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23.9.12

गणपति बप्पा मोरिया बोलो ये क्या हो रिया

गणपति बप्पा मोरिया
बोलो ये क्या हो रिया

ऋद्धि-सिद्धि के तुम दातारी
नजर तुम्हारी भी सरकारी
माल दे रहे सिर्फ उन्हीं को
दो नंबर से जिनकी यारी
नजर फेर ली हम जैसों से
चौका --चूल्हा रो रिया

गणपति बप्पा मोरिया
बोलो ये क्या हो रिया

तीन लोक का चक्कर हमने
तेरी तरह जनम भर काटा
हाथ न आई फूटी कौड़ी
कंगाली में गीला आटा
उनकी जेब ठसाठस भारी
अपना बच्चा रो रिया

गणपति बप्पा मोरिया
बोलो ये क्या हो रिया

-कुंवर प्रीतम
23-9-2012


पेड़ लगाओ पैसों का
सत्ताधारी जैसों का
गैस,कोयला खूब डकारो
चाम बनाओ भैंसों का

खद्दर का चोला सिलवाओ
वोटर को दारू पिलवाओ
कुर्सी पर जब आ जाओ
सुर्ख गुलाब सा खिल जाओ
मौका है, दस्तूर भी है
क्या डरना ऐसे-वैसों का

गैस,कोयला खूब डकारो
चाम बनाओ भैंसों का

-कुंवर प्रीतम
23-9-2012
http://www.facebook.com/pchandalia

भूख लगे तो भूखा रह, मत सूखे को सूखा कह


भूख लगे तो भूखा रह
मत सूखे को सूखा कह

दिल्ली का दरबारी बन
सुबह-शाम अखबारी बन
सच बोला तो मर जाएगा
जीना है, जरदारी बन

कलमाड़ी की पूजा कर
जेल है जिसका दूजा घर
टूजी के ब्रह्मा राजा के
पांव धोक ले घर जा कर

रंग बदल गिरगिट जैसे
माल बना किरकिट जैसे
माल बना पर जिक्र न कर
बदनामी की फिक्र न कर

परिवर्तन की बात न कर
अनुमोदन हर बात का कर
सत्यापन कर अपना लेकिन
मूल्यांकन सरकार का न कर

लाख टके की सीख है यह
मान ले वरना भूखा रह।

-कुंवर प्रीतम
23-9-2012

अकर्मण्य और कर्मशील


अकर्मण्य और कर्मशील 

एक पत्थर नदी के बहाव में बहता हुआ समुद्र की चट्टान के पास रुक गया। चट्टान ने उसे
उपहास के भाव से देखा और कहा - मित्र , तू सैंकड़ों मील से पानी के बहाव  के साथ बहता
रहा,पानी में बहते-बहते तू  अपना  यथा रूप भी नही बचा पाया। तू घुड़ता -पड़ता बहता रहा
और लम्बा गोल पिंड जैसा बन गया।मुझे देख मैं बरसों से एक ही जगह ताकत के साथ खड़ी
हूँ और पानी की लहरों से मुकाबला करती हूँ। तू मिलो लम्बी यात्रा करके भी आज तक क्या
कुछ पा सका है?

       छोटे पिंड रूपी पत्थर ने जबाब दिया- यह सच है की मैं पानी के साथ सैंकड़ो मील की
यात्रा करता रहा और अपना मूल स्वरूप भी नही बचा सका लेकिन मुझे ख़ुशी है कि मैं
तेरी तरह एक जगह पड़ा नही रहा।तुम वर्षो से यही पड़ी-पड़ी पानी से टकरा रही हो और
व्यर्थ पानी से टकरा कर अकर्मण्य जीवन गुजार रही हो जबकि मैं पानी के बहाव  के साथ
सदा गतिशील रहा हूँ  तेरी तरह व्यर्थ पानी से टकराता नहीं रहा और अकर्मण्य नही रहा।

  चट्टान छोटे से पत्थर की बात पर उपहास से मुस्करा उठी तभी एक राहगीर उधर से
गुजरा उसने चट्टान के पास पड़े बेलनाकार पिंड रूपी पत्थर को उठाया और उसे चट्टान
पर रख दिया। उस राहगीर ने आस-पास से कुछ फूल इकट्टे किये और श्रद्धा के साथ
उस पिंडी रूपी पत्थर पर अर्पित कर दिए  और उस पिंडी को हाथ जोड़कर उसकी शिव रूप
से स्तुति की और माथे पर चढा कर उसे ले जाने लगा।

  छोटी पिंडी ने चट्टान से कहा -हे निरर्थक चट्टान ,तुझे अब तो समझ आ गया होगा कि
गतिशील रहना कितना आवश्यक है। मेरी पानी के साथ गतिशीलता ने मुझे पूज्य बना
दिया और तेरी अकर्मण्यता के कारण तू सदियों से पानी की थपेड़े खा रही है और खाती
रहेगी।

सार - अकर्मण्य जीवन जीने का कुछ भी महत्व नही है        

22.9.12

बड़ा अजीब पीएम है देश का

प्रधानमंत्री सच कह रहे हैं, किंतु तरीका ठीक नहीं। वे बिल्कुल भी एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह नहीं बोले। न ही एक देश के जिम्मेदार प्रधानमंत्री की तरह ही बोले। वे एक प्रशासक और गैर जनता से कंसर्न ब्यूरोक्रैट की तरह बोले। पैसे पेड़ पर नहीं लगते? 1991 याद है न? महंगी कारों के लिए पैसा है डीजल के लिन नहीं? और सबसे खराब शब्द सिलेंडर जिसे सब्सिडी की जरूरत है वह 6 में काम चला लेता है और गरीबों के लिए कैरोसीन है? अब जरा पीएम साहेब यहां भी नजर डालिए। देश में गरीबों को कैरोसीन मिलता कितना मशक्कत के बाद है और मिलता कितना है यह भी तो सुनिश्चि कीजिए। सिलेंडर जो यूज करते हैं वह 6 में काम चला लेते हैं, तो जनाब क्या यह मान लें कि गरीब कम खाते हैं या फिर मध्यम वर्ग कभी अपनी लाचारी और बेबसी से बाहर ही न आ पाए। सिलेंडर पर अगर आप कर ही रहे हैं कैपिंग तो इसके ऊपर के सिलेंडर एजेंसियों के चंगुल से मुक्त कर दीजिए। पीएम साहब1991 याद दिलाकर देशपर जो अहसान आप जता रहे हैं, वह सिर्फ आपका अकेले का कारनामा नहीं था। और ओपन टू ऑल इकॉनॉमी की ओर तो भारत इंदिरा गांधी के जमाने से बढ़ रहा था। 1991 से पहले जैसे जिंदगी थी ही नहीं? जनाब जरा संभलकर बोला कीजिए। पैसे पेड़ पर नहीं उगते यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी खराब लग सकती है। ममता को रिडिक्यूल कीजिए, जनता को नहीं। यूपीए आप बचा लेंगे मगर साख नहीं बचा पाएंगे। और पैसे तो पेड़ पर नहीं लगते कुछ ऐसा जुमला है जो गरीब या भिखारियों को उस वक्त दिया जाता है जब वे ज्यादा परेशान करते हैं, क्या जनता से पीएम महोदय परेशान हो गए हैं। जब भी किसी विधा का शीर्ष उस विधा का गैर जानकार व्यक्ति बनता है तो उस विधा को एक सदी के बराबर नुकसान होता है। मसलन नॉन आईपीएस को डीजीपी, नॉन जर्नलिस्ट को एडिटर, नॉन एक्टर को फिल्म का मुख्य किरदार बना दिया जाए। वह उद्योग सफर करता है जिसमें ऐसी शीर्ष होते हैं। और हुआ भी यही जब पीएम डॉ. मनमोहन सिंह बनाए गए? - सखाजी

