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27.9.10

राम विशाल देव बने वायस ऑफ़ नेशन के पश्चिम उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ




राम विशाल देव बने वायस ऑफ़ नेशन के पश्चिम उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से प्रसारित हिंदी रास्ट्रीय न्यूज़ चैनल ने दोबारा पारी शुरू कर दी है | तो चैनल ने ज्यादातर अपने पुराने लोगो पर ही भरोसा जताया है | उसी कड़ी चैनल के शुरूआती दौर से साथ रहे राम विशाल देव को पुन पश्चिम उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गयी है | उन्हें पश्चिम उत्तर प्रदेश के १८ जिलो में तहसील स्तर पर संवाददाताओ की नियुक्ति की जिम्मेदारी दी गयी है | साथ ही चैनल को आन एयर करने का जिम्मा भी उन्ही को दिया गया है | ज्ञात हो की राम विशाल देव चैनल के शुरूआती दौर से साथ जुड़े रहे है और उन्होंने विपरीत परिस्थिति में भी चैनल को नहीं छोड़ा | वह चैनल के विश्वसनीय लोगो में शुमार है | राम विशाल देव ने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है ओर पश्चिम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, बिजनौर, रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ, गाजियाबाद, आगरा, फिरोजाबाद, पीलीभीत, आदि जगहों पर जयादातर हिस्सों में चैनल को आन एयर करा संवाददाता नियुक्त कर दिए | उनके अनुसार १५ दिन के अन्दर पुरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में नेटवर्क खड़ा कर दिया जायेगा | इससे  पहले राम विशाल देव हरिद्वार से एक साप्ताहिक अखबार में सह संपादक के पद पर कार्य कर चुके है ओर उन्होंने  कई पत्रिकाओ में भी लेखन कार्य किया है | ओर जल्द ही तीर्थ नगरी हरिद्वार से खबर उत्तराखंड नाम से एक न्यूज़ पोर्टल लांच कर रहे है जानकारी के अनुसार १० अक्टूबर को न्यूज़ पोर्टल लांच किया जा रहा है |  पश्चिम उत्तर प्रदेश में वायस ऑफ़ नेसन के संवाददाता बनने के लिए कॉल करे +९१-९८९७४६४१७२ या ई-मेल करे von.westup@gmail.com
राम विशाल देव, 9897464172

bolo ji tum ab kyaa kahoge.....???

                    ज़माना बेशक आज बहुत आगे बढ़ चूका होओ,मगर स्त्रियों के बारे में पुरुषों के द्वारा कुछ जुमले आज भी बेहद प्रचलित हैं,जिनमें से एक है स्त्रियों की बुद्धि उसके घुटने में होना...क्या तुम्हारी बुद्धि घुटने में है ऐसी बातें आज भी हम आये दिन,बल्कि रोज ही सुनते हैं....और स्त्रियाँ भी इसे सुनती हुई ऐसी "जुमला-प्रूफ"हो गयीं हैं कि उन्हें जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता इस जुमले से...मगर जैसा कि मैं रो देखता हूँ कि स्त्री की सुन्दरता मात्र देखकर उसकी संगत चाहने वाले,उससे प्रेम करने वाले,छोटी-छोटी बच्चियों से मात्र सुन्दरता के आधार पर ब्याह रचाने वाले पुरुषों...और ख़ास कर सुन्दर स्त्रियों, बच्चियों को दूर-दूर तक भी जाते हुए घूर-घूर कर देखने की सभी उम्र-वर्गों की जन्मजात प्रवृति को देखते हुए यह पड़ता है कि स्रियों की बुद्धि भले घुटने में ही सही मगर कम-से-कम है तो सही....तुममे वो भी है,इसमें संदेह ही होता है कभी-कभी....स्त्रियों को महज सुन्दरता के मापदंड पर मापने वाले पुरुष ने स्त्री को बाबा-आदम जमाने से जैसे सिर्फ उपभोग की वस्तु बना कर धर रखा है और आज के समय में तो विज्ञापनों की वस्तु भी....तो दोस्तों नियम भी यही है कि आप जिस चीज़ को उसके जिस रूप में इस्तेमाल करोगे,वह उसी रूप में ढल जायेगी....समूचा पारिस्थितिक-तंत्र  इसी बुनियाद पर टिका हुआ है,कि जिसने जो काम करना है उसकी शारीरिक और मानसिक बुनावट उसी अनुसार ढल जाती है...अगर स्त्री भी उसी अनुसार ढली हुई है तो इसमें कौन सी अजूबा बात हो गयी !!    

                     दोस्तों हमने विशेषतया भारत में स्त्रियों को जो स्थान दिया हुआ है उसमें उसके सौन्दर्य के उपयोग के अलावा खुद के इस्तेमाल की कोई और गुंजाईश ही नहीं बनती...वो तो गनीमत है विगत कालों में कुछ महापुरुषों ने अपनी मानवीयता भरी दृष्टि के कारण स्त्रियों पर रहम किया और उनके बहुत सारे बंधक अधिकार उन्हें लौटाए....और कुछ हद तक उनकी खोयी हुई गरिमा उन्हें प्रदान भी की वरना मुग़ल काल और उसके आस-पास के समय से हमने स्त्रियों को दो ही तरह से पोषित किया....या तो शोषित बीवी....या फिर "रंडी"(माफ़ कीजिये मैं यह शब्द नहीं बदलना चाहूँगा.... क्योंकि हमारे बहुत बड़े सौभाग्य से स्त्रियों के लिए यह शब्द आज भी देश के बहुत बड़े हिस्से में स्त्रियों के लिए जैसे बड़े सम्मान से लिया जाता है,ठीक उसी तरह जिस तरह दिल्ली और उसके आस-पास "भैन...चो....और भैन के.....!!)जब शब्दों का उपयोग आप जिस सम्मान के साथ अपने समाज में बड़े ही धड़ल्ले से किया करते हो....तो उन्हीं शब्दों को आपको लतियाने वाले आलेखों में देखकर ऐतराज मत करो....बल्कि शर्म करो शर्म....ताकि उस शर्म से तुम किसी को उसका वाजब सम्मान लौटा सको....!!
                 तो दोस्तों स्त्रियों के लिए हमने जिस तरह की दुनिया का निर्माण किया....सिर्फ अपनी जरूरतों और अपनी वासनापूर्ति के लिए....तो एक आर्थिक रूप से गुलाम वस्तु के क्या हो पाना संभव होता....??और जब वो सौन्दर्य की मानक बनी हुई है तो हम कहते हैं कि उसकी बुद्धि घुटने में....ये क्या बात हुई भला....!!....आपको अगर उसकी बुद्धि पर कोई शक तो उसे जो काम आप खुद कर रहे हो वो सौंप कर देख लो....!!और उसकी भी क्या जरुरत है....आप ज़रा आँखे ही खोल लो ना...आपको खुद ही दिखई दे जाएगा....को वो कहीं भी आपसे कम उत्तम प्रदर्शन नहीं कर रही,बल्कि कहीं -कहीं तो आपसे भी ज्यादा....कहने का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि इस युग में किसी को छोटा मत समझो...ना स्त्री को ना बच्चों को...वो दिन हवा हुए जब स्त्री आपकी बपौती हुआ करती थी...अब वो एक खुला आसमान है...और उसकी अपनी एक परवाज है...और किसी मुगालते में मत रहना तुम....स्त्री की यह उड़ान अनंत भी हो सकती है....यहाँ तक कि तुम्हारी कल्पना के बाहर भी....इसीलिए तुम तो अपना काम करो जी...और इस्त्री को अपना काम करने दो.....उसकी पूरी आज़ादी के साथ......ठीक है ना.....??आगे इस बात का ध्यान रखना....!!!

संस्‍कतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी का स्‍वागत करें ।।


प्रिय बन्‍धु 

आपके अपने संस्‍कृत ब्‍लाग , संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी ने अपना पहला लेख भारत माता की वंदना के रूप में प्रस्‍तुत किया है ।

पुण्यमयी मम भारतमाता

टिप्‍पणियों से स्‍वागत करें ।

शारदा जी ने मेघदूत के श्‍लोकों की प्रस्‍तुति आरम्‍भ की है ा

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भवदीय: - आनन्‍द:

संगठन चुनाव के नाम पर जिले में मात्र हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में मजबूत कांग्रेस को ही और मजबूत करने का काम किया गया है

प्रभात झॉ के कार्यक्रम में केवलारी का जुड़ना एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना मानी जा रही हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में कहा कि वैसे तो डॉ. बिसेन ने अच्छा चुनाव लड़ा था लेंकिन हमारी ही कुछ कसर रह गई। लेकिन इस बार आपको कोई चूक नहीं करना हैं। वैसे शायद प्रभात झॉ जी इस तथ्य वाकिफ ही होंगें कि इंका भाजपा की नूरा कुश्ती में ही केवलारी सीट भाजपा हारती आ रही हैं बदले में उसे शेष सभी सीटों पर जीत दिलायी जाती हैं। कांग्रेस के संगठन चुनावों के नाटक का समापन हो गया हैं। विगत दिनों कांग्रेस के जिला निर्वाचन अधिकारी वालुजकर सिवनी दोबारा आये थे। जिला प्रतिनिधियों की सूची गोपनीय रखी गई थी। इसको मीडिया को भी उपलब्ध नहीं कराया गया था। बैठक में पहुंचे वरिष्ठ इंका नेता आशुतोष वर्मा, राजकुमार पप्पू खुराना,प्रसन्न मालू और संजय भारद्वाज आदि ने इस बात पर आपत्ति उठायी कि जिला प्रतिनिधियों की सूची को गोपनीय क्यों रखा गयार्षोर्षो चुनाव के नाम पर औपचारिकता करके किसी नेता की मनमानी थोपी जा रही हैं। अयोध्या विवाद पर आने वाले फैसले को लेकर जिले में अमन चैन बनाये रखने के लिये ऐतिहात के तौर पर कई कार्य किये गये। जिले के प्रशासनिक अमले के साथ ही विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभायी। विगत 23 सितम्बर को प्रशासन की पहल पर जिले के सभी घर्म गुरुओं,राजनैतिक दलों के नेता,सामाजिक कार्यकत्ताZ और प्रशानिक अधिकारियों ने संयुक्त रूप से शान्ति मार्च का आयोजन किया।



प्रभात झा के दौरे में केवलारी का रहना चर्चित- लंबे समय बाद जिले में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झॉ का नगरागमन हुआ। उन्होंने जिले के सभी मंड़लों के कार्यकत्ताZओं से तीन सम्मेलनों में मुलाकात की और उन्हें मार्गदर्शन दिया। सिवनी,केवलारी और लखनादौन में उनकें सम्मेलन हुये। प्रभात झॉ के कार्यक्रम में केवलारी का जुड़ना एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना मानी जा रही हैं। उल्लेखनीय हैं कि केवलारी क्षेत्र कांग्रेस के हरवंश सिंह विधायक हैं जो इन दिनो विधानसभा के उपाध्यक्ष पद पर आसीन हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय हैं कि विस उपाध्यक्ष रहते हुये भी जब हरवंश सिंह ने कांग्रेस के निर्णय के साथ सदन के बहिष्कार का निर्णय लिया था और यह बयान दिया था कि पार्टी मेरे लिये पहले हैं और उपाध्यक्ष पद बाद मे हैं। तब सदन के अन्दर और बाहर भारी बवाल मचा था। नये प्रदेशाध्यक्ष बन प्रभात झॉ ने पूर्व मुख्यमन्त्री कैलाश जोशी और कप्तान सिंह के साथ राज्यपाल से भेंट कर श्री हरवंश सिंह के संवैधानिक पद पर रहते हुये सदन के बहिष्कार को आपत्तिजनक बताते हुये आवयक कार्यवाही करने की मांग की थी। लेकिन भाजपा की गुटबाजी और इंका भाजपा की नूरा कुश्ती के चलते हरवंश सिंह के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुयी थी। इसलिये प्रभात झॉ के जिले के दौरे में केवलारी के सम्मलिम होने को लेकर तरह तरह की अटकलें लगायी जा रहीं हैं। उनके इस प्रवास में भाजपा के केवलारी से रहे पूर्व मन्त्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन भी साथ थे। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में कहा कि वैसे तो डॉ. बिसेन ने अच्छा चुनाव लड़ा था लेंकिन हमारी ही कुछ कसर रह गई। लेकिन इस बार आपको कोई चूक नहीं करना हैं और पिछले चार बार बदला लेकर इस बार यह सीट जीतना ही हैं। वैसे शायद प्रभात झॉ जी इस तथ्य वाकिफ ही होंगें कि इंका भाजपा की नूरा कुश्ती में ही केवलारी सीट भाजपा हारती आ रही हैं बदले में उसे शेष सभी सीटों पर जीत दिलायी जाती हैं। भाजपा यदि सन 1993 के पहले चुनाव से लेकर आज तक की अपनी हार की समीक्षा करे तो सारे तथ्य वैसे ही उजागर हो जायेंगें लेकिन सब कुछ ओपन सीक्रेट की तरह साफ हैं फिर भी आज तक अनुशासन के जानी जाने वाली भाजपा ने कभी भी किसी के भी खिलाफ भीतरघात के आरोप में कोई कार्यवाही करना उचित नहीं समझा।

