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1.12.11

पश्चिम बंगाल/ परिवर्तन के छह महीने

शंकर जालान




पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस व कांग्रेस की गठजोड़ सरकार ने बीतों दिनों (२० नवंबर २०११) छह महीने पूरे कर लिए। वाममोर्चा को सत्ता से बाहर हुए यानि राज्य में परिवर्तन के २४ महीने पूरे हो गए। कहना गलत न होगा कि इन २४ महीनों में ही लोगों का विश्वास नई सरकार से डगमगाने लगा। जानकारों ने मुताबिक से लोग वाममोर्चा से ३४ साल में उबे थे और बड़ी उम्मीद से तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के हाथों में राज्य के बागडोर सौंपी थी, लेकिन ३४ साल बनाम ३४ हफ्ते तो क्या २४ हफ्ते में ही लोगों को दूध का दूध और पानी का पानी होता दिखने।
ममता के हठ और तुनकमिजाज से जगजाहिर है, लेकिन ऐसा लग रहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे कुछ गंभीर होंगी और जिस तरह से राज्य में परिवर्तन यानी बदलाव आया है ठीक उसी तरह ममता अपनी कार्य प्रणाली में भी बदलाव लाएंगी। बीते छह महीनों के क्रिया-कलाप के मद्देनजर यह कहने में कोई छिछक नहीं होगी कि जिस उम्मीद व आशा से राज्य की जनता ने ममता को सिर-माथे पर बैठाया या यूं कहें कि राज्य के मुख्यमंत्री बनने का मौके दिया था, उन पर लगभग पानी फिर गया है।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि जनता का ममता से इतनी जल्दी मोह भंग होने के पीछ कई ऐसे कारण हैं, जिसे ममता नरज अंदाज कर रही है। मसलन सब कुछ खुद करने की उनकी मंशा, जहां-तहां औचक दौरा, कार्यक्रमों में भारी-भरकम आर्थिक पैकेजों का एलान, अन्य मंत्रियों के काम में दखलअंदाजी, माओवादियों व गोरखालैंड समस्या और तो और थाने में जाकर अपनी समर्थकों को जबरन छुड़ा लाना। ममता भले ही ऐसा कर फूली नहीं समां रही हो, लेकिन जनता को ये कारनामे लोगों को नागवार लग रहे हैं। दबी जुबान से लोग यह कहने लगे हैं कि काहे का परिवर्तन ? कैसा परिवर्तन ? किसका परिवर्तन ?
चुनाव के पहले लेखिका महाश्वेता देवी ममता बनर्जी का ईद-गिर्द दिखती थी और ममता की तारीफ करते नहीं थकती थी। लोगों को लगता था कि एक विद्धान लेखिका खुलकर किसी पार्टी के समर्थक में बोल रही थी, ममता की पार्टी को वोट देने की अपील कर रही है, तो लेखिका की तौर पर उनकी बात माननी चाहिए। मंच में महाश्वेता और ममता के बीच मां- बेटी से रिश्ता नजर आता था, अभी छह महीने भी नहीं बीते कि महाश्वेता ने न केवल ममता के खिलाफ जहर उगलना शुरू किया, बल्कि उन्हें फांसीवाद की संज्ञा भी दे दी। हालांकि इसके एक दिन बाद ही महाश्वेता देवी एक बयान जारी कर कहा - उन्हें ममता सरकार पर पूरा भरोसा है। आम लोगों को भले ही इसमें कोई खास बात न नजग आती हो, लेकिन जानकारों के मुताबिक महाश्वेता देवी द्वारा ममता को फांसीवादी कहना तृणमूल के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं।
ममता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों में बुनियाद फर्क होता है। राजनीति से जुड़ा व्यक्ति अपने लाभ के लिए गलत का भी साथ दे सकता है, लेकिन अपवाद को छोड़ दे तो बुद्धिजीवी ऐसा नहीं करते। इस बाबत ममता बनर्जी को सांसद कबीर सुमन का ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही इस बात पर भी गौर करना चाहिए की उनके मंत्रिमंडल में तीन ऐसे मंत्री हें जो पूर्ण रूप से राजनेता नहीं है। राज्य के उच्चा शिक्षा मंत्री ब्रात्स बसु मूल रूप से नाटककार हैं और राजनीति से परे उनकी अलग समझ और पहचान। अमित मित्रा जो फिलहाल वित्त मंत्री की कुर्सी संभाले हुए हैं अर्थ शास्त्री हैं और फिक्की से सिचव रह चुके हैं। इसी तरह वाममोर्चा के शसन काल में राज्य के मुख्य सचिव रहे आईएएस अधिकारी मनीष गुप्त को ममता ने विकास व योजना विभाग की जिम्मेवारी सौंपी हैं। बसु, मित्र व गुप्त ऐसे लोग हैं, जो कभी भी ममता के खिलाफ मुखर हो सकते हैं। रही बात कांग्रेस के मंत्री व विधायकों की तो वे मौके की तलाश हैं। आग लगते ही वे उसमें घी डालने से पीछे नहीं हटेंगे।
