31.12.13

मैं कुतिया हूँ!-ब्रज की दुनिया


मैं दुनिया की कथित रूप से सबसे सभ्य प्रजाति आदमी की भाषा में एक कुतिया हूँ। मैं जानती हूँ कि उनकी भाषा में यह एक गाली है यानि मैं दुनिया के लिए एक गाली हूँ। इंसानों को क्या पता कि मेरा जीवन कितना दुःखमय रहा है। जबसे पैदा हुई जाड़ा,गर्मी और बरसात सब मैंने नीले आसमान के तले गुजारी है। कभी किसी ने रोटी दे दी तो किसी ने लात मार दी। रोटी देनेवाले को मैंने पूँछ हिलाकर हमेशा शुक्रिया कहा मगर लात मारनेवाले को कभी काटा नहीं। मैं खुदमुख्तार और आजाद हूँ इसलिए भी मुझे दुःख के थपेड़ों का ज्यादा सामना करना पड़ा। कई बार इंसान हम जैसे स्वतंत्रता पसंद कुत्तों को आवारा भी कह डालते हैं लेकिन हम आवारा नहीं हैं हम तो समय के मारे हैं। इतना कष्ट उठाने के बावजूद मुझे अपनी जिंदगी को लेकर तब तक कोई शिकायत नहीं थी जब तक कि मैं माँ नहीं बनी थी।
                        यही कोई एक महीना पहले मैंने 8 छोटे-छोटे बच्चों को जन्म दिया। 5 काले,दो भूरे और एक चितकबरा। उनमें से चितकबरे को मेरे निवास-स्थान यानि जिस खुले मैदान में मैं रहती हूँ के सामनेवाले घर ने अपना लिया और इस तरह मेरे पास बच गए 7 बच्चे। जब भी कोई इंसान हमारे बच्चों को अपनाता है तो एक साथ हमें दुःख और सुख दोनों होता है। दुःख होता है अपने बच्चे से बिछुड़ने का और सुख होता है यह सोंचकर कि मेरे एक बच्चे का जीवन अब सुरक्षित हो गया। उसी घर के बगल के घर में एक बुढ़िया रहती है जो जब-तब मेरे बच्चों को डंडे और लात से मारती रहती है। बच्चों का क्या वे चले ही जाते हैं उसके कैंपस में रोटी के लालच में।
                                           अभी दस दिन भी नहीं बीते थे मुझे माँ बने कि ठंड पड़नी शुरू हो गई। आप इंसान तो रजाई ओढ़कर आराम से ठंड गुजार लेते हो हम पर इस मौसम में क्या बीतती है यह हमीं जानते हैं। गाँव में तो बुझे हुए अलाव के गड्ढ़ों में बैठकर या घास-भूसे के ढेर में घुसकर हमारे रिश्तेदार गर्मी प्राप्त कर लेते हैं परंतु शहरों में तो खुले आसमान के तले ठिठुरने के सिवाय कोई रास्ता ही नहीं बचता। अकेली थी तो कोई चिंता नहीं थी लेकिन इस बार 7-7 बच्चे भी तो थे। मैं सातों बच्चों को अपने तन से ढँक लेती और रातभर अपने शरीर की गर्मी देती रहती जिससे उनको ठंड न लगे और उनकी मृत्यु न हो। सुबह होते ही फिर पेट भरने की जद्दोजहद। अगर खाना न खाऊँ तो दूध कैसे बने और बच्चों को क्या पिलाऊँ? यकीन मानिए मैं कभी अपने अपने बच्चों को अकेले नहीं छोड़ना चाहती मगर एक तो मेरे पेट की आग और फिर बच्चों को भी दूध चाहिए इसलिए जहाँ-जहाँ इंसान कूड़े फेंकता है मैं भटकती रहती हूँ कि कुछ अवशिष्ट-जूठन मिल जाए।
                                            इसी तरह एक दिन मैं बच्चों के पास नहीं थी। बच्चों को आपस में खेलता-कूदता छोड़कर दूर निकल गई थी कि अचानक इंसानों के तीन-चार शरारती बच्चे आए और मेरे एक काले रंगवाले बच्चे को पूँछ से पकड़कर उठाकर ले गए। मैं दूर से ही सबकुछ देख रही थी। फिर उन्होंने उसको जूठी सब्जियों के रस से भरे गड्ढ़े में डूबा दिया। बेचारा तड़प उठा एक तो भीषण ठंड उस पर मिर्च-मसालों की जलन। उन बच्चों का दिल इतने से ही नहीं माना और वे उस पर पत्थर भी बरसाने लगे। तभी उस पर एक देवदूत सरीखे इंसान की नजर पड़ी और उन्होंने बच्चों को भगाकर मेरे बच्चे को अपने हाथों से बाहर निकाला। जब वह देवदूत बच्चे को अन्य बच्चों के पास छोड़ने आ रहा था तब गलतफहमी में मैं उस पर गुर्राई भी थी मगर उसने कुछ भी बुरा नहीं माना। फिर मैं उस बच्चे को देर तक चाटती रही जिससे उसका तन तो सूख ही जाए उसकी थरथराहट भी दूर हो जाए। खैर किसी तरह मेरा वह प्यारा बच्चा जीवित बच गया।
                          लेकिन वो कहते हैं न कि जब विपदा आती है तो अकेली नहीं आती। कल होकर वही क्रूर बच्चे फिर से आए और मेरे एक भूरेवाले बच्चे को साथ लेकर चले गए। उसी दिन शाम में मैंने उसकी लाश बगल के चौराहे पर पड़ी हुई देखी। वो मेरा सबसे बड़ा बच्चा था। भोला था,तुरंत इंसानों पर विश्वास कर लेता था और थोड़ा-सा पुचकारने पर पीछे-पीछे चल देता था। मैं उसके मृत शरीर को दूर से ही देखती रही और रोती रही,अकेली,चुपचाप। फिर भी मैं उन शरारती बच्चों को शाप नहीं दूंगी मैं इंसान थोड़े ही हूँ कि बदले की भावना रखूँ।
                              यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे निवास के पास एनएच नहीं है अन्यथा मेरे कई बच्चे अब तक सड़क-दुर्घटना के शिकार हो चुके होते और इंसानों की मौत मर चुके होते। आज कई दिनों के बाद आसमान पर चटख धूप खिली हुई है। रातभर मेरे छहों बच्चे मुझसे चिपककर ठंड के मारे कराहते रहे लेकिन अभी आपस में खेल-कूद रहे हैं। उनमें से कुछ इतने बड़े हो गए हैं कि खड़े-खड़े ही मेरा दूध पी लेते हैं और मुझे उनको दूध पिलाने के लिए झुकना या बैठना नहीं पड़ता। लगभग सारे-के-सारे बच्चे अब भोजन की तलाश में खुद ही कूड़ों का चक्कर भी लगाने लगे हैं। मैं क्या करूँ बड़ा होने के साथ उनका पेट भी तो बढ़ने लगा है और सिर्फ मेरे दूध से उनकी भूख नहीं मिट पा रही। इंसानों ने भी अब बचा हुआ भोजन फेंकना कम कर दिया है और जो कुछ भी बचता है वे उसे फ्रिज में रख देते हैं। पता नहीं आनेवाले समय में मेरे बच्चों का जीवन कैसे कटेगा? वैसे भी दिन-प्रतिदिन इंसानों का नैतिक पतन होता जा रहा है। वे अब अपनों को भी नहीं बख्श रहे। हमारे बच्चों को भी तो रहना आखिर इंसानों की दुनिया में ही है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)
पुनश्च-11-01-2014, मित्रों कल रात से ही हाजीपुर में बरसात हो रही है। मेरी पड़ोसन कुतिया के तीन काले वाले बच्चे रात की बारिश और ठंड को झेल नहीं सके और रात में ही दम तोड़ दिया। खुले मैदान में वो जीवित रह भी कैसे सकते थे जबकि सबकुछ जमा देनेवाली ठंड पड़ रही हो? सुबह अपने बचे हुए बच्चों को लेकर वो कई परिसरों में गई कि कोई तो ऐसा दयालु इंसान होगा जो उसे और उसके बचे हुए तीनों बच्चों को आश्रय दे देगा लेकिन कहीं तो उस पर डंडों की बरसात की गई तो कहीं लात-जूतों की। बरसात अभी भी जारी है और ठंड लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन वो बेचारी कुतिया अपने बच्चों के साथ लगातार वर्षा में भींग रही है।

