Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

17.1.18

आगरा में अर्श नामक अस्पताल दरअसल एक कसाईखाना है


वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गुप्ता ने अखबारों का झूठ पकड़ा

  डा. सुभाष गुप्ता

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12.1.18

आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने चार जजों को लेकर क्या कह दिया...

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मीडिया में ब्राह्मणवाद क्यों है, इसका जवाब एक वरिष्ठ पत्रकार ने यूं दिया...

सुरेंद्र किशोर का संस्मरण पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें...

एक और पत्रकार ने रिपब्लिक टीवी से दिया इस्तीफा, शशि थरूर हुए खुश, देखें ट्वीट


देखें शशि थरूर का ट्वीट

Shashi Tharoor @ShashiTharoor

Many young idealists are repelled by what they are being asked to do in the name of journalism. Some media owner-anchors may have no scruples, but morality & decency are basic human values & most people find it troubling to abandon them for a paycheque. #UDontHave2Lie4ALiving

Touched by the moral courage  of journalist Deepu Aby Varghese who resigned from @republic TV after being ordered to harass me at the Tvm Press Club. He approached me to apologise for his behaviour, as have some former employees of @TimesNow. Decency appreciated. @seegerblues

बोकारो प्रेस क्लब की हुई बैठक में पत्रकार हित पर हुई चर्चा


युवा-दिवस पर विशेष : युवा के ताप में तप का सन्निवेश करना होगा

‘युवा’ संस्कृत शब्द स्रोत से प्राप्त ‘युवन’ शब्द का समासगत रुप है। ‘वृहत् हिन्दी कोश’ में युवा से संबंधित पुरुषवाचक संज्ञा शब्द ‘युवक’ का अभिप्राय तरुण, जवान और सोलह से तीस वर्ष तक की आयु का पुरुष है। और इसी संदर्भ में स्त्री के लिए ‘युवती’ शब्द प्रयुक्त होता है। आयु के अनुरुप शब्द प्रयोग की अपनी विशिष्ट परम्परा है, जिसमें छोटे बच्चों को शिशु अथवा बाल ; दस से पन्द्रह वर्ष तक की आयु वालों को किशोर; सोलह से तीस तक के वय-वर्ग हेतु तरुण और युवक, तीस से ऊपर प्रौढ़, पचास के लगभग अधेड़ और साठ-सत्तर की आयु से व्यक्ति की वृद्ध संज्ञा हो जाती है, किन्तु वर्तमान राजनीतिक संदर्भों में युवा शब्द उपर्युक्त प्रयोग परम्परा का अतिक्रमण कर चालीस से ऊपर के वय वर्ग तक प्रयुक्त हो रहा है जो कि परम्परा-सम्मत नहीं है।

11.1.18

मोदी का एक और जुमला... बता रहे हैं पत्रकार प्रमेंद्र मोहन

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इंदौर स्कूल बस हादसा और भ्रष्ट प्रशासन के मुंह पर मृतकों के परिजनों का तमाचा!

इन बातों पर फोकस क्यों नहीं?
1- आरटीओ ने बिना बस चेक किये फिटनेस कैसे दे दिया?
2- स्पीड गवर्नर लगवाने का अधिकार जिन एजेंसीज को नहीं वो ब्लैक लिस्टेड क्यों नहीं हैं?
3- परमिट लेने के लिए किसी ऑथोराइज़्ड कार सर्विस सेंटर का चेकअप सर्टिफिकेट अनिवार्य क्यों नहीं?
4- एक निश्चित समय से पुरानी बसों का परमिट रद्द क्यों नहीं?
5- स्कूल बसों में प्रॉपर विंडों और बम्फर, बैक गार्ड होना अनिवार्य क्यों नहीं?
6- एप्रूवल के दौरान वाहन की लाईट, हॉर्न, ब्रेक व अन्य जरुरी पार्ट्स प्रॉपर काम कर रहे हैं या नहीं इसकी जांच क्यों नहीं?

