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28.3.12

शिक्षा की परीक्षा में फेल नीतीश सरकार-ब्रज की दुनिया

मित्रों, कुछ लोगों की आदत होती है कि करते बहुत कम हैं लेकिन ढोल बहुत ज्यादा का पीटते हैं और कुछ इसी तरह की आदत से ग्रस्त हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. उनके शासनकाल में कुछ क्षेत्रों में सुधार हुआ तो है लेकिन उम्मीद से बहुत कम जबकि कुछ क्षेत्र ऐसे भी रहे हैं जिनमें धनात्मक की बजाए ऋणात्मक प्रगति हुई है और दुर्भाग्यवश इनमें सबसे अव्वल है शिक्षा जो सही मायने में आदमी को इन्सान बनाती है. यही वह सबसे बड़ी बेचारी है जिसे सुशासन के दिमाग में चल रहे केमिकल लोचे का दुष्परिणाम सबसे ज्यादा भुगतना पड़ा है.
             मित्रों, सबसे पहले तो सत्ता में आते-आते नीतीश जी ने स्व. परम आदरणीय तत्कालीन शिक्षा सचिव मदनमोहन झा के मार्गदर्शन में शिक्षामित्रों की अत्यंत मूर्खतापूर्ण तरीके से बहाली की. बहाली सही थी परन्तु बहाली का तरीका निहायत गलत था और गलत थी और है भी शिक्षामित्रों के प्रति सरकार की नीति. सबसे पहली गलती तो थी शिक्षामित्रों के मानदेय का बहुत कम रखा जाना जो २००६ में आश्चर्यजनक तरीके से मात्र १५०० रूपया था. अभी भी यह महंगाई के हिसाब से बहुत कम ५-७ हजार रूपया है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मेधावी छात्रों ने बहुत कम संख्या में इन नौकरियों के लिए अपनी अभिरूचि दिखाई और अगर अभिरुचि दिखाई भी तो बहाली की गलत और दोषपूर्ण प्रकिया ने उन्हें बहाल होने ही नहीं दिया. दरअसल इस सरकार की आदत है कि वो जो कुछ भी करती है बड़े पैमाने पर करती है इसलिए वह शिक्षामित्रों की बहाली में सिर्फ नीतिगत गलतियाँ करके ही नहीं रुकी और उसने प्रक्रियागत भूलें भी कीं. उसने शिक्षामित्रों को बहाल करने की महती जिम्मेदारी से पूरी तरह अपना पल्ला झाड़ते हुए यह भार पंचायतों के भ्रष्ट कन्धों पर डाल दिया. फिर तो जमकर पैसा बनाया गया और अपने नालायक भाइयों-भतीजों की जिंदगियां बड़े ही करीने से संवारी गयी. जिसका परिणाम वही हुआ जो किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए था. ऐसे-ऐसे शिक्षक बहाल हो गए जिन्हें गिनती तक नहीं आती थी. वैसे भी ५-६ हजार रूपयों में विश्वविद्यालय टॉपर तो मिलने से रहे. बाद में एक सांकेतिक योग्यता परीक्षा लेकर इस ढीठ सरकार ने अपनी गलतियों को सही साबित करने का असफल प्रयास भी किया.
                 मित्रों, नीतीश जी की शिक्षा-सम्बन्धी तथाकथित गौरव गाथा का अगला काला अध्याय है विद्यालयों का उत्क्रमण. दरअसल १५ साल के लालू-राबड़ी राज में सरकार ने लगातार तेज गति से बढती छात्र-छात्रों की संख्या को ध्यान में रखते हुए न तो नए विद्यालय-भवनों का निर्माण कराया और न ही यथोचित संख्या में नए शिक्षकों की बहाली ही की. नीतीश-सरकार ने भी पूरे मन से कदम नहीं उठाते हुए बहुत-से प्राइमरी स्कूलों को मध्य विद्यालयों में, मध्य विद्यालयों को उच्च विद्यालयों में और उच्च विद्यालयों को उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में उत्क्रमित कर दिया. इन उत्क्रमित विद्यालयों में नए कमरे तो बना दिए गए परन्तु नई कक्षाओं को पढ़ाने योग्य शिक्षकों की बहाली नहीं की गयी. अब समस्या यह है कि पुराने शिक्षक इतने योग्य नहीं हैं कि वे पहले से उच्चतर कक्षाओं को पढ़ा सकें. सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है उत्क्रमित उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में. वहां तो कक्षा-सञ्चालन पूरी तरह से ठप्प ही हो गया है और विद्यार्थी कोचिंग शरणं गच्छामि के लिए बाध्य हैं. दरअसल नीतीश जी की पतली अक्ल में यह बात समा ही नहीं रही है कि बच्चों की पढाई और साइकिल में सीधा सम्बन्ध नहीं है बल्कि पढाई का सीधा सम्बन्ध है शिक्षकों से और उनकी योग्यता से. उच्च विद्यालयों में शिक्षक बहाली की प्रक्तिया तो हालाँकि ठीक थी लेकिन ७-८ हजार रू. में इस महंगाई में काम करेगा भी तो कौन मेधावी छात्र? फलतः यहाँ भी ज्यादातर अयोग्य शिक्षक ही बहाल हो गए हैं.
                  मित्रों, केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कागजों पर तो प्रदान कर दिया है परन्तु बिहार के विद्यालयों में अभी भी कमरों और शिक्षकों की भारी कमी है और कमी है बिहार सरकार में ईच्छा-शक्ति की भी. ऐसे में यह कानून शायद ही कभी सही मायनों में राज्य में लागू होने पाए. राज्य में सरकार महादलितों के बीच रेडियो तो बाँट रही है लेकिन राज्य के अम्बेडकर विद्यालयों और छात्रावासों को रामभरोसे छोड़ दिया गया है. प्रतिवर्ष इन पर करीब एक अरब रूपये खर्च किए जाते हैं लेकिन इनमें रहनेवाले दलित-महादलित बच्चों की थालियों में आता है ऐसा भोजन जो शायद जानवर भी नहीं खाना पसंद करेंगे और इसके साथ ही उन्हें बिना शौचालय और स्नानघर की मूलभूत सुविधा के जीवन बिताना पड़ रहा है. वे चाहते तो नहीं फिर भी वे सरकारी उदासीनता के चलते खुले में शौच करने और स्नान करने के लिए अभिशप्त हैं.
                     मित्रों, राज्य के विश्वविद्यालयों में; जो बिहार सरकार के पूर्ण नियंत्रण में नहीं हैं, में भी हालात अच्छे नहीं हैं. महामहिम कुलाधिपति यानि राज्यपाल कथित रूप से पैसे लेकर कुलपतियों की नियुक्ति कर रहे हैं. कई कुलपति तो अपराधी भी है और उन पर आपराधिक मामले भी चल रहे हैं. पैसा देकर कुलपति बने कुलपति जी पैसे लेकर बिना जमीन, बिना भवन और बिना शिक्षक वाले महाविद्यालयों को भी धड़ल्ले से संबंधन प्रदान कर रहे हैं. इस मामले में हमारा विश्वविद्यालय यानि बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर खासी तत्परता प्रदर्शित कर रहा है. परन्तु ऐसा भी नहीं है कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा का बंटाधार करने जैसा महान कार्य सिर्फ राज्य के बूते ही सम्पन्न हुआ है वरन बिहार सरकार ने भी इस महायज्ञ में अपने हिस्से की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है. बिहार सरकार ने गैर मान्यताप्राप्त महाविद्यालयों को मानदेय देना शुरू किया है जो एक स्वागतयोग्य कदम है परन्तु उसने साथ-ही-साथ मानदेय को परीक्षा-परिणामों से भी जोड़ दिया है. जिसका परिणाम यह हुआ है कि महाविद्यालय अब पढाई का स्तर ऊँचा उठाने के बदले येन-केन-प्रकारेण परिणाम को ऊँचा उठाने में लगे रहते हैं. इसके लिए पहले परीक्षा-सञ्चालन में जान-बूझकर कदाचार किया-करवाया जाता है और फिर मूल्यांकन-केन्द्रों पर जाकर पैसा देकर रिजल्ट को जबरन उत्तम कोटि का करवाया जाता है. इतना ही नहीं नीतीश सरकार ने, जबसे वह सत्ता में आई है एक भी स्थाई शिक्षक की न तो विश्वविद्यालयों में और न ही महाविद्यालयों में ही बहाली की है. पुराने शिक्षकों के रिटायर होते जाने से शिक्षकों की विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में इतनी कमी हो गयी है कि कई विभाग तो पूरी तरह से शिक्षक-विहीन ही हो गए हैं. बीच में इनकी नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालयों की ओर से विज्ञापन भी दिया गया जिसमें शिक्षकों को अधिकतम १२००० रूपये मासिक मानदेय या हथउठाई देने की महान दुस्साहसिक घोषणा की गयी. भारी विरोध होने पर और इस लेखक द्वारा पढोगे लिखोगे बनोगे ख़राब लेख लिखने के बाद विज्ञापनों को वापस ले लिया गया और कहा गया कि अब बहाली पुराने तरीके से विश्वविद्यालय सेवा आयोग की पुनर्स्थापना के बाद उसके द्वारा ही की जाएगी. देखते-देखते दो साल बीत गए मगर उक्त आयोग का पुनर्गठन सरकार को नहीं करना था सो नहीं किया गया. अब फिर से जनता की कमजोर याददाश्त पर अटूट विश्वास करते हुए विश्वविद्यालयों को बहाली अपने स्तर से करने का अधिकार दे दिया गया है. शायद फिर से मानदेय अधिकतम १२००० रूपया ही रहेगा. अब आप ही बताईए कि क्या एमए, पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने और नेट/सेट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कौन मेधावी चाहेगा १२००० रूपये पर बेगार करना? यानि एक बार फिर शिक्षा के इस हिस्से का भी अयोग्य शिक्षकों के हाथों में जाना निश्चित है. साथ ही बहाली में भ्रष्टाचार भी जमकर हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
           मित्रों, इस प्रकार हमने देखा और पाया कि नीतीश सरकार जो प्रतिवर्ष लाखों विद्यार्थियों की परीक्षा लेकर उत्तीर्णता का प्रमाण-पत्र देती है खुद ही शिक्षा-व्यवस्था और शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के मोर्चे पर साल-दर-साल फेल हो रही है. मामले का सबसे निराशाजनक पहलू तो यह है कि आगे इस सरकार की यह मंशा भी नहीं दिख रही है कि बिहार में शिक्षा की स्थिति में सुधार हो और वह आईसीयू से बाहर आकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करे.