21.9.12

ठीक कहा प्रधानमंत्री जी...पैसे पेड़ पर नहीं लगते


सरकार से ममता की विदाई के बीच सरकार के फैसलों पर सफाई देने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दूरदर्शन में रात आठ बजे प्रकट हुए...तो लोगों को बड़ी उम्मीद थी कि शायद मौनी बाबा की उपाधि पा चुके मनमोहन सिंह का मौन टूटेगा तो शायद वे जनता की हक की बात करेंगे...हिंदी से परहेज करने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने हिंदी में बोलना शुरू किया तो ये उम्मीदें और ज्यादा बढ़ गयीं...लेकिन प्रधानमंत्री का संबोधन एक प्रधानमंत्री का संबोधन न होकर कांग्रेस का घोषणापत्र सरीखा समझ में आया। प्रधानमंत्री सिर्फ वही बोले...जो लगातार पिछले कुछ दिनों सरकार के मंत्री महंगाई और एफडीआई पर सरकार के फैसले के बचाव में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री के संबोधन में इतना नया जरूर था कि प्रधानमंत्री ने लोगों का सामान्य ज्ञान ये कहकर बढ़ा दिया कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते...अरे मनमोहन सिंह साहब आपने तो जनता के मुंह की बात छीन ली...बढ़ती महंगाई से परेशान जनता यही तो आपको बताने की कोशिश कर रही है कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते...इसलिए महंगाई पर काबू करो। पैसे पेड़ पर लगते तो आपको महंगाई बढ़ाने से कौन रोक रहा था...फिर तो आप बस बढ़ाए जाओ...लेकिन साहब ये पैसे एक आम आदमी...एक गरीब आदमी बड़ी मेहनत से कमाता है...मामूली सी कमाई में उसे सारे खर्च वहन करने होते हैं...देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा सिर्फ इतना ही पैसा रोज कमा पाता है कि किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके...ऐसे में आप इस चीज का जवाब दे दीजिए...कि आपके इन फैसलों से देश की इस बड़ी आबादी को क्या लाभ होगा। क्या इन्हें नौकरी मिल पाएगी…? क्या ये लोग बड़े बड़े स्टोर से सामान खरीदने की हिम्मत जुटा पाएंगे...? क्या वाकई में इनतो किफायती दरों में वस्तुएं उपलब्ध हो पाएंगे। इस बारे में भी जरूर सोचिएगा...जब आप देश हित में फैसले लेते हैं तो इन फैसलों से ऐसे लोगों को कितना फायदा होगा...ये शायद आप नहीं सोचते...एक अर्थशास्त्री भी होने के नाते आपके तर्क...आपके फैसले बिल्कुल सही हो सकते हैं...लेकिन क्या वास्तव में ये फैसले आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति का विकास कर पाएगी...ये जरूर सोचिएगा। माना आपके फैसलों से देश का आर्थिक विकास होगा...लेकिन क्या ये विकास रोजी रोटी के जुगाड़ में दिन गुजार देने वाले लोगों को विकास कर पाएगा। एफडीआई की बात करें तो निश्चित तौर पर वाहन, बीमा और टेलीकॉम के क्षेत्र में एफडीआई के अच्छे नतीजे रहे हैं...लेकिन यहां बड़ा सवाल ये भी खड़ा होता है कि आखिर ये फैसले लेने के लिए आपने यही वक्त क्यों चुना जब सरकार पहले से ही एक लाख 86 हजार करोड़ रूपए के कोयला घोटाले के आरोपों से घिरी थी। क्या ये सिर्फ कोयला घोटाले पर मचे बवाल को शांत करने की रणनीति थी। खैर इन आरोपों पर आपके पास देश के खराब आर्थिक हालात जैसे कई तर्क मौजूद हैं...जो आपने दिए भी हैं...लेकिन दूरदर्शन पर जनता को दूर से दर्शन देकर आपने जो सफाई दी है...वो तो कम से कम गले नहीं उतर रही है...उम्मीद करते हैं आपका ये मौन सिर्फ सरकार के फैसलों के बचाव में ही न टूटे बल्कि उनके सामने भी टूटे जिनके बैठने के लिए आप प्रधानमंत्री होने के बावजूद अपनी कुर्सी छोड़ देते हैं...जिनकी हामी के बिना आप कोई फैसला नहीं ले पाते...हमने तो कुछ ऐसा ही सुना है...अब यहां किसका जिक्र हो रहा है...ये भी अगर लिखना पड़े तो फिर तो पढ़ने वालों के सामान्य ज्ञान पर शक करने जैसा होगा।

deepaktiwari555@gmail.com

facts and opinion.....: The main objective of the Multilateral Fund

facts and opinion.....: The main objective of the Multilateral Fund: The main objective of the Multilateral Fund for the Implementation of the Montreal Protocol is to assist developing country parties to the M...

20.9.12

कृष्ण कुमार यादव को साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा द्वारा ''श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान-2012’’

युवा साहित्यकार व चर्चित ब्लागर एवं सम्प्रति इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव को राजस्थान की प्रसिद्ध साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिणक संस्था साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा द्वारा हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु ’’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान-2012’’ से सम्मानित किया गया। वैदिक क्रांति परिषद परिवार, देहरादून द्वारा साहित्यानुरागी, निस्पृह समाजसेवी, आर्यनेत्री एवं वैदिक क्रांति परिषद की संस्थापक स्वर्गीया श्रीमती सरस्वती सिंह की पावन स्मृति में प्रतिवर्ष दिये जाने वाले इस प्रतिष्ठित सम्मान के तहत श्री यादव को 11,000/- रुपये की नकद राशि, प्रशस्ति पत्र, शाल व अन्य मानद वस्तुएं प्रदान कर सम्मानित किया गया। इसी मंच पर साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा के अध्यक्ष श्री नरहरि ठाकर एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग व साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा के सभापति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा ने कृष्ण कुमार यादव को उच्च पदस्थ अधिकारी, सहृदय कवि एवं श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में सारस्वत सम्मान करते हुए भगवान श्रीनाथ का सुशोभित चित्र एवं अभिनन्दन पत्र भी भेंट किया। इस अवसर पर श्री यादव के साथ-साथ वरिष्ठ साहित्यकार प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित (लखनऊ), सुप्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य लेखक प्रेम जनमेजय (नई दिल्ली), वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य डा0 राम गोपाल शर्मा (नोयडा), भारतेन्द्रु परिवार के प्रपौत्र व भूगर्भ शास्त्र अध्येयता प्रो0 गिरीश चन्द्र चैधरी (वाराणसी) को भी सम्मानित किया गया। यह जानकारी साहित्य-मंडल, श्रीनाथद्वारा के श्री श्याम देवपुरा ने दी। गौरतलब है कि श्री यादव को हाल ही में विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि एवं परिकल्पना समूह द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ’’दशक के श्रेष्ठ दंपत्ति ब्लागर’’ के रूप में सम्मानित किया गया है।
सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढ़ा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 6 पुस्तकें-'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'इण्डिया पोस्ट : 150 ग्लोरियस ईअर्स' (2006), 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (2007) एवं 'जंगल में क्रिकेट' (बाल गीत संग्रह, 2012 ) प्रकाशित हो चुकी हैं। व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन करने वाले श्री यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र, 2009) भी प्रकाशित हो चुकी है। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में विभिन्न विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं व ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन भी आपने किया है। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से आपकी कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार इत्यादि का प्रसारण हो चुका हैं।
इससे पूर्व श्री कृष्ण कुमार यादव को भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘ व ‘’डा0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”काव्य शिरोमणि” एवं ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।

जिज्ञासा(JIGYASA) : भारत में खुदरा कारोबार 450 अरब डॉलर का है..

जिज्ञासा(JIGYASA) : भारत में खुदरा कारोबार 450 अरब डॉलर का है..: भारत में खुदरा कारोबार 450 अरब डॉलर का है। सकल घरेलू उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी तकरीबन 14 फीसदी है। साल 2015 तक इसके 785 अरब डॉलर हो जाने क...

मंजिलें अपनी जगह...रास्ते अपनी जगह


जिस चुनावी विकल्प को देने के ऐलान के साथ जंतर मंतर पर अगस्त के पहले सप्ताह में टीम अन्ना ने अपना अनशन समाप्त किया था...उसी के चलते करीब डेढ़ साल तक भ्रष्टाचार के खिलाफ...लोकपाल के समर्थन में मुहिम चलाने वाले अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए। एक मंजिल की तरफ बढ़ रहा काफिला दो अलग अलग रास्तों पर निकल पड़ा...और इसके साथ ही अलग अलग हो गए अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते। अन्ना ने टीम के टूटने पर दुख जताते हुए तल्ख तेवरों में ये भी कहा कि कोई भी राजनीति में उनके नाम और तस्वीर का इस्तेमाल न करे। हालांकि इसके संकेत दिल्ली में हुई बैठक से एक दिन पहले ही मिल गए थे...जब पुणे में अन्ना ने रास्ते अलग अलग होने की बात कही थी...साथ ही अन्ना ये भी कहने से नहीं चूके थे...कि राजनीति में लोग स्वार्थ के लिए आते हैं...और मैं कभी न तो राजनीतिक दल का गठन करूंगा और न ही राजनीति में कदम रखूंगा। अन्ना ने जनलोकपाल के लिए अपने आंदोलन को पूर्व की तरह जारी रखने की बात कही है तो केजरीवाल ने राजनीतिक दल गठन करने का फैसला लिया है...जिसने दोनों के रास्ते अलग करने की नींव भी रखी है। अब बड़ा सवाल ये है कि दो रास्ते जो एक मंजिल की तरफ जा रहे हैं...उन दोनों ही रास्तों से मंजिल तक पहुंचना कितना आसान है। अरविंद केजरीवाल की अगर बात करें तो इनके चुने रास्ते से मंजिल तक जल्दी पहुंचने का आभास तो होता है...लेकिन असल में ये रेगिस्तान में नजर आने वाली वो मरीचिका की तरह है जो मुसाफिर को पास ही मे पानी होने का आभास तो कराती है...लेकिन वास्तव में वो आंखों का धोखा ही होता है। इस रास्ते से गुजरने के लिए खुद को रेतीले तूफान का भी सामना करना पड़ता है...जिससे अगर नहीं बच पाए तो ये न सिर्फ रास्तों को मिटा देता है बल्कि मुसाफिर को ही लील जाता है। वैसे भी इस रास्ते को चुनने के साथ ही अन्ना ने केजरीवाल से किनारा कर लिया...किरण बेदी औऱ केजरीवाल के बीच पहले ही मतभेद जाहिर हो गए थे...ऐसे में किरण बेदी उनके साथ इस रास्ते को चुनेंगी इसकी उम्मीद भी नहीं है। यानि कि जैसे ही आंदोलन में राजनीति ने प्रवेश किया वैसे ही आंदोलन को लीड कर रही टीम बिखर गई...ऐसे में आने वाले दिनों में दूसरे सहयोगियों का भी केजरीवाल से किनारा करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यानि की इस रास्ते में केजरीवाल जैसे जैसे आगे बढ़ेंगे उनके साथ ईमानदार सहयोगियों का बने रहने की संभावना बहुत कम है...ऐसे में कैसे केजरीवाल ईमानदार औऱ स्वच्छ छवि के लोगों को साथ लेकर मंजिल तक पहुंच पाएंगे...ये बड़ा सवाल है। अरविंद के राजनीतिक दल गठन करने के पीछे की एक वजह शायद ये भी हो सकती है कि कहीं न कहीं अरविंद को लगता होगा कि आंदोलन के रास्ते अन्ना ने अपना पूरा जीवन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लगा दिया...और अन्ना ने कई भ्रष्ट अधिकारियों और मंत्रियों को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर भी कर दिया...लेकिन इसके बाद भी भ्रष्टाचार कम होने की बजाए बढ़ा ही है...ऐसे में वे भी अगर आंदोलन के ही रास्ते अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे तो शायद इसमें सालों लग जाएंगे...ऐसे में क्यों न राजनीति के रास्ते संसद में पहुंचा जाए...ताकि संसद में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के समर्थन में आवाज़ बुलंद किया जा सके। केजरीवाल को शायद ये भी लगता होगा कि आज के समय में जब युवा नौकरी के लिए कुछ भी करने को तैयार है...तो उनके ऐशो आराम की सरकारी नौकरी छोड़ने का असर युवाओं पर पड़े और देश की युवा शक्ति राजनीति के रास्ते पर उनका साथ दे...तो क्यों न राजनीतिक दल का गठन किया जाए और इस रास्ते पर आगे बढ़ा जाए। ये एक वजह में से एक हो सकती है...लेकिन असल वजह जो भी हो रास्ता तो अब केजरीवाल ने चुन ही लिया है...ऐसे में देखते हैं ये रास्ता केजरीवाल को कहां लेकर जाता है। अन्ना हजारे की जहां तक बात है अन्ना ने राजनीती के रास्ते की बजाए अपने उसी रास्ते पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराया है...जिस पर वे सालों से चलते आ रहे थे...निश्चित तौर पर अन्ना को इस बात का आभास होगा कि अगर वे राजनीति के दलदल में जाएंगे तो कीचड़ उन पर भी उछलेगा...जो उनकी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचने में बाधक हो सकता है। सवाल ये भी है कि क्या खुद को अपने अहम सहयोगियों से अलग करने के बाद एक बार फिर से जनलोकपाल की मांग को लेकर अन्ना अपना आंदोलन उस रूप तक...उस मुकाम तक ले जा पाएंगे...जो सरकार को प्रभावी जनलोकपाल लाने पर विवश कर दे।
deepaktiwari555@gmail.com