केवलारी क्षेत्र को केन्द्र बना कर हुये इंका के चुनाव- कांग्रेस के संगठन चुनावों के नाटक का समापन हो गया हैं। विगत दिनों कांग्रेस के जिला निर्वाचन अधिकारी वालुजकर सिवनी दोबारा आये थे। उन्होंने मालू भवन में एक बैठक में भाग लिया। इस बैठक में प्रवेश नियन्त्रित किया गया था। केवल पासधारी लोगों को ही प्रवेश की अनुमति दी गई थी। जिला प्रतिनिधियों की सूची गोपनीय रखी गई थी। इसको मीडिया को भी उपलब्ध नहीं कराया गया था। बैठक में पहुंचे वरिष्ठ इंका नेता आशुतोष वर्मा, राजकुमार पप्पू खुराना,प्रसन्न मालू और संजय भारद्वाज आदि ने इस बात पर आपत्ति उठायी कि जिला प्रतिनिधियों की सूची को गोपनीय क्यों रखा गयार्षोर्षो चुनाव के नाम पर औपचारिकता करके किसी नेता की मनमानी थोपी जा रही हैं। जिले के एकमात्र विधायक हरवंश सिंह के विश्वास पात्र हीरा आसवानी के नाम पर आम सहमति की बात की गई। यहां यह उल्लेखनीय हैं कि व्यवहार कुशल व्यवसायी हीरा आसवानी की केवलारी विधानसभा क्षेत्र में शुगर मिल रही हैं एवं पिछले तीन चुनावों से वे पलारी के आस पास के पोलिंग बूथों का प्रभार कुशलता के साथ सम्भालते रहें हैं। जिले में कांग्रेस संगठन के चुनाव ही मात्र केवलारी विधानसभा क्षेत्र जीतने के ही हिसाब से कराये गये हैं जो कि हरवंश सिंह का क्षेत्र हैं जहां से वे चार बार से चुनाव जीत रहें हैं। पिछले पांच चुनावों से सिवनी और बरघाट एवं दो बार से लखनादौन क्षेत्र में कांग्रेस हारती आ रही हैं। लेकिन इन क्षेत्रों को जीत कर कांग्रेस को मजबूत करने के कोई प्रयास संगठन चुनावों में नहीं किये गये है।सिवनी,बरघाट और लखनादौन क्षेत्रसे भी जिन नेताओं का चयन किया गया हें उनमें से अधिकांश हरवंश सिंह के पसन्दीदा उम्मीदवार ना आने पर अपने क्षेत्र में भीतरघात और केवलारी में हरवंश सिंह का चुनावी काम करते रहे हैं। अधिकांश प्रदेश प्रतिनिधियों और जिला प्रतिनिधियों का चयन इसी आधार पर किया गया हैं। केवलारी विधानसभा क्षेत्र में सम्पूर्ण केवलारी ब्लाक के अलावा सिवनी ग्रामीण,छपारा एवं धनोरा ब्लाक के कुछ हिस्से आते है।इन तीनों ब्लाकों के प्रदेश प्रतिनिधि केवलारी क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। इसी तरह इन तीन ब्लाकों के 18 जिला प्रतिनिधियों में से 13 जिला प्रतिनिधि केवलारी क्षेत्र के निवासी हैं जबकि इन तीन ब्लाकों में सिवनी एवं लखनादौन विधानसभा क्षेत्र के बड़े हिस्से शामिल हैं। इस तरह यह तो कहा ही जा सकता हैं कि इन संगठन चुनावों से जिले में कांग्रेस मजबूत नहीं होगी और सोनिया और राहुल की मंशा पर पानी फेर दिया गया है ैंऔर संगठन चुनाव के नाम पर जिले में मात्र केवलारी में मजबूत कांग्रेस को ही और मजबूत करने का काम किया गया हैं।।

अयोध्या विवाद:शान्ति मार्च का हुआ असर- अयोध्या विवाद पर आने वाले फैसले को लेकर जिले में अमन चैन बनाये रखने के लिये ऐतिहात के तौर पर कई कार्य किये गये। जिले के प्रशासनिक अमले के साथ ही विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभायी। विगत 23 सितम्बर को प्रशासन की पहल पर जिले के सभी घर्म गुरुओं,राजनैतिक दलों के नेता,सामाजिक कार्यकत्ताZ और प्रशानिक अधिकारियों ने संयुक्त रूप से शान्ति मार्च का आयोजन किया जो कि शहर के भेरौगंज इलाके से शुरू होकर विभिन्न इलाकों का भ्रमण करते हुये स्थानीय थाने के सामने वाले उर्दू स्कूल में समाप्त हुआ। शान्ति मार्च के समापन के अवसर पर उपस्थित धर्म गुरुओं,प्रमुख नेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने शान्ति और अमन चैन बनाये रखने की अपील की थी। जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक ने जिले ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण कर शान्ति बनाये रखने की अपील की थी। सभी कार्यक्रमों में उपस्थित नागरिकों को जिला पुलिस अधीक्षक शपथ भी दिलाते थे। इन सब प्रयासों से जिले में एक वातावरण बन गया था। सभी आश्वस्त दिख रहें थे कि बीते कुछ सालों में जिले के अमन चैन और शान्ति के स्विर्णम इतिहास पर लगे बदनुमा दागों को धो लेंगें। लेकिन 24 सितम्बर को होने वाला फैसला टल गया। अब 28 सित. को सुप्रीम कोर्ट में पेशी रहेगी जिसके बाद ही कुछ तय हो पायेगा। वैसे यही उम्मीद की जा रही है कि जिले में अमन चैन बना रहेगा।

हाँ हाँ मुझे भी एक औरत…………….!


सुबह से ही उठ कर नहा धो लेने के बाद मन के उफान को रोकते नाश्ता कर रहे मोहन के माँ को लगा रहा था की आज वो उसे किस तरह से दो रोटी ज्यादा खिला दे उसे लग रहा था की ये दो रोटी ज्यादा खा के जायेगा तो इंतरवियु में इसे सलेक्शन होने से कोई रोक नहीं पायेगा और उसका बेटा नियुक्ति पत्र लेकर ही अपने घर आएगा और फिर शान से उशकी भोली भाली तथा अनपढ़ माँ सबसे कहेगी की मोहन को नौकरी मिल गयी…………….मिठाई खाओ मिठाई खाओ! आखिर सोचे भी क्यों नहीं मोहन दुनिया के लिए कुरूप और बदरंग सही पर उसके लिए तो उसका बेटा था जो उसे बेइंतिहा प्यार करती थी,किचन में बेलन लिए खड़ी बूढ़ी माँ इतना सोचने में गम थी की उसे पता भी नहीं चला की उसके रोटी न सेक पाने की वज़ह से लेट हो रहा मोहन एक रोटी कम ही खा मुह को धोकर जैसे ही बोला अच्छा माई अब मै जा रहा हूँ और आशीर्वाद दे की आज नौकरी मिल ही जाय, की आवाज सुन अचानक ध्यान टुटा और दौड़ते हुए उसके माथे को चूम के बोल पड़ी अरे पगले तू आज भी आधे………….चल जा मै तो हमेशा तेरे साथ हूँ बेटा,तथा उसके जाने के बाद अचानक ही रोते हुए सोचने लगी कि अगर उसका बेटा इतना कुरूप न होता तो उसको कबकी नौकरी मिल गयी होती तथा अन्दर ही अन्दर डर रही थी कि कहीं आज भी उसके साथ वही न हो जो पिछले कई महीनो से पढाई ख़त्म करने के बाद हो रहा है को सोचते सोचते बिना खाए पिए जमीं पर ही सो गई! इधर अति सरीफ तथा बाहर से जितना कुरूप शायद भगवान ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी उसके कुरूपता में उतना ही अन्दर से साफ मोहन जो कोलेज के समय से लेकर अब तक की जिन्दगी में शायद ही मन से दिल भर किसी लड़की या औरत को देख पाया होगा तथा शायद उसके तो बस में चढ़ते ही लड़कियों के साथ साथ आदमी भी अपने आप किनारा दे दिया करते थे की क्या मजाल की वो किसी लड़की को सही से देखे,को बीशों इंतरवियु से हटाने के बाद आज फिर एक चांस मिला था और ये चांस मोहन कतई गवाना नहीं चाहता था क्योंकि वो जनता था कि अगर अब उसने जल्दी से नौकरी नहीं पकड़ी या मिली तो लोग उसके पढाई पर उँगलियाँ उठाने लगेंगे और उसकी बूढ़ी माँ को लोंगो के ताने भी सहने पड़ेंगे, लेकिन बिचारा क्या करे पर अब इतने इंतरवियु को फेश करने के बाद मोहन को भी यह अनुभव हो चुका था कि आखिर उसका सलेक्शन क्यों नहीं होता है क्यों कोई मालिक उसे नौकरी पे नहीं रखना चाहता,वो ये जान चूका था कि आज के समय में डिग्री के साथ साथ पर्सनालिटी भी चाहिए ना,पढने लिखने में काफी इंटेलिजेंट और बुधि के धनि वाले ब्यक्तित्व का मोहन बस में पीछे वाली सिट पर बैठ यही सोच रहा था कि किस तरह से पिछले वाले इंतरवियु में वो मस्त मैडम ने हंस कर उसके रिसुमे को लौटा दिया था और मुह घुमा कर मना किया था,और उसके पिछले वाले में भी तो यही हुआ था जब हर जबाब को देने के बाद न चाहते हुए भी सलेक्टरों ने राय मश्बरा कर उसे रिजेक्ट कर दिया था,अब वह समझ चुका था कि उसकी पर्सनालिटी का एक कोना खाली था फिर भी दुनिया कि अनेको बातों को सुनने के बाद परवाह न करने वाला मोहन को अचानक ही एक आवाज़ सुनाई पड़ी हे मिस्टर हे मिस्टर…………………अचानक ही सँभालते उसने देखा कि बगल में बैठी हुई लड़की जो अपने सरीर को हर तरह से बचने कि कोशिश करती ही दिख रही थी कि कहीं शारीर न टच हो जाय दुबकने के साथ उससे निकले के लिए रास्ता मांग रही थी,लड़की के उतरते ही बस जैसे ही चली कि मोहन को फ़ौरन याद कि उसे भी तो पीछे वाले स्टॉप पर ही उतरना था फिर संभल कर दौड़ते हुए ड्राईवर के पास जा कर बोल पड़ा भाई साहब जरा रोक दीजिये मुझे भी पीछे ही उतरना था……………हर ब्यक्ति के प्रताड़ना का शिकार मोहन को यंहा भी वही मिला जो हमेशा हर जगह मी जाया करता था….. हये चुप कर बे……………. कह कर चुप करा दिया गया खैर डरा सहमा मोहन अगले स्टॉप पर उतर कर दो किलोमीटर पीछे पैदल चल कर इंतरवियु देने ऑफिस में पहुँच अपना बायोडाटा जमा करा बैठ कर अपनी बारी कि प्रतीक्छा भगवान से प्रार्थना के साथ करने लगा,तथा थोड़ी देर बाद नंबर आने पर अन्दर जाते ही मोहन के साथ वो हुआ जो पहले कभी किसी इंतरवियु में नहीं हुआ था तथा सलेक्टरों ने नहीं किया था यंहा तो डिग्रियों को देखने के बाद काम सम्बन्धी कोई सवाल ही नहीं पूछा गया सिवाय कुछ के………………हाँ तो तुम क्या करना चाहते हो………सर नौकरी, इसके पहले क्या किया…………………सर कई इंतरवियु दिया लेकिन कंही मौका नहीं मिला, हँसते हुए क्यों भाई तुम्हारे पास डिग्री तो अच्छी है फिर भी………………….मैडम पता नहीं, क्यों किसी ने बताया नहीं,इधर उधर कि बातें और सवाल सुन मोहन समझ गया कि ये भी मौका गया तब तक, अच्छा एक बात बताओ तुमने कभी सोचा है कि तुम्हे कभी कोई आदमी या कोई औरत देखना चाहेगा या चाहेगी या फिर कभी किसी औरत ने तुमको प्यार किया है पसंद किया है…सवाल सलेक्टरों में से एक लड़की ने हंस कर पूछा ये बता दो और अगर हाँ तो नौकरी पक्की…………………जन्म से ही इन्सल्ट को सहते तथा काफी देर से यंहा हंसी का पात्र बना मोहन अचानक ही झल्ला कर बोल पड़ा जी हाँ ,हाँ हाँ हाँ किया है मैडम, किया है और करती भी है इतना ही नहीं वो तो मुझे रोज चूमती भी है और अपने बांहों में भी भरती है और वो भी एक दो दिन से नहीं पिछले छ्बीस साल चार महीने से अरे पचीस साल सात महीने से तो छू कर और गोंद में उठा बिठा सुला के और नौ महीने अनुभव करके,इतना ही नहीं जब तक घर नहीं जाऊंगा तब तक खाएगी भी नहीं और पता नहीं अब कब तक उसे ये मौका मिलेगा, वो तो मेरे नौकरी का समाचार सुनने के लिए पागल है और अब शायद ज्यादा दिनों तक साथ भी न दे पाए क्योंकि नौकरी न मिलने कि वजह से वो जमती सी जा रही है…….अरे मै पूछता हूँ कि आखिर मै कुरूप हूँ तो इसकी सजा सिर्फ मुझे मिलनी चाहिए उसे क्यों,उसका क्या दोष है,ये कि उसने मुझे पैदा किया…………हं, धन्यवाद मैडम लेकिन जब नौकरी में डिग्री वाले कुरूपों को नहीं रखना तो इश्तिहार में क्यों नहीं लिखवा देते आप लोग……………… और पता नहीं क्या क्या बडबडाते मन कि भड़ास को निकालते मोहन डिग्रियों को सँभालते हुएपीछे घूम कर चलना सुरु किया कि अचानक ही लगा जैसे वो किसी से टकरा जायेगा अंततोगत्वा बचते बचते टकरा ही गया……………………माफ़ कीजियेगा मै आपसे टकरा गया वो थोडा दिमाग पर काबू नहीं रहा पाया, चलिए जाईये आप अपना इंतरवियु दीजिये हाँ आप तो सलेक्ट हो ही जाएँगी आखिर आप इतनी सुन्दर जो है……… बोलते तथा हाथ जोड़ कर संभलते हुए खड़ा हो ही रहा था कि उस महिला ने उसे गले से लगा बोला कि अब दिमाग पर काबू रखना पड़ेगा मिस्टर, क्योंकि यहाँ पर काबू रख करके ही काम किया जाता है… मोहन आश्चर्य चकित होकर क्या,क्या कहा आपने मुझे नौकरी……………………..हाँ हाँ उसके सामने खड़ी एम् ड़ी महोदया जो मोहन को झल्लाते देख दरवाजे के बाहर ही रुक सारी बाते सुन रही थी ने उसके पीठ को थप-थपाते हुए बोला अब जल्दी जाओ और अपनी माँ को मिठाई खिलाओ हर माँ को इसका इंतजार रहता है और कल से समय से आफिस…………………………..!