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                                शिखा कौशिक 

यकीन


वह तो मैं था,
जो तेरी बातों पर,
करता रहा यकीन।
लोग तो जमाने में,
सच बातें भी,
कहां मानते हैं।



  • रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार गूगल

गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्ति

मोक्षदायिनी गंगा नदी पर बनाए जा रहे सभी बांधों को रोकने की मांग को उचित ठहरा रहे हैं डॉ. भरत झुनझुनवाला

स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जब गंगा पर बनाए जा रहे बांधों को रोकने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे तो सरकार उनकी मांग को पूरा न सही आंशिक रूप से मानने पर सहमत हुई, जिस पर उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया, लेकिन बाद में इस पर कोई अमल न होते देख वह पुन: अनशन के लिए विवश हुए। एक बार फिर सरकार ने देर से उनके अनशन की सुधि ली और उनकी मांगों पर विचार का आश्वासन दिया। इसके फलस्वरूप उन्होंने अपना अनशन वापस ले लिया है। ऐसे में कुछ मूल प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक हो गया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? सरकार के सामने जनता को बिजली उपलब्ध कराने की समस्या है। इस लिहाज से गंगा पर बनाए जा रहे बांधों के निर्माण को रोकना उचित नहीं प्रतीत होता। मैदानी क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ाने और जनता का पेट भरने के लिए गंगा के पानी को नहरों में डालना जरूरी है। गंगा के किनारे बसे तमाम शहरों के गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने में हजारों करोड़ रुपये लगेंगे, जिसके लिए अतिरिक्त टैक्स लगाना होगा। दोनों ही पक्ष जनहित के नाम पर अपना-अपना तर्क दे रहे हैं इसलिए दोनों के जनहित के अंतर को समझना होगा। मनोविझान में मनुष्य की चेतना के दो प्रमुख स्तर हैं-चेतन व अचेतन। सामान्य भाषा में चेतन को बुद्धि तथा अचेतन को मन बताया जाता है। सुखी व्यक्ति की बुद्धि तथा मन में सामंजस्य होता है। सुख का सीधा फॉर्मूला है कि बुद्धि को मन के अनुरूप दिशा दी जाए, लेकिन मन को पहचानना काफी कठिन काम है। बुद्धि और मन का यह विभाजन ही तमाम रोगों और सांसारिक समस्याओं की जड़ भी है। जैसे युवा का मन टैक्सी ड्राइवर बनने का है, परंतु दोस्तों की बात मानकर वह दुकान में बैठ जाए तो वह व्यापार में घाटा खाता है। इसका कारण यही है कि दुकान में बैठा उसका मन वास्तव में वहां नहीं होता। उसकी कुल मानसिक शक्ति का आधा चेतन हिस्सा ही क्रियाशील रहता है, जिस कारण वह ग्राहक के मनोभाव को नहीं समझ पाता है। मन को जगाने का कठिन कार्य गंगाजी करती हैं, ऐसा माना जाता है। करोड़ों लोग अपने जीवन भर की कमाई को गंगा में एक डुबकी लगाने के लिए खर्च कर देते हैं। देव प्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए हर वर्ष आने वाले तीर्थयात्रियों के सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत यात्रियों ने बताया या कि गंगा स्नान करने से उन्हें मानसिक शांति मिलती है। इसका कारण यही है कि स्नान से मन जागृत हो जाता है और बुद्धि मन के अनुसार दिशा पकड़ लेती है। इस बारे में पूछे जाने पर 26 प्रतिशत तीर्थयात्रियों ने बताया कि उन्हें केवल स्वास्थ्य लाभ हुआ। इसका भी कारण यही है कि मन की ऊर्जा जागृत होने से फेफड़े, हृदय आदि अंग सही-सही काम करने लगते, जिससे व्यक्ति का शरीर खुश होता है। 14 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें व्यापार में और 12 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें नौकरी में लाभ हुआ। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मन की ऊर्जा जाग्रत होने पर इनके मन ने सही दिशा पकड़ी, जिससे अच्छे परिणाम मिले। गंगा की मन को जागृत करने की यह अदृश्य शक्ति बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के पवित्र तीर्थ स्थलों से होकर बहने, पहाड़ी बहाव में गंगाजल में तांबा, क्रोमियम तथा थोरियम आदि के घुलने और कालीफाज नामक विशेष लाभकारी बैक्टीरिया के कारण आती है। जापान के वैज्ञानिक मसारू इमोटो ने अपने अध्ययन में पाया कि बहती नदी में पानी के अणु षट्कोणीय आकर्षक झुंड बना लेते हैं। संभवत: इन्हीं आणविक झुंडों के कारण गंगा के जल में मन को प्रभावित करने की शक्ति आती है। इमोटो ने पाया कि बहते पानी को बांध में रोक देने से इन झुंडों का सौंदर्य नष्ट हो जाता है। जलविद्युत टर्बाइन के पंखों से टकराने के बाद जल के षट्कोणीय झुंड बिखर जाएंगे और इससे वह लाभ नहीं मिलेगा जो गंगा के अबाध बहाव से मिलता है। उत्तरकाशी स्थित संस्था द्वारा टिहरी बांध के ऊपर एवं नीचे के पानी के नमूनों का स्विट्जरलैंड स्थित संस्था में परीक्षण कराया गया, जिसमें पाया गया कि टिहरी के ऊपर षट्कोणीय झुंडों में ऊर्जा के केंद्र दिखते हैं, जो बांध के नीचे बहाव वाले पानी में लुप्त हो जाते हैं। गंगा के बहाव को सुरंग तथा झील में बहाने से पत्थरों का घर्षण समाप्त हो जाएगा और तांबा आदि जल में नहीं घुलेंगे। पानी को टर्बाइन में डालने के पहले सभी वनस्पतियां निकाल दी जाती हैं। इससे लाभकारी बैक्टीरिया को भोजन नहीं मिल पाता और वे कालकवलित हो जाते हैं। मूल प्रश्न है कि गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्तियों से अधिक जनहित हासिल होगा या बिजली से? बिजली के अन्य विकल्प भी हैं, जैसे कोयला एवं सौर ऊर्जा। सिंचाई के भी अन्य विकल्प हैं, जैसे गेहूं के स्थान पर जौ और चने की खेती करना, परंतु गंगा का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ज्ञान स्वरूप सानंद की मांग जायज है और गंगा पर बन रहे सभी बांधों को रोकने के साथ-साथ पूर्व में बने टिहरी बांध को भी हटाने की पहल होनी चाहिए। इन बातों को न समझने के कारण ही भारत की जनता बांधों का समर्थन कर रही है। सरकार और जल विद्युत कंपनियां अपने लाभों के लिए गंगा को नष्ट करने पर आमादा हैं। कहा जा रहा है कि आमरण अनशन लोकतांत्रिक राजनीति के विपरीत है, लेकिन जब सरकार पर जलविद्युत कंपनियों का वर्चस्व हो तो गंाधीजी के इस अस्त्र का उपयोग करना सही प्रतीत होता है। यह सही है कि अनशन से बुद्धि को कुछ समझ नहीं आता है, परंतु अनशन से जनता केमन का भाव बदलता है, जो कि संवाद का एक तरीका है। यहां यह कहना सही नहीं होगा कि ज्ञानस्वरूप सानंद किसी तरह की राजनीति कर रहे हैं। श्री अरविंद तथा विवेकानंद जैसे मनीषियों की मानें तो विश्व में भारत की भूमिका आध्यात्मिक है और इस भूमिका का निर्वाह हम गंगा की मानसिक शक्ति का Oास करके नहीं कर सकेंगे।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार :- दैनिक जागरण

गरीबों के साथ धोखाधड़ी

निर्धन आबादी के संदर्भ में योजना आयोग के ताजा आंकड़ों का खोखलापन उजागर कर रहे हैं डॉ. विशेष गुप्ता

गरीबी निर्धारण के तौर-तरीकों पर नए सिरे से फजीहत का सामना करने के बाद केंद्र सरकार विशेषज्ञों का एक समूह गठित करने जा रही है, जो गरीबी रेखा के मानक निर्धारित करने के मौजूदा मानदंडों की समीक्षा करेगा। दरअसल योजना आयोग ने गरीबों की घटती तादाद को लेकर जो ताजा आंकड़े प्रस्तुत किए हैं उससे एक बार फिर देश में कोहराम मच गया है। इन आंकड़ों से ऐसा जाहिर होता है जैसे योजना आयोग गरीबी की वास्तविकता से मुंह मोड़ रहा है। योजना आयोग के द्वारा गरीबी से जुड़े जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं उसमें कहा गया है कि देश में गरीबों की तादाद घट रही है। इस संबंध में योजना आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 2004-2005 में भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी जो 37.2 फीसदी थी वह 2009-2010 में घट कर 29.8 रह गई है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी का अनुपात 8 फीसदी घटकर 41.8 फीसदी की जगह 33.8 फीसदी पर तथा शहरी इलाकों में 5 साल पहले जो गरीबी 25.7 फीसदी थी वह अब 4.8 फीसदी घटकर 20.9 फीसदी पर आ गयी है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सरकारी आंकड़ों के आधार पर अब देश के गांव में हर तीन में से एक व्यक्ति गरीब है, जबकि नगरों में थोड़ी बेहतरी के साथ वहां हर 5 में से एक व्यक्ति गरीबी की श्रेणी में आता है। योजना आयोग ने गरीबी से जुड़े आंकड़ों से भी एक कदम आगे बढ़कर लोगों की आमदनी के आधार पर गरीबी का जो पैमाना विकसित किया है वह निश्चित ही जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि शहर में प्रतिदिन 28.65 रुपये और गांव में 22.42 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। योजना आयोग ने इसी पैमाने के आधार पर माना है कि देश में गरीबी घट गई है। जरा स्मरण करें इसी संप्रग सरकार ने सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा प्रस्तुत किया था उसमें स्पष्ट कहा गया था कि शहरों में प्रतिदिन 32 रुपये और गांव में 26 रुपये खर्च करने वाले को गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को मिलने वाली सुविधाएं लेने का अधिकार नहीं है। उस समय भी गरीबी मापने के इस पैमाने को अव्यावहारिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी योजना आयोग को लताड़ लगाई थी। सरकार को इस विषय में कई सफाई देनी पड़ी थीं। इसके बावजूद भी योजना आयोग ने गरीबी मापने का जो पैमाना प्रस्तुत किया है वह पहले से अधिक अतार्किक और हास्यास्पद जान पड़ता है। आज योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत गरीबी से जुड़े आंकड़ों के साथ-साथ गरीबी रेखा निर्धारण की भी बहुत आलोचना हो रही है। उसका कारण भी साफ है कि देश के कई जाने-माने अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि 70 के दशक में गरीबी रेखा का पहली बार निर्धारण करते समय एक सामान्य भारतीय के लिए जितनी कैलोरी का भोजन जरूरी माना गया था अब गरीबी रेखा के स्तर पर रहते हुए उससे भी काफी कम कैलोरी मिल रही है। ग्रामीण इलाकों में कैलोरी की यह गिरावट आठ फीसदी तथा शहरी क्षेत्रों में यह तीन फीसदी रही है। इसलिए यहां इस कड़वे सच को कहने में कोई हिचक नहीं कि भारत में गरीबी रेखा अब धीरे-धीरे भुखमरी की रेखा बनकर उभर रही है। अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे आज के योजनाकार आखिर किस विरोधाभासी युग में जी रहे हैं और आखिर कौन सी उनको यह मजबूरी है? गरीबी के इन आंकड़ों में क्षेत्रीय असमानताएं भी बहुत अधिक उजागर हुई हैं। गरीबी के मामले में कुछ राज्यों में हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। प्रदेशों के स्तर पर गरीबी से जुड़ी क्षेत्रीय असमानताओं से साफ संकेत मिलते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में गरीबी नहीं घटी है। इन आंकड़ों में पूर्वोत्तर भारत की दशा तो और भी बदतर रही है। इससे भी अधिक चिंताजनक मामला दिहाड़ी के मजदूरों से जुड़ा है। आज यह गंभीर चिंतन का विषय है कि गांव व शहर के गरीबों के लिए अनेक योजनाओं के संचालन के बावजूद भी देश की आजादी के बाद गरीबों के आंकड़ों में कोई बहुत भारी कमी नहीं आई है। ऐसा लगता है कि देश के योजनाकारों ने गरीबी मापन का जो स्केल तैयार किया है उसमें गरीबी को मापने की जगह गरीबी को छिपाने का प्रपंच अधिक है। 2004-2005 में योजना आयोग ने कहा था कि देश में केवल 27 फीसदी लोग गरीब हैं। 2009 में सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि 37 फीसदी गरीब हैं। इसी बीच अर्जुन सेनगुप्ता की एक अन्य समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल आबादी के 78 फीसदी हिस्से के गरीब होने का अनुमान प्रस्तुत किया था। इसके बाद एनसी सक्सेना की अध्यक्षता वाली समिति ने 56 फीसदी आबादी को गरीबी की श्रेणी में रखा था। अब योजना आयोग ने 2009-2010 के अंाकड़ों के आधार पर गरीबी का अनुपात घटाकर 29.8 फीसदी रहने का अनुमान जारी किया है। यह 21वीं सदी की चमचमाती दुनिया का विद्रूप चेहरा ही कहा जाएगा कि जहां एक ओर आक्रामक उपभोग का विस्फोट है तो दूसरी ओर अभावग्रस्त जीवन फटेहाल जिंदगी जीने को मजबूर है। आज अधिकतर लोग गरीबी की श्रेणी में इसलिए हैं, क्योंकि उनका वास्तविक हक उन्हें नहीं मिल पा रहा है। भारत की गरीबी की समस्या का हल केवल गरीबी से जुड़े आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित करने से नहीं हो सकता। यहां मुख्य प्रश्न गरीब और अमीर के बीच संसाधनों में गैर-बराबरी और असमान वितरण से जुड़ा है। इसलिए हमें देश में लगातार बढ़ रही अमीरी पर भी सवाल उठाने होंगे। तभी हम गरीबी दूर करने की अपनी प्राथमिकता पूरी कर सकते हैं।
(लेखक समाजशास्त्र के प्राध्यापक हैं)
साभार :- दैनिक जागरण