क्या FDI भारत में घाटा उठाने आयेंगी ?


क्या FDI भारत में घाटा उठाने आयेंगी ?

बहुत शोर मचाया जा रहा  है देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा कि FDI के भारत में रिटेल क्षेत्र में
आने से देश को फायदा होगा ! कैसे ? क्या वो लागत से कम दाम पर हमे माल बेचेंगे ?
...बिलकुल नहीं। FDI  कोई परोपकारी संस्थाएं नहीं हैं जो भारतीयों की सेवा करने के लिए आएगी।
अगर सेवा करने का उनका उद्धेश्य नहीं है तो फिर वे सस्ता माल कैसे बेचेंगे ?

    FDI  आकर के हमारी वितरण पद्धति को तहस -नहस कर देगी।ये लोग वस्तु के उत्पादन से खपत
 के बीच के मध्यस्थों को खत्म कर देंगे।उत्पादन से खपत के बीच जो लोग आजीविका कमा रहे हैं
सबसे पहले वे बेकार हो जायेंगे जो करोड़ो भारतीय हैं। इन सबको बेकार करके FDI का पेट पालना
क्या भारत का विकास है या गुलामी की और बढ़ता तेज कदम। 

   FDI  बाहर  से पूंजी लेकर आयेगी इससे भारत की अर्थव्यवस्था में जान आएगी ,यह मानना है
हमारे भ्रमित अर्थशास्त्रियों का ? क्या रिटल में हमारे पास पैसे नहीं हैं ?क्या रिटेल में  सरकार के
ऋण का पैसा लगा है ?भारत का रिटेल भारतीयों की खुद के निवेश से चल रहा है।अगर निवेश की
जरूरत है तो सरकार बड़े उद्योग पतियों की सब्सिडी बंद कर रिटेल व्यापारियों को वह पैसा बिना
ब्याज के ,सरल किस्तों पर दे,सुधार अपने आप आ जाएगा। निवेश ही यदि चाहिए तो क्यों नही देश
के लुटेरों द्वारा स्विस बैंक में जमा  काला धन देश में लाया जाए।

   FDI  आधुनिक तकनीक लेकर आएगी जिससे उत्पादन लागत कम होगी ,ऐसा तर्क बुद्धिजीवी
देते हैं। सवाल उठता है कि क्या आजादी के बाद से अब तक हमारी सरकारे सो रही थी,लाखो -करोड़ो
के गपल्ले हो गए ,कर के पैसे का दुरूपयोग  हुआ,अनुत्पादक योजनायें चलाई मगर उत्तम तकनीक
विकसित नही की। क्यों? हमारी सरकारे अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए विदेशी मगरमच्छो
को क्यों बुला रही है ?क्या गरीब भारतीयों को FDI का मोहताज बनाना है?

   विगत वर्षों में हमने कुछ नही किया ,तकनीक का विकास नही किया ,इस बात को सरकारे
 स्वीकार क्यों नहीं कर लेती। आपस में वोटों के चक्कर में सभी दल लड़ते रहे इसलिए हमारे देश
की अवगति हुयी है ,मगर अब हम ऐसा फैसला नहीं लेंगे जो देश हित में नहीं है यह बात किसी भी
राजनैतिक दल ने नही कही है।  यदि सियासती लोग स्वहित छोड़कर देश हित के फैसले लें और
फैसलों पर अमल करें,तो FDI लाने की जरूरत नहीं विश्व में FDI बनकर जाने की बात होगी ।

   FDI हमे सस्ता देगी , बढ़िया सामान देगी तो क्या वो घाटा करेंगी ?...नही वो हम भारतीयों का खून
चुसेंगी , उसमे से कुछ बूंद हमे देगी और बाकी सब अपने देश में ले जायेंगी।

     FDI  इस देश से कमाकर जो पैसा  से ले जायेगी वो किसका है ? निसंदेह वो पैसा हम भारतीयों
का है।विदेशी लोग हमे लूट कर ले जाएँ और हम बदतर होते जाए ये कैसा विकास है ?

    आम भारतीय खुद के बनाये जुगाड़ से पेट पाल रहा है,87%भारतीय गरीब और मध्यम वर्गीय
है,सरकार हमे ज्ञान का विकास दे,हमे नई तकनीक दे,मगर हमे लूटने वाले FDI के राक्षस नही दे।           


आओ बन्धु, महिमा गाएं भारत बंद त्योहार की
लोकतंत्र में मनमानी के ताकतवर हथियार की
बोलो भारत बंद...बोलो भारत बंद

दफ्तर, बैंक, बाजार, स्कूल सब बंद रखने को बोला था
कल छुटभैय्ये नेता ने धमकी देकर सबको तौला था
नीम चढ़ा हो हरा करैला, इतना कड़वा बोला था
ताकत तन में नहीं मगर इक मुंह में जैसे शोला था
करी किरकिरी बात -बात में जोरदार सरकार की....

आओ बन्धु, महिमा गाएं भारत बंद त्योहार की
लोकतंत्र में मनमानी के ताकतवर हथियार की
बोलो भारत बंद...बोलो भारत बंद

बंद और हड़तालों में हैं हरदम चलती गोलियां
मारकाट मचवाकर नेता खेल रहे हैं होलियां
खौफ दिखाने डंडे के बल निकली उनकी टोलियां
भोली भाली जनता डरती सुनकर उनकी बोलियां
देशवासियों को खाती चिन्ता भूखे परिवार की

आओ बन्धु, महिमा गाएं भारत बंद त्योहार की
लोकतंत्र में मनमानी के ताकतवर हथियार की
बोलो भारत बंद...बोलो भारत बंद

-कुंवर प्रीतम
20 सितम्बर 2012

19.9.12

दिल की छत पर टहल कर आते हैं..! (गीत)



(GOOGLE)


दिल की छत पर टहल कर आते हैं..! (गीत) 




चल  रे  मन  तनिक  हम,  दिल  की   छत  पर  टहल  कर   आते   हैं..!

प्यार   भरी    सोच     के,    नरम    पापोश     पहन   कर   जाते   हैं..!

( पापोश= जूते)


अंतरा-१.


आदत     है     उसे     कहीं    भी,    दबे     पाँव     धूमने   की   मगर..! 

दबे   पाँव    चल   कर    चल,   हम    उसकी   नकल   कर   आते   हैं..!

चल  रे  मन  तनिक  हम,  दिल  की   छत  पर  टहल  कर   आते   हैं..!


अंतरा-२.


ओ रे  मन,  कोमल   सतह   पर,  तुम   पाँव  धरना  सँभल  कर..!

चल,  क़दमों  के  निशान  हम भी, अब  सकल   कर   आते   हैं..!

चल  रे  मन  तनिक,  दिल  की   छत  पर  टहल  कर   आते   हैं..!


(निशान  सकल   करना= कोने-कोने में छाप छोड़ना)  


अंतरा-३.


भोलेभाले    दिल  से,   सयाने   मन   का    मुक़ाबला   ही   क्या ?

चल,   उसके   भोलेपन   का,  आज  हम  अदल   कर   आते   हैं..!

चल  रे  मन  तनिक,  दिल  की   छत  पर  टहल  कर   आते   हैं..!


(सयाना= चालाक; अदल= इन्साफ,न्याय )


अंतरा-४.


दहशत   है,  छत  पर  कहीं,  दर्द   कि   परतें   न  जम   गई   हो..!  

गर      दर्द     है     भी     तो,   एतबारी    सफ़ल   कर   आते   हैं..!

चल  रे  मन  तनिक,  दिल  की   छत  पर  टहल  कर   आते   हैं..!


( एतबारी  सफ़ल  करना= किसी पर  विश्वसनीयता  कायम  रखना)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः १९-०९-२०१२.



