Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

25.9.08

रोज एक हिकमत.......,एक तरकीब, daily TIP..... SAVE POWER

रोज एक हिकमत.......,एक तरकीब, daily TIP..... SAVE POWER

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पर ब्यूरो आफ इनर्जी एफिशियेंसी , भारत सरकार , नई दिल्ली से सर्टीफाइड इनर्जी मैनेजर , भडासी विवेक
रंजन श्रीवास्तव , पावर इंजीनियर , विद्युत मंडल , जबलपुर के उर्जा बचाओ टिप पढ़िये ...हर दिन एक नई टिप.

हाय रे दैनिक हिंदुस्तान

वाक इन इंटरव्यू के लिए एचटी मीडिया के दफ्तर पहुचे पत्रकारों की जुबान पर पुरे दिन रहा "हाय रे हिंदुस्तान "वही कार्यालय में कार्यरत लोगो ने कहा सीन बार ख़राब है। जी सीन सच में बड़ा ख़राब था .सुबह १० बजे से सांझ ढलने तक बड़े बेआबरू हुए अनुभवी पत्रकार .कभी घंटो गेट पर पर खडे रहे तो कभी बहुमंजली हिंदुस्तान कार्यालय के आहते से बाहर खदेरे गए । बिहार पुलिस की भरती का सीन नज़र आ रहा था . इंटरव्यू के नाम पर घंटो की मशकत के बाद हुआ राम राम .रिज्यूमे छोड़ दे हम काल करेंगे .तो ये था तीन वर्षो से अधिक समय से पत्रकारिता कर रहे ,उप संपादक ,रिपोर्टर और पेजमेकर का इंटरव्यू . दरसल हिन्दुस्तान देलही ने कापी एडिटर /रिपोर्टर/पेजमेकर के लिए २३sept. को अपने पत्र में वाक इन इंटरव्यू का vegyapan प्रकाशित किया था .समय सुबह १० से ५ का था.

कितनी सहूलियत हो अगर आतंकवादी रोज विस्फोट करें!

देश की राजमंडली लकदक रहे तो कितना ठीक है। राजा साहिब बनाव-श्रृंगार नहीं करेंगे तो भला कौन करेगा, मेरा 'मंगरुआ'। गृह मन्त्री शिवराज पाटिल छैला बनकर नहीं घूमेंगे तो कौन घूमेगा। वैसे भी मुझको उनमें फिल्मी खलनायक अजीत या प्राण का अक्स नजर आता है। आप को अगर ठीक से याद आता हो तो बताइयेगा कि शिवराज बाबू किस फिल्मी पर्सनैलिटी की तरह लगते हैं। बहरहाल, शिवराज बाबू ने लोगों के सुविधानुसार ही वस्त्र धारण किया। विस्फोट से पहले पार्टी मीटिंग में गए तो बिल्कुल सौम्य ग्रे कलर का सूट पहनकर। वहां सोनिया-वोनिया जी कितने सारे लोग रहते हैं। मीडिया के सामने आए तो थोड़ा गहरे कलर का सूट पहन लिया। मीडियावाले ही बताएं कि आखिर कैमरे के सामने कपड़ों के रंग का महत्व होता है कि नहीं? बेचारे सुविधा भी प्रदान करते रहें और खिंचाई भी होती रहे, कैसा जमाना आ गया है। उसके बाद अस्पताल गये, मर-मरा गये और घायल लोगों का हालचाल लेने तो सफेद रंग का सूट पहन लिया। मीडिया के लोग जैसे सिनेमा देखते ही नहीं हैं। देखते नहीं वहां दरवाजे पर लाश पड़ी रहती है और परिजन एकदम झक सफेद कपड़े पहनकर विलाप करते हैं। कितने धैर्यशाली लोग होते हैं। घर में मौत पक्की हुई तो तुरन्त दहाड़ें मारना नहीं शुरू करते गंवारों की तरह। पहले जाते हैं वार्डरोब में से फ्यूनरल ड्रेस निकालते हैं तब रोना-धोना शुरू करते हैं। चाहे स्त्री हो या पुरुष सभी इस तरह का संयत व्यवहार करते हैं। इन फिल्मों को देखकर मुझे लगता है कि जरूर धनवान लोग दो-तीन जोड़ी फ्यूनरल ड्रेस बनवाकर रखते होंगे। तो अपने शिवराज जी भी सफेद सूट-बूट पहनकर गए शोक-संवेदना जताने।
आतंकवादियों ने अपने तयशुदा कार्यक्रम के तहत दिल्ली में बम विस्फोट कर दिया। उन्हें तो ऐसा करना ही था। अल्लाह के बन्दे हैं जो चाहें सो करें। कौन है उनको रोकने वाला। हमारी सरकार भी कम होशियार थोड़े है। उनकी इस घिनौनी हरकत से भी वह कुछ नया सीख लेती है। बकौल गृह सचिव 'हर बार के विस्फोट से अपना गृह मन्त्रालय कुछ नया सीखता है।' कितनी सहूलियत हो अगर आतंकवादी रोज विस्फोट करें, अपना गृह मन्त्रालय रोज कुछ न कुछ नया सीखेगा। मुफ्त की क्लास, मुफ्त का ज्ञान। कुल मिलाकर मुफ्त की पाठशाला। दरअसल इस्लामिक आतंकवाद के कीड़े पैर पसार चुके हैं और हमारी व्यवस्था से तो अब पायरिया की सी बदबू आने लगी है।
मैंने शुरू में ही देश के राजमंडली की जय कर दी है। झूठे थोड़े ही की है। वहां लालूजी हैं, रामविलास भाई हैं। दोनों सिमी समर्थक हैं। रामविलास भाई लादेन के भी जबर्दस्त फैन हैं। याद कीजिए २००४ बिहार विधानसभा का चुनाव। उस समय रामविलास भाई लादेन के एक हमशक्ल को लेकर चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब भी मैंने लिखा था कि ऐसा करके वह एक समुदाय विशेष को कटघरे में खड़े कर रहे हैं। सौभाग्य से लादेन या रामविलास को मुसलमानों का समर्थन नहीं प्राप्त हुआ। लेकिन ऐसे धुरंधरों के रहते हुए आतंकवादियों को निश्चित राहत महसूस होती होगी। सोचते होंगे कि हमारा भी कोई तगड़ा आदमी वहां है। वैसे भी इस मुल्क में उनके तमाम हित-बन्धु पैदा हो गए हैं। कोई डॉक्टर है तो कोई इन्जीनियर, कोई मुल्ला तो कोई मौलवी, कोई कुछ तो कोई कुछ। उनको पूरी तरह मुतमईन रहना चाहिए। दिग्गज धर्मनिर्पेक्षों के रहते उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। आतंकवादी अबुल बशर की गिरफ्तारी होगी तो एक से एक आला नेता पहुंचेंगे। जरूरी राहत और इमदाद देंगे। ऐसे में हे प्यारे आतंकवादियों! एकदम निश्चिन्त रहो, मन लगाकर अपना काम करो। लेकिन शिवराज भाई ''जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।''
वेद रत्न शुक्ल
bakaulbed.blogspot.com

वक्त वक्त की बात है

समय कब किस वक्त बदल जाए कौन जानता है। जो कुंवर नटवर सिंह कभी सोनिया गाँधी की आंखों का तारा हुआ करते थे वही आज उनके खिलाफ बोलने को मजबूर हैं। वह भी बीएसपी की सभा में। कांग्रेस के सालों साल तक नेता रहे नटवर सिंह ने आज श्रीगंगानगर में बीएसपी की सभा में कहा कि अब बहिन मायावती को देश की प्रधानमंत्री बनाना है। कई दल ऐसा नहीं होने देना चाहते लेकिन देश की जनता चाहती है कि मायावती प्रधानमंत्री बने। नटवर सिंह ने अपनी पूर्व नेता सोनिया गाँधी का नाम लिए बिना कहा कि एक विदेशी महिला बैठी है कांग्रेस की छाती पर जो हमें मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के कईशहरों में बम ब्लास्ट हुए लेकिन उत्तर प्रदेश में कुछ नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार से हिसाब माँगा जाएगा। आरम्भ में उन्होंने डॉक्टर अम्बेडकर और काशी राम के चित्रों पर माल्यार्पण किया। बीएसपी नेताओं ने उनका भावभीना स्वागत किया। उनके साथ उनके बेटे जगत सिंह भी थे। हालाँकि उनके आने का कोई प्रचार नहीं किया गया इसके बावजूद कई हजार लोग उनको सुनने के लिए आए। वे स्पेशल विमान से श्रीगंगानगर आए थे। शाम को वे उसी विमान से वापिस लौट गए। लालगढ़ हवाई पट्टी पर उनको विदा करने वाले केवल दलीप सहारण,मुरारीलाल सोनी और अप्पू थे। इन्होने नटवर सिंह और जगत सिंह को माला पहनाई। कुंवर नटवर सिंह ने इनसे बात की और आभार जताया। बीएसपी का कोई लीडर हवाई पट्टी पर नजर नही आया।

क्या दीखता है वो सही है....?


आज पूरे देश में iसाइयों पर हमलों की चर्चा हो रही है....लेकिन क्यों हुआ ये सब.......इसाई तो पहले.....भी वहीँ थे फ़िर अब उन पर हमले क्यों?कोई न कोई कारन तो जरुर है.....असल में हुआ ये है की देश में काम करने वाली मिशनरियों ने ये सब घोटाला किया है........जिन गरीब आदिवासियों के पास खाने को रोटी नहीं है....उनके पास टी वी,रेडियो,और हथियार कहाँ से आ गए?वो अचानक मंदिरों में जन क्यूँ भूल गए?ये सब अचानक नही हटा मित्रो इस खेल को समझने kइ कोशिश कीजिये....ये एक मामूली बात नहीं है....हमारे देश की ......जनता.......गरीब हो सकती है लेकिन .....उसे.....पैसे देकर इसाई बनाना ठीक नही है....हमने आपको अपने धर्म प्रचार की छूट दी है ....धर्म परिवर्तन की नहीं....आपके जो बड़े बड़े स्कूल चलते है उन में कितने गरीब पढ़ते है र कितनी फीस है हमे सब ध्यान है...इसलिए हे परमेश्वर के बन्दों अच्छे काम करो पर ये लोग धर्म परिवर्तन कर लेंगे....ये भूल........जाओ....रजनीश परिहार.....


