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27.1.10

नहीं लडूंगा अब अकेले....


लोकेन्द्र  सिंह राजपूत

समाज क्या होता है? क्यों समाज में उठना-बैठना चाहिए? क्यों एकांकी जीवन सदा आनंददायक नहीं होता? दो-तीन दिन में सही अर्थ समझा इन बातों का। हमारे बुजुर्ग जो भी कह गए हैं सौ फीसदी सही कह गए हैं। उन्होंने यूं ही धूप में बाल सफेद नहीं किए थे मान गए गुरू। अब सुनो, हमें यह बात दो-तीन दिन में क्योंकर समझ में आई? असल में ठीक आज से दो-ढाई साल पहले अपन सामाजिक आदमी थे। २४ में से १४ घंटे समाज के बीच में बीतते थे। खासकर वंचित समाज के बीच। बड़ा प्यार मिलता था। चाहे छोटा बच्चा हो या फिर ७० साल का आदरणीय वृद्ध। सभी प्रेम और अधिकार पूर्वक भैया संबोधन के साथ पुकारते थे। जब भी बस्ती में कदम रखता पहले पहल "राम-राम भैया जी" से स्वागत होता था। फिर छोटे-छोटे दोस्त अपने-अपने घर जबरन खींचकर ले जाते। वहां मां-बहनें वात्सल्य रस से सरोबोर कोई चाय तो कोई आलू के परांठे खिलाते। सबको पसंद था कि मुझे आलू के परांठे पसंद हैं, इसी वजह से कई शाम मेरी बस्ती के मेरे अपने घरों में बुक रहती थी। कभी मुझे कोई परेशानी हो या उन्हें कोई परेशानी हो तो बेवक्त और वक्त पर हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। आज सब यह बड़ा याद आ रहा है। कारण है इसका। दो-तीन दिन से अकेला हूं। अपने मुश्किल समय में। एक-दो लोगों को छोड़ दूं तो कोई साथ नहीं खड़ा। सब अपने-अपने काम में मस्त हैं। ऐसे नहीं है कि उन्हें मेरी समस्या का पता न हो। दुख तो इस बात का है कि मदद मांगने पर भी नकार सुनने को मिल रही है। कोई कहीं बिजी है तो कोई कहीं। खैर सबको बिजी रहने का मौलिक अधिकार है। आखिर कल ही तो गणतंत्र दिवस था सबको खूब याद आए होंगे अपने मौलिक अधिकर पर मौलिक कर्तव्य तो किसी ने भूलकर भी याद नहीं किए होंगे कसम राम की।
मुझे किसी बात की इतनी परवाह नहीं है। परवाह है तो इस बात की कि मैं अपने उन निस्वार्थ लोगों से कितना दूर हो गया। यह आजकल की पढ़ाई और नौकरी का कमाल है। नहीं-नहीं यह तो सिर्फ और सिर्फ मेरा दोष है। मुझ पर वक्त था उनके साथ बिताने का, लेकिन मेरी मती फिर गई थी जो गलत जगह अनमोल समय जाया कर दिया। हे भगवान मुझे फिर से उनके बीच जाने का अवसर दे। तू अवसर दे या नहीं दे मैं तो ढूंढ लूंगा। उनके दिलों में मेरे लिए जो प्रेम है वो मर थोड़े गया होगा। अभी भी थोड़ा तो जीवित होगा। उसे फिर से प्रगाढ़ कर लुंगा मेरे राम मेरा तुझसे वादा रहा। अब मैं अकेले नहीं लडूगां फिर से मेरे अपने मेरे साथ होंगे, ठीक पहले की तरह। फिर से मैं बेफिक्र रहकर किसी भी मुश्वित को न्यौता दे सकूंगा या फिर छिपकर और अचानक आई समस्या से लड़ सकूंगा। सबके साथ। अब बस इस बार अकेला लड़ लूं, फिर जीतकर मुझे थोड़ी फुरसत मिलेगी। वही मेरे लिए मौका होगा अपनों के पास जाने का। अच्छा दोस्तो अभी मुझे अकेला लडऩा है तो मैं चलता हूं फिर जल्दी ही मिलूंगा......

प्रज्ञा तिवारी की कविता

काश कि कुछ ऐसा हो पाता

कि जो सड़क पर है वह अपनी आवारीगर्दी को जी पाता

इस ठंढे मौसम की खुशहाली, हरियाली को

किसी गर्म, रुईदार कम्बल में सी पाता

ठंढ को सिरहाने रख, ज़िन्दगी के गर्म बिस्तर पर सोता वह

किसी तकिए की खुश्बू को जीता, अलाव की गरमी को पी पाता

काश..कि कुछ ऐसा हो पाता

शांति पत्रकारिता की जरुरत है मध्यपूर्व के लिए



 संकट की अवस्था में मीडिया को कैसे देखें ? यह सवाल सबसे महत्व का है। संकट की अवस्था में साधारण लोग संशय और भ्रम के शिकार होते हैं।ऐसी स्थिति में साधारण आदमी का मीडिया पर विश्वास नहीं होता और न स्वयं पर ही भरोसा होता है। क्षेत्रीय युध्द का कवरेज इसे क्षेत्रीय युध्द नहीं रहने देता,बल्कि विश्वव्यापी मुद्दा बना देता है।इस तरह के युध्द के कवरेज में लगातार विध्वंस और मौत के दृश्य बार बार आते रहे हैं,ये दृश्य हमें बार-बार ज्यादा से ज्यादा व्याख्या की ओर ले जाते हैं किंतु टीवी पर व्याख्याकारों का अकाल पड़ा है,सीएनएन और बीबीसी जैसे माध्यमों पर जो व्याख्याकार आ रहे हैं वे सैन्य विशेषज्ञ हैं ,भू.पू. अमेरिकी-इस्राइली सैनिक अधिकारी हैं या फिर किसी कंजरवेटिव रिसर्च संगठन के थिंक टैंक हैं।


      समाचार चैनलों में इन दिनों सनसनीखेज खबर बनाने या फिर खबर छपाने का चक्र चल रहा है।इसके कारण सबसे ज्यादा उन्हें क्षति पहुँच रही है जो अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।अपने जायज अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।समाचार चैनलों में गैर जरूरी सवालों पर ज्यादा ध्यान देने से ऑडिएंस के अ-राजनीतिकरण की प्रक्रिया को बल मिलता है।चैनल खबरों के इतिहास में नहीं जाते और न सही खबरों का चयन करते हैं। फिलीस्तीनी जनता के संघर्ष और कष्टों की खबरें एकसिरे से गायब हैं और जो खबरें दिखाई जा रही हैं वे हमलों की हैं।इजराइली सेना या फिलिस्तीनी संगठनों के हमले की खबरों को दिखाते समय खबरों के पीछे का सच छिपाया जाता है।
इस्राइली प्रशासन की कट्टरपंथी नीति के तहत इस्राइली ब्रॉडकास्टिंग ऑथरिटी ने कुछ अर्सा पहले यह आदेश दिया कि रेडियो खबरों में 'सेटलर्स' और 'सेटलमेंट्स' पदबंध का प्रयोग नहीं किया जाय।उल्लेखनीय है कि 1967 के युध्द के बाद फिलिस्तीनियों की जिन जमीनों पर अवैध बस्तियां बसायी गईं उन्हें 'सेटलमेंट्स' कहते हैं,और इनके अवैध बाशिंदों को 'सेटलर्स' कहते हैं। इस पाबंदी का असर हुआ और अब वे 'नेवरहुड'पदबंध का प्रयोग करते हैं।

