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27.3.10

असाधु को साधु बताकर होता हैं अर्थ का अनर्थ और साधु समाज का उपहास !

इन दिनों "इच्छाधारी-बाबाओं " का अच्छा सीजन चल रहा है |हर दूसरे दिन इस तरह की खबर पढने या सुनने को मिलती है,कि स्वामी फलाना-आनंद का हुआ पर्दाफाश,बाबा के सेक्स रेकेट का हुआ खुलासा |और न्यूज़ चेनलों को मिल जाता है मसाला|

इस तरह कि ख़बरों में न्यूज़ चेनलों कि तो बल्ले बल्ले हो जाती है ,चुपड़ी और दो-दो |खबर को ये लोग बढ़ा-चढ़ा के इस ढंग से पेश करते हैं जैसे कि लस्सी एक्स्ट्रा मलाई मार के | खैर इन कि इस में क्या गलती है,इन लोगों का तो काम ही ऐसा है |



किन्तु हमें तो एक बात ठेस पहुंचाती है कि क्यूं इस तरह के अपराधियों को,क्यूं इस तरह के हर सेक्स रेकेट चलाने वाले गुंडों का मीडिया में "बाबा" और "स्वामी" जैसी उपाधियों से बखान किया जाता है ? क्यूं इस तरह के सरगनाओं को साधू कह कह के पुकारा जाता है |क्यूं हर देह-व्यापार में लिप्त शख्स को साधू कि पहचान दी जा रही है |
सन्यासियों के भेष में छिपे ये अपराधी भगवा - वेश को भी लज्जित करते हैं और ऊपर से हमारा मीडिया भी असाधु को साधू कह कर अर्थ का अनर्थ करने में पीछे नहीं रहता |इस तरह के कर्म करने वाले को साधू कैसे कहा जा सकता है ?"साधू" शब्द के तो मायने ही अलग हैं तो फिर क्यूं दुराचारियों को मीडिया वाले साधू प्रस्तुत करते हैं ? हिन्दू धर्म के पूजनीय ओहदों के लिए कहे जाने वाले "बाबा और स्वामी " शब्दों को अपराधियों के लिए उपयोग में लाया जा रहा है | ये शर्म कि बात है |अपने कारनामों को गुप्त रखने के लिए ऐसे दुर्जन,गेरुआ-भेष का सहारा क्या ले लेते हैं हमारा मीडिया उन्हें साधू या बाबा बता के दुहाई देता रहता है |अरे !आप लोग अपराधी के अपराध उजागर कर रहे हो या सज्जनों और संतों का मखौल उड़ा रहे हो ?अपराधी को स्वामी की बजाय अपराधी ही क्यों नहीं बताया जाता ? क्यों उसे साधू बता कर,साधू शब्द पर लांछन लगाया जाता है,उस के मायने बदले जाते हैं ?


इस तरह के अपराधी को बाबा बताया जा रहा है जो नाग से भी खतरनाक होता है |क्या कारण है कि हर इस तरह के घिनौने कृत्य करने वाला जालिम संत ही पुकारा जाता है मीडिया में ?
सिर्फ अपनी टी आर पी और खबर में मसाला डालने के लिए असाधु को साधू बना दिया जाता है |

इस तरह के मुजलिमों को,जो अपने काले धंधे चलाने के लिए भगवा-वस्त्रों का सहारा लेते है को साधू या स्वामी कह कर कम से कम संतों का तो अपमान न करें | मेरा निवेदन है कि जिस्मफरोशी सरीखे धंदे करने वालों को "महात्मा" कि संज्ञा न दें | ये अर्थ का अनर्थ है |



कुलदीप गौड़

----चुटकी----

नौकर खाए
सूखी रोटियां
कुत्ता उड़ाए माल,
एक ही घर में
रहते दोनों,
कौन, किस से
करे सवाल।

26.3.10

कुंता

अब
जबकि छोड़ आया हूँ  मैं
कुंता को बरघाट*
और भूल चुका हूँ
उसका सादा-सा चेहरा
दो ही दिनों में,
तब भी,
क्यूँ कर रहा हूँ
उस दिन का विश्लेषण
अपने मित्र के साथ उस
सूने से पार्क में
अपरिचित मुर्गाबियाँ देखते हुए
शाम को
क्या इसलिये कि
पूछ रहा है वह
उस रात की शुरूआत
जब उतरा था
स्त्रियों की तरह
आँखें बन्द कर मैं
समाधि में,
और कुछ ही देर बाद
किसी शरणार्थी-सा
दुबक गया था
उसके भीतर
और
खरोंचता ही रहा था
जाने कितनी देर
छाती पर गुदे
गोदने को.............,
             ”हाँ,केवल दो रोज़ में ही
              उतर गई थी
              बोतल में.......”  मैंने कहा
पर भूल गया जान के भी
उसको बताना कि
-बेझिझक थी कुंता
-बखान से परे...........,
उस ढुलक चाल से उतरती
उघरारी रात में
दरख़्तों को छूती  बहती बयार में
जब ज़िंदगी
छटपटायी थी
तब अधकच्च मँजरियों की गंध लिये
छूने दिया था उसने मुझे
स्वयं को..............,
और ढह गया था मैं
उस आदिम उच्छावास में
जबकि होता उल्टा है
              “बदचलन होगी...”मित्र बोला
              “नहीं...................,”
पर रात सरक रही थी
चुपके से
आढ़त में माँगे
अहसास लिये,
और कुंता भी…....,चली गई,
पर उस रात
खोला था उसने भेद
कि मुझसे भी पहले
किये थे कई
आलिंगन,
पर छूने दिया था उसने
सिर्फ़ मुझे ही
खुद को......................!
अब 
जबकि भूल चुका हूँ
उसका सादा-सा चेहरा
तीन ही दिनों में
तब भी क्यूँ..............................|”
*बरघाट-एक जगह का नाम
प्रणव सक्सेना
amitraghat.blogspot.com            

‘बिग बी’ अमिताभ पर विवादः ये कैसा सम्मान है?

विवादों से दूर रहने का प्रयास करने वाले बिग बी अमिताभ बच्चन मुंबई के बांद्रा बरली सी लिंक के उद्घाटन समारोह में अपनी मौजूदगी को लेकर न चाहते हुए भी विवाद का हिस्सा बन गए। मंच पर हंस-हंसकर बतियाने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने यह कहकर सभी को चौंका दिया कि यदि उन्हें अमिताभ के आगमन का पता होता, तो वह खुद जाते ही नहीं क्योंकि अमिताभी गुजारात सरकार के ब्रांड एंबेसडर हैं। यह बात अलग है कि उनकी सरकार के प्रिय लोक निर्माण मंत्री ने ही उन्हें बुलवाया था इस बाबत बकायदा विज्ञापन भी छपे थे। भला यह कैसे संभव था कि मुख्यमंत्री का इसका पता नहीं था। अमिताभ की मौजूदगी को कांग्रेस हजम नहंी कर पायी। कांग्रेस आलाकमान ने कांग्रेसियों की नाराजगी को भी जायज करार दे दिया है। मुख्यमंत्री यह कहकर भी सम्मानजनक अपमान कर रहे हैं कि सरकारी कार्यक्रम में निमंत्रण भेजते वक्त पर्याप्त सावधानी बरती जानी चाहिए। एक महानायक का यह कैसा सम्मान है यह तो नाराज लोग ही जाने, लेकिन इतनी बात उनको समझ में जरूर आनी चाहिए कि सी-लिंक किसी की जागीर नहीं बल्कि राष्ट्र का गौरव है, ओर राष्ट्र का गौरव अमिताभ से भी बढ़ा है इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। कभी कांग्रेस परिवार के करीबी रहे अमिताभ ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन कांग्रेस उनकी मुखालफत पर उतर आयेगी। अमिताभ जैसी शख्सियत पर कोई टिप्पणी करना बेमानी जरूर है, लेकिन उन्हें समझ भी आ रहा होगा कि देश की राजनीति किसी दिशा में जा रही है। वह समाजवादी पार्टी के लिये ‘यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम’ का जोर लगाकर पहले भी विवादित हो चुके हैं अब उनके गुजरात सरकार के ब्रांड एंबेसडर होने को हवा दी जा रही है। वैसे सदी के महानायक को पार्टियों के प्रचार करते देखकर लोग आश्चर्यचकित तो होते ही हैं। अपने प्रदेश की जमीनी हकीकत को जनता से बेहतर कोई नहीं जानता। अमिताभ विरोधियों को जवाब दे रहे हैं कि जो लोग नरेंद्र मोदी से उनके जुड़ाव के आधार पर विरोध कर रहे हैं उन्हें टाटा-अंबानी जैसे लोगों का भी विरोध करना चाहिए वह गुजरात के विकास में खासा योगदान दे रहे हैं।

