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26.7.18

पीढियों की सोच में अंतर क्यों...


कुछ अजीब सा विषय है ना...पर ये जेनरेशन गैप हर पीढ़ी मे होता है...बस हमारा देखने का नजरिया अलग होता है...आख़िर ये जेनरेशन गैप है क्या बला...? आम तौर पर माना जाये तो ये दो पीढ़ी के बीच मे आने वाला फर्क है...या यूं कहें की हर बात मे, सोच मे ,आचार -विचार मे ,बातचीत के तरीके मे ,व्यवहार मे अंतर होने को जेनरेशन गैप कह सकते है...हमेशा नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को और पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को यही कहकर चुप करा देती है कि जेनरेशन गैप है...वो चाहे हम लोगों का जमाना रहा हो या फिर आज हमारे बच्चों का जमाना ही क्यों ना हो...ऐसा हम अपने अनुभव के आधार पर कह रहे हैं...


पर हमेशा नयी पीढ़ी को ही क्यों दोष दिया जाता है कि...नयी पीढ़ी या आजकल के बच्चे तमीज-तहजीब खो चुके है... उनमे छोटे-बडों का फर्क समझने की बुद्धि नही है...जबकि हम सभी उस नयी पीढ़ी वाले दौर से गुजर चुके है...पर क्या हम सबने अपने बडे-बुजुर्गों से कभी भी ऐसी बातें नही कही या करी है...?और क्या इन सबसे बडे-बुजुर्गों के साथ संबंधों या रिश्तों मे फर्क आ गया था...जब तब नही आया तो अब हम बच्चों को क्यों ये कहकर अहसास दिलाते है...ये तो सोचने वाली बात है की जो बात हम अपने दौर मे सही मानते थे...अब हम उसे गलत क्यों मानते है...सिर्फ इसलिए की हमारी नयी पीढ़ी हमारे बच्चे आज के ज़माने के है...और उनका सोचने-समझने का नजरिया हमसे भिन्न है...।

हमारे ख्याल से ये जेनरेशन गैप एक मिथ्या है...किसी भी वार्तालाप को ख़त्म करने का ये अचूक अस्त्र है...क्यूंकि इसके बाद कुछ कहने-सुनने की गुंजाइश ही नही रहती है...हम सभी यानी कि नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी दोनो ही सवालों का जवाब देने से बचने के लिए इस शब्द को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते है...आज के इस आधुनिक दौर में एक ओर जहां युवाओं में हर चीज को चुट्टकियों में निपटाने की आदत होती है...वहीं दूसरी ओर उम्रदराज लोग चीजों को करने और समझने में थोडा-सा समय लगाते हैं...बदलता वक्त हर चीज को बदल देता है...इसमें ना सिर्फ हमारे काम करने के तौर तरीके बदलते हैं, बल्कि हमारी सेाच में भी फर्क आ जाता है...इसके अलावा दो जेनरेशन के बीच और भी कई ऎसी चीजें होती हैं जो परेशानी का सबब बनती हैं...दोनों ही पीढी के लोग एक-दूसरे को ठंडे दिमाग से समझने और मिलकर काम करने की आदत डालें तो जेनरेशन गैप से होने वाली मुश्किलों को कम किया जा सकता है...।

जिन्दगी के हर कदम पर नई पीढी बुजुर्गो से बहुत कुछ सीख सकती है, क्योंकि उन्हें दुनियादारी का कहीं ज्यादा अनुभव होता है...यह बात प्रोफे शनल लाइफ में ज्यादा अच्छे से लागू होती है...ऑफिस में सीनियर लोगों को अच्छी जानकारी होती है...नई पीढी इन चीजों का फायदा उठा सकती है...युवा पीढी अगर पुरानी पीढी से कुछ सीख रही है तो बदले में नई पीढी भी उन्हें कुछ सीखा सकती है...खासकर के टेक्निकल बातों पर नई उम्र के लोगों की ज्यादा पकड होती है, जबकि उम्रदराज लोगों का इन चीजों में कम ज्ञान होता है...

पुरानी पीढी के पास हर बात हर चीज का तजुर्बा अधिक होता है...व लाइफ के विभिन्न पहलुओं चाहे वह पारिवारिक हों, समाज से जुडा हो या राष्ट्रहित से संबंध हो हर मुद्दे पर उनका अनुभव खासा कीमती होता है, वे विभिन्न मौके पर वास्तविकता का सामना कर चुके होते हैं, इसलिए उनमें सही-गलत भी बेहतर होती है...वहीं नई पीढी के पास अनुभव तो सीमित होता है, लेकिन उनके अन्दर नवीन तकनीक एवं प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने की उत्सुकता गजब की होती है...इस परिस्थिति में अगर दोनों पीढी अपनी अपनी विशेषताओं को एक-दूसरे के साथ मिलाकर कार्य करने की भावना विकसित करें तो हमारे देश एवं समाज को अधिक लाभ होगा...।

अगर यंगस्टर आधुनिकता की ओर अपना रूचि दिखाते हैं...तो यह मतलब कतई नहीं है कि वह मन लगा कर काम नहीं करते...कुछ चीजें एज और शौक से जुडी होती हैं...काम करने या ना करने से इनका कोई संबंध नहीं होता ऎसे में बुजुगों को चाहिए कि इस तरह की चीजों को लेकर नौजवानों को बेवजह नहीं डांटना चाहिए...युवाओं को लगता है कि...बुजुगों को नई चीजों के बारे में बहुत कम पता है...तो युवा पीढी कभी-कभी अनुभव की कमी महसूस करती है...

पुरानी पीढी का अनुभव और नई पीढी का जोश कई दिक्कतों को झट से हाल किया जा सकता है...अगर किसी का काम पसंद आए तो उसकी तारीफ में बिल्कुल हिचकना नहीं चाहिए...क्योंकि इससे ना सिर्फ हौसला बढता है बल्कि उसकी नजरों में आपकी इज्जत बढ जाती है...दोनों ही पीढी के लोगों को इस बाता को अमल में लाना चाहिए कि...जेनरेशन गैप पाटने का यह सब से बेहतर तरीका है...।

kunwar C.P. Singh

E.P. Rashtra khabar News

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