ममता अपनी सहयोगी कांग्रेस से खासी नाराज हैं कि उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने राज्य को भारी आर्थिक तंगी से उबरने के लिए अब तक कोई खास सहायता नहीं दी है। ममता ने कहा कि केंद्र ने अब तक राज्य को एक पैसा भी नहीं दिया है। इससे पहले पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर उन्होंने केंद्र से नाता तोड़ने का भी एलान किया था। लेकिन बाद में अपना पांव पीछे खींचते हुए तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि अब अगर दोबारा कीमतें बढ़ीं तो वह सरकार से बाहर निकल जाएगी।
युवा कांग्रेस अध्यक्ष मौसम नूर और सांसद दीपा दासमुंशी की अगुवाई में निकले एक मौन जुलूस ने ममता को नाराज कर दिया है। कांग्रेस ने राज्य में अपने कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमले व पुलिस की चुप्पी के विरोध में यह जुलूस निकाला था। इससे नाराज ममता ने साफ कह दिया कि उनकी पार्टी यानी तृणमूल कांग्रेस राज्य में सरकार चलाने के लिए कांग्रेस पर निर्भर नहीं है। लेकिन कांग्रेस केंद्र में सरकार चलाने के लिए तृणमूल पर निर्भर है।
दूसरी ओर, कांग्रेस की नाराजगी की अपनी वजहें हैं। हाल में राज्य के कांग्रेस विधायकों व नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली जाकर राहुल गांधी व शकील अहमद से मुलाकात कर शिकायत की कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस के लोग पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य कहते हैं कि हम सरकार-विरोधी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता हमारे लोगों पर हमले कर रहे हैं। हम महज इसी मुद्दे को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि हम राज्य सरकार में साझीदार हैं और यह गठजोड़ जारी रहेगा। लेकिन हमने कहीं ऐसा कोई बांड नहीं भरा है कि कांग्रेस राज्य में अकेले कोई आंदोलन नहीं कर सकती।
लेकिन तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि कांग्रेस के लोग ही राज्य के विभिन्न इलाकों में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। मालदा के गाजोल में कांग्रेसियों के हाथों पार्टी के एक सदस्य की हत्या का भी आरोप लगाया। ममता का आरोप है कि कांग्रेस अपनी गतिविधियों से माकपा के हाथ मजबूत कर रही है।
दूसरी बड़ी समस्या माओवाद की है। कहना गलत नहीं होगा कि ज्यों-ज्यों दिन व्यतीत होते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और माओवादियों के बीच खटास बढ़ती जा रही है। दूसरे शब्दों में कहे तो अपनी-अपनी जिद के कारण अब ममता और माओवादी खुलकर आमने-सामने आ गए हैं। माओवादियों ने इकतरफा युद्धविराम का उल्लंघन कर और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की हत्या कर राज्य सरकार को कड़े कदम उठाने पर बाध्य कर दिया है। इसी के मद्देनजर राज्य सरकार ने अब उनके खिलाफ अभियान तेज करने का संकेत दिया है। इसी कड़ी में राज्य सरकार ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी मनोज वर्मा को माओवाद विरोधी बल (सीआईएफ) का एसपी बना दिया है। इसबीच, पुलिस ने पुरुलिया जिले में साझा सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के बरामद किए और पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ इलाके में बारूदी सुरंग बनाने में इस्तेमाल होने वाले विष्फोटक भारी मात्रा में जब्त किए।
ममता और माओवादियों के खींचतान के बाबत जानकारों का कहना है कि ममता का यह कहना कि सत्ता में आते ही छह सप्ताह के भीतर माओवादी समस्या का समाधान कर दिया जाएगी, छह सप्ताह तो दूर छह महीना बितने के बाद ममता अपने वायदे को पूरा नहीं कर पाई। इस मामले में ममता लगभग टांय-टांय फिस हो गई।

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