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15.3.18

उपचुनाव में हार, बीजेपी के लिए सबक

 गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनावों के नतीजों ने एक बार फिर बीजेपी के लिए झटका साबित हुए हैं। दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी ने बड़े अंतर से विजय प्राप्त की है, वहीं बिहार की अररिया सीट पर भी राष्ट्रीय जनता दल ने कब्जा जमा लिया है। गोरखपुर लोकसभा सीट योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने, वहीं फूलपुर लोकसभा सीट केशव प्रसाद मौर्य के डिप्टी सीएम बनने के बाद खाली हुई थी। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में ही सत्तारूढ़ पार्टी को हार देखनी पड़ी, और बीजेपी के लिए दोहरा झटका है। उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री यानी आदित्यनाथ योगी की गोरखपुर सीट और केशवप्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर बीजेपी के हाथ से निकल गई।


भाजपा आश्वस्त थी कि गोरखपुर सीट तो उसके पास से नहीं जाएगी,यहां पिछले पांच लोकसभा चुनाव योगी जीतते आए है और उससे पहले उनके गुरु अवैद्यनाथ इस सीट पर दो बार सांसद रहे थे। फूलपुर में भी वह 2014 का प्रदर्शन दोहरा लेगी। लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता। दरअसल यूपी में सपा और बसपा ने 1993 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। तब 177 सीटों के साथ सपा-बसपा ने गठबंधन की सरकार बनाई थी। कहा जा सकता है 25 साल बाद जातिवादी राजनीति का अनूठा तालमेल किया,और जनता ने अपना फैसला बता दिया कि उसे बीजेपी के मुकाबले यह गठबंधन अधिक पसंद आया है। विश्लेषक इसे 2019 का सेमीफाइनल बता रहे हैं, अगर इस हिसाब से देखें तो अगले आम चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होने वाले हैं। इस गठबंधन में कांग्रेस शामिल नहीं थी,उसने अपने प्रत्याशी अलग उतारे थे। अगर कांग्रेस भी सपा-बसपा का साथ देती तो शायद जीत और बड़ी होती। कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी द्वारा विपक्ष की एकता के लिए दिए गए रात्रिभोज के कुछ घंटों बाद आए परिणामों ने इस धारणा को मजबूत किया कि यदि आगामी चुनावों में सफलता हासिल करनी है तो विपक्षी दलों को गठबंधन की राह पर और मजबूती के साथ कदम बढ़ाने होंगे।

वहीं बिहार में भी अररिया लोकसभा सीट राजद के खाते में गई और बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। अररिया पर जीत के साथ यह भ्रम भी टूट गया कि लालू प्रसाद के जेल में होने से राजद के हौसले पस्त है। यह भी साफ हो गया कि महागठबंधन से नीतीश के अलग होने का फैसला जनता को पसंद नहीं आया। इस सीट के लिए नीतीश कुमार ने पुरी ताकत लगा दी थी और भाजपा तो सांप्रदायिक कार्ड खेलने से भी नहीं चूकी थी। गनीमत रही कि बीजेपी का सांप्रदायिक कार्ड यहां नहीं चला और लालू प्रसाद का पुराना एम वाए फार्मूला फिर कारगर साबित हुआ।

राजस्थान,मध्यप्रदेश,बिहार,उत्तरप्रदेश हर जगह उपचुनावों में हार रही भाजपा को यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि जनता ने उनकी नीतियों को नकार दिया है। आगामी आम चुनावों में फतह करने के लिए बीजेपी को विचार करना होगा कि कहीं न कहीं खामी उनकी नीतियों में है।


कुशाग्र वालुस्कर
भोपाल,मध्यप्रदेश

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