Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

23.10.12



अजय सिंह को विस उपाध्यक्ष और हरवंश सिंह को प्रदेश चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाने के असंतुष्टों के प्रस्ताव से सियसी हल्के हुये भौंचक
 बीते दिनों दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर असंतुष्ट विधायकों की केन्द्रीय नेताओं से हुयी मुलाकात अखबारों की सुर्खी बनी हुयी हैं। इन नेताओं ने मिशन 2013 में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिये केन्द्रीय नेताओं एक पांच सूत्रीय र्फामूला सुझाया हैं। अखबारों में दावा किया जा रहा हैं कि यह मुहिम प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेश जोशी के नेतृत्व में चलायी जा रही हैं जिसमें सिंधिया समर्थक गुट शामिल हैं। इस अभियान से यह चर्चा जोर पकड़ गयी हैं कि अभी से मुख्यमंत्री बनने की बिसात बिछना चालू हो गयी हैं। इंकाई राजनीति को जानने वालों का दावा है कि महेश जोशी की हरवंश सिंह के बीच  सालों से तना तनी चल रही हैं। राजनैतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि हरवंश-शिवराज सांठ गांठ के आरोपों के चलते यह मुहिम फेल भी हो सकती हैं। हाल ही में संविधान में हुये संशोधन ाके लेकर जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन खासे उत्साहित हें कि गड़करी की भांति उन्हें भी लगातार दूसरी पारी खेलने को मिल सकती हैं। सिवनी के पूर्व और वर्तमान भाजपा विधायकों नरेश दिवाकर और नीता पटेरिया को अन्य जिलों का चुनाव प्रभारी बनाने को लेकर भी तरह तरह की चर्चायें जारी हैं। पिछले विस चुनाव में गौगपा उम्मीदवार के रूप में 39 हजार वोट लेने वाली इंका नेत्री एवं जनपद अध्यक्ष राजेश्वरी उइके ने आगामी चुनाव में कांग्रेस से उम्मीदवार बनने के लिये अपनी दावेदारी ठोंक दी हैं।
जिले मे चर्चा है प्रदेश इंका असंतोष की-प्रदेश कांग्रेस में चल रहे उठा पटक के दौर की जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चा जारी हैं। बीते दिनों दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर असंतुष्ट विधायकों की केन्द्रीय नेताओं से हुयी मुलाकात अखबारों की सुर्खी बनी हुयी हैं। इन नेताओं ने मिशन 2013 में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिये केन्द्रीय नेताओं एक र्फामूला सुझाया हैं। इस र्फामूले तहत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया को केन्द्रीय मंत्री बनाने, केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को विधानसभा उपाध्यक्ष बनाने, वरिष्ठ आदिवासी विधायक बिसाहूलाल सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाने और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह को प्रदेश चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया गया हैं। अखबारों में दावा किया जा रहा हैं कि यह मुहिम प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेश जोशी के नेतृत्व में चलायी जा रही हैं जिसमें सिंधिया समर्थक गुट शामिल हैं। इस अभियान से यह चर्चा जोर पकड़ गयी हैं कि अभी से मुख्यमंत्री बनने की बिसात बिछना चालू हो गयी हैं जबकि आज इस बात कीे कोई गारंटी नहीं हैं कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन ही जायेगी। गुटबाजी के लिये मशहूर मध्यप्रदेश में जब तक कांग्रेस के सभी गुटों को आला कमान पूरी सख्ती के साथ एक जुट होकर कांग्रेस को जिताने के लिये लाम बंद नहीं करेगा तब तक कांग्रेंस की संभावनायें प्रबल नहीं बन सकती हैं। और ऐसा हो पायेगा? यह कहना भी अभी संभव नहीं दिख पा रहा हैं। चूंकि इस अभियान में दिये गयेसुझावों में से एक हरवंश सिंह को प्रदेश चुनाव समिति के अध्यक्ष बनाने का भी है इसलिये जिले के राजनैतिक हल्कों में बन रहे इस नये राजनैतिक समीकरण का विश्लेषण भी किया जा रहा हैं। इंकाई राजनीति को जानने वालों का दावा है कि महेश जोशी की हरवंश सिंह के बीच  सालों से तना तनी चल रही हैं। ऐसे में उनके नेतृत्व में चलाये जा रहे अभियान में प्रदेश चुनाव समिति के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद के लिये उनका नाम कैसे शामिल हो गया। जानकार सूत्रों का दावा हैं कि विधायकों के माफीनामे के कांड़ के बाद दिग्गी खेमा हरवंशसिंह से खासा नाराज हैं। इसका खुलासा भी बीते दिनों जिले के कई इंका नेताओं ने देखा भी हैं। इसको भांपते हुये हरवंश सिंह ने एक सोची समझी रणनीति के तहत कमलनाथ और दिग्गी खेमे से परे हट कर सिधिंया खेमे की ओर अपने कदम बढ़ा लिय हैं। परिसीमन समिति में इंका सांसदों में सिधिया और विधायक हरवंश सिंह सदस्य थे। इस दौरान बने संबंधों के चलते ही उन्होंने निकटता बढ़ायी और चार साल तक विपक्ष की सरकार में भी लाल बत्ती का सुख भोगने के बाद अब चुनाव समिति का अध्यक्ष बन कर मिशन 2013 में तुरुप के पत्ते बनने का प्रयास चालू कर दिया हैं। इस र्फामूले की एक विशेषता और यह हैं कि मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अजय सिंह करे विस उपाध्यक्ष के संवैधानिक पद बिठाने और दूसरंे प्रबल दावेदार भूरिया को केन्द्र में भेजने की जो योजना हैं वह  भी  एक सोची समझी कूटनीतिक चाल कही जा रही  हैं। हरवंश सिंह यह बात भी भली भांति जानते है कि विस उपाध्यक्ष रहते हुये प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में भी वे सिर्फ विस अध्यक्ष ही बन सकते हैं। इस रास्ते से मुख्यमंत्री बनना संभव नहीं हैं। इसीलिये प्रदेश की राजनैतिक शतरंज में यह बिसात बिछायी गयी हैं। इंकाई हल्कों में यह भी चर्चा है कि कमलनाथ और दिग्गी राजा लंबे समय से हरवंश सिंह की राजनैतिक फितरतों को भली भांति जानते हैं जबकि सिंधिंया इससे उतने वाकिफ नहीं हैं। फिलहाल तो आला कमान ने डांट डपट कर असंतुष्टों को खाली हाथ लौटा दिया हैं लेकिन बताया जा रहा हैं कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात के विस चुनावों के बाद यह मुहिम एक बार फिर नये सिरे से चालू करने की योजना बनायी जा रही हैं। लेकिन राजनैतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि हरवंश-शिवराज सांठ गांठ के आरोपों के चलते यह मुहिम फेल भी हो सकती हैं।
भाजपा में क्या दूसरी पारी खेल पायेंगें सुजीत?-प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के संगठनात्मक चुनावों को लेकर इन दिनों खासी उत्सुकता बनी हुयी हैं। हाल ही में संविधान में हुये संशोधन ाके लेकर जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन खासे उत्साहित हें कि गड़करी की भांति उन्हें भी लगातार दूसरी पारी खेलने को मिल सकती हैं। सिवनी के पूर्व और वर्तमान भाजपा विधायकों नरेश दिवाकर और नीता पटेरिया को अन्य जिलों का चुनाव प्रभारी बनाने को लेकर भी तरह तरह की चर्चायें जारी हैं। संगठनात्मक चुनाव, सहकारिता के चुनाव और अगली विधानसभा टिकिट लो लेकर कुछ भाजपा नेताओं की डिनर डिप्लोमेसी की भी भाजपायी खेमे में खासी चर्चा हें।  जिले में कई गुटों में बंटी भाजपा में प्रदेश नेतृत्व कैसे तालमेल बिठायेगा और किसकी झोली मे क्या आयेगा? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं। वर्तमान जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के कार्यकाल में हुये एक मात्र लखदौन नगर पंचायत के चुनाव में भाजपा की हुयी करारी हार को उनके विरोधी नेता हथियार बनाने की फिराक में हैं। इसमें वे कहां तक कामयाब होते हैं? इसका खुलासा तो चुनावों के बाद ही हो पायेगा। 
इंका में लखनादौन विस से राजेश्वरी ने किया दावा -कभी कांग्रेस का मजबूत किला रही लखनादौन विस क्षेत्र में मिशन 2013 को लेकर अभी से हलचल चालू हो गयी हैं। पिछला चुनाव गौगपा से लड़कर 30 हजार 8 सौ 57 वोट लेने वाली राजेश्वरी उइके अब कांग्रेस में आकर वर्तमान में लखनादौन जनपद पंचायत की अध्यक्ष हैं। पिछले चुनाव में इंका प्रत्याशी पूर्व विधायक बेनी परते को 41211 तथा चुनाव जीतने वाली भाजपा की शशि ठाकुर को 46209 वोट मिले थे। आजादी के बाद से इस क्षेत्र में कभी ना हारने वाली कांग्रेस को 2003 के चुनाव में शशि ठाकुर ने ही पहली हराया था और भाजपा का परचम फहराया था। हाल ही में यह समाचार सियासी हलकों में चर्चित रहा कि लखनादौन क्षेत्र के 25 हजार आदिवासियों ने हस्ताक्षर करके राजेश्वरी उइके को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने की गुहार आलाकमान से की हैं। इस पत्र में यह लिखा गया हैं कि राजेश्वनी उइके ही भाजपा से इस क्षेत्र को वापस कांग्रेस को दिला सकतीं हैं। अब इसे क्या कहा जाये कि इंका नेता हरवंश की राजनैतिक चालों एवं उनके समर्थकों द्वारा की गयी हरकतों के चलते ही कांग्रेस का यह किला धूल धूसरित हो गया और हरवंश के समर्थक ही इस किले पर फिर से कांग्रेस का परचम फहराने का दावा कर रहें हैं। इतने पहले चालू हुयी राजनैतिक गतिविधियों को लेकर सियासी हल्कों में आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा हैं। उल्लेखनीय हैं कि हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह के परिसीमन के बाद समाप्त हो गयें घंसौर विस क्षेत्र का काफी बड़ा हिस्सा भी अब लखनादौन क्षेत्र में शामिल हो गया हैं।“मुसाफिर” 

