30.6.13

संवेदनाएं मर सी गयी हैं । जब आपको जीने के लिए जगह नहीं मिलती तो आप मर जाते हैं । अपने लिए स्थान पाने की जद्दोजहद में । भूखे प्यासे भी । जिनसे आपको भूख प्यास मिटाने की उम्मीद होती है वे जब मुकर जाते हैं तब ऐसा ही होता है । मेरे दिल में जहां कभी संवेदनाओं के लिए जगह थी वहाँ अब लाशों के ढेर हैं । संवेदनाएं अपने लिए जगह ढूंढ रही हैं लेकिन जगह है नहीं । ईश्वर  के द्वार पर भी नहीं । उस ऊँचे आकाश में भी नहीं जहां कभी निर्गंध हवा बहा करती थी वहाँ अब लाशों की गंध है । दूर उड़ते विमान उन गंधों से परेशां होकर तेजी से कहीं और चले जाते हैं । संवेदनाये जिन्दा थी जब मुझे कहीं कोई पीड़ित दीखता था ।  ढाढ़स बंधाता था मै  भी । अब शब्द कोष की कमी है । किस किस को ढाढ़स  बंधाऊं । उस माँ को जिसका लाल पूछकर गया था कि  शाम को लौटते वक़्त आज सब्जी में क्या क्या लाना है ? उस बहिन को जिसने अपने लिए दुपट्टा मंगाया था लाल रंग का । उस भाई को जो कई दिन से विडियो गेम का इन्तजार कर रहा था । उस पिता को जिसके जूते अब उसके बेटे के पाँव में आने लगे थे । उस पुत्र  को जो अपने पिता से जिद करता था कि  वह भी साथ जाएगा । मै  किस किस को ढाढस बंधाऊं ? वह पत्नी जो रोज राह देखा करती थी कि  कब वो आयेंगे जिन्होंने हाल ही में घर की जिम्मेदारी उठाई है । वह बच्चे जो रोज अपने पिता को आते देख कर कुछ पाने की लालसा में बाबा बाबा कह कर उनके आस पास मंडराने लगते थे । घर की उस मालकिन को जो पति से रोज पूछा करती कि  आज खाना क्या बनाना है ? या फिर उन सबको पूछूं जो ईश्वर  के दर्शन करने इस लालसा से आये थे कि  उनका यह लोक और परलोक अब सुधर जाएगा । शिव कल्याण करेंगे । वे शिव हैं । ईश  हैं । पशुपति भी हैं । शूली भी हैं । महेश्वर हैं । सर्व हैं । शंकर भी हैं । चंद्रशेखर हैं । उग्र हैं तो भोले भी हैं । लेकिन जो शिवदर्शन को आये थे शव में बदल गए , ईश  का आशीष लेने आये थे असमर्थ हो गए , जो पशुपति की शरण मे आये थे उन्होंने देखा , उस आपदा में मानुष क्या पशु भी बहते चले जा रहे थे , जो शूली से अपने जीवन के शूल दूर करने आये थे ऐसे शूल अपने दिल में लिए गए हैं कि  कसम खाए बैठे हैं कि  दोबारा चारों धाम नहीं आयेंगे । वे महेश्वर के पास आये और अपना ऐश्वर्य खो बैठे , जो सर्व दर्शन को आये अपना सर्वस्व खो कर शव में बदल गए । अपने जीवन में शम अर्थात कल्याण की कामना के साथ आये थे वे अशम  यानि  अकल्याण भोग गए , जो  उग्र को भोले समझ कर आये थे वे उनकी उग्रता को देखकर घबराए से अपने घर में बैठे हैं । उस भागीरथी के प्रवाह ने उन सबको अपने साथ बहा लिया जो कभी स्वयं भोले की जटाओं में उलझ गयी थी और उनसे अनुनय के बाद ही मुक्त हुयी थी । उस मंदाकिनी ने उन्हें अपने आगोश में लिए जो कभी कल कल करती बहा करती और अपने सुमधुर स्वर से अपने तट पर बैठे हुओं  के कानो में मिश्री घोल दिया करती थी । किसी ने उसके उग्र रूप की कामना क्या कल्पना भी नहीं की थी ।
बहुत से मर गए उस भूख प्यास से जो उन्होंने कभी नहीं झेली थी और उनके शरीर अनंत आकाश में उड़ते चील कौओं  का भोजन बन गए हैं । इस प्राकृतिक हिंसा ने बहुतों को जैनियों की श्रेणी में ला खडा किया है जो मरने के बाद अपने शरीर को पशुओं और पक्षिओं को दे दिए जाने की आशा के साथ अपना शरीर छोड़ते हैं । क्या आस्था हिल गयी है ? नहीं , आस्था नहीं हिली । उनके कुछ लोग फिर से अमरनाथ की यात्रा पर निकले हैं । वे अमरनाथ की यात्रा पर हैं । अमर नाथ । वही जोश । वही उमंग और वही उत्साह । उन्होंने तो लिख भी दिया है अपने बैनर में - अमरनाथ की यात्रा - २८ जून से प्रभु इच्छा तक । सही तो है प्रभु इच्छा तक।
खैर  , अब मै क्या करूं  । ऐसे ही बैठा रहूँ या उनकी चिंता करूं  जो मर गए उस संवेदन हीन सिस्टम के कारण जो कहीं भी तब पहुँचता है जब सब कुछ ख़त्म हो जाता है । या संवेदना व्यक्त करूं  उन नेताओं के प्रति जो सिर्फ इसलिए लड़ रहे थे कि  वे अपने लोगों को ले जायेंगे । लेकिन उन नेताओं के प्रति कैसे संवेदनाएं व्यक्त करूं  जिनकी वजह से मेरी संवेदनाएं ख़त्म हो रही है , दम तोड़ रही हैं ।
मैं तो उनके प्रति संवेदनाएं व्यक्त कर सकता हूँ जो चले गए , संवेदना के शब्द तो नहीं हैं मेरे पास , लेकिन खोजूं तो मिल जायेंगे । क्योकि शब्द ब्रह्म होता है और नित्य भी होता है उसी आत्मा की तरह जो उन तमाम शवों को छोड़कर निकल गयी है जो इस वक़्त राम के उस बाड़ा में बिखरे दबे पड़े हैं या पेड़ों पर शरण लिए पड़े हैं । मैं जिस राम के बाड़ा को राम की बाड़ समझता था वह अब टूट गयी है और मरघट में तब्दील है ।  शायद वे सभी उस श्वेत द्वीप नगर में चले गए हों जिसका जिक्र महाभारत का शांतिपर्व करता है । जो प्रकाश पुरुषों का स्थान है । मेरी संवेदनाएं हैं सब के प्रति - आत्मा एक है शरीर भिन्न - उस एक आत्मा की शान्ति के लिए -
न जायते म्रियते व कदाचित
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोयं  पुरानो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

नेता वचन

नेता वचन 

चुन लिया हमको नेता तो हश्र उसका पाईये
बच गये कयामत से कैसे उत्तर देते जाईये 

बच गया हिमालय ! इसे करिश्मा ही मानिए  
हिमगिरी के वस्त्र हरण में कसर रही ये जानिए  

खुदा से भी बड़ा अब तो हमको हुजुर मानिए  
पर्यटन के भ्रष्ट पाश में सबको तडफता पाइये

नेताओं के कुकर्मों से शिवशंकर गच्चा खा गए!
भस्मासुर नहीं भस्म हुआ भोले जी भी मान गए
  
महा मौत के खप्पर से भी लोग जिन्दा बच गए?
इसे हमारी नीतियों का नाकारापन ही जानिए 

जो बच गये आबाद सलामत उन्हें आगे डुबो देंगे
नही होता है विश्वास तो इतिहास पलटते जाइए  

राहत-बचाव के नाम का इश्तहार चिपकायेंगे 
तेरे आँसुओं की बाढ़ में तुम सबको ही डुबोयेंगे   

     
मित्रों !  आज के सन्दर्भ में राजनीति है क्या ? यह वास्तव में हमारा नजरिया ही है जो किसी चीज को कभी राजनैतिक तो कभी सामाजिक या समाज सेवी दृष्टिकोण से ओतप्रोत कर देता है । मोदी उत्तराखंड आये । उन्हें कहा गया कि  आप पैदल नहीं जा सकते । वे कुछ गुजरातियों को लेकर लौट गए । उन्होंने कहा कि गुजरात सरकार केदारनाथ को संवार देगी , तैयार कर देगी । यह एक प्रस्ताव था । बहुगुणा जी ने मना कर दिया । कोई बात नहीं । लेकिन कहा गया कि  मोदी राजनीति कर रहे हैं । सोचिये , यदि कोई कांग्रेसी मुख्यमंत्री केदार नाथ को संवारने की बात कहते और यदि बहुगुणा हाँ या न करते तो भी क्या राजनीति होती । हरियाणा के सी एम् ने भी दस गाँव गोद लेने की बात कही तो राजनीति नहीं हुई । मोदी ने कह दिया तो राजनीति हो गयी और हुड्डा ने कहा तो समाज सेवा ।
मोदी गुजरातियों को ले गए जिनके प्रति वे वहाँ के मुख्यमंत्री होने के नाते उत्तरदायी हैं तो राजनीति हो गयी । और आंध्र प्रदेश के नेता एयर पोर्ट पर आन्ध्र प्रदेश के आपदा पीड़ितों को लेने के लिए लड़ते नजर आये तो समाज सेवा हो गयी  । उनसे किसी ने नहीं पूछा कि  भाई बाकियों को क्यों नहीं ले जा रहे हो । सिर्फ आन्ध्र वासियों को ही क्यों ? मोदी आजकल ऐसे टारगेट हो गए हैं कि  सब मिलकर मोदी से घबराए हैं और कोई मौका नहीं चूकते ।
मोदी को पैदल जाने की इजाजत नहीं , राहुल के लिए रास्ता साफ़ , क्यों ? यह राजनीति क्यों नहीं है ? अपने  अमूल बॉय को आप जाने देते हैं ताकि चुनाव में फायदा उठाया जा सके । क्या जनता वास्तव में इतनी ही बेवकूफ होती है जितना नेता इन्हें समझते हैं ? हैरानी होती है । लेकिन एक बात तो तय हैकि  राहुल को वहाँ लोगों ने जो खरी खोटी सुनाई है वह राहुल याद तो जरूर रखेंगे और अपने मातहत कांग्रेसियों को समझा कर रखेंगे कि  आगे से ऐसा न हो ।
खैर , कुल मिलाकर कई बार राजनीति हमारी दृष्टि में होती है , वस्तु स्थिति में नहीं । अगर वास्तव में हमारा दृष्टिकोण बात बात में राजनीति न ढूँढता तो आज लोग वहाँ आपदा में भूखे प्यासे न मरते । क्योंकि यह राजनीति ही तो हमारी लाल फीताशाही को भी बर्बाद कर रही है ।
मित्रों ! किसी के बढ़ते कद का खौफ क्या होता है यह आप आजकल स्पष्ट महसूस कर सकते हैं । साथ ही सरकारें कितने खौफनाक इरादे रखती हैं और किसी को भी नष्ट करने की योजना किस तरह बनाती हैं इसकी बानगी भी हम देख सकते हैं । जिस तरह से नरेन्द्र मोदी ने गुजरात  में कांग्रेस को चित्त कर रखा है और निरंतर तीन चुनावों में हराया है और यह तब है जब इस व्यक्ति ने वी एच पी , आर एस एस तक की परवाह नहीं की और यहाँ तक कि  विगत गुजरात चुनावों में एक वर्ग विशेष के लोगों को चुनावों में टिकट तक नहीं दिया और फिर भी चुनाव भी जीते । यहाँ मई एक वर्ग विशेष के लोगों को टिकट न दिए जाने का पक्षधर नहीं हूँ लेकिन मुझे हैरानी इस बात पर भी है कि  इसके बाद भी इस वर्ग विशेष के लोगों का २0  प्रतिशत वोट मोदी के ही हक में गया । क्या इसे वाकई इस व्यक्ति की लोकप्रियता कहा जाय । मै  तो कहूँगा , अब रही बात इशरत जहां एनकाउंटर की , यह केश 20 0 ४ का है , आखिर ऐसा क्या है कि  ठीक चुनाव से पहले सरकार को इस केश को खोलने की जरूरत पद गयी । क्या सरकार को इशरत जहां को न्याय दिलाने की याद सिर्फ चुनाव के वक़्त आती है ? इतने सालों से सरकार सोई हुई थी । क्या सरकार को सिर्फ चुनाव के समय लगता है कि  इशरत जहां को न्याय दिलवाया जाय ? सरकार जिस तरह से काम कर रही है उससे सिर्फ एक शब्द ध्यान आता है कि  सामान्य भाषा में इसे ब्लैकमेलिंग कहा जाता है । समाजवादी पार्टी हो या बसपा , ये सभी सरकार की इस ब्लैकमेलिंग प्रक्रिया को बखूबी समझते हैं और इससे घबराते हुए सरकार के समर्थन में यह कह कह कर आगे आते हैं कि  नहीं तो साम्प्रदायिक शक्तियां आगे आ जायेंगी । यदि सरकार को इशरत जहां को न्याय दिलाना होता तो अब तक न्याय दिला भी   दिया गया होता चाहे इशरत आतंकवादी साबित होती या निर्दोष , लेकिन सरकार की मंशा ऐसे मुद्दों से किसी को न्याय दिलाने की नहीं दिखती बल्कि उसे डराने धमकाने में ही सरकार इन चीजों का लम्बे समय से इस्तेमाल कर रही है । डी  एम् के ने जैसे ही आँख दिखाई थी वैसे ही अगले दिन डी  एम् के के यहाँ सी बी आई का छापा पड़  गया था । इसलिए सरकार निश्चित तौर पर घबराई है और चाहती है कि  चार्जशीट में मोदी का और अमित शाह का नाम डालकर इन्हें फंसाया जाय ताकि चुनाव की नैया पार  लग सके। अमित शाह को बेहतर चुनावी मैनेजमेंट के लिए जाना जाता है और मोदी को बेहतर प्रशासन के लिए । जयराम रमेश तक पिछले दिनों मोदी की प्रशंसा कर चुके हैं और इसी प्रशंसा से चिढ़कर सत्यव्रत चतुर्वेदी ने यह तक कह दिया था कि  जयराम रमेश को भाजपा ज्वाइन कर लेनी चाहिए । अब यह कांग्रेस की परेशानी है कि  उसके ही मंत्री कई बार मोदी की प्रशंसा कर चुके हैं । अब यह तय है कि  कांग्रेस को लगता है कि  यदि मोदी सत्तासीन हो गए तो हो सकता है कि  कांग्रेस के लिए वर्षों तक सत्ता में लौटना ही कही मुश्किल न हो जाए । मोदी का काम आसान हो जाता यदि बी जे पी के बुजुर्ग और मोदी विरोधी लोग मोदी की राह का काँटा नहीं बनते । मोदी के लिए बाहरी चुनौतियां ही नहीं हैं बल्कि अन्दर भी ऐसे शत्रु खड़े हैं जिनकी आँख में मोदी कांटे की तरह चुभते हैं । देखते हैं , मोदी से कांग्रेस और मोदी विरोधी कैसे निपटते हैं और मोदी कैसे इनसे निपटते हैं । तब तक नमो नमः । रही बात मोदी के मुख्यमंत्री से हटने की , तो यदि नमो नमः सफल रहा तो मोदी स्वयं ही २ 0 १ ४ में यह कुर्सी छोड़ देंगे , कांग्रेस के लिए नहीं , अपने उत्तराधिकारी के लिए ।