30.12.13

सांप सूंघ गया है नमो नमो को ।
पिछले कई माह से जो नमो नमो चल रहा था उसे अब सांप सूंघ गया है । कितने ही दिनों से बीजेपी और इसके नेता नमो मंत्र का जाप कर रहे थे , टीवी पर मोदी मोदी था।  अब सब बदल गया है और बीजेपी को डर  लग गया है।  मुझे लगता है कि जैसे बीजेपी मोदी को ब्रांड बनाकर उनके विकास को बेच रही थी । उन्हें विकास पुरुष कह रही थी । मोदी का विकास माडल चल निकला था । सब विकास माडल की  , गुजरात के विकास की  मार्केटिंग कर रहे थे , अब अरविन्द का ईमानदारी माडल चल निकला है।  अरविन्द केजरीवाल ने अपनी ईमानदारी की  सही मार्केटिंग की  है । और पिछले दो साल से उन्हें एक ऐसा प्लेटफार्म मिला है जिसे उन्होंने भुनाने में कोई कोर कसर  नहीं छोड़ी है । हालाँकि यदि यह देखा जाय कि दिल्ली में क्या हुआ तो वहाँ पर यदि विजय गोयल ही बीजेपी के चीफ मिनिस्टर कैंडिडेट रहते और मोदी न आते तो बीजेपी भी कांग्रेस की  तरह दस बीस सीट्स पर सिमट चुकी होती । और अरविन्द पचास सीट्स ले गए होते । लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि मोदी आड़े आ गए यानि मोदी ने अरविन्द को रोका दिल्ली में , न कि अरविन्द ने मोदी को । खैर , अब अरविन्द केजरीवाल मॉडल मिला है । दिल्ली अधिकाधिक जनसँख्या घनत्व वाला क्षेत्र है और दूसरी सोच के साथ जी रहा है इसलिए आसान था , राष्ट्रीय नीति की  जरूरत नहीं थी लेकिन लोकसभा में बहुत जल्दी बहुत कुछ पा जाने की  आकांक्षा कुछ ज्यादा ही जल्दी है । दिल्ली संभाल लें और मॉडल पेश करें तो बात जमेगी , कितने अरविन्द केजरीवाल मिल पाएंगे ? शीला ने कम विकास नहीं किया था लेकिन दिल्ली सुरसा के मुह की तरह बढ़ रही है इसलिए समस्याएँ घटेंगी नहीं बढ़ेंगी ही । देखना होगा कि क्या क्या गुल खिलाती हैं आप ।
डॉ द्विजेन्द्र वल्लभ शर्मा
मोतीचूर , हरिपुर कलां ,वाया रायवाला , देहरादून

29.12.13

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव 

अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो कहा था कि इस देश को भारतवासी नहीं चला पायेंगे
और यह फिर से गुलाम हो जायेगा ,क्यों कहा था उन्होंने ऐसा ?क्योंकि वह जानते
थे हम भारत को ऐसी शिक्षा प्रणाली देकर जायेंगे जिसको पढ़ कर युवा दिशा हिन हो
जायेगा और भटक जायेगा।

आज इस देश के सामने मुख्य दौ समस्याएँ हैं पहली भ्रष्टाचार और दूसरी बेरोजगारी
इन दोनों समस्याओं ने कई नयी समस्याओं को जन्म दिया है जैसे- ध्वस्त होती
संस्कृति,महिला असुरक्षा ,जातिवाद,कर्तव्य बोध का अभाव आदि।

मुख्य समस्या भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से भारत ने निपटने के प्रयास किये और
वे प्रयास असफल होते गये और देशवासी इन समस्याओं से तालमेल बैठाकर जीना
सीख गए हैं और नतीजा यह कि ये बीमारियाँ बढ़ती ही जा रही है।

इन मुख्य समस्याओं से झुंझने का प्रयास सिर्फ फोरी तोर पर समय -समय पर
होता रहा है जैसे -आरक्षण,धरना ,आंदोलन प्रदर्शन या कानून लिख कर। ये उपाय
स्थायी नहीं हैं क्योंकि इससे समस्याओं की जड़ को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
क्या कठोर सजा ही सब समस्याओं का हल है ?समाज विज्ञान इसे नहीं मानता।
हमारे देश में अब बच्चे भी अवैधानिक काम कर के पकडे जा रहे हैं,प्रश्न यह उठता
है कि बच्चों के मन में अपराध को अंजाम देने के भाव आये कहाँ से ?ये अपराध
बच्चा सीखा कैसे ?इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?