22.10.12

बिहार में महिला थानों का औचित्य-ब्रज की दुनिया

मित्रों,बिहार के लोगों की रचनात्मकता का कहना ही क्या? व्याकरण के दृष्टिकोण से जो शब्द रूढ़ हैं उन्हें भी वे अक्सर यौगिक और कभी-कभी तो योगरूढ़ में बदल देते हैं। अब दरोगा (या दारोगा) शब्द को ही लीजिए हमने इसको भी सीधे योगरूढ़ में बदल दिया है। दरोगा अर्थात् द रो के या गा के यानि इस दोपाया (आदमी या जानवर का निर्णय हम आप पर छोड़ते हैं) के शिकंजे में अगर आप आ गए हैं तो आपको कुछ-न-कुछ पैसा देना ही पड़ेगा चाहे खुश होकर दीजिए या रो पीटकर। ये लोग निश्चित रूप से (यहाँ मैं कथित रूप से लिखना गैरजरूरी समझता हूँ) अपने पिता को भी नहीं छोड़ते हैं। उनको भी अगर कभी पुलिस थाने से कोई काम पड़ जाए और उनका बेटा ही क्यों न दरोगा रहे उनको भी पैसा देना ही पड़ेगा। बाप के लिए कोई कैसे नियम को बिगाड़ या तोड़ सकता है-रूल ईज रूल।
                  मित्रों, जब भी आप बिहार के किसी थाने में प्रवेश करेंगे बड़े मोटे अक्षरों में कुछ ईबारतें दीवारों पर लिखी हुई मिलेंगी, जैसे-ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति होती है, क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ इत्यादि। परन्तु ये ईबारतें सिर्फ दिखावे के लिए होती हैं। लिखना जरूरी होता है सो लिख दिया जाता है वैसे कोई इन्हें पढ़ता नहीं। दरोगा जी पढ़ने की जरुरत नहीं समझते और आरोपी य़ा आरोपित पढ़कर क्या करेगा? अगर कभी प्रतिवादस्वरूप किसी ने कह दिया कि हुजूर दीवार पर लिखा तो ऐसा है आपने तो यकीन मानिये उसे सैंकड़ों गालियाँ तो सुनने को मिलेंगी ही हो सकता है कि सरकारी कर्मचारी/अधिकारी पर हाथ उठाने या काम में बाधा डालने के झूठे इल्जाम में तत्काल भीतर भी कर दिया जाए। हो तो यह भी सकता है कि स्पेलिंग मिस्टेक के चलते मुकदमे की धारा ही बदल जाए,जैसे-धारा 107 धारा 307 हो जाए और यहाँ 1 और 3 का फर्क आप भी जानते होंगे।
                मित्रों, कई बार आपने देखा होगा कि पुलिस रेलवे स्टेशन,बस स्टैण्ड आदि स्थानों से चोर,पॉकेटमार को गिरफ्तार करके ले जाती है। आपने कभी पता लगाया है कि उनका क्या होता है और क्या किया जाता है? आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार में 99.99 आवर्त प्रतिशत ऐसे चोर-पॉकेटमार थाना पहुँचने से पहले या पहुँचने के फौरन बाद बाईज्जत छोड़ दिए जाते हैं कदाचित इस हिदायत के साथ कि काम सफाई से करो,कैसे पकड़े गए। हमारे राज्य बिहार में यह पुलिस की ही कृपा है कि राज्य में सुशासन में भी इतने अपराध हो रहे हैं। पुलिस नहीं होती तो शायद अपराध कब के बंद हो चुके होते। सच्चाई यह भी है कि लोगों के बीच जितना आतंक निजी गुंडों का नहीं है उससे कई गुणा ज्यादा वे वर्दीवाले गुंडों से डरते हैं। एक बड़ा ही रोचक चुटकुला हमारे बिहार में वर्षों से प्रचलन में है और कदाचित् हमेशा रहेगा। हुआ यूँ कि एकबार मुम्बई से एक मराठी बिहार आया और मुम्बई पुलिस के बारे में किसी बिहारी को बताने लगा कि मुम्बई में तो अपराध होने के 24 घंटे के भीतर ही पुलिस अपराध करनेवालों का पता लगा लेती है, गजब की फास्ट है मुम्बई पुलिस। तब बिहारी ने बिहार पुलिस का महिमामंडन करते हुए सिर ऊँचा करके और मूँछों पर ताव देते हुए कहा कि ये तो कुछ भी नहीं है हमारे यहाँ की पुलिस को तो अपराध होने के 24 घंटे पहले से ही पता होता है कि कहाँ अपनाध होनेवाला है और उसमें कौन-कौन शामिल होनेवाले हैं।
                     मित्रों,न जाने कितनी सरकारें बिहार में आईं और गईं, न जाने कितने एसपी,डीएसपी आए और गए परन्तु बिहार के थानों का न तो स्वभाव ही बदला और न तो सूरत ही। ये थाने आजादी से पहले भी रक्त-चूषक केंद्र थे और आज भी हैं। अब आप कहेंगे कि आपने तो पढ़ा है कि बिहार में तो सुशासन बाबू का सुशासन है। सुशासन है, जरूर है लेकिन अभी तक वह थानों का चक्कर ही लगा रहा है बेचारा थानों में घुसने लायक साहस ही नहीं जुटा पाया है। सुशासन बाबू ने जबसे अफसरों की ताकत में ईजाफा किया है तबसे तो जनता की प्रतिनिधि खादी भी थाने में घुसने से डरती है तो फिर सुशासन कहाँ से लाएगा हिम्मत? वैसे भी राज की बात तो यह भी है कि बिहार में इन दिनों न तो सुशासन बाबू का राज है और न ही कानून का बल्कि अफसरों का राज है। अफसर जो कहें वही कानून है और वे जो करें वही कानून का पालन है। उदाहरण के लिए अगर किसी थाने में थानेदार किसी महिला के साथ बलात्कार कर रहा है तो यह माना जाना चाहिए कि उसने ऐसा करके बलात्कारियों से उक्त महिला की रक्षा की है।
                              मित्रों, पहले से ही पुलिस थाने बिहार की गरीब जनता की आहिस्ता-आहिस्ता खाल उतारने में तन्मयता से लगी हुई थी परन्तु नीतीश जी का दिल तो बहुत बड़ा है और हमेशा मोर एंड मोर मांगता रहता है सो जनाब ने जनता को लूटने के अतिरिक्त केंद्र खोलने की न केवल योजना बनाई बल्कि खोल भी डाले। नहीं समझे क्या? जनाब मेरा मतलब महिला थानों से है। महिलाओं की (कदाचित् पत्नी को छोड़कर) विशेष चिंता करनेवाले नीतीश जी ने पूरे बिहार के प्रत्येक जिले में एक-एक महिला थाना खोला है जहाँ महिलाओं से संबंधित मामले दर्ज किए जाएंगे और उनके प्रति होनेवाले अपराधों पर बाजाप्ता अनुसंधान किया जाएगा। इनके खुलने से बिहार की आम महिलाओं को भले ही कोई फायदा नहीं हुआ हो (यकीनन होगा भी नहीं) इन थानों की महिला थानेदारों के घरों में तो छत तोड़कर श्यामा-लक्ष्मी की बरसात हो रही है। ये महिला थानेदार रिश्वत (अथवा रंगदारी) वसूलने में पुरूष-महिला समानता में बिल्कुल भी यकीन नहीं रखती हैं बल्कि इनका तो मानना है कि कम-से-कम इस मामले में तो स्त्रियों को पुरूषों से श्रेष्ठ होना ही चाहिए।
                            मित्रों, अभी कुछ दिन पहले मेरे दूधवाले ...... सिंह जो हाजीपुर के गंगाब्रिज थाने के सहदुल्लापुर के रहनेवाले हैं ने मुझे दूध देना बंद कर दिया। मुझे बड़ी चिंता हो गई क्योंकि जबसे हम महनार से हाजीपुर आए हैं वही हमें दूध दे रहे हैं। मुझे लगा कि कहीं मर-वर तो नहीं गए बेचारे बीमार तो थे ही। सो एक दिन ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उनके घर पहुँचा तब पता चला कि कुछ दिन पहले भतीजे और उसकी पत्नी से उनकी हल्की-फुल्की हाथापाई हो गई थी और उनका भतीजा सपत्नीक गंगाब्रिज थाने में मुकदमा करने चला गया। गंगाब्रिज थाने ने उसे समझा-बुझाकर लौटा दिया तो उसने जिला महिला थाना में जाकर केस कर दिया। उन्होंने यानि मेरे दूधवाले ने थानेदारनी को पैसे भी दिए हैं परन्तु थानेदारनी फिर भी दो-चार दिन बीचकर दरवाजे पर पुलिस-गाड़ी खड़ा कर देती है और इस प्रकार पूरा परिवार हाड़तोड़ मेहनत करके जो कुछ कमाता है छीन कर ले जाती है, ऊपर से बहुत कर्ज भी हो गया है। उनका भतीजा भी उनकी ही तरह घोर गरीब है और जाहिर है कि उसका हाल भी कोई अहलदा नहीं है। कैसे करूँ-क्या करूँ समझ में नहीं आ रहा। आप कुछ कर सकते हैं तो बताईये। मैंने सुना और सुनते ही मेरी समझ में भी नहीं आया कि मैं उसके लिए क्या करूँ और कैसे करूँ? आपके पास कोई उपाय हो तो बताईये नहीं तो बेचारे पर जब तक मुकदमा है ऐसे ही सपरिवार खटते-कमाते रहेंगे और भरते रहेंगे गोदान के होरी की तरह। समझ में तो मेरी यह भी नहीं आ रहा है कि क्या इसलिए बिहार में सुशासन बाबू ने महिला थानों की स्थापना की है?

