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20.2.14

शैतान से संवाद (सन्दर्भ केजरीवाल)

एक मनचला सियासी,हुस्न का शैदायी,जंगल के रास्ते जा रहा था । एक खूबसूरत जवान ऊॅंटनी को देखकर उसका मन मचल गया । जवानी किसी भी जीव में हो मन को विचलित कर ही देती है । जवान का मन मचल गया । वह ऊॅंटनी का बोसा लेना चाहता था । ऊॅंटनी की लम्बी गरदन बबूल के शाखों को छू रही थी । जवान कोई तरीका सोचने लगा,जिससे वह ऊॅंटनी का बोसा ले सके ।

जवान के तेज दिमाग में बिजली कौंधी । उसने बबूल की एक डाल तोड़ कर ऊॅंटनी को दिखाया । शाख को  देख कर ऊॅंटनी ने गरदन झुका ली और बबूल के पत्ते खाने लगी । जवान ने इस बीच अपने मन की मुराद हासिल कर ली ।

ऊॅंटनी तो सहज भाव से फिर बबूल की ऊंची डालों पर पत्तियॉं चरने लगी । जवान का मन पश्चाताप से विचलित हो गया । उसने दुःखी स्वर में  कहा – लहौल-बिला-कूवत,मेरे सिर शैतान सवार हो गया था ।

संयोग से शैतान भी पास ही खड़ा था । उसने कहा – बरखुरदार,क्यों मुझे बदनाम करते हो । ये हिकमत (उपाय) तो मेरे फरिश्ते भी नहीं सोच सकते थे । तुम तो मेरे भी बाप निकले ।

साहबान,थोड़ा कहा बहुत समझना,चिट्ठी को तार समझना । हाथ कंगन को आरसी क्या,पढ़े लिखे को फारसी क्या । बात को अफसाना बनाने में बंदा माहिर नहीं है । अर्ज ये कि सियासत के जंगल में ऐसे तमाम जवान डरावनी आवाज में गरज रहे हैं,जिन्हें देख कर हैरानी होती है । इन सियासी जीवों की पैदाइश कैसे और कहॉं से हुयी जीवशास्त्री अभी इस पर रिसर्च कर रहे हैं । नतीजा कब आयेगा कहा नहीं जा सकता । हमारे मुल्क में लोकतंत्र की तबाही के बाद आयेगा या पहले इस बारे में विभिन्न मत है । कुछ शोधकर्ताओं का मत है  कि इन सियासी प्राणियों का जन्म अमेरिकी फोर्ड फाउंडेशन से हुआ । कुछ कहते हैं कि इनके विकास में रमन मैग्सेसे पुरूस्कार का योगदान है । कुछ शोधकर्ता इन प्राणियों के उद्भव और विकास में अरब देशों के अकूत धन का योगदान मानते हैं । कुछ विशेषज्ञ इन्हें मजहबी जेहादियों की देन समझते हैं । कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लालपट्टी के जंगल से निकलकर माओवादियों का अग्रिम दस्ता दिल्ली में दाखिल हो गया है । जंगल में रहने वाले माओवादियों के हाथों में  हथियार है और दिल्ली में दहाड़ रहे तथाकथित माओवादियों की तीखी जबान धारदार नेजे का काम करती है ।

बहरकैफ,शोधकर्ताओं की दलील हम  उन्हीं के हाल पर छोड़ देते हैं । इन प्राणियों का मकसद लोकतंत्र की इमारत गिराकर देश का हाल मिस्र और नेपाल जैसा करना है । बकौल शायर –

              शैख ने मस्जिद बना मिस्मार बुतखाना किया ।
              पहले इक सूरत भी थी अब साफ वीराना किया ।

19.2.14

क्या अन्ना विश्वसनीय व्यक्ति हैं?-ब्रज की दुनिया

19-2-18,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कथित गांधीवादी अन्ना हजारे ने एक बार फिर से अपने विचार बदल लिए हैं। कदाचित यू-टर्न लेने की उनमें और उनके कथित चेले अरविन्द केजरीवाल में होड़-सी लगी हुई है। कभी अन्ना को नीतीश कुमार अच्छे लगने लगते हैं तो कभी अरविन्द केजरीवाल और कभी ममता बनर्जी। आजकल ममता बनर्जी की बारी आई हुई है। इतना ही नहीं कभी अन्ना को संसद द्वारा पारित लोकपाल अच्छा लगने लगता है तो कभी केजरीवाल का जनलोकपाल। समझ में नहीं आता कि अन्ना आखिर चाहते क्या हैं? क्या उनका चित्त स्थिर है? क्या उनके ऊपर विश्वास किया जा सकता है? अन्ना की कौन-सी बात सही है और कौन-सी गलत?
मित्रों,आपको याद होगा कि जब अरविन्द केजरीवाल ने राजनैतिक दल के गठन की घोषणा की थी तो अन्ना ने खुलकर उसका विरोध किया था। फिर कभी उन्होंने केजरीवाल का विरोध किया तो फिर अगले ही दिन समर्थन भी कर दिया। अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस ने संसद से लोकपाल को पास करने की घोषणा की। यह जानने के बावजूद अन्ना अनशन पर बैठ गए। फिर राहुल गांधी ने लोकपाल की जरुरत पर बल दिया और सरकार ने बिल लाकर उसे पारित करवा लिया। जब अन्ना और पूरे देश को पता था कि उक्त सत्र में सरकार लोकपाल लाने जा रही है तो फिर समझ में नहीं आता कि अन्ना क्यों अनशन पर बैठे? क्या वे इसका श्रेय पूरी संसद के स्थान पर सिर्फ राहुल गांधी को दिलवाना चाहते थे?
मित्रों,अभी तक अन्ना का जो विचित्र व्यवहार रहा है उससे ऐसा प्रतिध्वनित होता है कि अन्ना कहीं-न-कहीं कांग्रेसी हैं और वे चाहते हैं कि केंद्र में किसी-न-किसी तरह से कांग्रेस की ही सरकार रहे। हम अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं कि चुनावों से पहले ये कथित धर्मनिरपेक्ष दल चाहे जितनी भी तू तू मैं मैं कर लें चुनावों के बाद सबके सब कांग्रेस से मिल जाते हैं। यहाँ तक कि सपा और बसपा जैसे धुर विरोधी दल भी कांग्रेसी घाट पर एकसाथ पानी पीने लगते हैं। फिर अन्ना की ऐसी क्या मजबूरी है कि वे हमेशा इन कथित धर्मनिरपेक्ष दलों का ही समर्थन करते हैं? पहले केजरीवाल अच्छे लगे लेकिन जब देखा कि यह बंदा तो अब काफी बदनाम हो चुका है तो उन्होंने एक अन्य ऐसे दल का समर्थन कर दिया जिसके नाम में भी कांग्रेस लगा हुआ है और जिसका चाल,चरित्र और चेहरा तो कांग्रेसवाला है ही। अन्ना को कैसे ममता का शासन अच्छा लग रहा है जबकि पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में सरकारी भ्रष्टाचार के चलते जबसे ममता शासन में आई हैं मौत का तांडव चल रहा है।
मित्रों,मूलतः ममता और साम्यवादी दलों के शासन में कोई अंतर नहीं है। जो गुंडागर्दी और सामूहिक बलात्कार पहले साम्यवादी कार्यकर्ता कर रहे थे वही गुंडागर्दी और सामूहिक बलात्कार अब तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। आखिर वो कौन-सा चश्मा है जिससे देखने पर अन्ना को ममता बनर्जी दूध की धुली नजर आ रही हैं?
मित्रों,प्रश्न उठता है कि क्या अन्ना दिल से भारत का भला चाहते हैं? क्या वे चाहते हैं कि भारत का तीव्रतर विकास हो और भारत से भ्रष्टाचार का समूल नाश हो जाए? अगर हाँ तो फिर उनको नरेंद्र मोदी और भाजपा से शत्रुता क्यों है? मुझे तो लगता है कि अन्ना उस दिलफेंक आशिक की तरह चलंतमति हैं जिसका दिल रह-रहकर कभी इस पर तो कभी उस पर आता रहता है। सिर्फ वंदे मातरम का नारा भर लगा देने से भारत महान नहीं हो जाएगा। ममता ने पश्चिम बंगाल में ऐसा क्या कर दिया है कि अन्ना उस पर मोहित हो गए? ममता का शासन तो इतना निर्मम है कि उसने एक बिहारी बेटी को जिसका कि बंगाल में सामूहिक बलात्कार हुआ था अपने हाल पर छोड़ दिया। यहाँ तक कि घटना के बाद लंबे समय तक बलात्कारियों को गिरफ्तार तक नहीं किया,ममता की पुलिस ने साक्ष्यों को नष्ट हो जाने दिया और जब बिहार सरकार ने उसकी मदद करनी चाही तो उसके एक मंत्री ने उसका भी विरोध किया।
मित्रों,हमें कोरे नारे नहीं चाहिए। नारे तो पिछले 65 सालों से लग रहे हैं। अब हमें मजबूर की जगह मजबूत सरकार चाहिए,अब हमें गठबंधन की जगह एकदलीय सरकार चाहिए,अब हमें नीति नहीं नीयत चाहिए, कोरे नारे नहीं धरातल पर काम चाहिए,योजनाएँ नहीं उनका सटीक और पारदर्शी क्रियान्वन चाहिए,ममता जैसी 10-20 सांसदों वाला कमजोर और पिलपिला प्रधानमंत्री नहीं 273 प्लस वाला सिंहनाद करनेवाला शेर चाहिए जिसकी गर्जना से चीन से लेकर अमेरिका तक काँपने लगे। वही अमेरिका जिसका एजेंट होने के आरोप इन दिनों यू टर्न गुरू अन्नाजी के चेले पर लग रहे हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