यू.एन.प्रस्ताव सं.446 के अनुसार इन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसाना गैर कानूनी है।यह प्रस्ताव 1979 में पास हुआ और तब से लेकर आज तक अधिकृत इलाकों में अवैध बस्तियां बसाने का काम जारी है।इनमें लाखों फंडामेंटलिस्ट यहूदियों को बसाया गया है।

   सुरक्षा परिषद ने एक अन्य प्रस्ताव पास करके यह भी कहा है कि अधिकृत बस्तियों के मूल बाशिंदों को न तो हटाया जाय और न स्थानान्तरित ही किया जाय।अमेरिकी मीडिया किस तरह इस्राइलपंथी है और फिलिस्तीन विरोधी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है इस तथ्य की पुष्टि के लिए 'नेशनल पब्लिक रेडियो'(एनपीआर) के प्रसारणों के बारे में किए गए अनुसंधान से मदद ली जा सकती है।यह अनुसंधान 'फेयर' ने किया।इसमें सन्2001की प्रथम छमाही के समाचारों का मूल्यांकन किया गया।इसमें निष्कर्ष निकला कि इस अवधि में एनपीआर ने अपनी खबरों में 62 इस्राइली और 51 फिलिस्तीनियों की मौत की खबर प्रसारित की।सतही तौर पर यह आंकड़ा असंतुलित दिखाई नहीं देता।लेकिन गहराई में जाकर समीक्षा की गई तो पता चला कि इस अवधि में फिलिस्तीन-इस्राइल संघर्ष के दौरान 77 इस्राइली और 148 फिलिस्तीनी मारे गए।इसका अर्थ हुआ कि 81 फीसद इस्राइलियों की मौत की खबर प्रसारित की गई जबकि मात्र 34 फीसद फिलिस्तीनियों की मौत की खबर प्रसारित की गई।

इसी अवधि में 30 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए जिनकी उम्र 18वर्ष से कम थी।इनमें से मात्र 6 की खबर प्रसारित हुई यानी 20फीसद की रिपोर्टिंग हुई।इसके विपरीत 19 अल्पवयस्क इस्राइली मारे गए जिनमें से 17 की खबर प्रसारित हुई। यानी 89फीसद की रिपोर्टिंग की गई।इसी अवधि में 61 युवा फिलिस्तीनी मारे गए।किंतु 26फीसद की ही रिपोर्टिंग हुई। इसी तरह इस्राइली नागरिकों की मौत की खबर तुरंत प्रसारित की गई। 84 फीसद इस्राइली नागरिकों की मौत की खबर को 'नेशनल पब्लिक रेडियो' ने तुरंत प्रसारित किया। जबकि इस्राइली सेना की इसी अवधि में हुईं 69 फीसद मौत की खबरें प्रसारित की गईं।

इसकी तुलना में फिलिस्तीनी सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की 72 फीसद खबरें प्रसारित की गईं और फिलिस्तीनी नागरिकों के मारे जाने की मात्र 22 फीसद खबरें प्रसारित की गईं।सर्वे की अवधि में अधिकृत इलाकों में 112 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए।इनमें से मात्र 26 की मौत की खबर प्रसारित की गई।इसके विपरीत अधिकृत अवैध बस्तियों में रहने वाले 28 इजराइली मारे गए इनमें से 21 की खबर 'नेशनल पब्लिक रेडियो' ने प्रसारित की।

