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26.11.08

नेताओं के भाषण में मानव मुक्ति

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मनोज कुमार राठौर
नेताओं के भाषण मानव मुक्ति का गौण द्वार है। कर्म, धर्म, पाप, भ्रष्टाचार, बेईमानी और मोक्ष नेताओं के भाषण में समाहित रहते हैं। एक नेता जब अपने भाषण की उद्घोषणा करता है तो वह अपनी पार्टी का विश्वास जनता के प्रति जताता है। लगता है कि नेताजी ने जनता के लिए कोई भविष्यवाणी कर दी हो। नेताजी कहते है कि हमारी पार्टी यदि सत्ता में आती है तो हम इस क्षेत्र का नक्शा ही बदल देगें। सम्मानिय नेताजी यह नहीं जानते हैं कि पहले अपने विचारों के नक्शा को बदले बाद में क्षेत्र की बात करे। बेरोजगारी, गरीबी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में इन महाशय का महत्वपूर्ण योगदान है। विकास के प्रति नेताओं की भूमिका नकारात्मक हैं, भाई साहब सकारात्मता की ओर सोचते ही नहीं। नेताओं की पीढ़ी धीरे-धीरे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती जा रही हैं। आज के युग में जितने भी घोटले या गैर कानूनी काम होते हैं उनके पीछे नेताओं का हाथ जरूर रहता है। मतलब यह हुआ कि नेताओं की दम पर उनके साथी हवाई उड़ाने भरते हैं। देष के सभी नेता अपने मुंह पर भ्रष्टाचार का नाकाप लगाकर देष के वातावरण को दूषित कर रहे हैं। किसी ने सही कहा है कि सफेद पोशाक के पीछे काले शैतान का वास होता है। भारत देश के सुधारकों की अग्निपरिक्षा ली जाए तो वह भी हमाम में नगें खडे़े दिखाई देगें। नेताओं के भाषणवाद से ऐसा लगता है कि वह मानवता को मुक्ति धाम तक एक न एक दिन अवश्य पहुंचा देगें।
नेताओं के भाषण में क्या है?
यह सबको नज़र आता है।www.parkhinazar.blogspot.com

खंडहर

बहुत दिनों से विवाह समारोहों में व्यस्तता के चलते कुछ लिख नहीं सका। या यों कहें, शादियों में कारगिल सा युद्ध लड़कर ही लुत्फ उठा रहा था। विवाह समारोह भी अब सामान्य नहीं रहे। रिश्तेदारों को बुलाने से लेकर उनको खिलाने तक में बहुत कुछ बदल गया है। एक देहाती शादी में जाने का अवसर मिला जहां पर पत्तल की दावत के लिये कुछ मिनट इंतजार के बाद ही नम्बर आ गया। जिसने शादी में बुलाया था वह हर दो-तीन मिनट बाद ही आकर पूछ जाता एक पूड़ी तो और ले लो। कोई आकर कहता अरे बिल्कुल अभी-अभी कढ़ाई से निकालकर लाया हूं। खाने में व्यंजन कम और प्यार ज्यादा नजर आया। उसके ठीक दूसरे दिन शहर के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी के यहां जाने का सौभाग्य हुआ। दरवाजे पर ही मेजबान के दशर्न हुए फिर हम अंदर थे एक समुंदर की तरह लोग आते जा रहे थे। किसको क्या मिला क्या नहीं इस बात से किसी को मतलब नहीं। कौन भूखा गया यह देखने की फुर्सत किसी को नहीं। अधिकांश लोग तो दस-बारह कार्ड गाड़ी में रखकर लाये थे। हर जगह फेरी लगा-लगाकर ही पेट भर गया। लेकिन उन बेचारों का क्या जो सिर्फ एक ही शादी में पेट भरने की जुगाड़ से गये थे। खैर ये तो व्यवस्था का सवाल है। आजकल इन प्रतिष्ठित शादियों में जाने वाले ऐसे लोग ज्यादा होते हैं जिन्हें कई जगह जाना होता है। इस खाने-पीने के बीच एक कविता लिखने का मन कर आया। डरिये नहीं, कविता का खाने पीने से कोई मतलब नहीं है।
खंडहर
वो निर्जीव खंडहर
जो सहता है प्रकृति का हर बार
अपनी टूटी जर्जर दीवारों के सहारे
जिसके आगोश में दफन है
न जाने कितने युगों का इतिहास
जिसने सहा है
सैकड़ों दुशमनों का प्रहार।
पर यह निर्जीव खंडहर
जस का तस खड़ा रहा
हर युग में
समय का सबसे बड़ा राजदार
मौन हो देखता रहा
दिन- रात का बदलना
मानव का मानव से लड़ना।
यही निर्जीव खंडहरजैसे अट्ठाहस लगा रहा हो
हमारी मजबूरी पर
और कह रहा हो
कितना मूर्ख है मनुष्य
जो मेरी चाहत में ही मर मिटा।
कभी लगता घूरता मुझे
ये निर्जीव खंडहर।।
पंकज कुलश्रेष्ठ

25.11.08

KUCH HARIOM JI KE YAHA SE


एक सन्यासी से मुलाकात

विनय बिहारी सिंह

पिछले दिनों कोलकाता में एक सन्यासी से मुलाकात हुई। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि बातचीत मौन रह कर भी की जा सकती है। यह मेरे लिए एक अद्भुत बात थी। उन्होंने बताया- यह मैं नहीं रमण महर्षि और परमहंस योगानंद ने यह बात कही है। यह वैग्यानिक तथ्य है। मेरी उत्सुकता बढ़ी। उन्होंने कहा कि अगर आपके प्रति कोई दुश्मनी कर बैठा है तो उसके प्रति आप प्यार भेजिए। मन में उसका चेहरा रखते हुए कहते रहिए- मैं आपको प्यार करता हूं। आई लव यू। आपके दिल में उसके प्रति सचमुच प्रेम का भाव होना चाहिए। कुछ दिनों बाद वह आपसे दुश्मनी खत्म कर देगा। हो सकता है वह आपका मित्र बन जाए। मुझे यह विचार अच्छा लगा। सोचा क्यों न इसे सबको बताया जाए। क्या पता इससे समाज में सौहार्द बढ़े।


24.11.08

पाकिस्तानी अवाम में मुल्क के टुकड़े-टुकड़े होने का खौफ

'न्यूयार्क टाइम्स' में एक रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद पाकिस्तानी अवाम में मुल्क के टुकड़े-टुकड़े होने का खौफ समा गया हैं। 'न्यूयार्क टाइम्स' की रविवार को प्रकाशित 'ए रिड्रोन मैप ऑफ साउथ एशिया' नामक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी रणनीतिकारों और अवाम में भारत और अफगानिस्तान के बीच बन रहे रणनीतिक संबंध से खलबली मच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर पाकिस्तानी मानते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान को मजबूत करने की बजाए इस इस्लामी मुल्क के टुकड़े-टुकड़े करने में अपनी सहभागिता दे रहा हैं। रिपोर्ट में पाकिस्तान सेना के जनरल (सेवानिवृत्त) तलत मसूद के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तानी अवाम अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी को शक की निगाह से देख रहा हैं। जनरल (सेवानिवृत्त) तलत मसूद ने कहा कि पाकिस्तानी हुक्ममरान भारत की अफगानिस्तान में मौजूदगी से खफा हैं। और इसे रोकने के लिये अमेरिकी दख़ल चाहता हैं। लेकिन अमेरिकी सरकार इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर रही है।

पाकिस्तानी सेना के कुछ अधिकारी का मानना हैं कि पाकिस्तान में कबायली इलाकों में हो रहे अमेरिकी हमले आग में घी का काम कर रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में केवल अमेरिका को फायदा हो रहा है और पाकिस्तान का तो महज इस्तेमाल किया जा रहा है। यह बात पाकिस्तानी अवाम में घर करती जा रही हैं।

भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते को भी पाकिस्तान में शक की निगाह से देखा जा रहा हैं। पाकिस्तानी सेना कुछ अधिकारियों के हवाले से कहा गया हैं कि परमाणु समझौते से साबित होता है कि भारत और अमेरिका के बीच सैन्य रिश्ते तेजी से मजबूत होते जा रहे हैं। अफगानिस्तान में भारी भारतीय निवेश को लेकर भी पाकिस्तान में खलबली मच गई है। गौरतलब है कि भारत ने अफगानिस्तान की सेना को प्रशिक्षण देने की पेशकश की थी। साथ ही साथ भारत ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अफगानी संसद भवन के निर्माण के लिए 950 करोड़ रुपए की भारी-भरकम रकम देने का भी एलान किया था।

अमेरिका में नये बनते राजनीतिक समीकरण के बीच पाकिस्तानी अवाम की ये शिकायत कितनी सुनी जाती हैं, यह देखना मजेदार होगा।

Sumit K Jha
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क्या यही प्यार है...


तुम मुझे भूल जो नहीं जाओगे? किसी और से बात मत करना प्लीज और मेरा इंतजार करना समय से खाना खा लेना और सुबह उठते ही पहले मेरा संदेश पढ़ना। अब मैं आपको रोज सुबह जगाया करूंगी तभी उठना। चलो अब सो जाओ। यह डॉयलाग सभी केसाथ उस समय घटता है जब वह प्यार के अपने पहले या दूसरे दिन में होते हैं और बात आई लव यू तक पहुंच जाती है। दुनिया हसीन लगने लगती है हर तरफ सिर्फ एक प्यारा सा संसार दिखाई देता है जिसमें सब अच्छे लगते हैं। कुल मिलाकर जिंदगी मोबाइल फोन और इंटरनेट केइर्द-गिर्द घिरकर रह जाती है। उसका इंतजार रहता है जिसके साथ चार दिन में चार सौ साल तक जीने तक केसपने देख लिए जाते हैं।
पर जैसे-जैसे दिन बीतते हैं बस प्यार में शिकायतें दस्तक देती हैं। डायलॉग बदल जाता है। प्यारा सा अहसास दिलाने वाली सारी बातें समय केसाथ धूमिल हो जाती हैं। फिर कुछ इस तरह से डायलॉग बनने लगते हैं।
मैंने तुहें फोन किया था। तुहारा फोन व्यस्त जा रहा था तुम किससे बात कर रहे थे। वह जरूर कोई लड़की या लड़का रहा होगा। तुम मुझे भूल रहे हो? आज तुमने पूरे दिन में मुझे एक बार भी याद नहीं किया। आखिर इतने जल्दी ऐसा क्या हो गया कि तुहें मेरी परवाह नहीं रही। इस तरह से चलते-चलते एक दिन ऐसा आता है कि शिकायतों और गुस्से के बवंडर में फंसकर पहले दिन के किए गए वादे और सारे प्यारे अहसास दुश्मनी में बदल जाते हैं। इसके बाद में जब प्यार का अंत होता है तो उसकी शुरुआत और भी भयानक होती है। जो कुछ सप्ताह पहले एकदूसरे के बगैर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था वह अब अपने दोस्तों में बैठकर अपने प्यार को जलील कर रहा है। उसकी गलतियां गिना रहा है। ये अंश जो मैंने लिखे हैं आज के प्यार की वास्तविकता है अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसे क्या नाम देंगे। क्या यह सच में वही वाला प्यार है जिसे लैला-मजनू और हीर रांझा ने किया था। या फिर अब जरूरतों वाला प्यार है जिसमें एक इनफैचुएशन केसिवा कुछ और नहीं है। हर कोई किसी को चाहता है पर उसकेप्रति कितना गंभीर रहना चाहता है इसका वादा वह ना खुद से करता है ना ही उसका आभास अपने साथी को होने देता है। इस तरह से कुल मिलाकर कहा जा सकता है यह एक तरह की बीमारी है जिसमें बहुत से लोग एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। जिसका उदाहरण मुझे देने की जरूरत नहीं है अखबार समाज का आइना हैं उसमें हर दिन ऐसी खबरें प्रकाशित होती हैंं जिसमें प्यार के अंत का बेहतर उदाहरण दिया जाता है। पर मैंने अब तक जो देखा है वह मैंने बताया। अब आगे आप क्या सोचते हैं वह मुझे बताएं। और आधुनिक समाज के प्यार की एक परिभाषा देने में मुझे मदद करें जिसे मैं अपने अगले किसी पोस्ट में प्रयोग कर सकूं।

िरश्ते और जीवन


समय की रेत पर
बनते-िबगड़ते हैं कई िरश्ते।
कुछ कहने से पहले ही
खामोश हो जाते हैं कई।
आिखर इन अधूरी कहािनयों का
उद्देश्य क्या होता है?
ये क्यों शुरू करती हैं जन्म लेना,
जब िजंदगी जीनी ही न हो?
एेसे अक्स आिखर उभरते ही क्यों हैं,
िजन्हें कोई सूरत ही नसीब न हो?
कुछ बात तो होगी,
आिखर क्या बात होगी?
धुंधले होते हुए गायब होती कहािनयों में
झलक होती है िजंदगी की।
ये झलक-ये ललक
ही तो िजंदगी है।

ज़िन्दगी का सफर

बहुत सुहाना है यह शाम का मंजर।
एक दिन खत्म हो जाएगा ये ज़िन्दगी का सफर।।
दिल ये चाहे यूं ही लिखता रहे हर पल।
कभी न डगमगाए, ये कलम ऐ 'हैदर'।।
लिखावट के ज़ेरो-ज़बर में वो ताकत आए।
खुदा की सारी कायनात भी लुट जाए हम पर।।
जो भी पढ़े इन्हें, पढ़ता ही रहे हर पल।
ना उसे दिन का पता रहे, ना रहे शाम की ख़बर।।
दीन-ए-इलाही भी इनमें शामिल हों और हो सच्चे मायने।
मंजिलें भी इनसे हासिल हों और हो हासिल मंजिले डगर।।
हर आंख का तारा बनूं, हर आंख का प्यारा बनूं।
ना इसे बुरी जुबां मिले, ना लगे बुरी नज़र।।
बहुत सुहाना है यह शाम का मंजर।
एक दिन खत्म हो जाएगा ये ज़िन्दगी का सफर।।

- रज़ाक हैदर

22.11.08

गाफिल इतना सस्ता नहीं है....!!


इतना तनहा रहना भी अच्छा नहीं है....
सबसे जुदा रहना भी अच्छा नहीं है....!!
हर बात पर हैरत से आँखें फैला दे
आदमी अब इतना भी बच्चा नहीं है....!!
खुदा के नाम पर दे खुदा को ही गच्चा....
पक गया है ये अक्ल का कच्चा नहीं है..!!
आदमी के साथ मिल-बैठ मैंने जाना है ये
आदमी में अब रत्ती-भर भी बच्चा नहीं है..!!
आओ सब मिलके मुहब्बत को दफन कर दें
कि इसके बगैर तो अब कोई रास्ता नहीं है !!
तू आए और तेरे आते ही तेरे साथ चल दे...?
ओ कज़ा,"गाफिल"अभी इतना सस्ता नहीं है !!

कोशिश करता हूँ छुपाने की....!!