26.9.10

कभी तो समझ पाते

आँखो में आयी दिल की वो बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

तुझे देखते ही मेरे दिल का खिल जाना,
इतनी खुशी मानो जन्नत ही मिल जाना.

बिछूड़ते वक़्त वो मायूस से दूर खड़े हम,
रोम-रोम से टपकता वो विदाई का गम.

पागल दिल के वो बेकरार हालात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

परंपराओं के खिलाफ वो विद्रोही तेवर,
पर मौन मेरे होठों के कीमती जेवर.

दिल की बात जान को ही ना कह पाना,
कहते कहते बस यूँ ही चुप रह जाना.

मेरा जीवन हर साँस तेरी ही सौगात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

तेरी हर खुशी में मेरी आँखो की हँसी बेपर्द,
तेरी हर मायूसी में नम मेरे दिल के वो दर्द.

सदियों तक राह तकने को मेरी आँखे तैयार,
बेचैन दिल को बस तेरी आस तेरा ही इंतजार.

मेरे धड़कन के वो तड़पते ज़ज्बात,
काश तुम कभी तो समझ पाते.

'अनेकता मे एकता’ का देश


बात इस साल के मार्च महीने की है ,जब मैं छुट्टियों में दिल्ली से अपने गांव गया था ,शाम हो चुकी थी,झिंगुर की आवाज बचपन के दिनों को याद दिलाने के लिये काफ़ी थे । लम्बे समय के बाद गांव गया था, इसलिये अपने दोस्त के घर जाने का इरादा बनाया। आज फिर उसी शाम की अजान को सुनकर मैं अपने दोस्त अरसद से मिलने जा रहा था,लेकिन उसके घर की तरफ़ उठे हर कदम एक सवाल बनकर मेरा माथा ठनका रहे थे | क्योंकि आज मां और दादा(पिता जी) के आव भाव देख कर मुझे डर और एक अजीब से एह्सास ने घेर रखा था। मेरा अरसद के घर जाना आज शायद उन्हें खटक रहा था |


जब हम सातवीं में पढ़ते थे तो हमारी दोस्ती हुई थी, मुझे इसके आगाज़ का पता ही नहीं चला ,और अन्जाम से बेसुध हूं |अगर ऐसा पता होता तो शायद हम दोस्ती नहीं कर पाते दादा के शब्दों में ”एक मुसलमान से ” दादा का दिल इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं अरसद के घर जाउं या उससे मिलूं ,वो साफ़–साफ़ शब्दों में मना तो नहीं करते हैं ,लेकिन मेरे अरसद के घर जाने पर पहले की तरह खुश भी नहीं होते हैं | मां भी कह बैथती है कहां मियां-टोली(मुसलमान के मुहल्ले) जा रहे हो| दोनो अच्छे खासे पढ़े लिखे हैं , लेकिन उनकी इस नारजगी में मुझे एक मूर्खता दिखाई देती है |


जब इस दोस्ती की शुरूआत हुई थी तो मुझे लगा कि एक जिगरी यार मिला है, जो मेरे हर सुख दुख में मुझे अपना लगता है,और उसकी तरफ़ से भी कुछ ऐसा ही है| घंटों अरसद के घर पर जाकर बैठना ,पढ़ना, खेलना ,सैर सपाटे और टिफ़िन में स्कूल से भाग कर सात रूपये वाली फ़िल्म वी।सी।पी. पर देखने जाया करता था |उस समय न तो दादा रोकते थे और न ही मां कभी पूछा करती थी कि तुम इतने देर कहां थे |मैं कभी कभी उससे पूछ भी बैठता था यार हम दोनो की दोस्ती हमेशा ऐसी ही रहेगी ना |उसका जवाब होता था अगर तुम चाहोगे तो क्यों नहीं!

धर्म और मजहब का पाठ न मुझे तब भाता था और न अभी सुट करता है | हमारा एक दूसरे के साथ मिलना और समय बिताना ही अपने आप में सबसे बडा मजहब और धर्म होता था| ,लेकिन आज हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गयी है कि ये बात ना मेरे गांव वालों को पसन्द आ रही है और ना ही मेरे घर वालों को आखिर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि इसमें गलत क्या है वो मेरा दोस्त है ,हम अगर एक साथ खाना खा लेते हैं या बदना (पानी पीने का लोटा) में पानी पी लेते हैं तो क्या मैं मुसलमान हो जाउंगा । एक दिन रोजा रख लिया तो कौन सा धर्म परिवर्तन हो गया .


गांव में रिलाइंस बिग टी.वी और डी.टी.एच के छाते अब आसनी से देखने को मिल जाते हैं, अच्छी शिक्शा के लिये सरकारी स्कूलों की जगह मां-बाप अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने लगे हैं । लेकिन इस बदलते युग ने आज भी लोगों की सोच क्यों नहीं बदली है?

दादा के मनाही के बावजूद जब मैं उस के घर गया और उसके साथ समय बिताया तो मुझे कुछ भी बदला हुआ नहीं लगा, वही प्यार,वही गर्मजोशी और दोस्ती कि वही मिठास बिल्कुल जलेबी की तरह मेरी समझ में आज यह बात नहीं आ रही है आखिर ऐसा क्यों हुआ,आदर्श की बात करने वाले दादा आज क्यों बदल गये हैं| क्या दादा ने आज हमारी दोस्ती में मजहब खोज लिया है |जो बचपन का प्यार था वो शब्दों की तलवार कैसे बन गयी है। आखिर आज वो अरसद से एक’मुसलमान’ क्यों हो गया है| आज भी लोगों की सोच क्यों नहीं बदल पा रही है, वही पुरानी सोच वही अछूत और नीच वाली बात |


आज के दिन मन बहुत ही व्यथित हुआ,दादा की मौन मनाही ने जहां मेरे मन मे सवालों का पुलिन्दा खडा कर दिया था ,वहीं मां की भावनाओं ने भूखे सोने पर मजबूर । यह जान कर कि जात पात के इन भावनाओं से लोग कब खुद को अलग कर पायेंगे |' पोप्यूलर कल्चर’ वाले इस देश में लोग कब तक भटकाव,द्वन्द और दुविधा का दामन थाम कर एक अच्छे समाज की परिकल्प्ना करते रहेंगे?

