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22.8.19

चार मंत्रियों को बाहर करने के बाद योगी ने बाकी नए-पुराने मंत्रियों को पढ़ाया नैतिकता का पाठ

अजय कुमार, लखनऊलखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार की इमेज को लेकर काफी सचेत हैं। वह नहीं चाहते हैं कि उनके मंत्री प्रदेश सेवा की बजाए जनता के बीच अपना रूतबा दिखाए। योगी यह भी नहीं चाहते हैं कि किसी मंत्री के परिवार का कोई सदस्य या करीबी मंत्री के काम में हस्तक्षेप करे। मंत्रियों को साफ हिदायत दी गई है कि वह सरकार की छवि के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करें। तात्पर्य यह है कि योगी संकेतों में अपने मंत्रियों को समझा रहे थे कि अगर उन्होंने मंत्री के तौर पर अपने कार्य के प्रति लापरवाही या नीति विरूद्ध कोई काम किया तो उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।

21.8.19

योगी सरकार की यदुवंशियों को लुभाने की तैयारी, धूमधाम से मनाई जा रही है श्री कृष्ण जन्माष्टमी

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। धर्म और राजनीति दो अलग-अगल विषय हैं। संविधान निर्माताओं ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया था ताकि किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हो। सब जानते हैं कि भारत विभिन्न धर्मो, भाषाओं-जातियों वाला देश है। अनेकता में एकता भारत की शक्ति है। ऐसे में किसी एक या सभी धर्मो को साथ लेकर राजनीति करना मुश्किल ही नहीं असंभव थी। मगर कड़वी सच्चाई यह भी है कि भले ही हमारे संविधान निर्माताओं ने दूर की सोच रखते हुए देश का तानाबान धर्मरिनपेक्ष के रूप में तैयार किया था,लेकिन सियासतदारों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए समय-समय पर धर्म और राजनीति में घालमेल करने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ा।

पीलीभीत में पत्रकार सुधीर पर जानलेवा हमले से पत्रकार यूनियन नाराज

पत्रकारों की हत्या और जानलेवा हमले बर्दाश्त नहीं, पत्रकार ही अगर असुरक्षित हो गए तो लोकतंत्र का क्या होगा, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने प्रान्तीय बैठक में पत्रकार उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई
लखनऊ। उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बैठक सोमवार को गोमतीनगर स्थित प्रांतीय कार्यालय में संपन्न हुई, जिसमें पत्रकार उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की गई और सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई।

बेपटरी होती यूपी की कानून व्यवस्था

अपराध मुक्त प्रदेश के नारे के साथ सत्ता में आई बीजेपी की योगी सरकार ने अपने कार्यकाल का आधा समय पूरा कर लिया है। इस दौरान योगी सरकार अपराधियों पर नकेल कसने की पूरी कोशिश की है। मगर समय-समय पर अपराधी कानून व्यवस्था को बेपटरी करते रहे हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट यूपी की तर्ज पर कड़ा कानून बनाकर अपराधियों को उखाड़ फेकने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि छह महीने के भीतर दोनों राज्यों से गैंगेस्टर की सफाई शुरू हो जानी चाहिए। गैंगेस्टर के बीच एरिया में दबदबा बनाने के लिए होने वाला संघर्ष समाज व कानून व्यवस्था दोनों के लिए घातक है। यह सच है कि योगी सरकार अपराधियों पर कहर बन कर टूटी है। ढाई साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में पुलिस ने 3599 एनकाउन्टर किये है। जिसमें 73 अपराधी ढेर हुए है जबकि चार पुलिसकर्मी शहीद भी हुए है। इस दौरान पुलिस ने 8251अपराधी गिरफ्तार किये है, इसके अलावा मुठभेड़ में 1059 अपराधी घायल हुये है। आंकड़ों के मुताबिक मुठभेड़ में 1 लाख के तीन और 50 हजार के 28 ईनामी मारे गये है। ऑपरेशन क्लीन के खौफ से कुल 13866 अपराधी अपनी जमानत निरस्त कराकर जेल चले गये। 13602 आरोपियों के खिलाफ गैंगेस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई हुई। गैंगेस्टर आरोपियों की 67 करोड़ की सम्पत्ति जब्त की गयी बावजूद इसके पुलिस अभी भी अपराध और अपराधियों की कमर नहीं तोड़ पायी है।

19.8.19

जब जज बनकर फैसले करने लगे कलम के जिगोलो



अमितेश अग्निहोत्री
दैनिक जागरण ने पहलू खान की मॉब लिंचिंग में गिरफ्तार सभी अभियुक्तों के बरी होने की खबर तस्कर पहलू खान हत्याकांड के सभी आरोपित बरी शीर्षक के साथ लगाई है।अगर आप के अंदर संविधान,कानून और पत्रकारिता के मूल्यों की रत्ती भर समझ है तो अपना सर पीट लीजिये। दैनिक जागरण कथित रूप से हिंदी पट्टी का नम्बर 1 अखबार है। यह स्थान इन्हें ऐसे ही नही मिला है। पत्रकारिता को ताक पर रखकर पत्तेचाटी करने के लम्बे और सतत कालखण्ड के बाद आज यह शीर्ष पर पहुचे है।

वीआईपी कल्चर पर बार-बार मोदी-योगी का ‘हथौड़ा’

अजय कुमार, लखनऊ
नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान वीआईपी कल्चर पर ‘हथौड़ा’ चलाते हुए वर्ष 2017 में मंत्रियों और अफसरों की गाड़ी पर लाल-नीली बत्ती(जो स्टे्टस सिम्बल हुआ करता था) लगाए जाने पर रोक लगाई थी तो इसकी चैतरफा प्रशंसा के साथ-साथ इस पर खूब सियासत भी हुई थी। गैर भाजपाई राज्य सरकारों ने मोदी सरकार के फैसले को अपने राज्यों में लागू करने से मना कर दिया था। उस समय उत्तर प्रदेश में नई-नई योगी सरकार बनी थी। अन्य राज्यों से इत्तर योगी सरकार ने सबसे पहले लाल-नीली बत्ती कल्चर को खत्म करने के लिए इसे प्रदेश में लागू कर दिया। गौरतलब हो, मोदी सरकार ने पहली मई 2017 से लाल बत्ती हटाने के लिए मोटर व्हीकल एक्ट से वो नियम ही हटा दिया था, जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें वीआईपी लोगों को लाल बत्ती लगाने की इजाजत देती थीं। लाल बत्ती हटाने के आदेश के साथ ही 28 साल पुरानी परंपरा खत्म हो गई थी। वैसे, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार सख्त फैसले लेने के लिए जाने जाती है। पहले उसने मोदी सरकार की पहल पर मंत्रियों और अधिकारियों की गाड़ी पर लगने वाली लाल-नीली बत्ती कल्चर को खत्म किया तो उसके बाद मंत्रियों और नेताओं से सम्पति का ब्योरा मांग लिया। इसी प्रकार प्रदेश में अपराध नियंत्रण के लिए बदमाशों के एनकांउटर का रास्ता भी चुना।

आखिर आजादी के सही मायने क्या हैं.....

वर्तमान में आजादी के मायने बदल गए हैं. अब कोई भी हमारी राजनैतिक शक्तियां जल, अनाज, आवास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों पर बात नहीं करती हैं. यह बड़ी विडम्बना है कि आजादी के मायने को बदल कर राजनैतिक पार्टियां खुद देश की जनता को बहका रही हैं और राष्ट्र, धर्म, संप्रदाय, मंदिर- मस्जिद, जात- पात के नाम पर आपस में लड़ा कर स्वयं राजनीतिक रोटियां सेक रही हैं.  वास्तव में क्या यही आजादी के मायने है कि स्वातंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस पर झण्डा लहराना, परेड देखना, लाउडस्पीकर लगाकर देशभक्ति गानों पर थिरकना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होना और देश के जयकारे लगाना ही महज आजादी है.

370 व 35 ए हटाना कितना सही, कितना गलत और कितना सफल

पिछले कई दिनों से जम्मू- कश्मीर राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है. बना भी क्यों न रहे, जो जम्मू- कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35-ए हटा दिया गया. हालाकि भारत की शान व अभिन्न हिस्सा कहा जाने वाला कश्मीर आजादी के बाद से ही विवादित रहा और चर्चा का विषय बना रहा.

15.8.19

करणी दान सिंह राजपूत बीकानेर संभााग के 'राजस्थान सेवा गौरव पत्रकारिता' पुरस्कार से सम्मानित




बीकानेर के रवीन्द्र मंच पर आयोजित समारोह में यह सम्मान करणीदानसिंह राजपूत की माता हीरा और पिता रतनसिंह की सीख एवं पत्रकारिता के इतिहास का वर्णन करने के बाद प्रोफेसर चतुर्वेदी स्मृति संस्थान जयपुर की ओर से रविवार 4 अगस्त 2019 को प्रदान किया गया।  समारोह में स्वामी श्री समवित सोम गिरी जी महाराज (महंत श्री लालेश्वर महादेव मंदिर बीकानेर) श्री गुलाबचंद कटारिया (नेता प्रतिपक्ष राजस्थान विधानसभा व पूर्व गृह मंत्री राजस्थान सरकार) श्री अरुण चतुर्वेदी (पूर्व कैबिनेट मंत्री राजस्थान सरकार) के द्वारा प्रदान किया गया। श्री राजपूत को शाल और पीताम्बर व साफा ओढा कर मढे हुए सुनहरे सम्मान प्रशस्ति पत्र को प्रदान कर सम्मानित किया गया।

हिंदुओं के साथ ही आजादी के बाद मुसलमानों ने भी गांधी को नहीं समझा : प्रियंदव




बनारस : बीएचयू में एनी बेसेंट हाल में कला संकाय एवं प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा प्रख्यात कथाकार प्रेमचंद की याद में हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार एवं इतिहासविद प्रियंवद का एकल व्याख्यान आयोजित किया गया। अपने व्याख्यान में इतिहास और दर्शन के सम्बंधों पर चर्चा करते हुए प्रियंवद ने कहा कि यह इतिहास पर निर्भर करता है कि वह किसे कितना स्थान देता है. उन्होंने इतिहास पर अपनी बात रखते हुए कि वह बौद्धिकता के रसायन से बना हुआ सबसे खतरनाक उत्पाद है जो राष्ट्रों को अहंकारी और निरर्थक बनाता है। इसके उदाहरण भारत विभाजन की घटना में देखे जा सकते हैं।

आजादी के विरोधी और अंग्रेजी हुकूमत के पैरोकार देशभक्त नहीं गद्दार हैं

नई दिल्ली। आज की तारीख में उन क्रांतकारियों की आत्मा रो रही होगी, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले उन समाजवादियों की आत्मा भी आहत होगी, जिन्होंने देश में स्वराज का सपना देखा था। आज की तारीख में जब खुशहाली के रास्ते जाना चाहिए था ऐसे में भावनात्मक मुद्दे समाज पर हावी हैं। जो लोग आजादी की लड़ाई और आजादी के विरोधी, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत भाती थी वे आज न केवल आजाद भारत की सत्ता पर काबिज हैं बल्कि देश के संसाधनों के मजे भी लूट रहे हैं। आजादी के लिए सब कुछ लुटा दिये क्रांतिकारियों कर परिजन फतेहाल में गुरबत की जिंदगी काट रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस पर इन दिखावे के राष्ट्रवादियों का ढकोसला देखने को मिलेगा। देखना कैसे देश के सबसे बड़े देशभक्त होने का दावा किया जाएगा। 370 धारा खत्म करने के बाद इस स्वतंत्रता दिवस पर कैसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को देश के सबसे बड़े नायक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

चौपाल के मोहनकृष्ण बोहरा पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण


जोधपुर।  पढ़ो तो पूरा पढ़ो, तल तक जाओ। आगे बढ़ो तो उत्स तक जाओ।' हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक  प्रो. मोहनकृष्ण बोहरा ने उकत विचार अपने अस्सीवें जन्मदिन पर चौपाल द्वारा आयोजित समारोह में व्यक्त किये। जोधपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स के सभागार में आत्मीय जन को सम्बोधित करते हुए प्रो बोहरा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत एक पंजाबी कथन से की: तुस्सी साड्डा जुलूस करना चांदे हो, यानि आप लोग मेरा जुलूस निकालना चाहते हो।

अब कैसे कृष्ण, कैसे राम निकलेगा (ग़ज़ल)

तेरा न बोलना बहुत देर तक खलेगा
एक न एक दिन तेरा घर भी जलेगा

नज़र बंद हो अपनी बोई नफरतों में
फिर रहीम और कबीर कहाँ मिलेगा

चाँद को चुराके रात को दोष देते हो
इंतज़ार करो , आसमाँ भी पिघलेगा

जाति,धरम,नाम सबसे तो खेल लिया
अब कैसे कृष्ण , कैसे राम निकलेगा

पानी,हवा,मिटटी सब तो बँट गए हैं
किस आँगन में अब गुलाब खिलेगा

सब को बदल दिया खुद को छोड़के
सच को झूठ से और कितना बदलोगे

सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन, नई दिल्ली


14.8.19

जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं ....!!

जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं    ....!!
तारकेश कुमार ओझा
जीवन के खेल वाकई निराले होते हैं। कई बार ऐसा होता है कि ना - ना करते आप वहां पहुंच जाते हैं जहां जाने को आपका जी नहीं चाहता जबकि अनायास की गई ऐसी यात्राएं न सिर्फ सार्थक सिद्ध होती हैं बल्कि यादगार भी। जीवन की अनगिनत घटनाओं में ऐसी दो यात्राएं अक्सर मेरे जेहन में उमड़ती - घुमड़ती रहती है। पहली घटना मेरे किशोरावस्था की है। पत्रकारिता का ककहरा सीखते हुए उस दौर में रविवार, धर्मयुग , दिनमान और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी तमाम लब्ध प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बंद हो चुकी थी। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के इस काल - खंड में साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर कुछ नए अखबारों का प्रकाशन शुरू हुआ। कम कीमत वाले इन पत्रों के साथ चार रंगीन पृष्ठों का सप्लीमेंट और एक छोटी सी पत्रिका भी रहती थी। लिहाजा देखते ही देखते ऐसे साप्ताहिक पत्रों ने अच्छा - खासा पाठक वर्ग तैयार कर लिया। देश के चार महानगरों से हिंदी व अंग्रेजी में निकलने वाले एक साप्ताहिक पत्र का एक पन्ना आंचलिक खबरों के लिए था। शुरूआती दौर में मुझे ऐसे किसी मंच की बेताबी से जरूरत थी, लिहाजा बगैर किसी औपचारिक बातचीत के मैने उस समाचार पत्र के क्षेत्रीय कार्यालय को डाक से खबरें भेजना शुरू कर दिया।  अमूमन हर हफ्ते प्रकाशित होने वाली  बाइ लाइन खबरों  ने मुझे क्षेत्र का चर्चित पत्रकार बना दिया था। हालांकि मेरी प्राथमिकता पहचान के साथ पारिश्रमिक भी थी। क्योंकि यह मेरे करियर के शुरूआती दौर के लिए प्राण वायु साबित हो सकती थी। बेरोजगारी का कलंक मेरे सिर से मिट सकता था। लेकिन उस दौर के दो ऐसे समाचार पत्रों ने लिखित घोषणा के बावजूद एक चवन्नी भी कभी पारिश्रमिक के तौर पर नहीं दी तो मैं निराशा के गर्त में डूबने लगा।  क्योंकि अंतहीन प्रतीक्षा के बाद भी कभी कोई मनीआर्डर तो आया नहीं, उलटे ज्यादा तगादा करने पर खबरें छपना भी बंद हो जाती थी। इस बीच शहर में एक वित्तीय कंपनी का कार्यालय खुला। इसके कई कर्मचारी मेरे परिचित थे। तब फोन आदि नहीं बल्कि सीधे घर पहुंचने का जमाना था। लिहाजा इसके कुछ कर्मचारी कई बार मेरे घर यह कहते हुए आ पहुंचे कि आपको महाप्रबंधक बुला रहे हैं। मैं असहज हो गया। क्योंकि मैं जानता था कि अखबारों में समाचार छपवाने  के लिए मुझे बुलाया जा रहा है, जबकि तात्कालीन परिस्थितियों में यह मुश्किल था। लिहाजा मैने कन्नी काटने की भरसक कोशिश की। लेकिन काफी अनुनय - विनय के बाद मुझे उनके दफ्तर जाना ही पड़ा। महाप्रबंधक काफी भद्र आदमी था। उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि उनकी कंपनी का विज्ञापन किसी समाचार पत्र में छपवा दूं। इसके लिए कोलकाता जाना पड़े तो चले जाएं, कंपनी के आदमी साथ होंगे। आपको केवल साथ जाना पड़ेगा। मन से राजी न होते हुए भी आखिरकार मुझे कोलकाता निकलना पड़ा। कंपनी के दो मुलाजिम मेरे साथ थे, जिनमें से एक मेरा सहपाठी रह चुका था। ट्रेन से कोलकाता का रुख करते हुए भी कई बार लगा कि ऐसा कुछ हो जाए, जिससे मैं इस अनचाही यात्रा से बच सकूं। रेल अवरोध या तकनीकी समस्या। लेकिन मेरी एक न चली। उधेड़बुन के बीच हम हावड़ा स्टेशन पर थे। पूछते - पाछते बस से उसी साप्ताहिक समाचार पत्र के दफ्तर जा पहुंचे। जहां भविष्य की तलाश में पहले भी दो - एक बार जाना हुआ था। मुझे याद है कोलकाता के एजेसी बोस रोड पर उस अखबार का दफ्तर था।  आफिस के कर्मचारी अचानक मुझे अपने बीच पाकर हैरान थे। मैने अनमने भाव से मकसद बताया। कुछ देर में ही 3450 रुपये का विज्ञापन फाइनल हो गया। रसीद बनाते समय कुछ कर्मचारियों ने जब मुझसे कमीशन लेने को कहा तो मैं पशोपोश में पड़ गया। क्योंकि साथ गए लोगों के सामने मेरी इमेज खराब हो सकती थी। दूसरी तरफ दफ्तर के लोगों का कहना था कि एजेंसियों को हम 15 फीसद देते हैं। आप हमारे सहयोगी हैं। इसलिए हम आपको केवल 10 फीसद कमीशन दे सकते हैं। इस लिहाज से यह 345 रुपये बन रहा था। लड़कपन के उस दौर में यह मेरे लिए 3 लाख  से कम न था। , या कहें इससे भी ज्यादा । ये रुपये मुझे बगैर मांगे या उम्मीद के मिल रहे थे। मैं जिस  क्षेत ्र में  हाथ पांव मार रहा था, उसमें कमाई भी हो सकती है यह तब कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।  उधेड़बुन के बीच साथ गए लोगों ने यह कहते हुए मुझे धर्मसंकट से उबारा कि अखबार से अगर आपको कुछ मिल रहा है तो इसमें भला हमें क्या ऐतराज हो सकता है। कमीशन के पैसे बैग में रख कर दफ्तर से बाहर निकला तो मैं जिंदगी की पहेली पर हैरान था। क्योंकि लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जहां से मुझे कभी अठन्नी भी नहीं मिली, वहीं से बगैर मांगे इतने पैसे मिल गए कि दशहरा - दिवाली मन जाए।
अनचाही और आकस्मिक यात्रा की एक और मजेदार घटना युवावस्था में हुई। जब मैं अप्रत्याशित रूप से पत्रकारिता से रोजी - रोटी कमाने में सक्षम हो चुका था। तब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बिल्कुल नई बनी थी। इसकी नेत्री ममता बनर्जी  राजनैतिक तनातनी के लिए तब खासे चर्चित चमकाईतला आने वाली थी। जो मेरे ही जिले की सीमा क्षेत्र में है। एक रोज सुबह अखबार का काम निपटाने के बाद स्टेशन से बाहर निकला तो चमचमाती टाटा सुमो खड़ी नजर आई। तब इस गाड़ी में चढ़ना बड़े फक्र की बात मानी जाती थी।  पता लगा  कुछ परिचित  नेता वहां जा रहे हैं। कुछ देर बाद सभी सुमो के नजदीक खड़े मिले । मुझे देखते ही बोल पड़े, आपको लिए बगैर नहीं जाएंगे। मेरे लिए यह काफी आकर्षक प्रस्ताव था, क्योंकि चमकाईतला जाने के लिए हमें केशपुर होकर जाना था, जो उन दिनों राजनैतिक हिंसा के लिए अंतर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में था। लेकिन दुविधा यह कि मेरी प्राथमिकता शहर की खबरें होती थी। मुझे लगा कि मैं बाहर रहा और शहर में कोई बड़ी घटना हो गई तो... इसके साथ तब दोपहर के भोजन के बाद मुझे हल्की झपकी लेने की भी बुरी आदत थी। लिहाजा मैं वहां जाने से आना - कानी करने लगा। लेकिन नेताओं ने एक झटके से सुमो की अगली सीट का दरवाजा खोला और आग्रहपूर्वक मुझे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठा दिया। इस तरह जीवन की एक और आकस्मिक यात्रा यादगार बन गई। हम हंस पड़े जब सुमो का चालक लगभग रूआंसा हो गया जब उसे पता चला कि गाड़ी केशपुर होकर गुजरेगी। लगभग रोते हुए ड्राइवर बोल पड़ा... बाल - बच्चेदार हूं सर... और वाहन में बैठे सब लोग हंसने लगे।

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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*

13.8.19

हमे ऐसा हिंदुस्तान बनाना है...ईद-उल-अज़हा की मुबारकबाद

इस वीडियो की मार्फत ईद-उल-अज़हा की एहले हिंदुस्तान को दिली मुबारक पेश करता हूँ।वज़ीर-ए-आज़म आली जनाब नरेंद्र मोदी जी,वज़ीर-ए-दाखला आली जनाब अमित शाह जी की सरपरस्ती में हमें किस तरह के हिंदुस्तान की तशकील करनी है...इस वीडियो के मार्फत गौर फरमाएं...
जय-हिंद
लिंक---
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=396796227856291&id=100025777510340

10.8.19

संगठन पर्व सदस्यता अभियान-2019

उत्तर प्रदेश के ज़िला बदायूं में आयोजित सदस्यता अभियान कार्यक्रम मे सैकड़ो की तादात में मुस्लिम मोअशरे के लोगों को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कराई! इस अवसर पर मुझे प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक एवं मुख्य वक्ता के तौर पर रहने का सौभाग्य प्राप्त हुया,विधायक बदायूं सदर जनाब महेश चंद्र गुप्ता जी गरिमामई उपस्थित, प्रदेश मंत्री भारतीय जनता पार्टी(अल्पसंख्यक मोर्चा) DrNazia Alam जी की क़यादत और अल्पसंख्यक मोर्चा(BJP) जनाब Atif Nizami जी की निज़ामत ने इस इजलास को ज़ीनत अफ़रोज़ कर दिया...मुख्य वक्ता के तौर पर इजलास में मदु करने के लिये ज़िला बदायूं की अवाम,विधायक जी और आतिफ़ निज़ामी जी का दिल की गहराईयों से शुक्रिया...
#संगठन_पर्व_2019
#साथ_आएं_देश_बनायें
जय हिंद-जय भारत
जय राष्ट्रवाद
मोबाइल no- 9837357723














6.8.19

galgotia के पाप का घड़ा फूटा, धोखाधड़ी में ध्रुव गलगोटिया और पद्मिनी गलगोटिया गिरफ्तार


कई वर्षों से और कई तरह के फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी और बेईमानी करने करने वाले ‘गलगोटियाज’ के पाप का घड़ा भर गया दिखता है. खबर है कि तगड़ा विज्ञापन देकर मीडिया का मुंह बंद रखने वाले गलगोटिया पर 122 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में कार्रवाई हुई और galgotia university के निदेशक ध्रुव गलगोटिया और पद्मिनी गलगोटिया को गिरफ्तार कर लिया गया. गलगोटिया यूनिवर्सिटी के चेयरमैन का पुत्र है ध्रुव गलगोटिया और पत्नी हैं पद्यमिनी गलगोटिया. गिरफ्तारी की कार्रवाई आगरा पुलिस ने की. आगरा के थाना हरीपर्वत की पुलिस ने गलगोटिया विश्वविद्यालय के दोनों निदेशकों मां-बेटे पद्मिनी और ध्रुव को गुड़गांव से गिरफ्तार किया. शंकुतला एजूकेशनल सोसाइटी के चेयरमैन सुनील गलगोटिया की पत्नी हैं पद्मिनी. उनके खिलाफ आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया था.

मायावती की सियासत में मोदी-योगी विरोध के साथ राष्ट्रवाद का भी चटख रंग

अजय कुमार, लखनऊ
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमों मायावती ने काफी सोच-समझकर धारा 370 के खिलाफ मतदान किया है। ऐसा करते समय उन्होंने यह भी नहीं सोचा की उनके इस फैसले से उनका मुस्लिम वोट बैंक खिसक सकता है। संभवता माया को मुस्लिम वोटों से अधिक दलित वोट बैंक की चिंता तो रही ही होगी,इसके अलावा वह यह भी नहीं चाहती होंगी कि कोई उनके ऊपर कोई अम्बेडकर विरोधी होने का ठप्पा लगाए। क्योंकि मायावती की पूरी सियासत संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर के इर्दगिर्द ही चलती रही है। अम्बेडकर के नाम को जितना मायावती ने भुनाया उतना शायद ही किसी ने भुनाया होगा।

5.8.19

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी को मिला ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 सम्मान


उदयपुर। आईब्लॉगर द्वारा राष्ट्रीय स्तर का वर्ष 2019 का ब्लॉगर ऑफ द ईयर सम्मान उदयपुर के डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी को प्रदान किया गया है। डॉ. छतलानी जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर में कार्यरत हैं।

2.8.19

तारकेश्वर : गरीबों का अमरनाथ ....!!