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MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.com   (Hindi Articles)

आर्थिक उदारीकरण से फायदे कम नुकसान ज्यादा-ब्रज की दुनिया

मित्रों,कहते हैं कि सावन के अंधे को चारों तरफ सिर्फ हरियाली-ही-हरियाली नजर आती है लेकिन वैसे आँखवाले को क्या कहा जाए जिसको पतझड़ में भी चारों ओर सिर्फ हरियाली ही दिखाई दे रही है? कोई भी परिवर्तन,किसी भी तरह के बदलाव का एकमात्र पहलू नहीं होता। उसके कुछ अच्छे प्रभाव होते हैं तो आवश्यक रूप से कुछ बुरे परिणाम भी। सन् 1990 ई. में नरसिंह राव की कांग्रेसी सरकार द्वारा मनमोहन सिंह की अगुवाई में शुरू की गई कथित आर्थिक-क्रांति का भी हमारी अर्थव्यवस्था पर मिला-जुला असर ही पड़ा है। लेकिन मनमोहन जी को सिर्फ अच्छाइयाँ ही नजर आ रही हैं दुष्परिणाम मोटा चश्मा पहनने के बावजूद नजर ही नहीं आ रहे हैं। तभी तो पिछले कई दिनों से उनका कार्यालय ट्वीटर पर आर्थिक सुधारों के फायदे गिनाने में लगा है। गूढ़ और उलझाऊ आंकड़ों की बाजीगरी के माध्यम से जनता को गिनती सिखाई और बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि पिछले सालों में कितने घरों में बिजली लगी और फोन लगे। कितने लोगों के बैंकों में खाते खुले और कितने लोगों के पास आज मोबाईल या बाईक या कार है। परन्तु मनमोहन जी ने यह नहीं बताया है जबकि बताना चाहिए था कि पिछले सालों में कितनी फैक्टरियाँ या नौकरियाँ चीन को स्थानान्तरित हो गईं। उन्होंने यह भी नहीं बताया है कि आजकल भारत का औद्योगिक विकास-दर शून्य प्रतिशत या उससे भी नीचे पहुँच गया है। उन्होंने यह जानकारी भी नहीं दी कि निजी कंपनियों पर नजर रखने के लिए स्थापित ट्राई जैसी रेग्यूलेटिंग एजेंसियों के अस्तित्व में होते हुए भी 2-जी घोटाले में पौने दो लाख करोड़ रुपये की राजस्व-क्षति कैसे संभव हो गई। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि 1990 के बाद हमारे सामाजिक मूल्यों में तेज गिरावट क्यों आई है और पैसा ही भगवान कैसे बन गया है।
                         मित्रों,आर्थिक-क्रांति या संचार-क्रांति के आरंभ में ऐसे दावे किए जा रहे थे कि इससे शासन-प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ेगी। कहाँ है आज वह पारदर्शिता? इसी प्रकार यह दावा भी किया जा रहा था कि सबकुछ बाजार के हाथों में सौंप देने से गरीबी समाप्त हो जाएगी और सबकुछ सही हो जाएगा। क्यों नहीं हुआ ऐसा जबकि सबकुछ तो नहीं पर बहुत कुछ का नियामक आज बाजार है ? साथ ही सरकारी कामकाज के संचार-क्रांति के कारण त्वरित होने के दावे भी किए जा रहे थे फिर लेटलतीफी पिछले दशकों में घटने के बजाए बढ़ती ही क्यों गई है? क्यों आज के कम्प्यूटर-युग में भी न्यायतंत्र विलंबकारी ही बना हुआ है? मैं मानता हूँ कि लोगों को फोन मिले और बिजली मिली। परन्तु दूरसंचार-कंपनियों ने लोगों को लूटा भी कम नहीं है। गाहे-बेगाहे बिना उपभोक्ता की जानकारी के ही विभिन्न सेवाएँ उसके नंबर पर सक्रिय कर दी जाती हैं और मनमाने पैसे काट लिए जाते हैं। इसी प्रकार क्यों आज बिजली-कंपनियों को कोयला-घोटाला के द्वारा मुफ्त में कोयला मिलने के बावजूद बिजली काफी महंगी है और गुणवत्ताहीन ही है।
                              मित्रों,पिछले बीस सालों में हमारी धरती के गर्भ से बड़ी भारी मात्रा में अवैध खुदाई कर खनिज-अयस्क निकाले गए हैं। कर्नाटक,आंध्र प्रदेश से लेकर झारखंड तक में देशी-विदेशी पूंजीपतियों ने हमारे प्राकृतिक-संसाधनों की अंधाधुंध लूट की है। विदेशी पूंजी-निवेश भी हुआ है लेकिन उद्योग अथवा विनिर्माण के क्षेत्र में कम और आधारभूत-संरचना के क्षेत्र में तो बिल्कुल भी नहीं। शायद यही कारण है कि आधारभूत-संरचना के क्षेत्र में और कुल जीडीपी के मामले में भी हम पड़ोसी चीन से काफी पीछे छूट गए हैं। हमारे यहाँ ज्यादातर विदेशी पैसा सेवा-क्षेत्र में आया है जबकि इस क्षेत्र में रोजगार-सृजन के अवसर विनिर्माण की तुलना में काफी कम और न के बराबर होते हैं। मनमोहन जी यह भी नहीं बता रहे हैं कि विदेशी-पूंजी से कितने लोगों को रोजगार मिला। मैं बताता हूं कि वे क्यों नहीं बता रहे हैं क्योंकि हमारा पूरा विकास और जीडीपी की सरपट दौड़ पिछले 20 सालों में लगभग रोजगार-रहित हुई है।
                          मित्रों,विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के समय 1995 ई. में दावा किया गया था कि भविष्य में पूंजी के अबाध वैश्विक प्रवाह के साथ-साथ श्रम का भी दुनिया में निर्बाध रूप से प्रवाह होगा। क्यों ऐसा संभव नहीं हुआ? विदेशी पूंजी तो भारत में आई और भारी कमाई भी कर ली लेकिन क्या हमारे श्रमिक अमेरिका और यूरोप उतनी ही उन्मुक्तता के साथ जा सके? नहीं कदापि नहीं!! आज भी सारे विकसित देशों में हमारे श्रमिकों के कोटा निर्धारित है जबकि हमने तो कोकाकोला और पेप्सी कोला जैसी कंपनियों के पूंजी-निवेश और लाभ कमाने की कोई सीमा निर्धारित नहीं की है। ऐसा क्यों हुआ और क्यों हो रहा है? क्या यह हमारा आर्थिक औपनिवेशीकरण नहीं है? हम पहले भी उपभोक्ता थे और आज भी उपभोक्ता हैं। हम पहले भी बाजार थे और आज भी बाजार हैं। आज भी हमारा आयात काफी ज्यादा है और निर्यात काफी कम। फिर यह किस तरह की आर्थिक-क्रांति है और किस तरह से आर्थिक-क्रांति है? जब हमारी अर्थव्यवस्था के मौलिक चरित्र पर,स्वरूप पर और संरचना पर आर्थिक-सुधारों का कोई सद्प्रभाव नहीं पड़ा तब फिर ऐसे आर्थिक-सुधारों का क्या लाभ? क्या लगातार बढ़ती गरीबी,बेरोजगारी और प्राणघातक मुद्रा-स्फीति को हम किसी भी प्रकार से अपनी उपलब्धि मान सकते हैं? क्या इस तथ्य को हम अपनी उपलब्धि के रूप में गिना सकते हैं कि आज भी हमारी जनसंख्या का 80 प्रतिशत भाग मात्र 20 रू. प्रतिदिन या उससे भी कम में अपने दिन काटने के लिए मजबूर है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मनरेगा जैसी योजनाएँ गरीबी भगाने का होमियोपैथिक इलाज नहीं हैं बल्कि एलोपैथिक इलाज हैं,तात्कालिक या अल्पकालिक या अस्थायी उपाय। यह इलाज भी किंचित असर तभी करेगा जब इसमें भ्रष्टाचार नहीं हो। लेकिन हमने अपने खुद के पंचायत गोरीगामा (महनार प्रखंड) में ही पाया है कि मनरेगा के लाभार्थियों की सूची में दर्जनों ऐसे लोगों के नाम दर्ज हैं जो सरकारी नौकरियों में हैं। साथ ही मनरेगा के अंतर्गत कहीं भी ऐसा कार्य नहीं करवाया जा रहा है जिससे स्थानीय मजदूरों के लिए गांवों में स्थायी आमदनी का रास्ता बनता हो या खुलता हो।
                        मित्रों,विनिर्माण के साथ-साथ कृषि की स्थिति भी पिछले 2 दशकों में बिगड़ी ही है,खराब ही हुई है। लाखों किसानों ने इस दौरान हानि उठाकर आत्महत्या की है और कृषि विकास-दर 2 प्रतिशत के आसपास रेंगता रहा है। आज खेती घाटे का व्यवसाय बन चुका है और इसे घाटे का सौदा बनाया है हमारी नई आर्थिक नीतियों ने। हमने खाद पर सब्सिडी कम कर दी है या फिर समाप्त ही कर दिया है और रासायनिक-उर्वरकों की कीमतों को बाजार के हवाले कर दिया है। इतना ही नहीं कभी सेज के नाम पर तो कभी दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेस वे के नाम पर किसानों से जमीन अंग्रेजों के जमाने के काले कानूनों की सहायता से जबर्दस्ती कौड़ी के भाव में छीनी जा रही है। अब यमुना एक्सप्रेस वे को ही लीजिए कितना भद्दा मजाक है यह हम गरीब भारतीयों के साथ!? इस सड़क से गुजरने पर गाड़ी-मालिकों को जेपी कंपनी को 300 रु. की मोटी रकम अदा करनी पड़ेगी जितने में ट्रेन से कोई चाहे तो हजार किलोमीटर की यात्रा कर सकता है। फायदा सिर्फ निजी कंपनियों और नेताओं-अफसरों को और नुकसान सिर्फ किसानों और श्रमिकों को। किसी साल ज्यादा अच्छी फसल हो गई तो एक तरफ जहाँ भारतीय खाद्य निगम के सामने उसके भंडारण की समस्या खड़ी हो जाती है वहीं दूसरी तरफ लाखों टन अनाज सालोंसाल गोदामों में ही सड़ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट जब इसको गरीबों में बांटने को कहता है तो सरकार सीधे मना कर देती है और वही अनाज वो शराब-कंपनियों के हाथों औने-पौने दाम पर बेच देती है। भारतीय श्रमिकों की स्थिति पर हम अपने पिछले आलेखों में विस्तार से चर्चा कर चुके हैं।
                         मित्रों,कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि नई आर्थिक नीतियों से हमें जितना लाभ होना चाहिए था,नहीं हुआ और नुकसान थोक में हुआ। लाभ अगर 4 आना हुआ तो नुकसान 12 आने का हुआ। अगर हमने अपने पड़ोसी चीन की तरह सतर्कता बरती होती और लूट को रोका होता तो आज हम जरूर उसके हमकदम या बगलगीर होते। दरअसल हमारे (अर्थ)व्यवस्थारूपी बर्तन में शुरू से ही इतने छिद्र थे और हैं कि सारा लाभ उनमें से बहकर घोटालेबाजों के बैंक-खातों में पहुँच गया और बर्बाद हो गया। हमारी सरकार ने अर्थव्यवस्थारूपी दूध की सारी मलाई तो अपने बीच और अपनों के बीच जिसमें पूंजीपति भी शामिल हैं,बाँट दिया और जनता को या तो सिर्फ खुरचन थमा दी या फिर अंगूठा दिखा दिया। उदाहरण के लिए आम आदमी को मिलनेवाली सब्सिडी में विगत वर्षों में लगातार कमी की गई है और अब वह समाप्त होने के कगार पर आ गई है जबकि पूंजीपतियों को अभी भी हजारों करोड़ रुपयों की करछूट दी जा रही है। दरअसल पिछले 2 दशकों में भारतीय लोकतंत्र विकृत होकर भ्रष्टतंत्र और धनिक तंत्र में बदल गया है। नई आर्थिक नीतियाँ सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं थीं। गलत होतीं तो चीन आज दुनिया की दूसरी आर्थिक महाशक्ति नहीं होता लेकिन उनके क्रियान्वयन में सिर्फ दोष-ही-दोष थे और वे गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से उत्तरोत्तर बढ़ते ही चले गए और बढ़ते ही चले जा रहे हैं।