जनवितरण प्रणाली:भ्रष्टाचार की नाली-ब्रज की दुनिया

पूरा भारतवर्ष पिछले कुछ वर्षों से महंगाई से परेशान है.महंगाई से निपटने के लिए जनवितरण प्रणाली के नाम से पूरा-का-पूरा एक तंत्र काम करता है.इसके माध्यम से सरकार द्वारा जनता को सस्ते दरों पर सामान दिया जाता है.इसके लिए सरकार हजारों करोड़ रूपये की सब्सिडी देती है.लेकिन इस मन से भी तेज गति से बढती महंगाई के युग में सबसे दुखद बात यह है कि यह जनवितरण प्रणाली पूरी तरह से बेअसर साबित हो रही है.सरकार द्वारा दी जानेवाली अन्य सब्सिडियों की तरह इसमें दी जानेवाली सब्सिडी भी तंत्र चट कर जा रहा है और जनता के हाथ लगता है कुछ भी नहीं.यह प्रणाली अकस्मात भ्रष्ट हो गई हो ऐसा नहीं है.इसे भ्रष्टाचार का रोग लगा है धीरे-धीरे और अब स्थितियां इतनी बिगड़ चुकी हैं कि या तो केंद्र और राज्य सरकारों को इससे निबटने का उपाय ही नहीं सूझ रहा है या फ़िर वे यथास्थितिवादी है और सोंचती हैं कि जैसा चल रहा है चलने दो मेरा क्या जाता है?यह विभाग इतना भ्रष्ट हो चुका है कि भ्रष्ट विभागों की अगर कोई सूची बने तो बांकी विभाग काफी पीछे छुट जायेंगे.भ्रष्टाचार की यह नाली निकलती है जिला आपूर्ति अधिकारियों के दफ्तरों से.आप नई दुकान के लिए लाईसेंस लेने जाएँ तो मैं बांकी राज्यों की बात नहीं जानता लेकिन बिहार में आपसे अधिकतर जिला आपूर्ति कार्यालयों में ५० हजार से लेकर १ लाख रूपये तक की रिश्वत मांगी जाएगी.अब दुकानदार इस चढ़ावे की क्षतिपूर्ति कैसे करे, तो वह इकट्ठे दो-तीन महीनों का राशन बेच देता है.तो इस तरह होती है भ्रष्टाचार की इस दुकान की शुरुआत.पर भ्रष्टाचार के मार्ग पर उठा यह कदम दुकानदार बीच में रोक सकता है ऐसा भी नहीं है.इस गाड़ी में तो ब्रेक है ही नहीं.आपसे प्रत्येक महीने किरानियों और अधिकारियों की ओर से कुछ-न-कुछ रकम मांगी जाएगी अन्यथा दुकान का लाईसेंस रद्द होने का खतरा आपके सिर पर मंडराता रहेगा.जबसे अन्त्योदय योजना के तहत सब्सिडाइज्ड दर पर गेंहू और चावल दिया जाने लगा है, दुकानदारों की कमाई (अवैध) और भी बढ़ गई है.अधिकारयों की तरह वे भी लालची जो ठहरे.होता यह है कि बहुत से गरीब तो गरीबी के कारण अनाज लेने जाते ही नहीं हैं और ज्यादातर बार अनाज की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती.हर दो-तीन महीने में एक बार यह सारा का अनाज कालाबाजार में पहुँच जाता है.इतना ही नहीं कुछ यही हाल होता है किरासन तेल का भी.शहरों और महानगरों में उतना बुरा हाल नहीं है लेकिन गावों में जहाँ और भी ज्यादा गरीबी है वहां के अधिकतर डीलर ऐसा ही करते हैं.कुछ डीलरों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी हो गई है कि वे स्थाई संपत्ति यथा जमीन और मकान भी धड़ल्ले से खरीद रहे हैं.हालांकि इन डीलरों की गावों में कोई ईज्जत नहीं करता लेकिन इससे इनका क्या बिगड़ता है?मेरे पिताजी एक छोटे स्टेशन के स्टेशन मास्टर के बारे में बताते हैं कि वह जब ट्रेन स्टेशन पर आकर लगने को होती तब घंटी बजाता.लोग गिरते-पड़ते टिकट खिड़की की ओर दौड़ते.वह स्टेशन मास्टर सभी यात्रियों के कुछ-न-कुछ खुल्ले रख लेता और कहता कि खुल्ले नहीं हैं.लोग गालियाँ देते हुए ट्रेन की ओर दौड़ते.एक बार गर्मी की छुट्टियों में उसका बेटा वहां आया हुआ था उसने पिता से शिकायत की कि वे ऐसा काम क्यों करते हैं जिससे लोग उन्हें गालियाँ देते हैं तो उसने हंसकर कहा बेटा कुछ लेते तो नहीं हैं कुछ देकर ही तो जाते हैं चाहे गालियाँ ही सही.कुछ इसी तरह हमारा यह विभाग भी बेशर्म हो चुका है.अब तक किसी भी राज्य या केंद्र सरकार ने इस विभाग से भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया है जबकि सबको पता हैं कि यह जनवितरण प्रणाली की जगह भ्रष्टाचार वितरण प्रणाली बन चुकी है.कब तक जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सब्सिडी के माध्यम से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता रहेगा?कोई भी दल जब तक विपक्ष में रहता है तब तक तो भ्रष्टाचार मिटाने के लम्बे-चौड़े वादे करता है परन्तु सत्ता में आते है इस भ्रष्ट प्रणाली का एक हिस्सा बनकर रह जाता है.सभी राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाकर इस विभाग से भ्रष्ट अधिकारियों को बर्खास्त करने की दिशा में कदम सुनिश्चित करना चाहिए.केंद्र को राज्यों के साथ भी इस मामले में बातचीत करनी चाहिए.अधिकारियों पर कार्रवाई होते ही दुकानदार खुद ही रास्ते पर आ जायेंगे.

एक था बचपन !

एक था बचपन !!

बड़ा ही शरारती,बड़ा ही नटखट !!
वो इतना भोला था कि
हर इक बात पर हो जाता था हैरान
बन्दर के चिचियाने से,तितली के उड़ने से
मेंढक के उछलने से,चिड़िया के फुदकने से !!
वो बड़ो को बार-बार करता था डिस्टर्ब.....
काम तो कुछ करता ही नहीं था,और साथ ही
खेलता ही रहता था हर वक्त !!
कभी ये तोड़ा,कभी वो तोड़ा और कभी-कभी तो
हाथ-पैर भी तुडवा बैठता था खेल-खेल में बचपन
तो कभी कुछ जला-वुला भी लेता था अनजाने में बचपन
बचपन कभी किसी की कुछ सुनता भी तो नहीं था ना....!!
बस अपनी चलता था और तब.....
मम्मी की डांट खाता तो सहम-सहम जाता था बचपन
पापा मारते-पीटते तो सुबकने लगता था बचपन
मगर अगले कुछ सेकंडों में ही सब कुछ भूल-भुला कर
वापस खेलने लगता था बचपन !!
और मम्मी की गालों की पप्पी ले लेता
और पापा के गले में झूल जाता था बचपन...!!
सब कुछ तुरत ही भूल जाता था बचपन
मम्मी की डांट....पापा की मार.....
और बदले में वह उन्हें देता था
अपना प्यार....अपना दुलार.....!!

बचपन की बातें ख़त्म....
और बड़प्पन की शुरू.....!!
बड़ों के बारे में तो बस इतना ही कहना है कि
जिंदगी बचाई जा सकती थी
अगरचे बचा कर रख लिया जाता
अपना ही थोडा सा भी बचपन.......!!!

पागल

पत्नी कहती है पति से
तुम पागल तो नहीं हो?
इसके जवाब में पति मुस्कुराता है
यहाँ तक कि पत्नी को बाहों में लेकर
चूमने लगता है
बाकी उनके बीच क्या होता है या क्या
नहीं होता हमें नहीं मालूम
पति कहता है फ़िर से प्लीज़ मुझे पागल कहो न
इस बार पत्नी सिर्फ़ मुस्कुराती है

ऐसे पति इतने पागल होते हैं
कि पत्नी बहुत दिनों तक उन्हें
पागल न कहे तो घबरा जाते हैं
और ऐसे हालत पैदा करते हैं कि
पत्नी को उन्हें पागल कहना ही पड़ता है

मेरे ख्याल से आप दोनों उन्हीं में से हैं।


विष्णु नागर

http://annapurnaabhi.blogspot.com/

तू औरत है औरत...प्रतिक्रिया ना दे!!


शादी से पहले यौन सम्बन्ध बनाना अपराध नहीं है. इन मुद्दों को इतना complicated बना कर मजेदार तरीके से परोसना, डिस्कशन करते वक़्त चेहरे पर एक घटिया मुस्कराहट, चीप लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हुए परसनल प्रहार बेहद आम है. जब भी इस तरह के किसी मुद्दे पर टीवी शो में किसी महिला को बुलाया जाता है तो मर्दों को घटियापन पर उतरते देर नहीं लगती... डीबेट प्रोग्राम्स में पूजा भट्ट पर बातों बातों में कीचड़ उछालना लगभग सभी ने देखा होगा. एक सज्जन ने एक शो में बहस के दौरान स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस प्रीती को कहा था 'अगर आप को सड़क चलते कुछ भी पहनने का अधिकार है, तो मुझे भी आपके साथ कुछ भी करने का अधिकार है'

यौन सम्बन्ध अपराध हो ना हो पर ऐसे टुच्चे शब्दों का इस्तेमाल वो मानसिकता दिखाता है जो पूरे समाज पर छाई हुई है.
अगर आपको अपनी so called आबरू प्यारी है तो इनसे लड़ा भी नहीं जा सकता..लफ़्ज़ों से आपके कपडे नोच लेंगे, नज़रों से आप को बेआबरू कर देंगे...मज़े की बात तो ये है की ये वही लोग हैं जो नारी जाती की भलाई और इज्ज़त की दुहाई देते हैं. जबकि खुद मौका मिलते ही अपना नकाब उतार फेंकते हैं, उस परदे के पीछे का चेहरा सड़क चलते लड़कियों की कमर पर हाथ मार कर निकल जाने वालों से हुबहू मिलता है.
शादी के बाद पति की पत्नी पर जोर ज़बरदस्ती को ये कह कर ढंका जाता है की पत्नी अगर शारीरिक ज़रूरतों को पूरा नहीं करेगी तो पति बाहर का रास्ता देखेगा. वहीँ अगर यही बात पत्नी पर लागू की जाए तो वो औरत बदचलन कहलाएगी. अगर दो लोग अपनी मर्ज़ी से करीब आते हैं तो इस पर ख़राब करेक्टर का दोष भी लड़की पर. अभी हाल ही में एक किस्सा बहुत करीब से देखा एक कपल को ऑफिस में 'किस' करते देखा गया. (जो की मैं मानती हूँ की personal रिश्तों को प्रोफेशनल जगहों से दूर रखना चाहिए या कम से कम प्रोफेशनली बिहेव करना ही चाहिए). इन हालात में वही हुआ जो होता आया है. लड़की को terminate कर दिया गया जबकि वो लड़का अब भी ऑफिस में धड़ल्ले से काम करता है हँसता बोलता है.
किसी भी फिसिकली इन्वोल्व्मेंट में लड़की का ही सर झुकता है जबकि उसमें आदमी और औरत दोनों भागीदार होते हैं.
कहते हैं इज्ज़त लुट गयी...अरे काहे की इज्ज़त जो कुछ हुआ उसमें क्या लड़कों का कोई role नहीं होता या तो दोनों की इज्ज़त लुटी या तो किसी की भी नहीं...इज्ज़त का टोकरा औरत ही क्यूँ उठाये.
कभी अपना दुपट्टा सही से ओढ़ लो और कहीं अपना मुंह चुपचाप बंद कर लो...तुम औरत हो प्रतिक्रिया देना तुम्हारा काम नहीं.