आखिर अल्लाह और भगवान के बीच की ये दरार कब तक कायम रहेगी? आज भी शायद लोगों की सोच नहीं बदल पायी है,बदला है तो सिर्फ़ ग्लोबल बनने का तरीका और जात –पात को परीभाषित करने का तरीका । जात-पात का चोला पहनकर इस देश को कैसे ’अनेकता मे एकता’ का देश कहा जाता है यह मेरी समझ से पडे है बिल्कुल मेरे दादा और मां की सोच की तरह |

सुलगता काश्मीर और सरकार

राजकुमार साहू, जांजगीर छत्तीसगढ़

भारत का स्वर्ग कहा जाने वाला प्रदेश काश्मीर पिछले कुछ माह से सुलग रहा है। काश्मीर में छाई अलगाववादी ताकतों के कारण वहां के बाशिंदों का जीना दूभर हो गया है। ऐसी घिनौनी ताकतों को न कश्मीर की सरकार रोक पा रही है और ना ही केंद्र में बैठी मनमोहन की सरकार। जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री श्री अब्दुल्ला भी इन अलगाववादियों पर लगाम नहीं लगा पा रहा है। यह एक अफसोसजनक पहलू है। प्रदेश में युवा मुख्यमंत्री के कुर्सी सँभालने के बाद जम्मू-काश्मीर के लोगों को लगा था क़ि राज्य में अलगाववादियों पर बंदिश लगेगी, लेकिन उनकी सोच पर तब आघात लगी, जब वे अभी प्रदेश में हालात बिगड़ने के बाद एक कमजोर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। प्रदेश में पहले उनके पिता भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं, ऐसे में माना जा रहा था क़ि वे किसी तरह राज्य क़ि स्थिति पर नियंत्रण कर लेंगे। पर ऐसा हुआ नहीं, उलटे जिस तरह से दिनों-दिन काश्मीर में हालात बिगड़ रहें हैं, उससे सरकार क़ि क्षमता पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्र में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी काश्मीर क़ि स्थिति सुधारने में कामयाब नहीं हो सके हैं। उनहोंने शान्ति बहाली की अपील की हैं, वही एक उपलब्धि नजर आती है। अभी हाल में केंद्र सरकार द्वारा छात्रों क़ि रिहाई का महत्वपूर्ण फैश्ला किया है। जिसका विपक्ष भाजपा ने भी स्वागत किया है। जो भी काश्मीर के हालात में सुधार के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

राशि ज्ञान


प्रिय बन्‍धु
आपके संस्‍कृत जालपृष्‍ठसंग्राहक संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर आदरणीय ज्‍योतिषाचार्य जी ने
प्रारम्भिक राशिज्ञान सम्‍बन्धित लेख प्रकाशित किया है ।

जाल ज्योतिषं राशि ज्ञानं

अपनी टिप्‍पणियों द्वारा मार्गदर्शन करें ।।

श्री प्रतुल जी ने हितकरी विद्या के बारे में एक श्‍लोक प्रस्‍तुत किया है
इसे आप यहॉं 

एषा विद्या हितकरी ।

पर आघात करके पढ सकते हैं ।।

अपनी अमूल्‍य टिप्‍पणियों द्वारा स्‍वागत करें ।

धन्‍यवाद

--
भवदीय: - आनन्‍द:

बेटी ऐसी है तो बहू वैसी क्यों.....?

बहू और बेटी के फर्क की ही नहीं परवरिश की भी बात.......
पूरी पोस्ट यहाँ पढ़े.......

वजन ईमानदारी का

वजन करने की मशीन स्टेशन पर दिखी जब,
कितना भारी हुआ हूँ जानने की इच्छा हुई तब.

सिक्का डाला तो रिज़ल्ट निकलकर सामने आया,
जिसे पढ़कर मेरा मन थोड़ा सा चकराया.

सामने साफ दिख रहा था कि मैं हो गया हूँ भारी,
नीचे लिखा था- "आपके व्यक्तित्व की पहचान है ईमानदारी.

दोनो सच है इस पर नही हो रहा था विश्वास,
क्यूंकी दोनो बातों में था एक अजीब विरोधाभास.

भार के बारे में अब पुराना चलन नहीं रहा,
ईमानदारी में भई आजकल वजन नहीं रहा.

मंहगाई-मिलावट के जमाने में पौष्टिक खाना पाने से रहे,
इस कारण सिर्फ़ खाना खाकर तो हम मुटाने से रहे.

मंहगाई तो आजकल आसमान को छुने लगी है,
पानी भी तो बोतल बंद होकर मिलने लगी है.

शायद ये भी हो कल को आसमान में सूरज भी ना उगे,
कोई कंपनी उसे खरीद ले और धूप मुनाफ़े पे बेचने लगे.

यह सब सोच कर ये लगा यह मशीन मज़ाक कर रही है,
या फिर यह भी एक आदमी की तरह बात कर रही है.

आदमी रूपी वाइरस इसके अंदर प्रवेश कर गया है,
इसीलिए अब ये भी चापलूसी करना सीख गया है

इसबार मशीन को चेक करने के लिए सिक्का डाला,
पर अबकी तो उसने चमत्कार ही सामने निकाला,

मेरा वजन तो फिर से उतना ही दिखा था,
पर नीचे में तो कुछ अजब ही लिखा था.

लिखा था- "आप ऊँचे विचार वाले सुखी इंसान हैं"
मैं सोचा अजीब गोरखधंधा है कैसा व्यंग्यबाण है.

विचार ऊँचे होने से भला आज कौन सुखी होता है,
सदविचारी तो आज हर पल ही दुखी होता है.

बुद्ध महावीर के विचार अब किसके मन में पलते हैं,
गाँधीजी तो आजकल सिर्फ़ नोटों पर ही चलते हैं.

ऊँचा तो अब सिर्फ़ बैंक बॅलेन्स ही होता है,
नीतिशास्त्र तो किसी कोने में दुबक कर रोता है.

सदविचार तो आजकल कोई पढ़ने से रहा,
जिसने पढ़ लिया उसका वजन बढ़ने से रहा.

आइए आपको अब सामाजिक वजन बढ़ने का राज बताते हैं,
जब हम दूसरों पे आश्रित होते हैं लदते हैं तभी मूटाते हैं.

नेता जनता को लूटते हैं और वजन बढ़ाते हैं,
साधु भक्तों को काटते हैं अपना भार बढ़ाते हैं.

बड़े साहेब जूनियर्स को काम सरकाते हैं इसलिए भारी कहलाते हैं,
कर्मचारी अफ़सर पर काम टरकाते हैं इसलिए भारी माने जाते हैं.

नहीं होता आजकल वजन किसी ईमानदार सदविचारी का,
हलकापन है नतीजा आज मेहनत, ईमान और लाचारी का.

25.9.10

पत्रकार कर रहे है परीक्षा मे नक़ल

जीवाजी विस्वविध्यालय के दूरस्थ शिक्षण संस्थान मे चल रही पत्रकारिता की परीक्षा में इन दिनों खुलकर नकल और अक्ल चल रही है! खबर हे की कुछ पेपर आउट भी हो रहे है ! अब पत्रकार भी नकल से बनेगे तो क्या होगा और लेखनी में क्या दम रहेगा !

ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा......!!

ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा......!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा......!!
अरे हम सब मिलकर बजाते हैं हम सब का ही बाजा !! 
अरे हमने धरती के गर्भ को चूस-चूस कर ऐसा है कंगाल किया 
पाताल लोक तक इसकी समूची कोख को कण-कण तक खंगाल दिया 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
हमने सारे आसमान का एक-एक बित्ता तक नाप लिया 
जहां तक हम पहुंचे अन्तरिक्ष को अपनी गन्दगी से पाट दिया 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
इस धरती का रुधिर हमारे तन में धन बन बन कर बहता है
हमारा बहाया हुआ केमिकल धरती की रग-रग में बहता है
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
इस धरती हम सेठ-किंग और जाने क्या-क्या कहाते हैं 
हर नदी-तालाब-नाहर-नाले में अपना कचरा बहाते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
जिस अबला पर मन आ जाए उसे हम अपने धन-धान्य से पाट देते हैं 
और जो ना माने हमारी उसका बलात चीरहरण हम कर देते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
छोटे-छोटे बच्चे भी हमारी वहशी नज़रों से बच तक नहीं पाते हैं 
जिन्होंने जन्म लिया है अभी ही,वो भी भेंट हमारी चढ़ जाते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
कर ले यहाँ पर हम कुछ भी मगर कभी पापी नहीं कहलाते हैं 
और सभी पापों में भर कर गंगा में ही नहा आते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
आत्मा हमारी ऐसी है जो सबके धन की ही प्यासी है 
जो भी दे दे धन इन्हें ये बस उन चरणों की दासी है 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
भूखे-नंगे-गरीब-अनाथ कोई भी हमें दिखाई ही नहीं देते है 
जिसकी भी जर-ज़रा-जमीं-जोरू हो,हम तिजोरी में भर लेते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
कितना भी खा जाए मगर हम डकार कभी नहीं लेते हैं 
"फ़ोर्ब्स"पत्रिका में खुद को पाकर हम खुश-खुश हो लेते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
देश हमारी ठोकर पर है हर मंत्री हमारा नौकर,सब कहते हैं 
हम इतने गिरे हुए हैं भाई,किसी की भी जूती चाट लेते हैं 
ये हमारी प्यारी धरती,और हम है यहाँ के राजा.....!!
अरे हम सब मिलकर बजाते हैं हम सब का ही बाजा !!

कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो....?

पहले उच्चतम न्यायलय की लखनऊ बेंच में अनावश्यक अडंगेबाजी का प्रयास और वहां असफल होने के बाद अब सर्वोच्च न्यायलय के मध्यम से अनावश्यक अडंगेबाजी ।
कौन हैं वो लोग जो चाहते है कि रोग का निदान ना हो और इस देश में एक नासूर हमेशा हमेशा बना रहे......
क्या ये मीडिया में अनावश्यक प्रचार पाने के लिए लालयित लोग हैं या अपने को जरुरत से ज्यादा समझदार समझने वाले लोग हैं ?
इस देश में सभी को आजादी है मगर इसका अर्थ ये नहीं है कि आप दूसरों की आजादी में जबरदस्ती दखल देने लगें  ।
और राजनीति , धर्म , समाजसेवा के ठेकेदारों की रोजी रोटी चलने के लिए आवश्यक है कि कोई ना कोई समस्या बनी रहे, और अगर एक समस्या  समाप्त हो रही है तो तुरंत दूसरी समस्या उत्पन्न की जाय ।
यहां मूर्ख बनाने और बनने वालों की भी कमी नहीं है ....
मीडिया चैनल समझा रहें है कि ये मंदिर , मस्जिद का फैसला नहीं है , ये तो केवल भूमि के स्वामित्त्व का फैसला है ।
क्या ये इतना ही सीधा है ?
अरे अगर भूमि का स्वामित्त्व उस पक्षकार के तरफ जाता है जो हिन्दू है तो जाहिर सी बात है कि वो कहेगा कि अब ये मेरी जमीन है तो यहाँ मंदिर बनेगा और ये मंदिर वालों की ही जीत है और अगर भूमि स्वामित्त्व उस पक्षकार की तरफ जाता है जो मुस्लिम है तो वो कहेगा कि मेरी जमीन खाली करो यहाँ मेरी मस्जिद बनेगी और ये ममजिद वालों की जीत है ।
तो सीधे सीधे यह मानना चाहिए की अदालत यह निर्धारित करेगी कि वहां क्या बनना चाहिए ।
और जो लोग कहते है कि आपसी बातचीत से मामले को हल करने का समय दिया जाना चाहिए तो वो लोग अब तक कहाँ थे ?
अपने घरों में बैठे अपने बच्चों , नाती , पोतों को गोद में खिलने में व्यस्त थे अब तक ?
इतने वर्षों से क्या कर रहे थे वो लोग ?
अब अचानक कौन सा सुलह कर लेंगे ?
और जो महानुभाव लोग इसके पैरोकार हैं उनसे ये भी पूंछा जाना चाहिए कि उनके पास सुलह की क्या योजना है ?
उनकी और उनके योजना की देश में स्वीकारिता कितनी है ?
और सत्ता और धर्म के दलालों पर उनकी पकड़ कितनी है ?
मजाक बना दिया है लोगों ने देश में ।
ना खुद कोई फैसला कर सकते है , ना देश के विधान को कोई फैसला करने दे रहे है ?
कोई कह रहा है कि इस फैसले से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ जायेगा ।
अरे फैसला ना आने से कौन सा बड़ा भाईचारा पनपा जा रहा है । हाँ एक घाव नासूर बनकर अन्दर ही अन्दर टीसता जरुर जा रहा है दोनों सम्प्रदायों में , जो भाईचारे के लिए अनंत तक अवरोध हो सकता है ।
मानव जाति बड़े से बड़े दुःख और क्षति को बर्दास्त कर लेता है फिर चाहे वो उसके किसी अपने के जीवन समाप्त हो जाने का दुःख हो या अपना सर्वस खो देने की क्षति ।
तो क्यों नहीं जो कल होना है उसे आज होने देते है......
जो होना है हो जाने दो , आग लगनी है लग जाने दो , कम से कम जो राख बचेगी उसपर तो नयी इबारत लिखी जा सकेगी ...
और जमाना भी देख और पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो आग लगाने वाले है । जो अपने आप को देश के न्यायालय से ऊपर मानते है , देश के विधान को दर-किनार कर अपनी रोटी सेंकने को तत्पर है ।
अगर हम विकसित हो गए है , समझदार हो गए है , सहनशील हो गएँ है तो जो होनी है और उसे अनंत काल तक नहीं टाल सकते है उसे आज क्यों नहीं होने दे रहे है...क्यों अपने संतानों का जीवन भी अँधेरे के गर्त में धकेलने को तत्पर हैं । जब सभी तथाकथित राजनेता , धर्म गुरु , समाजसेवक और जनता स्वयं से कोई समाधान नहीं खोज पा रही है तो अंतिम विकल्प न्यायालय में अनावश्यक की अडंगेबाजी क्यों की जा रही है ?
और विवादित ढांचा गिरने से ज्यादा बवाल तो अब नहीं ही होगा ये निश्चित है फिर अगर किसी एक की एक उंगली काटकर दो पूरे शरीर बच सकते है तो उसे बचा लेने हेतु आपरेशन करने की अनुमति चिकित्सक को क्यों नहीं दी जा रही है , क्यों नासूर पाल कर पूरा शरीर बर्बाद करने पर हम उतारू हैं ।
तो जो कल होना है उसे आज होने दो ...............जिससे कम से कम आने वाला कल तो सही हो सके ।