21.10.12

पगथिया: आक और केक्टस

पगथिया: आक और केक्टस: आक और केक्टस  एक जंगल में आक और केक्टस के पौधे पास-पास में लगे हुए थे।केक्टस पर कांटे और सुन्दर फूल लगे थे।केक्टस के पास लगे आक के पौ...

19.10.12

अलसी मां की स्तुति


यह भजन "नटवर नागर नंदा भजो रे मन गोविंदा" की धुन पर बनाया गया है। 

पंचरत्न हलुवा


पंचरत्न हलुवा




सामग्री

बादाम     

50 ग्राम

पोस्तदाना     

50 ग्राम

मखाने   

50 ग्राम

सावा    

50 ग्राम

अलसी  

50 ग्राम

कसा हुआ नारियल    

10 ग्राम

पिसी इलायची      

एक टीस्पून

घी        

250 ग्राम

चीनी        

250 ग्राम

 

विधि

·       रात को बादाम और पोस्तदाने को पानी में भिगो दें।

·       सुबह मखानों को घी में थोड़ा तल लें और ठंडा होने पर मिक्सी में सूखा पीस लें।

·       अलसी और सावा को भी सूखा पीस लीजिये।

·       अब बादाम को छील कर और पोस्तदाने को मिक्सी में अलग अलग पीस लीजिये ।

·       बादाम, पोस्तदाना, मखाने और सावा को कढ़ाही में घी डाल कर मध्यम आंच पर अलग अलग भूनें जब तक सिकने की खुशबू नहीं आने लगे।

·       अब  कढ़ाही में भुने हुए बादाम, पोस्तदाना, मखाने, सावा और पिसी अलसी और बचा हुआ घी डाल कर 2-3 मिनट और भूनें। फिर अंदाज से पानी डाल कर हिलायें। 2-3 मिनट बाद चीनी डाल कर हिलाते रहें, जब पानी नहीं सूख जाये। बस अब आपका पंचरत्न हलुवा तैयार है। इसे कसे नारियल और इलायची से सुंदर बर्तन में सजायें। यह हलुवा वृत और उपवास में खाया जा सकता है। यह स्वादिष्ट हलुवा श्रीमती उषा वर्मा ने बनाया है।

 

सोनिया ने हमें दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया-ब्रज की दुनिया



मित्रों,हमने ऐसी कभी सपने में भी नहीं सोंचा था कि देश में कभी ऐसी पार्टी की सरकार भी आएगी जो उसे वोट देने और नहीं देनेवाले राज्यों के बीच इस कदर भेदभाव रखेगी। लेकिन वो कहते हैं न कि तेरे मन कछु और है कर्ता के कछु और। कभी-कभी आपका सोंचा हुआ नहीं भी होता है। इटली की बेटी और इंडिया की मदर सोनिया गांधी ने एक झटके में यह घोषणा करके कि कांग्रेस शासित राज्यों में रहनेवालों को साल में सिर्फ 9 सिलेंडर और नहीं रहनेवालों को सिर्फ 6 सिलेंडर दिए जाएंगे हमें दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया। क्या हम गैर कांग्रेसी सरकार वाले राज्य के लोग कम खाते हैं या आगे से कम खाएंगे? क्या उनको भारत के संविधान ने समानता का अधिकार नहीं दिया है? क्या गैर कांग्रेसी सरकारों वाले राज्यों में गरीब नहीं रहते सिर्फ अमीर ही रहते हैं? क्या इन राज्यों में महंगाई का असर नहीं पड़ रहा है? या वे आदमी नहीं जानवर हैं जो किसी तरह भी जी लेंगे?
               मित्रों,कल को कोई विधायक या एमपी क्या यह देखकर अपने क्षेत्र के लोगों की मदद करेगा कि उन्होंने उसे वोट दिया था कि नहीं? अगर वह सचमुच ऐसा करता भी है तो क्या वह लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों के प्रतिकूल नहीं होगा? लोकतंत्र का तो मतलब ही होता है अपने से अलग राय रखनेवालों की राय का भी सम्मान करना। तो क्या सोनिया जी को लोकतंत्र का मौलिक ज्ञान भी नहीं है? परन्तु ऐसा कैसे संभव है वह तो विदेश में ही जन्मी और पढ़ी है? या वे उन राज्यों के निवासियों को दंडित करना चाहती हैं जिन्होंने उनकी महाभ्रष्ट पार्टी को पहली बार में समझ लिया और वोट नहीं दिया। पूरे देश की जनता पहले से ही बेतहाशा महंगाई से परेशान है। आज जीना काफी कठिन और मरना काफी आसान हो गया है। जनसाधारण की थाली से बारी-बारी से दाल-दूध-सब्जी गायब हो चुकी है और अब उसके रसोईघर से गैस-सिलेंडर को भी गायब किया जा रहा है? सरकार कहती है कि 2 महीने में 1 सिलेंडर खर्च करो। कैसे हो सकेगा ऐसा? ऐसा हो पाना तो तभी संभव है जब हम महीने में 15 दिन तक उपवास रखें या फिर एक महीना बीच करके चांद्रयण व्रत रखें। भैया अपनी तो आप जानिए हमसे तो व्रत-उपवास कभी हुआ नहीं। कभी जन्माष्टमी के दिन उपवास रखा भी तो दोपहर होते-होते जान निकलने लगी और भोजन कर लिया। हाँ,इतना जरूर हो सकता है कि हम अपने बजट का पुनर्निधारण करें और खाद्य-सामग्री की मात्रा कम और भी कम कर दें जिससे सिलेंडर पर होनेवाले अतिरिक्त खर्च की यथासंभव भरपाई हो सके। गुणवत्ता से समझौता करने की हमें तो आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि वह तो हम पहले ही कर चुके हैं।
                    मित्रों,हालाँकि हमें इस कारण से उन लोगों से थोड़ा ज्यादा कष्ट दिया जा रहा है जो कांग्रेसशासित राज्यों के निवासी हैं परन्तु हमें इस बात के लिए कोई खेद बिल्कुल भी नहीं है कि हमने पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। बल्कि हमें खुद पर और पूरे बिहार की जनता पर गर्व है कि हम उन राज्यों में से एक हैं जहाँ के निवासियों ने सबसे पहले कांग्रेस के देशबेचवा (देश को बेचनेवाला) और देशखौका (देश को खानेवाला) चरित्र को समझ लिया था। हम यह गारंटी भी अभी से देते हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बिहार से एक भी सीट नहीं मिलनेवाली है। लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार को अभी से ही दूसरे किसी राज्य में ठिकाना ढूंढ़ लेना चाहिए। साथ ही मैं अन्य राज्यों के लोगों से भी निवेदन करता हूँ कि अभी से ही कांग्रेस को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकने का मन बना लीजिए नहीं तो एक बार और अगर यह डकैत पार्टी सत्ता में आ गई तो हमारे साथ-साथ आप भी सिलेंडर तो क्या थाली तक खरीदने के लायक भी नहीं रह जाएंगे।

पवार के मामले में चुप्पी क्यों साधे हैं दिग्गज!