Times News Network Editor Gautam Siddhartha collapsed in an office meeting after heart attack and died

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सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी FDI : क्यों साहेब, तब देश बिक रहा था... अब तो ये देशभक्ति है ना? स्वदेशी के पैरोकार अब कहाँ गायब हैं


10.1.18

इस नए साल में नए रोजगार के मामले में बुरी खबर है...

Ravish Kumar :  आ गया आर्थिक समाचारों का झटकामार बुलेटिन... आर्थिक समाचार पार्ट वन... भावुक मुद्दों की जल्द दरकार, नहीं है मार्केट में रोज़गार...  2017 में भी काम नहीं मिला, 2018 में मिलने की उम्मीद बहुत कम है। यह कहना है CMIE के महेश व्यास का, जो रोज़गार पर नियमित विश्लेषण पेश करते रहते हैं। हमने इनके कई लेख का हिन्दी अनुवाद कर पेश किया है। CMIE मतलब Centre for monitoring Indian Economy, के विश्लेषण की काफी साख मानी जाती है। आज के बिजनेस स्टैंडर्ड में महेश व्यास ने लिखा है कि सितंबर से दिसंबर 2017 के रोज़गार संबंधित सर्वे आ गए हैं। इन्हें अंतिम रूप दिया जा रहा है लेकिन जो शुरूआती संकेत मिल रहे हैं उससे यही साबित होता है कि रोज़गार में मात्र 0.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। संख्या में 20 लाख। इसके भीतर जाकर देखने पर शहरी रोज़गार में 2 प्रतिशत की वृद्धि दिखती है और ग्रामीण रोज़गार में 0.3 प्रतिशत की गिरावट दिखती है।

पायनियर दिल्ली के बिजनेस एडिटर राकेश बिहारी झा का निधन


कहानी : नाम गुम

हल्की फिनाईल की खुशबू से आँख खुल गई। बहुत से लोगों की आवाजें आ रही थी जिसे समझ पाना मुश्किल था। चार-पाँच लोग ऐसी भाषा बोल रहे थे कि उनकी भाषा बस सुन ही पा रहा था परंतु उसका अर्थ निकाल पाना मुश्किल था। आँख खुलने के पश्चात अपने आस-पास देखा तो कुछ लोग लेटे हुए दिखाई दिये। पड़ोस बाले पलंग पर एक 16-17 साल का लड़का लेटा हुआ था जिसका एक पैर प्लास्तर चड़े होने की वजह से आधा हवा में लटका हुआ था। आधी दिबारों पर टाइल और पास में ही रखे आक्सीजन सिलेंडर से मुझे यह तो ज्ञात हो गया कि मैं एक अस्पताल में हूँ । अचानक नजर गंदी चादर पर पड़ी जो कि पड़ोस वाले लड़के के पलंग पर बिछी हुई थी , जिससे यह साफ हो गया कि मैं एक सरकारी  अस्पताल में हूँ ।

डॉ. मनोज मिश्र पूर्वांचल विश्वविद्यालय पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष बने


हजारों करोड़ के घोटालेबाज निर्मल सिंह भंगू की आस्ट्रेलिया की 472 करोड़ की संपत्ति जब्‍त



दैनिक भास्कर के मालिकों पर लगा रेप का आरोप


नई दिल्ली। दैनिक भास्कर समाचार पत्र के मालिक सुधीर अग्रवाल समेत भास्कर के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों पर दुष्कर्म का आरोप लगा है। आरोप लगाने वाली महिला दैनिक भास्कर के कर्मचारी की पत्नी हैं। महिला का आरोप है कि आरोपियों ने उसकी नाबालिग बेटी के साथ भी दुष्कर्म किया है। भोपाल में रहने वाली एक महिला ने स्थानीय थाने से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय तक अपने साथ हुई घटना की शिकायत की। लेकिन पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाए उसे भोपाल के मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया।

बताइए साहब, लंदन गए पत्रकार चम्मच चुराते पकड़े गए....


