30.11.10

दिमागी लंगडा राजा और लोकतंत्र


चुनाव आते ही सभी लोग अलग अलग दलों में अपना ठिकाना खोजने में लग जाते हैं !चेहरे वही पुराने बस पार्टी बदल जाती है,सिद्धांत बदल जाते हैं,बदल जाता है नजरिया ,कल तक जो अपने थे वही बेगाने हो जाते हैं!खैर छोडिये राजनीती है सब जायज है,
गठबंधन करके दल अपनी सरकार तो बना लेते हैं...लेकिन इस गठबंधन के बदले छोटे दलों के आगे सरकार नाक रगड़ती नजर आती है...वर्तमान सन्दर्भ में भी यही बात सच होती दिखाई दे रही है....प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सब कुछ देखते हुए भी अनजान बने रहे और अभी भी हालत में उनकी सुधार नहीं है...मतलब ए.राजा के मामले में वे चुप्पी साधे हुए है...शायद कारण यही है कि ए.राजा की पार्टी उनकी सरकार को साधे है.
वर्तमान में लोकतंत्र की दशा को व्यक्त करती एक कहानी याद आ गई सो उसे आप लोगों के सामने परोस रहा हूँ.
एक हंस-हंसिनी का बड़ा सुंदर जोड़ा था,दोनों में बड़ा प्रेम था!मजे से दिन कट रहे थे !एक दिन दोनों ने नीलगगन में सैर करने की सोची,दोनों सैर करते करते काफी दूर निकल गए!रात हो गई थी सोचा रात यही गुजार कर सुबह चलते है!एक बरगद का पेड़ दिखाई दिया,दोनों वहां पहुचे!उस बरगद के पेड़ पर एक उल्लू रहता था !हंस ने उल्लू से रात गुजारने की बात कही,उल्लू ने अनुमति दे दी!कहा कोई बात नही!सुबह जब हंस-हंसिनी उठ कर जाने लगे तब उल्लू ने हंसिनी को पकड़ लिया, कहा अब हंसीं मेरी है!हंस ने बड़ी विनती की लेकिन उल्लू नही माना,अब हंस ने राजा के दरबार में गुहार लगायी!राजा ने उल्लू को बुलाया,कहा उल्लू,हंसिनी हमेशा हंस की होती है,उल्लू की कभी नही हो सकती !ये जोड़ा बेमेल है!उल्लू ने कहा -हंसिनी मेरी है,यदि आपने ऐसा निर्णय नही दिया तो मै किले की प्राचीर पर बैठ कर आपके काले कारनामों का चिटठा खोल दूंगा !अब राजा डर गया!उसका निर्णय बदल गया,उसने कहा-हंस,अब हंसिनी उल्लू की है!तुम घर जाओ!हंस रोते हुए उदास मन से जाने लगा !अब उल्लू भी रो रहा था!हंस ने पूंछा-तुम क्यों रो रहे हो?मेरी हंसिनी मुझसे छीन गई है,मेरे रोने का कारण तो समझ में आता है,लेकिन तुम क्यों रो रहे हो?उल्लू बोला- में लोक तंत्र की दशा पर रो रहा हूँ,एक सिरफिरे के कारण राजा ने अपना निर्णय बदल दिया!एक धमकी से राजा ने अन्याय को जीता दिया!भ्रष्टाचार को बढ़ावा इन धमकियों के कारण ही शायद मिल रहा है...क्या होगा इस देश का?इसलिए मै रो रहा हूँ!यही हाल है पूरे देश में,अब जनता को सोचना है अगली सरकार उन्हें कैसी बनानी है!
..........................जवाबों की आस में
कृष्ण कुमार द्विवेदी
छात्र(मा.रा.प.विवि,भोपाल)
उल्‍टे अक्षरों से लिख दी भागवत गीता




 
















मिरर इमेज शैली में कई किताब लिख चुके हैं पीयूष : आप इस भाषा को
देखेंगे तो एकबारगी भौचक्‍क रह जायेंगे. आपको समझ में नहीं आयेगा कि यह
किताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है. पर आप ज्‍यों ही शीशे के सामने
पहुंचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी. सारे अक्षर सीधे नजर
आयेंगे. इस मिरर इमेज किताब को दादरी में रहने वाले पीयूष ने लिखा है. इस
तरह के अनोखे लेखन में माहिर पीयूष की यह कला एशिया बुक ऑफ वर्ल्‍ड
रिकार्ड में भी दर्ज है. मिलनसार पीयूष मिरर इमेज की भाषा शैली में कई
किताबें लिख चुके हैं.
उनकी पहली किताब भागवद गीता थी. जिसके सभी अठारह अध्‍यायों को इन्‍होंने
मिरर इमेज शैली में लिखा. इसके अलावा दुर्गा सप्‍त, सती छंद भी मिरर इमेज
हिन्‍दी और अंग्रेजी में लिखा है. सुंदरकांड भी अवधी भाषा शैली में लिखा
है. संस्‍कृत में भी आरती संग्रह लिखा है. मिरर इमेज शैली में
हिन्‍दी-अंग्रेजी और संस्‍कृत सभी पर पीयूष की बराबर पकड़ है. 10 फरवरी
1967 में जन्‍में पीयूष बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं.
डिप्‍लोमा इंजीनियर पीयूष को गणित में भी महारत हासिल है. इन्‍होंने बीज
गणित को बेस बनाकर एक किताब 'गणित एक अध्‍ययन' भी लिखी है. जिसमें
उन्‍होंने पास्‍कल समीकरण पर एक नया समीकरण पेश किया है. पीयूष बतातें
हैं कि पास्‍कल एक अनोखा तथा संपूर्ण त्रिभुज है. इसके अलावा एपी अधिकार
एगंल और कई तरह के प्रमेय शामिल हैं. पीयूष कार्टूनिस्‍ट भी हैं. उन्‍हें
कार्टून बनाने का भी बहुत शौक है.
piyushdadriwala 09654271007

मुझे मस्त माहौल में जीने दो-ब्रज की दुनिया

पूरा भारत इस कालखंड में मस्त है.कोई गांजा पीकर तो कोई अफीम खाकर तो कोई बिना कुछ खाए-पिए.चारों तरफ मस्ती है.मेरी पड़ोसन भी इन दिनों अपने तीनों सयाने हो चुके बेटों के साथ 'मुन्नी बदनाम हुई' गाना सुन-सुनकर मस्त हुई जा रही है.नेताओं,अफसरों और जजों की मस्ती तो हम-आप कई बार टेलीविजन पर देख चुके हैं.जनता भी कम मस्त नहीं.मस्ती की बहती गंगा में वो क्यों न डुबकी लगाए?देश की मस्त हालत को देखकर यदि बाबू रघुवीर नारायण आज जीवित होते तो मस्ती में फ़िर से गुनगुनाने लगते लेकिन कुछ परिवर्तन के साथ:-सुन्दर मस्त देसवा से भारत के देसवा से मोरे प्राण बसे दारू के बोतल में रे बटोहिया.महनार में जब मैं रहता था तो मेरे एक पड़ोसी के तीन बेटे थे.पड़ोसी भी राजपूत जाति से ही था.तीनों बेटे माता-पिता की तरह ही मस्त थे.न तो नैतिकता की चिंता और न ही किसी भगवान-तगवान का डर.पड़ोसी के बेटी नहीं थी. जिस पर मेरे एक मित्र का मानना था कि भगवान ने कितना अच्छा किया कि इन्हें बहन नहीं दिया वरना ये उससे ही शादी कर लेते.खैर भगवान को जो गलती करनी थी की.लेकिन इन्होंने उनकी गलती में जरूर सुधार कर दिया.बड़े लड़के ने अपनी सगी फूफी की लड़की से शादी कर ली.अब तो उसके कई बच्चे अवतरित भी हो चुके हैं जो दिन में मेरे पड़ोसी को दादा कहते हैं और रात को नाना.आज का पिता पुत्र को शराब पीने से रोकता नहीं है बल्कि उसके साथ में बैठकर पीता है और पिता का कर्त्तव्य बखूबी निभाता है.वो संस्कृत में कहा भी तो गया है कि प्राप्तेषु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रं समाचरेत.मैं अपनी दादी के श्राद्ध में जब वर्ष २००८ में गाँव गया तो सगे चाचाओं को मस्ती में लीन पाया.भोज समाप्त हो चुकने के बाद रोजाना लाउदस्पिकर पर अश्लील भोजपुरी गीत बजाकर नाच-गाने का कार्यक्रम होता.शराब की बोतलें खोली जातीं और घर के बच्चों को भी इस असली ब्रम्ह्भोज में सम्मिलित किया जाता.कबीर ने ६०० साल पहले मृत्यु को महामहोत्सव कहा था और चाचा लोग अब जाकर इसे चरितार्थ कर रहे थे.गाँव-शहर जहाँ भी मैं देखता हूँ लोग मस्त हैं.स्कूल-कॉलेज के बच्चों से तो मैंने बोलना ही छोड़ दिया है.न जाने कौन,कब मस्त गालियाँ देने लगे या शारीरिक क्षति पहुँचाने को उद्धत हो जाए.एक नया प्रचलन भी इन दिनों बिहार में देखने को मिल रहा है.अधेड़ या कुछ बूढ़े भी इतना मस्त हो जा रहे हैं कि पुत्र जब विवाह कर घर में पुत्रवधू लाता है तो उस पर कब्ज़ा जमा ले रहे हैं.ऐसे महान पिता का पुत्र भी कम महान नहीं होता.वह भी जहाँ नौकरी कर रहा होता है वहीँ अपनी मस्ती का इंतजाम कर लेता है.मैं सोंचता हूँ कि इस मस्त माहौल में जब मेरे लिए साँस लेना भी दूभर हो रहा है कैसे जीवित रह पाऊँगा या फ़िर जब मेरे बच्चे होंगे तो उन्हें कैसे मस्त होने से बचा पाऊँगा?मैं मस्त तो नहीं हो सकता (पुराने संस्कारों वाला जो ठहरा) और न ही संन्यास ही ले सकता हूँ (मैं अपने माता-पिता का ईकलौता पुत्र हूँ).तो फ़िर क्या करुँ समझ में नहीं आ रहा.चलिए एक लाईफलाईन का ही प्रयोग कर लेता हूँ.तो औडिएंस आप बताईये मुझे इन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए.राय देने के लिए आपका समय शुरू होता है अब.

29.11.10

aisa prachar to sahi bat nahi.

