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29.11.11

तंग न करना । (गीत ।)





तंग न करना । (गीत ।) 


http://mktvfilms.blogspot.com/2011/11/blog-post_29.html




ठुकरा   कर  हमें  सनम, कभी बेरंग  न  करना ।

प्यार   में   तुम्हारे   तेवर, कभी  तंग  न  करना..!!


अंतरा-१.


बस   में   कहाँ    है    तेरे,  किसी   ओर   का  होना..!!

ये  ठीक  नहीं  की  समझो, दिल  को  एक खिलौना..!!

उठेगा    तूफाँ,  तक़दीर   से  कभी  जंग  न  करना ।

प्यार   में   तुम्हारे   तेवर,   कभी    तंग  न  करना..!!


अंतरा-२.


अगर  मेल  नहीं  है  तो, हम से  जुदाई  भी  कहाँ..!!

शीशा-ए-दिल  टूटा  कहाँ, बात निभाई  भी  कहाँ..!!

नाज़ुक    है    मामला,  इस   में   सुरंग  न  करना ।

प्यार    में    तुम्हारे   तेवर,  कभी   तंग  न  करना..!!


अंतरा-३.


गैर  से  रिश्ते - नाते, बहुत  ज़्यादती  है  सनम..!! 

जुदा   होने  की  बात, कहाँ  से उठती  है  सनम..!!

जुदाई   के   बहाने  तुम, अनूह  तरंग  न  करना ।

प्यार   में  तुम्हारे   तेवर,  कभी   तंग  न  करना..!!

(अनूह = बिना सोचे समझे )


अंतरा-४.


हसीं  हो   तुम, जवाँ  भी, कई  चाहने वाले  होंगे..!!

हम  तो  जाँ  लुटा   चुके, कई  और  लुटाते  होंगे..!!

मासूम  जवानी  को, इतनी  भी  दबंग  न  करना ।

प्यार   में   तुम्हारे   तेवर,  कभी   तंग  न  करना..!!


(दबंग = असरदार, कारगर, प्रभावी)



ठुकरा   कर  हमें  सनम, कभी बेरंग  न  करना ।

प्यार   में   तुम्हारे   तेवर, कभी  तंग  न  करना..!!



मार्कण्ड दवे । दिनांक-२६-११-२०११.

व्यंग्य - जूते और थप्पड़ का कमाल

राजकुमार साहू, जांजगीर, छत्तीसगढ़
जूता, जितना भी महंगा हो, हम सब की नजर में मामूली ही होता है और उसकी कीमत कुछ नहीं होती। जूता चाहे विदेश से भी खरीदकर लाया गया हो, फिर भी उसे सिर पर न तो पहना जाता है और न ही रखा जाता है। जूते तो बस, पैर के लिए ही बने हैं। जैसे, ओहदेदार लोगों के लिए कुछ लोग जूते के समान होते हैं,। वैसे भी जूते का वजन, कहां कोई तौलता है। अभी देश में खास किस्म के जूते कभी-कभी नजर आ जाते हैं, जिनकी अहमियत के साथ पूछपरख भी होती है। यह जूते भी उतना ही मामूली होते हैं, जितना बाजार में मिलने वाले जूते। ऐसे कुछ जूतों की खासियत होती हैं कि उसकी पहचान, कुछ विशेष लोगों से जुड़ जाती हैं। जूते की प्रसिद्धि इसकदर बढ़ जाती है, जिसके सामने नामी-गिरामी कंपनी के जूते भी बौने साबित होते हैं।
पहली बार जब विदेशी धरती पर जूता उछला, उसके बाद जूते, जूते नहीं रहे, बल्कि रातों-रात ही यह ऐसे महान वस्तु बन गया, जिसका अब तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। मीडिया ने तो जूते की महिमा ही बढ़ा दी। जूता उछलने के बाद इस तरह महिमामंडन किया गया, उसके बाद जूता, जूता नहीं रहा। अब तो जूते का धमाका हर कहीं होने लगा है। जूते की खुमारी ऐसी छाई कि हमारे देश मंे एक नहीं, बल्कि कई जूते उछाले गए व फेंके गए। देखिए, जूते जमाने से मामूली माने जाते रहे हैं, उछालने वाला भी मामूली व्यक्ति होता है, लेकिन जिन पर उछाला जाता है, वह नामचीन होते हैं। जूते के साथ ही मीडिया की मेहरबानी से वे व्यक्ति भी दिन-दूनी, रात-चौगनी की तर्ज पर इतना नाम कमा लेते हैं, जिसके बाद उन जैसों का नाम जुबानी याद हो जाता है। इस तरह वह ‘जूता वाला बाबा’ साबित होते हैं।
जूते की कहानी तो सुन ही रहे थे, जब थप्पड़ की धुन चल रही है। किसी को एक थप्पड़ पड़ी नहीं कि दूसरा कहता है, बस एक ही...। थप्पड़ का दर्द वही जान सकता है, जिसने महसूस किया हो। जिस तरह महंगाई का दर्द आम जनता सहती है, मगर उसका अहसास कहां किसी को होता है ? गरीब, गरीबी में मरता है और उसकी आने वाली पीढ़ी भी बरसों सिसकती रहती है। कई तरह की मार गरीब भी खाते हैं, भ्रष्टाचार व महंगाई की मार ने तो लोगों का जीना ही हराम कर दिया है। इतना जरूर है कि आम जनता, थप्पड़ का दर्द को नहीं जानती, क्योंकि वह पहले से ही गरीबी, महंगाई से कराहती रहती है, उसके बाद दर्द बढ़ने का पता कहां चल सकता है ?, दर्द सहने की आदत जो बन गई है।
जिन्ने कभी दर्द ही नहीं सहा हो, वह जान सकता है कि वास्तव में किसी तरह की मार की पीड़ा क्या होती है ?
देश में पहले जूते का शुरूर सवार था, अब थप्पड़ ने अपनी खूब पैठ जमा ली है। जनता भी थप्पड़ की धमक को हाथों-हाथ ले रही है। जूते व थप्पड़ का कमाल ऐसा चल पड़ा है कि महंगाई व भ्रष्टाचार की मार का दर्द भी सुन्न पड़ गया है। अब क्या करें, माहौल ही ऐसा बन गया है, जहां केवल जूते व थप्पड़ के ही चर्चे हैं।