तारकेश्वर : गरीबों का अमरनाथ   ....!!
तारकेश कुमार ओझा
पांच, दस, पंद्रह या इससे भी ज्यादा ...। हर साल श्रावण मास की शुरूआत के साथ ही मेरे जेहन में यह सवाल सहजता से कौंधने लगता है। संख्या का सवाल श्रावण में  कंधे पर कांवड़ लेकर अब तक की गई मेरी तारकेश्वर की पैदल यात्रा को लेकर होती है। आज भी शिव भक्तों  को कांवड़ लेकर तारकेश्वर की ओर जाता देख रोमांच से भर कर मैं  उन्हें हसरत भरी नजरों से देर तक उसी तरह  देखता रहता हूं मानो गुजरे जमाने का कोई फुटबॉल खिलाड़ी नए लड़कों को फुटबॉल खेलता देख रहा हो।  पहले श्रावण शुरू होते ही मेरे पांव सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर धाम की ओर जाने को बेचैन हो उठते थे।  सोच रखा था जब तक शरीर साथ देगी हर श्रावण में कंधे पर कांवड़ लटका कर सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर तक की पैदल यात्रा अवश्य करुंगा। हालांकि कई कारणों से मेरी यह कांवड़ यात्रा पिछले कई सालों से बंद है। लेकिन इस यात्रा के प्रति मेरा लगाव अब भी जस का तस कायम है। हालांकि यह सच है कि  पिछले दो दशकों की अवधि में कांवड़ यात्रा में बड़ा परिवर्तन आया है। क्योंकि पहले यह यात्रा नितांत व्यक्तिगत आस्था का विषय थी। तब कांवड़ यात्रा को न तो  इतना प्रचार मिलता था और न ये राजनीतिकों की रडार पर रहती थी।  भोले की भक्ति मुझे संस्कार में मिली , लेकिन तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा के प्रति मेरी दो कारणों से आसक्ति हुई। पहला कांवड़ लेकर पैदल चलते समय शिव से सीधे  साक्षात्कार से हासिल आध्यात्मिक अनुभव से मिलने वाली असीम शांति और दूसरा सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर तक पग - पग पर नजर आने वाला  स्वयंसेवी संस्थाओं का अनन्य सेवा भाव। जिसे प्रत्यक्ष देखे बिना महसूस करना मुश्किल है। पता नहीं स्वयंसेवकों में यह कैसी श्रद्धा जाग उठती है जो  महंगी से महंगी चीजें कांवड़ियों को खिलाने के लिए उन्हें बेचैन किए रहती है। बगैर मौसम की मार या दिन - रात की चिंता किए। कांवड़िए के कीचड़ से सने पांवों को भी सहलाने और जख्मों पर मरहम लगाने से भी उन्हें गुरेज नहीं। वाकई बाबा भोले की गजब महिमा है। कहते हैं जब तक बाबा बुलाए नहीं कोई उनके दरबार में नहीं पहुंच सकता। आप बनाते रहिए योजना पर योजना। लेकिन बदा नहीं होगा तो सारी प्लानिंग धरी की धरी रह जाएगी। वहीं कोई ऐसा बंदा भी कांवड़ लेकर बाबा के दरबार पहुंच जाता है, जिसने कभी इस बारे में सोचा तक नहीं था। अपनी  कांवड़ यात्रा के दौरान मैने ऐसे कई लोगों को पैदल चलते देखा जिनकी भाव भंगिमा और देह भाषा बताती है कि वे बगैर एयरकंडीशंड के शायद नहीं रह पाते होंगे, नंगे पांव जमीन पर चलना तो बहुत दूर की बात है। लेकिन भक्ति के वशीभूत वे भी कांवड़ लिए चले जा रहे हैं।  पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से 58 किलोमीटर की दूरी पर बसा तारकेश्वर हुगली जिले का प्रमुख शहर है। इस शहर का नाम भी तारकेश्वर मंदिर के ऊपर ही पड़ा। इस मंदिर के निर्माण और आस्था का रोचक इतिहास है। पूर्व रेलवे के हावड़ा - सेवड़ाफुल्ली - तारकेश्वर रेल खंड का यह आखिरी स्टेशन है। वाकई तारकेश्वर धाम की कांवड़ यात्रा को यदि गरीबों का अमरनाथ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। क्योंकि आस्थावान ऐसे लोगों का बड़ा समूह जिनके लिए तीर्थ , रोमांच या भ्रमण आदि पर खर्च करना संभव नहीं है  श्रावण में  तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा वे भी हंसते - हंसते कर जाते हैं। दीघा या अन्य किसी स्थान का बस का किराया भी जितनी  रकम से संभव न हो उससे भी कम पैसे में तारकेश्वर की यात्रा मुमकिन थी। यह सब स्वयंसेवी संस्थाओं की उदारता से संभव हो पाता है। कांवड़ यात्रा के दौर में मैने खुद अनुभव किया और दूसरे श्रद्धालुओं से भी पता लगा कि दूसरे तीर्थ या भ्रमण स्थल के विपरीत तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा में पैसे कभी बाधक नहीं बनते। क्योंकि रास्ते में खान - पान से लेकर दवा तक का निश्शुल्क इंतजाम बहुतायत में रहता है। सेवड़ाफुल्सी से जल लेकर चलने पर पहला पड़ाव डकैत काली होती है, जो पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब तो डकैत काली से पहले ही कई  स्वयंसेवी संस्थाओं के शिविर नजर आने लगे हैं। इसके बाद तो थोड़ी - थोड़ी दूर पर सड़क के  दोनों ओर शिविर ही शिविर दिखाई देते हैं, जो कांवड़ियों की सेवा को हमेशा तत्पर नजर आते हैं। सेवड़ाफुल्ली से तारकेश्वर के बींचोबीच काशी विश्वनाथ नाम का बड़ा बड़ा शिविर हैं, जहां पहुंच कर कांवड़ियों को खुद के वीआइपी होने का भ्रम होता है।  गर्म पानी के टब में थके पांवों   को डुबों कर राहत पाने का सुख निराला होता है। इसके बाद भी कई शिविरों से होते हुए कांवड़िए जब लोकनाथ पहुंचते हैं तो उन्हें अहसास हो जाता है कि वे बाबा के मंदिर पहुंच चुके हैं। यहां जल चढ़ाने  के बाद कांवड़िये बाबा के मंदिर की ओर रवाना होते हैं। कहते हैं बाबा इस  चार किलोमीटर की दूरी पर भक्त की की कड़ी परीक्षा लेते हैं, क्योंकि नजदीक पहुंच कर भी भक्तों को लगता है उनसे अब नहीं चला जाएगा। लेकिन रोते - कराहते भक्त बाबा के दरबार में पहुंच ही जाते हैं।     दो दशक पहले तक की गई अपनी कांवड़ यात्राओं में मैने अनेक ऐसे श्रद्धालुओं को देखा जिनके लिए किसी तीर्थ पर सौ रुपये खर्च कर पाना भी संभव नहीं , लेकिन उनकी यात्रा भी हर साल बेखटके पूरी होती रही। वाकई तारकेश्वर की कांवड़ यात्रा को गरीबों का अमरनाथ कहा जाए तो शायद  गलत नहीं होगा।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
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30.7.19

ये 17 बागी विधायक न मंत्री बन पाएंगे न उपचुनाव लड़ पाएंगे!

जे.पी.सिंह
कर्नाटक की बीएस येदियुरप्पा सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया है और इसके बाद स्पीकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कर्नाटक में अब सत्ता पूरी तरह से भाजपा के हाथ में आ गई है और राजनितिक ड्रामें के एक अंक का पटाक्षेप हो गया है।लेकिन कर्नाटक के नाटक में सबसे बड़े लूजर फिलवक्त वे 17 बागी विधायक हैं, जो विधानसभा स्पीकर द्वारा ने केवल अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं बल्कि विधानसभा के कार्यकाल तक के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिए गए हैं। अब उनका येदियुरप्पा कैबिनेट में मंत्री बनने का सपना उच्चतम न्यायालय के पाले  में चला गया है।स्पीकर के फैसले पर उच्चतम न्यायालय कोई राहत अयोग्य विधायकों को देता है या नहीं ,इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।

इलाहाबादियों को लूट कर भाग गई एक चिटफंड कंपनी


पूर्व भाजपा विधायक के भांजे सहित 11 लोगो पर ठगी व जालसाजी करने पर मुकदमा दर्ज
प्रयागराज। जनपद के नवाबगंज थाना क्षेत्र के नवाबगंज कस्बा स्थित बैंक आफ बडौ़दा के बगल में चिट फंड कंपनी खोलकर ठगों ने स्थानीय ग्रामीणों से एजेन्ट के माध्यम से लगभग 75 करोड़ रू जमा करा लिया। जब ग्रामीणों का पैसा पूरा होने का वक्त आया तो उक्त कंपनी के सम्बंधित कर्मचारी दफ्तर में ताला बंद कर के फरार हो गए। कंपनी द्वारा बनाये गये एजेन्टों ने डायरेक्टर समेत 11 लोगों के खिलाफ नवाबगंज में जालसाजी व धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया है।

28.7.19

न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल...



दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के एक लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैंलें भष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडि़या पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमार जी ने इसे हिन्दी भाषीय पाठ़कों के लिए अनुवादित किया है। –

न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल...

भारतीय लोग  होब्स विचारधारा वाले है (सिर्फ अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)

भारत मे भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार मे बिलकुल असहज नही होते, भ्रष्टाचार यहाँ बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नही होती

ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यो होते हैं उनके जीवनपद्धति और परम्पराये देखिये।

भारत मे धर्म लेनेदेन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद मे कि वो बदले मे दूसरे के तुलना मे इन्हे वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिये कुछ देना पडता है। मंदिर चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाय स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नही देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बरबाद होता है।

जून 2009 मे द हिंदू ने कर्नाटक मंत्री जी जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरो के 45 करोड मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नही जानते कि इसका करे क्या। अरबो की सम्पत्ति मंदिरो मे व्यर्थ पडी है।

जब यूरोपियन इंडिया आये तो उन्होने यहाँ स्कूल बनवाये। जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं।

भारतीयो को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिये धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने मे कुछ कुछ गलत नही है। इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं।

भारतीय कल्चर इसीलिये इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है, क्योंकि

1 नैतिक तौर पर इसमे कोई नैतिक दाग नही आता। एक अति भ्रष्ट नेता जयललिता दुबारा सत्ता मे आ जाती है, जो आप पश्चिमी देशो मे सोच भी नही सकते ।

2 भारतीयो की भ्रष्टाचार के प्रति संशयात्मक स्थिति इतिहास मे स्पष्ट है। भारतीय इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियो को रक्षको को गेट खोलने के लिये और कमांडरो को सरेंडर करने के लिये घूस देकर जीता गया। ये सिर्फ भारत मे है

भारतीयो के भ्रष्ट चरित्र का परिणाम है कि भारतीय उपमहाद्वीप मे बेहद सीमित युद्ध हुये। ये चकित करने वाला है कि भारतीयो ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना मे कितने कम युद्ध लडे। नादिरशाह का तुर्को से युद्ध तो बेहद तीव्र और अंतिम सांस तक लडा गया था। भारत मे तो युद्ध की जरूरत ही नही थी, घूस देना ही ही सेना को रास्ते से हटाने के लिये काफी था।  कोई भी आक्रमणकारी जो पैसे खर्च करना चाहे भारतीय राजा को, चाहे उसके सेना मे लाखो सैनिक हो, हटा सकता था।

प्लासी के युद्ध मे भी भारतीय सैनिको ने मुश्किल से कोई मुकाबला किया। क्लाइव ने मीर जाफर को पैसे दिये और पूरी बंगाल सेना 3000 मे सिमट गई। भारतीय किलो को जीतने मे हमेशा पैसो के लेनदेन का प्रयोग हुआ। गोलकुंडा का किला 1687 मे पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलो ने मराठो और राजपूतो को मूलतः रिश्वत से जीता श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे कई केसेज हैं जहाँ भारतीयो ने सिर्फ रिश्वत के लिये बडे पैमाने पर गद्दारी की।

सवाल है कि भारतीयो मे सौदेबाजी का ऐसा कल्चर क्यो है जबकि जहाँ तमाम सभ्य देशो मे ये  सौदेबाजी का कल्चर नही है

3- भारतीय इस सिद्धांत मे विश्वास नही करते कि यदि वो सब नैतिक रूप से व्यवहार करेंगे तो सभी तरक्की करेंगे क्योंकि उनका “विश्वास/धर्म” ये शिक्षा नही देता।  उनका कास्ट सिस्टम उन्हे बांटता है। वो ये हरगिज नही मानते कि हर इंसान समान है। इसकी वजह से वो आपस मे बंटे और दूसरे धर्मो मे भी गये। कई हिंदुओ ने अपना अलग धर्म चलाया जैसे सिख, जैन बुद्ध, और कई लोग इसाई और इस्लाम अपनाये। परिणामतः भारतीय एक दूसरे पर विश्वास नही करते।  भारत मे कोई भारतीय नही है, वो हिंदू ईसाई मुस्लिम आदि हैं। भारतीय भूल चुके हैं कि 1400 साल पहले वो एक ही धर्म के थे। इस बंटवारे ने एक बीमार कल्चर को जन्म दिया। ये असमानता एक भ्रष्ट समाज मे परिणित हुई, जिसमे हर भारतीय दूसरे भारतीय के विरुद्ध है, सिवाय भगवान के जो उनके विश्वास मे खुद रिश्वतखोर है

लेखक-ब्रायन,
गाडजोन न्यूजीलैंड

  

26.7.19

कारिगल यानि अटल की पीठ में छूरा भोंकने वाला युद्ध

अजय कुमार, लखनऊ
कारगिल विजय दिवस हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है। कारगिल युद्ध लगभग 60 दिनों तक चला और 26 जुलाई 1999 को खत्म हुआ। उस समय केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। अटल जी के कुशल ने नेृतत्व के चलते पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी और भारत की विजय हुई।  इस युद्ध में शहीद हुए जवानों के सम्मान के लिए कारगिल विजय दिवास मनाया जाता है। कारगिल यु़द्ध से पूर्व भी भारत अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की उदंडता का जबाव देते हुए उसे तीन बार 1947,1965 और 1971 के युद्ध में धूल चटा चुका था।

25.7.19

मोदी मुस्लिम महिलाओं पर तो योगी युवाओं पर मेहरबान

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार हर क्षेत्र में राज्य की पूर्ववती सरकारों से दो कदम आगे रहना चाहती है। इसी लिए योगी सरकार द्वारा कई ऐसे कदम उठाए गये हैं जिनको लेकर पहले की सरकारों में हिचकिचाहट नजर आती थी। बात मार्ग दर्शन की कि जाए तो कई चीजों को लेकर योगी सरकार को केन्द्र की मोदी सरकार से यह समर्थन मिलता है। इसी लिए तो जब आम चुनाव में शानदार सफलता हासिल करने के बाद मोदी ने सबका साथ-सबका विश्वास के साथ सबका विश्वास जीतने की बात कही तो योगी जी भी इसी रास्ते पर चल पड़े।

‘आधा खाली-आधा भरा गिलास’जैसे राम नाईक

संजय सक्सेना, लखनऊ
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक का पांच साल का कार्यकाल रविवार (21 अगस्त 2018) को पूरा हो जाएगा। गुजरात की पूर्व सीएम और मघ्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल उनकी जगह लेंगी। यूपी के गर्वनर के रूप में पांच वर्ष पूरे कर चुके राम नाईक के कार्यकाल को दो हिस्सों (राम नाईक का आधा कार्यकाल अखिलेश सरकार में आधा योगी राज में गुजरा) में बांट कर देखा जाए तो उनके पूरे कार्यकाल को किसी ने आधा भरा गिलास के रूप में देखा तो किसी ने आधा खाली गिलास के रूप में। पांच वर्षों में राम नाईक ने जो फैसले लिए, उनकी धमक जनता के साथ सत्ता भी लगातार महसूस करती रही।

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स को संघ का जेबी संगठन बना डाला!