fauziya reyaz
http://iamfauziya.blogspot.com

लो क सं घ र्ष !: उ0प्र0 सरकार का गुप्त हिन्दुत्व एजेन्डा

मुजफ्फरनगर जिले की खतोली तहसील में स्थित थाना मंसूरपुर के ग्राम पोर बालियान में एक मस्जिद को गिरा कर उस पर पुलिस चौकी स्थापित करने का मामला चर्चा में आया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार को संज्ञान में लेते हुए उ0प्र0 अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष एस0एम0ए0 काजमी ने मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी से रिपोर्ट भी तलब कर ली है। पुलिस का कहना है कि उसने ग्राम पंचायत की भूमि पर नाजायज तौर पर बनी इमारत से उसे रिक्त कराया है। जबकि मुस्लिम पक्ष के अनुसार ग्राम पंचायत की भूमि का पट्टा एक मुसलमान शरीफ को हुआ था जिसके मरणोपरांत उसके लड़के ने इस पर मस्जिद दारूल उलूम देवबन्द से फतवा लेने के बाद बनवाई थी।
यह बात बिल्कुल दुरूस्त है कि किसी विवादित भूमि पर मस्जिद नहीं बनवाई जा सकती है मस्जिद के लिए शरई हुक्म है कि वह भूमि हर विवाद से पाक-साफ हो और उसे ईश्वर के नाम पर वक्फ किया गया हो। मुजफ्फर नगर की मस्जिद यदि ग्राम समाज की भूमि पर धोखाधड़ी से बनवाई गई थी तो वह मस्जिद की ईमारत तो हो सकती है अल्लाह का इबादतगाह नहीं।
मुजफ्फरनगर की तहसील खतोली के ग्राम पोर बालियान की यह मस्जिद जो उस क्षेत्र के एक पुलिस अधिकारी राजू मल्होत्रा ने बुलडोजर चलवा कर उस पर पुलिस चैकी का बोर्ड लगवाने का कार्य बगैर जिला प्रशासन के किया जैसा कि जिलाधिकारी संतोष कुमार यादव के बयान से जाहिर है जो समाचार पत्रों में आया। विवादित भूमि का पट्टा ग्राम प्रधान द्वारा वर्ष 1967 में गांव के एक भूमिहीन शरीफ अहमद के नाम हुआ था जिनके मरने के पश्चात उनके वारिस पुत्र द्वारा इस पर मस्जिद का निर्माण बाकायदा दारूल उलूम देवबंद से फतवा हासिल कर करवाया था। गांव के लोग उस पर वर्षों से नमाज अदा करते चले आ रहे थें।
यह सही है कि सार्वजनिक भूमि पर बगैर अनुमति के केाई धार्मिक स्थल नहीं निर्मित किया जाना चाहिए और जिसको गंभीरता से लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी प्रांतों से सितम्बर 2009 के पूर्व में सार्वजनिक भूमि पर निर्मित धार्मिक स्थलों को चिंहांकित करने के निर्देश भी दिए हैं।
परन्तु पुलिस प्रदेश के हर थाने व पुलिस लाइन में अवैध रूप से बनाए गये मंदिरों के बारे में क्या कहेगी? क्या यह नेक काम अपने स्वयं के घर से नही प्रारम्भ कर सकती थी? अकेले मस्जिद पर कार्यवाई करना क्या न्यायोचित है?
आज प्रदेश में मस्जिद बनाने के लिए मुसलमान डरता है वक्फ बोर्ड जिसका अपर सर्वे आयुक्त स्वयं जिले का हाकिम यानि जिलाधिकारी होता है वह मस्जिद के नाम पर अनुमति यह कहकर नहीं देता कि इससे शांति भंग होने की संभावना उत्पन्न हो सकती है। मुसलमानों को साफ तौर पर संविधान में दी गई उनकी धार्मिक आजादी का उल्लंघन है परन्तु मंदिर बनाने के लिए कोई रोक नहीं चाहे वह थाना हो या कोतवाली या तहसील परिसर।
कहने को तो भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है परन्तु धर्म निरपेक्षता का अनुसरण करने के क्या यही तौर तरीके हैं कि देश के दूसरे नम्बर के बहुसंख्यक जिन्हें अल्पसंख्यक कहकर उन्हें विशेष अधिकार का दर्जा भी दिया गया है उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर इस प्रकार से आघात किया जाये। उनकी सामाजिक व शैक्षिक उन्नति पर सम्प्रदायिक भावना से ओत प्रोत होकर अंकुश लगाया जाए यह कहाँ का इंसाफ है क्या खुफिया तौर पर प्रदेश में यह हिन्दुवत्व वाली विचारधारा के एजेण्डे का हिस्सा तो नहीं।

मो0 तारिक खान

अमिताभ...राजनीति और रेखा...

                                                                        (उपदेश सक्सेना)

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को ना तो कभी राजनीति रास आयी न ही अभिनेत्री रेखा, बावजूद इसके उन्हें इन दोनों के नाम से ज्यादा जाना जाने लगा है. कभी अपनी माँ तेजी बच्चन के इंदिरा गाँधी से सहेली के रिश्ते और राजीव गाँधी से बचपन की दोस्ती के दम पर इलाहाबाद लोकसभा सीट से संसद पहुंचे बच्चन उस समय बिग-बी नहीं बने थे. अब जब उन्हें यह तमगा हांसिल हो गया है, एक बार फिर उनका राजनीति के प्रति प्रेम जागृत हो गया है. कई साल पहले कलकत्ता(अब कोलकाता) से आया अमरसिंह नाम का प्राणी अब उनका छोटा भाई बनकर इठलाता घूमता है. वह राजनीति में सक्रिय (?) है, सो बड़े भैया में भी उसने यह कीड़ा फिर जगा दिया. पहले कांग्रेस, फिर समाजवादी पार्टी और अब भाजपा की सरकारों वाले राज्यों में बच्चन की रुचि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को इंगित करती है. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हों या कर्नाटक के येदियुरप्पा, केरल की गठबंधन सरकार हो या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, बिग-बी हर दर पर सर धर रहे हैं. अमरसिंह को अब समाजवादी पार्टी ने बाहर कर दिया है, सो बच्चन को भी नया राजनीतिक मंच चाहिए. कांग्रेस उनकी भाजपा से नजदीकियों के कारण खफा है. शिवराज तो परेशान लोगों के खेवनहार बनने की प्रक्रिया शुरू कर ही चुके हैं, महिला हॉकी टीम को उन्होंने ऐसे समय आर्थिक मदद की जब हॉकी फेडेरशन उसकी नहीं सुन रहा था, बाद में पुरुष हॉकी को भी शिवराज ने निराश नहीं किया, वे जानते हैं कि, गोलकीपर को चकमा देकर गोल कैसे किया जाता है. शिवराज ने अब बच्चन को मध्यप्रदेश के एक प्रोजेक्ट से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू भी कर दी है. अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र की सत्ता विलासराव देशमुख की एक गलती से मिली थी, वे अच्छे खिलाड़ी भी नहीं माने जाते, वक़्त की बयार को भी समझने की खूबी उनमें नहीं है, सो उन्होंने अमिताभ से वर्ली सी लिंक के उदघाटन समारोह में हाथ मिला कर अपने ही गोल पोस्ट में गोल मार दिया. विरोधियों को हमेशा मौके का इंतज़ार होता है, इस 'हाथ मिलाई' को दिल्ली के कांग्रेस दरबार में 'दिल-मिलाई' बताया गया. वो तो भला हो राकांपा के उस मंत्री का जिसने चव्हाण को यह कहकर बचा लिया कि बच्चन को उन्होंने आमंत्रित किया था. सत्ता की खातिर अब चव्हाण ने बच्चन के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने से कान पकड़ लिए हैं.
अब बात ख़ूबसूरत रेखा की, आज भी जब किसी फिल्म समारोह में रेखा, बच्चन के सामने पड़ जाती हैं तो 'सिलसिला' वहीँ थमता नज़र आने लगता है. किसी ज़माने की हॉट मानी जाने वाली यह जोड़ी अब कितनी बेबस हो गई है कि सार्वजनिक रूप से उनके बीच नमस्कार का रिश्ता भी नहीं बचा. बाबा रामदेव के चर्चित होने के काफी पहले से रेखा योग साधना कर रही हैं, मगर उनकी सारी मुद्राएँ भी बच्चन के नाम पर आकर भावहीन हो जाती हैं. जबसे बच्चन ने ब्लोगिंग शुरू की है, उन्हें लेकर विवाद ज्यादा होने लगे हैं. ना तो इस देश में सच सुनने वाले बचे हैं ना ही दिल की बात ही किसी को समझ आती है. मुंशी प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी 'बूढी काकी' में कहा गया है, 'बुढापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है....'अमिताभ बुढा गए हैं, 'पा' भी वे हाल ही में बने हैं. वे दूसरों के लिए ही सही, यह समझ क्यों नहीं जाते कि अब ना तो राजनीति उनके बस की रही न ही रेखा...!
मेरे बारे में- पिछले २३ साल से खबर मेरी जिन्दगी है, खबर बिछाता हूँ, खबर ओढ़ता हूँ, खबर जीता हूँ.
updesh.saxena@gmail.com

लिव इन रिलेशन में नहीं थे राधा-कृष्ण

मथुरा। राधा और कृष्ण का अलौकिक प्रेम पहली बार बहस के केंद्र में आया है। लिव इन रिलेशन अदालती बहस के पहले से अस्तित्व में है। समय को कानून की दृष्टि से परिभाषित करने से समाज की अपनी धारा और बदलता वक्त बंधता भी नहीं है। सवाल यह नहीं है कि लिव इन रिलेशनशिप बदलते समय की जरुरत है या नहीं, सवाल यह है कि किस शिलालेख, साहित्य या शास्त्र में कहा गया है कि राधा-कृष्ण लिव इन रिलेशन में थे। कान्हा की नगरी में तो कहीं-कहीं कृष्ण खुद ही राधा रूप में नजर आते हैं तो कभी राधा और कृष्ण एक दिखते हैं।
बरसाना के लाडलीजी मंदिर में भगवान कृष्ण की कृष्ण के रूप में नहीं, सखी रूप में पूजा होती है। पूजा ही नहीं, उनका श्रृंगार भी सखी रूप में होता है। यहां दो अलग-अलग मूर्तियां जरूर हैं, लेकिन दोनों को सजाने-संवारने और पूजने में समानता रखी जाती है। भाव यही है कि दोनों एक ही हैं। किताबें कहती हैं कि कृष्ण ने किशोर वय पार करते-करते वृंदावन छोड़ दिया, जो उनकी रास लीलाओं के लिए ख्यात है। वह मथुरा आए और बारह साल की उम्र में कंस का संहार किया। कंस के वध की सूचना मिलने पर जरासंध मथुरा के लिए रवाना हो गया। जरासंध के आने की सूचना मिलते ही भगवान कृष्ण अपनी मुरली और मुकट यमुना किनारे छोड़कर गुजरात के लिए चले गये। उन्होंने गोपियों को समझाने के लिए उद्धव जी को भेजा। कृष्ण सबसे पहले डांगौरजी गये, जहां उनके रणछोर स्वरूप के दर्शन होते हैं।
कृष्ण को अकेले पूजने वाले भी हैं, राधा को मानने वाले भी हैं और दोनों की युगल छवि को पूजने वाले भी वैष्णव हैं। दोनों को लक्ष्मी-नारायण का रूप भी माना जाता है। कृष्ण को पूज्य मानने वाले वैष्णव उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं। शुरूआती पूजा की परंपरा को देखें तो दो शताब्दी ईसा पूर्व में पतंजलि का समय माना जाता है। तब वासुदेव कृष्ण के रूप में उनकी पूजा शुरू हुई, लेकिन उससे पहले उन्हें बाल कृष्ण के रूप में पूजा जाने लगा था। ग्रीक दूत मैगस्थनीज और कौटिल्य के अनुसार उन्हें सुप्रीम पावर के रूप में पूजा गया। भक्ति परम्परा में उनकी रास लीलाओं को जहां डिवाइन प्ले कहा गया है। सातवीं व नौैंवी शताब्दी से पहले दक्षिण भारत में उनकी भक्ति का प्रसार-प्रचार हुआ। बारह वीं शताब्दी में जब जयदेव का गीत-गोविंद आया तब उनकी रास लीला से लोग प्रभावित हुए और तब भी उनके अलौकिक रूप को ही पूजा गया। उत्तरी भारत में ग्यारह वीं शताब्दी में निबांकाचार्य, पंद्रहवी शताब्दी में वल्लभाचार्य और सोलह वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने उनके अलौकिक रूप को ही पहचान दी। और तो और वर्ष 1966 से जो भक्ति वेदांत आंदोलन पश्चिम के देशों में चल रहा है, वहां भी राधा-कृष्ण के रिश्तों को लौकिक रूप में परिभाषित करने का प्रयोग नहीं किया गया। इन देशों में लिव इन रिलेशनशिप सदियों से है।
इसी तरह परफार्मिग आर्ट्स में जो 150 ईसा पूर्व से प्रचलित हैं, उनमें भी ऐसे आख्यान या कथाएं नहीं हैं। दसवीं सदी से राधा-कृष्ण परफार्मिग आर्ट के सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र रहे हैं, लेकिन न तो उनकी भाव भंगिमा और न ही लोकोक्तियों में उनके शारीरिक मिलन की कोई कहानी सामने आती है। जहां तक पेटिंग्स का सवाल है तो कला के चितेरों ने अपनी कल्पना से उनके युवा रूप को ज्यादा दर्शाया है, जो काल्पनिक अधिक है। इन चित्रों में भी राधा-कृष्ण की लीलाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया। चित्रों के माध्यम से राधा-कृष्ण को एक भी दर्शाया गया। अलावा इसके न तो ऐसी मान्यता वैष्णव और हिंदू समाज में रही है और न ही कोई साहित्य, शिलालेख, संस्कृति उनके लौकिक रूप को दर्शाती है।
Pawan Nishant
http://yameradarrlautega.blogspot.com