जो तुम पढ़ते हो मेरे चहरे पर...
कोशिश बहुत करता हूँ छुपाने की !!
हरदम हंसता रहता हूँ ना मैं...
तो कोशिश करो मुझे रुलाने की..!!
जिन्दगी तो हर किसी की गोया..
ख्वाब हो इक पागल दीवाने की !!
चेहरे की लकीरें उसकी हैं ऐसी...
छिपने की और ना छिपाने की !!
जिन्दगी जीने की खातिर भईया
जरुरत है किसी नए बहाने की !!
ख्वाब-ख्वाब..ख़याल-ख़याल...बस
हयात है महज इक अफ़साने सी !!
अब तो जरुरत है भाई "गाफिल"
तुझको भी यहाँ से भाग जाने की !!

मैं तेरा क्या लगूं.....!!


मैं तेरा क्या लगूं.....!!


कितना भी रहूँ ग़मगीन मगर हंसता हुआ लगूं...
कोई बद-दुआ भी दे तो उसे बन कर दुआ लगूं !!
ये कड़ी धूप और कभी जो हो बादलों की छाँव...
हर मौसम में मैं फूल सा खिलता ही हुआ लगूं...!!
कई धरम हैं यहाँ और रिवायतें भी हैं कई....
हर किसी को मैं उसके धरम का मसीहा लगूं..!!
अभी तो मैं रात का सन्नाटा बुन रहा हूँ "गाफिल"
दिन में आकर पूछना सूरज कि मैं तेरा क्या लगूं..!!

पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्रीमद्वल्लभाचार्य



भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधार स्तंभ एवं पुष्टिमार्गके प्रणेता श्रीवल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव संवत् 1535,वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मण भट्टजी की पत्नी इलम्मा गारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार[अग्नि का अवतार] कहा गया है। वे वेदशास्त्रमें पारंगत थे।
श्रीरूद्रसंप्रदाय के श्रीविल्वमंगलाचार्यजी द्वारा इन्हें अष्टादशाक्षरगोपालमन्त्र की दीक्षा दी गई। त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्रतीर्थ से प्राप्त हुई। विवाह पंडित श्रीदेवभट्टजीकी कन्या- महालक्ष्मीसे हुआ, और यथासमय दो पुत्र हुए- श्री गोपीनाथ व श्रीविट्ठलनाथ।भगवत्प्रेरणावशव्रज में गोकुल पहुंचे, और तदनन्तर व्रजक्षेत्रस्थित गोव‌र्द्धन पर्वत पर अपनी गद्दी स्थापित कर शिष्य पूरनमल खत्री के सहयोग से संवत् 1576में श्रीनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। वहां विशिष्ट सेवा-पद्धति के साथ लीला-गान के अंतर्गत श्रीराधाकृष्णकी मधुरातिमधुरलीलाओं से संबंधित रसमय पदों की स्वर-लहरी का अवगाहन कर भक्तजन निहाल हो जाते।
श्रीवल्लभाचार्यजीके मतानुसार तीन स्वीकार्य तत्त्‍‌व हैं-ब्रह्म, जगत् और जीव। ब्रह्म के तीन स्वरूप वर्णित हैं-आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी रूप। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को ही परब्रह्म स्वीकारते हुए उनके मधुर रूप एवं लीलाओं को ही जीव में आनंद के आविर्भाव का स्त्रोत माना गया है। जगत् ब्रह्म की लीला का विलास है। संपूर्ण सृष्टि लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्म-कृति है।
जीवों के तीन प्रकार हैं- पुष्टि जीव जो भगवान के अनुग्रह पर निर्भर रहते हुए नित्यलीला में प्रवेश के अधिकारी बनते हैं), मर्यादा जीव [जो वेदोक्त विधियों का अनुसरण करते हुए भिन्न-भिन्न लोक प्राप्त करते हैं] और प्रवाह जीव [जो जगत्-प्रपंच में ही निमग्न रहते हुए सांसारिक सुखोंकी प्राप्ति हेतु सतत् चेष्टारतरहते हैं]।
भगवान् श्रीकृष्ण भक्तों के निमित्त व्यापी वैकुण्ठ में [जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर स्थित है] नित्य क्रीडाएं करते हैं। इसी व्यापी वैकुण्ठ का एक खण्ड है- गोलोक, जिसमें यमुना, वृन्दावन, निकुंज व गोपियां सभी नित्य विद्यमान हैं। भगवद्सेवाके माध्यम से वहां भगवान की नित्य लीला-सृष्टि में प्रवेश ही जीव की सर्वोत्तम गति है।

21.11.08

Impact: मुंबई एटीएफ ने साध्वी से पूछा- क्या तुम कुंवारी हो?

Impact: मुंबई एटीएफ ने साध्वी से पूछा- क्या तुम कुंवारी हो?

ये सेवाभावी बाद में उडऩ छू न हो जाए?

पंकज व्यास
इन दिनों तो भौंपुओं की भरमार है। चुनाव का हो गया आगाज है। हर भौंपू जोर लगा-लगा कर अपने प्रत्याशी को सेवाभावी बता रहा है। मेरे मन में सवालों पर सवाल उठाए जा रहा है। अचानक सेवाभावी लोगों की बाढ़ कहां से आ गई है? लोगों में सेवा की भावना बहुत समा गई है? मैं तो सोचता हूं, अब तो हमारा उद्धार हो जाएगा, समझ लो पूरा का पूरा विकास हो जाएगा, अब तो हमारे दिन फिर जाएंगे, विकास का पहिया घुम जाएगा, क्योंकि अब तो एक नहीं, कई कई सेवादार खड़े हो गए हैं, कई के अरमा बढ़े हो गए हैं। पर, एक सवाल मुझे सता रहा है। चुनाव के बाद भी ये सेवादार सेवा में डटे रहेंगे? सेवा में लगे रहेंगे? या सेवा का ये भूत उतर जाएगा? क्या कोई सेवाभावी प्रत्याशी बाद में नजर आएगा? सेवा कि चिड़ीया उड़ जाएगी? सेवाभाविता जारी रहेगी? बंधुओ, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है, मेरा दिल कह रहा है, ये सेवादार उडऩ छू हो जाएंगे और ढूंढे से भी नहीं मिल पाएंगे। कांश, ऐसा न हो, पर अब तक तो यही होता आया है, चुनाव के बाद सेवाभावी प्रत्याशी नजर नहीं आता है। पांच साल तक वनवास चला जाता है। आप बताओं आपका मन क्या कहता है? क्या सेवा के लिए सत्ता का स्वाद जरूरी होता है?

सच्चा वीर

एक वृद्ध अमेरिकी व्यक्ति अपने पोते-पोतियों को अपने मन की बात बता रहा था। उसने बच्चों को बताया, उसके मन के अंदर एक संघर्ष चल रहा है। एक पक्ष है-भय, क्रोध, ईष्र्या, शोक, पश्चाताप, लोभ, द्वेष, हीनता, अभिमान, अहंकार आदि का। दूसरा पक्ष है-आनंद, हर्ष, शांति, प्रेम, आशा, विनम्रता, परोपकारिता, सहानुभूति, दानशीलता,उदारता, सत्यता, विश्वास आदि का। संभव है कि ऐसा संघर्ष तुम्हारे अंदर और अन्य व्यक्तियों में भी चल रहा होगा। कुछ क्षण के लिए बच्चे सोच में डूब गए। तब एक बच्चा बोला- दादा जी! अंत में किस पक्ष की जीत होगी? वृद्ध व्यक्ति बोला, हम जिसे जिताना चाहेंगे, यानी जैसे मनोभावोंको हम स्वयं में बढावा देंगे, उसी की जीत होगी।
आत्मबल है सहायक
वास्तव में, दूषित मनोवृत्तियांही कायरता की सूचक हैं, न कि वीरता की। दरअसल, वीर और पराक्रमी व्यक्ति वही होते हैं, जो अत्याचार करने वाले लोगों का विरोध करते हैं और निर्बल की सहायता करते हैं। ऐसे लोगों में उनका आत्मबल ही होता है, जो दूसरे लोगों में व्याप्त बुरी प्रवृत्तियों को समाप्त करने में सहायक होता है। यदि हम भी अपने भीतर परोपकार, दया, दानशीलताजैसे मनोभाव चाहते हैं, तो आत्मबल को विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।
सत्य की राह
वीर व्यक्तियों में यह आत्मबल सत्य की राह पर चलने के कारण ही उत्पन्न होता है। और इसीलिए वे हमेशा सत्य का साथ देते हैं। अपने कहे गए सत्य वचनों को पूरा करने के लिए वे अपने जीवन की भी परवाह नहीं करते।
कौन उससे प्रसन्न है अथवा कौन उससे अप्रसन्न, इस बात की चिंता सत्य के पथिक नहीं करते। उनका एक ही उद्देश्य होता है, जरूरतमंदों की मदद करना। इस फेर में यदि कोई व्यक्ति उनसे अप्रसन्न हो जाता है, तो वे इसे नजरअंदाज कर देते हैं।
सरल मार्ग का चुनाव
हम जीवनपर्यन्तइन दो विचारों पर मंथन करते रहते हैं कि कौन कार्य हमारे लिए अच्छा है और कौन बुरा? विवेकी जन वही मार्ग चुनते हैं, जो उनके लिए सरल और शुभ हो। ऐसे लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा इसी तरफ मोड देते हैं। उनकी यह ऊर्जा सकारात्मक होती है। सच तो यह है कि नकारात्मक प्रवृत्तियां, जैसे-भय, क्रोध, ईष्र्या आदि दर्शाने वाले मनोभाव हमें गलत राह की ओर ले जाते हैं, यानी वे विनाश की ओर ले जाने वाले साबित हो सकते हैं। गीता में काम, क्रोध और लोभ को नरक का द्वार बताया गया है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि जो लोग आत्मोन्नतिके इच्छुक हैं, उन्हें इन तीनों दुर्गुणोंका त्याग कर देना चाहिए।
सदाचारी बनें
यदि हम चिंता, भय, क्रोध, ईष्र्या, शोषण आदि दुर्गुणोंके दास बन जाएं, तो हमारा जीवन नीरस ही नहीं, भार भी प्रतीत होने लगता है। यहां तक कि व्यक्ति नशे की शरण में जाने, वैरागी बनने, आत्महत्या करने आदि जैसे कुकृत्यों को अंजाम देने लगता है। यदि हम सदाचारी बनें, तो इससे न केवल स्वयं का भला होगा, बल्कि हम आसपास के लोगों की मदद भी करने में समर्थ हो सकते हैं। दूसरी ओर, यदि हमारा व्यवहार दुराचारी व्यक्ति के समान है, तो हम अपना तो सर्वनाश करेंगे ही, साथ ही साथ हमारे आस-पास का वातावरण भी दुखदायी हो जाएगा। सच ही कहा गया है कि जब बुराई की बेल बढती है, तो उसके विषैले फल संसार में अनेक प्रकार के दुष्परिणाम पैदा करते हैं।
जीव को दो प्रकार के दुखों का सामना करना पडता है- बाहरी और भीतरी। भौतिक अभिलाषाओं की पूर्ति न होने से बाहरी दुख उत्पन्न होते हैं और अन्तर्मन में उठने वाली अभिलाषाओं से भीतरी दुखों का सर्जन होता है। हमें अपने अंदर और बाहर उत्पन्न दुखों से संघर्षपूर्ण लडाई लडनी पडती है। सच तो यह है कि हमारा जीवन इस पृथ्वी पर एक संघर्षपूर्ण युद्ध के समान है। और हम इस युद्ध का सामना तभी कर पाएंगे, जब हम निडर और आत्मविश्वासी होंगे। जिस प्रकार मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, उसी प्रकार जीवन में संघर्ष भी अवश्यंभावी है।
श्रेष्ठ जन कहते हैं कि जीवन के संघर्षो का मुकाबला सदा जीतने के भाव से करना चाहिए। उनसे बच कर भागने के बजाय उनका दृढतापूर्वक सामना करना चाहिए, तभी सही मार्ग निकल सकता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन के शत्रुओं, जैसे-काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि को कम नहीं समझना चाहिए। यही हमारे मुख्य शत्रु हैं, जिन्हें हमें हराना है, ताकि हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। इन बुरी ताकतों को हराने के लिए संकुचित हठधर्मिता को छोडना होगा और सतत प्रयास करते रहना होगा, तभी हम सफलता की ओर कदम बढा सकेंगे।
लाजपत राय सभरवाल

यशवंत दादा! सच बताना........

अमीबा एक ऐसा प्राणी है जो पूरा का पूरा मात्र एक ही कोशिका से बना होता है यानि कि दिल-दिमाग-मन-आत्मा सभी उसी कोशिका में ठुंसे रहते हैं। उसमें लैंगिक प्रजनन नहीं होता इसलिये इन्हें कभी ही कोई सेक्सुअल प्राब्लम होती ही नहीं, इनमें न नर हैं न मादा और न ही हिजड़े। एक विशेष बात इस प्राणी के बारे में के इसका कभी एक आकृति नहीं रहती है यानि हमेशा शक्ल-सूरत बदलती रहती है यानि कि आप जिस "रामू अमीबा" से कल मिले थे उसे आज आप "श्यामू अमीबा" समझ बैठें। ’एकोहं बहुस्यामि’ की सोच में ये भी विश्वास रखते हैं। ये अपनी प्रकृति कभी नहीं बदलते यानि अमीबा ही रहते हैं ये नहीं कि पैरामीशियम(एक और दूसरा एक-कोशिकीय प्राणी) बन गये। इसलिये अमीबा के बारे में कोई राय कायम करना क्या मानवीय बुद्धिमानी की कसौटी पर सही रहेगी? ये कब पैदा हुए और मर गए पता ही नहीं चलता शायद इसलिये कि इन्हें न तो कब्रिस्तान में दफ़नाते हैं न ही श्मशान में जलाते हैं और तो और शवयात्रा तक नहीं निकालते। "अंगुलिमाल अमीबा" के गले में उंगलियों की माला है वो हर बात में एक उंगली निकाल कर मुद्दे की पिछाड़ी में डाल देता है ऐसा आपने सोचा लेकिन जब अमीबा ने अपनी प्रकृति इतने दिन तक आपको बतायी तो सच बताना कैसा लगा। न पैसा-न प्रसिद्धि-न शान्ति....... यही तो जीवन है; हम सबका अधूरापन ही तो हमें पूर्णता की ओर धकेलता है लेकिन हम किस बात को पूर्णता मानें ये हमारी मर्जी है। बस यावज्जीवेत सुखम जीवेत ही सत्य है, सत्य वही है जिसे हम मानते हैं जिसे नहीं मानते वो सत्य कहां है हमारे लिये? मेरे जीवन में संबंधों की उपलब्धियों में आप श्रेष्ठतम हैं ये मैं बता चुका हूं आज लिख कर दे रहा हूं। शरारतें,गम्भीरताएं,मनोरंजन,महत्त्वाकांक्षाएं,उठापटक,क्षोभ और गुदगुदी के बीच लोटने में बड़ा आनंद है,मुझ सुअर का यही कीचड़ है। मैं ने आपको कितना सताया है और क्यों सताया है ये आप जान पाये या नहीं? मैं नहीं बताउंगा, इस बात में बहुत सारे प्रश्नवाचक चिह्न लगा सकता था पर एक ही लगा कर काम चला लिया।
जय जय भड़ास

मुंबई एटीएफ ने साध्वी से पूछा- क्या तुम कुंवारी हो?