संघवाद पर सही दृष्टिकोण

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन के सुझाव की वकालत कर रहे हैं एस. शंकर

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण के अवसर पर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री का जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन होना चाहिए। यह नि:संदेह एक रचनात्मक प्रस्ताव है, जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। यह देश में सच्चे संघवाद और अधिक उत्तरदायी शासन की भावना से जुड़ा है। इसके लिए समय भी उपयुक्त है, क्योंकि लगातार ऐसी अनेक घटनाएं घट रही हैं, जो संघीय शासन प्रणाली की आत्मा को कचोट रही हैं। उत्तराखंड में जिस तरह मुख्यमंत्री का चयन हुआ उससे मुख्यमंत्री पद की फजीहत हो रही है। यह दिखाता है कि स्थानीय जनता और प्रतिनिधियों को दिल्ली स्थित कांग्रेस आलाकमान कुछ नहीं समझता। दिल्ली भरोसे खड़ा मुख्यमंत्री प्रदेश में कितना स्वतंत्र निर्णय ले सकेगा, यह सोचने वाली बात है। हैरत है कि पिछले दो दशकों के अनुभव से कांग्रेस आकाओं ने कुछ नहीं सीखा। इंदिरा गांधी के समय में जिस तरह विभिन्न राज्यों में कांग्रेस मुख्यमंत्रियों को पौधों की तरह उखाड़ा-लगाया जाता था, वह बड़ा कारण था कि आंध्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि प्रदेशों में कांग्रेस उजड़ गई। उन प्रदेशों की जनता तथा स्थानीय कांग्रेसियों को भी आलाकमान की उस प्रवृत्ति से हताशा होती थी। देवराज अर्स, गुंडु राव, भागवत झा आजाद जैसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री भी अकारण रातोरात हटा दिए जाते थे। इससे प्रशासन और नीति-निर्माण बुरी तरह प्रभावित होता था। अच्छे नेताओं, अधिकारियों का मनोबल गिरता था। यह सब प्रदेशों का शासन रिमोट कंट्रोल से दिल्ली से मनमाने-चलाने की जिद के कारण होता था। वस्तुत: उन सभी प्रांतों में क्षेत्रीय दलों का उदय और वर्चस्व स्थानीय स्वाभिमान की भावना का भी प्रतिफल था। दिल्ली के तुगलकी फरमानों से लोग खीझ चुके थे। उत्तर प्रदेश के चुनावी भाषणों में केंद्रीय कांग्रेसियों ने पुन: दोहराया कि यदि कांग्रेस जीती तो राहुल गांधी रिमोट से शासन चलाएंगे! यह अपने ही पैर कुल्हाड़ी मारने वाला बयान था। परिवार-केंद्रित कांग्रेस आलाकमान अभी भी उसी लालसा में है। उत्तराखंड में दिल्ली से भेजे जनाधार विहीन व्यक्ति को सत्ता सौंपना वही बात है। कांग्रेसी आलाकमान समझने को तैयार नहीं कि जो मुख्यमंत्री 10 जनपथ का खिलौना होगा वह प्रदेश को कैसे उत्साहित करेगा! इस तरह दिल्ली स्थित कांग्रेस आलाकमान उत्तराखंड की जनता, वहां अपनी पार्टी और मुख्यमंत्री पद की भी फजीहत कर रहा है। यह लोकतंत्र और संघवाद का खुला हनन है। कांग्रेस की विकृत केंद्रीयता से केवल केंद्र-राज्य संबंधों की संरचना ही नहीं बिगड़ी, बल्कि कई संवैधानिक संस्थाओं का भी भितरघात होता रहा है। पूरी सत्ता पर स्थायी कब्जा बनाए रखने की चाह में कांग्रेस आकाओं ने राज्यपाल, सीबीआइ, चुनाव आयोग, सीएजी, केंद्रीय आयोगों और उच्चतर न्यायपालिका समेत अनेकानेक संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा भी गिराई। सब जगह अपने आदमी रखने से शासन उत्तरोत्तर भ्रष्ट हुआ। उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान जिस तरह कई केंद्रीय कांग्रेसी नेताओं ने मंत्रिपद से चुनाव आयोग का मजाक बनाया वह भी संवैधानिक संस्थाओं को जानबूझकर चोट पहुंचाने का ही उदाहरण है। उसी तरह कई क्षेत्रीय दलीय नेताओं पर सीबीआइ की कार्रवाई केंद्र में कांग्रेसी सत्ताधारियों से दूरी या नजदीकी के अनुरूप बढ़ती-घटती है। संघवाद की उपेक्षा की बीमारी कांग्रेस से भाजपा आलाकमान को भी लगी है। उत्तराखंड में खंडूड़ी को बीच-रास्ते अकारण हटाने, फिर कुछ समय बाद वापस लाने में उसी अहमन्यतावादी प्रवृत्ति का दोहराव था, जो पहले झारखंड में भी देखा गया था। यही उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में भाजपा सरकारों के दौरान भी होता रहा है। स्थानीय पार्टी या जनता की पसंद की उपेक्षा करते हुए मुख्यमंत्री को कुछ केंद्रीय नेताओं की मर्जी या गुटबाजी की दया पर छोड़ना घातक है। संयोग है कि नरेंद्र मोदी बच गए, नहीं तो दस वर्ष पहले भाजपा के एक-दो केंद्रीय नेताओं की इच्छा से उनका भी हटना तय था। इस परिस्थिति में मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री का जनता द्वारा सीधे निर्वाचन एक दूरदर्शी उपाय होगा। इस एक कदम से शासन अधिक उत्तरदायी और स्थिर बनेगा, केंद्र-राज्य संबंध स्वस्थ होगा, जोड़-तोड़ की क्षुद्र राजनीति करने वाले स्वार्थी तत्वों का प्रभाव घटेगा, संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कम होगा तथा शासन के हर स्तर पर योग्य लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा। इससे वस्तुत: किसी दल को हानि नहीं होगी, बल्कि सबके बीच स्वस्थ प्रतियोगिता विकसित होगी। सभी अच्छे से अच्छे चेहरों को अपनी पार्टी में बढ़ावा देंगे। प्रधानमंत्री और मुख्य मंत्रियों का प्रत्यक्ष निर्वाचन जनभावना के भी अनुरूप है, क्योंकि लोग संभावित मुख्य प्रशासक का चेहरा और चरित्र देख कर निर्णय करना चाहते हैं। यदि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सीधे निर्वाचित हों तो वे अपने सहकर्मी चुनने के लिए भी अधिक स्वतंत्र होंगे। जरूरत होने पर वे दूसरे दल तथा निर्दलीय योग्य व्यक्तियों को भी मंत्री आदि बना सकेंगे। यह सहमतिपूर्ण, स्थिर और कुशल शासन के लिए भी लाभकारी होगा। दो कार्यकाल की सीमा प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को अधिक जिम्मेदार बनाएगी। साथ ही वह दलीय, विखंडनकारी, स्वार्थी नेताओं के दबाव से भी मुक्त रहेगा। इन सब कारणों से संवैधानिक संस्थाओं में छेड़छाड़ और गलत नियुक्तियों पर भी लगाम लगेगी। इसलिए, देश में सच्चे संघवाद और लोक-भावना के अनुरूप राजनीतिक सुधार की दिशा में पहल जरूरी है। सभी राजनीतिक दलों को कम से एक बार केवल देशहित में विचार कर सहमत होना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार :- दैनिक जागरण


कमजोर-लाचार नेतृत्व

सत्ता के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज पर निगाह डाल रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित

कमजोर और मजबूर हाथों से सत्ता नहीं चलती। भारत ने बहुत सोच-समझकर इतिहास के प्रमुख शासक अशोक के स्तंभ से अपना राजचिह्न अशोक चक्र अपनाया। अशोक की तुलना मारकस आरेलियस, कोस्टेटाइन, सोलोमन और खलीफा उमर जैसे विश्व नायकों से होती है। इतिहासकार एचसी राय चौधरी ने लिखा है, उनमें चंद्रगुप्त की ऊर्जा थी, समुद्रगुप्त का तेज था, लेकिन कमजोर हाथों वाले उत्तराधिकारी प्राचीन मौर्य साम्राज्य को संगठित बनाए रखने में अक्षम रहे। राष्ट्र-राज्य कमजोर हाथों से मजबूत नहीं होते। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कमजोर हैं। कमजोरी की ही परिणति है मजबूरी। प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहा, गठबंधन की मजबूरियों के चलते मुश्किल फैसले और मुश्किल हो जाते हैं। गठबंधन सरकारों में घटक दलों से समन्वय बनाना बेशक प्रधानमंत्री की व्यावहारिक मजबूरी होती है, लेकिन असल बात है उनकी व्यावहारिक कमजोरी। वह कांग्रेस संसदीय दल के स्वाभाविक निर्वाचित नेता नहीं हैं। उन्हें प्रधानमंत्री बनाया है सोनिया गांधी ने। संविधान के अनुसार वह संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन असलियत में वह सोनिया गांधी की कृपा से ही प्रधानमंत्री हैं। ममता बनर्जी ने रेलमंत्री हटवाने के सवाल पर कड़वा सच ही कहा है, सोनिया प्रधानमंत्री चुन सकती हैं तो अपनी पार्टी की नेता होने के कारण रेलमंत्री मैं ही चुनूंगी। रेल ममता की है, प्रमुख सत्ता सोनिया की। भारत के लोगों का यहां क्या है? न प्रधानमंत्री और न अन्य मंत्री। प्रधानमंत्री कमजोर और मजबूर हैं। संविधान में मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में सामूहिक उत्तरदायित्व की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर ही डाली थी। उन्होंने कहा था कि सामूहिक उत्तरदायित्व प्रधानमंत्री के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल रूपी मेहराब के बीच का मुख्य पत्थर है। यहां मुख्य पत्थर ही कमजोर है तो सामूहिक उत्तरदायित्व कैसा? प्रधानमंत्री की मजबूरी से भारत का संसदीय ढांचा ध्वस्त हो गया है। दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री की संस्तुति पर रेलमंत्री बने। उन्होंने लोकसभा में रेल बजट रखा। रेल बजट की प्रशंसा प्रधानमंत्री ने भी की थी। फिर ममता का दबाव आया। कमजोर हाथ जुड़ गए। प्रधानमंत्री ने सिर झुकाया और अपने रेलमंत्री का सिर ममता को सौंपा। ममता ने मुकुल राय को रेलमंत्री बनाने का निर्देश दिया। रेल राज्यमंत्री रह चुके इन्हीं मुकुल राय ने असम रेल दुर्घटना के समय इन्हीं प्रधानमंत्री का निर्देश नहीं माना था। मंत्री को प्रधानमंत्री का विश्वासपात्र होना चाहिए, लेकिन विश्वासपात्र दिनेश त्रिवेदी को हटाने और स्वयं प्रधानमंत्री का भी निर्देश न मानने वाले मुकुल राय को रेलमंत्री बनाने की सिफारिश प्रधानमंत्री ने ही की है। सामूहिक उत्तरदायित्व का संवैधानिक सिद्धांत अपनी मौत मर गया। दिनेश त्रिवेदी गलत थे तो प्रधानमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद की जिम्मेदारी है। नेतृत्व प्रधानमंत्री ही करता है, वह त्यागपत्र देता है तो सबका त्यागपत्र अपने आप हो जाता है। वह हटता है तो सब हटते हैं। प्रधानमंत्री सत्ता का प्रमुख है। वह देश की अर्थनीति, समाजनीति, संस्कृति और राजव्यवस्था का सर्वोच्च प्रतिनिधि है। वही प्रमुख शासनकर्ता है। मनमोहन सिंह विश्व इतिहास के प्रथम प्रधानमंत्री हैं जो दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र में राज करते हैं, लेकिन शासन नहीं करते। उन्होंने ममता के सामने सिर झुकाया। उन्होंने द्रमुक की इच्छानुसार संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन किया। वह शासन नहीं करते। विशेषाधिकार की कौन कहे, वह प्रधानमंत्री के संवैधानिक प्राधिकार की भी रक्षा नहीं करते। मजबूरी का नाम प्रधानमंत्री-मनमोहन सिंह ने यही सिद्ध किया है। वह दूसरी दफा प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कोई निर्णय यादगार नहीं बनता। मनमोहन सिंह के समय चीन ने अरुणाचल को लेकर गलतबयानी की। पाकिस्तान ने कई दफा अपमानजनक टिप्पणियां कीं। वह प्रतिकार नहीं कर सके। संप्रग घटक दलों के नेता भी प्रधानमंत्री से सीधी बात नहीं करते। मनमोहन सिंह का अब तक का पूरा कार्यकाल दयनीय है। देश के भविष्य को लेकर उनका स्वप्न क्या है? वह क्या करना चाहते थे? पता नहीं चला, वह जो नहीं करना चाहते थे, वही करते दिखाई पड़े। उनके सहयोगी मंत्री घोटालों में फंसे, घोटाले दर घोटाले हुए। उन्हें पता नहीं चला। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर भी वह वीतराग रहे। वह हमेशा आत्मसमर्पण की मुद्रा में रहे। बहुत मजबूर हैं मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह का आत्मसमर्पण भारत की मुख्य चिंता नहीं है। मुख्य चिंता है देश की सर्वोच्च शासन संस्था की साख और गरिमा। प्रधानमंत्री देश का राजमुकुट और संप्रभुता का प्रतिमान हैं। वही परतंत्र, मजबूर और लाचार हैं तो देश का क्या होगा? संविधान के अनुसार मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं, सर्वोच्च शासक हैं, उन्हें अपने मंत्री चुनने का अधिकार है लेकिन वस्तुत: उनका अपना अस्तित्व भी सोनिया गांधी के पास है और उनके मंत्रियों के प्राण भी दलीय नेताओं के पास। प्रधानमंत्री ही सरकार का मुखिया नहीं रहा। मंत्री के नाम दूसरे बताते हैं, प्रधानमंत्री हां करते हैं। मंत्री हटाने के निर्देश भी दूसरे देते हैं, प्रधानमंत्री उनके निर्देश मानने को मजबूर हैं। प्रधानमंत्री ने गठबंधन की मजबूरी की चादर में सारा सच ढक दिया है। क्या 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला गठबंधन की मजबूरी था? सीएजी की रिपोर्ट में 2-जी से कई गुने बड़े कोयला घोटाले की चर्चा है। घोटाले के समय कोयला विभाग प्रधानमंत्री के पास ही था। ढेर सारे घोटाले गठबंधन की ही मजबूरी नहीं हो सकते। असली सच है-हर हाल में सत्ता में बने रहने की कांग्रेसी पिपासा। कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को बेइज्जत करते हुए ही सत्ता में है। ठीक है कि तृणमूल कांग्रेस संप्रग का एक घटक है, लेकिन कांग्रेस उससे बड़ा घटक है। कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के साथ संवैधानिक मर्यादाओं के पालन की भी साझेदारी क्यों नहीं की? संप्रग के घटक कांग्रेस की सत्ता-कमजोरी का ही लाभ उठाते हैं। वे आंख दिखाते हैं, कांग्रेस झुक जाती है। वे धौंस देते हैं, कांग्रेस डर जाती है। वे डांट देते है, कांग्रेस आत्मसमर्पण कर देती है। मनमोहन सिंह यही सब करने-कराने के लिए प्रधानमंत्री हैं। उनके आचरण से विश्व में भारतीय प्रधानमंत्री की साख को बट्टा लगा है। वास्तविक प्राधिकार से विहीन प्रधानमंत्री के राज में भारत का भविष्य और राष्ट्र का स्वाभिमान दांव पर है। प्रधानमंत्री की मजबूरी समझी जा सकती है, लेकिन प्राधिकारविहीन प्रधानमंत्री बने रहने की उनकी मजबूरी आखिरकार क्या है?
(लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
साभार :- दैनिक जागरण

उतर गया गांधी परिवार का जादू

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति को गांधी परिवार के रसूख के खत्म होने का संकेत मान रहे हैं प्रदीप सिंह

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कई राजनीतिक दलों के पैरों के नीचे की जमीन खिसका दी है। लेकिन एक और बात हुई है जो समाजवादी पार्टी की जीत, अखिलेश यादव के युवा नेतृत्व और बसपा की अप्रत्याशित (कुछ लोगों के लिए) हार की चर्चा के बीच दब गई। या यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि महत्व के लिहाज से उसकी चर्चा नहीं हुई। वह है अमेठी, रायबरेली और सुल्तानपुर में कांग्रेस की हार। इन तीन संसदीय क्षेत्रों की पंद्रह विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के हाथ केवल दो सीटें लगीं। इसके बावजूद कि राहुल, सोनिया, प्रियंका सहित पूरे गांधी परिवार ने इन तीनों संसदीय क्षेत्रों में काफी सघन चुनाव प्रचार किया। एक सवाल हवा में है क्या गांधी परिवार का करिश्मा खत्म हो रहा है? करिश्मा उस जादू की तरह है जो सिर चढ़कर बोले। यानी करिश्मे से प्रभावित व्यक्ति तार्किक ढंग से सोचना छोड़ देता है। वह सही-गलत का फैसला नहीं करता। करिश्माई नेता के पीछे जनता चल पड़ती है। वह यह मानने को तैयार नहीं होती कि नेता जो कह रहा है उसके अलावा कोई सच हो सकता है। चुनावी राजनीति में आने के बाद राहुल गांधी पहली बार अमेठी, रायबरेली से निकलकर पूरे उत्तर प्रदेश में घूमे। सोनिया गांधी पहले से ही पूरे प्रदेश में चुनाव अभियान चलाती रही हैं। पहली बार प्रियंका गांधी मां और भाई के चुनाव क्षेत्र से बाहर निकलकर चुनाव प्रचार करने के लिए न केवल तैयार दिखीं बल्कि विपक्षी दलों को परोक्ष धमकी भी दी कि क्या वे यह चाहते हैं मैं राजनीति में आऊं? इसके बावजूद गांधी परिवार को अपने राजनीतिक घर में समर्थन नहीं मिला। अमेठी, रायबरेली और सुल्तानपुर संसदीय क्षेत्रों के चुनाव नतीजे गांधी परिवार के लिए भले ही चौंकाने वाले हों पर इसके संकेत चुनाव के दौरान ही मिलने लगे थे। इस बार प्रियंका दीदी को लोगों ने चुपचाप नहीं सुना। उनसे सवाल भी किए। लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि इन तीनों क्षेत्रों जो कुछ खराब है उसके लिए केवल विधायक जिम्मेदार हैं, सांसदों की कोई जिम्मेदारी नहीं है। अमेठी और रायबरेली दो ऐसे चुनाव क्षेत्र हैं जिनका प्रतिनिधित्व फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी और अब सोनिया व राहुल गांधी कर रहे हैं। फिर भी इनकी हालत उत्तर प्रदेश के दूसरे चुनाव क्षेत्रों से बहुत अच्छी नहीं है। देश में दो तरह के निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं। एक जो अपने चुनाव क्षेत्र के विकास के लिए अपनी क्षमता से अधिक प्रयास करते हैं और दूसरे जो निर्वाचन क्षेत्र के विकास के बजाय प्रतीकों और नारों की राजनीति से लोगों को संतुष्ट रखना चाहते हैं। गांधी-नेहरू परिवार दूसरी श्रेणी में आता है। यह परिवार गरीबी और गरीबों को सहेजकर रखता है। जवाहर लाल नेहरू सत्रह साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे और इस दैरान उनका चुनाव क्षेत्र फूलपुर रहा। राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव अभियान की शुरुआत फूलपुर से की। इस उम्मीद में कि लोगों को नेहरू की याद आ जाएगी। वह यह भूल गए कि नेहरू के साथ ही लोगों को क्षेत्र की बदहाली भी याद रहेगी। राहुल गांधी ने गरीबी नहीं देखी है। उनके लिए गरीबी कौतूहल का विषय है। दलित की झोपड़ी में रात बिताना उनके लिए वैसा ही एडवेंचर है जैसा उस दलित के लिए किसी पांच सितारा होटल में रात बिताना। दोनों के जीवन की यह हकीकत नहीं है। राहुल गांधी के सलाहकारों को लगता है कि दलित की झोपड़ी में रात बिताना कृष्ण का सुदामा के घर जाने जैसा है। फर्क यह है कि दलित सुदामा की तरह अभिभूत नहीं हुए क्योंकि दोनों में कोई सखा भाव नहीं है। और यह राजा-महाराजाओं का दौर नहीं है कि राजा को अपनी कुटिया में देखकर प्रजा धन्य-धन्य हो जाए। राहुल गांधी के लिए गरीब के झोपड़े में जाना पर्यटन का एक नया स्वरूप है। जनवरी 2009 में ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड भारत आए थे। राहुल गांधी उन्हें अमेठी ले गए। यह दिखाने को कि ग्रामीण भारत में लोग क्या कर रहे हैं। अमेठी में मिलीबैंड ने एक गरीब के घर रात गुजारी। खबर पढ़कर मैं कई दिन तक सोचता रहा कि राहुल गांधी ने आखिर ऐसा क्यों किया? क्या यह दिखाने के लिए कि देखो, मुझसे पहले जिस चुनाव क्षेत्र (अमेठी) का प्रतिनिधित्व मेरे चाचा, पिता और मेरी मां कर चुकी हैं उसकी गरीबी हमने खत्म नहीं होने दी है। गांधी परिवार का करिश्मा पंजाब में भी नहीं चला। जहां हर चुनाव में सरकार बदलने के इतिहास को झुठलाते हुए मतदाता ने अकाली दल और भाजपा गठबंधन को फिर सत्ता सौंप दी। गोवा में भाजपा और उसके ईसाई उम्मीदवारों की जीत का क्या अर्थ निकाला जाए? सोनिया गांधी के पार्टी की कमान थामने के बाद से ऐसा होता रहा है कि पार्टी में किसी मुद्दे या नेता को लेकर कोई भी विवाद उनके फैसले के साथ ही खत्म हो जाता था। उत्तराखंड में पहली बार ऐसा हुआ कि सोनिया गांधी के तय करने के बाद बगावत शुरू हुई। हाईकमान के सामने लोग झुके नहीं अपनी प्रतिष्ठा (विजय बहुगुणा) बचाने के लिए हाई कमान को झुकना पड़ा। करिश्मा और इकबाल कायम रखने के लिए जरूरी है कि नेतृत्व सबको समान अवसर दे और न्याय करते हुए दिखे। राजनीति में कार्यकर्ता और नेता का संबंध परस्पर सहजीवी का होता है। जब रेवड़ी बांटने के समय नेता अंधे की तरह व्यवहार करने लगे तो उसके पद का इकबाल चला जाता है और कार्यकर्ता की नजर में उसका कद भी घट जाता है। उत्तर प्रदेश में पार्टी की हार के बाद सोनिया गांधी ने कहा कि प्रत्याशियों के चयन में गलती और नेताओं की अधिकता के कारण पार्टी की हार हुई। सवाल है कि उनका चयन किसने किया? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? दूसरों की तरफ उंगली उठाते समय सोनिया गांधी भूल गईं कि चार उंगलियां उनकी तरफ भी उठी हुई हैं। राहुल गांधी जब उत्तर प्रदेश में रैली दर रैली बोल रहे थे कि हाथी पैसा खाता है तो लोगों को अपेक्षा थी कि केंद्र में पैसा खाने वालों के बारे में भी वह अपने विचारों का इजहार करेंगे। भारतीय राजनीति में यह हाईकमान संस्कृति के क्षरण का दौर है। सिर्फ पद के आधार पर रसूख का दौर खत्म हो रहा है। गांधी परिवार अब चुनाव में वोट की गारंटी नहीं है। अमेठी और रायबरेली में भी नहीं। चुनाव के बाद भी उसके फैसलों पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार :- दैनिक जागरण