वैसे तो नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स को संघ के विचारधारा से प्रभावित पत्रकारों का अखाड़ा माना जाता है मगर इन दिनों इसे पूरी तरह संघ का जेबी संगठन बनाने की पटकथा पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर और दिल्ली प्रदेश के संघ के पूर्व प्रचार प्रमुख राजीव तूली लिख रहे हैं। पिछले दिनों इस संगठन के एक धड़े ने प्रभात प्रकाशन के साथ मिलकर 'ब्लीडिंग बंगाल' नाम से एक पुस्तक का अंग्रेजी में प्रकाशन किया है।

23.7.19

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम की सिफारिश सरकार ने लौटाई

पुनर्विचार की वजह बताए कानून मंत्रालय : सुप्रीमकोर्ट
जे.पी.सिंह

उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने कानून मंत्रालय से यह बताने को कहा है कि वह आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर पुनर्विचार क्यों करे? भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 8 जुलाई को कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिखकर वर्तमान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस  विक्रम नाथ की आंध्र प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए सरकार से उन कारणों को बताने के लिए खा है जिसके आधार पर  पुनर्विचार किया जाये।

21.7.19

भारतीय समाज में बच्चियां कब सुरक्षित रह सकेंगी?

न जुल्म करो जग-जननी पर
कहीं ज्वालामुखी फट न जाए
ये धरती ध्वस्त न हो जाए
कहीं बेटियां लुप्त न हो जाए

हे! बेटी तू अब शस्त्र उठा
इतिहास बदल, भूगोल बदल
स्वाभिमान बढ़ा, जग नारित्व का
फूलनदेवी की तू, राह पे चल

सभ्य समाज कहलाने वाला भारतीय समाज कितना सभ्य है, यह इसी बात से स्पष्ट होता है कि, वहां पर नारी की स्थिति कैसी है? सभ्यता में कितना स्थान है वह मानवीय प्रतिष्ठा की दौड़ में किस स्थान पर है? ये सवाल इसलिए मायने रखता है कि, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।

बीच भंवर में नवजोत सिद्दू की नैय्या ,कोई नहीं खिवइया

कृष्णमोहन झा
क्रिकेट से राजनीति में आए कांग्रेस के बडबोले नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने आखिरकार पंजाब की अमरिंदर सरकार से इस्तीफा देना ही उचित समझा। पंजाब में गत विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार विजय के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्रित्व में सरकार का गठन हुआ था, तभी से नवजोत सिंह सिद्धू उसमें मंत्री बने हुए थे ,लेकिन उन्होने अपनी एक अलग हस्ती बनाए रखने की महत्वाकांक्षा का परित्याग कभी नहीं किया। वे जितने समय मंत्री रहे हमेशा ही अपनी हैसियत को मुख्यमंत्री से ऊपर मानते रहे। उन्हे यह अहंकार हो गया था कि जब तक राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की बागडोर है ,तब तक पंजाब में उनकी कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित है। सिद्धू ने एकाधिक अवसरों पर यहां तक कह दिया कि मैं किसी कैप्टन को नहीं जानता मेरे केप्टन तो राहुल गांधी ही है। और अब जब राहुल गांधी ही कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे तो मानो उनके सिर से उनका वरदहस्त भी हट गया।

'पत्रिका' वालों ने फिरौती गैंग के सरगना की खबर में राज्यपाल जगदीप धनकड़ की तस्वीर लगा दिया



20.7.19

बाबरी विध्वंस साजिश पर 9 माह में आएगा फैसला, विशेष जज एसके यादव को सेवा विस्तार

जे.पी.सिंह

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद  के बड़े नेताओं पर चल रहा मुकदमा 9 महीने में निपटाया जाएगा। उच्चतम न्यायालय  ने मामले की सुनवाई कर रहे लखनऊ के विशेष जज एस के यादव को सेवा विस्तार देते हुए केस के निपटारे की समय सीमा तय कर दी है।यादव 30 सितंबर को रिटायर होने वाले थे।कोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिया है कि वो उन्हें सेवा विस्तार देने का औपचारिक आदेश जारी करे।साथ ही साफ किया कि इस अवधि में जज सिर्फ इसी केस की सुनवाई करेंगे।

कर्नाटक के नाटक में राज्यपाल के कूदने से नया संवैधानिक संकट

जे.पी.सिंह
कर्नाटक के नाटक में राज्यपाल के कूद जाने से नए तरह का संवैधानिक संकट उत्पन्न हो  गया है और एक बार फिर पूरा विवाद उच्चतम न्यायालय की देहरी पर पहुंच गया है। उच्चतम न्यायालय  की संवैधानिक पीठ ने वर्ष  2016 में अरुणाचल प्रदेश की नबाम टुकी सरकार के मामले में एक आदेश दिया था कि असेंबली का सत्र चलने के दौरान गवर्नर के पास दखल देने और आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।तब पीठ ने फ्लोर टेस्ट को लेकर तत्कालीन गवर्नर जेपी राजखोवा के फैसले को असंवैधानिक करार दिया था।कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस  सरकार भी उच्चतम न्यायालय के इस आदेश से फिलहाल फ्रंटफुट पर है। आंकड़ों के खेल में मुख्यमंत्री  कुमारस्‍वामी यह जंग लगभग हार चुके हैं लेकिन वह अभी पराजय को मानने के मूड में नहीं दिखाई दे रहे हैं। जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार राज्‍यपाल के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय चली गयी है।

हत्या में शामिल और जेल काट चुका आमिर कादरी उर्फ़ रोबिन को रिपब्लिक भारत ने बनाया आगरा का स्ट्रिंगर!


सेवा में
श्रीमान सम्पादक महोदय
भड़ास 4 मीडिया

विषय : हत्या में शामिल और जेल काट चुका आमिर कादरी उर्फ़  रोबिन को रिपब्लिक भारत ने बनाया आगरा का स्ट्रिंगर!

देश का तेजी से उभरता न्यूज चैनल रिपब्लिक भारत किसी न किसी बजह से सुर्ख़ियो में बना रहता है। सबसे पहले खबर दिखने में माहिर और सुर्ख़ियां बटोर कर कम समय में पहचान बनाने वाले हिंदी न्यूज  चैनल रिपब्लिक भारत ने  अब ऐसे युवक को भी अपने संस्थान से जोड़कर स्ट्रिंगर बनाया  है, जो हत्या कर जेल काट चुका है। हम बात कर रहे हैं आगरा के स्ट्रिंगर  आमिर कादरी उर्फ़ रोबिन की। अताउल्लाह का बेटा  आमिर कादरी उर्फ़ रोबिन यमुना ब्रिज घाट, थाना एतमाउददौला में रहता है।

पंकज सुबीर के नए उपन्यास ‘‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’’ का विमोचन


शिवना प्रकाशन द्वारा आयोजित एक गरिमामय साहित्य समारोह में सुप्रसिद्ध कथाकार पंकज सुबीर के तीसरे उपन्यास ‘‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार तथा नाट्य आलोचक डॉ. प्रज्ञा विशेष रूप से उपस्थित थीं। कार्यक्रम का संचालन संजय पटेल ने किया। श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के सभागार में आयोजित इस समारोह में अतिथियों द्वारा पंकज सुबीर के नए उपन्यास का विमोचन किया गया। इस अवसर पर वामा साहित्य मंच इन्दौर की ओर से पंकज सुबीर को शॉल, श्रीफल तथा सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। मंच की अध्यक्ष पद्मा राजेन्द्र, सचिव ज्योति जैन, गरिमा संजय दुबे, किसलय पंचोली तथा सदस्याओं द्वारा पंकज सुबीर को सम्मानित किया गया।

17.7.19

मोदी सरकार में सब कुछ काफी ठीक है बस अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और पैसा नहीं है!

Ravish Kumar : सबकुछ काफी ठीक है बस अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और सरकार के पास पैसे नहीं है। जून में निर्यात का आंकड़ा 41 महीनों में सबसे कम रहा है। आयात भी 9 प्रतिशत कम हो गया है। जो कि 34 महीने में सबसे कम है। सरकार मानती है कि दुनिया भर में व्यापारिक टकरावों के कारण ऐसा हुआ है।

मूडीज ने मोदी सरकार को दे दिया संदेश- झूठी आंकड़ेबाजी से जनता को उल्लू बनाइये, हमें बेवकूफ न समझिए!

Girish Malviya : कुछ बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक खबरें पिछले दिनों आई है एक नजर डाल लीजिए. पहली खबर तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की मोदी सरकार को साफ साफ चेतावनी दी है. आसान भाषा में उसकी बातों का यह मतलब निकाला जा सकता है कि झूठी आंकड़ेबाजी से आप देश की जनता को ही उल्लू बनाइये, हमे बेवकूफ मत समझिए ऐसे आंकड़ो से खतरा देश की साख को है.

देश की आर्थिक समृद्धि के विजन का अभाव ही इस 'इकनॉमिक एंड फाइनेंशियल पैरालिसिस' का कारण है

Shyam Singh Rawat   
मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ (1325-1351 ई.) को 'उलूग ख़ाँ' भी कहा जाता था। अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों तथा प्रजाजनों के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण उसे 'पागल' व 'रक्त-पिपासु' कहा गया है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कारनामों से साबित किया है कि वे उसी 'उलूग खाँ' के आधुनिक संस्करण हैं जिन्होंने विरासत में मिली देश की अच्छी-भली अर्थ-व्यवस्था को रसातल में पहुंचा कर इसे 'इकनॉमिक एंड फाइनेंशियल पैरालिसिस' का शिकार बना दिया है। मोदी के बारे में कहा जाता है कि वह निर्णय पहले लेते हैं और सोचते बाद में हैं।

साक्षी-अजितेश दो माह में अपनी शादी रजिस्टर्ड नहीं कराते हैं तो हाईकोर्ट का आदेश निरस्त हो जाएगा!

जेपी सिंह
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साक्षी-अजितेश की शादी को वैध ठहराया है। अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर अदालत पहुंचे साक्षी और अजितेश की शादी का प्रमाणपत्र जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा की एकल पीठ ने देखा। इसके साथ ही एकल पीठ ने दोनों की उम्र की जांच के लिए शैक्षिक प्रमाणपत्रों की भी जांच पड़ताल की। सभी कागजातों से संतुष्ट होकर एकल पीठ ने शादी को वैध घोषित किया और  कहा कि दोनों बालिग हैं इसलिए ये पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं। एकल पीठ ने ये शर्त भी रखी है कि साक्षी और अजितेश को दो  महीने में शादी रजिस्टर्ड करानी होगी. अगर ऐसा नहीं कराते तो कोर्ट का आदेश निरस्त हो जाएगा। एकल पीठ ने सरकार को इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। साथ ही पुलिस को भी जोड़े को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए आदेश दिया है।

भूख - प्यास की क्लास ....!!