कहने का तात्पर्य यह है कि अमेरिकी बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय जनमाध्यमों का इस्राइल-फिलिस्तीन संघर्ष की खबरों की प्रस्तुतियों को लेकर संतुलित और वस्तुगत रवैयया कभी नहीं रहा। बल्कि इन माध्यमों की नीतियां अमेरिकी विदेश नीति से तय होती रही हैं।अमेरिकी विदेशी नीति मध्य-पूर्व के संदर्भ में अरब देशों और फिलिस्तीन राष्ट्र के हितों के खिलाफ और इस्राइली नस्लवादी, विस्तारवादी और फंडामेंटलिस्ट नीति से गहरे जुड़ी रही है। इस्राइली प्रशासन की प्रत्येक नीति को बहुराष्ट्रीय चैनल व्यापक कवरेज देते हैं जिससे उसके क्रिया- कलापों को वैध बनाया जा सके और फिलिस्तीनियों के संप्रभु राष्ट्र की स्थापना के संघर्ष को नाजायज ठहराया जा सके।
     मीडिया कवरेज का मूल समस्या है तथ्य और कल्पना के प्रति रवैयये की। कहां खबर है और कहां कहानी है।इसके बारे में मीडिया खासकर समाचार चैनलों के क्षरा सबसे ज्याइा भ्रम पैदा किया जा रहा है।सामान्य तौर पर खबर से बड़ी कहानी होती है,उसका कल्पना या वक्ता के विचारों से संबंध होता है। घटना के तथ्यों से उसका कोई संबंध नहीं होता। समाचार चैनलों में युध्द की खबरें कम और युध्द के इलाके का काल्पनिक विवरण ज्यादा आता रहता है।
     मसलन् चैनल पर युध्द के मोर्चे से एक खबर दिखाई गयी,उसके बाद उसके व्याख्याकार आने शुरू हो गए,वे सारे दिन या घंटों अपने विचारों को व्यक्त करते रहते हैं।आमतौर पर इन विचारों का घटना से कम काल्पनिक कहानी से ज्यादा संबंध होता है।
     हम यह भी कह सकते हैं ये 'खबर' के नाम पर व्यक्त की गयी 'राय' है। इस 'राय' में वक्ता के पूर्वाग्रह वर्चस्व बनाए होते हैं,इसके कारण ऑडिएंस या पाठक को 'खबर' को लेकर भ्रम पैदा हो जाता है। यह भी कह सकते हैं कि 'खबर' और 'राय' के बीच में चैनलों के द्वारा जो घालमेल चलाया जा रहा है वह खबर को गुम कर देता है और पूर्वाग्रहों को स्थापित कर देता है।यह काम 'रिपोर्ट' और 'खबर' के बीच घालमेल पैदा करके किया जाता है।
     मीडिया में 'रिपोर्ट' महज राय को व्यक्त करती है ,उसे खबर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।मीडिया कवरेज को देखते समय यह देखा जाना चाहिए कि किस तरह के वाक्य,भाषा,शीर्षक या कैप्सन का बार-बार प्रसारण किया जा रहा है। इनका बार-बार प्रसारण खास तरह की समझ बनाता है। ये हमेशा खास किस्म के अर्थ को व्यक्त करते हैं। इनके माध्यम वैचारिक प्रचार कार्य किया जाता है।यह भी कह सकते हैं कि समाचार के खास किस्म के कोड होते हैं जिनका भाषा के माध्यम से समाचार चैनल इस्तेमाल करते हैं।
    समाचार की भाषा में इनकी पुनरावृत्ति इस बात का संकेत भी है कि मामला सरल और सीधा सादा नहीं है। समाचार के भाषायी प्रयोग दर्शक को खास मनोदशा और वैचारिक सोच में ढ़ालते हैं,उसके लिए प्रशिक्षित करते हैं।उनके बारे में कोई भी निष्कर्ष इस बात पर निर्भर करता है कि हम उन्हें किस तरह ग्रहण करते हैं,दर्शक की आलोचनात्मक क्षमता का स्तर क्या है ?दर्शक की तथ्य के संदर्भ को समझने की क्षमता,स्टोरी के पीछे छिपे इतिहास को जानने की क्षमता पर समाचार का प्रभाव निर्भर करता है। समाचार के कोड वर्ड का इसी अर्थ में विशेष महत्व होता है।
    मसलन् इस्राइल के द्वारा फिलीस्तीनी इलाकों पर कब्जे के खिलाफ में फिलीस्तीनी प्रतिरोध को बीबीसी ने कभी प्रतिरोध नहीं कहा,बल्कि उसे 'सशस्त्र मुठभेड़' (आर्मड कनफंट्रेशन)कहा,जब 'सशस्त्र मुठभेड़' कहा जाएगा तो इसका अर्थ होगा कि फिलीस्तीनी अपनी जमीन पर वैध अधिकार प्राप्त करने के लिए हिंसा फैला रहे हैं।
    'कनफंट्रेशन' इकतरफा होता है।इसका अर्थ यह भी होगा कि फिलीस्तीनी हिंसा पैदा कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि हिंसाचार इस्राइल कर रहा है। किंतु इसका कहीं भी बीबीसी खबरों में जिक्र नहीं मिलेगा। बीबीसी ने हम्मास को 'आर्मड मिलिशिया' कहा,जबकि फिलीस्तीनी नजरिए से हम्मास एक प्रतिरोधी सैन्य संगठन है। जबकि 'आर्मड मिलीशिया' का अर्थ है हाशिए का ग्रुप।
      समाचार के संदर्भ में यह तथ्य हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए यदि पूर्व निर्धारित अर्थ के तहत समाचार प्रसारित किए जाएंगे तो किसी भी किस्म विमर्श जन्म नहीं लेता, फिलीस्तीन, इराक, और अफगानिस्तान के संदर्भ में बहुराष्ट्रीय समाचार चैनलों से इन इलाकों की जो खबरें आ रही हैं वे इसी कारण विमर्श पैदा नहीं करतीं,वे इकतरफा प्रचार सामग्री की तरह पेश की जा रही हैं।यही वजह है कि इन क्षेत्रों के बाशिंदों के अधिकारों के समर्थन में जनता जुगाड़ करना मुश्किल होता जा रहा है।
मध्यपूर्व संकट मीडिया कवरेज के विस्तृत मूल्यांकन का मूल मकसद है मीडिया की व्यापक शक्ति का शांति के लिए इस्तेमाल किया जाय,आज दुनिया को युध्द पत्रकारिता की नहीं बल्कि शांति पत्रकारिता की जरूरत है। आज के दौर में यदि कोई यह सोचे कि वह अराजकता या तबाही या विध्वंस से राजनीतिक लाभ उठा सकता है,राजनीतिक बढत हासिल कर सकता है तो वह गलतफहमी का शिकार है। इस तरह की किसी भी स्थिति में कोई भी अनुकूल परिणाम हासिल नहीं कर सकता है। इस्राइल को अरब देशों या फिलीस्तीन से आत्मरक्षा के नाम पर हमला करने की मीडिया में नंगी वकालत की जा रही है,किंतु आत्मरक्षा का अधिकार अरब देशों,फिलीस्तीन या इराक को नहीं है। सवाल किया जाना चाहिए कि यह आत्मरक्षा का एकतरफा और मनमाना अधिकार सिर्फ इस्राइल को ही क्यों है ?



लो क सं घ र्ष !: अगले वर्ष हिन्दुस्तान के महाभ्रष्ट को भारत रत्न मिलेगा


केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर अनिवासी भारतीय अमेरिकन संत सिंह चटवाल को पद्मभूषण से सम्मानित किया है श्री संत सिंह चटवाल ने नब्बे लाख डालर का घोटाला स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में किया था। जिसकी जांच सी.बी.आई ने की थी । जांच उपरांत सी.बी.आई ने संत सिंह चटवाल के खिलाफ आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया है।
सरकार के इस कदम से यह साबित होता है कि भ्रष्टाचार व आर्थिक अपराधियों को पद्मभूषण से सम्मानित किया जाना उसको मान्यता देना है । सरकार आने वाले वर्षों में देश में सबसे बड़े आर्थिक अपराधी व भ्रष्टाचारी को भारत रत्न भी दे सकती है सरकार के इस कदम से यह लगता है की श्री संत सिंह चटवाल अगर भारतीय नागरिक होते तो उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जा सकता था।
पद्मभूषण श्री संत सिंह चटवाल

नया मिले सुर मेरा तुम्हारा : ठीक ठाक





मित्रों
नमस्कार,
कल एक टी.वी. शो में मिले सुर मेरा तुम्हारा का नया स्वरुप देखने और साथ ही उससे जुडी रचना के सफ़र को सूना. पंडित भीमसेन जी की आवाज़ के ज़रिये पूरा हिन्दुस्तान जो आक्रसित होता था वेसा प्रभाव अभी अमिताभ जी का नही हो सकता. भले ही अमिताभ जी ज्यादा लोग जानते हो मगर,हम जानते है कि  भीमसेन जी की बात और ही रहेगी.वेसे एक हिसाब से लगभग सत्तर लोगों को शामिल करते हुए ये नया वीडीयो भले ही ज्यादा  लोगो को आकर्षित कर जाए मगर हम ये भी जानते है कि पुराने लोगो और उनकी बातों ,गीतों और आवाज़ का प्रभाव थोड़ा सा गहरा होता है. वो तो कायाम रहेगा. सच भी यह है. डॉ. बालमुरली कृष्णन और हरी प्रसाद जी जैसा भाव कोई और कहाँ पैदा कर सकता है.नए वाले में उस्ताद अमज़द खान साहेब और पंडित शिव जी के साथ अमिताभ जी  को लेने से इसकी लाज बचा गयी. एक दो सीन में तो कुछ अभिनेत्रियों को थोड़े से ठीक लिबास में ला पाते तो अच्छा रहता ,आमिर खान्वाला पार्ट बहुत संजीदा था.

लेकिन  एक बात ये भी है कि नए की भी कुछ तो तारीफ़ तो  बनती है. इसके निर्माता ने जो राष्ट्र भक्ति के लिए इतनी मेहनत  की है लाजवाब है.नए देखते रहने के साथ साथ हमें पुरानेकी याद आने से कोई नहीं रोक पायेगा. भले ही मैं अमिताभा जी बहुत पसंद करता हूँ लेकिन भीमसेन जी का वो प्रयाश तो नतमस्तक होने को राज़ी कर देता है.एक बात और कि हिन्दुस्तान को भावात्मक रूप से एक करने का म्युज़िक  जितना प्रभाव रखता है कोई और नहीं कर सकता.ये बात फिर एक बार साबित हो गयी है.पूरे देश के ख़ास ख़ास लीडर को शामिल करने का ये काम कुछ मायने में ठीक रहा.

