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12.11.17

यूपी में कुपोषण एक महामारी, लेकिन सियासी मुद्दा नहीं

अजय कुमार, लखनऊ
दुनिया 21वीं सदी में पहुंच गई है। विज्ञान नित्य नये चमत्कार कर रहा है। चांद पर घर बसाने की बात हो रही है तो अन्य ग्रहों का भी पता चला है,जहां जीवन के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। यह सब बाते और दावे काफी उत्साहित करने वाले लगते ही नहीं होते भी हैं। विज्ञान थ्योरी पर चलता है और इसके दावे प्रमाणित होते हैं, परंतु कुछ दावे ऐसे भी होते हैं जिनका कोई ओर-छोर नहीं होता है। ऐसे दावे तमाम मौकों पर हमारे नेतागण करते मिल जाते हैं। धरती पर स्वर्ग उतार लाने की बात होती हैं। वर्षों बरस तक ‘गरीबी हटाओं, देश बचाओं का’ का नारा देकर नेतागण सत्ता पर काबिज रहते हैं। पूरी दुनिया में एक मात्र अपना ही मुल्क होगा, जहां दरिद्र को नारायण की उपमा दी जाती होगी। फिर भी देश की बड़ी आबादी को भूखे पेट सोना पड़े, उसे न शुद्ध जल मिले न पौष्टिक खाना, छत और स्वास्थ सेवाओं की बात तो दूर की कौड़ी हो तो उस देश में कुपोषण जनित बीमारियों पर चर्चा करना बेईमानी लगता है। वहां  संयुक्त राष्ट्र हमें आइना दिखाते हुए कहता हो कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है। तो हमारा सिर शर्म से झुक जाना चाहिए लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं है।