भूख - प्यास की क्लास  ....!!
तारकेश कुमार ओझा
क्या होता है जब हीन भावना से ग्रस्त और प्रतिकूल परिस्थितियों से पस्त कोई दीन - हीन ऐसा किशोर कॉलेज परिसर में दाखिल हो जाता है जिसने मेधावी होते हुए भी इस बात की उम्मीद छोड़ दी थी कि अपनी शिक्षा - दीक्षा  को वह कभी कॉलेज के स्तर  तक पहुंचा पाएगा। क्या कॉलेज की सीढ़ियां चढ़ना ऐसे अभागे नौजवानों के लिए सहज होता है। क्या वहां उसे उसके सपनों को पंख मिल पाते हैं या फिर महज कुछ साल इस गफलत में बीत जाते हैं कि वो भी कॉलेज तक पढ़ा है। अपने बीते छात्र जीवन के पन्नों को जब भी पलटता हूं तो कुछ ऐसे ही ख्यालों में खो जाता हूं। क्योंकि पढ़ाई में काफी तेज होते हुए भी बचपन में ही मैने कॉलेज का मुंह देख पाने की उम्मीद छोड़ दी थी। कोशिश बस इतनी थी कि स्कूली पढ़ाई पूरी करते हुए ही किसी काम - धंधे में लग जाऊं। 
पसीना पोंछते हुए  पांच मिनट सुस्ताना भी जहां हरामखोरी मानी जाए, वहां सैर - सपाटा , पिकनिक या भ्रमण जैसे शब्द भी मुंह से  निकालना पाप से कम क्या होता। लेकिन उस दौर में भी कुछ भ्रमण प्रेमियों के हवाले से उस खूबसूरत कस्बे घाटशिला का नाम सुना था। ट्रेन में एकाध यात्रा के दौरान रेलगाड़ी की खिड़की से कस्बे की हल्की सी झलक भी देखी थी। लेकिन चढ़ती उम्र में ही इस शहर से ऐसा नाता जुड़ जाएगा जो पूरे छह साल तक बस समय की आंख - मिचौली का बहाना बन कर रह जाएगा यह कभी सोचा भी न था। यह भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के खुद को संभालने की कोशिश के दरम्यान की बात है। होश संभालते ही शुरू हुई झंझावतों की विकट परिस्थितियों में मैने कॉलेज तक पहुंचने की आस छोड़ दी थी। समय आया तो नए विश्व विद्यालय की मान्यता का सवाल और अपने शहर के कॉलेज में लड़कियों  के साथ पढ़ने की मजबूरी ने मुझे और विचलित कर दिया । क्योंकि मैं बचपन से इन सब से दूर भागने वाला जीव रहा हूं।  इस बीच मुझे अपने शहर से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित घाटशिला कॉलेज की जानकारी मिली। स्कूली जीवन में अपने शहर के नाइट कॉलेज की चर्चा सुनी थी। लेकिन कोई कॉलेज सुबह सात बजे से शुरू होकर सुबह के ही 10 बजे खत्म हो जाता है, यह पहली बार जाना। अपनी मातृभाषा में कॉलेज की शिक्षा हासिल करना और वह भी इस परिस्थिति में कि मैं अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन भी पहले की तरह करता रह सकूं, मुझे यह एक सुनहरा मौका प्रतीत हुआ और मैने उस कॉलेज मे ंदाखिला ले लिया। यद्यपि अपनी पसंद के विपरीत इस चुनाव में  मुझे कॉमर्स पढ़ना था। फिर भी मैने इसे हाथों हाथ लिया। क्योंकि कभी सोचा नहीं था कि जीवन में कभी कॉलेज की सीढ़ियां चढ़ना संभव भी हो पाएगा। । चुनिंदा सहपाठियों से तब पता लगा कि तड़के पांच बजे की ट्रेन से हमें घाटशिला जाना होगा और लौटने के लिए  तब की 29 डाउन कुर्लाटी - हावड़ा एक्सप्रेस मिलेगी। शुरू में कुछ दिन तो यह बदलाव बड़ा सुखद प्रतीत हुआ। लेकिन जल्द ही मेरे पांव वास्तविकता की जमीन पर थे। 354 नाम की जिस पैसेंजर ट्रेन से हम घाटशिला जाते थे, वह सामाजिक समरसता और सह - अस्तित्व के सिद्धांत की जीवंत मिसाल थी। क्योंकि ट्रेन की अपनी मंजिल की ओर बढ़ने के कुछ देर बाद ही लकड़ी के बड़े - बड़े गट्ठर , मिट्टी के बने बर्तन  और पत्तों से भरे बोरे डिब्बों में लादे जाने लगते। खाकी वर्दी वाले डिब्बों में आते और कुछ न कुछ लेकर चलते बनते। अराजक झारखंड आंदोलन के उस दौर में बेचारे इन गरीबों का यही जीने का जरिया था।  वापसी के लिए चुनिंदा ट्रेनों में सर्वाधिक अनुकूल 29 डाउन कुर्लाटी - हावड़ा एक्सप्रेस थी, लेकिन तब यह अपनी लेटलतीफी के चलते जानी जाती थी। यही नहीं ट्रेनों की कमी के चलते टाटानगर से खड़गपुर के बीच यह ट्रेन पैसेंजर के तौर पर हर स्टेशन पर रुक - रुक कर चलती थी। कभी - कभी तब राउरकेला तक चलने वाली इस्पात एक्सप्रेस से भी लौटना होता था। भारी भीड़ से बचने के लिए हम छात्र इस ट्रेन के पेंट्री कार में चढ़ जाते थे। इस आवागमन के चलते बीच के स्टेशनों जैसे कलाईकुंडा, सरडिहा, झाड़ग्राम, गिधनी, चाकुलिया , कोकपारा और धालभूमगढ़  से अपनी दोस्ती सी  हो गई। अक्सर मैं शिक्षा को दिए गए मैं अपने छह सालों के हासिल की सोचता हूं तो लगता है भौतिक रूप से भले ज्यादा कुछ नहीं मिल पाया हो, लेकिन इसकी वजह से मै जान पाया कि एक पिछड़े क्षेत्र में किसी ट्रेन के छूट जाने पर किस तरह दूसरी ट्रेन के लिए मुसाफिरों को घंटों बेसब्री भरा इंतजार करना पड़ता है और यह उनके लिए कितनी तकलीफदेह होती है। सफर के दौरान खुद भूख - प्यास से बेहाल होते हुए दूसरों को लजीज व्यंजन खाते देखना , स्टेशनों के नलों से निकलने वाले बेस्वाद चाय सा गर्म पानी पीने की मजबूरी के बीच सहयात्रियों को कोल्ड ड्रिंक्स पीते निहराना , मारे थकान के जहां खड़े रहना भी मुश्किल हो दूसरों को आराम से अपनी सीट पर पसरे देखना  और भारी मुश्किलें झेलते हुए घर लौटने पर आवारागर्दी का आरोप  झेलना अपने छह साल के छात्र जीवन का हासिल रहा।

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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।--

14.7.19

कर्नाटक का संकट : न्यायपालिका और स्पीकर के संवैधानिक अधिकारों को लेकर पेंच फंसा

जे.पी.सिंह
कर्नाटक के राजनीतिक संकट को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका और स्पीकर के संवैधानिक अधिकारों को लेकर पेंच फंस गया है। कर्नाटक संकट पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने सवाल किया कि क्या विधानसभा अध्यक्ष को उच्चतम न्यायालय के आदेश को चुनौती देने का अधिकार है?इस पर कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि अध्यक्ष का पद संवैधानिक है और बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए पेश याचिका पर फैसला करने के लिए वह सांविधानिक रूप से बाध्य हैं।

पहले संसद को तो भ्रष्टाचार मुक्त कर लो मोदी जी

चरण सिंह राजपूत
लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था है कि देश की दशा और दिशा संसद से तय होती है। इसका मतलब है कि देश के उत्थान के लिए संसद में अच्छी छवि के सांसद पहुंचने चाहिए। इन लोगों के क्रियाकलाप ऐसे हों जिनसे जनता प्रेरणा ले। क्योंकि इन लोगों को जनता चुनकर भेजती है तो इनका हर कदम जनता के भले के लिए ही उठना चाहिए। क्या संसद में ऐसा हो रहा है। क्या संसद में जनता की लड़ाई लड़ने वाले सांसद पहुंच रहे हैं। आम लोगों के मुंह से तो यही निकलेगा कि नहीं। तो फिर ये सांसद कैसे जनता के लिए काम करेंगी और कैसे मोदी सरकार कैसे देश और समाज का भला करेगी?

10.7.19

मोदी लिखेंगे विपक्ष की तकदीर!

दिनेश दीनू की कलम से
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जून को संसद में कहा कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है। मोदी का यह कथन वास्तव में विपक्ष के प्रति सम्मान है या विपक्ष को सम्मोहित करने की कला? मोदी के कहे का अर्थ आप अपने हिसाब से कुछ निकाल लें, लेकिन उन्होंने क्यों कहा है और उसका अर्थ क्या है, वह ही जानते हैं। कहे में फंसाने की कला मोदी में है। 2014 से दिल्ली की उनकी यात्रा से विपक्ष उनके आगे बौना बना हुआ है। 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणामों ने तो विपक्ष को छिन्न-भिन्न कर दिया है।

8.7.19

कांग्रेस का संकटकाल

अंशुमान सिंह
कांग्रेस स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से देश की सबसे बडी और व्यापक रूप से सक्रिय पार्टी रही है। कांग्रेस के केन्द्रीय सत्ता के क्रियान्वयन में नेहरू परिवार का अधिपत्य रहा है। चाहे जवाहरलाल नेहरू हों, इंदिरागांधी गांधी हों, राजीव गाँधी हों, कांग्रेस की निवर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी हों या फिर वर्तमान अध्यक्ष राहुल गाँधी हों।

6.7.19

हरेन पांड्या हत्याकांड का सच अब कभी सामने नहीं आएगा

जे.पी.सिंह
हरेन पांड्या हत्याकांड का सच अब कभी सामने नहीं आएगा क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने एनजीओ 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (सीपीआइएल) की जनहित याचिका खारिज कर दी, जिसमें इस हत्या की उच्चतम न्यायालय की निगरानी में फिर से जांच कराने की मांग की गई थी।उच्चतम न्यायालय ने एनजीओ पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। साथ ही यह भी कहा है कोर्ट की निगरानी में नए सिरे से जांच नहीं होगी, ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा।

IPS संजीव भट्ट के साथ जो हुआ, उसे लेकर पूर्व नौकरशाहों में बेचैनी है पर सब चुप हैं!

Parmod Pahwa : कोई भी सिविल सर्वेंट किसी भी दृष्टिकोण से गली के गुंडे, मवाली या अपराधी से तो लाख दर्ज़े बेहतर होता है। पुलिस या अन्य किसी सुरक्षा बल में शक्ति का प्रयोग तथा हथियार प्रशिक्षण का हिस्सा होते हैं और जीना-मरना एक सामान्य प्रक्रिया।

कारपोरेट को रिर्टन गिफ्ट है मोदी सरकार का बजट : वर्कर्स फ्रंट

मजदूर-किसान विरोधी है बजट, इससे देश कमजोर होगा
सोनभद्र : केंद्र की मोदी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा संसद में पेश किया गया बजट देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों द्वारा चुनाव में भाजपा को भरपूर मदद देने के एवज में दिया रिर्टन गिफ्ट है। वित्त मंत्री भले ही कहे कि यह ‘मजबूत देश- मजबूत नागरिक‘ का बजट है सच यह है कि इस बजट से भीषण मंदी के दौर से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में कोई मदद नहीं मिलेगी और इससे आम नागरिक, मजदूर, किसान, महिलाओं, नौजवानों की हालत और भी बदतर होगी।

वो तय करेंगे- आप संदिग्ध हैं, देशद्रोही हैं!

मसीहुद्दीन संजरी
लोकसभा चुनावों में 23 मई 2019 को भाजपा की प्रचंड जीत का एलान हुआ। आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भाजपा ने भोपाल से अपना प्रत्याशी बनाया जिन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह को भारी मतों से पराजित कर कानून बनाने वाली देश की सबसे बड़ी पंचायत में पदार्पण किया। मोदी के दोबारा सत्ता में आने के साथ ही सरकार आतंकवाद पर ‘सख्त’ हो गयी। पहले से ही दुरूपयोग के लिए विवादों में रहे पोटा कानून के स्थान पर कांग्रेस सरकार ने 2004 में नए रूप में गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम पेश किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में इसी में दो और संशोधन लाने का फैसला किया गया।

4.7.19

अमेरिका के आगे क्यों नतमस्तक है मोदी सरकार

Shyam Singh Rawat
थोड़ा पीछे चलकर याद कीजिये कि किस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर में नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन कांग्रेसनीत यूपीए सरकार तथा कांग्रेस को बुरी तरह सवालों के जाल में फँसाकर सत्ता पर कब्जा जमाने में कामयाबी हासिल कर ली थी। उन्होंने ऐसा क्यों हुआ, ऐसा क्यों नहीं किया गया आदि विभिन्न प्रकार के प्रश्नों के अलावा देशभर में घूम-घूमकर देशप्रेम के सुनहरे सपनों का मायाजाल रचा लेकिन दिल्ली की सत्ता कब्जियाने के बाद वे देशहित की बलि चढ़ाते हुए एक के बाद दूसरा फैसला अमेरिका तथा उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित-लाभ में लेते रहे हैं।  

29.6.19

हावड़ा - मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ....!!

