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24.12.14

माँ भारती के दो सपूत महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी और महामानव पंडित अटलबिहारी वाजपेयी जी को भारतरत्न, इन दो ब्रह्माण्ड रत्नो के प्रति असीम भारतीय कृतज्ञता का प्रकटीकरण है ! शिक्षा, साहित्य, धर्म और राजनीति के साथ सनातन संस्कृति पोषक इन दोनों पुरोधाओं का सम्मान कर आज प्रत्येक भारतीय अपने आप को गौरवान्वित और सम्मानित अनुभव कर रहा है ! हार्दिक बधाई , अभिनन्दन !

17.12.14

आतंक का कोई मजहब नहीं होता

-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
पाकिस्तान के पेशावर स्थित आर्मी स्कूल में जिस क्रूर अंदाज में बेरहम आतंकवादियों ने मासूम बच्चों को छलनी किया उससे इंसानियत शर्मसार है। चार घंटे में आतंकियों ने लाशों का अंबार लगा दिया। जो सामने आया उसे भून डाला। पूरी दुनिया में घटना की निंदा हो रही है। सबसे बड़ा सवाल यह कि पाकिस्तान में ऐसी नौबत आयी क्यों? आतंकियों को पाला किसने? दरअसल हकीकत यह है कि पाकिस्तान अब खुद अपनी ही आग में झुलस रहा है। आतंक की हांडी में जिन कीड़ों को उसने पाला वही अब कुलबुला रहे हैं। कांटों के पेड़ लगाकर कभी फूल नहीं खिला करते। उम्मीद है पाकिस्तान को समझ आ रहा होगा कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता। कांटों के पेड़ लगाकर उस पर कभी फूल नहीं खिला करते। अब पाकिस्तान खुद आतंक की आग में झुलस रहा है। आतंक का एक ही मजहब होता है नफरत, तबाही, हिंसा और मौत। मिया नवाज शरीफ कहतें हैं कि अब आतंकवाद से लड़ेंगे और पहले पूरी दुनिया बोल रही थी तब समझ नहीं आया? आतंक के खिलाफ पाकिस्तान ने आवाज उठाई होती, तो मासूमों की जान नहीं जाती। दर्जनों परिवारों के पास अब दर्द और आंसुओं के सैलाब हैं। उनका क्या गुनाह था? मासूमों की कब्रों परा चढ़कर पता नहीं आतंकी कौन सी जन्नत में जाएंगे? चरमपंथी हमले पाकिस्तान में होते रहे हैं। आतंक का जड़ से सफाया जरूरी है वरना यह आग ओर भी झुलसायेगी। इंसानियत का वजूद भी पूरी तरह खो जायेगा।

15.12.14

आचार्य तुलसी के अप्रकाशित फोटो की एलबम नुमा बूक

मान्यवर जी,
आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी वर्ष में  आचार्य तुलसी के अप्रकाशित फोटो की एलबम नुमा बूक का प्रकाशन  हुआ है। देश के जाने माने एवं पदम्  श्री अवार्ड से सम्मानित फोटोग्राफर रघु राय के इस फोटो एलबम बूक की प्रस्तावना दलाई लामा जी द्वारा लिखी गयी है।   यह एक   ऐतिहासिक कृति है, जिसे पीढ़ियों तक सुरक्षित व संग्रहित किया जा सकता है, साथ ही आप अपने परिजनों, मित्रों को भेंट भी दे सकते हैं।यह एलबम विक्रय हेतु नैतिकता के शक्तिपीठ ,गंगाशहर  पर उपलब्ध है। शीघ्र संपर्क करें। मो. 9414139192 . 01512270396
धन्यवाद।

25.11.14

45वें भारत का अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की शुरूआत
मुख्य अतिथि अमिताभ बच्चन ने किया दीप प्रज्जवलित
- रविकुमार बाबुल


गुजरे जमाने की यादें ताजा करने वाली रोमांचकारी प्रस्‍तुतियों के बीच 45वें भारत अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की रंगारंग शुरूआत समारोह के मुख्य अतिथि और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी स्‍टेडियम, बम्‍बोलिम में दीप प्रज्जवलित कर किया ।
इस अवसर पर अमिताभ बच्चन का साथ देते हुए गोवा की राज्‍यपाल श्रीमती मृदुला सिन्‍हा, केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरूण जेटली, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, गोवा के मुख्‍यमंत्री लक्ष्‍मीकांत पार्सेकर, सूचना एवं प्रसारण राज्‍य मंत्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौर, प्रतिष्ठित अभिनेता रजनीकांत, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव बिमल जुल्‍का ने भी दीप प्रज्‍ज्‍वलित किया। मंच पर अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍यूरी के अध्‍यक्ष सलाओमिरइदजियाक, झांग जियानया, नाडिया द्रेष्टि, मैरी ब्रेनर और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री सीमा बिश्‍वास ने भी उपस्थिति दर्ज की। मंच का संचालन अभिनेता अनुपम खेर और अभिनेत्री रवीना टंडन ने किया।
अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव के मुख्‍य अतिथि अमिताभ बच्‍चन ने अपने संबोधन में विभिन्‍न कालखंडों में छा जाने वाली थीम पर बनी उत्‍कृष्‍ट फिल्‍मों का जिक्र करते हुए भारतीय सिनेमा के आकर्षक विकास पर रोशनी डाली। श्री बच्‍चन ने भारत की विविधिता एवं अनेकता के संदर्भ में भारतीय सिनेमा की भूमिका एवं प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया। इस अवसर पर समारोह के मुख्‍य अतिथि अमिताभ बच्‍चन और केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने भारतीय सिनेमा में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित अभिनेता रजनीकांत को भारतीय फिल्‍म व्यक्तित्व के लिए शताब्‍दी सम्मान प्रदान किया। सम्मान ग्रहण करते हुए उन्‍होंने इसे अपने निर्माताओं, निर्देशकों, सह अभिनेताओं, टेक्‍नीशियनों और प्रशंसकों को समर्पित किया। इस अदभुत और प्रसिद्ध अभिनेता ने रूपहले पर्दे पर सिनेमा दर्शकों को हर प्रकार से लुभाया है। अपने स्‍वयं के प्रदर्शन को पर्दे पर देखकर वे भावुक हो उठे। इस अवसर पर उन्हें दस लाख रुपये, प्रमाणपत्र और रजत मयूर पदक प्रदान किया गया। भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पिछले साल से यह सम्मान आरम्भ किया गया था।
उदघाटन समारोह के दौरान महोत्‍सव की अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍यूरी का भी परिचय सिने प्रेमियों से कराया गया। जिनमें चेयरमैन श्री सलाओमिरइदजियाक (पोलैंड के जाने-माने फिल्‍म निर्माता), श्री झांग जियानया (चीन के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्देशक), नाडिया द्रेष्टि (स्विट्जरलैंड के मशहूर फिल्‍म निर्माता व अंतर्राष्‍ट्रीय लोकार्नो फिल्‍म महोत्‍सव के प्रमुख), मैरी ब्रेनर (जाने-माने अमेरिकी फिल्‍म आलोचक) और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री सीमा बिश्‍वास शामिल थीं।
श्वेत-श्याम सिनेमा युग की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और नृत्‍यांगना पद्मिनी की भतीजी शोभना पिल्‍लई की अपने समूह के साथ आकर्षक प्रस्‍तुतियों ने दर्शकों के स्‍मृति पटल पर भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध नृत्‍य प्रस्‍तुतियों की यादें ताजा कर दीं, खासकर  ‘होठों पे ऐसी बात में दबा के चली आई’ और ‘पिया तो से नैना लागे रे’ जैसे नृत्‍यों ने फिजा में स्‍वप्‍निल जादू बिखेरते हुए उपस्थित अतिथियों को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। इस अवसर पर उपस्थित अन्‍य जानी-मानी हस्तियों में सतीश कौशिक, मनोज बाजपेयी और रूपा गांगुली भी शामिल हुये।
उदघाटन समारोह के दौरान स्‍वच्‍छ भारत को प्रोत्‍साहन देने वाली फिल्‍म के अलावा महोत्‍सव की सिग्‍नेचर फिल्‍म भी दिखाई गई। सिग्‍नेचर फिल्‍म का निर्देशन शाजी एन. करुण ने किया है जो भारत के एक जाने-माने फिल्‍म निर्माता हैं। ईरान के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्माता मोहसेन मखमलबफ द्वारा निर्देशित की गई ‘द प्रेसिडेंट’ महोत्‍सव की शुरुआती फिल्‍म थी।
गोवा में आयोजित 11 दिवसीय 45वें भारत अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के दौरान 79 देशों की 178 फिल्‍में दिखाई जायेंगी। इन फिल्‍मों को विभिन्‍न श्रेणियों में बांटा गया है। विश्‍व सिनेमा (61 फिल्‍में), मास्‍टर-स्‍ट्रोक्‍स ( 11 फिल्‍में), महोत्‍सव बहुरूपदर्शक (फेस्टिवल केलिडोस्‍कोप) (20 फिल्में), सोल ऑफ एशिया (07 फिल्‍में), डाक्‍यूमेंट्री (06 फिल्‍में), एनीमेटेड फिल्‍में (06 फिल्‍में) इन श्रेणियों में शामिल हैं। इसके अलावा भारतीय पैनोरमा वर्ग में 26 फीचर और 15 गैर फीचर फिल्‍में होंगी। पूर्वोत्‍तर महोत्‍सव का फोकस क्षेत्र है, इसलिए आईएफएफआई 2014 में भारत के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की 07 फिल्‍में प्रदर्शित की जाएंगी। क्षेत्रीय सिनेमा भी महोत्‍सव का महत्‍वपूर्ण अंग होगा। इस वर्ष के समारोह में गुलजार और जानू बरूआ पर पुनरावलोकन वर्ग (रिट्रोस्‍पेक्टिव सेक्‍शंस), रिचर्ड एटनबरो, रॉबिन विलियम्‍स, ज़ोहरा सहगल, सुचित्रा सेन पर विशेष समर्पित फिल्‍में और फारूख शेख को विशेष श्रद्धाजंलि अन्‍य आकर्षण होंगे। नृत्‍य पर केंद्रित फिल्‍मों का एक विशेष वर्ग होगा तथा व्‍यक्तित्‍व आधारित पुनरावलोकन (रिट्रोस्‍पेक्टिव) और मास्‍टर क्‍लासेज/कार्यशालाएं भी आईएफएफआई 2014 का हिस्‍सा होंगे।
आम सिनेप्रेमियों के लिए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर मुफ्त में भारतीय फिल्‍मों की ओपन एयर स्‍क्रीनिंग इस महोत्‍सव का नया आकर्षण है। फिल्‍मों के प्रथम विश्‍व प्रदर्शन के अलावा आईएफएफआई 2014 के दौरान प्रतिनिधियों के लिए फिल्‍म बाजार, 3डी फिल्‍में, भोज, मास्‍टर क्‍लासेज, पैनल परिचर्चा व स्‍टॉल्‍स और ओपन एयर स्‍क्रीनिंग जैसी रंगपटल की गतिविधियां संचालित हुईं ।

20.11.14

कबीरपंथियों के पाखंड की पराकाष्ठा हैं रामपाल

20 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,साहेब बंदगी!
कबीर कहते हैं कि
कबीरा जब हम पैदा हुए जग हँसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो हम हँसें जग रोये।
मगर कबीर के अनुयायी अब जो कर रहे हैं उसको देखकर दुनिया हँस भी रही है और रो भी रही है। हँस रही है यह देखकर कि कबीर ने क्या कहा था और अनुयायी क्या कर रहे हैं और रो रही है उनके नैतिक पतन को देखकर। यह देखकर कि जो कबीर आजीवन पाखंड और पाखंडवाद से लड़ते रहे उनके ही नाम पर उनके कथित भक्तों ने यह कैसा पाखंड का साम्राज्य खड़ा कर दिया!
मित्रों,मैं वर्षों पहले अपने एक आलेख कबीर के नाम पर पाखंड का साम्राज्य में कबीर के नाम पर फैले पाखंड के साम्राज्य पर काफी विस्तार से लिख चुका हूँ लेकिन मैं जहाँ तक समझता था कबीर के नाम पर धंधा करनेवाले उससे कहीं ज्यादा ठग,चोर,फरेबी,पाखंडी और मानवशत्रु निकले। अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह बाबा रामपाल कैसा कबीरपंथी है और किस तरह से कबीरपंथी है। कबीर ने तो अपने प्रशंसकों को इंसान बनने और इंसानों के साथ इंसानों की तरह पेश आने की शिक्षा दी थी फिर यह रामपाल भगवान कैसे बन गया? पूरे आश्रम में जमीन के भीतर बने सुरंगों के माध्यम से कहीं भी प्रकट हो जाना,विज्ञान के चमत्कारों के माध्यम से हवा में चलना,लेजर की सहायता से अपने चारों ओर आभामंडल बनाना और सिंहासन सहित आसमान से उतरना आदि के माध्यम से रामपाल तो क्या कोई भी भगवान बन सकता है।
मित्रों,हमें इस बात को भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि कबीरपंथ के अधिकतर अनुयायी गरीब और दलित-पिछड़ी जातियों से आते हैं जिनके खाने के भी लाले पड़े होते हैं। स्वाभाविक रूप से उनमें से ज्यादातर अनपढ़ होते हैं और उनमें इतनी बुद्धि नहीं होती कि वे रामपाल के चमत्कारों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर कस सकें। रामपाल ने गिरफ्तारी से बचने के लिए जो मानव-शील्ड बनाई उनमें से अधिकतर लोग इसी तरह के थे।
मित्रों,विज्ञान और संचार-क्रांति का उपयोग जहाँ इस तरह की ठगविद्या के भंडाभोड़ के लिए होना चाहिए वहीं दुर्भाग्यवश उसका उपयोग ठगने के लिए किया जा रहा है। दिनभर टीवी चैनलों पर ऐसे बाबाओं से संबंधित कार्यक्रम आते रहते हैं जिनमें से कोई जन्तर बेच रहा होता है तो कोई भविष्य बतानेवाली किताब और कोई तो अपनी कृपा भी। और आश्चर्य की बात तो यह है कि 21वीं सदी में भी इन बाबाओं की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं।
मित्रों,रहा बाबा रामपाल का सवाल तो यह आदमी संत या अवतार तो क्या आदमी कहलाने के लायक भी नहीं है। जो व्यक्ति आदमी की जान का इस्तेमाल अपने को जेल से जाने से बचने के लिए करे उसको भला अवतार (भले ही संत कबीर का ही) कहा जा सकता है क्या? संत या अवतार तो वो है जो एक आदमी की प्राण-रक्षा के लिए अपने प्राण को न्योछावर कर दे। कबीर संत थे जिन्होंने अंधविश्वास,भेदभाव,छुआछूत और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई। भले ही तत्कालीन शासक सिकंदर लोदी ने तीन-तीन बार उनपर जानलेवा हमला क्यों न करवाया कबीर न तो डरे और न ही जान की परवाह ही की। कबीर ने तो भगवान से बस इतना ही मांगा था-
साईँ इतना दीजिए जामें कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
अर्थात् हे ईश्वर,हमको बस इतना बड़ा घर दे दो जिसमें मेरा पूरा परिवार समा जाए और इतना धन दे दो कि न तो मेरा परिवार ही भूखा रहे और न हीं अतिथि को मेरे द्वार से भूखा लौटना पड़े। फिर कबीर के रामपाल जैसे अनुयायियों को क्यों राजाओं जैसे ऐश्वर्यपूर्ण ठाठ-बाट की आवश्यकता पड़ गई? वे क्यों उस महाठगनी माया के चक्कर में पड़ गए जिसे बारे में कबीर ने कहा था कि-
माया महा ठगनी हम जानी।
तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरी बानी।।
केसव के कमला भय बैठी शिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत भय बैठीं तीरथ में भई पानी।।
योगी के योगन भय बैठी राजा के घर रानी।
काहू के हीरा भय बैठी काहू के कौड़ी कानी।।
माया महा ठगनी हम जानी।।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कहीं पर संत कबीर की आत्मा होगी तो आज जरूर रो रही होगी। कबीर ने अपने जीते-जी ऐसा कभी नहीं कहा कि उनको उनकी मृत्यु के बाद कथित भूदेव ब्राह्मणों की तरह देवता या भगवान का दर्जा दे दिया जाए बल्कि वे तो लोगों की ज्ञान-चक्षु खोलना चाहते थे जिससे कोई बाबा या ढोंगी उनको बरगला न सके। वे तो चाहते थे कि लोग किताबों में लिखी बातों से ज्यादा अपनी तर्कशक्ति,बुद्धि और विवेक पर विश्वास करें। वे तो चाहते थे कि लोग जब उनकी बातों पर अमल करें और उनकी शिक्षाओं का पालन करें तब भी आँख मूंदकर न करें बल्कि भले-बुरे पर विचार करके करें फिर कबीर को किसने और क्यों साधारण इंसान से साक्षात् परब्रह्म बना दिया? क्या ऐसा रामपाल जैसे ढोंगियों ने इसलिए नहीं किया क्योंकि उनको खुद को भगवान घोषित करना था और लोगों के विश्वास का नाजायज फायदा उठाना था?
मित्रों,अंत में दुनिया के तमाम कबीरपंथियों और सारे अन्य पंथियों से मेरा यह विनम्र निवेदन है कि वे सारे महामानवों को इंसान ही रहने दें भगवान न बनाएँ क्योंकि जैसे ही हम उनको भगवान मान लेंगे उसी क्षण हम यह भी मान लेंगे कि इनके जैसा हो पाना किसी भी मानव के लिए संभव ही नहीं है। चाहे वे राम हों,कृष्ण हों,बुद्ध,ईसा,महावीर या कबीर हों ये सभी इंसान थे और इस धरती पर विचरण करते थे। इन्होंने भी उसी प्रक्रिया से जन्म लिया था जिस प्रक्रिया से हम सभी ने लिया है। इनके भीतर जरूर ऐसे गुण थे जिसके चलते इन लोगों को महामानव की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे गुण हमारे भीतर भी हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर इन महामानवों के महान गुणों का विकास करें,उनके आदर्शों पर चलें और पूरी दुनिया को महामानवों की दुनिया बनाएँ न कि दिन-रात इनका नाम रटें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा उसी दिन धरती पर सतयुग आ जाएगा न कि किसी मकान या महल का नाम सतलोक आश्रम रख देने से आएगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