गाउट यानि यूरिक एसिड से ऐसे करें बचाव

गाउट एक सामान्य रोग है जिसमें बार बार जोड़ में संधिशोथ (जोड़ में दर्द, सूजन, लालिमा, उष्णता और अक्षमता)  के दौरे पड़ते हैं। अधिकांश रोगियों (लगभग 50%) में पैर के अंगूठे के जोड़ (मेटाटारसल-फेलेंजियल जोड़) में तकलीफ होती है। तब इसे पोडोग्रा भी कहते हैं। लेकिन गाउट का असर एड़ी, घुटना, कलाई और उंगली के जोड़ में भी हो सकता है। जोड़ो में रात को अचानक बहुत तेज दर्द होता है और सूजन आ जाती है। जोड़ लाल और गर्म महसूस होता है। साथ में बुखार और थकावट भी हो सकती है। यह रोग रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने से होता है। यूरिक एसिड बढ़ने से जोड़, टेन्डन और जोड़ के आपसास जमा हो जाता है। यदि यह गुर्दें में जमा होता है तो पथरी या युरेट नेफ्रोपेथी हो सकती है।
गाउट का दौरा अमूमन 5-7 दिनों में ठीक हो जाता है। 60 रोगियों को साल भर में प्रायः दूसरा दौरा पड़ जाता है। गाउट के रोगियों को रक्तचाप, डायबिटीज, मेटाबोलिक सिन्ड्रोम, वृक्क रोग और हृदय रोग का खतरा अधिक रहता है। यदि उपचार नहीं किया जाये तो गाउट धीरे-धीरे दीर्घकालीन और स्थाई रोग बन जाता है। जोड़ों की सतह क्षतिग्रस्त होने लगती है। अक्षमता और अपंगता बढ़ती जाता है। साथ ही शरीर में कई जगह (जैसे कान, कोहनी आदि) यूरिक एसिड जमा होने से दर्दहीन गांठें (Tophi) बन जाती हैं। यदि गुर्दे में पथरी बन जाये तो स्थिति और जटिल बन जाती है। वृक्कवात (Kidney Failure) हो सकता है।
प्राचीन काल में इसे राजरोग या अमीरों का रोग भी कहा जाता था, क्योंकि मांस-मछली और मदिरा सेवन से इस रोग का सीधा सम्बन्ध है। ब्रिटेन के किंग हेनरी को भी गाउट हुआ था। गाउट के निदान हेतु जोड़ में से सायनोवियल द्रव निकाल कर जांच की जाती है, उसमें यूरिक एसिड के क्रिस्टल्स की उपस्थिति से गाउट की पुष्टि हो जाती है। पिछले दो दशकों में गाउट का आघटन दो गुना हो गया है।
कारण
प्यूरीन चयापचय में आई खराबी गाउट का मूल कारण है। यूरिक एसिड प्यूरीन चयापचय का अंतिम उत्पाद है, जो गाउट में बढ़ जाता है। इसके कारण आहार, आनुवंशिकता, गुर्दे में यूरिक एसिड का उत्सर्जन कम होना आदि माने गये हैं। 90% रोगियों में गुर्दे यूरिक एसिड का पर्याप्त उत्सर्जन नहीं कर पाते हैं। 10% से कम रोगियों में ज्यादा यूरिक एसिड बनता  हैं। यदि यूरिक एसिड 7-8.9  mg/dl हो तो गाउट का सालाना जोखिम  0.5%  और 9  mg/dl से अधिक हो तो जोखिम  4.5% रहता है। यूरिक एसिड का सामान्य स्तर पुरुष में 7 और स्त्री में 6 mg/dl होता है।
जीवनशैली – 12% रोगियों में गाउट का कारण आहार को माना गया है। मदिरा सेवन, फ्रुक्टोज-युक्त पेय, मांस, मछली के सेवन से गाउट का जोखिम बढ़ता है।  
रोग – मेटाबोलिक सिन्ड्रोम, मोटापा, पॉलीसायथीमिया, लेड पॉयजनिंग, वृक्कवात, हीमोलिटिक एनीमिया, सोरायसिस और अंग प्रतिस्थापन में भी गाउट की संभावना रहती है। 
औषधियां – मूत्रवर्धक दवाइयां (हाइड्रोक्लोरथायडाइड), नायसिन, एस्पिरिन, साइक्लोस्पोरिन और टेक्रोलिमस आदि। 
उपचार
प्रारंभिक उपचार का उद्देष्य संधिशोथ के दौरे को शांत करना है। बार-बार पड़ने वाले दौरों को रोकने के लिए यूरिक  एसिड कम करने की दवाइयां दी जाती हैं। साथ में दर्द और सूजन कम करने के लिए नॉन-स्टीरॉयडल एंटीइन्फ्लेमेट्री दवाइयां (NSAIDs), कोलचिसीन और स्टिरॉयड्स दिये जाते हैं। NSAIDs प्रायः 1-2 हफ्ते तक दिये जाते हैं। यदि ये सब दवाइयां असर नहीं कर रही हो तो नई दवा पेग्लोटिकेस (इसे 2010 में अनुमोदित किया गया है) दी जाती है।
दौरों को रोकने के लिए ज़ेंथीन ऑक्सीडेज इन्हिबीटर्स (ऐलोप्यूरिनॉल और फेब्युक्सोस्टेट) और युर्कोसुरिक्स (प्रोबेनसिड और सल्फिनपायरेजोल) आदि देते हैं। इन्हें प्रायः गाउट का दौरा पड़ने के 1-2 हफ्ते के बाद शुरू करते हैं और लम्बे समय तक दी जाती हैं। यदि यूरिक एसिड का निर्माण 800 मिलिग्राम प्रति दिन से अधिक हो तो ज़ेंथीन ऑक्सीडेज इन्हिबीटर्स दी जाती हैं। रोगी को अपना यूरिक एसिड 6 से कम रखने की सलाह दी जाती है।
अन्य उपचार
बर्फ की सिकाई - इसके लिए दिन में कई बार बर्फ की सिकाई की जाती है, जिससे दर्द में राहत मिलती है। बर्फ की सिकाई के बीच-बीच में टॉवल को गर्म पानी में निचोड़ कर जोड़ पर लपेट देना चाहिये। सिकाई के बाद भी जोड़ों पर टॉवल लपेट देना चाहिये, ताकि सूजन कम हो और रोगी को नींद आ जाये।
दवा
कोल्चिसिन (Colchicine)
प्रोबेनसिड
(Probenecid)
ऐलोप्युरिनोल (Allopurinol)
फेब्युक्सोस्टेट
(Febuxostat)
ब्रांड और प्रस्तुति
टेब कोल्चिसिन्डोन, जाइकोल्चिन
0.5 मि. ग्राम
टेब बेनसिड
500 मि. ग्राम
टेब जाइलोरिक, सिप्लोरिक
100 और 300 मि. ग्राम
टेब फेब्युटास
40 और  80 मि. ग्राम
मात्रा
गाउट के दौरे में – शुरू में 1  मि. ग्राम, हर  घंटे में 0.5 मि. ग्राम जब तक दर्द नहीं मिट जाये, (अधिकतम 10 मि. ग्राम)
बचाव- 0.5-1.5 मि.ग्राम 7 दिन तक   
शुरूमें 5.25 ग्राम (150 एमएल पानी में) दो बार,
मेन्टेनेन्स – 3.5 ग्राम (150 एमएल पानी में) 
100 मिलिग्राम रोजाना, अधिकतम मात्रा 800 मि. ग्राम
40-80 मिलिग्राम रोज
कुप्रभाव
पेट दर्द, उबकाई, वमन, दस्त, बोनमेरो दमन, मायोपेथी
अपच, पेट फूलना, आहार पथ मे रुकावट
त्वचा में चकत्ते, ठंड लग कर बुखार,जोड़ों में दर्द, पीलिया, इयोसिनोफीलिया, ल्युकोपीनिया या ल्युकोसाइटोसिस
छाती में दर्द, अचानक भ्रम, बांह, टांगों या चेहरे में सुन्नता, त्वचा में खुजली, चकत्ते, श्वासकष्ट, संक्रमण, यकृत विकार
चेरी है चमत्कारी –  60 वर्ष पहले डॉ. लुडविग डब्ल्यु ब्लॉ जो गाउट से पीड़ित थे और उनका जीवन व्हील चेयर के सहारे चल रहा था। एक दिन उन्होंने पाव भर सारी चेरी खाई, जिससे उनका सारा दर्द जाता रहा। उन्होंने इस विषय पर शोध काफी की और गाउट के रोगियों को 180-240 ग्राम चेरी रोज खाने की सलाह देने लगे।
अलसी और चारकोल की पुलटिस – डॉ. थ्रेश कहते हैं कि अलसी और चारकोल की पुलटिस शरीर से टॉक्सिन और यूरिक एसिड खींच लेती है और गाउट में बहुत राहत देती है। 2-4 टेबलस्पून पिसी अलसी और आधा कप चारकोल को गर्म पानी में अच्छी तरह मिला कर पुलटिस बनाई जाती है। जोड़ पर इसका लेप करके पट्टी बांध दी जाती है। हर 4-6 घंटे में पुलटिस और पट्टी बदल दी जाती है। रात भर पुलटिस लगी रहने दें, बस ध्यान रखें कि बिस्तर खराब न हो। इसके लिए आप पट्टी के ऊपर पॉलीथीन लपेट सकते हैं। चारकोल की गोली दिन में चार बार पानी के साथ खाने से भी फायदा होता है। आधा या एक घंटे पैर को चारकोल या इप्सम के घोल में रखने से भी फायदा होता है।
अलसी -  
गाउट में अलसी बहुत कारगर साबित हुई है। अलसी के लिगनेन और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स प्रदाह को शान्त करते हैं। दर्द, सूजन में राहत मिलती है। ट्यूनिस में हुई शोध से साबित हुआ है कि अलसी शरीर में यूरिक एसिड का स्तर कम करता है। अलसी को रोटी के रूप में लेना सुविधाजनक रहता है। शीतल विधि से निकला अलसी का तेल पनीर या दही में मिला कर लिया जा सकता है।   

रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस



रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस एक दीर्घकालिक स्व-प्रतिरक्षित (Autoimmune) रोग है जो शरीर के जोड़ों और अन्य ऊतकों में विकृति पैदा  करता है। इस रोग में हाथ और पैरों के जोड़ प्रदाह ग्रस्त (Inflammed) हो जाते हैं, जिसके फलस्वरूप उनमें सूजन और दर्द होता है और धीरे-धीरे जोड़ों में क्षति होने लगती है।
  • शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जोड़ों और संयोजी ऊतक (Connective Tissue) को नष्ट करते हैं।
  • सुबह उठने पर या विश्राम के बाद जोड़ों (सामान्यतः हाथ और पैरों के छोटे जोड़ों) में दर्द और जकड़न होती है जो एक घंटे से अधिक समय तक रहती है।
  • बुखार, कमजोरी और अन्य अंगों में क्षति हो सकती है।
  • इस रोग का निदान मुख्यतः रोगी में लक्षणों के आधार पर किया जाता है, लेकिन रक्त में रियुमेटॉयड  फेक्टर की जांच और एक्स-रे भी निदान में सहायक होते हैं।
  • इस रोग के उपचार में कसरत, स्प्लिंट, दवाइयों (नॉन-स्टीरॉयडल एंटी-इन्फ्लेमेट्री दवाइयां, एंटीरूमेटिक दवाइयां और इम्युनोसप्रेसिव दवाइयां) और शल्य चिकित्सा की मदद ली जाती है।
विश्व की 1% आबादी रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस का शिकार बनती है। स्त्रियों में इस रोग का आघटन पुरुषों से दो या तीन गुना अधिक होता है। वैसे तो यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन इसकी शुरुआत प्रायः 35 से 50 वर्ष के बीच होती है। इस रोग का एक प्रारूप छोटे बच्चों में भी होता है, जिसे जुविनाइल इडियोपेथिक आर्थ्राइटिस (Juvenile Idiopathic Arthritis) कहते हैं।  
इस रोग का कारण अभी तक अज्ञात है, लेकिन इसे स्व-प्रतिरक्षित रोग (Autoimmune Disease) माना जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली जोड़ों के अस्तर या खोल (Synovial Membrane) पर प्रहार करती है, साथ में शरीर के अन्य अंगों के संयोजी ऊतक जैसे रक्तवाहिकाएं और फेफड़े भी क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। और इस तरह जोड़ों के कार्टिलेज, अस्थियां और लिगामेन्ट्स  का क्षरण होने लगता है, जिससे जोड़ विकृत, अस्थिर, खराब और दागदार हो जाते है। जोड़ों के क्षतिग्रस्त होने की गति आनुवंशिक समेत कई पहलुओं पर निर्भर करती है।