28.11.11

याद आ गया मेरा बचपन ...

याद आ गया मेरा बचपन ...! ''नहर के आसपास फैला बेशरम की झाडियो का झुन्ड '' जिसके किनारे नाई की दुकान ....जहा जाने से डरा करते थे.....?.कही नाई कान न काट दे ? चौक के पास ताज चचा की साइकिल दुकान ...जहा अक्सर साइकिल बनवाने जाया करते ....उसी के बगल मे कपुर महाराज की पान दुकान जहा कभी कभी पिताजी पपिता खिलाया करते थे.....? पास ही थी दिले चाचा की होटल जहा जलेबी तैयार रहती थी,सन्तन चचा के घर के सामने दलदल [ जहा आज काम्प्ले़क्स है ] के बगल मे दोस्तो के साथ गिल्लि डन्डा और फ़िट्टुल खेला करते थे जहा सन्तन चचा की डाट रोज मिलती .....स्कुल से आते ही भाग जाया करते बाजारडाण्ड मे [ आज जहा बस स्टैण्ड है ] ... लुका छिपी का खेल खेलते खेलते पीछे बाजार डाण्ड की छपरी मे चले जाते .....साल भर सोचते की होली मे कौन सी छपरी से लकडी चुरानी है और होलिका दहन की पहली रात काम को अन्जाम भी दे देते और फिर घर जाने की सुध भी नही रहती थी और मा का डन्डा तैयार रह्ता बरसने को......हम जब स्कुल से वापस आते रह्ते तो थाना के पास आम बगीचे मे लटके हुए चमगादड बाजारडाण्ड की ओर सैर को निकलते रह्ते ....उन्ही के साथ हुम भी खेलकर वापस होते.........? पर आज अपनी आन्खो के सामने अपने बचपन की यादो को उजड्ते देखा [प्रशासनिक कार्यवही के मद्देनजर[ अवैध दुकानो] पुराने समय से बसे बगीचा बस स्टैन्ड और बाजारडान्ड की दुकानो को हटवा दिया गया ] आन्खो मे आसु आ गए..... मैने कहा कैसे सन्जोउ उस बच्पन को ........? शायद मै भाव विभोर हो गया था ..! दिल को तस्सली देते हुए मैने सोचा की बच्पन की यादो के नीव मे ही सुन्दर और सुव्यवस्थित निर्माण ही भविश्य को और अच्छा बना सकता है.... हे! प्रभु उन परिवारो की मदद करना जो रोज़ एक नया जीवन जीते है........और आप भी खयाल रखना..

हर मोहल्ले में थप्पड़ क्लब


कहीं ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं ? shahid harvinder singh jindaabaad

मेरे जानकारों का सुझाव है की हर मोहल्ले में इसे थप्पड़ क्लब बनाए जाए , और संभंधित अधिकारी को, सार्वजानिक तोर पर  केवल याद दिलाने के लिए धीरे से(अहिंसक ) थप्पड़ / चपत लगायी जाये , उसके कर्त्तव्य को याद दिलाने के लिए . 

harvinder-singh.jpg  


में हरविंदर सिंह की इस कोशिश का भरपूर समर्थन करता हूँ. 

मैंने युवा लोगों से इस विषय में विचार लिए . वो भी बहुत खुश थे . 
यदि सरकार रामलीला मैदान में सोते लोगों पर लाठी प्रहार से जनता को मार सकती है, लोगों की (राजबाला की ) हत्या कर सकती है, तो क्या एक जनता का आदमी सरकारी आदमी को थप्पड़ भी नहीं मार सकता 

अन्ना जैसे आदमी को बिना बात कैद कर सकते हैं.. 
शुरुआत सरकार ने की है . 