हावड़ा - मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ....!!
तारकेश कुमार ओझा
महानगरों के मामले में गांव - कस्बों में रहने वाले लोगों के मन में कई तरह की सही - गलत धारणाएं हो सकती है। जिनमें एक धारणा यह भी है कि देर रात या मुंह अंधेरे महानगर से उपनगरों के बीच चलने वाली लोकल ट्रेनें अमूमन खाली ही दौड़ती होंगी। पहले मैं भी ऐसा ही सोचता था। लेकिन एक बार अहले सुबह कोलकाता पहुंचने की मजबूरी में तड़के साढ़े तीन बजे की फस्र्ट लोकल पकड़ी तो मेरी धारणा पूरी तरह से गलत साबित हुई। खुशगवार मौसम के दिनों में यह सोच कर ट्रेन में चढ़ा कि  इतनी सुबह गिने - चुने यात्री ही ट्रेन में होंगे और मैं आराम से झपकियां लेता हुआ मंजिल तक पहुंच जाऊंगा। लेकिन वास्तविकता से सामना हुआ तो लेटने की कौन कहे डिब्बों में बैठने की जगह भी मुश्किल से मिली। हावड़ा से मेदिनीपुर के लिए छूटने वाली लास्ट लोकल का मेरा अनुभव भी काफी बुरा और डराने वाला  साबित हुआ।
दरअसल यह नब्बे के दशक के वाइटूके की तरफ बढ़ने के दौरान की बात है। अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में मैं लगातार उलझता जा रहा था। हर तरफ से निराश - हताश होकर आखिरकार मैने भी अपने जैसे लाखों असहाय व लाचार लोगों की तरह दिल्ली - मुंबई का रुख करने का निश्चय किया। मोबाइल तो छोड़िए टेलीफोन भी तब विलासिता की वस्तु थी। लिहाजा मैने अपने कुछ रिश्तेदारों को पत्र लिखा कि मैं कभी भी रोजी - रोजगार के लिए आपके पास पहुंच सकता हूं। मेहनत - मजदूरी के लिए आपके मदद की जरूरत पड़ेगी।
जवाब बस एकाध का ही आया। सब की यही दलील थी कि छोटा - मोटा काम भले मिल जाए , लेकिन महानगरों की कठोर जिंदगी शायद तुम न झेल पाओगे। न आओ तो ही अच्छा है।
इससे मेरी उलझन और बढ़ गई। हर पल  जेहन में बुरा ख्याल आता कि अब मुझे भी किसी बड़े शहर में जाकर दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तरह सीने में रस्सा बांध कर बोझा ढोना पड़ेगा या फिर किसी मिल में मेहनत - मजदूरी करनी होगी।
श्रमसाध्य कार्य  की मजबूरी से ज्यादा व्यथित मैं अपनों से दूर जाने की चिंता से था। क्योंकि मैं शुरू से होम  सिकनेस का मरीज रहा हूं।
निराशा के इस दौर में अचानक उम्मीद की लौ जगी । सूचना मिली कि कोलकाता से एक बड़े धनकुबेर का अखबार निकलने वाला है। अखबार पहले सांध्य निकलेगा। लेकिन जैसे ही प्रसार एक निश्चित संख्या तक पहुंचेगा वह आम अखबारों की सुबह निकला करेगा। पैसों की कोई कमी नहीं लिहाजा अखबार और इससे जुड़ने वालों का भविष्य सौ फीसद उज्जवल होगा।
संयोग से अखबार के संपादक व सर्वेसर्वा मेरे गहरे मित्र बने, जिनसे संघर्ष के दिनों से दोस्ती थी। लिहाजा मैने उनसे संपर्क साधने में देर नहीं की।
उन्होंने भी मेरी हौसला - आफजाई करते हुए तुरंत खबरें भेजना शुरू करने को कहा। उस काल में मैं सीधे तौर पर किसी अखबार से जुड़ा तो नहीं था। लेकिन अक्सर लोग मुझे तरह - तरह की सूचनाएं  इस उम्मीद में दे जाते थे कि कहीं न कहीं तो छप ही जाएगी। ऐसी ही सूचनाओं में एक सामाजिक संस्था से जुड़ी खबर थी।
जिसके पदाधिकारियों ने कई बार मुझसे  संपर्क किया। मेरे यह कहने पर कि खबर जल्द प्रकाशित होने वाले अखबार के डमी कॉपी में छपी है, उन्होंने इसकी प्रति हासिल करने की इच्छा जताई तो मेरे लिए यह मसला प्रतिष्ठा का प्रश्न बन  गया।
तभी मुझे  सूचना मिली कि अखबार जल्द निकलने वाला है। में आकर डमी कॉपी ले जाऊं।
इस सूचना में मेरे लिए दोहरी खुशी की संभावना छिपी थी। अव्वल तो यदि सचमुच बड़े समूह का अखबार निकला तो मैं अपनी मिट्टी से दूर जाने की भीषण त्रासदी से बच सकता था और दूसरा इससे दम तोड़ते मेरे करियर को आक्सीजन का नया डोज मिल सकता था।
बस कहीं से सौ रुपए का एक नोट जुगाड़ा और अखबार की डमी कॉपियां लेने घनघोर बारिश में ही कोलकाता को निकल पड़ा।
रास्ते में पड़ने वाले सारे स्टेशन मानो बारिश में भींगने का मजा ले रहे हों। कहीं - कहीं रेलवे ट्रैक पर भी पानी जमा होने लगा था।
जैसे - तैसे मैं दफ्तर पहुंचा तो वहां का माहौल काफी उत्साहवर्द्धक नजर आया। सर्वेसर्वा से लेकर हर स्टाफ ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि अपन अब सही जगह पर आ गए हैं... भविष्य सुरक्षित होने वाला है... अब तो बस मौज करनी है।
उदास चेहरे पर फींकी मुस्कान बिखरते हुए मैं मन ही मन बड़बड़ाता .... भैया  मुझे न तो भविष्य सुरक्षित करने की ज्यादा चिंता है और न ऐश करने का कोई शौक... मैं तो बस इतना चाहता हूं कि कुछ ऐसा चमत्कार हो जाए, जिससे मुझे अपनों से दूर न होना पड़े। क्योंकि मैं किसी भी सूरत में अपना शहर नहीं छोड़ना चाहता था।
रिमझिम बारिश के बीच सांझ रात की ओर बढ़ने लगी... बेचैनी ज्यादा बढ़ती तो मैं बाहर निकल जाता और फुटपाथ पर बिकने वाली छोटी भाड़ की चाय पीकर फिर अपनी सीट पर आकर बैठ जाता।
मेरे दिल दिमाग में बस डमी कॉपियों का बंडल घूम रहा था। पूछने पर बार - बार यही कहा जाता रहा कि बस छप कर आती ही होगी।
देर तक कुछ नहीं आया तो लगा मैं फिर किसी धोखे का शिकार हो रहा हूं।
बारिश के बीच घर लौटने की चिंता से मेरा तनाव फिर बढ़ने लगा।
आखिरकार एक झटके से मैं उठा और बाहर निकल गया। किसी से कुछ कहे बगैर हावड़ा जा रही बस में सवार हो गया। लेकिन मुश्किलें यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी। इतनी रात गए हावड़ा - मेदिनीपुर की जिस लॉस्ट लोकल में मैं कुछ आराम से यात्रा करते हुए भविष्य को लेकर चिंतन - मनन की सोच रहा था, उसमें भी ठसाठस भीड़ थी। लोग डिब्बों के बाहर तक लटके हुए थे।  कोलकाता महानगर को ले एक बार फिर मेरी धारणा गलत साबित हुई। लोग डिब्बों के बाहर तक लटके हुए थे।
किसी तरह एक डिब्बे में सवार हुआ तो वहां यात्री एक - दूसरे पर गिरे पड़ रहे थे। इस बात को लेकर होने वाली कहासुनी और वाद - विवाद यात्रा को और भी कष्टप्रद बना रहा था।
ट्रेन एक के बाद एक स्टेशन पर रुकती हुई आगे बढ़ रही थी, लेकिन यात्री कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे थे। बागनान स्टेशन आने पर डिब्बा कुछ खाली हुआ तो मुझे बैठने की जगह मिल पाई।
देउलटि आते - आते कुछ और मुसाफिर डिब्बे से उतर गए तो मैं यह सोच कर बेंच पर लेट गया कि दिन भर की थकान उतारते हुए भविष्य की चिंता करुंगा। मैं सोचने लगा कि ट्रेन तो खैर देर - सबेर अपनी मंजिल पर पहुंच जाएगी लेकिन अपनी मंजिल का क्या होगा। क्या कोई रास्ता निकलेगा।
इस बीच कब मुझे झपकी लग गई पता ही नहीं चला।
नींद टूटने पर बंद आंखों से ही मैने महसूस किया कि ट्रेन किसी पुल के ऊपर से गुजर रही है।
हालांकि डिब्बे में छाई अप्रत्याशित शांति से मुझे अजीब लगा।
आंख खोला तो सन्न रह गया। पूरा डिब्बा खाली। जीवन की तरह यात्रा की भी अजीब विडंबना कि जिस ट्रेन के डिब्बों में थोड़ी देर पहले तिल धरने की जगह नहीं थी, वहीं अब पूरी की पूरी खाली। आस - पास के डिब्बों का टोह लिया तो वहां भी वही हाल।
लुटने लायक अपने पास कुछ था नहीं, लेकिन बारिश की काली रात में एक डिब्बे में अकेले सफर करना खतरनाक तो था ही।
लिहाजा ट्रेन के एक छोटे से स्टेशन पर रुकते ही मैं डिब्बे से उतर गया और किसी हॉरर फिल्म के किरदार की तरह बदहवास इधर - उधर भागने लगा।
क्योंकि हर डिब्बा लगभग खाली था। इंजन के बिल्कुल पास वाले एक डिब्बे में दो खाकी वर्दीधारी असलहा लिए बैठे थे। मैं उसी डिब्बे में चढ़ गया और जैसे - तैसे घर भी पहुंच गया।
इसके बाद के दिन मेरे लिए बड़े भारी साबित हुए। लेकिन वाकई जिंदगी इंतहान लेती है।
एक रोज कहीं से लौटा तो दरवाजे पर वहीं बंडल पड़ा था, जिसे लेने मैं बरसात की एक रात कोलकाता गया था और कोशिश करके भी हासिल नहीं कर पाया। बंडल के साथ एक पत्र भी संलग्न था, जिसमें अखबार शीघ्र निकलने और तत्काल संपर्क करने को कहा गया था। इस घटना के बाद वाकई मेरे जीवन को एक नई दिशा मिली...
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*

27.6.19

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि : हम उन्हें अलविदा नहीं कहा सकते

ललित गर्ग
विश्व प्रसिद्ध भारत माता मंदिर के संस्थापक, भारतीय अध्यात्म क्षितिज के उज्ज्वल नक्षत्र, निवृत्त शंकराचार्य, पद्मभूषण स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि मंगलवार सुबह हरिद्वार में उनके निवास स्थान राघव कुटीर में ब्रह्मलीन हो गए। वे पिछले 15 दिनों से गंभीर रूप से बीमार थे, उनके देवलोकगमन से भारत के आध्यात्मिक जगत में गहरी रिक्तता बनी है एवं संत-समुदाय के साथ-साथ असंख्य श्रद्धालुजन शोक मग्न हो गये हैं।

नयी शिक्षा नीति 2019 की प्रतियाँ जलाई गयी



आज अहमदाबाद में RTE फोरम गुजरात, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, माइनॉरिटी कोआर्डिनेशन कमेटी गुजरात के संयुक्त तत्वाधान में नयी शिक्षा नीति पर चर्चा आयोजित की गयी| नीति की मुख्य बातों को मुजाहिद नफ़ीस ने विस्तार से रखते हुए कहा कि शिक्षा बच्चों का मौलिक कानूनी अधिकार है. इसके अलावा, प्राथमिक स्तर पर स्कूलों में छात्रों की मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिये जाने का मसला भी अहम है. आरटीई फोरम लंबे समय से आरटीई प्रावधानों के मुताबिक शिक्षकों के नियमितीकरण व गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के साथ-साथ स्कूलों में पूर्णकालिक शिक्षकों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति एवं आधी-अधूरी तनख़्वाह पर रखे जाने वाले गैर प्रशिक्षित अतिथि और पैरा शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल उठाता रहा है|

विषय - उत्तराखंड के युवाओं को बेरोजगारी और आजीविका का संकट के संबंध में-



सेवा में
            श्रीमान प्रधानमंत्री जी
           भारत सरकार नई दिल्ली
विषय-उत्तराखंड के युवाओं को बेरोजगारी और आजीविका का  संकट के  संबंध में 

महोदय
      निवेदन इस प्रकार है कि  देश के 27 वें राज्य के रूप में उत्तराखंड का गठन  राज्य के युवाओं को रोजगार और पहाडों के विकास के लिए किया गया। राज्य बनने के 19 साल के बाद भी यहां के युवाओं और इस क्षेत्र के निवासियों की स्थिति और दयनीय होती जा रही है  राज्य में अलग-अलग सरकार बनी और अलग-अलग दावे सरकार द्वारा बार-बार होते रहे । परंतु राज्य की स्थित व राज्य के युवाओं की स्थिति अभी भी दयनीय बनी हुई है।

जनता के लिए तो यह आपातकाल से भी बदतर है प्रधानमंत्री जी

राजनीति में बेशर्मी कोई बड़ी बात नहीं रह गई है पर यदि देश का प्रधानमंत्री इस बेशर्मी पर उतर आये तो देश के लिए चिंतन का विषय जरूर है। जब देश में एक विशेष नारे के नाम पर एक विशेष धर्म के लोगों को टारगेट बनाया जा रहा हो। जब सरकार में बैठे लोग अपने विरोधियों को टारगेट बनाकर जेल भिजवा रहे हों। जब संविधान की रक्षा करने वाले तंत्रों को बंधुआ बनाने का दुस्साहस हो रहा हो।

24.6.19

आखिर क्यों खामोश है सपा और अखिलेश यादव

कल से उत्तर प्रदेश की राजधानी में अपने आपको दलितों और पिछड़ों की पार्टी कहलाने वाली बहुजन समाज पार्टी की लोकसभा चुनाव में जीत कम हार ज्यादा वाले प्रदर्शन पर मंथन चल रहा था. कहने के लिए मंथन हुआ. लेकिन उसमे हुए फैसलों को देखकर तो ऐसा कुछ लगता तो नहीं कि कुछ भी मंथन हुआ है.

पार्टी के संस्थापक काशीराम के उसूलों के खिलाफ जाकर पार्टी की सर्वेसर्वा मायावती ने अपने बाद अपने भाई को पार्टी का नंबर दो बना दिया. उन्होंने अपने भाई आनंद को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया है. हालांकि इससे पहले भी उन्होंने आनंद को इसी पद पर सुशोभित किया था, लेकिन बाद में हटा दिया था. पार्टी का तीसरा पद यानि नेशनल कोआर्डिनेटर उन्होंने अपने भतीजे आकाश को बनाया है. वो लोकसभा चुनावों में पानी बुआ के साथ साए की तरह नजर आए थे.