18.2.14

क्या केजरीवाल सीआईए के एजेंट हैं?-ब्रज की दुनिया

नई दिल्ली (एजेंसी)।  आज दिल्ली भाजपा नेता डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से मिले होने के आरोप लगाए हैं और पूछा है कि उनका शिमिरित ली से किस तरह का संबंध रहा है? ऐसे में प्रश्न उठता है कि यह शिमिरित ली कौन है, शोधार्थी या सीआईए एजेंट? दस्तावेज बताते हैं कि वह बतौर शोधार्थी ‘कबीर’ संस्था से जुड़े थी। इस संस्था के गॉड-फादर अरविंद केजरीवाल रहे हैं। विदित हो कि अरविन्द केजरीवाल को जब रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया था तो विस्तार से बताया नहीं गया था कि उन्होंने ऐसी कौन-सी महान उपलब्धि प्राप्त की है। वैसे मैग्सेसे पुरस्कार की फंडिंग भी अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन ही करती है जिससे भारी मात्रा में चंदा लेने के आरोप केजरीवाल की संस्था कबीर पर लग रहे हैं।
शिमरित ली को लेकर अटकलें लग रही हैं, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी। शिमिरित ली दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न विषयों पर काम करती रही है। भारत आकर उसने नया काम किया। कबीर संस्था से जुड़ी। प्रजातंत्र के बारे में उसने एक बड़ी रिपोर्ट महज तीन-चार महीनों में तैयार की। फिर वापस चली गई। आखिर दिल्ली आने का उसका मकसद क्या था? इसे एक दस्तावेजी कहानी और अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में समझा जा सकता है।
बहरहाल कहानी कुछ इस प्रकार है। जिस स्वराज के राग को केजरीवाल बार-बार छेड़ रहे हैं, वह आखिर क्या है? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि अगर इस गीत के बोल ही केजरीवाल के हैं तो गीतकार और संगीतकार कौन है? यही नहीं, इसके पीछे का मकसद क्या है? इन सब सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें अमेरिका के न्यूयार्क शहर का रुख करना पड़ेगा। न्यूयार्क विश्वविद्यालय दुनिया भर में अपने शोध के लिए जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय में ‘मध्यपूर्व एवं इस्लामिक अध्ययन’ विषय पर एक शोध हो रहा है। शोधार्थी का नाम है, शिमिरित ली। शिमिरित ली दुनिया के कई देशों में सक्रिय है। खासकर उन अरब देशों में जहां जनआंदोलन हुए हैं। वह चार महीने के लिए भारत भी आई थी। भारत आने के बाद वह शोध करने के नाम पर ‘कबीर’ संस्था से जुड़ गई। सवाल है कि क्या वह ‘कबीर’ संस्था से जुड़ने के लिए ही शिमिरित ली भारत आई थी? अभी यह रहस्य है। उसने चार महीने में एक रिपोर्ट तैयार की। यह भी अभी रहस्य है कि शिमरित ली की यह रिपोर्ट खुद उसने तैयार की या फिर अमेरिका में तैयार की गई थी।
बहरहाल, उस रिपोर्ट पर गौर करें तो उसमें भारत के लोकतंत्र की खामियों को उजागर किया गया है। रिपोर्ट का नाम है ‘पब्लिक पावर-इंडिया एंड अदर डेमोक्रेसी’। इसमें अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ब्राजील का हवाला देते हुए ‘सेल्फ रूल’ की वकालत की गई है। अरविंद केजरीवाल की ‘मोहल्ला सभा’ भी इसी रिपोर्ट का एक सुझाव है। इसी रिपोर्ट के ‘सेल्फ रूल’ से ही प्रभावित है, अरविंद केजरीवाल का ‘स्वराज’। अरविंद केजरीवाल भी अपने स्वराज में जिन देशों की व्यवस्था की चर्चा करते हैं, उन्हीं तीनों अमेरिका, ब्राजील और स्विट्जरलैंड का ही जिक्र शिमिरित भी अपनी रिपोर्ट में करती हैं।
‘कबीर’ के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं। यहां शिमरित के भारत आने के समय पर भी गौर करने की जरूरत है। वह मई 2010 में भारत आई और कबीर से जुड़ी। वह अगस्त 2010 तक भारत में रही। इस दौरान ‘कबीर’ की जवाबदेही, पारदर्शिता और सहभागिता पर कार्यशालाओं का जिम्मा भी शिमरित ने ही ले लिया था। इन चार महीनों में ही शिमरित ली ने ‘कबीर’ और उनके लोगों के लिए आगे का एजेंडा तय कर दिया। उसके भारत आने का समय महत्वपूर्ण है।
यहूदी परिवार से ताल्लुक रखने वाली शिमिरित ली को 2007 में कविता और लेखन के लिए यंग आर्ट पुरस्कार मिला। उसे यह पुरस्कार अमेरिकी सरकार के सहयोग से चलने वाली संस्था ने नवाजा। यहीं वह सबसे पहले सीआईए अधिकारियों के संपर्क में आई। जब उसे पुरस्कार मिला तब वह जेक्शन स्कूल फॉर एडवांस स्टडीज में पढ़ रही थी। यहीं से वह दुनिया के कई देशों में सक्रिय हुई।
