राम विशाल देव बने वायस ऑफ़ नेशन के पश्चिम उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ
27.9.10
राम विशाल देव बने वायस ऑफ़ नेशन के पश्चिम उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ
राम विशाल देव बने वायस ऑफ़ नेशन के पश्चिम उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ
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RAM VISHAL DEV
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bolo ji tum ab kyaa kahoge.....???
ज़माना बेशक आज बहुत आगे बढ़ चूका होओ,मगर स्त्रियों के बारे में पुरुषों के द्वारा कुछ जुमले आज भी बेहद प्रचलित हैं,जिनमें से एक है स्त्रियों की बुद्धि उसके घुटने में होना...क्या तुम्हारी बुद्धि घुटने में है ऐसी बातें आज भी हम आये दिन,बल्कि रोज ही सुनते हैं....और स्त्रियाँ भी इसे सुनती हुई ऐसी "जुमला-प्रूफ"हो गयीं हैं कि उन्हें जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता इस जुमले से...मगर जैसा कि मैं रो देखता हूँ कि स्त्री की सुन्दरता मात्र देखकर उसकी संगत चाहने वाले,उससे प्रेम करने वाले,छोटी-छोटी बच्चियों से मात्र सुन्दरता के आधार पर ब्याह रचाने वाले पुरुषों...और ख़ास कर सुन्दर स्त्रियों, बच्चियों को दूर-दूर तक भी जाते हुए घूर-घूर कर देखने की सभी उम्र-वर्गों की जन्मजात प्रवृति को देखते हुए यह पड़ता है कि स्रियों की बुद्धि भले घुटने में ही सही मगर कम-से-कम है तो सही....तुममे वो भी है,इसमें संदेह ही होता है कभी-कभी....स्त्रियों को महज सुन्दरता के मापदंड पर मापने वाले पुरुष ने स्त्री को बाबा-आदम जमाने से जैसे सिर्फ उपभोग की वस्तु बना कर धर रखा है और आज के समय में तो विज्ञापनों की वस्तु भी....तो दोस्तों नियम भी यही है कि आप जिस चीज़ को उसके जिस रूप में इस्तेमाल करोगे,वह उसी रूप में ढल जायेगी....समूचा पारिस्थितिक-तंत्र इसी बुनियाद पर टिका हुआ है,कि जिसने जो काम करना है उसकी शारीरिक और मानसिक बुनावट उसी अनुसार ढल जाती है...अगर स्त्री भी उसी अनुसार ढली हुई है तो इसमें कौन सी अजूबा बात हो गयी !!
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राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ )
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संस्कतम्-भारतस्य जीवनम् पर अमित जी का स्वागत करें ।।
प्रिय बन्धु
पुण्यमयी मम भारतमाता
--
भवदीय: - आनन्द:
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SANSKRITJAGAT
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ASHUTOSH VERMA
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हाँ हाँ मुझे भी एक औरत…………….!
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Dharmesh Tiwari
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26.9.10
कभी तो समझ पाते
आँखो में आयी दिल की वो बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.
तुझे देखते ही मेरे दिल का खिल जाना,
इतनी खुशी मानो जन्नत ही मिल जाना.
बिछूड़ते वक़्त वो मायूस से दूर खड़े हम,
रोम-रोम से टपकता वो विदाई का गम.
पागल दिल के वो बेकरार हालात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.
परंपराओं के खिलाफ वो विद्रोही तेवर,
पर मौन मेरे होठों के कीमती जेवर.
दिल की बात जान को ही ना कह पाना,
कहते कहते बस यूँ ही चुप रह जाना.
मेरा जीवन हर साँस तेरी ही सौगात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.
तेरी हर खुशी में मेरी आँखो की हँसी बेपर्द,
तेरी हर मायूसी में नम मेरे दिल के वो दर्द.
सदियों तक राह तकने को मेरी आँखे तैयार,
बेचैन दिल को बस तेरी आस तेरा ही इंतजार.
मेरे धड़कन के वो तड़पते ज़ज्बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.