नई दिल्ली। केंद्रीय कृषि मंत्री एवं राष्टÑवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार के विवादित मामले में विपक्षी दलों ने भी आश्चर्यजनक रूप से ‘संयम’ का परिचय दिया है। इन लोगों ने उन पर लगे घोटालों के आरोपों पर एकदम नरम तेवर अपनाए रखे। जबकि ऐसे मामलों में आमतौर पर विपक्षी नेता आक्रामक निशाना साधते नजर आते हैं। पूर्व आईपीएस अफसर एवं वकील वाई पी सिंह ने पवार के कुनबे पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाए हैं। कहा है कि बहुचर्चित लवासा सिटी प्रोजेक्ट में अरबों रुपए का खेल कर दिया गया है। इस खेल में शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार की खास भूमिका रही है। इस घोटाले के तमाम दस्तावेज, उन्होंने अरविंद केजरीवाल को दिए थे। लेकिन उन्होंने भी अज्ञात कारणों से इस मामले को दबाए रखा। ऐसे में उन्होंने खुद पवार कुनबे की पोल खोलने की मुहिम शुरू कर दी है। वाई पी सिंह ने कल मुंबई में मीडिया कांफ्रेंस करके लवासा मामले का खुलासा किया है। उन्होंने एक तरफ पवार परिवार को लपेटे में लिया, तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के चर्चित कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल की नीयत पर भी सवाल उठाया है। वाई पी सिंह ने इस बात पर खास हैरानी जाहिर की है कि केजरीवाल ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ मामला उठाने की पहल कर दी। जबकि लवासा सिटी घोटाले के आगे गडकरी की जमीन का विवाद बहुत छोटा मामला है। उल्लेखनीय है कि बुधवार को यहां टीम केजरीवाल ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने महाराष्टÑ सरकार से मिली-भगत करके किसानों की 100 एकड़ जमीन खुद ले ली है। जबकि यह जमीन बांध बनाने के लिए किसानों से बहुत सस्ती दरों पर ली गई थी। लेकिन गडकरी अपने राजनीतिक रुतबे का लाभ व्यवसायिक हितों के लिए लगातार ले रहे हैं। उनकी 17 कारोबारी कंपनियां हैं। जिनका सालाना कारोबार अरबों रुपए का है। केजरीवाल कहते हैं कि ऐसे में गडकरी, नेता कम व्यापारी ज्यादा हैं। इस स्थिति में मुख्य विपक्षी दल भाजपा से देश कैसे उम्मीद करे कि वह गडकरी के नेतृत्व में विपक्ष की सही भूमिका निभा भी पाएगी। इस मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में विवाद गरम बना हुआ है। कांग्रेस के नेताओं ने मांग की है कि टीम केजरीवाल के आरोप गंभीर हैं। ऐसे में नैतिकता के आधार पर भाजपा नेतृत्व को ही तय कर लेना चाहिए कि किस तरह की जांच जरूरी है। टीम केजरीवाल के आरोपों को गडकरी ने खारिज किया है। उन्होंने कह दिया है कि वे इस मामले में किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हैं। इस मामले में एक खास बात यह है कि यहां राजनीतिक हलकों में कई दिन से चर्चा थी कि केजरीवाल, गडकरी के खिलाफ कोई मामला उठाने वाले हैं। ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने भी पहले से ही पलटवार की रणनीति बना ली थी। पार्टी नेतृत्व ने टीम केजरीवाल के आरोपों को नकारने में देरी नहीं लगाई थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने यहां तक कह डाला कि गडकरी पर गलत आरोप लगाकर टीम केजरीवाल ने अपनी रही-सही साख भी डुबो दी है। गडकरी के मामले के पहले टीम केजरीवाल ने केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के प्रकरण में बवाल खड़ा किया था। आरोप लगाया था कि खुर्शीद के नेतृत्व वाले एक एनजीओ ने विकलांग कल्याण के नाम पर लाखों रुपए का घोटाला किया है। इस हेरा-फेरी के लिए बडेÞ पैमाने पर फर्जी वाड़ा किया गया है। इन आरोपों को लेकर कांग्रेस का नेतृत्व टीम केजरीवाल के प्रति आक्रामक मुद्रा में आ गया है। केंद्रीय मंत्री खुर्शीद ने एक टीवी चैनल को कानूनी लड़ाई में घसीट लिया है। इस मसले पर टीम केजरीवाल कई दिनों तक दिल्ली में प्रदर्शन करती रही है। खुर्शीद के इस्तीफे की मांग को लेकर केजरीवाल अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ एक दिन नजरबंद भी रह चुके हैं। अब उन्होंने ऐलान किया है कि वे 1 नवंबर को खुर्शीद के संसदीय क्षेत्र फर्रुखाबाद में आंदोलन करेंगे। इस ऐलान को लेकर खुर्शीद ने कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया है। गुस्से में वे कई बातें ऐसी कह गए, जिसे कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी पचा नहीं पा रहा है। खुर्शीद मामले के पहले टीम केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ समूह के लेन-देन के मामले में तमाम गंभीर आरोप लगाए थे। चूंकि यह मामला सीधे सोनिया गांधी के परिवार से जुड़ा था, ऐसे में राजनीतिक विवाद अब तक ठंडा नहीं हुआ है। इस प्रकरण को लेकर कांग्रेस का नेतृत्व टीम केजरीवाल से बुरी तरह से खफा है। लेकिन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के कार्यकर्ता लगातार किसी ना किसी बड़े नेता पर निशाना साधने में लगे हुए हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री पवार पर निशाना साधने वाले वाई पी सिंह ने एक तरफ, जहां पवार की भूमिका पर आरोपों की बौछार की है, वहीं दूसरी तरफ केजरीवाल की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। वाई पी सिंह का दावा है कि 2002 में शरद पवार के भतीजे, अजित पवार ने महाराष्टÑ के सिंचाई मंत्री के रूप में एक निजी कंपनी ‘लेक सिटी कॉरपोरेशन’ पर खास मेहरबानी की थी। इन्होंने किसानों की 348 एकड़ जमीन डेवलप करने के लिए लेक सिटी को दे दी थी। वह भी महज 23 हजार रुपए महीने की लीज पर। यह जमीन इस संस्थान को फिलहाल 30 साल के लिए लीज पर दी गई है। पूर्व आईपीएस अफसर का दावा है कि वे जो भी आरोप लगा रहे हैं, उनके पास सभी के पुख्ता प्रमाण हैं। आरोप है कि अजित पवार ने कॉरपोरेशन पर मेहरबानी इसलिए की थी, क्योंकि इसमें शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले और उनके पति के करीब 21 प्रतिशत के शेयर थे। हालांकि 2006 में सुप्रिया ने अपने शेयर बेच दिए थे। दावा किया गया है कि परोक्ष रूप से पवार परिवार, लवासा सिटी प्रोजेक्ट में बड़ा लाभार्थी रहा है। ‘एक्सिस बैंक’ ने लवासा कॉरपोरेशन का मूल्यांकन 10 हजार करोड़ रुपए का किया है। इसमें सुप्रिया के पति के 10 प्रतिशत के शेयर अभी भी हैं। ऐसे में उनकी यह संपत्ति अरबों रुपए की बैठती है। जबकि 2009 में सुप्रिया ने जब लोकसभा का चुनाव लड़ा था, तो उन्होंने अपने परिवार की निजी संपत्ति महज 15 करोड़ रुपए ही घोषित की थी। ऐसे में संपत्ति के शपथ-पत्र में भी उन्होंने धोखाधड़ी की है। केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में शरद पवार ने लवासा कॉरपोरेशन को किस तरह के फायदे कराए हैं, इनको लेकर भी वाई पी सिंह ने तमाम आरोप लगाए हैं। आरोपों से जुड़े तमाम दस्तावेज भी उन्होंने मीडियावालों को दिए थे। इतने गंभीर आरोप पवार पर एक साथ लगा दिए गए हैं। इसके बावजूद विपक्षी दलों ने इस मामले को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया है। भाजपा-शिवसेना सहित किसी विपक्षी दल ने पवार के खिलाफ कोई कड़ी टिप्पणी नहीं दर्ज कराई है। टीम केजरीवाल के सिपहसालार कुमार विश्वास कहते हैं कि दरअसल, बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार खुलने से इनके बीच एक अघोषित गठजोड़-सा हो गया है। शायद इसी का नतीजा है कि नेता एक-दूसरे के खिलाफ बोलने से परहेज कर रहे हैं। कुमार विश्वास ने वाई पी सिंह के इन आरोपों को गलत ठहराया है कि किसी खराब नीयत के चलते उनकी टीम ने पवार के मामले को दबाने की कोशिश की थी। कुमार विश्वास का दावा है कि वे लोग पवार के मामले में और पुख्ता तैयारी करने के फेर में थे। लेकिन वाई पी सिंह धैर्य नहीं रख पाए और अब गलत आरोप लगा रहे हैं। अपने इस रवैये से पता नहीं, वे किसका हित साधना चाहते हैं? साभारः- वीरेंद्र सेंगर (कार्यकारी संपादक), डीएलए

18.10.12

राम शिव मूर्ति यादव को 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा द्वारा 'हिंदी भाषा-भूषण' की मानद उपाधि


