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23.1.18

अजय प्रकाश की आंखों देखी--

Ajay Prakash : कल मैं बवाना में था। वहीं जहां दिल्ली में 17 मजदूर जलकर मर गए। हालांकि वहां जुटे मजदूर बता रहे थे 25 लाशें निकलीं थीं पर इसका न उनके पास आंखों देखी के अलावा कोई प्रमाण था और न अपने पास इसको पता लगाने का साधन। पर मैंने वहां कुछ महत्वपूर्ण बातों पर गौर किया, वह आपसे बताता हूं। वहां करीब मैं तीन घंटे से अधिक रहा। मौके पर दोनों ओर मिलाके करीब 6-7 सौ मजदूर खड़े थे। इसमें से 90 फीसदी युवा थे। 16 से 30 बरस के। इन युवा मजदूरों को फैक्ट्री से 50 मीटर दाहिने और 50 मीटर बाएं दूर रस्सी से रोककर रखा गया था। मौके पर एक भी मजदूर नहीं थे। मौके पर पत्रकार, पुलिस और कुछ अन्य लोग खड़े थे।


पत्रकारों की भारी भीड़ थी। मैं करीब 11 बजे पहुंच गया था। तबतक सभी बड़े मीडिया घरानों के पत्रकार और ओवी वैन लग गए थे। एक-दो ने फैक्ट्री गेट से एक-दो बार कुछ माइक से बोला भी। इस बीच वहां नेता के तौर पर केवल दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन पहुंचे। वह वहां कुल 5 मिनट रहे। माकन ने तीन मिनट मजदूरों की सुनी, 2 मिनट मीडिया वालों से बोले और चले गए। इस बीच एक आदमी आया जिसकी लंबाई 6 फिट से अधिक रही होगी, उसने नीले रंग की सूट पहन रखी थी। वह दिखने में शहरी लग रहा था। वह आया और मजदूरों को एक ओर से खदेड़ने लगा। उस एक आदमी के कहने से सारे मजदूर पीछे हट गए।

मैंने पूछा आप कौन तो उसके साथ आए आदमी ने बताया कि वह इधर के फैक्ट्री फेडरेशन का अध्यक्ष है। मेरे साथ Rajeev Ranjan भी थे। उन्होंने यह दृश्य देखकर कहा कि सोचिए, 6 सौ मजदूरों को खदेड़ने के लिए सिर्फ 6 ​​फीट का शरीर, चमकता सूट और दिखने में संभ्रांत होना काफी है। वहां दो मजदूर नेता भी खड़े थे, वह कुछ बोल न पाए।

और अब आख्रिर में...  पूरे तीन घंटे रहने के दौरान मैंने पाया कि वहां खड़े करीब दो दर्जन पत्रकारों में से किसी एक ने एक बार भी किसी मजदूर की ओर रूख नहीं किया, अलबत्ता एक-दो फोटोग्राफरों के। चलते-चलते मैंने एक पत्रकार से पूछा भी, 'आपलोग मजदूरों से कुछ पूछ नहीं रहे', उसका जवाब था- कुछ हो तब तो पूछा जाए, ऐसे क्या बात करनी?

मैंने पूछा, 'और क्या होना है! 17 का जिंदा जलना, प्लास्टिक की फैक्ट्री में बारूद भरा जाना, 10 की क्षमता में 45 का काम करना, फैक्ट्री को ताला बंद कर बाहर से काम कराना, एक दिन की छुट्टी लेने पर सैलरी काट लेना, 12 घंटे काम लेना और इतने रिस्क पर 5 हजार महीने की सैलरी मिलना? अब इससे अधिक क्या होना है?
इस पर जवाब था, 'यह कल की बात है, आज क्या नया है?

दिल्ली के पत्रकार अजय प्रकाश की एफबी वॉल से.

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