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Deepak YK
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'अनेकता मे एकता’ का देश
बात इस साल के मार्च महीने की है ,जब मैं छुट्टियों में दिल्ली से अपने गांव गया था ,शाम हो चुकी थी,झिंगुर की आवाज बचपन के दिनों को याद दिलाने के लिये काफ़ी थे । लम्बे समय के बाद गांव गया था, इसलिये अपने दोस्त के घर जाने का इरादा बनाया। आज फिर उसी शाम की अजान को सुनकर मैं अपने दोस्त अरसद से मिलने जा रहा था,लेकिन उसके घर की तरफ़ उठे हर कदम एक सवाल बनकर मेरा माथा ठनका रहे थे | क्योंकि आज मां और दादा(पिता जी) के आव भाव देख कर मुझे डर और एक अजीब से एह्सास ने घेर रखा था। मेरा अरसद के घर जाना आज शायद उन्हें खटक रहा था | जब हम सातवीं में पढ़ते थे तो हमारी दोस्ती हुई थी, मुझे इसके आगाज़ का पता ही नहीं चला ,और अन्जाम से बेसुध हूं |अगर ऐसा पता होता तो शायद हम दोस्ती नहीं कर पाते दादा के शब्दों में ”एक मुसलमान से ” दादा का दिल इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं अरसद के घर जाउं या उससे मिलूं ,वो साफ़–साफ़ शब्दों में मना तो नहीं करते हैं ,लेकिन मेरे अरसद के घर जाने पर पहले की तरह खुश भी नहीं होते हैं | मां भी कह बैथती है कहां मियां-टोली(मुसलमान के मुहल्ले) जा रहे हो| दोनो अच्छे खासे पढ़े लिखे हैं , लेकिन उनकी इस नारजगी में मुझे एक मूर्खता दिखाई देती है | जब इस दोस्ती की शुरूआत हुई थी तो मुझे लगा कि एक जिगरी यार मिला है, जो मेरे हर सुख दुख में मुझे अपना लगता है,और उसकी तरफ़ से भी कुछ ऐसा ही है| घंटों अरसद के घर पर जाकर बैठना ,पढ़ना, खेलना ,सैर सपाटे और टिफ़िन में स्कूल से भाग कर सात रूपये वाली फ़िल्म वी।सी।पी. पर देखने जाया करता था |उस समय न तो दादा रोकते थे और न ही मां कभी पूछा करती थी कि तुम इतने देर कहां थे |मैं कभी कभी उससे पूछ भी बैठता था यार हम दोनो की दोस्ती हमेशा ऐसी ही रहेगी ना |उसका जवाब होता था अगर तुम चाहोगे तो क्यों नहीं! धर्म और मजहब का पाठ न मुझे तब भाता था और न अभी सुट करता है | हमारा एक दूसरे के साथ मिलना और समय बिताना ही अपने आप में सबसे बडा मजहब और धर्म होता था| ,लेकिन आज हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गयी है कि ये बात ना मेरे गांव वालों को पसन्द आ रही है और ना ही मेरे घर वालों को आखिर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि इसमें गलत क्या है वो मेरा दोस्त है ,हम अगर एक साथ खाना खा लेते हैं या बदना (पानी पीने का लोटा) में पानी पी लेते हैं तो क्या मैं मुसलमान हो जाउंगा । एक दिन रोजा रख लिया तो कौन सा धर्म परिवर्तन हो गया . गांव में रिलाइंस बिग टी.वी और डी.टी.एच के छाते अब आसनी से देखने को मिल जाते हैं, अच्छी शिक्शा के लिये सरकारी स्कूलों की जगह मां-बाप अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने लगे हैं । लेकिन इस बदलते युग ने आज भी लोगों की सोच क्यों नहीं बदली है? दादा के मनाही के बावजूद जब मैं उस के घर गया और उसके साथ समय बिताया तो मुझे कुछ भी बदला हुआ नहीं लगा, वही प्यार,वही गर्मजोशी और दोस्ती कि वही मिठास बिल्कुल जलेबी की तरह मेरी समझ में आज यह बात नहीं आ रही है आखिर ऐसा क्यों हुआ,आदर्श की बात करने वाले दादा आज क्यों बदल गये हैं| क्या दादा ने आज हमारी दोस्ती में मजहब खोज लिया है |जो बचपन का प्यार था वो शब्दों की तलवार कैसे बन गयी है। आखिर आज वो अरसद से एक’मुसलमान’ क्यों हो गया है| आज भी लोगों की सोच क्यों नहीं बदल पा रही है, वही पुरानी सोच वही अछूत और नीच वाली बात | आज के दिन मन बहुत ही व्यथित हुआ,दादा की मौन मनाही ने जहां मेरे मन मे सवालों का पुलिन्दा खडा कर दिया था ,वहीं मां की भावनाओं ने भूखे सोने पर मजबूर । यह जान कर कि जात पात के इन भावनाओं से लोग कब खुद को अलग कर पायेंगे |' पोप्यूलर कल्चर’ वाले इस देश में लोग कब तक भटकाव,द्वन्द और दुविधा का दामन थाम कर एक अच्छे समाज की परिकल्प्ना करते रहेंगे? आखिर अल्लाह और भगवान के बीच की ये दरार कब तक कायम रहेगी? आज भी शायद लोगों की सोच नहीं बदल पायी है,बदला है तो सिर्फ़ ग्लोबल बनने का तरीका और जात –पात को परीभाषित करने का तरीका । जात-पात का चोला पहनकर इस देश को कैसे ’अनेकता मे एकता’ का देश कहा जाता है यह मेरी समझ से पडे है बिल्कुल मेरे दादा और मां की सोच की तरह |
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Unknown
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सुलगता काश्मीर और सरकार
राजकुमार साहू, जांजगीर छत्तीसगढ़
भारत का स्वर्ग कहा जाने वाला प्रदेश काश्मीर पिछले कुछ माह से सुलग रहा है। काश्मीर में छाई अलगाववादी ताकतों के कारण वहां के बाशिंदों का जीना दूभर हो गया है। ऐसी घिनौनी ताकतों को न कश्मीर की सरकार रोक पा रही है और ना ही केंद्र में बैठी मनमोहन की सरकार। जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री श्री अब्दुल्ला भी इन अलगाववादियों पर लगाम नहीं लगा पा रहा है। यह एक अफसोसजनक पहलू है। प्रदेश में युवा मुख्यमंत्री के कुर्सी सँभालने के बाद जम्मू-काश्मीर के लोगों को लगा था क़ि राज्य में अलगाववादियों पर बंदिश लगेगी, लेकिन उनकी सोच पर तब आघात लगी, जब वे अभी प्रदेश में हालात बिगड़ने के बाद एक कमजोर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। प्रदेश में पहले उनके पिता भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं, ऐसे में माना जा रहा था क़ि वे किसी तरह राज्य क़ि स्थिति पर नियंत्रण कर लेंगे। पर ऐसा हुआ नहीं, उलटे जिस तरह से दिनों-दिन काश्मीर में हालात बिगड़ रहें हैं, उससे सरकार क़ि क्षमता पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्र में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी काश्मीर क़ि स्थिति सुधारने में कामयाब नहीं हो सके हैं। उनहोंने शान्ति बहाली की अपील की हैं, वही एक उपलब्धि नजर आती है। अभी हाल में केंद्र सरकार द्वारा छात्रों क़ि रिहाई का महत्वपूर्ण फैश्ला किया है। जिसका विपक्ष भाजपा ने भी स्वागत किया है। जो भी काश्मीर के हालात में सुधार के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
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jindaginama
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राशि ज्ञान
जाल ज्योतिषं राशि ज्ञानं
एषा विद्या हितकरी ।
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भवदीय: - आनन्द:
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SANSKRITJAGAT
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बेटी ऐसी है तो बहू वैसी क्यों.....?