विडंबना है कि इन बातों पर हमारे जनसेवक कभी संसद में चर्चा नहीं करते ,ना
सामाजिक सगंठन इस विषय पर चर्चा करते हैं। बड़ा दुःख है कि हम लीव इन
रिलेशन लाते हैं ,हम समलैंगिगो के लिए संवेदना लाते हैं.हम गर्भपात को बढ़ावा
देते हैं,हम महिलाओं कि असामान्य वेशभूषा को प्रोत्साहित करते हैं मगर शिक्षा
पर कभी बृहद चर्चा नहीं करते जो की मुख्य है।

गणतंत्र भारत को कैसी शिक्षा प्रणाली की जरुरत है इस पर कभी कोई NGO
आंदोलन या धरना नही करता।शिक्षा का स्वरुप कैसा हो इस पर कभी जनमत
नहीं लिया जाता ,जबकि अनैतिक जोड़ गणित के लिए जनमत होते रहते हैं
कारण यही की इससे सत्ता नहीं मिलती।

देश के नेता इस पर चर्चा नहीं करते जबकि चुनाव के समय अपने लिए वोट की
गुहार लगाने घर-घर योजना बद्ध तरीके से पहुँच जाते हैं।

KG से कक्षा पाँच तक का सेलेबस क्या हो ?क्योंकि बच्चा इस समय कोमल मन
का होता है उसे जो सिखाया जाता है वह उसे ग्रहण करता है और यही बाल संस्कार
उसके जीवन को गढ़ते हैं। कक्षा 6 से 8 तक का सेलेबस क्या हो ?इस उम्र में बच्चा
सीखता है और सोचता है। हमारी शिक्षा यहाँ आकर किताबी बन जाती है। बच्चा
किताबों में उलझ जाता है और कीड़ा बनने का प्रयास करता है जबकि सर्वांगीण
विकास हमारा लक्ष्य होना चाहिए।हम यहाँ से बच्चे को संविधान का धर्म नहीं
पढाते हैं ,सँस्कार और संस्कृति को लिखना सिखाते हैं मगर उसे जीवन में उतारना
नहीं सिखाते। कक्षा 9 से 12  जिसमे बच्चा बालिग़ होने लगता है तब तक वह
केवल यही जानता है कि तोता रटन्त परीक्षा पास करने के लिये जरुरी है।
अभिभावक भी कुछ नहीं कर पाते और शिक्षा प्रणाली के अनुरूप बच्चों को तोता
रटन्त करवाते हैं नतीजा बच्चा संस्कार, संस्कृति, सदाचार,नैतिकता को जीवन
में उतारने का अवसर खो देता है।

मेरे देश में कक्षा 12 के बाद बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ना छोड़ देते हैं और ये अनगढ़
बच्चे भारत निर्माण में लग जाते हैं ,ये बच्चे कैसा और कितना योगदान श्रेष्ठ
भारत निर्माण के लिए दे पायेंगे ,जरा आप खुद सोचे।

कॉलेज और मास्टर डिग्री के छात्र सिर्फ जीवन यापन के लिए पढ़ते हैं ,वे इस
कर्तव्य से अनजान हैं की उनकी समाज के लिए कोई जबाबदेही है। हमारी
कागजी डिग्रियाँ जब रोजगार का निर्माण नहीं कर पाती तो युवा हताश हो जाता
है और छोटी मोटी सरकारी नौकरी के लिए चक्कर लगाता है और उसे पाने के
लिए भ्रष्टाचार से समझौता कर लेता है और यही से वह खुद भ्रष्ट जीवन जीने
को धकेल दिया जाता है।

शिक्षा स्वावलम्बी हो ,सभ्य समाज का निर्माण करने वाली हो ,संस्कृति और देश
भक्ति प्रधान हो। इस व्यवस्था के बिना सुराज्य संभव नहीं है       

भू-लोक तन्त्र !!

भू-लोक तन्त्र !! 

एक गाँव के प्रवेश द्वार के पास एक कँटीला पेड़ था और उस पेड़ से कुछ दुरी पर
एक साधु की कुटिया थी। पेड़ के बड़े-बड़े काँटों से आये दिन कोई न कोई आदमी
चुभन का शिकार होता रहता।

एक दिन किसी राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से बिलबिला उठा। उसे लगा
की कुछ ऐसा काम कर दूँ ताकि अन्य राहगीर को काँटे न चुभे। अगले दिन उसने
एक बड़ा बोर्ड बनाया और पेड़ से कुछ फलाँग पहले लगा दिया। उस बोर्ड पर लिखा
था -"सावधान ,आगे काँटे का पेड़ है "
साधू ने उस बोर्ड को देखा और मुस्करा कर कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद दूसरे राहगीर को काँटा लग गया ,वह राहगीर भी दर्द से बिलबिला
उठा। कुछ समय बाद वह एक कुल्हाड़ी लेकर वापिस आया और पेड़ कि कुछ टहनियाँ
जो रास्ते पर आ रही थी उनको काट डाला।
साधु उस राहगीर के पास आया और मुस्करा के अपनी कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद फिर तीसरे राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से चिल्ला उठा और
गुस्से से भरा दौड़ता हुआ घर पर गया और घर से आरा लाकर उस पेड़ के तने को
काट डाला। पेड़ को कटा देख सब गाँव वाले इकट्टे हुये और उसे कंधों पर बिठा कर
उत्साह से नाचने लगे।

साधु गाँव वालों के पास गया और सब तमाशा देख चुपचाप मुस्कराता हुआ कुटिया
में चला आया। गाँव वाले कुछ दिन सुकून से रहे। किसी ने उस बोर्ड को वहाँ से हटा
दिया मगर कुछ ही महिनों में वह पेड़ फिर से फलफूल गया और राहगीर फिर से
घायल होने लग गये।

आने जाने वालों ने फिर से बोर्ड लगा दिया ,किसी ने फिर से बड़ी टहनियों को काटा
तो कोई आरा लेकर फिर से तने को काट डालता। तने को काटने वाले को गाँव वाले
कंधों पर बैठाते और नाचते। साधु हर बार घटना क्रम को देखता और मुस्करा कर
कुटिया में चला जाता।

पेड़ का तना कटने के बाद कुछ दिन गाँव में शान्ति रहती और जैसे ही पेड़ वापिस
फलफूल जाता वापिस वही  चक्र शुरू हो जाता। बार-बार के इस चक्र से गाँव वाले
परेशान हो गये और इस समस्या का स्थायी हल ढूंढने के लिए साधु के पास उपाय
पूछने गये।

साधु ने कहा -"आप सब मिलकर इस पेड़ को जड़ सहित उखाड़ दो ,यह इस समस्या
का स्थायी हल है "

गाँव वालों में से एक बोला -हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इस उपाय से हम नेता
विहीन हो जायेंगे ,हम में से जो बोर्ड लगाता है वह सेवा भावी कहलाता है जो कुछ
टहनियाँ काटता है वह समाज सुधारक कहलाता है और जो आरा लेकर तना काटता
है वह नेता कहलाता है.इस चक्र ने हमें सेवाभावी ,समाज सुधारक और नेता दिये हैं
इसके रुकने पर सब बराबर हो जायेंगे। यह उपाय नामंजूर है  …
गाँव के सेवा भावी ,समाज सुधारक और नेता इस उपाय से असहमत थे।

उन सबकी बात सुनकर साधू जोर-जोर से हँस पड़ा और बोला -हाय! भू-लोक तन्त्र !!       

