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29.6.19

हावड़ा - मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ....!!

हावड़ा - मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ....!!
तारकेश कुमार ओझा
महानगरों के मामले में गांव - कस्बों में रहने वाले लोगों के मन में कई तरह की सही - गलत धारणाएं हो सकती है। जिनमें एक धारणा यह भी है कि देर रात या मुंह अंधेरे महानगर से उपनगरों के बीच चलने वाली लोकल ट्रेनें अमूमन खाली ही दौड़ती होंगी। पहले मैं भी ऐसा ही सोचता था। लेकिन एक बार अहले सुबह कोलकाता पहुंचने की मजबूरी में तड़के साढ़े तीन बजे की फस्र्ट लोकल पकड़ी तो मेरी धारणा पूरी तरह से गलत साबित हुई। खुशगवार मौसम के दिनों में यह सोच कर ट्रेन में चढ़ा कि  इतनी सुबह गिने - चुने यात्री ही ट्रेन में होंगे और मैं आराम से झपकियां लेता हुआ मंजिल तक पहुंच जाऊंगा। लेकिन वास्तविकता से सामना हुआ तो लेटने की कौन कहे डिब्बों में बैठने की जगह भी मुश्किल से मिली। हावड़ा से मेदिनीपुर के लिए छूटने वाली लास्ट लोकल का मेरा अनुभव भी काफी बुरा और डराने वाला  साबित हुआ।
दरअसल यह नब्बे के दशक के वाइटूके की तरफ बढ़ने के दौरान की बात है। अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में मैं लगातार उलझता जा रहा था। हर तरफ से निराश - हताश होकर आखिरकार मैने भी अपने जैसे लाखों असहाय व लाचार लोगों की तरह दिल्ली - मुंबई का रुख करने का निश्चय किया। मोबाइल तो छोड़िए टेलीफोन भी तब विलासिता की वस्तु थी। लिहाजा मैने अपने कुछ रिश्तेदारों को पत्र लिखा कि मैं कभी भी रोजी - रोजगार के लिए आपके पास पहुंच सकता हूं। मेहनत - मजदूरी के लिए आपके मदद की जरूरत पड़ेगी।
जवाब बस एकाध का ही आया। सब की यही दलील थी कि छोटा - मोटा काम भले मिल जाए , लेकिन महानगरों की कठोर जिंदगी शायद तुम न झेल पाओगे। न आओ तो ही अच्छा है।
इससे मेरी उलझन और बढ़ गई। हर पल  जेहन में बुरा ख्याल आता कि अब मुझे भी किसी बड़े शहर में जाकर दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तरह सीने में रस्सा बांध कर बोझा ढोना पड़ेगा या फिर किसी मिल में मेहनत - मजदूरी करनी होगी।
श्रमसाध्य कार्य  की मजबूरी से ज्यादा व्यथित मैं अपनों से दूर जाने की चिंता से था। क्योंकि मैं शुरू से होम  सिकनेस का मरीज रहा हूं।
निराशा के इस दौर में अचानक उम्मीद की लौ जगी । सूचना मिली कि कोलकाता से एक बड़े धनकुबेर का अखबार निकलने वाला है। अखबार पहले सांध्य निकलेगा। लेकिन जैसे ही प्रसार एक निश्चित संख्या तक पहुंचेगा वह आम अखबारों की सुबह निकला करेगा। पैसों की कोई कमी नहीं लिहाजा अखबार और इससे जुड़ने वालों का भविष्य सौ फीसद उज्जवल होगा।
संयोग से अखबार के संपादक व सर्वेसर्वा मेरे गहरे मित्र बने, जिनसे संघर्ष के दिनों से दोस्ती थी। लिहाजा मैने उनसे संपर्क साधने में देर नहीं की।
उन्होंने भी मेरी हौसला - आफजाई करते हुए तुरंत खबरें भेजना शुरू करने को कहा। उस काल में मैं सीधे तौर पर किसी अखबार से जुड़ा तो नहीं था। लेकिन अक्सर लोग मुझे तरह - तरह की सूचनाएं  इस उम्मीद में दे जाते थे कि कहीं न कहीं तो छप ही जाएगी। ऐसी ही सूचनाओं में एक सामाजिक संस्था से जुड़ी खबर थी।
जिसके पदाधिकारियों ने कई बार मुझसे  संपर्क किया। मेरे यह कहने पर कि खबर जल्द प्रकाशित होने वाले अखबार के डमी कॉपी में छपी है, उन्होंने इसकी प्रति हासिल करने की इच्छा जताई तो मेरे लिए यह मसला प्रतिष्ठा का प्रश्न बन  गया।
तभी मुझे  सूचना मिली कि अखबार जल्द निकलने वाला है। में आकर डमी कॉपी ले जाऊं।
इस सूचना में मेरे लिए दोहरी खुशी की संभावना छिपी थी। अव्वल तो यदि सचमुच बड़े समूह का अखबार निकला तो मैं अपनी मिट्टी से दूर जाने की भीषण त्रासदी से बच सकता था और दूसरा इससे दम तोड़ते मेरे करियर को आक्सीजन का नया डोज मिल सकता था।
बस कहीं से सौ रुपए का एक नोट जुगाड़ा और अखबार की डमी कॉपियां लेने घनघोर बारिश में ही कोलकाता को निकल पड़ा।