गणित के फंडे ( वैदिक गणित)

हेल्लो ! फ्रेंड्स ! मेरे पास कुछ जानकारी है गणित विषय को ले कर के मैं इसे आप सबके सामने रखना चाहता हु। सायद आपको पसंद आएगा।

==> MULTIPLY TRICKS :-
1) सामान दसंक वाले संख्या :-
83 X 87 = ?
TRICK : 83 X 87
3 X 7 =21
8 X 9 = 72
83 X 87 = 7221

( जब भी एक ही दसंक में संख्या हो तो उसे उसके ऊपर के अंक के साथ गुना कर देना चाहिए। 8 X 9 )
2) TO MULTIPLY ANY TWO DIGITS NO BY 11
54 X 11 = ?
TRICK : 5_4
(5+4=9)
ANS : 594

( किसी भी दो सांख्ययो को ११ से गुना करना हो तो उन्हें अलग अलग कर के उन्ही के योग (JOD) को बिच में देने से जवाब मिल जायेगा.)

3) MULTIPLY WITH NUMBER 5
563254 X 5 = ?
TRICK : 563254 X 10/2 (10/2 =5)
= 5632540/2 (MAKE 2-2 GROUPS FROM LEFT TO RIGHT)
= 2816270 (HALF IT)

4) 9 टेबल

0-9 तक चढ़ते क्रम में लिख दो
0
1
2
3
4
5
6
7
8
9

फिर 9-0 तक उसी के बगल में लिख दीजिये
09
18
27
36
45
54
63
72
81
90


इस प्रकार
9 X 1 = 09
9 X 2 = 18
9 X 3 = 27
9 X 4 = 36
9 X 5 = 45
9 X 6 = 54
9 X 7 = 63
9 X 8 = 72
9 X 9 = 81
9 X 10= 90

खाना खाने का समय हो रहा है। दूसरा ब्लॉग बाद में लिखूंग।

साधक-परिक्रमा

“77 मंत्रियों की संपत्ति की सूची जारी कर पहली बार मंत्रियों की संपत्ति के बारे मे जानकारी सार्वजनिक की है।”- अरे! जो बच्चे बच्चे को पता है, उसे क्या सर्वजनिक करने का दावा! और इसमें स्विट्जरलैंड –फ़ेक्टर कहाँ है जनाब?
पैसा लूटने के सिवा, नेता का क्या काम?
लूटो-लुटाओ-लूट की जाँच का बनता काम.
जाँच का बनता काम, बिठा दी जाँच-कमेटी.
उसमें भी पैसे का चक्कर, लूटा-लूटी.
कह साधक कवि, स्वागत है आ जाओ लूटने.
फ़ुर्सत कहाँ है इसे, लगा है पैसा लूटने.


नितिन गडकरी ने फोन पर ही आदेश पारित कर दिया कि हर हाल में झारखण्ड में सरकार बननी चाहिए. हालांकि ऊपरी तौर पर भले ही यह लग रहा हो कि नितिन गडकरी संघ की इच्छाओं का सम्मान कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है िक झारखण्ड
पूरा पढने ले लिये चटका दें….

जब न्यायालय सर्वोच्च तो फिर………………


आदरणीय पाठक गण, दिमाग कुछ उलझन में है इसी लिए पिछले कुछ दिनों से आपके बिच किसी भी छोटे विचार के साथ उपस्थित नहीं हो पाया,तो आज अचानक ही पिता जी की एक बात याद आ गयी वो हमेशा कहते है की किसी के भी जब मन के अन्दर की उलझन या कोई गुथ्ही अकेले न सुलझे दूसरों और विशिष्ट जनों के सामने रखने पर सुलझ जाती है दरशल बात कुछ और नहीं कई वर्षों से चल और चलाये जा रहे विवाद तथा पिछले कुछ दिनों से चर्चा के साथ इंतजार में रहा अयोध्या पर आने वाला फैश्ला जो अभी भी इंतजार ही बना हुआ है और पता नहीं कब तक इंतजार बना रहेगा ही है! भगवान श्री राम चन्द्र की इस जन्म अस्थली अयोध्या जो इनके जन्म से ही ऐतिहासिक बनी पर आने वाले फैश्ले को बार-बार टालने की अपील की गई और शायद आगे भी की जाय, वो भी ये कह कर की यह मामला बात-चीत से ही हल हो सकता है,तथा अंततोगत्वा जब से सुप्रीम कोर्ट से फैश्ले को कुछ दिनों के लिये टलवाने में सफलता प्राप्त किया गया तभी से दिमाग एक उलझन में फंसा हुआ है और वो ये है की आखिर क्यों-जहाँ देश के एक विशाल जन समूह अरे मुझे तो लगता है की जनता के साथ साथ जानवर और पंझी को भी इस पर आने वाले फैश्ले का वेसह्ब्री के साथ वर्षों से इंतजार है यहाँ तक की अयोध्या खुद इंतजार में पागल हुए जा रहा है! अरे भगवान का फैश्ला तो सर्वोपरी होता ही है पर देश में एक प्रावधान के मुताबिक न्यायालय को भी यह दर्जा प्राप्त है जैसे इस धरती पर उपलब्ध सभी चीजे वो चाहें इन्शान हो या फिर पशु,पक्छी,पेंड,पौधे या फिर मौषम सभी को भगवान का फैश्ला सम्मान के साथ स्वीकारना पड़ता है उसी प्रकार देश के हर नागरिक को भगवान के फश्ले के बाद न्यायालय के फैश्ले को भी हंस के स्वीकारना पड़ता है और इन्सान स्वीकारता भी है! यानी सभी मुद्दों को यंहा सुलझा कर न्याय प्राप्त होता है तो आज जब सबकी निगाहे वो चाहे किसी भी धर्म व जाती की हों उसी दर पर विश्वास के साथ टिकी हुई है जहाँ से निष्पछ फैश्ला मिलता है जिसका फैश्ला देश में सर्वोपरी है और सबको मनना ही पड़ता है! तो ऐसे में आखिर सिर्फ कुछ चंद ब्यक्तित्व क्यों फैश्ले को टालने में लगे हुए है,और फिर चलो फैश्ले को टल्वाना तो समझ से परे है ही पर यह कहना की अयोध्या मसले का हल केवल बात-चीत है यह तो बिलकुल ही समझ से परे है आखिर ऐसा क्यों, लगता है की अब या तो इन लोंगो को न्यायालय पे भरोषा नहीं,या फिर अगर भरोषा है तो आने वाला फैश्ला जो मुद्दे का अशली हल है चाहते ही नहीं!अरे जिस मुद्दे को सुलझाते-सुलझाते न जाने कितने वर्ष बीत गए,न जाने कितने लोग इस मुद्दे को सुलझाने हेतु होने वाले अनेको-अनेको आंदोलनों में अपने जानों को गवा बैठे,अपने हंश्ते खिलते बच्चों और परिवार को छोड़ गए, अनगिनत लोग भगवान श्री राम के इस नगरी के फैश्ले के इंतजार में स्वंय इंतजार करते करते उनके पास चले गए,और अभी तक कोई हल नहीं हो पाया,कब-तक!और फिर अगर बात चीत इसका हल है तो यह बिलकुल समझ नहीं आता की क्या बात-चीत न्यायालय से बड़ा है! और फिर जहाँ फैश्ले को टलवाने हेतु एक और दलील दी गयी है की इससे साम्प्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं तो क्या इसके पहले हुए आंदोलनों में दंगे नहीं हुए या फिर मुर्ख जनता ने अपने जान नहीं गवाए और अगर ऐसा हुआ है तो फिर इसकी क्या गारंटी है की न्यायालय के फश्ले के बाद दंगे भड़क सकते है और बात-चीत के बाद होने वाले फैश्ले सबको मान्य होंगे, यह कैसे कहा जा सकता है!आखिर इस मामले को इतना लम्बा क्यों खीचा जा रहा है क्यों इसके आने वाले फैश्ले में अड़ंगे लगाये जा रहे हैं आज बात-चीत,बात-चीत क्यों चिलाया जा रहा है पिछले न जाने कितने दशको से बात-चीत करके पेट नहीं भरा क्या!आज पिछले कई दिनों से ये बात-चीत सामने आकर खड़ा क्यों हो गया है, अरे अगर ये इतना कारगर है तो अब तक क्यों नहीं वहां कुछ निर्माण हुआ है और जब अब तक नहीं हुआ तो इसकी क्या गारंटी है की आगे की बात-चीत ऐसी होगी की वंहा कुछ निर्माण होने की स्थिति बन जाएगी,और फिर आखिर ये बात-चीत होगी किसके बीच तथा बात-चीत करने वाले इसके बाद होने वाले फैश्ले पर अडिग भी रहेंगे या नहीं! फैश्ला कुछ भी हो जहाँ एक विशाल जन समूह इसका इंतजार और मानने के लिए तैयार बैठा है तथा अंततोगत्वा मानना ही पड़े जैसा प्रावधान अपने देश में है तो फिर इस मुद्दे पर आने वाले फैश्ले को क्यों कुछ चंद ब्यक्तित्व न्यायालय से बाहर करना चाहते है!आखिर ऐसा क्यों…………………………………..
यही कुछ चंद बाते दिमाग में उलझन स्वरूप परेशान किये जा रही है सो आपके सामने रखने की कोशिश किया!

निशंक ताबूत में आंखरी कील ठोकेगा कौन ?

