जब जिम्मेदारी बढ़ जाती है तो दायित्य भी बढ़ जाता है । कुछ ऐसा ही हम नेपाली मओवादिओं के वारे में कह सकते है क्योंकि आजकल कुछ ऐसा ही पटना में चल रहे कवायदों से मालूम परता है। यदि नेपाली माओवादियों का भारत सरकार के साथ अच्छा सम्बन्ध बनता है तो यह अपने यहाँ के माओवादियों के लिए एक सबक होगा की बंदूक छोर bailet पर विश्वास करें। ऐसी कोई सरकार नहीं होगी की उनके साथ अच्छा सलूक न करे। आज के दुनिया में आप बंदूक के बल पर कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। जिस माओ के सिधांत को माओवादी मानते हैं उस माओ के चीन में ख़ुद उस सिधांत का कोई पूछ नहीं। सायद चीन वासी जल्दी समझ गए की बेतुकी सिधांत से अच्छा है जीवन को आगे बढाने वाला नुस्खा अपनाया जाय। बुद्धि वाला मानव वही कहलाता है जो दुनिया के साथ कदम मिलकर चलता है। तो भारतीय माओवादियों आप की बुद्धि कब रस्ते पर आएगी।
27.4.08
भड़ासियों को F.B.I. के नाम पर चूतिया बनाने की कोशिश है
आखिर ये यूरोपियन लोग कब तक हम भारतीयों को लालची और चूतिया समझते रहेंगे। जरा देखिये लाटरी लगने की ई-मेल से दो कदम आगे का तरीका अपनाया गया है। ध्यान रखिये कि किसी भी हाल में जीवन में अगर पैसा शार्टकट से आता है तो कहीं न कहीं गलत ही होगा क्यों कि अगर हम सब इतने भाग्यशाली होते तो भड़ासी न होते।
Anti-Terrorist and Monitory Crimes Division.
Federal Bureau Of Investigation.
J. Edgar. Hoover Building Washington D.C
Attn: Beneficiary,
This is to Officially inform you that it has come to our notice and we have thoroughly Investigated by the help of our Intelligence Monitoring Network System that you are having an illegal Transaction with Imposters claiming to be Prof. Charles C. Soludo of the Central Bank Of Nigeria, Mr. Patrick Aziza, Mr Frank Nweke, none officials of Oceanic Bank, none officials of Zenith Bank and imposter claiming to be the Federal Bureau Of Investigation. During our Investigation, it came to our notice that the reason why you have not received your payment is because you have not fulfill your Financial Obligation giving to you in respect of your Contract/Inheritance Payment.
So therefore, we have contacted the Federal Ministry Of Finance on your behalf and they have brought a solution to your problem by arranging your payment in total of US$800,000.00 in an ATM CARD which you will use to withdraw money in anywhere of the world. You now have the lawful right to claim your fund in the ATM CARD.
Since the Federal Bureau of Investigation is involved in this transaction, all you did have to do is to be rest assured for this is 100% risk free because it is our right to make sure that you receive your ATM CARD. All I did want you to do is proceed and contact the ATM CARD CENTER via email for their requirements to proceed and procure your Approval Slip on your behalf which will cost you $150.00 only and note that your Approval Slip contains details of your PERSONAL IDENTIFICATION NUMBER (PIN) which you will use in activating your ATM CARD in any ATM MACHINE.
Do contact Mr. Paul Smith of the ATM CARD CENTRE with your full name, home address, mobile telephone number, home telephone number or work telephone number and bank name so your files would be updated after which he will send the payment informations to you which you will use in making payment of $150.00 via Western Union Money Transfer or Money Gram for the procurement of your Approval Slip after which the delivery of your ATM CARD will be effected to your designated home address without any further delay.
Name : MR PAUL SMITH
Email Address : paulsmith.01@live.com
We order you get back to this office after you open contact with the ATM SWIFT CARD CENTRE and we do await your response so we can move on with our Investigation and make sure your ATM SWIFT CARD gets to you.
Thanks and hope to read from you soon.
FBI Director
Mr.Paul Smith
Note: Do disregard any email you get from any imposter or office claiming to be in possesion of your ATM CARD, you are adviced only to be in contact with Mr. Paul Smith of the ATM CARD CENTRE who is the rightful person you are suppose to deal with in regards your ATM CARD PAYMENT and forward any email you get from imposters to this office so we could act upon and commence investigation
FEDERAL BUREAU OF INVESTIGATION ATM CARD PAYMENT
Federal Bureau Of Investigation
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
1 comments
गैंगमैन कुली या कुली गैंगमैन
Posted by
Anonymous
2
comments
हरभजन सिंह को सजा मिले!
आखिर हरभजन सिहं को समझ आ ही गया कि अगर एक ही गलती को बार बार किया जायगा तो फिर देश वासी भी उनके साथ खडॆ नहीं होंगे.
दरअसल आस्ट्रेलिया में जो कुछ हरभजन ने किया था वो भी इतना ही शर्मनाक था जो उन्होने भारत में श्रीसंत के साथ किया, लेकिन उस समय वो देश के लिये खेल रहे थे और जो आरोप उन पर लगाये गये थे वो उनके साथ साथ देश के ऊपर लगे थे और इसीलिये सारा देश ये जानते हुए भी कि वो गलत हैं उन्के साथ खडा था.
और आज हर देशवासी चाह्ता है कि हरभजन को उनके गलत व्यव्हार की सजा मिले.
sanjayrkablog.blogspot.com
Posted by
Unknown
3
comments
26.4.08
पत्रकार बिरादरी की लाचारगी
दुनिया को रास्ता दिखाने वाला लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मलिकों के दबाव के आगे घुटघुट कर जीने को मजबूर है। हर किसी के शोषण के खिलाफ अपनी कलम से आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार जगत की आवाज मालिकानों की धमक के आगे दबकर रह गई है। अब इसे पत्रकारों की नपुंसकता मानें या उनकी रोजी-रोटी की मजबूरी वह विसंगतियों के बीच जीने को अभिशप्त हैं। विभिन्न विभागों के कर्मचारियों के वाजिब वेतन और भत्ते की चिंता करने वाला कलमकार खुद अपने यथोचित पगार के लिए आवाज उठाना तो दूर सुझाव तक देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। राष्ट्रीय श्रमजीवी पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए गठित वेतन बोर्ड के सामने एक साल में मात्र ११ सुझाव ही मिलना पत्रकारों की वास्तविक संघर्ष सामथ्र्य की पोल ही खोलता है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने श्रमजीवी पत्रकार एवं अन्य समाचार पत्र कर्मचारियों के वेतनमान निर्धारण एवं संशोधन के लिए दो राष्ट्रीय वेतन बोर्ड गठित किए हैं। एक बोर्ड श्रमजीवी पत्रकारों तथा दूसरा गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए २४ मई २००७ को जारी अधिसूचना एवं तीन जुलाई २००७ के आदेश तहत गठित किए हैं। बोर्ड को मई २००८ तक अंतरिम रिपोर्ट तैयार करनी है इसलिए प्रत्येक राज्यों में बैठक में पत्रकारों एवं मालिकों से सुझाव लिए जा रहे हैं और इसी सिलसिले में राजस्थान के जोधपुर में गत दिवस पहली बैठक हुई। वेतन बोर्ड की हुई प्रथम बैठक में यह तथ्य सामने आया कि देशभर में अभी तक बोर्ड को मात्र ११ ही सुझाव मिले हैं। सुझाव नहीं मिलने की वजह यह है कि पत्रकार प्रतिष्ठान मालिकों के डर से खुलकर सामने आने से कतरा रहे हैं। बैठक में वेतनबोर्ड के सदस्य सचिव केएम साहनी ने बताया कि अहमदाबाद में एक पत्रकार ने यहां तक कहा कि आपसे मिलने की सूचना भी पत्र मालिक को मिल गई तो हमारे लिए समस्या पैदा हो जाएगी। उन्होंने कहा कि बैठक में यह भी सुझाव आया कि वेतनमान लागू नहीं करने वाले समाचार पत्रों को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन एवं कागज कोटे में सख्ती बरती जाए लेकिन इस प्रकार का निर्णय समाचार पत्र मालिकों के खिलाफ जाकर लेने का साहस किसी सरकार के पास नहीं है। इस संबंध में १२५ अखबारों को नोटिस जारी किए गए हैं। जस्टिस नारायण कुरुप की अध्यक्षता में गठित वेतन बोर्ड को अपनी रिपोर्ट २०१० तक केंद्र सरकार को देनी है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में पांच से सात मई तक नई दिल्ली कार्यालय में जन सुनवाई भी रखी गई है। अब देखने वाली बात यह है कि उस सुनवाई में कितने पत्रकार सुझाव देने की हिम्मत जुटा पाते हैं।
Posted by
IMP Blog
1 comments
पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप, टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!, बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!
1--------
पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पाप
पत्रकारिता के लिए आज सबसे फिट और एकल संबोधन है...मीडिया मार्केट। कोई मिशन-फिशन नहीं रहा। शुद्ध धंधा। जैसी की पहली पोस्ट पर कुछ मित्रों की लिखित-मौखिक प्रतिक्रियाएं रहीं, उनके या अन्य किसी के अंदेशे का मैं यहां समन करने नहीं जा रहा, न ही सोदाहरण इस पर यहां कुछ लिखने-पढ़ने या भंडाफोड़ जैसी सनसनी परोसने की मेरी मंशा है। क्योंकि शीत-पीत पत्रकारिता के झंडाबरदार इस पर पहले ही काफी कुछ कागजी शेखियां बघार चुके हैं। यहां मैं अपनी बात क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस)काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखने जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जाएंगे....
.....घीसू-माधव एक ही अखबार में काम करते हैं। घीसू (आत्मा से) मर चुका है। माधव मर रहा है। दोनों ने तिल-तिल मौत का रिहर्सल और एहसास भी किया है।
....घीसू का बेटा शहर के सबसे महंगे कान्वेंट स्कूल में पढ़ रहा है। उसके पास एसी गाड़ी, शहर के सबसे पॉश इलाके में शानदार बंगला और पत्रकारिता की दुनिया में उसका क्या खूब बिकाऊ-टिकाऊ नाम है।
....माधव अभी पत्रकारिता के पराड़करी तर्पण में अस्तव्यस्त है। गर्मियां मटके के पानी में बीत जाती हैं, बच्चे गांव की पाठशाला में नाक पोंछ रहे हैं। पत्नी १८ की उमर में ३८ की हो चली है। बूझो तो जानें कि माधव की मौत और घीसू की जिंदगी के अर्थ क्या हैं?
......घीसू क्राइम रिपोर्टर है। माधव को दफ्तर में अपने बड़ों के पैर छूने नहीं आता। घीसू को मालूम है कि किस सर के घर शराब की पेटी पहुंचानी है, किस सर के खाने की टिफिन उनकी मेज पर लगानी है, किस सर के कपड़े प्रेस कराना है, किस सर का बच्चा जब जोर जोर से रोता है तो कौन सी टाफी खिलाने पर चुप हो जाता है।
.....एक बार घीसू अपने स्वामी के चेंबर में दबे पांव घुसा कई कुंतल विनम्रता ओढ़े हुए, पूरी आस्था से दांत निपोरे हुए। बोला, सर आपको देखकर मुझे अपने पिता की याद आती है। आप मेरे पिता समान है। स्वामी बोले, वो तो मेरे यहां नौकरी करने वाला हर कर्मचारी मुझे पापा कहता है। जब दूसरे अखबार में जाता है तो वहां के स्वामी उसके पापा हो जाते हैं। तुम जैसे कर्मचारियों के बीच मैं यूं ही टकलू नहीं हुआ हूं।
....एक बार स्वामी को हंसते हुए देखकर माधव को हंसी आ गई। स्वामी का चौंकना स्वाभाविक था कि जब मेरे इर्द-गिर्द खड़े इतने बड़े-बड़े महानुभाव (दर चापलूस) मेरी हंसी के डर से घर तक पत्नी-बच्चों को डांट भगाते हैं, फिर इस ट्रेनीज कमीनगी के मायने क्या हो सकते हैं? माधव आज तक स्वामी की हंसी और अपने डिमोशन का अंतर नहीं समझ पाया।
....घीसू की बीवी एक कथित राष्ट्रीय दल की जब्बर दलैत है। बेटा थानों से चौथ वसूलता है। (पुत्र के परमानेंट होने के बाद से) पिता शहर के नामी समाजसेवी हैं। हर महीने, हर थाने से उनके नाम सफेद लिफाफा आता है। अखबार के फोटोग्राफर ने घीसू के बच्चों की अब तक आठ दर्जन से ज्यादा तस्वीरें खींचीं हैं। शहर के सिपाहियों के दबादले की सूची घीसू की माता जी बनाती हैं।
....माधव की मां तपेदिक से मर चुकी है। पिता गठिया का मरीज है। बाकी बीवी-बच्चों के बारे में हर किसी को पता है।
......घीसू के पास कई बीवियां हैं। कई दुकानों से उसके यहां शराब की पेटियां आती हैं। हर रिक्शे वाला उसके बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए लालायित रहता है। बीवियां थाने से नीलामी की गाड़ियां उठवाती हैं।
.....ड्यूटी से छूटने के बाद माधव शराब पीता है और गालियां देता है। कहता है, आज तक मुझे कभी जेल की सजा नहीं हुई। सोचता हूं, एक बार ३०७ में जेल हो आऊं!
------------------------------------
2-----------------
टीआरपी सिंह लड़कियों के शौकीन हैं!