रास्ते में पड़ने वाले सारे स्टेशन मानो बारिश में भींगने का मजा ले रहे हों। कहीं - कहीं रेलवे ट्रैक पर भी पानी जमा होने लगा था।
जैसे - तैसे मैं दफ्तर पहुंचा तो वहां का माहौल काफी उत्साहवर्द्धक नजर आया। सर्वेसर्वा से लेकर हर स्टाफ ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि अपन अब सही जगह पर आ गए हैं... भविष्य सुरक्षित होने वाला है... अब तो बस मौज करनी है।
उदास चेहरे पर फींकी मुस्कान बिखरते हुए मैं मन ही मन बड़बड़ाता .... भैया  मुझे न तो भविष्य सुरक्षित करने की ज्यादा चिंता है और न ऐश करने का कोई शौक... मैं तो बस इतना चाहता हूं कि कुछ ऐसा चमत्कार हो जाए, जिससे मुझे अपनों से दूर न होना पड़े। क्योंकि मैं किसी भी सूरत में अपना शहर नहीं छोड़ना चाहता था।
रिमझिम बारिश के बीच सांझ रात की ओर बढ़ने लगी... बेचैनी ज्यादा बढ़ती तो मैं बाहर निकल जाता और फुटपाथ पर बिकने वाली छोटी भाड़ की चाय पीकर फिर अपनी सीट पर आकर बैठ जाता।
मेरे दिल दिमाग में बस डमी कॉपियों का बंडल घूम रहा था। पूछने पर बार - बार यही कहा जाता रहा कि बस छप कर आती ही होगी।
देर तक कुछ नहीं आया तो लगा मैं फिर किसी धोखे का शिकार हो रहा हूं।
बारिश के बीच घर लौटने की चिंता से मेरा तनाव फिर बढ़ने लगा।
आखिरकार एक झटके से मैं उठा और बाहर निकल गया। किसी से कुछ कहे बगैर हावड़ा जा रही बस में सवार हो गया। लेकिन मुश्किलें यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी। इतनी रात गए हावड़ा - मेदिनीपुर की जिस लॉस्ट लोकल में मैं कुछ आराम से यात्रा करते हुए भविष्य को लेकर चिंतन - मनन की सोच रहा था, उसमें भी ठसाठस भीड़ थी। लोग डिब्बों के बाहर तक लटके हुए थे।  कोलकाता महानगर को ले एक बार फिर मेरी धारणा गलत साबित हुई। लोग डिब्बों के बाहर तक लटके हुए थे।
किसी तरह एक डिब्बे में सवार हुआ तो वहां यात्री एक - दूसरे पर गिरे पड़ रहे थे। इस बात को लेकर होने वाली कहासुनी और वाद - विवाद यात्रा को और भी कष्टप्रद बना रहा था।
ट्रेन एक के बाद एक स्टेशन पर रुकती हुई आगे बढ़ रही थी, लेकिन यात्री कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे थे। बागनान स्टेशन आने पर डिब्बा कुछ खाली हुआ तो मुझे बैठने की जगह मिल पाई।
देउलटि आते - आते कुछ और मुसाफिर डिब्बे से उतर गए तो मैं यह सोच कर बेंच पर लेट गया कि दिन भर की थकान उतारते हुए भविष्य की चिंता करुंगा। मैं सोचने लगा कि ट्रेन तो खैर देर - सबेर अपनी मंजिल पर पहुंच जाएगी लेकिन अपनी मंजिल का क्या होगा। क्या कोई रास्ता निकलेगा।
इस बीच कब मुझे झपकी लग गई पता ही नहीं चला।
नींद टूटने पर बंद आंखों से ही मैने महसूस किया कि ट्रेन किसी पुल के ऊपर से गुजर रही है।
हालांकि डिब्बे में छाई अप्रत्याशित शांति से मुझे अजीब लगा।
आंख खोला तो सन्न रह गया। पूरा डिब्बा खाली। जीवन की तरह यात्रा की भी अजीब विडंबना कि जिस ट्रेन के डिब्बों में थोड़ी देर पहले तिल धरने की जगह नहीं थी, वहीं अब पूरी की पूरी खाली। आस - पास के डिब्बों का टोह लिया तो वहां भी वही हाल।
लुटने लायक अपने पास कुछ था नहीं, लेकिन बारिश की काली रात में एक डिब्बे में अकेले सफर करना खतरनाक तो था ही।
लिहाजा ट्रेन के एक छोटे से स्टेशन पर रुकते ही मैं डिब्बे से उतर गया और किसी हॉरर फिल्म के किरदार की तरह बदहवास इधर - उधर भागने लगा।
क्योंकि हर डिब्बा लगभग खाली था। इंजन के बिल्कुल पास वाले एक डिब्बे में दो खाकी वर्दीधारी असलहा लिए बैठे थे। मैं उसी डिब्बे में चढ़ गया और जैसे - तैसे घर भी पहुंच गया।
इसके बाद के दिन मेरे लिए बड़े भारी साबित हुए। लेकिन वाकई जिंदगी इंतहान लेती है।
एक रोज कहीं से लौटा तो दरवाजे पर वहीं बंडल पड़ा था, जिसे लेने मैं बरसात की एक रात कोलकाता गया था और कोशिश करके भी हासिल नहीं कर पाया। बंडल के साथ एक पत्र भी संलग्न था, जिसमें अखबार शीघ्र निकलने और तत्काल संपर्क करने को कहा गया था। इस घटना के बाद वाकई मेरे जीवन को एक नई दिशा मिली...
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*