आजकल अधिकांश आलेखों में मैं एक बात बहुत ज्यादा देख रही हूँ कि राजनेताओं में जितनी आलोचना गाँधी परिवार ,सोनिया जी , राहुल जी की की जाती है इतनी अन्य किसी की नहीं .वे अगर रेल का सफ़र करें तो बुराई.वे अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ कहें तो बुराई,वे अगर जनता से मिलें तो बुराई यहाँ तक कि बुराई की हद तो ये है कि एक समझदार अनुभवी लेखक जब अपने लेख में गाँधी परिवार के चरित्र पर ऊँगली उठाने पर आये तो उन्हें जब सोनिया जी के चरित्र पर कोई कलंक नहीं दिखा तो उन्होंने उन्हें बोफ़ोर्स मुद्दे से जोड़कर बदनाम करने की कोशिश की.इस तरह के जितने भी लेख आज इन ब्लोग्स पर लिखे जा रहे हैं इनके पीछे मात्र एक ही उद्देश्य दिखता है कि हमारा ब्लॉग या आलेख जल्द चर्चा पा जाये.इस तरह से ये आलेख जनता के हित में नहीं दीखते और ना ही ये स्वस्थ आलोचना कही जा सकती है.सोनिया जी ने आज जो कुछ भी हासिल किया है उसमे गाँधी परिवार की जनता में लोकप्रियता का तो महत्वपूर्ण स्थान है ही साथ ही उनकी मेहनत और जनता में उनकी भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान भी खास स्थान रखता है.इंदिरा  जी की दो पुत्र वधूं में सोनिया जी ने विदेशी होते हुए भी भारतीयता को अपनाया और उसके बाद भी वे यहाँ की चंद रूढ़िवादी सोच वालों की आलोचना का शिकार बनती रही हैं.जबकि वे देखा जाये तो दो दो बार भारत के प्रधान-मंत्री पद पर विराजमान हो सकती थी;-पहली बार तब जब राजीव जी की मृत्यु हुई और दूसरी बार तो उन्होंने सबके  सामने ही इस पद को त्याग दिया.इस भारतवर्ष में जहाँ एक नगरपालिका सदस्य भी अपने पद को छोड़ना नहीं चाहता ऐसे में इतने उच्च पद को इतनी शालीनता से अस्वीकार करने पर भोली जनता ने तो उन्हें सर पर चढ़ाया वहीँ बुद्धि के ठेकेदारों को इसमें  उनकी चाल ही नज़र आयी.आये दिन मनमोहन जी के नेतृत्व वाली सरकार में उनकी भूमिका को लेकर आलोचना की जाती है जबकि जिस गढ़बंधन की वे अध्यक्ष हैं क्या उस हैसियत  से वे ये भी नहीं जान सकती की सरकार का सम्बंधित मामले में क्या रूख है?
    इसी तरह राहुल जी को लेकर  रोज़ नए बबाल खड़े किये जाते हैं.जबकि वे आज जिस तरह से राजनीति की बारीकियों को सीख रहे हैं उसकी केवल प्रशंसा की जा सकती है.मीडिया द्वारा उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर रोज़ कयास लगाये जाते हैं और वे कयास रोज़ ख़त्म हो जाते हैं ये वे ही मीडिया वाले हैं जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में "पाटिल" नाम सुनकर  शिवराज पाटिल की राष्ट्रपति बनने की सम्भावना व्यक्त कर दी थी जबकि वे "पाटिल "तो माननीय राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल थी  .
आज समझदार लेखकों को अपने लेख जो राजनीतिज्ञों से सम्बंधित हों में उनकी कार्यप्रणाली की त्रुटियों पर केन्द्रित करने चाहिए.आलोचना स्वस्थ होनी चाहिए.यदि कोई राजनेता अच्छा कार्य करता है तो तारीफ तो होनी ही चाहिए.सोनिया जी ने महिला आरक्षण के लिए जो जी तोड़ कोशिशें  की  हैं और राहुल जी ने जो महाराष्ट्र में राज ठाकरे की क्षेत्रवादी  राजनीति को जो करारा जवाब दिया है इसकी तारीफ तो होनी ही चाहिए.
उत्तराखंड में ये कैसी पत्रकारिता कर रहे है आज कुछ पत्रकार?
सूचना के अधिकार के तह्त सरकार को ब्लैकमेल कर रहें है कुछ तथाकथित पत्रकार