यूँ तो कलाकारों को हमेशा ही कष्ट भोगना पड़ता है, और कलाकार कलाकार ही होता हैं जो समाज सुधर करने चलता है और समाज इस कदर प्रताडित करता हैउसे अपने कलाकार होने से घृणा होने लगती है। मैं भी एक कलाकार हू। पहले था नही अब बना हू । रंग मंच पर एक दो ही नाटक कियाहै और कलाकारों के बारे में जान कर मन में काफी दुःख होता। किस कदर कलाकारों की जिन्दगी संघर्ष से सुरु होकर संघर्ष में ही ख़तम हो जाती है।
घर और समाज इस से अछूता नही हैं। घर में परिवार वाले कहते हैं की देख नचनिया बजनिया बनी इ इ इ । समाज में लोग कहते हैं की काम धाम नइखे कमाए के आच्छा धंधा अपना लेले बा ।
इतना सब कुछ होने के बाद भी कलाकार नीलकंठ के सामान सब कुछ पी जाता है और समाज को उसकी कमी को दिखता हैं । समाज देखता हैं और कुछ देर बाद भूल जाता है । यदि प्रस्तुति आच्छी हुई तो थोडी देर वाहवाह उसके बाद ताना देना शुरू कर देते हैं लोग।
कलाकारों के अंदर कोई नही देखता की उसके अन्दर भी एक आदमियत है उसके अन्दर भावना है। छोटे शहरो में तो काफी ख़राब स्थिति है। रंगमंच पर अगर कुछ करना है तो कोई कलाकारों को मदद को आगे नही आता । ५०० रु० का डौगी मुर्गा खा सकता है पर ५० रु० नाटक करने को लोग नही दे सकते।
काफी कुछ सहना पड़ता है फ़िर भी मुस्कुराना पड़ता है। अभी मात्र चार सालों से ही इस क्षेत्र में हूँ इस दौरान कुछ आच्छा अनुभव नही रहा है मुझे । कभी कभी तो इतनी प्रशंशा मिलती है की मन में काफी जोश भर जाता है । जिसके बदौलत आज भी रंगमंच पर काफी कुछ करने मन होता है पर सबसे बड़ी समस्या वही होती ही धन की जो एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आने वाला कलाकार कभी पुरा नही कर सकता है। हर कलाकार की कमजोरी होती है रंगमंच । मैं क्या लिखू समझ में नही आ रहा है । फ़िर भी कलाकार होने का दंश झेलना ही पड़ेगा मुझे । सारे रंगकर्मियों को सादर प्रणाम करते हुए दिल से लिखे इस पोस्ट को अब समाप्त कर रहा हू । आप सबों का प्यार, दुलार , स्नेह , आशीर्वाद मुझे इस क्षेत्र से जोड़े रख सकता हैं कृपया हिम्मत दे। dhanyawad।

कलाकारों दुविधा


यूँ तो कलाकारों को हमेशा ही कष्ट भोगना पड़ता है, और कलाकार कलाकार ही होता हैं जो समाज सुधर करने चलता है और समाज इस कदर प्रताडित करता हैउसे अपने कलाकार होने से घृणा होने लगती है। मैं भी एक कलाकार हू। पहले था नही अब बना हू । रंग मंच पर एक दो ही नाटक कियाहै और कलाकारों के बारे में जान कर मन में काफी दुःख होता। किस कदर कलाकारों की जिन्दगी संघर्ष से सुरु होकर संघर्ष में ही ख़तम हो जाती है।
घर और समाज इस से अछूता नही हैं। घर में परिवार वाले कहते हैं की देख नचनिया बजनिया बनी इ इ इ । समाज में लोग कहते हैं की काम धाम नइखे कमाए के आच्छा धंधा अपना लेले बा ।
इतना सब कुछ होने के बाद भी कलाकार नीलकंठ के सामान सब कुछ पी जाता है और समाज को उसकी कमी को दिखता हैं । समाज देखता हैं और कुछ देर बाद भूल जाता है । यदि प्रस्तुति आच्छी हुई तो थोडी देर वाहवाह उसके बाद ताना देना शुरू कर देते हैं लोग।
कलाकारों के अंदर कोई नही देखता की उसके अन्दर भी एक आदमियत है उसके अन्दर भावना है। छोटे शहरो में तो काफी ख़राब स्थिति है। रंगमंच पर अगर कुछ करना है तो कोई कलाकारों को मदद को आगे नही आता । ५०० रु० का डौगी मुर्गा खा सकता है पर ५० रु० नाटक करने को लोग नही दे सकते।
काफी कुछ सहना पड़ता है फ़िर भी मुस्कुराना पड़ता है। अभी मात्र चार सालों से ही इस क्षेत्र में हूँ इस दौरान कुछ आच्छा अनुभव नही रहा है मुझे । कभी कभी तो इतनी प्रशंशा मिलती है की मन में काफी जोश भर जाता है । जिसके बदौलत आज भी रंगमंच पर काफी कुछ करने मन होता है पर सबसे बड़ी समस्या वही होती ही धन की जो एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आने वाला कलाकार कभी पुरा नही कर सकता है। हर कलाकार की कमजोरी होती है रंगमंच । मैं क्या लिखू समझ में नही आ रहा है । फ़िर भी कलाकार होने का दंश झेलना ही पड़ेगा मुझे । सारे रंगकर्मियों को सादर प्रणाम करते हुए दिल से लिखे इस पोस्ट को अब समाप्त कर रहा हू । आप सबों का प्यार, दुलार , स्नेह , आशीर्वाद मुझे इस क्षेत्र से जोड़े रख सकता हैं कृपया हिम्मत दे। dhanyawad।

मेरी तरह ,मेरे अक्षर भी जैसे हैं,वैसे ही दिखे हैं,

छायावादी या उन्मादी नाप-तोल कर नही लिखे हैं,
मेरी तरह ,मेरे अक्षर भी जैसे हैं,वैसे ही दिखे हैं,
छप जाऊं स्वर्णिम-पर्षठों में,
या, शिखरों से गाया जाऊं,
पद्मशरी पाने वालो की,
संगत में ,मैं पाया जाऊं,
लंबे जीवन-नभ मे ऐसे यश,के बादल नही दिखे हैं
छायावादी या उन्मादी नाप-तोल कर नही लिखे हैं
दिल्ली की सङकों सा जीवन,
दूषित और जाम रहता है,
यदा-कदा होता विशिष्ट यह ,
वैसे तो ये आम रहता है
चकमा देकर आगे निकलने वाले पैतरे नहीं सिखे हैं
मेरी तरह ,मेरे अक्षर भी जैसे हैं,वैसे ही दिखे हैं
सोचा चाहा कोशिश भी की ,
महानगर पर रास ना आया
क्या-कुछ पा सकता था,लेकिन
इन हाथों में कुछ ना आया
किंचित है,अफसोस मगर संतोष भी है हम नही बिके हैं
,चकमा देकर आगे निकलने वाले पैतरे नहीं सिखे हैं,
देने वालों को क्यों कोसूं,मैं
ही शायद पातर् नही था
जिसको स्वर्ण-पदक बंटने थे,
उस कक्षा का छातर् नही था,
सबको थी आपत्ति कि उत्तर शीश झुकाकर नही लिखे हैं
मेरी तरह ,मेरे अक्षर भी जैसे हैं,वैसे ही दिखे हैं,
-अरविन्द पथिक

एक बार की बात है

एक बार की बात है श्रीगंगानगर में एक नेता हुआ करता था। आर्थिक रूप से बहुत कमजोर वह नेता आम जन के लिए बहुत उपयोगी था। कुछ नहीं था फ़िर भी उसके यहाँ कम करवाने वालों की भीड़ लगी रहती थी। वह जाने माने राज नेता भैरों सिंह शेखावत का भी खास था। १९९३ में उसने श्रीगंगानगर से जनता दल की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा। मगर बहुत कम वोट से हार गया। इस चुनाव में भैरों सिंह शेखावत तीसरे स्थान पर रहे। हारने के बाद भी जनता का उस नेता से और नेता का जनता से मोह भंग नही हुआ। दोनों का प्रेम बना रहा। पॉँच साल गुजर गए। विधानसभा के चुनाव में इस बार नेता जी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे। जनता फ़िर साथ लगी। इस बार भी कम अन्तर से नेता जी विधायक बनने से रह गए। खैर वक्त ने तो बीतना ही था, सो बीता। २००३ में फ़िर विधानसभा चुनाव आए। इस बार नेता जी के हाथ में बीजेपी की टिकट थी। जनता इसके पीछे पागल हो गई।नेता जी को रिकॉर्ड मतों से जीता कर विधानसभा भेजा। बस तब से नेता जी का हाजमा बिगड़ गया। जो मित्र घर का खर्च वहां करते थे उनसे लेकर आम जन तक से व्यवहार करने का उनका स्टाइल बदल गया। अपने साथी नेता पर जान लेवा हमला करवाने की शाजिश रचने के आरोप में न्यायिक हिरासत में भी रहा। इस मामले का मुख्य आरोपी तो अभी तक फरार है जो नेता जी का पीए था। और भी ना जाने क्या क्या हुआ। श्रीगंगानगर की जनता नेता जी से दूर और बहुत दूर हो गई। आज अखबार में नेता जी कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी के साथ खड़े हुए थे। वे अब इस बार का चुनाव कांग्रेस की टिकट पर लड़ने के मूड में हैं। पता नहीं वहां की जनता का क्या होगा जहाँ से ये चुनाव लडेंगें। राजस्थान के निवासी तो इस नेता जी को जान ही गए होंगें बाकी भी थोडी देर में जान जायेंगें। जिसने दुःख दर्द में नेता जी का साथ दिया नेता जी उनके ही नहीं हुए तो कांग्रेस के क्या होंगे जिसकी तमाम उमर उन्होंने खिलाफत की है। आदरणीय,सुबह सुबह स्मरणीय, पूजनीय,इस नेता का नाम है श्री श्री सुरेन्द्र सिंह राठौर । जब २००३ में ये चुनाव जीते तब जन जन को ऐसा लगा जैसे श्रीगंगानगर को लम्बी काली रात के बाद भोर का उजाला नसीब हुआ हो। तब कोई क्या जानता था कि रात और काली होने वाली है। चलो जो कुछ हुआ उस से कांग्रेस की नेता सोनिया जी को क्या सरोकार हो सकता है। उन्होंने तो राजनीती करनी है। उनकी बला से किसी के भी सपने खाक में मिले उनको क्या। यही तो है "राजनीती" जिसमे नीति तो गायब हो गई बस राज रह गया। राज करना है राज से।

24.9.08

ये सच्चाई है , फ़ैसला आप का अपना होगा

JOB? OR BUSINESS.

