अन्ना हजारे और बाबा रामदेव एक काम बेहतर तरीके से कर सकते थे | करना चाहिए था , और है | लेकिन शायद ऐसा वे चाहते ही नहीं थे , इसकी नीयत ही नहीं थी या उतना नैतिक साहस नहीं था | जब कि ये उलटे सरकार की नीयत पर प्रश्न चिन्ह उठा रहे हैं | जिस प्रकार जय प्रकाश नारायण ने डाकुओं से आत्म समर्पण कराया था , ये अपनी संतई के बल पर जंतर मंतर या राम लीला मैदान में भ्रष्टाचारियों से भविष्य में कोई भ्रष्टाचार न करने का संकल्प दिला सकते थे | यह कार्य उनके स्तर [stature] के सर्वथा अनुकूल होता और सरकार एवं राष्ट्र उन्हें भरपूर सम्मान देता , यद्यपि यह भी अंततः एक नाटक ,एक पाखण्ड ही साबित होता | लेकिन इससे संतों की नीयत और उनकी देश भक्ति का खुलासा तो होता | ऐसा नहीं हुआ ,क्योंकि ऐसा होना ही नहीं था | ##
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