अफ़सोस की विपक्षी दल भी विरोध कर रहे हैं , क्योंकि वे भी इसी भ्रष्टाचारी व्यवस्था का हिस्सा हैं.

मेरे विचार से इन नेताओं को जिन्होंने जनता को लाठी से , व भूख से , प्यास से मारा हुआ है, उनको लाइन से खरा करके मीडिया के सामने जुटे लगाने चाहिए 



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कहीं ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं ?
- राजीव गुप्ता , लेखक        
 
जब खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लग जाय और रसोई के चूल्हे की आग गैस सिलेंडर महंगा होने से बुझ जाय , सरकार के मंत्री के घोटालो के चलते पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हो , विदेशों में जामा काले धन को स्वदेश में लाने के लिए सरकार टालमटोल का रवैया अपनाये तो ऐसा में जनता में आक्रोश होना लाजमी है ! अगर सरकार अब भी न चेती तो कही हालात नियंत्रण से बाहर न हो जाय जिसका आगाज़ एक शख्स  ने वर्तमान कृषि मंत्री शरद पावर जी पर थप्पड़ मार कर अपने आक्रोश का इजहार तो कर दिया जो कि बहुत ही निंदनीय है परन्तु सरकार को अब जागना ही होगा अन्यथा कही ये हालात और भड़क कर बेकाबू न हो जाय !  
 
फ़्रांस की 1756 की क्रांति का इतिहास साक्षी है , जो कि कोई सुनियोजित न होकर जनता के आक्रोश का परिणाम थी !  जब जनता किंग लुईस के शासन में महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान होकर सडको पर उतरी और तो पूरे राजघराने को ही मौत के घाट उतारते हुए अपने साथियों को ब्रूस्सील ( Brusseel ) जेल को तोड़कर बाहर निकाल कर क्रांति  की शुरुआत की ! परिणामतः वहां  लोकतंत्र  के साथ - साथ  तीन नए शब्द  Liberty , Equality ,  Fraternity  अस्तित्व में आये ! वास्तव में उस समय राजघराने का जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था ! इसका अंदाजा हम उस समय की महारानी मेरिया एंटोनियो के उस वक्तव्य से लगा सकते है जिसमे उन्होंने भूखमरी और महंगाई से बेहाल जनता से कहा था कि " अगर ब्रेड नहीं मिल रही तो केक क्यों नहीं खाते ! "
 
ऐसी ही एक और क्रांति सोवियत संघ में भी हुई थी ! जिसका परिणाम वहां की जारशाही का अंत के रूप में हुआ था ! कारण लगभग वहां भी वही थे जो कि फ़्रांस में थे जैसे खाने-पीने की वस्तुओं का आकाल , भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता और सत्ता के द्वारा जनता के अधिकारों का दमन ! सोवियत संघ में लोकतंत्र तो नहीं आया परन्तु वहां कम्युनिस्टों  की सरकार बनीं !
 
जब अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर हो , मंहगाई के साथ - साथ बेरोजगारी दिन - प्रतिदिन बढ़ रही हो , और सरकार अपनी दमनकारी एवं गलत नीतियों से जनता की आवाज को दबाने कोशिश कर रही हो तो जनता सडको पर उतरकर अपना आक्रोश प्रकट करने लग जाती है और यदि समय रहते हालात को न संभाला गया तो यही जनता भयंकर रूप लेकर सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल करने से पीछे भी नहीं हटती जिसका गवाह इतिहास के साथ साथ अभी हाल हे में हुए कुछ देशों के घटनाचक्र है ! सत्ता - परिवर्तन करने के लिए लोग अपने शासक गद्दाफी का अंत करने से भी पीछे नहीं हटे ! एक तरफ  कभी अमेरिका और ब्रिटेन के लोग आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के चलते प्रदर्शन करते है तो वही दूसरी तरफ मिस्र की जनता सड़कों पर है, जिसके चलते  मिस्र आज भी सुलग रहा है !
 
आंकड़ो की बजीगीरी सरकार चाहे जितनी कर ले पर वास्तविकता इससे कही परे है ! बाज़ार में रुपये की कीमत लगातार गिर रही है अर्थात विदेशी निवेशक लगातार घरेलू शेयर बाज़ार से पैसा निकाल रहे है ! गौरतलब है कि रुपये की कीमत गिरने का मतलब विदेशी भुगतान का बढ़ जाना है अर्थात पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें और बढ़ेगी ही जिससे कि अन्य वस्तुओ की कीमतों में भी इजाफा होगा ! महंगाई को सरकार पता नहीं क्यों आम आदमी की समस्या नहीं मानना चाहती ? एक तरफ जहां हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्री है , विदेशों में जाकर आर्थिक संकट से उबरने की सलाह देते है और अपने देश में मंहगाई से आम आदमी का कचूमर निकाल कर कहते है कि हमारे पास कोई जादू की छडी नहीं है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री जी महंगाई कम होने की तारीख पर तारीख देते रहते है जैसे कि कोई अदालतीये कार्यवाही में तारीख दे रहे हो ! 
 