27.6.19

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि : हम उन्हें अलविदा नहीं कहा सकते

ललित गर्ग
विश्व प्रसिद्ध भारत माता मंदिर के संस्थापक, भारतीय अध्यात्म क्षितिज के उज्ज्वल नक्षत्र, निवृत्त शंकराचार्य, पद्मभूषण स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि मंगलवार सुबह हरिद्वार में उनके निवास स्थान राघव कुटीर में ब्रह्मलीन हो गए। वे पिछले 15 दिनों से गंभीर रूप से बीमार थे, उनके देवलोकगमन से भारत के आध्यात्मिक जगत में गहरी रिक्तता बनी है एवं संत-समुदाय के साथ-साथ असंख्य श्रद्धालुजन शोक मग्न हो गये हैं।

नयी शिक्षा नीति 2019 की प्रतियाँ जलाई गयी



आज अहमदाबाद में RTE फोरम गुजरात, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, माइनॉरिटी कोआर्डिनेशन कमेटी गुजरात के संयुक्त तत्वाधान में नयी शिक्षा नीति पर चर्चा आयोजित की गयी| नीति की मुख्य बातों को मुजाहिद नफ़ीस ने विस्तार से रखते हुए कहा कि शिक्षा बच्चों का मौलिक कानूनी अधिकार है. इसके अलावा, प्राथमिक स्तर पर स्कूलों में छात्रों की मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिये जाने का मसला भी अहम है. आरटीई फोरम लंबे समय से आरटीई प्रावधानों के मुताबिक शिक्षकों के नियमितीकरण व गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के साथ-साथ स्कूलों में पूर्णकालिक शिक्षकों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति एवं आधी-अधूरी तनख़्वाह पर रखे जाने वाले गैर प्रशिक्षित अतिथि और पैरा शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल उठाता रहा है|

विषय - उत्तराखंड के युवाओं को बेरोजगारी और आजीविका का संकट के संबंध में-



सेवा में
            श्रीमान प्रधानमंत्री जी
           भारत सरकार नई दिल्ली
विषय-उत्तराखंड के युवाओं को बेरोजगारी और आजीविका का  संकट के  संबंध में 

महोदय
      निवेदन इस प्रकार है कि  देश के 27 वें राज्य के रूप में उत्तराखंड का गठन  राज्य के युवाओं को रोजगार और पहाडों के विकास के लिए किया गया। राज्य बनने के 19 साल के बाद भी यहां के युवाओं और इस क्षेत्र के निवासियों की स्थिति और दयनीय होती जा रही है  राज्य में अलग-अलग सरकार बनी और अलग-अलग दावे सरकार द्वारा बार-बार होते रहे । परंतु राज्य की स्थित व राज्य के युवाओं की स्थिति अभी भी दयनीय बनी हुई है।

जनता के लिए तो यह आपातकाल से भी बदतर है प्रधानमंत्री जी

राजनीति में बेशर्मी कोई बड़ी बात नहीं रह गई है पर यदि देश का प्रधानमंत्री इस बेशर्मी पर उतर आये तो देश के लिए चिंतन का विषय जरूर है। जब देश में एक विशेष नारे के नाम पर एक विशेष धर्म के लोगों को टारगेट बनाया जा रहा हो। जब सरकार में बैठे लोग अपने विरोधियों को टारगेट बनाकर जेल भिजवा रहे हों। जब संविधान की रक्षा करने वाले तंत्रों को बंधुआ बनाने का दुस्साहस हो रहा हो।

24.6.19

आखिर क्यों खामोश है सपा और अखिलेश यादव

कल से उत्तर प्रदेश की राजधानी में अपने आपको दलितों और पिछड़ों की पार्टी कहलाने वाली बहुजन समाज पार्टी की लोकसभा चुनाव में जीत कम हार ज्यादा वाले प्रदर्शन पर मंथन चल रहा था. कहने के लिए मंथन हुआ. लेकिन उसमे हुए फैसलों को देखकर तो ऐसा कुछ लगता तो नहीं कि कुछ भी मंथन हुआ है.

पार्टी के संस्थापक काशीराम के उसूलों के खिलाफ जाकर पार्टी की सर्वेसर्वा मायावती ने अपने बाद अपने भाई को पार्टी का नंबर दो बना दिया. उन्होंने अपने भाई आनंद को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया है. हालांकि इससे पहले भी उन्होंने आनंद को इसी पद पर सुशोभित किया था, लेकिन बाद में हटा दिया था. पार्टी का तीसरा पद यानि नेशनल कोआर्डिनेटर उन्होंने अपने भतीजे आकाश को बनाया है. वो लोकसभा चुनावों में पानी बुआ के साथ साए की तरह नजर आए थे.

राजनीति में एक शब्द काफी प्रचलित है- भाई-भतीजावाद. लेकिन अब तक इसका कोई अच्छा उदाहरण नहीं देखने को मिलता था. लेकिन इस ताजे फैसले से अब भाटिया राजनीति को एक अच्छा उदाहरण भी मिल गया. अब राजनीति के छात्रों को एक अच्छे उदहारण के साथ भाई-भतीजावाद समझाया जा सकेगा.

दूसरा फैसला रहा समाजवादी पार्टी से गठबंधन ख़त्म करना. यह हालांकि यह फैसला 23 मई को रिजल्ट के बाद ही हो गया था. बसपा के नेताओं के बयानों से लगने लग गया था की यह बेमेल गठबंधन कभी भी टूट सकता है. और हुआ भी यही.

किसी जोड़ी वाले खेल में हार जाने के बाद कई बार दोनों साथी एक-दूसरे पर आरोप लगते हुए अलग हो जाते है. और कुछ होते हैं की चुपचाप बिना कुछ आरोप प्रत्यारोप के अलग हो जाना. मायावती ने पहला ऑप्शन चुना. उन्होंने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तमाम आरोप जड़ते हुए गठबंधन से अलग हुईं. उन्होंने सीधे अखिलेश यादव और राजनैतिक सूझबूझ पर सवाल उठा दिए. उन्होंने इसे विज्ञानं का एक प्रयोग बता दिया. कहा की इससे बसपा को नुकसान ही हुआ है. हालांकि सच्चाई कुछ और ही कहती है.

लेकिन अच्मभे वाली बात यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी समाजवादी पार्टी की तरफ से कोई भी सफाई या बयां नहीं आया है. बात-बात पर अपनी राय जताने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनका ट्विटर अकाउंट भी खामोश पड़ा हुआ है. इसके पीछे क्या वजह हो सकती है. क्या उन्हें अभी भी अपनी बुआ मायावती की तरफ से कुछ उम्मीदें हैं? क्या उन्हें आशा है की 2022 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों बसपा उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के मिशन में सहयोग करेगी? या इसके पीछे कुछ और ही राजनीति है?