· WHO DOES A JOB? A man who can’t do business.

· WHO GIVES THE JOBS? A man who does business.

· WHO DOES BUSINESS? A business man.

· WHO MAKES PROFIT? A business man.

· WHO IS A BUSINESS MAN? A rich man.

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मेरी चीजें !!

मेरे पास ढेर सारी चीज़ें थीं -
मैं उन्हें काफी दिनों तक सहेजता रहा ,
मगर -
अंततः उनमें से एक भी चीज़ न बची !!
और -
मैं बिल्कुल अकेला रह गया !!
तब मैंने जाना कि चीज़ें ,
कभी सहारा नहीं बनती ,आदमी का ,
यहाँ तक कि साया भी नहीं !!
अंततः
आप भी नहीं बचते ,चीज़ों की तरह !!

फिर, एक दिन अचानक -
वे सारी चीजें -
मेरे पास वापस आ गयीं ,
और मैनें उन्हें -
समस्त पृथ्वी-वासियों में बाँट दिया -
मगर तब भी -
मेरे पास कुछ चीज़ें बच ही रहीं !!
तब मैनें उन्हें -
अन्तरिक्ष-वासियों को दे डाला !!
सबने मुझे धन्यवाद दिया,
और मैनें भी उन्हें ,
उनके ढेर सारे प्यार के लिए !!

मैनें पाया कि -
मेरी समस्त चीज़ें तो ,
मेरे पास ही मौजूद थीं ,
और भी सघन होकर -
सबके -
ढेर सारे प्यार के रूप में !!

व्योमेश की कवितायें : भारत वंदना

हे भारत तुझे प्रणाम, माँ भारत तुझे प्रणाम
तेरे चरणों का वंदन करते हम तेरे संतान ।
वो तुम ही हो भारत भूमि,जहाँ संस्कृति का निर्माण हुआ
गीता का उपदेश हुआ, भारत का संग्राम हुआ
रामायण युग धर्म हुआ ,सभ्यता का संचार हुआ
जब जब तुझ पे संकटआया , अवतार लिए भगवान।
तुम ही वो जननी हो माँ जो वीरो को जनती है
तेरी संताने तुझ पे माँ सर्वस्व निछावर करती है
रन, शिवा, आजाद, भगत जैसे कितने वीर हुए
गाँधी, नेहरू, शास्त्री, सुभास ने किया स्वयं बलिदान।
तेरी शांत प्रकृति के बेटे ,माँ हम शान्ति दूत कहलाते है
पर उठे कोई ऊँगली तुझ पर ,हम कालदूत बन जाते है
रंगभेद मितलाये हम ,औ विश्वबंधु कहलाये है
तेरी धरती पे जन्म लिए ,हमको है अभिमान।
कश्मीर से कन्याकुमारी, तुम एक अखंड मूर्ति हो माँ
भारत के हर जन जन के मन में बसी छवि हो माँ
तुझ पे गर कोई हाथ उठा, वो हाथ वहीं कट जाएगा
तेरी खातिर दे देंगे हम कोटि कोटि जन प्राण.

बोलो तो करो,वरना चुप रहो

"आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता" "आतंकवादियों की कोई जाति नहीं होती ............"। जैसे बयान हर रोज़ आते है। जितना बड़ा नेता उतना बड़ा बयान। जब ऐसा है तो फ़िर उनको पुचकारने,उनके लाड करने की जरुरत क्या है। क्यों उनके धर्म या जाति से जुड़े वोट बैंक की चिंता की जाती है।उनके खिलाफ कोई भी कदम उठाने से पहले सरकार के अन्दर और बाहर के नेता हांफने क्यों लगते हैं। तुम ख़ुद कहते हो कि इनका कोई धर्म और जाति नहीं है फ़िर इनके खिलाफ ठोस कार्यवाही क्यों नहीं होती। आतंकवादी जब चाहे जहाँ चाहे धमाके करते हैं और हमारे नेता कपड़े बदल बदल कर बयान देने के अलावा कुछ नहीं करते। अगर इन नेताओं को केवल इनके ही वोट चाहिए तो फ़िर साफ कहें ना कि हम तो कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकते हैं आप जानो आपका काम। कितने अफ़सोस की बात है कि हिन्दुओं की बात करने वाला तो साम्प्रदायिक कहा जाता है और इन आतंकवादियों का पक्ष करने वाला महान धर्मनिरपेक्ष। आज तक कोई बता नहीं सका कि यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है। इस थोथी और वोट बैंक बनाये रखने के लिए तन पे लपेटी गई धर्मनिरपेक्षता ने देश का बंटा धार कर दिया है। हिन्दुस्तान में इन सबके पक्ष में बोलने वाले तो सभी हैं मगर ऐसा कोई नहीं जो उन लोगों की बात करें जो हिंदू कहलाते हैं। देश के नेता गाँधी जी की कोई और बात माने या न माने मगर "एक गाल पर कोई चांटा मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो" वाली बात पर हर रोज़ अमल करते हैं।
दूसरा गाल नहीं अपना देश तक उनके हवाले करने को तैयार हैं। मीडिया कौन सा कम है। बात करतें हैं न्याय की। करनी भी चाहिए। लेकिन न्याय तो वह होता है जिसमे सबको एक समान समझा जाता है। जिसको पाने के बाद सभी पक्ष न्याय करने वाले की बल्ले बल्ले करतें हैं। पता नहीं यह सब कब तक चलेगा। हिंदुस्तान कब हिन्दुस्तानियों का होगा। जब तक वोटों की राजनीति के चक्कर में किसी खास वर्ग जाति,धर्म को खास महत्व दूसरों के हितों को नकार कर दिया जायेगा। तब तक आतंकवाद को दौर थमेगा इस में संदेह है।

झारखण्ड में लूट की छुट है.

१७ सितम्बर मुंबई एअरपोर्ट से संजय चौधरी नाम का शख्स १२ करोड़ रुपये के साथ गिरफ्तार हुआ। और कुछ घंटो के बाद छुट भी गया। ये शख्स झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा का करीबी माना जाता है। हालाकि कोडा ऐसी किसी बात से इनकार करते हैं , पर सच्चाई यह है की उनके पैरवी से ही संजय का पासपोर्ट बना था।संजय के नाम तक़रीबन ७२० करोड़ की सम्पति का पता चला है। वैसे संजय चौधरी मात्र एक उदाहरण है -सत्ता धारी नेताओ के आस पास मंडराने वाले दलालों का जो ख़ुद तो करोडो की दलाली करते ही हैं , अपने आका नेताओ मंत्रिओं के पैसे को मैनेज भी करते हैं।

गलती सुधारो

---- चुटकी ----
सर जी गलती सुधारो
एक के बदले चार मारो
वरना सब कुछ
हाथ से निकल जाएगा,
भारत में खालिस्तान
तो नहीं बना हाँ
पाक जरुर बन जाएगा।
----गोविन्द गोयल ,श्रीगंगानगर

23.9.08

व्योमेश की कविताये: prakash

कुहांसे और अंधियारे के बीच
दिखने लगी है आशा की एक नन्ही किरण
बादलो के घने लामबंद परतो के बीच
चमकाने को आतुर है सूरज
बार -बार दल देते है उसे पीछे
काले,डरावने ,सफ़ेद ,भूरे बदल
लेकिन वह आएगा, चमकेगा अवश्य
उस पर टिकी है साडी दुनिया की निगाहे
अंधकार से लड़कर प्रकाश
और अज्ञानता को हर कर ज्ञान का
विस्तृत करने के उदहारण
आओं हम सब मिल कर बने सूरज
फैलाये नव प्रकाश,नव आशा, नव विश्वास
क्योंकि मिल कर अंधकार से लड़ने से
सूरज को शक्ति मिलती है.

थर्टी डेज़ का प्रकाशन दीवाली से

वाराणसी । विश्व की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से हिन्दी मासिक पत्रिका थर्टी डेज़ का प्रकाशन आने वाले दीवाली से प्रारम्भ हो जाएगा। पत्रिका के विषय में बताते हुए प्रधान संपादक ज्ञान प्रकाश जी ने बताया है की यह एक संपूर्ण पत्रिका होगी जो भारत की सांस्कृतिक परम्परा को समेटते हुए लोगो को मनोरंजन पूर्ण सुचना सामग्री उपलब्ध कराएगी। पत्रिका के संपादन का दायित्व अनुभवी पत्रकार डाक्टर व्योमेश चित्रवंश जी को दिया गया है। पत्रिका का प्रवेशांक प्रकाश पर्व अंक होगा। जिसका विमोचन आगामी २ अक्तूबर गाँधी जयंती के दिन वाराणसी में होगा।
ज्ञान जी ने पत्रिका के आगामी अंको के लिए प्रकाशन योग्य सामग्री पत्रिका के निम्न संपर्क कार्यालय पर भेजा जा सकता है :
संपर्क कार्यालय
थर्टी डेज़ (मासिक पत्रिका )
ई ४/३१, प्रेमचंद नगर ,पांडेयपुर
वाराणसी-221002

आंतकवादी आए कहाँ से......?


आंतकवादी जब भी कोई वारदात करते थे तो सबसे पहले पाकिस्तान का नाम आता था...लेकिन अब दिल्ली में पकड़े गए सारे आंतकवादी भारतीय है....ये क्यूँ बने आंतकवादी?...ऐसी क्या बात थी की ये देशवासियों के खिलाफ ह गए?.इसका सीधा अ जवाब है की इन्हे ग़लत श जेहाद के नाम पर भड़काया गया...और झोंक दिया गया इस खेल में....लेकिन ऐसे युवाओं क चाहिए की जेहाद के नाम पर लड़ने वाले अन्य देशं का क्या हुआ...?अनेक मुस्लिम देश ये लड़ाई लड़ते लड़ते आज बर्बादी के कगार पर पहुँच चुके है........लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ...उन देशों के मुकाबले भारत में कितनी ही बेहतर इश्थिति में है मुसलमान..... फ़िर ये जेहाद किसके लिए और क्यूँ? - रजनीश परिहार........