उदारवादी आर्थिक नीतियों का फायदा सीधे - सीधे पूंजीपतियों को ही होता है और आम आदमी महंगाई के बोझ - तले पिस जाता है !  अब असली मुद्दा यह है कि आम आदमी जाये  तो कहा जाये ? ऐसे में जनता में सरकार के प्रति आक्रोश  तो लाज़मी ही है ! जनता का यह आक्रोश कोई विकराल रूप ले ले उससे पहले सरकार को आत्मचिंतन कर इस सुरसा रूपी महंगाई की बीमारी से जनता को निजात दिलाना ही होगा, क्योंकि एक बार राम मनोहर लोहिया जी  ने भी कहा था कि  जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं किया करती है , ऐसे में मुझे लगता है  कि कही ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं है !   
                - राजीव गुप्ता , लेखक                    
 

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Diabetes Terminator - Flaxseed


डायन डायबिटीज और उसके दुष्प्रभावों का सफल उपचार - अलसी
डॉयबिटीज या मधुमेह क्या है ?
डायबिटीज या मधुमेह चयापचय संबंधी रोग है जिसमें रक्त में शर्करा की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि या तो शरीर में रक्त-शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने वाले इंसुलिन नामक हार्मोन का निर्माण बहुत कम होता है या इंसुलिन  अपने कार्य को ठीक से नहीं कर पाता है।

ग्लूकोज का सूत्र C6H12O6 है।   इसमें 6 कार्बन के परमाणुओं का एक षटकोणीय छल्ला होता है जिनसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के परमाणु जुड़े रहते हैं। इसमें सूर्य की असीम ऊर्जा संरक्षित रहती है। यह हमारे शरीर का ईंधन है जो शरीर की हर कोशिका तक पहुँचता है। और कोशिका में ऑक्सीजन से क्रिया कर कार्बन-डाई-ऑक्साइड, पानी तथा  ऊर्जा का निर्माण करता है। ग्लूकोज मृदुभाषी, षठ-बंध उदरधारी, बलवान, अहंकारी, कपटी, कामचोर, विश्वासघाती, आवारा और शरारती प्रवृत्ति का तत्व है इसीलिये इन्सुलिन नामक हार्मोन एक कठोर प्रोफेसर की भाँति इसको कड़े अनुशासन में रखता है और इसकी सारी गतिविधियों पर पूरा नियंत्रण रखता है। हर कोशिका की भित्ती या झिल्ली में शर्करा के प्रवेश हेतु मधु-द्वार (Glucose Transporter-4) होते हैं। इन मधु-द्वारों के तालों की कुंजी इन्सुलिन के पास ही रहती है। आवश्यकता होने पर इन्सुलिन मधु-द्वार खोल देता है और ग्लूकोज को कोशिकाओं में अपने कार्य करने और प्रवेश की अनुमति दे देता है। यदि पर्याप्त इंसुलिन उपलब्ध न हो या इंसुलिन अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाये, जैसा कि डॉयबिटीज में होता है, तो ग्लूकोज नामक ईंधन कोशिकाओं में प्रवेश नहीं कर पाता है और खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है।  कोशिकाएं ऊर्जाहीन तथा कमजोर पड़ने लगती हैं और वसा के उपापचय से ऊर्जा ग्रहण करती हैं। खून में बढ़े हुए ये स्वछन्द, कामचोर, और घमंडी ग्लूकोज के अणु बेपरवाह होकर शरीर में दहशतगर्दी करने निकल पड़ते हैं और शरीर में उत्पात मचाते रहते हैं। इनकी शरारतों से शरीर के कोमल अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचने लगता है, इसलिये वे ग्लूकोज की शिकायत गुर्दों को भेजते हैं। गुर्दे स्थिति का अवलोकन करते हैं और ग्लूकोज को दण्ड देने के बारे में विचार करते हैं। उधर रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ती जाती है और एक स्थिति ऐसी आती है जब रक्त में ग्लूकोज की मात्रा एक निश्चित सीमा को छू लेती है, तब गुर्दों के सब्र का बांध टूट जाता है और वे ग्लूकोज को दंड के रूप में मूत्र के साथ शरीर से विसर्जन करना शुरू कर देते हैं। इन्हीं कारणों से चिकित्सा-शास्त्री डायबिटीज के रोगी को आहार प्रबंधन, औषधियों और इन्सुलिन की मदद से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को सामान्य रखने की सलाह देते हैं।
ग्लूकोज के अणु हमारे दुश्मनों जैसे जीवाणु, विषाणु, परजीवियों, मुक्त-कणों, कैंसर आदि से बहुत जल्दी धुल मिल जाते हैं, मित्रता कर लेते हैं, उनको पोषण और ऊर्जा देते हैं। ऐसा विश्वासघाती और कपटी है ये ग्लूकोज।