आतंकवादी बताकर गिरफ्तार की गई साध्वी प्रज्ञा को यातना देने में एटीएस ने तमाम हदें पार कर दी है। साध्वी से पूछे गए सवालों में इंसानियत और मर्यादाओं को तार तार करने वाले सवाल भी पूछे गए। उनसे पूछा गया कि क्या वे कुंवारी हैं ? आश्चर्य इस बात का है कि अर्ध्दनग्न नृत्य करने वाली टीवी और फिल्मी अभिनेत्रियों के आपसी झगड़ों और स्वार्थों की लड़ाई में देश का महिला आयोग बयान जारी करता है और इन अभिनेत्रियों से मिलकर उनके साथ ग्रुप फोटो खिंचवाता है, जबकि एक साध्वी जिससे अभी पूछताछ हो ही रही है उसे हर तरह से प्रताड़ित किए जाने के बावजूद महिला आयोग ने चुप्पी साध रखी है।
कश्मीर में आशिया अंदरावी नामकी महिला कट्टर इस्लामी संगठन दुख्तराने मिल्लत की अध्यक्ष हैं। उन पर अमेरिका ने आरोप लगाया था कि श्रीनगर के एक बम धमाके में उनके संगठन का हाथ था। जिसमें एक पत्रकार मारा गया था। भारतीय गुप्तचर एजेंसियों ने उन पर हवाला से पैसा लेकर जिहादी आतंकवादियों को देने का आरोप लगाया और पोटा के अंतर्गत जेल भी भेजा देश के खिलाफ और आतंकवादियों के समर्थन में काम करने वाली इस महिला को जेल में वे तमाम ऐसो आराम और सुविधाएं दी गईं और बाद में छोड़ भी दिया गया। दूसरी ओर साध्वी प्रज्ञा पर अभी तक कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ है। लेकिन उससे पूछताछ के नाम पर नैतिकता, कानून और बेशर्मी की तमाम हदें पार की जा रही है। आखिर महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास को यह सब दिखाई क्यों नहीं देता, या वे भी पूर्वाग्रह से ग्रसित है।

गुनाहगार लगे है सभी....!!



गुनाहगार लगे हैं सभी....!!



दिल में बेकली हो तभी हर शाम गुनाहगार लगे है तभी....
शिद्दत हो गर दिल में तो...अपने ही यार लगे है सभी...!!
यार दो बोल मीठा भी बोल दे तो मान जाऊं मैं अभी...
नफरत से लबालब तिरे ये हर्फ़ तो तलवार लगे है सभी....!!
भीतर जो देख ले आदम तो ख़ुद को बदल ही दे अभी...
बाहर तो इक अपने अपने सिवा खतावार ही लगे है सभी..!!
हर कोई हर किसी को माफ़ कर दे तो सब बदल जाए...
मन में बोझ लेकर जीने से जीना भी दुश्वार लगे है सभी..!!
चन्द साँसे ही सौगात में लेकर आयें हैं हम सब यहाँ...
हर नेमत को आपस में बाँट लें,कि यार लगे है सभी....!!
मुहब्बत भरा दिल ये जो अपने पास ना हो "गाफिल"
चूम कर कलियाँ कहें फूल को,कि खार लगे हैं सभी....!!

मुझे माफ कर मेरे बाप

जंग चुनावी जारी है, सबकी सब तैयारी है।
नेता हल्के, जनता जॉनी अंग-प्रत्यंगा भारी है।
खादी च्यों रंडवाई भोगें, कुर्सी अभी कंवारी हैं।
जनता इनको देखके बोली, दादा फिर से आ गए आप...
मुझे माफ कर, मुझे माफ कर, मुझे माफ कर मेरे बाप...
बिजली, शेयर, चीनी, राशन, दूध, दही और दाल मखानी
भिंडी, तौरी, प्याज टमाटर, आटा, सरिया, सादा पानी
गैस, सिलेंडर, झोंपड़, डीजल, सीमेंट, सिगरेट, चूहेदानी
काजू, किशमिश, पत्ती, कॉफी, सब भावों में लग गई आग...
मुझे माफ कर, मुझे माफ कर, मुझे माफ कर मेरे बाप...
कहीं कबाड़ी, कहीं जुगाड़ी, कहीं पे खेल खिलाड़ी है
कहीं अगाड़ी, कहीं पिछाड़ी, लल्लू कहीं अनाड़ी है
कहीं सुरारी, कहीं जुआरी, मोहन कहीं मुरारी है
राजकुमारी, कहीं पे रानी, कहीं हर-हर गंग भिखारी है
देश का बेड़ा, जय-जय खेड़ा, सब मिट्टी में, सब कुछ खाक...
मुझे माफ कर, मुझे माफ कर, मुझे माफ कर मेरे बाप...
अपने कम्प्यूटर पर बाहर के एडिशनों से आई हुई फोटो देख रहा था, तब कोटा से आई एक फोटो देखकर दीमाग में ख्याल आया- मुझे माफ कर, मुझे माफ कर, मुझे माफ कर मेरे बाप...। लिखने कुछ और बैठा था, लिख दिया कुछ ओर। फोटो कोटा के एक कांगे्रस प्रत्याशी की है, जो जनसम्पर्क कर रहे हैं। और यह बालक इनका अभिनन्दन कर रहा है। इस फोटो से कविता का कोई लेना-देना नहीं है। http://dard-a-dard.blogspot.com/

20.11.08

हालात से नाउम्मीद होती ज़िंदगी!

आज अपने ब्लॉग पर चंद पंक्तियां मेरे दोस्त रवीश रंजन शुक्ला की कलम से। दिल्ली में रह कर पत्रकारिता कर रहे रवीश भी मेरी तरह एक छोटे शहर से हैं। रवीश की ख़ासियत ये है कि वे एक बेहद संवदेनशील इंसान हैं और अपने आस-पास होनेवाले तमाम वाकयों से खुद को अलग नहीं रख पाते। कुछ रोज़ पहले रवीश को एक वाकये ने बुरी तरह झकझोर कर रख दिया। उन्होंने मुझसे दिल की बात कही और मैंने ही उन्हें ये सब ब्लॉग पर लिखने का सुझाव दिया। बाकी जो भी है, आपके सामने है --अभी थोड़े दिन पहले मैं दीपावली में अपने घर गया था। घर जाते ही पुराने दोस्तों की याद आती है। इन्हीं में से एक मेरा दोस्त था राकेश साहू। दरम्याना कद, मुस्कुराता सांवला चेहरा, ब्लैक बेल्ट खिलाड़ी। जिंदगी में सफलता या असफलता से कोई लेना देना नहीं। हमेशा दूसरों के काम आना, साहित्य पढ़ना और रंगकर्म में वक्त निकालना। बीएसएसी भी झोंके में पास कर डाली थी। हाल के दिनों में संपर्क उससे कम हो गया था, क्योंकि मैं अपने काम से फ़ारिग नहीं हो पाता और वो अपनी मटरगश्ती से। राकेश साहू अजीब था। वैसा ही अजीब जैसे किसी कस्बाई शहर का आम लड़का होता है।जीवन में शायद उसने एक गलती की थी। शादी करने की। खैर, घर पहुंचने के दो दिन बाद एक दिन अचानक मेरे पास एक दोस्त महेंद्र का फोन आया। उससे पता चला कि राकेश साहू की हत्या हो गई। पुलिस ने आदतन बिना शिनाख्त किए उसकी लाश को जला डाला। मैं और महेंद्र हैरान। हमारी आंखों के सामने उसका चेहरा घूमा। हमने बहराईच की कोतवाली में जाकर खुद शिनाख्त करने का फैसला किया। कोतवाली की ओर जाते कई बार दिमाग ने कहा कि भगवान करे राकेश साहू की फोटो न हो। लेकिन मुंह में पान दबाए कोतवाल साहब ने बड़े नखरे दिखाकर फोटो दिखाया तो वो राकेश ही था। आंखें खुली, गर्दन पर गहरा ज़ख्म, हमारी सुधबुध थोड़े समय के लिए चली गई। थोड़ी देर बाद कोतवाल साहब को याद आई कि उनके सामने खड़े दो सज्जन में से एक पत्रकार है और दूसरा अधिकारी, तब कुर्सी मंगवाई, हमें बिठाया। और फिर शुरू की हत्या को दुर्घटना का जामा पहनाने की कहानी।दरअसल शादी के बाद राकेश की अनबन उससे ससुराल वालों से थी और राकेश की शादी का मामला कोर्ट में चल रहा था। उसने खुद भी कई बार हत्या हो जाने की आशंका जताई थी। पुलिस को भी ये बात मालूम थी, लेकिन बहराईच पुलिस ने ना तो लाश की अलग-अलग एंगेल से फोटो करवाई ना ही कोई सबूत इकट्ठा करने की कोशिश की। राकेश के शरीर पर से शर्ट गायब थी। पैरों के जूते और मोजे नदारद थे। जेब से पैसे और मोबाइल गायब थे। कुछ भी तो ढूंढने की कोशिश नहीं की। क़त्ल का मकसद मौजूद था। मौके-ए-वारदात और पास की दीवार पर छिटके खून से पहली नज़र में ही ये हत्या का मामला लग रहा था। लेकिन पुलिस का कहना था कि टैक्टर के हल से कटकर उसकी मौत हुई है।पुलिस का यह नाकारा रवैया देखकर हम हैरान थे। हम शाम को अखबार के दफ्तर पहुंचे। कुछ एक अखबारी दोस्तों के ज़रिए ख़बर छपवाने की कोशिश की लेकिन दो अखबारों को छोड़कर किसी को भी ये खबर नहीं लगी। सभी ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिसवालों की दोस्ती का ख्याल रखा और कुछ भी पुलिस की जांच के खिलाफ न लिखकर वही लिखा जो पुलिस ने बताया। दूसरे दिन हमें फिर निराशा मिली लेकिन फिर भी हमने बहराईच के वयोवृद्ध साहित्यकार डा. लाल के ज़रिए कैंडल मार्च निकालने का मन बनाया और वहां के एसपी चंद्र प्रकाश से भी बात की। उन्होंने ज़रूर हमें भरोसा दिलाया कि यह मर्डर है और हम जांच कर रहे हैं, लेकिन घटना के २० दिन होने को हैं, अभी तक राकेश के हत्यारों का पता नहीं चला है। इसी बीच हमारे दोस्तों को अब आसपास के लोग ही समझा रहे हैं कि जाने वाला तो चला गया अब तुम क्यों दुश्मनी ले रहे हो?हम निराश इसलिए भी हैं कि एक प्यारे दोस्त को तो हमने खोया, लेकिन उसके लिए कुछ ही न कर पाने का मलाल ज्यादा है। छोटे शहर से लेकर बड़े शहर तक ना जाने कितने लो प्रोफाइल राकेश इसी तरह मर जाते हैं, लेकिन पुलिस की तफ्तीश कितना भरोसा पैदा करती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ब्लॉग पर इस तरह का वाकया लिखने का मक़सद एक ही है कि अगर कोई इस तरह के मामलों में दिलचस्पी दिखाए और कुछ भी कर सके तो अच्छा है। साथ ही ये घटनाएं बताती है कि हम कितने लाचार हो जाते हैं। राकेश भले ही चला गया हो लेकिन हम ज़ुबानी जमाखर्च और रोज़ाना की पेशेवर कामकाज में इतने मसरुफ़ हैं कि हमसे कुछ होगा ऐसा नहीं लगता...

ये भीड़ तंत्र नहीं, लोकतंत्र है...

>>पंकज व्यास
एक जना आके मुझसे बोला, 'चुनाव में अलां उम्मीदवार जीत जाएगा और फलां उम्मीदवार हार जाएगा? मैं अवाक रह गया। उससे पूछा, भाया, तुम कैसे कह सकते हों, चुनाव के पहले चुनाव परिणाम बता रहे हों, क्या बात है? क्या तुम अंतर्यामी बन गए हों, ज्योतिष सीख लिया है? भविष्य वक्ता बन गए हों...? वो बोला, नहीं रे, ऐसी बात नहीं है।मैंने सवाल दागा, 'तो फिर कैसी बात है? उसने तपाक से कहा, 'अलां की सभा में बहुत भीड़ थी, फलां की सभा इने गिने लोग।' मैंने ·हा, 'तो? उसने मुंह खोला, 'आश्चर्य जताया कि अब भी नहीं समझे! जिसकी सभा में भीड़, वह जीता समझो। मैंने समझादारी दिखाई और उसे लगा समझाने, ऐसा नहीं होता है, ये भीड़ तंत्र नहीं, लोकतंत्र हैं। किसी की सभा में ज्यादा भीड़ आ गई, इसका मतलब ये थोड़ी की जीत गया, जिसको ज्यादा वोट मिलेंगे वो जीतेगा। 'फिर इस भीड़ का क्या मतलब? ये भीड़ क्यों जुटी? अगर लोगों को जिसकी सभा में जा रहे हैं, उसे नहीं जीताना है, तो वहां गए ही क्यों..?, ऐसे कई सवाल उसने दाग दिए? और सवालपूछूं मुद्रा में मुझे टकटकी लगाए देखने लगा? मैं फिर लगा फिर अपना ज्ञान झाडऩे, 'कोई सभा सुनने आ गया इसका मतलब ये थोड़ी की वो उसका पक्का वोटर हो गया, व्यक्ति के मन में जिज्ञासा होती है कि चलो क्या ये क्या बोलेगा, इसलिए भी सुनने चले जाते हैं और सभा में जाएंगे नहीं, तो प्रत्याशी के विचार कैसे मालूम पड़ेंगेदोस्तों, मैंने काफी जतन किए वो जना इस बात को नहीं मान पाया कि ये भीड़तंत्र नहीं, लोकतंत्र है। वो अपने कयास लगाता रहा? मैं उसे समझाता रहा कि कोई जन आंदोलन हो तो भीड़ का बड़ा महत्व होता है, उसे जन समर्थन माना जाता है, लेकिन चुनावी सभाओं में जरूरी नहीं कि जनसमर्थन मिल ही रहा हो, पर वह नहीं माना।