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बीस साल से भी ज्यादा का समय हो गया हैं,मुझे पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते हुए। स्व.प्रभाष जी,रामविलास शर्मा,त्रिलोचन जी और देवकीनंद पांडे,सुरेंद्र प्रताप जी,आलोक मेहता,मृणाल जी जैसे कई दिग्गजों के साथ काम करने का हमें मौका मिला। अपने शुरुआती दिनों से लेकर अभी तक हमने दूरदर्शन से जुड़े रहते हुए पत्रकारिता के कई रूपों को देखा। दूरदर्शन का इतिहास अपने आप श्रेयकर रहा हैं और है भी। आज तमाम चैनलों के चलते हुए भी दूरदर्शन की खुद की गरीमा है। खुद का एक कंटेंट है,जिसपे वह हमेशा से कायम रहा है। हमने इसी मंच से पत्रकारिता के शुरूआत की और आज भी अपने मक्सद में निरंतर हम प्रयासरत है। लेकिन जीवन के इस पड़ाव तक हमने पत्रकारिता के किसी भी मुकाम को कलंकित नहीं होने दिया,ना ही हम तथाकथित शब्दों के कभी अभीप्राय बने। हमने पत्रकारिता के मिज़ाज को एक नयी परिभाष के माध्यम से जीवंत ही नहीं किया अपितु उसे श्रेष्ठ भी बनाया।
मैं पहाड़ से हूं और पहाड़ बहुत ऊंचे होते है,उनकी ऊचांई हर कोई नहीं नाप सकता है। इसके लिए बहुत बड़ा ज़िगरा चाहिए होता है। जो हर किसी के पास नहीं होता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मैंने पहाड़ को बहुत करीब से देखा हैं,और आज देख रहा हूं। यहां के जीवन परिवेश को जितना मैंने जिया हैं,मस्ती में जिया हैं,मैंने पहाड़ों को हमेशा खुद में समाहित किया है। इसलिए भी मैं पहाड़ को बहुत करीब से देखने की हिमाकत कर पाता हूं। निश्चित तौर पर पहाड़ों ने हर क्षेत्र में विश्व को कुछ न कुछ विशेष दिया है। फिर चाहे वह किसी भी तरह की चुनौती हो या फिर युद्ध का मैदान पहाड़ अपनी भूमिका हमेशा तय करता रहा है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में जो चुनौतियां पहाड़ ने चुनी है। वह आज किसी से छुपी नहीं है। लेकिन आज कुछ तथाकथित पत्रकारिता के दलाल इस पेशे के साथ जिस तरह का मजाक कर रहे है। उससे निश्चित तौर पर पहाड़ के जन-मानस को ठेस पहुंच रही है। वह भी ऐसे पत्रकार जो खुद हमेशा पाक-साफ होने के दावे करते है। लेकिन इनकी वास्तविकता जब सामने आती हैं,तो कई बार सही अर्थों में पहाड़ भी शर्म के मारे झुक जाते है। इसका एक पुख्ता तथ्य का ज़िगर में निश्चित तौर पर यहां करना चाहूंगा। पिछले दिनों मैं देहरादून में मौजूद था। आपदा को लेकर उत्तराखंड सरकार की भूमिका को जानने के लिए,यकीनन सरकार ने अपने स्तर पर आपदा पीड़ितों के लिए जो भूमिका तय की थी। उसे पूरे विश्व ने देखा और इस के लिए सरकार की सराहना भी की और की भी जानी चाहिए। क्योंकि विकास के मार्ग जब कोई रोड़ा आता हैं,और उसे आप सावधानी के साथ हटाकर आगे बढ़ जाते हैं तो इसे आपके विकास की सफलता कहा जा सकता है। जो मुझे लगता हैं कि डॉ.निशंक के करके दिखाया है।
यकीनी तौर पर आपदा की आगोश में फंसे उत्तराखंड को एक ऐसी सोच की आवश्यकता थी। जो यहां के विकास में बाधा न बने,जिसके लिए कई लोगों ने प्रयास भी किए और किए भी जा रहे है। लेकिन ऐसे मौके पर भी कुछ पत्रकार बंधुओं ने सरकार से सूचना के अधिकार के तह्त कुछ ऐसी जानकारियां जुटाने का भरसक प्रयास किया कि जो शायद सरकार को कहीं न कहीं अपने काम से भटका रहा था। उससे जुड़े अधिकारी निरतंर उन सूचनाओं को जुटाने में लगे थे,जो उन्हें प्रश्नकर्ता को देने थे। यकीनन यह अधिकार हमें हैं और इसका गठन भी इसी लिए किया गया हैं कि ताकि हम सच जान सकें। लेकिन ऐसे मौके पर यह कहां तक उचित हैं कि आप आपदा के भंवर में फंसे हैं,और आप ऐसे में यह जानना चाहते हैं कि सरकार ने कितने पैसे अभी तक बांटे और कब बांटे। क्या इसके लिए फिर से कोई दूसरी समय सीमा तय नहीं की जा सकती थी। लेकिन यहां इन पत्रकारों को हर हाल में जल्द से जल्द यह जानकारी चाहिए थी। जनता की सेवा भाड़ में जाएं,इससे इन्हें कोई लेना देना नहीं था। यहां काबिले तारीफ बात तो यह हैं कि जो सवाल इन कुछ तथाकथित पत्रकारों के माध्यम से पूछे गए उसमें केवल चार ही लोग ऐसे थे। जिन्होंने आपदा के बारे में सूचनाएं मांगी थी। बाकि की 96% ऐसे लोग हैं जो तमाम ऐसे मुद्दों को लेकर सवाल जानना चाहते हैं। जिनसे इन्हें दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। ना ही इन सूचनाओं से किसी के लिए कोई विशेष रिपोर्ट तैयार होनी वाली थी। कुछ सवाल का उल्लेख करना चाहूंगा किः- उत्तराखंड से निकलने वाली एक पत्रिका को दस हजार का विज्ञापन दिया गया तो हमें क्यों नहीं दिया गया,हमें पांच हजार ही क्यों मिले? इसी तरह एक पत्रकार ने सवाल किया हैं कि मुझे जल्द ही एक अख़बार का प्रकाशन शुरू करना हैं। तो मुझे इससे सरकार से कितना सहयोग मिलेगा? कुछ इस तरह के सवाल हैं,जो सही अर्थों में सूचना के अधिकार का मजाक उड़ाते हुए नज़र आते है। अब इन सवालों का सूचना अधिकारी क्या जबाब दें। इस बारे में जब हमने एक सूचना अधिकार से बातचीत की तो,उनकी हंसते हुए कहना था कि 'जनता से जुड़ी सूचनाएं,जनता के लिए किए जा रहे कार्यों की जानकारी आज किसी को नहीं चाहिए। यहां तो ऐसे लोग हैं,जिन्हें यह जानना हैं की फलाने को सरकार से क्या मिला,तो हमें क्या मिलेगा और कैसे मिलेगा। ये तो मजाक ही हैं,जो यकीनन सरकार का समय भी बरबाद कर रहा हैं और जन-मानस का भी,सूचना अधिकारी आगे बताते हैं कि कई लोग इस तरह से सवाल पूछते हैं कि या तो विपक्ष का नेता उनसे यह सवाल लिखवाता हैं,या फिर यह लोग कुछ नेताओं के साथ मिलकर सरकारी व्यक्ति को उलझाए रखने के लिए इस तरह के सवाल करते है। जिसके चलते इसके लिए एक व्यक्ति विशेष का वह समय नष्ट हो जाता हैं,जिस उसे किसी जरूरत मंद व्यक्ति के काम में लगना था।
इस विषय पर जब हमने विस्तार से जानने की कोशिश की तो पता चला जिन पत्रकार बंधुओं ने यह सूचनाएं मांगी थी। वह तो पत्रकार थे ही नहीं। बल्कि यह लोग तो पत्रकारिता के नाम पर अपनी-अपनी दुकाने चला रहे है। और सूचना के अधिकार मांगने के नाम पर सरकार को ब्लैकमेल कर रहे है। तब हमने तय किया की अब इस मामले की तय तक जाना बहुत जरुरी हो गया है। इसके बाद हमने भी सूचना के अधिकार के तह्त सरकार से उन तमाम अख़बारों और पत्रिकाओं की सूचि मांगी जो उत्तराखंड में विकास की दौड़ में खुद को शामिल मानते है। इसके बात जब हमें इसका जबाब मिला तो,सच कहें तो हमें ही शर्म आयी और मन भर आया कि आखिर यह कुछ तथाकथित पत्रकार हमारे पेशे को किस तरह बदनाम कर रहे है। साथ ही यह राज्य सरकार का तो समय ख़राब कर ही रहे है। बल्कि यह तो वह लोग भी हैं,जो आये दिन सरकार के खिलाफ अफवाओं का बाज़ार गर्म करते है। कभी यह मुख्यमंत्री को दिल्ली तलब करा देते हैं तो कभी खंडूड़ी जी की ताजपोशी की तैयारी करवा देते है। इन्हें राज्य सरकार की विकास यात्रा से कोई लेना देना नहीं है। इससे साफ जाहिर हो जाता हैं की यह आख़िर किसके लिए और क्यों काम करते है।
उत्तराखंड हो देश के दूसरा कोई हिस्सा आज निश्चित तौर पर पत्रकारिता के नाम पर कुछ लोगों ने उगायी शुरू कर दी है। यह लोग किसी न किसी तरह सरकारी तंत्र का वह हिस्सा हैं जो भ्रष्टाचार की नींव पर फल-फूल रहा है। हमने पाया की आज के समय सिर्फ उत्तराखंड में और ख़ास तौर पर राजधानी देरहादून में कई ऐसे पत्रकार मौजूद हैं जो खुद को सरकार के ईर्द-गिर्द रखते हुए सरकार को ऐसे मामलों में उलझाएं हुए है। जिनसे सरकार का कोई सरोकार ही नहीं है। इससे नुकसान हर किमत पर आम आदमी का हो रहा है। विकास का हो रहा है। नुकसान की बात हमने की तो,सूचना के अधिकार के तह्त मांगी जानी वाली तमाम सूचना लेने वाले व्यक्तियों में अधिकांश ऐसे लोग या पत्रकार हैं। जो किसी न किसी रूप में विपक्षी पार्टियों के बड़े नामों से जुड़े हैं या एक ख़ास किस्म के दलाल है। जो पूरे दिन सरकारी दफ्तरों में बैठ कर सरकारी बाबूओं की चाय पिते हैं,उनके साथ ठहाके लगाते हैं और इन ठहाकों के साथ सरकार के उन तमाम अधिकारियों की त्रुटियों को खोजने में लगे रहते हैं,जिससे इन्हें बहुत बड़ा फ्यादा होने वाला हो। नब्ज़ पकड़ना तो इन्हें आता ही है,इसी तरह से यह सरकार के उस विकास की धारा को तो रोकते ही है,बल्कि खुद भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते है। उत्तराखंड में इस तरह से यह धनदा खूब फल-फूल रहा है। मैं किसी व्यक्ति विशेष पर कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं,लेकिन यह सच हैं कि कुछ तथाकथिक पत्रकार आजकल राजधानी में खूब फल-फूल रहे है। जो सरकार को कई मामलो में उलझा कर खुद की जेब गर्म कर रहे है। कभी वह सरकार को गंगा के नाम पर घेरते हैं तो कभी विपक्ष के गढ़ में शामिल होकर,जिससे आये दिन सरकार के काम में बाधा तो पड़ती हैं,बल्कि प्रदेश की जनता को भी इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है। क्योंकि जिस वक्त काम होना है,वह वक्त तो इन लोगों के झूठे मुद्दों को सुलझाने में गुजर जाता है। फिर यही लोग हो-हल्ला मचाते हैं,सरकार काम नहीं कर रही हैं,सरकार बेकार हैं। लेकिन सवाल यह उठता हैं कि सरकार को काम कौन करने दे रहा हैं,और अगर सरकार के काम में देरी हो रही हैं,तो इसका जिम्मेदार कौन है। इस बात की जांच और उन चेहरों के नाम सरकार को निश्चित तौर पर उज़ागर करने चाहिए जो सरकार के कामों में बाधा पहुंचा रहे है।
दूसरी तरफ कुछ पत्रकार आज़ मैं मांफी चाहूंगा इन्हें पत्रकार नहीं कहना चाहिए। दरअसल यह तो दलाल हैं,जिन्हें अब अपनी जान को ख़तरा है क्योंकि यह दलाली करते-करते अपने लिए अपार धन-सम्पती जुटा चुके है। जिस पर इनसे भी बड़े दलालों की नज़र हैं,और अब इन्हें इस दलाली की कमाई को इनसे बचाने के लिए खुद को बचाने के लिए सरकारी सुरक्षा की भी आवश्यकता आना पड़ी है। जिसके लिए यह राज्य सरकार से एक के बाद एक सिफारिश कर रहे है या करवा रहे है। क्योंकि अब इनकी जान को ख़तरा हैं,फिर चाहे यह नोएडा-दिल्ली कहीं भी रहे इन्हें उत्तराखंड सरकार से खुद की दौलत और खुद की जान की ख़ातिर सुरक्षा चाहिए। यहां सवाल यह उठता हैं कि आखिर इन्हें सुरक्षा की आवश्यता क्यों पड़ी। कल तक एक छोटे से पुराने कमरे में मोमबती के उजाले में दो पंक्तियां लिखने वाले लेखक-पत्रकार इतने धनी कैसे हो गए। कुछ नामी लेखकों-पत्रकारों से लिखने का निवेदन कर छोटी-छोटी पत्रिकाओं और छोटे-छोटे दो पेज के अखबार प्रकाशित करने वालो के पास इतनी अपार सम्पती आखिर कहां से आयी। जो आज उसकी सुरक्षा के लिए इन्हें सरकार से सुरक्षा चाहिए। वह भी उस सरकार से जिसकी कल दिन तक यह सब मिलकर टांग खीच रहे थे। क्या इन सब बातों की जांच नहीं की जानी चाहिए। क्या यह जानने का अधिकार आम-आदमी को नहीं हैं कि कल तक फटे हाल घुमने वाले ये छोटे से पत्रकार आज लखों के मालिक कैसे बन गए। जिनके पास कल तक रहने के घर नहीं था आज वह कोठियों के मालिक कैसे हो गए। क्या इस बात की जांच नहीं होनी चाहिए। इस बारे में जब हमने राज्य सरकार से जानना चाह तो,सरकार ने साफ किया कि राज्य सरकार जल्द ही ऐसे लोगों को चिन्हित कर रही हैं। जो पत्रकारिता का नाम बदनाम कर रहे है,साथ ही सरकार का समय ख़राब करने में लगे है। इस के लिए राज्य सरकार ने एक टीम का गठन भी कर दिया है। जो जल्द ही सरकार को एक रिपोर्ट तैयार कर देगी कि उत्तराखंड में कितनी ऐसी पत्र-पत्रिकाए और पत्रकार हैं,जो खुद के मूल्यों पर काम कर रहे है। साथ ही यह भी देखा जा रहा हैं कि वह कौन लोग है,जो पत्रकारिता के नाम पर भ्रम फैला रहे हैं,और सरकार की भूमिका पर सवाल उठा रहे है। यह टीम इस बात की रिपोर्ट भी जल्द सरकार को देगी की कितनी पत्र-पत्रिकाओं और पत्रकारों को राज्य सरकार या अन्य संगठनों से मान्यता प्राप्त हैं और इनके कमायी के स्रोत क्या है। इनका प्रकाशन और प्रचार-संचालन किस तरह से किया जाता हैं या सरकारी तौर पर किस तरह से मदद पहुंचायी जाती है। इसके साथ यह भी जानकारी प्राप्त की जाएगी की आख़िर इन लोगों को सुरक्षा की जरुरत क्यों आना पड़ी। इसके बाद राज्य सरकार एक कमेटी का गठन करेगी जो फर्जी तरीके से काम रहे इन तथाकथिक पत्रकारों और संगठनों पर लगाम कसने का काम करेगी।
विद्रोही

संगठित जनता की एकजुट ताकत के आगे झुकना सत्ता की मजबूरी!