1. पत्रकारिता एक माल है, निजी संपत्ति जुटाने का खेल है, इसलिए युवतियों की नंगी फोटो छापो। नंगी फोटो छापना भी कोठे चलाने की एक विधा है। आज-कल संपादक लंपट सिंह इस काम में सबसे बोल्ड लीचड़ माने जाते हैं।
2. टीवी पत्रकारिता टीआरपी की भड़ैती में व्यस्त और मस्त-मस्त है। अब तो निर्वस्त्र दृश्यों से भी उनका काम नहीं चल रहा है, सो कोठेबाजी को आयुष्मान बनाए रखने के लिए हंसोड़ों की फौज लेफ्ट-राइट करने लगी है। ऐसे निर्लज्ज हंसोड़, जो अपनी मां-बहन को छोड़ पूरी दुनिया की औरतों के जिस्मानी चटखारे लेने का धंधा करने लगे हैं। गंदे जोक के नाम पर एंकरिंग की दुकान भी पूरी बेहयायी से कंडोम और चोली-घाघरा की तिजारत करने लगी है। ऐसे दो भड़ैत भड़भूज बुद्धू और चेंकर चुम्मन दांत चियारे, हाथ पसारे आजकल करोड़ों में खेल रहे हैं। तुर्रा यह कि दुनिया को हंसा रहे हैं। जरा अपनी मां-बहन को नंगा नचाकर दुनिया वालों को हंसाओ तो जानें।
3. लंपट सिंह कहते हैं कि सेठ जी की मौत की खबर तीन कालम में पेज के टॉप पर लगेगी। लू-ठंड और मुफ्लिसी की मिर्गी से मरने वालों को संक्षेप कॉलम में कहीं किनारे चेंप कर छुट्टी पाओ। समझे कि नहीं समझे! उठावनी के विज्ञापनों से अच्छी कमाई हो रही है। खबरें हटाकर उठावनी छापो, तभी तो तुम्हारी सेलरी का जुगाड़ होगा।
4. एक साहित्य संपादक भांड़ेन्द्र जी मुद्दत से स्री-विमर्श में तल्लीन हैं। ओक्का-बोक्का, तीन चलोक्का, लइया-लाची, चंदन काटी, इजयी-न-विजयी, पान-फूल ढोंड़वा पचक्क। अपने लीद-लेखों में वे अक्सर लिखा करते हैं कि स्त्री के पास एक देह ही तो ऐसी चीज है, दिखाने-भुनाने के लिए। उसकी लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार उसका देह है। वैसे संपादक जी की स्री-पटकथा से भला कौन वाकिफ नहीं।
5.चूंकि देश की राजधानी में रहते हैं, इसलिए टीरापी सिंह, भांड़ेन्द्र जी और लंपट सिंह रोजाना शाम सात-आठ बजे मुफ्त के तीन-चार पैग सूतने के बाद देश-दुनिया और अखबारी मालिकाने पर गंभीर चर्चाएं-मंत्रणाएं किया करते हैं। आखिरकार उनकी बैठकी यह सिद्धकर ही समाप्त होती है कि सेठ, सांसद और अफसरशाह महान हैं। भारत भुक्खड़ों का देश है।
6.लंपट सिंह पहले जहां काम करते थे, एक दिन स्वामि-भक्ति की पिनक में अखबार-मालिक को त्यागपत्र थमा बैठे। बदकिस्मती से स्वामिभक्ति गच्चा दे गई। इस्तीफा मंजूर हो गया। अगले दिन सिक्योर्टी ने जनाब को प्रेस में घुसने से रोक दिया तो पहुंच गए मालिक के बंगले पर। बर्फी और कॉफी से अगवानी के बाद मालिक सर बोलेः भाई रिजायन कर दिया है तो क्या हो गया, कभी कोई दिक्कत-परेशानी अकेले मत झेलना, मुझे खबर कर देना, मदद कर दिया करूंगा। अब नौकरी करके क्या करोगे। लंपट जी चक्कर खाकर गिर पड़े। वहीं खून की बोमेटिंग हुई। अब बेचारे सालों की बेरोजगारी के बाद उठावनी और अश्लील तस्वीरें छापने के नए आइडिया के साथ दिल्ली में नमूदार हुए हैं।
7. सभी न्यूज चैनलों को मालूम है कि टीआरपी सिंह देश का सबसे बड़ा आइडिया-चोर है। पूरा-का-पूरा पैकेज चुटकियों में टिपवाकर अपने यहां कर देता है...फ्लैश-फ्लैश!! चोखा-चटनी-घी-अचार के बावजूद बाकियों का जायका फिस्स। यानी टीआरपी खुश, बाकी फुस्स। इसे कहते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, समझे-कि-नहीं समझे!
8.लंपट सिंह बड़े विद्वान और बाल-साहित्य-विशेषज्ञ हैं। रोजाना जब तक दो-चार कर्मचारियों के बच्चों के पेट पर लात न मार लें, उनको खाना हजम नहीं होता है। अब तक छप्पन दर्जन लात मार चुके हैं। वैसे वह मारपीट और गाली-गलौज के सख्त खिलाफ हैं। सशस्त्र-वार्ता के बाद एक बार थाने में अनायास पसीने-पसीने हो गए थे।
9.टीआरपी सिंह लड़कियों के करारे शौकीन हैं। गीत-गजल अच्छी लिखते हैं। भंडाफोड़ होते ही बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने-रिरियाने लगते हैं। अपनी जिस्मानी लुच्चई के फेर में अब तक कई चैनल बदल चुके हैं। कई बार पिटे-पिटाये भी हैं। अब तरह की दैहिक समीक्षा के आदती हो चले हैं। दिल्ली में सब चलता है।
10.लंपट, टीआरपी, भाड़ेंद्र, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। नक्षत्र क्या, चांद-सूरज या सप्तऋषि-मंडल हैं। मंडली के आगे सरकार, पीछे कई पुश्तों का बैंक-बैलेंस है। पराड़कर जी ने इसीलिए तो बनारसी मालदार बाबू शिवप्रसाद गुप्त की चौखट पर मत्था टेक कर इस देश में पत्रकारिता के आदर्श रचे थे। जय हो! जय हो!!
-करतूतें सच्ची, नाम काल्पनिक।
------------------------------------
3--------------------
बड़ा नाम करेगा चुगलू फादर......च्च्च्च्चो!
(यहां मैं चरित्रहीन मीडिया की बातें क्रमशः सौ (प्रतिदिन दस) काल्पनिक पात्रों के माध्यम से रखता जा रहा हूं, जो ईमानदार और भ्रष्ट, कनिष्ठ-वरिष्ठ दोनों तरह के पत्रकारों ही नहीं, पूरे मीडिया-सिस्टम के मन की गांठें खुद-ब-खुद खोलते चले जा रहे हैं....लंपट दुबे, टीआरपी सिंह, भाड़ेंद्र जादो, भड़भूज बुद्धू, चेंकर चुम्मन भारतीय पत्रकारिता के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं....से आगे पढ़ें आज...पत्रकारिता की कोख में कैसे-कैसे पापःतीन.....बड़ा नाम करेगा चुगलू मादर......च्च्च्च्चो!)
1.बिगांडू महतो अभी साल-छह महीने से अखबार के पेशे में आया है। हक्का-बक्का है। चपड़दंती मुंह बाए दिन भर शहर के इस कोने से उस कोने तक ड्यूटी बजाता फिरता है। शाम को इकट्ठे पूरी रिपोर्ट मुंह जुबानी एडिटोरियल इंचार्ज को देनी होती है। ड्यूटी भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, खबर-सबर की नहीं, लिखने-पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं, सब साबुत-साबुत मुंह-जुबानी। ......कि हमारे अखबार का रिपोर्टर आज हमारे प्रतिद्वंद्वी अखबार के किन-किन रिपोर्टरों से मिला। ....कि किस रिपोर्टर ने आज हमारी कौन-सी खबर लीक की। ....कि फलां कार्यक्रम के इनोग्रेशन में फलां संपादक को क्यों बुलाया गया, हमें क्यों नहीं। .....कि पत्रकार संघ के चुनाव में हमारे अखबार का कंडीडेट विरोधी अखबार के कंडीडेट से क्यों हार गया, मतदान में कौन-कौन से हमारे-अपने विभीषण रहे?
2. फटीचर मंडल सर्कुलेशन इंचार्ज हैं। उनको आज-कल एक ही चिंता खाए जा रही है। एबीसी वाले शहर में डेरा डाल चुके हैं। अब क्या होगा। साल भर रिपोर्ट तो नंबर दो में बनी है। अब वे खंगालेंगे एक-एक रिकार्ड। बाहर रास्ते में अखबार के बंडल से लदी गाड़ियां चेक करेंगे। मंडल साहब एक बार फिर उसी आजमाये पुराने फार्मूले को भिड़ाने में जुटे हैं कि सांप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। चार-पांच जोड़ी जूते, चार-पांच दर्जन चूड़ियां और साड़ियां, दस किलो मिठाई, प्रति कंडीडेट दो-दो सेट कपड़े...। ऐं, ये क्या है? सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल से पूछिए!!
3. सर्कुलेशन गुरू फटीचर मंडल की एक टेंशन हो तो झेल भी जाएं, रोज चार तरह के टेंशन। आज-कल एजेंटों का फिर माथा फिरा हुआ है। सवेरे अखबार के बंडल उठाने की बजाय सेंटर पर पहले मीटिंग करते हैं। नेतागीरी का शौक चढ़ा है। कहते हैं, आज हम अखबार नहीं उठाएंगे। पहले एक रुपया हमारा कमीशन बढ़ाओ। अब कमीशन कहां से बढ़ाएं। अखबार का रेट बढ़ाते ही ग्राहक बोलते हैं, ई कूड़ा-कबाड़ा हमे नहीं पढ़ना, कल से अखबार बंद कर दो। अब रेट बढ़ाएं तो सांसत, न बढ़ाएं तो। इसी चक्कर में रोजाना सर्कुलेशन गिर रहा है। लगता है कि इन पर भी वहीं पुराना फार्मूला एक बार फिर आजमाना पड़ेगा....दै डंडा, दै डंडा, पट्ट कर दो सबों को एक साथ। अभी क्राइम रिपोर्टर से तिग्गी भिड़ाता हूं कि पिटाई के समय कोई पुलिस वाला बीच में न आए।
4. मुच्छड़ दुबे पुराने गुंडे हैं। कालेज के दिनो के। बेचारे ने अखबार में नौकरी कर ली है। अब उसे रोज अपने संपादक को बताना है कि कौन, किसके कान में क्या फुसफुसा रहा था। किस रिपोर्टर की किससे ज्यादा पटती है, मुझसे किसकी ज्यादा फटती है। आज कल डेस्क वाले शाम को आने वाली मिठाइयों को क्यों दबा जा रहे हैं। खुद ही खा जा रहे हैं। चुनाव का मौसम है। फिल्ड से मिठाइयों के इतने पैकेट रोजाना आ रहे हैं, मेरी मेज तक एक भी नहीं पहुंचे। जरा पता तो लगाओ, इसके पीछे शरारत किसकी है, किसका दिमाग इतना तेज काम कर रहा है, अभी दुरुस्त करता हूं। आखिर मैं भी बाल-बच्चेदार हूं, दो-चार पैकेट मुझे भी तो घर के लिए चाहिए। आज-कल रिपोर्टरों को फिल्ड में खूब गिफ्ट भी मिल रहा, सो अलग से। सब दबाके बैठ जा रहे हैं, जरा कस के पता करो, बाकी सब काम-धाम छोड़ दो। ठीक-ठीक पता कर लिये तो इस बार प्रमोशन-इंक्रीमेंट डबल। इसी तरह लगे रहो, लंबी रेस का घोड़ा बनोगे, पत्रकारिता में आगे चल कर बड़ा नाम करोगे पट्ठे। और क्या, तुम कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े ही कर रहे हो दुबे जी। सबसे पक्का काम कर्मचारियों की जासूसी और इधर-उधर का लगाना यानी चुगलखोरी। तुम भी खुश, हम भी खुश। अखबार जाए चूल्हे भाड़ में।
5. चिंटू-पिंटू की ड्यूटी है कि सबके उसमे (.....) डंडा किए रहो। किस-किस के उसमें (.....) डंडा करना है सर? अरे!! ये भी कोई पूछने की बात है! दाढ़ी-मूंछ सफेद कर लिये प्रेस की नौकरी में, और ये तक पता नहीं कि किस-किसके उसमें (....) डंडा किये रहा जाता है? होटल वालों के, थाने वालों के, सिनेमा वालों के, मंडी वालों के, मिठाई वालों के, शो रूम वालों के, बिजली वालों के, पानी वालों के, मीट-मुर्गा वालों के, फल-सब्जी वालों के, ठेकेदारों के, नेताओं के, उठावनी के विज्ञापन देने वालों के.....। सर, तब तो पूरे शहर के उसमें (.....) डंडा करना पड़ेगा! हां, और क्या। तुम्हे रक्खा किसलिए गया है चिंटू-पिंटू। कुछ मालूम है, चूतिया कहीं के! मादर......च्च्च्च्चो।
6. तरकर जी बड़े सीनियर जर्नलिस्ट हैं। अब तक देश के उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम के दर्जन भर से ज्यादा अखबारों में नाम कमा चुके हैं। हर शहर में उनकी बस दो ही जरूरतें रहीं हैं, एक बीवी और एक मकान। इस तरह अब तक करोड़ों की नाजायज जायदाद और दर्जन से ज्यादा नाजायज औलाद के विधाता बन चुके हैं। तो भी तरकर की व्यथा-कथा अनंता। दर्दे-दिल ये कि सब कुछ अपने ही डकारते रहे, अपने ऊपर वालों से बेखबर। सो फ्रस्टेशन बढ़ता गया, बढ़ता गया। मुद्दत से सब-एडिटरी। यानी जिंदगी बीती जा रही, हाई स्कूल पास न हुए। जब जोरू-जायदाद खुद ही सब डकार जाओगे तो प्रमोशन-इंक्रीमेंट क्या खाक मिलेगा।
7. लुच्चा पंडित ने पत्रकारिता में कमाई-धमाई का अव्वल आइडिया अख्तियार कर रखा है। साल में सिर्फ दो प्रोग्राम कराते हैं और फूल कर लाल हो जाते हैं, जैसे अमेरिकी सुअर। उनकी एक जुगाड़ मुंबई है। उसके आशीर्वाद से समर सीजन में फिल्म वालों का प्रोग्राम। दूसरा दिल्ली-कलकत्ता में। उसका काम है खेल-खिलाड़ियों के साथ तिग्गी भिड़ाना। सो जाड़े में नेशनल टूर्नामेंट। बस। ना काहू की चुगली, ना काहू की दलाली। पंडी जी का यह डबल गेम उनके ऊपर वालों को लट्टू किए हुए है। कमाई में दस परसेंट ऊपर वालों के बाल-बच्चों के लिए। तुम भी खुश, हम भी खुश। यही सब तरकर जी को नहीं करने आया वरना आज एडिटर की कुर्सी पर होते।
8. सत्येंद्र नरवार तबादले की कौवा हंकनी से परेशान हैं, क्या ससुरा सिर पर पत्तरकारिता का भूत चढ़ा था, इस पेशे में चला आया। इतनी पढ़ाई-लिखाई सब व्यर्थ। लगता है लुच्चा पंडित वाला रास्ता ही धरना पड़ेगा, वरना हर छमाही तबादला। कहां तक झेलें। टाइम आफिस वाले कहते हैं, ऐसा सार्टिफिकेट लेकर अखबार में क्या करने चले आए। यहां तो चुगलुओं का राजपाट चलता है। अरे चोगद जी, बन जाओ चुगलू मादर...च्च्च्च्चो....तुम भी उसकी तरह मजे करोगे। फिर कभी न होगा तबादला। इंक्रीमेंट-प्रमोशन अलग से। समझे बच्चू सतेंदर नरवार!
