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16.1.12

दोहे नेता जी के !



दोहे  नेता जी  के  !





याचक बन नेता चले   ;घर घर मांगें वोट 
बदले में  ले लो  भले मदिरा ,साड़ी,नोट .

अग्नि  परीक्षा की  घडी  ;हाल  हुए  बेहाल  
जनता को  कैसे ठगें चले कौनसी चाल ?


पांच साल कटे मौज से  ; खूब  उड़ाया  माल 
जनता के  भी  खून  में अब आया  है  उबाल !

    .
भाषण  देने  की  भला  कैसे  करे मजाल ? 
जनता तो  अब  क्रोध  में  जूता  रही  उछाल ! 


.जूते  से  जो  डर  गया  ;नेता न  बन पाए  ,
डर  और  शर्म  जो  छोड़  दे  सो  नेता कहलाये  !

                                              शिखा  कौशिक  


6 comments:

Dr. O.P.Verma said...

बहुत बढ़िया।

Dr. O.P.Verma said...

बहुत बढ़िया।

शिखा कौशिक said...

thanks a lot verma ji .

मुक्ताभ said...

अच्छा लगा.......

मुक्ताभ said...

बहुत खूब....

शिखा कौशिक said...

hardik dhanyvad MUKTABH JI