मित्रो ! सरकार राम बाड़ा का सच छिपा रही है और यह बेहद जरूरी है कि  लापरवाह सरकारों का सच हर हाल में सामने आना चाहिए । यह शर्म का विषय है कि  जो स्थानीय लोग हैं उनकी संख्या क्या है इसका आकलन न होने देने के लिए सरकार मीडिया तक को वहां न जाने देने की कोशिश कर रही है । सेना के मुताबिक़ राम बाड़ा में ही हज़ारों शव बिखरे पड़े हैं और यह देख कर सेना का दिल भी असहज हो गया है । और ये वे शव उन लोगों के हैं जो बाहरी तौर पर दिख रहे हैं । मलबे के अन्दर जो लोग दबे हैं वे कितने हैं इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है । कितने बह गए , कौन जानता है । कितने ऐसे भी रहे होंगे जिनका पूरा का पूरा परिवार बह गया होगा और उनके बारे में किसी ने पूछा भी नहीं होगा । सरकार अपनी विफलता कैसे छिपाती है , इसका एक ताजा तरीन उदाहरण यह प्रकरण है । इतने दिन बाद भी सरकार राहत सामग्री स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंचा पा रही है और ये ट्रक वापस जा रहे हैं । यहाँ तक कि  राहुल महोदय ने जो ट्रक रवाना  किये थे वे तक वापस जा रहे हैं क्योंकि उन्हें डीजल तक के पैसे नहीं दिए गए । वे सामान बेच रहे हैं और उससे पैसा इकट्ठा करके वापस जा रहे हैं । यह उत्तराखंड सरकार का हाल है । इश्वर सरकार को सद्बुद्धि दे जिससे वह लोगों की सही मायने मे मदद कर सके ।

स्वार्थ बुद्धि -श्रीमद भगवत गीता

स्वार्थ बुद्धि -श्रीमद भगवत गीता 

यह सँसार दौ मुख्य कारणों के इर्द गिर्द चल रहा है पहला मोह और दूसरा स्वार्थ।पशु में इन
दोनों चीजो का अभाव होता है मगर मनुष्य में ये होती ही हैं ,इनके अभाव हो जाने से शायद
सृष्टि का विकास भी खत्म हो सकता है।प्रश्न यह उठता है कि फिर श्री कृष्ण ने मोह और
स्वार्थ दोनों से दूर रहने को ही सही क्यों माना और अपने उपदेश में दूर रहने को ही सही
क्यों बताया ?

इस प्रश्न से पहले हमें इन दोनों शब्दों के अर्थ समझ लेने चाहिए ताकि हम इस प्रश्न के हल
की ओर बढ़ सके।

मोह -किसी वस्तु ,पदार्थ या जीव में आसक्ति और मेरापन 

स्वार्थ -स्वयं की प्रसन्नता के लिए किये जाने वाले कामना युक्त कर्म ,ऐसे कर्मो के अन्दर 
          अन्य लोगों का अहित छुपा रहता है 

इन दोनों से बिलकुल अलग है प्रेम  और परमार्थ।प्रेम में मेरापन नहीं होता ह्मारापन होता
है और परमार्थ में शुभ कर्म ही निहित होते हैं।प्रेम में देने का भाव होता है प्रतिफल की इच्छा
नहीं होती।प्रेम में त्याग की भावना होती है प्रेमी से सुख पाने की लालसा नहीं होती।परमार्थ
में काम करने से पहले यह सोचना होता है की उस कर्म के करने से किसी का अहित तो नहीं
होगा।परमार्थ में कर्म के प्रभाव को पहले ध्यान में लिया जाता है और उसके बाद खुद के हित
को देखा जाता है।  

              अब हम मूल विषय पर आते हैं कि शुभ कर्म क्या है और स्वार्थ क्या है।शुभ कर्म
में अच्छे साहित्य का अध्ययन,शुभ कर्म से अर्जित सम्पति से दान,इंद्रियों में संयम यानि
तप,शरीर से लोकोपयोगी काम करना।स्वार्थ बुद्धि में भी कर्म करना पड़ता है परन्तु अन्य
के हित का ध्यान नहीं रखा जाता, शुभ -अशुभ सभी कर्मो से सम्पति का अर्जन करना और
स्वयं के सुख के लिए भी कंजूसी से खर्च करना दान तो बहुत दूर की बात है, इन्द्रियों का
दुरूपयोग करना हरेक इंद्री में असंयम,और शरीर से स्व हित के कर्म करना।

                 भगवान् गीता में मोह से परे हटकर विवेक का उपयोग करते हुए कर्म को पूरा
करने का उपदेश देते हैं।एक पिता को अपना पुत्र बहुत प्यार होता है,पुत्र पर स्नेह होने के
कारण पिता अपने पुत्र के ना करने योग्य काम पर टोकता नहीं है ,पुत्र को उचित दंड नहीं
देता है तो क्या वह अपने पुत्र का भला कर रहा होता है ?पुत्र चोरी करता है ,झूठ बोलता है
शराब पीता है ,जुआ खेलता है और पिता मोह के वशीभूत पुत्र के कुकर्मो पर आँख पर पट्टी
बाँध लेता है तो क्या वह अपने पुत्र का प्रेमी या हितेषी कहलाता है ?पैसे कमाने के लोभ में
संतान अपराध करता है,अराजकता के काम करता है,दुराचार करता है और माँ -बाप मोह
के कारण सब कुछ सह लेते हैं मगर क्या इसमें संतान का भला होता है ?अगर बाप जज हो
और बेटे ने किसी अबला के साथ दुराचार किया हो और उसका फैसला उसी बाप की कलम
से होना हो और वह बाप अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके पुत्र के पक्ष में फैसला दे देता
है तो क्या वह पुत्र का भला कर रहा होता है।मोह से विवेक मंद पड़ जाता है विवेक के नष्ट
होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और कुबुद्धि से लिया गया निर्णय पतन का हेतु बन जाता है।

           स्वार्थ का त्याग का मतलब यह नहीं कि हम जो भी अर्जित करे उसे दुसरो पर लुटा
दे या खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का हित साधते रहे।श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध में खड़े हो
जाने की बात कही है यह नहीं कहा कि इस नर संहार से अच्छा है साधू बन जाना।हम जो
भी कर्म करे उनको करने से पहले इतना विचार जरुर कर लेना चाहिए कि मेरे द्वारा किये
जा रहे काम से किसी कमजोर का अहित तो नहीं होगा ना।मेरे काम से मुझे तो शुभ फल
प्राप्त हो मगर उसका प्रभाव दुसरो पर हितकारी रहे ,अन्यों को भी लाभ हो।भगवान् राम
यदि राज्य के लोभ में पड़कर पिता दशरथ को बंदी बना लेते और शासन खुद संभाल लेते
तो क्या वह आज हमारे पूजनीय होते ?जब भरत उनके पास जाकर राज्य संभालने की
जिद करते हैं और श्री राम उनकी बात को मानकर वनवास त्याग राज्य की धुरा खुद के
हाथ में ले लेते तो क्या आज हम उनको पूजते ?

               जब भी हम कर्म करते हैं तब दुसरो के सुख को भी ध्यान में रख लेते है तो वह
काम लक्ष्य तक पहुँच जाता है और उस काम को पूरा करने में सहयोग भी सभी से स्वत:
ही मिल जाता है।जिस कर्म को करने में दुसरो के हित का ध्यान रखा गया तो निश्चित
जानिये उस काम के परिणाम में उस काम को करने वाले का भला होता ही है क्योंकि सूत्र
यह कहता है कि अच्छे काम का परिणाम कभी भी खुद के लिए बुरा हो नहीं सकता।कर
भला तो हो भला                 


28.6.13

कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता

कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता 

श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण कहते हैं की कर्म की आसक्ति से,सफलता या असफलता के
भाव से परे हटकर कार्य किया जाए तो समता भाव आता है।किसी कार्य को करने से पहले
यदि हम उसे कर्तव्य निर्वाह मान कर शुरू करे और जब तक वह कार्य सम्पूर्ण नहीं हो जाता
तब तक सफलता या असफलता के भाव से दूर रहकर करे तो उसे कार्य कुशलता कहा जाता
है ,क्योंकि हमारा मस्तिष्क इस तरीके से काम करने पर बंधन में नहीं रहता है ,कोई बोझ
यदि मन पर नहीं है तो वह कार्य पूर्ण होने पर यज्ञ बन जाता है।यदि किसी परिणाम से बंध
कर हम काम शुरू करते हैं तब हमारी कार्य क्षमता कम हो जाती है ,खुद पर श्रद्धा कम हो जाती
है।परिणाम से बंध कर कार्य करने पर हम शंका में फँस जाते हैं और नकारात्मक चिंतन करते
हैं,इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम लक्ष्य रहित या लापरवाही से काम को अंजाम दे।हमारे
कर्तव्य की योजना स्पष्ट,समयबद्ध और सुनियोजित होनी चाहिएलेकिन उसका परिणाम
उस योजना के पूरा हो जाने के बाद ही देखना चाहिए।

                          दौ अलग -अलग व्यक्ति एक ही प्रकार के काम को शुरू करते हैं उसमे एक
व्यक्ति सफल हो जाता है और दूसरा असफल,ऐसा क्यों होता है ? इसका कारण उस विषय के
प्रति पूर्ण जानकारी का भिन्न होना भी हो सकता है या उस काम को करने के ढंग में अंतर हो
सकता है।उस काम को करते समय एक व्यक्ति उसके परिणाम को अपनी इच्छा के अनुकूल
आने की चिंता के साथ करता है और दूसरा उस काम को कुशलता से पूरा करने के नजरिये से
करता है।काम को कुशलता पूर्वक करने के नजरिये से करने वाला सफल ही होता है और इसी
को भगवान् कर्म यज्ञ कहते हैं।

                           कर्म या तो शुभ होते हैं या अशुभ। शुभ कर्म ही कर्म यज्ञ कहलाते हैं।अब
प्रश्न यह उठता है कि शुभ कर्म से तात्पर्य क्या,किसे शुभ कर्म माने और किसे अशुभ।देश की
रक्षा के लिये किया गया शत्रु वध शुभ कर्म होता है जबकि स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी की
हत्या करना अशुभ कर्म हो जाता है।शुभ कर्म का आशय यह है कि ऐसे काम जिसके करने से
किसी निर्दोष का अहित नहीं हो और परिणाम भी सुन्दर हो।एक चोर ने एक महिला का हाथ
काट कर उसके हाथ में पहनी सोने की चूड़ी लूट ली और दुसरे दृश्य में एक सर्जन डॉक्टर ने
किसी मरीज की जान को बचाने के लिए उसकी दोनों टाँगे काट दी,अब हम किस कर्म को शुभ
और किसे अशुभ कहेंगे ?