डायबिटीज़ पर अलसी के चमत्कार –
जीरो कार्ब  भोजन है अलसी
अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है, डायबिटीज़ के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती हैं। डायबिटीज के रोगियों के लिए अलसी एक आदर्श और अमृत तुल्य भोजन है, क्योंकि यह  जीरो कार्ब  भोजन है। चौंकियेगा नहीं, यह सत्य है। मैं आपको समझाता हूँ। 14 ग्राम अलसी में 2.56 ग्राम प्रोटीन, 5.90 ग्राम फैट, 0.97 ग्राम पानी और 0.53 ग्राम राख होती है। 14 में से उपरोक्त सभी के जोड़ को घटाने पर जो शेष                           (14-{0.97+2.56+5.90+0.53}=4.04 ग्राम) 4.04 ग्राम बचेगा वह कार्बोहाइड्रेट की मात्रा हुई। विदित रहे कि फाइबर कार्बोहाइड्रेट की श्रेणी में ही आते हैं।  इस 4.04 कार्बोहाइड्रेट में 3.80 ग्राम फाइबर होता है जो न रक्त में अवशोषित होता है और न ही रक्तशर्करा को प्रभावित करता है। अतः 14 ग्राम अलसी में कार्बोहाइड्रेट की व्यावहारिक मात्रा तो 4.04 - 3.80 = 0.24 ग्राम ही हुई, जो 14 ग्राम के सामने नगण्य मात्रा है इसलिये आहार शास्त्री अलसी को  जीरो कार्ब  भोजन  मानते हैं।   
हृदय के लिए हितकारी है अलसी
अलसी हमारे रक्तचाप को संतुलित रखती हैं। अलसी हमारे रक्त में अच्छे कॉलेस्ट्राल (HDL Cholesterol) की मात्रा को बढ़ाती है और ट्राइग्लीसराइड्स व खराब कोलेस्ट्रोल (LDL Cholesterol) की मात्रा को कम करती है। अलसी रक्त के पतला रखती है और दिल की धमनियों में खून के थक्के (एथेरोस्क्लिरोसिस रोग) नहीं बनने देती और इस तरह हृदयाघात से बचाव करती हैं। हृदय की गति को नियंत्रित कर वेन्ट्रीकुलर एरिद्मिया से होने वाली मृत्यु दर को बहुत कम करती है।

प्रदाहरोधी है अलसी
डायबिटीज में कोशिका स्तर पर मुख्य विकृति प्रदाह (इन्फ्लेमेशन), रक्त-वाहिकाओं और नाड़ियों का क्षतिग्रस्त होना है और इन्ही के कारण शरीर में विभिन्न जटिलतायें पैदा हो जाती हैं। डायबिटीज के अलसी हमारे शरीर में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का अनुपात संतुलित रखती है, जिसके फलस्वरूप कोशिका में एक और तीन    प्रदाहरोधी, रक्तवाहिका विस्तारक और बिंबाणुरोधी प्रोस्टाग्लैन्डिन E-1 तथा E-3, ल्युकोट्राइन्स (TXA-2), थ्रोम्ब्रोक्सेन्स (TLB-4) बनते हैं। हैं। अलसी में लिगनेन होता है जो रक्तशर्करा को नियंत्रण में रखता है तथा एक शक्तिशाली प्रदाहरोधी और प्रतिऑक्सीकारक है। इसलिए अलसी सेवन करने वाले रोगी में डायबिटीज की  जटिलताओं के होने की संभावना कम रहती है। यह बहुत बड़ी बात है।  


लैंगिक विकार का उपचार है अलसी
डायबिटीज का एक बहुत अहम कुप्रभाव स्तंभनदोष, दुर्बल कामेच्छा, शीघ्रस्खलन, बांझपन, शुष्क योनि, गर्भपात आदि भी है। आज यह जटिलता और भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि आजकल डायबिटीज बहुत कम उम्र में होने लगी है। अलसी इस जटिलता को भी पूरी तरह ठीक करने में सक्षम है।

फाइबर से भरपूर है अलसी
अलसी में 27 प्रतिशत रेशा (फाइबर) होता है। अलसी में विद्यमान फाइबर आंतों में शर्करा को बांध कर रखता है और धीरे-धीरे रक्त में छोड़ता है। जिससे रक्त-शर्करा का स्तर ज्यादा उछाल नहीं मारता है, अग्न्याशय को रक्त में कम इन्सुलिन छोड़ना पड़ता है, इन्सुलिन प्रतिशोध कम होता है, लंबे समय तक पेट भरा रहता है और खाने की ललक कम होती है।     