19.11.14

मेला सोनपुर का आता है हर साल,आके चला जाता है

19 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,भारत त्योहारों और मेलों का देश है। यहाँ रोजाना कोई न कोई-न-कोई पर्व-त्योहार होता है और रोज कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी हिस्से में मेला लगता है मगर सोनपुर के हरिहर क्षेत्र मेले की तो साहब बात ही कुछ और है। हाँ भई यह मेला उसी हरिहरनाथ के पूजन के सिलसिले में लगता है जिसके गीत हर साल बिहार और पूर्वांचल के कोने-कोने में होली में गाए जाते हैं-बाबा हरिहरनाथ,बाबा हरिहरनाथ सोनपुर में रंग लूटे,होरी राम हो हो हो,बाबा हरिहरनाथ बाबा हरिहरनाथ.....।
मित्रों,कोई नहीं कह सकता कि यह विश्वप्रसिद्ध मेला कितने सालों से लग रहा है। पहले बिहार के लोग सालभर इस मेले का इंतजार करते। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बैलगाड़ी जुतती और लोग दाल-चावल बर्तन लेकर मेले में आते। गंगा-नारायणी के पवित्र संगम पर गंगा-स्नान करते और मेला घूमते। तब यहाँ कई वर्ग किलोमीटर में हाथी,घोड़े,गाय,बैल,बकरी और भैंसों के बाजार लगते। लोग जानवरों को बेचते और खरीदते। रात में किसी पेड़ के नीचे दरी बिछाकर या बैलगाड़ी पर ही सो जाते। लौटने लगते तो ग्रामीण सामुदायिक व व्यक्तिगत उपयोग के लिए दरी,कंबल,बर्तन,चादर,साड़ियाँ-कपड़े,खिलौने,मिठाई आदि लेकर लौटते। गांव में बच्चों को भी अपने पिता-चाचा-दादा-मामा के मेले से लौटने का बेसब्री से इंतजार रहता। अगर किसी बच्चे को मेले में स्वयं जाने का अवसर मिल जाता तो समझिए कि उसकी तो लौटरी ही लग गई। फिर वो कई महीनों तक अपने ग्रामीण मित्रों को मेले की कहानियाँ सुनाता रहता।
मित्रों,बदलते जमाने के साथ दुनिया बदली है,लोग बदले हैं सो सोनपुर मेला भी बदला है। अब ज्यादातर लोग मोटरसाईकिल से आते हैं। स्टैंडवाले को 5 के बदले 15 रुपया देकर गाड़ी खड़ी करते हैं और घूम-फिरकर घर चल देते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सुबह की ट्रेन से आते हैं और शाम की ट्रेन से वापस लौट जाते हैं। अभी भी मेले के लिए पूरे एक महीने तक ट्रेन मेले में रूकती है। जानवर के नाम पर अब दस-बीस घोड़ों और कुछ दर्जन गाय-भैसों,कुछेक बैलों के अलावा और कुछ होता नहीं होता। अब गांव में भी ज्यादातर लोगों ने गाय-बैलों को पालना छोड़ दिया है क्योंकि अब खेती बैलों से नहीं मशीनों से होती है नहीं तो एक जमाना वह था जब 1856 में बाबू कुंवर सिंह ने इसी मेले से अपनी सेना के लिए एकसाथ 5000 घोड़े खरीदे थे। फिर भी मेले में भीड़ कम नहीं होती। बिहार सरकार की प्रदर्शनियाँ हर साल की तरह इस साल भी लगी हैं लेकिन देखने से लगता है कि जैसे पिछले साल से कोई बदलाव नहीं किया गया है। वहीं जानकारियाँ,वहीं तस्वीरें।
मित्रों,लोगों की भगवान के प्रति आस्था में कमी आई है जिसके चलते जहाँ मेले में अपार भीड़ होती है वहीं बाबा हरिहरनाथ के मंदिर में इक्के-दुक्के लोग ही दिखते हैं। मेले में हर मजहब के लोग देखे जा सकते है। हिन्दू,मुसलमान और कुछेक विदेशी सैलानी भी। मेला घूमते-घूमते अगर थक गए हों तो बिहार सरकार के जन संपर्क विभाग के पंडाल में आ जाईए। सैंकड़ों कुर्सियाँ लगी हुई हैं और लगातार लोकगीतों का गायन चलता रहता है जिस पर नर्तक-नर्तकियाँ नृत्य भी करते रहते हैं। मेले में ही मुझे एक मित्र से कई साल बाद भेंट भी हो गई। जनाब कभी माखनलाल के नोएडा परिसर में हमारे साथ पढ़ते थे और आजकल बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं। नाम है-रंजय कुमार। पहले तो जनाब ने पहचाना ही नहीं लेकिन बाद में जब मैंने अपना प्रेस कार्ड दिया तब पहचान लिया।
मित्रों,कुछ लोगों का मानना है कि एक दिन यह मेला समाप्त हो जाएगा लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। सोनपुर मेला हमारी शान है हमारी आन है। एक स्थान पर यहाँ मनोरंजन के जितने साधन हैं,जितने खिलौने,खाद्य-सामग्री और रोजाना उपयोग में आनेवाली चीजें बिक रहीं हैं शायद दुनियाँ में ऐसा नजारा कहीं और शायद ही देखने को मिले। पिछले कई सालों से कुछ कमी प्रशासन की तरफ से भी रही है। किसी समय सोनपुर के काली घाट और हाजीपुर के कोनहारा घाट के बीच नावों का लचका पुल बनता था जो अब नहीं बनाया जाता। अगर बनता तो मेले की शोभा में चार चांद लग जाते। कल मेरी भी ईच्छा हो रही थी कि मैं पैदल ही इस पार से उस पार कोनहारा घाट चला जाऊँ लेकिन ऐसा हो न सका। एक और कमी मुझे शिद्दत से महसूस हुई और वह है शौचालय की कमी। कहने को तो प्रशासन ने बँसवारी में टाट से घेर कर शौचालय बनवा दिए हैं लेकिन वे इतने गंदे हैं कि कोई उनमें नहीं जाता और लोग यत्र-तत्र मल-त्याग करते रहते हैं जिससे घोड़ा बाजार की तरफ तो जाना भी मुश्किल हो जाता है। हमने कई महिलाओं को खुले में ही शौच करते देखा और हम नहीं समझते कि यह सब देखकर देश-विदेश से आनेवाले सैलानियों के मन में बिहार की कोई अच्छी छवि बनेगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

16.11.14

दुनिया के सबसे बड़े हवाबाज और वादावीर नेता हैं नीतीश

16 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के पीएम इऩ वेटिंग नीतीश कुमार के भाषणों को सुनकर उनपर दया भी आती है और हँसी भी। आश्चर्य होता है कि नीतीश कुमार कितने झूठे और बेशर्म हैं! मैं एक बिहारी होने और पिछले सात सालों से बिहार में ही रहने के कारण यह  दावे के साथ कह सकता हूँ कि न सिर्फ भारत बल्कि पूरी वसुंधरा पर नीतीश कुमार से बड़ा दूसरा कोई वादावीर इस समय नहीं है और गजब यह कि अपने 9 सालों के काफी लंबे शासन में अपना एक भी वादा पूरा नहीं करनेवाले नीतीश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके छठे महीने में ही उनके द्वारा किए गए वादों का हिसाब मांग रहे हैं।
मित्रों,जब 2005 का विधानसभा चुनाव चल रहा था तब नीतीश कुमार ने बिहार को सुशासन देने का वादा किया। बिहार में सुशासन तो आया नहीं मगर नौकरशाहों का शासन जरूर आ गया। मतलब कि एक अति के बदले नीतीश ने दूसरी अति को स्थापित कर दिया। इसी प्रकार जब वर्ष 2010 का विधानसभा चुनाव चल रहा था तब नीतीश कुमार ने बिहार की जनता से वादा किया कि पहली पारी में हमने कानून-व्यवस्था में सुधार किया अब अगली पारी में भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। हालाँकि रोज-रोज बिहार में औसतन तीन-चार घूसखोरों को रंगे हाथों पकड़ा गया लेकिन इससे राज्य में भ्रष्टाचार की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा बल्कि बढ़े हुए जोखिम के मद्देनजर रेट में कई गुना की बढ़ोतरी हो गई।
मित्रों,फिर भी बिहार की जनता नीतीश सरकार से काफी हद तक संतुष्ट थी मगर इसी बीच नीतीश जी पर भारत का प्रधानमंत्री बनने का फितूर सवार हो गया और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से सांप्रदायिकता के नाम पर गठबंधन तोड़ दिया। बिहार की जनता हतप्रभ थी कि जो पार्टी पिछले 18 सालों से धर्मनिरपेक्ष थी 2014 के लोकसभा चुनावों के समय कैसे सांप्रदायिक हो गई। जनता ने नीतीश के इस घोर अवसरवादी कदम और सहयोगी दल के साथ की गई धोखेबाजी को बिल्कुल भी पसंद नहीं किया और उनकी पार्टी आज बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी बन चुकी है।
मित्रों,इसी तरह नीतीश जी ने कहा था कि अगर 2015 तक बिहार के हर गांव और घर में बिजली नहीं पहुँची तो वे वोट मांगने नहीं आएंगे मगर नीतीश जी अपने इस वचन पर भी कायम नहीं रहे और विधानसभा चुनावों से एक साल पहले से ही जनता के द्वार पर जा पहुँचे हैं। नीतीश जी ने अपनी धन्यवाद यात्रा और विकास यात्रा के दौरान बिहार के कई गांवों में रात बिताई और जमकर थोक में शिलान्यास किया। बेगूसराय और मोतीहारी की जनता ने जब कई महीनों के इंतजार के बाद भी पाया कि काम शुरू नहीं हो रहा है तब उन्होंने शिलापट्ट को उखाड़कर फेंक दिया। इधर नीतीश जी भी यकीनन शिलान्यासों को भूल चुके थे। मेरे क्षेत्र राघोपुर (वैशाली) की जनता भी इन दिनों काफी निराश है क्योंकि उनकी सड़क-पुल की उम्मीद धूमिल होने लगी है और इस दिशा में कहीं कोई काम होता हुआ नहीं दिख रहा है। बिहार के भूमिहीनों के साथ नीतीश कुमार ने वादा किया था कि उनको तीन-तीन डिसमिल जमीन दी जाएगी मगर हुआ कुछ नहीं। इसी तरह नीतीश जी ने बिहार के हर जिले में पॉलिटेक्निक और हर गांव में उच्च विद्यालय खोलने का वादा किया था जो शायद अब उनको याद भी नहीं है। नीतीश जी यह भी भूल गए हैं कि उन्होंने मार्क्सवादी नेता स्व. वासुदेव सिंह के इस आरोप कि बिहार सरकार प्राईवेट कंपनी बन गई है के जवाब में कहा था कि अबसे बिहार सरकार कांट्रैक्ट के आधार पर नहीं बल्कि स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी। इसी प्रकार नीतीश कुमार महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं कर पाए जो आज तक भी नहीं हो पाई है। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि बीपीएससी की परीक्षा अब प्रत्येक साल हुआ करेगी लेकिन वे यह वादा भी पूरा नहीं कर सके। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे बिहार में कानून का राज कायम करेंगे मगर नीतीश की पहली पारी के विपरीत आज के बिहार में फिर से जंगलराज की स्थिति बन गई है। इसी तरह नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे कभी जाति-धर्म की राजनीति नहीं करेंगे बल्कि हमेशा विकास की राजनीति करेंगे। नीतीश जी ने कहा था कि मंदिरों-मस्जिदों और स्कूलों के पास शराब की सरकारी दुकानें नहीं खोली जाएंगी और जो दुकानें खुल गई हैं उनको बंद कर दिया जाएगा मगर अफसोस ऐसा हो न सका। नीतीश कुमार ने पटना को जलजमाव से मुक्त करने का वादा भी किया था लेकिन राजधानी पटना इस साल भी बरसात में झील में बदल गई और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद भी बनी रही। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे बिहार की शिक्षा-व्यवस्था का कायाकल्प कर देंगे मगर उन्होंने उल्टे शिक्षा को बर्बाद कर दिया। इस साल इंटर के परीक्षार्थियों के साथ कैसा मजाक हुआ यह पूरी दुनिया ने देखा है। स्क्रूटनी में कॉपियाँ जाँची नहीं गईं और कॉपियों को खोले बिना ही एक-दो नंबर बढ़ा दिए गए जिससे मेधावी छात्र-छात्राओं का एक साल बर्बाद हो गया।
मित्रों,हम कहाँ तक गिनवाएँ कि नीतीश कुमार ने कितने वादे किए थे शायद शेषनाग भी नहीं गिना पाएंगे। हाँ,हम इतना दावे के साथ कह सकते हैं कि नीतीश कुमार ने उनमें से किसी भी एक भी वादा को पूरा नहीं किया। इस प्रकार हम उनको भारत का सबसे बड़ा वादावीर के रूप में विभूषित कर सकते हैं। जहाँ तक नरेंद्र मोदी का सवाल है तो कालाधन से लेकर प्रत्येक मुद्दे और वादे पर केंद्र सरकार कायम है और संजीदगी व शीघ्रता से उस दिशा में कदम भी उठा रही है। यहाँ तक कि जी20 की बैठकों में भी मोदी का सबसे ज्यादा जोर भ्रष्टाचार और कालेधन की वापसी पर ही है। ये बात और है कि नीतीश जी की रणनीति चूँकि केंद्र सरकार की कथित विफलताओं को मुद्दा बनाकर बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ना है इसलिए उनको केंद्र सरकार काम करती हुई दिख ही नहीं रही जबकि होना तो यह चाहिए उनको केंद्र की वर्तमान सरकार की विफलताओं के मुद्दे पर नहीं बल्कि अपनी सरकार की सफलताओं के मुद्दे पर चुनावों में जाना चाहिए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