बाकी अपनी अपनी राय है. हो सकता है कि आपकी राय अलग हो,मगर इस गीत कि और इसके लगातार प्रसन की आज के दौर में ज्यादा ज़रूरत लगती है. मन को कुछ एक रूप में शांति कि कहानी कहता गीत पहले वाला भी और ये भी मन को भाया .जितना हो सके सुने .कई बार नए पर ज्यादा बड़ी प्रतिक्रया करने के पहले बार सुने देखें.फिर कोई बात कहें तो  ठीक रहेगा.

आपका
 माणिक

युवा फिल्म समीक्षक -मेरी नज़र में





एक फ़िल्म, एक उपन्यास और गांधीगिरी का अंत.


3-idiotsfivepoint1यूँ देखें तो मेरा राजकुमार हीरानी के सिनेमा से सीधा जुड़ाव रहा है. मेरा पहला रिसर्च थिसिस उनकी ही पिछली फ़िल्म पर था. तीन महीने दिए हैं उनकी ’गांधीगिरी’ को. ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के गांधीगिरी सिखाते गांधी ’सबाल्टर्न’ के गांधी हैं. किसी रिटायर्ड आदमी को उसकी पेंशन दिलवाने का नुस्खा बताते हैं तो किसी युवा लड़की को उसका जीवन साथी चुनने में मदद करते हैं. ये ’आम आदमी’ के गांधी हैं. यहाँ ज़ोर उनके एतिहासिक व्यक्तित्व पर नहीं उनके जीवन जीने के तरीके पर है. ’गांधीगिरी’ यहीं से निकली. राजू की फ़िल्म उन्हें इतिहास के ’महावृतांतों’ की कैद से आज़ाद करवाती है. कई मायनों में मुन्नाभाई श्रृंखला की फ़िल्में जेनर डिफ़ाइनिंग फ़िल्में हैं क्योंकि वे हिन्दी सिनेमा से ते़ज़ी से गायब होते जा रहे तत्व ’स्वस्थ्य हास्य’ को सिनेमा में सफलता के साथ वापस लेकर आती हैं.

लेकिन कहना होगा कि यहाँ वे गलती पर हैं. और अगर मैं अब तक के उनके सिनेमा को थोड़ा भी समझ पाया हूँ तो उसी तर्क पद्धति का सहारा लेकर कहूँगा कि यहाँ मेरे लिए सिर्फ़ दो तथ्य महत्वपूर्ण हैं. एक यह कि उनकी फ़िल्म एक लेखक की किताब पर आधारित है और दूसरा यह कि उन्होंने उसी लेखक का नाम ले जाकर सबसे कोने में कहीं पटक दिया है. काग़ज़, पैसा, कितने प्रतिशत कहानी किसकी, किसने कब क्या बोला, ये सारे सवाल बाद में आते हैं. सबसे बड़ा सवाल है अच्छाई, बड़प्पन और ईमानदारी जो हमने उनकी ही रची ’गांधीगिरी’ से सीखी हैं. यह तो वे भी नहीं कह रहे कि उनकी फ़िल्म का चेतन भगत के उपन्यास से कोई लेना-देना नहीं. बाकायदा उपन्यास के अधिकार खरीदे गए हैं और कुल-मिलाकर ग्यारह लाख रु. का भुगतान भी हुआ है. तकनीकी रूप से उनपर इतनी बाध्यता थी कि वे फ़िल्म के क्रेडिट रोल में चेतन भगत का नाम दें और फ़िल्म के आखिर में उनकी किताब का नाम देकर उन्होंने उसे पूरा भी कर दिया है. लेकिन सहायकों, तकनीशियनों और स्पॉट बॉयज़ की भीड़ में कहीं (मैं तो तलाश भी नहीं पाया) चेतन का नाम छिपाकर उन्होंने अपनी ईमानदारी खो दी है.

“हमारी फ़िल्म एक उपन्यास पर आधारित है.” यह कहने से आपकी फ़िल्म छोटी नहीं होती है. मेरी नज़र में तो उसकी इज़्ज़त कुछ और बढ़ जाती है. विधु विनोद चोपड़ा ने चेतन भगत के सामने अभिजात जोशी को खड़ा करने की कोशिश की है और कहा है कि वे फ़िल्म के असल लेखकों का हक़ मारना चाहते हैं. यह छद्म प्रतिद्वंद्वी खड़ा करना है. चेतन भगत ने कभी भी फ़िल्म की पटकथा पर अपना हक़ नहीं जताया जिसे अभिजात जोशी और राजू हीरानी ने मिलकर काफ़ी मेहनत से तैयार किया है. ’थ्री इडियट्स’ की पटकथा इस साल आए सिनेमा की सबसे बेहतरीन और कसी हुई पटकथाओं में से एक है जिसमें हर कथा सूत्र अपने मुकम्मल अंजाम तक पहुँचता है चाहे वो एक छोटा सा फ़ाउंटन पेन ही क्यों न हो. इस कसी हुई पटकथा के लिए उन्हें भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना ’स्लमडॉग मिलेनियर’ के पटकथा लेखक साइमन बुफॉय को ऑस्कर से नवाज़ कर दिया गया था. सवाल तो विधु विनोद चोपड़ा से पूछा जाना चाहिए जो कहानी लेखन में दो लेखकों का नाम पहले से होते ’को-राइटर’ के तौर पर अलग से फ़िल्म के टाइटल्स में नज़र आते हैं. और सवाल उन सभी निर्देशकों से पूछा जाना चाहिए जो अपनी फ़िल्म में लेखक का नाम पहले से मौजूद होते शान से अपने नाम के आगे ’लेखक और निर्देशक’ की पदवी लगाते हैं. सलीम-जावेद के हाथ में पेंट का डब्बा लेकर अपनी फ़िल्मों के पोस्टरों पर अपना ही नाम लिखते घूमने के किस्से इसी सिनेमा जगत के हैं. चेतन सिर्फ़ फ़िल्म की शुरुआत में अपनी किताब का नाम चाहते हैं. इसके अलावा वो अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी करते हों, मुझे उससे मतलब नहीं. इस मुद्दे पर मैं उनके साथ हूँ. यहाँ सवाल व्यक्ति का नहीं, सही और गलत का है.

एक और बात है. एक व्यापक संदर्भ में हमारे लिए यह खतरे की घंटी है. इस प्रसंग में ’सबका फ़ायदा हुआ’ कहने वाले यह नहीं देख पा रहे हैं कि इस सारे ’मीडिया हाइप्ड’ प्रसंग के गर्भ में एक अदृश्य लेखक छिपा है. डरा, सहमा सा. वो लेखक न तो चेतन की तरह मीडिया का चहेता लेखक है और न ही उसकी भाषा इतनी ताक़तवर है कि सत्ता के बड़े प्रतिष्ठान उसकी किसी भी असहमति पर ध्यान दें. उसके पास बस उसके शब्द हैं, उसकी कहानियाँ. उसकी क़लम, उसकी रचनात्मकता जिससे वह इस बहरूपिए वर्तमान के मुखौटे की सही पहचान करता है. अपने जीवन की तमाम ऊर्जा को बाती में तेल की तरह जलाकर इस समय और समाज की उलझी जटिलताओं को अपने पाठकों के लिए थोड़ा और गम्य बनाता है. हिन्दुस्तान की क्षेत्रीय भाषाओं का यही ईमानदार लेकिन गुमनाम लेखक है जिसका इस सारे तमाशे में सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है.