सूफी काव्य के अग्रदूत बाबा शेख फरीद

शेख फरीद भारतीय सूफी काव्य के प्रथम और प्रामाणिक हस्ताक्षर हैं। सूफी काव्य के बुनियादी संकल्प शेख फरीद की वाणी में नये उद्बोधन के साथ उभरते हैं। सूफी जीवन दर्शन सामाजिक जीवन के संतुलन पैदा करने वाली जीवन शैली थी। जिसका प्रचार-प्रसार हमें शेख फरीद के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्वमें मिलता है। उत्तरभारत की सूफी परंपरा शेख फरीद के जीवन के दर्शन से केवल प्रभावित ही नहीं रही, बल्कि इसका सही अनुसरण लोक-जीवन में भी मिलता है।
शेख फरीद जीवन के नैतिक मूल्यों की वकालत भी करते हैं तथा इसे आदर्श जीवन का मानदण्ड भी स्वीकार करते हैं। शेख फरीद की वाणी में ऐसे कई पहलू देखे जा सकते हैं। शेख फरीद का जीवन दर्शन केवल किताबी नहीं है, उसमें सही जिन्दगी की वह तस्वीर भी अंकित है जो आलोक-स्तंभ बनकर आस्था के नए स्वरों को जन्म देती है। जीवन की प्रत्येक सच्चाई को शेख फरीद गंभीरतापूर्वक लेते हैं। वे जीवन के धनात्मक मूल्यों के पक्षधर हैं। फरीद की वाणी में मानव जीवन का महाबिम्बविद्यमान है। इस महाबिम्बमें जन्म, शैशव, यौवन और बुढापे का चित्रण बडी खूबसूरती से हुआ है।
वहीं शेख फरीद की वाणी में स्वतंत्र मानव की वह छवि उभरती है, जिसके कारण वह नेक और उमदा इंसान बना हुआ है। शेख फरीद अकाल पुरखपर सौ-प्रतिशत विश्वास करते हैं। रब्बकी रजा उनके लिए अन्तिम फरमान है। वे ज्ञान और क्रिया में केवल विश्वास ही नहीं रखते बल्कि अपनी वाणी में यह भी साबित करते हैं कि भरोसे का खेल हर व्यक्ति के बस की बात नहीं है। अल्ला की जात पर ईमान रखने वाला व्यक्ति उन तमाम सीमाओं को लांघ जाता है, जिसकी अपेक्षा दुनिया में उससे की जाती है। शेख फरीद की स्थापनाओं में धर्म का असली चेहरा रौशन होता है। इस रोशनी में त्याग, सेवा, भाईचारा तथा जीवन के प्रति गहरी निष्ठा अपना कमाल दिखाती है। इस जागरण में आदमी की वह मनोदशा क्रियाशील होती है, जिसकी वजह से उसका मनोबल मानवीय शक्ति में रूपांतरण हो जाता है।
इसके अलावा फरीद वाणी में यह दास्तान बहुआयामी है। फरीद का अनुभव यथार्थवादी है। फरीद उस परम्परा का तत्काल समर्थन नहीं करते, जिसकी अर्थवत्तायुग के अनुरूप नहीं है। वह चाहते हैं कि परंपरा का सांस्कृतिक सम्प्रेषण सीधे लोक जीवन में हो जिसकी सार्थकता शाश्वत काल तक बनी रहे। शेख फरीद की वाणी में ऐसे जीने के कई साक्ष्य मिलते हैं। फरीद वाणी के विकास में यह विमर्श मूल्यवान भी है तथा सम्पूर्ण अखण्ड भी। वास्तव में शेख फरीद के जीवन दर्शन की यही सम्भावना और गहराई है। शेख फरीद की वाणी में हिन्दोस्तानभी हािजर और पंजाब भी। पंजाबी जन-जीवन के सूक्ष्म ब्यौरों से फरीद वाणी नई साहित्यिक विरासत को जन्म देती है।
दर्शन मीमांसा के कई महत्वपूर्ण संदर्भ फरीद वाणी में नव चेतना के साथ दर्ज हुए हैं। सूफी दर्शन का सरलीकरण फरीद वाणी की विशेषता है। कठिन से कठिन सूफी अनुभव फरीद वाणी में सरल बन जाता है। इसीलिए ओशोफरीद वाणी को शीतल-छांग की संज्ञा देते हैं। फरीद की वाणी में आनंद और सुख के श्लोक एक ऐसा सच्चा वातावरण पैदा करते हैं, जिसमें क्षण, दिन-रात तथा पूरा परिवेश नई दिशा को ग्रहण कर लेता है और मौन की करामात अन्तर्तममन पर बरस जाती है। यही विचार फरीद वाणी का केन्द्र है। फरीद वाणी की अन्त‌र्ध्वनियांसम्पूर्ण सत्य का उद्घाटन कर देती है।
छायारूपइस जगत को उस महान् अस्तित्व से जोड देती है, जिसका सरोकार उस सत्य से होता है जिसकी असलियत अंधेरे और प्रकाश के संघर्ष में जन्म ले रही होती है। शेख फरीद चाहते हैं कि उन अंधेरे रास्तों को सदा के लिए प्रकाशमान बना दिया जाए जो हर आदमी को स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और सौहार्द से वंचित रखता है। फरीद चाहते हैं कि सच्चा इन्सान खुदा पर विश्वास रखे, अपने सत्य को पाने का विश्वास करे तथा तार्किक और बौद्धिक उलझनों में न उलझकर गहन समक्ष से उस सत्य को प्राप्त कर ले, जिसके लिए वह भटक रहा है। फरीद वाणी का यही जीवन्त महान् उपदेश है। बाबा शेख फरीद के पास भी लोगों को अजर और अमर बनाने की नैतिक शिक्षाओं की महान औषधि थी। यह औषधि मन और तन निरोग कर देती थी।
यही कारण है कि शेख फरीद का फलसफा पूरे हिन्दोस्तानमें भाईचारे के सन्देश के साथ फैला।
शेख फरीद समाज में ऐसा माहौल बनाना चाहते थे, जिसके माध्यम से नये दर्शनशास्त्र की मिसाल कायम हो सके। उन्हें यह अहसास था कि दुनिया में रहने वाले रब्बके बन्दे तभी शान्ति से रह सकते हैं यदि प्रेम की सरिता अविरल बहे। मन की तडप, प्रभु को पा लेने की इच्छा तभी स्थिर हो सकती है यदि सच्चे ईश्वर के प्रति न खत्म होने वाली ललक पैदा हो जाए। पंजाबी साहित्य में जो दीपक शेख फरीद जी ने बिरहा की अग्नि वाला जलाया, वह आज तक पंजाबी काव्य में अपनी आभा बिखेर रहा है। शेख फरीद भारतीय भाषाओं में बिरहा के भी पहले कवि हैं। पंजाब का यह सौभाग्य है कि हर बरस बाबा शेख फरीद का पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। बाबा शेख फरीद को याद करने का अर्थ है, उस सांझे भाईचारे को याद करना, जिसके कारण पंजाब न हिंदू और न मुसलमान बल्कि वह तो महान विरासत है जिसके कण-कण में बाबा शेख फरीद का महान संदेश छुपा हुआ है। बाबा शेख फरीद ने पंजाबियों को भरे-पूरे जीवन की जांच सिखलाई।
प्रो. हरमहेन्द्रसिंह बेदी

आप सुन रहें हैं ना पापा...

प्रिय पापा,
आज आपको इस दुनिया से गए तेईस साल हो गए। मैं नहीं जानता अब आप कहां होंगे, लेकिन अभी भी ऐसा महसूस होता है कि आपका वजूद हमसे अलग नहीं हुआ है। आपको गए लम्बा अरसा बीत चुका, लेकिन आपकी यादों से हमारा दामन ज़रा भी नहीं छूटा। आज मैं उम्र की उस पर मंजिल पर हूं, जहां मेरी गिनती न बच्चों में होती है और न ही युवा मानकर समस्त जिम्मेदारियों का भार मुझे सौंपने का जोखिम उठाया जा सकता है। हालांकि परिवार से मिलने वाले लाड़-दुलार का कोई अभाव नहीं है, लेकिन आप के मार्गदर्शन की कमी सदैव महसूस होती है। हमेंशा यहीं लगता है कि आपका स्नेहिल हाथ सिर पर होता तो शायद खुशियां दोगुनी रफ्तार से ज़िन्दगी में प्रवेश करती। आज जब इतना वक्त गुज़र चुका है तो भी एक पिता, एक संरक्षक की कमी मन को सदैव कचोटती रहती है कि आप होते तो शायद ज़िन्दगी का एक और खूबसूरत रूप देखने को मिलता।
इसे मेरा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बचपन का वह सुनहरा दौर यूं ही गुज़र गया जब बच्चे पिता की अंगुली थाम कर चलना सीखते हैं। बदमाशियों पर डांट खाने, अच्छे अंक हासिल करने पर प्यार भरी थपकी, बड़े भाई-बहनों से झगड़ने पर आपके द्वारा अपने सीने में छिपा लिए जाने के एहसास से मैं बिल्कुल महरूम रह गया। आज आपकी तस्वीर को देखते ही आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। हर उस मौके पर आपकी यादें पल-पल जीवंत हो उठती है, जो पिता-पुत्र से जुड़ा होता है। जब भी किसी बेटे को अपने पिता से किसी चीज की ज़िद करते देखता हूं तो जुबां खामोश और आंखें नम हो जाती है। जब कोई पिता अपने बेटे से यह उम्मीद करता है कि वो बुढ़ापे के दिनों में उसका सहारा बनेगा तो सोचता हूं कि आखिर क्यूं भगवान ने मुझे यह मौका नहीं दिया।
पापा, अकेला मैं ही नहीं पूरा परिवार आपकी यादों को सीने से लगाए है। दादी आंसुओं से भरी हुई सूनी आंखों से एकटक आपकी तस्वीर को देखते हुए बताती थीं कि किस तरह पूरे शहर और गांव में आपका यश कायम था। पापा, आपकी वह कामयाबी आज भी गर्व से मेरा सिर ऊंचा कर देती है। जब लोग बड़ी इज्ज़त के साथ कहते हैं कि यह 'वकील साहब' का बेटा है। उस समय, वक्त थम सा जाता है और साथ ही जीवन में कुछ करने की असंख्य प्रेरणाओं से लबरेज हो जाता है। हालांकि आपकी मौत के हादसे ने सही-गलत की अच्छी परख कराई। आपके चले जाने से घर का आय-अर्जन का साधन भी खत्म हो गया था। सच यह भी है कि उन हालातों ने घर के सभी सदस्यों को दुनियादारी के असली मायने सिखा दिए। वक्त के साथ ज़िन्दगी ढर्रे पर आई। आज मैं धीरे-धीरे ज़िन्दगी के अनुभवों से सीख रहा हूं। समय ने हम सबको समय से पहले परिपक्व बना दिया। अब हर एक छोटी घटना भी सबक देती प्रतीत होती है। कई बार एक भावनात्मक तूफान दिल को चीरता हुआ निकलता है और मुझसे यह सवाल करता रहता है कि क्या आप होते तो ऐसा होता..? , आप होते तो शायद वैसा नहीं होता...
अब धीरे-धीरे हालात संभल रहे हैं। पापा, काश आप देख पाते कि अब सब कुछ व्यवस्थित हो रहा है। मैं भी उच्च अध्ययन कर रहा हूं। यह आपके आशीर्वाद का ही नतीजा था कि विषम परिस्थियों के बावजूद हमारे कदम डगमगाए नहीं। हालांकि सभी की पूरी कोशिश होती है कि हमें आपकी कमी महसूस न हो। लेकिन अतीत के लम्हे वर्तमान पर दस्तक देकर आंखों को भिगो देते हैं। पापा, मैं उम्र और अनुभव में बहुत अधिक बड़ा तो नहीं लेकिन मैंने यह संकल्प लिया है कि आपका यश और ज्यादा प्रसारित करूंगा। आपका यह बेटा आपका सहारा बनने का सौभाग्य तो प्राप्त न कर सका, लेकिन आपकी इज्ज़त, आपकी पहचान जरूर बनेगा। मैं श्रद्धांजलि इन्हीं शब्दों के माध्यम से आप तक पहुंचाता हूं कि जाने वाले तो कभी लौट कर नहीं आते। लेकिन उनके सपनों को पूरा करके उन्हें अपने दिल के करीब रखा जा सकता है। मैं जानता हूं पापा, आप हम लोगों से बेहद दूर चले चले गए हैं और आपकी कमी को कोई भी पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में हमारा फर्ज़ बनता है कि आपके आदर्शों और मूल्यों को सहेज कर रखा जाए। आपके ख्वाबों को सफलता का शिखर दिखाया जाए। बस अब ईश्वर से यही गुजारिश है कि मैं आपके अरमानों की कसौटी पर खरा उतर पाऊं और परिवार को भी उसी मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित कर पाऊं।
-आपका बेटा

नपुंशक बना देता है मधुमेह

मधुमेह या डायबिटीज का एक प्रभाव ऐसा भी है जिस पर अमूमन खुलकर चर्चा कम ही होती है। मधुमेह पर होने वाली कई गोष्ठियों में भी विशेषग्य अक्सर इस विषय ( सेक्स प्रभाव ) को छोड़ देते हैं। सच यह है कि असुविधाजनक चर्चा मानकर छोड़ दिए जाने से इस गंभीर नुक्सान के प्रति जागरूकता लाने का एक महत्वपूर्ण पहलू छूट जाता है। विशेषग्यों का मानना है कि मधुमेहग्रस्त स्त्रियों और पुरुषों में सेक्स संबंधी ऐसी शिथिलता आ जाती है जिसके कारण इच्छा होते हुए भी ऐसे मरीज सेक्स के प्रति अक्षम हो जाते हैं। अंग शिथिल पड़ जाते हैं । महिलाओं में योनि की तंत्रिकाओं व उसकी कोशिकाओं को इतना नुकसान पहुंचता है जिससे संसर्ग के वक्त होने वाला द्रव्य प्रवाह रुक जाता है। योनि मार्ग सूख जाता है जिससे संसर्ग काफी तकलीफदेह हो जाता है। नतीजे में मधुमेह के मरीजों में कामेच्छा ही मर जाती है। एक अध्ययन के मुताबिक लगभग ४० प्रतिशत मधुमेह पीड़ित महिलाओं में या कामेच्छा ही मर जाती है या सेक्स के प्रति उनकी रुचि ही खत्म हो जाती है। कोई कामोत्तेजना न होने या सेक्स की अक्षमता के कारण यौनांगों में कोई कामोत्मुक प्रतिक्रिया नहीं होती। कहने का अर्थ यह है कि ऐसा महिला मरीजों का पूरा सेक्स जीवन ही नष्ट हो जाता है।
इसी तरह पुरुषों में भी मधुमेह के कारण तंत्रिकाएं और रक्तवाहिनियां प्रभावित होती हैं। इस कारण वह नपुंशकता का शिकार हो जाता है। मधुमेह पुरुषों के शिश्न समेत पूरे शरीर के तंत्रिका तंत्र को नष्ट कर देता है। एक बार जब तंत्रिकाएं नष्ट हो जाती हैं तो वह बिल्कुल क्रियाशील नहीं रह जाती हैं। संपर्क या संसर्ग के वक्त इसी कारण पुरुषों को कोई उत्तेजना नहीं होती। सामान्य अर्थों में इसे यह कहा जा सकता है कि मन में उठी कामोत्तेजना शिश्न ( लिंग ) तक नहीं पहुंच पाती। मन उत्तेजित हो जाता है मगर यौनांग बेजान पड़े रहते हैं क्यों कि उनतक कामोत्तेजना को पहुंचाने वाली तंत्रिकाओं की क्रियाशीलता मधुमेह के कारण नष्ट हो चुकी रहती है। नपुंशकता की इस अवस्था में लगभग असहाय हो जाता है मधुमेह का मरीज। क्यों कि लिंग में वह तनाव या कड़ापन नही आ पाता जो सेक्स क्रिया को पूरा करने के लिए जरूरी होता है। यानी दो मुख्य घटनाएं होती हैं। पहला यह कि संवेदनाओं या कामेच्छा की सूचना यौनांगों तक नहीं पहुंच पाती और दूसरा यह कि रक्त कोशिकाओं में दोष के कारण लिंग में तनाव नहीं आता। स्त्रियों और पुरुषों में सेक्स की यह अधोगति तब आती है जब वे मधुमेह को नियंत्रित नहीं रख पाते। अगर मधुमेह पर कारगर नियंत्रण हो तो सेक्स संबंधी इन विकारों से बचा जा सकता है।
अब आइए समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे या किन रसायनों के कारण मधुमेह के मरीज नपुंशकता के शिकार हो जाते हैं। दरअसल जब मधुमेह को मरीज नियत्रित नहीं रख पाता है तो शरीर में सेक्स व अन्य क्रियाओं को संपन्न कराने वाले महत्वपूर्ण रसायन नाइट्रिक आक्साइड की कमी हो जाती है। इसके अभाव में शिश्न या लिंग में रक्त का दबाव नहीं बन पाता है। इस कारण सेक्स का कार्य करने के लायक बनाने वाला लिंग में भरने वाला खून बाहर निकल जाता है। जबकि उसे लिंग में रुकना चाहिए। इब रक्त का दबाव नहीं बनने से लिंग शिथिल पड़ा रह जाता है। यानी मधुमेह के मरीज में नाइट्रिक आक्साइड की कमी से रक्तवाहिनियां काफी संकरी और कड़ी हो जाती हैं। उनमें लचीलीपन कम हो जाता है। इसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। हृदयजनित बीमारियां भी इसी के कारण पैदा होती हैं। जब एथेरोस्क्लेरोसिस से वह धमनियां प्रभावित होती हैं जो लिंग में रक्त प्रवाहित करती हैं तो जाहिर तौरपर लिंग में बहुत कम रक्त जा पाता है नतीजे में शिश्न शिथिल ही पड़ा रह जाता है। जो सेक्स क्रिया के अयोग्य होता है। अगर मधुमेह को काबू में रखा जाए तो यह सब कुछ रोका या कम किया जा सकता है।

सेक्स क्षमता बनाए रखने के कुछ सुझाव

मधुमेह पीड़ित स्त्री व पुरुष इन विकारों को रोक सकते हैं। बस आप निम्न कुछ बातों को ध्यान में रखिए।

१- बेहिचक अपने चिकित्क से इस संबंझ में बात करिए। जब आप अपने डाक्टर से बात करेंगे तो कोई शर्म मत महसूस करिए क्यों कि आप जो बात डाक्टर को बता रहे हैं वह उसे पता है। वह जानता है कि मधुमेह के मरीज को यह परेशानी भी होती है। आप जैसे ही बात शुरू करेंगे उसकी भी आपके प्रति झिझक खत्म हो जाएगी। आपका डाक्टर बातचीत से ही तय कर पाएगा कि आपको यह समस्या क्यों है? यह मधुमेह से है या किसी अन्य कारण से ?