28.12.13

                                 जमीन पर रहकर आसमान से जमीन नापना 
 ये आसमान से जमीन नापने या मापने जैसा है।  क्या कभी आपने कल्पना की है कि हेलीकाप्टर से जमीन को नापा जाए।  शायद नहीं।  लेकिन अब ऐसा हो रहा है।  क्या है यह।  दिल्ली विधानसभा के चुनाव में अरविन्द केजरीवाल की विजय इसी का हिस्सा है । चुनाव से पहले अक्सर समीक्षक कहा करते थे कि आप चार पांच सीट्स ही ले पायेगी । भाजपा और कांग्रेस भी भाव देने से कतराते थे सो अब कतरा  कतरा  रो रहे हैं । लेकिन एक बात सही है । अक्सर तमाम राजनैतिक पार्टियां पहले पहल ग्राम प्रधान , पंचायत सदस्य , ब्लाक प्रमुख आदि क्रम से राजनीति में होते हुए विधायक मंत्री सांसद आदि का सफ़र तय करती हैं।  यह भारतीय राजनीति  के इतिहास में पहली बार हुआ है कि कोई सीधे ही अट्ठाइस  विधायकों के साथ दिल्ली का मुखिया बन बैठा है।  है न आकाश से जमीन नापना।  वह भी जमीन पर रहकर । ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था।  लेकिन यह हो चुका  है। अक्सर पार्टियां जमीनी स्तर  पर राजनैतिक कब्ज़ा करती हैं विभिन्न संघटनों , संस्थानो संस्थाओं आदि पर कब्ज़ा करती हैं और फिर ऊपर पकड़ बनाती हैं लेकिन पहली बार ऐसा नहीं हुआ है । कहीं यह दिवास्वप्न तो नहीं है । यकीनन दिवास्वप्न नहीं है ।
लेकिन क्या झांसा दिया जाना जरूरी था । बीजेपी कहती रही कि वह विपक्ष में बैठेगी । कांग्रेस ने पत्ते खोले और सोचा कहीं  ऐसा न हो कि लोकसभाचुनाव  में मोदी ब्रांड के साथ अगर दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए तो बीजेपी इस राज्य में भी सत्ता में न आ जाए । सो केजरीवाल को समर्थन दो । समर्थन दिया । कहा कि दोबारा चुनाव में नहीं धकेल सकते दिल्ली की  जनता को । लेकिन यह नहीं समझाया कि मई २०१४ में तो जनता को मतदान केंद्र जाना ही है । एक और बटन दबा देता मतदाता । दिल्ली विधान सभा के लिए भी वोट दे देता । सो दोबारा चुनाव होने देते । कांग्रेस ने क्या पांच साल के लिए समर्थन दिया है ? कोई गारंटी ? नहीं । तो फिर केजरीवाल को क्या हुआ ? इस से बेहतर तो यह होता कि केजरीवाल बीजेपी को समर्थन देते या बीजेपी से समर्थन लेते । लेकिन हमारे देश में धर्म निरपेक्ष दिखने का एक शौक है सभी को । और इसलिए केजरीवाल ने अपने घोषणा पत्र में लिख दिया कि दिल्ली में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया जाएगा । पंजाबी तो है ही द्वितीय राजभाषा । उर्दू भी । वाह । असल में राजनीति बीजेपी और गैर बीजेपी में फांसी है और इसलिए सही मायने में बीजेपी और शिवसेना जैसे दल एक तरफ हैं और शेष दल एक तरफ । केजरीवाल को जल्दी है । दिल्ली संभालेंगे या देश ? एक बिन्नी ने ही रातों की  नींद उड़ा  दी । देश में जिन लोगों को लोकसभा में भेजेंगे उनमे कितने बिन्नी होंगे क्या पता । सत्ता में वहाँ लोकसभा में तो नहीं आयेंगे ? फिर कुछ सीट्स मिल भी गयी तो अपने लोगों को कैसे रोक पाएंगे गाडी बंगला न लेने के लिए । वहाँ तो मिलेगा ही । बवाल नहीं होगा ? बिन्नी नहीं पैदा होंगे ? प्रलोभन न हो सामने तो ईमानदार बने रहना आसान है लेकिन जब सामने करोड़ों होंगे तो ? तब ईमानदार बनना होगा ? क्या वास्तव में सब बुद्धा ही हैं केजरीवाल पार्टी में । नहीं । लेकिन मैं केजरीवाल का विरोधी नहीं । समर्थक हूँ । चाहता हूँ धीरे धीरे बढ़ें ताकि विश्वसनीयता को कोई आंच नहीं आये । अभी जितना मिला है उसे पचाएं , जो कहा है करके दिखाएँ । तब बात जमेगी । और प्रत्याशी ? सभी की  पत्नियां तो नौकरी नहीं करती ? उनका परिवार कौन पालेगा । केजरीवाल की  तो पत्नी उनका अपना परिवार सम्भाल लेगी । लेकिन बाकी  क्या बाबा वैरागी लायेंगे । मिल जायेंगे ? ढूँढिये । बहुत जल्दी भी ठीक नहीं है । दुनिया बहुत बड़ी है और समय का इन्तजार करें । और हाँ , सुरक्षा जरूर लें , क्योंकि राजनीति में हैं । थोडा गोवा के परिकर के बारे में भी सोचें ।

फ्रॉम -
डॉ द्विजेन्द्र वल्लभ शर्मा
मोतीचूर , हरिपुर कलां , रायवाला देहरादून

भारत एकता: तलवार धार चलकर, है व्यवस्था तुझे बदलना.

भारत एकता: तलवार धार चलकर, है व्यवस्था तुझे बदलना.: तलवार है दुधारी, जिस पथ है तुझको चलना, है तेरे अपने हाथ ही, गिरना और सम्भलना...... सियासत में बहुत शातिर, है ये कॉंग्रेस प्यारे, गिरगिट ...

