Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

14.12.12

ये कैसा फर्ज


ये कैसा फर्ज 

माँ -बाप के प्रति श्रद्धा मेरे देश में कम होना मन को ठेस पहुँचाता है।पुत्र की कामना के
लिए भगवान् की चोखट पर मन्नत मांगने वाले माँ -बाप जब पुत्र पा जाते हैं और उसमे
अपने सुखद बुढ़ापे के सपने देखते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है।बच्चों के लिए अपनी
हर सुविधा को न्योछावर कर जब वे बूढ़े हो जाते हैं। यदि  उनका जवान बेटा उनके सपनों
को निर्ममता से तहस -नहस कर देता है तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी ,इस बात
को महसूस करने के लिए  एक छोटा सा वृत्तांत दे रहा हूँ जो सत्य है-

               बात करीब दस साल पुरानी है।मेरे एक परिचित मुलत: राजस्थान के रहने
वाले हैं।उनके पिताजी ने इकलोते बेटे के लिए जीवन भर पुरुषार्थ कर पाई-पाई जोड़ी
और बेटे को सुरत में कपड़े की थोक व्यापार की दूकान करवा दी। बाप के द्वारा मिले
धन से बेटा सुरत में सेट हो गया और अपने व्यापार को काफी फैला लिया।

              एक दिन मैं उनकी दूकान पर बैठा था तब उनके गाँव से उनके पिताजी की
चिट्ठी आई।उन्होंने चिट्ठी पढ़ी और मुझे बताया कि उनके पिताजी की तबियत ठीक
नहीं है और उन्हें मिलने के लिए गाँव बुलाया है।

            मेने कहा-आपको गाँव पड़ेगा ,क्योंकि आप उनके इकलोते बेटे हैं?

उन्होंने कहा- बात तुम्हारी सही है परन्तु इस समय सीजन चल रही है।शादी ब्याह का
समय है।इस समय कपड़े में काफी बिक्री रहेगी और गाँव चला गया तो 15-20दिन लग
सकते हैं ऐसे में उन्हें संभावित बिक्री से होने वाले फायदे से वंचित रहना पडेगा।

मेने कहा- लेकिन आपके पास कोई विकल्प भी नहीं हैं ?

वो बोले- एक विकल्प है ,मैं उन्हें 20000/- का ड्राफ्ट भेज देता हूँ,शायद उनके पास पैसे
नहीं होंगे इसीलिए बुला रहे होंगे।पैसे मिल जाने से वे अपना इलाज करा लेंगे।

  बात यहीं पर हम दोनों के बीच उस दिन आई गई हो गयी और अगले दिन उन्होंने
20000/- का बैंक ड्राफ्ट बना कर गाँव भेज दिया।

       8-10के बाद उनके पास गाँव से रजिस्टर्ड पोस्ट से एक लिफाफा आया जो उनके
पिताजी ने भेजा था उन्होंने उस पत्र को पढ़ा और मुझसे कहा- मेरे पिताजी एकदम
बचकाना हरकत कर रहे हैं।मैने उनको 20000/-भेजे, उन्होंने वापिस लौटा दिए हैं।

मेने पूछा- ......वापिस क्यों लौटा दिए ?कुछ लिखा होगा ?

वो बोले- हाँ ,लिखा है ....और उन्होंने वह पत्र मुझे दे दिया। मेने उस पत्र को पढ़ा।
उसमे लिखा " बेटे,तुम्हारा जबाब मिला और साथ में ड्राफ्ट भी।मेने अपनी तबियत
अस्वस्थ थी इसलिए तुझे गाँव आने का लिखा था।तूने जो रूपये भेजे हैं वो तो मेरे ही
दिए हुए थे उसका कोई तकाजा मेने नहीं किया इसलिए ये रूपये वापिस भेज रहा हूँ।
मेने तो अपने बेटे को बुलाया था जो इस अवस्था में मुझे सहारा दे सकता था लेकिन
पैसे कमाने की चिंता मेरे स्वास्थ्य से बढ़कर है तेरे लिए,यह जानकार मुझे दु:ख हुआ।
तुम वहां सुखी रहो ,मेरी चिंता मत करना।मैं जैसे तैसे अपनी गाडी चला लूंगा।

    मेने वह पत्र अपने परिचित मित्र को वापिस दे दिया।कुछ दिनों बाद मालुम चला
कि मेरे परिचित व्यापारी के पिता का देहांत गाँव में हो चूका है और उनका इकलोता
बेटा  सुरत से सपरिवार अंतिम संस्कार के लिए गया है।

     यह घटना मुझे झकजोर गयी थी।मेरे भारत की यह तस्वीर कैसे बन गयी क्योंकि
मेरी संस्कृति सिखाती है-मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: ....कहाँ खो गयी वो भावनाएँ ......                      

5 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

स्थिति कुछ ऐसी ही है आजकल जहाँ हम पश्चिम की सभ्यता से प्रेरित हो रहे है।।

हमें अपने में सजग रहने की जरुरत है।।बाकि सब ठीक हो जायेगा ..

जागरूक करता हुआ सामायिक पोस्ट।।।शुभकामनाएं

Aditya Tikku said...

utam-***

Aditya Tikku said...

utam-***

VASUDEV MISHRA said...

aapki is post ne andar tak jhakjhor kar rakh dia...

Gangaprasad Bhutra said...

vinodbhai,aditybhai vasudev bhai aap sabka aabhar.