9. एक जनाब मणिसाना वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू होने की बेकरारी में इतने सस्वर हो उठे कि आजकल रेलवे रोड पर चाय-पान का खोखा चला रहे हैं। मालिक को फूटी आंखों नहीं सुहा रहे थे। निकाल बाहर किया। तेरी ये हिमाकत। यहां लोग अट्ठारह-अट्ठारह घंटे मरा रहे हैं, चूं तक नहीं कर रहे और तू पत्रकार का चोद्दा, दस घंटे काम करके मणिसाना-मणिसाना चिल्ला रहा है....ऐं!!
10. एक और थे। भीतर-ही-भीतर यूनियनबाजी के पर्चे बांट रहे थे। मनीजर बाबू को किसी चुगलू से भनक लग गई। ऐसा संट किया कि आज कल दिल्ली में आईटीओ पर आटो चला रहे हैं। लेकिन हैं बड़ी मस्ती में। अखबार का नाम लेते ही एक सांस में सौ-सौ गालियां धाराप्रवाह ...... मादर.... च्च्चो .... फादर.... च्च्च्चो...... बाहन.... च्च्च्च्चो...... बेटी..... च्च्च्च्चो....
-(सभी नाम काल्पनिक, बाकी सब सही-सही)
(हिंदी पत्रकारिता के पाप का खुलासा करने का बीड़ा उठाया है जेपी नारायण ने। बेहया नामक अपने ब्लाग पर वे लगातार हिंदी पत्रकारिता पर लिख रहे हैं। उन्हीं के ब्लाग बेहया http://behaya.blogspot.com से उपरोक्त तीनों पोस्टें उठायी गई हैं। आप सभी भड़ासियों से अनुरोध है कि उपरोक्त तीनों पोस्टों को गंभीरता से पढ़ें और एक एक लाइन धैर्य के साथ पढ़ें। आपको जरूर लगेगा कि दरअसल ये प्रतीकात्मक कहानियां आपके आसपास की वो कड़वी सच्चाइयां ही हैं जिनसे आप रोजाना की जिंदगी में हमेशा दो-चार होते रहते हैं। जय भड़ास...यशवंत)
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
0
comments
Labels: खुलासा, जेपी नारायण, पत्रकारिता, पाप, बेहया, ब्लाग, भड़ास, हिंदी मीडिया
भड़ास की पोस्टिंग अब दैट्सहिन्दी पर भी
दैट्स हिन्दी के होम पेज पर अब भड़ास की लेटेस्ट पोस्टिंग भी देखी जा सकती है। www.thatshindi.in ने पिछले दिनों हिन्दी में ब्लागर्स की एक्टीविटी को भी एक प्लेटफार्म देने की कोशिश की है। इसके स्पेशल सेक्शन ब्लागर्स ट्रैफिक में बड़ी संख्या में हिन्दी ब्लाग्स की लिस्ट देखी जा सकती है। इसमें ब्लाग्स को सर्च करने के कई आप्शन मौजूद हैं। कोई भी अपना ब्लाग इसमें सबमिट कर सकता है। इतना ही नहीं इसके होम पेज पर कुछ चुनिंदा ब्गाल्स की लेटेस्ट पोस्टिंग भी दिखती रहती है। इनमें भड़ास भी शामिल हैं। इनका चयन कंटेट के महत्व, ब्लाग की नियमितता और उसकी मौलिकता और विविधता के आधार पर किया गया है। ((pls see http://thatshindi.oneindia.in))
अक्तूबर में लांचिंग के बाद संतुलित रफ्तार से आगे बढ़ने वाला हिन्दी न्यूज पोर्टल दैट्स हिन्दी देखते-देखते बीते कुछ महीनों में हिन्दी के प्रमुख न्यूज पोर्टल्स में शामिल हो गया है। खास बात यह है कि सिर्फ दैट्स हिन्दी आईटी प्रोफेशनल्स और मीडिया कर्मियों द्वारा संचालित होने वाला स्वायत्त न्यूज पोर्टल है, जबकि बीबीसी हिन्दी, एनडीटीवी खबर, जोश18, जागरण याहू और वेबदुनिया जैसे पोर्टल किसी न किसी बड़े समूह का एक अतिरिक्त उप्रकम हैं, मगर इस सबके वाबजूद गूगल सर्च इंजन में दैट्स हिन्दी ने इनके समकक्ष अपनी मौजूदगी दिखाई है, न सिर्फ खबरों की तात्कालिकता में बल्कि उनके दिलचस्प प्रस्तुतिकरण में भी।
दैट्स हिन्दी ने पहले से बने-बनाए फारमेट की बजाय यूजर की दिलचस्पी के आधार पर अपना प्रोफाइल और लेआउट तय किया और उसके सकारात्मक नतीजे सामने आए। इस पोर्टल में वीडियो देखने, गाने सुनने, खबरें, मनोरंजन, ज्योतिष जैसे तमाम सेक्शन हैं। इसके अलावा इसके बुकमार्क सेक्शन में यूजर अपना यूनीक बुकमार्किंग यूआरएल बना सकता है।
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
1 comments
Labels: दैट्सहिंदी, प्रयास, ब्लागिंग, भड़ास, हिंदी
आदमी, औरत और सूअरः गणित के हिसाब के रिश्ते-नाते
Human = eat + sleep + work + enjoy
Pigs = eat + sleep
Hence, Human = Pigs + work + enjoy
If, Human - enjoy = Pigs + work
In other words,
Human that don't know enjoy = pigs that work
************ **
Men = eat + sleep + earn money
Pigs = eat + sleep
Hence, Men = Pigs + earn money
If Men - earn money = Pigs
In other words,
Men that don't earn money = Pigs
************ **
Women = eat + sleep + spend
Pigs = eat + sleep
Hence, Women = Pigs + spend
If, Women - spend = Pigs
In other words,
Women that don't spend = Pigs
************ **
Summary:
Men earn money not to let women become pigs!
Women spend not to let men become pigs!
Men + Women = 2 Pigs
Wish all the pigs happy forever.
((धन्यवाद हर्ष भाई, दैनिक जागरण, मुजफ्फरनगर वाले, इस रोचक मेल के लिए...यशवंत))
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
0
comments
अब तो दुनिया कहने लगी...जय भड़ास, जय भड़ास...यकीन न हो तो नीचे की चिट्ठी, आलेख और न्यूज पढ़िए
Dear Yashwantji,
This newsletter has reference to your blog Bhadas. I have given even its link referring to an item about Narendra Modi. This is just for your reference. You can all issues of the newsletter from the archive of the newsletter.I had written a letter to you. I am still waiting for the reply.
Yogesh Sharma
-------
Lets Continue Blog Talk
Last week I wrote about blogging. This week I have lot of stuff to continue the blog talk. I also have Big B talking about blogging! He is in a way promoting the idea of blogging. He may have different mission, but the result is blogging.
A lady journalist based in Mumbai, beautiful and successful-to use her own expression, sent URL of her blog on first day itself. Binu shared with me his experience of blogging and he is sad that pressing assignments are killing his passion for blogging.
I was struck by two incidence of power of blog this week.
There is a blog Bhadas. About 250 others, mostly journalists, use Bhadas as a common platform to express themselves in all shades of vocabulary. Yashvant was the first and the only person to write about what happened at the meeting of Gujarati Samaj. Boycott of Narendra Modi's function by the media was on this blog alone. You can read it in detail in the newsletter. So if the newspapers and others do not express, use the blog.
In another incident, a staff member of Delhi office of Indo Asian Newspaper Service (IANS) used his resignation letter for his outburst against the editor of the Hindi service. What is more? He put the resignation letter on the blog.
Considering all this, at the last minute on Thursday evening I decided to focus more on blogging. And, this time also the newsletter is being released on Thursday night!!!!! I call it law of inertia in real life. Many self improvement experts are minting money for suggesting tips to get over this tendency which is called procrastination in the new age parlance.
Please use the newsletter blog www.medianewsletter.blogspot.com to interact with friends and share your views and experiences with them. My Hindi blog www.zerocolumn.blogspot.com also has some of the media stuff in Hindi besides other items of light reading.अरे बाबा एक बार तो देखो मेरे ब्लोग को !!!!!!
Have A Happy Reading.
With love
Yogesh Sharma
GujaratGobal.com
-----------
Media Newsletter
GujaratGlobal
Issue 8
April 24, 2008
In The Blog Wonderland
Last week Gujarat Chief Minister Narendra Modi had couple of non government engagements in Delhi. One of them was his felicitation by Gujarati Samaj. Our friend Nilesh Shukla who looks after Gujarat's media relations in Delhi for more than a decade asked Delhi media to cover the function.
However, at the venue it was chaos. No arrangement for media. Oraganisors checked media like sleuths. Confrontation was the natural outcome. Friends pulled all strings. Nilesh was at the airport. However, friends managed entry using BJP headquarters contacts.
Inside, trouble began afresh. Friends and fans of Modi began protesting the position of cameramen. They shouted and yelled. We do not want you, was the cry. Media persons looked around. They could not make out whether was looking at them or had a blank stare. They retreated in protest. But there was none to stop him. Certainly there could be no worse instance of humiliation of invited media.
All knew that there protests would meet the same fate in their own office. But Yashwant Singh of Bhadas was prompt to put the matter on his blog in his own way within two hours of the incident. He also predicted that this would not appear anywhere.
The URL of the blog of this news is http://bhadas.blogspot.com/2008/04/blog-post_5029.html
Certainly, for anyone blog is expression unlimited globally except in China and some other countries.
Almost the same day I encountered another post on Bhadas. It was a resignation letter of a staffer of IANS Swatantra Mishra. It had outburst against editor of the Hindi section of the IANS Arun Anand. Some may find such an action improper, but in a fast moving word this is a way to raise voice.
With Love,
Yogesh Sharma
GujaratGobal.com
जेन्टलमैन शेम !
आज आखिर वहि हुआ जिसका जिक्र मैने अपनी पिछ्ली पोस्ट मे किया था.आज आखिर IPL ने देश के क्रिकेट, क्रिकेट के खिलाडिओ और उसे चाहने वालो को बाट ही दिया.
आज देश के लोगों ने क्रिकेट के मैदान पर जो देखा वो IPL कि सोच का परिणाम था, IPL का मकसद सिर्फ यही है कि अपने पृ्तिद्वव्न्दी ICL को नाकामयाब करने के लिये देश के लोगों कि भावनाओं को भड़काओ और उन्हें शहरों के नाम पर बांटो.
आज लोगों नें देखा कि कैसे राष्टीय टीम के दो वरीष्ठ खिलाड़ी हार और जीत के मसले पर मैदान पर ही आपस में उलझ गये और उसके बाद जो हुआ कम से कम क्रिकेट के मैदान पर ऐसा देखने को आज तक नहीं मिला था, ये वाकइ शर्मनाक था, और क्या इसके बाद आप उम्मीद कर्ते हैं कि स्टेडियम मैं बैठे दर्शक अपने शहर की टीम को लेकर आपस में नहीं उलझेंगे?
क्या अभी भी आपको लगता है कि IPL राज ठाकरे कि MNS से अलग है??
Posted by
Unknown
1 comments
25.4.08
अधनंगा क्रिकेट
आज का क्रिकेट .... टी २० के बारे में क्या कहे ! जोश और जूनून के अलावा कुछ भी नही है। हाँ ये क्रिकेट अधनंगा जरुर हो गया है। ग्राउंड के बाहर नाचने वाली आयातित सुंदरियाँ लोगो के साथ खिलाड़ियों का भी मनोरंजन करती है। लेकिन क्या इस क्रिकेट को देख कर अमरनाथ, रोज़र बिन्नी जैसे दिग्गज सर्म्सरहर नही होते होंगे। आधुनिकता के नाम पर हम कहा जा रहे है। संसद तक में आवाज़ उठी, lएकं क्या ये सभ कुछ बंद हो जाएगा। कोई ललित मोदी को क्यों नही समझाता कि भाई अगर कुछ न बिके , क्या उससे नंगा करके बेचा जाना उचित है ? बच्चे पूछते है कि ये मैच के बीच में ये क्यों कमर मटकाती है?
मेरे भाइयों, मेरी मदद करो , क्रिकेट का ये रूप नही देखा जा सकता!
अविनाश श्रीवास्तव
Posted by
Unknown
4
comments
अगर तुम
अगर तुम अपना दिमाग ठीक रख सकते हो जबकि तुम्हारे चारों ओर सब बेठीक हो रहा हो और लोग दोषी तुम्हे इसके लिए ठहरा रहे हों...