27.12.13

नो वन किड्नैप्ड नवरुणा-ब्रज की दुनिया


मुजफ्फरपुर से अपने घर से सोते समय खिड़की तोड़ कर 18 सितंबर,2012 की रात में अपहृत कर ली गई नवरुणा के मामले में उस समय दिलचस्प मोड़ आ गया जब केन्द्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई ने मामले की जाँच के बिहार सरकार के अनुरोध को ठुकराते हुए केस से संबंधित कागजात वापस कर दिए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अब इस मामले का होगा क्या? क्या इस मामले का भी हश्र वही होने जा रहा जो कभी जेसिका हत्याकांड का हुआ था कि नो वन हैव किल्ड जेसिका? अगर अपहरण हुआ तो लड़की गई कहाँ और अगर नहीं हुआ तो लड़की कहाँ है? जब तीन-चार घंटे में निर्भया के साथ दुष्कर्मी दरिंदगी की प्रत्येक हद को तोड़ सकते हैं तो अपहर्त्ताओं ने 12 साल के उस मासूम के साथ इतने दिनों में कितनी दरिंदगी की होगी यह सोंचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
नवरुणा अपहरण कांड न सिर्फ बिहार पुलिस,सीआईडी बल्कि पूरी बिहार सरकार की कार्यक्षमता पर लगा हुआ एक बहुत बड़ा प्रश्न-चिन्ह है। इस अपहरण कांड और उसके उद्भेदन में बिहार सरकार के तंत्र की विफलता से यह आशंका भी जन्म लेती है कि इसके पीछे कहीं-न-कहीं बहुत-ही प्रभावशाली लोगों का हाथ है। वे कदाचित मुजफ्फरपुर में पीढ़ियों से बसे बंगालियों को भगाकर उनकी बहुमूल्य जमीन पर कब्जा जमाना चाहते हैं। यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि पिछले दिनों कई बंगालियों पर मुजफ्फरपुर में जानलेवा हमले हो चुके हैं। ये लोग इतने अधिक प्रभावशाली हैं कि शायद इनकी सीधी पहुँच न सिर्फ पटना बल्कि दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों तक भी है। संदेह तो यह भी उत्पन्न हो रहा है कि क्या सचमुच बिहार सरकार या पुलिस जाँच को लेकर गंभीर है या फिर जाँच का ढोंग मात्र कर रही है? सीबीआई ने हालाँकि जाँच से इन्कार करके बिहारवासियों व नवरुणा के परिजनों को निराश किया है तथापि उसको इसलिए कर्त्तव्यविमुखता के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि कानून-व्यवस्था मूल रूप से राज्य का विषय होता है न कि केंद्र का। (हाजीपुर टाईम्स से साभार)

नयी परिभाषा

नयी परिभाषा 

इस देश के नेता कब क्या कह जाते हैं यह सोच कर की जनता याद नहीं रखती। आये दिन
नयी परिभाषाएँ बनाने की जुगत में हर कोई लगा है चाहे वह अपनी सोसायटी के किसी
पद पर है या फिर समाज,गाँव ,शहर राज्य या देश के किसी नेता पद पर।
कुछ शब्दों कि नयी सीमा रेखाएँ -

सच :- मैं जो कहूँ और जिसे मानू  वही सत्य 

सरलता :- जो व्यक्ति मेरे  गलत इशारे पर भी नाचे वह सरल 

नैतिक :- जो मुझे रूचिकर लगे और लोग उस पर अँगुली ना उठाये 

वादा :- वो शब्द जिसे मेरी मर्जी से तोडा या टुकड़े टुकड़े कर जोड़ा जा सके  

कसम :- लोग तब भी विश्वास करे जब मैं इसे तोड़ मरोड़ दूँ 

वफादार :- जो मेरे काले कारनामों को दबा दे ,मिटा दे 

ईमानदार :- जो व्यक्ति मेरे पक्ष में खड़ा हो सके 

भ्रष्ट :-मेरा विरोधी तथा मेरे पक्ष में रहकर आँखे और कान खुले रखता हो 

व्यवहार :- उचित काम करने पर दी जाने वाली अनुचित राशी 

होशियारी :- मैं कसम तोड़ता जाऊँ और जनता समर्थन देती रहे 

समझदार :-नाव डूबती देख विरोधी का पल्ला थाम ले 

सेवा :- जिस काम को खूब प्रचारित जा किया जाये और आडम्बर भी फैले 

त्याग :- अपराध सिद्ध हो जाने पर पद से लिया गया इस्तीफा 

अहँकार :- विरोधी द्वारा कहा जा रहा कड़वा सच 





26.12.13

कैसे जुटेगा फंड

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कामकाज संभालते ही अपने घोषणापत्र को अमलीजामा पहनाना शुरु कर दिया है, चूंकि वे खुद वित्तमंत्री का दायित्व भी निभाएंगे, ऐसे में बतौर वित्तमंत्री उनके लिए अपनी नई घोषणाओं के लिए फंड जुटाना बड़ी चुनौती होगी। राज्य में वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए 44,169 करोड़ का बजट अनुमान था, जो 2014-15 में बढ़कर करीब 48 हजार करोड़ के पार पहुंच जाएगा।
रमन सिंह ने शपथ लेते ही निर्देश जारी कर दिए हैं कि 1 जनवरी 2014 से 47 लाख परिवारों को 1 रुपए प्रति किलो की दर से चावल दिया जाए। घोषणा पत्र के अपने वादे को पूरा करते हुए समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसानों को प्रति क्विंटल 300 रुपए बोनस देने के आदेश भी दे दिया गया है। साथ ही अटल बिहारी बाजपेयी के जन्मदिवस यानि 25 दिसंबर 2013 से अटल बीमा योजना लागू करने के निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं, जिसके तहत प्रदेश के लगभग 17 लाख खेतिहर मजदूरों को जीवन व दुर्घटना बीमा किया जाएगा। आदिवासी और वनवासियों के लिए तेंदूपत्ता की तर्ज पर इमली, चिरौंजी, महुआ, लाख और कोसा को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का फरमान भी जारी कर दिया गया। ये सब सुनने और देखने में सुखद जरूर लग सकता है, लेकिन राज्य सरकार को इसके लिए मोटी कीमत चुकानी होगी। सरकार को पहले से जारी योजनाओं के लिए भी वित्त की पूर्ति करनी है, ऐसे में इन नई रियायतों के लिए राजकोष पर चार से पांच हजार करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ने का अनुमान है।