"या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें।"

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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आज हमारे लिये सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है कि देश या समाज के लिये न सही, कम से कम अपने आपके और अपनी आने वाली पीढियों के सुखद एवं सुरक्षित भविष्य के लिये तो हम अपने वर्तमान जीवन को सुधारें। यदि हम सब लोग केवल अपने वर्तमान को सुधारने का ही दृढ निश्चय कर लें तो आने वाले कल का अच्छा होना तय है, लेकिन हमारे आज अर्थात् वर्तमान के हालात तो दिन-प्रतिदिन बिगडते ही जा रहे हैं। हम चुपचाप सबकुछ देखते और झेलते रहते हैं। जिसका दुष्परिणाम यह है कि आज हमारे देश में जिन लोगों के हाथों में सत्ता की ताकत हैं, उनमें से अधिकतर का सच्चाई, ईमानदारी एवं इंसाफ से दूर-दूर का भी नाता नहीं रह गया है। अधिकतर भ्रष्टाचार के दलदल में अन्दर तक धंसे हुए हैं और अब तो ये लोग अपराधियों को संरक्षण भी दे रहे हैं। ताकतवर लोग जब चाहें, जैसे चाहें देश के मान-सम्मान, कानून, व्यवस्था और संविधान के साथ बलात्कार करके चलते बनते हैं और सजा होना तो दूर इनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज नहीं होते! जबकि बच्चे की भूख मिटाने हेतु रोटी चुराने वाली अनेक माताएँ जेलों में बन्द हैं। इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों के खिलाफ यदि कोई आम व्यक्ति या ईमानदार अफसर या कर्मचारी आवाज उठाना चाहे, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित एवं अपमानित करने का प्रयास किया जाता है और सबसे दु:खद तो ये है कि पूरी की पूरी व्यवस्था अंधी, बहरी और गूंगी बनी देखती रहती है।

अब तो हालात इतने बिगडते चुके हैं कि मसाले, घी, तेल और दवाइयों तक में धडल्ले से मिलावट की जा रही है। ऐसे में कितनी माताओं की कोख मिलावट के कारण उजड जाती है और कितनी नव-प्रसूताओं की मांग का सिन्दूर नकली दवाईयों के चलते युवावस्था में ही धुल जाता है, कितने पिताओं को कन्धा देने वाले तक नहीं बचते, इस बात का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। इस सबके उपरान्त भी इन भ्रष्ट एवं अत्याचारियों का एकजुट होकर सामना करने के बजाय हम चुप्पी साधकर, अपने कानूनी हकों तक के लिये भी गिडगिडाते रहते हैं।

अधिकतर लोग तो इस डर से ही चुप्पी साध लेते हैं कि यदि वे किसी के खिलाफ बोलेंगे तो उन्हें भी फंसाया जा सकता है। इसलिये वे अपने घरों में दुबके रहते हैं! ऐसे लोगों से मेरा सीधा-सीधा सवाल है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में हमारे आसपास की गंदगी को साफ करने वाले यह कहकर सफाई करना बन्द कर देंगे, कि गन्दगी साफ करेंगे तो गन्दगी से बीमारी होने का खतरा है? खानों में होने वाली दुर्घटनाओं से भयभीत होकर खनन मजदूर यह कहकर कि खान गिरने से जीवन को खतरा है, खान में काम करना बंद कर दे, तो क्या हमें खनिज उपलब्ध हो पायेंगे? इलाज करते समय मरीजों से रोगाणुओं से ग्रसित होने के भय से डॉक्टर रोगियों का उपचार करना बन्द कर दें, तो बीमारों को कैसे बचाया जा सकेगा? आतंकियों, नक्सलियों एवं गुण्डों के हाथों आये दिन पुलिसवालों के मारे जाने के कारण यदि पुलिस यह सोचकर इनके खिलाफ कार्यवाही करना बन्द कर दें कि उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुँचा सकता हैं, तो क्या सामाज की कानून व्यवस्था नियन्त्रित रह सकती है? पुलिस के बिना क्या हमारी जानमाल की सुरक्षा सम्भव है? आतंकियों तथा दुश्मनों के हाथों मारे जाने वाले फौजियों के शवों को देखकर, फौजी सरहद पर पहरा देना बंद कर दें, तो क्या हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाएंगे?

यदि नाइंसाफी के खिलाफ हमने अब भी अपनी चुप्पी नहीं तोडी और यदि आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो आज नहीं तो कल जो कुछ भी शेष बचा है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाने वाला है। आज आम व्यक्ति को लगता है कि उसकी रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है! क्या इसका कारण ये नहीं है, कि आम व्यक्ति स्वयं ही अपने आप पर विश्वास खोता जा रहा है? ऐसे हालात में दो ही रास्ते हैं-या तो हम अत्याचारियों के जुल्म और मनमानी को सहते रहें या समाज के सभी अच्छे, सच्चे, देशभक्त, ईमानदार और न्यायप्रिय-सरकारी कर्मचारी, अफसर तथा आम लोग एकजुट होकर एक-दूसरे की ढाल बन जायें। क्योंकि लोकतन्त्र में समर्पित, संगठित एवं सच्चे लोगों की एकजुट ताकत के आगे झुकना त्ता की मजबूरी है और सत्ता वो धुरी है, जिसके आगे सभी प्रशासनिक निकाय और बडे-बडे अफसर आदेश की मुद्रा में मौन खडे रहते हैं।

लोकतंत्र को लूटते लोकतंत्र के प्रहरी-ब्रज की दुनिया

हजारों साल पहले की बात है.किसी राज्य का राजा बड़ा जालिम था.उसके शासन में चारों तरफ लूटमार का वातावरण कायम हो गया.कुछ लोगों ने उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराने की कोशिश भी की.लेकिन उन सबको अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.उसी राज्य में एक वृद्ध और बुद्धिमान व्यक्ति रहता था.एक दिन जा पहुंचा राजा के दरबार में और कहा कि मैं एक सच्ची कहानी आपको सुनना चाहता हूँ.राजा को कहानियां बहुत पसंद थी.बूढ़े ने कहना शुरू किया कि महाराज जब आपके दादाजी का राज था तब मैं नौजवान हुआ करता था और बैलगाड़ी चलाता था.एक दिन जब शहर से लौट रहा था तब जंगल में ऊपर से नीचे तक सोने के गहनों से लदी नवयौवना मिली.डाकुओं ने उसके कारवां को लूट लिया था और पति और पति के परिवार के लोगों की हत्या कर दी थी.वह किसी तरह बच निकली थी.उसका दुखड़ा सुनकर मुझे दया आई और मैंने उसे गाड़ी में बिठाकर सही-सलामत उसके पिता के घर पहुंचा दिया.बाद में जब आपके पिता का राज आया तब मेरे मन में ख्याल आया कि अच्छा होता कि मैं उसे घर पहुँचाने के ऐवज में उसके गहने ले लेता.अब आपका राज है तो सोंचता हूँ कि अगर जबरन उसे पत्नी बनाकर अपने घर में रख लेता तो कितना अच्छा होता.राजा ने वृद्ध की कहानी में छिपे हुए सन्देश को समझा और पूरी मेहनत से स्थिति को सुधारने में जुट गया.मैं जब भी इस कहानी के बारे में सोंचता था तो मुझे लगता कि भला ऐसा कैसे संभव है कि कोई ईमानदार व्यक्ति समय बदलने पर बेईमान हो जाए.खुद मेरे पिताजी का उदाहरण मेरे सामने था जो सारे सामाजिक प्रतिमानों के बदल जाने पर भी सच्चाई के पथ पर अटल रहे.लेकिन जब प्रसिद्ध पत्रकार और कारगिल फेम बरखा दत्ता को दलाली करते देखा-सुना तो यकीन हो गया कि यह कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं है बल्कि हकीकत भी है.ज्यादातर लोग समय के दबाव को नहीं झेल पाते और समयानुसार बदलते रहते हैं.कारगिल युद्ध के समय हिमालय की सबकुछ जमा देनेवाली ठण्ड में अग्रिम और दुर्गम मोर्चों पर जाकर रिपोर्टिंग कर पूरे देश में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर देने वाली बरखा कैसे भ्रष्ट हो सकती है?लेकिन सच्चाई चाहे कितनी कडवी क्यों न हो सच्चाई तो सच्चाई है.नीचे ग्रामीण और कस्बाई पत्रकारों ने पैसे लेकर खबरें छापकर और दलाली करके पहले से ही लोकतंत्र के कथित प्रहरी इस कौम को इतना बदनाम कर रखा है कि मैं कहीं भी शर्म के मारे खुद को पत्रकार बताने में हिचकता हूँ.अब ऊपर के पत्रकार भी जब भ्रष्ट होने लगे हैं तो नीचे के तो और भी ज्यादा हो जाएँगे.वो कहते हैं न कि महाजनो येन गतः स पन्थाः.यानी समाज के जानेमाने लोग जिस मार्ग पर चलें वही अनुकरणीय है.मैंने नोएडा में देखा है कि वहां की हरेक गली के एक अख़बार है जिनका उद्देश्य किसी भी तरह समाज या देश की सेवा या उद्धार करना नहीं है.बल्कि इनके मालिक प्रेस के बल पर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और उसके बल पर दलाली करते हैं,ठेके प्राप्त करते हैं.दुर्भाग्यवश बड़े अख़बारों और चैनलों का भी यही हाल है.दिवंगत प्रभाष जोशी ने पेड न्यूज के खिलाफ अभियान भी चलाया था.लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के चलते यह अभियान अधूरा ही रह गया.कई बार अख़बार या चैनल के मालिक लोभवश सत्ता के हाथों का खिलौना बन जाते हैं और पत्रकारिता की हत्या हो जाती है.अभी दो दिन पहले ही पटना के एक प्रमुख अख़बार दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख का तबादला राज्य सरकार के कहने पर लखनऊ कर दिया गया है.खबर आप भड़ास ४ मीडिया पर देख सकते हैं.वैसे भी हम इन बनियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?जो अख़बार मालिक जन्मना बनिया नहीं है वह भी कर्मणा बनिया है.व्यवसायी तो पहले भी होते थे लेकिन उनमें भी नैतिकता होती थे.जब चारों ओर हवा में नैतिक पतन की दुर्गन्ध तैर रही हो तो पत्रकारिता का क्षेत्र कैसे इससे निरपेक्ष रह सकता है?क्या ऐसा युग या समय के भ्रष्ट हो जाने से हो रहा है.मैं ऐसा नहीं मानता.समय तो निरपेक्ष है.समय का ख़राब या अच्छा होना हमारे नैतिक स्तर पर निर्भर करता है.जब अच्छे लोग ज्यादा होंगे तो समय अच्छा (सतयुग) होगा और जब बुरे लोग ज्यादा संख्या में होंगे तो समय बुरा (कलियुग) होता है.मैं या मेरा परिवार तो आज भी ईमानदार है.परेशानियाँ हैं-हमें किराये के मकान में रहना पड़ता है,कोई गाड़ी हमारे पास नहीं है,हम अच्छा खा या पहन नहीं पाते लेकिन हमें इसका कोई गम नहीं है.इन दिनों टी.वी चैनलों में टी.आर.पी. के चक्कर में अश्लील कार्यक्रम परोसने की होड़ लगी हुई है.समाज और देश गया बूंट लादने इन्हें तो बस पैसा चाहिए.कहाँ तो संविधान में अभिव्यक्ति का अधिकार देकर उम्मीद की गई थी कि प्रेस लोकतंत्र का प्रहरी सिद्ध होगा और कहाँ प्रेस पहरेदारी करने के बजाय खुद ही दलाली और घूसखोरी में लिप्त हो गया है.नीरा राडिया जैसे जनसंपर्क व्यवसायी अब खुलेआम पत्रकारों को निर्देश देने लगे हैं कि आपको क्या और किस तरह लिखना है और क्या नहीं लिखना है,क्या प्रसारित करना है और क्या नहीं करना है.शीर्ष पर बैठे पत्रकार जिन पर सभी पत्रकारों को गर्व हो सकता है पैसे के लिए व्यापारिक घरानों के लिए लिखने और दलाली करने में लगे हैं.जब पहरेदार ही चोरी करने लगे और डाका डालने लगे तो घर को कौन बचाएगा?उसे तो लुटना है ही.कुछ ऐसा ही हाल आज भारतीय लोकतंत्र का हो रहा है.