अगर तुम अपने उपर विश्वास रख सकते हो जबकि सब लोग तुम पर शक कर रहे हों..पर साथ ही उनके संदेह की अवज्ञा तुम नहीं कर रहे हो..
अगर तुम अच्छे दिनों की प्रतीक्षा कर सकते हो और प्रतीक्षा करते हुए उबते न हो..या जब सब लोग तुम्हें धोखा दे रहे हों पर तुम किसी को धोखा नहीं दे रहे हो...
या जब सब लोग तुमसे घृणा कर रहे हों पर तुम किसी से घृणा नहीं कर रहे हो...साथ ही न तुम्हें भले होने का अभिमान हो न बुद्धिमान होने का....
अगर तुम सपने देख सकते हो पर सपने को अपने उपर हावी न होने दो, अगर तुम विचार कर सकते हो पर विचारों में डुबे होने को अपना लक्ष्य न बना बैठो...
अगर तुम विजय और पराजय दोनों का स्वागत कर सकते हो पर दोनों में से कोई तुम्हारा संतुलन नहीं बिगाड़ सकता हो...
अगर तुम अपने शब्दों को सुनना मूर्खों द्वारा तोड़े मरोड़े जाने पर भी बर्दाश्त कर सकते हो और उनके कपट जाल में नहीं फंसते हो...
या उन चीजों को ध्वस्त होते देखते हो जिनको बनाने में तुमने अपना सारा जीवन लगा दिया और अपने थके हाथों से उन्हें फिर से बनाने के लिए उद्यत होते हो..
अगर तुम अपनी सारी उपलब्धियों का अंबार खड़ा कर उसे एक दांव लगाने का खतरा उठा सकते हो, हार होय की जीत...
और सब कुछ गंवा देने पर अपनी हानि के विषय में एक भी शब्द मुंह से न निकालते हुए उसे कण-कण प्राप्त करने के लिए पुनः सनद्ध हो जाते हो...
अगर तुम अपने दिल अपने दिमाग अपने पुट्ठों को फिर भी कर्म नियोजित होने को बाध्य हो सकते हो जबकि वे पूरी तरह थक टूट चुके हों...जबकि तुम्हारे अंदर कुछ भी साबित न बचा हो...सिवाए तुम्हारे इच्छा बल के जो उनसे कह सके कि तुम्हें पीछे नहीं हटना है....
अगर तुम भीड़ में घूम सको मगर अपने गुणों को भीड़ में न खो जाने दो और सम्राटों के साथ उठो बैठो मगर जन साधारण का संपर्क न छोड़ो...
अगर तुम्हें प्रेम करने वाले मित्र और घृणा करने वाले शत्रु दोनों ही तुम्हे चोट नहीं पहुंचा सकते हों...
अगर तुम सब लोगों को लिहाज कर सको लेकिन एक सीमा के बाहर किसी का भी नहीं, अगर तुम क्षमाहीन काल के एक एक पल का हिसाब दे सको.....
....तो यह सारी पृथ्वी तुम्हारी है...और हरेक वस्तु तो इस पृथ्वी पर है उस पर तुम्हारा हक है....वत्स तुम सच्चे अर्थों में इंसान कहे जाओगे....
- रुडयार्ड किपलिंग ( यह कविता किपलिंग ने अंग्रेजी में लिखी है जिसका कवि हरिवंश राय बच्चन ने हिंदी में अनुवाद अपनी आत्मकथा में किया है....कविता मुझे अलग अलग समय में काफी प्रेरणा देती है...जीने का साहस देती है....)
Posted by
Vidyut Prakash Maurya
2
comments
कहां जा रहे है हम ?
कल का दिन कानपुर शहर के इतिहास में एक बदनुमा दाग के रूप में अंकित हो गया, कल शहर के सबसे बड़े अस्पताल हैलट अस्पताल के प्रसूति एवं बाल रोग विभाग में बाँदा से मजदूर युवती अपने बच्चे को जंम देने के लिये आयी थी । चूंकि युवती मजदूर परिवार से सम्बन्ध रखती थी इसलियें उसके पास अपने पेट में पल रहे एक बच्चे के अलावा कुछ भी न था । अपने ऐशों आराम के आदी अस्पताल में पदस्थ डाक्टरों ने उसे सरकारी अस्पताल में घुसने नहीं दिया जिसका परिणाम यह आया कि उस युवती ने अस्पताल के दरवाजे पर ही एक बच्चे को जंम दे दिया जंम के कुछ देर बाद ही उसने दम तोड़ दिया इतनी गन्दी दुनिया को देखने की अपेक्षा उसने दुनिया छोड़ना ही बेहतर समझा इतना ही नहीं देर रात बच्चे को जंम देने वाली मां भी अपने बच्चे के पास होली । गत सप्ताह एक लड़की ने अपने प्यार के खातिर अपने पूरे परिवार जिसमें सात सदस्य थे, कि हत्या अपने प्रेमी के साथ मिल कर दी अपने मासूम सात माह के भतीजे को अपने हाथों से गला घोट कर खत्म कर दिया ,देश की राजधानी दिल्ली में नितिन ने अपने मां बाप पत्नी की हत्या कर दी ।
ये घटना यह प्रदर्शित करती है कि मानव के नाम से बनी मानवता भी मानव का साथ छोड़ कर अपनी दुनिया में विलीन हो गयी है । क्या समाज आज इस गति से आगे बढ़ रहा है कि उसे पीछे की गरीबी ,दया ,भावुकता,अपनापन,विवशता आदि कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है । कहां जा रहे हम ?। और इस पर आगे बढ़ कर हम जाना कहां चाहते है? कहां है हमारी मंजिल, ? मानवता से दूर हो कर हम पाना क्या चाहते है? अगर यही है हमारी तरक्की है, तो हम पिछडे ही ठीक थे अगर यही है शहरों का जीवन तो निश्चित ही हम गाँवों में इससे बेहतर जीवन जी रहे थे पत्थरों की ऊंची इमारतों में रहने के कारण हमारे दिल सोच विचारधारा भी पथरीली हो गयी है क्या ?
क्या हम यही सब पाने के लिये शिक्षित हो रहे है ? अगर यही शिक्षा है तो हम अशिक्षित ही ठीक है । वैश्विकरण के कारण पूरी दुनिया एक गांव का रूप ले रही है देश की सीमाऐ खत्म हो रही है लेकिन क्या उसका सही उपयोग हो रहा है । अगर किसी भी भड़ासी मित्र को ऊपर पूछे गये प्रश्नों का हल मालूम हो कृपया मुझे प्रतिक्रिया स्वरूप अवश्य बतायें
Posted by
शशिश्रीकान्त अवस्थी
3
comments
मिल गया ऑफ़ लाइन हिन्दी टाइपिंग का टूल
आज हिन्दी आफ लाइन टाइपिग के लिये एक टूल मिल ही गया.धन्यावद उन्मुक्त जी!
अब बिना आन लाइन हुए अपने विचार लिख कर उन्हे जब चाहे एक पोस्ट अप्ने ब्लोग पर डाल सकते है.
कैफेहिन्दी एक ऐसा ही टूल है, इसे आप www.cafehindi.com पर जाकर डाउनलोड कर सकते है.
एक बार फिर से उन्मुक्त जी का धन्यावाद!
Posted by
Unknown
5
comments
कविता के आज बन गये वो दादा फल्के
कल तक थे नौकरी में जो लकड़ी की टाल के
कविता के आज बन गये वो दादा फल्के
मरने के बाद यार ने ऐसा किया सलूक
जूते पहन के फिरता है वो मेरी खाल के
मीना बजार लाएगा वो अब खरीदकर
निकला है घर से जेब में एक सिक्का डाल के
अच्छी भली किताब का अब तो अकादमी
करती है खूब फैसला सिक्का उछाल के
दिल में हजार वाट का जलने लगा है बल्ब
उसने पिलां दीं बिजलियां शीशे में ढाल के।
पं. सुरेश नीरव
(पिछली गजल के संदर्भ में मुझे डा. रूपेश श्रीवास्तव, डा. सुभाष भदौरिया,रजनीशके.झा,.अंकितमाथुर,भागीरथजी, और अनिल भारद्वाज की बहुमूल्य प्रतिक्रियाएं मिलीं,आभारी हूं। आपकी राय यह बताती है कि ब्लाग की दुनिया में साहित्य के गंभीर सरोकारों को भी बाकायदा नागरिकता मिल सकती है। मेरे प्रणाम्..।)।। जय भड़ास।। जय यशवंत ।।
Posted by
Unknown
3
comments
पं. सुरेश नीरव की एक चुलबुली गजल
(सभी भड़ासियों से स्वास्थ्य पर इसका बड़ा आयुर्वेदिक असर पड़ेगा)
किसी के हुस्न का जादू जगाने का इरादा है
सभी कुछ दांव पर अब तो लगाने का इरादा है
है मिसरी-सी जुवां तेरी,शहद टपके हैं बातों से
तुम आफत हो बड़ी कितनी बताने का इरादा हैसहमकर शाम को तनहा मिलोगी जब बगीचे में
तुझे नाजुक शरारत से सताने का इरादा हैकभी फूलों की घाटी से,कभी पर्वत की चोटी से
तुझे दे-देकर आवाजें थकाने का इरादा है
मुहब्बत की शमा दिल में हुई रौशन न सदियों से
तेरे जलवों की तीली से जलाने का इरादा है
तुझें लहरों की कलकल में,तुझे फूलों की खुशबू में
तुझे भंवरों की गुनगुन में बसाने का इरादा है
फटाफट तुम चली आओ,मेरी उजड़ी हवेली में
तुझे टूटे खटोले पर सुलाने का इरादा है
ठिठुरकर शाम ने ओढ़ा है देखो शॉल कोहरे का
तुझे जलते अलावों पर बुलाने का इरादा है
हँसी देखी है जोकर की, न देखे आंख के आंसू
हजल से आज नीरव को हँसाने का इरादा है।
Posted by
Unknown
1 comments
24.4.08
एक नया शिगूफा आया है
महंगाई और अपने घर के कलह के बीच भारतीय जनता पार्टी एक नया शिगूफा लेकर आई है। यह शिगूफा इस प्रकार है कि ठकाठक क्रिकेट में रूपसी चियर्स लीडर, इसे हम अपनी भाषा में कहें तो खिलाडियों में उत्साह पैदा करने के लिए कम कपडों में नाचने वाली नर्तकियां, भारतीय संस्कृति को खाई मे ले जा रही हैं। इसलिए ठकाठक क्रिकेट में इन रूपसी चियर्स लीडरों पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए। चलिए यह तो रही भाजपा की बेदना और उनकी मांग। अब अपनी भडास आपको सौंपता हूं। यह मात्र इतना है कि आज के इस ग्लोबल माहौल में जब सारी दुनिया इंटरनेट के माध्यम से एक हो चुकी है और हमारे समाज में पाश्चात्य समाज इस कदर हावी हो गया है कि धोती कुरता पहने वाला भारतीय समाज से नदारद है तो हम किस संस्कृति को बचाने का ढोंग रच रहे हैं। अगली बात यह कि आप घर का दरवाजा बंद कर रात भर नीली पीली पिक्चरें तो देखें या नौटंकी में जमकर फूहडता निकालें लेकिन हजारों की भीड में चार लडकियां किसी टीम का हौसला बढाएं वह आपसे बरदाश्त नहीं हो रहा। हां यह बात सही है कि उन लडकियों के कपडे छोटे हैं। लेकिन आप यह तय कर लें कि मैच देखने जा रहे हैं या पाश्चात्य सभ्यता की नुमाइश। रही बात कम कपडे की तो आजकल फिल्मों में जितने कपडे हिरोइनें पहन रही हैं यह लडकिया उससे ज्यादा ही पहन रही हैं। अब कोई व्यक्ति ने दुकान खोला है तो वह अपना सामान तो बेचेगा ही। आखिर वह लोग स्टेडियम में उन लडकियों से जिस्मफरोशी तो नहीं करा रहे न। आप घर की बात तो सोच नहीं रहे और धर्म और संस्कृति का ठेका ले रहे हैं। लोगों को उन चियर्स लीडर्स पर पाबंदी से पहले अपनी गिरहबान में झांकना चाहिए। हमें पाश्चात्य समाज से खतरा नहीं हमे अपनों से खतरा है। यह बात अब समझनी होगी। क्योंकि जब तक हम नहीं चाहेंगे कोई समाज, सभ्यता या संस्कृति हम पर हावी नहीं हो सकती।
फोटो साभार : MSN
अबरार अहमद
Posted by
अबरार अहमद
3
comments
मनीषा नाम के हिजड़े का भड़ासियों द्वारा बहिष्कार प्रशंसनीय है,यही होना चाहिये.......
