हास्य-गजल
उठाकर क्राकरी महरी किचन में जब गिराती है
मैं आपे में नहीं रहता तुम्हारी याद आती है
निकट तोते के जब तोती कोई इठला के जाती है
फुदकता हूं मैं मेढक बनके तेरी याद आती है
किसी भी ठूंठ पर तितली जब अपने पर हिलाती है
सिसकते दिल के गुलदस्ते पे बिजली कौंध जाती है
पड़ोसन जब भी बल्बों को जलाती है बुझाती है
मेरा दिल लुपलुपाता है तमन्ना लड़खड़ाती है
हजामत को नहीं पैसे बढ़ी aआती है
अदा से गर्म डोसे पर वो जब चटनी लगाती है
गरीबों को कभी नीरव नहीं मिलता कोई साथी
है दिल की पासबुक खाली तुम्हारी याद आती है।
पं. सुरेश नीरव
मों-९८१०२४३९६६
3 comments:
NOTICE
kya panditji aap bhi roj ek farakati hui si lambi chori gajal pel dete hain. bhadas ki fat jayegi.fir is jurm me aap bhitar jayenge.
shashibhuddin thanedar
तोड़कर क्राकरी जब महरी आँख दिखाती है
काम छोड़ने को कह कर धमकाती है।
चाय में नमक और सब्जी में चीनी पड़ जाती है
सच कहूँ प्रिये तुम्हारी याद आती है।
सब्जी साबुत रहती है और उंगली कट जाती है।
रोटी कच्ची रहती है और उंगली जल जाती है।
खाना खाने की जगह पेट भर लेता हूँ।
पेन्ट की जगह पजामा पहन लेता हूँ।
सच कहूँ प्रिये तुम्हारी याद आती है।
तुम्हारा लड़ना तुम्हारा झगड़ना।
बात बात पर तुम्हारा अकड़ना।
तुम्हारा मुस्कराना, तुम्हारा प्यार जताना।
जरासी बात पर अपना मुंह फुलाना।
तन्हाई मुझे सब याद दिलाती है।
सच कहूँ प्रिये तुम्हारी याद आती है।
Bhai waah panditji waah waah;
Kitni taarif karoon?.Kya tasveer khichi hai padosan ki aur uske bulb jalaane aur bujhane ki.
Bhai ye gazal padhke hamain bhi kuchh-kuchh hone lagaa hai.
Roz yun hi lage rahiye.
Mrigendra Maqbool.
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