राजनीति में एक शब्द काफी प्रचलित है- भाई-भतीजावाद. लेकिन अब तक इसका कोई अच्छा उदाहरण नहीं देखने को मिलता था. लेकिन इस ताजे फैसले से अब भाटिया राजनीति को एक अच्छा उदाहरण भी मिल गया. अब राजनीति के छात्रों को एक अच्छे उदहारण के साथ भाई-भतीजावाद समझाया जा सकेगा.

दूसरा फैसला रहा समाजवादी पार्टी से गठबंधन ख़त्म करना. यह हालांकि यह फैसला 23 मई को रिजल्ट के बाद ही हो गया था. बसपा के नेताओं के बयानों से लगने लग गया था की यह बेमेल गठबंधन कभी भी टूट सकता है. और हुआ भी यही.

किसी जोड़ी वाले खेल में हार जाने के बाद कई बार दोनों साथी एक-दूसरे पर आरोप लगते हुए अलग हो जाते है. और कुछ होते हैं की चुपचाप बिना कुछ आरोप प्रत्यारोप के अलग हो जाना. मायावती ने पहला ऑप्शन चुना. उन्होंने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तमाम आरोप जड़ते हुए गठबंधन से अलग हुईं. उन्होंने सीधे अखिलेश यादव और राजनैतिक सूझबूझ पर सवाल उठा दिए. उन्होंने इसे विज्ञानं का एक प्रयोग बता दिया. कहा की इससे बसपा को नुकसान ही हुआ है. हालांकि सच्चाई कुछ और ही कहती है.

लेकिन अच्मभे वाली बात यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी समाजवादी पार्टी की तरफ से कोई भी सफाई या बयां नहीं आया है. बात-बात पर अपनी राय जताने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनका ट्विटर अकाउंट भी खामोश पड़ा हुआ है. इसके पीछे क्या वजह हो सकती है. क्या उन्हें अभी भी अपनी बुआ मायावती की तरफ से कुछ उम्मीदें हैं? क्या उन्हें आशा है की 2022 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों बसपा उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के मिशन में सहयोग करेगी? या इसके पीछे कुछ और ही राजनीति है?

20.6.19

ब्रज की डिक्शनरी से लिए गए कुछ चुनिंदा शब्द

Excuse me  - नैक सुनियो
 
what             - काये
 
why               - चौं
 
really             - अरे हम्बै??
 
hey dude      - ऐं.. रे
 

19.6.19

गए थे नवोदित खिलाड़ी से मिलने , याद आने लगे धौनी...!!

गए थे नवोदित खिलाड़ी से मिलने , याद आने लगे धौनी...!!
तारकेश कुमार ओझा
कहां संभावनाओं के आकाश में टिमटिमाता नन्हा तारा और कहां क्रिकेट की दुनिया का एक स्थापित नाम। निश्चित रूप से कोई तुलना नहीं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उस रोज नवोदित क्रिकेट खिलाड़ी करण लाल से मिलते समय बार - बार जेहन  में महेन्द्र सिंह धौनी का ख्याल आ रहा था। इसकी ठोस वजहें भी हैं। क्योंकि करीब 18 साल पहले मुझे धौनी का  भी साक्षात्कार लेने का ऐसा ही मौका मिला था। जब वे मेरे शहर खड़गपुर में रहते हुए टीम इंडिया में चुने जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह 2001 की बात है। तब  मैं जमशेदपुर से प्रकाशित दैनिक पत्र के लिए जिला संवाददाता के तौर पर कार्य कर रहा था। पत्रकारिता का जुनून सिर से उतरने लगा था। कड़वी हकीकत से हो रहा लगातार सामना मुझे विचलित करने लगा । आय के साधन अत्यंत सीमित जबकि जरूरतें लगातार बढ़ रही थी। तिस पर पत्रकारिता से जुड़े रोज के दबाव और झंझट - झमेले। विकल्प कोई था नहीं और पत्रकारिता से शांतिपूर्वक रोजी - रोटी कमा पाना मुझे तलवार की धार पर चलने जैसा प्रतीत होने लगा था। हताशा के इसी दौर में  एक रोज डीआरएम आफिस के नजदीक हर शाम चाउमिन का ठेला लगाने वाले  कमल बहादुर से मुलाकात हुई। कमल न सिर्फ खुद अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी है बल्कि आज भी इसी पेशे में हैं। मैं जिस अखबार का प्रतिनिधि था कमल उसका गंभीर पाठक भी है, यह जानकर मुझे अच्छा लगा जब उसने कहा .... तारकेश भैया ... आप तो अपने अखबार में इतना कुछ लिखते हैं। अपने शहर के नवोदित क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धौनी के बारे में भी कुछ लिखिए। इस शानदार खिलाड़ी का भविष्य उज्जवल है। मैने हामी भरी। बात उनके शहर लौटने पर मिलवाने की हुई। लेकिन कभी ऐसा संयोग नहीं बन पाया। 2004 तक वे शहर छोड़ कर चले भी गए, फिर क्रिकेट की दुनिया में सफलता का नया अध्याय शुरू हुआ। क्रिकेट की भाषा में कहें तो यह अच्छे से अच्छा फील्डर से कैच छूट जाने वाली बात हुई। धौनी को याद करते हुए करण लाल से मिलने का अनुभव लाजवाब रहा।  टीम में चुने जाने से पहले तक धौनी की पहचान अच्छे  विकेटकीपर के तौर पर थी। वे इतने विस्फोटक बल्लेबाज हैं यह उनकी  सफलता का युग शुरू होने के बाद पता चला। लेकिन करण अच्छा बल्लेबाज होने के साथ बेहतरीन गेंदबाज भी है और टीम में चुने जाने के बिल्कुल मुहाने पर खड़ा है। पत्रकारिता और क्रिकेट में शायद यही अंतर है। क्रिकेट का संघर्षरत खिलाड़ी भी स्टार होता है। करियर के शुरूआती दौर में महेन्द्र सिंह धौनी जब रेलवे  की नौकरी करने मेरे शहर खड़गपुर शहर आए तब भी वो एक स्टार थे। टीम में चुने जाने और अभूतपूर्व कामयाबी हासिल करने के बाद वे सेलीब्रेटी और सुपर स्टार बन गए। करण लाल भी आज एक स्टार है। उसका जगह - जगह नागरिक अभिनंदन हो रहा है। बड़े - बड़े अधिकारी और राजनेता उनसे मिल कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

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18.6.19

हुक्मरानों, बच्चों की अर्थियां बहुत वजनदार होती हैं!


अभी कुछ दिनों पहले ही IIT के रिजल्ट आया. हर बार की तरह इस बार भी बिहार के छात्रों ने अपना लोहा मनवाया. लेकिन इन छात्रों के मन में एक कसक होगी कि हार बार की तरह इस बार इनके बारे में चर्चा नहीं की जा रही है. लेकिन इस बात का इन्हें कोई मलाल नहीं होगा. क्योंकि इस बार चर्चा हो रही है तो उन्हीं के राज्य में ही लगे एक अनचाहे शतक के बारे में. बिहार राज्य की एक ऐसी शतकीय पारी जो इतिहास के पन्नों पर हर वक़्त बिहार से ताल्लुक रखने वालों को ही नहीं हर देशवासी को मुंह चिढ़ाएगी.

शायद अब आपको अंदाजा हो गया होगा की मैं किस शतकीय पारी की बात कर रह हूँ. मैं बात कर रहा हूँ मुज्जफरपुर में चमकी बुखार से हुए लगभग 130 मासूम बच्चों की मौत का. उन्हीं बच्चों की बात जिनकी मौत शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के अनुसार खाली पेट लीची खाने से हुई थी. बिहार का मुज्जफरपुर जिला हालांकि राज्य की राजधानी से कुछ ज्यादा दूरी पर नहीं है. लेकिन इन मासूम बच्चों से मिलने या इनसे अपनी संवेदना जताने के लिए हुक्मरानों का पहुँचने का सिलसिला बहुत ही लाचार है. क्योंकि यहां से राजनीति या वोटों की रोटियां नहीं सेंकी जा सकती हैं.

कहने को तो बिहार में बहुत कुछ बदलाव हुआ है. लेकिन आपका सिर शर्म से और झुक जाएगा जब आपको मालूम होगा कि मुज्जफरपुर में यह बीमारी पिछले 25 सालों से घर किये हुए है. पिछले 25 सालों से यहां मौत का तांडव हो रहा था, लेकिन सरकार और हुक्मरानों के कानों पर जूं तक न रेंगी थी. स्वास्थ्य विभाग के ही आंकड़ों को देखें तो मालूम पड़ता है कि 2010 से अब तक लगभग इस 500 बच्चे अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. पिछले 9 सालों में यह बीमारी धीमे-धीमे असर कर रही थी, लेकिन इस साल इस चमकी बुखार ने अपना तांडव शताब्दी की स्पीड में चला दिया. इस चमकी बुखार की बढ़ी स्पीड का सारा दोष दिया गया लीची को.

मीडिया को बंगाल से जब फुर्सत मिली, तो इन मासूमों का ख्याल आया. मीडिया ने हो हल्ला किया. सरकार और जिम्मेदारों पर जूं रेंगी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन उनके जूनियर अश्विनी चौबे और बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय अस्पताल में पहुंचे. अस्पताल का शाही दौरा किया गया. दौरे के बाद दिखावे के लिए प्रेस कांफ्रेंस का मंचन किया गया. डॉ. हर्षवर्धन को भी उम्मीद नहीं होगी की सारा खेल यहीं हो जाएगा. हालांकि उन्होंने सवालों का सामना किया और एक डॉक्टर होने के नाते जवाब भी दिए. लेकिन बगल में ही बैठे दोनों ही मंत्रियों ने सारा गुडगोबर कर दिया. उनके जूनियर अश्विनी चौबे नींद में झूम रहे थे. जिसको उन्होंने चिंतन और मनन का नाम दिया था. और वहीं बिहार के मंत्री साहब को क्रिकेट के स्कोर की ज्यादा चिंता थी.

अब जब मंत्रियों के दौरे की बात आ ही गई है, तो एक और दौरे का जिक्र करना चाहूँगा. तारीख थी 22 जूं 2014. अंतर सिर्फ इतना था की राज्य में एनडीए की सरकार नहीं थी. उस वक़्त भी स्वास्थ्य मंत्री भी यही हर्षवर्धन थे. उस वक़्त भी बच्चों की मौतें हुई थीं. अपने उस दौरे दौरान उन्होंने वादा किया था कि मुज्जफरपुर में 100 बेडों का अस्पताल बनाया जाएगा. लेकिन यह वादा भी अन्य वादों के साथ धुल गया. हाथ आया तो सिर्फ हर साल मौतों का बढ़ता हुआ हुआ आंकड़ा. और यही वादा इस बार भी किया गया है.

लेकिन फिलहाल बात करें तो हालात यह हैं कि डॉक्टरों को अभी तक यह भी नहीं मालूम है कि बीमारी क्या है? कौन सी दवाई दी जाए?किस तरह बढ़ते हुए आंकड़ो को रोका जाए? लेकिन सच्चाई यह है की सरकार और हुक्मरान इन मासूमों की मौत के जिम्मेदार हैं. अगर पहले ही कुछ कर लिया जाता तो यह आंकड़ा इतना लंबा नहीं जाता. बिहार और देश इन मौतों को कभी नहीं भुला पाएगा. क्योंकि बच्चों की आर्थियाँ बहुत वजनदार होती हैं.....             


7.6.19

कोलकाता की वो पुरानी बस और डराने वाला टिकट!


तारकेश कुमार ओझा

कोलकाता की बसें लगभग अब भी वैसी ही हैं जैसी 90 के दशक के अंतिम दौर तक
हुआ करती थी। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले जगहों के नाम ले लेकर
चिल्लाते रहने वाले कंडक्टरों के हाथों में टिकटों के जो बंडल होते थे,
वे साधारणत: 20, 40 और 60 पैसे तक के होते थे। एक रुपये का सिक्का बढ़ाते
ही कंडक्टर टिकट के साथ कुछ न कुछ खुदरा पैसे जरूर वापस लौटा देता। कभी
टिकट के एवज में कंडक्टर 80 पैसे या एक रुपये का टिकट बढ़ाता तो लगता कि
कोलकाता के भीतर ही कहीं दूर जा रहे हैं। उसी कालखंड में मुझे कोलकाता के
एक प्राचीनतम हिंदी दैनिक में उप संपादक की नौकरी मिल गई। बिल्कुल
रिफ्रेशर था, लिहाजा वेतन के नाम पर मामूली रकम ही स्टाइपेंड के तौर पर
मिलती थी और सप्ताह में महज एक दिन का अघोषित अवकाश।

राजनाथ सिंह कभी यशवंत सिन्हा नहीं बनना चाहेंगे!