                         सभी कर्म यदि शुभ भाव से ,सच्ची निष्ठां से किये जाते हैं तो वह यज्ञ है और
यज्ञ ही पूजा है।श्री कृष्ण कहते हैं-फल की इच्छा,आसक्ति,कामनाऔर कर्तव्य के अभिमान से
रहित होकर कर्म करने के लिए कर्म करे।प्राय: मनुष्य कर्म करने से पहले यह सोचता है कि
मेरा भला हो  या मेरा भला हो चाहे दुसरे का अहित हो जाए  या मेरा भला ना हो तो दुसरे का भी
भला ना हो या मेरा भला हो तथा दुसरे का भी हित हो या चाहे मेरा अहित हो जाए मगर दुसरे
का भला हो।सबसे अंतिम सोच लोक कल्याण की भावना है जिसके उदाहरण बहुत कम वर्तमान
में मिलते हैं क्योंकि ये लोक शिक्षा के कर्म है मगर भगवान् कहते हैं की तुम इस भाव से कर्म
नहीं करोगे तो भी मैं तुम्हारे कर्म को यज्ञ मान लूँगा यदि तुम निर्लिप्त भाव से उन्हें करो।

                   वर्तमान समय हो या गुजरा हुआ समय हो एक सूत्र श्री कृष्ण ने सफल व्यक्ति
बनने के लिए प्राणी मात्र को दिया है वह यह है कि कर्तव्याभिमान से सदैव बचे।यह एक सूत्र
है ,सूत्र सार्वभोमिक सत्य होते हैं हर काल में लागू होते हैं और उनका प्रभाव पड़ता है।

                     व्यक्ति छोटा सा भी शुभ काम करता है तो उसके मन में खुद पर अभिमान
आता हैऔर वह हर किसी के सामने उस शुभ कर्म को रखना चाहता है।व्यक्ति जिसके
सामने अपने शुभ कर्म को रखता है तो उसके मन में इच्छा जाग्रत होती है कि सामने वाला
उसकी प्रशंसा कर दे।इसी इच्छा से अभिमान की उत्पत्ति होती है और अभिमान ही पतन
का कारण बनता है।व्यक्ति शुभ आचरण करके प्रशंसा की इच्छा करे इसे कुछ समय के
लिए ठीक मान ले मगर उस व्यक्ति का क्या होगा जिसने खुद ने शुभ काम किया ही नहीं
था लेकिन वह यह चाहे कि लोक में उसकी प्रशंसा हो जाए भले ही वह काम किसी और ने
किया हो।प्राकृतिक आपदाओं के समय राजनेता जनता के द्वारा प्राप्त कर की राशि में
से आपदाग्रस्त को देने का दिखावा इस तरह से करते हैं कि जैसे उन्होंने खुद ने अपनी
कमाई से दी हो।
                            उच्च पदों पर आसीन नेता जब भी जनता के कर से प्राप्त राशि को लोक
हित में खर्च करने की योजना बनाते है तब सबसे पहले खुद की फोटो अखबार में विज्ञापन
के साथ जरुर देते हैं जैसे वो जनता का धन जरूरतमंद को देकर कोई उपकार कर रहे हों।

                     कर्तव्य के अभिमान का रोग उस भारत में बुरी तरह से फैल गया है जिससे
बचने के लिए ही श्री कृष्ण ने उपदेश किया था।आज अधिकाँश लोग यह चाहते हैं की उसकी
जगत में प्रशंसा हो चाहे उसने कर्म कैसा भी क्यों ना किया हो।आम व्यक्ति भी भगवान् के
मन्दिर पर जाता है और खुद के कल्याण की प्रार्थना करता है फिर खुद की संतुष्टि के लिए
कुछ चढ़ावा भेंट करता है और उसके बदले में बड़ी साड़ी लिस्ट भगवान को सौंप देता है तथा
मंदिर से बाहर आकर जगत में ढिंढोरा पीटता है कि उसने आज शुभ काम किया है ,दान दिया
है।
                कर्तव्य अभिमान और अधिकारों का दुरूपयोग यह बहुत बड़ी बिमारी है जिससे
भारत ही नहीं पूरा विश्व ग्रसित है।इस खोटी प्रशंसा से उबरने की जरूरत है और उबरने
का उपाय भी गीता में निहित है कि कर्म के फल में आसक्ति ना हो ,कर्म में कामना ना
हो ,कर्म कर्तव्य बुद्धि से पूर्ण हो उसमे अभिमान की लालसा ना हो           
                               

27.6.13

उत्तराखंड में संकट में लोक तंत्र लापता-ब्रज की दुनिया

मित्रों,16 जून की शाम ढलने तक दुनियाभर के हिन्दुओं के लिए सदियों से अतिपवित्र माना जानेवाला देवभूमि उत्तराखंड श्मशान में तब्दील हो चुका था। हर जगह,हर तरफ लाशें थीं,चीखें थीं,चीत्कारें थीं,नहीं थी तो केवल सरकार और सरकारी तंत्र। कहीं कोई राहत का इंतजाम नहीं,कहीं किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं। एक घोर चापलूस,दरबारी और अयोग्य मुख्यमंत्री से हम उम्मीद भी क्या करें और क्यों करें? अब तक केंद्र व राज्य की सरकारों ने हादसे के बाद बस इतना ही काम किया है कि वे लाशों को गिन रहें हैं मगर काफी कम करके। जहाँ मरनेवाले अभागे 20 हजार से कम नहीं हैं इन सरकारों की गिनती अभी हजार तक भी नहीं पहुँची है।
             मित्रों,हम सभी जानते हैं कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था सदियों से हिन्दू तीर्थयात्रियों के आगमन पर आधारित है और 16 जून को आए जल प्रलय में मरनेवाले और प्रभावित होनेवाले लगभग सारे लोग हिन्दू तीर्थयात्री ही हैं। कहाँ तो वे आए थे चारों धाम की यात्रा कर पुण्य कमाने और कहाँ तो वे या तो सुरधाम पहुँच गए या फिर उनको मरणांतक पीड़ा का सामना करना पड़ा और करना पड़ रहा है। सोलह जून की शाम को उन्होंने खुद को 15-20 फीट ऊँची वो भी कंकड़-पत्थरयुक्त अतिशीतल पानी की तेज धारा के मध्य में पाया। उनमें से कुछ अभागे तो तत्काल मर गए और जो बच गए उनकी हालत तो और भी बुरी थी। उनको सरकारी अव्यवस्था और अराजकता के चलते न तो कुछ खाने को ही कुछ मिल रहा था और न तो पीने को ही। न तो दवा ही मिल रही थी डॉक्टर भला कहाँ से मिलते? नौ-दस दिनों तक वे लोग लगातार पानी उड़ेलते खुले आकाश के नीचे भींगते-सूखते भूखे-प्यासे पड़े रहे और पड़े हैं। न कहीं शासन का पता और न कहीं प्रशासन का ही,पूरा-का-पूरा तंत्र लापता। न जाने क्यों और किसलिए राज्य सरकार ने इतने भारी-भरकम तंत्र को पाल-पोस रखा है? क्या अब भी किसी को संदेह रह गया है कि भारतीय लोकतंत्र में खासकर कांग्रेसी लोकतंत्र में तंत्र की नजर में लोक का कोई स्थान रह भी गया है? यह सर्वविदित है कि इस प्राकृतिक त्रासदी में मरनेवाले लगभग सारे लोग हिन्दू हैं और कोई हिन्दू वोट बैंक तो होता है नहीं कि उनकी चिंता की जाए। हिन्दू अगर अब भी नहीं जागे तो परंपरागत,सदियों पुरानी चार धाम यात्रा तो भविष्य में थम ही जाएगी उनके जीने के भी लाले पड़ जाएंगे जैसे कि इस समय देवभूमि उत्तराखंड में पड़े हुए हैं।
                         मित्रों,यह सब तब हुआ है जबकि सीएजी ने दो महीने पहले ही अपनी रिपोर्ट में उत्तराखंड में आपदा-प्रबंधन के शून्य होने की चेतावनी दे दी थी। फिर किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की ऐसी स्थिति क्यों आई? क्यों राज्य और केन्द्र की सरकारों को कल-परसों यह कहना पड़ा था कि जिनको पीड़ितों तक राहत पहुँचानी है वे आप खुद जाकर पहुँचाएँ? आप ही बताईए कि ऐसा भी कहीं हुआ है कि सड़क मार्ग से कटे,अतिदुर्गम क्षेत्रों में जाकर देशभर के सहृदय और देशभक्त लोग खुद राहत पहुँचाएँ? फिर जब लोग आगे आने लगे तो अब वही केंद्र व राज्य सरकारें ऐसा क्यों कह रही हैं कि राहत-कार्य सिर्फ हमारे द्वारा ही चलाए जाएंगे?
                       मित्रों,क्या सीएजी की चेतावनी के बाद भी केंद्र और उत्तराखंड की सरकारों का कान में तेल डालकर सोए रहना आपराधिक कृत्य नहीं है? क्या केंद्र और उत्तराखंड की सरकारों पर हजारों निरपराधों की हत्या का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? हमारे प्रधानमंत्री रोजाना सर्वोच्च न्यायालय को अपनी सीमा में रहने की चेतावनी देते रहते हैं फिर क्यों बिना सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उत्तराखंड में राहत और बचाव का काम शुरू नहीं किया गया? देश में क्या आवश्यकता है ऐसे लोकतंत्र की जिसमें जब लोक की जान पर बन आए तो तंत्र लापता हो जाए? क्या जरुरत है ऐसी सरकारों की जो गाढ़ी जरुरत के समय जनता की किसी भी तरह से मदद न कर पाए और जनता को पूरी तरह से रामभरोसे तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ दे?
                       मित्रों,पूरा देश आभारी है भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के उन जवानों का जिन्होंने रात-दिन एक करके और अपनी जान की बिल्कुल भी परवाह न करते हुए हजारों लाचारों की जान बचाई। कल की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में वायुसेना और अर्द्धसैनिक बलों के 19 जवानों को जान भी गवानी पड़ी है। हम उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और महापापी सरकार से अनुरोध करते हैं कि इन वास्तविक नायकों के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा दे,कम-से-कम राशि धौनी ब्रिगेड को कप जीतने पर मिलने वाली राशि से तो ज्यादा जरूर होनी चाहिए,प्रति जवान कम-से-कम एक करोड़ रूपया। दोस्तों,यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी भी कम-से-कम पाँच हजार लोग लगातार 11 दिनों से बरसात,मच्छर,कीड़े-मकोड़े और भूख-प्यास से लड़ते हुए अभी भी मदद का इंतजार कर रहे हैं। देश में किसी भी तरह की आपदा-योजना या आपदा-तंत्र का नहीं होना क्या यह नहीं दर्शाता है कि वर्तमान केंद्र-सरकार और उत्तराखंड की सरकार दोनों ही नाकारा हैं और किसी भी तरह की बाहरी और भीतरी चुनौती से निबटने में पूरी तरह से अक्षम हैं? क्या ऐसी सरकारें खुद अपने-आपमें ही आपदा नहीं होती हैं?
                              मित्रों,मुझे आपको यह सूचित करते हुए अपार क्रोध हो रहा है कि भारत को श्री सुशील कुमार शिंदे के बाद कई और नीरो के बाप मिल गए हैं। जिस प्रदेश में 10-11 दिनों से साक्षात महाकाल का तांडव चल रहा हो,लाशों को जलाने के लिए लकड़ियों के लाले पड़े हों उस राज्य का मुख्यमंत्री न जाने क्यों इसी सप्ताह स्विट्जरलैंड की यात्रा पर जा रहा है। उनको स्विस बैंक से कोई जमा-निकासी करनी है या कोई अन्य अपरिहार्य काम आ पड़ा है पता नहीं लेकिन वे जिस विषम परिस्थिति में विदेश जाने पर अड़े हुए हैं उसे देखकर तो कदाचित् किसी जल्लाद को भी शर्म आ जाए। जब उनका प्रेरणा-पुरूष युवराज ही दो-दो गृह राज्य मंत्रियों को साथ में लेकर ऐन घटना के दिन से एक सप्ताह तक पेरिस में रंगरलियाँ मना रहा हो तो बहुत सारे अज्ञात गुणों से युक्त बहुगुणा क्यों नहीं मनाएंगे? मरनेवाले या नरक की पीड़ा भोग रहे लोग कोई उनके सगे-संबंधी तो हैं नहीं। इसी बीच कृपालु युवराज 24 जून को देश में वापस आ गए हैं और लगातार बाढ़-पीड़ितों से मिल रहे हैं जबकि इससे पहले भारत-सरकार के गृह-मंत्री श्री शिंदे ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर ऐसा करने से रोक दिया था कि इससे राहत-कार्य में बाधा आएगी। देश की कुंडली में राहु की महादशा ला सकने की अपार क्षमता रखनेवाले राहुल गांधी किसी नियम के अंतर्गत तो आते हैं नहीं सो वे क्यों मंत्री की सलाह पर अमल करने जाएँ? कुछ अन्य केंद्रीय मंत्री तो ऐसे भी हैं जिन्होंने तो राहत में लगे हेलिकॉप्टरों को जबरन खाली करवा दिया और तब आपदा-प्रभावित क्षेत्रों का क्रूरतापूर्वक हवाई और जमीनी सर्वेक्षण किया। क्या पता फिर कब ऐसा सुनहरा मौका हाथ लगता?
                               मित्रों,इस बीच उत्तराखंड के प्रलय-क्षेत्र से कुछ इस तरह की सूचनाएँ या खबरें भी आ रही हैं जो उसके एक और नाम देवभूमि से बिल्कुल भी मेल नहीं खातीं। कई जगहों पर स्थानीय निवासी फँसे हुए तीर्थयात्रियों से खाद्य-सामग्री और पानी के मनमाने दाम वसूल रहे हैं। देवताओं यह देव-संस्कृतिवाली बात तो हुई नहीं। भारतीय वांङ्मय में अतिथियों को देवता का दर्जा दिया गया है फिर उनकी मजबूरियों से अनुचित लाभ उठाना तो दानवोंवाला कृत्य ही कहा जाएगा न? इतना ही नहीं कई जीवित-मृत महिलाओं के हाथ तक भी स्वर्णाभूषणों के लालच में काट लिए गए हैं,कई तीर्थयात्रियों को पहाड़ से नीचे फेंकने की धमकी देकर लूटा गया है और कई तीर्थयात्री महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया है। कुछ जगहों से जैसे गौरीकुंड से इस तरह की खबरें भी आ रही हैं कि वहाँ के ग्रामीणों ने अपना सारा राशन-पानी पीड़ित आगन्तुकों को खिला-पिला दिया है और खुद उपवास कर रहे हैं। ऐसे लोग निश्चित रूप से श्रद्धा और स्तुति के पात्र हैं।
                मित्रों,कहते हैं कि आपदायें मानवता का लिटमस टेस्ट होती हैं। इसी दौरान पता चलता है कि कौन मानव है और कौन दानव,कौन हितैषी है और कौन शत्रु। तभी तो रहीम कवि ने कहा था कि-रहिमन विपदा हूँ भलि जो थोड़े दिन होय।हित-अनहित या जगत में जानि पड़े सब कोय।। जल-प्रलय ने हिन्दुओं के समक्ष कांग्रेस के खौफनाक हिन्दू-विरोधी,मानवता-विरोधी और देश-विरोधी चेहरे को तो पूरी तरह से अनावृत कर ही दिया है वहाँ की स्थानीय जनता के देव-संस्कृति का हिस्सा होने के दावे को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। मैं हमेशा से तीर्थयात्रा को मूर्खता मानता रहा हूँ। भक्तराज रामकृष्ण परमहंस भी कहा करते थे कि जहाँ सज्जन लोग निवास करते हों वहीं तीर्थ है अन्यत्र नहीं। हिन्दुओं को अपना कर्म सुधारना चाहिए परलोक बिना तीर्थयात्रा किए ही सुधर जाएगा।
                   मित्रों,उत्तराखंड में न तो पहली बार बादल फटे हैं और न ही पहली बार भूस्खलन ही हुआ है। हाँ,इस बार जान-माल का नुकसान जरूर बहुत ज्यादा हुआ है। हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया और प्रकृति ने हमें बिना देरी किए उसका दंड भी दे दिया। हिमालय के साथ सबसे पहला खिलवाड़ तो अंग्रेजों ने पूरे क्षेत्र में अखरोट के बदले चीड़ का जंगल लगाकर किया था जिसकी जड़ों में मिट्टी को जकड़कर रखने की क्षमता कम होती है। फिर हमने औद्योगिकीकरण,सड़क-निर्माण और जल-विद्युत उत्पादन के नाम पर पूरे उत्तराखंड के पहाड़ों को वेध कर रख दिया,छलनी कर दिया। अभी-अभी 4-5 जून को मूर्खता के प्रकाश-स्तंभ,चापलूस-शिरोमणि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय पर राज्य में नई जल-विद्युत परियोजनाओं और नई सड़कों के निर्माण को बाधित करने का आरोप लगाते हुए देखा। सूत्र बताते हैं कि नई जल-विद्युत परियोजनाओं के लिए प्रति मेगावाट 1 करोड़ रूपया माननीय मुख्यमंत्री सुविधा-शुल्क के रूप में लेते हैं।
                       मित्रों,सारे पर्यावरणविद् हिमालय-क्षेत्र में नए बाँधों और सड़कों के निर्माण के विरूद्ध लगातार चेतावनी देते रहे हैं। हमने अपनी आँखों से देखा है कि मंसूरी में लोगों ने पहाड़ की ढाल पर पीलर दे-देकर घर बना लिए हैं। नवीन वलित पर्वतीय व भूकंप की दृष्टि से अतिसंवेदनशील क्षेत्र में इस प्रकार से घर बनाना और उसमें रहना निश्चित रूप से मृत्यु को आमंत्रण देना है इसलिए प्रदेश में अंधाधुंध कंक्रीटों के जंगल लगाने पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। गिनाने को तो मैंने गिना दिया कि उत्तराखंड में क्या-क्या किया जाना चाहिए परन्तु यह सब करेगा कौन? कांग्रेस पार्टी के नेताओं से तो कुछ होनेवाला है नहीं सिवाय धर्मनिरपेक्षता के फूटे ढोल को पीटते रहने के और धर्मनिरपेक्षता की छतरी के नीचे बैठकर देश-प्रदेश को लूट लेने के,बेच देने के और फिर अमेरिका व स्विट्जरलैंड जाकर लूट और विक्रय के माल को ठिकाने लगाने के या फिर पेरिस जाकर रंगरलियाँ मनाने के। तो आईये मित्रों,अंत में हम भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र की तरह वर्तमान भारत की महादुर्दशा (अंग्रेजों ने तो भारत की सिर्फ दुर्दशा ही की थी) पर सामूहिक विलाप करें-रोवहु सब मिलि के आवहु भारत भाई। हा! हा! भारत महादुर्दशा देखी न जाई।। 