बहू और बेटी के फर्क की ही नहीं परवरिश की भी बात.......
पूरी पोस्ट यहाँ पढ़े.......
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डॉ. मोनिका शर्मा
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वजन ईमानदारी का
वजन करने की मशीन स्टेशन पर दिखी जब,
कितना भारी हुआ हूँ जानने की इच्छा हुई तब.
सिक्का डाला तो रिज़ल्ट निकलकर सामने आया,
जिसे पढ़कर मेरा मन थोड़ा सा चकराया.
सामने साफ दिख रहा था कि मैं हो गया हूँ भारी,
नीचे लिखा था- "आपके व्यक्तित्व की पहचान है ईमानदारी.
दोनो सच है इस पर नही हो रहा था विश्वास,
क्यूंकी दोनो बातों में था एक अजीब विरोधाभास.
भार के बारे में अब पुराना चलन नहीं रहा,
ईमानदारी में भई आजकल वजन नहीं रहा.
मंहगाई-मिलावट के जमाने में पौष्टिक खाना पाने से रहे,
इस कारण सिर्फ़ खाना खाकर तो हम मुटाने से रहे.
मंहगाई तो आजकल आसमान को छुने लगी है,
पानी भी तो बोतल बंद होकर मिलने लगी है.
शायद ये भी हो कल को आसमान में सूरज भी ना उगे,
कोई कंपनी उसे खरीद ले और धूप मुनाफ़े पे बेचने लगे.
यह सब सोच कर ये लगा यह मशीन मज़ाक कर रही है,
या फिर यह भी एक आदमी की तरह बात कर रही है.
आदमी रूपी वाइरस इसके अंदर प्रवेश कर गया है,
इसीलिए अब ये भी चापलूसी करना सीख गया है
इसबार मशीन को चेक करने के लिए सिक्का डाला,
पर अबकी तो उसने चमत्कार ही सामने निकाला,
मेरा वजन तो फिर से उतना ही दिखा था,
पर नीचे में तो कुछ अजब ही लिखा था.
लिखा था- "आप ऊँचे विचार वाले सुखी इंसान हैं"
मैं सोचा अजीब गोरखधंधा है कैसा व्यंग्यबाण है.
विचार ऊँचे होने से भला आज कौन सुखी होता है,
सदविचारी तो आज हर पल ही दुखी होता है.
बुद्ध महावीर के विचार अब किसके मन में पलते हैं,
गाँधीजी तो आजकल सिर्फ़ नोटों पर ही चलते हैं.
ऊँचा तो अब सिर्फ़ बैंक बॅलेन्स ही होता है,
नीतिशास्त्र तो किसी कोने में दुबक कर रोता है.
सदविचार तो आजकल कोई पढ़ने से रहा,
जिसने पढ़ लिया उसका वजन बढ़ने से रहा.
आइए आपको अब सामाजिक वजन बढ़ने का राज बताते हैं,
जब हम दूसरों पे आश्रित होते हैं लदते हैं तभी मूटाते हैं.
नेता जनता को लूटते हैं और वजन बढ़ाते हैं,
साधु भक्तों को काटते हैं अपना भार बढ़ाते हैं.
बड़े साहेब जूनियर्स को काम सरकाते हैं इसलिए भारी कहलाते हैं,
कर्मचारी अफ़सर पर काम टरकाते हैं इसलिए भारी माने जाते हैं.
नहीं होता आजकल वजन किसी ईमानदार सदविचारी का,
हलकापन है नतीजा आज मेहनत, ईमान और लाचारी का.
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Deepak YK
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25.9.10
पत्रकार कर रहे है परीक्षा मे नक़ल
जीवाजी विस्वविध्यालय के दूरस्थ शिक्षण संस्थान मे चल रही पत्रकारिता की परीक्षा में इन दिनों खुलकर नकल और अक्ल चल रही है! खबर हे की कुछ पेपर आउट भी हो रहे है ! अब पत्रकार भी नकल से बनेगे तो क्या होगा और लेखनी में क्या दम रहेगा !