संघ की थीम

---- चुटकी-----

संघ
की
थीम,
गडकरी
की
टीम।

---- चुटकी-----
शीला दीक्षित
तैश में,
आग लगा दी
गैस में।

25.3.10

मेरी टिप्पणी पर सेंसर - आडवाणी जी आपसे जबाब चाहिए

एक ब्लोगर का या कहें ब्लॉग पढ़ने वाले पाठक का मूलभूत अधिकार है टिप्पणी देने का और वह भी स्वतंत्र रूप से .यदि ब्लॉग लिखने वाले को टिप्पणी पर आपत्ति है तो उसे हटाने का अधिकार है लेकिन टिप्पणी पर सेंसर यह कुठाराघात  है अभियक्ति की स्वतंत्रता पर . और उस व्यक्ति द्वारा जो हजारो या कहें लाखो लोगो के आदर्श के रूप में स्थापित है . 


आजकल एक फैशन चल गया है ब्लॉग लिखने का हम जैसो की देखा देखी . :-) यह ब्लॉग की समाज में स्थापित होने की गारंटी है . बहुत बड़े बड़े लोग भी ब्लॉग पॉवर का फायदा उठाने की कोशिश में है . ब्लॉग एक माध्यम बन गया है अपने मन की बात कहने का . 


खैर विषय पर लौटते हुए ...........  बड़े बड़े लोग ब्लॉग लिख रहे है उनमे से एक है अपने प्राइम मिनिस्टर बेटिंग 
लौह पुरुष माननीय लाल कृष्ण आडवाणी . आडवाणी जी आजकल ब्लॉग वह भी हिन्दी में लिख रहे है . हिन्दी में ब्लॉग पढ़ने की लालसा लिए में आडवानी जी के ब्लॉग पर पंहुचा . पोस्ट का विषय था विदेश में जमा गुप्त भारतीय धन पर श्वेत पत्र की जरुरत  . पढ़ कर अच्छा लगा छः साल सत्ता सुख के बाद छः साल विपक्ष में बैठने के बाद आडवानी जी को ध्यान आया . 


तुरंत एक टिप्पणी की -   छ साल बहुत होते है इन सब के लिये …………………… आप इतना तो कर सकते है कि भा ज पा के सभी नेताओ से शपथ पत्र दिला दे उनका कोइ ऎसा खाता नही है.ख़ास कर मेनका और वरुण गांधी से 




आडवानी जी ने जो टिप्पणी अपने ब्लॉग पर लगाई वह चौकाने वाली थी उन्होंने मेरी टिप्पणी को सेंसर कर दिया और जो उनके ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी आई उसमे मेनका और वरुण गांधी का नाम नदारत था 


dhiru singh Says:


छ साल बहुत होते है इन सब के लिये …………………… आप इतना तो कर सकते है कि भा ज पा के सभी नेताओ से शपथ पत्र दिला दे उनका कोइ ऎसा खाता नही है.

इसका क्या अर्थ लगाया जाए . मेनका या वरुण गाँधी में ऐसा क्या आपत्तिजनक था जो आडवानी जी ने उसे हटा दिया . मुझे कोई परेशानी नहीं थी कि आडवानी जी मेरी टिप्पणी को बिलकुल हटा देते . लेकिन सेंसर पर मुझे एतराज है . 

क्या सेंसर मेरी स्वतंत्र अभियक्ति पर रोक नहीं . क्या इसे फासीवादी कार्यवाही मानी जाए . यह विषय मेरे लिए महत्वपूर्ण है और मैं आप सब से संरक्षण मांगता हूँ . 

इस तरह से तो टिप्पणी देना व्यर्थ सा लगता है . और मैं इस तरह के सेंसर के पूर्ण रूप से खिलाफ हूँ वह भी आडवाणी जी के द्वारा जो मेरे पिता तुल्य है .

क्या  आप मेरी आवाज़ के साथ है ?

घातक एवं लाइलाज बीमारी है डी.वी.टी.

इसको जानने के लिए यहाँ चटका लगाये।

श्रेष्ठ सृजन


धर्म के ना रंग होते, अधर्म फिर होता नहीं…


जीत के आगे छुपा,
है लोभ का कोहरा घना…
हार कर देखा है मैंनें,
शर्म से जो मुंह बना..

परिणाम गर होते नहीं तो,
कितना सुन्दर दृश्य होता..
फिर विफल होता ना कोई,
और ना कोई दिव्य होता…

न कर्ण ही तब छला जाता,
और न लंका जला जाता…
दूर उस एक गांव में फिर,
नक्सली ना पला जाता..

धर्म के ना रंग होते,
अधर्म फिर होता नहीं…
बेफ़िक्र हो सोते सभी,
बच्चा कोई रोता नहीं…

राहुल कुमार

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुर्दशा

उच्चतम न्यायालय की एक समिति के इस निष्कर्ष पर तनिक भी आश्चर्य नहीं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली नितांत अक्षम और भ्रष्ट है। भले ही उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश डीपी वधवा की अध्यक्षता वाली केंद्रीय सतर्कता समिति ने यह न स्पष्ट किया हो कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सब्सिडी पर सालाना 28000 करोड़ रुपये की जो भारी-भरकम राशि खर्च की जाती है उसमें कितना हिस्सा भ्रष्ट तत्वों की जेबों में चला जाता है, लेकिन इस प्रणाली में जिस तरह हर स्तर पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है उसे देखते हुए पांच-दस प्रतिशत राशि का भी सदुपयोग होने की उम्मीद नहीं है। चूंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त है इसलिए इसमें संदेह है कि कुछ कड़े कदम उठाने से अपेक्षित सुधार आ जाएगा। ऐसा होने की उम्मीद इसलिए और भी कम है, क्योंकि अफसरशाही, राशन दुकानदारों और दलालों के बीच गठजोड़ कायम हो चुका है। इसके चलते गरीबों का खाद्यान्न राशन दुकानों तक पहुंचे बगैर सीधे आटा मिलों तक पहुंच जाता है। यह शर्मनाक है कि यह काम दिल्ली तक में होता है। जब दिल्ली में यह हाल है तो इस पर सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि शेष देश में और भी बुरी स्थिति होगी। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि राज्य सरकारें सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के लिए बिलकुल भी गंभीर नहीं हैं। स्पष्ट है कि केंद्र सरकार निर्धन तबके को 28 हजार करोड़ रुपये की जो सब्सिडी देती है वह राज्य सरकारों की लापरवाही के चलते अफसरशाही, राशन दुकानदारों और दलालों के गठजोड़ को उपलब्ध हो रही है। एक तरह से केंद्र और राज्य सरकारें भ्रष्टाचार की एक सार्वजनिक प्रणाली चला रही हैं। यह समझना कठिन है कि गरीबों के नाम पर ऐसी प्रणाली चलाते रहने का क्या अर्थ जो सिर्फ भ्रष्ट तत्वों को मालामाल कर रही हो? वैसे तो राज्य सरकारें बात-बात में केंद्र को कठघरे में खड़ा करती रहती हैं, लेकिन सच यह है कि वे अपनी हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने में सर्वथा नाकारा हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के भ्रष्टाचार में जकड़ जाने के लिए राज्य सरकारें केंद्र को दोष नहीं दे सकतीं। उन्हें इसका पूरा-पूरा अधिकार है कि वे इस प्रणाली को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए हर संभव उपाय करें। शायद ही कोई राज्य सरकार हो जिसने इस प्रणाली में कोई उल्लेखनीय सुधार किया हो। ऐसा लगता है कि केंद्र सब्सिडी बांट कर खुश है और राज्य राशन दुकानें खुलवाकर। वधवा कमेटी ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जो भयावह तस्वीर सामने रखी उसकी हकीकत से केंद्र और राज्य सरकारें पहले से अवगत थीं, लेकिन ऐसा लगता है कि वे उच्चतम न्यायालय के दखल के इंतजार में बैठी थीं। नि:संदेह यह न्यायपालिका का काम नहीं कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुर्दशा देखे, लेकिन उसे इसके लिए विवश होना पड़ा। उसकी विवशता शासनतंत्र के नाकारापन का एक और शर्मनाक उदाहरण है। यदि केंद्र एवं राज्य सरकारें सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार और गरीबों की मदद करने के लिए तनिक भी प्रतिबद्ध हैं तो उन्हें इस प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करके दिखाना होगा। आवश्यकता पड़ने पर इस प्रणाली को खत्म कर निर्धनों को सीधे खाद्यान्न कूपन देने में भी संकोच नहीं किया जाना चाहिए।
सम्पादकीय दैनिक जागरण