पहले यह जान लेना जरूरी है कि कुपोषण है क्या ? शरीर के लिए आवश्यक सन्तुलित आहार लम्बे समय तक नही मिलना ही कुपोषण है। कुपोषण के कारण बच्चों और महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे वे आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। कुपोषण की जानकारियाँ होना अत्यन्त जरूरी है। कुपोषण पर्याप्त सन्तुलित अहार के आभाव में होता है। बच्चों और स्त्रियों के अधिकांश रोगों की जड़ में कुपोषण ही होता है। स्त्रियों में रक्ताल्पता या घेंघा रोग अथवा बच्चों में सूखा रोग या रतौंधी और यहाँ तक कि अंधत्व भी कुपोषण के ही दुष्परिणाम हैं। इसके अलावा ऐसे पचासों रोग हैं जिनका कारण अपर्याप्त या असन्तुलित भोजन होता है।
भारत में हर तीन गर्भवती महिलाओं में से एक कुपोषण की शिकार होने के कारण खून की कमी अर्थात् रक्ताल्पता की बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं। हमारे समाज में स्त्रियाँ अपने स्वयं के खान-पान पर ध्यान नहीं देतीं। जबकि गर्भवती स्त्रियों को ज्यादा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। उचित पोषण के अभाव में गर्भवती माताएँ स्वयं तो रोग ग्रस्त होती ही हैं साथ ही होने वाले बच्चे को भी कमजोर और रोग ग्रस्त बनाती हैं। अक्सर महिलाएँ पूरे परिवार को खिलाकर स्वयं बचा हुआ रूखा-सूखा खाना खाती हैं, जो उनके लिए अपर्याप्त होता है।
संयुक्त राष्ट्र ही नहीं भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय की ओर कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) सर्वेक्षण की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार भी तस्वीर इससे कुछ इतर नहीं है। बात उत्तर पदेश की कि जाये तो प्रदेश में 0 से 5 साल के आयु वर्ग के 46.3 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं तो 39.5 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से कम वजन के हैं।
   2015-16 में आए एनएफएचएस के सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और शहरी इलाकों को मिलाकर 6 से 23 महीने के सिर्फ 5.3 फीसदी बच्चों को ही संतुलित आहार मिलता है। यह आंकड़े उत्तर प्रदेश को कुपोषण से मुक्त बनाने के लिए राज्य सरकारों के दावों को खोखले साबित करने के लिये पर्याप्त हैं। हाल ही में कुपोषण पर  सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत हुआ है। प्रदेश के बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार निदेशालय ने एक आरटीआई के जबाब में बताया कि मायावती का कार्यकाल रहा हो या अखिलेश सरकार का, पिछले पांच वर्षो के दौरान प्रदेश सरकार ने कुपोषण के संबंध में कोई भी अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं कराया है, जिससे यह बात सामने आ सके कि प्रदेश में कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या कितनी है।
उत्तर प्रदेश का बहराइच देश के सर्वाधिक कुपोषण के शिकार जिलों में प्रथम पादान पर है। सरकारी आकड़ों पर गौर करें तो जिले में 53 हजार बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। जबकि 2236 गर्भवती महिलाएं एनेमिक हैं। पूरे प्रदेश में कुपोषण काफी तेजी के साथ अपने पैर पसार रहा है। प्रदेश के 75 जिलों में 1,177,933 अति-कुपोषित बच्चे हैं, जो कि पोषण की कमी के चलते बद से बदत्तर जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार ने अति-कुपोषित बच्चों को चिन्हित किया जरूर था, लेकिन गौर करने वाली बात यह रही कि दो दिन अभियान चलाये जाने के बाद भी आधे अति-कुपोषित बच्चे  ढूंढें नहीं जा सके। प्रदेश में कुपोषित बच्चों की बढ़ती संख्या सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। पांच वर्ष की आयु के बच्चो की संख्या दो करोड़ 26 लाख 53 हजार 877 है। स्वास्थ्य विभाग ने अति-कुपोषण के लिए जो मानक तय किये हैं उसके अनुसार कुल 22 लाख 65 हजार 387 बच्चे अति-कुपोषित हैं। हाल ही में नीति आयोग ने देश के 100 जिलों की लिस्ट जारी की थी जिसमें सबसे अधिक बच्चे कुपोषण के जिम्मेदार हैं तो इसमें 29 जिले उत्तर प्रदेश के थे। यह आंकड़े सरकारी हैं,जबकि इस क्षेत्र में काम करने वालों का कहना है कि स्थिति कहीं विकराल है।
बात स्वास्थ्य सुविधाओं की कि जाये तो उत्तर प्रदेश में जरूरत की तुलना में 40 फीसदी स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी है।हजारांे डॉक्टरों के पद भरे नहीं जा सके हैं। प्राथमिक स्वास्थ केन्द्रों का नेटवर्क सही तरीके से खड़ा नहीं हो पाया है। ये केंद्र या तो सुविधा विहीन है या उसकी पहुंच दूर दराज के क्षेत्रों तक नहीं है। यह खामियां केन्द्रों तक ही सीमित नहीं है। बड़े अस्पतालों में भी पर्याप्त सुविधाआंे का अभाव है। बर्थ एस्फिक्सिया होने पर मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और जान बचाने के लिए फौरन वेंटीलेटर की जरूरत होती है,लेकिन ज्यादातर अस्पतालों में वेंटीलेटर और इन्क्यूबेटर की पर्याप्त सुविधा नहीं होती। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि इनमें से अधिकतर बच्चों की जान बचायी जा सकती थी, वह भी बिना पैसे के सिर्फ जागरूकता और साफ सफाई रखकर। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य जागरूकता का आभाव है, जिसके चलते बीमारी गंभीर रूप ले लेती है. स्वास्थ्य सेवाएं गांवों तक नहीं पहुंची हैं और जानकारी के आभाव में ग्रामीण स्वास्थ केन्द्रों तक नहीं पहुंच पाते। उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. सत्यमित्र कहते हैं ‘ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य तंत्र का ढांचा मजबूत करके मौतों की संख्या में काफी कमी लाई जा सकती है।’
 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) द्वारा जारी आंकड़ों में वर्ष 2015-16 में प्रति हजार बच्चों में यूपी में 64, छत्तीसगढ़ में 54, मध्य प्रदेश में 51, बिहार में 48 और असम में 48 बच्चों की मौत हुई। मृत्युदर के घटाने के मामले में यूपी सबसे आखिरी पायदान पर है। वहीं पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर के मामले में भी यूपी अन्य प्रदेशों की तुलना में पिछड़ गया है। यूपी में प्रति हजार में 78, मध्य प्रदेश में 65, छत्तीसगढ़ में 64, बिहार में 58 और असम में 56 बच्चों की मौत वर्ष 2015-16 में हुई।
बात अन्य कारणों की कि जाये तो उत्तर प्रदेश में दो में से एक बच्चे का पूरी तरह से टीकाकरण नहीं होता है और राज्य मातृ मृत्यु दर (जन्म देने वाली प्रति एक लाख माताओं में 258) के मामले में भारत में दूसरे स्थान पर है। एक दशक पहले जब पिछला एनएफएचएस सर्वेक्षण हुआ था, तब छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 71 थी, जो 2015-16 में घटकर 54 पर आ गई है। मध्य प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर प्रति हजार 93 थी, जो कि वर्ष 2015-16 में घटकर 65 पर आ गई है। सबसे दुख की बात यह है कि उत्तर प्रदेश में कुपोषण एक महामारी की तरह फैला हुआ है,लेकिन यह कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन सका।
लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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