रमन सिंह के अपने तीसरे कार्यकाल के पहले ही दिन लोकलुभावन योजनाओं के क्रियान्वयन की लंबी सूची को आम लोग भले ही सुशासन से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन इसके लिए राज्य सरकार को बड़ी रकम जुटानी होगी, जो कि अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।
राज्य सरकार पर नई घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने में पड़ने वाले वित्तीय भार को हम पिछले बजट से समझ सकते हैं। वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए 44,169 करोड़ का बजट अनुमान प्रस्तुत किया गया था। इसमें खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग 42 लाख गरीब परिवारों को दो और तीन रुपए प्रति किलो की रियायती दर पर तथा 8 लाख सामान्य परिवारों को ए.पी.एल. दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान था। इस पर लगभग 2000 करोड़ का खर्च अनुमानित था अब नए निर्देशों के तहत प्रति परिवार 1 रुपए किलो की दर से चावल उपलब्ध करवाया जाना है यानि योजना पर खर्च दुगुना हो जाएगा।
वहीं वर्ष 2012-13 में खरीदे गए 70 लाख मीट्रिक टन धान के बदले 270 रुपए प्रति क्विंटल की दर से अकेले बोनस देने के लिए 1750 करोड़ का प्रावधान किया गया था। अब नई घोषणा के तहत सरकार को प्रति क्विंटल 300 रुपए बोनस देना है यानि इस मद पर भी राशि दुगुनी ही होनी है। इसका एक कारण ये भी है कि हर साल धान खरीदी का आंकड़ा बढ़ रहा है। राज्य सरकार ने वर्ष 2010-11 में ही 51 लाख  मीट्रिक टन धान खरीद कर  किसानों को 5000 करोड़ रूपए धान की कीमत और बोनस के रूप में दिए थे । 2013 में धान खरीदी का आंकड़ा 70 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गया।
इस मसले पर मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं कि अपनी घोषणाओं को हम हर हाल में पूरा करेंगे। जहां तक बजट का सवाल है, हम अपने वित्तीय अनुशासन से इसकी पूर्ति करेंगे। लेकिन सीएम ये नहीं बताते कि वे किस तरह के वित्तीय अनुशासन की बात कर रहे हैं।
वर्ष 2013-14 में बजट पेश करते हुए मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था कि राज्य की कुल प्राप्तियाँ 43,977 करोड़ तथा कुल  व्यय 44,169  करोड़ अनुमानित किया गया है। इन वित्तीय प्राप्ति और व्यय में अंतर के कारण 192  करोड़ का शुध्द घाटा अनुमानित है। साथ ही वर्ष 2012-13 के संभावित घाटे 1,485 करोड़ को शामिल करते हुये कुल बजटीय घाटा 1,677 करोड़ अनुमानित है। इस घाटे की पूर्ति वित्तीय अनुशासन तथा अतिरिक्त आय के संसाधन जुटाकर की जाएगी। यानि 2013-14 में ही 1 हजार 677 करोड़ का घाटा अनुमानित था।
प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता रामचंद्र सिंहदेव तहलका से कहते हैं कि राज्य सरकार तो कंगाल हो चुकी है। पिछले ही साल सरकार ने कामकाज चलाने के लिए अब तक का सबसे बड़ा लोन यानि साढ़े तीन हजार करोड़ रुपया राष्ट्रीयकृत बैंकों से लिया था। इससे ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकारी खजाना बिलकुल खाली हो चुका है। अब कैसे योजनाओं को पूरा किया जाएगा, ये तो मुख्यमंत्री ही जानें
जबकि वर्ष 2000 में जब छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था, तब अविभाजित मध्यप्रदेश के हिस्से के रूप में छत्तीसगढ़ के भौगोलिक क्षेत्र के लिए कुल बजट प्रावधान केवल पांच हजार 704 करोड़ रूपए था, जो अलग राज्य बनने के बाद क्रमशः बढ़ता गया और अब तेरह सालों में 40 हजार करोड़ रूपए से अधिक हो गया है।
हालांकि सूबे के मुखिया को अपने घोषणा पत्र में किए गए वादों को पूरा करने की जल्दी शायद इसलिए भी है कि लोकसभा चुनाव सामने हैं, या फिर रमन सिंह अपनी हैट्रिक से गदगद हैं और जनता का अहसान चुकाना चाहते हैं। किंतु योजनाओं को लागू करने की जल्दबाजी चाहे किसी भी कारण हो, लेकिन इस त्वरित क्रियान्वयन में मुख्यमंत्री एक बात भूल रहे हैं कि इन योजनाओं को लागू करने के लिए राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय भार से वे कैसे निपटेंगे। सरकार का खर्च तो हर साल बढ़ रहा है, लेकिन आय कैसे बढ़ेगी, इसका जबाव फिलहाल किसी के पास नहीं है, लेकिन हां, मंत्रालय में घोषणा पत्र के क्रियान्वयन के लिए बैठकों का दौर जारी है।