ऐसे लोगों को सलाम !!

सवेरे-सवेरे ही देखा कि बिहार के बाड़ पीड़ित इलाके में काम कर रहे डॉक्टरों की टीम में से एक डाक्टर की मौत अचानक ही हो गयी,मगर उन विपरीत परिस्थितियों में भी बचे डाक्टरों ने वहां से वापस आने बजाय अब वहीं रहकर काम करने का फैसला किया है,यही उनके अनुसार मृतक डाक्टर को उनकी भावभीनी श्रद्दांजलि होगी !! यह पढ़ते ही आँखें नम हों आयीं,और मन-ही-मन में उनको सैल्यूट को हाथ जैसे माथे पर जा लगे !!
आज,जबकि हर ओर पैसे के लिए मारा-मारी,हर ओर प्रतिस्पर्धा के पीछे भागा-भागी,तथा जीवन जीने के तमाम साधनों को पाने के लिए हर प्रकार की लम्पटता को,हर प्रकार के स्वार्थ को अपनाना एक अनिवार्य घटना मान लिया गया है,वहां ऐसे लोगों के इस स्तुत्य जज्बे को सलाम ही किया जा सकता है!!हमारे आस-पास तो घटनाएं बहुत घटती रहती हैं,लेकिन लगभग सारी ही घटनाएं सिर्फ़ व् सिर्फ़ अपने बेतरह एवं अनंत स्वार्थ से अभिप्रेत होती हैं,या स्वजनों की सहायता हेतु किए गए कार्य-मात्र होते
हैं ,यहाँ तक की लोग तो अपने रिश्तेदारो को सहयोग करते हुए भी उनपर अपने अहसान का इतना ज्यादा लाड देते हैं की बेचारे रिश्तेदार उस अहसान के बोझ टेल घुट कर मर जाएँ !!और यह सबको मान्य भी है !!इसे बिना स्वार्थ के किया जाने वाला किसी का कोई भी कार्य मानो एक ईश्वरीय घटना ही प्रतीत होता है !!
शायद देश के सुपुत्र इन्ही लोगों को कहा जाता है,यही वो प्रेरणाएं हैं,जिनसे मानव की सेवा की सीख ली जा सकती है,अगरचे कोई सीख लेने को हम तैयार हों !!क्या हमारी युवा पीढी की आंखों में अपने देश के लिए भी कुछ सपने बचे हुए है??यदि रत्ती भर भी इसका जवाब हाँ में है,तो यह भी सच है की भारत के भविष्य की तस्वीर कुछ बेहतर है,वरना कुछ गिने-चुने लोगों ने तो इसे बेच ही डाला है !!

नई दुनिया के नॉएडा कार्यालय में काम शुरू

नई दुनिया नॉएडा कार्यालय में काम काज मंगलवार से शुरू हो गया है, अखबार जल्द ही मार्केट में आने वाला है,, हाल ही में हुए फेरबदल के तहत देनिक हिन्दुस्तान के रिपोर्टर बिशन पपोला ने नई दुनिया ज्वायन कर लिया है, राजकुमार चौधरी व संजीव रघुवंशी भी अपनी सेवाए नई दुनिया को देगे, टीम के अन्य सदस्यों में ओमदेव, ओमपाल, सत्यबीर नागर, राहुल कुमार, प्रेरणा शर्मा विक्रम शर्मा है , टीम लीडर चेतन आनंद है,

जख्म गहरा है


--- चुटकी ---
नवजोत सिद्धू जरुरत से
कुछ ज्यादा ही हँसता है,
अन्दर का जख्म
बहुत गहरा लगता है।
---गोविन्द गोयल श्रीगंगानगर

अब बस करो


भारत के वाइस प्रेजिडेंट रहे और जाने माने राजनेता श्री भैरों सिंह शेखावत का अपना एक वजूद है। शायद ही कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी होगी जिसमे श्री शेखावत को चाहने वाले न हों। ऐसा इसलिए कि वे रिश्तों को निभाने में माहिर हैं। श्रीगंगानगर से उन्होंने १९९३ का विधानसभा चुनाव लड़ा था। वे वह चुनाव बुरी तरह हारे। वे किसी भी पद पर रहे,जिसको अपना कहा उसके साथ हर समय खड़े नजर आए। अब उनके राजनीति में एक्टिव होने की चर्चा पर बहस छिडी हुई है। इस में कोई शक नही कि श्री शेखावत जैसे इन्सान निष्क्रिय होकर घर बैठने वालों में से नहीं है। मगर वाइस प्रेजिडेंट रहे किसी नेता का फ़िर से राजनीति में आना वाइस प्रेजिडेंट पद की गरिमा को तो आहत करेगा हीश्री शेखावत का मान सम्मान भी कम होगा। श्री शेखावत जी आपने वह सब कुछ पा लिया जो आपने कल्पना भी नहीं की होगी। अब क्या ऐसा रह गया जिसके लिए अपना बुढापा ख़राब करने की नोबत आ गई। सच है कि राजनीति में पद कि चाहत कभी ख़त्म नहीं होती मगर कोई लकीर तो आप जैसे सीनियर
को लगानी चाहिए। ये नहीं कहते कि आपके आराम करने के दिन है,आप जैसे घर आराम करेंगें तो तो देश को सही दिशा कौन देगा। किंतु अब आप राजनीति में कुछ पद पाने की बजाये उसको साफ सुथरा करने का अभियान चलायें। कुछ ऐसा करें जिस से नेताओं के प्रति जन जन का खोया विश्वास फ़िर लौटने लगे। आप इस बात को जानते है कि नेताओं के प्रति आवाम की भावना कैसी है। आप शक्तिशाली है,आपका नेटवर्क है,जन जन आप पर विश्वास करता है,आपके लिए अब हर पद छोटा है आप का कद बहुत ऊँचा है उसको किसी पद में बाँध कर उसको दायरे में मत रखना। अभी तो आपने अपनी जुबान से कुछ कहा ही नहीं कि अफसाने शुरू हो गए। आपके आने से किसको कितना नफा नुकसान होगा ये तो समय बताएगा किंतु ये तय है कि इस से भैरों सिंह शेखावत की वो बात नहीं रहेगी जो अब तक है। साहब जी जिंदगी में पाना ही सब कुछ नहीं होता,त्याग का भी अपना महत्व है । ऐसा नहीं हैं कि आप इन बातों को नहीं जानते,आप जानी जान हैं। हमसे अधिक अनुभव और ज्ञान आपके पास है। अगर आप ने राजनीति में आना है तो हमारे कहने से रुकने वाले नही और नहीं आना तो किसी के कहने से आने वाले नहीं। आप को आप से ज्यादा और कौन जानता है। [फाइल फोटो]

चार दिन की ज़िंदगी क्या क्या करें

ऐसा करें,वैसा करें,कैसा करें,
चार दिन की ज़िंदगी क्या क्या करें।
बचपने में खेल जो हम कर चुके,
कोई बतलाये नया अब क्या करें।
मन्दिर चलें,मस्जिद चलें या मैकदा,
आप का न साथ हो तो क्या चलें।
पूछिए मत बेखुदी में क्या किया,
होश में हैं अब बता क्या क्या करें।
मकबूल से तन्हाई में उसने कहा,
इन हसीं लम्हों में बोलो क्या करें।
maqbool

एक आतंक किसानो पर उसे भी महसूस करे

किसान के साथ मजाक
हमारी सरकार किसानो के विश्वास को तोड़ने का ही काम करती है । हमेशा व्यापारियो की सुनने वाली ,उनको फायदा करने वाली सरकार ही आती है वह भी किसानो के वोट लेकर । सत्ता किसी भी पार्टी की हो किसान की आवाज़ कोई नहीं सुनता । एक समाचार जो उस समय आता है ,जब किसानो की फसल खेतो में तैयार होती है । कि अनाज पे से निर्यात कि रोक हटी । और वह रोक लगती कब है मालूम जब किसान कि फसल बाज़ार में आती है । इसके पीछे का गडित या कहे तिल्लिस्म क्या है उसे समझे -किसानो के फसल जब खेतो में होती है उसी समय ब्यापरियो के गोदाम पुराने अनाज से भरे होते है जो उन्होंने किसानो से सस्ते दामो पर ख़रीदे होते है उनेह बेचने के लिए निर्यात खुलना जरोरी होता है ,सरकार परमिसन देकर उनेह फायदा देकर खुद उपकृत होती है ।
और जब किसानो की फसल बाज़ार पहुचती है तब निर्यात पर रोक लग जाती है इससे अनाज की कीमत गिर जाती है और वोही ब्यापारी फिर से सस्ते दामो पर अनाज खरीद कर अपने गोदामों में भर लेता है ।
और किसान हमेशा की तरह ठगा जाता है । उसके साथ फिर मजाक होती है यही उसकी नियति है । ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह आज की आई .टी .सी या कारगिल और न जाने कितनी विदेशी कम्पनिया देश की अर्थव्यवस्था को तो आज भी गुलाम बनाये हुए है ।

"सेल !!" (लघुकथा)