जून 2008 में वह घाना में अमेरिकन ज्यूश वर्ल्ड सर्विस में काम करने पहुंचती। नवंबर 2008 में वह ह्यूमन राइट वॉच के अफ्रीकी शाखा में बतौर प्रशिक्षु शामिल हुई। वहां उसने एक साल बिताए। इस दौरान उसने चाड के शरणार्थी शिविरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा और विश्लेषण का काम किया। जिन-जिन देशों में शिमिरित की सक्रियता दिखती है, वह संदेह के घेरे में है। हर एक देश में वह पांच महीने के करीब ही रहती है। उसके काम करने के विषय भी अलग-अलग होते हैं। उसके विषय और काम करने के तरीके से साफ जाहिर होता है कि उसकी डोर अमेरिकी अधिकारियों से जुड़ी है। दिसंबर 2009 में वह ईरान में सक्रिय हुई। 7 दिसंबर, 2009 को ईरान में छात्र दिवस के मौके पर एक कार्यक्रम में वह शिरकत करती है। वहां उसकी मौजूदगी भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि इस कार्यक्रम में ईरान में प्रजातंत्र समर्थक अहमद बतेबी और हामिद दबाशी शामिल थे।
ईरान के बाद उसका अगल ठिकाना भारत था। यहां वह ‘कबीर’ से जुड़ी। चार महीने में ही उसने भारतीय लोकतंत्र पर एक रिपोर्ट संस्था के कर्ताधर्ता अरविंद केजरावाल और मनीष सिसोदिया को दी। अगस्त में फिर वह न्यूयार्क वापस चली गई। उसका अगला पड़ाव होता है ‘कायन महिला संगठन’। यहां वह फरवरी 2011 में पहुंचती। शिमिरित ने वहां “अरब में महिलाएं” विषय पर अध्ययन किया। कायन महिला संगठन में उसने वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग का प्रबंधन संभाला। यहां वह सात महीने रही। अगस्त 2011 तक। अभी वह न्यूयार्क विश्वविद्यालय में शोध के साथ ही ‘अर्जेंट एक्शन फंड’ से बतौर सलाहकार जुड़ी हैं। पूरी दुनिया में जो सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और स्त्री संबंधी मुद्दों पर जो प्रस्ताव आते हैं, उनकी समीक्षा और मूल्यांकन का काम शिमिरित के जिम्मे है। अगस्त 2011 से लेकर फरवरी 2013 के बीच शिमिरित दुनिया के कई ऐसे देशों में सक्रिय थी, जहां उसकी सक्रियता पर सवाल उठते हैं। इसमें अरब देश शामिल हैं। मिस्र में भी शिमिरित की मौजूदगी चौंकाने वाली है। यही वह समय है, जब अरब देशों में आंदोलन खड़ा हो रहा था।
शिमिरित ली 17वें अरब फिल्म महोत्सव में भी सक्रिय रहीं। इसका प्रीमियर स्क्रीनिंग सेन फ्रांसिस्को में हुआ। स्क्रीनिंग के समय शिमिरित ने लोगों को संबोधित भी किया। इस फिल्म महोत्सव में उन फिल्मों को प्रमुखता दी गई, जो हाल ही में जन आंदोलनों के ऊपर बनी थी।
शिमिरित ली के कबीर संस्था से जुड़ने के समय को उसके विदेशी वित्तीय सहयोग के नजरिए से भी देखने की जरुरत है। एक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत एक जानकारी मांगी। उस जानकारी के मुताबिक कबीर को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले। 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड ने कबीर की आर्थिक सहायता की। इस बीच केजरीवाल को वर्ष 2006 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार के माध्यम से 50000 डॉलर देकर उपकृत किया जा चुका था। इससे पहले केजरीवाल सरकारी नौकरी छोड़ चुके थे। इसके बाद 2010 में अमेरिका से शिमिरित ली ‘कबीर’ में काम करने के लिए आती हैं। चार महीने में ही वह भारतीय प्रजातंत्र का अध्ययन कर उसे खोखला बताने वाली रिपोर्ट केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को देकर चली जाती है। शिमिरित ली के जाने के बाद ‘कबीर’ को फिर फोर्ड फाउंडेशन से दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला। इसे भारत की खुफिया एंजेसी ‘रॉ’ के अपर सचिव रहे बी. रमन की इन बातों से समझा जा सकता है।
एक बार बी. रमन ने एनजीओ और उसकी फंडिंग पर आधारित एक किताब के विमोचन के समय कहा था कि “सीआईए सूचनाओं का खेल खेलती है। इसके लिए उसने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ और ‘रेडियो फ्री यूरोप’ को बतौर हथियार इस्तेमाल करती है।” अपने भाषण में बी. रमन ने इस बात की भी चर्चा की थी कि विदेशी खुफिया एजेंसियां कैसे एनजीओ के जरिए अपने काम को अंजाम देती हैं। किसी भी देश में अपने अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए सीआईए उस देश में पहले से काम कर रही एनजीओ का इस्तेमाल करना ज्यादा सुलभ समझती है। उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए वह फंडिंग का सहारा लेती है। जिस क्षेत्र में एनजीओ नहीं है, वहां एनजीओ बनवाया जाता है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