लक्षण
आमतौर पर रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस की शुरुआत धीरे धीरे होती है। बीच-बीच में रोग के लक्षण भड़कते हैं, जिसके बाद लम्बे अंतराल तक रोगी लक्षणहीन रहता है और रोग निष्क्रिय अवस्था में  रहता है। या रोगी में लक्षण तेजी से अथवा धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं। कभी रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस अचानक कई जोड़ों पर एक साथ धावा बोलता है। कई बार यह बहुत धीरे से शुरू होता है, और मुख्तलिफ जोड़ों पर असर करता चलता है। यह रोग प्रायः दोनों तरफ के जोड़ों पर असर करता है और मुख्यतः अंगुलियां, हाथ, पैर, कलाई, कोहनी, टखना आदि  छोटे जोड़ों पर पहले प्रहार करता है। प्रदाह ग्रस्त जोड़ में सुबह उठने पर या आराम के बाद प्रायः दर्द और जकड़न होती है जो एक घंटे से अधिक समय तक रहती है। यह रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस का विशिष्ट लक्षण है। कुछ रोगी दोपहर में थकावट और कमजोरी महसूस करते हैं। रोगी को भूख न लगने, वजन कम होने और हल्का बुखार बने रहने की तकलीफ भी हो सकती है।
प्रभावित जोड़ प्रदाह के कारण नाजुक, गर्म, लाल और बड़ा महसूस होता है। कई बार जोड़ में पानी भर जाता है। जल्दी ही जोड़ विकृत और कुरूप हो जाता है। इसके बाद जोड़ में जकड़न बढ़ने लगती है और उसे धुमाना या हिलाना डुलाना मुश्किल हो जाता है। कई बार अंगुलियां उतर कर छोटी अंगुली कनिष्ठा की तरफ झुक जाती हैं जिससे उनके टेन्डन भी उतर जाते हैं।
सूजे हुए जोड़ नाड़ी पर दबाव डालते हैं, जिससे संवेदनशून्यता और सिरहन होती है। कई बार घुटनें के पीछे पुटिका (Cyst) बन जाती है, जिसके फूटने पर टांग में दर्द होता है और सूजन आ जाती है। रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस के 30% रोगियों में त्वचा के नीचे (जहाँ दबाव अधिक पड़ता है जैसे कोहनी) कठोर गांठें बन जाती हैं, जिन्हें रियुमेटॉयड  नोड्यूल्स कहते हैं। इनके अलावा त्वचा में पायोडर्मा, स्वीट्स सिन्ड्रोम, ऐरीदिमा नोडोसम, लोब्युलर पेनिकुलाइटिस, पामर ऐरीदिमा आदि विकार हो सकते हैं।   
कदाचित रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस रक्तवाहिकाओं को प्रदाह ग्रस्त कर देता है। इसकी वजह से ऊतकों को रक्त की आपूर्ति कम होती जाती है, और नाड़ी की क्षति या पैर में छाले हो सकते हैं। फेफड़े के बाहरी आवरण (Plura) या हृदय के  आवरण (Pericardium) या फेफड़े अथवा हृदय के प्रदाह और स्कारिंग के कारण छाती में दर्द या श्वासकष्ट हो सकता है। रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस  में ऐथेरोस्क्लिरोसिस, हार्ट अटेक और स्ट्रोक का जोखिम अधिक रहता है। कभी कभार पेरीकार्डोइटिस, एंडोक्रेडाइटिस, लेफ्ट वेन्ट्रीकल फेल्यर, वाल्वलाइटिस और फाइब्रोसिस  आदि हृदय विकार हो सकते हैं।
दीर्घकालीन  प्रदाह के कारण फेफड़े में फाइब्रोसिस और वृक्क में एमाइलोडोसिस हो सकता है। कुछ रोगियों के लिम्फनोड्स में सूजन आ सकती है। शोग्रिन्ज सिन्ड्रोम नामक रोग में जोड़ में प्रदाह के साथ आँख, योनि या मुँह में खुश्की रहती है। साथ ही कुछ रोगियों में इपिस्क्लिराइटिस, ऐनीमिया, न्यूट्रोपीनिया, थ्रोम्बोसाइटोसिस, पेरीफ्रल न्युराइटिस, लिम्फोमा आदि विकार हो सकते हैं।
निदान
रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस के निदान में इसके विशिष्ट स्वरूप और लक्षणों के साथ प्रयोगशाला के परीक्षण, जोड़ के द्रव की सूक्ष्मदर्शी जांच और बायोप्सी से बहुत मदद मिलती है। रोग की प्रारंभिक अवस्था में एक्स-रे में कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिलते हैं। लेकिन बाद में जोड़ के आसपास अस्थि ऊतक कम होना (Juxta-articular Osteopenia), सूजन और जोड़ में जगह कम होना आदि परिवर्तन साफ दिखाई देते हैं। जैसे जैसे रोग बढ़ता है हड्डियों का क्षरण और जोड़ों का ढीला (Subluxation)देखा जा सकता है।    एम.आर.आई. से जोड़ों की बड़ी स्पष्ट और साफ तस्वीरे प्राप्त होती हैं, लेकिन निदान हेतु प्रायः एम.आर.आई. करने की जरूरत नहीं पड़ती है।  
10 में से 9 रोगियों का ई.एस.आर. बढ़ा हुआ मिलता है, जो प्रदाह की उपस्थिति को इंगित करता है। हालांकि कई अन्य रोगों में भी ई.एस.आर. बढ़ा रहता है, लेकिन फिर भी इसका बढ़ना रोग की सक्रियता को दर्शाता है। आमवात के 70% रोगियों के रक्त में खास तरह की एंटीबॉडीज जैसे रियुमेटॉयड फेक्टर पाई जाती हैं। रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस के रोगियों में रियुमेटॉयड  फेक्टर के स्तर का रोग की गंभीरता से सीधा गुणात्मक सम्बन्ध होता है। जब जोड़ों में प्रदाह कम होता है, तो रियुमेटॉयड फेक्टर का स्तर घटने लगता है। लेकिन रियुमेटॉयड  फेक्टर कुछ अन्य रोगों जैसे हिपेटाइटिस के रोगियों में भी मिलता है। कई बार स्वस्थ व्यक्तियों में भी रियुमेटॉयड  फेक्टर उपस्थित हो सकता है।    
रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस के  96% रोगियों में एंटी-सिट्रुलिनेटेड पेप्टाइड (anti-CCP) एंटीबॉडीज पाई जाती हैं और जिन्हें यह रोग नहीं होता है उनमें ये एंटीबॉडीज कभी नहीं मिलती हैं। इसलिए आजकल चिकित्सक इनकी जांच करवाने लगे हैं।
अधिकांश रोगियों में रक्त की मामूली कमी (ऐनीमिया - लाल रक्त कोशिकाओं की कमी) होती है। कभी-कभार श्वेत रक्त कोशिकाओं की गणना (TLC) कम हो सकती हैं। यदि रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस के रोगी में टी.एल.सी. कम हो, यकृत में नोड्यूलर हाइपरप्लेजिया (कुप्फर सेल्स की सक्रियता बढ़ने के कारण) और तिल्ली बढ़ी हुई हो तो इस रोग समूह को फेल्टीज़ सिन्ड्रोम (Felty's syndrome) कहते हैं।
फलानुमान
रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस की प्रगति अनियमित और अप्रत्याशित होती है। यह रोग शुरू के छ सालों में और खासतौर पर पहले साल में तेजी से बढ़ता है। 10 साल के भीतर 80%  रोगियों के जोड़ों में स्थाई अपंगता आ ही जाती है। रोगियों के औसत जीवन में 3-7 वर्ष की कमी आती है। हृदय रोग, संक्रमण, आहार पथ में रक्तस्राव, औषधियां और कैंसर स्थिति को और जटिल बना देते हैं। कभी कभार रोगी अकस्मात ठीक भी हो जाता है।
75% रोगियों में उपचार से फायदा होता है। इन सारे तामझाम और इलाज के बावजूद 10% रोगीयों में तो गंभीर अक्षमता और अपंगता आ ही जाती है। निम्न पहलू खराब फलानुमान को इंगित करते हैं।
  • श्वेत नस्ल के रोगी, स्त्री या दोनों
  • जिन रोगियों में रियुमेटॉयड  नोड्यूल बने हों
  • रोग की शुरूआत अधिक उम्र में हुई हो
  • जिनके 20 या अधिक जोड़ों में तकलीफ हो
  • जिनका ई.एस.आर. ज्यादा हो
  • जिनमें रियुमेटॉयड  फेक्टर या Anti-CCP का स्तर अधिक हो
उपचार
रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस के उपचार में औषधियों और शल्य चिकित्सा के साथ कुछ साधारण उपाय जैसे आराम, स्वस्थ आहार आदि शामिल किये गये हैं। डिजीज मोडीफाइंग एंटीरिह्युमेटिक औषधियां (DMARDs) वास्तव में रोग के विकास और विस्तार को धीमा करते हैं और तकलीफ में आराम दिलाते हैं। इसलिए जैसे ही रोग का निदान हो, इन्हें शुरू कर दिया जाता है।
गंभीर रूप से प्रदाह-ग्रस्त जोड़ को आराम देना जरूरी है, क्योंकि यदि प्रदाह-ग्रस्त जोड़ कार्य करता रहेगा तो प्रदाह और तकलीफ बढ़ती रहेगी। जोड़ को नियमित आराम मिलने से दर्द में राहत मिलती है और रोग की सक्रिय अवस्था जल्दी ठीक होती है। जोड़ों को विश्राम देने और स्थिर करने के प्रयोजन से एक या कई जोड़ों पर स्प्लिंट लगाये जाते हैं। लेकिन जोड़ों के थोड़ी हरकत जरूरी होती है ताकि मांस-पेशियां कमजोर न पड़ें और जोड़ में जकड़न नहीं हो पायें।
औषधियों में नॉन-स्टीरॉयडल एंटीइन्फ्लेमेट्री दवाइयां (NSAIDs), डिजीज मोडीफाइंग एंटीरिह्युमेटिक औषधियां (DMARDs), कोर्टिकोस्टीरॉयड्स, इम्युनोसप्रेसिव दवाइयां आदि प्रमुख हैं। नई दवाओं में लेफ्लुनोमाइड, एनाकिनरा (an interleukin-1 receptor antagonist), ट्यूमर नेक्रोसिस फेक्टर इन्हिबीटर्स आदि प्रमुख हैं। रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस  में कई दवाइयों को संयुक्त रूप से देने का प्रचलन है।   
नॉन-स्टीरॉयडल एंटीइन्फ्लेमेट्री दवाइयां (NSAIDs)
रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस  में ये दवाइयां दर्द और प्रदाह में तो फायदा पहुँचाती है, लेकिन रोग के विकास, विस्तार और जोड़ के क्षयन को रोकने में प्रभावशून्य हैं। एस्पिरिन इस रोग में प्रयोग नहीं की जाती है। NSAIDs का पूरा असर आने में 2 हफ्ते लगते हैं। इसलिए इनकी मात्रा बढ़ाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। NSAIDs साइक्लोऑक्सीजनेज (COX) एंजाइम्स का बाधित करते हैं और इस तरह प्रोस्टाग्लेंडिन्स के निर्माण को कम करते  हैं। कुछ प्रोस्टाग्लेंडिन्स COX-1 से नियंत्रित होते हैं, जो शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्य (जैसे आमाशय की श्लेष्मा (Mucosa) को सुरक्षित रखना और बिंबाणुओं का चिपचिपापन कम करना) करते हैं। दूसरे प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स होते हैं जो COX-2 सी सहायता से निर्मित होते हैं। खास COX-2 इन्हिबीटर श्रेणी (जैसे सेलीकोक्सिब) की दवाइयों के आहार-पथ पर कुप्रभाव कम होते हैं। इसलिए दूसरे NSAIDs के पेप्टिक अल्सर और अपच के रोगी को नहीं देना चाहिये।
NSAIDs के दूसरे कुप्रभाव सिरदर्द, सूजन, भ्रम (Confusion), केंद्रीय नाड़ी तंत्र लक्षण, रक्तचाप बढ़ना, बिंबाणु (Platelets) की गतिविधि कम होना आदि हैं। इनके हृदय पर कोई स्पष्ट कुप्रभाव नहीं हैं। कभी कभार क्रियेटिनीन बढ़ सकता है या इंटरस्टिशियल नेफ्रोइटिस हो सकती है।
कोर्टिकोस्टिरॉयड्स – कोर्टिकोस्टिरॉयड्स अन्य औषधियों की अपेक्षा प्रदाह और दूसरी तकलीफों को शीघ्रता से को शांत करते हैं। ये हड्डियों के क्षरण को शिथिल करते हैं। परन्तु ये जोड़  को क्षतिग्रस्त होने से नहीं रोक पाते हैं और इनका असर धीरे धीरे कम होता जाता है। दूसरा कई बार इनको बंद करने के बाद रोग बहुत भड़क सकता है। इनके दीर्घकालीन कुप्रभाव को देखते हुए कई चिकित्सक इनके अन्य DMARDs का असर आने तक देते हैं।
कोर्टिकोस्टिरॉयड्स का प्रयोग तभी किया जाता है जब जोड़ बहुत क्षतिग्रस्त हो गये हो या रोग अन्य स्थानों में भी फैल गया हो। पेप्टिक अल्सर, रक्तचाप, डायबिटीज, ग्लूकोमा और तीव्र संक्रमण में इनका प्रयोग नहीं करें।
इन्ट्रा-आर्टिकुलर इंजेक्शन – जोड़ में कोर्टिकोस्टिरॉयड्स के डिपो इंजेक्शन लगाने से दर्द और सूजन में अस्थाई राहत मिलती है। ट्रायमसिनोलोन हेग्जासीटोनाइड लम्बे समय तक प्रदाह को नियंत्रण में रखता है। ट्रायमसिनोलोन सीटोनाइड और मिथाइल प्रेडनिसोलोन एसीटेट भी प्रभावी हैं। किसी भी जोड़ में स्टिरॉयड के इंजेक्शन साल में 3-4 बार से ज्यादा नहीं देने चाहिये, क्योंकि जोड़ के खराब होने का खतरा रहता है। हालांकि जोड़ में संक्रमण का खतरा 2% से कम रहता है, लेकिन जोड़ में 24 घंटे के बाद भी दर्द का होना संक्रमण को इंगित करता है।
हाइड्रोक्सीक्रोरोक्वीन – इस रोग के तकलीफ में राहत देती है। इसे शुरू करने से पहले और हर साल रोगी की आँख के फंडस और विजुअल फील्ड्स की जांच होनी चाहिये। यदि 9 महीने में कोई फायदा नहीं दिखे तो इसे बंद कर देना चाहिये।
सल्फासेलेजीन – यह इस रोग के लक्षण में फायदा करती है और रोग को बढ़ने से भी रोकती है। इसका असर आने में 3 महीने लगते हैं। इसकी एन्टेरिक कोटेड गोलियां दी जाती हैं। इसे शुरू करने के 1-2 हफ्ते के बाद और हर 12 हफ्ते में सी.बी.सी. करवा लेना चाहिये। हर 6 महीने में या जब भी मात्रा बढ़ानी हो तब एस.जी.पी.टी. और एस.जी.ओ.टी. करवा लेना चाहिये।
लेफ्युनोमाइड – यह नई दवा है और पाइरीमिडिन चयापचय के एक एंजाइम की गतिविधि में व्यवधान पैदा करती है। यह मीथोट्रेक्सेट जितनी ही असरदार है और न बेनमेरो का दमन करती है, न यकृत को नुकसान बहुँचाती है और न ही फेफड़ों में संक्रमण करती है।
मीथोट्रेक्सेट – यह फोलेट विरोधी ( (Folate Antagonist) है और अधिक मात्रा में देने पर रक्षाप्रणाली का दमन (Immunosuppressive) करती है। कम मात्रा में यह एंटीइन्फ्लेमेट्री के रूप में कार्य करती है। यह रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस में बहुत प्रभावी है और अपेक्षाकृत जल्दी (3 से 4 हफ्ते में) असर करती है। यकृत और वृक्क रोग में इसका प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिये। इसके सेवन के दौरान मदिरा सेवन को टालना ही श्रेयस्कर है। इसके साथ 1 मिलिग्राम फोलेट प्रति दिन का सेवन करने से मीथोट्रेक्सेट के कुप्रभाव कम होते हैं। जिस दिन मीथोट्रेक्सेट दें, फोलेट नहीं दें।  हर 8 हफ्ते में सी.बी.सी., एस.जी.पी.टी., एस.जी.ओ.टी., एल्ब्युमिन, क्रियेटिनीन की जांच करनी चाहिये। यदि यकृत के एंजाइम्स का स्तर निरंतर दो गुना या अधिक बना रहे तो यकृत की बायोप्सी की जानी चाहिये और मीथोट्रेक्सेट बंद कर देनी चाहिये। मीथोट्रेक्सेट बंद करने के बाद कई बार रोग बहुत भड़क सकता है।  कई बार मीथोट्रेक्सेट के प्रयोग से रियुमेटॉयड  नोड्यूल्स बड़े हो सकते हैं।
इम्युनोमोड्यूलेट्री, साइटोटॉक्सिक और इम्युनोमोसप्रेसिव दवाइयाँ – ऐजाथायप्रीन, साइक्लोस्पोरीन (इम्युनोमोड्यूलेट्री) या साइक्लोफोस्फेमाइड का असर DMARDs के जैसा ही है। लेकिन ये दवाइयां विशेष तौर पर साइक्लोफोस्फेमाइड अधिक टॉक्सिक है। इसलिए DMARDs असर नहीं करे या स्टिरॉयड्स के प्रयोग से बचना हो तभी  इनका प्रयोग  किया जाना  चाहिये। इनका प्रयोग प्रायः तभी किया जाता है जब रोग जोड़ों के अलावा अन्य स्थानों में भी फैल गया हो। मेन्टेनेन्स के लिए ऐजाथायप्रीन की न्यूनतम मात्रा प्रयोग की जाती है। साइक्लोस्पोरीन कम मात्रा में अकेले या मीथोट्रेक्सेट के साथ दी जाती है। यह ऐजाथायप्रीन और साइक्लोफोस्फेमाइड से कम खतरनाक मानी गई है।
बॉयोलोजिक एजेंट्स - TNF-α antagonists को छोड़ कर बी-कोशिका या टी-कोशिका को लक्षित करने के लिए ऐबाटासेप्ट, रिटुक्सीमेब, ऐनाकिनरा आदि बॉयोलोजिक रेस्पॉन्स मोडीफायर्स प्रयोग किये जाते हैं।
टीएनएफ-अल्फा एंटागोनिस्ट – (जैसे ऐडालिमुमेब, इटानरसेप्ट और इन्फिक्सीमेब) जोड़ों को क्षतिग्रस्त होने से रोकते हैं। कुछ रोगियों में इनका अच्छा असर होता है। इन्हें मीथोट्रेक्सेट के साथ प्रयोग किया जाता है।