25.12.13

मानें सब भगवान



     
ईसा ने दिया था प्रेम का पावन यह संदेश।
प्रेम जगत का सार, मानव का धर्म विशेष।।
वह चला गया हम भूल गये उसकी वाणी।
इसीलिए हैं पीड़ित दुनिया के सारे प्राणी।।
मानव सेवा सच्ची सेवा और प्रेम है धर्म।
विश्व सुखी होगा जब समझेगा यह मर्म।।
मानव रूप धर आया, मानें सब भगवान।
दुखियों का बना मसीहा,था ऐसा इनसान।।
दुख झेले पर जिसने दिया प्रेम का साथ।
दीनों की सेवा में जिसने सदा बढ़ाये हाथ।।
                 -राजेश त्रिपाठी

कहीं यह कांग्रेस-केजरीवाल का फिक्स मैच तो नहीं?-ब्रज की दुनिया

मित्रों,अभी कुछ दिन जब अरविन्द केजरीवाल अपने कथित पूजनीय गुरू अन्ना हजारे पर कांग्रेस के हाथों की कठपुतली होने और दोनों के बीच सबकुछ पूर्वनिर्धारित होने का आरोप लगा रहे थे तब मैं यह सोंचने में लगा था कि कहीं कांग्रेस और केजरीवाल के बीच फिक्स मैच तो नहीं चल रहा है? वरना ऐसा न तो पहले देखा गया था और न ही सुना गया था कि कोई पार्टी उसी पार्टी की सरकार को बिना शर्त समर्थन दे जिसने उसके अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिन्ह लगा दिया हो और कांग्रेस जैसी धूर्त पार्टी ऐसा महामूर्खता तो बिना वजह के कर ही नहीं सकती।
                    मित्रों,जहाँ तक मुझे लगता है कि आप पार्टी कांग्रेस की प्रयोगशाला में तैयार तजुर्बा है जो मोदी रथ को रोकने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। याद कीजिए कि केजरीवाल को प्रमोट किसने किया-केंद्र की कांग्रेस सरकार ने। अन्ना हों या केजरीवाल दोनों ही कांग्रेस द्वारा फिक्स किए गए मैच को खेल रहे हैं। कहना न होगा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का आप पार्टी प्रयोग बेहद सफल रहा है। सत्ता का जाम भाजपा के होठों तक पहुँचते-पहुँचते दूर हो गया है। सोंचिए,कल्पना कीजिए कि अगर कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देकर आप को सत्ता में आने का अवसर नहीं दिया होता तो क्या होता? तब केजरीवाल अभी तक मीडिया से सिरे से गायब हो चुके होते और यह चर्चा शुरू ही नहीं होती कि क्या केजरीवाल अब मोदी का रथ रोकेंगे? जाहिर है कि अगर दिल्ली विधानसभा की तरह ही लोकसभा चुनावों में भी त्रिशंकु की स्थिति बनती है तो सबसे ज्यादा संतोष कांग्रेस को होगा। चाहे मुख्यमंत्री केजरीवाल हों या शीला दीक्षित या फिर प्रधानमंत्री अरविन्द केजरीवाल हों या मनमोहन सोनिया गांधी परिवार को कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण सहित अधिकांश मुद्दों पर आप और कांग्रेस की विचारधारा एक है। कांग्रेस को अगर नफरत है तो सिर्फ हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व से जिसके उभार को रोकने के लिए वो केजरीवाल तो क्या ड्रैकुला से भी हाथ मिला सकती है। जो मित्र केजरीवाल के बार-बार जनता के पास जाने और हर काम को जनता की ईच्छा बताकर करने को नई तरह की राजनीति की शुरुआत मान रहे हैं उनको मैं हिटलर का इतिहास पढ़ने की सलाह दूंगा जो केजरीवाल की ही तरह जनता की ईच्छा बताकर बुरे-से-बुरे काम को अंजाम दिया करता था। जनलोकप्रियता की राजनीति हमेशा अच्छा परिणाम नहीं देती बल्कि कई बार शासन को देश-प्रदेश के हित में जनाकांक्षाओं की अनदेखी भी करनी पड़ती है।
                               मित्रों,इस बीच आप पार्टी के नेताओं के सुर भी आरोपों और वादों को लेकर बदलने लगे हैं। पहले जहाँ ये स्वयंभू-स्वघोषित ईमानदार बिजली कंपनियों से कमीशन खाकर कांग्रेस सरकार पर बिजली के दर बढ़ाने के आरोप लगा रहे थे और यह दावा भी कर रहे थे कि वे बिजली कंपनियों का ऑडिट करवाएंगे और अगर जरूरी हुआ तो उनको हटाकर नई कंपनियों को राष्ट्रीय राजधानी में बिजली वितरण का ठेका देंगे अब सरकारी खजाने से सब्सिडी देकर बिजली बिल को आधा करने और प्रत्येक परिवार को 750 लीटर पानी मुफ्त में देने की बातें कर रहे हैं। मियाँ जब सब्सिडी देकर ही वादों को पूरा करना था जो कि एक छोटा-सा बच्चा भी कर सकता है तो फिर चुनाव से पहले हथेली पर दूब जमा देने के वादे किए ही क्यों थे? ये लोग फरमाते हैं कि जनता का पैसा जनता के ऊपर ही खर्च कर देंगे। मगर यह खर्च करना तो हुआ नहीं लुटा देना हुआ जो बाँकी दल पहले से ही टीवी-लैपटॉप-साईकिल जनता के बीच बाँटकर कर रहे हैं। क्या केजरीवाल एंड कंपनी यह बताएगी कि 36000 करोड़ रुपए के कुल वार्षिक बजटवाले दिल्ली राज्य के लिए वो 20-तीस हजार करोड़ रुपए की सब्सिडी के लिए पैसे कहाँ से लाएगी? इस 36000 करोड़ रुपए में से भी कुछ राशि योजनागत व्यय के लिए होगी जिसमें से वे राशि डाईवर्ट कर नहीं सकते ऐसे में दिल्ली के विकास,नए निर्माण, मेंटनेंस और वेतन के लिए पैसा कहाँ से आएगा? ऐसे में लगता है कि आप पार्टी सरकार बनाने से पहले ही यानि परीक्षा शुरू होने से पहले ही अनुत्तीर्ण हो गई है। केजरीवाल जी चुनाव में मुद्दा बिजली-पानी था न कि यह कि मुख्यमंत्री या विधायकों-मंत्रियों को जेड श्रेणी की सुरक्षा और अन्य सुविधाएँ मिलनी चाहिए या नहीं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी एक साथ प्रकाशित)

झोले वालों के ’असली बसन्त’ पर खद्गदर वालों के पतझड़ का फातिया !



                                                                                                                                                                                                                                                                                  
बात युनाईटेड प्रोगेसिव एलायन्स प्रथम (UPA - 1) की पहली बार सरकार बनने और सोनिया गांधी के खुद को सरकार से अलग करते हुये मनमोहन सिंह को प्रधान मन्त्री बनने के लिये आगे करने के समय की है । चूंकि कांग्रेस के लोग इस बात को हजम नहीं कर पा रहे थे कि नेहरु - गांघी परिवार से इतर कोई कुर्सी सम्भाले इसलिए सोनिया गांघी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (National Advisory Council - NAC) का गठन कराया और सरकार को विकास एवं जनहित के मुद्दों पर सलाह देने का बीड़ा उठाया ।

इस परिषद में सोनिया ने देश भर के नामचीन समाजिक कार्यकर्ताओं जैसे अरूणा राय, मेधा पाटकर, सन्दीप पाण्डेय आदि को शामिल किया । तब यह कहा गया कि सोनिया ने सरकार को समाज और सामाजिक सरोकारों से जोड़कर चलाने का इन्तजाम किया है । और अखबारों के opinion editorial पन्नों पर छपने लगा कि यह "झोले वालों का बसन्त काल है ।"   सोनिया के रास्ते सीधे तौर पर सामाजिक सरोकारों का सरकार के काम - काज पर प्रभाव रहेगा । सरकारी बैठकों में भी झोलेवाओं से राय - मशविरा किया जाना शुरू हुआ ।  बताते चलें के सामाजिक कार्यकर्ताओं को euphimistically "झोलेवाला" कहा जाता है । साथ ही यह भी बतातें चलें कि UPA - 1 के कार्यकाल की उपलब्धियों में RTI Act और MNREGA सरीखे लोक कल्याणकारी कानून शामिल हैं । राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (FSB) भी इसी NAC के दिमाग की उपज कहा जा सकता है ।

आज जब अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की कुर्सी पर बैठने को तैयार हो गये तो बरबस ही 1999 से आगे का समय जो मैने देखा - एक kaleidoscope की भांति आखों के आगे घूम गया । लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.काम. में पढ़ते समय मेरे ईमेल पर पता चलता था कि दिल्ली में परिवर्तननामक गैर सरकारी संस्था (NGO) द्वारा बिजली दफ्तरों के बाहर जनसभाएं करके और कैम्प आदि लगा के जनता की समस्याओं से दो-चार होकर उन्हे सुलझाने का प्रयास किया जा रहा था । और इस संस्था का मुखिया अरविन्द केजरीवाल नाम का व्यक्ति, इनकम टैक्स का एक बड़ा अधिकारी था । परिवर्तनकी ईमेल की खास बात यह होती थी कि वे अपनी सफलताओं और विफलताओं को बेहद साफगोई से रखते थे । केजरीवाल ने इससे पहले अपने इनकम टैक्स कार्यालय से ही समाज सेवा की शुरुआत की थी ।

बाद में केजरीवाल ने परिवर्तनके बैनर के तले ही शुचिता कानून कहे जाने वाले सूचना का अधिकार अधिनियम को पूरे देश में लागू करने के लिये आन्दोलन खड़ा किया ।  2005 में पूरे देश में लागू होने से पहले दिल्ली सहित देश के छ: राज्यों में अलग-अलग अधिनियमों के माध्यम से यह कानून लागू था । RTI पर केजरीवाल रसीखे लोगों के इसी संघर्ष के कारण 2005 में पूरे देश को यह अधिकार मिला । और इसके लागू होने के बाद भी पूरे देश में इसके ट्रेनिंग कार्यक्रम और क्षमता विकास के कार्यक्रम आयोजित किये । मनीष सिसोदिया उसी दौर के साथी हैं ।