यह अंतरिम बजट नहीं यह पार्टी का घोषणापत्र है-ब्रज की दुनिया

18-2-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, किसी भी आम बजट में दो बातें प्रमुख होती हैं. पहला, बजट से सरकार और पार्टी की आर्थिक और राजनीतिक सोच का पता चलता है और दूसरा, देश की वित्तीय नीतियों के बारे में पता चलता है। बजट के प्रावधानों से पता चल जाता है कि केंद्र सरकार की आर्थिक नीति कैसी होगी। दुर्भाग्यवश चिदंबरम अपनी सरकार और पार्टी की सोंच और नीतियों की बात तब करने चले हैं जबकि इस सरकार के दिऩ पूरे हो गए हैं।
यह साफ है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा पेश अंतरिम बजट सिर्फ लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। इस बजट का न  तो देश के वर्तमान से ही कुछ लेना-देना है और न ही भविष्य से ही।  हमें ध्यान रखना चाहिए कि ‘वोट ऑन एकाउंट’ में करों से संबंधित विशेष प्रावधान नहीं किये जाते हैं। चुनाव से पहले सरकारी खर्च के लिए ही अंतरित बजट पेश किया जाता है।
2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार और 2009 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी अंतरिम बजट में करों का कोई नया प्रावधान नहीं किया था, लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस बार ऐसा कर दिया। पहली बात तो यह कि यह संसदीय परंपराओं के खिलाफ है।
कुछ महीने बाद आम चुनाव होनेवाले हैं और मई, 2014 तक नयी सरकार का गठन हो जायेगा। नयी सरकार अपना पूर्ण बजट पेश करेगी। अगर यूपीए की सरकार फिर से बनती है और पी चिदंबरम ही फिर से वित्त मंत्री बनते हैं, तब भी अंतरिम बजट में की गयी घोषणाओं को लागू करना मुश्किल होगा। नियमों के तहत चिदंबरम यूपीए सरकार की दस साल की उपलब्धियों के बारे में बखानभर कर सकते थे।
हालांकि इस बात के लिए भी उनकी आलोचना होती, लेकिन चुनावी साल में अमूमन सभी ऐसा करते हैं। अंतरिम बजट में चिदंबरम द्वारा की गयी कुछ घोषणाओं को वास्तविकता में लागू नहीं किया जा सकता है। अब देश की जनता जागरूक हो गयी है। चुनावी साल में लोक लुभावन घोषणाओं से उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। आर्थिक लिहाज से भी इन घोषणाओं का कोई मतलब नहीं है।
यह ध्यान देने की बात है कि 2008-09 तक आर्थिक मंदी का सामना करने में भारत इसलिए सफल हो पाया था, क्योंकि तब उसकी बुनियाद मजबूत थी। वर्ष 2008 के बाद घरेलू निवेश का हिस्सा 65 फीसदी, जबकि घरेलू बचत 35 फीसदी था। वर्ष 2014 में कमरतोड़ महंगाई के कारण निवेश 34 फीसदी रह गया है। आज भारत के बड़े-बड़े उद्योगपति ही देश में निवेश नहीं  कर रहे हैं। पिछले पांच साल में भारत की आर्थिक बुनियाद काफी कमजोर हो गयी है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कमजोर और संकटग्रस्त है। भारतीय अर्थव्यस्था संस्थागत चुनौती का सामना कर रही है।  राजकोषीय घाटे को जिस तरह से कम करके बताया जा रहा है वह सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी है क्योंकि चिदंबरम ने बड़ी धूर्तता से सब्सिडी के 35000 करोड़ रुपए को अगले साल पर डाल दिया है। इतना ही नहीं इसके लिए आधारभूत संरचना और सामाजिक क्षेत्र पर होनेवाले खर्च में भी 90 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है। ईंधन के लिए जो 65000 करोड़ रुपए की सब्सिडी रखी गई उसको प्राप्त करना तभी संभव होगा जबकि या तो सब्सिडी में अभूतपूर्व कमी कर दी जाए या फिर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के मूल्य धराशायी हो जाएँ। जाहिर है कि सब्सिडी कम करने की महती जिम्मेदारियों से आनेवाली सरकार को जूझना होगा। यूपीए-2 सरकार ने इस चुनौती का ख्याल नहीं रखा। महंगाई को कम करने पर ध्यान नहीं दिया गया। सिर्फ महंगाई रिजर्व बैंक की नीतियों से नियंत्रित नहीं हो सकती है। रिजर्व बैंक सिर्फ रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को घटाने और बढ़ाने जैसे छोटे कदम उठा सकता है। महंगाई को कम करने के लिए सरकार को व्यापक कदम उठाने की जरुरत है। इसके लिए सरकार को पीडीएस व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन विभिन्न सेक्टरों में महंगाई को काबू में करने की कोशिश नहीं की गई। यह कोशिश न तो पिछले दस साल में दिखी, और न ही अंतरिम बजट में कोई प्रावधान किया गया। प्रणव दा द्वारा प्रस्तावित सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों के खाते में डालने की योजना का अभी तक कहीं अता-पता नहीं है। आज देश के सामने आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने और महंगाई को कम करने की विकराल चुनौती है। यह आगे भी बनी रहेगी।
यूपीए सरकार के पूरे कार्यकाल में आधारभूत संरचना के विकास की गति काफी धीमी हो गयी। इससे रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं। बड़ी परियोजनाएं कानूनी अड़चनों के कारण परवान नहीं चढ़ पायी। घोटालों के कारण नीतिगत स्तर पर ठहराव आ गया। रक्षा क्षेत्र की जरुरतों की छोटी-छोटी सामग्री भी विदेशों से आयात किए जाने लगे। इस कारण दूसरे दौर की सुधार प्रक्रियाओं को लागू करने में सरकार विफल रही। सरकार की इस नाकामी के कारण निवेशकों का विश्वास डोल गया जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा और आर्थिक विकास दर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरिम बजट में आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की कोई ठोस घोषणा नहीं की गयी। कुल मिला कर यह यूपीए सरकार का अंतरिम बजट नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी का अंतरिम घोषणापत्र है। सरकार ने इस बजट में लोकलुभावन नीतियों द्वारा ज्यादा-से-ज्यादा जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयासभर किया है जिनमें किसान,पूर्व सैनिक,छात्र,अल्पसंख्यक आदि शामिल हैं। यह आरोप इसलिए भी सच लगता है क्योंकि पूर्व सैनिकों के लिए समान रैंक के लिए समान पेंशन की पार्टी युवराज राहुल गांधी द्वारा की गई मांग को अभी 48 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे और मांग को तमाम परंपराओं को ताक पर रखते हुए पूरा भी कर दिया गया। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