 पैर की रक्षक है अलसी
डायबिटीज के कारण पैरों में रक्त का संचार कम हो जाता है व पैरों में एसे घाव हो जाते हैं जो आसानी से ठीक नहीं होते। इससे कई बार गेंग्रीन बन जाती है और इलाज हेतु पैर कटवाना  पड़ जाता हैं। इसी लिए डायबिटीज पीड़ितों को चेहरे से ज्यादा अपने पैरों की देखभाल करने की सलाह दी जाती है। पैरों की नियमित देखभाल, अलसी खाने से पैरों में रक्त का प्रवाह बढ़ता हैं, पैर के घाव व फोड़े आदि ठीक होते हैं। पैर व नाखुन नम, मुलायम व सुन्दर हो जाते हैं।
आँखों की ज्याति बढ़ाती है अलसी  
डायबिटीज के दुष्प्रभावों के कारण आँखों के दृष्टि पटल की रक्त वाहिनियों में कहीं-कहीं हल्का रक्त स्राव और रुई जैसे सफेद धब्बे बन जाते हैं। इसे रेटीनोपेथी कहते हैं जिसके कारण आँखों की ज्योति धीरे-धीरे कम होने लगती है। दृष्टि में धुंधलापन आ जाता है। अंतिम अवस्था में रोगी अंधा तक हो जाता है। अलसी इसके बचाव में बहुत लाभकारी पाई गई है। डायबिटीज के रोगी को मोतियाबिन्द और काला पानी होने की संभावना भी ज्यादा रहती है। अलसी के सेवन से नजर अच्छी हो जाती हैं, रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं तथा धीरे-धीरे चश्मे का नम्बर भी कम हो सकता है।
गुर्दों की रक्षक है अलसी
डायबिटीज का बुरा असर गुर्दों पर भी पड़ता है। गुर्दों में डायबीटिक नेफ्रोपेथी नामक रोग हो जाता है, जिसकी आरंम्भिक अवस्था में प्रोटीन युक्त मूत्र आने लगता है, बाद में गुर्दे कमजोर होने लगते हैं और अंत में गुर्दे नाकाम हो जाते हैं। फिर जीने के लिए डायलेसिस व गुर्दा प्रत्यारोपण के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता हैं। अलसी गुर्दे के उत्तकों को नयी ऊर्जा देती है।

डायबिटीज में अलसी सेवन का तरीका



डायबिटीज के रोगी को 30-50 ग्राम अलसी रोज खाना चाहिये। कौशिश करें अलसी को रोजाना मिक्सी के चटनी जार में सूखा पीसें। बहुत बारीक नहीं पीसें, दरदरी ही ठीक रहती है। लेकिन यदि रोज पीसने में परेशानी हो तो एक सप्ताह की इकट्ठी भी पीस सकते हैं। 15-25 ग्राम अलसी सुबह और शाम आटे में मिला कर रोटी बनवा कर खाये। यह रोटी बहुत स्वादिष्ट लगती है। अलसी खाने का यह सबसे अच्छा तरीका है। इससे एक तो गैहूं का आटा कम खाने में आता हैं जिसका ग्लाइसीमिक इंडेक्स बहुत ज्यादा होता है। दोनों मुख्य आहार में फाइबर की पर्याप्त मात्रा पेट में जाती है जो शर्करा को बांधे रखती है और धीरे-धीरे रक्त में छोड़ती है। लेकिन जो लोग अलसी की रोटी नहीं खाना चाहते हैं, इसे वे दही, सलाद, सब्जी आदि में डाल कर सुबह शाम ले सकते हैं। 

अंतिम दो शब्द
अंत में डायबिटीज़ के रोगी के लिए कुछ अन्य निर्देश भी बतला देता हूँ।

रिफाइंड कार्ब होते बड़े खराब
आपको परिष्कृत शर्करा जैसे सफेद चावल, मेदा, चीनी और खुले हुए या पेकेट बंद खाद्य पदार्थ जैसे ब्रेड, केक, पास्ता, मेगी, नूडल्स, बिस्कुट, अकंलचिप्स, कुरकुरे, पेप्सी, लिमका, कोकाकोला, फैंटा, फ्रूटी, पिज्जा, बर्गर, पेटीज, समोसा, कचोरी, भटूरा, नमकीन, सेव आदि का सेवन नहीं करना चाहिये। उपरोक्त सभी खाद्य पदार्थ मैदा व ट्रांसफैट युक्त खराब रिफाइंड तेलों से बनते हैं। तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म किया जाता हैं जिससे उसमें अत्यंत हानिकारक कैंसर पैदा करने वाले रसायन जैसे एच.एन.ई. बन जाते हैं।
बंद करो रिफाइन्ड तेल अगर चलानी हो जीवन की रेल 
आपको खराब फैट जैसे परिष्कृत या रिफाइंड तेल जिसे बनाते वक्त 400 सेल्सियम तक गर्म किया जाता है व अत्यंत हानिकारक रसायन पदार्थ जैसे हैक्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि-आदि मिलाये जाते हैं, का सेवन कतई नहीं करना है। आपको अच्छे वसा जैसे घाणी का निकला नारियल (हालांकि अमरीकी संस्था FDA ने अभी तक नारियल के तेल को सर्वश्रेष्ठ खाद्य तेल का दर्जा नहीं दिया है) , तिल या सरसों का तेल ही काम में लेना है। नारियल का तेल खाने के लिये सर्वोत्तम होता है, यह आपको दिल की बीमारियों से बचायेगा व आपके वज़न को भी कम करेगा।