सफलता के सूत्र -श्रीमद भगवत गीता से

सफलता के सूत्र -श्रीमद भगवत गीता से 

कर्म का आशय वह कार्य जिसके करने के निमित में प्रतिफल की लालसा हो और कर्मयोग
का मतलब समतापूर्वक समभाव रखते हुए कर्म का निर्वाह करना,यहाँ फल की लालसा नहीं
है जो भी परिणाम मिलेगा उसे स्वीकार कर लेना है।समता पूर्वक कर्तव्य का आचरण करना
ही कर्मयोग है

समतापूर्वक कर्म कैसे किया जाये ? यह प्रश्न स्वाभाविक है क्योंकि हर परिस्थिति में सम
रहना बहुत मुश्किल लगता है।हम जो भी कर्म करते हैं तब दौ चीजों से जुड़ कर करते हैं
राग और द्वेष,लाभ या हानि ,हार या जीत ,सफलता या असफलता।जब इन भावनाओं के
वशीभूत होकर हम काम करते हैं तो हम अपने अनुकूल या प्रतिकूल किसी एक बंधन में
बंध जाते हैं जो हमे सुख या दू:ख का अनुभव करवाता है।भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -
श्रेयान स्वधर्मो विगुण: परधर्मात स्वनुष्ठितात
स्वधर्म क्या है -अपना कर्तव्य खुद तय करके उस पर आचरण करना।कर्तव्य हर परिस्थिति,
समय,स्थान,व्यक्ति के अनुसार अलग -अलग होता है। किसी व्यक्ति के लिए कोई कर्म
आवश्यक होता है तो दुसरे के लिये वही काम अनावश्यक भी हो सकता है।एक डॉक्टर के
पास दौ रोगी एक साथ पहुंचे।डॉक्टर ने एक से कहा -तू दही का सेवन छोड़ दे और दुसरे से
कहा-तुझे दिन में दही जरुर सेवन करना है।दही एक ही है मगर एक को नुकसान  कर सकता
है और एक को फायदा।अर्जुन जब कर्तव्य को समझने में भ्रमित हो जाता है तो श्री कृष्ण
कहते हैं कि तेरे लिए युद्ध करना ही कर्तव्य है।युद्ध जैसा कर्म जिसमे नर संहार होना निश्चित
है जिसमे गुण नहीं है फिर भी वह समय ,परिस्थिति स्थान और व्यक्ति के कारण कर्तव्य
बन जाता है जबकि किसी वीतरागी व्यक्ति ने श्री कृष्ण से पूछा होता तो उत्तर यह हो सकता
था -अहिंसा परम धर्म है।
               स्वकर्म क्या हो?कैसा हो ?किस रीति से तय किया जाये?- स्वकर्म आत्मवलोकन
है खुद का मूल्यांकन करना।हम किसी पर कोई कार्य थोप दे उसे पूरा करने को स्वमूल्यांकन
नहीं कह सकते।हम किस विषय में निपुण हैं और किस में कमजोर यह सबसे अच्छे तरीके से
खुद ही जानते हैं इसलिए खुद के प्रति तठस्थ रहकर अपने गुण और विगुण को परखे ,अपनी
कमजोरियों को सही रूप से पहचाने और अपने गुणों को भी यथारूप में पहचाने।यदि यह काम
हम सफलता से कर सकते हैं तो हम आसानी से लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
          कोई छात्र गणित में निपुण हो और उसके अभिभावक कहे कि वह इतिहास के विषय
का चयन करके उसे ही पढ़े तो क्या वह छात्र अपनी सम्पूर्ण योग्यता का प्रदर्शन कर पायेगा ?
किसी व्यक्ति की रूचि कार बनाने में हो और उसे कहा जाये कि आपको खेती करनी है तो
क्या परिणाम आयेगा ?किसी पडोसी के जेवरात की दूकान अच्छी चलती हो और खुद के धंधे
में मंदी चल रही हो तो क्या तुरंत अपने धंधे का त्याग कर जेवर बेचने की दूकान शुरू कर देना
बुद्धिमत्ता है ?
  श्री कृष्ण कहते हैं कि दुसरे का कर्म कितना ही लुभाने वाला क्यों ना हो पर अपनी समझ से
परे हो तो तुच्छ है ना करने के योग्य है क्योंकि उस कर्म को हम लोभ के वशीभूत होकर कर
रहे हैं ,हम जिस विषय में पारंगत ना हो तो सिर्फ देखादेखी करने से फायदे की जगह नुकसान
ही करेंगे।हम क्या कर सकते है और कितना कर सकते हैं हमारे लिये इसी बात का महत्व है।
लोग क्या कर रहे हैं इस बात का महत्व अपने खुद के लिए नहीं होता है।जैसे पतिव्रता के लिये
उसका पति ही सेव्य है चाहे वह अवगुण भी रखता हो ,यदि दुसरे का पति गुणवान हो तो क्या
वह सेवनीय है? पर पति पतिव्रता के लिए कदापि सेवनीय नहीं होता है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि स्वकर्म का आचरण करो चाहे उसमे कितनी ही बाधाएं क्यों ना हो।जो
कार्य खुद को रुचिकर लगे जिस काम को करने की हम योग्यता रखते हैं उस काम को ही
करने की योजना बनाओ और उस पर अमल करो।हर काम में विघ्न बाधाएँ होती ही है।वास्तव
में बाधाएं तो यह परीक्षा करने के लिए आती है कि हमने जो संकल्प किया है उसके प्रति कितने
निष्ठावान हैं।काम को करने पर हमारे आत्म विशवास की परीक्षा करने के लिए विधि बाधाओं
को भेजती है यदि हम उस काम को समस्याओं के कारण बीच में ही अधूरा छोड़ देंगे तो हारेंगे
भी और लोक में हँसी भी होगी।बाधों के आने पर भी यदि हम लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे तो
बाधाएँ स्वत ही दूर हो जायेगी यदि किसी कारण से दूर ना भी हुयी और हम लक्ष्य से दूर रह भी गए
तो भी मन में पछतावा नहीं होगा,कष्ट नहीं होगा।क्योंकि हमने जो काम किया उसको जी जान
से पूरा किया ,पुरे मन से किया।                             

26.6.13

उत्तराखंड  में प्राकृतिक आपदा में मारे गए लोगों के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि - ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे और उनके परिवार जनों को इस दुःख को सहने की शक्ति दे । दुःख की इस घड़ी  में हम सभी ह्रदय से उनके साथ हैं । -

वासांसि जीर्णाणि  यथा विहाय नवानि संयाति नवानि देही । 
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ 
अर्थात जिस प्रकार से मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नए वस्त्र को धारण करता है उसी प्रकार से आत्मा भी पुराने या कटे फटे मृत शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करता है ॥
न जायते म्रियते व कदाचित
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोयं पुरानो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।। 
यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और कभी मरता भी नहीं,
यह होकर फिर कभी नहीं होता ।
पुराणों  में कथित यह आत्मा अज है अर्थात कभी उत्पन्न नहीं होने वाला है , नित्य है शाश्वत है अर्थात अनादि काल से अनंत काल तक है ।
यह मारे जाने वाले शरीर में कभी मारा भी नहीं जाता ॥