देश-विदेश में प्रतिष्ठित साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संस्था 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा ( राजस्थान) ने प्रखर लेखक श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनकी हिंदी सेवा के लिए हिंदी दिवस (14 सितम्बर, 2012 ) पर आयोजित दो दिवसीय सम्मलेन में "हिंदी भाषा-भूषण" की मानद उपाधि से अलंकृत किया | हिंदी के विकास को समर्पित इस सम्मलेन में देश-विदेश के तमाम साहित्यकारों और लेखकों ने भाग लिया | गौरतलब है कि 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा की स्थापना आजादी से पूर्व वर्ष 1937 में हुई थी और तभी से यह प्रतिष्ठित संस्था हिंदी को समृद्ध करने और हिंदी-सेवियों को उनके योगदान के आधार पर सम्मानित कर अपनी गौरव-गाथा में वृद्धि कर रही है. इस वर्ष श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनकी विशिष्ट हिंदी सेवा के लिए साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा के अध्यक्ष श्री नरहरि ठाकर एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग व साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा के सभापति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा ने सारस्वत सम्मान करते हुए उपाधि-पत्र, भगवान श्रीनाथ जी की भव्य स्वर्ण जल से हस्तनिर्मित सुशोभित चित्र एवं अन्य मानद वस्तुएं भेंट किया। इस अवसर पर आयोजित सम्मलेन में विचार गोष्ठी,सम्मान समारोह व साहित्यकारों द्वारा बैंड बाजों के साथ नगर भ्रमण द्वारा हिंदी का प्रचार -प्रसार व जागरूकता का आयोजन भी किया गया |

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। यदुवंशियों पर आधारित प्रथम हिंदी ब्लॉग ”यदुकुल” (http://www.yadukul.blogspot.in/) का भी आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है। दुनिया भर के लगभग 65 देशों में पढ़े जाने वाले इस ब्लॉग को 293 से ज्यादा लोग नियमित रूप से अनुसरण करते हैं, वहीँ इस ब्लॉग पर अब तक 315 से ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं। इस ब्लॉग की लोकप्रियता का अंदाजा इसे से लगाया जा सकता है कि आज इस ब्लॉग को करीब 65,000 से ज्यादा लोग पढ़ चुके हैं।

इससे पूर्व श्री राम शिव मूर्ति यादव जी को भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए 'ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान' (2007), 'डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान' (2011), अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु रिपब्लिकन पार्टी के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले द्वारा ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011', राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद द्वारा विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘भारती ज्योति’ सम्मान, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘बृज गौरव‘, म.प्र. की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी द्वारा 'भारत-भूषण' (2010) की मानद उपाधि से अलंकृत किया जा चूका है। श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनके सृजनात्मक एवं मंगलमयी जीवन के लिए अनंत शुभकामनाएं।

सुर्खियों के लिए केजरीवाल की जल्दबाजी


 राजनीति में रहना है तो खबरों में बने रहना बहुत जरुरी है। सरकारी अधिकारी से पहले समाजसेवी बने और फिर समाजसेवी से राजनीतिज्ञ बने अरविंद केजरीवाल को शायद ये बात समझ में आ गयी है। इसलिए शायद अब केजरीवाल सुर्खियों में बने रहने के लिए हर वो काम कर रहे हैं जो उन्हें देश की जनता के बीच जिंदा रख सके। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगाए गए आरोपों के बाद कहीं न कहीं लगता है कि केजरीवाल ने इस बार जल्दबाजी कर दी और इस बार उनकी प्रेस कांफ्रेस में वो धार भी नहीं दिखाई दी...जिसके लिए आमतौर पर केजरीवाल जाने जाते हैं। न ही केजरीवाल कोई इतना बड़ा धमाका गडकरी के खिलाफ कर पाए कि गडकरी के साथ ही देश की मुख्य विपक्षी पार्टी मुश्किलों में घिरती नजर आती। उस पर उस किसान गजानन घड़गे का पहले प्रेस कांफ्रेंस के बाद गायब हो जाना और फिर ये बयान देना की उसका गडकरी से कोई विवाद नहीं है...औऱ ये कहना कि गडकरी जी ने मेरी मदद की है...ने केजरीवाल एंड कंपनी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में केजरीवाल और दमानिया के दूसरे आरोप कि महाराष्ट्र में गडकरी और अजीत पवार की सांठगांठ का आरोप है...इस बात का खुलासा तो केजरीवाल और अंजलि उस वक्त ही कर चुकी थी जब सिंचाई घोटाले को उठाने के लिए गडकरी के पास जाने की बात कही थी। जिस बड़े खुलासे का दावा प्रेस कांफ्रेस से तीन चार दिन पहले तक किया जा रहा था...और जितनी उत्सुक्ता भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को और आम लोगों को इस प्रेस कांफ्रेंस को लेकर थी वो प्रेस कांफ्रेंस शुरु होती ही निराशा में बदल गई। क्योंकि प्रचार खुलासे को लेकर प्रेस कांफ्रेस से पहले किया गया था उससे जहां कांग्रेस ये मानकर बैठी थी कि अब उसके हाथ भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा लग सकता है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं...औऱ वैसे भी कांग्रेस महाराष्ट्र में एनसीपी के सहयोग से सरकार चला रही है...और महाराष्ट्र सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्री जो एनसीपी से ताल्लुक रखते हें...उनसे सांठगांठ का आरोप गडकरी पर लगाया गया तो कांग्रेस तो चाहकर भी इस मुद्दे को नहीं भुना सकती...क्योंकि माहाराष्ट्र और केन्द्र में दोनों जगह एनसीपी कांग्रेस की बैसाखी बनी हुई है। अऱविंद केजरीवाल के जिस जल्दबाजी में बिना बहुत कुछ साक्ष्य जुटाए वही पुराने आरोप गडकरी के खिलाफ दोहराए तो उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल अखबार और टीवी की सुर्खियां बने रहना चाहते हैं...वैसे देखा जाए तो खुद के राजनीतिक वजूद को जिंदा रखने के लिए केजरीवाल को कुछ न कुछ ऐसा करना ही होगा...और बड़े राजनेताओं पर आरोप लगाकर इससे अच्छा तरीका दूसरा तो कई और नहीं हो सकता...लेकिन जो भी आरोप या खुलासा करने का दावा केजरीवाल एंड कंपनी करती है निश्चित ही तौर पर उसमें उतना ही दम भी होना चाहिए...या उन चीजों को बार बार दोहराने से केजरीवाल को बचना चाहिए। क्योंकि देश भर में जिस माहौल के बीच अरविंद केजरीवाल ने अन्ना के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का आगाज़ किया था...उससे लोगों को उम्मीदें उनकी औऱ उनकी टीम से बढ़ गई थी...लेकिन अन्ना के अलग होने के बाद औऱ केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश के बाद लोगों का केजरीवाल एंड कंपनी से मोह भंग भी हुआ है...हालांकि इसके बाद भी केजरीवाल के आंदोलनों में बड़ी संख्या में जिस तरह से लोग उनका साथ देने पहुंच रहे हैं उससे लगता है कि लोगों का एक बड़ा वर्ग केजरीवाल के राजनीति के फैसले से इत्तेफाक रखता है। ऐसे में वक्त में केजरीवाल को निश्चित ही चुनाव तक लोगों के जेहन में बने तो रहना होगा...लेकिन उसके लिए रोज रोज वो बड़े-बड़े खुलासे करें या नेताओं पर हमला करने के लिए खुद को पूरी तरह झोंक दें ये न तो संभव है और न ही केजरीवाल के लिए ठीक है। ऐसे में लंबे समय तक टिके रहने के लिए केजरीवाल एंड कंपनी को एक निश्चित अंतराल पर ही सही लेकिन पूरे दमखम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ सीना ठोक कर भ्रष्ट नेताओं को घेरने पर काम करना चाहिए ताकि न तो ऐसा लगे की केजरीवाल की धार कुंद हुई है...और न ही उनके आरोपों को कोई सिरे से नकार सके...और सामने वालों को इसका जवाब देना पड़े।  

deepaktiwari555@gmail.com

तुम सब जगह हो, मलाला!