7.1.18

जयपुर में गहलोत पहुंचे पत्रकारों के अनशन पर


जिस महिला रिपोर्टर ने भंडाफोड़ किया, उसी पर दर्ज कर दिया मुकदमा


पत्रकारों की हालत क्या से क्या हो गई

अनिल सिन्हा
Anil Sinha : शनिवार की शाम उदासी में गुजरी। प्रेस क्लब गया था, चैनलों और अखबारों में चल रही छंटनी पर आयोजित सभा में भाग लेने। देख कर उदास हो गया कि मीडियाकर्मियों पर बेचारगी पूरी तरह हावी है। जयशंकर गुप्ता और उर्मिलेश जैसे वरिष्ठ साथियों ने संघर्ष और एकता के कुछ अच्छे तरीके जरूर बताए। सवाल यह है कि पत्रकारों की इस हालत के लिए क्या सिर्फ मीडिया संस्थान दोषी हैं? वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था के साथ उपभोक्तावाद ने पत्रकारों को इस तरह मोहित कर लिया कि वे भी बारात में बाजा बजाने लगे।

पत्रकारों की आमदनी इतनी बढ गई कि देश की गरीबी की चर्चा करने में उन्हें शर्म आने लगी। उन्होंने मजदूर यूनियनों और आंदोलन समूहों की खबरें छापना बंद कर दी। पहले पत्रकार लड़ाई के लिए उतरते थे तो वे यूनियन वाले लोग बिन बुलाए आ जाते थे। अब किस मुंह से आएंगे? कई वक्ताओं ने भावुकता भरी शिकायत रखी कि चैनल और अखबारों में लाखों पाने वाले संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह कम कर साथियों की नौकरी नहीं बचाई।
इस चर्चा का असर तो किसी पर शायद ही होगा, लेकिन इसमें बड़े मूल्यों की ओर लौटने की ललक जरूर दिखाई देती है। पत्रकार अगर अपनी जमीन पर लौट गए तो लोकतंत्र पर मंडरा रहा खतरा काफी कम हो जाएगा। पत्रकार जिस बेचारगी की मुद्रा में आ गए है, वह लोकतंत्र के ध्वंस के संकेत हैं। ऐसी स्थिति उस समय कभी नहीं आई जब पत्रकार इतना कम वेतन पाते थे कि उनका गुजारा भी मुश्किल से होता था। नैतिक ताकत ने उन्हें भारत को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने की ऊर्जा दी और इसी ताकत के बल पर वह इंदिरा गांधी के आापातकाल से लड़ पाए।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिन्हा की एफबी वॉल से.

राजेंद्र तिवारी ने प्रभात खबर से इस्तीफा दिया


6.1.18

यूएनआई एजीएम से रवीन्द्र कुमार को लौटना पड़ा उल्टे पांव



चपरासी की नौकरी और विधायक के बेटे की सफलता... 70 साल कुछ नहीं हुआ बनाम चार साल खूब काम हुआ...

Sanjaya Kumar Singh : 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ने के बाद मुझ नौकरी ढूंढ़ने या करने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। 2011 में साथी Yashwant Singh ने bhadas4media के लिए बीता साल कैसे गुजरा पर लिखने की अपील की थी। तब मैंने लिखा था, “मेरे लिए बीता साल इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि इस साल एक ज्ञान हुआ और मुझे सबसे ज्यादा खुशी इसी से हुई। अभी तक मैं मानता था कि जितना खर्च हो उतना कमाया जा सकता है। 1987 में नौकरी शुरू करने के बाद से इसी फार्मूले पर चल रहा था। खर्च पहले करता था कमाने की बाद में सोचता था। संयोग से गाड़ी ठीक-ठाक चलती रही। …. पर गुजरे साल लगा कि खर्च बढ़ गया है या पैसे कम आ रहे हैं। हो सकता है ऐसा दुनिया भर में चली मंदी के खत्म होते-होते भी हुआ हो।



हरिभूमि रायपुर को वरिष्ठ पत्रकारों की जरूरत