पवित्रात्मा नेता और नास्तिक जनता !

पवित्रात्मा नेता और नास्तिक जनता !

संसद एक मंदिर है ठीक वैसे ही जैसे मथुरा में श्री कृष्ण का और अवध में श्री राम का. अरे! जब
आपश्री राम और कृष्ण का आदर करते हो ,उनके श्री चरणों में शीश झुकाते हो ,बड़े ही ध्यान से
उनका नाम जप करते हो ,और उनके हर फैसले को करनी का फल मानकर स्वीकार कर लेते हो
तो फिर संसद के अन्दर विराजमान पवित्रात्मा का सम्मान क्यों नहीं करते हो ? इन पवित्रात्माओ
की लीला पर टीका टिप्पणी करना अक्षम्य अपराध है ! इनका हर फैसला उचित ही होता है उसे
सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिये क्योंकि विधि की रचना विधाता करता है या फिर ये साक्षात
पवित्रात्मा .

    जैसे पवित्र तीर्थो का सेवन करने से आत्मा प्रसन्न हो जाती है .तीर्थो की भूमि की रज मात्र से पाप
धुल जाते हैं ठीक वैसे ही इन साक्षात पवित्रात्मा के दर्शन का भी असीम फल है ,इन पवित्रात्मा की
जिस पर भी ठंडी नजर पड़ जाती है उसके वारे न्यारे हो जाते हैं ,पैदल चलने वाला फटीचर इनकी
कृपा से मोटर कार में घुमने वाला बन जाता है .कंगले भी इनकी कृपा से लक्ष्मीवान हो जाते हैं .

   भगवान् और इनके चरित्र में भी विशेष समानता है .जिस तरह भगवान् को भी अपना नाम जपने
वाला अतिप्रिय है उसी प्रकार इन्हें भी चापलूस पसंद है ,जिस प्रकार भगवान् को हरिजस गाने वाले
प्रिय हैं उसी प्रकार इन्हें भी अपना चालीसा -पुराण ,कीर्ति गाथा गाने वाला पसंद है ,जिस प्रकार प्रभु
को कानून थोपना पसंद है उसी प्रकार इन्हें भी यही पसंद है ,जिस प्रकार भगवान् नास्तिकों पर
क्रूरता दिखाते हैं उसी प्रकार ये भी इनके खिलाफ आवाज उठाने वाले बन्दों  पर क्रूरता बरसाते हैं .

     जब हम माखन चुराने वाले चोर को आदर दे सकते हैं , पल-पल छल करने वाले छलिया का
 गुणगान गा सकते हैं ,दौ भाईयो के युद्ध को रोकने की बजाय अवश्यम्भावी बना देने वाले को हम
पूज्य कह सकते हैं ,हजारो रानियों के साथ रहने वाले को मायापति कह सकते हैं तो फिर इन
पवित्रात्माओ को आदर क्यों नहीं दे सकते हैं? 
चोर कन्हेया भी थे और ये भी ,छल वो भी करते थे और ये भी ,महाभारत चक्रधारी ने भी होने दिया
और ये भी हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख इसाई में छ्मकले करवाते रहते हैं ,वो महारसिक था तो ये भी
रसिकहैं मंदिर के आसन पर बैठकर लीला देखते हैं किसी  भी कोण से बाँके से कम नहीं है दो अंगुल
बढ़कर ही हैं उस कालिया से, मगर फिर भी इनको आदर नहीं देना इनके साथ न्याय नहीं है.

     भगवान् के समकक्ष इन पवित्रात्मा के खिलाफ करोडो सिरफिरे पैदा हो गये इनके इन्द्रासन को
चुनोती देने लग गये .इनकी रासलीला के चटकारे लेने लग गये .इन पवित्रात्मा की बैचेनी जायज है
अगर देश की जनता का इनसे मोहभंग तेजी से इसी तरह होता रहा तो इनकी अर्चना और पूजा का
स्वरूप बदल कर रोद्र ना बन जाए ,महा आरती ना उतार दे बागी भगत !

   स्तुति और वन्दना के समकक्ष ये पवित्रात्मा जो भी लीला करते हैं उस लीला में अचानक अवरोध
 उत्पन्न करने वाले विद्रोही भगतो का टोकना इन्हें बुरा लगता है.कन्हेया की लीला में सुदर्शन का
कमाल था तो इन पवित्रात्मा की लीला में वोट का कमाल है .

    जिस तरह पापी अपने को गंगा स्नान से पवित्र करता है ,चोर उचक्का प्रभु मंदिर में जाकर दोष
मार्जन करता है ,धूर्त ठग दान दक्षिणा करके धन को शुद्ध करता है ठीक उसी प्रकार ये भी अपने को
शुद्धोत्तम मान चुके हैं क्योंकि ये भी चुनावी वेतरनी पार करके  मंदिर में बैठे हैं .इन्हें अपराधी
मानने और कहने से गरिमा भंग होती है .जैसे तुलसी अपने जीवन में काम लोलुप रहे थे मगर राम 
चरित्र लिखने के बाद आदरणीय बन गये ,परम साधू हो गये .जब तुलसी को आदर से याद किया 
जाता है तो इन पवित्रात्मा को भी पवित्र मान लेना चाहिए,आखिर ये भी जनता से चुनकर भेजे
गये हैं .

   संसद में विराजमान पवित्रात्मा आज सच के अदने से व्यक्ति से, हर उस आदमी से परेशान है
जो अंधे को अँधा कहता है ,काणे को काणा कहता है .देश में नास्तिक बढ़ते जा रहे हैं जो इनमे
अश्रद्धा रखते हैं . इन सब पवित्रात्मा को संगठित होकर देश के नास्तिको पर वार करना चाहिये.


                    

27.3.12

खुदा कहाँ मौजूद हैं....?





आखिर खुदा कहाँ बसता हैं बस इसी बात का बन्दे को इल्म नहीं होता हाँ वो ये जरूर मानता हैं की खुदा कहीं न कहीं उसके आस पास मौजूद जरूर रहता हैं  जो उसकी हर मुश्किल में उसे मुश्किलों से निजाद दिलाता हैं. ऐसे में हमारे कुछ शायरों का क्या कहना हैं आप ही सुनिए उनकी जुबानी....



सबसे पहले पेश हैं मिर्ज़ा ग़ालिब साहब  की जुबानी उनकी शायरी...

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर,
या वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं..

वहीँ अल्लामा इकबाल साहब क्या कहते है ये रही उनकी शायरी...

मस्जिद खुदा का घर है, पीने की जगह नहीं,
काफिर के दिल में जा, वहां खुदा नहीं..

अब सुनिए अहमद फ़राज़ साहब की शायरी उनकी जुबानी...

काफिर के दिल से आया हूँ में यह देख कर,
खुदा मौजूद है वहां, पर उसे पता नहीं..


अब आप ही बताईये खुदा कहाँ मौजूद हैं....?
यूँ तो लोग भी कहते है और में भी मानता हूँ की खुदा हमारे दिल में बसता हैं. पर फिर भी इस बात पर उस वक़्त थोडा सा शक या डर कहूँ, होता हैं जब हम मुश्किलों में घिरे हो और अपने खुदा को को याद कर रहे हों. लेकिन अंत में सब कुछ फिर से ठीक हो जाता है और फिर हम उसी खुदा का धन्यवाद करते हैं.



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26.3.12

श्रद्धेय श्रीयुत श्रीवल्लभजी शर्मा को कोटि कोटि नमन


       
अभी-अभी श्रद्धेय श्रीयुत श्रीवल्लभजी शर्मा, इंदौर महानगर-निगम के पूर्व महापौर एवं पूर्व विधायक , भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता एवं प्रखर प्रवक्ता , वरिष्ठ समाज सेवी एवं विप्र समाज के उन्नायक , खांडल विप्र महासभा के पूर्व कार्याध्यक्ष , संरक्षक एवं जननेता के  आज  दिनांक २६-०३-२०१२ को ब्रह्म्लीन होने की जानकारी मिली ! अप्रत्याशित तो नहीं पर बेहद ह्रदय-विदारक अवश्य है ! काफी अरसे से  श्रद्धेय  पंडितजी अस्वस्थ ही चल रहे थे पर उनका होना अपने आप में संबल देता था ! शायद  इसी भावना से वो अब तक हमारे बीच थे ! अपनी धर्मपत्नी विदुषी श्रीमती सीता देवी के १४-०१-२०१२ को  परलोकगमन से  शिव समान व्यामोह ही उन्हें हमसे दूर ले गया ! इस देदीप्यमान नक्षत्र के अस्त होने से खांडल विप्र समाज की तो गहन क्षति हुई है जिसकी निकट भविष्य मै सम्पूर्ति असम्भव है ! इनकी यशोमई जीवनगाथा दीर्घावधि तक मानव-मात्र के मार्ग को प्रकाशित करती रहेगी !   श्रधेय पंडितजी अपने आचार-विचार-व्यवहार-दर्शन-ज्ञान और इन सबसे अर्जित यश-कीर्ति के साथ सदैव हमारे मार्गदृष्टा - पथप्रदर्शक रहेगे ! मेरा और उनका बहुत ही स्नेह-सम्मान का रिश्ता था ! राजनीति की असीम ऊँचाइयों के बीच से जब १९८२ में जोधपुर महाधिवेशन के समय और उसके बाद कार्यसमिति-सदस्य , कार्याध्यक्ष और महासभा संरक्षक रहते हुवे उन्होंने समाज सेवा के नए आयाम स्थापित किये ! अपनी अस्वस्थता के बावजूद कुछ वर्ष पहले दायें-बाएं चलती महासभा को पटरी पर लाने के लिए इंदौर मै आहूत बैठक और उनके प्रयास स्तुत्य थे ! आज श्रधेय पंडितजी का हमारे बीच से चले जाना एक अपूर्णीय क्षति है !  परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है की इस देवात्मा को अपनी चरण-शरण में चिरस्थाई शांति एवं सद्गति प्रदान करे तथा शोक संतप्त स्वकीय जन को इस असह्य वेदना को सहने की असीम शक्ति  और उनके आदर्शो पर चलने की इच्छाशक्ति  प्रदान करे !   ब्रह्म्लीन महामनस्वी को शत-शत  नमन I    
'विप्र सेतु' एवं 'कलियुग संजीवनी' परिवार की और से विनीत श्रुधांजलि -शब्दांजलि-पुष्पांजलि समर्पित है ! 
हीरालाल सेवदा 
संपादक 'विप्र सेतु' 'कलियुग संजीवनी'                                       
संरक्षक अखिल भारतवर्षीय श्री खांडल विप्र महासभा                 
संस्थापक  महासचिव वरिष्ठ नागरिक समिति 

plitical dairy of seoni disst. of M.P.