नीतीश की भई गति साँप छछूंदर केरी

16 नवंबर,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,रामचरितमानस में एक प्रसंग है कि कैकयी द्वारा वर मांगने के बाद राम वनवास जाने को उद्धत होते हैं। जाने से पहले जब वे अपनी जननी कौशल्या से अनुमति लेने जाते हैं तब उनकी माँ असमंजस में पड़ जाती है कि करूँ तो क्या करूँ? अगर अपने पुत्र को वन जाने से रोकती है तो पति पर वचनभंग का कलंक लगता है और अगर वनवास पर जाने को कहती है पति के प्राण चले जाएंगे। ऐसे में माता कौशल्या की स्थिति वही हो गई थी जैसी कि छुछुंदर को निगल लेने के बाद साँप की हो जाती है। साँप अगर छुछुंदर को निगल जाता है तो मर जाएगा और अगर उगल देता है तो लोकमान्यताओं के अनुसार अंधा हो जाएगा।

मित्रों,लगभग वही स्थिति इन दिनों बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी की भी है। नीतीश जी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ तो दिया मगर लोकसभा चुनावों में बिहार की जनता ने उनके इस कदम को पसंद नहीं किया। घबराहट के मारे उन्होंने अपने चिरशत्रु लालू प्रसाद यादव के साथ नया गठबंधन बनाया और साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा मगर फिर से जनता ने उनकी पार्टी को लालू प्रसाद की पार्टी से आधी ही सीट दी। कहने का तात्पर्य यह कि एक नहीं दो-दो बार दो-दो चुनावों में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को राजद के मुकाबले आधी ताकतवाला दल साबित हो चुका है ऐसे में स्वाभाविक तौर पर अगले साल होनेवाले विधानसभा आम चुनावों में राजद उनको अपने बराबर सीट नहीं देनेवाला है। कल डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने सीटों के बँटवारे के लिए लोकसभा चुनाव,2014 में प्राप्त मत-प्रतिशत को आधार बनाने की मांग करके इस बात का संकेत भी दे दिया है।

मित्रों,ऐसे में नीतीश कुमार चाहते ही नहीं हैं कि महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ा जाए और इसलिए वे जनसमर्थन जुटाने के लिए संपर्क-यात्रा पर निकले हुए हैं। एक और मोर्चे पर नीतीश जी हालत न घर के घाट वाली हो रही है। नीतीश जी ने जीतनराम मांझी को कठपुतली समझकर अपने स्थान पर मुख्यमंत्री तो बना दिया लेकिन मांझी अब सिर का दर्द बन गए हैं। वे लगातार अपने बेतुके बयानों से विवाद खड़ा कर रहे हैं और बाँकी जातियों को दरकिनार कर केवल दलितों-महादलितों के नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं जिससे पार्टी के प्रति अन्य जातियों में गुस्सा पैदा हो रहा है। इस प्रकार नीतीश कुमार न तो मांझी को मुख्यमंत्री बनाए रख सकते हैं और न ही हटा ही पा रहे हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

15.11.14

ब्लाउस फाड़ कर तमाशा खड़ा कर दूंगी



आर टी आई अर्थात सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से सूचना लगाना  अब इतना आसान नहीं रह गया है. अब तो धमकी दी जाती है इसमें महिलाये अपने महिला होने का फायदा उठती है जबकि यही महिलाये हमेशा पुरुष के बराबरी का अधिकार मांगती है.

हमने पिछले दिनों राष्ट्रिय माध्यमिक शिक्षा मिसन के अंतर्गत कटनी जिले में चलने वाले बालिका छात्रावासो में चल रहे भ्रष्टाचार की पोल-खोलने के उद्देश्य से आर टी आई के माध्यम से जानकारी मांगी

इस पर रमसा बालिका छात्रावास रीठी की अधीक्षिका ने प्रिंसिपल के माध्यम से वांछित रूपये जमा करा लिए और इसकी पावती  भी नहीं दी.

हफ्ते भर बाद प्रिंसिपल के सामने यह अधःक्षिका तिरिया चरित्र बताते हुए कहने लगी की एक महिला से बात करने  की तमीज नहीं है मै अभी ब्लाउस फाड़ कर तमाशा खड़ा कर दूंगी और फसा दूंगी

यह जानकारी मैंने  जिला शिक्षा अधिकारी कटनी से मांगी है ऐसे में इस वार्डन का  व्यवहार कई सवाल खड़े करता है ?

जबकि इसी बालिका छात्रावास में इसका पति भी रहता है जिसे प्रिंसिपल से लेकर सभी उच्च अधिकारी जानते है लेकिन कुछ नहीं बोलते

कारण तो आप समझ चुके होगे

अब देखो कैसे मुझे यह जानकारी मिलती है

अखिलेश उपाध्याय

12.11.14

कांग्रेस का इतिहास है इसलिए कांग्रेस अब इतिहास है

12 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात उस समय की है जब फ्रांस का शासक नेपोलियन महान फ्रांस के सैनिक स्कूल में पढ़ता था। उसके साथ फ्रांस के बड़े-बड़े कुलीन सामंतों के लड़के पढ़ते थे। चूँकि नेपोलियन कुलीन नहीं था इसलिए वे उससे जलते थे। एक दिन उन्होंने नेपोलियन को नीचा दिखाने के लिए उससे पूछा कि तुम किस वंश के हो। नेपोलियन ने पूरी दृढ़ता के साथ उत्तर दिया कि मेरा वंश मुझसे शुरू होता है।
मित्रों,इन दिनों भारत की ऐतिहासिक राजनैतिक पार्टी कांग्रेस का भी वही हाल है जो फ्रांसीसी क्रांति के समय कुलीनों की या उनके बच्चों की थी। कांग्रेस ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती पर पार्टी द्वारा आयोजित होनेवाले समारोह में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित नहीं करने की धृष्टता की है और उल्टे वो भाजपा पर अपने नेताओं को छीनने के आरोप लगा रही है। उसका यह भी कहना है कि कांग्रेस का गौरवशाली इतिहास रहा है जबकि भाजपा या मोदी को ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं है।
मित्रों,कांग्रेस अभूतपूर्व पतन के बावजूद  निश्चित रूप से यह नहीं समझ पा रही है भले ही कांग्रेस के पास अतीत में एक-से-एक तेजस्वी और तपःपूत नेता थे लेकिन आज उसके पास ऐसा एक भी नेता नहीं है जो योजना बनाने,वक्तृता,प्रशासनिक योगयता और त्याग में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पासंग में भी ठहरता हो। जनता को इतिहास नहीं वर्तमान चाहिए। आज नेहरू,आजाद,प्रसाद,पटेल,गांधी या इंदिरा नहीं आनेवाले हैं देश और कांग्रेस को चलाने बल्कि देश को वही लोग चलायेंगे जो इस समय जीवित हैं और जो कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व है वह परवर्ती मुगलों की तरह पूरी तरह से अक्षम है।
मित्रों,हमारे गांव में एक जमींदार था जिसके दरवाजे पर कभी कई-कई हाथी झूमते रहते थे। आज उसके वंशज भिखारी हो चुके हैं मगर उनके पास आज भी वह लोहे का सिक्कड़ है जिससे कि हाथियों को अतीत में बांधा जाता था। क्या आज कांग्रेस की हालत भी ऐसी ही नहीं हो गई है? कांग्रेस के दरवाजे से जनसमर्थन बटोरने वाले नेता (हाथी) तो गायब हो चुके हैं लेकिन सोनिया और राहुल आज भी उनका सिक्कड़ लेकर घूम रहे हैं मगर भारत की जनता है कि अपनी नाक पर मक्खी तक को नहीं बैठने दे रही है क्योंकि जनता को ऐसा हाथी चाहिए जो भारत को फिर से विश्वगुरू बनाए न कि कोरा सिक्कड़।
मित्रों,इसलिए कांग्रेस को अपने अतीत पर इतराने के बदले मोदी सरकार के सकारात्मक कार्यों का समर्थन और नकारात्मक कार्यों (अगर वो करे) का विरोध करना चाहिए। अगर कांग्रेस नरेंद्र मोदी को आज भी एक चायवाला समझ रही है तो निश्चित रूप से उसको और भी बुरे दिन देखने हैं क्योंकि आज नरेंद्र मोदी न सिर्फ भारत के बल्कि विश्व के सबके लोकप्रिय नेता बनकर उभरे हैं और उनकी अकुलीनता पर किसी भी तरह के अपमानजनक व्यवहार को भारत की जनता किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं करेगी और करारी प्रतिक्रिया देगी। मोदी को किसी गांधी-नेहरू के वंश से खुद को जोड़ने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि मोदी का वंश नेपोलियन की तरह मोदी से ही शुरू होता है और निश्चित रूप से इस कारण से मोदी पर ही समाप्त नहीं होगा क्योंकि उनका कोई परिवार नहीं है बल्कि देश के करोड़ों राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी के भाई-बंधु हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

11.11.14

बिहार के लोगों को कैसे मिले इंसाफ,अदालत खाली है!

11 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं पहले भी आपसे अर्ज कर चुका हूँ कि बिहार में पिछले कई महीनों से सरकार नाम की चीज ही नहीं रह गई है। अब जब सरकार ही लापता हो जाएगी तो जाहिर है कि उसका असर शासन के प्रत्येक अंग पर पड़ेगा सो बिहार की न्यायपालिका पर भी पड़ने लगा है। बिहार की अदालतों में इन दिनों मुकदमों की सुनवाई,उन पर निर्णय और निर्णय का क्रियान्वयन तो दूर की कौड़ी रही केस एडमिट तक नहीं हो रहे सिर्फ फाईल हो रहे हैं। कारण यह है अदालतों में जज हैं ही नहीं। पहले से जो सब जज थे उनको एडिशनल जज में प्रोन्नति दे दी गई और उनकी जगह किसी को भेजा ही नहीं।

मित्रों,हम हाजीपुर का ही उदाहरण लें तो यहाँ के जिला व्यवहार न्यायालय में कुल 9 सब जज हैं जिनमें से सिर्फ सब जज संख्या 8 और 9 में जज हैं बाँकी 1 से 7 तक की सब जज अदालतों में पिछले 3 महीने से कोई जज नहीं है जिससे सारा-का-सारा काम ठप्प पड़ा हुआ है। वकील और मुवक्किल अदालत आते हैं और नई तारीख लेकर वापस चले जाते हैं। चूँकि केस के एडमिशन का काम सब जज 1 के यहाँ होता है इसलिए इन दिनों नए मुकदमे भी एडमिट नहीं हो रहे सिर्फ फाईल हो रहे हैं। आप ऐसा समझने की भूल कदापि न करें कि ऐसी स्थिति सिर्फ हाजीपुर में है बल्कि ऐसी स्थिति पूरे बिहार की अदालतों में है। करीब 15-20 दिन पहले पटना हाईकोर्ट के महानिबंधक वीरेंद्र कुमार स्थिति का जायजा लेने हाजीपुर आए भी थे लेकिन उनके जाने के बाद से भी स्थिति जस-की-तस बनी हुई है।

सूत्रों के अनुसार,बिहार सरकार ने 183 मजिस्ट्रेटों को सब जज में प्रोन्नति देने का निर्णय किया है लेकिन संभावना यही है कि वे लोग अब नए साल में ही अपना नया पदभार संभालेंगे। ऐसे में वर्षों से इंसाफ के लिए अदालतों के चक्कर काट रही जनता करे भी तो क्या करें सिवाय नए जजों के इंतजार करने के? सूत्र यह भी बता रहे हैं कि मजिस्ट्रेटों को सब जज बना देने से तत्काल अदालतों में कामकाज तो शुरू हो जाएगा लेकिन मजिस्ट्रेटी में फिर मजिस्ट्रेटों की किल्लत हो जाएगी और उधर कामकाज ठप्प हो जाएगा। अगर बिहार सरकार ने हर साल न्यायाधीशों की बहाली के लिए परीक्षा का आयोजन किया होता तो निश्चित रूप से बिहार की जनता को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता लेकिन बिहार सरकार न तो सिविल सेवा और न ही न्यायिक सेवा की ही परीक्षा हर साल ले रही है।

मित्रों,जहाँ भारत के प्रधानमंत्री मिनिमन गवर्ननेंट एंड मैक्सिमम गवर्ननेंस की बात कर रहे हैं वहीं लगता है कि बिहार की वर्तमान सरकार का उद्देश्य नो गवर्ननेंस है तभी तो बिहार के सभी महकमों में अराजकता और लापतातंत्र जैसी स्थिति बनी हुई है। नो गवर्ननेंस से उपजी जिसकी लाठी उसकी भैंस की स्थिति से पीड़ित जनता जब थाने में जाती है तो पुलिस पहले तो केस ही दर्ज नहीं करती और अगर केस दर्ज हो भी जाए तो अदालतों में जज साहब हैं ही नहीं। ऐसे में कोई आत्मदाह कर रहा है,तो कोई अपना घर छोड़कर होटल में ठहर जाता है,तो कोई अपने पुरखों के गांव-शहर को सदा के लिए अलविदा कह जाता है तो कोई सीधे नक्सली बन जा रहा है। जब तंत्र न्याय नहीं देगा तो लोगों के समक्ष और विकल्प बचता भी क्या है,बचता है क्या?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

9.11.14

जिसकी लाठी उसकी भैंस को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखिए,कुछ दिन तो गुजारिए बिहार में