२- ब्लड सुगर को नियंत्रित रखिए। अगर लगातार ऐसा रखेंगे तो तंत्रिकाओं व रक्तवाहिनियों में वह गड़बड़ी नहीं आएगी जो सेक्स क्षमता को प्रभावित करती है।
३- मधुमेह के मरीज तंबाकू सेवन और धूम्रपान से बचें। धूम्रपान तो रक्त में नाइट्रिक आक्साइड के स्तर को घटा देता है। जो रक्तवाहिनियों को संकरा बनाकर उनमें रक्त प्रवाह को कम या बंद कर देता है।
४- अधिक शराब पीनें से बचें। यह मधुमेह पीड़ितों में सेक्स क्षमता को घटाता है और रक्तवाहिनियों को नुक्सान पहुंचाता है। अगर पीना जरूरी है तो पुरुष एक दिन में दो पैग और महिलाएं एक से ज्यादा न लें।
इन सब के पीछे सिर्फ यह एहतियात होनी चाहिए कि मधुमेहपीड़ित तंत्रिकाओं और रक्तवाहिनियों को नष्ट होने से बचाएं। और ऐसा सिर्फ जागरूक रहकर ही किया जा सकता है। अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें और सुगर को कभी बढ़ने नहीं दें।

साभार-- मेलाबिकडाटकाम

19.11.08

हाय रे, वादे भी नसीब नहीं...,

>>पंकज व्यास

ये विधानसभा के 2008 के चुनाव हो रहे हैं। अपने रतलाम में भी हो रहे हैं और उसके लिए जोरआजमाईश जारी है। सबके सब प्रदेश के गृह मंत्री हिम्मत कोठारी के पीछे पड़े हैं। चाहे कांग्रेस के प्रमोद गुगालिया हो, निर्दलीय प्रत्याशी पारस सकलेचा हो, बसपा के झालानी जी हो या फारवर्ड ब्लॉक के राष्ट्र pemi सुभाष अग्रवाल हो या कोई ओर... सबका कहना है कि हिम्मत कोठारी ने कुछ नहीं किया, कुछ नहीं किया 30 सालों में और हिम्मत कोठारी भी अपने कामों को बताने में लगे हैं कि मैंने ये किया वो किया... और आज बुधवार को बीजेपी का भोंपू भी गाड़ी में चित्कार, चित्कार कर कह रहा है कि आईए, देखने महलवाड़ा, हिम्मत कोठारी ने क्या विकास किया? सभा को संबोधित करने आ रहे हैं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह गुरुवार को शाम सात बजे। हर बार विधानसभा में अपन लोग सुनते हैं कि प्रत्याशी वादे करते हैं कि मैं ये कर दूंगा, वो कर दूंगा, अलां ..फलां... पर, पर, पर अबकी बार तो ·िसी सभा में ये सुनने को कम ही मिल रहे हैं। आश्वासन सुनने को कम मिल रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब कोई वादा नहीं बचा हो। अब तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। प्रतिस्पर्धा चल रही है, होना भी चाहिए, पर स्वच्छ प्रतिस्पर्धा का अभाव खलता है। सब ओर ये ही सुनाई देता है, उसने ये नहीं किया, वो नहीं किया, मैंने वो किया आदि-आदि पर कोई बता नहीं रहा खूद के बारे में कि वो जीत जाएंगे तो क्या करेंगे? कम से कम जनता को आश्वासनों के सहारे तो जीने दो, उसके जीने का सहारा मत छीनो, आश्वासन तो दो, आश्वासन से आशा का संचार होगा, आशा का संचार होगा तो आपको वोट मिलेंगे, आपको वोट मिलेंगे, भले ही जितने वादे करोंगे उतने पूरे न भी करों, तो भी क्या, शरमासरमी उनमें से कुछ तो पूरे करोंगे। पर, वादे ही नहीं करोंगे, आश्वासन हीं नहीं दोंगे तो फिर काहे की शरम। आप तो कह दोंगे कि हमने कोई कहा थोड़े ही था। आपको ऐसा नहीं लगता कि ने_ïूई आरोप-प्रत्यारोप से निकल कर प्रत्याशियों को अपनी कार्ययोजना को लोगों को बताना चाहिए कि वे जब चुनाव जीत जाएंगे, तो क्या करेंगे? अपनी कार्य योजना बतानी चाहिए। भाया, हमारे रतलाम के तो ये हाल हैं, आपके क्या हाल है?

भारतीय संस्कृति संसद में बच्चन के मधुकाव्य पर अभिनव आयोजन

प्रकाश चण्डालिया
कोलकाता। हरिवंश राय बच्चन के जन्मशती समारोह के अन्तर्गत संसद परिवार की ओर से आयोजित संगीतमय कार्यक्रम बच्चन का मधुकाव्य शहर के काव्यानुरागी श्रोताओं के लिए यादगार अनुष्ठान बन गया। खचाखच भरे सभागार में लोगों ने मधुशाला एंव अन्यान्य रचनाओं के माध्यम से भरपूर ज्ञानरंजन किया। हाला, प्याला, साकी और मधुशाला रुपी प्रतीकों के माध्यम से कवि के राष्ट्रदर्शन, भक्ति, श्रृंगार, वेदना व ऋतु सम्बन्धी रूबाइयों का प्रस्तुतीकरण विभिन्न रागों में किया गया। जिससे दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। इसके अलावा बच्चनजी की सुप्रसिद्ध कविताएं इस पार-उस पार एवं पथभ्रष्ट की आवृति की गई। मधुकाव्य से सम्बन्धित रोचक संस्मरण एवं बच्चन जी के जीवन से सम्बद्ध प्रेरक घटनाओं का भी जिक्र किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन, संयोजन संस्था के कर्मसचिव श्रीराम चमडिय़ा ने किया। काव्यपाठ आदि में अंशग्रहण किया सर्वश्री काशीप्रसाद खेरिया, गोविन्द फतेहपुरिया, श्यामसुन्दर बगडिय़ा, श्रीराम चमडिय़ा, राजगोपाल सुरेका, महेश लोधा, विजय झुनझुनवाला, विश्वनाथ केडिया, राजीव माहेश्वरी, प्रमोद शाह, केशव बिन्नानी, चंद्रशेखर लाखोटिया एवं सर्वश्रीमती डा. तारा दुगड़, चित्रा नेवटिया, नीता सिंघवी एवं विद्या भण्डारी ने।

औरत है तुझे औरत रहना है...



मनोज कुमार राठौर
घर-द्वारे तुझे है रहना
अत्याचार तुझे है सहना
औरत है तुझे औरत रहना है...

पहले पति की बात सुनना
फिर बेटे की हरकत पर रोना है
औरत है तुझे औरत रहना है...

कितनी तू आवाज उठाए
यही देश का रोना है
औरत है तुझे औरत रहना है...

लोग उठाये तुझ पर उंगली
स्वच्छ नदी सी बहना है
औरत है तुझे औरत रहना है...

तुझे जलाए लाख दबंगे
कष्टकारी पीड़ा सहना है
औरत है तुझे औरत रहना है...

तू ही कल का भविष्य बनाए
जब भी लोगों यह कहना है
औरत है तुझे औरत रहना है...

वैदिक विद्याओं के संपादक : महर्षि वेदव्यास



महर्षि वेदव्यासभगवान विष्णु के कालावतारमाने गए हैं। कलियुग में पाप के प्रबल और पुण्य के क्षीण होने से मनुष्य की आयु, बौद्धिक प्रतिभा एवं आध्यात्मिक शक्ति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडा है। आज संपूर्ण वैदिक ज्ञान रखने वाले पृथ्वी पर दुर्लभ हो गए हैं। वैदिक यज्ञों-अनुष्ठानों का लोप होता जा रहा है। सर्वज्ञ भगवान से यह बात छिपी नहीं थी, अत:जीवों के कल्याण के लिए स्वयं श्रीहरिद्वापरयुगके अंतिम चरण में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के पौत्र महर्षि पराशरके अंश से कैवर्तराजकी पोष्यपुत्रीसत्यवती के गर्भ द्वारा महर्षि व्यास के रूप में अवतरित हुए।
व्यासजीका जन्म द्वीप में होने से इनका नाम द्वैपायन पडा। श्यामवर्ण का शरीर होने से ये कृष्णद्वैपायन कहलाए। जन्म लेते ही इन्होंने अपनी माता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा प्रकट की। प्रारंभ में इनकी माता ने इन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया, किन्तु अन्त में माता के स्मरण करते ही तत्काल उनके पास आने का वचन देकर इन्होंने माँ की अनुमति प्राप्त कर ली। ये तप करने के लिए हिमालय चले गए और वहाँ नर-नारायण की साधनास्थलीबदरीवनमें तपस्या की। इससे इनकी बादरायण नाम से प्रसिद्धि हो गई।
महर्षि व्यास अलौकिक शक्ति-संपन्न महाविद्वानहैं। लोगों को आलसी, अल्पायु, मंदमतिऔर पापरतदेखकर इन्होंने वेद का विभाजन किया। मनुष्यों की धारणा-शक्ति को कमजोर होते देख व्यासजीने वेद को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद-इनचार भागों में विभाजित किया और एक-एक वैदिक संहिता अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढाई। उन्होंने पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद, जैमिनिको सामवेद तथा सुमन्तुको अथर्ववेदका संपूर्ण अध्ययन कराया। तत्पश्चात प्रत्येक संहिता की फिर अनेक शाखा-प्रशाखाएं हुई। इस प्रकार इन्हीं के द्वारा वैदिक वाङ्गमयका सम्पादन और विस्तार हुआ। व्यास का शाब्दिक अर्थ है विस्तार। वेदों का विस्तार इनके माध्यम से होने के कारण इनका नाम वेदव्यास पडा, जो कि इनके अन्य नामों की अपेक्षा सर्वाधिक लोकप्रिय भी है। समाज का कोई भी वर्ग वैदिक विद्याओं के ज्ञान से वंचित न रहे, इसलिए महर्षि वेदव्यासने महाभारत की रचना की। कहा जाता है कि स्वयं भगवान गणेश ने इस महान ग्रंथ को लिपिबद्ध किया था। इनके द्वारा प्रणीत महाभारत को मनीषी पंचम वेद मानते हैं। श्रीमद्भगवद्गीताइस महाभारत का ही अंश है। व्यासजीने महाभारत को सर्वप्रथम अपने पांचवें प्रमुख शिष्य लोमहर्षणजीको पढाया था।
वेदान्त-दर्शन के साथ अनादि पुराण को लुप्त होते देखकर श्रीवेदव्यासने अट्ठारह पुराणों का प्रणयन किया। उपनिषदों का सार-तत्व समझाने के लिए इन्होंने ब्रह्मसूत्र का निर्माण किया, जिनपर शंकराचार्य, वल्लभाचार्यआदि अनेक महाविद्वानोंने भाष्य-रचना कर अपना-अपना अलग मत स्थापित किया। व्यास-स्मृति के नाम से रचा हुआ इनका एक स्मृतिग्रंथभी उपलब्ध होता है। इस प्रकार भारतीय वाङ्गमयएवं हिन्दू संस्कृति पर वेदव्यासजीका बहुत बडा ऋण है। ये श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के प्रधान व्याख्याता हैं। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में इनका विशिष्ट योगदान है। व्यास-जन्मतिथि आषाढी पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा के रूप में महापर्वबन गई है, जिसे प्रतिवर्ष अत्यंत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ सनातन धर्मावलम्बी मनाते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा को सुदृढ बनाने के उद्देश्य से व्यास-पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
संसार को श्रीमद्भगवद्गीताजैसा अनुपम आध्यात्मिक रत्न श्रीवेदव्यासकी कृपा से ही प्राप्त हुआ। इन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण के उस अमर उपदेश को अपनी महाभारत में ग्रंथित कर उसे संपूर्ण विश्व के लिए सुलभ बना दिया। प्राणियों के कल्याण की कामना से भक्ति-रस के सागर को महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराणके 18हजार श्लोकों में बांध दिया है।
दिव्य तेज, असीम शक्ति एवं असाधारण गुणों से संपन्न महर्षि व्यास को मनीषियोंने त्रिदेवोंकी समकक्षताप्रदान की है-
अचतुर्वदनोब्रह्मा द्विबाहुपरोहरि:।
अभाललोचन:शम्भुर्भगवान्बदरायण:॥
श्रीव्यासदेव चतुर्मुख न होते हुए भी ब्रह्मा, दो भुजाओं वाले होते हुए भी दूसरे विष्णु तथा त्रिनेत्रधारीन होने पर भी साक्षात् शिव ही हैं।
इसीलिए इनकी स्तुति में यह कहा गया है-
नमोऽस्तुतेव्यास विशालबुद्धे
फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।
येन त्वयाभारततैलपूर्ण:
प्रज्वालितो ज्ञानमय: प्रदीप:॥
खिले हुए कमल की पंखुडी के समान बडे-बडे नेत्रों वाले महाबुद्धिमानव्यासदेव!आपने अपने महाभारतरूपीतेल के द्वारा दिव्य ज्ञानमय दीपक को प्रकाशित किया है, आपको नमस्कार है।
वस्तुत:वेद भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, आचार-विचार, रीति-नीति, विज्ञान-कला आदि सभी कुछ वेद से ही अनुप्राणित है। हमारे जीवन और साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसका बीज वेद में न मिले। सही मायनों में वेद हमारी सभ्यता की आधारभूमिहै। महर्षि वेदव्यासने वेद के विभाजन का युगान्तकारीकार्य करके इस अथाह ज्ञान-राशि को लोकहित में संपादित कर दिया। महाभारत के माध्यम से वेदांशसमाज के सभी वर्गो तक पहुँचाया। ऐसे अवतारीमहापुरुष का अवतरण-दिवस सबके लिए गुरु पूर्णिमा के रूप में सत्प्रेरणाका महापर्वबन गया है।

क्या वाकई में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ?


बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात आ रही थी की क्या वाकई में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ? खैर सबसे पहले सभी भडासी भाइयों को बंडमरु का नमस्कार । देर से ही सही दुरुस्त आए तो काफी आच्छा होता है काफी दिनों बाद आ रहा हूँ मैं । तो मै आपनी बात पर आता हूँ की क्या वाकई में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ? कहानी कुछ यु शुरू होती है मैं अपने ऑफिस में काम कर रहा था की मेरे सर आए और कुछ बडबडाते हुए से आए । और कहने लगे की सभी जगह एक ही हाल है हर बड़ी मछली छोटी मछली को खाने के लिए आतुर होती है । चुकी हमारे वो बॉस है मैं उनसे कुछ पूछ नही सकता लेकिन बातचीत से लगा की उनके बॉस ने उनको दे दिया है खाने पिने भर ........ हालाँकि वो भी यानि मेरे बॉस भी कुछ कम नही है लेकिन अपने पर बीतती है तब इसका आभास होता है। इधर कुछ महीनो से मैं आपने कार्यक्रम में ब्यस्त था हम लोग भोजपुर जिले में एक कार्यक्रम करते है भोजपुर बल महोत्सव जिसमे पुरे जिले से ५००० से ७००० बच्चें भाग लेतें हैं । यह कार्यक्रम जिले स्तर का प्रतियोगिता होता है। इसी कार्यक्रम में ब्यस्त होने के करण मैं ब्लॉग पर नही आ सका। इस कार्य क्रम में मैं और मेरे तिन दोस्तों के सात भी वही हुआ । इस कार्य क्रम को कराने वाली संस्था में मै भी एक आदना सा सदस्य हूँ।खैर मैं अपने ऑफिस में अपने सहकर्मी से इस बाबत बात किया की वाकई में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ? तो उसने कहा की बड़ी मछली को आजकल सोचना पड़ सकता है छोटी मछली को निगलने के लिए । वो पुराने ज़माने की बात है जब बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती थी।अब देखते है आप लोगो की क्या राय हैं ।

स्कूली बच्चों को पोर्न, ड्रग्स, शराब का चस्का


स्कूली बच्चों को पोर्न, ड्रग्स, शराब का चस्का


बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से वक्त से पहले ही बड़े होने लगे हैं, इसे पश्चिमी सभ्यता का असर कहें या फिर तथाकथित आधुनिकता की दौड़, दिल्ली के कई टॉप स्कूलों के बच्चे, लड़के हो या लड़कियां पोर्न (अश्लील) फिल्में देखने, ड्रग्स लेने और शराब पीने के मामले में बिल्कुल नहीं झिझकते हैं।लड़कियों से आगे लड़केएक निजी हैल्थकेयर कंपनी के प्रमुख मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख द्वारा किए एक सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक पोर्न साइट देखने और उसे लेकर स्कूल में बातचीत करने के संबंध में 26 फीसदी लड़के मॉड्रेट जबकि 21 फीसदी हाई कैटेगरी में दर्ज हुए।करीब 24 फीसदी लड़कियां मॉड्रेट जबकि 5 फीसदी हाई कैटेगरी में दर्ज हरुई। यह सर्वे दिल्ली के टॉप स्कूलों के एक हजार बच्चों (541 लड़के और 429 लड़कियों) पर किया गया। सर्वे में ज्यादातर लड़के-लड़कियों ने उन वेब साइट्स को विजिट करने की बात भी कबूली जो उनकी उम्र के लिए बनी ही नहीं थीं।शराब पीना खुलकर कबूलाइन बच्चों के बीच कभी कभार स्कूल में होने वाली पार्टियों में ड्रग्स का सेवन भी होता रहा है। करीब 36 फीसदी बच्चों ने पार्टियों में ड्रग्स लेने की बात कही। इनमें 23 फीसदी लड़के और 13 फीसदी लड़कियां शामिल थीं। शराब पीने के मामले में 22 फीसदी लड़के माड्रेट जबकि 16 फीसदी हाई कैटेगरी में दर्ज हुए। करीब 60 फीसदी बच्चों ने शराब का सेवन करने की बात खुलकर कही। सर्वे में शामिल 13 से 17 वर्ष आयु वर्ग के ये बच्चे स्कूली परिसर में ही धूम्रपान करने में भी पीछे नहीं थे।


sanjay sen sagar

तुम्हारे बिखराए हुए शब्द.....!!


baat puraani hai
हम सब एक साथ ही पुराने भी हैं,और नए भी....शरीर से नए...मगर मान्यताओं से पुराने...समय के साथ थोडा नए होते जाते... शरीर से थोड़ा पुराने होता जाते...बाबा आदम जमाने की रुदिवादिताएं भी हममे हैं..और सभ्य भी हम...हम क्या हैं..हम क्यूँ हैं...हम कौन हैं...हमारे वुजूद का मतलब क्या है...??हम कभी भी विचार नहीं करते...नहीं करते ना....!!

Tuesday, November 18, 2008
तुम्हारे बिखराए हुए शब्द....!!




तुम्हारे बिखराए हुए शब्दों के कणों को चुन रहा था मैं...
जो जमी में बेतरतीब थे धूल से सने हुए.....
बड़े प्यार से मैंने उन्हें उठाया वहां से...
हल्का-हल्का झाडा-पोंछा उन्हें...
और थोड़ा थपथपाया...
तभी तो उनका रूप निखर-कर
ऐसा सामने आया......
जमीं पे जब देखा था उन्हें..
कुछ चमकती हुई-सी वस्तू-से लगे थे..
हाथ में जब लिया,तब लगा...
अरे ये तो मोती हैं...
फिर बाहर नहीं छोडा उन्हें...
दिल के भीतर रखकर घर ले आया...
और अब उनका दीदार कैसे कराऊँ...
वो तो अब मेरे मन को मथ रहे हैं...
वो अब मेरी रूह को जज्ब कर रहे हैं....!!

18.11.08

हाईटेक हुआ चुनाव प्रचार

www.parkhinazar.blogspot.com

मनोज कुमार राठौर

राजनीति पार्टियां चुनावी माहौल में वोट बाटौरने के लिए प्रचार के नये-नये हथकंडे अपना रही है। भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा जैसी पार्टियों ने चुनाव प्रचार के लिए हाईटेक तरीका अपनाया है। यह सभी पार्टियां मोबाईल, इंटरनेट, प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक चैनलों के आलावा बोथलाइन(दो और चार पहिया वाहनों पर रात व दिन में से रात और दिन में) प्रचार कर रही है। स्वतंत्रता के दौरान हमारे राजनेताओं को प्रचार की एहमियत का पता नहीं था। हमारे देश में जैसे-जैसे विकास की गंगा बहती गई, वैसे-वैसे राजनेताओं ने प्रचार के तौर-तरीके भी सीखें। आज हमारा देश चहूमुखी विकास कर रहा है और इस विकास के साथ राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव के तरीकों में भी बदलाव किया। पहले जहां पार्टी चुनाव के प्रचार के लिए आम सभा का आयोजन रखती थी जिसमें लाखों लोग सिरकत भी करते थे। साईकिल, तांगे और बैलगाड़ियों से भी प्रचार किया जाता था लेकिन आज हवाई जहाज और चार पहिया वाहनों से प्रसार-प्रचार किया जा रहा है। मध्यप्रदेश के स्टार प्रचारक शिवराज सिंह, बसपा प्रमुख मायावती और भाजशा की राष्ट्रीय अध्यक्ष उमा भारती भी हवाई जहाज से चुनाव प्रचार कर रहे हैं। अमेरीका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार-प्रचार तरीकों को भारतीय राजनीति में अपनाया जा रहा है। जहां दोनों दावेदारों ने डिजिटल मीडिया जैसे यू ट्यूब, ब्लाॅग, सोषियल नेटवर्क, आनॅलाइन पेटिषन्स, आॅनलाइन गु्रप्त, ई-मेल आदि का चुनाव प्रचार के लिए जमकर प्रयोग किया। भारतीय राजनीति पार्टियों में भाजपा ही इन हाईटेक संचार माध्यम का प्रयोग कर रहे हंै। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी बीमारी के कारण भाजपा का प्रचार-प्रसार करने में असमर्थ हैं, उनकी इस कमी को पूरा करने के लिए भाजपा ने उनके भाषण की एक सीडी बनाई और उसकी के माध्यम से चुनाव प्रचार कर रहे हैं। अपने प्रचार-प्रसार के लिए पार्टियां बड़ी-बड़ी विज्ञापन एजेंसी के शरण में जा रही हंै। हाईटेक प्रचार के लिए पार्टी अरबों रुपए खर्च कर देती है। यह धन चुनाव के वक्त तो पार्टियां लगा देती हंै लेकिन चुनाव जीतने के दौरान पलभर में वसूल भी कर लेती है। यही अरबों रुपए यदि देष के विकास कार्यों में लगाया तो शायद हमारे देश को अर्थव्यवस्था सुदृढ़ प्राप्त होगी । http://www.parkhinazar.blogspot.com/

सतत् यायावर स्वामी रामतीर्थ



पंजाब के मुरलीवालाग्राम के निवासी पण्डित हीरानंदके परिवार में सन् 1873ई.में दीवाली के दिन एक पुत्ररत्नकी प्राप्ति होती है। नाम रखा जाता है तीरथराम।शिशु-जन्म के कुछ दिन बाद माता का देहान्त। शिशु के पालन-पोषण का भार उसकी बुआ पर। बालक तीरथशैशवकाल से ही कृशकाय।पांच वर्ष की आयु में विद्यारंभ। प्राथमिक स्तर पर फारसी की शिक्षा। 10वर्ष की आयु तक प्राथमिक शिक्षा पूरी हो जाती है। इसी आयु में विवाह। आगे की पढाई के लिए बालक तीरथरामगुजरांवालाजाता है। वहां पंडित हीरानन्दके मित्र धन्नारामका निवास-स्थान। उन्हीं के यहां रहकर तीरथरामकी पढाई। 14वर्ष की आयु में तीरथराममैट्रिक परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त करता है। पुरस्कार स्वरूप उसे राज्य की ओर से छात्रवृत्ति। आगे की पढाई के लिए तीरथरामलाहौर जाता है। पिता की वित्तीय स्थिति चिन्तनीय। वे तीरथको आगे पढाने में असमर्थ। तीरथछात्रवृत्ति के सहारे ही आगे पढने का निर्णय लेता है। अध्ययन क्रम में अनेक व्यवधान। तीरथअपनी संकल्प-शक्ति के सहारे सारी विघ्न-बाधाओं को पार कर जाता है। वह इण्टरमीडिएट परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करता है। उसे पुन:छात्रवृत्ति मिलती है। एक ओर तो शैक्षिक सफलता का यह क्रम, दूसरी ओर भीषण परिस्थितियां तीरथरामके धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा लेने के लिए और अधिक आतुर। पिता जी तीरथरामकी पत्नी को उसके पास छोड जाते हैं। कहां तो अपना ही ठिकाना नहीं, कहां एक और प्राणी के योगक्षेम के वहन की समस्या। कभी-कभी तो इस दम्पति को निराहारतक रह जाना पडता है। तीरथरामनंगे पांव विद्यालय जाता है। बीएकी परीक्षा में संस्कृत और फारसी विषयों में तीरथको उच्चांक मिलते हैं पर अंग्रेजी में वह अनुत्तीर्ण हो जाता है। अत:पूरी परीक्षा में अनुत्तीर्ण। अब क्या किया जाय? कहीं से कोई सहारा नहीं। इसी घोर अंधकार में आशा का एक दीप टिमटिमाता है। झंडूमलनाम का एक मिठाई वाला है। वह तीरथरामके परिवार के भोजन,आवास आदि की व्यवस्था करता है। इससे तीरथराममें थोडा आत्मविश्वास जगता है। वह पूरी शक्ति लगाकर परीक्षा की तैयारी करता है और अगले वर्ष पूरे विश्वविद्यालय में बीएकी परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करता है। उसे पुन:छात्रवृत्ति मिलती है। तीरथरामकी आयु 19वर्ष है। तीरथरामलाहौर विश्वविद्यालय से ही गणित विषय में परास्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करता है। तीरथरामजीविकोपार्जन हेतु सियालकोटमें अमेरिकन मिशन द्वारा संचालित एक विद्यालय में शिक्षण-कार्य प्रारम्भ करता है। वेतन होता है 80रुपये प्रतिमाह। इसी क्रम में वह दो पुत्रों का पिता हो जाता है। पुत्रों के नाम हैं, मदन गोस्वामी और ब्रह्मानन्द। परिवार के बन्धनों और जीविकोपार्जन की बाध्यताओं से तीरथरामका मन क्रमश:उचटने लगता है। उसकी व्याकुलता दिनों-दिन बढती जाती है।
अंतत:25वर्ष की आयु में नौकरी-चाकरी, घर परिवार छोडकर तीरथरामऋषिकेश के पास ब्रह्मपुरी में निवास करने लगता है। ऐसी लोकमान्यताहै कि इसी स्थान पर तीरथरामको दिव्य-ज्ञान की प्राप्ति होती है। 28वर्ष की अवस्था में तीरथरामएक नया व्यक्तित्व ग्रहण करते हैं। वे तीरथरामसे स्वामी रामतीर्थ हो जाते हैं। वे परम्परागत संन्यास की सीमाओं में बंधना नहीं चाहते हैं। बस, शिखा और सूत्र गंगा जी में फेंककर संन्यास-भाव में आ जाते हैं। टेहरीके महराज ज्ञानाभासे प्रभावित होकर आपको देश-विदेश की यात्रा हेतु प्रेरित करते हैं। स्वामी रामतीर्थ जापान एवं अमेरिका की यात्रा करते हैं। इन देशों में वे लोगों को भारत के औपनिषदिक ज्ञान की झलक दिखाते हैं।
अमेरिका में उनका प्रवास लगभग दो वर्षो
तक रहता है। विदेश-यात्रा से लौटकर महाराज
टेहरीके विशेष आग्रह पर स्वामी रामतीर्थ टेहरीराज्य में गंगा जी के किनारे एक कुटी में निवास करने लगते हैं। एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्वामी रामतीर्थ गंगा-स्नान हेतु जाते हैं। स्नान क्रम में वे आगे ही बढते जाते हैं। अचानक वे एक भंवर में फंस जाते हैं और वहीं उनकी जलसमाधि बन जाती है। यह घटना 1906की है। इस समय स्वामी जी की आयु मात्र 33वर्ष है। स्वामी जी फारसी, संस्कृत और हिंदी के अच्छे कवि थे।
डा. वंशीधर त्रिपाठी

अल्फाजों मे वो दम कहा

संजय सेन सागर की यानि मेरी एक अधूरी सी कविता आपके लिए इस बादे के साथ की कल यह अधूरी कविता पूरी होगी यही पर भड़ास पर और मेरे ब्लॉग पर !यार अभी मैं कैफे मे हूँ और पूरी कविता दिमाग से निकल गयी है और कल तक रुक नहीं सकता सो अभी आधी ही सुन लो लो हां भैया कल सबको आना है.....तो तब तक के लिए देखते रहिये भड़ास और हिन्दुस्तान का दर्द [www.yaadonkaaaina.blogspot.com]


अल्फ़ाज़ों मैं वो दम कहाँ जो बया करे शख़्सियत हमारी,
रूबरू होना है तो आगोश मैं आना होगा ,
यूँ देखने भर से नशा नहीं होता जान लो साकी,
हम इक ज़ाम हैं हमें होंठो से लगाना होगा.

