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2.1.18

नए साल पर यशवंत ने क्या सोचा, पढिए

अच्छी बात है कि इस साल कोई वादा नहीं किया. या यूं कहें कि कुछ ऐसा कोई मन में उमड़ घुमड़ नहीं हुआ जिसको लेकर कोई रिजोल्यूशन पारित किया जाए. हां, बस उस एक घंटे के वक्त को दो घंटा कर दिया हूं जो नितांत निजी होता है. ये वक्त आमतौर पर मेरे सुबह जगने और फ्रेश होने के बाद शुरू होता है,बिना कुछ भी खाए-पिए. इसमें योग+कसरत+ध्यान+नृत्य री-मिक्स होते हैं. ये चारों जुड़कर जो इज इक्वल टू में कनवर्ट होते हैं, वो बताया नहीं जा सकता. केवल महसूस किया जा सकता है.


आप अगर महीने में दो बार भी अपनी छत पर या अपने कमरे में या बाहर किसी पार्क में गोल-गोल देर तक घूमकर पूरे ब्रह्मांड को अपने साथ नाचते-घूमते नहीं देखते महसूस करते तो फिर बहुत कुछ मिस करते हैं. बचपन में एक ही जगह गोल-गोल लगातार घूमकर हंसते-मुस्कराते हुए हो हो हो हो अहा वाह वाह कह कर आनंदित होने का काम सबने किया होगा.मेरे लिए यह अब सबसे सहज किस्म का योग है. मेरी इस उम्र का सबसे अनुपम नृत्य है. इसके जरिए मैं लौट जाता हूं बचपन में. इसके जरिए नाप आता हूं ब्रहांड को, खुद को धुरी बनाकर घुमा देता हूं पूरी सृष्टि को. इसके जरिए तोड़ देता हूं भीतर की जड़ता. इसके जरिए बाहर के जड़ जीवन को चलायमान बना देता हूं.

लेफ्ट टू राइट और राइट टू लेफ्ट या यूं कहें क्लाक वाइज और एंटी क्लाक वाइज, दोनों तरफ गोल-गोल घूमिए. पहले क्लाक वाइज, फिर एंटी क्लाक वाइज. उसके बाद रुक कर आंख बंद कर लीजिए. ध्यान लगा दीजिए. फटाक से एंट्री मार जाएंगे एक नई दुनिया में जो इसी दुनिया का एक अदृश्य लेयर है. ये जो दुनिया है, जो दृश्यमान है, वह उतनी ही नहीं है. इसकी दृश्यता बहुत सारी अदृश्य दुनियाओं के कंधों-खंभों पर टिकी है. सो, अपन इस नए साल में कुछ अन्य अदृश्य चीजों से कनेक्ट होवें, ये इच्छा है. इस राह का यात्री वही बन पाता है जो खुद एक पारदर्शी इंसान में तब्दील हो चुका हो. जो अपने आर-पार देख पा रहा हूं. उसे खुद में कहीं कोई रुकावट / बंधन-सा नजर न आ रहा हो. कोई ऐसी गांठ, कोई ऐसा रोड़ा, कोई ऐसी कुंठा, कोई ऐसा बांध न हो भीतर... इनसे मुक्ति पाए बैगर, इनसे मुक्त हुए बगैर आगे की यात्रा के बारे में सोच पाना तक संभव नहीं.
विचार और तर्क का सबसे चरम विचारहीन और तर्कहीन होना ही है. सो, इसी तरह ट्रांसपैरेंट होेने के लिए भीतरर के सारे गढ़ मठ ढहाने होंगे, जो कई किस्म की चीजों से निर्मित है. नया साल आप सबको मुक्त उन्मुक्त करे, मस्ती दे, नचाए (खुद से ही नाच लिया करिए वरना कोई दूसरा नचवा देगा... हा हा हा) , बहुत कुछ बूझने सूंघने की ताकत दे, यही कामना है. ये जो आज लिख रहा हूं, ये वही वक्त है नितांत अकेले होने का, जिसे बढ़ाकर एक घंटे से दो घंटे कर दिया हूं, ये दो घंटे मिनिमम है, बाकी बाबा पर किसका अधिकार कि उन्हें रोके टोके... बैठ गए तो दसियों घंटे मगन हैं... और चल पड़े तो चलते ही चले जा रहे हैं...

हां, ये सब उनके लिए कतई नहीं लिखा गया है जो अब भी टर्नओवर, सफलता, लांचिंग, प्रतिष्ठा, धंधा, तेरा-मेरा करते रहते हैं... ऐसे लोगों से अपील है कि वे खूब दम लगाकर धंधा-पानी करके सफल हो जाएं ताकि मोहभंग की स्थिति तक पहुंच सकें जिससे उन्हें कुछ नया फील होना शुरू हो... फिलहाल तो ये लोग इंद्रियजन्य सुखों, ढेर सारी आशंकित दुखों के वशीभूत होकर लबड़ हबड़ करते हुए कोल्हू के बैल की माफिक अपनी-अपनी रोबोटिक / खयाली दुनियाओं में लत्तम जूतम भागमभाग कर रहे हैं, रोबोट की माफिक.

हम जब कार चलाते हैं और नियंत्रण खो देते हैं तो क्या हश्र होता है, हम जानते हैं. लेकिन जब हम खुद के जीवन को चलाने का भ्रम पाल लेते हैं तो गड़बड़ हो जाती है. हमें कोई और चला रहा है, सो, ड्राइविंग उसी के हवाले रखें, अपन मस्त कार बन जाएं और सड़कों-गली-कूचों का आनंद लें.

ऐसा न कर पावेंगे तो एक रोज कोई एक अपरिचित अचानक आपसे आकर कह जाएगा...

''खोपचा में कलंपू सुती-उठी टांय टांय कर रहा था...''

और. आप ताकते टापते रह जाएंगे कि गुरु नागाजी किसको क्या कह के कहां चले गए...

हा हा हा

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत की फेसबुक वॉल से. 

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