"ऐ आशा,चल न,चिंकारा मॉल में सेल लगी हुई है,सभी चीजों पर फिफ्टी परसेंट की छूट है !"लता ने अपनी सहेली से कहा ।
"हाँ-हाँ,मैं भी यही सोच रही थी,अभी मैं तुझे फोन करने ही वाली थी,अच्छा हुआ कि तू ख़ुद ही आ गई ,अरे ये एन नाइंटी फाइव कब लिया तूने ?ये तो थ्री जी है ना ?कितना क्यूट है ?कितने का पड़ा ?"
"कितने का तो पता नहीं,कल ये बॉम्बे से आयें है वही लाये है,अपने लिए भी उन्होंने एप्पल ख़रीदा है,वो तो इससे भी ज्यादा स्मार्ट है,अच्छा-अच्छा चल ना देर हो रही है,फिर बच्चों के स्कूल से वापस आने का समय हो जायेगा,चल जल्दी कर !"
" हाँ-हाँ,चल न मैं तो तैयार ही बैठी हूँ,गाड़ी लायी है ना कि मैं अपनी निकालूं ?"
"लायी हूँ ना,तू क्यूँ चिंता करती है मेरी जान,गाड़ी भी है और मनी से भरा ये बैग भी !"
"बाप-रे-बाप !अरे,सारा का सारा मॉल ही खरीदे कि क्या ?"
"नहीं रे,कई दिन से मार्केटिंग में निकली नहीं हूँ ना,बोर हो गई थी,आज निकल रही हूँ,न जाने क्या-क्या पसंद आ जाए !!"
"लेकिन ये तो बता कि हम लोग आख़िर खरीदेंगे क्या? हमारी आलमारियाँ तो पहले ही सौओं कपडों और पचासों जूतियों से भरी पड़ी हैं "हँसते हुए आशा बोली ।
"तो पहले आलमारी खरीद लेते हैं यार!टेंशन काई कू लेने का !!"लता ने ठहाका लगाया ।
अगले कुछ मिनटों में दोनों मुंहलगी सखियाँ चिंकारा मॉल के भीतर थीं.फूल ऐ.सी.मॉल में जैसे लोग भेड़-बकरियों की तरह चले आ रहे थे,ये सारे वे लोग थे जिनको वास्तव में किसी भी चीज़ की जरुरत ही नहीं थी,वस्तुतः खाने-पीने की चीजों के सिवा अगर वे दस साल भी कोई अन्य चीज़ न खरीदते तो उनका कोई काम हर्ज़ ना होता,मगर सेल थी कि लगी हुई थी और विज्ञापन ऐसे कि सारी चीजें गोया फ्री ही मिल रही हों !!
लोग यों टूट पड़ रहे थे कि आज ही सब-कुछ न खरीद लिया तो कल प्रलय आ जायेगी और अपने मन की इच्छा पूरी किए बगैर वे अल्लाह को प्यारे हो जायेंगे !! मॉल के तमाम कैश-काउंटरों पर ऐसी ही मतवाली व बावली भीड़ एक-दूसरे के ऊपर समाये जा रही थी !!
दोनों सखियाँ जब दो घंटे बाद खरीदारी करके बाहर निकलीं,तो उनके माथे पर इस जद्दोजहद से उपजा पसीना बह रहा था,वे बेहाल थीं और लोगों को कोस रही थीं !मॉल की सीढियों से नीचे उतरते ही एक कातर व मुलायम आवाज़ ने उन्हें टोका ,
"एक रूपया दे ना माईजी !!"
इस वक्त असल में वो अब घर जाने या किसी रेस्टोरेंट में जाने के सिवा कुछ सोचना भी नहीं चाहती थीं मगर वह आवाज़ इतनी भींगी हुई थी कि उनके कान ना चाहते हुए भी उस आवाज़ की और मुड गए ।
यह एक छोटी-सी बच्ची थी,जो अपनी गोद में एक मरियल-से बच्चे को चिमटाये हुए थी ।
"मेरे तो हाथ खाली नहीं हैं,ऐ लता तू अपने पास से इसे कुछ दे-दे ना !"
लता ने अपने पर्स में हाथ डाला ,उसमें उसे पाँच और दो के सिक्के हाथ लगे ,एक का एक भी सिक्का न था ,लड़की बड़ी आशा से उन्हे ताक़ रही थी ।
"छुट्टे नहीं हैं,बाद में ले लेना !!"और दोनों सखियाँ गाड़ी में बैठ गयीं,गाड़ी ने तुंरत रफ़्तार पकड़ ली,धूल उडाती जा रही उस चमकती व महँगी गाड़ी को वह चोटी-सी बच्ची अवाक-सी देखे जा रही थी ,शायद सोच रही थी कि यह "बाद "कब आएगा !!

क्या यह सब एक मज़ाक है ??

एक था देश,बड़ा ही विभिन्नताओं वाला और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला !!इस देश की लोक - तांत्रिकता इतनी बहुमुखी और उदार थी कि यहाँ कोई भी कुछ भी करता रहता था,किसी पर भी कोई बंदिश या पाबंदी वगैरह बिल्कुल नहीं थीं और थोडी- बहुत अगर थी भी तो वह सिर्फ़ गरीब और मजलूमों के लिए ही थीं !! देश की इस उदारता का लाभ देश के तमाम लोग तमाम वक्त उठाया करते थे,हर जगह गन्दगी करने,मल-मूत्र निकास करने वगैरह के लिए तो खैर देश में कोई कमी ही न थी,मगर हद तो यहाँ तक थी कि यह देश तमाम तरह के आतंकवादिओं और देशद्रोहियों की भी पनाहगाह था ,अचरज की बात तो यही थी कि इस देश की तमाम जेलों में तो आधे से ज्यादा लोग तो निर्दोष ही कैद रहते थे, मगर दुर्दांत से दुर्दांत अपराधी,हत्यारे,लूटेरे, व्यभिचारी,आतंकवादी और देशद्रोही छुट्टे सांड की तरह खुलेआम अपने "लिंग"(ताकत)का प्रदर्शन करते घुमते रहते थे !!तथा बड़े आराम से वे रंगधारी वसूलते,डकैती करते, गोली-चाकू या कुछ भी चलाते,माँ-बहनों की इज्ज़त लूटते,जमीन हड़पते,किडनैप करते या कुछ भी ऐसा करते , जिससे लोगों की जिंदगी हराम होती थी,कर के किसी नेता या किसी सफेदपोश की पनाह में चूहों की तरह छिप जाते थे !!...मज़ा यह कि सारी राज्य-सरकारें और केन्द्र-सरकार उनकी पनाहगाह और पनाह्गारों का पता जानती थी,मगर भूले से भी उनके गिरेबान हाँथ नहीं डालती थीं,किसी ऊपर की गाज गिरने की संभावना तथा अपने भविष्य के मटियामेट होने से डरती थीं !!बेशक इस डर से देश ही क्यूँ न मटियामेट हो जा रहा हो!!और वह देश सचमुच वहां के आम लोगों की कब्रगाह होता जा रहा था !!क्योंकि उस देश का कानून भी इतना पेचीदा था कि एक साफ़ तौर पर मुकम्मल अपराधी और देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक व्यक्ति को भी सज़ा होते- होते वर्षों-वरस लग जाते थे !!तुर्रा यह कि अधिकाँश लोग तो बा-इज्ज़त !!ही बरी हो जाते थे,बहुत कम मामलों
दोषियों को सज़ा मिल पाती थी !!सो कानून की जटिलता और राजनीतिकों के द्वारा अपराधियों को संरक्षण देने के कारण समयांतर में ऐसे लोगों का मनोबल इतना ज्यादा बढ़ गया कि जिन आतंकवादियों को किसी पश्चिमी देश में मच्छर की तरह मसल दिया जाता,वे टुच्चे लोग यहाँ ई-मेल करके देश को बताते कि आज अमुक शहर में इतने स्थानों पर बम का धमाका कर पूरे शहर को दहला दिया जाएगा !!और सचमुच अगले कुछ ही मिनटों
सारा शहर थर्रा देने वाली चीखों और रोंगटे खड़े कर देने वाले बम-धमाकों से सुबक उठता !!बेशक वहां खुफिया एजेंसी और देश की सुरक्षा के लिए काम करने वाली कई संस्थाएं मौजूद हों ....मुस्तैद अलबत्ता नहीं थीं!!आए दिन शहर-दर-शहर एक- के-बाद-एक धमाकों से पूरा शहर हिल जाता.....और पूरा तंत्र यकायक जाग उठता ....अच्छा जी !हाँ जी !नहीं जी !ठीक है जी !अबके नहीं होगा जी !हम इस सबका जवाब देने को तैयार हैं जी ! ये देश शत्रु हैं जी !बस चार दिनों में इनसे निबट लेंगे जी !ये कायरतापूर्ण कृत्य है जी !!....और अगले चार दिनों में कोई कारवाई होती-ना-होती....तमाम महकमे फिर खर्राटे भरते दिखाई देते.....!!और चार हफ्ते बीतते-न- बीतते फिर वैसे ही धमाकों से सब चौंक पड़ते !!हालत तो यहाँ तक थी कि देश की राजधानी भी इन सबसे महफूज़ न थीं ,बल्कि वह बार-बार इसका निशाना बनती थी ! ऐसा लगता था कि आम आदमी से ज्यादा वहां आतंकवादी ही सुरक्षित थे,क्योकि देश संसद तक को वे नहीं छोड़ते थे !!उस नामालूम से नाम वाले देश की राजधानी का नाम बिल्ली या ऐसा ही कुछ था !!मगर बिल्ली बेचारी बचती तो बचती कैसे ??क्योकि उसे कुत्ते नोच-नोच कर खा रहे थे !और उस देश के तो कुत्ते,कहते हैं,हड्डी भी नहीं छोड़ते थे !!

22.9.08

झारखंड की जनता के नाम !!

आ ना कुछ करके दिखाते हैं !!

आ चल तुझे इक खेल खिलाते हैं,चल ज़रा चाँद को ही छु आते हैं !!
आ ना खुशियाँ बटोर कर लाते हैं,कुछ देर जरा बच्चों को खिलाते हैं !!
हर रोज़ अच्छाई की कसम खाते हैं,रोज़ कसम तोड़कर सो जाते हैं!!
खुदा को तो जरा भी नहीं जानते हैं,और मस्जिद में नमाज़ पढ़ आते हैं !!
असल में कुछ दिखाई तो देता नहीं,लोग सपनों की महफ़िल सजाते हैं!!
ख़ुद तो खुदा से किनाराकशी करते हैं,बच्चों को उसकी कसम खिलाते हैं!!
इक दिन मुझे उदास देख बेटी बोली,पापा चलो ना पार्क घूम आते हैं!!
जिनके भीतर कुछ नहीं होता वे अक्सर,अपने कपड़े...जूते दिखाते हैं!!
बाहर तो चलाते हैं वो गोलियाँ और,घर में खुदा की फोटुयें सजाते हैं !!
बहुत ज्यादा छोटी रखी हुई है हमने,आओ प्यार की चादर और फैलाते हैं !!
इबादत थोडी ना करते हैं हम "गाफिल",वो तो बस अपना दिल बहलाते हैं !!

