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6.8.15

भावनाओं का ज्वार, रोए जार- जार...

-तारकेश कुमार ओझा-

मेरे मोहल्ले के एक बिगड़ैल युवक को अचानक जाने क्या सूझी कि उसने साधु बनने का फैसला कर लिया। विधिवत रूप से संन्यास लेकर वह मोहल्ले से निकल गया। बषों बाद लौटा तो उसके गले में कई चेन  तो अंगलियों  में सोने की एक से बढ़ कर अंगूठी देख लोग दंग रह गए। पूछने पर उसने बताया कि अब तक उसे न जाने कितनी ही ऐसी अंगुठियां व अन्य आभूषण मिल चुके हैं। लेकिन कुछेक को छोड़ सब उसने किसी न किसी को दान कर दिया। बातों का लोगों पर असर पड़ता देख उसने मोहल्ले में बड़ा यज्ञ कराने की इच्छा जताई। देखते ही देखते संसाधन जुटते गए और विशाल भव्य यज्ञ का आयोजन मोहल्ले में कई दिनों तक चला। समापन पर भंडारे का आयोजन जो सुबह शुरू हुआ तो रात का अंधेरा घिरने तक लगातार चलता ही रहा। इस सफलता से साधु का उत्साह बढ़ा और उसने मोहल्ले में कुछ और कल्याणमूलक  सामाजिक कार्य करने की इच्छा जताई। इसके लिए वह बैठक दर बैठकें बुलाता रहा, लेकिन इसमें दो एक अपवाद को छोड़ कोई नहीं आया। आखिरकार साधु निराश होकर अपनी राह निकल लिया।



अपने देश में भावनाओं के ज्वार की भी कुछ ऐसी हालत है। देश में हजारों लोग शोषण – अन्याय का शिकार होते हैं। न्याय के लिए दर – दर की ठोकरे खाने वालों की भी कोई कमी नहीं है। लेकिन मदद तो दूर उनकी ओर आंख उठा कर भी देखने वाला कोई नहीं। लेकिन क्या आश्चर्य कि जघन्य से जघन्य अपराध के दोषियों के लिए समाज के एक वर्ग में इतनी तड़प है कि उसके लिए वे हर स्तर पर अभियान चला सकते हैं। आधी रात को न्यायधीश का दरवाजा खटखटा सकते हैं और महाआश्चर्य कि ऐसे लोगों के लिए दरवाजा खुल भी जाता है। निठारी कांड का कोली हो या मुंबई विस्फोट कांड का आरोपी याकूब मेमन ... ऐसे लोगों के लिए समाज के एक वर्ग में अस्वाभाविक तड़प देख कर हैरत होती है। लेकिन यह भी कमाल है कि भावनाओं का ऐसा ज्वार सिर्फ उन्हीं मामलों पर हिलोरे मारता है जो मीडिया की सुर्खियों में हो और उसमें हाथ डाल कर व्यापक प्रचार पाया जा सके। निठारी कांड जैसा घिनौना अमानवीय अपराध हो या मुंबई बम धमाके सरीखा देश को हिला कर रख देन वाला लोमहर्षक कांड। इसके आरोपियों को मिलने वाली अदालती सजा का व्यापक प्रचार लाजिमी है। लिहाजा ऐसे मामलों में नकारात्मक – सकारात्मक भूमिका निभा कर खुद प्रचार पाने का बढ़िया मौका एक वर्ग देखता है।

यहां भी यज्ञ कराने वाले साधु जैसी हालत है। एक मामले को उदाहरण मान कर यदि कोई सोचे कि दूसरे मामलों में ऐसे “ स्वनामधन्य “ लोगों का रवैया ऐसा ही रहता होगा तो यह सरासर मूर्खता ही कही जाएगी। याकूब मेमन को लेकर छाती पीट रहे वर्ग की पीड़ा को देखते हुए सहज ही यह सवाल मन में उठता है कि क्या उनके आस – पास होने वाले न्याय – अन्याय पर भी उनके मन में ऐसी ही टीस उभरती है जैसा याकूब मामले में देखी जा रही है। देश के छोटे से छोटे शहर की अदालतों में भी बड़ी संख्या में लोगों को न्याय के लिए भटकते देखा जाता है। लेकिन बगैर कीमत के उन्हें उचित सलाह भी नहीं मिल पाती। वहीं लोमहर्षक मामलों में मददगारों की फौज उमड़ी दिखाई पड़ती है। चाहे निरीह लोगों की नृशंस हत्या करने वाले माओवादी हो या हैवानियत की हद पार करने वाले आतंकवादी । इनकी पैरवी करने वालों की होड़ सी लगी रहती है। क्योंकि इसमें व्यापक प्रचार की गुंजाइश है। अब तो आलम यह कि दशकों की प्रतीक्षा के बाद यदि किसी मानवता के दुश्मन को सजा होती भी है तो मन में शंका होने लगती है कि अदालत से मिली सजा का सचमुच क्रियान्वयन हो भी पाएगा या नहीं । बेशक कसाब , अफजल व मेमन का मामला अपवाद साबित हुआ हो। लेकिन दूसरे कई मामलों में यह देख कर कोफ्त हुई कि अदालत से सजा मिलने के बावजूद आरोपी अपने अंजाम तक पहुंचने से पहले बच निकले। जैसे निठारी कांड । मानवता को कराहने पर मजबूर कर देने वाली इस घटना के आरोपियों का अब तक बचा रहना सचमुच किसी त्रासदी से कम नहीं। समूचे देश में कानून की पेचीदिगियों का लाभ उठा रहे ऐसे आरोपियों की वास्तविक संख्या पता नहीं कितनी हो।

लेखक तारकेश कुमार ओझा पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्कः 09434453934, 9635221463

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