9 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमलोग जानते हैं कि इन दिनों हमलोगों की हथेली पर बाल इसलिए नहीं उग पा रहे हैं क्योंकि हम अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अच्छे कामकाज पर दिनरात तालियाँ पीटते रहते हैं लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों में निश्चित रूप से इसलिए बाल जड़ नहीं जमा पा रहे क्योंकि बेचारे अपने दोनों हाथों को इन दिनों लगातार एक-दूसरे पर पूरी ताकत और मनोयोग से मले जा रहे हैं। बड़बोले नीतीश कुमार ने खुद को खुद ही भारत के प्रधानमंत्री पद का सर्वोत्तम उम्मीदवार घोषित कर दिया था मगर जनता ने उनके इस स्वमूल्यांकन को स्वीकार नहीं किया और उनके दावे को न केवल पूरी तरह से अस्वीकृत कर दिया बल्कि इस हालत में भी नहीं छोड़ा कि वे यह कह सकें कि हम चुनाव हारे हैं लेकिन सम्मानजनक तरीके से हारे हैं।
मित्रों,फिर हमारे अभूतपूर्व सुशासन पुरूष नीतीश जी ने बिहार की जनता से अपनी हार का बदला लेने के लिए एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जो वास्तव में किसी गांव का मुखिया होने की योग्यता भी नहीं रखता। परिणामस्वरूप आज बिहार फिर से जंगलराज में पहुँच गया है। पूरे बिहार में इस समय पूरी तरह से अराजकता का साम्राज्य है। जिसके हाथ में लाठी है वह खुलकर अपनी मनमानी कर रहा है और शासन-प्रशासन भी उसकी ही मदद कर रहा है। बिहार के लोगों का सीधा मानना है कि प्रशासन सिर्फ और सिर्फ सज्जनों को दंडित करने और दुर्जनों को सम्मानित करने के लिए है। बिहार सरकार इन दिनों बस इतना ही काम करती हुई दिखाई दे रही है कि नीतीश कुमार के शासनकाल के एक-के-बाद-एक घोटाले इन दिनों सामने आ रहे हैं और पूरी बिहार सरकार उनको बचाने में जुटी हुई है।
मित्रों,फिर भी हमारे भूतपूर्व सुशासन बाबू पूरी बेशर्मी दिखाते हुए गुजरात की सरकार और गुजरात के विकास मॉडल को गरिया रहे हैं वो भी इसलिए क्योंकि कुछ दिन पहले एक भैंस किसी तरह से सूरत हवाई अड्डा परिसर में घुस गई थी और हवाई जहाज के आगे आ गई थी। निश्चित रूप से यह एक दुर्घटना थी और इसको एक दुर्घटना के रूप में ही लेना चाहिए लेकिन नीतीश जी ठहरे घोर सिद्धान्तवादी राजनीतिज्ञ सो वे इस पर भी राजनीति करने लगे जबकि उनके बड़े भाई लालू जी के आतंक राज (नीतीश कुमार जी के ही शब्दों में) में पटना हवाई अड्डे के परिसर में अक्सर नीलगायें घुस जाती थीं और इसके चलते घंटों वहाँ विमान का उड़ना और उतरना रूका रहता था। वैसे नीतीश जी के समय शायद ऐसा नहीं हुआ लेकिन अब बिहार के हर खेत में वही नीलगाय घुस चुकी हैं और उनके चलते बिहार में खेती करना घाटे का सौदा बन गया है। माफ करिएगा मैं एक आम बिहारी का रोना लेकर आपके पास बैठ गया। तो मैं कह रहा था कि अगर आप एक पर्यटक के तौर पर ऐतिहासिक बिहार का दौरा करना चाहते हैं तो एक बार जरूर आपको अपने दुस्साहस पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए क्योंकि हवाई अड्डे से बाहर आने के बाद आपके साथ कुछ भी कुछ भी हो सकता है क्योंकि बिहार में इन दिनों फिर से जंगल राज कायम हो चुका है। अगर आप अकेले आ रहे हैं तब तो फिर भी आपका अपराध क्षम्य है लेकिन अपनी पत्नी और बेटी के साथ आ रहे हैं तो जरूर आपको अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए क्योंकि इन दिनों हमारी बिहार पुलिस का मूल मंत्र यह है कि बिहार में रहने और आनेवाले लोग अपनी,अपने परिजनों और अपने सामान की रक्षा स्वयं करें। कोई न्यायालयकर्मी न्याय नहीं मिलने पर एसपी कार्यालय गेट के समक्ष आत्मदाह कर रहा है तो किसी लड़की को इस बात की चिंता है कि उसके दबंग पट्टीदार कहीं उसका तीसरी बार अपहरण न कर लें और इस डर से वो पूरे परिवारसहित घर-बार छोड़कर होटल में रूकी हुई है।
मित्रों,सबसे पहले तो आपसे टेंपो या टैक्सीवाला मनमाना पैसा मांगेगा। फिर होटलवाला आपको लूटेगा। उस पर गजब यह कि आपकी कहीं शिकायत भी नहीं सुनी जाएगी। थाने में जाएंगे तो आपको पुलिसवाला ही लूट लेगा फिर हो सकता है कि आपके पास घर वापस लौटने के लिए भी पैसे नहीं बचें। पटना के सड़क-छाप होटलों में तो आप महिलाओं के साथ रूकने की सोंचिए भी नहीं,नहीं तो जान से भी जाएंगे और ईज्जत से भी। हाँ,अकेला होने पर रूक सकते हैं लेकिन ऐसा तभी करें जब आपने फिरौती में देने के लिए लाखों-करोड़ों रूपये अलग करके रख छोड़ा हो। और अगर आप किसी भी कारण से गांधी मैदान जा रहे हैं तो एम्बुलेंस लेकर ही जाईए तो अच्छा क्योंकि हो सकता है कि आप वहाँ जाएँ टैक्सी से और वापस जिंदा या मुर्दा आएँ एम्बुलेंस में। तो यह है संक्षेप में नीतीश कुमार जी के विकास मॉडल वाले बिहार और बिहार सरकार की हालत लेकिन नीतीश जी को देखिए कि वे छलनी हँसे सूप पर जिसमें खुद ही एक हजार छेद वाली महान थेथरई वाली कहावत को चरितार्थ करने में लगे हैं। नीतीश जी माना कि गुजरात के विकास की तस्वीरें फोटोशॉप से संपादित करके बनाई गई थीं लेकिन बिहार के जो लाखों लोग गुजरात की फैक्ट्रियों में मजदूरी करके पेट पाल रहे हैं क्या वे अपने घर पर पैसा भी फोटोशॉप से ही भेजते हैं? और अभी हाल में ही सूरत के एक हीरा व्यवसायी ने अपने कर्मियों को जो कारें दिवाली-उपहार में दे दीं क्या वह खबर और उससे संबंधित तस्वीरें भी फोटोशॉप का ही कमाल थीं? नीतीश जी गुजरात मॉडल अगर फेल हो चुका है तो फिर टीवी कैमरों पर वहाँ के विकास की जो तस्वीरें दिखाई जाती हैं वो क्या बिहार में ली गई तस्वीरें होती हैं? अगर गुजरात में रोजगार नहीं है,नैनो,रिलायंस,सूती-कपड़ा उद्योग,हीरा-पॉलिशिंग उद्योग,24 घंटे बिजली कुछ भी नहीं है तो फिर वहाँ रहनेवाले लाखों बिहारियों को रोजगार क्या नीतीश कुमार जी दे रहे हैं? आपके मॉडल ने बिहार की शिक्षा और प्रशासन को चौपट कर दिया,पूरे बिहार को शराबी बना दिया,पंचायत से लेकर सचिवालय तक भाई-भतीजावाद,भ्रष्टाचार और रिश्वत को सरकारी रस्म बना दिया,बिना पैसे दिए नौकरी पाना असंभव बना दिया,बरसात में रोज आपके राज में बनाए गए पुल कभी यहाँ तो कभी वहाँ गिरते रहे,लाख छिपाने और दबाने का बावजूद रोज ही आपके शासन-काल के घोटाले सामने आ रहे हैं,कोसी के बाढ़-पीड़ित जलप्रलय के 6 साल बाद भी राहत का इंतजार कर रहे हैं और आपको फिर भी अपना मॉडल गुजरात के मॉडल से भी बेहतर नजर आ रहा है? आप गुजरात में दिन गुजारने के विज्ञापन का मजाक उड़ाने के बदले यह क्यों नहीं कहते कि जिसकी लाठी उसकी भैंस को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखिए,कुछ दिन तो गुजारिए बिहार में? शायद आपके इन शब्दों में निवेदन करने से बिहार में एडवेंचर को पसंद करनेवाले पर्यटकों की आमद अचानक बढ़ जाए और आपके हाथों बिहार का कुछ भला हो ही जाए ।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

3.11.14

25.10.14

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

पर उपदेश कुशल बहुतेरे 

एक बाबाजी जँगल में कुटिया बना के रहते थे। समीप के गाँवों से भिक्षा अर्जन
करके पेट भर लेते थे। बाबाजी समीप के गाँवों में प्रसिद्ध थे। गाँव वालो के दुःख
दर्द सुनते और उचित उपचार और सलाह देते। उनकी कुटिया पर दिन भर कोई
ना कोई भक्त अपना दुःख दर्द लेकर आता रहता। कोई बच्चे के निरोगी होने की
कामना से,कोई पालतू जानवर के बीमार हो जाने पर,कोई बिगड़े काम को
सँवारने की आशा से।

एक दिन सुबह सवेरे बाबाजी गाँव की ओर गये और गाँव वालो को खुद की बीमार
गाय का हाल बताया और ठीक होने का उपाय पूछा। गाँव वालो ने दूसरे गाँव के
जानकार के पास भेजा ,दूसरे ने तीसरे गाँव वाले जानकार के पास। एक गाँव से
दूसरे गाँव घूमते-घूमते बाबाजी थक गए इतने में एक किसान उधर से गुजरा।
बाबाजी को प्रणाम कर उसकी भैंस को भभूत से ठीक कर देने के लिए आभार
जताया और बाबाजी को वहाँ होने का कारण पूछा।

बाबाजी ने अपनी बीमार गाय के बारे में सुबह से गाँव-गाँव बिमारी के बारे में
जानकारी रखने वाले की खोज में घूमने की बात कही। उनकी बात सुन किसान
बोला -बाबाजी,आपकी भभूत से मेरी भैंस ठीक हो गयी तो क्या आपकी गाय
ठीक नहीं हो सकती ?

बाबाजी बोले -वो तेरी भैंस थी बेटे,मगर यह मेरी गाय है।

हम अपनी पीड़ा के बोझ तले दब जाते हैं। दूसरे का दुःख छोटा और खुद का बड़ा
समझने की फितरत है इंसान में। आप कहेंगे यह तो हर कोई जानता है,इसमें
नया क्या ?दूसरों को उपदेश देना सहज,सरल है क्योंकि उसमें "मेरा"या "मेरापन"
नहीं है। जहाँ मेरापन झुड़ा हो,वहां क्या करे,कैसे करें ?

जब दुःख स्वयं से जुड़ जाता है तो उसको दूर करने के लिए हम निष्णात व्यक्ति
से,अपने हितेषी के निर्णय से और परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जुड़ जाये।
खुद की बुद्धि का संकटकाल में अधिक उपयोग ना करेंक्योंकि चिंतित मन कभी
भी सही निर्णय समय पर नहीं करता है।       

14.10.14

Indian AirForce Hidon 03

धार्मिक उत्सवों से समाप्त होती धर्मिकता ना केवल चिंता का विषय है वरन इसे पुर्नजीवित करने के प्रयास करना जरूरी है
आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी। महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। लेकिन कांग्रेस से टीम राहुल की हिना कांवरे ही गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है। दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। 
धार्मिक उत्सवों में समाप्त होती धार्मिकता चिंता का विषय:-आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। पिछले कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि जब पूरे देश में दशहरा मनाया जाता है तो उसके दूसरे दिन सिवनी में दशहरा मनाने का निर्णय ले लिया जाता है। इस साल भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस कारण होता यह है कि गांव के लोग दशहरे के दिन आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं। उन्हें इस बात का पता ही नहीं रहता कि शहर में आज नहीं ब्लकि कल मनाया जाने वाला हैं। ऐसे आयोजनों में यदि भटकाव आता है तो धर्म गुरु राह दिखाते हैं। कई साल पहले शहर में मां दुर्गा के मंड़पों में नौ दिनों तक ना केवल बेतुके फिल्मी गाने बजते थे ब्लकि कई स्थानों पर फूहड़ नृत्य भी हुआ करते थे। तब जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने यह कहा कि मां जगदम्बा के पंड़ालों में फिल्मी गीत नहीं बजना चाहिये औ फूहड़ नृत्य नहीं होना चाहिये ब्लकि जस और भजन बजना चाहिये ताकि धार्मिक वातावरण बने और दर्शक पूरे श्रृद्धा भाव से मां के दर्शन कर धर्म लाभ ले सकें। इसका यह असर हुआ कि आज शहर में ना तो कोई फूहड़ नृत्य होते है और ना ही फिल्मी गाने बजते है ब्लकि मां अम्बे के जस की गूंज पूरे शहर में भक्ति भाव का संचार करते हैं। इस साल भी पं. रविशंकर शास्त्री जी ने यह कहा था कि धर्मानुसार सभी पूजन पाठ मुहुर्त के हिसाब से होना चाहिये। लेकिन दशहरा एक दिन बाद मनाने का निर्णय ले लिया गया था। जानकार लोगों का दावा है कि ऐसा इसलिये होता है क्योंकि दुर्गा चौक के माता राज राजेश्वरी मंदिर के जवारे नवमी के दिन विसर्जन के लिये निकलते हैं। कई बार जब तिथियों के घटने के कारण दशहरा भी नवमी के दिन पड़ता है तो समस्या आती है। वैसे यदि देखा जाये तो सिर्फ सिंघानिया जी के मकान से स्व.महेश मालू के घर के सामने तक की कुछ मीटर की सड़क ही ऐसी कामन है जो दशहरे के जुलूस मार्ग और जवारे के मार्ग में शामिल रहती हैं। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी।
कांग्रेस में सिवनी का कम होता महत्व:-महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। जिले के भाजपा के के तीन पूर्व विधायकों डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और नरेश दिवाकर को महाराष्ट्र तथा नीता पटेरिया को हरियाणा में प्रभार दिया गया है। इसके अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और पूर्व जिला भाजप अध्यक्ष सुजीत जैन भी महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार करने गये हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश में विस के उप चुनावों में भाजपा को करारा झटका लगने के बाद ये चुनाव भाजपा के लिये प्रतिष्ठा  का प्रश्न बन गयें हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि इन दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जरूरत से ज्यादा प्रचार को महत्व दे रहें हैं। जिसके कारण उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी है। ऐसे महत्वपूर्ण मिशन में जिले के भाजपा नेताओं को भी प्रभार मिलना काफी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिये भी ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व ने जिले के किसी भी नेता को इन राज्यों में चुनाव में कोई जवाबदारी नहीं दी है।  और तो और टीम राहुल से भी सिर्फ बालाघाट लोस क्षेत्र की कांग्रेस उम्मीदवार रहीं विधायक हिना कांवरे कांग्रेस के प्रचार में महाराष्ट्र गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है।
दिवाली के बाद लग सकती है नपा चुनाव के लिये आचार संहिताः-दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। वैसे तो वार्डों के आरक्षण के बाद से ही मोहल्लों में चुनावी रणवीरों ने अपने दांव पेंच दिखाने लगे है। हालांकि अभी किसी भी पार्टी ने अपने उम्मीदवार तय नहीं किये हैं लेकिन अपने अपने आकाओं के आश्वासन पर पार्षद बनने की उम्मीद रखने वाले नेताओं ने अपनी अपनी बिसात बिछाना चालू कर दी है। तब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव में क्या रणनीति अपनाते है और किन मुद्दों को उठाया जाता है। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि सिवनी के निर्दलीय विधायक मुनमुन राय इस चुनाव में सीधे मैदान में उतरते हैं या फिर कोई और रणनीति बना कर किसी को लाभ पहुचाने और किसी को नुकसान करने करने की बिसात बिछाते है? राजनैतिक विश्लेषकों की इन्हीं सब पर पैनी नजर है जो चुनावों के परिणामों को प्रभावित करन वाली साबित होंगीं।“मुसाफिर” 
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
14 अक्टूबर 2014