20.6.19

ब्रज की डिक्शनरी से लिए गए कुछ चुनिंदा शब्द

Excuse me  - नैक सुनियो
 
what             - काये
 
why               - चौं
 
really             - अरे हम्बै??
 
hey dude      - ऐं.. रे
 

19.6.19

गए थे नवोदित खिलाड़ी से मिलने , याद आने लगे धौनी...!!

गए थे नवोदित खिलाड़ी से मिलने , याद आने लगे धौनी...!!
तारकेश कुमार ओझा
कहां संभावनाओं के आकाश में टिमटिमाता नन्हा तारा और कहां क्रिकेट की दुनिया का एक स्थापित नाम। निश्चित रूप से कोई तुलना नहीं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उस रोज नवोदित क्रिकेट खिलाड़ी करण लाल से मिलते समय बार - बार जेहन  में महेन्द्र सिंह धौनी का ख्याल आ रहा था। इसकी ठोस वजहें भी हैं। क्योंकि करीब 18 साल पहले मुझे धौनी का  भी साक्षात्कार लेने का ऐसा ही मौका मिला था। जब वे मेरे शहर खड़गपुर में रहते हुए टीम इंडिया में चुने जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह 2001 की बात है। तब  मैं जमशेदपुर से प्रकाशित दैनिक पत्र के लिए जिला संवाददाता के तौर पर कार्य कर रहा था। पत्रकारिता का जुनून सिर से उतरने लगा था। कड़वी हकीकत से हो रहा लगातार सामना मुझे विचलित करने लगा । आय के साधन अत्यंत सीमित जबकि जरूरतें लगातार बढ़ रही थी। तिस पर पत्रकारिता से जुड़े रोज के दबाव और झंझट - झमेले। विकल्प कोई था नहीं और पत्रकारिता से शांतिपूर्वक रोजी - रोटी कमा पाना मुझे तलवार की धार पर चलने जैसा प्रतीत होने लगा था। हताशा के इसी दौर में  एक रोज डीआरएम आफिस के नजदीक हर शाम चाउमिन का ठेला लगाने वाले  कमल बहादुर से मुलाकात हुई। कमल न सिर्फ खुद अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी है बल्कि आज भी इसी पेशे में हैं। मैं जिस अखबार का प्रतिनिधि था कमल उसका गंभीर पाठक भी है, यह जानकर मुझे अच्छा लगा जब उसने कहा .... तारकेश भैया ... आप तो अपने अखबार में इतना कुछ लिखते हैं। अपने शहर के नवोदित क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धौनी के बारे में भी कुछ लिखिए। इस शानदार खिलाड़ी का भविष्य उज्जवल है। मैने हामी भरी। बात उनके शहर लौटने पर मिलवाने की हुई। लेकिन कभी ऐसा संयोग नहीं बन पाया। 2004 तक वे शहर छोड़ कर चले भी गए, फिर क्रिकेट की दुनिया में सफलता का नया अध्याय शुरू हुआ। क्रिकेट की भाषा में कहें तो यह अच्छे से अच्छा फील्डर से कैच छूट जाने वाली बात हुई। धौनी को याद करते हुए करण लाल से मिलने का अनुभव लाजवाब रहा।  टीम में चुने जाने से पहले तक धौनी की पहचान अच्छे  विकेटकीपर के तौर पर थी। वे इतने विस्फोटक बल्लेबाज हैं यह उनकी  सफलता का युग शुरू होने के बाद पता चला। लेकिन करण अच्छा बल्लेबाज होने के साथ बेहतरीन गेंदबाज भी है और टीम में चुने जाने के बिल्कुल मुहाने पर खड़ा है। पत्रकारिता और क्रिकेट में शायद यही अंतर है। क्रिकेट का संघर्षरत खिलाड़ी भी स्टार होता है। करियर के शुरूआती दौर में महेन्द्र सिंह धौनी जब रेलवे  की नौकरी करने मेरे शहर खड़गपुर शहर आए तब भी वो एक स्टार थे। टीम में चुने जाने और अभूतपूर्व कामयाबी हासिल करने के बाद वे सेलीब्रेटी और सुपर स्टार बन गए। करण लाल भी आज एक स्टार है। उसका जगह - जगह नागरिक अभिनंदन हो रहा है। बड़े - बड़े अधिकारी और राजनेता उनसे मिल कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

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18.6.19

हुक्मरानों, बच्चों की अर्थियां बहुत वजनदार होती हैं!


अभी कुछ दिनों पहले ही IIT के रिजल्ट आया. हर बार की तरह इस बार भी बिहार के छात्रों ने अपना लोहा मनवाया. लेकिन इन छात्रों के मन में एक कसक होगी कि हार बार की तरह इस बार इनके बारे में चर्चा नहीं की जा रही है. लेकिन इस बात का इन्हें कोई मलाल नहीं होगा. क्योंकि इस बार चर्चा हो रही है तो उन्हीं के राज्य में ही लगे एक अनचाहे शतक के बारे में. बिहार राज्य की एक ऐसी शतकीय पारी जो इतिहास के पन्नों पर हर वक़्त बिहार से ताल्लुक रखने वालों को ही नहीं हर देशवासी को मुंह चिढ़ाएगी.

शायद अब आपको अंदाजा हो गया होगा की मैं किस शतकीय पारी की बात कर रह हूँ. मैं बात कर रहा हूँ मुज्जफरपुर में चमकी बुखार से हुए लगभग 130 मासूम बच्चों की मौत का. उन्हीं बच्चों की बात जिनकी मौत शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के अनुसार खाली पेट लीची खाने से हुई थी. बिहार का मुज्जफरपुर जिला हालांकि राज्य की राजधानी से कुछ ज्यादा दूरी पर नहीं है. लेकिन इन मासूम बच्चों से मिलने या इनसे अपनी संवेदना जताने के लिए हुक्मरानों का पहुँचने का सिलसिला बहुत ही लाचार है. क्योंकि यहां से राजनीति या वोटों की रोटियां नहीं सेंकी जा सकती हैं.