यहाँ सबसे मुख्य बिन्दु यह है कि आज भी हिन्दी सिनेमा किसी किताब से, रचना से अपना नाम जोड़कर कोई खुशी, कोई गर्व नहीं महसूस करता. यहाँ तो जिस किताब का ज़िक्र है वो अंग्रेज़ी भाषा की एक बेस्टसेलर पुस्तक है. यहाँ यह हाल है तो हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों का क्या हाल होगा जिनके नाम के साथ चेतन भगत के नाम जैसा कोई ग्लैमर भी नहीं जुड़ा है. अगर हमारे सिनेमा का अपने देश के साहित्य और कला से ऐसा और इतना ही जुड़ाव रहा तो हिन्दी सिनेमा विदेशी सिनेमा (पढ़ें हॉलीवुड) की घटिया नकल बनकर रह जाएगा जिसके पास अपना मौलिक कुछ नहीं बचेगा. अपनी ज़मीन के कला-साहित्य से जुड़ाव से सिनेमा माध्यम हमेशा समृद्ध होता है. मल्टीपलैक्स का दौर आने के बाद से मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा वैसे भी अपने देश के गांव-देहात से, उसके आम जनमानस से कटता जा रहा है. ऐस में उसका अपने देश के लेखन और ललित कलाओं से भी असहज संबंध खुद सिनेमा के लिए भी अच्छा नहीं है.

आपको ऐसी कितनी हिन्दी फ़िल्में याद हैं जिनकी शुरुआत में किसी किताब का नाम शान से लिखा आता हो? मैं ऐसी फ़िल्मों का इंतज़ार करता हूँ. राजकुमार हीरानी से मुझे इसकी उम्मीद थी. ’थ्री इडियट्स’ हमारे लिए वो फ़िल्म होनी थी.

तो क्या यह भविष्य के लिए सभी उम्मीदों का अंत है? क्या यह साहित्य सर्जक के लिए सिनेमा माध्यम में बंद होते दरवाजों में आखिरी दरवाजा था?

नहीं, कुछ छोटे-छोटे टिमटिमाते तारे हैं. कुछ मुख्यधारा में और कुछ हाशिए पर कहीं. एक परेश कामदार हैं जो अपनी फ़िल्म (खरगोश)के पीछे मौजूद मूल कहानी के लेखक को फ़िल्म के पहले सार्वजनिक शो पर मुख्य अतिथि की तरह ट्रीट करते हैं और उनके साथ आए तमाम दोस्तों को अपनी जेब से कॉफ़ी पिलवाते हैं. एक विशाल भारद्वाज हैं जो अपनी नई फ़िल्म (कमीने) में टाइटल्स की शुरुआत होते ही पहले किन्हीं केजतान बोए साहब का शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने युगांडा की एक फ़िल्म वर्कशॉप में उन्हें पहली बार यह स्टोरी आइडिया सुनाया था.

जैसा राजू हीरानी ने ’लगे रहो मुन्नाभाई’ में बताया था, एक-एक गांधी हम सबके भीतर हैं. बस हमारे आँखें बंद करने की देर है.
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मूलत: ’डेली न्यूज़’ के ’हम लोग’ में प्रकाशित. 10 जनवरी 2010.


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गणतंत्र पर शाब्दिक हमला


देश में कल गणतंत्र की धूम दिखी इसी बीच एक और बात जो प्रचुर मात्रा में देखने कों मिली वो थी कागजी मीडियाके महारथी का देश के नाम शाब्दिक पटुता का एक नया अंदाज़ | ये कोई नयी बात नहीं थी |शब्दों के कुशलकारीगर गणतंत्र पर देश की खामियों कों गिनाने में लगे हुए थे |सुबह से लेकर शाम तक मैं ने करीब दस आलेखऔर कुछेक ब्लॉग पढ़े सबके सब शाब्दिक चिंता में डूबे दिखे वजह देश की आजादी के लम्बे अरसे बाद भी देश केस्थिति का चरित्र चित्रण |मेरी समझ में एक बात बिलकुल नहीं आयी ये आखिर कलम के जादूगर कहना औरकरना क्या चाहते है |

क्या देश की खामियों कों गिनाकर कोई क्रांती लायी जा सकती है जिसकी नीव बदलाव के साथ रखीजायेगी |क्यागणतंत्र पर राजपथ की परेड कों फिजूलखर्ची कहने से गरीबों का पेट भर जाएगा |कलम के बादशाहों कों शायद येपता नहीं की उनके शब्द में अब वो ताकत नहीं है, जो गांधी, दिनकर और भगत की लेखनी में हुआ करते थेआखिर ये अपनी शाब्दिक पटुता कों काली स्याही के रंग में रंग कर साबित क्या करना चाहते है |चन्द पैसों केलिए कलम चलाने वाले ये महानुभाव लेखनी से ही देश की गरीबी ,भूखमरी और नक्सलवाद जैसी समस्याओं कासमूल नाश करने का बीड़ा उठा रखा है |

ये सवाल उन प्रबुद्ध जनों से नहीं है जो देश की उपलब्धियों कों धता बताते है और शब्दों में ही सुधार की गुंजाइशदेखते है |काश ऐसा हो पाता ! सही मायने में ये लोकतंत्र से ही एक सवाल है |जहाँ गणतंत्र और स्वतंत्र होने के भीदिवस कों मनाया जाता है |शाब्दिक प्रबुधता से देश का कल्याण नहीं हो सकता है |इस देश में लिखने वालो कीकोई कमी नहीं है जो अपनी शाब्दिक पटुता से देश हित की कागजी बातें करते करते खुद कों ख़तम कर लेते हैलेकिन सुधार के नाम पर बासठ सालो में तो कुछ भी देखने कों नहीं मिलता |ये सवाल सिर्फ सिर्फ प्रबुद्ध जनों केमन मष्तिष्क में ही नहीं उभरा है , मैं और मेरे जैसे पत्रकारिता के कुछ मेरे दोस्त भी इस दौर में शामिल है |शब्दका अस्तित्व ही क्या है .....क्या आग कहने से आग जलने लगती है , क्या पानी कहने से प्यास बुझ जाती है |नहींबिलकुल नहीं |

सब अपना भड़ास सिर्फ शब्दों में निकालकर शांत हो जायेंगे फिर अगले साल गणतंत्र आयेगा और खुद कों आमआदमी के लेबल से चिपकाकर ये अगली बार फिर लिखेंगे जिनके इन्हें चन्द पैसे मिल जायेंगे | शब्द देश काकल्याण करते तो ये कलम के जादूगर देश और देश की आम जनता के लिए सरकार का ध्यान आकृष्ट करवा पातेदेश के गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या और दिवस पर ऐसे ही आलेख लिखे जायंगे ,हम जैसे मूकपाठक उसे पढ़कर मौन रहने का संकल्प लेंगे और अगली बार फिर देशहित और समाज के समग्र विकास की परिकल्पनाओं में खुद कों शाब्दिक शेर साबित करेंगे|

ये टिकट नहीं आसान ?