एक बार फिर से वोट फॉर मोदी,वोट फॉर इंडिया-ब्रज की दुनिया

14 अक्तूबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। महाराष्ट्र और हरियाणा के मित्रों,एक बार फिर से गेंद आपके पाले में है,बाजी आपके हाथों में है। लोकसभा चुनावों के समय जिस तरह आपलोगों ने बाँकी देश के साथ मिलकर कदमताल किया उसके लिए हम आजीवन आपके आभारी रहेंगे। यह आपकी बुद्धिमानी का ही प्रतिफल है कि आज केंद्र में देश के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले व्यक्ति के नेतृत्व में सरकार सत्ता में है। केंद्र में आज मजबूर नहीं मजबूत सरकार है लेकिन यह सरकार अभी भी पूरी तरह से मजबूत नहीं है। वह इसलिए क्योंकि राज्यसभा में इसको बहुमत प्राप्त नहीं है और यह तो आप भी जानते हैं कि कोई भी विधेयक तभी कानून बनता है जब उसको राज्यसभा भी पारित कर दे।
मित्रों,हमारे संविधान में ऐसी व्यवस्था की गई है कि विधानसभा सदस्य ही राज्यसभा सदस्यों का चुनाव करते हैं। जाहिर है कि एनडीए को तभी राज्यसभा में बहुमत मिल सकेगा जब देश की सारी विधानसभाओं में उसका बहुमत हो। यह आप दो राज्यों के निवासियों का सौभाग्य है कि इस दिशा में पहला कदम उठाने का सुअवसर आपलोगों को मिला है। आपने लोकसभा में तो एऩडीए को मजबूत कर दिया आईए राज्यसभा में भी उसको मजबूती प्रदान करें जिससे कि वह सचमुच में मजबूत सरकार सिद्ध हो सके और उसको राज्यसभा में जया,ममता,माया और मुलायम जैसे भ्रष्टों और देशविरोधियों का मुँहतका न बनना पड़े। देश का भविष्य आपके हाथों में है। देश का भविष्य आपको पुकार रहा है। तो आईए दोस्तों,घर से निकलिए भारी-से-भारी संख्या में मतदान करिए-एक बार फिर से वोट फॉर मोदी,वोट फॉर इंडिया।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

13.10.14

कैसे कहूँ हैप्पी बर्थ डे वैशाली जिला?-ब्रज की दुनिया

13-10-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक जमाना था जब वर्तमान वैशाली जिला क्षेत्र में रहनेवाले लोगों को किसी भी काम के लिए हाजीपुर से 55 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर जाना पड़ता था। लोग सत्तू-चूड़ा-ठेकुआ लेकर निकलते और 15-15 दिन के बाद घर आते। कई लोग तो पैदल ही मुजफ्फरपुर का रास्ता नाप देते थे। रास्ते में अगर रिश्तेदारों का घर स्थित हो तो सोने पर सुहागा। दो दिन बुआ के घर ठहर लिया तो दो दिन दीदी के घर। इसी तरह कभी गोविन्दपुर सिंघाड़ा से मुकदमा लड़ने मुजफ्फरपुर का बार-बार चक्कर लगानेवाला एक युवक बार-बार के आने-जाने से इतना परेशान हो गया कि उसने मुजफ्फरपुर में अपना घर ही बसा लिया और उसका वही घर आज एक गांव बन गया है-कन्हौली का राजपूत टोला।
मित्रों,लोग लंबे समय तक मांग करते रहे कि उनको अलग जिला बना दिया जाए। आंदोलन हुए,धरना-प्रदर्शन हुआ और अंततः वह दिन आया 1972 में 12 अक्तूबर के दिन जब वैशाली को मुजफ्फरपुर जिला से अलग कर दिया गया और हाजीपुर को बनाया गया जिला मुख्यालय। अब लोगों को बार-बार मुजफ्फरपुर नहीं जाना पड़ता था। एक ट्रेन से आए अपना काम किया और फिर शाम की दूसरी ट्रेन से घर वापस हो गए। जिस इलाके में ट्रेन नहीं जाती वहाँ के लिए भी उसी कालखंड में बसें चलनी शुरू हो गईं। तब हाजीपुर एक कस्बा था आज महानगर बनने की ओर अग्रसर है। आज हाजीपुर में क्या नहीं है? आईआईएमएच है,नाईपर है,सीपेट है,कई उद्योग-धंधे हैं,महाविद्यालय हैं,कोचिंग हैं,आईटीआई हैं,ट्रेनिंग कॉलेज हैं और सबसे बढ़कर है पूर्व मध्य रेल का मुख्यालय। इनमें से अधिकतर हाजीपुर के हमारे सांसद रामविलास पासवान के प्रयासों का नतीजा हैं।
मित्रों,फिर भी कुछ तो ऐसा है जिसकी हमें कमी लग रही है और लगता है कि जैसे वही समय अच्छा था जब मुजफ्फरपुर हमारा भी जिला मुख्यालय हुआ करता था। हमारा आज का प्रशासन बेहद संवेदनहीन हो गया है। हाजीपुर में कई तरह के प्रशासनिक कार्यालय तो खुल गए हैं लेकिन वहाँ अब आम और निरीह जनता की सुनी नहीं जाती। वहाँ शरीफों को जलील किया जाता और चोरों की आरती उतारी जाती है। जो सड़कें पहले निर्माण के 10-10 साल बाद तक जस-की-तस रहती थीं आज साल-दो-साल में ही इतनी जर्जर हो जा रही हैं कि उन पर पैदल तक नहीं चला जा सकता। स्कूलों की बिल्डिंगों में अब पाँच साल में ही दरार पड़ने लगती है। पूरे जिले में कहीं भी पेय जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं है,लगभग सारे-के-सारे सरकारी नलकूप बंद हैं,संत परेशान हैं और हर जगह चोरों का राज है। पुलिस का तो हाल ही नहीं पूछिए आज चोरी-डकैती होती है तो एक महीने बाद भी थानेदार आपका हाल पूछने आ जाएँ तो इसको उसकी मेहरबानी ही समझिए। पुलिसिया अनुसंधान का हाल ऐसा है कि ठीक नए साल के दिन थानेदार की थाने में घुसकर अपराधी हत्या कर देती है और पुलिस न तो हत्या में प्रयुक्त हथियार ही बरामद कर पाती है और न ही सहअभियुक्तों को गिरफ्तार ही कर पाता है और अंत में होता वही है जो इस अवस्था में होना चाहिए। मुख्य अभियुक्त शान से हाईकोर्ट से जमानत लेकर गांव लौटता है हाथी पर सवार होकर।
मित्रों,आज हमारे जिले की जो हालत है उसमें निश्चित रूप से दिन-ब-दिन भ्रष्ट से भ्रष्टतर और भ्रष्टतम होते जा रहे प्रशासन का भी काफी अहम योगदान है। आज पूरे वैशाली जिले में जिधर देखिए उधर अपराधियों का बोलबाला है। कभी हम गर्व करते थे कि हमारा जिला बहुत शांत जिला है। तब हमारे जिले में न तो लूट-मार थी और नक्सलवाद का तो कहीं नामोनिशान भी नहीं था। लेकिन क्या इस हालत के लिए सचमुच सिर्फ प्रशासन ही दोषी हैं? क्या हमारा अंतर्मन उतना ही शुद्ध है जितना कि हमारे उन पूर्वजों का था जिन्होंने इस जिले में एक-एक कर एक-एक गांव और एक-एक कस्बे को बसाया? कदापि नहीं। फिर जबकि सामाजिक,मानवीय और प्रशासनिक हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते ही जा रहे हों तो आप ही बताईए कि मैं किस मुँह से कहूँ कि हैप्पी बर्थ डे माई डियर वैशाली डिस्ट्रिक्ट,मुझे तुम पर गर्व है?


(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

10.10.14

२६ इंच का हुआ  सीना
बात अधिक पुरानी नहीं हे अभी कुछ माह पहले जब लोकसभा के चुनाव नहीं हुए थे  बीजेपी और खासकर नरेंद्र मोदी जिस तरह से भाषण में   मनमोहन सरकार को पंगु और पाकिस्तान और चीन  को जनाब मुहतोड़ जवाब देने की बात कर रहे थे. चुनाव हुए जनता ने सिरमौर बनाया और मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा   दिया..सार्क देशो के राष्ट्राध्यक्ष को   अपने  राजतिलक में बुलाकर दुनिया में दमदारी का मेसेज देने   कोशिश की यह काफी हद तक कामयाब भी हुई. अभी सरकार और मोदी अपने हनीमून पीरियड में ही थे की पाकिस्तान ने वही पुरानी  चाले चलना शुरू कर दी. सीमा पर गोलीबारी भी बढ़ा दी.  सीमा से सटे गावों में लोग दहशत में आ गए ४ लोगो की जान भी चली गयी. इश्कि अब निंदा हुई तो मोदी शब ने जवाब दिया की सीमा पर जवाब बंदूके देती हे. और सब ठीक हो जाने की बात  कर रहे हे. चुनाव् से पहले जो मोदी  दहाड़े मर रहे थे पाकिस्तान और को करारा जबाव देने २६ की बात कर रहे थे अब  उन्हें साप क्यों सूंघ गाय. उनका ५६ इंच का सीना २६ का कैसे रह गया मोदी जी वादा करते हुए ये तारे तोड़ने जैसे कई वादे  चुके हे. ये वादे बे सपनो में ही कर सकते हे ऐसे में  उनके गले की फांस बने हुए हे. अगर चुनाव के समय  थोड़ा  होते तो  नहीं आती

8.10.14

रिश्ते के बीच एक श  श  श  होता है । आजकल बीजेपी ने शिवसेना के खिलाफ यही श अपना रखा है । पी एम मोदी कह रहे हैं वे शिव सेना के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे । शिव सेना के लोग बीजेपी के खिलाफ बोलते हुए झिझक तो रहे हैं लेकिन बोल कर रो भी रहे होंगे । दस सीट्स की ही तो बात थी । अब यदि मोदी लहर ने अपना असर दिखा दिया  तो क्या होगा ? लेकिन श के दोनों तरफ जो अक्षर बचे हैं वे रिते  या कह लें रीते से लगने लगे  हैं विशेषकर इन दोनों के सम्बन्ध में । आडवाणी जी को लगा कुछ तो बोला जाए वैसे भी मोदी सरकार में उन्हें वह पद दे दिया गया है जिसमे भ्रष्टाचार के मामले में वे जिस भी सांसद के खिलाफ कुछ करेंगे वही  उनके खिलाफ हो जाएगा और यदि कार्यवाही नहीं करेंगे तो मोदी जी को क्या जवाब देंगे ? उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि  मोदी का यह मायाजाल किसी मकड़जाल से कम  तो नहीं ही होगा । खैर , इधर अब समझ आने लगा है कि  शिवसेना भी क्यों मोदी के नाम का पी एम के लिए समर्थन करने से बचती थी । खैर , अब तो जो हो गया उसे भुगतना ही है । यह अफजल कौन है ? अब जो अफजल है तो फिर औरंगजेब कौन है ? मोदी क्या हैं शिवसेना की नजर में ? अफजल या औरंगजेब ? चुनाव क्योंकि बी जे पी लड़ रही है तो अफजल तो मोदी  हुए और यदि ऐसा तो क्या अमित शाह औरंगजेब हैं क्योंकि बी जे पी के औरंगजेब तो अमित शाह हैं । खैर , लेकिन यदि मोदी औरंगजेब हैं तो अमित शाह अफजल हैं ? तो शिवाजी को ज्यादा परेशानी अफजल से थी या औरंगजेब से ? निश्चित ही औरंगजेब से । तो फिर शिवसेना को ज्यादा परेशानी किस से है ? मोदी से या अमित शाह से ? तय कर लीजिये । दूसरे  का तो पता स्वतः चल जाएगा । एक अफजल वह भी था जिसके नाम पर बी जे पी को बेचारे  मनमोहन सिंह जी में भी औरंगजेब दिखाई देता रहा होगा  । लेकिन सोच रहा हूँ , यदि भाजपा के लोग अफजल या औरंगजेब हो गए तो ध्रुवीकरण की जरूरत बी जे पी अब भी समझेगी ? 