कहने को तो बिहार में बहुत कुछ बदलाव हुआ है. लेकिन आपका सिर शर्म से और झुक जाएगा जब आपको मालूम होगा कि मुज्जफरपुर में यह बीमारी पिछले 25 सालों से घर किये हुए है. पिछले 25 सालों से यहां मौत का तांडव हो रहा था, लेकिन सरकार और हुक्मरानों के कानों पर जूं तक न रेंगी थी. स्वास्थ्य विभाग के ही आंकड़ों को देखें तो मालूम पड़ता है कि 2010 से अब तक लगभग इस 500 बच्चे अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. पिछले 9 सालों में यह बीमारी धीमे-धीमे असर कर रही थी, लेकिन इस साल इस चमकी बुखार ने अपना तांडव शताब्दी की स्पीड में चला दिया. इस चमकी बुखार की बढ़ी स्पीड का सारा दोष दिया गया लीची को.

मीडिया को बंगाल से जब फुर्सत मिली, तो इन मासूमों का ख्याल आया. मीडिया ने हो हल्ला किया. सरकार और जिम्मेदारों पर जूं रेंगी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन उनके जूनियर अश्विनी चौबे और बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय अस्पताल में पहुंचे. अस्पताल का शाही दौरा किया गया. दौरे के बाद दिखावे के लिए प्रेस कांफ्रेंस का मंचन किया गया. डॉ. हर्षवर्धन को भी उम्मीद नहीं होगी की सारा खेल यहीं हो जाएगा. हालांकि उन्होंने सवालों का सामना किया और एक डॉक्टर होने के नाते जवाब भी दिए. लेकिन बगल में ही बैठे दोनों ही मंत्रियों ने सारा गुडगोबर कर दिया. उनके जूनियर अश्विनी चौबे नींद में झूम रहे थे. जिसको उन्होंने चिंतन और मनन का नाम दिया था. और वहीं बिहार के मंत्री साहब को क्रिकेट के स्कोर की ज्यादा चिंता थी.

अब जब मंत्रियों के दौरे की बात आ ही गई है, तो एक और दौरे का जिक्र करना चाहूँगा. तारीख थी 22 जूं 2014. अंतर सिर्फ इतना था की राज्य में एनडीए की सरकार नहीं थी. उस वक़्त भी स्वास्थ्य मंत्री भी यही हर्षवर्धन थे. उस वक़्त भी बच्चों की मौतें हुई थीं. अपने उस दौरे दौरान उन्होंने वादा किया था कि मुज्जफरपुर में 100 बेडों का अस्पताल बनाया जाएगा. लेकिन यह वादा भी अन्य वादों के साथ धुल गया. हाथ आया तो सिर्फ हर साल मौतों का बढ़ता हुआ हुआ आंकड़ा. और यही वादा इस बार भी किया गया है.

लेकिन फिलहाल बात करें तो हालात यह हैं कि डॉक्टरों को अभी तक यह भी नहीं मालूम है कि बीमारी क्या है? कौन सी दवाई दी जाए?किस तरह बढ़ते हुए आंकड़ो को रोका जाए? लेकिन सच्चाई यह है की सरकार और हुक्मरान इन मासूमों की मौत के जिम्मेदार हैं. अगर पहले ही कुछ कर लिया जाता तो यह आंकड़ा इतना लंबा नहीं जाता. बिहार और देश इन मौतों को कभी नहीं भुला पाएगा. क्योंकि बच्चों की आर्थियाँ बहुत वजनदार होती हैं.....             


7.6.19

कोलकाता की वो पुरानी बस और डराने वाला टिकट!


तारकेश कुमार ओझा

कोलकाता की बसें लगभग अब भी वैसी ही हैं जैसी 90 के दशक के अंतिम दौर तक
हुआ करती थी। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले जगहों के नाम ले लेकर
चिल्लाते रहने वाले कंडक्टरों के हाथों में टिकटों के जो बंडल होते थे,
वे साधारणत: 20, 40 और 60 पैसे तक के होते थे। एक रुपये का सिक्का बढ़ाते
ही कंडक्टर टिकट के साथ कुछ न कुछ खुदरा पैसे जरूर वापस लौटा देता। कभी
टिकट के एवज में कंडक्टर 80 पैसे या एक रुपये का टिकट बढ़ाता तो लगता कि
कोलकाता के भीतर ही कहीं दूर जा रहे हैं। उसी कालखंड में मुझे कोलकाता के
एक प्राचीनतम हिंदी दैनिक में उप संपादक की नौकरी मिल गई। बिल्कुल
रिफ्रेशर था, लिहाजा वेतन के नाम पर मामूली रकम ही स्टाइपेंड के तौर पर
मिलती थी और सप्ताह में महज एक दिन का अघोषित अवकाश।

राजनाथ सिंह कभी यशवंत सिन्हा नहीं बनना चाहेंगे!