चुनाव में अपने पैसे से फोरलेन और बड़ी रेल लाइन बनाने की गर्जना करने वाले मुनमुन अब लगा रहे गुहार
अपन को गैर राजनैतिक कहने वाले जनमंच के कुछ अवशेषों को एक पत्र में फोर लेन में राजनैतिक अड़ंगे डालने के षड़यंत्र की बू आ रही थी और दूसरे पत्रों में आशा की किरण दिखायी दे रही है। अब ऐसे दोहरे चरित्र और आचरण वालों के लिये भला क्या कहा जा सकता है? जनता दरबार में प्रत्याशियों के कार्यक्रम में हजारों लोगों के सामने निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश मुनमुन राय ने कांग्रेस और भाजपा को आड़े हाथों लेते हुये गरज कर कहा था कि यदि वे चुनाव जीतते है तो अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम करा देंगें। मतदाताओं ने यह सोच कर वोट दिया था कि इधर मुनमुन जीते और उधर वे अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम प्रारंभ करा देंगें। लेकिन जनता को निराशा ही हाथ लगी है। नीता पटेरिया को प्रदेश भाजपा ने बालाघाट लोस द्वोत्र का प्रभारी बनाकर पुरुस्कृत किया या टिकटि की दौड़ से बाहर? इसका खुलासा अभी होने को है। लोकसभा चुनाव की टिकिट को लेकर जिले के कांग्रेसी हल्कों में कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। वैसे भी परिसीमन में सिवनी संसदीय क्षेत्र समाप्त होने तथा जिले के चारों विस क्षेत्र भी एक ही लोस क्षेत्र में ना रहने से जिले का राजनैतिक महत्व ही समाप्त हो गया है।
चिट्ठी चिट्ठी में भी देखते है फर्क-एक चिट्ठी वो थी एक चिट्ठी यह भी है। वो भी केन्द्रीय मंत्रियों को लिखी गयी थी ये भी एक केन्द्रीय मंत्री को लिखी गयी है। वो भी फोर लेन के लिये लिखी गयी थी ये भी फोर लेन के लिये लिखी गयी है। उसमें भी वाइल्ड लाइफ बोर्ड से व्यवधान दूर कराने का अनुरोध किया गया था इसमें भी यही किया गया है। लेकिन अपने अपन को गैर राजनैतिक कहने वाले जनमंच के कुछ अवशेषों को उसमें राजनैतिक फोर लेन में अड़ंगे डालने के षड़यंत्र की बू आ रही थी और इसमें आशा की किरण दिखायी दे रही है। जी हां हम बात कर रहें हैं फोर लेन के के लिये लिखी गयी चिट्ठियों बारे में। एक चिट्ठी जब इंका नेता आशुतोष वर्मा ने प्रधानमंत्री सहित अन्य केन्द्रीय मंत्रियों को भेजी गयी और तो उसे फोर लेन में अड़ंगा डालने के एक और षड़यंत्र की शुरुआत मानी गयी जबकि दूसरी चिट्ठी जब शिवराज सिंह और विधायक मुनमुन ने लिखी और वन मंत्री को जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने के साथ जाकर दी गयी तो उससे आशा की किरण दिखायी देने लगी। अब ऐसे दोहरे चरित्र और आचरण वालों के लिये भला क्या कहा जा सकता है?     
अपने पैसे से फोर लेन बनाने के मुनमुन के वायदे का क्या हुआ?-विस चुनाव प्रचार के दौरान गांधी चौक में दैनिक हंटर समाचार पत्र द्वारा आयोजित जनता दरबार में प्रत्याशियों के कार्यक्रम में हजारों लोगों के सामने निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश मुनमुन राय ने कांग्रेस और भाजपा को आड़े हाथों लेते हुये गरज कर कहा था कि यदि वे चुनाव जीतते है तो अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम करा देंगें। इन दोनों समस्याओं से त्रस्त जनता ने मुनमुन को इतने अधिक वोटों से जिता दिया जितनी कि उनको भी उम्मीद नहीं रही होगी। सिवनी क्षेत्र के मतदाताओं ने यह सोच कर वोट दिया था कि इधर मुनमुन जीते और उधर वे अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम प्रारंभ करा देंगें। लेकिन जनता को निराशा ही हाथ लगी। कोई भी जीतता तो शायद वो भी यहीं से प्रयास चालू करता जहां से मुनमुन ने चालू किये है। मुनमुन ने नवम्बर में चुनाव जीतने के बाद 1 फरवरी को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान इन मांगों को उठाया और फिर 10 फरवरी को दिल्ली में शिवराज के साथ वन एवं पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोइली से भी मिले। इनके साथ जनमंच के वे अवशेष भी शामिल थे जिन्होंने शुरू से ही निर्वाचित जन प्रतिनिधियों पर निकम्मेपन का आरोप लगाते हुये उनसे परहेज करने की रणनीति अपना रखी थी। इसी यात्रा में मुनमुन रेलमंत्री से भी मिल लिये जबकि उन्हें इस बात की जानकारी थी कि 12 फरवरी को संसद में अनुपूरक रेल बजट पेश किया जाने वाला है। लेकिन इस सबके बाद भी मुनमुन इस बात में तो सफल हो गये कि वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के फोर लेन के लिये दिल्ली चले गये वरना वे तो पिछले पांच साल से सिवनी के प्रतिनिधिमंड़ल को दिल्ली ले जाने का वायदा करते रहें है। शिवराज ने फोर लेन जैसे ज्वलंत मुद्दे पर दिल्ली यात्रा में सिवनी के भाजपा प्रत्याशी और जिला भाजपाध्यक्ष नरेश दिवाकर से क्यों परहेज किया?जिले के किसी भी भाजपा नेता चाहे वे विधायक कमल मर्सकोले हों,या डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन हों या नीता पटेरिया हों या फिर शशि ठाकुर के बजाय निर्दलीय विधायक मुनमुन राय को अपने साथ ले जाना क्यों पसंद किया?इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हो रहीं है। 
नीता पटेरिया बनी बालाघाट लोस क्षेत्र की प्रभारी-जिले की जनपद सदस्य,जिला पंचायत सदस्य,सांसद और विधायक रहीं भाजपा नेत्री नीता पटेरिया को बालाघाट संसदीय क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है। नीता समर्थक इसे उनकी उपलब्धि मान रहें है। विधायक रहते हुये उनकी टिकिट काट कर पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को दी गयी थी। लेकिन इस चुनाव में पांच बार से जीतने वाली भाजपा की हालत पतली हो गयी और यहां से निर्दलीय मुनमुन राय ने उसे 22 हजार वोटों से हरा दिया। भाजपा की इस करारी हार के बाद नीता की इस नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह भी तय किया गया है कि  लोस चुनावों के लिये भाजपा ने जिन नेताओं को प्रभारी बनाया है उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकिट नहीं दी जायेगी। कुछ विश्लेषकों का ऐसा मानना है कि इस तरह प्रदेश नेतृत्व ने नीता को बालाघाट संसदीय क्षेत्र से टिकिट की दौड़ से बाहर कर दिया है। अब देखना यह है कि बहनों के भाई और भांजियों के मामा शिवराज नीता पटेरिया का क्या राजनैतिक उपयोग करना पसंद करेंगें? 
कांग्रेस में टिकिट को लेकर उत्सुकता नही -लोकसभा चुनाव की टिकिट को लेकर जिले के कांग्रेसी हल्कों में कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। वैसे भी परिसीमन में सिवनी संसदीय क्षेत्र समाप्त होने तथा जिले के चारों विस क्षेत्र भी एक ही लोस क्षेत्र में ना रहने से जिले का राजनैतिक महत्व ही समाप्त हो गया है। उल्लेखनीय है परिसीमन में जिले की बरघाट और सिवनी सीट बालाघाट लोस में तथा केवलारी और लखनादौन सीट मंड़ला (अजा) लोस में शामिल कर दिये गये है। दोनों ही क्षेत्रों 6 विस क्षेत्र अन्य जिलों के है। इसलिये जिले के कांग्रेसी हल्कों में अभी तक टिकिट को लेकर कोई गंभीर चर्चा तक नहीं हो रही है तथा ना ही दोनों क्षेत्रों के कांग्रेस की टिकिट चाहने वाले नेताओं ने ही अपनी कोई सक्रियता इस जिले में दिखायी है।पिछले चुनाव में मंड़ला से कांग्रेस के बसोरी सिंह मसराम सांसद है जिन्होंने भाजपा के दिग्गज फग्गन सिंह कुलस्ते को हराया था और बालाघाट से भाजपा के के.डी.देशमुख ने कांग्रेस के विश्वेश्वर भगत को चुनाव हराया था। लेकिन सांसद के.डी.देशमुख अब भाजपा से कटंगी क्षेत्र के विधायक बन गये है। इसलिये दोनों ही पार्टियों से नये उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चा है। इन दिनो जारी चर्चाओं के अनुसार कांग्रेस से लांजी की युवा विधायक हिना कावरे और परसवाड़ा के विधायक मधु भगत का नाम संभावित उम्मीदवारों के रूप में लिया जा रहा है। ऐसी भी चर्चायें हैं कि मंड़ला से भी कांग्रेस किसी नये प्रत्याशी पर दांव खेल सकती है। अब यह तो वक्त आने पर ही स्पष्ट हो पायेगा कि कांग्रेस किसको अपना प्रत्याश बनाती है।“मुसाफिर” 
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
18 फरवरी 2014 से साभार 