एक तरफ भड़ास से जुड़े लोग भावुक होने का नाटक करते नहीं थकते हैं, लोगों की बातों में मीन-मेख निकालते नहीं थकते हैं, महिला-दलित चिंतन का घंटा इधर भी पूरी ताकत से बजाने से पीछे नहीं हटते हैं तो ऐसे में भला इनके बीच में एक हिजड़े का क्या काम हो सकता है? उसे तो भगवान ने भी दंडित कर रखा है तो भला हम जैसे भावुक किस्म के भड़ासी उसे अपने बीच क्यों जगह दें। इसलिये सबसे सुन्दर तरीका अपनाया है कि इसे तो बस नज़रअंदाज करे रहो, इग्नोर करे रहो तो एक दिन अपने आप ही हौसला पस्त हो जाएगा और वापस लौट जाएगा अपनी नारकीय दुनिया में जहां से आया है। हम जैसे कुछ दो-एक जड़बुद्दि लोग हैं जैसे कि यशवंत दादा,मुनव्वर आपा और मैं जो उनकी ओर तवज्जो देते हैं बाकी लोग इस हिजड़े की तरफ तो देखिये भी मत वरना अशुद्ध हो जाएंगे इसका लिखा पढ़ कर कहीं आप भी हिजड़े बन गए तो गजब हो जाएगा। इसलिये बेहतर है कि लड़कियों को प्रोत्साहित करिये जो कि पुण्य का काम है,महिला मुक्ति का पुनीत कार्य है या फिर किस्सागोई और कविताओं का हलुआ सानिये और एक दूसरे को चटाते रहिये। अगर किसी हिजड़े के लिखे पोस्ट पर कमेंट कर दिया तो उसकी हौसलाअफ़जाई हो जाएगी जोकि हमारे सभ्य समाज के लिये ठीक नहीं है। आज लिख रहा है कल को हमारे साथ बैठ कर खाना खाएगा मुझे तो ये सोच कर भी उल्टी आ रही है। सुन्दर लड़कियों की बात ही कुछ और है मुनव्वर आपा के शब्दों में कहूं तो सुन्दर लोगों का तो पादना भी लोगों को संगीत और हगना भी व्यंजन बनाना लगता है। मैं उन सभी भड़ासियों का आभारी हूं जिन्होंने मनीषा नामक हिजड़े को भड़ास में पर हाशिये पर सरका रखा है भले ही वो ऊपर सलाहकारों में हो। आप सबका हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए एक बार फिर से उनका पोस्ट पेल रहा हूं अब मैं बस आने वाले दस दिनों में यही एक पोस्ट दुराग्रही,हठी,दंभी की तरह से रोज सुबह-सुबह डाला करूंगा और आप लोग इसेनज़रअंदाज करके कविता-कहानी डालते रहना बस शाम तक फिर ये किनारे सरक जाएगा और आप लोग ऊपर आ जाएगें
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
4
comments
पं. सुरेश नीरव की एक चुलबुली गजल
(सभी भड़ासियों से स्वासथ्य पर इसका बड़ा आयुर्वेदिक असर पड़ेगा)
किसी के हुस्न का जादू जगाने का इरादा हैसभी कुछ दांव पर अब तो लगाने का इरादा है
है मिसरी-सी जुवां तेरी,शहद टपके हैं बातों सेतुम आफत हो बड़ी कितनी बताने का इरादा है
सहमकर शाम को तनहा मिलोगी जब बगीचे मेंतुझे नाजुक शरारत से सताने का इरादा है
कभी फूलों की घाटी से,कभी पर्वत की चोटी सेतुझे दे-देकर आवाजें थकाने का इरादा है
मुहब्बत की शमा दिल में हुई रौशन न सदियों सेतेरे जलवों की तीली से जलाने का इरादा है
तुझें लहरों की कलकल में,तुझे फूलों की खुशबू मेंतुझे भंवरों की गुनगुन में बसाने का इरादा है
फटाफट तुम चली आओ,मेरी उजड़ी हवेली मेंतुझे टूटे खटोले पर सुलाने का इरादा है
ठिठुरकर शाम ने ओढ़ा है देखो शॉल कोहरे कातुझे जलते अलावों पर बुलाने का इरादा है
हँसी देखी है जोकर की, न देखे आंख के आंसूहजल से आज नीरव को हँसाने का इरादा है।
Posted by
Unknown
8
comments
ये मुहब्बत की इन्तहां नहीं तो
ये मुहब्बत की इन्तहां नहीं तो और क्या है।
समंदर आज भी प्यासा है किसी की चाहत में।।
शोरगुल में जिंदगी को ढुढते हो ये दोस्त तुम भी।
कभी गौर से देखना इसे खामोशी की आहट में।।
-----------------------
जी तो करता है कि आज फिर से चूम लूं तेरी पेशानी को।
पर अफसोश आज मैं तुझसे से कहीं छोटा हूं।
वक्त ने छीन लिए सारे कांधे मुझसे।
इसलिए अब दीवारों से लग के रो लेता हूं।।
जी तो करता है कि आज फिर से चूम लूं तेरी पेशानी को।
पर अफसोश...................
अबरार अहमद
Posted by
अबरार अहमद
5
comments
23.4.08
tiirandaaj.blogspot.com नाम से खेल का ब्लॉग
मेरठ के वरिष्ट खेल पत्रकार यशपाल सिंह जी ने tiirandaaj.blogspot.com नाम से खेल का ब्लॉग शुरू किया है प्रिंट मीडिया के साथ -साथ ब्लॉग मे लिखने लिए उन्हे ढेर सारी शुभकामना
जय भडास
राकेश जुयाल
Posted by
paharNews
0
comments
tiirandaaj.blogspot.com नाम से खेल का ब्लॉग
मेरठ के वरिष्ट खेल पत्रकार यशपाल सिंह जी ने tiirandaaj।blogspot.com नाम से खेल का ब्लॉग शुरू किया है प्रिंट मीडिया के साथ -साथ ब्लॉग मे लिखने लिए उन्हे ढेर सारी शुभकामना
जय भडास
राकेश जुयाल
Posted by
paharNews
0
comments
शाम को फोन पर काम करो
सभी भडासी भाइयों को नमसकार... दिन में धूप तेज होने से अब तो मेरी तरह सभी पत्रकार भाइयों का धूप में घूमने का मन नहीं करता होगा लेकिन कया करें जाना तो पडेगा ही कयोंकि शाम को संपादक महोदय को रिपोट देनी पडती है एसा कहना है मेरे एक रिपोटर साथी का. जब मैने पूछा इसका इलाज कया है तो एक ही जबाव अाया दिन भर अराम एक करो शाम को फोन पर काम करो
अमरदीप दैनिक भासकर, लुधियाना
Posted by
amardeep
4
comments
पत्रकारिता पुरानी अंदाज नया
पत्रकारिता पुरानी अंदाज नया
साहब...
यहां हर अखबार की अपनी अलग कहानी है
अंदाज बदलता रहता है, पत्रकारिता पुरानी है
हर पत्रकार अपने आप को बेहतर बताता है
चाहे पत्रकारिता का उसे क-ख न आता है
हमें तो कविता के आइने में, उसे सच्चाई दिखलानी है
अंदाज बदलता रहता है....
सीनियर्स ने मुझे डाली आदत शब्दों से खेलने की
जरूरत ही नहीं पड़ी कभी, जबरन कविता पेलने की
छोटे ये बात जान चुके है, बड़ों को समझानी hai
अंदाज बदलता रहता है...
सभी तीस मारखां जानते हैं पत्रकारिता के असूल
नौकरी करते लाला जी की इन्हें क्यों जाते हैं भूल
भूलने की आदत इनके दिल से हमें भुलानी है
अंदाज बदलता रहता है...
दूसरों को नसीहत दें जरूर, पहले खुद के दिल में झांके
न दूसरों से अपनी तुलना करें, न अपनी कीमत आंके
भाव में बहकर जो लिख दिया, वह शायद मेरी नादानी है
अंदाज बदलता रहता है, पत्रकारिता पुरानी है
विजय जैन
Posted by
vijay jain
2
comments
मनीषा नाम के हिजड़े का भड़ासियों द्वारा बहिष्कार प्रशंसनीय है,यही होना चाहिये.......
एक तरफ भड़ास से जुड़े लोग भावुक होने का नाटक करते नहीं थकते हैं, लोगों की बातों में मीन-मेख निकालते नहीं थकते हैं, महिला-दलित चिंतन का घंटा इधर भी पूरी ताकत से बजाने से पीछे नहीं हटते हैं तो ऐसे में भला इनके बीच में एक हिजड़े का क्या काम हो सकता है? उसे तो भगवान ने भी दंडित कर रखा है तो भला हम जैसे भावुक किस्म के भड़ासी उसे अपने बीच क्यों जगह दें। इसलिये सबसे सुन्दर तरीका अपनाया है कि इसे तो बस नज़रअंदाज करे रहो, इग्नोर करे रहो तो एक दिन अपने आप ही हौसला पस्त हो जाएगा और वापस लौट जाएगा अपनी नारकीय दुनिया में जहां से आया है। हम जैसे कुछ दो-एक जड़बुद्दि लोग हैं जैसे कि यशवंत दादा,मुनव्वर आपा और मैं जो उनकी ओर तवज्जो देते हैं बाकी लोग इस हिजड़े की तरफ तो देखिये भी मत वरना अशुद्ध हो जाएंगे इसका लिखा पढ़ कर कहीं आप भी हिजड़े बन गए तो गजब हो जाएगा। इसलिये बेहतर है कि लड़कियों को प्रोत्साहित करिये जो कि पुण्य का काम है,महिला मुक्ति का पुनीत कार्य है या फिर किस्सागोई और कविताओं का हलुआ सानिये और एक दूसरे को चटाते रहिये। अगर किसी हिजड़े के लिखे पोस्ट पर कमेंट कर दिया तो उसकी हौसलाअफ़जाई हो जाएगी जोकि हमारे सभ्य समाज के लिये ठीक नहीं है। आज लिख रहा है कल को हमारे साथ बैठ कर खाना खाएगा मुझे तो ये सोच कर भी उल्टी आ रही है। सुन्दर लड़कियों की बात ही कुछ और है मुनव्वर आपा के शब्दों में कहूं तो सुन्दर लोगों का तो पादना भी लोगों को संगीत और हगना भी व्यंजन बनाना लगता है। मैं उन सभी भड़ासियों का आभारी हूं जिन्होंने मनीषा नामक हिजड़े को भड़ास में पर हाशिये पर सरका रखा है भले ही वो ऊपर सलाहकारों में हो। आप सबका हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए एक बार फिर से उनका पोस्ट पेल रहा हूं अब मैं बस आने वाले दस दिनों में यही एक पोस्ट दुराग्रही,हठी,दंभी की तरह से रोज सुबह-सुबह डाला करूंगा और आप लोग इसे
नज़रअंदाज करके कविता-कहानी डालते रहना बस शाम तक फिर ये किनारे सरक जाएगा और आप लोग ऊपर आ जाएगें
कुदरत मानव जाति को नष्ट कर रही
हैआज एक चैनल पर एक कार्यक्रम में "गे" और "लेस्बियन" लोगों पर बात चल रही थी, कुछ लोगों का इंटरव्यू भी था। उसे देखने पर दिल और दिमाग के साथ मेरे पूरे अस्तित्त्व में भूकंप सा आ गया। नवयुवकों ने स्त्रियों की तरह से लाली-पाउडर लगा रखा था और बड़े ही भावुक अंदाज में दलील दे रहे थे कि हमारे साथ ईश्वर ने नाइंसाफी कर दी है हम लोग मन और आत्मा से तो औरत हैं लेकिन मर्दाने जिस्म में कैद हैं वगैरह..वगैरह....। इसी तरह से लड़कियों ने भी पुरुषों की तरह से बाल छोटे कटवा रखे थे और वे भी कुछ इसी अंदाज में ईश्वर की नाइंसाफी का बखान कर रही थीं और स्टूडियो में आमंत्रित जनता भी उनसे सहानुभूति जता रही थी। मैंने जीवन में पहली बार ईश्वर को धन्यवाद करा था मेरे बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव से मिलने पर और दूसरी बार अब दिया कि हे भगवान आपने मुझे आंगिक(लैंगिक) विकलांगता दी जो मेरे ही न जाने किन किन पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है लेकिन कम से कम बुद्धि तो संतुलित दी है वरना अगर इन लोगों जैसी बुद्धि होती तो ज्यादा कष्ट होता। गुरुशक्ति का स्मरण कर स्थिरचित्त होकर बैठने पर सोच को एक नया आयाम मिला है कि ये लोग दिमागी मरीज हैं और मैं इनसे सर्वथा भिन्न हूं। "गे" और "लेस्बियन" लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग भी इसे ईश्वरीय अन्याय ही मानते हैं जैसा भगवान ने इन्हे बनाया है वैसे वे हैं भला इनका क्या दोष...। सत्य है इनका दोष नही है बल्कि दोष है समाज का जो इन्हें मनोरोगी न मान कर सामान्य मान लेता है और उचित उपचार की प्रेरणा नहीं देकर जस का तस स्वीकार लेता है। एक इंसान जिसे ईश्वर ने पुरुषांग से सजा कर पुरुष बना कर भेजा किन्तु जब वह किशोरावस्था में प्रवेश करता है और उसका परिचय हारमोन्स के परिवर्तनों से उपजी यौनभावना से होता है, उस दौरान यदि वह किसी मनोयौनरोगी किस्म के व्यक्ति के सम्पर्क में आ जाता है। जिससे उसे पहली बार यौन भावना की अभिव्यक्ति और उसके उद्दीपनकर्म से होता है तो उसे वही सब नैसर्गिक और सहज लगता है। जैसा कि आयुर्वेद में बताया गया है कि व्यक्ति के आहार-विहार-विचार से उसके अंतःस्रावी ग्रन्थियों यानि कि पूरे एंडोक्राइन सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है और वे उसी के अनुरूप हो कर क्रियाशील हो जाती हैं, समय के साथ ही ये भीतर ही भीतर इस बात का अनुकूलन भी हो जाता है। इसलिये शरीर के हार्डवेयर को कुदरत द्वारा निर्धारित जो साफ़्टवेयर्स चलाते हैं उनमें से लैंगिक आयाम से संबद्ध साफ़्टवेयर करप्ट हो जाता है और मर्द खुद को औरत और औरत खुद को मर्द समझने लगते हैं। इस बात पर जरा गहराई से विचार करिये कि यदि कोई बच्चा ’स्टारफिश’ जैसी जिंदगी जीना चाहे तो आप उसे क्या समझेंगे? ’स्टारफिश’ का पाचन संस्थान (digestive system) कुदरत ने ऐसा डिजाइन करा है कि वह जिस अंग से भोजन ग्रहण करती है उसी अंग से पाचन हो जाने के बाद अपशिष्ट मल का उत्सर्जन भी उसी अंग से कर देती है यानि कि मुंह और गुदा का काम एक ही अंग करता है। जबकि मानव देह में पाचन संस्थान की उक्त प्रक्रिया मुंह द्वारा भोजन ग्रहण करने के बाद गुदा द्वारा मल त्याग करने पर पूर्ण होती है। किंतु मानव अगर ऐसा करे कि पाचन के बाद उल्टी करके निकालने का प्रयास करे और इस प्रयास को तर्क से उचित ठहराए तो आप उसे क्या कहेंगे? मेरी नजरों में तो वह विक्षिप्त ही होगा। यौनकर्म में कुदरत ने आनंद की एक विशेष अनुभूति को इसलिये छिपा रखा है कि मानव उसी अनुभूति के लिये संभोग करे और प्रजनन होता रहे व वंशक्रम चलता रहे और प्राणियों की ये प्रजाति लुप्त होने से बची रहे। किन्तु विकास के क्रम में ये संतुलन मानवों द्वारा गड़बड़ा दिया गया और बुद्धि का प्रयोग निसर्ग से हट कर करना शुरू कर दिया। आज के दौर में मानव ने यौनकर्म को दो सर्वथा दो भिन्न हिस्सों में बांट दिया - प्रजनन और यौनानंद। आनंद की प्राप्ति के लिये कुदरती तरीके से भिन्न उपाय सभ्यता के विकास के साथ खोजे जाने लगे। धीरे-धीरे प्रजनन देह से हटकर प्रयोगशालाओं की परखनलियों (test tubes) में सिमटता जा रहा है और शरीर मात्र आनंद का उपकरण बनता जा रहा है।मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि कदाचित कुदरत ही अपना संतुलन बनाए रखने के लिये ऐसा कर रही है कि एक एक दिन मनुष्यों की बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के विकराल प्रश्न का एकमात्र उत्तर स्वयं ही सामने आ जाएगा और वह उत्तर है - "समलैंगिकता"। इसी समलैंगिकता के चलते कुछ समय में ही मानवजाति की जनसंख्या स्वयं ही सिकुड़ने लगेगी और अगर यही हाल रहा तो एक दिन धरती से मानव लुप्त हो जाएंगे, खत्म हो जाएगा आदम का वंश..........:- "अर्धसत्य" से सादर
जय जय भड़ास
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
7
comments
Labels: गे, लेस्बियन, लैंगिक विकलांग, समलैंगिकता, हिम्मत
मध्य प्रदेश के १७ मंत्री सर्वे मैं फ़ैल
यशवंत जी ,
बिच्छू.कॉम के सर्वे में मध्य प्रदेश के १७ मंत्री इस बार जीत से दूर रहेंगे। आपको नही लगता कि ये संख्या बढ़ सकती है।, वैसे बिच्छू.कॉम का सर्वे सटीक है, फिर भी बीजेपी इससे इतेफाक नही रखती। भादासी भाई क्या कहेंगे। आप भी एक बार जरूर देखे और हम भादासियों को गाइड करे।,
अविनाश श्रीवास्तव
भोपाल
Posted by
Unknown
2
comments
बदहाल बुंदेलखंड
बुंदेलखंड के बांदा जिले का बसहरी गांव जितनी बुरी हालत में इस बार है, शायद ही पहले कभी इतनी बदतर हालत में रहा हो। एक तो पानी नहीं बरसा। खेती चौपट हो गई और दूसरी तरफ चार साल से पड रहे सूखे की मार ने इस इलाके की कमर तोडकर रख दी है। किसानों की फसल तक की लागत नहीं निकल पाई। इस बार न गांव में ताजगी थी और न ही वहां की माटी में सुगंध। थी तो सिर्फ हर ओर बदहाली और कब्रिस्तान का सा सन्नाटा, भूखा मरता किसान और प्यासे मरते मवेशी। कुंए में एक बूंद पानी न था और न ही तालाब में। कामता के पंद्रह बीघा खेत में मात्र चार पसेरी गेहूं हुआ। उसे यह चिंता खाए जा रही है कि इस साल वह अपना पेट कैसे पालेगा। इलाके में चोरी चकारी बढ गई है। राहगीरों को रास्ते में ही लूट लिया जाता है, और अंधेरा होते ही लोग घर से बाहर निकलने से घबराते हैं। बसहरी की तरह ही बुंदेलखंड के अधिकांश गावों का हाल है। अगर देश का सबसे बदहाल क्षेत्र इसे कहा जाए जो गलत नहीं होगा। जब से गांव जा रहा हूं, तब से इसे ऐसे ही पाया है। न कोई विकास हुआ और न ही किसी को यहां की सुध है। मात्र कुछ सरकारी नल ही हाल मे यहां लगे हैं जो लोगों की प्यास बुझाने का एकमात्र जरिया है। जिस के घर के सामने यह नल लगे हैं, वह दूसरों को पानी न भरने देने की भरपूर कोशिश करता है। उस नल पर अपना अधिकार जताता है। संचार क्रांति और आधुनिकता के प्रतीक एयरटेल का टॉवर गांव में जरूर लग गया है। भूख से मरते किसान को मोबाइल के मोह में फंसाया जा रहा है। अखबारों में पढा की राहुल गांधी बुंदेलखंड के दौरे पर हैं, वे यहां के हालात को जानने और समझने गए हैं। उन्होंने कई गांवों का दौरा किया और किसानों की बदहाली देखी लेकिन अगले ही वे आईपीएल के मैच में दिखे। उन्हें देखकर हैरानी इस बात की हुई कि यदि कोई सचमुच किसानों और इस क्षेत्र के गरीबों को शुभचिंतक है तो उनकी स्थिति देखकर कोई कैसे चैन से सो सकता है। जो आदमी कल तक यहां की स्थिति का जायजा ले रहा था, लोगों की बदहाली जानकर भी कैसे उसे आईपीएल का मैच सुहा सकता है। कैसे वह उन किसानों के मुरझाए हुए चेहरों को भूलकर खचाखच भरे स्टेडियम में मैच का मजा ले सकता है।
भागीरथ
Posted by
भागीरथ
2
comments
अमेरिकी चुनाव
Posted by
DEEPAK
2
comments
मेरे दोस्त कहाँ हो
mere dost kahan ho
स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी का जमाना बीत चुका। वो दोस्त भी गुम हो गए जिनके साथ वो पल गुजारे थे जो हमेशा याद रहेंगे। इन दोस्तों को कहां ढूंढे? कैसे पता लगाएं वो आजकल क्या कर रहे हैं। कैसे संपर्क हो उनसे। न कोई पता न ठिकाना। लेकिन अब इसका हल भी निकल आया है। हल है बैचमेट डॉट कॉम यह वेबसाइट है जो हाल ही में शुरू हुई है। इसमें पास किए बैच के मुताबिक आप अपने दोस्तों के बारे में आसानी से पता लगा सकते हैं। इंटरनेट की दुनिया ने लोगों को इतना नजदीक लिया दिया है कि सीमाएं पुरानी बात हो गई हैं। विदेश में बैठे अपने दोस्तों से भी इंटरनेट के माध्यम से आसानी से संपर्क किया जा सकता है। लेकिन यदि मसला किसी एडरेस या संपर्क न होने का हो तो भी आधुनिक तकनीक ने इसका हल निकाल लिया है। हल के रूप में सामने आई है(इस वेबसाइट का फायदा कुछ लोगों ने तो उठा भी लिया है। उनके वे दोस्त जो करीब दस वर्ष या इससे पहले गुम हुए थे उन्हें इस वेबसाइट से ढूंढ लिया गया है। वेबसाइट बैचमेट डॉट कॉम में खास बात यह है कि इसमें देश भर के मुख्य स्कूलों, कॉलेजों व यूनिवर्सिटीज की डिटेल दी गई है। कुछ स्कूल तो वेबसाइट में ऐसे हैं जिन्हें अभी बैचमेट्स का इंतजार है तो कुछ में इनकी संख्या अच्छी खासी हो चुकी है। वेबसाइट में जाते ही इंस्टीट्यूट का नाम भरने के साथ ही इंस्टीट्यूट का रिकॉर्ड खुल जाता है। इसमें अब तक रजिस्ट्रड लोगों की सूची तो सामने आएगी ही साथ ही नए लोग भी इसमें खुद को रजिस्ट्रड कर सकते हैं। इसके बाद रजिस्ट्रड करने वाला अपने बैच मेट के साथ यहां पर पढ़ चुके पुराने स्टूडेंट्स के साथ भी संपर्क कर सकता हैै।
Posted by
vijay jain
2
comments
ई आईपीएल सर्कस ह........
ई आपीएल सर्कस ह......
के कहता कि सर्कस खत्म हो गईल बा.....अबो सर्कस देखे के मिल रहल बा...सरकस के जीवन दान दान देवे के काम कइले बा आईपीएल। अब ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट मैच देखे के बहाने सरकस देखल जा सकेला...इ सरकस मैदान में हो रहल बा...ए में क्रिकेट सिनेमा अउर राजनीति के सुमेल बा....सरकस के मैदान में शाहरुख खान सिटी बजावत लउक जालन...दुगो मैच जीतला के बाद उ कहेलें बा केहु हमरा से बड़ जादुगर...त उनका के चुनौती बड़ दिल वाली प्रीटि जिटा दे रहल बाड़ी...सरकस के उत्साह बढ़ावे खातिर राजनीति के मैदान से फुर्सत निकाल के कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी आपन बहिन अउर दामाद के लेके पहुंच जा रहल बाड़न....
आईपीएल सरकस में सबसे बड़ बात बा एके टिकट लेके मैदान में देखल जा सकेला...अगर टिकट नइखी ले सकत ता सोनी के सेटमैक्स चैनल पर भी देख सकत बानी....जब पुरान जमाना में सरकस देखे जात रही जां त ओमे कम कपड़ा पेन्ह के लइकी लोग बड़ा सुनर सुनर करतब देखावत रही जा...आईपीएल सरकस में भी लइकी लोग बड़ा मस्त मस्त अदा देखावत बाड़ी जा...जइसे जइसे चउका अउर छक्का लागेला ओइसे ओइसे मस्त अदा लोग देखा रहल बा...इस सब देख के बुढ़ पुरनिया आदमी के भी जीव जुड़ा जात बा....शाहरुख खान एतना नीक नीक लइकी एक आईपीएल सरकस में लेके आइल बाड़े की का बताई जां..दिल खुश हो जा रहल बा मैच देख के....केहु कहता कि एह से क्रिकेट के साथ अन्याय हो रहल बा...लेकिन हम कहतानी की एह से सरकस के नया जीवन मिल रहल बा...हमार आईपीएल के आयोजक से गुजारिश बा कि आईपीएल के मैच( सरकस पढ़ी) के दौरान पिंजड़ा में शेर, बाघ, भालू भी लेके आईं जा....एह से लोग के दिल अउर खुश हो जाई मैच देख के....अब सेट मैक्स चैनल के भी देखीं उ आईपीएल मैच ( सरकस समझी) के परचार कइसे कर रहल बिया....टीवी पर बार बार एड आ रहल बा कि देखीं मनोरंजन के बाप.....सचमुच सिनेमा आ सरकस देख के पहिले लोग मनोरंजन करत रहे....पर अब मनोरंजन के साधन बदल गोइल बा....ई आईपीएल सरकस सचमुच मनोरंजन के बापे हउए....हम सेटमैक्स चैनल के भी बहुते शुक्रगुजार बानी...कि उ मनोरंजन के बाप ले के आइल बाड़न....
- विद्युत प्रकाश मौर्य
Posted by
Vidyut Prakash Maurya
3
comments
patarkaar
पुलिस, पब्लिक और पॉलीटिशियन हरदम जिसके दिल में रहते हैं
यह है वो शख्सियत जिसे पत्रकार हम कहते हैं
पुलिस मारे डंडे इनको, नेता डाले केस
फिर भी हारें न यह जीवन में अपनी रेस
आजकल पत्रकार पर जो कर दे टेढ़ी नजर से वार
उसे समझा जाता है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार
जो जुडे़ है इस फील्ड से, सबको उनपर नाज है
लोगों के लिए जो कल है, उनके लिए वह आज है
अपने लिए यह लड़ते नहीं, दूसरों के लिए लड़ते हैं
दिन-घूम इकट्ठी करें, जो खबरें सुबह हम पढ़ते हैं
सच्चाई के लिए जो कुछ भी करने को तैयार है
सही मायने में उस समय वह सच्चे पत्रकार हैंजो
पत्रकारिता को समझे गुरु की बाणी, पत्रकारिता को कुरान भी
पत्रकारिता उसका धर्म भी हो, पत्रकारिता उसका इमान भी
उनकी पत्रकारिता में जोश हो, लिखने का जूनून भी
उनमें सच लिखने का दम है अगर तो डरता है कानून bhi
patrakaar चांद जैसे नर्म भी हैं, सूरज जैसी आग है
जो बिक जाएं झूठ की खातिर, वह पत्रकारिता पर दाग है
ऐसे लोगों को दूर करें, आप अपने आप से आज से
इनके कारण ही गिरती है पत्रकार की साख समाज सेमैं
भी बनना चाहता हूं एक अच्छा पत्रकार
कुछ सीखा है, कुछ सीखने को हूं तैयार
जो सीखूंगा यहां से, दूसरों से काम लाऊं
तभी सही मायने में मैं पत्रकार kahalaaoon
vijay jain
Posted by
vijay jain
6
comments
आज मेरा देश सारा जल रहा है हर दिशा में
आज मेरा देश सारा जल रहा है हर दिशा में
आग की लपटें भयंकर सर्पिणी-सी आज डसती है मेरे आकाश को
धुंध चारों ओर जो छाया हुआ विष का धुआं है मिटाता-सा मेरी हर आस को
जवानी जोश में आकर जहां को भूलती है
कहानी जख्म पाकर भी हवा में झूलती है
कहा किसने कि आकर संभालो इस वतन को जिस वतन की जिंदगी अपने खुदा को भूलती है
भूख से बेचैन कितने नैन रोते हैं धरा पर एक रोटी के लिए
अरे पाषाण कितने गीद अपना चैन खोते हैं यहां पर एक बोटी के लिए
यहां मानव कहाने के लिए तैयार भी मानव नहीं है
जिंदगी संघर्ष में अब बन गयी दानव कहीं है
और वो दानव लहू पर देश के यूं पल रहा है
आदमी का पाप ही आदमी को छल रहा है
गर तुझे अब ना रहा इन हड्डियों से प्यार है
तू देश का शासक नहीं गद्दार है-गद्दार है।
पं. सुरेश नीरव९८१०२४३९६६जय भड़ास।। जय यशवंत
Posted by
Unknown
4
comments
एक नए दोस्त के लिए कुछ कविताएं (पाश की) सप्रेम.....