बेचारे किसानों के लिये नेता तो सभी परेशान हैं लेकिन पिछले साल से ज्यादा कुछ मिलने की संभावना नहीं हैं

जिले में भी सपा ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने पर जिला अस्पताल में मरीजों को फल वितरण करके राजनैतिक पटल पर लंबे अर्से बाद अपनी उपस्थिति दर्ज की हैं। सपा,बसपा और गौगपा तीसरी पारी खेलने के लिये बेताब भाजपा के लिये संजीवनी का काम कर सकती हैं। भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के आदिवासी नेता फग्गनसिंह कुलस्ते के राज्यसभा के लियेे निर्विरोध निर्वाचित हो जाने से भाजपा के राजनैतिक समीकरणों में बदलाव आने की संभावनायें व्यक्त की जा रहीं हैं। अब जिले के तीन सांसद हो गये हैं लेकिन यदि कुलस्ते सिर्फ इन दो रेल परियोजनाओं को ही गति दिलवा दें तो जिले के विकास में उनका यह योगदान मील का पत्थर साबित हो सकता हैं। गेहूं खरीदी की मात्रा को लेकर राजनीति का खेल तेजी से जारी हैं। सबसे पहले जिला पंचायत के उपाध्यक्ष इंका नेता अनिल चौरसिया ने फिर विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह और अब वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिह बिसेन ने किसानों की चिंता की हैं। सूखी और सिंचिंत दोनों ही किस्म की खेती करने वाले किसानों से सरकार एक ही मानक स्तर पर खरीदी करेगी जो किसानों के हित में होगा या बिचौलियों के हित में? यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

यू.पी.की जीत से सपां में उत्साह-उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों से समाजवादी पार्टी में उत्साह का वातावरण बन गया है। जिले में भी सपा ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने पर जिला अस्पताल में मरीजों को फल वितरण करके राजनैतिक पटल पर लंबे अर्से बाद अपनी उपस्थिति दर्ज की हैं। प्रदेश में इंका और भाजपा के अनावा और कोई राजनैतिक विकल्प ना होने के कारण इन दलों की सक्रियता के अलावा किसी भी अन्य पार्टी की सक्रियता नहीं के बराबर हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के हाल ही के चुनावों में सपा को मिली सफलता ने प्रदेश में भी राजनैतिक उम्मीदें जगा दी हैं। अब यह आगे सपा की राजनैतिक गतिविधियों पर ही निर्भर करेगा कि वे प्रदेश के राजनैतिक पटल पर अपनी कितनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा पातें हैं। वैसे इसके लिये आवयक संगठनात्मक ढ़ांचा अभी वैसा मजबूत नहीं है जैसा कि जरूरी है। सपा,बसपा और गौगपा तीसरी पारी खेलने के लिये बेताब भाजपा के लिये संजीवनी का काम कर सकती हैं।

अब तीन तीन सांसद हो गये हैं जिले में-भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के आदिवासी नेता फग्गनसिंह कुलस्ते के राज्यसभा के लियेे निर्विरोध निर्वाचित हो जाने से भाजपा के राजनैतिक समीकरणों में बदलाव आने की संभावनायें व्यक्त की जा रहीं हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते पहले तो वोट फार नोट के मामले में संकंट में फंसे थे और उसके बाद पिछले लोस चुनाव में वे इंका के बसोरी सिंह मसराम से चुनाव हार गये थे। उनके चुनाव परिणाम का सबसे रोचक तथ्य यह था कि वे लोकसभा क्षेत्र में आने वाले केवलारी और गोटेगांव क्षेत्र से चुनाव जीत गये थे जहां से कांग्रेस के हरवंश सिंह और नर्मदा प्रजापति विधायक हैं लेकिन शेष सभी उन छः क्षेत्रों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था जहां भाजपा के विधायक थे। कुलस्ते के दोबारा सांसद बन जाने से जिले की राजनीति में भी प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही हैं क्योंकि जिले की लखनादौन और केवलारी सीटें मंड़ला संसदीय क्षेत्र में ही आती हैं। इनमें केवलारी विस क्षेत्र ऐसा हैं जो कि इंका और भाजपा दोनों की राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करता हैं। पिछले अठारह सालों का इतिहास यह बताता है कि इंका भाजपा का तालमेल जिले के अन्य क्षेत्रों का राजनैतिक भविष्य तय करता हैं। इसमें कोई शक नहीं हैं कि कुलस्ते एक कद्दावर नेता है और राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य में भी उनकी प्रभावशाली उपस्थिति हैं। कुलस्ते की यह उपलब्धि इंका सांसद बसोरी सिंह के लिये परेशानी का सबब बन सकती हैं। लेकिन कुलस्ते के राजनैतिक कद का जिले को कोई लाभ होगा या नहीं ? यह अभी भविष्य की गर्त में हैं। वैसे भी जिले की फोर लेन, छिंदवाड़ा सिवनी नैनपुर गेज परिवर्तन और रामटेक गोटेगांव नई रेल परियोजना जैसी कई महत्वाकांक्षी विकास योजनायें दबंग राजनैतिक व्यक्तित्व के आभाव में अधूरी पड़ी हैं। रामटेक गोटेगांव रेल लाइन में भी गोटेगांव से लेकर छपारा तक का एक लंबा हिस्सा मंड़ला लोकसभा क्षेत्र में ही आता हैं। इसके अलावा कलबोड़ी से लेकर खवासा तक का हिस्सा बरघाट विस क्षेत्र में आता हैं जहां से उनके रिश्तेदार कमल मर्सकोले भाजपा के विधायक हैं। इसी तरह भोमा से लेकर मंड़ला फोर्ट तक का हिस्सा भी मंड़ला क्षेत्र में आता हैं जो कि गेज परिवर्तन की राह तक रहा हैं। वैसे कहने को तो अब जिले के तीन सांसद हो गये हैं लेकिन यदि कुलस्ते सिर्फ इन दो रेल परियोजनाओं को ही गति दिलवा दें तो जिले के विकास में उनका यह योगदान मील का पत्थर साबित हो सकता हैं।

गेहूं खरीदी केी मात्रा पर नेताओं में मचा घमासान -गेहूं खरीदी की मात्रा को लेकर राजनीति का खेल तेजी से जारी हैं। सबसे पहले जिला पंचायत के उपाध्यक्ष इंका नेता अनिल चौरसिया ने फिर विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह और अब वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिह बिसेन ने किसानों की चिंता की हैं। अनिल चौरसिया ने प्रति हेक्टेयर खरदी के लिये निर्धारित गेहूं की मात्रा पर आपत्ति उठायी थीं। फिर जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह ने 20 मार्च को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज करायी और कहा कि सरकार प्रति हेक्टेयर 30 क्विंटल गेहूं खरीदी का निर्णय ले। आपने यह भी उल्लेख किया कि पिछले वर्ष सरकार ने केवलारी मंड़ी में 35 एवं पलारी उप मंड़ी में 45 क्वि. प्रति हेक्टे. गेहूं खरीदा था किन्तु फिर भी पूरा गेहूं नहीं खरीदा जा सका था। अपने इसी पत्र में हरवंश सिंह ने यह भी लिखा था कि इस साल पानी अच्छा गिरा हैं इसलिये गेहूं की अच्छी फसल आयेगी। इस पत्र के आकड़ें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं। जब 35 और 45 क्वि. खरीदी के बाद भी पूरा गेहूं ना ले पाने की बात कही गयी है तो फिर ऐसा क्याकारण हैं कि एक विपक्ष के विधायक होने के बाद भी उन्होंने सिर्फ तीस क्वि. खरीदी को मांग क्यों उठायी ? क्या ऐसा तो नहीं कि सरकार तीस क्वि. के आदेश जारी करने जा रही हो और यह बात उन्हें पता लग गयी हो इसलिये ऐसा किया गया? या अपने ही पत्र के विरोधाभास का वे ध्यान नहीं रख पाये? बात जो कुछ भी हो लेकिन तीन दिन बाद ही उनका एक दूसरा पत्र मीडिया को जारी किया गया जिसमें असंिचत में 30 और सिंचिंत में 45 क्वि. प्रति हेक्टेयर की मांग फिर से उठायी गयी हैं। असिंचिेत जमीन में एक हेक्टेयर में तीस क्वि. गेहूं पैदा होने की बात पर भी किसान यह कहने से नहीं चूक रहें हैं कि ऐसी खेती खेतों में तो नहीं लेकिन कागजों पर जरूर हो सकती हैं जो कि कालेधन सफेद धन में बदलने के लिये चंद लोग किया करते हैं। इसके बाद प्रदेश के वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने एक बयान जारी कर किसानों से चिंता ना करने की बात कही और यह विश्वास दिलाया कि पिछले वर्ष के समान ही इस साल भी खरीदी की जायेगी। सरकार जल्दी ही संशोधित आदेश जारी कर देगी। यहां यह विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं कि पिछले वर्ष बाद में संशोधित आदेश के अनुसार प्रदेश सरकार ने 35 से 45 क्वि. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खरीदी की थी जिसमें सिंचिंत और असचिंत भूमि के लिये कोई अलग से मानदंड़ तय नहीं किये गये थे। जबकि इस साल प्रदेश सरकार ने सिर्फ 16.5 क्वि. प्रति हेक्टे. के हिसाब से खरीदी करने के आदेश दिये हैं। जिले के बेचारे किसानों के लिये सभी नेता तो परेशान है लेकिन अंतिम तौर पर बाद में बस इतना ही होने की संभावना दिख रही हैं कि पिछले साल के हिसाब से ही खरीदी हो सकेगी। याने पर्याप्त पानी गिरने के बाद अच्छी फसल होने की संभावना के बाद भी किसान से सरकार एक क्विंटल भी अधिक गेहूं नहीं खरीदेगी। सूखी और सिंचिंत दोनों ही किस्म की खेती करने वाले किसानों से सरकार एक ही मानक स्तर पर खरीदी करेगी जो किसानों के हित में होगा या बिचौलियों के हित में? यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

क्या बीजेपी विपक्ष की भूमिका के साथ न्याय कर पा रही है?