देहरादून 2 सितंबर। देवभूमि उत्तरा खंड को देश का भाल बनाकर यहां के पानी और जवानी दोनों को विकास के कमल के सहारे ऊंची उड़ान भरने का जो सपना प्रदेश के मुख्यमंत्राी ने जिस तरीके से बुना है, उस पर देशभर में उगलिया उठनी भी शुरू हो गई हैं। पावर प्रोजेक्ट के आवंटन में घोटाले की बात हो या पिफर ट्टशिकेष की सरकारी भूमि का लैंडयूज चेंज कर अरबों के घोटाले को लेकर सरकार की कोर्ट में जवाबदेही। सभी मामलों में सरकार पूरी तरह कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। मुख्यमंत्राी का ताज पहनने के बाद से ही प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य के विकास को लेकर इसे देश का भाल बनाने की जो बातें जनता से कही थी उन पर खरा उतरना तो दूर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच ही भाजपा विकास का संदेश दे पाने में पूरी तरह पिफसड्डी साबित हुई है। सत्ता में साड़े तीन साल के भीतर राज करने वाली भाजपा सरकार को मुख्यमंत्राी तक बदलने पड़े और अब पुनः नेतृत्व परिवर्तन की बातें उठनी शुरू हो गई हैं। मुख्यमंत्राी की कुर्सी पर बैठने के बाद से ही निशंक विरोध्ी ताकतें लगातार अपना तिकड़म भिड़ाती रही और प्रदेश के दो बड़े नेताओं भुवन चंद्र खंडूड़ी व भगत सिंह कोश्यारी के एक साथ हो जाने के चलते दोनों गुटों की ताकतें निशंक सरकार से कहीं अध्कि बड़ी हो गई। निशंक सरकार ने जहां अपने कार्यकाल के दौरान हरिद्वार के महाकुंभ को शांनि पूर्वक निपटाये जाने का श्रेय देशभर में लेने का प्रयास किया उसे उनके ही विरोध्ी लोगों ने कुंभ में घोटाला किए जाने की बातें कहकर शांत कर डाला। कुंभ को नोबल पुरस्कार दिए जाने की बातें भी प्रमुखता से उठाई जाने लगी लेकिन अंतिम शाही स्नान के दिन हुए भगदड़ के खूनी खेल ने कुंभ के सपफल आयोजन पर भी पूरी तरह प्रश्न चिन्ह लगा दिया। लेकिन कुंभ के सपफल आयोजन को भाजपा सरकार पूरे देशभर में प्रचारित करती हुई देखी गई। यहां तक की भाजपा के बड़े नेताओं तक ने कुंभ के सपफल आयोजन की तारीपफ करते हुए निशंक सरकार को अच्छे नंबर दे डाले। इतना ही नहीं सरकार के कामकाज से खुश होकर भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने भी सरकार की जमकर तारीपफ कर डाली। वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा. निशंक को सपफल मुख्यमंत्राी का ताज पहना डाला। जबकि एक पत्रिका द्वारा किए गए सर्वे में उत्तराखंड के सपफल मुख्यमंत्राी को टॉप-10 देना तो दूर कहीं भी ऐसा स्थान नहीं दिया गया जिससे उत्तराखंड के मुख्यमंत्राी डा. निशंक को सपफल मुख्यमंत्राी करार दिया जा सके। जबकि इसी संस्था द्वारा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्राी भुवन चंद्र खंडूड़ी को देश के मुख्यमंत्राीयों की सूचि में चौथे स्थान पर दर्शाया गया था।खंडूड़ी के मुख्यमंत्राी कार्यकाल में भले ही जनता के बीच सरकार सही संदेश दे पाने में विपफल रही हो लेकिन खंडूड़ी सरकार के लिए गए पफैसले जनता के बीच सरकार के प्रति आक्रोश का स्वर कभी भी नहीं उठा सके। क्योंकि लोक सभा चुनाव की पांचों सीटें कांग्रेस की झोली में जिस तरह से डलवा दी गई वह भी खंडूड़ी के तख्ता- पलट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हुई दिखी। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर खंडूड़ी को बदले जाने का कई वरिष्ठ नेताओं ने विरोध् भी किया लेकिन खंडूड़ी कोश्यारी के बीच लड़ाई का पफायदा सन् 2000 से मुख्यमंत्राी का सपना सजो रहे डा. निशंक उठाने में कामयाब रहे। लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठने के साथ से ही निशंक सरकार ने पावर प्रोजेक्ट के आवंटन से लेकर ट्टिशिकेष की सरकारी जमीन निजी कंपनी को लैंडयूज चेज कर कौड़ियों के भाव दे डाली तभी से सरकार की मुसीबतें उपफान पर आ बैठी। सड़क से लेकर सदन तक मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस व बसपा ने सरकार के इस निर्णय का खुलकर विरोध् करते हुए अपना बिगुल बजा डाला। इसके बाद सरकार की मुश्किलें कम होती न देख सरकार ने जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन को निरस्त करते हुए आवंटन में खामियां होने की बातें सामने रख डाली। घोटाले में 140 करोड़ रुपये से अध्कि लेन-देन के आरोप सरकार पर लगने शुरू हुए और इसके तुरंत बाद उत्तराखंड के सबसे बड़े घोटाले का खुलासा हो गया। इस खुलासे के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार पूरे देश भर में जो साख बनाने का दावा कर रही थी वह पूरी तरह खुलकर सामने आ गई। उत्तराखंड में कायदे कानूनों को ताक पर रखकर जिस तरह से बिना अनुमति के हरे पेड़ों को काट डाला गया उसने उत्तराखंड के सबसे बड़े घोटाले को उजागर करते हुए देश के भाल कहे जाने वाले मुख्यमंत्राी की बोलती को भी बंद कर डाला। सरकार कई बार इस घोटाले के ना हाने की बातें मीडिया के सामने करती नजर आयी वहीं निशंक नौ रत्नों से लेकर उनके करीबी लोग घोटाला ना होने की बातें करते नजर आए। यहां तक की कांग्रेस की इस मामले में सीबीआई जांच तक की मांग को मुख्यमंत्राी द्वारा ठुकरा दिया गया। इस घोटाले में भाजपा के सह प्रभारी डा. अनिल जैन, प्रभातम कंपनी के साथ-साथ आरएसएस से जुड़े कुछ नेताओं के नाम भी खंुलकर उजागर हुए। घोटालों की गूंज इस तरह उठी कि उसका ध्ुआं देशभर की जनता ने टीवी चैनलों की सुर्खियों के रूप में देखा। यहां तक की सरकार के घोटालों की गूंज से दिल्ली में बैठे भाजपा के दिग्गज भी सन्न रह गए और घोटालों के पीछे सरकार की छवि देशभर में खराब होने को लेकर भी मंथन शुरू हो गया। घोटालों के बाद से ही लगातार भाजप के दो बड़ दिग्गज आपस में हाथ मिलाकर निशंक के तख्ता-पलट की तैयारी में आंखरी कील ठोकने में जुट गए हैं। यहां तक की दोनों दिग्गज पार्टी हाई कमान के सामने 2012 के होने वाले विधनसभा चुनाव को लेकर अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत कर चुके हैं वहीं निशंक सरकार के रिपोर्ट कार्ड पर लाल झंडी दिखाने के लिए हाईकमान से गुजारिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं विकास के नाम पर 2012 की तैयारियों में जुटने का दम भरने वाली भाजपा सरकार को कार्यकर्ताओं का भी आक्रोश झेलना पड़ रहा है और निशंक सरकार के विधयक निध् िसे होने वाले कार्यों को लेकर भी विधयकों के खिलापफ निर्णय दिए जाने से सरकार कटघरे में आ गई है। जबकि इससे पूर्व विधयक निध् िसे हाने वाले कार्यों का कोई टैंडर नहीं कराया जाता था लेकिन निशंक सरकार ने एक लाख से ऊपर के होने वाले कार्यों पर टैंडर के माध्यम से काम कराए जाने का शासनादेश जारीकर दिए जाने से भी विधयकों में रोष देखा जा रहा है। घोटालों की परत जिस तरह से उत्तराखंड में खुलती हुए देखी जा रही है उसे देखते हुए जल्द ही हरिद्वार में हुए महाकुंभ में किया गया करोड़ों का खर्च भी सामने उजागर हो सकता है। कुलमिलाकर स्टर्डिया डैवलेपर्स के निर्माण कार्यों पर रोक लगाकर सरकार ने घोटाले को स्वीकार तो कर लिया है लेकिन जमीन का लीज रद्द ना किए जाने के पीछे घोटाले की मंशा अभी भी बरकरार हैं।इस मामले को लेकर हाई कोर्ट में दाखिल उत्तराखंड जनता संघर्ष मोर्चा के सचिव स्वाती दर्शन भारती ने जनहित याचिका दायर कर कंपनी को बिना विधनसभा में बिल पारित किए करोड़ों की भूमि दिए जाने की शिकायत की गई थी। याचिका कर्ता द्वारा जमीन के सौदों को रद्द करने के साथ-साथ सारे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराए जाने की मांग की गई हैं। इस प्रकरण में उत्तराखंड के मुख्य न्यायाध्ीश न्यायमुर्ति बारेन घोष व न्यायमुर्ती वी. के बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ ने प्रदेश सरकार व संबंध्ति कंपनी को चार हफ्रते का समय देते हुए जवाब पेश करने के आदेश दिए हैं। यह मामला कोर्ट में चले जाने बाद सरकार की मुश्किलें कम होती नहीं देखी जा रही वहीं घोटालों के साथ-साथ चरित्रा हनन की राजनीति भी शुरू हो गई है। कुलमिलाकर 2012 में पुनः सत्ता में वापसी का सपना सजोने वाली भाजपा एक और नए मुख्यमंत्राी की ताजपोशी करने में जुटी हुई हैं। इसका कितना पफायदा उत्तराखंड को मिलेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन संगठन स्तर पर मुख्यमंत्राी बदले जाने को लेकर प्रदेश के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं से भी पफीड बैक लिया जाना शुरू हो गया है। खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता सौदान सिंह व सुध्ीर कुलकर्णी का दून दौरा कुछ इस तरह के ही संदेश दे रहा है। हांलाकि प्रदेश का भाजपा संगठन उनके दौरों को लेकर किसी भी प्रकार की टिप्पणी से बचता नजर आ रहा है।वहीं निशंक सरकार में बेकाबू नौकरशाही में भी सूबे को बेहाल कर डाला है। निशंक सरकार के खिलापफ घोटालों, वरिष्ठ नौकरशाहों को नजरअंदाज, जनता से किए गए वादों को पूरा ना किए जाने के आरोपों के साथ-साथ चरित्रा हनन तक के आरोप लगे हुए हैं। अब देखना यह होगा कि राजनीति के अर्जुन इन सब आरोपों से निकल पाते हैं या पिफर अभिमन्यु की तरह घेरे में कैद हो जाते हैं। क्योंकि आंकड़ों के आधर पर बाजीगरी दिखाने का खेल निशंक उत्तर प्रदेश के समय से बखुूबी जानते हैं। 09837261570

दिल्ली सरकार का अनुकर्णीय निर्णय

(अदालत में शादी करने के लिए कोई नोटिस नहीं, उसी दिन विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र भी)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

हमारे देश का संविधान सभी को एक जैसा समान न्याय एवं सम्मानपूर्वक जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करके इसकी गारण्टी भी देता है, लेकिन व्यावहारिक क‹डवी सच्चाई इस बात का समर्थन नहीं करती हैं। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं? जिनमें व्यक्ति को न तो समान न्याय मिलता है और न हीं सम्मानपूर्वक जीवन जीने का कानूनी या मौलिक अधिकार प्राप्त है।

वयस्क युवक-युवतियों द्वारा अपनी-अपनी स्वैच्छा से हिन्दू समाज के समाजिक रीति रिवाजों के विरुद्ध जाकर विवाह करने या विवाह करने का प्रयास करने वालों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने देने की आजादी प्रदान करना तो दूर, उन्हें हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों द्वारा जीवित रहने के अधिकार से ही वंचित किया जा रहा है।

इसके लिये एक सीमा तक हिन्दू विवाह अधिनियम बनाने वाली संसद भी जिम्मेदार है। जिसमें स्वैच्छा से विवाह करने की लम्बी और ऐसी दुरूह व्यवस्था की गयी है, जिसका मकसद स्वैच्छा से विवाह करने वालों का विवाह सम्पन्न करवाना नहीं, बल्कि उनके विवाह को रोकना ही असली मसद नजर आता है। इस लम्बी प्रक्रिया के कारण स्वैच्छा विवाह करने वाले जो‹डे के परिजनों को सारी जानकारी प्राप्त हो जाती है और फिर खाप पंचायतें अपना रौद्र रूप धारण करके तालिबानी न्याय प्रदान करके संविधान की धज्जियाँ उडाती हैं।