17.2.14

रायता फैला दिया !




लेखक - नरेश मिश्र



किशोर उम्र में कामेडियन लॉरेल-हार्डी की एक अवाक फिल्म देखी थी । फिल्म में दोनों मसखरे] अनाड़ी] बेरोजगार कामेडियनों ने लंदन के बाजार में एक घड़ीसाज की दुकान खोली । घंटों इंतेजार के बाद एक बदकिस्मत ग्राहक  अपनी एलार्म टेबल-वॉच लेकर दुकान पर आया । लॉरेल-हार्डी ने मुस्कुराहट बिखेर कर ऊॅंची टोप वाले ग्राहक का स्वागत किया । ग्राहक ने उन्हें एलार्म घड़़ी दिखाई । दोनों मसखरों ने घड़ी को उलट पलट कर देखा । मरम्मत का मेहनताना तय किया । फिर दोनों पेचकस लेकर घड़ी के पुर्जे खोलने लगे । दोनों ने एक एक पुर्जा खोलकर अलग कर दिया,  फिर वे उसकी मरम्मत के बारे में गहराई से सोचने लगे । अधेड़ ग्राहक उत्सुकता से उनकी कारगुजारी देख रहा था । सलाह मशवरे के बाद दोनों मसखरे इस नतीजे पर पहुंचे कि वे घड़ी की मरम्मत नहीं कर सकते । लॉरेल ने ग्राहक से इशारा कर उसका टोप आगे करने को कहा । उन्होंने ग्राहक के टोप में घड़ी के कलपुर्जे रख दिये और ग्राहक से इशारा कर कहा - इसकी मरम्मत नहीं हो सकती, आप इसे ले जाईये ।

दिल्ली के उन्चासदिनी मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की नौटंकी देखकर हमें लॉरेल-हार्डी की याद बेसाख्ता आई । लॉरेल-हार्डी की आत्मा को भी केजरीवाल का करिश्मा याद आया होगा लेकिन हम यकीनन कह सकते हैं कि लॉरेल-हार्डी केजरीवाल का करिश्मा देखकर हंसने के बजाय रो रहे होंगे । उन्हें अफसोस हुआ होगा कि उन्होंने यह कमेडी फिल्म क्यों बनाई जिसकी नकल कर केजरीवाल ने दिल्लीवालों का दिल  तोड़ दिया ।

साहेबान, मेहरबान  ! गौर फरमायें, पहला करिश्मा । अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के वक्त दिल्ली की सड़कों पर बैनर लगाकर दावा किया था कि वे अन्ना हजारे का जनलोकपाल विधेयक पास करायेंगे । उनकी औकात नहीं थी लेकिन उन्होंने औकात के बाहर बयाना लिया । दिल्लीवासियों का पचास फीसदी बिजली बिल कम करने और सात सौ लीटर रोजना पानी देने का वायदा भी था । वोटर तो केजरीवाल के मंच भाषण से ठगे गये । आप पार्टी के घोषणापत्र में इन वायदों पर कुछ शर्तें भी लिखी थीं । आमतौर पर ठग व्यापारी अपने आकर्षक विज्ञापनों में ग्राहकों को ठगने के लिये (शर्तें लागू) लिख देते हैं । व्यापार जगत की यह ठगी सियासत में भी काम आती है । योगेन्द्र यादव अपनी मसीहाई वाणी में फरमाते हैं - वोटरों को घोषणपत्र पढ़ लेना चाहिये था । आप पार्टी के चालबाज ठगों से कोयी ये नहीं पूछता कि सियासी पार्टियों के घोषणपत्र कितने वोटर पढ़ते हैं । लगभग डेढ़ करोड़ वोटरों में आपने कितने घोषणापत्र बॉंटे थे । कितने वोटर वोट देने से पहले घोषणपत्र पढ़ते हैं । वे घोषणापत्र पढ़ना जानते हैं या नहीं ।

सवाल तो तमाम हैं । जवाब देने के लिये आप के चालबाज प्रवक्ता हैं, जो ऊॅंची आवज में बुलेट ट्रेन की चाल से बोलते हैं । वे किसी और को  बोलने नहीं देते । हिटलर के प्रचार मंत्री गॉयबेल्स ने कहा था कि सौ बार झूठ बोलने पर वह सच महसूस होने लगता है ।  गॉयबेल्स कब्र में बेचैनी से करवटें बदलता होगा । केजरीवाल ने तो एक बार झूठ का तूफान खड़ा कर दिल्ली को लूट लिया । ईरानी लुटेरा नादिरशाह जिन्दा होता तो अचरज से ऑखें फाड़ कर कहता - जनाब इतनी बेदर्दी से तो हमने भी दिल्ली वालों को नहीं लूटा था ।

केजरीवाल ने कहा था - मैंने कांग्रेस और भाजपा का रायता फैला दिया । यकीनन उन्हें रायता पसंद है । रायता का ज़ायका खट्टा होता है, केजरीवाल को खांसी की शिकायत हैं, उन्हें रायते का ज़ायका लेने से बचना चाहिये । बुरी आदत आसानी से नहीं छूटती । केजरीवाल अब अपनी पार्टी का रायता फैलायेंगे । देशवासियों की सेहत के लिये यह रायता यकीनन ज़हर साबित होगा ।





एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली-ब्रज की दुनिया

17-2-14,भिखनपुरा (कुबतपुर),ब्रजकिशोर सिंह। कैसी बिडंबना है कि एक तरफ तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जोर-शोर से घोषणा करते फिर रहे हैं कि 250 की आबादी तक के गांवों को भी बिजली से जोड़ा जाएगा वहीं वैशाली जिले का एक गांव भिखनपुरा (कुबतपुर) ऐसा भी है जिसकी रोशनी खुद सुशासन ने छीन ली। वर्ष 2006 तक हाजीपुर-महनार मुख्य सड़क पर बिलट चौक के पास स्थित यह गांव दिन ढलते ही बिजली की रोशनी में नहा उठता था। उसी साल दुर्भाग्यवश ट्रांसफार्मर जल गया और तभी से गांव के 700 लोग बिजली का इंतजार कर रहे हैं। बीच में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजना आई और चली भी गई लेकिन इस अभिशप्त गांव की किस्मत में मानो अंधेरा ही लिखा था। बगल के गांव खोरमपुर में इस परियोजना के अंतर्गत बिजली आ गई लेकिन कुबतपुर को इस परियोजना का लाभ नहीं मिल पाया।

पिछले साल गांव के लोगों में तब उम्मीद जगी जब गांव में बिजली लाने के लिए किसी को ठेका दे दिया गया। पोल गाड़े गए और टूटे हुए तारों को ठीक भी कर दिया गया मगर मामला फिर ट्रांसफार्मर पर आकर अँटक गया। ठेकेदार का मुंशी रंजन कुमार ट्रांसफार्मर लगाने के ऐवज में 20 हजार रुपए की रिश्वत मांग रहा है जिससे बाँकी के सारे काम पूरे हो जाने के बावजूद पिछले 6 महीने से गांव दिन ढलते ही अंधेरे में डूब जाता है। इस संबंध में जब जिले के कार्यपालक अभियंता रामेश्वर सिंह को जानकारी दी गई तो उन्होंने बताया कि वहाँ पर विद्युतीकरण का काम पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया कर रहा है इसलिए वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। जब पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के नंबर-0124-2571845 पर फोन किया गया तो कहा गया कि कंपनी के डीएमएस विभाग में 0124-2571929 पर फोन किया जाए कोई झा जी फोन उठाएंगे। हमने इस नंबर पर भी कई बार फोन किया मगर किसी ने फोन नहीं उठाया। हमने हाजीपुर के सांसद रामसुंदर दास और राजापाकर के विधायक श्री दास के पुत्र संजय कुमार के नंबर पर भी कई बार बात करने का प्रयास किया लेकिन हर बार मोबाईल बंद मिला।

इसके बाद हमने बिजली मंत्री,बिहार विजेंद्र प्रसाद यादव को फोन मिलाया तो कहा गया कि मंत्री जी इस समय हाउस में हैं इसलिए हम चाहें तो समस्या को फैक्स कर सकते हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

16.2.14

सेवा की मिसाल ‘नारायण सेवा समिति’

जांजगीर-चांपा ( छत्तीसगढ़ ) के षिवरीनारायण की नारायण सेवा समिति, ‘मानव सेवा’ की मिसाल बन गई है। षिवरीनारायण में माघी पूर्णिमा से हर साल शुरू होने वाले प्राचीन मेले में हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं को नारायण सेवा समिति द्वारा प्रसाद स्वरूप भोजन कराया जाता है। भूखे व्यक्तियों की सेवा को ‘नारायण सेवा’ मानकर यह परिपाटी शुरू की गई थी, जो 16 बरसों से जारी है। हर साल 10 हजार से अधिक श्रद्धालु भोजन करते हैं। लोट मारकर भगवान नर-नारायण के दर्षन के लिए पहुंचने वाले भक्तों को दो दिनों तक भोजन कराया जाता है। इसकी सफलता के लिए कई समाजसेवी के साथ ही, स्कूली छात्र-छात्राएं जुटे रहते हैं।  नारायण सेवा समिति के अध्यक्ष राजेष अग्रवाल का कहना है कि 1998 में षिवरीनारायण के कुछ समाजसेवी अमरनाथ यात्रा पर गए थे। इस दौरान वहां दूरस्थ इलाकों से भगवान के दर्षन करने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भोजन कराने की परिपाटी की जानकारी मिली। इसके बाद षिवरीनारायण में भी इस परिपाटी को माघी पूर्णिमा के अवसर पर शुरू की गई, जो आज भी जारी है।
नारायण सेवा समिति के कई सदस्य दो दिनों तक पूरी तन्मयता के साथ जुटे रहते हैं, वहीं षिवरीनारायण के कई उत्साही युवक भी समाजसेवा की भावना से लबरेज होकर भोजन परोसने से लेकर श्रद्धालुओं की अन्य सेवा में जुटे रहते हैं। लोट मारकर मंदिर के पट तक पहुंचने वाले लोगों को भोजन का कूपन दिया जाता है और उन्हें पास ही भोजन स्थल की जानकारी दी जाती है। इस तरह भगवान ‘नर-नारायण’ के दर्षन के बाद श्रद्धालु, भोजन प्राप्त करने पहुंचते हैं। 
माघी पूर्णिमा से शुरू होने वाले षिवरीनारायण मेले की पहचान काफी प्राचीन है। अविभाजित मध्यप्रदेष के समय से ही षिवरीनारायण का 15 दिवसीय मेला, सबसे बड़ा मेला रहा है। छग के निर्माण के बाद भी षिवरीनारायण मेले की वही पहचान आज भी कायम है। महाषिवरात्रि तक मेले में रोजाना लाखों की संख्या में भीड़ जुटती है।   षिवरीनारायण की महत्ता इसलिए भी है कि इस धार्मिक नगरी को पुरी के भगवान जगन्नाथ का ‘मूल स्थान’ माना जाता है और किवदंति है कि भगवान जगन्नाथ, माघी पूर्णिमा को एक दिन षिवरीनारायण में विराजते हैं, इसलिए भगवान के दर्षन के लिए भक्तों को सैलाब उमड़ पड़ता है। माघी पूर्णिमा पर चित्रोत्पला महानदी के त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद श्रद्धालु, भगवान नर-नारायण के दर्षन करने पहुंचते हैं। हजारों भक्त ऐसे होते हैं, जो भगवान के द्वार तक लोट मारते पहुंचते हैं और आषीर्वाद प्राप्त करते हैं। खास बात यह भी रहती है कि दूर-दूर से लोट मारकर आने वाले भक्तों के चेहरों में थकान कहीं नजर नहीं आती, इसे वे भगवान की कृपा ही मानते हैं।


चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

चिड़ियाँ छोड़ मुर्गी को धाये !!