हमारी आह से पानी मे भी अंगारे दहक जाते हैं,
हमसे मिलकर मुर्दों के भी दिल धड़क जाते हैं,
गुस्ताख़ी मत करना हमसे दिल लगाने की साकी,
हमारी नज़रों से टकराकर मय के प्याले चटक जाते

जब हमसे कोई जुदा होता है तो जैसे मछलियाँ पानी से जुदा हो जाती है
हमारी याद मे ये हवा भी जल जाती है
हमें मिटाने की बेकार कोशिश ना करो तुम ,
क्यों की जब हम दफ़न होते हैतो ये जमी भी पिघल जाती है!!
संजय सेन सागर

भड़ास के बच्चे ने कायम किया रिकार्ड, बन गया गबरू जवान

भड़ास से प्रेरित होकर पांच महीने पहले जब भड़ास4मीडिया शुरू किया था तो मुझे कतई नहीं पता था कि पांच महीनों में ही यह बच्चा कमाल करने वाला है और एकाएक किशोर होकर नौजवान बन जाएगा। पर यह करिश्मा हो चुका है। मेरी तरह आपको भी यकीन नहीं हो रहा होगा लेकिन जो आंकड़े मिले हैं उसके मुताबिक पांच महीनों में बिना किसी प्रचार अभियान के 12 लाख पेज हिट्स पाने वाला पहला हिंदी पोर्टल बन चुका है भड़ास4मीडिया। भड़ास4मीडिया को लेकर कई सारी बातें जो मन में थीं, उसे लिख डाला है। इस मौके पर दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लाग भड़ास के सदस्य साथियों और इसके पाठकों से भी अनुरोध करुंगा कि वो कामयाबी के जश्न में शामिल होने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ें और अपने विचार यहां कमेंट के रूप में रखें। इस मौके पर मैं भड़ास के उन दर्जनों साथियों को याद करना चाहूंगा जिनके शुरुआती साथ और समर्थन के चलते भड़ास यहां तक पहुंचा और इसी के कारण भड़ास4मीडिया पैदा हुआ और बढ़ा। अगर कोई नाम छूट रहा हो तो मुझे माफ करेंगे.....ये साथी लोग हैं....रवि रतलामी, अविनाश दास, डा. रुपेश श्रीवास्तव, मनीष राज, रजनीश के झा, अंकित माथुर, विकास मिश्रा, रियाज हाशमी, दिवंगत अनिल सिन्हा, डा. मांधाता सिंह, डा. सुभाष भदौरिया, हृदयेंद्र प्रताप सिंह, सचिन श्रीवास्तव, हरेप्रकाश उपाध्याय, पंडित सुरेश नीरव, गोपाल राय, रंजन श्रीवास्तव, मनीषा दीदी, विनीत उत्पल, विनीत कुमार आदि आदि.....।

कई नाम छूट गए हैं, मुझे यकीन ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास भी है। इस मौके पर अगर हम सब मिलकर पुराने नामों को यहां याद करें, नीचे कमेंट के रूप में लिखकर तो एक बार फिर यादें ताजा हो जाएंगी। मुझे जितने नाम तुरंत याद आए, लिख दिया। अब अंकित माथुर जी से चाहूंगा कि वो जरूर पुराने लोगों को याद कर उनके नाम यहां दर्ज कराएं। उपरोक्त जो नाम दिए गए हैं उसमें से ढेर सारी साथी न सिर्फ भड़ास से दूर हो चुके हैं बल्कि उनमें से कुछ से विभिन्न वजहों से मेरी बोलचाल भी बंद है। कुछ से तो हम लोगों ने घोषित तौर पर आनलाइन जंग भी की हुई है। बावजूद इसके, उनका नाम ससम्मान लेना चाहूंगा क्योंकि किसी ने आपके साथ अगर कभी रत्ती भर भी बड़प्पन दिखाया हो तो आपका फर्ज बनता है कि उस बड़प्पन को हर उस सफलता के पड़ाव पर पहुंचने के बाद याद करिए जहां कारवां के साथ होने के नाते आ सकने का बोध रहता हो। ये अलग बात है कि कारवां चलता रहता है और उस कारवां में किसी मोड़ पर शामिल हुए लोग अपनी सीमा व सामर्थ्य के अनुसार एक हद तक ही साथ चलकर अलग राह पर चले जाते हैं।

नए लोगों में कई लोग अब भड़ास की पहचान और जान बन चुके हैं जिनका नाम यहां लेने की इसलिए कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनके लिखे पोस्ट हम लोग हफ्ते में जरूर एकाध बार पढ़ लेते हैं।

तो चलिए, भड़ास के बच्चे की सफलता का जश्न मनाएं...... चिकन तंदूरी के साथ....चीयर्स....मेरे जैसे तामसिक भड़ासियों के लिए और डा. रूपेश जैसे सात्विक भड़ासियों के लिए पूड़ी तरकारी और कई हंड़िया खीर।

तो लीजिए भड़ास4मीडिया की सफलता से जुड़ा आलेख पढ़िए, लिंक यह है....

http://www.bhadas4media.com/index.php/kahin/32-kahin/704-editorial

और हां, भड़ासियों की जुटान का सपना अभी तक सपना ही बना हुआ है। इसे मूर्त रूप देने के लिए योजना कई बार बनाई गई लेकिन आर्थिक तंगी आड़े आती रही। लेकिन दुख भरे दिन बीते रे भइया....के अंदाज में जल्द ही जरूर हम लोग मिलकर भड़ासी कोरस गाने के लिए एक आयोजन दिल्ली में करेंगे। फिलहाल तो आप सभी के साथ खुशी शेयर करके खुश हो रहा हूं.....।

जय भड़ास
यशवंत


(एक अपील मैं आप लोगों से करना चाहूंगा कि आप लोग अपने अपने ब्लागों पर भड़ास4मीडिया का विजुअल लिंक डाल दें तो इससे भड़ास4मीडिया को काफी प्रोत्साहन मिलेगा। इसके लिए उपर बाईं तरफ लिखे Media ka Baap के लिंक के ठीक नीचे लगे भड़ास4मीडिया के लोगो की पिक्चर को अपने डेस्कटाप पर सेव एज कर लें और उसे अपने ब्लाग के लेआउट में जाकर न्यू गैजेट्स में पिक्चर लगाने के आप्शन में लोड कर उसमें भड़ास4मीडिया के यूआरएल http://www.bhadas4media.com/ का लिंक दे दें। अगर इस काम में किसी को कोई दिक्कत आती है तो वो मुझसे 09999330099 पर फोन करके संपर्क कर सकता है। आपका इतना सहयोग भड़ास4मीडिया के लिए एक बड़ा सपोर्ट होगा। आपका ब्लाग चाहे छोटा हो या बड़ा, रोज अपडेट करतें हों या कभी-कभार, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है आपके अपने ब्लाग के एक कोने पर भड़ास4मीडिया का साधिकार मौजूद होना। इससे जाहिर होगा कि आपके दिल में रहने वाला भड़ास4मीडिया वहां से निकल कर आपके ब्लाग पर भी प्रकट हो चुका है।)

चिंताएं.....हमारा अंत हैं.....!!




चिंताएं ....हमारा अंत हैं......!!



baat puraani hai
हम सब एक साथ ही पुराने भी हैं,और नए भी....शरीर से नए...मगर मान्यताओं से पुराने...समय के साथ थोडा नए होते जाते... शरीर से थोड़ा पुराने होता जाते...बाबा आदम जमाने की रुदिवादिताएं भी हममे हैं..और सभ्य भी हम...हम क्या हैं..हम क्यूँ हैं...हम कौन हैं...हमारे वुजूद का मतलब क्या है...??हम कभी भी विचार नहीं करते...नहीं करते ना....!!


चिनाताएं...हमारा अंत हैं.....!!




चिंताएं...एक लम्बी यात्रा है....अंतहीन....
चिंताएं....एक फैला आकाश है....असीम.....
चिंताएं....हमारे होने का इक बोध है.....
चिंताएं....हमारे अंहकार का प्रश्न भी...
चिताएं...कभी दूर नहीं होती हमसे....
...हमारे कामों से ही शुरू होती हैं....
हमारी अनंत....अंतहीन...चिंताएं....और.
हमारे बुझे-बुझे कामों के बर-अक्स...
हरी-भरी होती जाती है हमारी चिंताएं....
एक काम ख़त्म...तो दूसरा शुरू....
दूसरा ख़त्म...तो तीसरा....
दरअसल.......
हमारे काम कभी ख़त्म नहीं होते....
इसके एवज में....
चिंताएं भी खरीद ली जाती हैं.....
चिंताएं हमारी कैद है...हमारा फैलाव भी....
चिंताएं हमारा समाज है..हमारा एकांत भी....
चिंताएं हमारा अहसास हैं....और...
हमारी जिन्दगी के लिए पिशाच भी....
चिंताएं प्रश्न है...और उसका उत्तर भी....
चिंताएं इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं...
कि हम कुछ नहीं कर सकते चिंता के सिवा...
और जिसे हम अपना किया हुआ समझते हैं...
होता है कोई और ही वो हमसे करवा....
मजा ये कि मानते हैं हम....
उसे अपना ही किया हुआ....!!
उसी से तो निकलती हैं...हमारी चिंताएं....
और हमें जलाती भी हैं...बुझाती भी....
.....चिंताओं में अगर...गहरा जायें हम....
तब जान सकते हैं हम.....
अपने अस्तित्व का भ्रम...
हमारे होने की अनुपयोगिता.....
और................
हमारी चिंताओं की असमर्थता....
हमारे हाथ-पैर मारने की व्यर्थता....
और हमारे तमाम दर्शन का पागलपन....
बेशक हमारा कार्य हमारा धर्म है.....
दरअसल..........
दूर आसमान में एक खूंटा बंधा है....
उस खूंटे से अगरचे हम.....
अपनी चिंताओं को बाँध सकें....
तो ही आजाद हो सकते हैं......
अपनी चिंताओं के कैदखाने से हम........!!

17.11.08

एक था बचपन.....!!




एक था बचपन....बड़ा ही शरारती....बड़ा ही नटखट....,
वह बड़ों को करता था.....बार-बार ही डिस्टर्ब.....,
और छोटों से करता था...हर वक्त ही मारधाड़....,
वो कुछ काम तो...करता भी नहीं था....,
खेलता ही रहता था.....हर वक्त....,
कभी ये तोडा...तो कभी वो.....,
और कभी-कभी तो...,
हाथ-पैर तक तुड़वा बैठता था....
खेल-खेल में ही बचपन...
तो कभी कुछ जला भी लेता था...
अनजाने में ही बचपन.....!!
बचपन तो किसी की कुछ.....
सुनता भी तो नहीं था.....
बस अपनी ही चलाता रहता था....!!
मम्मी की डांट खाता तो....
सहम-सहम-सा जाता था बचपन....
और पापा मारते थे तो....
सुबकने लगता था बचपन.....
मगर अगले कुछ ही सेकेंडों में...
सब कुछ भूल भी जाता था...वो...
मम्मी के गालों की पप्पी लेता...
और पापा के गले में झूल जाता था बचपन....
सब कुछ तो क्षण-भर में ही भूल जाता था वो...
मम्मी की डांट...और पापा की मार...
और बदले में उन्हें देता था...अपना...
मीठा-मीठा दुलार...तुतलाया हुआ प्यार...!!
और भी इक ख़ास बात थी उस बचपन की...
कि हर इक बात पर हैरान जाता था बचपन...
बन्दर के चिचियाने से...घोडे के हिनहिनाने से...
मेढक के फुदकने से...और मछली के तैरने से....
वो कहीं भी बिना बताये ही चला जाता था.....
सब उसे पुकारते ही रह जाते थे....
और उसके कुछ भी ना सुनने पर....
आँखे तरेर कर उसे देखा करते...
और वो अनदेखा-सा कर...
अपनी ही मनमानियां करता जाता....
ऐसा था भाई...वो अलबेला-सा बचपन...!!
बचपन की बातें ख़त्म.....
और बड़ों की शुरू...
बड़ों के बारे में बस इतना ही...
कि जिन्दगी बचाई जा सकती थी.....
अगरचे....
बचा कर रख लिया जाता....
जिन्दगी में थोडा-सा बचपन....!!

मेरा बचपन......

साथियों १४ नवम्बर बीत चूका है जिसे हम सभी "बाल दिवस" के नाम से जानते हैं बचपन से आज तक मैंने जिस बचपन को अपने आस पास जिया है उसको अपनी इन पंक्तियों में बताने की कोशिश की है शायद इससे मै उन बच्चों की आवाज़ को उठा सकूँ जिनको पता ही नहीं की बचपन होता क्या है और बाल दिवस क्यूँ मनाया जाता है.
मेरा बचपन
फुटपाथों पर गुब्बारे बेचता मेरा बचपन,
भूख मिटने को भीख मांगता मेरा बचपन,
सड़कों पर फिरता करता बूट्पोलिश मेरा बचपन,
कूड़े के ढेरों पर कबाड़ उठता मेरा बचपन,
साहूकारों के गोदामों में बोझ उठता मेरा बचपन,
सेठों के घरों में झाडू पोंछा करता मेरा बचपन,
रातों को रोता रहता भूखा सोता मेरा बचपन,
टूटे पत्तों जैसा हवा में उड़ता मेरा बचपन,
इक रात जो सोया जाने कहाँ खो गया मेरा बचपन,
आंख खुली तो देखा मैंने बीत चूका था मेरा जीवन...