"गाफिल"जाने भी दो ना !!

दुनिया बदल रही है,इसे देखने दो ना ,क्या अच्छा है बुरा क्या समझने दो ना !!
रात को आराम से गुजर जाने भी दो,समय से पहले तो रौशनी को पकडो ना !!
खुदा के पास पहुँचने के हैं रस्ते कई ,सबको अपने ही रास्ते पे चलने दो ना !!
तलवारें चलाने से भला खुदा मिला है?हर किसी को उसकी खुदाई बख्शो ना !!
जिसके नाम पे हो जाते हो लामबंद ,कभी उसकी रज़ा को भी तो समझो ना !!
खिंच जाती हैं बात-बात पर तलवारें,अब इतना भी किसी बात को पकडो ना !!
अल्ला को तो खुला-खुला ही रहने दो,अपनी आदतों में तुम उसे तो जकडो ना!!
तेरे होने के भरम में जीता हूँ यारब ,कहाँ हो कभी घर आकर तो मिलो ना !!
तेरे नाम पे ठा-ठा करता है आदम ,यार इसके दिमाग को बदल डालो ना !!

ये जो हो रहा है !!

जो हो रहा है उसे समझ,ख़ुद को समझाने दे ,
चुप मत बैठ आदम ,दिल को तिलमिलाने दे!!
अपने या घर-दूकान के भीतर घुसा मत रहा,
बाहर निकल,ताज़ी हवा को भी पास आने दे!!
कोई भी किसी को जीने क्यूँ नहीं दे रहा ,
ख़ुद को कभी उनसे ये बात कर के आने दे !!
तेरे कूच करने से ही बदल पाएगी ये फिजां ,
तू अपनी मुहब्बत से जरा इसे बदलवाने दे !!
जन्नत एक तिलिस्म नहीं है मेरे भाई,सच,
मेरे साथ चल,प्रेम के गली में हो के आने दे !!
तू अपनी सोच में अच्छा हो के बैठा मत रह,
तू अपने अच्छे कर्मों को यां खिलखिलाने दे !!
तेरे रहते ही कुछ अच्छा हो,तो हो जाए"गाफिल",
वरना इस बेमुरौवत जिंदगी का क्या,जाने दे !!
इत्ती-सी बात को दिल में लिए बैठे हो,
अब छोड़ो भी "गाफिल"जाने दो ना !!

कोई भूत-वूत सामान खरीदता था भैया ??

बडिए कमा लिए हो भइया!! कहाँ से कमाए हो भइया??
जनता से ना ...!! तनी सुन जनतवा को लौटा भी दो भइया!!
जनतवा से तनी-तनी सुन करके ना लिए हो भइया ??
तनिये-तनी लौटाने को कह रहे हैं हम तुमको भइया !!
का कहा ..?अपनी मेहनत से ई सब कमाए हो भइया !!
तो इतना घमंड कौन बात का कर रहे हो भैया !!
एतना गुस्सा कऊन बात का करते हो बड़के भैया ??
पईसा तो नहीं रहने का, इतना भी मत पादों भइया !!
तुम अपना सामान किसको बेचे थे,जनता को भइया!!
कि कोई भूत-वूत सामान खरीदता था भैया ??
जिन्दा लोगन ही तुम्हारा सामानवा लेता था भइया !!
जिंदा लोग ही मिलकर तुमको सेठ बनाया है भइया !!
बहुत जरुरी है अब तुमरा सहयोग हे बाबू भइया !!
जिंदा लोगों के अब तुम करो कुछ ओ प्यारे भैया !!
धरती रो रही है तुमको पुकार-पुकार कर ओ भइया !!
उसके बच्चों की कुछ मदद करो ऐ समर्थवान भइया !!
देखो कितना चीत्कार है ई धरती पर ओ भोले भइया !!
तुम्हारे ही पौरूष को ललकार है ये क्षत्रिय भइया !!
तुमको कसम इस माटी की ,जिसका तुमने खाया !!
यूँ मर गए तो माटी कहेगी,हाय नपुंसक !दैया-रे दैया!!

इस देश का नेता शातिर है.......

एक गीत देश में होने वाली हर शादी में बजता दीखता है "ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का....." क्यों बजता है इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। बहुत साल पहले इसी गीत की तर्ज़ पर देश के नेताओं पर एक गीत लिखा था, अज के हालातों ने फ़िर पुरानी डायरी पलट कर वही गीत आप लोगों के सामने रखने को मजबूर किया. आइये आप लोग भी "ये देश है वीर जवानों का..." की धुन के साथ नेताओं के गीत का आनंद उठायें.

ये देश है दंगा, फसादों का,
घोटालों का, बेईमानों का,
इस देश का नेता.....ओये...
इस देश का नेता शातिर है,
बस जीता अपनी खातिर है।
ओ॥ओ...ओ॥ओ॥ओ....

कहीं शोर मचा है मन्दिर का,
कहीं गूँज उठी है मस्जिद की,
कहीं तड-तड गोली....
कहीं तड-तड गोली चलतीं हैं,
बस खून की नदियाँ बहतीं हैं।

कुर्सी ही इनका सपना है,
अरे देश कौन सा अपना है,
चाहे देश हमारा..... ओये
चाहे देश हमारा मिट जाए,
पर कुर्सी इनको मिल जाए।
ओ...ओ...ओ...ओ...ओ....

ये देश है दंगा फसादों का,
घोटालों का...........

(बुरा न लगे किसी को और गाओ ये देश था वीर जवानों का.......ये देश है वीर जवानों का........ये देश रहेगा वीर जवानों का......)

वेश्यागमन करोगे !!??

आज तक समझ ही नहीं पाया कि अलग-अलग व्यक्तियों के साथ सोने वाली स्त्रियाँ वेश्या होती है या अलग-अलग
स्त्रियों के साथ सोने वाला पुरूष वेश्या !! वेश्या के बारे में बहुत कुछ कहा जाता रहा है,कहा जाता रहेगा.... लेकिन कोई स्त्री वेश्या क्यूँ है?उसका उत्स क्या है?वह वेश्या क्यूँ है?क्या अब वो इस जीवन से निजात पाना चाहती है? उसने जीवन में क्या चाहा था?क्या माँगा था?दरअसल क्या वह इस धंधे को धंधा समझती है?धंधे का के उसूल अपने से पृथक चीजों को बेचना होता है?अपनी ही देह का मजबूरी में पैसे कमाने के लिए इस्तेमाल करना क्या सचमुच एक स्वस्थ व्यापार कहा जा सकता है??अगर सचमुच ऐसा है तो एक अच्छी से अच्छी वेश्या की, एक
टुच्चे से टुच्चे व्यापारी कि तुलना में क्या साख,मान-सम्मान,हैसियत या रूतबा होता है??एक वेश्या,जिसका इस्तेमाल हम अपने अनिर्वर्चनीय आनंद के लिए करते हैं,उसको हकीकत में हम क्या इज्जत देते हैं??यदि नहीं तो क्यों हमने स्त्री जाति के एक विशाल वर्ग को इतना स्तरहीन,इतना मलीन,इतना व्यक्तित्व-विहीन बनाया हुआ है ??क्या सिर्फ़ अपनी विष्ठा-वीर्य उसमें त्यागने के लिए ??वेश्या को बनाए रखने में किसका हाथ है ??यदि हम सच ही में स्त्री को इज्जत देते हैं,या वाकई हमारे भीतर उसके लिए पवित्र भावनाएं हैं!!तो क्या हमें इनके उन्मूलन के प्रयास नहीं करने चाहिए??यदि हम ऐसा कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं तो जमाने से यह क्या चीखना-चिल्लाना करते रहते हैं??हम सामर्थ्यहीन लोग झूठ-मूठ ही राग अलापते रहते हैं और विभ्भिन्न प्रकार की पोथियों के पन्ने काले करते रहते हैं??...................स्त्री को जब भोगना ही है,तो बदनामी का भी मज़ा लो ...!! यों चोरी-छुपे भोगकर इज्जतदार होने का भी ढोंग क्यों ??...यानी कि अन्दर भी बल्ले-बल्ले .... बाहर भी बल्ले-बल्ले !!वाह रे आदमी !!इसे ही तो कहते हैं चित भी मेरी ...पट भी मेरी !!!!

.....सब वादे हैं....वादों का क्या!!

......रिश्ते जिन्दगी को धीमा कर देते हैं!!रिश्ते मतलब,एक -दूसरे की फिक्र!!रिश्ते मतलब,एक-दूसरे को प्यार!!रिश्ते मतलब,रोज-रोज की तकरार-मनुहार!!रिश्ते मतलब,एक-दूसरे को अपना वक्त देना......कुल-मिलाकर वक्त खोटा करना !!और वक्त!!वो तो हम सब के पास बेहद कम है,देखो ना भागा ही जा रहा है!!नामुराद साला!!ठहरता ही नहीं!!जिन्दगी में कित्ते तो काम हैं!!ये करना है,वो करना है!!इससे आगे बढ़ना है,उससे आगे जाना है!!मकान बनाना है,बच्चों की शादी,ऊँचा रहन-सहन,मोबाइल,गाड़ी,कपड़े,टी.वी, फ्रीज,कंप्यूटर,डी.वी.डी.प्लेयर,तरह-तरह के अन्य साजो-सामान....ना जाने कितना और कुछ.....!!जिन्दगी की इन सच्चाईयों के बीच रिश्तों की भला बिसात ही क्या ?? प्लीज रिश्तों की कोई बात ना कीजिये !!रिश्ते दरअसल अन्धकार हैं, आज के दौर की ये चकाचौंध हमारी रौशनी!!हमें अपने समय से बहुत आगे जाना है,हममे से हर एक को,हर एक से आगे जाना है,कहाँ .... पता नहीं !!!! बूढे माँ-बाप... इन्होने तो अपना फ़र्ज़ पूरा किया,किसी पर अहसान थोड़ा ही ना किया!! रिश्ते !!हा-हा-हा-हा!! रिश्ते दर्द हैं!!रिश्ते दुख हैं!!रिश्तों से भला कैसी रिश्तेदारी?? रिश्तों से कोई ना निभाओ यारी !! रिश्ते धुंध हैं !!धुंध के पार जाना है!!अब शायद कोई अपनी माँ से पैदा ना होगा!!अब शायद किसी का कोई बाप ना होगा !! सच !!!!

