21.11.15

परिचर्चा- आजादी, लोकतंत्र और सरकारें : देश के विकास का माडल अब बदलना होगा

"साझा संस्कृति मंच" के तत्वावधान आज वाराणसी में नेपाली कोठी स्थित सभागार में आयोजित परिचर्चा जिसका विषय “आजादी लोकतंत्र और सरकारें” था में वक्ताओं ने आजादी मिलने के सातवे दशक में देश की स्थिति पर चर्चा की. इस अवसर पर मुख्य वक्तव्य दे रहे छतीसगढ़ से आये वरिष्ठ गांधीवादी चिन्तक हिमांशु कुमार ने कहा कि भारत की आज़ादी के वख्त इसे एक ऐसा मुल्क बनाने का सपना देखा गया था जिसमें सभी धर्मों , भाषाओँ के लोग बराबर होंगे . गरीब और अंतिम व्यक्ति का सबसे पहले ध्यान रखा जाएगा, भारत यह संस्कृति सारी दुनिया को सिखायेगा, लेकिन आज़ादी के कुछ ही समय बीतने के बाद देश के कई समुदाय डर महसूस करने लगे हैं, गरीबों की ज़मीन सरकारी ताकत के सहारे छीन कर अमीरों को दी जा रही है, आज़ादी के सारे वायदों से मुकरा जा रहा है . आज देश की सरकारें उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के हित साधन में लगी हुयी हैं. उद्योगपतियों को यह सब कुछ सस्ता और लगातार चाहिये, उसके लिये उसे सरकार पर अपना नियंत्रण भी चाहिये, कच्चे माल के इलाकों में रहने वाले लोगों के कब्ज़े से वो इलाका खाली करवाने के लिये फौजी ताकत का प्रयोग भी किया जा रहा है यही कारण है कि आज भारत का मिडिल क्लास अपने आदिवासी भाई से युद्ध कर रहा है.




          वक्ताओं ने कहा कि आदिवासियों  के संसाधन पर कब्जे के बाद अब पूजीपतियों और कार्पोरेट की दृष्टि किसानों पर है. यह बीस प्रतिशत साधन सम्पन्न उच्च मध्यम वर्ग अस्सी प्रतिशत के खिलाफ एक प्रकार का युद्ध छेड़ कर बैठा है. आज दुनिया में विकास के मायने बदल रहे हैं ऐसे में हमारे देश को भी अपनी सोच बदलनी होगी, अमरीका के विकास के माडल को जल्द ही छोड़ना होगा. क्योंकि यह विकास का अंग्रेज़ी माडल है जो युद्ध और पर्यावरण का विनाश ही लाएगा. इसमें सारे समाज का असली विकास अर्थात सबका सामाजिक ,राजनैतिक , आर्थिक विकास , भाषाओँ, कलाओं का विकास , समानता और प्रेम का विकास सम्भव ही नहीं है. विकास के वर्तमान दौर में हमने पर्यावरण के महत्व को बहुत हद तक नजर अंदाज कर दिया है जिसका खामियाजा भी हमे समय समय पर भुगतना पड़ रहा है. विकास की योजनाये बनाते समय उसके पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्प्रभावों पर गंभीर चितन होना चाहिए

           इस क्रम में वक्ताओं ने आगे कहा कि सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस सरकार के आदेश पर चलती है सरकार अमीरों की मुट्ठी में होती है इसलिए अक्सर सेना,अर्धसैनिक बल और पुलिस अमीरों के फायदे के लिए गरीबों के विरुद्ध क्रूर बर्ताव करते हैं, हमें शासन को सेना अर्ध सैनिक बल और पुलिस के बल पर चलाये जाने को नकारना होगा. लोकतंत्र में जनता से बातचीत के द्वारा कामकाज किया जाना चाहिये.



परिचर्चा में मुख्य रूप से मुहम्मद भाई, प्रो. महेश विक्रम सिंह., डा स्वाती, अनूप श्रमिक, डा आनंद तिवारी,रवि शेखर, अफलातून,  डा लेनिन रघुवंशी, मकसूद अली, डा नीता चौबे, वल्लभाचार्य पाण्डेय, उज्ज्वल भट्टाचार्य, जागृति राही, निहार, दिलीप दिली, लक्ष्मण प्रसाद, सतीश सिंह, विनय, सूरज, श्रुति नागवंशी, महेंद्र राठोर आदि ने विचार रखे. अध्यक्षता प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह और संचालन एकता ने किया.


भवदीय

साझा संस्कृति मंच

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