Navneet Mishra : राजनाथ सिंह कभी यशवंत सिन्हा नहीं बनना चाहेंगे। मंझे हुए खिलाड़ी है। दर्द भी सीने में दबाकर मुस्कुराने वाले नेता हैं। वह कभी महत्वाकांक्षा का शिकार होकर ख़ुद बेटे की राह का काँटा नहीं बनने वाले, जैसे जयंत के लिए उनके पापा बन गए।

आओ राजा हम ढोएंगे पालकी, जाती रहे जान हमारे जवान की

Asit Nath Tiwari
नारा लगा कि आएगा तो मोदी ही और आए भी मोदी ही। लेकिन आए क्यों ? क्योंकि रोज़ी, रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा के तो मुद्दे ही ग़ायब हैं। चुनाव में सेना की शहादत का मुद्दा राष्ट्रवादी चासनी में मीठा होता दिखा। 2016 में भी भारतीय वायुसेना का एएन-32 विमान लापता हो गया था। इस विमान ने तब चेन्नई से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन बंगाल की खाड़ी के ऊपर से उड़ते हुए ये लापता हो गया था। चीन बॉर्डर के नजदीक लापता हुए विमान को ना तो धरती ने निगला होगा और ना ही आसमान ने खा लिया होगा। चीन से पूछने की हिम्मत किसे है। रक्षा मामले में मोदी सरकार की इस बड़ी विफलता पर जवानों की शहादत पर जश्न मनाने वाले मोदी के मतदाताओं ने खामोशी की चादर तान ली। एयर फोर्स के अधिकारियों और जवानों समेत 29 लोग इसमें सवार थे। इनकी शहादत, सरकार की विफलता थी लिहाजा, 29 सैनिकों की शहादत को ग़ुमनामी के घोर अंधेरे में धकेल दिया गया।

दलित राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल विकल्प

एस. आर. दारापुरी
(राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट)


हाल के लोक सभा चुनाव ने दर्शाया है कि दलित राजनीति एक बार फिर बुरी तरह से विफल हुयी है. इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने के उद्देश्य से बना सपा- बसपा गठबंधन बुरी तरह से विफल हुआ है. इस चुनाव में यद्यपि बसपा 2014 के मुकाबले में 10 सीटें जीतने में सफल रही है परन्तु  इसमें इस पार्टी का अवसान भी बराबर दिखाई दे रहा है .  2014 के लोक सभा चुनाव में इसका पूरी तरह से सफाया हो गया था और इसे एक भी सीट नहीं मिली थी. इस चुनाव में भी इसका वोट प्रतिशत 2014 के 19.60% से घट कर 19.26% रह  गया है. इसी तरह 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 23% पर पहुँच गया था.  यद्यपि  मायावती ने बड़ी चतुराई से इस का दोष सपा  के यादव वोट के ट्रांसफर न होने तथा ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी बता कर अपनी जुम्मेदारी पर पर्दा डालने की कोशिश की है परन्तु उसकी अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, तानाशाही, दलित हितों की अनदेखी और जोड़तोड़ की राजनीति के हथकंडे किसी से छिपे नहीं हैं. बसपा के पतन के लिए आज नहीं तो कल उसे अपने ऊपर जुम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी.

दम तोड़ती सपा, अहंकार में डूबे अखिलेश

अजय कुमार, लखनऊ
बसपा-समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन टूटने के बाद यक्ष प्रश्न यही है कि अखिलेश यादव अब कौन सा रास्ता चुनेंगे? 2017 में विधान सभा चुनाव के समय कांगे्रस से और अबकी लोकसभा चुनाव के समय बसपा से गठबंधन का अनुभव अखिलेश के लिए किसी भी तरह से सुखद नहीं रहा। फिर भी अच्छी बात यह है कि गठबंधन टूटने के बाद भी अखिलेश अपनी मंुहबोली बुआ मायावती से संबंध खराब नहीं करना चाहते हैं। अगर इसी सोच के साथ अखिलेश यादव खून के रिश्ते भी निभाते तो शायद न तो चाचा शिवपाल यादव उनसे दूर होते ? न ही उन्हें अपनी सियासत बचाने के लिए गैरों की चैखट पर सिर रगड़ना पड़ता। मगर दुख की बात यह है कि भले ही अखिलेश यादव अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हों ? मायावती ने उनको मझधार में छोड़ दिया हो ? लेकिन अखिलेश पारिवारिक कलह सुलझने में बिल्कुल रूचि नहीं ले रहे हैं। कम से कम पारिवारिक मामलों में तो वह (अखिलेश )कुछ ज्यादा ही अहंकारी नजर आ रहे हैं। उनके अहंकार के कारण ही समाजवादी पार्टी लगातार सियासी मैदान में दम तोड़ती जा रही है।

दूसरों के बैंक एकाउंट से ठग बेहिचक उड़ा रहे रुपए, पीड़ित काट रहे पुलिस के चक्कर!



 अलीगढ़ । अलीगढ़ महानगर में एक्सिस बैंक बस स्टैंड शाखा के खाताधारक बॉबी कुमार के साथ अजीब तरह की ठगी का मामला सामने आया है। बॉबी के मुताबिक 24अप्रैल को उसके पास एक फोन आया और उसके क्रेडिट कार्ड की जानकारी मांगी। बॉबी ने कॉल करने वाले को स्पष्ट रूप से कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया  बाबजूद इसके बॉबी के क्रेडिक कार्ड से 9999 रुपए पांच बार मे निकाले गए कुल मिलाकर पांच बार में 50000/- पचास हज़ार रुपये उड़ गए।

5.6.19

पर्यावरण और बेपरवाह समाज : कुछेक तारीखें हमने छाती पीटने के लिए तय कर दी हैं

मनोज कुमारकुछेक तारीखें हमने छाती पीटने के लिए तय कर दी हैं. विलाप करने का मौका भी ये तारीखें हमें देती हैं. इन्हीं तारीखों में 5 जून भी एक ऐसी ही तारीख है जिस दिन पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर सियापा करते हैं और दिन बीतते ना बीतते हम 5 जून को बिसरा देते हैं. खैर, ऐसा करना हम भारतीयों की जीवनशैली बन गई है क्योंकि हम उत्सव प्रेमी हैं और किसी भी तारीख पर उत्सव की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं. पर्यावरण का संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है. ज्यों ज्यों किया इलाज, त्यों-त्यों बढ़ता गया मर्ज वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. पर्यावरण के जानकार चेता रहे हैं, सजग कर रहे हैं लेकिन हमारी नींद नहीं टूट रही है. पर्यावरण संरक्षण के लिए अकेले सरकार को कटघरे में खड़ा करना या उसकी जवाबदारी तय करना अनुचित है.