25.6.13

कमलनाथ को काले झंड़े दिखाने वाले जनमंच ने शिवराज के आने पर विज्ञप्ति जारी कर लगायी गुहार
जनमंच ने कमलनाथ के आगमन पर काले झडे़ं दिखायश्े जबकि शिवराज सिंह के आगमन पर केवल विज्ञप्ति जारी अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली। इससे क्या यह प्रमाणित नहीं होता हैं कि जनमंच पर भाजपा की बी टीम बन कर आरोप गलत नहीं हैं? शायद इसीलिये जनमंच से जन दूर हो गया है और केवल मंच ही शेष रह गया है। जिले के केवलारी विस क्षेत्र से डॉ. वसंत तिवारी की दावेदारी के समचार अखबारों में सुर्खियां बने हुये हैं। अपने दावे को पुख्ता बताने के लिये डॉ. तिवारी के समर्थन में प्रकाशित होने वाले समाचारों में सन 1993 के टिकिट वितरण के मामले को उछाला जा रहा हैं। बताया जा रहा है कि तत्कालीन सांसद कु. विमला वर्मा ने अपने कर्म क्षेत्र केवलारी को छोड़कर अपने कोटे की टिकिट सिवनी से आशुतोष वर्मा को दिलवा दी। लेकिन यह तथ्य सही नहीं हैं। केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के दौरे के बाद सिवनी विस क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडने वाले मुनमुन राय का बयान अखबारों में सुर्खियों में रहा कि उन्हें किसी नाथ की जरूरत नहीं हैं उनके साथ 30 हजार मतदाताओं का साथ हैं। यह जगजाहिर से उन्हें भाजपा और इंका के असंतुष्टों ने खुले आम मदद की थी। इंका के क्षत्रप का तो उन्हें खुला समर्थन प्राप्त था। 
नाथ के लिये काले झंड़े शिवराज के लिये सिर्फ विज्ञप्ति..वाह जनमंच-जिले के नागरिकों द्वारा फोर लेन के संघर्ष के लिये जनमंच नामक गैर राजनैतिक संगठन का गठन किया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सिवनी का मामला दर्ज हो जाने के बाद इसके चंद कर्त्ता धर्त्ताओं ने इसके राजनीतिकरण करने का प्रयास प्रारंभ कर दिया था। कार्यक्रमों में जहां एक तरफ कांग्रेस नेताओं का विरोध तो किया जाता था लेकिन भाजपा के नेताओं पर निशाना साधने से परहेज किया जाने लगा था। इस कारण धीरे धीरे कई प्रमुख लोगों ने इससे किनारा करना चालू कर दिया था। धीरे धीरे यह जन धारणा बनने लगी थी कि जनमंच भाजपा की टीम बन गयी है। एक तरफ तो केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ पर आरोप लगा कि उन्होंने फोर लेन में व्यवधान डाले तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी स्थानीय मिशन स्कूल ग्राउंड़ में यह सिंह गर्जना की थी कि सूरज चाहे पूरब की जगह पश्चिम से ऊगने लगे लेकिन फोर लेन सिवनी से ही जायेगी। इतना ही नहीं जनमंच के प्रतिनधिमंड़ल को भी शिवराज सिंह ने दो बार यह आश्वासन दिया था कि वो जनमंच का प्रतिनधि मंड़ल अपने साथ दिल्ली ले जायेंगें और प्रधानमंत्री सहित अन्य केन्द्रीय मंत्रियों से मिलवा कर समस्या को दूर करने का प्रयास करेंगें। यह बात जनमंच के संजय तिवारी ने खुद अखबारों में विज्ञप्तियां प्रकाशित कर छपवायी थी। हाल ही 13 जून को केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का सिवनी आगमन हुआ था। इस दौरान जनमंच ने उनको काले झंड़े दिखाकर अपना विरोध प्रगट किया था। इसके ठीक  9 दिन बाद जब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिवनी आये तो जनमंच ने उनसे विज्ञप्ति जारी करके गुहार लगाना ही उचित ही समझा। जनमंच ने उनको काले झंड़े दिखाना जरूरी नहीं समझा। जनमंच के इस दोहरे चरित्र से यह स्पष्ट हो गया है कि जनमंच अब एक गैर राजनैतिक संगठन नहीं रह गया हैं। होना तो यह था कि शिवराज को भी काले झंड़े दिखाये जाते और उनकी कई अधूरी घोषणाओं के पूरे ना होने पर उनका विरोध किया जाता। इन तमाम बातो ऐसा लगना स्वभाविक ही है कि जनमंच अब भाजपा की बी टीम के रूप में काम करने वाला मंच बन कर रह गया है जिससे जन दूर हो गये है।
केवलारी से वसंत का दवाःतथ्यों को तोड़ मरोड़ कर परोसा -जिले के केवलारी विस क्षेत्र से डॉ. वसंत तिवारी की दावेदारी के समचार अखबारों में सुर्खियां बने हुये हैं। अपने दावे को पुख्ता बताने के लिये डॉ. तिवारी के समर्थन में प्रकाशित होने वाले समाचारों में सन 1993 के टिकिट वितरण के मामले को उछाला जा रहा हैं। इसमें कुछ तथ्यों को ऐसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है जिसमें जिले की वरिष्ठ इंका नेत्री कु. विमला वर्मा कां इंगित कर डॉ. तिवारी के त्याग को प्रचारित किया जा रहा हैं। बताया जा रहा है कि तत्कालीन सांसद कु. विमला वर्मा ने अपने कर्म क्षेत्र केवलारी को छोड़कर अपने कोटे की टिकिट सिवनी से आशुतोष वर्मा को दिलवा दी। लेकिन यह तथ्य सही नहीं हैं। सन 1990 में सिवनी क्षेत्र से स्व. हरवंश सिंह चुनाव लड़े थे और वे 6086 वोटों से चुनाव हार गये थे। कांग्रेस ने यह नीति बनायी थी कि पिछला चुनाव पांच हजार से अधिक वोटों से हारने वालों को टिकिट नहीं देगी। स्व. हरवंश सिंह उन दिनों प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री थे और वे ये बात जानते थे कि उनको सिवनी से टिकिट नहीं मिलेगी। इसीलिये उन्होंने कु विमला वर्मा के सांसद बन जाने के बाद केवलारी जैसे सुरक्षित क्षेत्र से टिकिट पाने की रणनीति बनायी थी। उल्लेखनीय है कि 1967 से लेकर 1985 तक कांग्रेस से विमला वर्मा ही चुनाव जीत रहीं थीं। 1990 में वे चुनाव हारीं थीं। अपनी रणनीति के तहत स्व. हरवंश सिंह ने जब जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज से बर्रा में भागवत करायी थी तब से ही उन्होंने केवलारी के केन्द्र में रख कर काम करना चालू कर दिया था। सांसद के रूप में विमला वर्मा ने केवलारी क्षेत्र से जिन तीन नामों का पैनल दिया था उसमें डॉ. वसंत तिवारी,स्व. ठा. रामनारायण सिंह और दादू राघवेन्द्रनाथ सिंह के नाम शामिल थे।लेकिन प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री होने के नाते अपनी राजनैतिक रसूख के साथ उन्होंनें स्वामी जी का भी आर्शीवाद प्राप्त कर लिया था जो कि उनकी टिकिट में निर्णायक साबित हो गया था। इन सब बातों को डॉ. वसंत तिवारी भी जानते हैं। लेकिन एक सच्चे कांग्रेसी के रूप में उन्होंनें केवलारी में कांग्रेस का काम किया और बाद में वे जनपद अध्यक्ष भी बने। अब वे यदि टिकिट की दावेदारी कर रहें हैं तो अपना दावा खें इसमें कोई बुरायी नहीं हैं लेकिन तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने वाले कोई तथ्य यदि अखबारों में प्रकाशित होते है तो उनका खंड़न करने का साहस भी उन्हें दिखाना चाहिये। 
कोई नाथ की चाह नहीं मुनमुन को-केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के दौरे के बाद सिवनी विस क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडने वाले मुनमुन राय का बयान अखबारों में सुर्खियों में रहा कि उन्हें किसी नाथ की जरूरत नहीं हैं उनके साथ 30 हजार मतदाताओं का साथ हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि ऐसे समाचार आये थे कि उन्होंने कांग्रेस में प्रवेश हेतु कमलनाथ से प्रयास किया था। इसके संबंध में उन्होंने यह बयान जारी किया है। मुनमुन राय ने 2008 का चुनाव सिवनी से लड़ा था। यह जगजाहिर से उन्हें भाजपा और इंका के असंतुष्टों ने खुले आम मदद की थी। इंका के क्षत्रप का तो उन्हें खुला समर्थन प्राप्त था। उनके तमाम समर्थकों ने सरेआम अपने हाथों में पंजे के बजाय कप बसी थाम ली थी। यह बात अलग है कि कांग्रेस में या भाजपा में किसी के भी खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं हुयी थी। लेकिन कम से कम मुनमुन राय तो इस बात को भली भांति समझते ही है कि उन्हें तीस हजार वोट कैसे और किसके सहारे मिले थे? हालांकि वे इस बार भी सिवनी से चुनाव लड़ने की तैयारी में है लेकिन इस बार उन्हें नये सिरे से रणनीति बनाये बिना सम्मानजनक स्थिति बनाये रखना बहुत ही कठिन होगा। जिले में कांग्रेस का नया परिवेश कितनामजबूत होगा और भाजपा और निर्दलीयों के लिये कितना चुनौतीपूर्ण होगा? यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। “मुसाफिर“ 

दर्पण झूठ ना बोले
25 जून 2013 से साभार
फिर ठगे गये शिव की नगरी के वासी शिवराज से
सिवनी। शिव की नगरी सिवनी से ना जाने शिवराज का क्या बैर है कि उनके राज में जिले को कुछ मिला तो नहीं छिन जरूर गया। जिले की लगभग पेंतीस ऐसी घोषणायें है जो आज तक पूरी नहीं हुयीं है। यह भी पहला मौका है कि उनके राज में जिला मंत्री विहीन रहा है। 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में शिव की नगरी सिवनी सबसे ज्यादा नुकसान में रही है। उनका हर दौरा जिले के साथ छलावा ही रहा है। मुख्यमंत्री ने घोषणाओं का तो हर दौरे में अंबार लगा दिया और जिले के भाजपा नेताओं ने उनकी घोषणाओं पर आभार भी खूब व्यक्त किया लेकिन अंततः वे घोषणावीर ही साबित हुये। उनकी ज्यदातर घोषणायें अपने पूरा होने का इंतजार ही कर रहीं है। इसमें यदि यह कहा जाये कि जिले के भाजपा के जनप्रतिनिधि भी बराबरी के दोषी हैं तो कोई गलत बात नहीं होगी। वे भी हर बार उनके आगमन पर नयी नयी मांग तो करतें गये लेकिन पूर्व की घोषणाओं पर अमल के लिये अपने ही मुख्यमंत्री को मजबूर नहीं करा पाये। 
इस दौरे में तो हद ही हो गयी। मुख्यमंत्री ने अपनी ही पूर्व में की गयी अधूरी घोषणाओं को ही एक बार फिर से करने का करतब भी दिखा डाला है। चाहे वह नर्सिंग कॉलेज की हो या फिर फोर लेन की हो। 
फोर लेन के मामले में शिवराज ने सफाई दी कि वे इस मामले में जयराम रमेश से मिल थे। लेकिन उनकी इन मुलाकातों के जितने भी समाचार सूचना प्रकाशन विभाग से जारी हुये उनमें विभिन्न योजनाओं का तो जिक्र था लेकिन सिवनी की फोर लेन का नहीं था। और तो और केन्द्र में लगभग साल भर से जयंती नटराजन वन एवं पर्यावरण मंत्री है जिनका अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने जिक्र तक नही किया। उन्होंने यह भी कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार के बीच एक पेंच फंसा हुआ हैं जबकि फोर लेन का मामला नेशनल टाइगर कंजरवेश अर्थारिटी ऑफउ इंड़िया में एन.ओ.सी. के लिये लंबित है। इससे यह साफ जाहिर होता है सिवनी में सिंह गर्जना करने के अलावा मुख्यमंत्री इस मामले में कितने गंभीर है। मेडिकल कॉलेज, एग्रीकल्चर कॉलेज,संभाग जैसी कई मांगें हैं जिनका कोई समाधान नहीं हुआ है। सिवनी का एक और रिकार्ड शिवराज के नाम दर्ज हो गया हैं। अंतरिम सरकार से लेकर अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि सत्तादल का जिले से विधायक जीता हो और जिले से मंत्रीमंड़ल में कोई मंत्री ना बना हो। एक बार सन 1977 में जरूर जिले से कोई मंत्री नहीं बना था क्योंकि सत्तारूढ़ जनता पार्टी का एक भी विधायक जिले सें जीता नहीं था। जिले की पांचों विस सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के दोनों कार्यकाल के लगभग आठ वर्षों से जिले में चार में तीन भाजपा के विधायक होने के बाद भी किसी को शिवराज ने मंत्री नहीं बनाया। और तो और प्रदेश में जिन सांसदों को विस चुना लड़ाया था उनमें नीता पटेरिया को छोड़कर सभी मंत्री बन गये। हालांकि दो भाजपा नेताओं को लालबत्ती जरूर दी गयी है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि जब बिना कुछ दिये सांसद,तीन विधायक और नगर पालिका काचुनाव भाजपा जीत जाती हैं तो भला शिवराज शिव की नगरी को कुछ क्यों देंगें?
दर्पण झूठ ना बोले
25 जून 2013 से साभार

पहले नेचुरल एक्टर मोतीलाल

हिन्दी सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे भी हुए, जिन्होंने नैसर्गिक अभिनय (नैचरल एक्टिंग) के सहारे कामयाबी हासिल की। इस कोटि में मोतीलाल सर्वप्रमुख हैं। संजीवकुमार और बलराम साहनी भी नैचरल एक्टर माने जाते है। मोतीलाल जन्मजात शोमेन रहे कहे जाते है। वह लगातार तैंतीस साल तक नायक या चरित्र-नायक के रूप में फिल्मी परदे पर आते रहे और दर्शकों को भाते रहे। उन्होंने हिन्दी-सिनेमा की मेलोड्रामाई संवाद-अदायगी और अभिनय की सँकरी-लीक को छोड़कर स्वच्छंद-अभिनय की एक नई शैली से दर्शको को रू-ब-रू कराया। अभिनय के लिए मशक्कत करते उन्हें कभी नहीं देखा गया। फिल्म-जगत में मोतीलाल को दादामुनि अशोक कुमार के समान अग्रज माना जाता था। उनके खाते में अनेक अच्छी फिल्में दर्ज हैं। 

मोतीलाल की विशिष्ट पहचान फेल्ट-हैट से थी, जिसे उन्होंने कभी मुड़ने नहीं दिया। शार्क-स्कीन के भड़कीले शर्ट-पैंट, चमचमाते जूते, मस्त चालढाल, राजसी अंदाज, हाव-भाव में नफासत, बातचीत का नटखट लहजा, कुल मिलाकर एक जिंदादिल आदमी की छवि पेश करते थे मोतीलाल राजवंश। वे जीते-जागते कैलिडोस्कोप थे। जब देखो, जितनी बार देखो, हमेशा निराले नजर आते। मोतीलाल संगीत-मर्मज्ञ भी थे। वे बाँसुरी, वायलिन, हार्मोनियम और तबला बजाना जानते थे। अपने टेरेस-अर्पाटमेंट में वे हमेशा संगीत-महफिलें जमाते, जिनमें सहगल भी आते थे। उन्होंने अस्सी से अधिक फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई, जिनमें राजकपूर अभिनीत ‘अनाड़ी’ और दिलीपकुमार की ‘पैगाम’ तथा ‘लीडर’ भी शामिल है। 

मोतीलाल का जन्म 4 दिसंबर 1910 को शिमला में हुआ था वे दिल्ली के एक सुसंस्कृत परिवार से थे। उनके पिता शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर थे। मोतीलाल एक साल के ही थे कि पिता चल बसे। उनके परिवार को चाचा के घर रहना पड़ा, जो उत्तरप्रदेश में सिविल सर्जन थे। इन चाचा ने मोतीलाल एवं उनके पाँच भाई-बहनों की परवरिश की। चाचा ने ही मोतीलाल को जीवन के प्रति उदारवादी नजरिया दिया। शिमला के अंग्रेजी स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद मोतीलाल ने पहले उत्तरप्रदेश, फिर दिल्ली में पढ़ाई की। स्नातक की उपाधि उन्होंने दिल्ली से ली। कॉलेज के दिनों में वे ऑल-राउंडर थे। 