Navneet Mishra : राजनाथ सिंह कभी यशवंत सिन्हा नहीं बनना चाहेंगे। मंझे हुए खिलाड़ी है। दर्द भी सीने में दबाकर मुस्कुराने वाले नेता हैं। वह कभी महत्वाकांक्षा का शिकार होकर ख़ुद बेटे की राह का काँटा नहीं बनने वाले, जैसे जयंत के लिए उनके पापा बन गए।

आओ राजा हम ढोएंगे पालकी, जाती रहे जान हमारे जवान की

Asit Nath Tiwari
नारा लगा कि आएगा तो मोदी ही और आए भी मोदी ही। लेकिन आए क्यों ? क्योंकि रोज़ी, रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा के तो मुद्दे ही ग़ायब हैं। चुनाव में सेना की शहादत का मुद्दा राष्ट्रवादी चासनी में मीठा होता दिखा। 2016 में भी भारतीय वायुसेना का एएन-32 विमान लापता हो गया था। इस विमान ने तब चेन्नई से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन बंगाल की खाड़ी के ऊपर से उड़ते हुए ये लापता हो गया था। चीन बॉर्डर के नजदीक लापता हुए विमान को ना तो धरती ने निगला होगा और ना ही आसमान ने खा लिया होगा। चीन से पूछने की हिम्मत किसे है। रक्षा मामले में मोदी सरकार की इस बड़ी विफलता पर जवानों की शहादत पर जश्न मनाने वाले मोदी के मतदाताओं ने खामोशी की चादर तान ली। एयर फोर्स के अधिकारियों और जवानों समेत 29 लोग इसमें सवार थे। इनकी शहादत, सरकार की विफलता थी लिहाजा, 29 सैनिकों की शहादत को ग़ुमनामी के घोर अंधेरे में धकेल दिया गया।

दलित राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल विकल्प

एस. आर. दारापुरी
(राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट)


हाल के लोक सभा चुनाव ने दर्शाया है कि दलित राजनीति एक बार फिर बुरी तरह से विफल हुयी है. इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने के उद्देश्य से बना सपा- बसपा गठबंधन बुरी तरह से विफल हुआ है. इस चुनाव में यद्यपि बसपा 2014 के मुकाबले में 10 सीटें जीतने में सफल रही है परन्तु  इसमें इस पार्टी का अवसान भी बराबर दिखाई दे रहा है .  2014 के लोक सभा चुनाव में इसका पूरी तरह से सफाया हो गया था और इसे एक भी सीट नहीं मिली थी. इस चुनाव में भी इसका वोट प्रतिशत 2014 के 19.60% से घट कर 19.26% रह  गया है. इसी तरह 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 23% पर पहुँच गया था.  यद्यपि  मायावती ने बड़ी चतुराई से इस का दोष सपा  के यादव वोट के ट्रांसफर न होने तथा ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी बता कर अपनी जुम्मेदारी पर पर्दा डालने की कोशिश की है परन्तु उसकी अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, तानाशाही, दलित हितों की अनदेखी और जोड़तोड़ की राजनीति के हथकंडे किसी से छिपे नहीं हैं. बसपा के पतन के लिए आज नहीं तो कल उसे अपने ऊपर जुम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी.

दम तोड़ती सपा, अहंकार में डूबे अखिलेश

अजय कुमार, लखनऊ
बसपा-समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन टूटने के बाद यक्ष प्रश्न यही है कि अखिलेश यादव अब कौन सा रास्ता चुनेंगे? 2017 में विधान सभा चुनाव के समय कांगे्रस से और अबकी लोकसभा चुनाव के समय बसपा से गठबंधन का अनुभव अखिलेश के लिए किसी भी तरह से सुखद नहीं रहा। फिर भी अच्छी बात यह है कि गठबंधन टूटने के बाद भी अखिलेश अपनी मंुहबोली बुआ मायावती से संबंध खराब नहीं करना चाहते हैं। अगर इसी सोच के साथ अखिलेश यादव खून के रिश्ते भी निभाते तो शायद न तो चाचा शिवपाल यादव उनसे दूर होते ? न ही उन्हें अपनी सियासत बचाने के लिए गैरों की चैखट पर सिर रगड़ना पड़ता। मगर दुख की बात यह है कि भले ही अखिलेश यादव अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हों ? मायावती ने उनको मझधार में छोड़ दिया हो ? लेकिन अखिलेश पारिवारिक कलह सुलझने में बिल्कुल रूचि नहीं ले रहे हैं। कम से कम पारिवारिक मामलों में तो वह (अखिलेश )कुछ ज्यादा ही अहंकारी नजर आ रहे हैं। उनके अहंकार के कारण ही समाजवादी पार्टी लगातार सियासी मैदान में दम तोड़ती जा रही है।

दूसरों के बैंक एकाउंट से ठग बेहिचक उड़ा रहे रुपए, पीड़ित काट रहे पुलिस के चक्कर!



 अलीगढ़ । अलीगढ़ महानगर में एक्सिस बैंक बस स्टैंड शाखा के खाताधारक बॉबी कुमार के साथ अजीब तरह की ठगी का मामला सामने आया है। बॉबी के मुताबिक 24अप्रैल को उसके पास एक फोन आया और उसके क्रेडिट कार्ड की जानकारी मांगी। बॉबी ने कॉल करने वाले को स्पष्ट रूप से कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया  बाबजूद इसके बॉबी के क्रेडिक कार्ड से 9999 रुपए पांच बार मे निकाले गए कुल मिलाकर पांच बार में 50000/- पचास हज़ार रुपये उड़ गए।

5.6.19

पर्यावरण और बेपरवाह समाज : कुछेक तारीखें हमने छाती पीटने के लिए तय कर दी हैं

मनोज कुमारकुछेक तारीखें हमने छाती पीटने के लिए तय कर दी हैं. विलाप करने का मौका भी ये तारीखें हमें देती हैं. इन्हीं तारीखों में 5 जून भी एक ऐसी ही तारीख है जिस दिन पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर सियापा करते हैं और दिन बीतते ना बीतते हम 5 जून को बिसरा देते हैं. खैर, ऐसा करना हम भारतीयों की जीवनशैली बन गई है क्योंकि हम उत्सव प्रेमी हैं और किसी भी तारीख पर उत्सव की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं. पर्यावरण का संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है. ज्यों ज्यों किया इलाज, त्यों-त्यों बढ़ता गया मर्ज वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. पर्यावरण के जानकार चेता रहे हैं, सजग कर रहे हैं लेकिन हमारी नींद नहीं टूट रही है. पर्यावरण संरक्षण के लिए अकेले सरकार को कटघरे में खड़ा करना या उसकी जवाबदारी तय करना अनुचित है.

यूपी में गठबंधन की सियासत फिर ‘चौराहे’ पर

अजय कुमार,लखनऊ
उत्तर प्रदेश में कल तक मजबूत दिख रहे सपा-बसपा गठबंधन में बसपा सुप्रीमों मायावती के एक बयान के बाद दरार नजर आने लगी है। भले ही बसपा सुप्रीमों मायावती के मन में अखिलेश को लेकर कोई कड़वाहट नहीं है,परंतु गठबंधन के बाद भी लोकसभा चुनाव में उम्मीद के अनुसार उन्हें(मायावती) सियासी फायदा नहीं मिलने से से उम्मीद के अनुसार  यह कहने में भी गुरेज नहीं रहा कि सपा के यादव वोट बैंक में सेंधमारी लग चुकी है। माया का इशारा साफ है कि अगर सपा-बसपा के वोटर एक साथ आते तो गठबंधन की जीत का आंकड़ा बहुत बड़ा होता। मगर सपा से नाराज यादव वोटरों के चलते ऐसा हो नहीं पाया। माया के बयान पर अभी तक सपा प्रमुख अखिलेश यादव सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं,लेकिन मायावती के नए पैतरे से यह तो साफ हो ही गया है कि अखिलेश के लिए मायावती को समझना इतना आसान भी नहीं है। माया ने फिलहाल सपा से संबंध तोड़ने की बात तो नहीं की है लेकिन यह जरूर साफ कर दिया है कि वह अपने हिसाब से चलेंगी। इसी के तरह बसपा सुप्रीमों  2007 के हिट फार्मूले ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय’ को फिर से धार देना चाहती हैं, जिसके बदौलत प्रदेश में उनकी बहुमत के साथ सरकार बनी थी।

चुनाव आयोग ने प्रेक्षकों की शिकायत की सूचना देने से मना किया

निर्वाचन आयोग ने लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को लोक सभा चुनाव 2019 के दौरान विभिन्न प्रेक्षकों द्वारा भेजी गयी शिकायतों तथा रिपोर्ट की सूचना देने से इंकार कर दिया है. नूतन ने लोक सभा चुनाव 2019 में आयोग के प्रेक्षकों द्वारा चुनाव ड्यूटी में लगे अधिकारियों के खिलाफ भेजी गयी शिकायतों तथा उन पर कृत कार्यवाही के संबंध में जानकारी मांगी थी.

बालीवुड टीवी सीरियल के नजरिए से हिन्दू एक कुटिल चाल

यह एक मनोवैज्ञानिक सच है कि हम जिस तरह के माहौल में रहते है उसका हमारी जिंदगी पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फिल्मे आम जन जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। आज टीवी ओर सिनेमा के युग में आने वाली फिल्में और सीरीयल भी हमारी जिंदगी को उतना ही प्रभावित करते है जितना कि हमारा माहौल हमें प्रभावित करता है। एक तरह से देखा जाए तो आज टीवी सिनेमा हमारी जिंदगी को हमारे माहौल से ज्यादा प्रभावित करते है क्योंकि लोगों का मेलजोल दूसरे लोगों से कम और टीवी से ज्यादा हो रहा है। परंतु दुखद बात यह है कि मनोरंजन के नाम पर टीवी और सिनेमा सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाल रहे हैं।

जब संदली हवाओं ने तुमको छुआ होगा...

न जाने फ़िज़ाओं में क्या हुआ होगा
जब संदली हवाओं ने तुमको छुआ होगा

3.6.19

ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय है

जयराम शुक्ल
"यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। युधिष्ठिर कहते हैं कि हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए"....
-महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद

सबसे बड़ा चोर और बेईमान वही आदमी है जो रिश्वत देता है!

भारती सिंह
एक पत्रकार की भड़ास...  दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत यह एक चिराग कई आंधियों पर भारी है....... कुछ विचार साझा करती हूं... हम चाहते हैं कि सब कुछ अच्छा हो जाए पर हम यह नहीं चाहते कि हमारी वजह से अच्छा हो जाए....यह तो चाहते हैं कि हमारे लिए अच्छा हो जाए पर यह कभी नहीं चाहते कि सबके लिए अच्छा हो जाए....

दलित राजनीति की त्रासदी

-एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

हाल के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वर्तमान दलित राजनीति विफल हो गयी है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है जिसकी मुखिया मायावती चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले तक प्रधान मंत्री बनने की इच्छा ज़ाहिर कर रही थी. परिणाम आने पर बसपा केवल दस सीटें ही जीत सकी जबकि चुनाव में महागठबंधन मोदी को हराने का दावा कर रहा था. यद्यपि बसपा की दस सीटों की जीत पिछले चुनाव की अपेक्षा एक अच्छी उपलब्धि  मानी जा सकती है परन्तु महागठबंधन के चुनावी परिणामों ने इसकी विफलता भी दिखा दी है.

1.6.19

अम्बेडकरनगर में ‘आधार’ बनवाने के लिए भटकते लोग

आधार और आधार कार्ड तथा उसमें अंकित नम्बर का महत्व जिस किसी को अच्छी तरह से न मालूम हो वह भारत देश के सूबे उत्तर प्रदेश के जनपद अम्बेडकरनगर में आ जाए.......जी हाँ बात सोलह आने सच है। हर छोटे-बड़े कार्य में आधार की उपयोगिता होती है। इसके चलते आधार बनाने वाले लोगों द्वारा जिले की जनता का भरपूर धनादोहन किया जा रहा है। पहले जब निजी क्षेत्रों में आधार बनाने का कार्य होता था तब लोग आसानी से आधार निर्माण केन्द्रों पर 10, 20, 50 रूपए खर्चने के बाद बहुउद्देश्यीय उपयोगार्थ आधार बनवाने में सफलता प्राप्त कर लेते थे, परन्तु अब आधार बनाने का जिम्मा निजी क्षेत्रों के जनसेवा केन्द्रों के बजाय किसी ऐसी कम्पनी को दे दिया है जो बीते वर्ष से अब तक आधार निर्माण में कम और धन कमाने में ज्यादा रूचि ले रही है।

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री के जिले का सदर अस्पताल सड़ चुका है....

बिहार के सीवान सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में खून नहीं के बराबर है। इसको लेकर सीवान के ब्लड डोनर और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर मुहिम भी छेड़ी है। इसी के तहत दिल्ली स्थित आजतक न्यूज चैनल के सीनियर पत्रकार दीपक कुमार ने भी चिंता जाहिर की है। दीपक कुमार ने अपने आॅफिशियल फेसबुक पेज पर लिखा—

जो मोदी की कसौटी पर था खरा, उसे ही मिला गाड़ी-बंगला!

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्रचंड जीत के बल पर केन्द्र में एक बार फिर मोदी सरकार ने शपथ ले ली है। 80 में से 64 सीटें बीजेपी गठबंधन को मिलना किसी करिश्में से कम नहीं था,इस लिए राजनैतिक पंडितो को लग रहा था कि इस बार मोदी मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश के मंत्रियों की संख्या और अधिक बढ़ सकती है,लेकिन मोदी और शाह क्या और किसी दिशा में सोचते हैं, कोई नहीं जानता। इसी लिए तो यूपी का प्रतिनिधित्व बढ़ना तो दूर राज्य के मंत्रियों की संख्या कम ही हो गई।

संगोष्ठी का आयोजन कर गाजीपुर में भी मनाया गया पत्रकारिता दिवस



गाजीपुर। हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर बृहस्पतिवार को पत्रकार प्रेस परिषद के तत्वाधान में एक संगोष्ठी का आयोजन जिला मुख्यालय स्थित कैंप कार्यालय पर किया गया। संगोष्ठी में जनपद के विभिन्न अंचलों से आए पत्रकारों ने 'पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान एवं चुनौतियों' पर प्रकाश डाला। गाजीपुर के वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्र ने पत्रकारिता के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कर्तव्य एवं कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्रकार को अध्ययनप्रिय एवं कर्तव्यनिष्ठ होना जरूरी है।