आज इस दल में है, कल किसी और में,



नेताओं से....................
by ..Prof.C.B.Shrivastava
C/6 , MPSEB Colony , Rampur ,JABALPUR (MP
mob. 09229118812)
देश सेवा परम उच्च आदर्श है
लोगों ने जानें तक दी हैं इसके लिये।
सोचिये आज क्या कर रहे आप हैं
यह उठापटक है सारी किसके लिये ?
देश सेवा में मन है तो उसके लिये
किसी कुर्सी या पद की जरूरत नहीं।
सैकड़ों काम दुनियॉं में सेवा के हैं
जो करें कुछ तो जीवन में फुरसत नहीं ।।
सिर्फ संकल्प के सिवा कुछ भी नहीं
सेवा करने को केवल लगन चाहिये।
अपने मन से भला पूछिये तो जरा
हैं ये कसरत-कवायत भला किसलिये ? ।।1।।
आज इस दल में है, कल किसी और में,
फिर किसी और में फिर किसी और में।
शांति मन की गंवा यों भटक क्यों रहे
भला हासिल क्या यों मन की झकझोर में ।।
है दलों में विचारों की जो भिन्नता
तो चुनावों में कुर्सी का कठजोड़ क्यो ?
देष भी है वहीं और जनता वहीं
लक्ष्य सेवा है तो दलबदल किसलिये ? ।।2।।
व्रत है सेवा का जो, धन का क्यों मोह तो,
क्यों ये सारे हवाले-घोटाले हुये ?
खेले जाते हैं क्यों, कुर्सी के वास्ते
पर्दे के पीछे आवागमन के जुये ?
मोह से जागिये, स्वार्थ को त्यागिये
खुदको भी धोखा देना मुनासिब नहीं
जीतना सारी जनता का मन है उचित
अपनी छबि साफ सुथरी रखें इसलिए ।।3।।

प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव `विदग्ध´

शोक के बहाने

--- चुटकी ----
मंत्री का मर गया कुत्ता
सूरत दिखाने के बहाने
शोक मनाने आए हजारों लोग,
एक दिन मंत्री जी चल बसे
अब कौन मनाये शोक?
----गोविन्द गोयल

आलोचना में टेलीविजन की महारानी

एकता कपूर ऐसी क्यों हैं?

  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
    टेलीविजन की दुनिया पर एकता कपूर एकछत्र राज करती हैं। कम उम्र में अप्रत्याशित सफलता व्यक्तित्व पर खासा असर करती है। एकता पर भी आरोप लगते रहे हैं कि वे कामयाबी के मद में इतनी चूर हैं कि स्वयं को टेलीविजन संसार की 'स्वयम्भू महारानी' मानती हैं। एकता की कार्यशैली और बर्ताव फिल्म उद्योग में चर्चा का विषय बना रहता है। संभवतः यह ईर्ष्यावश ही प्रचारित किया गया होगा कि 2004 में रिलीज हुई फिल्म 'गर्लफ्रेंड' उनके ही चरित्र पर रची गई। यह दुष्प्रचार भी हो सकता है और सच भी।
    दरअसल, फिल्मी दुनिया ही कुछ ऐसी है कि यहां हर बात गासिप-सी नजर आती है। सच भी झूठ जान पड़ता है और झूठ सौ टका सच। 22 सितंबर08 को 'दैनिक भास्कर' के भोपाल संस्करण में 'आपस की बात' कालम के अंतर्गत वीना नागपाल एकता कपूर की बॉडी लैंग्वेज को आड़े हाथों लेती हैं। संदर्भ बिग बॉस के घर से जुड़ा हुआ है। एकता अपने भाई तुषार के साथ इस शो में गेस्ट बनकर आई हुई थीं। उनके मुंह में च्युंगम था, सो शिल्पा शेट्टी के हर सवाल के जवाब में उनका मुंह काफी हरकत-सा करता नजर आता। साथ ही वे बात-बात पर तुषार के कंधे या पैर पर हाथ भी पटक रही थीं। एकता का च्युंगम चबाना और बॉडी लैंग्वेज लेखिका वीनाजी को भारतीय नारी के चरित्र के अनुकूल नजर नहीं आई।एकता कपूर के 'सास बनाम बहू' सीरियलों को लेकर भी नुक्ता-चीना होती रही है। तथाकथित समाजसेवियों का तर्क है कि एकता के सीरियलों ने भारतीय नारी की छवि धूमिल कर दी है। उनके सीरियल घरेलू झगड़ों की वजह भी बने हुए हैं, गोया एकता कपूर मनोरंजन के नाम पर मन-दर-मन रंज के बीज बो रही हों? यह दीगर बात है कि ऐसे समाजसेवियों का दर्द सिर्फ इतना है कि पुरुष प्रधान समाज में उनका वर्चस्व डोलने लगा है। नारियां एकता के सीरियल देखकर मुखर/उग्र हो रही हैं। एकता कपूर के सीरियलों में काम करने वाले तमाम कलाकार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वे एकता की कार्यशैली से भी पीड़ित हैं, लेकिन सैकड़ों संषर्घरत कलाकार ऐसे भी हैं, जो एकता कपूर का गुणगान करते थकते नहीं हैं। एकता का स्वरूप क्या है? इसे समझ पाना शायद तब तक संभव नहीं है, जब तक 'बालाजी टेलीफिल्म' अस्तित्व में है।
    दरअसल, महिमा-मंडन और छीछालेदरी का यह सारा खेल 'बालाजी टेलीफिल्म' के गठन के बाद ही शुरू हुआ है। संभव है कि टेलीविजन के मनोरंजन उद्योग पर बालाजी के वर्चस्व ने एकता में गुरुर पैदा कर दिया हो...और यह भी हो सकता है कि कई लोग उनकी यह अभूतपूर्व सफलता पचा न पा रहे हों? कारण दोनों हो सकते हैं। एकता के चाल-चरित्र को लेकर अब फिल्में भी रची जाने लगी हैं। गणेश आचार्य की 'मनी है तो हनी है' में एकता के 'मर्दाना रवैये ' पर खूब कटाक्ष किया। गोया बालाजी टेलीफिल्म में काम करने वाले कलाकार बंधुआ मजदूर-सरीखे हों। यह हैरानी वाली बात भी हो सकती है कि पिछले कई सालों से एकता फिल्म उद्योग, खासकर टेलीविजन, तथाकथित समाजसेवियों और मीडिया के निशाने पर रही हैं, लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ। उनके होंठों पर सदैव मुस्कान अठखेलियां करती रहती है, मानों वे चिकने घड़े का प्रतीक हों।...लेकिन अब अचरज तो यह होता है कि बालाजी प्रोडक्शन की फिल्मों में भी एकता के ऐसे रंग-ढंग को मनोरंजन में ढाला जाने लगा है। हालिया रिलीज फिल्म 'सी कंपनी' इसका ताजातरीन उदाहरण है। यह भी संभव है कि एकता अपनी लोकप्रियता को भुनाने के लिए ऐसा कर रही हों, या वे यह बताना चाहती हों कि उन पर कीचड़ उछालने वाले कोई दूध से धुले नहीं हैं। वहीं ऐसा भी आभास होता है कि एकता यह जताने का प्रयास कर रही हैं कि यह लड़की हर संकट में मुस्कराती रहेगी, जैसा फिल्म के एक दृश्य में होता है। अंडरवर्ल्ड डान यानी मिथुन चक्रवर्ती एकता को कड़ी फटकार लगाते रहते हैं, लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं होती और मुस्कराती रहती हैं।
    दरअसल, कोई भी इंसान यह दावा और प्रमाण पेश नहीं कर सकता कि वह दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। चूक सबसे होती है, लेकिन जो उनसे सबक हासिल कर लेता है, वह श्रेष्ठ मानवों की श्रेणी में शुमार हो जाता है। एकता कपूर ने भी बहुत गलतियां की होंगी, लेकिन क्या इस बात को नकारा जा सकता है कि बालाजी टेलीफिल्म ने नवोदित कलाकारों के संघर्ष को कम किया है। आज बालाजी से हजारों कलाकार, तकनीशियन और अन्य विधाओं के माहिर लोग जुड़े हुए हैं। बालाजी उनके रोजी-रोटी का जरिया बना हुआ है। बालाजी टेलीफिल्म से जुडे मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि वहां काम करके यूं लगता है मानों वे कलाकार नहीं, दिहाड़ी मजदूर हों। लेकिन वे इस बात को भी स्वीकारते हैं कि अगर बालाजी टेलीफिल्म न होता, तो न जाने कितने कलाकार संघर्ष करते-करते बुढा जाते।
    यह विडंबना ही है कि बहुसंख्यक लोग अपनी आलोचना स्वीकार नहीं कर पाते, लेकिन एकता ने अपने असंयमित व्यवहार पर तमाम हो-हल्ला के बावजूद खुद को संयमित रखा। 'सी कंपनी' में एक विदूषक की भूमिका निभाते हुए उन्होंने खुद का उपहास बनाया, ऐसा साहस बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। शायद एकता ने यह बताने की कोशिश की है कि आलोचनाएं उन्हें कभी विचलित नहीं का पातीं, या उनके बुरे बर्ताव के लिए दूसरे लोग भी दोषी हैं...या उनके बारे में जैसा प्रचारित किया जाता है, वो सौ टका सच नहीं है! एकता का मकसद जो भी रहा हो, लेकिन उनका यह साहस सलाम के योग्य है।

सपेरे को काटा

--- चुटकी ---
ओह! आह! हाय रे!
ये क्या
हो गया पाक में,
सपेरे को ही
काट लिया
काले नाग ने ।
----- गोविन्द गोयल

भोंहें चढ़ी हुई हैं चेहरा भी लाल है.