युवावस्था में नैवी ज्वॉइन करने के इरादे से मुंबई पँहुचे तो ऐन-परीक्षा के दिन बीमार हो गए और प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए। इस बात का उन्हें रंज तो था, लेकिन एक दिन शानदार कपड़े पहनकर शूटिंग देखने के इरादे से सागर स्टूडियों जा पहुँचें। वहाँ डायरेक्टर कालीप्रसाद घोष किसी सामाजिक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। घोष बाबू तेज-तर्रार युवा मोतीलाल को देखकर दंग रह गए, क्योंकि अपनी फिल्म के लिए उन्हें ऐसे ही हीरो की तलाश थी। जिसकी तलाशी थी, वह खुद सामने प्रकट हो गया – फिल्मी दुनिया में ऐसे इत्तफाक बहुत सुनने को मिलते हैं। 

घोष बाबू ने अपनी फिल्म ‘शहर का जादू’ (1934) के नायक के रूप में उन्हें चुन लिया और नायिका सवितादेवी के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। सवितादेवी इस फिल्म की नायिका थीं। तब फिल्मों में पाश्र्वगायन आम प्रचलन में नहीं था, उसलिए मोतीलाल को अपने गाने खुद गाने पड़े। गायक मन्ना डे के दृष्टिहीन चाचा कृष्णचंद्र डे फिल्म के संगीतकार थे। उन्होंने मोतीलाल से एक गीत गवाया, जिसके बोल थे – ‘हमसे सुदंर कोई नहीं, कोई नहीं हो सकता’। तब यह गीत लोकप्रिय हो गया था। सागर मूवीटोन को उन दिनों कलाकरों की नर्सरी कहा जाता था। सिंगिंग एक्टर सुरेन्द्र, बिब्बो, याकूब, माया बेनर्जी, कुमार और चिमनलाल लोहार जैसे धाकड़ भी वहाँ मोजूद थे। संगीतकारों में हीरेन बोस और अनिल बिस्वास अपनी मधुर धुनों से ‘सिल्वर-किंग’, ‘जागीरदार ’ और ‘फारबिडन-ब्राइड’ जैसी फिल्मों को सजा रहे थे। ऐसे माहौल में मोतीलाल ने अपनी शालीन कॉमेडी, मैनरिज्म और स्वाभाविक संवाद अदायगी से तमाम नायकों को पीछे छोड़ दिया। 

सन् 1937 में मोतीलाल ने सागर मूवीटोन छोड़ दिया और चंदूलाल शाह के रणजीत स्टूडियों में काम करने चले गए। रणजीत की फिल्मों में उन्होंने दिवाली से होली तक, ब्राह्मण से अछूत तक और ग्रामीण गँवई से शहरी छैला-बाबू तक के किरदार निभाए। अभिनेत्री खुर्शीद के साथ उनकी फिल्म ‘शादी’ (41) सुपरहिट रही। रणजीत के बैनर वाले उन्होंने ‘परदेशी’, ‘अरमान’, ‘ससुराल’, और ‘मूर्ति’ जैसी दमदार फिल्मों में काम किया। बॉम्बे-टॉकीज ने अगर गाँधीजी की प्रेरणा से ‘अछूत-कन्या’ बनाई थी तो रणजीत ने भी ‘अछूत’ (40) नामक फिल्म बनाई, जिसमें मोतीलाल के साथ गौहर नायिका थीं। फिल्म का नायक बचपन की अछूत सखी का हाथ थामता है और अछूतों के लिए मंदिर के द्वार तक खुलवाता है। फिल्म को महात्मा गाँधी और सरदार पटेल का आर्शीवाद प्राप्त था। यह फिल्म राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय पुणे के पास सुरक्षित है। 

मजहर खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पहली नजर’ (45) में मोतीलाल के लिए गायक मुकेश ने पाश्र्वगायन किया, जो उनके चचेरे भाई थे। गाना था, ‘दिल जलता है जलने दे’, जिसके संगीतकार थे अनिल बिस्वास। उस समय में देश में सहगल की आवाज का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था। लोगों ने समझा कि यह गीत भी सहगल का गाया हुआ होगा। लेकिन ऐसा नहीं था। यह गीत आवाज की दुनिया में मुकेश की पहली जोरदार दस्तक थी। रूप के. शौरी की फिल्म ‘एक थी लड़की’ (49) में ‘लारालप्पा गर्ल’ मीना शौरी और मोतीलाल की चुलबली जोड़ी ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। यह जोड़ी ‘एक-दो-तीन’ में भी दोहराई गई और उतनी ही कामयाब रही। मोतीलाल के अभिनय के अनेक पहलू थे। कॉमेडी रोल में अगर उन्होंने दर्शकों को गुदगुदाया तो फिल्म ‘दोस्त’ और ‘गजरे’ में गंभीर अभिनय करके उन्हें अभिभूत कर दिया। उनके करियर की मास्टरपीस फिल्म थी ‘मिस्टर सम्पत’ (52), जिसे जेमिनी के एस. एस. बासन ने आर. के. नारायण के उपन्यास के आधार पर बनाया था। यह एक शहरी चालबाज व्यक्ति की कार गुजारियां, धोखाधड़ी इत्यादि की दिलचस्प फिल्म थी। चालीं चैपलिन की फिल्म ‘द किड’ से प्रेरित एच.एस. रवैल की फिल्म ‘मस्ताना’ (54) में मोतीलाल ने एक फक्कड़ की भूमिका को जीवंत किया। इस फिल्म का गाना – ‘झूम-झूम’ कर दो दीवाने गाते जाएँ गली-गली’ अपनी धुन में मस्ती का पैगाम सुनाए गली-गली सचमुच में गली-गली गूँजा था। सन् 

1950 के बाद मोतीलाल ने चरित्र नायक का रूप धारण कर अपने अद्भुत अभिनय की और भी मिसालें पेश कीं। बिमल राय की फिल्म ‘देवदास’ (1950) में उन्होंने नायक दिलीपकुमार के शराबी दोस्त चुन्नी बाबू की भूमिका में जान डाल दी। इस फिल्म के दर्शकों को वह दृश्य अवश्य याद होगा, जब नशे में चूर चुन्नी बाबू घर लौटते हैं और अपनी छड़ी को दीवार पर पड़ रही खूँटी के साए पर टाँगने की नाकाम कोशिशें करते हैं। यह अत्यंत मार्मिक हास्य दृश्य था। इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर ने उन्हें वर्ष के सर्वोत्तम सहअभिनेता का पुरस्कार घोषित किया था, जिसे लेने से उऩ्होंने इनकार कर दिया। बिमल राय की फिल्म ‘परख’ (60) की चरित्र भूमिका के लिए उन्हें फिल्म फेअर अवॉर्ड मिला। राजकपूर की फिल्म ‘जागते रहो’ (1956) में उन्होने शराबी के रोल को चार चाँद लगा दिए। यह शम्भू मित्र और अमित मोइत्रा द्वारा निर्देशत फिल्म थी। उसमें मोतीलाल शराबी के रोल में थे। वे रात में सूनसान सड़क पर झूमते लडखड़ाते गाते हैं – ‘जिन्दगी ख्वाब है’ यह एक दार्शनिक गीत था। 

भिनेत्री नूतन और तनूजा की माता और जानी-मानी अभिनेत्री शोभना समर्थ के साथ मोतीलाल ने पहली बार 1936 में ‘दो दीवाने’ फिल्म में काम किया था, जो कालांतर में विशेष रिश्ते में बदल गया। नजदिकियों के चलने मोतीलाल ने उनके होम-प्रॉडक्शन की फिल्म ‘हमारी बेटी’ नूतन के साथ काम किया और इस फिल्म की पटकथा-संवाद और निर्माण की जिम्मेदारियाँ भी निभाई। असल जिन्दगी में भी वे नूतन के गॉडफादर थे। करियर के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘राजवंश प्रॉडक्शन्स’ की स्थापना कर महत्वाकांक्षी फिल्म ‘छोटी-छोटी बातें’ (65) शुरू की। वे स्वयं इस फिल्म के लेखक, नायक, निर्माता-निर्देशक सब कुछ थे। फिल्म को राष्ट्रपिता का ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’ जरूर मिला, मगर गर्व का यह पल देखने के लिए वह इस दुनिया में मौजूद नहीं थे। फिल्म बनाते-बनाते वे न सिर्फ दिवालिया हुए, बल्कि परेशानियों से जूझते जीवन से भी किनारा कर गए। जैसे गीतकार शौलेन्द्र के लिए ‘तीसरी कसम’ का निर्माण जानलेवा साबित हुआ, वैसा ही हाल मोतीलाल का हुआ। 17 जून 1965 को बीच कैंडी अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी अधूरी फिल्म को पूरा करने का वित्तीय भार गायक मुकेश ने उठाया, जो उनसे बहुत स्नेह रखते थे। उन्होंने फिल्म का संगीत पूरा करने के लिए संगीतकार अनिल बिस्वास को दिल्ली से मुम्बई बुलाया, जो फिल्में छोड़कर दिल्ली में रहने लगे थे। 

मोतीलाल को बचपन से शिकार का शौक था। वे कई बार घोड़े सहित दुर्घटना के शिकार हुए। वे दस साल की उम्र में बन्दूक चलाना सीख गए थे। उन्हें पेटिंग का चस्का भी था और वे क्रिकेट भी खेलते थे। स्टार इलेवन में उन्हें हमेशा शामिल किया जाता था। एक बार वह विजय मर्चेंट की गेंद चोटिल भी हुए। उन्होंने भी हुए। उनके आँख में लगी थी, जिसके कारण कई दिनों तक बिस्तर पर रहना पड़ा। दूसरी तरफ विजय मर्चेंट ने प्रायश्चित स्वरूप वर्षो तक मोतीलाल की हर फिल्म ‘फर्स्ट-डे-फर्स्ट शो’ देखने का व्रत लिया और इसे निभाया भी। मोतीलाल पूरे रईसी अंदाज में दोस्तों के लिए शराब पार्टियाँ आयोजित करते थे और घुडदौड़ में उनके घोड़े भी दौड़ते थे। वे अच्छे पायलट भी थे और अपने विमान से हिन्दुस्तान की सैर किया करते थे। मालाबर हिल्स पर उनका खूबसूरत बंगला था, जिसमें ऊपरी मंजिल पर मोतीलाल और नीचे उनकी पत्नी रहती थी, जो पेशे से डॉक्टर थी। ब्याहता पत्नी को अनकी जीवन-शैली पसंद नहीं थी। बाद में उन्हें छोड़कर दिल्ली चली गई । बिल्लोरी आँखों वाले अभिनेता (समुद्र-मंथन फेम) चन्द्रमोहन मोतीलाल के अंतरंग मित्र थे। मोतीलाल ने अपने समय के सभी प्रसिद्ध कलाकरों के साथ काम किया, जिनमें दिलीपकुमार, राजकपूर, नरगिस, मधुबाला, नसीम बानो, सुरैया, नूरजहाँ, मीनाकुमारी, माधुरी (पुरानी) और वनमाला के नाम उल्लेखनीय हैं। विडम्बना देखिए कि उऩकी अंतिम यात्रा में बॉलीबुड का कोई सितारा नहीं था। उनके आखिरी वर्षों की दोस्त अभिनेत्री नादिरा ने उनकी चिता को अग्नि दी थी। 

मोती लाल के गाये गीत

‘मुझसे सुन्दर कोई नहीं – ‘शहर का जादू’ /1938 
‘रूठी लड़की कौन मनाए’ – ‘आपकी मरजी’ /1939
‘माशूक हर जगह है, आशिक कहीं-कहीं’ – ‘शादी’ /1941
‘प्यारा-प्यारा है समां’ – ‘कमल’ /1949