पत्रकारों के वेश में छिपे दलाल:::: बड़ा नंगा बनाम सड़कछाप चोरकट


बीच वाला  कहो या दलाल या फिर पहुँच  वाले लोग ( सिफारिशी ) , इन लोगों को कोई नाम दो , ये लोग हमेशा रहें है और रहेंगे , नेताओं , पत्रकारों  या सम्पर्क सूत्रों के रूप में , काम दलाली का रहता है बस स्वरूप बदल जाता है , जब कोई छोटा फसता है तो उसे नैतिकता का पाठ पढ़ा कर दंड दिला दिया जाता है और जब बड़ा फसता है तो अपनी ताकत के बल पर हाय तोबा मचा कर लोगो को या कानून को डराने- धमकाने क़ि कोशिश की जाती है .


   

इस लिए कोई हो हल्ला मचाने  से कुछ  मिलने वाला नहीं है , बस अख्बारी  सुर्खिया या टी वी की हेड लाईन्स ही दिख कर सब ख़त्म हो जायेगा .दलाल हर समाज से आते है अगर कुछ पत्रकार दलाली करते पकडे गयें  है पकडे जा रहे है , तो इसमें  आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. 

ये बात क़िस  से छिपी है क़ि स्वनामधन्य  बडे , खास 

कर अंग्रेजी अख़बार और टेलीविजन  के तथाकथित  

बडे लोग कुछ खास घरानों के लिए काम करते हैं , साथ 

ही सरकारों  के लोग अपने अपने हितों  से जुड़ी बातें 

प्रचारित करवाने में इन तथाकथित बड़ों का खुले आम 

इस्तेमाल करते है और बदले में मनचाहा सुविधा शुल्क 

देने  में पीछे नहीं रहते .

कारपोरेट  घराने हों या बडे लोग अपने हितों की रक्षा के लिए क्या क्या नही करते , इसे सब कोई जानता है , वरना मुकेश अम्बानी को २/३  पत्रकारों को अपने गोपनीय निजी  पार्टी में बुलाने की क्या ज़रूरत ठी , जब क़ि बाकी पत्रकारों से इस अन्तरंग  पार्टी    के होने की बात छिपाई गयी .

ये सब पैसे का खेल है , जहाँ  सुरा , सुन्दरी और नोटों की गड्डियों से ले कर सब चलता है , बस काम होना चाहिए .कोई अपने को कितना ही दूध का धुला बताये ,हम्माम  में सब नंगे हैं .
-- जारी 

28.11.10

Sheila ki Jawaani one of my raunchiest songs: Katrina




Bollywood actress Katrina Kaif, who has done a sizzling item number Sheila ki Jawaani for her upcoming film Tees Maar Khan, feels that the song is one of the raunchiest she has ever shot.

“It was kind of a learning experience for me. I don’t take the song being called item  number as an offence. There is exposure in the song but it is more about attitude and I was specific about it. It is about dancing with openness and not being inhibited,” Katrina said during an interaction .

kartrina“It had be one of the raunchiest songs I have ever shot,” she added.
The actress, who showcased a rarely seen avatar of hers in the song, said she had watched many DVDs of old films prior to doing Sheila ki Jawaani.
“Farah gave me a lot of DVDs of older movies not to imitate or emulate. I can never do that even if I wanted to but just to see the way Madhuriji (Dixit) dances and the joy she felt while dancing… how focused and involved she was,” Katrina said.
Tees Maar Khan, an action-comedy stars Akshay Kumar and Katrina in the lead and with Akshaye Khanna in a cameo. Salman Khan and Anil Kapoor too have made special appearances in the film, which is releasing on December 24.

आवाम, पुलिस और सरकार



राजकुमार साहू, जांजगीर, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ ने जिस तरह विकास के दस बरस का सफर तय कर देश में एक अग्रणी राज्य के रूप में खुद को स्थापित किया है और सरकार, विकास को लेकर अपनी पीठ थपथपा रही है, मगर यह भी चिंता का विषय है कि छत्तीसगढ़िया, सबसे बढ़िया कहे जाने वाले इस प्रदेश में अपराध की गतिविधियों मंे लगातार इजाफा होता जा रहा है। राजधानी रायपुर से लेकर राज्य के बड़े शहरों तथा गांवों में निरंतर जिस तरह से बच्चों समेत लोगों के अपहरण हो रहे हैं तथा सैकड़ों लोग एकाएक लापता हो रहे हैं और पुलिस उनकी खोजबीन करने में नाकामयाब हो रही है, ऐसे में आम जनता के मन में भय बनना स्वाभाविक है। जिनके कंधे पर लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, यदि वही अपराध रोकने में अक्षम साबित हो रहे हैं, तो आम लोग भला किसके पास जाएं। इस नये राज्य में वैसे ही नक्सलवाद के कारण हालात बिगड़े हुए हैं, उपर से आपराधिक घटनाओं में हो रही बढ़ोतरी ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन सरकार को शायद कोई चिंता नहीं है। यदि ऐसा होता तो अब तक राज्य में बेहतर पुलिसिंग तथा आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए नीति बना ली गई होती। प्रदेश में एक के बाद एक अपहरण जैसे गंभीर अपराध की घटना घटित हो रही हैं, लेकिन पुलिस के लंबे हाथ अपराधियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ को बरसों से एक शांत इलाका माना जाता है। राज्य के निर्माण के बाद जिस तरह से विकास की गति तेज हुई है, उसी लिहाज से प्रदेश में दूसरे राज्यों से लोगों का आना शुरू हुआ है। दस बरस पहले के हालात अलग थे और आज अलग है। एक समय रायपुर को अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों में गिना जाता रहा। छग बनने के बाद राजधानी के तौर पर रायपुर की बसाहट में कई गुना वृद्धि हुई। जाहिर सी बात है कि यहां की आबो-हवा में बदलाव आना ही था तथा छग में आपराधिक गतिविधियों में इजाफा होने से यहां की शांत प्रिय जनता के मन में भय पैदा हो गया है। हाल ही में हुई कुछ घटनाओं से प्रदेश के लोगों का विश्वास पुलिस से उठ रहा है, क्योंकि घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है और प्रदेश की पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
पिछले दिनों राजधानी रायपुर में हुई ब्लास्ट की घटनाओं को लोग भूले नहीं थे कि प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में अपहरण, बलि जैसे गंभीर मामले सामने आने लगे हैं। रायपुर, अंबिकापुर, भिलाई, बिलासपुर समेत जांजगीर-चांपा तथा कई अन्य जिलों में बच्चों, युवतियों एवं लोगों के गायब होने की जानकारी सामने आ रही है। कुछ मामलों में अपहरण के बाद फिरौती की भी मांग की गई। ऐसे कई मामलों में पुलिस की मुस्तैदी नजर नहीं आई। पुलिस केवल खोजबीन करने की बात कहकर अपने दायित्वों से मुंह मोड़ लेती है, यही कारण है कि पुलिस न तो अपहृत लोगों को बचा पा रही है और न ही, उन अपराधियों को पकड़ पा रही है। जांजगीर-चांपा जिले में भी एक आंकड़े के अनुसार करीब 137 लोगों के लापता होने की जानकारी है। इनका पता पुलिस नहीं लगा सकी है, ऐसे में किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इन लोगों को जमीं निगल गई या फिर आसमां खा गया। पुलिस कहती है कि उसका तंत्र मजबूत है, लेकिन यहां सवाल यही है कि जब तंत्र इतना मजबूत है तो फिर कैसे अपहरण जैसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
अंबिकापुर के हृदय विदारक घटना ने पूरे प्रदेश के लोगों को हिलाकर रख दिया है। झारखंड से फिरौती मांगने के बाद बच्चे को जान से मारने की घटना से भी न तो पुलिस जाग पाई है और न ही सरकार। यहां लोगों के गुस्से का सामना पुलिस समेत कई अफसरों को करना पड़ा, क्योंकि लोगों का कहना है कि पुलिस ने तत्परता दिखाई होती तो इस घटना को रोका जा सकता था। इसके बाद आए भिलाई में बच्चे की बलि के मामले ने पुलिस की उपस्थिति पर सवालिया निशान लगा दिया है। रायपुर से अपहृत बालक रोशन की लाश मिलने के बाद लोगों में आक्रोश और बढ़ गया है। प्रदेश में अपहरण के दर्जनों मामले दर्ज हैं और राज्य में सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनके बारे में पुलिस पता लगाने में कामयाब नहीं हो सकी है। हालात यह हैं कि लापता होने तथा अपहरण के मामले सामने आने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। देखा जाए तो ऐसे हालात, राज्य में हर साल बनते हैं, लेकिन फिर भी सरकार क्यों आपराधिक घटनाओं को रोकने प्रयास नहीं करती ? प्रदेश में गृहमंत्री ननकीराम कंवर अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन राज्य में कानून व्यवस्था को सुदृढ़ नहीं बनाने उनका ध्यान नजर नहीं आता। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है, जब किसी का सपूत, अपराधियों की कारस्तानियों से उनसे दूर चला गया हो, उपर से ग्रामीण विकास मंत्री रामविचार नेता का अंबिकापुर में गैरजिम्मेदाराना बयान आना, इसे निंदनीय ही कहा जा सकता है।
प्रदेश में दिनों-दिन बिगड़ रही कानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष भी सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया है। ग्रामीण विकास मंत्री के बयान को कांग्रेस नेताओं ने गलत करार दिया है। अंबिकापुर में हुई घटना के बाद कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष धनेन्द्र साहू तथा नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे, रितिक ( अपहरण के बाद मार दिए गए बालक ) के परिजनों से मिलने गए, यहां उन्होंने प्रदेश के हालात को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। जिस तरह छत्तीसगढ़ में आपराधिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, उसके बाद अब लोगों की जुबान पर यह बात भी आने लगी है कि छग, अब बिहार बनने लगा है। उनका कहना है कि कुछ बरस पहले बिहार में अपहरण समेत आपराधिक घटनाएं आम थी, उसी तरह स्थिति अभी छत्तीसगढ़ में बनी हुई है।
इन घटनाओं पर गौर करते हुए सरकार को गंभीर होने की जरूरत है, राज्य की सवा करोड़ जनता के मन में जो भरोसा सरकार के प्रति कायम है, वह कहीं टूट न जाएं। आपराधिक घटनाओं को रोकने पुलिस तंत्र को मजबूत किया जाना जरूरी है, क्योंकि कहीं न कहीं पुलिसिंग में कमियां बरकरार नजर आती हैं, जिसका लाभ सीधे तौर पर अपराध करने वाले असामाजिक तत्व उठा रहे हैं और कई घरों के चिराग को खत्म कर अनेक परिवारों को उजाड़ने का कारण भी बन रहे हैं।
हमारा मानना है कि राज्य की कानून व्यवस्था को बनाने तथा आपराधिक गतिविधियों पर लगाम लगाने प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को अपने हाथ में लेना चाहिए, क्यांेकि बीते कुछ बरसों से पुलिस विभाग का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है। प्रदेश के गृहमंत्री ननकीराम कंवर, नक्सली मामले में इसे राश्ट्रीय समस्या बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन प्रदेश में हो रही अपहरण की घटनाएं तो छत्तीसगढ़ से जुड़ी हैं, ऐसे में अब समय आ गया है कि प्रदेश में बेहतर कानून व्यवस्था कायम करने माकूल प्रयास किए जाएं। समय रहते ऐसा नहीं हुआ तो शांतप्रिय माने जाने वाली जनता को कहीं सड़क पर न उतरना पड़ जाए।