6.10.14

क्या बिहार नीतीश कुमार की निजी जमींदारी है?-ब्रज की दुनिया

6-10-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले कुछ समय में बिहार की राजनीति ने जिस तरह से यू-टर्न लिया है आज से दो साल पहले कोई उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता था। जो व्यक्ति कभी हमेशा दिन-रात मूल्यों और सिद्धांतों का राग अलापा करता था वही सबसे बड़ा अवसरवादी निकला। राम निकला तो था रावण से लड़ने के लिए लेकिन युद्धभूमि में जाकर उसने पाला बदल लिया और सीता (बिहार) अपने उद्धार की बाट ही जोहती रह गई। पहले उसने अपने उस गठबंधन सहयोगी को सरकार से निकाल बाहर कर दिया जिसके साथ मिलकर उसने 2010 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। उसकी पार्टी को जो भी मत मिले थे वे अकेले उसकी पार्टी के नहीं थे बल्कि जनता ने दोनों पार्टियों को एक मानकर उसकी गठबंधन सरकार को बंपर बहुमत दिया था। फिर उस नीतीश कुमार को किसने यह अधिकार दे दिया कि वे अकेले की सरकार चलाएँ? जनता ने तो उनको गठबंधन सरकार चलाने के लिए मत दिया था। क्या बिहार नीतीश कुमार जी की निजी जमींदारी थी और है? अगर नहीं तो नैतिकता का तकाजा तो यह था कि वे गठबंधन तोड़ने के तत्काल बाद ही विधानसभा को भंग करके आम चुनाव करवाते।
मित्रों,नीतीश कुमार जी की बिहार और बिहार की जनता के साथ खिलवाड़ यहीं पर नहीं रुका। भाजपा को सरकार और गठबंधन से निकालबाहर करने के बाद नीतीश जी ने लगभग एक साल तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं किया और एक साथ उन सभी  विभागों सहित जो भाजपा के पास थे 18 विभागों के मंत्री बने रहे जिसका परिणाम यह हुआ कि पूरे बिहार में अराजकता व्याप्त हो गई। सारे नियम-कानून की माँ-बहन होने लगी जिसका परिणाम यह हुआ कि नीतीश जी की पार्टी को बिहार में जीत के लाले पड़ गए। अगर नीतीश जी में थोड़ी-सी भी नैतिकता होती उनको लोकसभा चुनावों के तत्काल बाद ही विधानसभा चुनाव करवाने चाहिए थे। लेकिन नीतीश जी ने एक बार फिर से बिहार को अपनी निजी जमींदारी समझते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और खुलकर जातीयता का गंदा खेल खेलते हुए एक निहायत अयोग्य महादलित को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। इस तरह बिहार के साथ जानलेवा प्रयोग-पर-प्रयोग करने का अधिकार नीतीश कुमार जी को किसने दिया है? चिड़िया की जान जाए बच्चों का खिलौना?
मित्रों,जबसे बिहार में जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया है तबसे बिहार के शासन-प्रशासन ने जो थोड़ी चुस्ती थी वह भी जाती रही। अब आप बिहार पुलिस को घटना के समय या घटना के बाद लाख फोन करते रहें वह तत्काल घटनास्थल पर नहीं आती है जबकि वर्ष 2005 में जब जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार नई-नई आई थी तब पुलिस सूचना मिलते ही घटनास्थल पर हाजिर हो जाती थी और समुचित कार्रवाई भी करती थी। अब अगर आप बिहार में रहते हैं तो अपने जान व माल सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी-पूरी आपकी है। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी में वह योग्यता है ही नहीं कि वे प्रशासनिक अराजकता को दूर कर सकें। वे तो बस विवादित बयान देते रहते हैं और इस बात का रोना रोते रहते हैं कि उनका जन्म छोटी जाति में हुआ है इसलिए लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। पिछले कुछ समय में श्री मांझी ने इतने मूर्खतापूर्ण बयान दिए हैं कि इस मामले में उनके आगे बेनी प्रसाद वर्मा का कद भी बौना हो गया है।
मित्रों,यह तो आप भी मानेंगे कि इस प्रकार के अतिमूर्खतापूर्ण बयान वही व्यक्ति दे सकता है जो महामूर्ख हो। पुत्र-विवाहेतर संबंध विवाद,विद्यालय उपस्थिति विवाद,...... और अब पटना गांधी मैदान भगदड़ पर उटपटांग बयान कि इसमें गलती भीड़ की भी हो सकती है,.....। श्री मांझी किस तरह के मुख्यमंत्री हैं कि इतनी हृदयविदारक घटना के घंटों बाद तक घटना से पूरी तरह से बेखबर रहते हैं? और जब मुँह खोलते भी हैं तो मृतकों के परिजनों के जख्मों पर मरहम लगाने के बदले यह बोलकर कि गलती भीड़ की भी हो सकती है नमक छिड़कने का काम करते हैं। क्या श्री मांझी बताएंगे कि गलती किसकी थी उन दो दर्जन मासूम बच्चों की जिनके जीवन को खिलने से पहले ही पैरों तले कुचल दिया गया? उन बेचारों को तो अभी पता भी नहीं होगा कि गलती की कैसे जाती है या गलती शब्द का मतलब क्या होता है। क्या सिर्फ महादलित होने से ही किसी व्यक्ति में मुख्यमंत्री बनने की पात्रता आ जाती है?
मित्रों,बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के प्रयोगवादी पागलपन जीतनराम मांझी को बहुत बर्दाश्त किया मगर अब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है। जो व्यक्ति एक ट्राफिक हवलदार तक बनने के काबिल नहीं था उसको नीतीश कुमार ने बिहार को दिशा देने का काम सौंप दिया? जब 1 ग्राम भी बुद्धि है ही नहीं तो श्री मांझी शासन कैसे चलाएंगे और इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे उठाएंगे? जाहिर है कि ऐसा कर पाना उनके बूते की बात नहीं है। हाजीपुर टाईम्स ने तब भी जब मांझी को बिहार के सीएम की कुर्सी दी गई थी अपनी सामाजिक व राजनैतिक जिम्मेदारी को निभाते हुए नीतीश जी को चेताया था लेकिन तब नीतीश जी ने जो कि एक वैद्य के बेटे हैं एक मरणासन्न रोगी की तरह हमारे रामवाण नुस्खे को नहीं माना था।
मित्रों,हमारा स्पष्ट रूप से यह मानना है कि नीतीश कुमार जी को देर आए मगर दुरुस्त आए पर संजीदगी से अमल करते हुए तत्काल बिहार में विधानसभा चुनाव करवा कर फिर से जनादेश प्राप्त करना चाहिए। बिहार की जनता को अगर उनके महाअवसरवादी महागठबंधन में विश्वास होगा तो वे दोबारा मुख्यमंत्री बन जाएंगे और अगर नहीं होगा तो विपक्ष की शोभा बढ़ाएंगे लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में बिहार को एक पागल,बुद्धिहीन के शासन से तो मुक्ति मिलेगी। इसके विपरीत अगर नीतीश जी श्री मांझी को हटाकर किसी दूसरे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाते हैं तो यह एक बार फिर से उनकी अनाधिकार चेष्टा होगी। जनता ने 2010 में उनको इसलिए बहुमत नहीं दिया था कि वे बिहार को चूँ-चूँ का मुरब्बा बनाकर रख दें बल्कि उनको बिहार के समग्र विकास के लिए वोट दिया था। वैसे भी लोकसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर वे बिहार के विकासपुरुष की अपनी जिम्मेदारियों से भाग चुके हैं लेकिन वे एक बिहारी होने की जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकते हैं। इसलिए बिहार का एक शुभचिंतक होने के नाते,एक बिहारी होने के नाते उनको अपने सारे प्रयोगों को विराम देते हुए बिहार में तत्काल विधानसभा चुनाव करवाना चाहिए वरना उनके 8 साल के सुशासन से पहले बिहार जहाँ से चला था अगले एक साल में उससे भी पीछे चला जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

2.10.14

स्वच्छता से पवित्रता की ओर

स्वच्छता से पवित्रता की ओर 

मानव या पशु हर कोई स्वच्छता पसन्द होता है भले ही पवित्रता पसन्द ना भी
करता हो। यह सत्य सार्वभौमिक है। फिर क्या कारण रहा कि जो आर्य पवित्रता
का संदेशवाहक था वह पवित्रता तो भुला ही मगर स्वच्छता भी भूलता चला गया।
आज हम लापरवाह और बेजबाबदार हो चुके हैं हमारी स्वच्छता खुद के शरीर तक
खुद के कमरे या मकान तक सिमित हो गयी है ,सार्वजनिक स्थान की हर जबाबदारी
चाहे वह रखरखाव की हो या स्वच्छता की,हम उसमे अपना कर्तव्य नहीं देखते ;
उसको प्रशासन का कर्त्तव्य मानते हैं।
    हम अपने घर का कूड़ा कचरा बाहर सड़क पर इसलिए भी बेहिचक फैंक
देते हैं कि सफाई कर्मचारी को काम मिलता रहे !!हमारी इस सोच के कारण सफाई
कर्मचारी भी कुण्ठित हो अपने काम के प्रति उदासीन हो जाता है क्योंकि वह जानता
है हर दिन ऐसे ही होना है।
    हम हवा,जल और पृथ्वी तीनों ही सम्पदा का दुरूपयोग करने में लगे हैं। बड़े पैसे
वाले जमकर प्रदुषण करते हैं जिसका कुफल निचे से मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा
पड़ता है और हमारा पर्यावरण विभाग कुम्भकर्ण की नींद में रहता है या कभी कभार
खानापूर्ति करके चुप हो जाता है या अपनी जेब में सिक्के का वजन देख अनदेखी
करता रहता है।
    हम वर्षो से स्वच्छता पर राष्ट्र के धन को खर्च करके भी आज तक शून्य ही हासिल
कर पाये हैं ,क्यों ? यह प्रशासनिक अव्यवस्था है जो कटु सत्य है इसे मानकर दुरस्त
करने के लिए हमें जबाबदेही तय करनी पड़ेगी,कार्य के प्रति प्रतिबद्धता रखनी पड़ेगी।
    सड़को को टॉयलेट आम आदमी क्या चाह करके बनाता है ?नहीं ना। इसके पीछे
का कारण है सार्वजनिक जगहों पर टॉयलेट का अभाव। यह काम किसको करना था ?
क्या उस आम आदमी को जिसके पास पेट भरने तक का साधन नहीं है ?हम फैलती
जा रही गन्दगी के लिए उसे तब तक जिम्मेदार नहीं मान सकते जब तक हम हर
नागरिक की पहुँच तक टॉयलेट ना बनवा दे।
    हमारे पास कूड़ा निष्पादन की आधुनिक तकनीक का अभाव है। प्रशासन शहर का
कूड़ा या तो शहर की सीमा पर या समीप के गाँव के पास ढेर लगा देता है। क्या इसे
समाधान कहा जा सकता है ?
    स्वच्छता के लिए जरुरी है पवित्रता। पवित्रता मानसिक और आत्मिक विचारों में
भी झलकनी चाहिए और बाहर वातावरण में भी दिखनी चाहिये। कूड़ा -कचरा बाहर
फैलाने या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने से पहले हमें खुद से प्रश्न करना चाहिए कि
क्या मुझे ऐसा करना चाहिये ? जब हम इस प्रक्रिया को शुरू करेंगे तो परिणाम भी
पायेंगे। आइये- हम केवल स्वच्छ ही नहीं पवित्र भारत के निर्माण के लिए स्वयं की
गन्दी आदतों को अभी से बदले और राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनें।         

30.9.14

पल्लू कांड़ को  राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये लेकिन सामाजिक रूप से उचित ठहराना संभव दिखायी नहीं देता 
विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया।  भाजपा ने इस घटना की निंदा करके चुप्पी साध ली जबकि कांग्रेस ने निंदा करने के साथ ही कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरना का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे 
मोदी के जन्म दिन पर सार्वजनिक मंच पर हुआ भाजपा नेत्री का अपमान:-विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। इसी कार्यक्रम को कवर करने के लिये लगे वीडियो कैमरों में मंच की एक अशोभनीय घटना भी कैद हो गयी। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया। चुपके से ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पलट कर बाजू में देखा तो उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान सी दिख रही थी और उन्होंने चेहरे पर एक ऐसी हरकत करके सिर हिलाया जिसे समाज में अच्छा नहीं माना जाता है। सोशल मीडिया पर इस घटना के दो वीडियो ने चंद घंटों में ही हड़कंप मचा दिया। इसे सार्वजनिक शासकीय मंच पर एक महिला के साथ हुये अपमान से जोड़कर देखा गया और निंदा तथा आलोचना का दौर शुरू हो गया। नीता पटेरिया ने कहा कि उन्हें वाडियो देखने के बाद घटना का पता चला तो दूसरी तरफ मुनमुन राय ने कहा कि वे नीता पटेरिया को मां,बहन और भाभी मानते हैं और मंच पर हुआ वो हास्य विनोद के क्षण थे। फिर भी यदि बुरा लगा हो तो वे माफी मांगते है। दूसरे दिन नपा के सामने मुनमुन राय का भाजपा कार्यकर्त्ताओं ने पुतला जलाया और पुलिस में घटना की कंपलेंट की लेकिन नीता पटेरिया ने रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी। इस घटना के समाचार राष्ट्रीय और प्रादेशिक चैनलों के साथ ही अखबारों की भी सुर्खी बनी और राजनैतिक हल्कों में एक भूचाल सा आ गया। 
कांग्रेस ने सौंपा ज्ञापन तो भाजपा ने की निंदा:- इस घटना को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने विज्ञप्ति जारी कर घटना की निंदा की और इसे महिला अपमान के साथ के साथ जनादेश का अपमान भी निरूपित किया। लेकिन इसके बाद भाजपा ने चुप्पी साघ ली। कहा जाता है दूसरे वीडियों में जिला भाजपा अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर भी विवाद में आ गये थे। कांग्रेस नेताओं ने बाद में कलेंक्टर से मुलाकत कर ज्ञापन भी सौंपा और प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी कटघरें में खड़ा किया कि एक वरिष्ठ महिला नेत्री के साथ हुये अपमान पर सरकार और प्रशासन चुप्पी साधे हुये है। इसके अलावा भ कई संगठनों और दलों ने भी घटना की निंदा की और इसे महिला का अपमान निरूपित किया।
ब्राम्हण समाज ने दिश धरनाः- इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरने का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। इसमें पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेत्री नेहा सिंह और विस प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना सहिीत कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने हिस्सा लेकर धटना की निंदा कर कार्यवाही की मांग भी की। धरने के बाद नीता पटेरिया ने एस.पी. से भेंट करके एक ज्ञापन भी सौंपा और इस बात पर अपनी नाराजगी भी जताई कि मेरे बयान होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी। हालांकि यहां यह उल्लेखनीय है कि पुलिस थाने में स्वयं नीता पटेरिश ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी है। उन्होंने राज्य महिला आयोग में जरूर अपनी शिकायत दी है। 
मुनमुन ने भी किया शक्ति प्रदर्शन:- जिस दिन ब्राम्हण समाज के बैनर पर महिला अपमान के विरोध में धरना प्रदर्शन हो रहा था तो वहीं दूसरी तरफ चंद कदमों दूर विधायक मुनमुन राय अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। जिले भर से आयी सैकड़ों गाड़िया ओर में लाये गये हजारों लोगों का उत्साह देखने लायक था। राजनैतिक विश्लेषकों की आंखों के सामने वह दिन आ गया जब तत्कालीन भाजपा सांसद नीता पटेरिया की रिपोर्ट पर तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला धारा 307 के तहत कायम हुआ था तो उन्होंने न्याय रैली आयोजित की थी जिसमें ऐसी ही भीड़ जुटायी गयी थी। स्व. हरवंश सिंह ने न्याय रैली की थी तो अभी मुनमुन जनता से न्याय मांग रहे थे। अभी यदि रिपोर्ट पर पुलिस मामला कायम करती है तो वो भी धारा 354 का होता। जनता के सामने मुनमुन ने अपनी पुरानी मां,बहन और भाभी वाली सफायी देते हुये कांग्रेस और भाजपा नेताओं पर आरोप भी लगा डाला कि वे उनकी जीत  और लोकप्रियता से जलते है इसलिये धज्जी का सांप बना रहें हैं। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे और इस मामले में घिर जाने पर ही उन्हें यहां गाड़ियां भेज कर बुलाया गया था। कुछ लोग इस बात को लेकर भी लेकर आश्चर्यचकित है कि एक ही दिन लगभग एक ही जगह एक ही मुद्दे पर आयोजित होने वाले दो विपरीत आंदोलनों के लिये अनुमति कैसे दे दी गयी? यह भी बताया गया कि शक्ति प्रदर्शन के दूसरे ही दिन वे विदेश यात्रा पर चले गये हैं। बहरहाल उस दिन मंच पर घटित पल्लू कांड़ को कितने ही राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये?लेकिन सामाजिक रूप से इसे उचित ठहराना तो संभव दिखायी नहीं देता है। “मुसाफिर
 sABHAR Darpan Jhoot Na Bole
Seoni 
30 Sep 2014




















   



27.9.14

पाकिस्तान का रोना

पाकिस्तान का रोना 

पाकिस्तान को रोने की आदत हो चुकी है क्योंकि नासमझ बच्चा जब भी रोता
है तो समझदार लोग उसके हाथ में लॉलीपॉप थमा देते हैं,तब बच्चा समझता
है रो कर के मेने कुछ पाया और समझदार जानते हैं कि उसका लॉलीपॉप चूसना
ही बेहतर है ताकि वे लोग महत्वपूर्ण काम कर सके।

जब समझदार लोग अपने महत्वपूर्ण काम पुरे कर लेते हैं और बच्चा फिर रोने
लगता है तब उसे चाँटा मारकर चुप करा दिया जाता है या फिर गला फाड़ कर
रोने दिया जाता है और बच्चा दोनों ही परिस्थिति में अपनी औकात समझ मुँह
बंद कर लेता है।