ज़िंदगी में दोस्ती, यारी, अपनापा, सदभाव, प्रेम.....ये ही तो वो कुछ ऐसे बंधन हैं, कुछ सूत्र हैं, कुछ धागे हैं, कुछ रिश्ते हैं, कुछ कड़ियां हैं... जो मनुष्य को जीते रहने के लिए कहते हैं वरना हैवानों-इंसानों ने धरती की सूरत ऐसी बना दी, दानवों-मानवों ने मनुष्यता की परिभाषा कुछ यूं गढ़ दी कि यहां कोई सोचने समझने वाला इंसान खुश प्रसन्न मुग्ध होकर रह ही न सके, जी ही न सके। तो जीते रहने की ज़िद में जब कुछ ऐसे जाने/अजाने दोस्त मिल जाते हैं जिन्हें सुनना, पढ़ना, देखना, सोचना, महसूस करना ऊर्जा से भर देता हो, तनावों और दबावों से उबार लेता हो, कुछ बेहतर करने की ललक पैदा करता हो तो फिर वाकई दिल कहता है....थैंक्यू दोस्त।
चलिए, आज मैं उस दूर बैठे दोस्त को मशहूर क्रांतिकारी कवि पाश की कुछ कविताएं भड़ास के जरिए भेंट करता हूं।
यह एक कोशिश भी है कि भड़ास पर राजनीति, साहित्य, खेल, पत्रकारिता से जुड़ी भड़ास निकालने के साथ-साथ निजी एहसास से जुड़े़ भाव को भी शब्द देकर भड़ास का रूप दें ताकि दिल हलका हो सके, मन खुश हो सके। संभवतः यही वो चीज है जो हमारी आपकी जिंदादिली को बयान करेगी, बचाए रखेगी, आगे ले जाएगी... वरना शब्दों के जरिए क्रांतिकारी बंदूक दागने वालों की कमी थोड़े ही है इस दुनिया में।
फिलहाल भाषण देने का मूड नहीं है, कविता पढ़ाने को बेसब्र हूं। तो लीजिए जनाब, हुजूर, महाशय, महोदय....
यशवंत
-------------------
1-
बस कुछ पल और
तेरे चेहरे की याद में
बाकी तो सारी उम्र
अपने ही नक्श खोजने से फुरसत न मिलेगी
बस कुछ पल और
यह सितारों का गीत
फिर तो आसमान की चुप
सबकुछ निगल जाएगी....।
देख, कुछ पल और
चांद की चांदनी में चमकती
यह तीतरपंखी बदली
शायद मरुस्थल ही बन जाए
ये सोए हुए मकान
शायद अचानक उठकर
जंगल की ओर ही चल पड़ें....
2-
उनकी आदत है सागर से मोती चुग लाने की
उनका रोज का काम है, सितारों का दिल पढ़ना।
3-
हजारों लोग हैं
जिनके पास रोटी है
चांदनी रातें हैं, लड़कियां हैं
और 'अक्ल' है
हजारों लोग हैं, जिनकी जेब में
हर वक्त कलम रहती है
और हम हैं
कि कविता लिखते हैं...
4-
मेरे पास चेहरा
संबोधक कोई नहीं
धरती का पागल इश्क शायद मेरा है
और तभी जान पड़ता है
मैं हर चीज पर हवा की तरह सरसराता हुआ गुजर जाऊंगा
सज्जनों, मेरे चले जाने के बाद भी
मेरी चिंता की बांह पकड़े रहना
5-
प्यार आदमी को दुनिया में
विचरने लायक बनाता है या नहीं
इतना जरूर है कि
हम प्यार के बहाने (सहारे)
दुनिया में विचर ही लेते हैं
6-
आदमी के खत्म होने का फैसला
वक्त नहीं करता
हालात नहीं करते
वह खुद करता है
हमला और बचाव
दोनों आदमी खुद करता है।
7-
समय ओ भाई समय
कुछ तो कह दो
हम तुम्हारे संग हो क्या कुछ करें?
हमारा समय है गुनाहों भरा
कैसे पार जाएं हम इस भवजल से?
8-
तुम्हारे बगैर मैं बहुत खचाखच रहता हूं
यह दुनिया सारी धक्कमपेल सहित
बे-घर पाश की दहलीजें लांघकर आती-जाती है
तुम्हारे बगैर मैं पूरे का पूरा तूफान होता हूं
ज्वारभाटा और भूकंप होता हूं
तुम्हारे बगैर धरती का गुरुत्व
भुगत रही दुनिया की तकदीर होती है
या मेरे जिस्म को खरोंचकर गुजरते अ-हादसे
मेरा भविष्य होते हैं
लेकिन किंदर! जलता जीवन माथे लगता है
तुम्हारे बगैर मैं होता ही नहीं।
9-
आदमी का भी कोई जीना है
अपनी उम्र कव्वे या सांप को बख्शीश में दे दो
10-
जीने का एक और ढंग होता है
भरी ट्रैफिक में चौपाल लेट जाना
और स्लिप कर देना
वक्त का बोझिल पहिया।
मरने का एक और भी ढंग होता है
मौत के चेहरे से उलट देना नकाब
और ज़िंदगी की चार सौ बीस को
सरेआम बेपर्द कर देना।
(उपरोक्त सभी कविताएं मशहूर कवि पाश की हैं। उनका जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के तलवंडी सलेम, तहसील नकोदर, जिला जालंधर में हुआ था। 23 मार्च 1988 को अमेरिका लौटने से दो दिन पहले तलवंडी सलेम में अभिन्न मित्र हंसराज के साथ खालिस्तानी आतंकवादियों की गोलियों के शिकार होकर शहीद हुए।)
कैसे कैसे कामरेड बनाम रोहिणी में एक दढ़ियल कुत्ता!
--जेपी नारायण--
...वह रोहिणी (दिल्ली) की गलियों में दाढ़ी बढ़ाकर घूम रहा है। पहचानो उसे, मार भगाओ। वह एक शातिर मठाधीश है। कुत्ते की तो भी एक दियानतदारी होती है। मजदूरों के नाम पर उसने अपनी दुकानदारी जमा रखी है। पहचानो उसे। पहचानो। उसकी दुकान में तरह-तरह के माल है। समाजवादी माल। जनवादी माल। वह पुस्तक-फरोश क्रांतिकारिता का अलमबरदार बना छुट्टा घूम रहा है। अपने तरफदारों के बीच कहता है कि वह भूमिगत है। नक्सलवादी है लेकिन हकीकत ये है कि वह कुछ और ही कारनामो को अंजाम दे रहा है। पहचानो उसे। पहचानो!
जनवाद और समाजवाद के नाम पर हजारो कथित कामरेड ऐसे भी है जो लेबी के पैसे से कोढियों की तरह पल रहे हैं। ठाट की जिंदगी जी रहे हैं। बेटे-बेटी के शादी व्याह रचा रहे हैं। विदेशी ब्राड के कपड़े पहन कर मारुति से दिल्ली की गलियों में घूम रहे हैं। उन्हीं में एक जनाब ऐसे हैं जो मीडिया की आड़ में पुस्तक का धंधा कर रहे हैं। इन कथित क्रांतिकारियों ने अब तक हजारो लोगों को चूना लगाया है। सैकड़ो लोगो के घर-मकान बिकवा दिए। और दर्जनों लोगों के साथ ऐसा शर्मनाक कृत्य किया, जिसे सुन कर कोई भी शर्म से गड़ जाए। ऐसे लोगों को इन धंधेबाजों ने पहले तो विचारों की घुट्टी पिलाकर संगठन में शामिल किया, रूपये-पैसे दुहे, जब वह आर्थिक मदद देने लायक नहीं रहा तो निकाल बाहर किया।
----एक ऐसी ही लड़की, अपना घर-परिवार छोड़कर पति के साथ इन धंधेबाजों के चंगुल में फंस गई। इस बीच उसके पति का आर्थिक दोहन चलता रहा। इसी बीच वह लड़की प्रीगनेंट हो गई। तब तक इस दंपत्ति का भरपूर दोहन किया जा चुका था। ...और फिर उनके साथ भी वही हुआ, जो अब तक दर्जनों के साथ हो चुका था। उन्हें संगठन से खदेड़ दिया गया। वे दिल्ली की गलियों में काफी समय तक दर-दर भटकते रहे।
........कारनामा यही तक होता तो गनीमत थी। इन धंधेबाजों का एक और हैरतअंगेज कारनामा। वे क्रांति के लिए संघर्ष का नारा देते हुए शोषण का जोरदार आइडिया भी बखूबी आजमा रहे हैं। उन्होंने दिल्ली में एक ट्रांसलेशन ब्यूरो खोल रखा है। ब्यूरो में युवाओं को रोजगार के नाम पर चूसा जा रहा है। ब्यूरो के कर्ता-धर्ता प्रकाशकों से या अन्य सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों से ट्रांसलेशन के लिए मैटर जुगाड़ लाते हैं। बेरोजगार युवा उन्हें अनूदित करते हैं। एक-एक युवक प्रति माह २५ से ३० हजार रुपये तक का काम कर देता है। उसमें छह से आठ हजार रुपये उसे पकड़ा दिए जाते हैं, बाकी रकम धंधेबाजों के जेब में चली जाती है, जिससे वे ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं, समाजवाद पर लंबे-लंबे आख्यान देते हैं। और धंधेबाजों का दावा होता है कि ट्रांसलेशन ब्यूरो की लंबी कमाई क्रांति के कारोबार में लगाई जा रही है।
...उनकी करनी अनंत है, यहां कितना गिनाएं-बताएं। इन मुफ्तखोरों के आए दिन मैग्जीनों में लंबे-लंबे लेख छपते हैं। जनवाद-समाजवाद की बातें होती हैं और अंधेरे की करतूतें ऐसी कि वामपंथ गया तेल लेने।
....और तरह-तरह के रंगे-सियार वामपंथ के नाम पर १९५० के दशक से जो कुछ कर रहे हैं, नांदीग्राम जैसी पटकथाएं लिखते हुए आजकल प.बंगाल में पूंजी निवेश के लिए पाजामा खोले खड़े हैं। उनके हजारो-हजार कथित कम्युनिस्ट कार्यकर्ता फिल्ड में नित-नए कीर्तिमान रच रहे हैं। कोई इप्टा के नाम पर धंधा चला रहा है तो कोई भाकपा-माकपा के नाम पर। कोई गोली-बंदूक लेकर बीहड़ में चौथ वसूली कर रहा है तो हथियारों की तस्करी तक में लिप्त है।
इस तरह देखिए-जानिए कि कम्युनिज्म के नाम पर देश में कितना बड़ा कारोबार चल रहा है। शर्म है ऐसे कथित वामपंथियों पर, धिक्कार है उनकी काली करतूतों को। बात सियासत तक ही नहीं, एक-से-एक घाघ बुद्धिजीवी बहसों में, कविताओं, लेखों में, मंचों पर, गोष्ठियों में इस तरह नमूदार होते हैं, मानो वाह-वाह झुग्गी-झोपड़ी का क्या खूब दर्द उड़ेला है, और अपनी निजी जिंदगी में वातानुकूलित कमरों, हवाई उड़ानों के आनंद से लबरेज होते हैं। कोई स्री-विमर्श के नाम पर दिल्ली में मजे कर रहा है तो कोई एनजीओ के कारोबार में लाखों की कमाई में अस्तव्यस्त है। ....फिलहाल तो इतना ही।
-जेपी नारायण के ब्लाग बेहया (http://behaya.blogspot.com) से साभार
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
5
comments
Labels: करतूत, कहानी, कामरेड, चेतावनी, जेपी नारायण, पर्दाफाश, बेहया, सावधान
कुदरत मानव जाति को नष्ट कर रही है
कितना साफ दिखता है कि जिधर एक तरफ लोग किस्सागोई और शायरी में लोट रहे हैं वहीं दूसरी ओर हमारी मनीषा दीदी को मानव जाति के भविष्य के बारे में कितनी गहरी चिन्ता सता रही है ये उनके इस पोस्ट से पता चलता है। समाज जिन्हें तिरस्कार से देख रहा है वे खामोश रह कर भी कितने फ़िक्रमंद हैं जरा देखिये। कहीं-कहीं उनके लेखन पर मेरी छाप दिखती है ये संगति का असर है कि हम भाई-बहन एक ही ट्यूनिंग पर सोचते हैं। इस बात का पूरा यकीन है कि ज्यादा लोग इस पोस्ट को न तो पढ़ेंगे और न ही कमेंट करेंगे क्योंकि मनीषा दीदी की उपस्थिति शायद लोगों को अब तक रास नहीं आई है या पच नही रही है। लेकिन फिर भी ये लेख विचारोत्तेजक जान पड़ा तो उनके ब्लाग से बिना इजाजत ज्यों का त्यों उठा कर डाल रहा हूं जिनमें हिम्मत है वे ही पढ़े...........