हेडली से अमेरिकी प्रशासन का समझौता

पाकिस्तान मूल के आतंकी दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कोलमेन हेडली से अमेरिकी प्रशासन का समझौता भारत के लिए एक आघात तो है ही, आतंकवाद के मामले में अमेरिका के दोहरे आचरणका एक और सबूत भी है। एक बार फिर अमेरिका ने वही किया जो सिर्फ उसके हितों की पूर्ति करने वाला था। हेडली से समझौता कर अमेरिका ने इस आशंका की पुष्टि कर दी कि यह आतंकी लश्कर का गुर्गा होने के साथ-साथ उसकी खुफिया एजेंसी एफबीआई का भेदिया भी था। यह ठीक है कि अमेरिका इस तथ्य पर पर्दा डालना चाहेगा, लेकिन यह निंदनीय है कि इस कोशिश में उसने एक ऐसे आतंकी से समझौता किया जो डेढ़ सौ से अधिक लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार है। इस पर गौर किया जाना चाहिए कि अमेरिकी प्रशासन और हेडली के बीच हुए समझौते की एक शर्त यह है कि उसे भारत और डेनमार्क प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता। चूंकि हेडली डेनमार्क के एक अखबार के दफ्तर में हमला करने की साजिश को अंजाम देने के पहले ही पकड़ा गया इसलिए यह देश शायद ही उससे पूछताछ करने का इच्छुक हो, लेकिन न्याय का तकाजा तो यह कहता है कि उसे भारत लाया जाना चाहिए। कम से कम अब तो हमारे नीति-नियंताओं को यह समझ आ जाना चाहिए कि अमेरिका ने अपने लिए अलग और शेष दुनिया के लिए अलग नियम बना रखे हैं। यह बेहद दयनीय है कि भारत अमेरिका के इस आश्वासन पर राहत महसूस कर रहा है कि उसे हेडली से पूछताछ करने का अवसर दिया जाएगा। इसमें संदेह है कि ऐसा हो पाएगा। हेडली से पूछताछ करने में अमेरिका इतने अड़ंगे लगा सकता है कि भारतीय अधिकारी उससे पूछताछ न करना ही बेहतर समझें। अमेरिका ने आतंकी हेडली के हितों की रक्षा के लिए जो तत्परता दिखाई उससे उसके और पाकिस्तान के आचरण में एक समानता सी नजर आने लगी है। आखिर अब अमेरिका किस मुंह से यह कहेगा कि कि मुंबई हमले के दोषियों को दंड मिलना चाहिए, क्योंकि एक दोषी को बचाने का काम तो वह खुद कर रहा है? क्या भारत सरकार अमेरिका से यह सवाल करेगी कि उसे हेडली की जान की इतनी परवाह क्यों है? यह शुभ संकेत है कि गृहमंत्री चिदंबरम कह रहे हैं कि भारत हेडली के प्रत्यर्पण की कोशिश जारी रखेगा, लेकिन यह ठीक नहीं कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा अमेरिकी सहयोग से संतुष्ट हैं। आखिर यह क्या बात हुई? विदेश मंत्री अमेरिका की तरफदारी क्यों कर रहे हैं- और वह भी तब जब अमेरिका आतंकवाद के मामले में दोहरे मानदंड दिखा रहा है? ऐसा लगता है कि हमारे नीति-नियंता यह अहसास नहीं कर पा रहे हैं कि अमेरिका ने अपने संकीर्ण स्वार्थो को पूरा करने के फेर में भारत को धोखा देने का काम किया है। शर्मनाक केवल यह नहीं है कि अमेरिका ने एक कुख्यात आतंकी से समझौता कर लिया, बल्कि यह भी है कि उसकी ओर से हेडली को इस बात का प्रमाण पत्र देने की भी कोशिश की जा रही है कि उसने ईमानदारी से अपने गुनाह कबूल किए हैं और वह सरकार के साथ सहयोग करने के लिए सहमत है। हेडली की यह ईमानदारी ओबामा प्रशासन को ही मुबारक हो। इसका कोई औचित्य नहीं कि भारत हेडली के मामले में अमेरिका के रवैये का प्रतिरोध न करे, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसी संभावना नहीं है कि भारतीय नेतृत्व अमेरिका से अपनी नाराजगी जताएगा।
सम्पादकीय दैनिक जागरण

सरकार की पराजय गाथा

सरकार पर आतंकवाद और विदेश नीति पर अमेरिकी दबाव में राष्ट्र विरोधी फैसले लेने का आरोप लगा रहे हैं तरुण विजय
अभी 26/11 के मुख्य षड्यंत्रकारियों में से एक डेविड कोलमैन हेडली से पूछताछ में भारत सरकार की असफलता की स्याही सूखी भी नहीं थी कि रेल मंत्रालय के उस विज्ञापन की चर्चा उभरकर आई, जिसमें दिल्ली को पाकिस्तान में दिखाया गया है। इस मामले पर भी उसी तरह लीपापोती की जा रही है जैसी कुछ दिन पहले समाज कल्याण मंत्रालय के विज्ञापन में पाकिस्तानी वायुसेना अध्यक्ष का चित्र छापने पर की गई थी। इसी बीच तमाम तरह की मक्कारियों और भारत विरोधी आक्रामकताओं के बावजूद पाकिस्तानी पक्ष को वार्ता के लिए बुलाकर भारत सरकार ने अमेरिकी दबाव का आरोप आमंत्रित किया था। उस वार्ता से भी कोई नतीजा नहीं निकला, बल्कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री से यहां तक सुन लिया गया कि भारत ने घुटने टेककर पाकिस्तान को वार्ता के लिए बुलाया है। कसाब पर मुकदमा चलते हुए दो साल से अधिक समय हो गया है, परंतु मामला किसी नतीजे तक पहुंचता नहीं दिखता। उधर, अमेरिका ने तो हेडली पर छह महीने से भी कम समय में मुकदमा चलाकर और साक्ष्य जुटाकर निर्णय तक पहुंचने की अद्भुत चुस्ती दिखाई है, जो भारत के लिए एक सबक होना चाहिए। भारत में आम धारणा बन गई है कि अभी तक सरकार किसी भी आतंकवादी को सजा की परिणति तक नहीं पहुंचा पाई है। मुंबई दंगों के आरोपियों को भी 13 साल तक चले मुकदमों के बाद सजा सुनाई गई। अफजल को फांसी न दिए जाने की तो अलग ही कहानी बन चुकी है। कुल मिलाकर यह परिदृश्य उभर रहा है कि सरकार का शरीर भले ही दिल्ली में हो पर उसका मन भारत में नहीं है। इसलिए आतंकवादियों से बातचीत की जाती है, लेकिन देशभक्तों के शरणार्थी बनने पर भी सरकार के मन में दर्द नहीं उमड़ता। 5।5 लाख से अधिक कश्मीरी हिंदू शरणार्थी हैं। मुजफ्फराबाद और रावलपिंडी से 1947 में कश्मीर आए हिंदू शरणार्थियों की संख्या 3 लाख हो गई है। इन्हें अभी तक न कश्मीर की नागरिकता मिली है न ही मतदान करने का अधिकार है। इसके विपरीत पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर में आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने गए कश्मीरी मुस्लिम युवाओं को भारत के गृहमंत्री और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री द्वारा वापस श्रीनगर लौटने का न्योता दिया जाता है। यह किस मानसिकता का द्योतक है? हेडली का मामला तो सबसे शर्मनाक और आत्मघाती है। हेडली मुख्यत: भारत का अपराधी है। उस पर अमेरिका में मुकदमा चलाए जाने से अधिक न्यायसंगत भारत में मुकदमा चलाया जाना है। 26/11 का मुख्य युद्धस्थल भारत था। हेडली 12 बार भारत आकर षड्यंत्र की आधारभूमि तैयार कर गया था। कुछ अमेरिकियों के उस आक्रमण में मारे जाने के कारण अमेरिका हेडली पर मुकदमा चलाने का मुख्य नैतिक अधिकार नहीं प्राप्त कर लेता जैसे अमेरिका में 9/11 के हमले में कुछ भारतीयों के मारे जाने के परिणामस्वरूप भारत 9/11 के आरोपियों पर मुकदमा चलाए जाने का मुख्य नैतिक अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता। लेकिन अमेरिका ने न केवल कसाब से भारत आकर पूछताछ का अधिकार प्राप्त किया, बल्कि जब भारत के गुप्तचर अधिकारी हेडली से पूछताछ के लिए अमेरिका गए तो उन्हें बैरंग वापस लौटा दिया। अमेरिका हेडली से पूछताछ के मामले में यह बात ढकने की कोशिश कर रहा है कि उसने हेडली को मुस्लिम नाम (दाऊद) बदलकर इसाई नाम रखने की अनुमति दी। हेडली अमेरिका के लिए डबल एजेंट का भी काम करता रहा है। ओबामा ने भारत को हेडली के मामले में पूरी तरह से निराश और विफल किया है तो दूसरी ओर भारत की दब्बू अमेरिकापरस्त सरकार ने भारतीय नागरिकों को असफल किया है। भारत सरकार को हेडली के मामले में अमेरिका सरकार के सामने जो आक्रामकता दिखानी चाहिए थी, उसका शतांश भी नहीं दिखाई। दुनिया में आतंकवाद का सबसे अधिक शिकार होने के बावजूद भारत दुनिया के किसी भी देश को प्रभावित करने या उसे अपने साथ आतंकवाद विरोधी मुहिम में जोड़ने में पूरी तरह नाकामयाब रहा है। वास्तव में अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति पूरी तरह से एकांतिक और स्वार्थ केंद्रित है। यह मानना बड़ी भूल होगी कि ओबामा आतंकवाद विरोधी मुहिम में भारत की संवेदनाओं को समझेंगे या यहां की लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करेंगे। पाकिस्तान को अमेरिका पूरी तरह से अपनी मुस्लिम विश्वनीति और अपनी दृष्टि के आतंकवाद विरोधी युद्ध में एक आवश्यक सहयोगी के नाते मान्य करता है। उसका स्वार्थ है कि पाकिस्तान अपने पश्चिमी मोर्चे पर अफगानी तालिबानी से लोहा लेता रहे। पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवादियों को बढ़ावा दे रहा है या नहीं, इससे अमेरिका को कोई सरोकार नहीं है। यही कारण है कि मुंबई 26/11 के हमले के संदर्भ में अमेरिका द्वारा पकड़े गए हेडली से भारत के अधिकारी प्रत्यक्ष पूछताछ से भी दूर रखे गए हैं। शक्तिहीन सत्ता केंद्र राष्ट्रीय भावनाओं के अभाव में युद्ध कैसे हारते हैं, वर्तमान सरकार उसका एक दयनीय उदाहरण है। ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, भारत की चिंता करना उनका काम नहीं है। वह अपनी दृष्टि से अपने देश का हित कर रहे हैं। सवाल उठता है कि भारत के नेता भारत के हित के संदर्भ में क्या कर रहे हैं? दोनों ओर से परमाणु शक्ति संपन्न शत्रु देशों से घिरा भारत आंतरिक तौर पर नक्सली आतंक से लहुलुहान है। लेकिन कहीं भी आतंक पर विजय प्राप्त कर नागरिकों को निर्भय बनाने की इच्छाशक्ति नहीं दिखती।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार:-दैनिक जागरण