यूपी में गठबंधन की सियासत फिर ‘चौराहे’ पर

अजय कुमार,लखनऊ
उत्तर प्रदेश में कल तक मजबूत दिख रहे सपा-बसपा गठबंधन में बसपा सुप्रीमों मायावती के एक बयान के बाद दरार नजर आने लगी है। भले ही बसपा सुप्रीमों मायावती के मन में अखिलेश को लेकर कोई कड़वाहट नहीं है,परंतु गठबंधन के बाद भी लोकसभा चुनाव में उम्मीद के अनुसार उन्हें(मायावती) सियासी फायदा नहीं मिलने से से उम्मीद के अनुसार  यह कहने में भी गुरेज नहीं रहा कि सपा के यादव वोट बैंक में सेंधमारी लग चुकी है। माया का इशारा साफ है कि अगर सपा-बसपा के वोटर एक साथ आते तो गठबंधन की जीत का आंकड़ा बहुत बड़ा होता। मगर सपा से नाराज यादव वोटरों के चलते ऐसा हो नहीं पाया। माया के बयान पर अभी तक सपा प्रमुख अखिलेश यादव सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं,लेकिन मायावती के नए पैतरे से यह तो साफ हो ही गया है कि अखिलेश के लिए मायावती को समझना इतना आसान भी नहीं है। माया ने फिलहाल सपा से संबंध तोड़ने की बात तो नहीं की है लेकिन यह जरूर साफ कर दिया है कि वह अपने हिसाब से चलेंगी। इसी के तरह बसपा सुप्रीमों  2007 के हिट फार्मूले ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय’ को फिर से धार देना चाहती हैं, जिसके बदौलत प्रदेश में उनकी बहुमत के साथ सरकार बनी थी।

चुनाव आयोग ने प्रेक्षकों की शिकायत की सूचना देने से मना किया

निर्वाचन आयोग ने लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को लोक सभा चुनाव 2019 के दौरान विभिन्न प्रेक्षकों द्वारा भेजी गयी शिकायतों तथा रिपोर्ट की सूचना देने से इंकार कर दिया है. नूतन ने लोक सभा चुनाव 2019 में आयोग के प्रेक्षकों द्वारा चुनाव ड्यूटी में लगे अधिकारियों के खिलाफ भेजी गयी शिकायतों तथा उन पर कृत कार्यवाही के संबंध में जानकारी मांगी थी.

बालीवुड टीवी सीरियल के नजरिए से हिन्दू एक कुटिल चाल

यह एक मनोवैज्ञानिक सच है कि हम जिस तरह के माहौल में रहते है उसका हमारी जिंदगी पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फिल्मे आम जन जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। आज टीवी ओर सिनेमा के युग में आने वाली फिल्में और सीरीयल भी हमारी जिंदगी को उतना ही प्रभावित करते है जितना कि हमारा माहौल हमें प्रभावित करता है। एक तरह से देखा जाए तो आज टीवी सिनेमा हमारी जिंदगी को हमारे माहौल से ज्यादा प्रभावित करते है क्योंकि लोगों का मेलजोल दूसरे लोगों से कम और टीवी से ज्यादा हो रहा है। परंतु दुखद बात यह है कि मनोरंजन के नाम पर टीवी और सिनेमा सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाल रहे हैं।

जब संदली हवाओं ने तुमको छुआ होगा...

न जाने फ़िज़ाओं में क्या हुआ होगा
जब संदली हवाओं ने तुमको छुआ होगा

3.6.19

ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय है

जयराम शुक्ल
"यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। युधिष्ठिर कहते हैं कि हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए"....
-महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद

सबसे बड़ा चोर और बेईमान वही आदमी है जो रिश्वत देता है!

भारती सिंह
एक पत्रकार की भड़ास...  दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत यह एक चिराग कई आंधियों पर भारी है....... कुछ विचार साझा करती हूं... हम चाहते हैं कि सब कुछ अच्छा हो जाए पर हम यह नहीं चाहते कि हमारी वजह से अच्छा हो जाए....यह तो चाहते हैं कि हमारे लिए अच्छा हो जाए पर यह कभी नहीं चाहते कि सबके लिए अच्छा हो जाए....

दलित राजनीति की त्रासदी

-एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

हाल के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वर्तमान दलित राजनीति विफल हो गयी है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है जिसकी मुखिया मायावती चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले तक प्रधान मंत्री बनने की इच्छा ज़ाहिर कर रही थी. परिणाम आने पर बसपा केवल दस सीटें ही जीत सकी जबकि चुनाव में महागठबंधन मोदी को हराने का दावा कर रहा था. यद्यपि बसपा की दस सीटों की जीत पिछले चुनाव की अपेक्षा एक अच्छी उपलब्धि  मानी जा सकती है परन्तु महागठबंधन के चुनावी परिणामों ने इसकी विफलता भी दिखा दी है.

1.6.19

अम्बेडकरनगर में ‘आधार’ बनवाने के लिए भटकते लोग

आधार और आधार कार्ड तथा उसमें अंकित नम्बर का महत्व जिस किसी को अच्छी तरह से न मालूम हो वह भारत देश के सूबे उत्तर प्रदेश के जनपद अम्बेडकरनगर में आ जाए.......जी हाँ बात सोलह आने सच है। हर छोटे-बड़े कार्य में आधार की उपयोगिता होती है। इसके चलते आधार बनाने वाले लोगों द्वारा जिले की जनता का भरपूर धनादोहन किया जा रहा है। पहले जब निजी क्षेत्रों में आधार बनाने का कार्य होता था तब लोग आसानी से आधार निर्माण केन्द्रों पर 10, 20, 50 रूपए खर्चने के बाद बहुउद्देश्यीय उपयोगार्थ आधार बनवाने में सफलता प्राप्त कर लेते थे, परन्तु अब आधार बनाने का जिम्मा निजी क्षेत्रों के जनसेवा केन्द्रों के बजाय किसी ऐसी कम्पनी को दे दिया है जो बीते वर्ष से अब तक आधार निर्माण में कम और धन कमाने में ज्यादा रूचि ले रही है।

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री के जिले का सदर अस्पताल सड़ चुका है....