राजनीती में बड़े - बड़े लोगो के छक्के छूट जाते हैं| और जब समय चुनाव का हो तो पता चलता है की राजनीत है क्या ? सबसे दिक्कत वाला पल होता है जब टिकट मिलने का समय होता है ,यकीन नहीं होगा आपको की कैसे भाग दौड़ कर के नेता लोग अपनी सेहत बनाते हैं | जब तक टिकट नहीं मिलता है तो खूब प्रदेश की राजधानी से लेकर देश की राजधानी की यात्रा होती है | अगर इतनी सी दौड़ धूप के बाद भी टिकट मिलना पक्का हो तो कोई बात नहीं| सही बात है टिकट के लिए नेताओ को आजकल जितनी जिल्लत झेलनी पड़ रही हैं उतने में तो कोई आम आदमी चार धाम की यात्रा कर आवे | सबसे पहले समर्थक जुटाने पड़ते है इसके लिए देश के टॉप क्लास के मैनेजमेंट वाले लोगो से संपर्क करना होता है |यहाँ जानकारी जरूरी है की ये मैनेजमेंट वाले लोग आईआईएम या अन्य किसी बिजनेस संस्थान से नहीं बल्कि आम जनता से जुड़े हुए संस्थान से होते हैं |उसके बाद भीड़ मैनैजे करनी होती है जितनी ज्यादा भीड़ उतना ज्यादा चांस टिकट मिलने की |अगर लोग नहीं आये तो यकीन कौन करेगा की फलाने नेता की फलाने जगह कुछ पकड़ है | खैर भीड़ जुटाने में नेताजी को शारीरिक और आर्थिक दोनों रूप से तैयार भी होना होता है |जब लोग नेताजी के रैली में आ गए तो नेता लोगो को कुछ यकीन होता है की इस बार टिकट मिल सकता है पूरा यकीन तो होता ही नहीं है |फिर शुरू होता है असली दौर बड़े -बड़े पार्टी पदाधिकारियों से मिलने का ताकि किसी तरह टिकट का जुगाड़ हो जाए |सिर्फ नेताजी ही नहीं कई चमचे भी चम्मच लगा रहे होते है नेताजी के टिकट के लिए | एक तरफ नेताजी लोगो से मिल कर यह आश्वासन भी ले रहे होते हैं की अगर पार्टी टिकट नहीं देती है तो वो निर्दलीय भी चुनाव लड़ सकते है | नेताजी मुलाकातों का दौर जारी रखते है इस दौरान ताकि कोई मौका छूट न जाए |फिर जब आखिरी दौर आता है एक- दो नामों के बीच कांटे का टक्कर होता है तो नेताजी लगातार बड़े नेताओ को अपनी ताकत का उद्धारण देने में कोई कसर नहीं छोड़ते | लेकिन जब टिकट मिलता है और सिर्फ एक को ही मिलता है तो बड़ी मायूसी होती है अन्य में |और जिसको टिकट मिल जाते है वो यह प्रचार करते फिर रहा होता है की किस तरह इतने लोगो को छांट कर उसे टिकट मिला है |सही में इसी समय नेता लोगो को लगता है की कितना मुश्किल होता है टिकर पाना | भगवान से ज्यादा वे अपने पार्टी के भगवानो को शुक्रिया देते हैं |

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह का आज आखिरी दिन- मध्यपूर्व के बारे में मीडिया में इस्राइली मिथ

    इस्राइली सेना के बारे में पश्चिमी मीडिया यह मिथ प्रचारित कर रहा है कि वह कभी गलती नहीं कर सकता। इस्राइली हमेशा जीतेंगे। इस्राइली सेना इस्राइली जनता की रक्षा करेगी। इस्राइली चैनलों में 'हम' की केटेगरी के तहत पश्चिम की प्रशंसा और पश्चिम के साथ इस्राइली रिश्ते के साथ जोड़कर पेश किया जा रहा है। इस्राइल के द्वारा 'अन्य' या पराए की केटेगरी में समूचे अरब जगत को पेश किया जा रहा है। फिलीस्तीनी और अरब जनता को 'न्यूसेंस' और आतंकी के रूप में पेश किया जा रहा है।

इस्राइली प्रचार में कहा जा रहा है इस्राइल का लक्ष्य है 'न्यूसेंस' और आतंकवाद का विरोध करना,उसका सफाया करना।ऐसा करने में किसी भी किस्म के पश्चाताप करने की जरूरत नहीं है। अरब जनता को शक्लविहीन और आतंकी बनाने में पश्चिमी मीडिया का बड़ा हाथ है,खासकर चैनलों का।
      मीडिया आसानी से यह बात भूलता जा रहा है कि इस्राइली सैनिकों के द्वारा फिलिस्तीनी जनता पर निरंतर अमानवीय अत्याचार किए जा रहे हैं।  वे इन लोगों को अपमानित और परेशान कर रहे हैं। ऐसे में फिलीस्तीनी जनता के मन में गुस्सा,घृणा या प्रतिवाद या बदला लेने की भावना पैदा होती है या नहीं ? इस्राइल के सैनिकों के द्वारा गाजा के इलाकों में किया जा रहा अपमानजनक व्यवहार गुस्सा पैदा करता है।मीडिया इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं देता।

गाजा और बेस्ट बैंक के इलाकों में निरंतर बमबारी बच्चों और गर्भवती औरतों के लिए गंभीर रूप से क्षति पहुँचा रही है। बच्चे और औरतें रात में सो नहीं पाते,बच्चों के कान के पर्दे फट रहे हैं,गर्भवती औरतों के बमबारी के धमाकों के कारण गर्भ गिर रहे हैं। पश्चिमी मीडिया में ये सारी बातें एकसिरे से गायब हैं।

इसके अलावा फिलीस्तीनी इलाकों में चली आ रही आर्थिक नाकेबंदी के कारण भी फिलीस्तीनी जनता का जीना दूभर हो गया है। आर्थिक नाकेबंदी के कारण इस्राइल सामूहिक तौर पर फिलीस्तीनी जनता को उत्पीडित कर रहा है। इस सारे अमानवीय कार्यकलाप का आख्यान मीडिया से गायब है। यहीं पर हमें मैनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका के बारे में गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