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khbro ka khulasa
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ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा......!!
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा......!!
मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
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राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ )
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कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो....?
पहले उच्चतम न्यायलय की लखनऊ बेंच में अनावश्यक अडंगेबाजी का प्रयास और वहां असफल होने के बाद अब सर्वोच्च न्यायलय के मध्यम से अनावश्यक अडंगेबाजी ।
कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो और इस देश में एक नासूर हमेशा हमेशा बना रहे......
क्या ये मीडिया में अनावश्यक प्रचार पाने के लिए लालयित लोग हैं या अपने को जरुरत से ज्यादा समझदार समझने वाले लोग हैं ?
इस देश में सभी को आजादी है मगर इसका अर्थ ये नहीं है कि आप दूसरों की आजादी में जबरदस्ती दखल देने लगें ।
और राजनीति , धर्म , समाजसेवा के ठेकेदारों की रोजी रोटी चलने के लिए आवश्यक है कि कोई ना कोई समस्या बनी रहे, और अगर एक समस्या समाप्त हो रही है तो तुरंत दूसरी समस्या उत्पन्न की जाय ।
यहां मूर्ख बनाने और बनने वालों की भी कमी नहीं है ....
मीडिया चैनल समझा रहें है कि ये मंदिर , मस्जिद का फैसला नहीं है , ये तो केवल भूमि के स्वामित्त्व का फैसला है ।
क्या ये इतना ही सीधा है ?
अरे अगर भूमि का स्वामित्त्व उस पक्षकार के तरफ जाता है जो हिन्दू है तो जाहिर सी बात है कि वो कहेगा कि अब ये मेरी जमीन है तो यहाँ मंदिर बनेगा और ये मंदिर वालों की ही जीत है और अगर भूमि स्वामित्त्व उस पक्षकार की तरफ जाता है जो मुस्लिम है तो वो कहेगा कि मेरी जमीन खाली करो यहाँ मेरी मस्जिद बनेगी और ये ममजिद वालों की जीत है ।
तो सीधे सीधे यह मानना चाहिए की अदालत यह निर्धारित करेगी कि वहां क्या बनना चाहिए ।
और जो लोग कहते है कि आपसी बातचीत से मामले को हल करने का समय दिया जाना चाहिए तो वो लोग अब तक कहाँ थे ?
अपने घरों में बैठे अपने बच्चों , नाती , पोतों को गोद में खिलने में व्यस्त थे अब तक ?
इतने वर्षों से क्या कर रहे थे वो लोग ?
अब अचानक कौन सा सुलह कर लेंगे ?
और जो महानुभाव लोग इसके पैरोकार हैं उनसे ये भी पूंछा जाना चाहिए कि उनके पास सुलह की क्या योजना है ?
उनकी और उनके योजना की देश में स्वीकारिता कितनी है ?
और सत्ता और धर्म के दलालों पर उनकी पकड़ कितनी है ?
मजाक बना दिया है लोगों ने देश में ।
ना खुद कोई फैसला कर सकते है , ना देश के विधान को कोई फैसला करने दे रहे है ?
कोई कह रहा है कि इस फैसले से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ जायेगा ।
अरे फैसला ना आने से कौन सा बड़ा भाईचारा पनपा जा रहा है । हाँ एक घाव नासूर बनकर अन्दर ही अन्दर टीसता जरुर जा रहा है दोनों सम्प्रदायों में , जो भाईचारे के लिए अनंत तक अवरोध हो सकता है ।
मानव जाति बड़े से बड़े दुःख और क्षति को बर्दास्त कर लेता है फिर चाहे वो उसके किसी अपने के जीवन समाप्त हो जाने का दुःख हो या अपना सर्वस खो देने की क्षति ।
तो क्यों नहीं जो कल होना है उसे आज होने देते है......
जो होना है हो जाने दो , आग लगनी है लग जाने दो , कम से कम जो राख बचेगी उसपर तो नयी इबारत लिखी जा सकेगी ...
और जमाना भी देख और पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो आग लगाने वाले है । जो अपने आप को देश के न्यायालय से ऊपर मानते है , देश के विधान को दर-किनार कर अपनी रोटी सेंकने को तत्पर है ।
अगर हम विकसित हो गए है , समझदार हो गए है , सहनशील हो गएँ है तो जो होनी है और उसे अनंत काल तक नहीं टाल सकते है उसे आज क्यों नहीं होने दे रहे है...क्यों अपने संतानों का जीवन भी अँधेरे के गर्त में धकेलने को तत्पर हैं । जब सभी तथाकथित राजनेता , धर्म गुरु , समाजसेवक और जनता स्वयं से कोई समाधान नहीं खोज पा रही है तो अंतिम विकल्प न्यायालय में अनावश्यक की अडंगेबाजी क्यों की जा रही है ?