बिहार के सीवान सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में खून नहीं के बराबर है। इसको लेकर सीवान के ब्लड डोनर और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर मुहिम भी छेड़ी है। इसी के तहत दिल्ली स्थित आजतक न्यूज चैनल के सीनियर पत्रकार दीपक कुमार ने भी चिंता जाहिर की है। दीपक कुमार ने अपने आॅफिशियल फेसबुक पेज पर लिखा—

जो मोदी की कसौटी पर था खरा, उसे ही मिला गाड़ी-बंगला!

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्रचंड जीत के बल पर केन्द्र में एक बार फिर मोदी सरकार ने शपथ ले ली है। 80 में से 64 सीटें बीजेपी गठबंधन को मिलना किसी करिश्में से कम नहीं था,इस लिए राजनैतिक पंडितो को लग रहा था कि इस बार मोदी मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश के मंत्रियों की संख्या और अधिक बढ़ सकती है,लेकिन मोदी और शाह क्या और किसी दिशा में सोचते हैं, कोई नहीं जानता। इसी लिए तो यूपी का प्रतिनिधित्व बढ़ना तो दूर राज्य के मंत्रियों की संख्या कम ही हो गई।

संगोष्ठी का आयोजन कर गाजीपुर में भी मनाया गया पत्रकारिता दिवस



गाजीपुर। हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर बृहस्पतिवार को पत्रकार प्रेस परिषद के तत्वाधान में एक संगोष्ठी का आयोजन जिला मुख्यालय स्थित कैंप कार्यालय पर किया गया। संगोष्ठी में जनपद के विभिन्न अंचलों से आए पत्रकारों ने 'पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान एवं चुनौतियों' पर प्रकाश डाला। गाजीपुर के वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्र ने पत्रकारिता के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कर्तव्य एवं कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्रकार को अध्ययनप्रिय एवं कर्तव्यनिष्ठ होना जरूरी है।

हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारों को पक्षकार न बनने की नसीहत

बघौली। गुरूवार को सुन्नी गांव में भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा हिन्दी पत्रकारिता दिवस का आयोजन किया गया। जिसमें जिला उपायुक्त राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की मौजूदगी के साथ वरिष्ठ शहरी और ग्रामीण पत्रकार समाजसेवी व पत्रकारिता के समर्थक मौजूद रहे। नन्हें-मुन्ने बच्चों ने पत्रकारिता को समर्पित स्वरचित रचना का पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकारों का माल्यार्पण कराने के साथ ही उपहार देकर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में जिले के दूरस्थ इलाकों के अलावा उन्नाव जिले से आए पत्रकारों ने आयोजन को सराहा।

हिंदी का प्रथम दैनिक समाचार पत्र 'सुधा वर्षण' भी कलकत्ता से 1854 में प्रारम्भ हुआ

साथियों,

आज 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है।  इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की विभिन्न राज्य इकाइयों ने आज जोर शोर से हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया। यह दिवस हमें न केवल अपने इतिहास की याद दिलाता है अपितु यह एक ऐसा अवसर है जब हम इसकी दशा और दिशा पर विचार करते हैं। हिंदी के प्रथम समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन आज ही के दिन अहिन्दी भाषी राज्य बंगाल की राजधानी कलकत्ता से 1826 में हुआ था।

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर प्रेस क्लब इटावा ने वरिष्ठ पत्रकारों और साहित्कारों को किया सम्मानित


इटावा । हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर आज प्रेस क्लब इटावा के तत्वाधान मे प्रेस क्लब भवन मे वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारो का सम्मान किया गया। प्रेस क्लब भवन, इटावा मे संपन हुए हिंदी पत्रकारिता दिवस के आयोजन मे जिला सूचना अधिकारी मातादीन मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

ब्रज प्रेस क्लब व उपजा के तत्वावधान में आयोजित हुआ पत्रकारिता दिवस समारोह


पत्रकार महेश की स्मृति में रखा जायेगा मार्ग का नाम, ब्रज प्रेस क्लब की जमीन को बोर्ड से रिन्युअल करायेंगे मेयर
पत्रकारिता दिवस आत्म चिंतन का दिवस: जिलाधिकारी
पत्रकारों के हर संघर्ष में साथ रहूंगा: हेमंत तिवारी

भाजपा विधायक पूरन प्रकाश व कारिंदा सिंह बोले- पत्रकारों के सम्मान में नहीं आने देंगे कमी

मथुरा। ब्रज प्रेस क्लब एवं उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के तत्वावधान में होटल ब्रजवासी रॉयल में पत्रकार संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें वक्ताओं ने पत्रकारिता की आगे दिशा-दशा क्या होगी तथा वर्तमान में पत्रकारिता एक चुनौती पूर्ण कार्य विषय पर विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारंभ उप्र मान्यता प्राप्त संवाद समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी, जिलाधिकारी सर्वज्ञ राम मिश्र, महापौर डा.मुकेश आर्यबंधु, वरिष्ठ पत्रकार आईएफडब्ल्यूजे के सचिव सिद्धार्थ कालहंस, उप्र वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष, भास्कर दुबे, सचिव राजेश मिश्रा, महामंडलेश्वर डा.अवेशेषानंद महाराज, भाजपा विधायक पूरन प्रकाश, भाजपा विधायक ठा.कारिंदा सिंह, क्षेत्राधिकारी राकेश सिंह, समाजसेवी पवन चतुर्वेदी, रामलीला कमेटी के अध्यक्ष सेठ जयंती प्रसाद अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर किया।