कुदरत मानव जाति को नष्ट कर रही है
आज एक चैनल पर एक कार्यक्रम में "गे" और "लेस्बियन" लोगों पर बात चल रही थी, कुछ लोगों का इंटरव्यू भी था। उसे देखने पर दिल और दिमाग के साथ मेरे पूरे अस्तित्त्व में भूकंप सा आ गया। नवयुवकों ने स्त्रियों की तरह से लाली-पाउडर लगा रखा था और बड़े ही भावुक अंदाज में दलील दे रहे थे कि हमारे साथ ईश्वर ने नाइंसाफी कर दी है हम लोग मन और आत्मा से तो औरत हैं लेकिन मर्दाने जिस्म में कैद हैं वगैरह..वगैरह....। इसी तरह से लड़कियों ने भी पुरुषों की तरह से बाल छोटे कटवा रखे थे और वे भी कुछ इसी अंदाज में ईश्वर की नाइंसाफी का बखान कर रही थीं और स्टूडियो में आमंत्रित जनता भी उनसे सहानुभूति जता रही थी। मैंने जीवन में पहली बार ईश्वर को धन्यवाद करा था मेरे बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव से मिलने पर और दूसरी बार अब दिया कि हे भगवान आपने मुझे आंगिक(लैंगिक) विकलांगता दी जो मेरे ही न जाने किन किन पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है लेकिन कम से कम बुद्धि तो संतुलित दी है वरना अगर इन लोगों जैसी बुद्धि होती तो ज्यादा कष्ट होता। गुरुशक्ति का स्मरण कर स्थिरचित्त होकर बैठने पर सोच को एक नया आयाम मिला है कि ये लोग दिमागी मरीज हैं और मैं इनसे सर्वथा भिन्न हूं। "गे" और "लेस्बियन" लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग भी इसे ईश्वरीय अन्याय ही मानते हैं जैसा भगवान ने इन्हे बनाया है वैसे वे हैं भला इनका क्या दोष...। सत्य है इनका दोष नही है बल्कि दोष है समाज का जो इन्हें मनोरोगी न मान कर सामान्य मान लेता है और उचित उपचार की प्रेरणा नहीं देकर जस का तस स्वीकार लेता है। एक इंसान जिसे ईश्वर ने पुरुषांग से सजा कर पुरुष बना कर भेजा किन्तु जब वह किशोरावस्था में प्रवेश करता है और उसका परिचय हारमोन्स के परिवर्तनों से उपजी यौनभावना से होता है, उस दौरान यदि वह किसी मनोयौनरोगी किस्म के व्यक्ति के सम्पर्क में आ जाता है। जिससे उसे पहली बार यौन भावना की अभिव्यक्ति और उसके उद्दीपनकर्म से होता है तो उसे वही सब नैसर्गिक और सहज लगता है। जैसा कि आयुर्वेद में बताया गया है कि व्यक्ति के आहार-विहार-विचार से उसके अंतःस्रावी ग्रन्थियों यानि कि पूरे एंडोक्राइन सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है और वे उसी के अनुरूप हो कर क्रियाशील हो जाती हैं, समय के साथ ही ये भीतर ही भीतर इस बात का अनुकूलन भी हो जाता है। इसलिये शरीर के हार्डवेयर को कुदरत द्वारा निर्धारित जो साफ़्टवेयर्स चलाते हैं उनमें से लैंगिक आयाम से संबद्ध साफ़्टवेयर करप्ट हो जाता है और मर्द खुद को औरत और औरत खुद को मर्द समझने लगते हैं। इस बात पर जरा गहराई से विचार करिये कि यदि कोई बच्चा ’स्टारफिश’ जैसी जिंदगी जीना चाहे तो आप उसे क्या समझेंगे? ’स्टारफिश’ का पाचन संस्थान (digestive system) कुदरत ने ऐसा डिजाइन करा है कि वह जिस अंग से भोजन ग्रहण करती है उसी अंग से पाचन हो जाने के बाद अपशिष्ट मल का उत्सर्जन भी उसी अंग से कर देती है यानि कि मुंह और गुदा का काम एक ही अंग करता है। जबकि मानव देह में पाचन संस्थान की उक्त प्रक्रिया मुंह द्वारा भोजन ग्रहण करने के बाद गुदा द्वारा मल त्याग करने पर पूर्ण होती है। किंतु मानव अगर ऐसा करे कि पाचन के बाद उल्टी करके निकालने का प्रयास करे और इस प्रयास को तर्क से उचित ठहराए तो आप उसे क्या कहेंगे? मेरी नजरों में तो वह विक्षिप्त ही होगा। यौनकर्म में कुदरत ने आनंद की एक विशेष अनुभूति को इसलिये छिपा रखा है कि मानव उसी अनुभूति के लिये संभोग करे और प्रजनन होता रहे व वंशक्रम चलता रहे और प्राणियों की ये प्रजाति लुप्त होने से बची रहे। किन्तु विकास के क्रम में ये संतुलन मानवों द्वारा गड़बड़ा दिया गया और बुद्धि का प्रयोग निसर्ग से हट कर करना शुरू कर दिया। आज के दौर में मानव ने यौनकर्म को दो सर्वथा दो भिन्न हिस्सों में बांट दिया - प्रजनन और यौनानंद। आनंद की प्राप्ति के लिये कुदरती तरीके से भिन्न उपाय सभ्यता के विकास के साथ खोजे जाने लगे। धीरे-धीरे प्रजनन देह से हटकर प्रयोगशालाओं की परखनलियों (test tubes) में सिमटता जा रहा है और शरीर मात्र आनंद का उपकरण बनता जा रहा है।मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि कदाचित कुदरत ही अपना संतुलन बनाए रखने के लिये ऐसा कर रही है कि एक एक दिन मनुष्यों की बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के विकराल प्रश्न का एकमात्र उत्तर स्वयं ही सामने आ जाएगा और वह उत्तर है - "समलैंगिकता"। इसी समलैंगिकता के चलते कुछ समय में ही मानवजाति की जनसंख्या स्वयं ही सिकुड़ने लगेगी और अगर यही हाल रहा तो एक दिन धरती से मानव लुप्त हो जाएंगे, खत्म हो जाएगा आदम का वंश..........
:- "अर्धसत्य" से सादर
Posted by
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
1 comments
Labels: गे, लेस्बियन, लैंगिक विकलांग, समलैंगिकता, हिम्मत
22.4.08
कुर्सी तोड़ मार्का लोकतंत्र
यह हमारा लोकतंत्र है
खालिस देशी
शुद्ध घी की तरह
कोई मिलावट नहीं
कुछ भी इम्पोर्टेड नहीं ।
बहुत खूबियाँ हैं इसमें
हैं इसके कई फायदे
चूल्हों को जलावन तक मयस्सर नहीं है
पर हैं चाँद सितारों के वायदे ।
कोई कुछ भी कहे
विश्व में अव्वल है
हमारा लोकतंत्र
वर्ना सदन में
कुर्सियाँ चलाने, तोड़ने को
कहाँ कौन है स्वतंत्र।
ये हमारा कुर्सीतोड़ मार्का
लोकतंत्र है
यहाँ सब स्वतंत्र हैं
चाहे तो सदन में गालियाँ दे लो
चप्पलें चप्पलें चप्पलें चप्पलें चला लो
कुर्सियाँ तोड़ दो
या किसी की बाँह मरोड़ दो
कोई कुछ नहीं कहेगा ।
ये हमारा तरीका है
लोकतंत्र में
आस्था व्यक्त करने का
कोई दूसरा मुल्क
ऐसा क्या कर पाता है
जो उँगलियाँ उठाते हैं
हमारे लोकतंत्र पर
उनके बाप का क्या जाता है।
आख़िर स्वतंत्रता है
अभिव्यक्ति की यहाँ
भावना की कद्र की जाती है
हर एक व्यक्ति की यहाँ
सिर्फ हमारे लोकतंत्र में
पाला बदलने की सुविधा है
नेताओं के मन में
पार्टियों को लेकर
नहीं तनिक भी दुविधा है।
यहाँ दाल नहीं गली तो
वहाँ गला लेंगे
नहीं तो अपनी खिचड़ी
अलग पका लेंगे
खंडित जनादेश की सूरत में'
छोटे बडों का
भेद सारा मिट जाता है
पिद्दियों और सूरमाओं के
बीच का
विभेद सारा मिट जाता है।
गठबंधन की राजनीति
समरसता का गीत गाती है
बाघ और बकरी को
एक ही मंच पर बिठाती है
बाघ मिमियाता है
बकरी दहाड़ती है
क्योंकि सियासी कुर्सी की
एक टांग
बकरी के हाथ में
जो आ जाती है।
सियासी कुर्सी की
इसी एक टांग की खातिर
टूटती है अक्सर सदन में
अन्य कुर्सियों की टाँगें
इसी से गौरवान्वित होता है
हमारा कुर्सी तोड़ मार्का लोकतंत्र
जहाँ कुर्सियाँ चलाने तोड़ने को
होता है हर कोई पूर्ण स्वतंत्र।
वरुण राय
Posted by
VARUN ROY
2
comments
बबली तेरो मोबाइल , वह रे तेरो स्टाइल
बबली तेरो मोबाइल , वह रे तेरो स्टाइल ..................................................
चाहे बबली हो या बब्लू , उनके पास कुछ हो या ना हो पर मोबाइल जरुर होगा . लड़किया चाहे पर्श मै मेकप का सामान लाना भूल भी जाए पर मोबाइल कभी नही भूलती .लड़के चाहे पर्श जो उनको सबसे प्रिय है वो तक भूल जाए पर मोबाइल न बाबा ना ---नेवर .बच्चे , बुड्ढे और जवान मागे बस (मोबाइल).मम्मी का पापा का हम सबका प्यारा मोबाइल.और यही नही जिनके पास होता है वो और अच्छा चाहते है ---------ये दिल मांगे मोरे .बाप रे आज की दुनिया कितनी बातूनी हो गई है . ,दुश्रो को देने के लिए भले ही एक रुपैया ना हो पर मोबाइल के लिए हजारो रुपिये पानी की तरह बहा देते है और कोई गम भी नही . आज जिधर देखो लोग बातें बस बातें करते नजर आते है . कोई सड़क के किनारे खडा है , कोई सड़क के बीच भी मोबाइल को कानो से चिपकाए है. अपनी जान की उतनी परवाह नही है जितनी मोबाइल की . सात से सत्तर के पास भी मोबाइल आम बात है , मोबाइल की दौड़ मै गरीब अमीर का कोई भेद नही , भेद है तो बस सस्ते मंहगे का. एक छोटे से बच्चे को भी खेलने को मोबाइल ही चाहिये और अस्शी साल के बुड्ढे को भी चाहे दांत हो या ना हो, मोबाइल हमेशा रहेगा. जय हो मोबाइल जी की .जान से प्यारा मोबाइलसबसे न्यारा मोबाइल हुमारा प्यारा मोबाइल वैशे मोबाइल जी है बड़े काम की चीज.कुछ भी काम हो चुटकी मै हो जाता है मोबाइल से . और तो और त्यौहार भी अब मोबाइल पर ही मना लिया जाता है .पहले तो कुछ ही गिने -चुने त्यौहार होते थे पर मोबाइल जी के आते ही इनकी संख्या लाखो मै पहुँच गई है. आज ये डे ,कल वो डे ,परसों न जाने कौन सा डे ? लोग इतना खुश दोस्त से मिलने पर भी नही होते जितना उश्से मोबाइल पर बातें करने और मेसेज करने पर होते है ।
वाह रे मोबाइल तेरी महिमा अपरम्पार है.राजा को रानी से प्यार है मोबाइल पर सूरज चाँद का यार है मोबाइल परखाना- पीना , सोना- जागना, उठना- बैठना सब भूल गए बस याद रहा तो मोबाइल.अब लड़के को ही देख लो ,घर वालो के काम के लिए चाहे एक मिनट का टाइम ना हो पर अगर प्रेमिका ने मोबाइल घुमाया वो भी मिस कॉल ,मजनू तुरंत हाजिर. और लड़की वो भी कम नही . माँ ने कहा घर का काम करो तुरंत कह दिया पढ़ रही हूँ . ,मजनू का मिस कॉल आते ही (जो उनका कोड नम्बर है) माँ से कह दिया की सहेली के घर पढने जा रही हूँ .चल दी अपने मजनू से मिलने.यही तक सीमित नही है मोबाइल जी की दास्ताँ. अगर कुछ देर के लिए सिग्नल चले जाए तो दुनिया उलट-पलट हो जाती है ,पागल हो जाते है ,इतने परेशान हो जाते है जैशे सब -कुछ उजड़ गया हो. और अगर कही कुछ दिक्कत आ जाए तो लगे खनख्नाने कॉल-सेंटर.
वैसे चाहे कुछ भी कहो ,पर है बहुत ही सुविधाजनक यह मशीन एकदम अल्लादीन के जादुई चिराग की तरह .किसी से कुछ कहना हो तुरंत कह दिया ,किसी से कुछ
पूछना हो ,बताना हो तुरंत कह-पुच लिया। लैला या मजनू को कुछ भेजना हो किसी पास पड़ोसी से कह दिया वो भी तुरंत हो गया .सबकुछ फ़टाफ़ट. भई बहुत ही
फायदेमंद है यह पर नुकशान भी कुछ कम नही.....................
१)बिना जाने-पहचाने बतियाने लगे ,खा ली जीने मरने की कसम और फिर खा गए धोका ,लुट गया सब कुछ।
२)बात-बातो मै खोल दिए घर के सारे राज और हो गया घर साफ।
३)हम तो बतियाते-बतियाते छोड़ आए वो गलिया पर वो ना आया।
४)क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार मै।
५)मोबाइल आते ही जाने कौन कौन कंपनिया लगी फ़ोन खंख्नाने ।
६)रात की नींद टूटी दिन का चैन गया।
७)अपने पास होते हुए भी दूर हो गए।
८)त्योहारों का रंग उड़ गया।
९)पैसे पानी की तरह बह गए और हाथ फिर भी खाली।
१०)दिल-दिमाग की बिमारी हुई सो अलग।
११)आनंद धुन्दने चले थे बेचैनी ,मायुशी, ले आए।
१२)दोस्त -दोस्त ना रहा ,प्यार -प्यार ना रहा।
अगर किसी को फायदा हुआ तो सिर्फ़ और सिर्फ़ कम्पनी वालो को.सो डीअर बातो मै न जाओ ,अपनी अक्कल लगाओ.
Posted by
KAMLABHANDARI
2
comments
Labels: मोबाइल के किस्शे

















.jpg)