सच्चे जज्बे और जुनून का पर्याय बन गई है, 14 वर्षीय मलाला। वह पाकिस्तान के स्वात घाटी की रहने वाली है। कट्टरवादी तालिबान आताताइयों की गोलियों ने उसे लहूलुहान कर डाला है। वह जीवन- मौत के बीच पिछले 9 दिनों से लगातार संघर्ष कर रही है। इन दिनों उसका इलाज ब्रिटेन के एक नामी अस्पताल में चल रहा है। नन्हीं मलाला के जीवन के लिए मुल्क के करोड़ों हाथ रोज दुआओं के लिए उठ रहे हैं। तालिबानों के खूनी कारनामे से वे भी आहत हो गए हैं, जो कहीं ना कहीं इन कट्टरपंथियों के लिए अपने अंदर नरम कोना रखते आए हैं। इतनी कम उम्र में यह लड़की अपनी मुहिम के लिए मौत से भी नहीं डरी। इसी के चलते ताकतवर तालिबान इस छोटी सी लड़की से डरे, तो उसकी जान लेने के लिए उतारू हो गए। लेकिन आतंकी गोलियां झेलकर मलाला ने गफलत में उनींदे मुल्क को झकझोर कर रख दिया है। अब मलाला केवल पाकिस्तान की ही नहीं रही। दुनिया में जहां भी अमानुषिक कट्टरपंथ के खिलाफ संघर्ष चल रहा है, वहां के लिए मलाला की पहल उम्मीद की एक किरण बन गई है। ऐसे में मलाला सबकी अपनी हो गई है। इस्लामाबाद से महज 160 किमी दूर है, खूबसूरत स्वात घाटी। किसी दौर में यह घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटकों को बहुत लुभाती थी। लेकिन अब इस इलाके में तालिबानों का बोल-बाला है। इनके दबदबे के चलते यहां पर पाक की हुकूमत की नहीं चल पाती। बंदूकधारी तालिबान ही स्वात घाटी के मालिक बन बैठे हैं। ये लोग ‘शरीया कानून’ के नाम पर महिलाओं को घर के बाहर नहीं निकलने देना चाहते। यहां तक कि इन्होंने बालिकाओं के स्कूल भी तोड़ डाले हैं। खौफ पैदा करने के लिए कईयों को गोलियों का शिकार भी बना चुके हैं। इस बर्बरता के बावजूद यहां पर प्रतिरोध की कोशिशें जारी हैं। एक ऐसी ही बहादुराना कोशिश मलाला ने 3 साल पहले शुरू की थी। उस समय उसकी उम्र महज 11 साल ही थी। उसने तालिबानियों के फरमान के बाद भी कह दिया था कि वह जान दे देगी, लेकिन स्कूल जाना बंद नहीं करेगी। धीरे-धीरे मलाला ने दूसरी लड़कियों को पढ़ाई जारी रखने के लिए तैयार किया। देखते-देखते उसकी मुहिम रंग लाती गई। तालिबानों ने तमाम धमकी दी। लेकिन स्वात घाटी के कई स्कूलों में बालिकाएं जाती रहीं। क्योंकि इन सबकी प्रेरणा स्रोत बन गई थी, मलाला। बीबीसी की उर्दू सेवा ने उसकी डायरी प्रसारित करनी शुरू कर दी थी। इस डायरी ने उसे पूरे इस्लामिक जगत में खासतौर पर चर्चित कर डाला। लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि तालिबानों के गढ़ स्वात घाटी में एक छोटी सी लड़की कैसे इन कट्टरपंथियों को रोज चुनौती दे देती है? जब तालिबानों की धमकियों से वह लड़की नहीं डरी, तो फिर तालिबानों ने नन्हीं जान के जिस्म में 2 गोलियां उतार दीं। पूरा मुल्क मलाला के लिए दुआ कर रहा है। जनभावनाओं का उबाल देखकर पाक की सरकार भी सहम गई है। उसने घायल मलाला के इलाज के लिए बेहतर से बेहतर प्रबंध कर दिए हैं। हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस देश के करोड़ों वयस्क कह रहे हैं कि मलाला, तो सबसे बड़ी ‘मर्द’ निकली। पिछले साल सरकार ने उसे पहला ‘नेशनल यूथ पीस अवार्ड’ दे दिया था। इसके पहले नोबल पुरस्कार विजेता डेसमंड टुटु ने मलाला के जज्बे को सलाम करने के लिए उसे ‘इंटरनेशनल चिल्ड्रेन पीस अवार्ड’ के लिए नामित किया था। इससे मलाला एक जानी मानी शख्सियत बन गई थी। तालिबानियों ने 9 अक्टूबर को स्कूल की बस में उसे गोलियां मार दीं। अब पूरा मुल्क इन कट्टर पंथियों के खिलाफ अंगड़ाई लेता नजर आ रहा है, तो वे खंभा नोचने को दौड़ रहे हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि मुल्क के आवाम को अचानक क्या हो गया है? वे नन्हीं बच्ची को गोलियां मारने की जिम्मेदारी तो ले रहे हैं, लेकिन सफाई में यही कह रहे हैं कि यह लड़की ‘शरीया कानून’ के खिलाफ खड़ी हो गई थी। ऐसे में उन्हें मजबूरन इसे गोलियां मारनी पड़ीं। ये लोग अब धमकी दे रहे हैं कि यह लड़की बच भी गई, तो वे उसे दोबारा गोलियों से भून देंगे। लेकिन अब बात दूर तक चली गई है। स्वात घाटी की तमाम छात्राओं ने कहना शुरू कर दिया है कि अब उनमें से हर एक लड़की, मलाला है। बीबीसी के एक संवाददाता ने रिपोर्ट दी है कि स्वात घाटी में कई छात्राएं अपने दुपट्टों में एक नारा लिख रही हैं, ‘हम सब मलाला हैं।’ सरकार ने भी लड़कियों के इस हौसले को प्रोत्साहन देने के लिए कई स्तरों पर कवायद तेज की है। सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए हैं। स्थानीय लोगों की नाराजगी के चलते हथियारबंद तालिबानी छिपते घूम रहे हैं। क्योंकि मलाला की बहादुरी ने अब यहां गोलियों के खौफ को कुछ कम कर दिया है। गलियों में कई लोग कह रहे हैं कि छोटी सी लड़की मलाला ने हमे झकझोर दिया है। यही कि हौसला बना लें, तो तालिबानियों की गोलियां दम तोड़ देंगी। भारत जैसे मुल्कों में भी धर्म के नाम पर कट्टरवादी जमातें जब-तब उधम करने से नहीं चूकतीं। कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर, तो कभी अजब-गजब मुद्दों पर फसाद किए जाते रहे हैं। दशकों से जम्मू-कश्मीर का अमन छीन लिया गया है। यहां भी कट्टरवादी तत्व कई बार धर्म के नाम पर लोगों के जज्बात भड़काते रहते हैं। इसके चलते घाटी की आर्थिक तस्वीर भी बिगड़ी है। लेकिन ऐसे कठिन दौरों में भी कोई ना कोई उम्मीद की लौ दिखाई पड़ने लगती है। भारत में भी कई ऐसे दौर आए हैं, जिनमें यह लगने लगा था कि हालात शायद ही ठीक हों। इंदिरा गांधी सरकार के दौर में ‘इमरजेंसी’ लगा दी गई थी। स्वतंत्र अभिव्यक्ति का गला घोटने की पूरी कोशिश हुई थी। माहौल में नाउम्मीदी का धुप अंधेरा छाने लगा था। लेकिन सरकार की तानाशाही ज्यादा नहीं चल पाई। क्योंकि जगह-जगह देश में ‘मलाला सिंड्रोम’ का जज्बा पैदा हुआ, तो आइरन लेडी कही जाने वाली इंदिरा गांधी को भी बहुत बुरे दिन देखने पड़े थे। याद कीजिए, 90 के दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक गैर पढ़े-लिखे किसान ने अपने जज्बे के चलते राज्य और केंद्र सरकार को पानी पिला दिया था। इस शख्स का नाम था, महेंद्र सिंह टिकैत। टिकैत के किसान आंदोलन ने उत्तर भारत के किसानों में एक नई एकजुटता पैदा कर दी थी। ऐसे में सरकार को किसान हितों की परवाह करनी पड़ी। क्योंकि गांव-गांव में तमाम किसान ‘टिकैत’ बन गए थे। यानि वे अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के बलिदान को कौन भुला सकता है? उन्होंने मजदूरों के लिए अपनी जान दे दी थी। शराब माफिया की गोलियों ने उन्हें शहीद कर डाला था। लेकिन मरने के बाद भी नियोगी की मुहिम लंबे अरसे तक जीवंत रही। ताजा मामला हरियाणा के एक खांटी ईमानदार और जुझारू आईएएस अफसर अशोक खेमका का है। इस अधिकारी ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ड वाड्रा की जमीनों के सौदों की जांच कराने का साहस कर लिया। ट्रांसफर के रूप में उसे कीमत भी चुकानी पड़ी। लेकिन 21 साल की नौकरी में खेमका को 42 बार ट्रांसफर के दंश झेलने पड़े हैं। क्योंकि किसी भी सरकार को खेमका की खांटी ईमानदारी रास नहीं आती रही है। दरअसल, इन सबमें ‘मलाला प्रवृति’ के ही कहीं ना कहीं दिग्दिर्शन हो जाते हैं। इसीलिए कह सकते हैं कि कोई भी मुल्क हो, जहां भी गैर-इंसाफी है, वहां मुकाबले के लिए ‘मलाला जज्बा’ किसी ना किसी रूप में सामने आ ही जाता है। कहा जा सकता है कि ‘मलाला जिजीविषा’ मरा नहीं करती। वीरेंद्र सेंगर (कार्यकारी संपादक), डीएलए।

विकास किसका – कचरे का


विकास किसका – कचरे का

मिट्टी के मकान और फूस की झोपड़ी में से इतना भी कचरा नहीं निकला था कि दोनों हाथों मे भर सके। देखना है तो सुदूर देहात में जाइए और किसी आदिवासी के यहां सुबह-सुबह देख लिजिए। फिर आदमी ने आधुनिक बनना और विकसित बनना शुरु किया। आदमी के द्वारा फेंके गए कचरे से गढ्ढे भर गे, तालाब-आहर-पोखर-पइन भी भर गए। गोया कचरा न हो कोई राक्षस हो। हल्की-सी बरसात हुई नहीं कि बाढ़ हाजिर हो जाए और उस बाढ़ में बहता गली-कुचे में लुक छिप कर फेंका गया कचरा मुंह के सामने नाजिर हो जाए।