24.6.13



उत्तराखंड में आई आपदा की भयानक तस्वीर सामने आने के बाद अब सभी तरफ से सरकार  के इस ऑपरेशन के चीरफाड़ की बारी आ गयी है । इससे पूर्व ही उत्तराखंड के आपदा मंत्री ने खुद कह दिया है कि  हम नाकाम रहे । राज्य सरकार ने भी पचास सवालों के बाद यह मान ही लिया है कि  सरकार इस दिशा में नाकाम रही है । इस सबके बीच बहुगुणा विरोधी लाबी खुश हो रही होगी कि  चलो , बहुगुणा फेल  हुए और अब इस लाबी को यह मौका मिल गया है कि  यह अपने आलाकमान के कान भर सके कि  बहुगुणा के कमजोर प्रशासन ने देश में कांग्रेस की भद पिटवा  दी है और अब मुख्यमंत्री बदला जाना चाहिये और हो सकता है कि  कुछ दिन में यह आवाज उठे  ।
इस आपदा का सार यही कहा जा सकता है कि  सरकार बादल को नहीं रोक सकती थी लेकिन जो लोग भूख से मर गए , दम घुटने , ठण्ड लगने , कुचलने से मर गए या रास्ता भटक  कर इधर उधर मर गए या नेपाली युवकों द्वारा लूट लिए गए और मार भी दिए गए , यह सब सरकार की जिम्मेदारी थी और सरकार इस मामले में पूरी तरह से फेल  हो गयी है ।
यही नहीं , जब रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ तब शुरुआत में सिर्फ २ २ हेलीकाप्टर लगाए गए , जैसे जैसे देखा गया देर हो रही है तो हेलीकाप्टर की संख्या बधाई गयी । और सात दिन बाद टी वी पर देखा गया कि  ८३ हेलीकाप्टर हैं । लेकिन तब तक दोबारा बारिश शुरू हो गयी । क्या अब जो लोग फंस गए हैं और रास्ते फिर टूटने शुरू हो गए हैं तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है । यदि पहले ही यह काम तेजी से कर लिया जाता तो वे लोग भी अब तक सुरक्षित बचाए जा सकते थे । लेकिन ऐसा हो नहीं सका और यह स्थिति तब है जब दो दिन बाद ही मनमोहन और सोनिया गाँधी का दौर हो चुका  था । लेकिन जब केंद्र सरकार ही ७ दिन बाद तक इस इन्तजार में बैठी रही कि  उसके युवराज स्पेन से लौटेंगे तब उनके हाथों से ही राहत सामग्री बंटवाई जायेगी तब इस बेचारी सरकार का क्या कहें ।
आपदा प्रबंधन कुशल होता तो जिस दिन केदारनाथ में यह घटना घटी उस दिन वहाँ पर यह टीम यदि पहले से सक्रिय  होती तो वहाँ पर सैकड़ों लोगों को बचा लिया जाता । कुछ लोग ठण्ड से मर रहे थे , कुछ दम घुटने से तो कुछ भूख से , कुछ लोग उन बंद मकानों में भी फंसे थे जिन में मलबा भर गया था । लेकिन सरकार के पास सोचने का कोई तंत्र नहीं था इसलिए पिता की गोद में उसका बच्चा भूख और पानी की प्यास से अपने पिता से पानी पानी मांगता हुआ दम तोड़ गया । जो स्थानीय पुलिस सात दिन बाद दिखाई दी वह अगर सक्रिय  होती तो उन महिलाओं के पतियों को बचाया जा सकता था जिन्हें कुछ नेपाली गुंडों ने लूटने के बाद खाई में फेंक दिया । लेकिन बेचारी सरकार का क्या कहें । जो २ ० ०  कमांडो छठवे दिन उतारे गए वे पहले भी उतारे जा सकते थे । जो मानव रहित विमान लोगों को खोजने के लिए सातवें दिन लगाने की बात सामने आई वह पहले भी लगाए जा सकते थे । लोगों तक कम से कम रोटी और पानी तो पहुंचाई जा सकती थी । सेना जो कर रही है वह भगवान् का रूप निभा रही है । लेकिन सरकार कहाँ है । क्या सरकार के पास कोई सोच भी नहीं है जो किसी का भला कर सके ।
राष्ट्रीय  आपदा घोषित करने से कतरा रहे गृह मंत्री नहीं समझ सकते कि  जब किसी आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाता है तब समस्त राज्यों की सरकारें उस आपदा से निपटने में तत्परता दिखाती हैं । गृहमंत्री इसे राष्ट्रीय संकट मानने को तो तैयार थे लेकिन राष्ट्रीय आपदा नहीं । क्या वे बता पायेंगे कि  आखिर राष्ट्रीय आपदा और संकट में क्या फर्क है । क्या वे नहीं जानते कि  संकट और आपदा एक ही बात है । ये दोनों पर्याय वाची शब्द हैं । लेकिन यह मांग चूंकि विपक्ष की तरफ से थी इसलिए राष्ट्रिय आपदा और संकट में फर्क दिखने की कोशिश की गयी है । इसे कहते हैं विरोध के लिए विरोध अंततः राज्य सरकार को मानना पड़ा कि  वह नाकाम रही , और आपदा मंत्री भी कह चुके हैं कि  हम नाकाम रहे । क्या यदि एक माह बाद इश्वर न करे कोई बादल फिर फट जाए तो सरकार के पास तैयारी है । नहीं , बिलकुल नहीं ।
खैर , राहुल देहरादून पहुंचे , कल तक जो सरकार यह कह रही थी कि  कोई भी हवाई सर्वे तो कर सकता है लेकिन जमीन पर नहीं उतार जाएगा क्योंकि इससे सिस्टम पर असर पड़ता है उसे अब क्या हो गया है । राहुल ऐसा क्या करने स्पेन से सीधे जमीन पर आ गए हैं जिससे विकास कार्य को गति मिल जायेगी । लेकिन राजनीति है यह भी । खैर राजनेता राजनीती नहीं करेंगे तो उनकी दूकान कैसे चलेगी ?
कुल मिलाकर इस देश के सबसे बड़े खेल संगठन बी सी सी आई ने उत्तराखंड के लिए कुछ भी देने से मना कर दिया है । इस देश का वह करिश्माई कप्तान भी इसी राज्य का ही है । वाह , इसे कहते हैं देश भक्ति । जिन्हें जरूरत है उन्हें कुछ नहीं लेकिन जो पहले से मालामाल हैं उन्हें एक एक करोड़ ।
खैर , यह इस देश की नियति है कि  यहाँ समय पर कुछ नहीं होता और जब होता है तो पानी सर पर से गुजर चुका  होता है ।
इस घटना से कुल मिलाकर राज्य सरकार के पर्यटन उद्योग को अच्छा ख़ासा घाटा होने वाला है । जो लोग भी बचकर आये हैं कसम खाए हुए हैं कि  दुबारा इस यात्रा पर नहीं आयेंगे और दूसरों को भी सलाह देंगे कि  यहाँ न आयें क्योंकि यहाँ का प्रशासन पंगु है ।
सभी लोग आर्मी का धन्यवाद दे रहे हैं । मेरी भी तरफ से आर्मी को हज़ार सलाम । कोई तो है जो हमको बचा लेगा ।
जो चले गए हैं  , उनकी आत्मा को ईश्वर  शांति दे ।
न जायते म्रियते व कदाचित
नायं भूत्वा भविता व न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणों ,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
राहुल जी आ गए है
राहुल जी आ गए हैं । मम्मी का फ़ोन गया था । बेटा  ! यहाँ उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आ पड़ी हैं । ये विपक्ष वाले हल्ला मचा रहे हैं कि  तुम कहाँ हो । ऐसा है , अगले साल चुनाव हैं । इनके नेता तो वहाँ पहुँच गए हैं । एक जहाज ले के अपने यात्रियों को अपने स्टेट पहुंचा भी दिया है लेकिन सब कह रहे हैं कि  तुम कहाँ हो । इनको पता नहीं किसने बता दिया है कि  तुम स्पेन में हो । तुम काहे सबको बता कर जाते हो कि  कहाँ जा रहे हो ? अब नुकसान करवा दिया न । अब ऐसा है कि  फ़टाफ़ट कोई सी ट्रेन , या अगर ट्रेन न मिले तो जहाज पकड़ कर आ जाओ । यहाँ मैंने पच्चीस ट्रक रसद संभाल कर रखी  है ताकि तुम आओ तो पहुँचाओ । सात दिन तो हो गए हैं । उधर जो भी जिन्दा बचकर आ रहा है वो आर्मी का तो धन्यवाद कर रहा है लेकिन हमारी सरकार को गाली दे रहा है । अब ऐसे में तुम और गायब हो । जानते नहीं कि  इनका नेता कितना चालाक है । वो वहाँ पहुँच कर कह रहा है कि  उसने वहाँ बहुत लोगों की मदद की । और केदारनाथ को ठीक करने का ठेका मांग रहा था । वो तो हमारे दिग्गी ने कह दिया कि  तुमसे पहले तो हमारे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने दस करोड़ रुपये देकर केदार नाथ के उद्धार के लिए कह दिया था । और अब हम उस चालाक विपक्षी नेता के द्वारा दिए गए २ करोड़ रूपये पर उसकी टाँग  खींच रहे हैं । बड़ा कहता था - गुजरात विकास कर रहा है । अब जब देने की बात आई तो २ करोड़ दिए । गरीब प्रदेश का मालिक । क्या ख़ाक विकास किया है ? खैर , उसको छोडो , रात दिन उसके बारे में ही तो सोचते रहते हैं । नींद हराम कर रखी  है उसने । तुम आ जाओ । नहीं तो लोग तुम्हें भूल जायेंगे । ये राशन वितरित हो जाए तो कुछ सांस में सांस आये । इधर , हमारा खाद्यान्न सुरक्षा बिल ये विपक्ष वाले पास नहीं होने दे रहे हैं और उधर हमारी सरकार के इस प्रदेश में लोग इस तबाही में भूखे मर रहे हैं । कोई पत्ती  चबा रहा है , कोई लकड़ी चूस रहा है , कोई कच्ची मैगी खा रहा है , दो रुपये की चीज पचास में बिक रही है । आठ माह बाद चुनाव हैं , क्या होगा कैसे होगा बताओ । अब तुम आ जाओ । नहीं तो सब गड़बडा  जाएगा । वहाँ हमारी किरकिरी हो रही है । जल्दी आओगे तो कुछ जवाब भी तुम्हें रटने हैं । हर बार तुम्हें मेहनत  करानी पड़ती है और तब जाकर तुम कुछ करते हो । जब निर्भया काण्ड था तब भी तुम उत्तराखंड के प्रशासन की तरह एन मौके पर गायब हो गए थे । जब अन्ना  आये थे तब तुम ग्यारह दिन बाद निकले थे बाहर । तुम्हें सजाने संवारने में हमें कितनी मेहनत  करनी पड़ती है तुम क्या जानो । उनका नेता देखो कैसे फ़टाफ़ट बोल लेता है । अब कुर्ती की बांह तो तुम चढ़ा लेते हो बखूबी , लेकिन यूपी में यह सब काम नहीं आया । अब उत्तराखंड में लोग कुर्ती की बांह चढ़ाए पीड़ित हैं , उनकी कुर्ती की बांह नीचे करो . यहाँ जल्दी आ जाओ । इधर ये मीडिया वाले केदार घाटी तक पहुँच कर बार बार कह रहे हैं कि मैं पहले पहुंचा हमारा चैनल पहले पहुंचा , और चैनल पर लाइन चला रखी  है कि  राहुल गाँधी कहाँ हैं ? वहाँ चैनल्स  में जल्दी पहुँचने की होड़ लगी हैं और इस मौके पर तुम गायब हो । जल्दी नहीं तो कम से कम उत्तराखंड की स्थानीय पुलिस की तरह सातवें दिन तो बाहर निकल आओ बेटा  । जल्दी आ जाओ । बड़ी फजीहत हो रही है । और हाँ लोगों से ये  कह देना कि  मैं स्पेन गया था घूमने । ठीक है । आ  जाओ अब ।

सलाम है सेना को यारा .........

सलाम है सेना को यारा .........


एक ओर नेताओं की टोली, एक ओर सैनिक है यारा
किसको करना है सेल्यूट ,मन को कौन लगे प्यारा

एक ओर झंडे सब दल के, एक ओर तिरंगा न्यारा
किसको करना है प्रणाम, मन को कौन लगे प्यारा

इधर नेता का जयघोष,उधर सेना का जय हिन्द 
किस पर रखना है विश्वास, कौन है जनता को प्यारा

इधर नेता की आँख में आँसू, उधर शहीद दारा की धारा    
किसे देख छलकेगी आँखें ,तू ही तुझको तोल ले प्यारा

एक ओर हवाई दौरे हैं,एक ओर डटा है सैनिक यारा
किसे कहें पुरुषार्थ? बता दे कौन तेरी आँखों का तारा

इधर जहर उगलती बातें,उधर जान बचाने की जहमत
किस ओर चले दुआ मन की,तू ही तो बतला दे यारा

इधर बेजानो पर रण नीति,उधर जान बचाना ही नारा 
महाकाल खड़ा उस ओर,जहाँ सेना ने है काल को मारा       

23.6.13

शिवपुर वाराणसी की की पुलिस द्वारा मुक़दमा अपराध संख्या 86/2013 धारा 419/420/467/468/471 IPC में दर्ज ऍफ़ आई आर पर कोई कार्यवाही न करने और दोषी को गिरफ्तार न किये जाने के सम्बन्ध में

 


माननीय पुलिस महा निदेशक  महोदय,

            मै प्रार्थी व्योमेश कुमार श्रीवास्तव चित्रवंश , एडवोकेट  मुक़दमा अपराध संख्या 86/2013 अंतर्गत धारा419/420/467/468/471 थाना शिवपुर वाराणसी का मुक़दमा वादी हूँ . उक्त मुक़दमा सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव पुत्र स्व० गणेश लाल निवासी म०न० शिव 3/18 B-1K-2P शारदा विहार कालोनी , मीरापुर बसही  थाना शिवपुर  जिला वाराणसी   के विरुद्ध शिवपुर थाने की जाली मुहर और थाने  के दरोगा उदय प्रताप सिंह के फर्जी हस्ताक्षर बना कर एक कूट रचित आख्या का प्रयोग माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में प्रकीर्ण दांडिक प्रार्थना पत्र  संख्या 14766 सन 2012 सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव प्रति उत्तर प्रदेश राज्य  अंतर्गत धारा  482 द०प्र०स० में शपथ पत्र पर संलग्नक  संख्या 9 पृष्ठ संख्या 56-59 के रूप में दाखिल किया गया . पुनः उसी कूट रचित आख्या  को  माननीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अधीक्षक महोदय के  में शिकायती  पत्र संख्या  CST/RTR 876  सन 2012  में भी संलग्नक के रूप में प्रस्तुत किया गया . इस सम्बन्ध में कई बार थाना शिवपुर से लेकर माननीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदय के कार्यालय   में  मुझ प्रार्थी द्वारा एवं  दि   सेन्ट्रल बार एसोसिएसन वाराणसी  के  माध्यम से पत्र प्रेषित किये जाने  के बावजूद कोई   कार्यवाही नहीं हुई .

               अंततः    माननीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अधीक्षक महोदय को   ई मेल दिनांक 17 अप्रैल 2013 को  भेजे  जाने पर उनके आदेश से थाना शिवपुर में उक्त मुक़दमा दोषी के विरुद्ध  दिनांक 20 अप्रैल 2013 को पंजीकृत किया गया .