खासकर आतंकवादी हमलों, युध्द और प्राकृतिक आपदा जैसे संकट के समय मैनस्ट्रीम मीडिया को वस्तुगत भूमिका अदा करनी चाहिए। संकट के समय राजनीतिक ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा होता है। मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। ऐसी अवस्था में ही जनता के हितरक्षक के रूप में मीडिया सक्रिय भूमिका अदा करता है। संकट की अवस्था में मैनस्ट्रीम मीडिया में जो चीज सबसे पहले गायब होती है वह है वस्तुगतता।
     वस्तुगत रिपोर्टिंग के अभाव के कारण अनेक किस्म के अ-जनतांत्रिक पूर्वाग्रहों को मीडिया हवा देने लगता है। मध्य-पूर्व के संदर्भ में खासतौर पर यह बात ध्यान रखने की है कि वहां पर अरब देशों को लेकर मीडिया अपने पूर्वाग्रहों से पूरी तरह बंधा हुआ है। अरब जनता को शैतान के रूप में चित्रित करता रहा है।
  मध्यपूर्व की समस्या की बुनियादी वजह है अमेरिका का इस्राइल की तुलना में अरब देशों के साथ भेदभावपूर्ण संबंध। अमेरिका-इस्राइल के द्वारा अरब देशों के ऊपर कब्जा,उत्पीडन ,बर्बरता और अरब जनता के जीवन का अवमूल्यन।
अमेरिका की नीति है कि वह मध्यपूर्व के संकट को चुनिंदा रूप में सम्बोधित करता रहा है,कभी समग्रता में इस संकट का समाधान खोजने की कोशिश नहीं की गई।वह कभी मध्यपूर्व की समग्र जनता को सम्बोधित नहीं करता। वह उन्हें अपने शांति प्रयासों में शामिल नहीं करता। अमेरिका का सारा जोर इस्राइल की सुरक्षा पर है। यही स्थिति अमेरिकी मीडिया में भी देखी जा सकती है। अमेरिकी जनता को अपने चैनलों पर कभी इस्राइली बर्बरता के चित्र देखने को नहीं मिलते। फिलीस्तीनी इलाकों में इस्राइल ने किस तरह का संकट और तबाही पैदा की है उसके विवरण और ब्यौरे कभी दिखाए नहीं जाते। इस्राइल जहरीले रासायनिक अस्त्रों का इस्तेमाल कर रहा है,जिसके ब्यौरे गैर अमेरिकी मीडिया में मिल जाएंगे। किन्तु अमेरिकी -इस्राइली मीडिया में इसकी एकसिरे से अनुपस्थिति है।

मीडिया में मध्यपूर्व का जो थोड़ा-बहुत कवरेज आ रहा है उसमें ऐतिहासिक नजरिए का अभाव है। समस्त रिपोर्टिंग घटना केन्द्रित रहती है,समस्या और उसके ऐतिहासिक कारणों को कभी पाठक या दर्शक को नहीं बताया जाता। कहने का तात्पर्य यह है कि इस्राइली जुल्म और अरब देशों पर अमेरिका-इस्राइल के अवैध कब्जे के आख्यान के बिना मीडिया मध्यपूर्व की खबरें दे रहा है। चैनलों में यदि कभी अरब विशेषज्ञ शामिल किए जाते हैं तो बहस में एक पक्ष के रूप में,विवादी स्वर के रूप में।

यदि कभी किसी चैनल में अरब देशों के पक्षधर विशेषज्ञों से सवाल किए जाते हैं तो सवाल इस तरह का होता है कि विशेषज्ञ को रक्षात्मक मुद्रा अपनानी पड़ती है। मीडिया की मूल समस्या यह है कि उसे मध्यपूर्व में असमानता और वैषम्य नजर नहीं आता। असमानता और वैषम्य जब तक रहेगा हिंसा जारी रहेगी।

 हिंसा के लिए सिर्फ बहाना चाहिए। हिंसा का मूल कारण घटना विशेष को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। घटना विशेष तो बहाना है,मूल कारण है अमेरिका-इस्राइल का मध्यपूर्व के प्रति असमान नजरिया और भेदभावपूर्ण विदेशनीति। समस्या है इसे को चुनौती देने की।

चैनलों के द्वारा सुनियोजित ढ़ंग से ऐसी भाषा और पध्दति का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे अमेरिकी-इस्राइली हितों और नजरिए के पक्ष में माहौल बना रहे।मसलन् बहुराष्ट्रीय मीडिया ने फिलीस्तीनी नाकेबोदी ,अहर्निश बमबारी और तबाही को युध्द की संज्ञा नहीं दी है। बहुराष्ट्रीय मीडिया ने इसे 'मध्यपूर्व संकट' , 'इस्राइल - हम्मास झगड़ा' 'इस्राइल और आतंकवाद' के बीच के संघर्ष के नाम से ही पेश किया है। इसमें इस्राइली-अमेरिकी विशेषज्ञों ,सैन्य अधिकारियों को ही बार-बार प्रमाण के रूप में पेश किया है।
इस्राइल के द्वारा फिलीस्तीनी इलाकों में किए जा रहे हमलों को आतंकवादी ठिकानों पर किए जा रहे हमले कहा है,जबकि ये सारे हमले रिहायशी इलाकों पर किए गए हैं। इस्राइली बमबारी में बच्चे,औरतें और निर्दोष नागरिक ही मारे गए हैं।ऐसे में इस्राइल का यह दावा कि उसकी सारी कार्रवाई आतंकवादियों के खिलाफ है। गलत साबित होता है। समाचार चैनलों में नंगे रूप में इस्राइली प्रचार अभियान चल रहा है। इसमें मध्यपूर्व का यथार्थ एकसिरे से गायब है। समूचा बहुराष्ट्रीय मीडिया सेंसरशिप और आत्म-सेंसरशिप से गुजर रहा है।
    
                    





गीदड़ का शासन बेहतर


लोकतंत्र निस्संदेह वर्तमान काल की सबसे अच्छी शासन प्रणाली है.लेकिन यह पूरी तरह निर्दोष हो ऐसा भी नहीं है.कम-से-कम भारतीय लोकतंत्र में समय-समय पर कई बुराइयाँ देखने में आई हैं और समय बीतने के साथ मुखर होती चली गई हैं.सबसे बड़ी समस्या जो पिछले दिनों ज्यादा परेशान करने लगी है वो है शासन का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और अयोग्य लोगों का मंत्रिमंडल में आ जाना.हमारे यहाँ सबसे ज्यादा मत पानेवाले को विजयी घोषित कर दिया जाता है.कभी-कभी तो १० प्रतिशत या इससे भी कम मत पाकर भी लोग चुनाव जीत जाते हैं.सबसे ज्यादा परेशानी तो तब आती है जब विधान सभा या लोकसभा में किसी भी एक दल को बहुमत प्राप्त नहीं हो.तब शुरू होता है मोलभाव का सिलसिला.सत्ता-प्राप्ति के लिए अयोग्य और भ्रष्ट लोगों से भी हाथ मिला लिया जाता है.इस तरह मोलभाव के बाद जो लोग मंत्री बनते हैं उनमें जिम्मेदारी का भाव बिलकुल भी नहीं होता.वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल को ही लें जिसके कई मंत्री अपनी जिम्मेदारी से भागते देखे जा सकते हैं.महंगाई मंत्री शरद पवार कह रहे हैं कि महंगाई के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार नहीं हैं वहीं एक और मंत्री कृष्णा तीरथ एक गंभीर गलती होने के बाद कह रही हैं कि ऐसा तो आडवाणी के समय भी हुआ था.अरे बहनजी आडवाणीजी के समय जो हुआ वह अब इतिहास का विषय है और आपने उससे कोई सीख नहीं ली यह शर्म का विषय है.उस काल खंड से आप क्यों तुलना कर रही हैं!जब मंत्रियों में जिम्मेदारी का भाव ही नहीं रहेगा तब फ़िर अच्छा शासन कैसे देखने को मिलेगा.यहीं कारण है कि विदेश नीति से लेकर अर्थ नीति तक प्रत्येक मोर्चे पर सरकार विफल है और देश में अराजकता का माहौल उत्पन्न हो रहा है.हमने सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़ा था कि मध्यकाल में १२ साल तक भारत के ही किसी राज्य में एक गीदड़ ने शासन किया था.शायद उसका शासन भी वर्तमान शासन से बेहतर रहा होगा.