विकास हुआ तो कचरे का या आदमी का, यह सवाल आदमी से पूछने पर थप्पड़ खाना पड़ेगा, क्योंकि आदमी को विकास के प्यार में परेशान है। वह दिन-रात या तो बेरोजगारी का थप्पड़ खा-खाकर परेशान है, या नियोक्ता के। जो इनसे बच जाते हैं वे तो मीडिया के पीछे पड़ने से परेशान हैं। कुछ भी हो परेशान मस्तिष्क को सवाल-जवाब से झुंझलाहट होती है। परेशानीयों के थप्पड़ खाकर झुंझलाया इंसान इस तरह के सवाल करनेवाले पर थप्पड़ जरुर चला देगा। क्योंकि वह जानता है कि उसके सोंचने से कोई व्यावहारिक संतोषप्रद जवाब नहीं मिलेगा। इसलिए जो सोचने को कहे समझो समय उसका भारी हो गया है। तब कचरे से ही सवाल पूछ्ना मजबुरी है।

अब कचरा भी बोलता है भला! आदमी चुप रहता है तो सबूत बोलता है। सबूत को चुप करने के लिए रुपया बोलता है! रुपए के दम पर वकील बोलता है, वकील के दम पर न्यायाधीश बोलता है। विज्ञापनदाता के कहने पर पत्रकार बोलता है, कसाई के यहाँ पहुँचने पर गुंगा बकरा भी बोलता है। इसी तरह जब डेंगु-मलेरिया होता है तो मरीज के मुंह से कचरा बोलता है, सरकार के पुरी फौज लगाने पर भी नहीं मरनेवाले मच्छर के मुंह से कचरा बोलता है, ऑटो-कार-रेलवे-कारखाने के धुंए से कचरा बोलता है, गौर से देखो गली-गली में आजु से बाजु से कचरा बोलता है।

कचरा क्या बोलता है – पहाड़ों में पत्थर थे, पथरों पर झाड़ीयाँ थी, झाड़ीयों मे हरियाली थी, हरियाली मे जड़ी-बुटीयाँ थी, जड़ी-बुटीयों मे मनुष्यों की जीवनी शक्ति थी। मनुष्यों ने अपनी जीवनी शक्ति की जड़ी-बुटीयों की नस्ल मिटायी, हरियाली हटा कार्बन-डाई-ऑक्साइड बढ़ाया। फिर पत्थरों को तोड़ने में बारुद लगाया, ढोने में डीजल, इंच-दर-इंच कंक्रीट ढलवाया । हर दस साल बाद नया कंक्रीट ढलवाया। मनुष्यों के द्वारा तोड़ा गया हर पत्थर एक दिन कचरा बन जाता है, पेट्रोलियम की हर बुंद एक दिन कचरा बन जाती है, हर पानी की बोतल कचरा बन जाती है, दवाओं की पैकिंग कचरा बन जाती है, कुर्सी-पलंग-टेबुल कचरा बन जाती है, हर कागज का टुकड़ा कचरा बन जाता है, हर भोजन (चाय-बिस्कीट-केक) की पैकेजिंग कचरा बन जाती है, बच्चे जब अकेले छोड़ कर विदेश चले जाते हैं तब समझ में आता है कि इंसान खुद कचरा बन गया है। कभी राजतंत्र कचरा बन जाता है तो कभी राजा कचरा बन जाता है, कभी प्रजातंत्र का प्रधानमन्त्री – राष्ट्रपति भी एक दिन कचरा बन जाता है।

मनुष्य जो भी विकास के नाम पर करता है वह एक दिन कचरा बन जाता है। इंजिनीयरींग का नमुना पटना का गांधी-सेतु कचरा बन जाता है, अमेरीका का वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर कचरा बन जाता है। मेडिकल साइंस की खोजी गई हर नई एंटीबायोटिक एक दिन कचरा बन जाती है। नौकरी स्थायी हो जाने पर पी0एच0डी0 की थेसिस भी कचरा बन जाती है। जब स्टेशन पर शिशु को दूध नहीं मिलता तो पॉकेट का रुपया कचरा बन जाता है। स्टेशन से याद आया – हर बीस साल बाद रेलवे का इंजन-पटरी-डिब्बा कचरा बन जाता है, पचास साल बाद पूरा रेलवे स्टेशन कचरा बन जाता है। नालंदा विश्वविद्दालयों के खंडहरों में कुआँ आज भी मौजुद है लेकिन महान अविष्कारों की देन बोरींग-मोटर-पानी की टंकी कचरा बन जाती है।

कचरे ने आगे कहा – बता भला मैं रक्तबीज कैसे न बनुं। जब मनुष्य दिन-रात कचरा बनाता है, अपनी सारी अकादमिक बुद्धि को कचरा बनाने में लगाता है, उसका हर आविष्कार और अनुसंधान नए-नए विकसित संस्करण के कचरे बनाने का प्रतिफल देता है, उसकी पढ़ाई नंबर एक की दौड़ में उसके अच्छे भले बच्चे को कचरा बना देती है, उंची पगार और कैरियर के लिए बारह चौदह घंटे प्रतिदिन की कसरत को जायज ठहराकर दिल-नाड़ी-किडनी को कचरा बनाती है। मानव का कोई ऐसी गतिविधि ही नहीं है जो क्चरा नहीं बनाती – क्या फैशन, क्या एजुकेशन, क्या नौलेज, क्या जर्नलिज्म, क्या इंटरप्रेन्योरशीप, क्या रिसर्च, क्या इन्नोवेशन।

पूछना पड़ा – पिछले हजारों सालों से आप कहां थे कचरा महान? मानना पड़ेगा कि धरती से अँतरीक्ष तक आपका ही साम्राज्य है। आपको किसी का भय नहीं लगता? सतयुग-द्वापर-त्रेता का अंत हुआ, इतिहास में कई राक्षसराज पैदा हुए सबका अंत हुआ, ईश्वर के सभी अवतारों का अंत हुआ, लेकिन आपको तो अपने अंत का कोई भय ही नही है। कभी कोई बुरा सपना देखा हो तो बताएँ।

अट्टहास कर कचरा बोला – हजारों सालों से न कंक्रीट था, न पेट्रोलियम और न ही मानव में मूर्खता थी। मानव जो भी करता नैतिकता के दायरे से बाहर नहीं जाता था। सबसे बड़ी बात कि मनुष्य तब प्रकृति को ईश्वर समझता था और खुद (अपने शरीर) को कचरे का डब्बा। अपने स्वत्व के अहंकार से मुक्त रहकर वह प्रकृति का पोषण करता था, अभी की तरह दोहन नहीं. पहले वह उन्हें गुरु मानता था जो हर तरह का ज्ञान, आनंद और विकास अपने शरीर के अंदर से ढुँढ़ निकालते थे। दुसरों के लिखे-कहे का रट्टामार जोड़-तोड़ कर खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश करनेवाला धुर्त घोषित कर दिया जाता था। अब वह उसे गुरु मानता है जो ज्यादा से ज्यादा किताबें रट्टा मार चुका हो, ज्यादा से ज्यादा कागज के रुपये, डिग्रीयां या सम्मानपत्र इकट्ठा कर चुका हो। अब सबसे बड़ा वह है जो सबसे ज्यादा कचरा गढ़ चुका हो।

तभी तो हिमालय की तराईयों में और अंडमान-निकोबार के द्वीपों में मनुष्य हजारों सालों से चैन से रह रहा था। आज उसे कहीं चैन नहीं है। गांवों से शहर भागता है, शहरों से महानगर, महानगरों से विदेश, विदेश से दुसरे ग्रहों पर लेकिन बेचैन ही मर जाता है। वह भूल गया है ईसा मसीह और पैगम्बर मोहम्मद को, राम और कृष्ण को कालपनिक घोषित कर चुका है – गांधी को भी कहां मानता है। गांधी ने कहा था कि पृथ्वी अपने सारी संतानों को खाना दे सकती है लेकिन किसी एक व्यक्ति के लोभ का पेट नहीं भर सकती। अगर उनकी बात को मनुष्य मानता तो तमाम लोभीयों को चुनाव में सीधे हरा देता लेकिन पीढ़ीयों से रोटी देनेवाली अपनी धरती मां को छोड़ कर भागता नहीं। जिस प्रकार आदमी जितना भागता है उसे कुत्ते और मधुमक्खी उतना ही खदेड़ते हैं, उसी प्रकार आज का आदमी जितना भागदौड़ करता है उतना ही मेरा साम्राज्य बढ़ता है, क्योंकि विकास की मृगतृष्णा में वह हर कदम पर कचरा ही तो पैदा करता जाता है।

मुझे किसी का भय नहीं है। किसी के पास इतना समय नहीं है कि इतनी दूर तक सोंचे, जो इतना सोचेगा उसे दुनिया पागल घोषित कर देगी, न्युटन की तरह। वह जितना बाहरी विकास करेगा उअतना ही कचरा पैदा करेगा, उतना ही अधिक मेरा साम्राज्य बढ़ेगा, उतना ही मैं गरीबों का खुन पिउंगा और शक्तिशाली बनुंगा। जो बचेंगे वे विकास के अतिरिक्त कुछ भी दाएँ-बाएँ नहीं सोचेंगे क्योंकि वे मानते हैं कि वे ही सबसे बुद्धिमान, शक्तिशाली और विकासशील और विकासशील हैं। जो भी आभ्यंतर के विकास की बात करेगा उसे आमरण अनशन की मौत नसीब होगी। इसलिए मैं निर्भय हुं। जो लोग ठहरकर सोचेंगे वे पायेंगे कि उनका पड़ोसी उनसे बहुत आगे निकल चुका है, उनकी आनेवाली पीढ़ीयां अपने भौतिक पिछड़ेपन के लिए अपने पितरों को गाली देंगी और विकास की अंतहीन अंधी सुरंग में दौड़ पड़ेंगी - जिवनभर कचरा पैदा कर खुद कचरा बन जाने के लिए।