शुचिता संवर्धन के उसी दौर में Association for Democratic Reforms (ADRI) नामक संस्था बनी जिसमें IIM - Bangalore के प्रो. त्रिलोचन शास्त्री, IIM - Ahemedabad के एक प्रो. और अनिल बैरवाल आदि शामिल थे । ADRI ने पूरे देश में Election Watch नामक कार्यक्रम की नीवं रखी जिसने चुनावी उम्मीदवारों के हलफनामों का अध्ययन करके उम्मीदवारों के आय - व्यय और आपराधिक मुकदमों को सार्वजनिक करने का बीड़ा उठाया । 

झोलेवालों का जो बसन्त काल तब शुरू हुया था आज वह एक मुक्कमल मुकाम पर पहुँच गया है । अब यह मुकाम किसी सोनिया के रहमों करम पर नहीं है । किसी को सलाह न देकर अब वह खुद अपनी इबारत लिख सकेंगे । मुबारक हो यह बसन्त ! शुचितानीत राजनीति का शैशव-काल मुबारक हो !

पर पूरे प्रकरण से खद्दर वालेतिलमिलाए हुये हैं । समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों ? उनकी थाथी में ठेस जो लगी है । शायद राजनीति में उनका पतझड़ काल शुरू हो गया है ? समय रहते नहीं चेते तो जनता फातिया भी पढ़वा देगी । 

22.12.13

जनमत तो श्री राम के साथ भी था …।

जनमत तो श्री राम के साथ भी था  …। 

केजरीवाल के दाँत क्या खाने और दिखाने के अलग हैं ?यह प्रश्न सहज है ,क्योंकि वे युवा
भारत को नैतिकता और ईमानदारी का स्वराज्य देने का सपना दे रहे थे। जिस भ्रष्टाचार
से लड़ने की बात किया करते थे वो केजरीवाल अब कहाँ गायब हो गया ?क्या सत्ता की
भूख हर बार नैतिकता पर भरी पड़ जाती है ?

"आप" कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ वोट माँग रही थी और जब राजा बनने की
बारी आयी तो कांग्रेस से समर्थन पाकर राज जमाने की तैयारी में लग गयी है। क्या
यही नैतिकता है या यही स्वराज्य का स्वरुप था केजरीवाल का। क्या जनता ने इसलिए
केजरीवाल को वोट किया था। नहीं ,जब जनता ने वोट किया था तो उसकी सोच कांग्रेस
के शासन से मुक्ति की थी और "आप"के निर्दोष नए चेहरे थे। जनता ने इस विश्वास के
साथ "आप"को वोट दिया कि उसे नया स्वराज्य मिलेगा।

जब जनता ने केजरीवाल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया तो उसे भी भाजपा कि तरह सत्ता
को हाथ जोड़ देना चाहिए था ,लेकिन हाथीके दाँत खाने और दिखने के अलग होते हैं उसी
तरह "आप" ने सत्ता का सुख भोगने का शॉर्ट कट लिया उसका अर्थ यह था कि सत्ता मिल
गयी तो राज करते रहेंगे और काँग्रेस ने हाथ हटाया तो जनता को कह देंगे कि हमने तो
आपके कहने पर यह सब पाप किया।

  मुझे रामायण का वह खंड याद आता है जब राम के वनवास कि बात सुन अयोध्या की
प्रजा ने राजा दशरथ का साथ छोड़ श्री राम को राजा मान लेने का निर्णय कर लिया था।
खुद दशरथ भी राम से कह चुके थे कि -"बेटा ,मुझे कारावास में बंदी बनाकर तुम राज कर
लो "मगर श्री राम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि उनके इस आचरण का
दूरगामी प्रभाव प्रजा पर पडेगा और वह भी धीरे -धीरे अनैतिक हो जायेगी। राम ने वनवास
को सुराज्य कि स्थापना के लिए स्वीकार किया था। श्री राम ने उस समय जनमत के
विरुद्ध आचरण करके वन जाना स्वीकार क्यों किया ?उन्होंने जनमत का आदर क्यों नहीं
किया जो उन्हें उसी समय राजा के रूप में स्वीकार कर चूका था।

केजरीवाल जनता कि भावुकता और सरल ह्रदय का फायदा उठाने कि सोच चुके हैं ,अगर
जनता ने भावावेश में कोई निर्णय कर लिया तो इसका मतलब यह नहीं की केजरीवाल
सिंहासन पर बैठ जाये। केजरीवाल और उनकी टीम ने कभी भी जनता से यह प्रश्न नहीं
किया कि हमें वापिस जनता के पास जाना चाहिए ,क्यों ? आप जनता से हाँ या ना क्यों
पूछ रहे थे ?उनको यह क्यों नहीं समझा रहे थे कि काँग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना
अनैतिक है ?

इसके जबाब में "आप"यह तर्क दे कि जनता इतना जल्दी चुनाव का खर्च नहीं बर्दास्त
कर पायेगी लेकिन इस बात में कोई दम नहीं है क्योंकि जनता जानती है की उसने सही
बहुमत नहीं दिया इसलिए वापिस चुनाव का खर्च उठाना पडेगा। देश की जनता मौका
परस्त नहीं है ,देश कि जनता नैतिकता के प्याले में अनैतिकता का घोल पसंद नहीं
करती है मगर उससे छद्म और छल से गलत फैसला करवा कर हम किस ढ़ंग की
नैतिकता की स्थापना करने जा रहे हैं यह शोचनीय है

   

21.12.13

दोस्तों से डर लगे







राजेश त्रिपाठी
रहबर कभी थे आजकल राहजन होने लगे।
मूल्य सारे क्यों भला इस तरह खोने लगे।।
स्वार्थ की आग में जल गयी इनसानियत।
दुश्मनों की कौन पूछे दोस्तों से डर लगे।।

जमीं पर था कभी अब आसमां को चूमता।
उसको इनसानियत का पाठ बेमानी लगे।।
झोंपड़ी सहमी हुई है, बंगले तने शान से।
ये तरक्की की तो हमें बस लंतरानी लगे।।

आपने देखा अपना आज का ये हिंदोस्तां।
हर तरफ मुफलिसी औ गम के मेले लगे।।
कोई मालामाल तो कर रहा है फांके कोई।
ख्वाब गांधी का तो अब यहां फानी लगे।।

हर तरफ नफऱत रवां है, आदमी बेजार है।
प्यार लेता सिंसकियां दुश्मनी हंसती लगे।।
हम भला क्या कहें अब सारा जहां बीमार है।
मुल्क में लोग खौफ के ख्वाब हैं बोने लगे।।

पाठ समता का कभी जिसने पढ़ाया खो गया।
सुख की सोये नींद कोई कोई कर रहा रतजगे।।
दुनिया में जो था आला आज वह बदहाल है।
ये खुशी तो है नहीं हंसता आदमी रोने लगे।।