आतंकी का साथी अमेरिका

लश्कर आतंकी डेविड हेडली के मामले में अमेरिका के आचरण को भारत विरोधी बता रहे हैं राजीव सचान
इस परिदृश्य पर शायद हर किसी ने विचार किया होगा कि तब क्या होता जब अमेरिका में किसी आतंकी वारदात में शामिल रहे व्यक्ति को भारत ने पकड़ा होता? इसमें किसी को संदेह नहीं कि अमेरिकी अधिकारियों ने भारत आकर न केवल उससे गहन पूछताछ की होती, बल्कि उसे अपने साथ अमेरिका ले भी गए होते, भले ही वह कुछ मामलों में भारत में वांछित होता। अमेरिका ने मुंबई हमले की साजिश रचने वाले पाकिस्तान मूल के अपने नागरिक दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कोलमेन हेडली को भारत प्रत्यर्पित करना तो दूर रहा, उसकी शक्ल तक नहीं देखने दी। शिकागो में उसकी गिरफ्तारी के बाद उससे पूछताछ करने गए भारतीय अधिकारियों को बैरंग लौटा दिया गया और अब यह सुनिश्चित किया गया है कि उसे भारत न ले जाया जा सके। अमेरिकी न्याय प्रणाली में यह व्यवस्था है कि यदि कोई अपराधी अपना गुनाह कबूल करने को तैयार हो तो उसे सजा देने में नरमी बरती जाती है। माना जाता है कि इससे आपराधिक मामलों का निपटारा होने में आसानी होती है। इस व्यवस्था के अपने गुण-दोष हैं और उस पर भारत या अन्य किसी देश की आपत्ति का कोई मतलब नहीं, लेकिन यह कहां का न्याय है कि किसी अपराधी को उस देश की पहुंच से दूर कर दिया जाए जहां उसने जघन्य अपराध किया हो? अमेरिका ने ठीक यही किया है। उसने दाऊद गिलानी से उसकी सुविधानुसार समझौता कर लिया। उसे न केवल मृत्यु दंड से बचने का अवसर दिया गया, बल्कि भारत, डेनमार्क और पाकिस्तान को न सौंपने का वचन भी दिया गया। यह समझना मुश्किल है कि समझौते के लिए गिलानी लालायित था या अमेरिकी प्रशासन? एक आतंकी से समझौते के बावजूद भारत को कोई आपत्ति नहीं है और उल्टे भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा कथित अमेरिकी सहयोग से संतुष्ट हैं। आखिर इसमें संतुष्ट होने जैसा क्या है और वह भी तब जब सहयोग का नामों-निशान तक नहीं दिखता। या तो यह भारतीय नेतृत्व का दीवालियापन है अथवा अमेरिका के समक्ष याचक मुद्रा में रहने की मानसिकता कि किसी ने इस पर मुंह खोलने का साहस नहीं किया कि दाऊद गिलानी से समझौता कर अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जारी लड़ाई को कमजोर किया है और इस अनुचित समझौते से मुंबई हमले के गुनहगारों का पर्दाफाश करने में कठिनाई आएगी। दाऊद गिलानी और अमेरिकी प्रशासन के बीच हुआ समझौता इसलिए कहीं अधिक आपत्तिजनक है कि वह गिलानी की शर्ताें के हिसाब से हुआ। इस समझौते से यह साफ हो गया कि गिलानी अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई का भेदिया था, जो बाद में लश्कर का आतंकी बना। माना तो यह भी जा रहा है कि अमेरिकी अधिकारियों को इसकी जानकारी थी कि दाऊद गिलानी लश्कर की किसी साजिश को अंजाम देने के लिए ही बार-बार भारत के चक्कर लगा रहा है, लेकिन उन्होंने उसके खिलाफ समय रहते कोई कार्रवाई इसलिए नहीं की, क्योंकि वे उसे लश्कर के और करीब होते हुए देखना चाहते थे। तनिक गौर करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि मुंबई हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की सक्रियता के साथ-साथ अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई की निष्कि्रयता का भी नतीजा है। गौर करने वाली बात यह भी है कि भारत एक ओर पाकिस्तान पर दबाव बनाने में असमर्थ है तो दूसरी ओर अमेरिका से शिकायत करने में भी संकोच कर रहा है। क्या अमेरिका से नाराजगी जाहिर करने से वह नाराज हो जाएगा? क्या उसके नाराज होने से भारत का अहित हो जाएगा? क्या दाऊद गिलानी के साथ समझौता करने से भारत का हित हुआ? क्या अफगानिस्तान में भारत की भूमिका की अनदेखी करने से हमारा हित हो रहा है? क्या कश्मीर पर पाकिस्तान से सीधी बात करने के दबाव से भारत का हित हो रहा है? यह मनमोहन सिंह ही बता सकते हैं कि भारत अमेरिका के समक्ष इतना दीनहीन क्यों है, क्योंकि ओबामा प्रशासन पाकिस्तान को खुश करने में जुट गया है। इसके प्रबल आसार हैं कि वह पाकिस्तान के साथ भारत सरीखा नाभिकीय समझौता न सही, कुछ ऐसा करेगा जिससे पाकिस्तान को यह कहने का अवसर मिल जाए कि वह भारत से कम नहीं है। जार्ज बुश ने भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू पर तौलने की जिस नीति का परित्याग किया था, लेकिन ओबामा ऐसा कर रहे हैं कि जिससे दोनों देश फिर से एक ही तराजू पर दिखाई दें। मुंबई हमले की जमीन तैयार करने के दौरान दाऊद गिलानी भारत में जिन भी लोगों से मिला वे उसके दोस्ताना रवैये के कायल हो गए, लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि वह तो आतंकी था। मनमोहन सिंह की पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान ओबामा ने उनके प्रति जैसा दोस्ताना व्यवहार किया वह भारतीयों को मुग्ध कर गया। व्हाइट हाउस में मनमोहन सिंह की आवभगत से ऐसा लग रहा था कि ओबामा भारत के सबसे बड़े हित रक्षक हैं। अब आम भारतीय खुद को ठगा महसूस कर रहा है, खासकर इसलिए कि डेनमार्क दाऊद से पूछताछ कर चुका है। अमेरिका के इस आश्वासन पर मनमोहन सिंह संतुष्ट हो सकते हैं कि भारत को दाऊद गिलानी से पूछताछ करने की इजाजत मिलेगी। समस्या यह है कि इस सबके बावजूद मनमोहन सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति से अगली मुलाकात में यह कह सकते हैं कि भारत के लोग आपको बहुत चाहते हैं। दरअसल यह कुछ भी नहीं, क्योंकि जब वह यूसुफ रजा गिलानी से बलूचिस्तान में भारत की भूमिका पर चर्चा के लिए राजी हो सकते हैं तो फिर दाऊद गिलानी का बचाव करने वाले ओबामा की सराहना भी कर सकते हैं। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

अंध मोदी-विरोध का मतलब

छद्म सेक्युलरों पर नरेंद्र मोदी के बहाने हिंदू भावना को कुचलने की साजिश रचने का आरोप लगा रहे हैं एस शंकर
साल भर भी नहीं हुआ जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त इसी विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में कुख्यात मानवाधिकारवादी तीस्ता सीतलवाड को गुजरात के बारे में भयानक हत्याओं और उत्पीड़न की झूठी कहानियां गढ़ने, झूठे गवाहों की फौज तैयार करने, अदालतों में झूठे दस्तावेज जमा करवाने और पुलिस पर मिथ्या आरोप लगाने का दोषी ठहराया था। पर उस रिपोर्ट के बाद तीस्ता के विरुद्ध कुछ नहीं हुआ। अब उसी दल ने नरेंद्र मोदी को मात्र बयान देने के लिए बुलाया, तो इसी आधार पर उनसे इस्तीफा देने की मांग होने लगी! इस अंध मोदी-विरोध को कैसे समझा जाना चाहिए? पांच वर्ष पहले नाटककार विजय तेंदुलकर ने कहा था कि यदि वे पिस्तौल उठाएंगे तो सबसे पहले नरेंद्र मोदी को मारेंगे। देश के बौद्धिक-राजनीतिक वर्ग ने तेंदुलकर की निंदा नहीं की। उलटे मोदी को बुरा-भला कहा। इनमें वे भी थे जो मानवाधिकार और सामुदायिक सद्भाव के लिए आतंकियों को भी सुविधा व छूट देने की मांग करते हैं। मोदी लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बने तो इसमें उनके अच्छे शासन का भी योग है। इसके बावजूद राजनीतिक वर्ग में उनके प्रति विद्वेष और उन्हें कानून या मीडिया द्वारा फांसने की कोशिशें भी कम नहीं हुई हैं। इसका अर्थ है कि आज भी मोदी अकेले हैं। यानी एक ऐसा व्यक्ति जो जाने-अनजाने हिंदू आत्मरक्षा का प्रतीक बना, जिसने एक छोटा-सा सच कहने की हिम्मत की, उसे भारत में राजनीतिक अछूत बना दिया गया है! उसकी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, निष्पक्ष-प्रशासन और जन-समर्थन के बावजूद प्रभावी राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग में उसके लिए बोलने वाला कोई नहीं। यह एक खतरनाक स्थिति है। मोदी केवल चुनावी आधार पर विजयी रहे हैं, क्योंकि गुजराती जनता उनके पक्ष में है। इसके अलावा हर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनके खिलाफ जहर उगला जाता है। यह दुनिया भर के हिंदू-विरोधियों द्वारा हिंदुओं को दी जाने वाली चेतावनी है कि तुम्हें कुछ कहने का अधिकार नहीं! तुम्हें बराबरी का हक नहीं! तुम्हें अपने देश में भी दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहना है। इस अखंड मोदी-विरोध ने उन हिंदुओं को डराया है जो हिंदू चिंताओं को मुस्लिम चिंताओं के समान देखना उचित समझते हैं। यह संयोग नहीं कि जो बुद्धिजीवी, पत्रकार और राजनीतिकर्मी नरेंद्र मोदी के विरुद्ध जिहाद में लगे हैं, वे ऐसे एनजीओ के कर्ता-धर्ता हैं जिन्हें संदिग्ध विदेशी स्त्रोतों से धन, पुरस्कार मिलता है। तीस्ता सीतलवाड को निरंतर सम्मानित किया जा रहा है। उन्हें पुरस्कृत करने का संदेश यही है कि देश हिंदू-विरोधियों का है। इसलिए हिंदुओं में भी जो सेक्यूलर-वामपंथ, मानवाधिकारवाद, वैश्विक नागरिक, बहुंसस्कृतिवाद आदि के नाम पर व्यवहारत: हिंदू-विरोधी हो चुके हैं, उन्हीं को प्रश्रय मिलेगा। इसके अतिरिक्त जो सहज हिंदू भावना, न्याय भावना से बोलेंगे उन्हें लताड़ा जाएगा। मोदी-विरोध एक वृहत वैचारिक-राजनीतिक रणनीति का अंग है। वह अलग बिंदु नहीं, बल्कि एक असहिष्णु तानाशाही की अभिव्यक्ति है, जो मानो भारतीय हिंदुओं को चेतावनी दे रही है कि विश्व में हिंदू समुदाय या हित जैसी चीज नहीं। इसलिए उसके अधिकार तो क्या, सामान्य अभिव्यक्ति भी सांप्रदायिकता और दूसरों के अधिकारों का हनन है! मोदी को कदम-कदम पर अपमानित करना यही बताने का प्रयास है कि हिंदू भावनाओं की अभिव्यक्ति सख्त मना है। कि हिंदुओं को बराबरी की अनुमति नहीं। हिंदू को केवल पिटने, अपमानित होने और अन्य सभ्यताओं के समक्ष जी-हुजूरी की इजाजत है। वह स्वयं को हिंदू भी नहीं कह सकता। उसे केवल सेक्यूलर कहलाना है। उच्च-वर्गीय हिंदुओं ने यह हीन स्थिति स्वीकार कर ली है, जो ईसाई, इस्लामी और कम्युनिस्ट साम्राज्यवादियों ने लंबे समय से जबरन बना रखी है। यह हीन-भावना हिंदू नेताओं, बुद्धिजीवियों में इतनी गहरी बैठी हुई है कि हरेक संकट में वे इस्लामी, ईसाई या मा‌र्क्सवादी सहमतों के विरुद्ध एक होने के बदले उस हिंदू से ही कतराते हैं जिसने कुछ सच बोल दिया हो। असंख्य उच्च-पदस्थ हिंदुओं द्वारा मोदी की निंदा करने का यही अभिप्राय है। इसीलिए मूल गोधरा-कांड, जिसने प्रतिहिंसा पैदा की, कभी नाराजगी या न्याय का विषय नहीं बना। किंतु उसके बाद हुई हिंदू-प्रतिक्रिया अंतहीन विषवमन का स्थायी विषय बनी रही है। यह स्वत: नहीं हुआ, न इसे भारतीय जनता का समर्थन है। गुजरात के चुनाव परिणामों से भी इसे बहुत आसानी से समझा सकता है। लोकतंत्र, कानून, सामान्य बुद्धि आदि किसी निष्पक्ष कसौटी पर मोदी के विरुद्ध अभियान उचित नहीं ठहरता। किंतु अभिजात्य पंथनिरपेक्ष-वामपंथियों ने मोदी के बहाने हिंदू भावना को जान-बूझकर कुचलने की नीति अपनाई है। दोषी स्वयं हिंदू समाज है, जो राजनीति का पहला सूत्र भूल गया है कि जो समाज अपने लिए बोलने में समर्थ नहीं, उसके सद्भाव, नाराजगी या भावना का विशेष मूल्य नहीं होता। यदि हम हिंदू होकर भी दुनिया के सामने खुल कर हिंदुओं की चिंता रखने से बचते हैं, और सेक्युलर दिखना चाहते हैं तो निर्बलता स्पष्ट है। राजनीति में निर्बल नहीं, शक्तिशाली टिकता है। मोदी को ध्वस्त करने की चाह के पीछे हिंदुओं को दबाने और हिंदू दब्बूपन को यथावत रखने की रणनीति है। अब मोदी एक प्रतीक के रूप में हैं, व्यक्ति के रूप में नहीं।
saabhar:-dainik jagran
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