हां! एक बार बहुत समय पहले एक बुरा सपना आया था, गांधी की तरह कोई खुद नंगे रहकर अनुयायियों से कपड़े जलवा रहा था, मार्क्स की तरह पेट्रोलियम-कंक्रीट के खिलाफ चौराहे पर चिल्ला रहा था, शंकराचार्य और विवेकानंद की तरह विश्वभर के विद्वानो और वैज्ञानिकों को निरुत्तर कर रहा थ, ईसा मसीह की तरह उसे सुली पर चढ़ा दिया गया तब जाकर मेरी नींद खुली। जब नींद खुली तो पाया कि पिछले एक घंटे में मेरा साम्राज्य 100 हेक्टेयर बढ़ चुका है, मेरे अनुयायीयों की संख्या एक लाख बढ़ चुकी है सारे अनुयायियों ने कमा-कमाकर एक हजार टन कचरा बढ़ा दिया है। सपने से पैदा हुई चिंता दूर हो चुकी थी।

कृपया अपनी प्रतिक्रिया हमें जरुर दें..

खाप – वोटतंत्र का श्राप


खाप – वोटतंत्र का श्राप

हरियाणा के पिछले एक महीने में 18 महिलाओं, जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं, के साथ बलात्कार की घटनाएँ पुलिस द्वारा दर्ज की गई हैं। इनसे हरियाणा सरकार की इतनी किरकिरी हुई कि सोनिया गाँधी जब हरियाणा गई तो एक बलात्कार-पीड़ित दलित महिला से मिलने अस्पताल जा पहुँची। लेकिन उन्होने जब हरियाणा छोड़ते समय पत्रकारों से बात की तो बलात्कार की औपचारिक आलोचना के साथ ही यह भी कह गईं कि देशभर में इस तरह की घटनाएँ बढ़ रही हैं। अपराधियों को सजा, पीड़ितों को न्याय और कानून व्यस्था में सुधार के बजाए अपनी हरियाणा सरकार का बचाव उनकी प्राथमिकता बन गई। गोया महिलाओं के साथ अपराध बढ़ रहे हैं तो इसे न तो हरियाणा सरकार और न ही केन्द्र सरकार की कोई जिम्मेवारी है, न इसे उनकी असफ़लता के तौर पर देखा जाना चाहिए।

 

      जब बलात्कार-पीड़िता से मिलने के बाद इस तरह का असंवेदनशील बयान दिया गया तो बलात्कारी से मिल लेने के बाद क्या होता? संभव है कि तब वही बयान होता जो हरियाणा की खाप पंचायतों ने दिया – “लड़कियाँ पहले की अपेक्षा अब जल्दी जवान हो रही हैं इसलिए उनकी जल्दी शादी कर दी जानी चाहिए – सरकार को विवाह की न्यूनतम उम्र सीमा को घटाकर पंद्रह साल कर देना चाहिए।”

 

      यह हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की खाप-राजनीति का ही असर है कि बलात्कारियों को यथाशीघ्र सजा सुनिश्चित करने के बजाए ऐसी घटनाओं की वर्ष-दर-वर्ष बढ़ती संख्या को सामान्य रुप से लेने की कोशिश, उस राजनीतिक हस्ती को करनी पड़ी जिसे विश्व की छठवें नंबर की सबसे शक्तिशाली महिला घोषित किया गया है।

 

हद तो तब हो गई जब उन्हीं की पार्टी के नेताओं ने न सिर्फ खुलेआम खाप की बातों का समर्थन किया बल्कि विपक्ष ने पूरी तन्मयता से खापों की बात राज्यपाल तक पहुँचाने में शीघ्रता दिखाई। खापों के डर से उत्तर प्रदेश से राजस्थान, हरियाणा से हिमाचल प्रदेश तक के सत्ताधारी और विपक्ष के नेता समय-समय पर खापों के दकियानूसीपन का समर्थन करते देखे जाते हैं।

 

      आजादी के पैंसठ साल बाद भी जिस देश के अधिकांश ग्राम पंचायतों में ग्राम सभा की बैठकें नहीं होती, जातीय राजनीति करनेवाले करनेवाले अधिकांश लोग बिना दहेज के अपनी ही जाति की बेटी को अपनी बहू नहीं बनाते, किसी पंचायत सरकार के काम और खर्च का हिसाब न तो जनता ही एकजुट होकर माँगती है, न ही मिलता है, ऐसी परिस्थिति में आखिर यह कौन सी बात है जिसकी वजह से एक बड़े भू-भाग में हिन्दू से मुस्लिम तक खाप पंचायतों का बोलबाला है।

 

      कभी ये खाप पंचायतें एक स्त्री को कुछ साल से साथ रह रहे पति को छोड़कर अपने पुराने पति के पास लौट जाने का फरमान सुनाती हैं, तो कभी बच्चों और प्रेमी-पति को छोड़्कर पिता की मर्जी से दूसरी शादी कर लेने का। इन खापों की अधिकांश चिंताएं स्त्रियों को लेकर ही होती हैं। स्थानीय राजनेता खुलेआम इन खापों का समर्थन करते हैं तो राष्ट्रीय राजनेता कुटनीतिक रूप से या मौन से।

 

      इस क्षेत्र में अधिकांश महिलाएं अभी जागरुकता की पहली सीढियों पर ही हैं और समाज मुख्यतः पुरुषवादी ही है। अलग-अलग जातियों और समुदायों का घनत्व कहीं न कहीं ज्यादा होता है। ऐसी जगहों पर ये समूह पारंपरिक रूप से अपनी समस्याओं को खाप पंचायतों में सुलझाते थे। वर्तमान में ऐसी पंचायतों का नेतृत्व ऐसे लोग करते हैं जो या तो दबंग प्रवृत्ति के होते हैं या पारंपरिक रुप से धनाढ्य रहे हैं।

 

      लोकतंत्र का तकाजा है कि राजनेताओं के लिए यह जरूरी हो जाता है कि कम-से-कम मेहनत में ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल किए जाएँ। यही तकाजा राजनेताओं को खापों का समर्थन करने पर मजबूर कर भारतीय लोकतंत्र को वोटतंत्र का जनाजा बना देता है। राजनेताओं को  एक-एक व्यक्ति से अलग-अलग मिलने के बजाए खाप के चंद नेताओं से मिलना और उन्हें अपने पक्ष में करना आसान होता है। बाद में खाप के ये नेता राजनेताओं के पक्ष-विपक्ष में सामुहिक या जातीय गोलबंदी का काम करते हैं। बदले में राजनेता ठेकेदारी-पट्टेदारी आदि के जरिए इन दबंगों के व्यक्तिगत हित मदद करते हैं और सामुहिक हित सामूहित कार्यों (ज्यादातर धार्मिक या आडंबरकारी आयोजनों) में चंदे देकर करते हैं। यह एक अति-सरलीकृत विवेचना है, उम्मीद है पाठकगण लेखक से ज्यादा समझदार होंगे ।

 

      यह मजबुरी राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं को इन खापों को बनाए रखने का कारण बनती है। दुसरी तरफ खापों को अपने आस-पास के माहौल पर वर्चस्व बनाए रखने में मदद करती है, विजयी राजनेता के समर्थक अपने क्षेत्र में दुसरी जातियों समुदायों पर वर्चस्व बनाये रखने में नेताजी की मदद भी लेते हैं। कभी-कभी तो ये राजनेता खापों के बीच विवादो में सुलहकर्ता की मुख भुमिका में भी रहते हैं। इस तरह तैयार होता है एक लोकताँत्रिक राजनेता और खाप का ऐसा गठजोड़ जो एक-दुसरे को कुछ भी करने की छुट दे देता है।

 

सर्वोच्च न्यायालय इन खाप पंचायतों और उनके द्वारा समय-समय पर जारी होनेवाले फरमानों को असंवैधानिक करार दे चुकी है, यहां तक कि कई मौकों पर खापों को अवैध करार देते हुए उन्हें सख्ती से बंद करने को कहा है। इसके बावजूद खाप पंचायतें न केवल तालीबानी फरमान जारी करती है बल्की स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय मीडिया के समक्ष उपस्थित भी होती है। राजनेता मजबुर है कि समर्थन करना छोड़ नहीं सकते। आलोचना होने पर केन्द्र राज्यों पर और राज्य केन्द्र पर कुटनीतिक दार्शनिकता की गुगली मारते हैं। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सर्वोच्च नेता का बयान खापों की आवश्यकता का नतीजा भले ही रहा हो लेकिन वोट के लिए किसी भी हद तक नीचे गिरने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो कानून का राज नहीं रह पायेगा। रह जायेगा तो केवल खापों का राज जो आधी आबादी के गैरतपूर्ण अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा देगा।

कृपया अपनी प्रतिक्रिया हमें जरुर दें..