आधे मन से उठाया गया अधूरा कदम



महंगाई ने भले ही आम भारतीयों का जीना मुहाल कर दिया हो केंद्र सरकार के लिए यह सियासत से ज्यादा कुछ भी नहीं है.तभी तो वो इससे निपटने के लिए मूर्खतापूर्ण कदम उठा रही है जिसका निष्फल होना पहले से ही तय है.केंद्र सरकार ने अजीबोगरीब कदम उठाते हुए जनवरी और फरवरी महीने में भारत के प्रत्येक कार्डधारी को जन वितरण प्रणाली के माध्यम से १० किलोग्राम अनाज देने का निर्णय लिया है.इस योजना के द्वारा गेहूं १०.८० रूपये प्रति किलो और चावल १५.३७ रूपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जायेगा.अन्त्योदय और बीपीएल परिवारों को भी इसी दर पर अनाज उन्हें प्रत्येक महीने मिलनेवाले अनाज के अतिरिक्त दिया जायेगा.मनमोहन सिंहजी जिन गरीबों को पहले से २-३ रूपये किलो गेहूं-चावल मिल रहा हो वे क्यों इतने ऊंचे दामों पर अनाज उठाएंगे?दूसरी बात जो भी गेहूं उत्पादक क्षेत्र हैं वहां यह इससे भी कम मूल्य पर मंडी में यूं ही मिल रहा है, फ़िर क्यों उन इलाकों में रहनेवाले लोग यह अनाज लेने को तैयार होंगे?ठीक यही बात चावल उत्पादक इलाकों के लोगों के साथ भी लागू होती है.प्रधानमंत्रीजी यह योजना तो पहले से ही असफल है और इस योजना का ज्यादातर अनाज कालाबाजार में पहुँच जानेवाला है.प्रधानमंत्रीजी आप और आपके सहयोगी या तो मूर्ख हैं या फ़िर अपने को बहुत चालाक और जनता को महामूर्ख समझते हैं.

26.1.10

सड़क भी इनके बाप की....!!शहर भी इनके बाप का.....!!

.........हू...हू...हू...हू.....हा...हा...हा....हा......वाह....वाह.....वाह.......क्या बात है......बल्ले...बल्ले.....वाह मैं तो भूत हूँ....फिर भी मारा जाऊं.....!!मेरे शहर से एक बार फिर अतिक्रमण हटाया जा रहा है....फुटपाथ पर बसे दुकानदारों को मार-मार कर भगाया जा रहा है....उनके सामान जब्त कर लिए जा रहे हैं....उनके साथ बदसलूकी भी की जा रही है....और अगर फुटपाथ-वासी कोई औरत या लड़की है तो उसे गंदे जुमलों सेव सुशोभित भी किया जा रहा है...अभी-अभी जहां पर बैठ-कर कोई कमा-खा रहा था....अपने परिवार के ना जाने कितने लोगों का भरण-पोषण किये जा रहा था.....अभी-अभी के बाद वो खुद भी दो जून की रोटी का मोहताज हो गया है....बाकी परिवार के सदस्यों की तो बात ही जाने दें....!!प्रशासन के पास ताकत है....क़ानून का जोर है.....और अंधेपन की पराकाष्ठा भी.....क्योंकि हर बार की तरह यह कार्यवाही भी एकतरफा है....चंद लोगों यानी महज गरीब-गुर्गों के खिलाफ है.....!!
कई दुसरे द्रश्य मेरी आँखों के सामने हैं.....शहर के कई प्रमुख होटल,जिनके लाजवाब व्यंजनों की महक शहरवासियों की जीभ को लुभाती रहती है....और जिनके मालिकों की पहुँच प्रशासन के "ऊँचे" लोगों तक है....इन होटलों के सामने सारे-सारे दिन खड़े रहते हैं दर्जनों-सैकड़ों वाहन,और जिनसे बाधित होता है शहर की एकदम-बल्कि एकमात्र सड़क पर आवागमन .........!!इसी एकमात्र सड़क पर शहर के सारे प्रमुख शो-रूम और बड़े व्यापारिक स्थल हैं....इन सभी प्रमुख व्यापारिक-स्थलों पर समूचे दिन कुल-मिलकर हजारों वाहन खड़े रहते हैं.....उसके सामने फुटपाथ पर बसे दुकानदारों और उनके कुल ग्राहकों की गिनती राई बराबर भी नहीं....मगर सरकार चाहे किसी की भी हो....शहर के सुन्दरीकरण का होश जब भी प्रशासन को आता है.....उसकी गाज सबसे पहले इन्हीं लोगों पर गिरती है.....ठीक उसी तरह जिस तरह देश का विकास करने के लिए जब भी किसी कारखाने को किसी भी जगह लगना होता है....तो उसकी गाज हमेशा वहां पहले से अवस्थित गाँव-वासियों पर ही गिरा करती है....फिर भले ही उस कारखाने का कोई रत्ती-भर भी फ़ायदा गाँव के शायद के भी आदमी को ना हो....!!
गोया कि सड़क भी इनके बाप की है....फुटपाथ भी इनके बाप का........शहर भी इनके बाप का....गाँव भी इनके बाप का.....!!
........हू....हू.....हू......हू......हा...हा....हा...हा....हा.....मैं तो भूत हूँ ,आदमी की इन कारगुजारियों पर सिवाय हसने के और कर भी क्या सकता हूँ.....ठीक है....ठीक है.....ओ आदम के बच्चे.....तू बस इसी तरह विकास पर विकास किये जा.....इसी तरह सुन्दरीकरण की पींगे बढाता जा.....तेरे बच्चे जुग-जुग जियें....ये बात अलग है....कि वो सब मिलकर तेरा ही खून पियें.....!!.....क्यों ??मेरी यह शुभकामना तुझे अच्छी नहीं लगी.....??तो तू क्या कर रहा है यह सब....तेरे उलटे-सीधे कारनामों से ना जाने कितने ही लोगों का खून होता जा रहा है....तो फिर तू अपने लिए इससे अलग उम्मीद कैसे किये बैठा है....??
मैं भूत अपने परमात्मा से सदा यह विनती करूँगा.....कि इस धरती पर जो भी लोग किसी दुसरे का किसी भी तरह से खून किये जा रहे हैं.....या फिर दूसरों को कहीं से भी उजाड़ने में की भी तरह का सहयोग कर रहे हैं.....उनको परमात्मा भी इसी तरह उजाड़ दे.....मैं तो भूत हूँ....इससे ज्यादा कर भी सकता हूँ.....??