यदि ठंडी विधि से निकला
, फ्रीज में संरक्षित किया हुआ अलसी का तेल  रोजाना दो चम्मच तेल को चार चम्मच दही या पनीर में हेंड ब्लेंडर से अच्छी तरह मिश्रण बना कर फलों या सलाद के साथ लें। अलसी का तेल हमेशा फ्रीज में रखें। अलसी के तेल को कभी गर्म नहीं करें क्योंकि 42 सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है।  

प्राकृतिक उपचार
रोजाना आधा चम्मच पिसी हुई दालचीनी सब्जी या चाय में डालकर लें। रोज एक क्रोमियम व अल्फालाईपोइक एसिड युक्त एन्टीऑक्सीडेंट का केप्सूल और Shilajit Dabur के दो केप्सूल सुबह शाम लेना है। मेथीं दाना, करेला, जामुन, आंवला, नीम के पत्ते आदि का सेवन करें।  




What does Flax do in Doctors Language

  • Zero Carb Food
  • Hypoglycemin
  • Anti-inflamatory
  • Increase BMR & eliminates food craving
  • Anti-obesity
  • Anti-Platelet
  • Anti-hypertensive
  • Anti-arrhythmic
  • Antithrombotic
  • Anti-atherogenic
  • Improves Endothelial Function
  • Anti-cholesterol
  • Coronary Vasodilator
  • Improves Heart Risk Parameters
  • Improves Vision Color Fidelity
  • Delays cataract and reduces intraocular    Pressure
  • Peripheral Vasodilator
  • Natural Cosmetic
  • Natural Manicure and Pedicure
  • Rejuvenates Nerves and Brain cells
  • Anti-lupus
  • Anti-depressant
  • Mood Elevator – A Feel Good Food
  • Acts as Sim Card of Mind
  • Nootropic Enhances Memory & Cognition
  • Aphrodisiac – Cures Sexual Problems

FDI का विरोध- वोट की ताकत से ताज और तख़्त बदल दीजिये.

FDI का विरोध-  वोट की ताकत से ताज और तख़्त बदल दीजिये.

सरकार हम चुनते हैं और हमारे हित के फैसले लेने के लिए चुनते है ,यह लोकतंत्र की मूल भावना है .
केंद्र सरकार की  उदारवादी पॉलिसी गरीबों के हित में नहीं है .आजादी के ६४ वर्षों के बाद भी हमारी
समस्याए ज्यों की त्यों हैं ,गरीब और गरीब होता जा रहा है देश की विकास की तस्वीर ५% लोगो की
मुट्ठी में है .क्या अब भी हम धर्म ,जाती अगड़ा-पिछड़ा के नाम पर नेताओं की चाल में थिरकते रहेंगे ?
पहले अंग्रेजों ने लड़ाया अब आरक्षण ,अगड़ा- पिछड़ा ,अल्पसंख्यक ,बहुसंख्यक के नाम पर भिड़ाया
जा रहा है क्या हम आपस में लड़कर अपने भविष्य को बर्बाद कर लेंगे?

आज केंद्र में बैठे लोग जो फैसले हमारे अहित में ले रहे हैं और हम बेबस हैं ,हमारे हाथ से पांच साल का
तीर लग चुका है लेकिन निराशा की बात फिर भी नहीं है .हमारे मौलिक अधिकार हमें अभिव्यक्ति की ,
विरोध प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता देते हैं .सरकार यदि काले कानून लाती है तो उनका पुरजोर विरोध
हमारा प्रमुख हथियार है ,हमें जागरूक नागरीक बनने की जरुरत है.अपने आप को निडर बनाईये ,
संगठित हो जाईये ,भूल जाईये आपसी मनभेद को ,आपसी मतभेद को .

देश के खुदरा व्यापार को सरकार विदेशी हाथों में सौपने जा रही है ,यह हमारा हर तरह से सर्वनाश
 करने वाली बात है .सरकार का पक्ष बेतुका है ,वह इसमें किसानो का भला दिखाती है .अपना माल बेचने
 के लिए आज किसान के पास जितने विकल्प हैं वह FDI आने से कम  हो जायेंगे? आज किसान को जो
ज्यादा भाव देता है उसे ही माल बेच रहे हैं ,थोक व्यापारी की प्रतिस्पर्धा से किसान फायदे में ही है लेकिन
जब उसे अपनी फसल गिने चुने लोगो को बेचना पडेगा तब FDI का एकाधिकार उसे कंगाल नहीं बना देगा ?

किसानो की फसल खेत में ही नष्ट हो जा रही है,क्यों? कौन जबाबदार है ?उसकी फसल को सुरक्षित रखने
 के उपाय किसे करने थे ?उनकी उपज का सही भाव कौन तय करता है ?क्यों गन्ना किसान अपनी खड़ी
फसल को आग लगा देता है ?क्यों आन्दोलन कर रहे हैं कपास की फसल उपजाने वाले किसान ?हमारी
गलत नीतियों के कारण ऐसा हो रहा है ,क्यों मनमाने ढंग से कपास के निर्यात पर रोक लगाई पिछले वर्ष
जब किसान को अच्छे भाव मिल रहे थे ?किसान को गलत राजनीति का शिकार किसने बनाया ?