और विवादित ढांचा गिरने से ज्यादा बवाल तो अब नहीं ही होगा ये निश्चित है फिर अगर किसी एक की एक उंगली काटकर दो पूरे शरीर बच सकते है तो उसे बचा लेने हेतु आपरेशन करने की अनुमति चिकित्सक को क्यों नहीं दी जा रही है , क्यों नासूर पाल कर पूरा शरीर बर्बाद करने पर हम उतारू हैं ।
तो जो कल होना है उसे आज होने दो ...............जिससे कम से कम आने वाला कल तो सही हो सके ।
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Vivek Mishrs
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Labels: AnantAparAseemAakash, Vivek Mishra
गणित के फंडे ( वैदिक गणित)
हेल्लो ! फ्रेंड्स ! मेरे पास कुछ जानकारी है गणित विषय को ले कर के मैं इसे आप सबके सामने रखना चाहता हु। सायद आपको पसंद आएगा।
==> MULTIPLY TRICKS :-
1) सामान दसंक वाले संख्या :-
83 X 87 = ?
TRICK : 83 X 87
3 X 7 =21
8 X 9 = 72
83 X 87 = 7221
( जब भी एक ही दसंक में संख्या हो तो उसे उसके ऊपर के अंक के साथ गुना कर देना चाहिए। 8 X 9 )
2) TO MULTIPLY ANY TWO DIGITS NO BY 11
54 X 11 = ?
TRICK : 5_4
(5+4=9)
ANS : 594
( किसी भी दो सांख्ययो को ११ से गुना करना हो तो उन्हें अलग अलग कर के उन्ही के योग (JOD) को बिच में देने से जवाब मिल जायेगा.)
3) MULTIPLY WITH NUMBER 5
563254 X 5 = ?
TRICK : 563254 X 10/2 (10/2 =5)
= 5632540/2 (MAKE 2-2 GROUPS FROM LEFT TO RIGHT)
= 2816270 (HALF IT)
4) 9 टेबल
0-9 तक चढ़ते क्रम में लिख दो
0
1
2
3
4
5
6
7
8
9
फिर 9-0 तक उसी के बगल में लिख दीजिये
09
18
27
36
45
54
63
72
81
90
इस प्रकार
9 X 1 = 09
9 X 2 = 18
9 X 3 = 27
9 X 4 = 36
9 X 5 = 45
9 X 6 = 54
9 X 7 = 63
9 X 8 = 72
9 X 9 = 81
9 X 10= 90
खाना खाने का समय हो रहा है। दूसरा ब्लॉग बाद में लिखूंग।
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MONEY PLANT GROUP
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साधक-परिक्रमा
“77 मंत्रियों की संपत्ति की सूची जारी कर पहली बार मंत्रियों की संपत्ति के बारे मे जानकारी सार्वजनिक की है।”- अरे! जो बच्चे बच्चे को पता है, उसे क्या सर्वजनिक करने का दावा! और इसमें स्विट्जरलैंड –फ़ेक्टर कहाँ है जनाब?
पैसा लूटने के सिवा, नेता का क्या काम?
लूटो-लुटाओ-लूट की जाँच का बनता काम.
जाँच का बनता काम, बिठा दी जाँच-कमेटी.
उसमें भी पैसे का चक्कर, लूटा-लूटी.
कह साधक कवि, स्वागत है आ जाओ लूटने.
फ़ुर्सत कहाँ है इसे, लगा है पैसा लूटने.
नितिन गडकरी ने फोन पर ही आदेश पारित कर दिया कि हर हाल में झारखण्ड में सरकार बननी चाहिए. हालांकि ऊपरी तौर पर भले ही यह लग रहा हो कि नितिन गडकरी संघ की इच्छाओं का सम्मान कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है िक झारखण्ड
पूरा पढने ले लिये चटका दें….
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Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "
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जब न्यायालय सर्वोच्च तो फिर………………

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Dharmesh Tiwari
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निशंक ताबूत में आंखरी कील ठोकेगा कौन ?
देहरादून 2 सितंबर। देवभूमि उत्तरा खंड को देश का भाल बनाकर यहां के पानी और जवानी दोनों को विकास के कमल के सहारे ऊंची उड़ान भरने का जो सपना प्रदेश के मुख्यमंत्राी ने जिस तरीके से बुना है, उस पर देशभर में उगलिया उठनी भी शुरू हो गई हैं। पावर प्रोजेक्ट के आवंटन में घोटाले की बात हो या पिफर ट्टशिकेष की सरकारी भूमि का लैंडयूज चेंज कर अरबों के घोटाले को लेकर सरकार की कोर्ट में जवाबदेही। सभी मामलों में सरकार पूरी तरह कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। मुख्यमंत्राी का ताज पहनने के बाद से ही प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य के विकास को लेकर इसे देश का भाल बनाने की जो बातें जनता से कही थी उन पर खरा उतरना तो दूर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच ही भाजपा विकास का संदेश दे पाने में पूरी तरह पिफसड्डी साबित हुई है। सत्ता में साड़े तीन साल के भीतर राज करने वाली भाजपा सरकार को मुख्यमंत्राी तक बदलने पड़े और अब पुनः नेतृत्व परिवर्तन की बातें उठनी शुरू हो गई हैं। मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर बैठने के बाद से ही निशंक विरोध्ी ताकतें लगातार अपना तिकड़म भिड़ाती रही और प्रदेश