पाकिस्तान का सँयुक्त राष्ट में जाकर कश्मीर पर रोना !! कोई ज़माना था जब
इस मातम मनाने के तरीके पर उसे समझदार पुचकारा करते थे मगर अब
उसके रोने हश्र उस हठीले बच्चे जैसा होगा जो चाँटा खा कर चुप होता है या
गला फाड़ कर रोने से गला दर्द करने लगता है और वह मौका पाकर स्वत: ही
रोना बंद कर देता है।

पाकिस्तान का कश्मीर पर रोने का हश्र क्या होगा ?आज विश्व को ताकतवर
भारत के सहयोग की आवश्यकता है खण्डहर हो चुके पाकिस्तान का सहारा
लेकर कोई भी भारत से रिश्ता खट्टा नहीं करेगा।

विश्व जानता है कि भारत अपना मसला खुद सुलझाने का माद्दा रखता है और
इस मसले पर टाँग फँसा कर कौन आफत मोल लेगा,इसलिए अब वो होने वाला
है जो भारत चाहता है। यह है शक्तिशाली भारत की नयी पहचान।   
   

25.9.14

बराज की श्रृंखला नष्‍ट कर देगी गंगा को


  • अमेरिका में फेल हो चुकी बराज योजना को गंगा में लागू करना चाहती है सरकार
  • एलएस कॉलेज में दो दिवसीय गंगा सेमिनार शुरू


मुजफ्फरपुर। एलएस कॉलेज में गुरुवार को ‘गंगा बेसीन : संरक्षण एवं चुनौतियां’ विषय दो दिवसीय राष्‍ट्रीय सेमिनार का उद्घाटन समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्‍हा ने किया।
इस दौरान प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्री व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. भतर झुनझुनवाला ने कहा कि केंद्र सरकार ने गंगा पर बैराज की श्रृंखला बनाने की विध्‍वंसकारी योजना बना रही है। ताकि आयातित कोयले को बिजलीघरों तक गंगा के जल मार्ग से पहुंचाया जा सके। कुछ औद्योगिक घरानों का फायदा पहुंचाकर गंगा को नष्‍ट करने की योजना है। इसके लिए गंगा में गहराई की जरूरत है। जबकि गंगा में कई जगह पर गहराई मात्र छह फीट है। इसलिए यहां पर 16 से 22 बराज बनाने की योजना है। लेकिन असलिय यह है कि इससे गंगा नष्‍ट हो जाएगी।
उनहोंने अमेरिका की सबसे बड़ी नदी मिस्‍सीसिपी का उदाहरण देकर बताया कि वहां पर बैराज की श्रृंखला बनाने की वजह से नदी और वहां के इलाकों में तबाही आ गई है।
मिस्‍सीसिपी नदी पर बराज की श्रृंखला बनाने से पहले वहां के आस-पास मिट्टी ऊंची थी। मैंग्रोव का जंगल था। जंगल खत्‍म हो गए। अमेरिकी सरकार के यूएस गवर्नमेंट एकाउंटेबलिटी ऑफिस की रिपोर्ट में कहा गया है कि बराज की श्रृंखला से नदी की जैविकता पर प्रभाव पड़ा है। इलाकों में बाढ़ आ गई।
उन्‍होंने कहा कि बराज बनने से पहले मिस्‍सीसिपी नदी बालू लेकर आती थी और समुद्र में डालती थी। समुद्र का भोजन बालू है। नदी के माध्‍यम से बालू जाने से यह भूमि का कटान नहीं करती है। वहां बैराजों में सिल्‍ट जमने लगा और पानी जंगलों में फैलने लगा। पांच हजार वर्ग किलोमीटर जमीन समुद्र में घिर चुकी है। तटिय क्षेत्र को बालू नहीं मिलने से ऐसा हुआ। नदी का तल ऊंचा होने से इसकी सहायक नदियों में भी जलस्‍तर बढ़ गया।
डॉ. झुनझुनवाला ने कहा कि अमेरिका में फेल हो चुकी व्‍यवस्था को सरकार गंगा नदी में लागू करना चाहती है। ताकि सस्‍ते में कोयला की ढुलाई हो सके। ऐसा हुआ तो गंगा 16 तालाबों में तब्‍दील हो जाएगी। उन्‍होंने कहा कि बराज से नुकसान का सबसे बड़ा उदाहरण फरक्‍का बराज है। दुनिया में सबसे ज्‍यादा सिल्‍ट चीन की पीली नदी और भारत की गंगा में उत्‍पन्‍न होता है। फरक्‍का बराज से गंगा की गति धीमी हो जाती है और उसके साथ आ रहा सिल्‍ट जम जाता है। इसके बाद जलस्‍तर ऊंचा होता है और डूब क्षेत्र बढ़ रहा है। अब ड्रेनेज से पानी निकालने की कोशिश चल रही है, ताकि नहर में पानी भेजा जा सके।
पहले गंगा बालू को समुद्र तक ले जाती थी, लेकिन फरक्‍का बराज से उसकी क्षमता का ह्रास हो गया है। सिल्‍ट न जाने से पश्चिम बंगाल में समुद्र किनारे बड़ा क्षेत्र डूबता जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि फरक्‍का बराज से कुछ फायदा हुआ है लेकिन नुकसान बेहद ज्‍यादा है। उन्‍होंने कहा कि कठोर निर्णय लेकर फरक्‍का बराज को तोड़ देना चाहिए।
उन्‍होंने कहा कि अगर गंगा पर बराज की श्रृंखला बनी तो गंगा की सहायक नदियों में भी बराज बनाना होगा। इससे यहां की नदियां उफनाएंगी और बा़ढ का जबरदस्‍त खतरा ज्‍यादा बढ़ेगा।
उन्‍होंने कहा कि मौसम वैज्ञानिकों की रिपोर्ट है कि क्‍लाइमेट चेंज की वजह से बरसात के तीन महीने का पानी इकट्ठा अगस्‍त में ही बरसने की परंपर बढ़ेगी। ऐसे में बराज की श्रृंखला हुई तो नदी की पानी संग्रहण की क्षमता घट जाएगी और बढ़ के भयावह रूप को देखना होगा।
उन्‍होंने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को बड़े जहाज के लिए बराज बनाने की जगह इसमें छोटे जहाज से माल ढुलाई करना चाहिए। सोलर पावर की लागत कम होने वाली है, ऐसे में कोयला आधारित बिजलीघरों की जगह सोलर पावर का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए।
उन्‍होंने कुछ उदाहरण देकर बताया कि नदी से पानी को नहरों में भेजने के लिए इसपर बराज बनाने की आवश्‍यकता नहीं है।

समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा कि जब तक हम कचरा पैदा करने वाले विकास के रास्ते को नहीं, छोड़ेंगे, तब तक गंगा को प्रदूषण मु‍क्‍त नहीं किया जा सकता है। सारे विकास की दृष्टि को बदलने की जरुरत है। विज्ञान का इस्‍तेमाल कर प्रकृति पर नियंत्रण करने की कोशिश में हम गलत दिशा में जा रहे हैं। इससे प्रकृति का अधिक से अधिक दोहन हो रहा है और गंगा नष्‍ट हो रही है। उन्‍होंने कहा कि धार्मिक अंधता की वजह से भी गंगा प्रदूषित हो रही है।
उन्‍होंने कहा कि दिल्ली में यमुना गंदा नाला बन गया है। बड़े नगर के लिए गंगा से पानी निकाला जा रहा है। हिमालय से निकलने वाली पानी धीरे-धीरे कम हो रहा है। बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों का कचरा गंगा में डाला जा रहा है।

सेमिनार के संयोजक अनिल प्रकाश ने कहा कि ढ़ाई सौ साल से विकास की अवधारणा है कि प्रकृति को दास मानकर उसका अधिकतर दोहन किया जाए। इस गलत दृष्‍ट‍िकोण की वजह से महाप्रलय का खतरा है और यह दुनिया भर के वैज्ञानिकों की सर्वमान्‍य राय है। गंगा हम जब बोलते हैं तो उससे जुड़ी सभी नदियां हैं, हिमालय और पूरा इको सिस्‍टम भी है। एक फरक्‍का बराज बना और इससे आठ राज्‍यों में हिल्‍सा जैसी कई मछलियां गंगा से गायब हो गईं। बीस लाख मछुआरों की रोजी उजर गई।
उन्‍होंने कहा कि अब गंगा को छोटे छोटे तालाबों में तब्‍दील करने, पिकनिक स्‍पॉट बनाने, रिजॉट बनाने, गंगा के किनारे स्‍मार्ट सिटी बनाने, धर्म के नाम पर अनैतिक काम करने के मंसूबे पर को सफल नहीं होने देंगे। उन्‍होंने कहा कि यह राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्‍कृतिक और सामाजिक सेमिनार है।
जिस तरह से मां का दूध बच्‍चे के लिए संसाधन नहीं होता है, वैसे ही खेत और न‍दी हमारे लिए संसाधन नहीं हो सकती है। नदियां खत्‍म करेंगे तो मानव जाति और जीव जगत पर संकट आ जाएगा।

जल आंदोलनों से जुड़े पश्चिम बंगाल के विजय सरकार कहा कि विकास के बहाने हम महाप्रलय के रास्‍ते पर चल पड़े हैं। उन्‍होंने बताया कि कोलकाता से एक साइकिल यात्रा गंगोत्री से गंगासागर तक जाएगी। इसके माध्‍यम से गंगा के आस-पास बसी जिंदगी की युक्ति भी जानेंगे और गंगा पर बन रही गलत नीतियों के बारे में जागरूक किया जाएगा।
सामाजिक कार्यकर्ता रंजीव ने कहा कि उनका मानना है कि बिहार में गंगा नहीं है। गंगा को टिहरी डैम में बांध दिया गया है। बिहार में जो गंगा दिखती है वह इसकी सहायक नदियों का पानी है। उन्‍होंने कहा कि यही मौका है विचार करने का कि हमें कैसा विकास चाहिए।
रंजीव ने कहा कि वर्ष 2000 से बिहार लगातार क्‍लाइमेट चेंज से पीडि़त हैं। लेकिन आज तक बिहार सरकार ने इसे ध्‍यान में रखकर नीतियां नहीं बनाई है। जब उत्‍तराखंड में बादल फटा तो इससे हम पीडि़त हुए। यहां गंगा का पानी कई महीने तक उल्‍टी दिशा में जाती है। टिहरी और फरक्‍का बराज से गंगा को रोक दिया गया, यह अविरल नहीं है।  
एसएस कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. भुजनंदन प्रसाद ने कहा कि राष्‍ट्रीय सेमिनार ने गंगा पर आ रही चुनौतियों पर माकूल जवाब देने के लिए बौद्धिक रूप से धनी बनाया है।
कार्यक्रम के आयोजक व एलएस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमरेंद्र नारायण यादव ने कहा कि अतिथियों का स्‍वागत किया। उन्‍होंने कहा कि गंगा को लेकर इस तरह का मंथन इसके रखवालों को एक दिशा देगा। प्रथम सत्र का धन्‍यवाद ज्ञापन प्रो. नित्‍यानंद शर्मा ने किया। कार्यक्रम का संचालन विजय कुमार चौधरी ने किया।

द्वितीय सत्र

भागीरथ से गंगा ने कहा था – मैं संसार की सबसे अभिशप्‍त नदी बनने जा रही हूं
दूसरे सत्र में गंगा से आस-पास बीमारी व कृषि पर चर्चा
मुजफ्फरपुर। एलएसए कॉलेज में आयोजित राष्‍ट्रीय सेमिनार के दूसरे सत्र में पूर्व डीजीपी रामचंद्र खान ने कहा कि पुराणों में गंगा के प्रदूषित होने की आशंका भी जताई गई थी। जब भागीरथ, गंगा को पृथ्‍वी पर लाने की प्रार्थना कर रहे थे, तब गंगा ने कहा था- ‘ मैं संसार की सबसे दुखी, सबसे अभिशप्‍त रखने वाली नदी बनने वाली हूं। जिस देश में तुम मुझे लेकर आए हो, उसकी सारी गंदगी मुझ में गिराई जाएगी और फिर मेरा उद्धार करने वाला कोई नहीं होगा। जब तक मैं समुद्र में जाती रहूंगी तब तक अभिशप्‍त रहूंगी।‘
रामचंद्र खान ने कहा कि अब यह सच साबित हो रहा है। गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है और इसके लिए बनने वाली योजना बेहद चिंताजनक हैं।
उन्‍होंने कहा कि अमेरिका में डैम को तोड़ा जा रहा है और भारत में नया बनाने की कोशिश चल रही है। अमेरिकी उदाहरण को भी समझना चाहिए।

चिकित्‍सक डॉ. प्रगति सिंह ने कहा कि गंगा से उनका व्‍यतिगत लगाव रहा है। उन्‍होंने कहा कि हम स्‍वयं दोषी हैं गंगा को प्रदूषित करने में। आस्‍था के नाम पर फूल मालाएं, मूर्तियां व अधजले शव प्रवाहित कर देते हैं। गंगा को बचाने पर लोगों का ध्‍यान ज्‍यादा नहीं जाता है। एक संकल्‍प लेना पड़ेगा कि हमें खुद भी प्रयास करें कि गंदा न करें।
उन्‍होंने कहा कि गंगा के प्रदूषण से बहुत सी बीमारियां फैल रही हैं और इसके इलाज में खर्च बेहद ज्‍यादा हो रहा है। इसलिए गंगा का ऐसा स्‍वरूप ऐसा बनाएं कि गंगा में प्रवाहित होने वाले कचरे को दूर हो सके।
कृषि वैज्ञानिक व राजेंद्र कृषि विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी ने कहा कि प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। हमें प्रकृति के साथ रहने की आदत डालना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि प्रकृति को मुट्ठी में बंद कर दें, यह नहीं होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि भारतवर्ष में गंगा के आस-पास सबसे ज्‍यादा उत्‍पादकता थी। यहां की खेती नदियों की मिट्टी पर होती थी। फसल इतनी अच्‍छी होती थी। नदियों को जोड़ने का बांध बनाने का या अन्‍य योजना बनाकर इसे खत्‍म किया जा रहा है।
टिहरी में बांध बना दिया है। ऐसी आशंका है कि जैसे उत्‍तराखंड और जम्‍मू कश्‍मीर में बाढ़ आ गया, वैसे बारिश हुई तो पूरा बिहार और यूपी डूब जाएगा।
कार्यक्रम में खगडि़या से आए चंद्रशेखर ने भी विचार व्‍यक्‍त किए। 