लो क सं घ र्ष !: भारत सरकार का विज्ञापन है या निम्नकोटि के शोहदों का उवाच

पहले माओवादियों ने खुशहाल जीवन का वादा किया
फिर, वे मेरे पति को अगवा कर ले गए
फिर, उन्होंने गाँव के स्कूल को उड़ा डाला
अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं
रोको, रोको, भगवान के लिए इस अत्याचार को रोको

यह विज्ञापन भारत सरकार के गृहमंत्रालय द्वारा जनहित में जारी किया गया है अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं यह बात संभावनाओं पर है और इस तरह के आरोप प्रत्यारोप मोहल्ले के तुच्छ किस्म के शोहदे किया करते हैं। भारत सरकार के विज्ञापनों में इस तरह के अनर्गल आरोप लगाने की परंपरा नहीं रही है । गृह मंत्रालय माओवाद के कार्य क्रियाशील क्षेत्रों में भ्रष्टाचार को समाप्त करता है। विधि सम्मत व्यवस्था जब समाप्त होती है तब हिंसा का दौर शुरू होता है । आज देश की राजधानी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक प्रत्येक विधि सम्मत कार्य को करवाने के लिए घूश की दरें तय हैं . घुश अदा न करने पर इतनी आपत्तियां लग जाएँगी की इस जनम में कार्य नहीं होगा। एक सादाहरण सा ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में अच्छे-अच्छे लोगों को दलाल का सहारा लेना पड़ता है और तुरंत कार्य हो जाता है यदि आप अपना लाइसेंस बगैर घूश के बनवाना चाहते हैं तो कई दिनों की प्रक्रिया बनवानी पड़ेगी जिसमें आपका हर तरह से उत्पीडन किया जायेगा। चौराहे पर ट्राफ़िक पुलिस की भी ड्यूटी उसको चौराहे की वसूली के आधार पर मासिक देने पर ही लगती है और भ्रष्टाचार का यह रूप गृह मंत्रालय को नहीं दिखता है। राजधानी से दूर के हिस्सों में अधिकारीयों का जंगल राज है और अधिकारियों द्वारा सीधे सीधे आदिवासियों व किसानो के यहाँ डकैतियां डाली जा रही हैं जिसका विरोध होना लाजमी है। कौन सा कुकर्म इन लोगो ने गाँव की भोली जनता के साथ नहीं किया है । मैं माओवाद समर्थक नहीं हूँ लेकिन इस भ्रष्ट तंत्र के साथ भी नहीं हूँ यदि समय रहते भारत सरकार ने अपने नौकरशाहों को भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं किया तो देश की सारी सम्पदा उनके बैंक खातों में ही नजर आएगी। इस तरह के विज्ञापन जारी कर गृहमंत्रालय समझ रहा है की हम चरित्र हत्या कर के अपनी असफलताओं को छिपा लेंगे। एस.पी.एस राठौर, के.पि. एस गिल जैसे अधिकारियों को सरकार माओवादी घोषित क्यों नहीं करती ? अब सरकार को चाहिए की अपने कर्मचारियों और अधिकारियों के चरित्र चित्रण आए दिन मीडिया में छाए रहते हैं उसकी ओर ध्यान दे।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

सपने और हकीकत-ब्रज की दुनिया

यूं तो गीता सार को मैं हजारों बार पढ़ चुका हूँ और गीता को भी सैंकड़ों बार.मैं जानता हूँ कि दुनिया में मैं कुछ ही समय के लिए आया हूँ और सबकुछ भगवान का है.लेकिन फ़िर भी मैं न जाने कैसे बार-बार माया में उलझ जाता रहा हूँ.मैंने जब होश संभाला तो मुझे पता चला कि क्या-कौन-कैसे मेरा है और क्या-कौन-कैसे मेरा नहीं है.फ़िर मेरे हाथ लगे बहुत सारे धर्मग्रन्थ जिनमें मैंने पढ़ा कि सब माया है लेकिन शायद इस मूलमंत्र को आत्मसात नहीं कर पाया.इंटर से पहले भी मैं सपने देखा करता था लेकिन वे बचकाने होते थे.इससे पहले मैंने अपनी भावी जिंदगी के बारे में नहीं सोंचा था.वैसे मैं पढने में बहुत अच्छा नहीं तो अच्छा तो था है.इंटरमीडिएट के दौरान मुझे अपने गणित-ज्ञान पर बहुत गर्व था और लगता था जैसे इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास करना तो मेरे लिए बाएं हाथ का खेल है.लेकिन जब आई.आई.टी. और बी.आई.टी. की प्रारंभिक परीक्षाओं में मैं गणित के पर्चे में जब प्रीमियर में कोचिंग करने के बावजूद एक भी प्रश्न हाल नहीं कर पाया तो मेरा घमंड चकनाचूर हो गया. इसी दौरान किसी तरह से मैं पोलिटेक्निक प्रवेश परीक्षा पास कर गया.मेरा नामांकन दरभंगा पोलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हुआ.कुछ प्रतियोगियों द्वारा नामांकन नहीं लेने के कारण मुझे अपना ट्रेड बदलने का अवसर मिला.उस समय सिविल इंजीनियरिंग अच्छा नहीं माना जाता था.अब मैंने पूर्णिया पोलिटेक्निक में विद्युत ट्रेड में पुनर्नामांकन करवा लिया.मन में नया उत्साह था, नयी उमंगें थीं.लेकिन कर्ता के मन में तो कुछ और ही था-तेरे मन कछु और है कर्ता के कछु और.जातिवाद की आग में झुलसते इस शहर में मुझे राजपूत जाति में जन्म लेने का खामियाजा भुगतना पड़ा और मेरी पढाई दो साल की पढाई पूरी कर लेने के बावजूद अधूरी रह गई, मेरे इंजीनियर बनने के सपने अधूरे रह गए.लेकिन आँखें अभी थकी नहीं थी सपने देखने से.अब उनमें एक नया सपना आई.ए.एस. बनने का बस गया था.मैंने ए.एन. कॉलेज, पटना से बी.ए. किया और दिल्ली के प्रसिद्ध राउज आई.ए.एस. स्टडी सर्किल में कोचिंग ली.इससे पहले मैंने एक बार घर पर रहकर ही यू.पी.एस.सी. की परीक्षा दी थी जिसमें मैं १० प्रतिशत प्रश्नों के भी सही उत्तर नहीं दे पाया था.कोचिंग के दौरान की गई मेहनत ने रंग दिखाया और मैं वहां आयोजित होनेवाली आतंरिक मूल्यांकन परीक्षाओं में प्रथम आने लगा.जैसे सपनों को नए पंख लग गए.मैं अपने को सचमुच का आई.ए.एस समझने लगा था.मुझे भी बिन पिए ही नशा हो गया था जैसे प्रेमचंद को नशा कहानी में हो गया था.मैं लगातार तीन बार पी.टी. में सफल और मुख्य परीक्षा में असफल होता रहा.जब मैं चौथी बार (मुझे कुल चार बार ही परीक्षा में बैठने की अनुमति थी) भी मुख्य परीक्षा में असफल घोषित कर दिया गया.तब एकबारगी जैसे मेरे सारे सपने समाप्त हो गए थे.मैं अब अकेला था यथार्थ की निर्मम जमीन पर लुटा-पुटा सा, निराश और हताश.अब समस्या यह थी कि मैं करूँ क्या?सपने खत्म हो गए थे लेकिन जीवन तो बांकी था.अभी तो सिर्फ ट्रेलर समाप्त हुआ था पूरी-की-पूरी फिल्म बची हुई थी.अंत में काफी सोंच-विचार के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र को चुना.मेरा कैरियर शुरू हुआ हिंदुस्तान, पटना से.मुझे कहा गया था कि तुम्हारा वेतन ६००० रूपये मासिक होगा लेकिन ६ महीने बाद जब मेरे हाथ में पैसे आये तो तीन हजार मासिक की दर से.मुझे एक बार फ़िर सपनों के टूटने जैसा अहसास हुआ.इसी बीच मैंने बी.पी.एस.सी. की प्रारंभिक परीक्षा दी और सफल भी हो गया, वो भी बिना एक मिनट पढाई किये.ऑफिस से रात की ड्यूटी करके अर्द्ध जाग्रतावस्था में परीक्षा दी थी.एक बार फ़िर मेरी आँखों में जगते-सोते एस.डी.ओ. बनने के सपने के सपने तैरने लगे.मैंने अपनी नौकरी जिससे मैं संतुष्ट भी नहीं था को छोड़ दिया और जी-जान से सपनों को सच करने के इस आखिरी मौके के लिए मेहनत शुरू कर दी.अभी कुछ ही दिन पहले मुख्य परीक्षा का परिणाम आया है.मैं एक बार फ़िर मुख्य परीक्षा में जाकर छंट गया हूँ.लेकिन आधी से भी ज्यादा जिंदगी अब भी बांकी है.मेरे साथ सपनों ने धोखा किया.लेकिन कभी मेरे मन में आत्महत्या का विचार तक नहीं आया.मैं इतना कायर नहीं हूँ कि बिना लड़े ही हथियार डाल दूं.मुझे निराशा तो होती है लेकिन सब कुछ हमारे हाथों में है ही कहाँ!हमारे हाथों में है सपने देखना और उसे हकीकत में बदलने के लिए प्रयास करनासपने सच होंगे या नहीं यह तो किसी और के हाथों में है.अगर कोई मुझसे पूछे कि कौन-सा दर्द सबसे दर्दनाक होता है तो बेशक मैं कहूँगा कि सपनों के टूटने का दर्द.इसलिए अब मैंने सपने नहीं देखने का संकल्प लिया है और अपनी बची हुई जिंदगी भगवान को समर्पित कर दिया है. खुद को जीवन-नदी की अनवरत बहती धारा में डालकर छोड़ दिया है.देखें कहाँ किस घाट पर जाकर नाव किनारे पर लगती है.