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सेनापति पांडुरंग महादेव बापट का जीवन संघर्ष

सेनापति पांडुरंग महादेव बापट का जीवन संघर्ष


अरविन्द विद्रोही

किसी भी देश की पहचान उसके गौरवशाली,संघर्षमय इतिहास से होती है।हजारों वर्षों की दासता और दासता की बेड़ियों को तोड़ने में लगे मातृभूमि के लाड़लों की एक बृहद् समृद्धिशाली,त्यागमयी गौरवपूर्ण गाथा है,जो पीढ़ी दर पीढ़ी देश के युवाओं को प्रगति व आत्मसम्मान के पथ पर ले जाने हेतु पथ-प्रदर्शक का कार्य करती रहेगी।भारत-भूमि देवभूमि यूॅं ही नही कही जाती है।यह धरा अपना बचपन,अपनी जवानी,अपना सर्वस्व धरती माता के चरणों में,सेवा में,रक्षा में अर्पित कर देने वाले सपूतों की जन्मदात्री है।एैसे ही एक भारत के लाल पांडुरंग बापट का जन्म 12नवम्बर,1880 को महादेव व गंगाबाई के घर पारनेर-महाराष्ट में हुआ था। प्रारम्भ में ही आपको बताते चलें कि इनके विषय में साने गुरू जी ने कहा था-सेनापति में मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज,समर्थ गुरू रामदास तथा सन्त तुकाराम की त्रिमूर्ति दिखायी पड़ती है।साने गुरू जी बापट को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक,महात्मा गॉंधी तथा वीर सावरकर का अपूर्व व मधुर मिश्रण भी कहते थे।बापट को भक्ति,ज्ञान व सेवा की निर्मल गायत्री की संज्ञा देते थे-साने गुरू जी।बापट ने पारनेर में प्राथमिक शिक्षा के बाद बारह वर्ष की अवस्था में न्यू इंग्लिश हाईस्कूल-पूणे में शिक्षा ग्रहण की।पूणे में फैले प्लेग के कारण बापट को पारनेर वापस लौटना पड़ा।गृहस्थ जीवन में आपका प्रवेश 18वर्ष की आयु में हुआ।अपनी मौसी के घर अहमदनगर में मैटिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर आपने 5वॉं स्थान तथा जगन्नाथ सेठ की छात्रवृत्ति प्राप्त की।कचेहरी में दस्तावेज-नवीस का कार्य आपने इसी दौरान किया।उस समय 12रू प्रति माह की छात्रवृत्ति आपने संस्कृत विषय में हासिल की।उच्च शिक्षा हेतु 3जनवरी,1900 को 20वर्ष की उम्र में डेक्कन कॉलेज,पूणे में दाखिला लिया।छात्रावास में टोपी लगाकर बाहर जाने के नियम का असावधानी पूर्वक उल्लंघन करने के कारण आपको 6महीने छात्रावास से बाहर रहने का दण्ड़ मिला।इस अवसर पर सतारा के नाना साहब मुतालिक ने बापट को अपने कमरे में रख कर सहारा दिया।अपनी उच्च शिक्षा को जारी रखने के उद्देश्य से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् बापट ने बम्बई पहुॅंच कर स्कूल में अस्थायी अध्यापन का कार्य प्रारम्भ किया।सौभाग्य से बापट को मंगलदास नाथूभाई की छात्रवृत्ति मिल गई।अब बापट मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने स्काटलैण्ड पहुॅंच गये।यहां के कवीन्स रायफल क्लब में आपने निशानेबाजी सीखी। भारतीय क्रान्ति के प्रेरणाश्रोत श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा,जिन्होंने लन्दन में क्रान्तिकारियों के लिए इण्डिया हाउस की स्थापना की थी,इण्डियन सोशलाजिस्ट नामक अखबार से क्रांति का प्रचार-प्रसार किया था,उस महान विभूति से यहीं पर पांडुरंग महादेव बापट की मुलाकात हुई।ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन भारत की परिस्थिति विषय शेफर्ड सभागृह में निबन्ध-वाचन के अवसर पर श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा उपलब्ध करायी गयी सामग्री के आधार पर आपने भाषण दिया,आपका निबन्ध छपा।तत्काल मुम्बई विद्यापीठ सिफारिश पर बापट की छात्रवृत्ति समाप्त हो गई।अपनी मातृभूमि की दशा को बखान करने की कीमत चुकायी बापट ने।अब बापट ने क्रान्ति की शिक्षा ग्रहण करना प्रारम्भ कर दिया।इण्डिया हाउस में रहने के दौरान बापट,वीर सावरकर के सम्पर्क में आये।आपको पेरिस बम कौशल सीखने भेजा गया।अपनी विद्वता का इस्तेमाल आपने अपने देश की सेवा व लेखन में किया।दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में होने वाले 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में वॉट शैल अवर कांग्रेस डू तथा 1907 में सौ वर्ष बाद का भारत आपके कालजयी लेख हैं। मजदूरों-मेहनतकशों-आम जनों को एकता के सूत्र में बांघने तथा क्रांति की ज्वाला को तेज करने के उद्देश्य से श्यामजी कृष्ण वर्मा व सावरकर की सलाह पर बापट भारत वापस आये।शीव बन्दरगाह पर उतरने के पश्चात् धुले-भुसावल होते हुए कलकत्ता के हेमचन्द्र दास के घर माणिकतल्ला में पहुॅंचे।यहां कई क्रांतिकारियों के साथ आपकी बैठक हुई।इन्ही क्रान्तिकारियों में से एक क्रान्तिकारी बम प्रकरण में दो माह बाद गिरफतार हो गया,जो मुखबिर बन गया।बापट की भी तलाश प्रारम्भ हो गई।साढ़े चार वर्ष बाद इन्दौर में पुलिस के हाथों बापट की गिारफतारी हुई।इसी बीच मुखबिर बने नरेन्द्र गोस्वामी को क्रान्तिकारी चारू चन्द्र गुहा ने मार गिराया फलतःबापट पर कोई अभियोग सिद्ध नहीं हो सका।पांच हजार की जमानत पर छूटकर बापट पारनेर घर आकर सामाजिक सेवा,स्वच्छता जागरूकता,महारों के बच्चों की शिक्षा,धार्मिक प्रवचन आदि कार्यों में जुट गये।पुलिस व गुप्तचर बापट के पीछे पड़े रहे।1नवम्बर,1914 को पुत्र रत्न की प्राप्ति के पश्चात् नामकरण के अवसर पर प्रथम भोजन हरिजनों को कराने का साहसिक कार्य किया था-बापट ने।अप्रैल1915 में पूना के वासु काका जोशी के चित्रमय जगत नामक अखबार में फिर 5माह बाद तिलक के मराठी पत्र में बापट ने कार्य किया।पूणे में भी सामाजिक कार्य व रास्ते की साफ-सफाई करते रहते थे-बापट।बापट ने मराठा पत्र छोड़ने के बाद पराड़कर के लोक-संग्रह दैनिक में विदेश राजनीति पर लेखन करने के साथ-साथ डॉ0श्रीधर व्यंकटेश केलकर के ज्ञानकोश कार्यालय में भी काम किया।आपकी पत्नी की मृत्यु 4अगस्त,1920 को हो गई।इस समय बापट 2अगस्त,1920 से चल रही श्रमिक मेहतरों की मुम्बई में चल रही हड़ताल का नेतृत्व कर रहे थे।झाडू-कामगार मित्रमण्डल का गठन कर सन्देश नामक समाचार पत्र में विवरण छपवाया।मानवता की शिक्षा देते हुए,मुम्बई वासियों को जागृत करने हेतु,गले में पट्टी लटका कर भजन करते हुए 1सितम्बर,1920 को आप चौपाटी पहॅंुचे।यह हड़ताल सफल हुई। इसके पश्चात् अण्ड़मान में कालेपानी की सजा भोग रहे क्रान्तिकारियों की मुक्ति के लिए डा0नारायण दामोदर सावरकर के साथ मिलकर आपने हस्ताक्षर अभियान चलवाया,घर-घर भ्रमण किया,लेख लिखे,सभायें आयोजित की।बापट ने राजबन्दी मुक्ता मण्डल की भी स्थापना की।कालेपानी की कठोर यातना से इन्द्रभूषण सेन आत्महत्या कर चुके थे तथा उल्लासकर दत्त पागल हो गये थे।महाराष्ट में सह्याद्रि पर्वत की विभिन्न चोटियों पर बॉंध बॉंधने की योजना टाटा कम्पनी ने की।मुलशी के निकट मुला व निला नदियों के संगम पर प्रस्तावित बॉंध से 54गॉंव और खेती डूब रही थी।विनायक राव भुस्कुटे ने इस के विरोध में सत्याग्रह चला रखा था।1मई,1922 को दूसरे सत्याग्रह की शुरूआत होते ही बापट को गिरफतार कर 6माह के लिए येरवड़ा जेल भेज दिया गया।छूटने के बाद बापट मुलशी के विषय में घूम-घूम कर कविता पाठ करते,प्रचार फेरियां निकलवाते।नागपुर में बेलगॉंव तक भ्रमण किया बापट ने।अब बापट सभाओं में कहते,-अब गप्प मारने के दिन खत्म हुए,बम मारने के दिन आ गये हैं।मुलशी प्रकरण में 23अकतूबर,1923 को बापट तीसरी बार गिरफतार हो गये।रिहाई के बाद रेल पटरी पर गाड़ी रोकने के लिए पत्थर बिछाकर,हाथ में तलवार,कमर में हथियार और दूसरे हाथ में पिस्तौल लेकर बापट धोती की कॉंख बॉंधे अपने 5साथियों के साथ खड़े थे।इस रेल रोको आन्दोलन में गिरफतारी के बाद 7वर्ष तक सिंध प्रांत की हैदराबाद जेल में बापट अकेले कैद रहे।मुलसी आन्दोलन से ही बापट को सेनापति का खिताब मिला।रिहाई के बाद 28जून,1931को महाराष्ट कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये।विदेशी बहिष्कार का आन्दोलन चला।अपने भाषणों के कारण बापट फिर जेल पहुॅंच गये।सिर्फ 5माह बाद ही गिरफतार हुए बापट ने वकील करने से मना कर दिया।7वर्ष के काले पानी तथा 3वर्ष की दूसरे कारावास में रहने की दूसरी सजा मिली।जेल में रहने के ही दौरान बापट के माता-पिता की मृत्यु हो गई।बाहर कांग्रेस ने सार्वजनिक हड़ताल व सभायें की।येरवड़ा जेल में बन्द गॉंधी जी के अनशन के समर्थन में बापट ने जेल में ही अनशन किया।सूत कातने,कविता लिखने,साफ-सफाई करने में वे जेल में अपना समय बिताते।अनशन में स्वास्थ्य खराब होने पर उन्हें बेलगांव भेज दिया गया।23जुलाई,1937 को रिहा कर दिये गये सेनापति बापट के रिहाई के अवसर पर स्वागत हेतु बहुत विशाल सभा हुई।सुभाष चन्द्र बोस के द्वारा फारवर्ड ब्लाक की स्थापना करने पर बापट को महाराष्ट शाखा का अध्यक्ष बनाया गया।द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल करने का किया -फारवर्ड ब्लाक ने।भाषण दिये गये।कोल्हापुर रियासत में धारा144 लागू थी,वहॉं भाषण देने के कारण आपको गिरफतार की कराड़ लाकर छोड़ दिया गया।आपने फिर कोल्हापुर में सभा कर विचार रखे।5अप्रैल,1940 को मुम्बई स्टेशन पर आपको गिरफतार कर कल्याण छोड़ा गया तथा मुम्बई प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।नजरबन्दी के बावजूद आपने चौपाटी में पुलिस कमिशनर स्मिथ की मौजूदगी में उर्दू में भाषण दिया,इस अवसर पर अंग्रेज का पुतला तथा यूनियन जैक भी जलाया गया।बापट को गिरफतार कर नासिक जेल में रखा गया।यहां पर बापट का वीर पुत्र वामनराव भी द्वितीय विश्व युद्ध के विरोध की सजा में बन्द थे।20मई,1944को आपकी पुत्री का देहान्त हो गया तथा सात माह की नातिन की जिम्मेदारी भी आप पर आ गई। नवम्बर,1944 में विद्यार्थी परिषद का आयोजन हुआ।चन्द्रपुर,अकोला की सभाओं के बाद बापट अमरावती की सभा के पहले गिरफतार हो गये।एक वर्ष की सजा हो गई।1946 में दुर्भिक्ष पड़ा।इस अवसर पर मजदूरों का साथ दिया सेनापति बापट ने तथा सहायता निधि जमा करके मजदूरों की मदद की।मातृभूमि की सेवा करने की जो शपथ 1902 में छात्र जीवन में बापट ने ली थी,अक्षरशःपालन किया।देश के लिए पूरा जीवन व्यतीत कर देने वाले इस सेनापति का अधिकांश समय जेल में ही बीता।संयुक्त महाराष्ट की स्थापना व गोवा मुक्ति आन्दोलन के योद्धा बापट सदैव हमारे मध्य सदैव प्रेरणा बन करके रहेंगे।आजादी के दिन 15अगस्त,1947 को बापट ने पुणे शहर में तिरंगा फहराने का गौरव हासिल किया।सेनापति बापट की देहावसान 28नवम्बर,1967 को हुआ था।पुणे-मुम्बई में सेनापति बापट के सम्मान में एक प्रसिद्ध सड़क का नामकरण किया गया है।

हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी-ब्रज की दुनिया

भ्रष्टाचार के खिलाफ इस समय संसद में विपक्ष की एकजुटता देखते ही बनती है.विपक्ष अब भी जे.पी.सी. से कम पर मानने को तैयार नहीं है.लेकिन क्या विपक्ष वास्तव में भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता है?नहीं,हरगिज नहीं.उसका मकसद इस मुद्दे पर सिर्फ हल्ला मचाना है.अगर ऐसा नहीं होता तो फ़िर मुख्य विपक्षी दल भाजपा भ्रष्टाचार के दर्जनों आरोपों से घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा को अभयदान नहीं दे देती.भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह उसका कैसा जेहाद है कि तुम्हारा भ्रष्टाचार गलत और मेरा सही.भाजपा के इस पक्षपात ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रहे अभियान के रथ को किसी परिणति तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया है.अब यह निश्चित हो गया है कि देश को निगल रहे इस महादानव के खिलाफ तत्काल कुछ भी नहीं होने जा रहा.पिछले १५-२० दिनों से विपक्ष ने जिस प्रकार से संसद में गतिरोध पैदा कर रखा है उससे जनता में इस लड़ाई के किसी सार्थक परिणाम तक पहुँचने की उम्मीद बंध गई थी.उम्मीद बंधाने में सबसे बड़ा हाथ रहा है मीडिया का.हालांकि मैं इसमें मीडिया की कोई गलती नहीं मानता.विपक्ष इस मुद्दे पर कुछ इस प्रकार से आक्रामक हो ही रहा था कि कोई भी भ्रम में आ जाए.लेकिन अब भाजपा ने कर्नाटक में येदुरप्पा को अपदस्थ नहीं करने का निर्णय लेकर मोर्चे को ही कमजोर कर दिया है.जाहिर है हम इस लड़ाई में किसी भी राजनैतिक पार्टी पर भरोसा नहीं कर सकते.ये दल खुद ही भ्रष्ट हैं,फ़िर क्यों ये हमारी लड़ाई लड़ने लगे?जिस तरह अमेरिका भारत के लिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ सकता उसी तरह ये राजनैतिक दल भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे लिए नहीं लड़ने वाले.यह लड़ाई हमारी लड़ाई है और हमें खुद ही लड़नी पड़ेगी.उधार के कन्धों से लड़ाई जीती नहीं जाती बल्कि हारी जाती है.अब यह हम पर निर्भर करता है कि इस लड़ाई को हम कब शुरू करते हैं.अलग-अलग होकर लड़ते हैं या एकजुट होकर.अलग-अलग होकर हमारी केवल और केवल हार ही संभव है.एकसाथ होकर लड़ेंगे तो निश्चित रूप से जीत हमारी होगी और भ्रष्टाचार की हार होगी.देश में वर्तमान किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता में वह नैतिक बल नहीं कि वह देश के लिए आतंकवाद और वामपंथी उग्रवाद से भी बड़ा खतरा बन चुके देश के सबसे बड़े दुश्मन भ्रष्टाचार के विरुद्ध होने वाली इस अवश्यम्भावी और अपरिहार्य बन चुकी लड़ाई में जनमत का नेतृत्व कर सकें.इसके लिए हमें नया और पूरी तरह से नया नेतृत्व तलाशना होगा.लेकिन यह भी कडवी सच्चाई है कि सिर्फ नेतृत्व के बल पर आन्दोलन खड़ा नहीं किया जा सकता.इसके अलावा लाखों की संख्या में तृणमूल स्तर पर जनता को प्रेरित करने वाले कार्यकर्ताओं की भी आवश्यकता होगी.कब उठेगा गाँव-गाँव और शहर-शहर के जर्रे-जर्रे से भ्रष्टाचार के खिलाफ गुब्बार मैं नहीं जानता.कैसे संभव होगा यह यह भी मैं नहीं जानता.मैं तो बस इतना जानता हूँ कि ऐसा गुब्बार बहुत जल्द ही दूर रक्तिम क्षितिज से उठेगा और देखते ही देखते पूरे देश को अपनी जद में ले लेगा.फ़िर भारत के राजनैतिक आसमान पर जो सूरज उगेगा वह निर्दोष और निर्मल होगा,ईमानदार होगा और अमीर-गरीब सब पर बराबर की रोशनी डालने वाला होगा.

जब शिक्षिका ने छात्रो को जूतों की माला पहनाई

 अखिलेश उपाध्याय
कटनी / शहर के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका द्वारा छात्रो को जूते चप्पलो की माला पहनाने और उन्हें जूते सूघने की सजा देने का आरोप जाँच में सही पाया गया है.

दो सदस्यीय दीम द्वारा जाँच के बाद सौपी गई रिपोर्ट के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी शशिबाला झा ने शनिवार को दोषी शिक्षिका को निलंबित करने के आदेश जारी किये गए . यह घटना तीन दिन पहले खिरहनी फाटक के पास स्थित निषाद स्कूल में हुई थी.

जिसमे प्राथमिक शाला की प्रधानाध्यापिका अनुसुईया गौड़ ने बच्चो को चप्पल जूते कक्षा से बाहर न उतारने पर यह सजा सुनाई थी. इस कृत्य से प्रताड़ित लगभग एक दर्जन छात्रो ने इसकी शिकायत अभिभावकों से की थी. जिसके बाद स्कूल में जमकर हंगामा भी हुआ था.
पीड़ित छात्र माया निषाद, शालू दुबे व अन्य ने बताया की पहले उन्हें चप्पल सूघने के लिए कहा गया और बाद में चप्पल की माला गले में पहनाई गई. जबकि दोषी पाई गई प्रधानाध्यापिका ने खुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया है.
एक तरफ शिक्षा विभाग और प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक प्रत्येक बच्चे को शिक्षा से जोड़ने के लिए करोडो रूपये खर्च कर रही है दूसरी तरफ ऐसे चंद शिक्षक बच्चो को शिक्षा से दूर कर शाला त्यागी बनाने की कोशिश में जुटे हुए है. इस बाकये ने पूरे शिक्षा विभाग को शर्मसार किया है.

***हवा करती है सरगोशी, बदन ये काँप जाता है***

आज 26 / 11 जैसे दुर्भाग्य पूर्ण प्रकरण की दूसरी बरसी है और ये हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है की इस सबके दोषी को सरकार दामाद की तरह पाल कर बैठी है, मेरी ये रचना उन सभी को समर्पित है, जो निर्दोष होते हुए मारे गये और वो जवान जो इन निर्दोषों के प्राण बचाने की खातिर शहीद हो गये........
मैं नही जानता मेरा लिखा गजल की श्रेणी में आता है या नही मेरे जो मन के भाव कसाब जैसे देशद्रोहियों को जीवित देखकर आते हैं शब्दों में व्यक्त है........ मैंने इसमें भावावेश में नेताओं के लिए कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है जिसके लिए मुझे कोई खेद नही है........