            परन्तु खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि  शिवपुर थाना पुलिस इस सम्बन्ध में आज तक उदाशीन है और अभी तक  शिवपुर थाना पुलिस द्वारा इस फर्जीवाड़े के दोषी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गयी   .अभी तक इस सम्बन्ध में मुझ प्रार्थी  का बयान  तक नहीं अंकित किया गया है . दोषी व्यक्ति अजमानतीय और आजीवन कारावास तक के धाराओ  के दोषी होने के  खुले आम घूम रहा है, और मुझ प्रार्थी पर बार बार मुक़दमा  वापसी  के लिए दबाव   बनाते हुए धमका  रहा है.   ऐसे में आरोपित व्यक्ति द्वारा मेरे साथ  भी कोई अनहोनी की जा सकती है. 
        आरोपी व्यक्ति एक  आपराधिक प्रकृती  का व्यक्ति है वह  पूर्व में भी थाना मंडुआडीह वाराणसी से मु०अ०स०114सन 1982  अंतर्गत धारा 420 IPC राज्य प्रति शिव प्रताप व् अन्य में आरोपित रहा है. साथ ही साथ वह  थाना कैंट  वाराणसी से मु०अ०स० 313सन1988अंतर्गत धारा323/504 IPC व्  मु०अ०स०64सन1998 में आरोपित रहा है. उसके इसी तरह के  आचरण पर उसे कृषि विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा दिनांक 18-07-1979 को सेवा से पृथक कर  दिया गया था, बाद में भी उसे कई बार विभाग से प्रतिकूल प्रविष्ठी  और निलंबित किया गया था, उसके साथ गांठ आपराधिक लोगों से है  वह प्रार्थी के साथ कोई भी घटना करीत करा सकता है. 

          जबकि थाना शिवपुर द्वारा जानबूझ कर इस तरह के आपराधिक व्यक्ति को न तो आज दो माह  बीतने के पश्चात भी न तो गिरफ्तार किया गया न ही मुकदमें में कोई अग्रिम कार्यवाही ही की गयी .जब की मुकदमे से सम्बंधित सभी आवश्यक अभिलेख थाना शिवपुर और  वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक  कार्यालय से सम्बंधित और उपलब्ध है . ऐसे में थाना शिवपुर के  मंशा पर सवाल उठाना स्वाभाविक है. 
                 जब कि  माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा इस प्रकरण में क्रि ० मि ० रिट  संख्या 11563 सन 2013में अभियुक्त उपरोक्त  की याचिका दिनांक 6-6-2013 को याचिका में हस्तक्षेप न करने की आवश्यकता न  हुए पाते  हुये ख़ारिज की जा चुकी है.  माननीय उच्च न्यायलय का  निर्णय निम्न है 

 Court No. - 21
Case :- CRIMINAL MISC. WRIT PETITION No. - 11563 of 2013

Petitioner :- Surendra Kumar Srivastava
Respondent :- State Of U.P. And 2 Others
Counsel for Petitioner :- Taru Ropanwal,Abhishek Srivastava
Counsel for Respondent :- Govt. Advocate

Hon'ble Arun Tandon,J.
Hon'ble Manoj Kumar Gupta,J.

Supplementary affidavit has been filed today. It is taken on record.
Heard the learned counsel for the petitioner and the learned AGA.
This writ petition has been filed by the petitioner for quashing the FIR dated
20.4.2013 in case crime no. 86 of 2013 under sections 419, 420, 467, 468, 471
IPC, PS - Shivpur, District - Varanasi. 
From the perusal of the FIR, it appears that on the basis of the allegations made
therein the prima facie cognizable offence is made out. There is no scope of
interfering in the FIR. Therefore, the prayer for quashing the FIR is rejected.

The writ petition is dismissed.
 
(Manoj Kumar Gupta,J.)    (Arun Tandon,J) 

अतः  माननीय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अधीक्षक महोदय से प्रार्थना है कि  उक्त मुकदमे की विवेचना किसी उछाधिकारी से करवाने और दोषी व्यक्ति को तत्काल गिरफ्तार किये जाने हेतु आदेश  करे ताकि प्रार्थी के साथ कोई अनहोनी न हो. 

 प्रार्थी 
व्योमेश कुमार श्रीवास्तव चित्रवंश , एडवोकेट

--  VYOMESH K.S.CHITRAVANSH,
Advocate
Dr. Rajendra Prasad Adhivakta Bhawan
Collectrate Court ,Varanasi -221002 India
Cell. 9450960851; 

तालाब, पार्क नहीं यहां तो नदी पर हो गया है अतिक्रमण

तालाब, पार्क नहीं यहां तो नदी पर हो गया है अतिक्रमण



  • मोरवा नदी के करीब 300 मीटर क्षेत्र पर कर लिया गया है कब्जा, 
  • जिलाधिकारी आवास के बाउंड्री से होकर गुजरी है मोरवा नदी, 
  • करीब एक दशक पूर्व हुआ था डीएम आवास का निर्माण, 
  • कार्यदायी संस्था व इंजीनियरों के कार्य पर सवाल

तालाबो पर कब्जे की बात तो आपको अखबारों में पढ़ने को मिल जाती हो लेकिन किसी नदी पर कब्जे की बात शायद किसी ने सुनी हो ,लेकिन उत्तर प्रदेश के  भदोही में कुछ ऐसा ही वाकया  सामना आया है।  देश में अपने तरह का पहला मामला है जब नदी को ही अपनी चहारदीवारी के अन्दर कर लिया गया है, 1994 में भदोही को जिला बनने के बाद जनपद में जिलाधिकारी के लिए एक बड़े आवास  की जरूरत पड़ी मुख्यालय के बगल में ही इसका निर्माण कराया गया,  उसी के पास से प्रवाहित हो रही मोरवा नदी को जिला अधिकारी के अवास के अन्दर ले लिया गया हालांकि यह कार्यदायी संस्थायो ने लगभग 10 वर्ष पूर्व किया होगा तबसे से लेकर अब तक  15 से अधिक जिला अधिकारी उस आवास में रह चुके हैं लेकिन किसी का ध्यान  भी इस ओर नहीं गया  मोरवा नदी सरपतहां आदि गांव से होते हुए आगे जाकर वरूणा नदी में मिल गई है। सरपतहां तक तो मोरवा नदी स्वच्छंद रूप में गुजरी है। लेकिन आगे जाकर जिलाधिकारी आवास के चहारदीवारी में कैद कर ली गई है। करीब 300 मीटर से अधिक लंबा नदी का क्षेत्र डीएम आवास की चहारदीवारी में कैद है। चहारदीवारी से होते हुए हुए नदी बाहर निकलती है।
   भारतीय संविधान और केन्द्रीय रिवर बोर्ड अधिनियम कहता है कि किसी भी प्राकृतिक संपदा नदी, तालाब आदि पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। बावजूद जबकि कानून किसी भी नदी के क्षेत्र को किसी आवास के चहारदीवारी के अंदर नहीं मिलाया जा सकता है। जिस कार्य संस्था और इंजीनियरों की टीम ने आवास का निर्माण कराया, उन्होनें आखिरकार कानून का ख्याल क्यों नहीं रखा। यही नहीं अब तक कई जिलाधिकारी जिले में आए और गए। उनकी भी नजर आवासीय परिसर में कैद नदी पर नहीं पड़ी।
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    इसी  जनपद के उगापुर गांव के वाद पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से पुरे देश में तालाबो ,पोखरांे आदि के संरक्षण में तेजी आई इस निर्णय ने देश के तालाबो पोखरों को जल संरक्षण का आधार  माना उसे संरक्षित करने उसे बचाने  का आदेश सरकार को दिया ,इस निर्णय ने तालाब पोखरों पार्कों पर अवैध कब्जा हटाने का अधिकार भी दे दिया ,लेकिन इसी से लगभग आठ किलोमीटर दूर जनपद की प्रमुख नदी मोरवा पर ही कब्जा कर लिया गया , कब्जा भी जिसने किया उसी को सरकार ने इसके संरक्षण की  करने की जिम्मेदारी भी सौंप रखी थी
पिचले 10 वर्षों  से ज्यादा समय से यही स्थिति बनी रही किसी सरकारी संस्थान की नजर इस ओर नहीं गया न ही पर्यावरणविद को नदी जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनो पर नजर  रखने के लिए अनेक सरकारी संस्थाए काम  करती हैं, लेकिन किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई ये सरकारी कार्यप्रणाली का इससे अच्छा सबुत नहीं हो सकता है हालांकि कुछ लोग मानते है की मामला जिलाधिकारी आवास से जुड़ा हुआ है इसलिए किसी संगठन खबरनवीस , सरकारी अधिकारी की हिम्मत नहीं पड़ी हो , उप जिलाधिकारी ज्ञानपुर रत्नाकर मिश्रा का
 यहाँ बयांन  भी आपने आप पुष्टि करता है जब उनसे नदी कब्जे की बात पर वह इसे गलत बताते है लेकीन  जब जिलाधिकारी आवास की बात बताई गयी तो उनके बयान किस तरह से बदला गए  


जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुए चंद्रकांत पाण्डेय से

अभी हाल में ही जनपद में जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुए चंद्रकांत पाण्डेय से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया और कहा उन्हें आये एक-दो दिन ही हुए और इस मामले को  देखंेगे  नवागत जिलाधिकारी ने नदी अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई के प्रति अपनाने की बात दिखाई पड़ती है।


वरुण बचाओ अभियान के संयोजक व्योमेश इस-

 पर अपनी टिप्पणी दी की नदी, तालाब आदि के संरक्षण के लिए सरकारें व न्यायालय विशेष सख्ती बरत रही है। बावजूद इसके अतिक्रमण जारी है। तालाब व पार्कों पर तो अतिक्रमण व अवैध कब्जा की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। लेकिन किसी नदी पर कब्जा कर लिया गया हो, ऐसा मामला अभी तक सामने नहीं आया था।


           जनपद के ओमप्रकाश पाल का कहना है

कि इस आवास और इसकी जमीन अधिगृहित कर पूरे निर्माण के दौरान स्वीकृति के लिए तमाम रास्ते तय किए होंगे। तमाम वरिष्ठ अधिकारी और शासन के स्तर से  आवास के लिए नक्शा आदि की भी स्वीकृति ली गई होगी ऐसे में इस प्रकार नदी को कब्जे में लिया गया वो लचर सरकारी कार्य प्रणाली का सबसे बड़ा सबूत


सामाजिक सरोकारों से रूचि रखने वाले पर्यावरण मामलों के जानकर और अधिवक्ता संतोष गुप्ता-
 

का का कहना है नदी, तालाब सार्वजनिक संपत्ति है। इस पर किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा कब्जा नहीं किया जा सकता है। इस पर कब्जा करने या इसे बाउंड्री में मिलाने का अधिकार किसी को नहीं है। भारतीय संविधान में इस बात का उल्लेख है कि किसी भी प्राकृतिक संपत्ति पर कोई भी व्यक्ति या संस्था कब्जा नहीं कर सकता है। राज्य सरकार को संपत्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। 133 सीपीआरसी में उल्लेख है कि जिलाधिकारी व मजिस्ट्रेट प्राकृतिक संपत्ति की सुरक्षा करें। अगर कब्जा व अतिक्रमण की जानकारी मिले तो कार्रवाई करें।




क्या कहते हैं एसडीएम

इस संबंध में उपजिलाधिकारी ज्ञानपुर रत्नाकर मिश्र से पूछा गया तो उन्होनें ने कहा किसी नदी, तालाब या जलाशय पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। उसे अपने बाउंड्री के अंदर नहीं मिलाया जा सकता है। लेकिन जिलाधिकारी आवास के बाउंड्री से होकर बुजरी मोरवा नदी के बारे में पूछने पर गोलमोल जवाब दिया। कहा कि बाउंड्री के अंदर नदी भले है, लेकिन उसके स्वरूप वही है। स्वरूप् से छेड़छाड़ नहीं हुआ है। इसलिए बाउंड्री के अंदर मिलाया जा सकता है।


वरुणा  नदी 

वरुणा  नदी भदोही जनपद की ३२ किलोमीटर लम्बाई  तय करती वाराणसी के छोर से इलाहबाद के सीमा तक सफर तय करती है  जनपद के 155 वर्ग किमी परिक्षेत्र में फैली है यह नदी वरुण और गंगा की सहायक नदी है मोरवा नदी कारी गांव से निकली है जो कसिदहां, नथईपुर,मूसी, जोगीपुर, सरपतहां आदि गांव से होते हुए आगे जाकर वरूणा नदी में मिल गई है।

क्या कहता है कानून

1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के तहत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संपदा नदी ,तालाब आदि का संरक्षण करे।
2. अनुच्छेद 48क के तहत राज्य का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक संपदा की रक्षा करे।
3. 133 सीआरपीसी के तहत जिलाधिकारी व मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्रदान की गई है कि उन्हें सूचना मिले या वे निरीक्षण के दौरान किसी नदी, तालाब पर कब्जा है तो उसे तत्काल हटवाएं। डीएम व मजिस्ट्रेट को अतिक्रमण हटवाने का पूरा अधिकार है।
4. नदी के धारा या भूमि पर कोई ऐसा अवरोध नहीं लगाया जा सकता जिससे उसका उपयोग करने में जन सामान्य को परेशानी हो।
5. चहारदीवारी बनाकर किसी नदी के जल को अवरूद्ध नहीं किया जा सकता है।
6. नदी या तालाब का निजी तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


फोटो गूगल मैप कर रहा है पुष्टि 

ग्ूगल मैप में देखने में साफ-साफ पता चल रहा कि मोरवा नदी को लिाधिकारी आवास परिसर में कैद किया गया है। नदी आवास के बाउंड्री के अंदर से गुजरी है। स्थिति स्पष्ट हो सके, इसके लिए तस्वीर को ग्राफिक्स के जरिए स्पष्ट किया गया है। लाल रंग की दिख रही लाइन मोरवा नदी है। वहीं नीले रंग की लाइन जिलाधिकारी आवास की बाउंड्री है। ग्राफिक्स देखने के बाद स्पष्ट हो जाएगा कि मोरवा नदी का कितना लंबा क्षेत्र जिलाधिकारी आवास के परिसर से गुजरा है।