सच्चा आध्यात्मिक नायक स्वामी विवेकानंद


स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के एक क्रांतिकारी संत हुए हैं। 12जनवरी, 1863को कलकत्ता में जन्मे इस युवा संन्यासी के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था। इन्होंने अपने बचपन में ही परमात्मा को जानने की तीव्र जिज्ञासावशतलाश आरंभ कर दी। इसी क्रम में सन् 1881में प्रथम बार रामकृष्ण परमहंस से भेंट की और उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया तथा अध्यात्म-यात्रा पर चल पडे। काली मां के अनन्य भक्त स्वामी विवेकानंद ने आगे चलकर अद्वैत वेदांत के आधार पर सारे जगत को आत्म-रूप जताया और कहा कि आत्मा को हम देख नहीं सकते किंतु अनुभव कर सकते हैं। यह आत्मा जगत के सर्वाश में व्याप्त है। सारे जगत का जन्म उसी से होता है, फिर वह उसी में विलीन हो जाता है। उन्होंने धर्म को मनुष्य, समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए स्वीकार किया और कहा कि धर्म मनुष्य के लिए है,मनुष्य धर्म के लिए नहीं। भारतीय जन के लिए, विशेषकर युवाओं के लिए उन का नारा था -उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक रुको मत।
31मई, 1883को वह अमेरिका गए।
11सितंबर, 1883में शिकागोके विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित होकर अपने संबोधन में सबको भाइयो और बहनोकह कर संबोधित किया।
इस आत्मीय संबोधन पर मुग्ध होकर सब बडी देर तक तालियां बजाते रहे। वहीं उन्होंने शून्य को ब्रह्म सिद्ध किया और भारतीय धर्म दर्शन अद्वैत वेदांत की श्रेष्ठता का डंका बजाया, उनका कहना था कि आत्मा से पृथक करके जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु से प्रेम करते हैं, तो उसका फल शोक या दु:ख होता है।
अत:हमें सभी वस्तुओं का उपयोग उन्हें आत्मा के अंतर्गत मान कर करना चाहिए या आत्म-स्वरूप मान कर करना चाहिए ताकि हमें कष्ट या दु:ख न हो। अमेरिका में चार वर्ष रहकर वह धर्म-प्रचार करते रहे तथा 1887में भारत लौट आए। फिर बाद में 18नवंबर,1896 को लंदन में अपने एक व्याख्यान में कहा था, मनुष्य जितना स्वार्थी होता है, उतना ही अनैतिक भी होता है।
उनका स्पष्ट संकेत अंग्रेजों के लिए था, किंतु आज यह कथन भारतीय समाज के लिए भी कितना अधिक सत्य सिद्ध हो रहा है? स्वामी विवेकानंद ने धर्म को मात्र कर्मकांड की निर्जीव क्रियाओं से निकाल कर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में लगाने पर बल दिया। वह सच्चे मानवतावादी संत थे। अत:उन्होंने मनुष्य और उसके उत्थान और कल्याण को सर्वोपरि माना। इस धरातल पर सभी मानवों और उनके विश्वासों का महत्व देते हुए धार्मिक जड सिद्धांतों तथा सांप्रदायिक भेदभाव को मिटाने के आग्रह किए।
युवाओं के लिए उनका कहना था कि पहले अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाओ, मैदान में जाकर खेलो, कसरत करो ताकि स्वस्थ-पुष्ट शरीर से धर्म-अध्यात्म ग्रंथों में बताए आदर्शो में आचरण कर सको। आज जरूरत है ताकत और आत्म विश्वास की, आप में होनी चाहिए फौलादी शक्ति और अदम्य मनोबल।
विवेकानंद ने शिक्षा को अध्यात्म से जोड कर कहा कि जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। हमें तो ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढे, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खडा हो सके।
पराधीन भारतीय समाज को उन्होंने स्वार्थ, प्रमाद व कायरता की नींद से झकझोर कर जगाया और कहा कि मैं एक हजार बार सहर्ष नरक में जाने को तैयार हूं यदि इससे अपने देशवासियों का जीवन-स्तर थोडा-सा भी उठा सकूं।
इस प्रकार एक सच्चे भारतीय संत की मर्यादा के अनुरूप स्वामी विवेकानंद ने अशिक्षा, अज्ञान, गरीबी तथा भूख से लडने के लिए अपने समाज को तैयार किया तो राष्ट्रीय चेतना जगाने, सांप्रदायिकता मिटाने, मानवतावादी संवेदनशील समाज बनाने की एक आध्यात्मिक नायक की भूमिका निभाते हुए 4जुलाई सन् 1902में कुल 39वर्ष की आयु में अपनी इहलीला समाप्त की।
डा. बलदेव वंशी

महाकवि सेठिया को रुखी विदाई

प्रकाश चंडालिया
कोलकाता का राजस्थानी समाज शायद सो गया है। सोया नहीं है तो निसंदेह अपनी सौजन्यता के समृद्ध पारम्परिक पथ से विमुख हो रहा है। धरती धोरां री और पाथळ र पीथळ जैसे अमर गीतों की रचना करने वाले, हिन्दी, राजस्थानी एवं उर्दू की 34 पुस्तकों के रचयिता महाकवि कन्हैयालाल सेठिया की श्रद्धांजलि सभाओं में उपस्थित लोगों की गिनती तो कमोबेश यही संकेत देती है। राजस्थानी समाज के प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में कई दशकों तक सक्रिय रहने वाले सेठियाजी के महाप्रयाण को रोकना तो, माना, किसी के वश में नहीं था, पर उन्हें जागरूक समाज पूरी भावना से विदायी देता-यह तो वश में था। एक सप्ताह में अलग अलग स्थानों में सेठियाजी की दो सभाओं का आयोजन हुआ। दोनों सभाओं में मोट उपस्थिति गिनी जाए, तो 200 के आंकड़ों को पार नहीं कर पाएगी।राजस्थान परिषद के साथ सेठियाजी का जुड़ाव उतना ही गहरा रहा, जितना उनकी अपनी रचनाधर्मिता से। इस परिषद के साथ वे वर्षों तक आत्मीय भाव से प्राण पुरुष के रूप में जुड़े रहे। पर लगता है, वर्तमान में परिषद की बागडोर संभालने वालों के मन में उनके योगदानों पर उत्साह कम, उदासीनता अधिक थी। आम तौर पर राजस्थान परिषद के आयोजनों में ओसवाल भवन के पूरे तल्ले में कुर्सियां लगाई जाती हैं, लेकिन सेठियाजी की शोकसभा में होने वाली उपस्थिति का अंदाजा इन्हें पहले से ही था, सो आधे हॉल को खाली छोड़ दिया गया। जितने में कुर्सियां बिछी थीं, उनमें भी कुछेक मेहमान को तरस रही थीं। राजस्थान परिषद की वार्षिक स्मारिका में प्रवासी राजस्थानियों की जितनी प्रतिनिधि ग्राम संस्थाओं के नाम प्रकाशित होते हैं, उनमें से कईयों के प्रतिनिधि नदारद थे। क्या यह इन संस्थाओं का सामाजिक कर्तव्य नहीं था कि जिन सेठियाजी ने अपना पूरा जीवन राजस्थान और राजस्थानी भाषा के लिए खपा दिया, उनके सम्मान में श्रद्धा के दो फूल चढ़ा आते? प्रतिनिधि संस्थाओं के साथ राजस्थान परिषद का कितना आन्तरिक सम्बन्ध है, यह इसी से उजागर होता है।मंच पर अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के निवर्तमान होने जा रहे महामंत्री मौजूद थे, जबकि अन्य पदाधिकारियों के पास फुर्सत नहीं थी। शायद सेठियाजी का आकलन लोग ऐसे ही करते हैं। सेठियाजी जन्मना सेठिया होकर भी आमजन के कल्याण के लिए सक्रिय रहे। हरिजनों के लिए खड़े हुए, पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा, राजस्थानी के लिए भूख हड़ताल पर बैठे, नेताओं से लोहा लिया। पर उन्हें प्रवासी राजस्थानी समाज ने इतनी जल्दी भुलाने का बीड़ा उठा लिया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।राजस्थान परिषद चाहता तो इस शोकसभा को संकल्प सभा में तब्दील करवा सकता था। सेठियाजी के महाप्रयाण के साथ राजस्थानी को संविधान की मान्यता दिलाने का सपना खत्म नहीं हो गया है। परिषद के कर्णधारों से अपेक्षा है कि वे अब भी सकारात्मक सोच के साथ आगे आएं, ताकि राजस्थानियों की पहचान केवल लोटा-डोरी लेकर आने वालों के रूप में न रह जाए। सेठियाजी तो भाषा, संस्कृति और संस्कार लेकर आए थे। लोटा-डोरी वालों ने अर्थ का घड़ा भरा, पर सेठियाजी ने तो जीवन पर्यन्त साहस और स्वाभिमान का प्रसाद बांटा। जिस कोलकाता महानगर में राजस्थानी समाज की तमाम संस्थाओं के केंद्रीय कार्यालय हों, वहां राजस्थान के सदी के श्रेष्ठ कवियों में अग्रणी सेठियाजी के महाप्रयाण पर रूखी विदाई कई सवाल खड़ा करती है। जो समाज अपने साहित्यकारों को अपेक्षित सम्मान नहीं दे सकता, उसके पराभव को भला कौन रोक सकता है। पारिवारिक आयोजनों में सोने के बाजोट पर अनगिनत पकवान परोसने और दिखावा करने वालों से कोई अपेक्षा नहीं करता, पर जागरूक लोगों का रूखापन तो आंखों में आंसू लाता ही है।

टिकटधारी बनाम बिना टिकट

लीजिये देव उठ गए। और साथ ही चुनाव की सरगर्मियां शुरू हो गई । बड़े बड़े नेता, अफसर , मातहत , छुटभैये, कामगार , मोहल्ला समितियों के सदस्य , कोलेज के होणार विद्यार्थी , शिक्षक इत्यादि गण अपने इस गणतंत्र के यज्ञ में अपने अपने काम पर लग गए है।
साथ ही बड़े बिज्नेस्मन और छोटे दूकानदार , यहाँ तक की चने बेचने वाले तक भी लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण खेल में रूचि लेने लगे है।
कहानी का रंग अभी चढेगा मित्रों । अभी प्रमो चल रहा है। टिकट लिए, दिए बाटे, छीने , बेचे और खरीदे जा रहे है। इस टिकट वितरण कार्यक्रम में हमारे यहाँ की एक पार्टीमें खूब जूतमपैजार हो चुकी है ।
कुछ संतुष्ट है क्युनके वो टिकट धारी है , कुछ संतुष्ट नही है क्युनके उनका टिकट काट दिया।। कुछ उछल रहे है की उनकी पार्टी ने उनके त्याग को पहचाना, उनको टिकट मिल गया। कुछ गला फाड़ फाड़ कर हो हल्ला मचा रहे है की उनका टिकट काट दिया गया।
किसी पति का टिकट काट कर पत्नी को दे दिया गया। किसी बाप का टिकट काट कर बेटे को दिया गया हमारे यहाँ तो एक बेटे का टिकट काट कर बाप को टिकटधारी बनाया गया है।
इस प्रकार इस दंगल में मुख्यतः दो ही प्रकार के पहलवान होते है एक टिकट धारी और एक बिना टिकट के। दोनों के अपने रंग होते है। कई बार टिकट के दावेदार को बिना टिकट गाड़ी में बैठा दिया जाता है तो वो बिना टिकट ही दंगल में कूद पड़ता है। अब उसका लक्ष्य जीतना नही बल्कि टिकटधारी को हराना ही होता है, क्युनके उसने उनका टिकट मार लिया ।
ऐसे ही एक टिकट कटे नेता अपने चेलो के साथ पार्टी के दफ्तर के सामने काले झंडे लिए कुछ गालीनुमा नारे लगा रहा था । उनकाटिकट नही दिया गया। उनका कहना था की चालीस बरस पार्टी की सेवा करी, अब थोड़ा और विश किया तो पार्टी ने संतुष्ट नही किया। पार्टी के लिए शादी भी नही की । प्रेम किया था मगर उसको भी पार्टी हित में त्यागना पड़ा। प्रेमिका ने उनको छोड़ कर PWD के एक ठेकेदार से शादी रचा ली । ठेकेदार एक नेताजी का साला था , उनकी महरबानी हुई तो प्रेमिका नगर निगम में पार्षद बन गई।
मगर हाय रे लोकतंत्र की राजनीती , उनका टिकट एक दूसरी पार्टी के बागी को दे दिया गया।
दोस्तों यह इस महान फ़िल्म का ट्रेलर है । अभी फ़िल्म आएगी। अब देखते रहिये। टिकटधारी और बिना टिकट के पहलवान दंगल में उतरने वाले है । कौन जीतेगा कौन हारेगा यह लाख रुपये का सवाल है हालांके इसका जवाब दो टके का है ।
टिकट के लिए मारामारी मची है। एक टिकट के सौ दावेदार है । सत्तासुन्दरी का स्वयंवर होना है । वरण एक का होगा बाकी सब सर फुटोवल करेंगे।
जिनको पार्टी टिकट नही देगी वों अपनी ही पार्टी के उमीदवार को हारने में लग जायेंगे । और जो टिकट धारी हार जायेंगे वे हारने के बाद कहेंगे- हमको तो अपनों ने मारा गैरों में कहाँ दम था, हमारी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था।

मंदी के भूत

धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी गरीबी
पैसा कमाने के सपने तो होंगे पर जरूरत नहीं होगी
जरूरत पूरी करने की चुभन तो होगी पर एहसास मर जाएगा
न्यूज प्रिंटर की तरह धड़ाधड़ बाहर आएंगी जरूरतें
चिल्लाएंगी हंगामा करेंगी पर अधूरी जरूरतें
पूरी होने वाली जरूरतों का घोंट देंगी गला
सुबह का अखबार कौन पढ़ना चाहेगा
अल्सुबह काम पर जाना होगी सबसे बड़ी जरूरत
तब रात में निकलने शुरू होंगे अखबार या तब
जब कोई उन्हें पढ़ने की जरूरत जताएगा
दिन भर बिना कमाये लौटेगा आदमी
रात में काम पर जाएंगी औरतें, लगी रहेंगी काम में
यक्ष प्रश्न बार-बार परीक्षा लेगा उनकी
किसका बिस्तर गर्म करें कितनों का बिस्तर गर्म करें
कि गरम हो सके सुबह का चूल्हा
बिस्तर गरम कराने वाले छोड़ चुके होंगे शहर
शहर के अस्पताल भरे होंगे उनसे
हाहाकार मचा होगा अस्पतालों में-
ऊं जूं सः मा पालय, ऊं जूं सः मा पालय पालय।
बच्चे निकलेंगे पूरा परिवार संगठित होकर
कमाएगा और पाएगा फूटी कौड़ी
तब जागेगा प्यार आर्थिक अभाव में
प्यार भूख में होगा पर भूख न लगेगी
बाजारवाद की व्याख्या करके
विजयी भाव से भर जाएगा प्यार
इतिहासकारों का शरीर फट चुका होगा
अर्थशास्त्रियों के भेजे में हो जाएगा कैंसर या मधुमेह से
मारे जा चुके होंगे सब के सब
जनता का आदर्श हो जाएगा आर्थिक अभाव
पूंजी का कोई अर्थ न रह जाएगा
जो पूंजी वाला होगा, वही सबसे गरीब होगा
पैसे वाला पैसे वाले से दूर भागेगा
जो जितना अमीर होगा उतना अश्पृश्य हो जाएगा
जो जितना गरीब होगा उतना अपना होगा
पूंजी के साथ आने वाले मर्ज उड़न छू हो चुके होंगे

मुझे भूतों की दुनिया दिखती है

उस दुनिया में मारामारी नहीं है
आदमी भड़ुआ नहीं है औरत बाजारी नहीं है
बच्चों के आगे बड़ा होने की लाचारी नहीं है
बड़ी हो रही है भूतों की दुनिया
समय के सहवास में हुए स्खलन से हो रहा है उसका जनम
किसी पल कबीर की उलटबांसियों की तरह
सामने आकर खड़ी हो सकती है भूतों की दुनिया
उनकी आंखों में लाल डोरे फैलने लगे हैं
जाप चल रहा है चल रहा है और तेज हो रहा है
तीव्रतम हो रहे हैं उनके स्वर-
परित्राणाय साधुनाम......

भूतों की हथियार मंद दुनिया से
हमले का अंदेशा लगता है
pawan nishant
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