22.9.14

Break your bad habits - The Hindu

Break your bad habits - The Hindu

बिहार की उच्च शिक्षा के श्राद्ध-कर्म में आप सादर आमंत्रित हैं-ब्रज की दुनिया

22 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, मैं आपसे पहले भी अर्ज कर चुका हूं कि हमारे बिहार का कबाड़ा करने में जवाब नहीं। जब नेपाल की सरकार ने बिहार में बाढ़ लाने से मना कर दिया तो बिहार सरकार ने राजधानी पटना को ही जलमग्न करवा दिया। आखिर राहत के लिए तैयार सामग्री को कहीं-न-कहीं तो खपाना ही था। वो तो भला हो कश्मीर का वरना बिहार के कई अन्य ईलाकों को भी जलमग्न करना पड़ता।
मित्रों,अब बिहार की शिक्षा को ही लीजिए। बिहार की प्राथमिक शिक्षा का तो पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही गला घोंट चुके थे लेकिन बिहार की उच्च शिक्षा अभी तक साँस लिए जा रही थी। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अब बहुत कम शिक्षक बच गए थे लेकिन दुर्भाग्यवश जो शिक्षक अभी तक रिटायर होने से बचे हुए थे उनमें से कई वास्तव में ज्ञानी थे। अब बिहार सरकार कोई नरेंद्र मोदी तो है नहीं कि वो कहे कि डिग्री के लिए नहीं ज्ञान के लिए पढ़ो। बल्कि उसका तो साफ तौर पर मानना है कि पढ़ो ही नहीं। हम साईकिल दे रहे हैं उसकी सवारी गांठो,हम पैसे दे रहे हैं उससे सिनेमा देखो या इंटरनेट पैकेज भरवाओ,हम पोशाक राशि दे रहे हैं उससे अच्छी-अच्छी पोशाक बनवाओ लेकिन पढ़ो मत। परीक्षाओं में हमने कदाचार की पूरी छूट दे रखी है इसलिए ज्ञान के पीछे,पढ़ाई के पीछे नहीं भागो डिग्री के पीछे भागो। नौकरी झक मारकर तुम्हारे पीछे आएगी। दूसरे राज्यों में अगर प्रतियोगिता परीक्षा के कारण नौकरी नहीं मिली तो हम हैं न। हाँ,इंटर और मैट्रिक की परीक्षा में खूब कागज काले करो और हमारे दिए पैसों में से कुछ बचाकर भी रखो क्योंकि जो शिक्षक तुम्हारी कॉपियाँ देखेंगे उनको भी कहाँ कुछ अता-पता है। वे तो तराजू पर तुम्हारी कॉपियाँ तौल कर ही या फिर तुमसे पैसे लेकर ही तुमको नंबर देंगे। चाहे तुम आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में पास भी कर जाओ मगर हमारे परीक्षक तो तुमको केमिस्ट्री में 8 और गणित में 5 नंबर ही देंगे। देखा नहीं इसलिए तो हमने मुहम्मद बिन तुगलक से प्रेरित होकर पहले प्राथमिक विद्यालयों में नंबर के आधार पर शिक्षकों को बहाल किया और अब महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की बहाली भी नंबर के आधार पर करने जा रहे हैं।
मित्रों,हमारे मुख्यमंत्री मांझी जी जो कुछ भी बोलते रहते हैं यह भी कह सकते हैं कि गुजरात में भी तो मोदी ने स्कूल टीचर इसी तरह से बहाल किए थे। मगर गुजरात में इस तरह से मस्ती की पाठशाला तो नहीं चलती,परीक्षाएँ ओपेन बुक सिस्टम के आधार पर तो नहीं ली जातीं? बल्कि वहाँ तो वास्तव में ज्ञान के लिए शिक्षा दी जाती है डिग्री के लिए नहीं। अब आप हमारे बैच को ही लीजिए। मैं अपने बैच में प्रतिभा खोज परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम आया था। हमेशा ज्ञान के पीछे भागा। जबतक किसी प्रश्न का उत्तर नहीं पा जाता बेचैन रहा करता लेकिन जब मैट्रिक का रिजल्ट आया तो हमारी कक्षा का सबसे भोंदू विद्यार्थी जिसने वाकई विद्या की अर्थी ही निकाल दी थी और जिसको ए,बी,सी,डी और पहाड़ा तक का पता नहीं था उस रंजीत झा को सबसे ज्यादा अंक प्राप्त हुए थे क्योंकि उसकी बोर्ड में पैरवी थी। अब आप ही बताईए कि अगर मुझे और रंजीत को शिक्षक बना दिया जाए तो कौन अच्छा पढ़ाएगा? आप कहेंगे कि आप लेकिन बिहार सरकार तो कह रही है कि रंजीत झा छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ज्यादा बेहतर साबित होगा भले ही रंजीत झा कभी कक्षा में जाए ही नहीं।  जिसने मैट्रिक,इंटर,बीए और पीजी की परीक्षाओं में जितना ज्यादा कदाचार किया उसके बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की संभावना उतनी ही ज्यादा है।
मित्रों,मेरे ममेरे भाई संतोष को भले ही कुछ नहीं आता हो,थीटा और बीटा के चिन्हों को भी वो पहचान नहीं पाए लेकिन हमारी बिहार सरकार को तो महाविद्यालय में गणित शिक्षक के तौर पर वही चाहिए भले ही सिर्फ कॉलेजों के स्टाफ रूम की शोभा बढ़ाने के लिए। लगता है कि बिहार सरकार इसलिए खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली नहीं करना चाहती क्योंकि उसको लगता है कि अगर आईए,बीए में ज्यादा-से-ज्यादा नंबर पानेवाले परीक्षा में असफल हो गए तो वह असफलता बिहार की शिक्षा,परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की असफलता होगी। इससे बिहार की शिक्षा और परीक्षा-प्रणाली की पोल भी खुल जाने का खतरा है। फिर हमलोगों के जैसे ज्ञानी मानव अगर प्रोफेसर बन गए तो विद्यार्थियों में विद्रोह और सरकार के विरोध की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा और हमारे महाविद्यालय और विश्वविद्यालय वास्तव में मस्ती की पाठशाला बन पाने से वंचित रह जाएंगे। विद्यार्थियों को पढ़ना पड़ेगा जिससे उनकी दिमागी हालत पर बुरा असर भी पड़ सकता है।
मित्रों,कहने का मतलब यह है कि बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से बिहार सरकार ने बिहार में महाविद्यालय और विश्वविद्यालय शिक्षकों की बहाली के लिए जो अधिसूचना जारी की है और जो कार्यक्रम तय किए हैं वास्तव में वह बिहार की उच्च शिक्षा का श्राद्ध-कर्म कार्यक्रम है जिसमें आप सभी सादर आमंत्रित हैं।-मान्यवर,बड़े ही हर्ष के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि बिहार की उच्च शिक्षा का डिग्री का दौरा पड़ने से दिनांक 13 सितंबर,2014 को आकस्मिक निधन हो गया है। श्राद्ध-कर्म के लिए कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किए गए हैं जिसमें आप सभी येन-केन-प्रकारेण उच्च प्राप्तांकधारी आमंत्रित हैं-
क्षौर-कर्म-              दिनांक 20-11-2014 के पाँच बजे शाम तक
बाँकी के एकादशा,द्वादशा को पिंडदान और महाभोज के बारे में आपको जानकारी भविष्य में दी जाएगी।
दर्शनाभिलाषी-महाठगबंधन के सभी सदस्य,
आकांक्षी-जीतनराम मांझी,मुख्यमंत्री,बिहार।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

21.9.14

एक था पप्पू!-ब्रज की दुनिया

20 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं वैसे तो कई पप्पुओं को जानता हूँ लेकिन इनमें से एक पप्पू ऐसा है जो इन दिनों पूरे बिहार को पप्पू बनाने की कोशिश कर रहा है। मैं बात कर रहा हूं श्रीमान राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जी की। मैंने पहले पहल इन श्रीमान का नाम तब सुना जब पप्पू यादव जी निर्दलीय विधायक हुआ करते थे और किसी दारोगा जी की मूँछें इनको इतनी पसंद आ गई थीं कि इन्होंने उनको जड़ से उखाड़ ही लिया था। बाद में पप्पू जी लालू जी के द्वारा स्थापित यादव राज के प्रतीक बनकर उभरे और इस दौरान इनकी अदावत हुई एक और बाहुबली निर्दलीय विधायक आनंद मोहन के साथ। तब इन दोनों की मुठभेड़ की खबरों से बिहार के अखबार पटे रहते थे। यह वही समय था जब पूरा बिहार आरक्षण की जातीय आग में जल रहा था। यात्रियों को बसों से उतार-उतारकर उनकी जातियाँ पूछकर पीटा जा रहा था। एक बार फिर से पप्पू जी तब चर्चित हुए जेल में होते हुए भी सैर-सपाटा करते हुए पाए गए। इस बीच पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय सांसद बन बैठे और पूरा पूर्णिया जिला उनकी कृपा से राजपूत और यादव जातियों के बीच वर्चस्व का अखाड़ा बन गया। पूर्णिया के मरंगा गांव में एक धक्का सिंह नामक व्यक्ति का लाईन होटल था। एक दिन पप्पू जी के आदमी वहाँ चाय-पानी के लिए पहुँचे और उसका नाम पूछा। नाम सुनकर उनको लगा वो राजपूत होगा और बिना किसी दुश्मनी या बकझक के उन्होंने उसको राजपूत समझकर गोली मार दी। बाद में जब पता चला कि वह धक्का सिंह तो यादव है तब उसे लेकर पटना भागे और इस तरह बेचारे धक्का सिंह जी जान बच गई। उन दिनों इस जातीय झगड़े का मुख्य अखाड़ा था पूर्णिया बस स्टैंड।
मित्रों,तब तक एक बार मैं पप्पू यादव जी का 15 अगस्त,1993 के दिन पटना के सब्जीबाग में भाषण भी सुन चुका था। बड़ा बेकार-सा भाषण देते थे वे लेकिन तब तक मैं उनसे सीधे-सीधे प्रभावित नहीं था। वह गुंडा या अपराधी है तो मुझे क्या तब तक मेरे मन में पप्पू यादव को लेकर यही भाव रहता था लेकिन तब मैं यह नहीं जानता था कि इस व्यक्ति के कारण मेरी जिन्दगी तबाह हो जानेवाली है। हुआ यह कि वर्ष 1993 में पॉलिटेक्निक की प्रवेश परीक्षा में बैठा और पास हो गया लेकिन रैंक अच्छा नहीं आया। सो मेरा नामांकन दरभंगा पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हो गया। दरभंगा पॉलिटेक्निक में जातीय तनाव जैसा कुछ नहीं था इसलिए वहाँ मेरा समय शांति से गुजरा। इसके कुछ महीने बाद ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सीटें खाली हुईँ और तब मैं दरभंगा छोड़कर पूर्णिया पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने पहुँचा लेकिन वहाँ का तो माहौल ही अलग था। वहाँ के अधिकतर विद्यार्थी यादव जाति से आते थे और वे सारे यादव विद्यार्थी कथित रूप से पप्पू यादव के आदमी थे। पहले दिन ही मुझसे वहाँ के छात्रसंघ के अध्यक्ष जयराम यादव ने मेरी जाति पूछी और राजपूत सुनते ही नाराज होकर गालियाँ देने लगा। मैं भौंचक्का था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। हॉस्टल में रहना है तो ठीक वरना 500 रुपया वार्षिक रंगदारी टैक्स देना होगा।
मित्रों,मेरे साथ यादव जाति से आनेवाले विद्यार्थी लगातार काफी बुरा सलूक करते थे जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त था। मैंने भी विरोध किया और अपने स्थानीय मित्र राजकुमार पासवान को साथ लेकर कॉलेज जाने लगा। कक्षा के दौरान ही जाति के आधार पर बंटे छात्रों के बीच अक्सर मारपीट होने लगती। यादव जाति के छात्र बहुधा प्रोफेसरों को भी अपमानित कर डालते थे। इस बीच पूर्णिया में रोजाना हत्याएँ होती थीं। उस समय पूर्णिया में दो आपराधिक गिरोह थे  जिनमें से एक का नेतृत्त्व पप्पू यादव कर रहे थे और दूसरे का नेतृत्त्व था वर्तमान बिहार सरकार में समाज कल्याण मंत्री लेशी सिंह के पति स्व. बूटन सिंह के हाथों में। कभी पप्पू यादव के लोग बूटन सिंह के लोगों को मार देते तो कभी बूटन सिंह के लोग पप्पू यादव के लोगों को। ज्यादातर हत्याएँ पूर्णिया कोर्ट के आसपास होती थीं। पूर्णिया पॉलिटेक्निक के पास ही मरंगा गांव था जो यादवों का गढ़ था इसलिए भी पूर्णिया पॉलिटेक्निक में यादवों का वर्चस्व था। एक बार तो मैंने खुद कचहरी के सामने से पप्पू यादव को अपने आदमी वीरो यादव की लाश के साथ जुलूस निकालते भी देखा था। धड़ाधड़ पूरे शहर की दुकानों के शटर बंद हो गए थे।
मित्रों,धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि या तो मैं हत्या करता या फिर पूर्णिया पॉलिटेक्निक में ही मेरी हत्या हो जाती। मैं सीधा-सच्चा आदमी था इसलिए मैंने पॉलिटेक्निक में दो सालों की पढ़ाई कर लेने के बाद भी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और इस तरह मेरी जिन्दगी तबाह हो गई। अगर मेरी पढ़ाई पूरी हो गई होती तो मैं आज इंजीनियर होता और आराम की जिन्दगी जी रहा होता लेकिन पप्पू यादव के रंगदारी राज के चलते मेरा कैरियर चौपट हो गया। बाद मेें पप्पू यादव के लोगों ने बूटन सिंह और पूर्णिया के विधायक अजीत सरकार की हत्या कर दी। बाद में पप्पू यादव विभिन्न जेलों में भी रहे मगर फिर कानून की कमजोरियों का लाभ उठाकर बरी भी हो गए।
मित्रों,वही पप्पू यादव आज फिर से सहरसा-मधेपुरा में गरीबों के मसीहा होने का ढोंग कर रहे हैं। मेरा सीधे-सीधे मानना है कि यह व्यक्ति कल भी एक रंगदार था,आज भी है और कल भी रहेगा। यह सिर्फ गरीबों के नाम पर उनको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा कर सकता है उनका भला नहीं कर सकता। यह आदमी जातीय वैमनस्यता फैलाकर समाज को पथभ्रष्ट कर सकता है समाज को सही दिशा नहीं दिखा सकता। यह हमारे बिहार की त्रासदी है कि इस तरह का गिरा हुआ आदमी बार-बार चुनाव जीत जा रहा है। चाहे अपराधी को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही क्यों न बना दिया जाए वह मूलतः अपराधी ही रहेगा, देश और समाज को त्रास ही देगा। आपने इस छुटभैय्ये अपराधी को पहले विधायक बनाया फिर एमपी। आपने इस दौरान इसमें क्या परिवर्तन देखा? यह पहले छोटा अपराधी था बाद में बड़ा अपराधी बन गया। अब यह मंत्री-मुख्यमंत्री बनना चाहता है। अगर यह पप्पू यादव जनता को धोखे में रखने में कामयाब हो गया तो निश्चित रूप से इस बार एक-दो नहीं बल्कि सैंकड़ों-हजारों ब्रजकिशोर सिंह को अपनी पढ़ाई अधूरी ही छोड़नी पड़ेगी। इसलिए आपलोगों से मैें हाथ जोड़कर अनुरोध करता हूँ कि इस रंगे सियार की बातों में,झाँसे में आने की भूल कदापि नहीं कीजिएगा। क्या विडंबना है कि जिसको मरते दम तक जेल में होना चाहिए वह व्यक्ति संसद की शोभा बढ़ा रहा है? जिसके हाथ सैंकड़ों अपराधी-निरपराध लोगों के खून से रंगे हुए हैं वह देश के लिए कानून बना रहा है और गंभीर-से-गंभीर मुद्दों पर विचारों की नफासत दिखा रहा है?? यह प्रश्न-चिन्ह वास्तव में हमारे मतदाताओं के विवेक पर लगा प्रश्न-चिन्ह है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)