राजनैतिक झंझावातों के दौर में विपक्ष की भूमिका और उसकी कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विपक्ष अपनी रणनीतियों द्वारा सत्ता की जन विरोधी नीतियों को प्रहारात्मक रूप से रोकने की कोशिश करता है, साथ ही सत्ता को हर समय एक चेतावनी देने की मुद्रा में रहता है ताकि वह कभी भी ऐसे फैसलों को अंजाम ना दे सके, जिससे लोगों का जीना दूभर हो जाए।
यकीनन काफी लंबे समय से भारत में एक सशक्त विपक्ष की अनुपस्थिति देखी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी, जिसे विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करने का दायित्व सौंपा गया है, उसकी स्थिति इस परिप्रेक्ष्य में लाचार, बेबस विपक्ष की रही है जो सत्ता पक्ष के अनुग्रह और कृपा की आकांक्षी ही अधिक दिखती रही है।
विपक्ष की स्थिति और भूमिका में बीजेपी को लेकर अनेक राजनैतिक विश्लेषकों और आम जन का कहना है कि बीजेपी जिसे पूर्ण रूप से अपने दायित्वों को समझना चाहिए था, शायद वह अपनी हैसियत समझ ही नहीं पाई है। किसी भी मुद्दे पर उसकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है जैसे उसकी ही जान सांसत में हो। महंगाई, भ्रष्टाचार, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों का बढ़ना, काले धन और सब्सिडी का मुद्दा हो या फिर किन्हीं विशिष्ट राजनैतिक बदलावों का मामला हो, सभी में पार्टी की कमजोर और लापरवाह स्थिति दिखाई देती है।
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रिश्तों की आग बुझाने बैठे हो तुम


दोपहर में बुझा-बुझा सा है सूरज आज।
देखा जब, टूटा दीपक का ख्वाब आज।

कल अंधियारा सौंपा था उसने मुझको,
और पराया हुआ अपना ही साया आज।

रिश्तों की आग बुझाने बैठे हो तुम,
मैंनें इक चिंगारी सुलगाई  है आज।

कुछ दूरी थी अन्तर्मन की, करीब मैं आया,
मंजिल भूला, राह भटका मैं फिर आज।

सौंधी मिट्टी, महकते फूल, चहकते पंछी,
इनमें बस तू ही तू मुझको दिखता है आज।
  •  रविकुमार बाबुल


चित्र : साभार गूगल

अध्यापक पात्रता परीक्षा में गलत क्या है?

हमारे देश को आजाद हुए ६४ वर्ष से अधिक हो गए हैं,हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने पराधीन भारत में स्वतंत्र भारत का जो स्वप्न देखा था,हम उसके आस पास भी नहीं हैं|अपने अधिकारों और कर्तव्यों की कौन कहे,इन ६४ सालों में हम आज तक समग्र साक्षरता के मह्त्वाकांक्षी लक्ष्य को भी हासिल नहीं कर पाए हैं|हालांकि,इतने सालों में हमने अच्छी उपलब्धि हासिल की है और आज साक्षरता के क्षेत्र में हम ब्रिटिश राज के १२ प्रतिशत के आकडें को पार करते हुए २०११ के आंकड़ों के अनुसार ७५.०४ प्रतिशत तक पहुँच गए हैं किन्तु तुलनात्मक दृष्टि से हम आज भी विश्व साक्षरता के औसत (८४ प्रतिशत) से भी लगभग १० अंक निचले पायदान पर स्थित हैं|बात यही पर खत्म नहीं होती है,यदि हम नेपाल,बंगलादेश और पाकिस्तान जैसे संसाधनविहीन देशों को छोड़ दे तो हमारे अन्य पडोसी मसलन चीन,म्यामार,यहाँ तक की श्रीलंका जैसे छोटे देश भी साक्षरता के क्षेत्र में ९० प्रतिशत से ऊपर पहुँच चुके है|ध्यातव्य है की साक्षरता के ये आंकड़े ७ वर्ष से ऊपर आयु वर्ग की जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं|
वास्तव में,इसके मूल में अंग्रेजों द्वारा स्थापित वह दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है,जिससे हम आज तक नहीं उबर पाए हैं|अंग्रेजों ने शिक्षा के क्षेत्र में अधोमुख निस्यन्दन की वह प्रक्रिया विकसित की जिसके तहत मिशनरी स्कूलों से शिक्षा प्राप्त व्यक्ति हमारी समग्र शिक्षा व्यवस्था का नियामक बन बैठा|शिक्षा में भारतीयता और राष्ट्रवाद के तत्वों को एक निहित उद्देश्य के चलते धीरे धीरे सीमित किया गया और आज वह पूरी तरह से विलुप्त हो गया है|हमारे शिक्षालयों में संसाधनों का भारी अभाव है और योग्य शिक्षकों की कमी है|हम योजना दर योजना मूल्य आधारित,गुणवत्तापरक और सामूहिक शिक्षा की बात करते तो हैं किन्तु जब इन्हें अमली जामा पहनाने का वक्त आता है तो हम बजट की कमी का रोना रोने लगते हैं|राज्य, केन्द्र पर दोषारोपण करता है और केन्द्र सरकार राज्यों को दोषी ठहराने लगती है|यह बात सर्वविदित है की जब तक विद्यालयों में योग्य शिक्षक नहीं होंगे,सर्व शिक्षा अभियान के मह्त्वाकांक्षी उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता और यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम यह मान कर चलते हैं की ६ से १४ वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए क्योंकि उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने १९९३ में यह स्पष्ट किया था की १४ साल तक के समस्त बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना एक मौलिक अधिकार है यद्यपि यह राज्य पर निर्भर करता है की वह इस बाध्यकारी व्यवस्था को कैसे लागू करती है?
यह १८३५ में लार्ड मैकाले द्वारा स्थापित मात्र अंग्रेजी शिक्षण की वह व्यवस्था नहीं है जिसका एकमात्र उद्देश्य लिपिकों की एक फ़ौज खड़ी करना हो और जिसके द्वारा भारत सरकार अपने प्रशासनिक उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए मानव संसाधन विकसित करने के स्थान पर न्यूनतम साक्षरता हासिल करने के उद्देश्य तक ही सीमित रहे बल्कि अनिवार्य शिक्षा क़ानून का आशय ६ से १४ वर्ष की आयु वर्ग तक के बच्चों में उनके विकास क्रम के अनुसार उनके बौद्धिक,शारीरिक,मानसिक,नैतिक और वैज्ञानिक जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान कर उनके अंदर एक वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि विकसित करना है और जब शिक्षा के क्षेत्र में इन दूरगामी उद्देश्यों की पूर्ति करना है तो योग्य शिक्षकों का होना अपरिहार्य है लिहाजा योग्य शिक्षकों के चयन का मानक मात्र प्रशिक्षण का प्रमाणपत्र पाना ही नहीं होना चाहिए|इन्हीं सब उद्देश्यों को केन्द्र में रखते हुए केन्द्र सरकार ने १७ अगस्त १९९५ को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का गठन किया|इससे पहले राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद के अंतर्गत अधीनस्थ के रूप में कार्य कर रही थी और १९७३ से लेकर १९९५ तक इसका कार्य मात्र राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद को विविध मसलों पर सलाह देने तक ही सीमित था|१९८६ के राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात का स्पष्ट रूप से अनुभव किया गया की विभिन्न बोर्डों में न सिर्फ योग्य अध्यापकों की भारी कमी है वरन उनके पाठ्यक्रमों में भी पर्याप्त भिन्नता है|देश के अनेक राज्यों में प्राथमिक शिक्षा का अधिकाँश भार इंटर उत्तीर्ण अथवा कहीं कहीं हाई स्कूल उत्तीर्ण ऐसे अप्रक्षित अध्यापक वहन कर रहे हैं, जिन्हें न तो बाल मनोविज्ञान की सम्यक जानकारी है और न ही वे शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले नवाचारों से परिचित हैं|
वर्तमान में भारत शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का मात्र ४.१ फीसदी व्यय कर रहा है जो आगे बढ़ कर लगभग ६ फीसदी होने का अनुमान है|इसका यह साफ़ अर्थ है, हमें बड़ी मात्रा में शिक्षक चाहिए और ऐसे शिक्षक चाहिए जो वैश्विक मानदंडों पर खरे उतरते हो|हम जानते हैं की शिक्षा के क्षेत्र में निर्मित पिछली समस्त योजनाएं नाकारा साबित हो चुकी हैं और यह स्थिति तब है जब केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ साथ हमारे देश को शिक्षित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं और वे हमारे देश को अकेले शिक्षा के मद में प्रतिवर्ष करोड़ो,अरबों रुपये अनुदान अथवा ऋण के रूप में उपलब्ध करवाती हैं|२००८-०९ के आंकड़े बताते हैं की प्राथमिक शिक्षा के शेत्र में समस्त भारत में प्रति ३२ विद्यार्थी पर १ शिक्षक उपलब्ध है, देश के १४६ जिले ऐसे हैं जहाँ ४० विद्यार्थियों पर १ शिक्षक उपलब्ध है और यदि इन आकडों में दूर दराज के ग्रामीण अंचलों को भी शामिल कर लिया जाए तो अनेक ऐसे विद्यालय हैं जहाँ १०० विद्यार्थियों पर मात्र एक शिक्षक की उपलब्धता है और वह भी अप्रशिक्षित होने के साथ ही प्राथमिक शिक्षा के लिए नितांत अयोग्य है|उत्तर प्रदेश के समस्त प्राथमिक विद्यालयों के १२.०८ प्रतिशत और बिहार के ११.९० प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षक छात्र अनुपात १०० से भी ऊपर है|आंध्र प्रदेश,अरुणांचल,दिल्ली,हिमाचल,कर्नाटक,केरल,महाराष्ट्र जैसे १४ राज्य ऐसे हैं जहाँ १०० से ऊपर अनुपात वाले विद्यालय .५ प्रतिशत से भी कम हैं और उच्च साक्षरता दर के रूप में इनका परिणाम हमारे सामने है|उत्तर प्रदेश और बिहार में प्राथमिक शिक्षा बस राम भरोसे ही चल रही है क्योंकि इन दो राज्यों में प्राथमिक शिक्षा का सम्पूर्ण राजनीतिकरण हो चूका है|राज्य के परिषदीय विद्यालयों में ग्राम प्रधानों और सभासदों का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है क्योंकि इंटर अथवा स्नातक शिक्षा मित्र ग्राम प्रधानों तथा सभासदों द्वारा अनुचित तरीके से चुने जाते हैं और इनके संपर्क बेसिक शिक्षा अधिकारी तक से होने के कारण मिड डे मील योजना में भारी उलट फेर करते हुए पाए जाते हैं|
आज स्थिति यह है की पूरे देश में केवल नाम मात्र की शिक्षा दी जा रही है|वास्तविकता यह है की भारत में शिक्षा को मटियामेट करने का कार्य तब से प्रारम्भ हुआ जब से प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में संविदा के आधार पर उन लोगों को शिक्षक बना कर नियुक्त किया जाने लगा जो खुद भी इंटर पास नहीं कर सके थे|उदहारण के लिए पश्चिम बंगाल और असं जैसे राज्यों में कोई भी कक्षा १० उत्तीर्ण व्यक्ति बिना किसी प्रशिक्षण के प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापन का कार्य कर सकता है|फलस्वरूप,आकडें बताते हैं की आज भी हमारे देश के विद्यालयों में लगभग ६ लाख शिक्षक ऐसे हैं जिनमें न्यूनतम शैक्षिक अभिरुचि ही नहीं है|जो या तो अयोग्य है अथवा अप्रशिक्षित हैं|
इन्ही सब समस्यायों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने राष्ट्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा का विचार किया और २०११ में प्रथम अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित की|इस परीक्षा को अध्यापक चयन हेतु बाध्यकारी बनाते हुए यह प्रावधान किया गया की उक्त परीक्षा में न्यूनतम ६० प्रतिशत अंक अर्जित करना अनिवार्य होगा और केन्द्र सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त निजी संस्थानों में भी शिक्षक चयन हेतु इसे आधार बनाया जाना चाहिए|जुलाई २०११ में आयोजित प्रथम पात्रता परीक्षा में लगभग ७ लाख १० हजार अभ्यर्थी सम्मिलित हुए जिनमे से महज ९७,९१९ अभ्यर्थी ही इस परीक्षा में सफल हो सके शेष ८६ प्रतिशत अभ्यर्थी असफल हुए और उन्होंने सम्पूर्ण परीक्षा प्रक्रिया का ही आलोचना करना प्रारम्भ कर दिया|चूँकि रिक्तियों के सापेक्ष सफल होने वाले अभ्यर्थियों की तादाद कम थी अतः यह प्रावधान भी किया गया की राज्य सरकार चाहे तो वह अलग से प्रदेश स्तर पर अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित कर सकती है किन्तु आगे से अध्यापको के चयन का आधार केवल पात्रता परीक्षा ही होगी|प्रारम्भ में कोई भी राज्य राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की इस अवधारणा से सहमत नहीं हुआ और उत्तर प्रदेश में तो इससे मुक्ति पाने के लिए अनेक बार परिषद के मसौदे को ठुकराने की चेष्टा की गयी किन्तु देश हित में परिषद के अड़ियल रवैये के चलते सरकार ने घुटने टेके और आनन फानन में उत्तर प्रदेश अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित की गयी|प्रश्न पत्र का स्वरुप सरलतम रखा गया ताकि अधिक से अधिक लोग इस परीक्षा को पास कर सके और प्रदेश में अनुमानित १ लाख ९० हजार रिक्तियों को आसानी से भरा जा सके| प्रश्न पत्र में लगभग ९० फीसदी प्रश्न शिक्षा मित्रों को प्रशिक्षण हेतु दिए गए अभ्यास पुस्तिकाओं से ही पूछे गए ताकि शिक्षा मित्र भी इसे आसानी से पास कर सके|इसके बावजूद लगभग ५७ प्रतिशत छात्र अनुतीर्ण हुए और इससे मुक्ति हेतु अदालत का दरवाजा खटखटाने लगे|माननीय उच्च न्यायालय ने भी योग्यता के मूल्यांकन की इस प्रणाली में आस्था व्यक्त की और अध्यापक पात्रता परीक्षा के विरुद्ध लंबित तमाम याचिकाओं को प्रथम दृष्टया ही निरस्त कर दिया|अब न्यायालय में पात्रता परीक्षा के विरुद्ध कोई भी दमदार याचिका नहीं है लेकिन पात्रता परीक्षा को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है|
इस विवाद के केन्द्र में पात्रता परीक्षा के आधार पर ७२,८२५ रिक्तियों के भरे जाने हेतु बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा प्रकाशित विज्ञप्ति है|यादव कपिल देव लालबहादुर और राज्य तथा अन्य द्वारा उच्च न्यायालय में दायर याचिका ने पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को आंदोलित कर दिया है|इस याचिका में पात्रता परीक्षा को नहीं बल्कि बेसिक शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा किया गया है|मामला यह है की बेसिक शिक्षा अधिनियम १९७३ के अनुसार प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में चयन हेतु नियुक्ति प्राधिकारी बेसिक शिक्षा अधिकारी होगा और इस बार के विज्ञापन में इस परम्परा को तोडा गया है|स्पष्ट है की याचिका तकनिकी रूप से समस्त प्रक्रिया को उलझाने के निमित्त लायी गयी है और इस याचिका के पीछे संविधान की आंशिक शक्ति भी नहीं है बल्कि इस एक याचिका के कारण पूरे प्रदेश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम का खुल्लम खुल्ला मखौल उडाया जा रहा है और देश का एक अदना सा नागरिक भी इस बात को स्पष्ट रूप से समझता है की न्यायालय मूल अधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक है|अतः,मेरा आंकलन है की माननीय उच्च न्यायालय को इस याचिका को निरस्त कर देना चाहिए और उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के पीछे विधि की शक्ति विद्यमान होने के कारण ऐसा होगा भी|फिर भी इस याचिका ने राज्य में नियुक्तियों के भविष्य को प्रभावित किया है और नियुक्तियों में जितना ही देर होता जा रहा है उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के मन में उतना ही आक्रोश भरता जा रहा है|अकादमिक में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले किन्तु पात्रता परीक्षा में फिसड्डी अभ्यर्थी टीईटी प्राप्तांकों को चयन का आधार बनाये जाने के विरुद्ध हैं किन्तु विविध बोर्डों के मध्य असमानता वाली कसौटी पर खरे न उतरने के कारण राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद भी उनके मांगों और प्रस्तावों को गंभीरता से नहीं ले रहा है|बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकाँश अधिकारी और लगभग ९० फीसदी ब्यूरोक्रेसी टीईटी प्राप्तांकों को चयन का आधार बनाये जाने को न्यायोचित मानती है और शिक्षा के अन्तराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के लिए यह जरूरी भी है|जिस प्रकार एक अयोग्य माली पानी और खाद के प्रयोग से अनभिग्य होने के कारण पूरे बगिया को उजाड कर रख देने का प्रधान कारण बनता है ठीक उसी प्रकार एक अयोग्य शिक्षक समस्त राष्ट्र को उजाड सकता है|अध्यापक पात्रता परीक्षा दूध में से मक्खन निकालने की प्रक्रिया है अतः इसके आधार पर चयन पूरी तरह न्यायसम्मत है और जिस प्रकार ६ से १४ वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा एक मौलिक अधिकार है ठीक उसी प्रकार योग्य शिक्षक द्वारा शिक्षा ग्रहण करना भी उनका मौलिक अधिकार होना चाहिए क्योंकि संविधान द्वारा अनुच्छेद २१ में दिया गया जीवन रक्षा का अधिकार तब तक व्यर्थ है जब तक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक उपकरणों का भी प्रबंध नहीं कर दिया जाता|शिक्षा, जीवन रक्षा के अधिकार का एक अनिवार्य उपकरण है और इस उपकरण का उचित समय पर उचित प्रयोग एक योग्य अध्यापक ही बता सकता है|