रियुमेटॉयड आर्थ्राइटिस – औषधियां
दवा
मात्रा
कुप्रभाव
डिजीज मोडीफाइंग एंटीरिह्युमेटिक औषधियां (DMARDs)
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (Hydroxychloroquine)


शुरू में 400-600 मिलिग्राम प्रति दिन भोजन या दूध के साथ दी जाती हैं। इसकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जाती है जब तक वांछित लाभ नहीं मिल जाता है। 4-12 हफ्ते बाद मात्रा घटा कर 200-400 ग्राम प्रति दिन कर देते हैं।
मामूली डर्मेटाइटिस. मायोपेथी, कोर्निया में ओपेसिटी, कभी कभार रेटीना में स्थाई क्षयन
लेफ्यूनोमाइड (Leflunomide)
20 मिलिग्राम/दिन लेकिन यदि कोई कुप्रभाव हो तो मात्रा घटा कर 10 मिलिग्राम/दिन कर दें
त्वचा में रियेक्शन, यकृत रोग
मीथोट्रेक्सेट (Methotrexate)
7.5 मिलिग्राम हफ्ते में एक बार दें, धीरे-धीरे मात्रा 25 मिलिग्राम तक बढ़ाई जा सकती है। 20 मिलिग्राम/सप्ताह से ज्यादा मात्रा त्वचा के नीचे (SC) दी जा सकती है। 
यकृत में फाइब्रोसिस, उबकाई, बोनमेरो का दमन, मुँह में छाले, न्युमोनाइटिस
सल्फासेलेजीन (Sulfasalazine)


शुरू में 0.5 से 1 ग्राम प्रति दिन दी जाती हैं,  जिसे हर हफ्ते बढ़ा कर 2 ग्राम प्रति दिन तक ले जाते हैं। इस मात्रा को दो खुराक में विभाजित करके सुबह और शाम देना चाहिये। आधिकतम मात्रा 3 ग्राम प्रति दिन है।  
बोनमेरो का दमन, पाचन विकार, न्यूट्रोपीनिया, हीमोलाइसिस, हिपेटाइटिस
कोर्टिकोस्टीरॉयड्स (Corticosteroids)
प्रेडनिसोलोन (Prednisone)

7.5 मिलिग्राम दिन में एक बार
वजन बढ़ना, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, अस्थिक्षयन (Osteoporosis)
इम्युनोमोड्यूलेट्री, साइटोटॉक्सिक और इम्युनोमोसप्रेसिव दवाइयाँ
Azathioprine



1 मिलिग्राम/किलो (50–100 मिलिग्राम) दिन में एक या दो बार, 6-8 हफ्ते बाद 0.5 मिलिग्राम/किलो/दिन के हिसाब से मात्रा बढ़ाएं फिर हर 4 हफ्ते में मात्रा बढ़ाएँ।  अधिकतम मात्रा 2.5 मिलिग्राम/किलो/दिन है।
यकृत में खराबी, बोनमेरो का दमन, साइक्लोस्पोरिन के प्रयोग से कैंसर का खतरा, गुर्दे कमजार होना
Cyclophosphamide



2–3 मिलिग्राम/किलो रोजाना गोली के रूप में या आई.वी. पल्स थेरेपी: 0.75 ग्राम/मीटर2 हर माह (मात्रा को 1 ग्राम/मीटर2/माह के हिसाब से बढ़ा कर 6 माह तक दी जाती है यदि टी.एल.सी.  3000/µL से अधिक बना रहे), इसे 30-60 मिनट में धीरे-धीरे दिया जाता है। साथ में मुँह या आई.वी. द्वारा तरल दिये जाते हैं।
साइक्लोस्पोरीन (Cyclosporine)
50 मिलिग्राम प्रति दिन , अधिकतम मात्रा 1.75 मिलिग्राम /किलो सुबह शाम 
बायोलोजिक एजेन्ट
अबाटासेप्ट (Abatacept)
शुरू में 750 मिलिग्राम इंजेक्शन आइ.वी. दिया जाता है, फिर 2 हफ्ते बाद, 4 हफ्ते बाद और फिर हर 4 हफ्ते बाद इंजेक्शन दिया जाता है।
फेफड़े में खराबी संक्रमण का जोखिम, सिरदर्द, यू.आर.आई., गले में खारिश, उबकाई
रिटुक्सीमेब (Rituximab)
1 ग्राम इंजेक्शन आइ.वी. दिया जाता है, फिर 2 हफ्ते बाद, 4 हफ्ते बाद और फिर हर 4 हफ्ते बाद एक इंजेक्शन दिया जाता है।
इंजेक्शन देते समय – इंजेक्शन की जगह पर चकत्ते बन जाना, कमर दर्द, बुखार, उच्च रक्तचाप या रक्तचाप कम हो जाना,  संक्रमण या कैंसर का खतरा, बोनमेरो का दमन
IL-1 रिसेप्टर विरोधी
ऐनाकिनरा  (Anakinra)
100 मिलिग्राम इंजेक्शन रोज त्वचा के नीचे (SC) लगाये    
इंजेक्शन की जगह रियेक्शन, रक्षाप्रणाली और बोनमेरो का दमन
टी एन एफ - α विरोधी
एडालिमुमेब (Adalimumab)
40 मिलिग्राम का इंजेक्शन रोज त्वचा के नीचे (SC) हर 1 या 2 हफ्ते में लगावें
संक्रमण (संभवतः टी.बी.) या कैंसर का जोखम, लिम्फोमा, बोनमेरो दमन, यकृत में खराबी, नाड़ी विकार
इटानरसेप्ट (Etanercept)
25 मिलिग्राम का इंजेक्शन रोज त्वचा के नीचे सप्ताह में दो बार या 50 मिलिग्राम का इंजेक्शन रोज त्वचा के नीचे प्रति सप्ताह  
इन्फिक्सीमेब (Infliximab)


3 मिलिग्राम/किलो सेलाइन में मिला कर आइ.वी. दी जाती है। इसके 2 और 6 सप्ताह बाद दूसरी और तीसरी ड्रिप दी जाती है। फिर हर 8 हफ्ते में एक ड्रिप दी जाती है। (मात्रा 10 मिलिग्राम किलो के हिसाब बढ़ाई जा सकती है)