हुसैन पर हाय-तौबा

हुसैन पर हाय-तौबा
देवी-देवताओं की अश्लील पेंटिंगों को हुसैन की संकीर्ण सोच की उपज बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश

मकबूल फिदा हुसैन भारत में छद्म पंथनिरपेक्ष भीड़ के नायक रहे हैं। इसीलिए अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग उनके कतर देशांतर पर प्रलाप कर रहा है और हिंदुओं पर उनके पीछे पड़ने का आरोप मढ़ रहा है। कुछ टीवी एंकर हुसैन के भारत की नागरिकता छोड़ कर कतर की नागरिकता लेने पर चीत्कार मचा रहे हैं किंतु वे हुसैन की कलात्मक स्वच्छंदता की सच्चाई बताने के इच्छुक नहीं हैं। इसलिए अब समय है कि हुसैन के बारे में कुछ गरम पहलुओं से परदा उठाएं। श्रीमान हुसैन को भारत से भागने के लिए किसने मजबूर किया? एंटी हिंदूज पुस्तक के लेखक प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा कुछ महत्वपूर्ण सुराग और इस सवाल का विस्तार से उत्तर देते हैं। इस पुस्तक में न केवल संस्कार भारती के डीपी सिन्हा की प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की गई है, बल्कि हुसैन की बेहद घिनौनी पेंटिगों की तस्वीरें भी छपी हैं। असलियत में, यह प्रेस विज्ञप्ति चित्रकार के खिलाफ विस्तृत आरोपपत्र ही है क्योंकि इसमें पेंटिंगों को एक से बढ़कर एक भौंडी और निंदनीय बताया गया हैं। यहां इस संगठन द्वारा आठ सर्वाधिक आपत्तिजनक पेंटिंगों की सूची जारी की गई है। पहली पेंटिंग का शीर्षक दुर्गा है, जिसमें दुर्गा देवी को एक टाइगर के साथ रति क्रिया रत दिखाया गया है। रेस्क्यूइंग सीता पेंटिंग में नग्न सीता को हनुमान की पूंछ पकड़े चित्रित किया गया है। हनुमान की पूंछ शालीनता की तमाम सीमाओं को लांघते हुए एक लैंगिग प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की गई है। भगवान विष्णु को आम तौर पर चार हाथों के साथ चित्रित किया जाता है, जिनमें शंख, पद्म, गदा और चक्र होते हैं। किंतु हुसैन की पेंटिंग में विष्णु के हाथ काट दिए गए हैं। विकृत और थकेहारे विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी और वाहन गरुड़ की ओर देख रहे हैं। भगवान विष्णु के हाथ-पैर काटना रचनात्मक स्वतंत्रता है या फिर हिंदू संवेदना का जानबूझ कर अपमान करना है? सरस्वती जिन्हें हिंदू एक देवी के रूप में पूजते हैं, श्वेत साड़ी में चित्रित की जाती हैं। इन्हें भी हुसैन ने अपनी पेंटिंग में नग्न दर्शाया है। एक अन्य पेंटिंग में नग्न देवी लक्ष्मी देव गणेश के सिर पर सवार हैं। इस दृश्य से भी कामुकता झलकती है। हनुमान-4 शीर्षक से एक पेंटिंग में तीन मुख वाले हनुमान और एक नग्न युगल चित्रित किया गया है। महिला की पहचान संदेह से परे है। हनुमान का जननांग महिला की ओर दिखाया गया है। इसमें अश्लीलता बिल्कुल स्पष्ट झलकती है। हनुमान-13 शीर्षक वाली पेंटिंग में बिल्कुल नग्न सीता नग्न रावण की जांघ पर बैठी हैं और नग्न हनुमान उन पर वार कर रहे हैं। एक अन्य पेंटिंग जार्ज वाशिंगटन एंड अर्जुन आन द चैरियट में महाभारत के प्रसिद्ध गीता प्रसंग की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण का स्थान वाशिंगटन ने ले लिया है क्योंकि भगवान कृष्ण की आंखों में कोई देवत्व नहीं है और उनकी अवमानना करते हुए उन्हें महज एक मानव जार्ज वाशिंगटन के रूप में पेश किया गया है। क्या हुसैन का यह मूर्तिभंजन एकसमान है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। बात जब गैर हिंदू विषयों की आती है तो हुसैन आदर और सम्मान के प्रतिमान स्थापित कर लेते हैं। वह पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा को पवित्रता और शिष्टता के साथ चित्रित किया है, जो कपड़े पहने हुए हैं। यहां चित्रकार कोई छूट नहीं लेता। वह तब भी कोई छूट नहीं लेता जब उनकी बेटी और माता का चित्रण करता है। हुसैन की मदर टैरेसा पेंटिंग कला का लाजवाब नमूना है, जिसमें मदर टैरेसा करुणा की प्रतिमूर्ति लगती हैं। अगर ऐसा है तो हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं को इस कदर घिनौने अंदाज में क्यों चित्रित किया? इसका जवाब एक और पेंटिंग में मिलता है। एक पेंटिंग में आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर चित्रित किए गए हैं, जिनमें से केवल हिटलर को नग्न दिखाया गया है। क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिन चरित्रों को हुसैन घिनौना मानते हैं उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? इन निंदनीय कला कर्म को पुन‌र्प्रकाशित करने और संस्कार भारती की विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी करने वाले प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा एमएफ हुसैन को विकृत कामवासना से ग्रस्त व्यक्ति बताते हैं। इन पेंटिंग के फोटोग्राफ मौलिक रूप से एक ऐसी पुस्तक में प्रकाशित हुए थे, जिसे खुद हुसैन ने डिजाइन किया था। लेखकों ने सिन्हा द्वारा पेश किए गए आठ उदाहरणों में अपनी तरफ से भी तीन जोड़े हैं। इनमें एक पेंटिंग में सांड को पार्वती से सहवास करते दिखाया गया है, जबकि शंकर उनकी तरफ देख रहे हैं। दूसरी में हनुमान के जननांग को एक औरत की ओर दर्शाया गया है और एक पेंटिंग में नग्न कृष्ण के हाथ-पैर कटे हुए दिखाए गए हैं। लेखक नंग्नता, अश्लीलता और कामविकृति में भेद की तरफ ध्यान खींचते हैं। वे कहते हैं, जब अश्लीलता या कामविकृति के साथ देवी-देविताओं को चित्रित किया जाता है तो यह आस्था के साथ खिलवाड़ करने की श्रेणी में आता है। जैसाकि गोर्दिया और पांडा रेखांकित करते हैं, हुसैन को संदेह का लाभ देना बिल्कुल संभव नहीं है। आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर के चित्रण वाली पेंटिंग अकाट्स साक्ष्य है। पहले तीन के शरीर पर कपड़े हैं, जबकि हिटलर नग्न है। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि जिनसे वह घृणा करते हैं, उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? वे पूछते हैं, क्या हिंदू का सम्मान करने वाला कोई भी व्यक्ति हुसैन को माफ कर सकता है? इसका जवाब स्पष्ट तौर पर ना है। तो हुसैन की कला से प्रताडि़त किसी हिंदू को क्या करना चाहिए? कुछ ऐसे असभ्य लोगों को छोड़कर जिन्होंने कानून अपने हाथ में लेकर चित्रकार की कुछ पेंटिंग प्रदर्शनियों में तोड़फोड़ की, अधिकांश हिंदुओं की प्रतिक्रिया वही थी, जो एक लोकतंत्र में होनी चाहिए। उन्होंने अदालत की शरण ली और चित्रकार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए। उन्होंने कानून का सहारा लिया जो नागरिकों को अन्य नागरिकों की पंथिक संवेदनाओं पर आघात करने से रोकता है। उन्हें जान से मारने की धमकी नहीं दी गई और इस तरह के भद्दी घोषणाएं नहीं की गई जैसी उत्तर प्रदेश में एक मुसलमान ने डेनमार्क के काटूर्निस्ट का सिर कलम करने वाले को 51 करोड़ रुपए देने की पेशकश के रूप में की थी, जिसने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाया था। अगर आप कुछ टीवी एंकरों के हावभाव पर गौर करें तो इस ईश-निंदा के घटिया तरीके पर हिंदुओं की लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया के लिए कोई सराहना नहीं की जानी चाहिए, बल्कि अदालत में खींचने के लिए इनकी भ‌र्त्सना की जानी चाहिए। हुसैन के मित्र और प्रशंसक जो भी कहें, सच्चाई यह है कि हिंदू भावनाओं के साथ इस प्रकार की घृणित खिलवाड़ के कारण वह कानूनी रूप से भगोड़ा घोषित हैं। जबसे उन पर मामले दर्ज किए गए हैं, वह फरार चल रहे हैं। बहुत से हिंदू जो हुसैन की इस घिनौनी कला से परिचित हैं, उन्हें कतरनाक पेंटर बताते हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि उनके लिए कतर ही उनकी अंतिम मंजिल थी! किंतु अगर हम अपनी पंथनिरपेक्ष परंपरा को मान देते हैं तो हमें उन्हें बचकर भाग निकलने नहीं देना चाहिए। कानून की लंबी बांह को कतर तक जाना चाहिए। हमें उनका प्रत्यारोपण करके 80 करोड़ भावनाओं पर चोट पहुंचाने के लिए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
साभार:- दैनिक जागरण
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)