सम्भवत: इसी विसंगति को दूसर करने के आशय से पिछले दिनों दिल्ली सरकार सरकार ने हिन्दू विवाह पंजीकरण नियम (१९५६) में महत्वपूर्ण बदलाव करने को मंजूरी दे दी है। जिसके तहत अभी तक अदालत से विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र हासिल करने में एक माह का समय लगता है। जिसमें विवाह करने वालों के परिजनों को सूचना देना भी अनिवार्य होता है। दिल्ली सरकार के निर्णय के अनुसार, अब अदालत में विवाह करने के लिए कोई नोटिस नहीं देना होगा और विवाह के बाद उसी दिन विवाह पंजीकरण प्रमाण-पत्र भी मिल जाएगा।

विवाह करने के इच्छुक युवक-युवती किसी भी कार्य दिवस में बिना पूर्व सूचना अदालत में जाकर विवाह कर सकेंगे। हिन्दू विवाह पंजीकरण नियम,१९५६ के संशोधन के लिए अब दिल्ली सरकार एक अधिसूचना जारी करेगी। यह तय किया गया है कि मौजूदा नियम की धारा-७ की उप धारा ६ के प्रावधान अब दिल्ली में विवाह पंजीकरण के लिए जरूरी नहीं होंगे। जिनमें अभी तक यह व्यवस्था थी कि दिल्ली में विवाह पंजीकरण के लिए दोनों पक्षों में से कम से कम एक के अभिभावक का दिल्ली में कम से कम ३० दिन से अधिक का निवास होना चाहिए। अब यह तय किया गया है कि दिल्ली में किये गये विवाह के पंजीकरण के लिए यह शर्त लागू नहीं होगी। अब ३० दिन के निवास की शर्त समाप्त कर करने का प्रस्ताव है।

दिल्ली मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णय से ३० दिन की तय सीमा खतम होने के कारण परिजनों या समाज की मर्जी के खिलाफ जाकर विवाह करने वाले युवाओं को परेशानी का सामना नहीं करना प‹डेगा। अभी तक विवाह का पंजीकरण प्रमाण पत्र न होने के कारण ऐसे दंपती खुलकर समाज या पुलिस के सामने नहीं आ पाते थे और इनमें से कई तो ऑनर किqलग के नाम पर खाप पंचायतों द्वारा मौत के घाट उतार दिये जाते थे। अब जल्द विवाह होने एवं पंजीकरण प्रमाण पत्र मिल जाने से ऐसे दपंती पुलिस व कोर्ट के समक्ष पेश होकर सुरक्षा की मांग भी कर सकते हैं।

दिल्ली सरकार का उक्त निर्णय अन्य राज्य सरकारों के लिये अनुकरणीय निर्णय है। जिस पर यदि सभी सरकारें अमल करती हैं या स्वयं भारत सरकार इस पर अमल करती है तो बहुत सारी ऑनर किqलग (प्रतिष्ठा के लिये हत्या) को रोका जा सकेगा। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक के लिये दिल्ली सरकार के प्रस्तावित कानून ने यह सन्देश तो दे ही दिया है कि कोई भी इच्छुक युवक-युवति दिल्ली में आकर अपना विवाह पंजीकरण करवा सकते हैं और अपने विवाह को उजागर करके पुलिस तथा प्रशासन का संरक्षण मांगकर मनमानी खाप पंचायतों से कानूनी संरक्षण पा सकते हैं।

-लेखक : जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका" के सम्पादक, होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें 19 सितम्बर, 2010 तक, 4470 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे)

24.9.10

श्री रामाय नमः !

मैं यशवंत जी को सबसे पहले मुबारक बाद देना चाहूँगा जिन्होंने कुछ अलग करने की कोसिस की।


मेरा नाम अरुण तिवारी है। मेरी उम्र २५ वरस है और मैं सूरत से हूँ । यह मेरा पहला ब्लॉग है और मैं इसे भगवन को अर्पित करना चाहता हूँ जिन्होंने ये खुबसूरत दुनिया बनायीं है। और बिना किसी भेद भाव के प्रकृति सबके लिए सामान रूप से अपनी अबो हवा प्रदान करती है। और निश्चय ही भारत देश को भी सलामी देना चाहूँगा जिसमे पैदा हो कर मुझे गर्वान्वित महसूस होता है।

vakratu.nDa mahaakaaya koTisuuryakotisamaprabha nirvighnaM kuru me deva sarvakaaryeshhu सर्वदा ।

या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता.
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा.

हिंदी अनुवाद: जो कुंद फूल, चंद्रमा और वर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं जिनके हाथ, श्रेष्ठ वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर आसन ग्रहण करती हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिदेव, जिनकी सदैव स्तुति करते हैं हे माँ भगवती सरस्वती, आप मेरी सारी (मानसिक) जड़ता को ।

जाने कैसी कैसी खबरें छापते हैं अखबार

(मुंबई से भड़ास के एक पाठक ने इस कटिंग को भेजा है, उनकी इच्छा थी कि यह भड़ास पर छपे)

मातृत्व को तो बख्श दो मेरे भाई..


 मातृत्व को तो बख्श दो मेरे भाई...
आजकल टीवी पर एक विज्ञापन बार-बार दिखाया जा रहा है जिसमें माँ अपने बच्चे को बिना किसी आवाज़ के जन्म दे रही है और बच्चा भी बिना रोये पैदा हो जाता है...विज्ञापन के अंत में आवाज़ आती है अपनी आवाज़ बचाकर रखना इंडिया क्योंकि आस्ट्रेलिया आ रहा है. दरअसल यह विज्ञापन जल्दी ही शुरू होने वाली भारत-आस्ट्रेलिया क्रिकेट को लेकर है.विज्ञापन कहता है कि मैचों के दौरान भारतीय टीम के समर्थन के सभी भारत वासियों को अभी बोलना नहीं चाहिए मतलब अपनी आवाज़ बचाकर रखनी चाहिए ताकि मैचों के समय जमकर शोर मचा सके. इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती कि हमें अपनी टीम का समर्थन करना चाहिए लेकिन इस अपील के लिए मातृत्व या कोख का अपमान तो ठीक नहीं है. मातृत्व मानव जीवन की सबसे अनूठी और यादगार उपलब्धि है. पूरे नौ महीने की तपस्या के बाद माँ अपनी कोख से नव-सृजन करती है और जन्म लेते बच्चे का रोना सुनने के लिए माँ ही नहीं पूरा परिवार और यहाँ तक कि डाक्टर-नर्स भी इंतज़ार करते हैं क्योंकि बच्चे के इस रुदन में ही उसके सेहतमंद होने का राज छिपा होता है. इसलिए प्रकृति के इस चमत्कार का अपमान किसी भी सूरत में नहीं किया जाना चाहिए.
 विज्ञापनों में महिलाओं का इस्तेमाल हालाँकि कोई नई बात नहीं है. इन दिनों टीवी पर दिखाए जा रहे डियोडेरेन्ट और परफ्यूम के विज्ञापनों में हमें जिस स्त्री के दर्शन हो रहे हैं वह कहीं से भी हमें अपनी सी नहीं लगती. यौन-उन्मांद से रची-बसी ये महिलाएं एक खास कंपनी के उत्पाद का इस्तेमाल करने वाले पुरुषों पर हमला सा करती नज़र आती हैं,उसे देखकर आहें भरती हैं, ऐसी भाव-भंगिमाएँ प्रदर्शित करती हैं मानो उनके जीवन में यौन संबंधों के अलावा और कुछ नहीं है और वे सेक्स के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं. अब ये उस उत्पाद का असर है या हमारी महिलाएं बदल रही हैं? इसका विश्लेषण तो समाजविज्ञानी ही बेहतर कर सकते हैं पर अपनी सामान्य समझ के हिसाब से मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि ये कम से कम हमारे-आपके घर की महिलाएं तो नहीं हैं. तो क्या बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पाद बेचने/थोपने के लिए हमारी महिलाओं और संस्कृति को बिगाड़ने की साजिश रच रही हैं? या फिर देश में दुग्ध क्रांति,हरित क्रांति की तर्ज़ पर यौन क्रांति का दौर आ गया है?
     आज ये पैसा कमाने के लिए  विज्ञापनों में रचनात्मकता के नाम पर मातृत्व का इस्तेमाल कर रहे हैं तो फिर भविष्य में और किस हद तक जा सकते हैं ...इसकी कल्पना से ही डर लगता है....

टीआरपी के खेल में संतो की रेल

हो सकता है... ये सब टीआरपी का खेल है... संतों पर उछाले जानी वाली कीचड़ टीवी चैनल पर खूब बिकती है। स्टिंग आप्रेशन के मास्टर टेप और प्रसारित किये जाने वाले विजुअल में काफी अंतर होता है। बिजनेस बन चुके टीवी न्यूज चैनलों को माल बेचने के लिए कुछ तो ऐसा दिखाना ही पड़ेगा जिसे लोग चाव से देखे। आये दिन हमें देखने को मिल जाता है कि फंला फंला संत पर ये आरोप लगे है। लेकिन जब वे आरोपों से बरी होते है तो वो खबर नहीं बनती है। खबर बनेगी भी क्यों उसका पैसा थोड़े ही मिलेगा। मैं ये नहीं कहता है देश के सभी संत दागी है, हो सकता है उनमें से कुछ अपराधी हो।
लेकिन मैं एक बात पूछना चाहता हूं... हमारा देश संतो का देश है यहां पर अच्छे संत भी है, और उनके द्वारा चलाये जा रहे अच्छे काम भी। फिर वो कभी खबर क्यों नहीं बन पाती है। हां अगर वो पैसा देंगे तो निश्चित रूप से खबर बनेगी। वैसे भी आज कल पैड न्यूज का जमाना भी आ गया है।

23.9.10

जातिवाद या विकाश


 जातिवाद या विकाश
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है. बिहार में इस बार होने वाला चुनाव देश की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाला होगा. इस बार के चुनाव में यह देखना है कि यहाँ के चुनाव में विकाश और जातीय समीकरण में से कौन जीतता है. हलाकि अभी देश की राजनीति में जातिवाद ने अपनी जड़े काफी गहरी कर ली है. बिहार में छह चरणों में होने वाले चुनाव के पहले से ही राजनीति में जातिवाद की धमक साफ- साफ सुनने को मिल रही है. सभी दलों के नेता अलग-अलग जाति के मतदाताओ को रिझाने में लगे है. कोई अगड़ी जाति के मतदाताओ को रिझा रहा है तो कोई अति पिछड़ा और मुस्लिमो को.
हमारे देश की राजनीति के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि राष्ट्रवाद और समाजवाद कि बात करने वाले राजनीतिक दल भी जातिवाद को बढ़ावा दे रहे है. विश्व में प्रजातंत्र की पहली किरण इसी भारत देश के छोटे से वैशाली जनपद से फैली थी. आज हमारा देश जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति की धुरी बनकर रह गयी है.  देश में सबसे पहले अंग्रेजो ने सन 1857 के ग़दर के बाद जातिवाद और मजहब के नाम पर लोगो को बाटने का कम किया था. चंद गद्दारों के कारन अंग्रेज इस भारत विरोधी षड़यंत्र में काफी हद तक सफल हुए और लम्बे अरसे तक हम पर राज किया. सन 1947 में भारत और पाकिस्तान का विभाजन भी इसी आधार पर हुआ था. अंग्रेजो से तो हमारा मुल्क आजाद जरुर हो गया लेकिन अंग्रेज हमे जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के दलदल में फसा कर चले गये.
आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जातिवादी जनगणना का विरोध किया था. इसके बाद पूर्व प्रधामंत्री विपी सिंह ने मंडल कमीशन को लागु कर जातिवादी राजनीति को हवा दी. उस वक़्त कई युवको ने इसके कारन अपनी जान गवांई थी. उस वक़्त लगी आग की लपटे आज भी भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रही है.
बिहार में छह चरणों में चुनाव होने है. एक दो दिनों  में सभी दलों के प्रत्यासियो की घोषणा भी हो जाएगी. लेकिन इस बार के चुनाव में भी विकाश के मुद्दे पर जातीय समीकरण हावी दिख रहा है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दावा किया थी कि इस बार का चुनावी मुद्दा बिहार का विकाश और विनाश होगा लेकिन हालिया घटनाक्रम को देखते हुए ऐसा लगता है की राजनीति वे भी अछूते नहीं है.
बीजेपी- जेडीयूं  गठबंधन, राजद - लोजपा और कांग्रेस सहित सभी दल के लोग जाति विशेष के मतदाताओ को रिझाने में लगे है. सभी दलों के लोग अगड़ी और मुसलमान मतदाताओ को अपने पक्ष में करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे है. अभी यहाँ की चुनावी राजनीति में दल- बदल का खेल जोड़-शोर से चल रहा है. ये दल बदल जातीय समीकरण और टिकट को लेकर हो रहे है.
सवाल यह उठता है कि आखिर हमे जातीय राजनीति से कब मुक्ति मिलेगी. कब हम जात- पात से ऊपर उठकर विकाश के मुद्दे पर वोट करेंगे. इसके लिए हम सब को जागरूक होना पड़ेगा. जिस दिन हमारे देश की राजनीति में जातिवाद पर विकाश हावी हो जायेगा उस दिन हमारा देश पूरी दुनिया का सिरमौर्य कहलायेगा.जातिवाद या विकाश