के दो बड़े नेताओं भुवन चंद्र खंडूड़ी व भगत सिंह कोश्यारी के एक साथ हो जाने के चलते दोनों गुटों की ताकतें निशंक सरकार से कहीं अध्कि बड़ी हो गई। निशंक सरकार ने जहां अपने कार्यकाल के दौरान हरिद्वार के महाकुंभ को शांनि पूर्वक निपटाये जाने का श्रेय देशभर में लेने का प्रयास किया उसे उनके ही विरोध्ी लोगों ने कुंभ में घोटाला किए जाने की बातें कहकर शांत कर डाला। कुंभ को नोबल पुरस्कार दिए जाने की बातें भी प्रमुखता से उठाई जाने लगी लेकिन अंतिम शाही स्नान के दिन हुए भगदड़ के खूनी खेल ने कुंभ के सपफल आयोजन पर भी पूरी तरह प्रश्न चिन्ह लगा दिया। लेकिन कुंभ के सपफल आयोजन को भाजपा सरकार पूरे देशभर में प्रचारित करती हुई देखी गई। यहां तक की भाजपा के बड़े नेताओं तक ने कुंभ के सपफल आयोजन की तारीपफ करते हुए निशंक सरकार को अच्छे नंबर दे डाले। इतना ही नहीं सरकार के कामकाज से खुश होकर भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने भी सरकार की जमकर तारीपफ कर डाली। वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा. निशंक को सपफल मुख्यमंत्राी का ताज पहना डाला। जबकि एक पत्रिका द्वारा किए गए सर्वे में उत्तराखंड के सपफल मुख्यमंत्राी को टॉप-10 देना तो दूर कहीं भी ऐसा स्थान नहीं दिया गया जिससे उत्तराखंड के मुख्यमंत्राी डा. निशंक को सपफल मुख्यमंत्राी करार दिया जा सके। जबकि इसी संस्था द्वारा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्राी भुवन चंद्र खंडूड़ी को देश के मुख्यमंत्राीयों की सूचि में चौथे स्थान पर दर्शाया गया था।खंडूड़ी के मुख्यमंत्राी कार्यकाल में भले ही जनता के बीच सरकार सही संदेश दे पाने में विपफल रही हो लेकिन खंडूड़ी सरकार के लिए गए पफैसले जनता के बीच सरकार के प्रति आक्रोश का स्वर कभी भी नहीं उठा सके। क्योंकि लोक सभा चुनाव की पांचों सीटें कांग्रेस की झोली में जिस तरह से डलवा दी गई वह भी खंडूड़ी के तख्ता- पलट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हुई दिखी। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर खंडूड़ी को बदले जाने का कई वरिष्ठ नेताओं ने विरोध् भी किया लेकिन खंडूड़ी कोश्यारी के बीच लड़ाई का पफायदा सन् 2000 से मुख्यमंत्राी का सपना सजो रहे डा. निशंक उठाने में कामयाब रहे। लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठने के साथ से ही निशंक सरकार ने पावर प्रोजेक्ट के आवंटन से लेकर ट्टिशिकेष की सरकारी जमीन निजी कंपनी को लैंडयूज चेज कर कौड़ियों के भाव दे डाली तभी से सरकार की मुसीबतें उपफान पर आ बैठी। सड़क से लेकर सदन तक मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस व बसपा ने सरकार के इस निर्णय का खुलकर विरोध् करते हुए अपना बिगुल बजा डाला। इसके बाद सरकार की मुश्किलें कम होती न देख सरकार ने जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन को निरस्त करते हुए आवंटन में खामियां होने की बातें सामने रख डाली। घोटाले में 140 करोड़ रुपये से अध्कि लेन-देन के आरोप सरकार पर लगने शुरू हुए और इसके तुरंत बाद उत्तराखंड के सबसे बड़े घोटाले का खुलासा हो गया। इस खुलासे के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार पूरे देश भर में जो साख बनाने का दावा कर रही थी वह पूरी तरह खुलकर सामने आ गई। उत्तराखंड में कायदे कानूनों को ताक पर रखकर जिस तरह से बिना अनुमति के हरे पेड़ों को काट डाला गया उसने उत्तराखंड के सबसे बड़े घोटाले को उजागर करते हुए देश के भाल कहे जाने वाले मुख्यमंत्राी की बोलती को भी बंद कर डाला। सरकार कई बार इस घोटाले के ना हाने की बातें मीडिया के सामने करती नजर आयी वहीं निशंक नौ रत्नों से लेकर उनके करीबी लोग घोटाला ना होने की बातें करते नजर आए। यहां तक की कांग्रेस की इस मामले में सीबीआई जांच तक की मांग को मुख्यमंत्राी द्वारा ठुकरा दिया गया। इस घोटाले में भाजपा के सह प्रभारी डा. अनिल जैन, प्रभातम कंपनी के साथ-साथ आरएसएस से जुड़े कुछ नेताओं के नाम भी खंुलकर उजागर हुए। घोटालों की गूंज इस तरह उठी कि उसका ध्ुआं देशभर की जनता ने टीवी चैनलों की सुर्खियों के रूप में देखा। यहां तक की सरकार के घोटालों की गूंज से दिल्ली में बैठे भाजपा के दिग्गज भी सन्न रह गए और घोटालों के पीछे सरकार की छवि देशभर में खराब होने को लेकर भी मंथन शुरू हो गया। घोटालों के बाद से ही लगातार भाजप के दो बड़ दिग्गज आपस में हाथ मिलाकर निशंक के तख्ता-पलट की तैयारी में आंखरी कील ठोकने में जुट गए हैं। यहां