25.3.12

सलमान औऱ रीता जोशी 2 लाख करोड के अनाज घोटाले में शामिल

देश के सबसे गरीब राज्य उत्तर प्रदेश में 2 लाख करोड़ रुपये के इस घोटाले में गरीबों के लिए तय अनाज को जानबूझकर और एक प्रक्रिया के तहत खुलेबाजार में देश और विदेश में बेचा गया। यह घोटाला 7 साल तक चला और इसमें 5,000 एफआईआर भी दर्ज हुईं। इस घोटाले में इतनी पारदर्शिता थी की इसे रेलगाडी के माध्यम से देश के दुसरे हिस्सों में भेजवाया गया । जो अनाज गरीबों तक पहुंचना था उसे देश विदेश के खुले बाजारों में बेचा गया । इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में  न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह ओर न्यायमूर्ति एस.सी.चौरसिया की खंडपीठ ने 3 दिसंबर 2010 को अनाज घोटाले के मामले में कहा था कि यदि राज्य सरकार भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमें के लिए तीन महीने में अनुमति नहीं देती है तो उसके लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। खंडपीठ ने सीबीआई को आदेश दिया कि बलिया. लखीमपुरखीरी और सीतापुर के साथ ही वाराणसी, गोंडा तथा राजधानी लखनऊ में भी हुए अनाज घोटाले की जाँच को अपनी जद में लाए।
 प्रर्वतन निदेशालय और केन्द्रीय वित्त मंत्रालय इस बात की जाँच करे कि घोटाले की करोड़ों रुपए की राशि कहाँ गई। खंडपीठ ने केन्द्र सरकार को सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के कानून में संशोधन करने को भी कहा। खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई अधिकारी बाहर का है तो उसके खिलाफ जाँच सी  बी आई करेगी।


                     एक खबर सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त हुई है की सी.बी.आई. नें सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है की  कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और रीता बहुगुणा जोशी को भी अनाज घोटाले अपराधी की तौर पर  शामिल है । 
           कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के द्वारा ज्योंही लखनऊ खंड पीठ नें अपना फैसला 2010 में सुनाया तुरंत इलाहाबाद हाई कोर्ट में उनके एक रिश्तेदार रफत आलम की नियुक्ति प्रधान न्यायाधीश के रूप में कर दी गई जिसके बाद यह मामला इस घोटाले को उठाने वाले याचिकाकर्ता नें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करवा दिया । मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद कानून मंत्री महोदय नें अपने पद का फायदा उठाते हुए अपने एक अन्य रिश्तेदार जावेद अहमद को लखनऊ सी.बी.आई. में ज्वाइंट डायरेक्टर बना कर बैठा दिये जिसके बाद से सी.बी.आई. के वकीलों पर अनावश्यक रूप से इस मामले को निपटाने का या रफा दफा करने के लिये दबाव पडने लगा, जिनमें से कुछ मामले दिल्ली तक पहुंच गये हैं । 
            
           इस मामले को दुसरे नजरिये से देखा जाय तो अनाज घोटाले में मुलायम या समाजवादी पार्टी अथवा कांग्रेस पार्टी किसी भी रूप से जिम्मेदार नही बनती दिखलाई पड रही है इस मामले में शंका जाहिर की जा रही है की उक्त सारा अनाज घोटाला अमर सिंह, सलमान खुर्शीद और रीता बहुगुणा जोशी की मिली भगत से हुआ होगा । इस मामले में जनता मुलायम को या समाजवादी पार्टी को इसलिये जिम्मेदार नही मान रही है क्योंकी उस समय मुलायम से ज्यादा अमर सिंह की चला करती थी । 
           अब देखना यह है की कांग्रेस पार्टी जो कई घोटालों में लिपटी हुई है अपने कानून मंत्री से किस तरह से निपटती है . यदि कांग्रेस मामले के उठते ही सलमान से केवल इस्तीफा ना लेकर उनके खिलाफ कडा बयान जारी करती है तो   गांधी परिवार यू.पी. के दिलों में वापसी की उम्मीदें जगा सकते हैं । 
             
विधान सभा चुनाव के समय राहुल गांधी को अक्सर एक जुमला मुसलमान लोग सुनाते थे की क्या राहुल बाबा हमनें मांगा था मुसलमान और आपने भेज दिया सलमान ...... 
          हकीकत ये है की गांधी परिवार नें अपने ऊपर लगने वाले सारे भ्रष्टाचारों को केवल इसलिये सहन किया है क्योंकी वे इस मामले में लिप्त लोगों को अपने परिवार का हिस्सा समझने की भूल करने लगे थे और उन्हे लगता की ये लोग ऐसा नही कर सकते जबकी हकीकत ये थी की इन लोगों नें देश का पैसा खाकर गांधी परिवार को बदनाम करने के अलावा कुछ नही किये ।    








आलम - रिश्तेदार
सीबीआई. लखनऊ- जावेद अहमद (ज्वाइंट डायरेक्टर)