आम आदमी-ब्रज की दुनिया

आप अक्सर घर से बाहर निकलते होंगे और अगर आप बिहार में रहते हैं तो कभी-न-कभी जरुर आपसे आपकी जाति पूछी जाती होगी.कोई यह नहीं पूछता होगा कि आप आम आदमी हैं या खास आदमी हालांकि यह विभाजन जाति से ज्यादा प्रभावकारी है..आप कहेंगे इन दोनों वर्गों में क्या फर्क है?हालांकि आप खुद भी इसका पता लगा सकते हैं लेकिन मैं नहीं चाहता कि आप अपने कोमल मस्तिष्क तंतुओं पर दबाव डालें इसलिए थोड़ी मदद कर देता हूँ,हिंट दे देता हूँ.यदि आप प्रखंड,राज्य या जिले में अधिकारी या कर्मचारी,पूंजीपति,विधायक,मंत्री या सांसद,मुखिया या पंचायती राज जनप्रतिनिधि,नगर पंचायत प्रतिनिधि,अधिकारी या कर्मचारी,मीडिया में उच्चाधिकार,बैंक अधिकारी या कर्मी,बीमा अधिकारी या कर्मी,स्कूल में प्रधानाध्यापक,खाकी वर्दीधारी इत्यादि  नहीं हैं तो आम आदमी हैं अन्यथा खास आदमी हैं.हमारे देश में हर कोई खास आदमी को गालियाँ देता है लेकिन साथ-साथ खुद खास आदमी बनना भी चाहता है,क्या बिडम्बना है!खास आदमियों को एक खास जिम्मेदारी दी गई है और वह है आम आदमी को परेशान करने व उनका शारीरिक,मानसिक और आर्थिक शोषण करने की जिम्मेदारी.आपको हर जगह आम आदमी मिल जाएँगे.कभी ट्रेन के टिकट के लिए पंक्तियों में खड़े हुए,तो कभी बैंक में पैसा जमा करने या निकालने के लिए धक्कामुक्की करते हुए.इनकी किस्मत में सिर्फ पंक्तियाँ हैं.जहाँ देखिये लाइन लगी है.इनकी आधी ज़िन्दगी तो लाइन में खड़े-खड़े गुजरती है और बांकी वक़्त बदलने का इंतजार करते-करते.हर पांच साल पर देश और इलाके के तारणहार इनका दरवाजा खटखटाते हैं कोई लाल-हरी पत्ती हाथ पर रख देता है तो कोई थमा जाता है कभी न पूरा हो सकनेवाले वादों का पुलिंदा.ये लोग बड़े भोले और भावुक होते हैं तभी तो नेता इन्हें जाति और धर्म जैसी भावनाओं में बहा ले जाते हैं.इनका पग-पग पर शोषण होता है.डाक्टर,वकील और पुलिस इस मामले में सबसे आगे कहे जा सकते हैं.पुलिस तो इन्हें गाहे-बगाहे घरों से उठा भी लेती है और जब ये वापस लौटते हैं तब दो पैरों पर नहीं बल्कि चार कन्धों पर सवार होकर.यहाँ तक कि इनका शोषण करने में गैस वेंडर और टेम्पो चालक भी पीछे नहीं.वेंडर इन्हें अक्सर एक-दो किलो कम गैस वाला सिलेंडर थमा जाते हैं तो वहीँ टेम्पो चालक जितना चाहे उतना पैसा किराया के नाम पर इनकी जेब से निकाल लेते हैं.यानी हर कोई चाहे वो गरीब हो या अमीर इनकी मजबूरी का फायदा उठाने के चक्कर में रहता है.ये हमेशा शक्तिविहीन और मजबूर होते हैं.इनमें से कई तो यूं जीते हैं मानों जीना इनकी मजबूरी हो.यह अपनी ही लाश कंधे पर उठाये आजीवन संघर्ष करता है,कभी समाज के अराजक तत्वों के खिलाफ तो कभी शासन-प्रशासन के खिलाफ.जब संघर्ष से जी उब जाता है तो विदर्भ के किसानों की तरह कीटों पर कीटनाशकों का प्रयोग करने के बजाये खुद अपने ऊपर कर डालता है और सोंचता है कि सरकारी मुआवजे से कम-से-कम उनका परिवार तो सुखी हो जाए.बाद में आत्महंता आम आदमी के परिवार के दूसरे आम आदमी मुआवजे के लिए बांकी जिंदगी दफ्तरों के चक्कर लगाते काटते हैं और उनका सुख-चैन सरकारी फाइलों में खोकर रह जाता है.बैंककर्मी इनके ऋण में से घूस के तौर पर पैसा काट लेने को अपना कई जन्मों का सिद्ध अधिकार मानते हैं तो इनके ही गाँव का मुखिया इंदिरा आवास के पैसे में से ८-१० हजार रूपया काट लेना अपना धर्म.मीडिया भी इन्हें कवरेज नहीं देता जब तक ये भारी संख्या में मारे न जाएँ.इनकी जान सस्ती होती है क्योंकि ये ट्रेन से चलते हैं प्लेन से नहीं इसलिए दुर्घटना होने पर इन्हें या इनके परिवार को मुआवजा भी कम मिलता है.कभी-कभी तो अगलगी आदि होने पर गाँव-ग्राम का दबंग आदमी पूरा का पूरा मुआवजा गटक जाता है और ये मुंह ताकते रह जाते हैं.इनके जीवन का पल-पल कठिन होता है लेकिन फ़िर भी ये हंसी-ठिठोली के अवसर निकाल ही लेते हैं.आईये हम भी इनकी जिन्दादिली को सलाम करें जिसके सहारे ये अपनी पहाड़-सी लम्बी और कठिन जीवन-यात्रा पूरी करते हैं वरना हर चीज तो खास लोगों के हाथों में हैं इनके पास सिवाय संघर्ष करते रहने के हौसले के सिवा है भी क्या.साथ ही प्रतिज्ञा करें कि मेरी परिभाषानुसार खास आदमी बन जाने पर भी हम आम आदमी के प्रति संवेदनहीन नहीं होंगे.

आइये अभिवादन करें

         मित्रों महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम किसका अभिवादन करें , महत्वपूर्ण यह है कि हम वास्तविक अर्थों में अभिवादनशील बनें क्योंकि एक अभिवादनशील व्यक्ति ही अहंकार को छोड़ कर सच्चे अर्थों में झुंक सकता है वरना आज हमारा झुंकना भी एक व्यवसाय हो गया है जिसके मध्यम से हम किसी से कुछ पाने की , कुछ खोने के भाव से बचने की, दूसरों की चापलूसी कर उसे प्रशन्न करने की अथवा भविष्य में किसी भावी लाभ को ध्यान में रखकर संबन्धों की बुनियाद रखने हेतु एक निवेश करने जैसा प्रयास करने लगते है । और तब हम मन में भले सामने वाले को गलियां दे रहे हो, उसकी पीठ पीछे उसे भला-बुरा कहते हो उसके परन्तु सामने ऐसा दर्शाते है कि जैसे हमसे ज्यादा आदर भाव किसी और में हो ही नहीं सकता । और सबसे बड़ी बात इन हालातों में यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम जिसका अभिवादन कर रहे है उसकी औकात , अधिकार , पहुँच कितनी है ? और वो हमारे बारे में क्या सोंचता है ?

मैंने देखा है यह संसार ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिन्हें अपने माता-पिता,भाई,गुरुजन आदि का होली , दीपावली, ईद , बकरीद जैसे पर्वों पर भी अभिवादन करने कि फुर्सत और तमीज नहीं है मगर अपने लोभ , लालच में वो अपने अधिकारियों , नेतावों , दलालों का प्रतिदिन अभिवादन करते रहते हैं  ।

मगर जब हम अभिवादनशील होते है तब यह फर्क नहीं पड़ता कि हमारे अभिवादन को स्वीकार करने वाला कौन है , उसका सामर्थ्य  क्या है, उसने हमें कोई लाभ पहुँचाया है या नहीं,  और उसके सामने झुंकने पर हमारा मान घट रहा है या बढ रहा है ।

इस प्रकार जिस अभिवादन में कोई लोभ, आकांक्षा, चतुराई, भय अथवा स्वयं के अहम् का तुष्टिकरण नहीं होता है, और जो काल,पात्र,स्थान को देख  कर निर्धारित नहीं होता है वही सच्चे अर्थों में हमारा अभिवादन होता है , हमारी कृतज्ञता होती है उस सबके लिए जो हमें कहीं से भी प्राप्त हुआ है या होना है ।

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संस्‍कृतलेखनप्रशिक्षणकक्ष्‍या - धातु प्रकरणम्



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संस्‍कृतलेखनप्रशिक्षणकक्ष्‍या- धातु प्रकरणम्


भवदीय: - आनन्‍द:

सबके अपने अपने ईश्वर , जाने कितने जग के ईश्वर ?

नफ़रत के जब बीज बो रहे, धर्म ध्वजा के पहरेदार ।
कैसे बचेगी मानवता , यहाँ सब के सब हैं लम्बरदार ।
पहले तो दीवारें उठीं , सब धर्मो के बीचो बीच ।
फिर खिच गयी लकीरे देखो , जाति-पांति के बीचो बीच ।
शेष बचा था जो कुछ देखो , वर्गों में फिर बाँटा गया ।
चुन चुन कर इंसानों को , इंसानों से ही काटा गया ।

हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई , बौध-जैन-यहूदी भाई ।
सभी हैं ऊँचे एक दूजे से , सब के सब आवारा भाई ।
सबके अपने अपने ईश्वर , जाने कितने जग के ईश्वर ?
कौन बनाता किसे यहाँ , कौन चलता है इस जग को ?
शायद उनके मध्य भी हो , बँटवारा उनके कर्तव्यों का ।
कोई साझा सरकार बनाकर , सभी चलाते हो इस जग को ।

फिर भी कोई एक तो होगा , जिसने सबको पैदा किया ?
फिर जाने कब क्यों किसने , खायीं मध्य में खोद दिया ।
अब जो बीत गया सो बीत गया , जो आने वाला है वो देखो ।
सत्य गुनो मिल सब धर्मों का , आडम्बर को कचड़े में फेंको ।
काश अगर सब सुन पायें , बस अपने अंतरमन की बात ।
बच जाये ये धरती और , बच जाये मानवता की लाज ।
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