भोंहें चढी हुई हैं चेहरा भी लाल है,
जलवों का उसके देखिये कैसा जमाल है।
अखबार जबसे देख लिया जोहराजबीं ने,
संसद की तरह हो रहा घर में धमाल है।
कश्मीर है तुम्हारा या हमारे बाप का,
पुश्तों से नही सुलझा ये ऐसा सवाल है।
रिश्वत के जुर्म में जो बर्खास्त हो गया,
रिश्वत खिला के हो गया फ़िर से बहाल है।
हासिल फतह मकबूल इन्हे हो या फ़िर उन्हें,
मुर्गे को हरइक हाल में होना हलाल है।
मकबूल.

आतंकवाद को लेकर भारतीय मुसलमान...........


आखिरकार वाही हुआ जिसका डर था ,पाकिस्तान में पहली बार ऐसा नही हुआ जब किसी नामालूम व्यक्ति ने हमला किया हों ,पाकिस्तान में ऐसा कई बार हो चुका है ,जुल्फिकार भुट्टो और बेनजीर के बाद अगला निशाना खों होगा .यह एक सवाल है ?क्या परवेज साहब को ऐसा लगने लगा है की पाक में उनका जिंदा बच पाना बहुत मुश्किल है

भारतीय पत्रकारों में भी यही चिंता है की पाक की हालत का असर भारत पर भी दिखेगा ,जौर ऐसा अब दिखने भी लगने लगा है .यह हकीकत है की बेनजीर के बार और फ़िर परवेज के बाद भारत पर हमले भी बदने लगे है ,-कुछ सवाल फ़िर हमारे सामने आज खडे हो रहे है की क्या इस्लाम का मतलब आतंकवाद है हिन्दुस्तानमें उन लोगो का अनुपात ज्यादा है -
पहली बार ऐसा लग रहा की आतंकवाद को लेकर भारतीय मुसलमान सामने आ रहे है,india gate पर पहली बार इस्लाम के सही समर्थक अब आतंकवाद के विरोध में शामने आ रहे है ,हमको चाहिए की इस बुरे वक्त में जातिवाद से कोसो दूर होकर हम इस्लाम के साथ खड़े हों ,
आशीष जैन

अनसेफ नहीं है मेरा निवेश

बाजार से बाहर जब सभी बिकने वाली
चीजें खरीदी जा रही थीं
तुम्हारा अंतिम प्रेम पत्र छिपाने को
मैंने खरीदा एक संदूक
जब बड़ी कविता बड़े शिल्प बड़े कैनवस
बड़े हादसे बड़ी खुशियां और बड़े फरेब
बदले जा रहे थे रुपयों में
एक संदूक में बदल लिए मैंने रुपए
तुम्हारे जैसा छिछोरापन
तुम्हारे जैसी लालसाएं
तुम्हारे जैसी मुस्कराहटें
झांक रही थीं अपने-अपने फ्रेम से
उन्हें में झांक कर पढ़ा मैंने
उसी बाजार में तुम्हारा प्रेम पत्र
बाजार में प्रेम पत्र भी हो रहे थे नीलाम
टालस्टाय के लेनिन के नेहरू के
एक छोटे कवि को लिखा गया प्रेम पत्र भी
नीलाम हुआ था और उसे मिले थे पूरे एक लाख
पर तुम्हारे प्रेम पत्र को पैसों में
बदलने से मैंने किया परहेज
बाजार में साधुओं ने खरीदे भक्त
आतंकियों ने खरीदी अमानुषिकता
नेताओं ने खरीदे वोटर मंत्रियों ने खरीदे सांसद
और पूंजीपतियों ने सरकार
वैसे ही लेकिन मैंने खरीदा एक संदूक
यह भी तो नहीं हो पाता कि हाट लगे
और बिकवाली न हो
बाजार में हों आप और कुछ भी न खरीद कर लौंटें
वैसे भी अपने कुछ रुपयों में मैं नहीं खरीदता संदूक
तो मां खरीदती चिमटा बहन खरीदती नेपकिन
या पापा खरीदते ऐसे ब्लेड वाला रेजर
जो उनकी खुरदरी दाढ़ी को
एक महीने तक साफ कर पाता
लेकिन मैंने खरीदा एक संदूक
छिपाए रखने के लिए तुम्हारा प्रेम पत्र
उस अकेलेपन के लिए
जब मैं नितांत अकेला होऊं और
बाजार के बाजीगर ढोल मजीरा पीट रहे हों
स्त्रियों के विमर्श से अकेलापन ऐसे
दूर रहता है आदमियों से जैसे अंधेरा उजाले से
और बाजार ऐसे दूर रहता है हर उस आदमी से
जो उनका ग्राहक न हो इसीलिए
जब खरीदी जा रही थीं सभी बिकने वाली चीजें
मैंने खरीद लिया एक संदूक

बुरे समय के लिए यह निवेश
क्या कभी बेवकूफी कहा जाएगा

तो क्या मथुरा में बाढ़ आएगी

आधे अगस्त से सितंबर की शुरूआत तक जब कोसी नदी उफान पर नहीं थी तो यमुना लबालब बह रही थी। मथुरा के दर्जनों गांवों में पानी घुस गया था। इतनी गनीमत जरूर रही कि कोई जन हानि नहीं हुई। अब जब बिहार में कोसी का कोप शांत हो रहा है तो मथुरा में मंगल वार से पहले से भी ज्यादा बाढ़ आ सकती है। जिला प्रशासन की मानें तो खतरे के निशान से दो मीटर ऊपर तक पानी बुधवार तक हो जाएगा। जनपद के मांट और महावन के करीब डेढ़ सौ गांवों में तबाही भी मच सकती है। जिला प्रशासन ने शनिवार की रात में आपात मीटिंग बुला ली तो रविवार के अवकाश में मंडलायुक्त ने यहां आकर निर्देश जारी किए।
रविवार को मांट और महावन के एसडीएम एवं पुलिस ने पचास से ज्यादा गांवों के निवासियों को तत्काल गांव खाली करने की चेतावनी दी है। सुरक्षित स्थानों पर डेढ़ दर्जन करीब कैंप बनाए गए हैं। जिला पूर्ति अधिकारी ने मिट्टी के तेल का कोटा जारी कर दिया है। दरअसल यह सारी कवायद इसलिए हो रही कि टिहरी डैम में पानी बड़ी मात्रा में बढ़ गया है और इससे ताजेवाला हैड वर्क्स पर पानी का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसे कम करने के लिए शुक्रवार की रात से पानी छोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ है और आज रविवार तक चार लाख नौ हजार क्यूसिक पानी छोड़ दिया गया है। शनिवार को सुबह आठ बजे से लेकर सायं चार बजे तक चार बार पानी का डिस्चार्ज मथुरा की ओर किया गया। यह पानी आज दिल्ली के ओखला बैराज से पास हो गया। सोमवार की सायं तक मथुरा में एक लाख क्यूसिक पानी होकर गुजरेगा। गुरुवार तक आगरा और इसके दो दिन बाद इटावा की ओर पानी बढ़ेगा, लेकिन इससे मथुरा में तबाही मचने के ज्यादा आसार हैं। एसएसपी ने रविवार को अधीनस्थों की मीटिंग लेकर सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। एक साथ चार लाख क्यूसिक से ज्यादा पानी छोड़े जाने से यमुना व नहरों की पटरियों के टूटने का खतरा भी बढ़ गया है। इससे पहले मथुरा में सन् 78 में बाढ़ आयी थी, जिससे भारी तबाही मची थी। लेकिन इस बार मथुरा में पक्के घाट बन जाने से यमुना के दूसरी ओर ही पानी घुसने का अंदेशा है।

पवन निशान्त

21.9.08

..तो क्या बाढ़ आ रही है दो दिन बाद

आधे अगस्त से सितंबर की शुरूआत तक जब कोसी नदी उफान पर नहीं थी तो यमुना लबालब बह रही थी। मथुरा के दर्जनों गांवों में पानी घुस गया था। इतनी गनीमत जरूर रही कि कोई जन हानि नहीं हुई। अब जब बिहार में कोसी का कोप शांत हो रहा है तो मथुरा में मंगल वार से पहले से भी ज्यादा बाढ़ आ सकती है। जिला प्रशासन की मानें तो खतरे के निशान से दो मीटर ऊपर तक पानी बुधवार तक हो जाएगा। जनपद के मांट और महावन के करीब डेढ़ सौ गांवों में तबाही भी मच सकती है। जिला प्रशासन ने शनिवार की रात में आपात मीटिंग बुला ली तो रविवार के अवकाश में मंडलायुक्त ने यहां आकर निर्देश जारी किए।
रविवार को मांट और महावन के एसडीएम एवं पुलिस ने पचास से ज्यादा गांवों के निवासियों को तत्काल गांव खाली करने की चेतावनी दी है। सुरक्षित स्थानों पर डेढ़ दर्जन करीब कैंप बनाए गए हैं। जिला पूर्ति अधिकारी ने मिट्टी के तेल का कोटा जारी कर दिया है। दरअसल यह सारी कवायद इसलिए हो रही कि टिहरी डैम में पानी बड़ी मात्रा में बढ़ गया है और इससे ताजेवाला हैड वर्क्स पर पानी का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसे कम करने के लिए शुक्रवार की रात से पानी छोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ है और आज रविवार तक चार लाख नौ हजार क्यूसिक पानी छोड़ दिया गया है। शनिवार को सुबह आठ बजे से लेकर सायं चार बजे तक चार बार पानी का डिस्चार्ज मथुरा की ओर किया गया। यह पानी आज दिल्ली के ओखला बैराज से पास हो गया। सोमवार की सायं तक मथुरा में एक लाख क्यूसिक पानी होकर गुजरेगा। गुरुवार तक आगरा और इसके दो दिन बाद इटावा की ओर पानी बढ़ेगा, लेकिन इससे मथुरा में तबाही मचने के ज्यादा आसार हैं। एसएसपी ने रविवार को अधीनस्थों की मीटिंग लेकर सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। एक साथ चार लाख क्यूसिक से ज्यादा पानी छोड़े जाने से यमुना व नहरों की पटरियों के टूटने का खतरा भी बढ़ गया है। इससे पहले मथुरा में सन् 78 में बाढ़ आयी थी, जिससे भारी तबाही मची थी। लेकिन इस बार मथुरा में पक्के घाट बन जाने से यमुना के दूसरी ओर ही पानी घुसने का अंदेशा है।

पवन निशान्त