तक की दोनों दिग्गज पार्टी हाई कमान के सामने 2012 के होने वाले विधनसभा चुनाव को लेकर अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत कर चुके हैं वहीं निशंक सरकार के रिपोर्ट कार्ड पर लाल झंडी दिखाने के लिए हाईकमान से गुजारिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं विकास के नाम पर 2012 की तैयारियों में जुटने का दम भरने वाली भाजपा सरकार को कार्यकर्ताओं का भी आक्रोश झेलना पड़ रहा है और निशंक सरकार के विधयक निध् िसे होने वाले कार्यों को लेकर भी विधयकों के खिलापफ निर्णय दिए जाने से सरकार कटघरे में आ गई है। जबकि इससे पूर्व विधयक निध् िसे हाने वाले कार्यों का कोई टैंडर नहीं कराया जाता था लेकिन निशंक सरकार ने एक लाख से ऊपर के होने वाले कार्यों पर टैंडर के माध्यम से काम कराए जाने का शासनादेश जारीकर दिए जाने से भी विधयकों में रोष देखा जा रहा है। घोटालों की परत जिस तरह से उत्तराखंड में खुलती हुए देखी जा रही है उसे देखते हुए जल्द ही हरिद्वार में हुए महाकुंभ में किया गया करोड़ों का खर्च भी सामने उजागर हो सकता है। कुलमिलाकर स्टर्डिया डैवलेपर्स के निर्माण कार्यों पर रोक लगाकर सरकार ने घोटाले को स्वीकार तो कर लिया है लेकिन जमीन का लीज रद्द ना किए जाने के पीछे घोटाले की मंशा अभी भी बरकरार हैं।इस मामले को लेकर हाई कोर्ट में दाखिल उत्तराखंड जनता संघर्ष मोर्चा के सचिव स्वाती दर्शन भारती ने जनहित याचिका दायर कर कंपनी को बिना विधनसभा में बिल पारित किए करोड़ों की भूमि दिए जाने की शिकायत की गई थी। याचिका कर्ता द्वारा जमीन के सौदों को रद्द करने के साथ-साथ सारे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराए जाने की मांग की गई हैं। इस प्रकरण में उत्तराखंड के मुख्य न्यायाध्ीश न्यायमुर्ति बारेन घोष व न्यायमुर्ती वी. के बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ ने प्रदेश सरकार व संबंध्ति कंपनी को चार हफ्रते का समय देते हुए जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं। यह मामला कोर्ट में चले जाने बाद सरकार की मुश्किलें कम होती नहीं देखी जा रही वहीं घोटालों के साथ-साथ चरित्रा हनन की राजनीति भी शुरू हो गई है। कुलमिलाकर 2012 में पुनः सत्ता में वापसी का सपना सजोने वाली भाजपा एक और नए मुख्यमंत्राी की ताजपोशी करने में जुटी हुई हैं। इसका कितना पफायदा उत्तराखंड को मिलेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन संगठन स्तर पर मुख्यमंत्राी बदले जाने को लेकर प्रदेश के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं से भी पफीड बैक लिया जाना शुरू हो गया है। खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता सौदान सिंह व सुध्ीर कुलकर्णी का दून दौरा कुछ इस तरह के ही संदेश दे रहा है। हांलाकि प्रदेश का भाजपा संगठन उनके दौरों को लेकर किसी भी प्रकार की टिप्पणी से बचता नजर आ रहा है।वहीं निशंक सरकार में बेकाबू नौकरशाही में भी सूबे को बेहाल कर डाला है। निशंक सरकार के खिलापफ घोटालों, वरिष्ठ नौकरशाहों को नजरअंदाज, जनता से किए गए वादों को पूरा ना किए जाने के आरोपों के साथ-साथ चरित्रा हनन तक के आरोप लगे हुए हैं। अब देखना यह होगा कि राजनीति के अर्जुन इन सब आरोपों से निकल पाते हैं या पिफर अभिमन्यु की तरह घेरे में कैद हो जाते हैं। क्योंकि आंकड़ों के आधर पर बाजीगरी दिखाने का खेल निशंक उत्तर प्रदेश के समय से बखुूबी जानते हैं। 09837261570
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narayan pargain
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दिल्ली सरकार का अनुकर्णीय निर्णय
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24.9.10
श्री रामाय नमः !
मैं यशवंत जी को सबसे पहले मुबारक बाद देना चाहूँगा जिन्होंने कुछ अलग करने की कोसिस की।
मेरा नाम अरुण तिवारी है। मेरी उम्र २५ वरस है और मैं सूरत से हूँ । यह मेरा पहला ब्लॉग है और मैं इसे भगवन को अर्पित करना चाहता हूँ जिन्होंने ये खुबसूरत दुनिया बनायीं है। और बिना किसी भेद भाव के प्रकृति सबके लिए सामान रूप से अपनी अबो हवा प्रदान करती है। और निश्चय ही भारत देश को भी सलामी देना चाहूँगा जिसमे पैदा हो कर मुझे गर्वान्वित महसूस होता है।
vakratu.nDa mahaakaaya koTisuuryakotisamaprabha nirvighnaM kuru me deva sarvakaaryeshhu सर्वदा ।
या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता.
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा.