26 / 11 का वो मंजर, जब भी याद आता है,
हवा करती है सरगोशी, बदन ये काँप जाता है ||

करकरे जैसे जांबाजों की, मौत जब जब याद आती है,
जाँ ही बस नही निकलती, कलेजा मुंह को आता है||

लाशों के जखीरे पर, खड़ा होकर कोई नेता,
खुद के नपुंसक वजूद तले, शहादत का मजाक उडाता है||

खुद घर में जिन्दा मुजरिम को, दामाद बनाकर पाले है,
और पकिस्तान उन्हें सजा दे, इसकी गुहार लगाता है||

भगत बनाकर माँ, बेटे को ,सरहद पर मरना सिखाती है,
और देश के नपुंसक नेता उन्हें, बेमौत मरवाता है||

वो दस आकर एक सौ पिचहत्तर, सरेआम भून देते हैं,
हमारा क़ानून एक को मारने, सबूतों की दुहाई लगाता है||

पडौसी ने हमे समझा अभी तक, हिजड़ा ही दोस्तों,
जब जी में आता है, हमारे घर आ, हमे वो मार जाता है||

भारतीयनेता अमेरिका के सामने, अपनी नामर्दी की दहाड़ लगाते है,
हवा करती है सरगोशी, बदन ये काँप जाता है||


हवा करती है सरगोशी, बदन तब काँप जाता है ||
भारतीय होने पर सर, शर्म से जमी में गड जाता है||

27.11.10

''अपनी माटी'' वेब मंच:-नवम्बर अंक


नमस्कार ,पाठक साथियों
''अपनी माटी''
जैसा गैरराजनैतिक ,कलावादी,अनियतकालीन,अव्यावसायिक और धर्मनिरपेक्ष वेब मंच
इस नवम्बर माह से ही अपनी शुरूआत के दूजे साल में प्रविष्ट हो चुका है इस यात्रा में आपकी ओर से मिले स्नेह और योगदान को हम सदैव मानते हैं.ये यात्रा हम आगे भी आपके आसरे तय करना चाहेंगे.नवम्बर माह में प्रकाशित रचनाओं  के समेकित अंक में लिंक्स इस तरह रहे हैं.


अभी तलक इस मंच से बहुत ज्ञानवान रचनाकार और संस्कृतिकर्मी जुड़े हैं आपका भी स्वागात है,कला,साहित्य,रंगकर्म,सिनेमा,समाज,संगीत,पर्यावरण से जुड़े लेख,बातचीत,समाचार,फोटो,रचनाएँ,रपट हेतु इस साझा मंच पर प्रेषित कर सकते हैं,हम अपने पाठकों के हित प्रकाशित कर खुद को समाज से जुड़ा समझेंगे.
अभी तलक जुड़े रचनाकारों की सूची

सादर,

माणिक;संस्कृतिकर्मी
सम्पादक,अपनी माटी,
17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग,
चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001
Cell:-09460711896,
http://apnimaati.com

छात्र संघ की बहाली लोकतान्त्रिक अधिकार

छात्र संघ की बहाली लोकतान्त्रिक अधिकार

अरविन्द विद्रोही
भारतीय राजनीति आज समाजसेवा का माध्यम न रहकर सत्ता प्राप्ति और सुनियोजित तरीके से जनता की मेहनत की कमाई को लूटने का जरिया बन गई है।लोकसभा चुनावों में,विधानसभा चुनावों में,पंचायती चुनावों में प्रत्याशियों के द्वारा चुनाव में विजयी होने के लिए अपनाये जाने वाले अनैतिक एवं असंवैधानिक कृत्यों को सभी जानते भी हैं और स्वीकारते भी हैं।समस्त राजनैतिक दल पूरे जोशो-खरोश से युवा वर्ग को आकर्षित करने के लिए नाना प्रकार के लोक-लुभावन वायदे करते नजर आते हैं।अधेड़ हो चुके अपने अनुभव हीन पुत्रों को तमाम राजनेता युवा नेता के रूप् में प्रस्तुत करके किसी साज-सज्जा की,उपभोग की वस्तु की तरह प्रचारित-प्रसारित करने में करोड़ों रूपया खर्च कर चुके हैं।आज 18वर्ष की उम्र का कोई भी युवा अपना मत चुनावों में अपना जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने में दे सकता है।
लोकतंत्र का दुर्भाग्य कहें या वंशानुगत राजनीति का प्रभाव कहें कि भारत में प्रधान से लेकर सांसद तक के निर्वाचन में अपना मत देने वाला युवा वर्ग अपने शिक्षण संस्थान में अपना छात्र-संघ का प्रतिनिधि नहीं निर्वाचित कर सकता है।कारण है छात्र संघों का निर्वाचन बन्द होना।छात्र राजनीति लोकतांत्रिक राजनीति की प्रयोगात्मक,शिक्षात्मक व प्राथमिक पाठशाला होती है और इस राजनीति पर प्रतिबन्ध लगाकर अपने क्षमता के बूते छात्र-छात्राओं के हितों के लिए संघर्ष करके राजनीति में आये गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि के होनहारों को राजनीति में अपना स्थान बनाने से रोकने के लिए यह दुष्चक्र रचा गया है।यह दुष्चक्र युवा वर्ग ही तोडेगा,इसमें तनिक भी सन्देह की गुंजाइश नही है।क्या सिर्फ इस दौरान आम युवा वर्ग को राजनीति में आने से रोकने का दुष्चक्र रचा गया है?नहीं.....छात्र-संघ पर प्रतिबन्ध लगाना,युवा वर्ग राजनीति में प्रवेश न करे इसका प्रयास पूर्व में भी किया गया है।लेकिन घ्यान रखना चाहिए कि भारत ही नहीं समूचे विश्व के इतिहास में जब भी तरूणाई ने अव्यवस्था के खिलाफ अंगड़ाई मात्र ही ली तो परिणामस्वरूप बड़ी-बड़ी सल्तनतें धूल चाटने लगी।क्रांति व युद्ध का सेहरा सदैव नौजवानों के ही माथे रहा है।छात्र-संघ बहाली की लड़ाई ने अब जोर पकड़ना प्रारम्भ कर दिया है।केन्द्र सरकार की सर्वेसर्वा सोनिया गॉंधी को इलाहाबाद यात्रा के दौरान छात्रों विशेषकर समाजवादी पार्टी के युवाओं ने भ्रष्टाचार-महॅंगाई आदि मुद्दों पर अपने विरोध प्रदर्शन से लोहिया के अन्याय के खिलाफ संघर्ष के सिद्धान्त को कर्म में उतार कर खुद को साबित किया है।अब छात्र-छात्राओं,युवा वर्ग को अपने जनतांत्रिक अधिकार की लड़ाई लड़कर अधिकार हासिल करके खामोश नहीं बैठना है वरन् सतत् संघर्ष का रास्ता अख्तियार करके वंशानुगत राजनीति की यह जो विष बेल बड़ी तेजी से भारतीय लोकतंत्र में फैल रही है,इसकी जड़ में मठ्ठा डालने का काम भी करना है।छात्र-संघों का चुनाव न कराना एक बड़ा ही सुनियोजित षड़यंत्र है-आम जन के युवाओं को राजनीति में संघर्ष के रास्ते से आने की।
इसी प्रकार से जंग-ए-आजादी के दौरान तमाम् नेता विद्यार्थियों को राजनीति में,क्रंाति के कामों में हिस्सा न लेने की सलाहें देते थे,जिसके जवाब में क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिेह ने किरती के जुलाई,1928 के अंक में सम्पादकीय विचार में एक लेख लिखा था।इस लेख में भगत सिंह ने लिखा था,-‘‘दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है?महात्मा गॉंधी,जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति,पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ?क्या वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं?सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं?कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज?फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ।क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए?हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करने वाले वफादार नहीं,बल्कि गद्दार हैं,इन्सान नहीं,पशु हैं,पेट के गुलाम हैं।तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।‘‘
आज भगत सिंह के इस लेख के 82 वर्ष एवं भारत की ब्रितानिया दासता से मुक्ति के 63वर्ष बाद भी युवा वर्ग को मानसिक गुलामी का पाठ पढ़ाने का,वंशानुगत राजनैतिक चाकरी करवाने का दुष्चक्र रचा गया है।छात्र-संघ को बहाल न करना तथा अपने दल में छात्र व युवा संगठन रखना राजनैतिक दास बनाने के समान नहीं तो ओर क्या है?क्रंातिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिंह ने अपने इसी लेख में आगे लिखा,-‘‘सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत है,जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्यौछावर कर दें।लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे?क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फॅंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे?यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फॅंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो।‘‘
आज आजाद भारत में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हरण किया जा रहा है।सत्ताधारी दलों की निरंकुशता का चाबुक छात्र हितों व छात्र राजनीति पर बारम्बार प्रहार करके राजनीति के प्राथमिक स्तर को नष्ट करने पर आमादा है।इन छात्र-युवा जन विरोधी सरकारों को छात्र-संघ बहाली का ज्ञापन देना,इनसे अपने अधिकारों की बहाली की मांग करना अन्धे के आगे रोना,अपना दीदा खेाना के समान है।सन् 1960-62 में डा0राम मनोहर लोहिया ने नारा दिया था-देश गरमाओं।जिसका अर्थ है,-‘‘आदमी को अन्याय और अत्याचार पूर्ण रूतबे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार करना।दरअसल अन्याय का विरोघ करने की अीदत बन जानी चाहिए।आज ऐसा नहीं है।आदमी लम्बे अर्से तक गद्दी की गुलामी और बहुत थोडें अर्से के लिए उससे नाराजगी के बीच एक अन्तर करता रहता है।‘‘वर्तमान समय में छात्र संघ की बहाली व छात्र हितों की आवाज उठाने वाले लोगों को शासन-सत्ता व भाड़े के गुलामों के दम पर कुचलने का प्रयास किया जा रहा है।छात्र संघ बहाली के लिए आंदोलित सभी छात्र-युवा संगठनों को एक साथ आकर अनवरत् सत्याग्रह व हर सम्भव संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना चाहिए।
आज मुझे प्रज्ञा आंटी
के निधन का समाचार विनय ने दिया । मी अवाक् रह गया सुन कर। कुछ माह पहले शशांक दा गए और अब प्रज्ञा आंटी भी। मै थोडा डरते डरते ही उनके बघीरा वाले अपार्टमेन्ट मी दाखिल हुआ था। परवहां बीजो दा से , उनके छोटे बेटे से मुलाकात हुई और मेरा मुखर्जी आंटी के घर जाना सार्थक हो गया। मै अभी बहुत भरा हूँ। दादा- प्रज्ञा आंटी के हसमुख चेरे मुजे दिख रहे है। मै कभी इन दोनों रंगमंच की बहतरीन शख्सियतो पर ज़रूर लिखूंगा और तब उन नाकारा कला समीक्षकों की भी खबर लूँगा जिन्हें इन दोनों के बारे मी कलम चलाना फालतू लगा होगा। तभी तो प्रज्ञा आंटी के funeral पर एक श्री सतीश मेहता जी को छोड़ कोई नहीं जा सका। अभी एक खबर दे दो की फलां फिल्म director ने अमुक होटल मी बुलाया है तो सब के सब जमा हो जायेंगे। सा...