हमारे पास मिटटी की उर्वरा ,पहचान ,उत्तम खाद और उत्तम बीज का इन्फ्रा स्ट्रक्चर क्यों विकसित नहीं
हुआ ? क्यों नहीं हमने कोल्ड स्टेरोज विकसित किये ?हमने मनरेगा के लिए फंड बनाया, क्या काम आया
खुली लूट हुयी जनता के धन की .अगर यही पैसा भूमि सुधार ,कोल्ड स्टोरेज ,आधुनिक कृषि सयंत्र ,खेती
के लिए पानी और न्यूनतम दरों पर बिजली पर खर्च कर दिया जाता तो देश के किसान का जीवन स्तर
सुधर जाता ,मगर हमने ऐसा नहीं किया और अब उसी किसान को खून चूसने वाले परजीवियों के भरोसे
छोड़ देना चाहते हैं.आज उन्ही किसान के बच्चे मनरेगा के मजदुर बन गए हैं . 

खुदरा व्यापार में करोडो भारतीय रोजी रोटी कमा रहे है करोडो परिवार पल रहे हैं .लाख दौ लाख से भी कम
पूंजी से वे लोग काम कर रहे हैं ,क्या उनकी आजीविका को छीन लेने वाले कानून बनाने के लिए चुना है
सरकार को ?यदि इस समय FDI को वापिस नहीं लौटाया तो आने वाले समय में खुदरा व्यापारी खत्म हो 
जायेंगे .कैसे बाथ भिडायेगा एक- दौ लाख से व्यापार चलाने वाला अरबों रुपयों वाले FDI से ?मसल देंगे 
विदेशी खुदरा व्यापारी उसे मच्छर की तरह.

सरकार से इस मुद्दे पर असहयोग कीजिये .शांतिपूर्ण अनवरत प्रदर्शन कीजिये ,आम आदमी तक अपनी
आवाज पहुंचाने के लिए दुकाने खुल्ली रखिये मगर बिक्री रोक दीजिये ,अपने पेंडिंग काम पुरे कीजिये ,जब
सप्लाई की चेन बंद हो जायेगी तो आपकी बात बहरे कानो तक पहुँच जायेगी ,एक दिन का बंद बेहरोंको
सुनाने के काफी  नहीं होगा ,अपनी लड़ाई को शांतिपूर्ण,लम्बी और धारदार बनाईये .

अगर फिर भी सरकार नहीं सुनती है तो कीजिये आने वाले चुनावों में अपने मत का प्रयोग और बदल
 दीजिये अहंकारी मतिहीन तख़्त और ताज को .यह आपकी ताकत है , पूरा उपयोग कीजिये .      

तबीब कसाई हो गए? (व्यंग गीत ।)





तबीब  कसाई   हो   गए? (व्यंग गीत ।)



चेहरे    की   चमक,   तेरी  जेब   की  खनक,

सब   कुछ  देखो,  हवा  -  हवाई   हो   गए..!!

मुफ़्त   में   तबीब   ये  बदनाम   हो    गए  ?

जब   से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?  

( इलीस =  धर्म  मार्ग  से  भ्रष्ट, शैतान )


  अंतरा-१.


इन्सानियत   की   तो,   ऐसी   की   तैसी..!!

साँठ - गाँठ   है   ज़िंदा,   वैसे    की   वैसी..!!

नेता - बीमा - लेब,  सब  लुगाई   हो   गए..!!

जब  से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?  




अंतरा-२.


कौन    अंग   दायाँ,  कौन   सा   है    बायाँ..!!

कौन    यहाँ     बच्चा,   कौन    यहाँ    बुढ़ा..!!

हाड़ - मांस    पिघल   के,  दवाई   हो   गए..!!

जब   से   तबीब,  इलीस  कसाई   हो   गए ?  


अंतरा-३.



कहाँ    है    ग़रीबी,  कहाँ   के   तुम  ग़रीब..!!

गुर्दे की  क़िमत  सुन, खुल  जाएगा नसीब..!!

बदन  -  दवा   -  दारू,   महँगाई   हो   गए..!!

जब   से   तबीब,  इलीस  कसाई   हो   गए ?   


(गुर्दा = कीडनी)



अंतरा-४.


कहाँ   के   ये   ईश्वर,  कहाँ   के   ये   गोड़..!!

ऐंठे  -  जीते  -  मरते,   है   सब   गठजोड़..!!

अस्पताल    सोने   की    खुदाई   हो  गए..!!

जब   से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?   


अंतरा-५.


तुलसी  -  हलदी  -  हरडे,  अनर्थ  हो   गए..!!

ग्रंथ    ये    पुराने,  सब    व्यर्थ    हो   गए..!!

माँ   के   सारे    नुस्खे    दंगाई   हो   गए..!!   


तब  से  तबीब, इलीस  कसाई  हो  गए ?

(दंगाई =  उपद्रवकारी)

मार्कण्ड दवे । दिनांक - २७ -११ - २०११.