हिंदी अनुवाद: जो कुंद फूल, चंद्रमा और वर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं जिनके हाथ, श्रेष्ठ वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर आसन ग्रहण करती हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिदेव, जिनकी सदैव स्तुति करते हैं हे माँ भगवती सरस्वती, आप मेरी सारी (मानसिक) जड़ता को ।
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MONEY PLANT GROUP
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मातृत्व को तो बख्श दो मेरे भाई..
मातृत्व को तो बख्श दो मेरे भाई...
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संजीव शर्मा/Sanjeev Sharma
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टीआरपी के खेल में संतो की रेल
हो सकता है... ये सब टीआरपी का खेल है... संतों पर उछाले जानी वाली कीचड़ टीवी चैनल पर खूब बिकती है। स्टिंग आप्रेशन के मास्टर टेप और प्रसारित किये जाने वाले विजुअल में काफी अंतर होता है। बिजनेस बन चुके टीवी न्यूज चैनलों को माल बेचने के लिए कुछ तो ऐसा दिखाना ही पड़ेगा जिसे लोग चाव से देखे। आये दिन हमें देखने को मिल जाता है कि फंला फंला संत पर ये आरोप लगे है। लेकिन जब वे आरोपों से बरी होते है तो वो खबर नहीं बनती है। खबर बनेगी भी क्यों उसका पैसा थोड़े ही मिलेगा। मैं ये नहीं कहता है देश के सभी संत दागी है, हो सकता है उनमें से कुछ अपराधी हो।
लेकिन मैं एक बात पूछना चाहता हूं... हमारा देश संतो का देश है यहां पर अच्छे संत भी है, और उनके द्वारा चलाये जा रहे अच्छे काम भी। फिर वो कभी खबर क्यों नहीं बन पाती है। हां अगर वो पैसा देंगे तो निश्चित रूप से खबर बनेगी। वैसे भी आज कल पैड न्यूज का जमाना भी आ गया है।
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Suraj Singh Solanki
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23.9.10
जातिवाद या विकाश
हमारे देश की राजनीति के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि राष्ट्रवाद और समाजवाद कि बात करने वाले राजनीतिक दल भी जातिवाद को बढ़ावा दे रहे है. विश्व में प्रजातंत्र की पहली किरण इसी भारत देश के छोटे से वैशाली जनपद से फैली थी. आज हमारा देश जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति की धुरी बनकर रह गयी है. देश में सबसे पहले अंग्रेजो ने सन 1857 के ग़दर के बाद जातिवाद और मजहब के नाम पर लोगो को बाटने का कम किया था. चंद गद्दारों के कारन अंग्रेज इस भारत विरोधी षड़यंत्र में काफी हद तक सफल हुए और लम्बे अरसे तक हम पर राज किया. सन 1947 में भारत और पाकिस्तान का विभाजन भी इसी आधार पर हुआ था. अंग्रेजो से तो हमारा मुल्क आजाद जरुर हो गया लेकिन अंग्रेज हमे जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के दलदल में फसा कर चले गये.
आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जातिवादी जनगणना का विरोध किया था. इसके बाद पूर्व प्रधामंत्री विपी सिंह ने मंडल कमीशन को लागु कर जातिवादी राजनीति को हवा दी. उस वक़्त कई युवको ने इसके कारन अपनी जान गवांई थी. उस वक़्त लगी आग की लपटे आज भी भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रही है.
बिहार में छह चरणों में चुनाव होने है. एक दो दिनों में सभी दलों के प्रत्यासियो की घोषणा भी हो जाएगी. लेकिन इस बार के चुनाव में भी विकाश के मुद्दे पर जातीय समीकरण हावी दिख रहा है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दावा किया थी कि इस बार का चुनावी मुद्दा बिहार का विकाश और विनाश होगा लेकिन हालिया घटनाक्रम को देखते हुए ऐसा लगता है की राजनीति वे भी अछूते नहीं है.
बीजेपी- जेडीयूं गठबंधन, राजद - लोजपा और कांग्रेस सहित सभी दल के लोग जाति विशेष के मतदाताओ को रिझाने में लगे है. सभी दलों के लोग अगड़ी और मुसलमान मतदाताओ को अपने पक्ष में करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे है. अभी यहाँ की चुनावी राजनीति में दल- बदल का खेल जोड़-शोर से चल रहा है. ये दल बदल जातीय समीकरण और टिकट को लेकर हो रहे है.
सवाल यह उठता है कि आखिर हमे जातीय राजनीति से कब मुक्ति मिलेगी. कब हम जात- पात से ऊपर उठकर विकाश के मुद्दे पर वोट करेंगे. इसके लिए हम सब को जागरूक होना पड़ेगा. जिस दिन हमारे देश की राजनीति में जातिवाद पर विकाश हावी हो जायेगा उस दिन हमारा देश पूरी दुनिया का सिरमौर्य कहलायेगा.जातिवाद या विकाश
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gunjan
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आम आदमी-ब्रज की दुनिया
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ब्रजकिशोर सिंह
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आइये अभिवादन करें
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Vivek Mishrs
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संस्कृतलेखनप्रशिक्षणकक्ष्या - धातु प्रकरणम्
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संस्कृतलेखनप्रशिक्षणकक्ष्या- धातु प्रकरणम्
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SANSKRITJAGAT
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सबके अपने अपने ईश्वर , जाने कितने जग के ईश्वर ?
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Vivek Mishrs
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