कामना और लोभ की जब अति होती है तब दानव का जन्म होता है। शास्त्र ने कहा है
अति सर्वत्र वर्जयेत। आचार्य चाणक्य का मानना था कि मनुष्य ना तो ज्यादा सरल
बने और ना अतिशय ईमानदार क्योंकि अति दानी होने के कारण बली को पाताल
लोक में जाना पड़ा , अति ईमानदार होने के कारण राजा हरिशचन्द्र को चाण्डाल
बनना पड़ा और अतिशय रूपवती होने के कारण सीता का अपहरण हुआ।

         देश की सियासत में एक अति महत्वाकांक्षी पार्टी का उदय हुआ जो खुद को
और खुद की पार्टी में शामिल सभी लोगों को ईमानदारी का स्वयं निर्मित ताज पहना
कर उनके ऊपर ईमानदारी का चौबीस केरेट का सिक्का लगा महसूस करती है और बाकी 
सब को चोर समझती है ,इनके मुताबिक़ संविधान में प्रावधान नहीं है तो संविधान
को ठेंगा बताये और संविधान से इनके स्वार्थ की पूर्ति होती है तो उस बेकार संविधान
को पवित्र मान उसकी दुहाई दे दे। राह चलता उदंड किसी सज्जन को गाली बक कर
यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि इस महाशय ने जो भी समाजोपयोगी काम किये
हैं उसमें उनकी मेहनत के अलावा हराम के धन का उपयोग किया है तो हो सकता है लोग
उस सज्जन पर शंका करें मगर उस उदंड के पास पहले से भी खोने के लिए कुछ भी ना था
और अब भी कुछ नहीं है लेकिन समाज को उसकी उदंडता से एक नुकसान जरुर होता है
की सज्जन लोग समाजोपयोगी काम करने से विरक्त हो जाये।

         एक किसान ने खेत पर पाले हुए कुत्ते को एक दिन गाँव में लाने की सोची।किसान
ने सोचा कि गाँव की गलियों के कुत्ते उस पर हमला ना कर दे इसलिए उस कुत्ते के गले
में पट्टा बाँध बैलगाड़ी के निचे बाँध दिया और बैलगाड़ी को गाँव की ओर हाँक दिया। कुत्ता
बैलगाड़ी के निचे सुरक्षित चल रहा था। कुछ देर बाद जब गाँव में बैलगाड़ी ने प्रवेश किया
तो गलियों के कुत्तों ने खेत के कुत्ते से पूछा -भाई ,आप बैलगाड़ी के निचे हम लोगों से डर
कर क्यों चल रहे हो ?तुम और हम तो एक ही जाति से हैं। कुत्ते ने बहाना बनाते हुए कहा -
भाइयों,मैं आपसे डर नहीं रहा हूँ। कुछ देर रुक कर शेखी मारते हुए बोला -आप लोग तो
निकम्मे बन गए हो ,मुफ्त कि रोटियाँ तोड़ रहे हो और मेरे ऊपर अभी बेलों सहित मालिक
को सुरक्षित घर पहुँचाने कि जबाबदेही है ,इन सबका बोझ उठाते हुए मैं महत्वपूर्ण सेवा में
व्यस्त हूँ। सभी कुत्ते उसकी शेखी सुनकर उस पर भौंकने लगे। कहने का आशय यही है कि
मनुष्य कभी ये ना समझे कि उससे ज्यादा बुद्धिमान कोई भी नहीं है और ना भविष्य में
जरुरत पड़ने वाली है।

        आचार्य चाणक्य ने कहा है कि अनिश्चित और निश्चित में से निश्चित का ही महत्व
है चाहे उसका फल छोटा भी क्यों ना हो। कल मिलने वाले मुर्गे की आकांक्षा के चलते आज
जो हाथ में चिड़ियाँ है उसको छोड़ देने वाला मुर्ख होता है। व्यक्ति जब अति लोभी बनता है
तो उसके लोभ के कारण वह अपने कुनबे के सर्वनाश का कारण बनता है  उस कुनबे की
हालत उस मक्खी जैसी होती है जो मीठे के लोभ में शहद पर बैठ जाती है और अपने पँख
शहद से लिपटा कर अपनी मौत का कारण खुद बनती है।               

मोदी,केजरीवाल और अंबानी-ब्रज की दुनिया

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,लोकसभा चुनाव के लिए चल रहा चुनाव प्रचार अब निर्णायक दौर में प्रवेश करने जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अभी भी प्रधानमंत्री पद के अपने निकटतम अघोषित उम्मीदवार कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी से काफी आगे चल रहे हैं। तीसरे स्थान के लिए काफी जद्दोजहद है और इस स्थान पर आने के लिए इन दिनों जो व्यक्ति सबसे ज्यादा व्याकुल हो रहा है उसका नाम है रणछोड़ अरविन्द केजरीवाल।
मित्रों,श्री केजरीवाल ने 40000 रुपए मासिक की पेंशन और दिल्ली में ताउम्र एक बंगले पर अपने कब्जे को सुनिश्चित करते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है। श्रीमान का झूठा और आधारहीन आरोप है कि भारत के सबसे धनवान व्यक्ति मुकेश अंबानी ने कांग्रेस और भाजपा को एक कर दिया है। यह तो नीरा राडिया प्रकरण में ही साबित हो गया था कि भारत की वर्तमान केंद्र सरकार को वास्तव में मुकेश अंबानी चला रहे हैं। यह तो स्थापित तथ्य है फिर नए सिरे से कांग्रेस पर आरोप लगाकर केजरीवाल क्या साबित करना चाहते हैं और क्या प्राप्त करना चाहते हैं? इससे पहले जब भाजपा की सरकार केंद्र में थी तब तो अंबानी परिवार की नहीं चलती थी और उसको बाँकी उद्योगपतियों से इतर कोई विशेष लाभ नहीं पहुँचाया गया था। फिर इस मामले में भाजपा को घसीटने का केजरीवाल का क्या औचित्य है? क्या यह आरोप भी आप विधायक मदनलाल के माध्यम से लगाए गए आरोपों की तरह मात्र पब्लिसिटी स्टंट नहीं है?
मित्रों,श्री केजरीवाल ने मोदी से अंबानी के बारे में राय मांगी है। क्या उन्होंने ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं किया है क्योंकि अंबानी भी मूल रूप से गुजराती है? मोदी ने तो टाटा,बिरला सहित सारे बड़े उद्योगपतियों के कारखाने गुजरात में स्थापित करवाए हैं और खुद पहल करके करवाए हैं फिर सिर्फ अंबानी पर ही मोदी से क्यों राय मांगी जा रही है? अगर मोदी ने बाँकी उद्योगपतियों की उपेक्षा करके अंबानी को कोई लाभ पहुँचाया है और इस तरह का कोई सबूत झूठ शिरोमणि श्री श्री केजरीवाल के पास है तो हम मीडिया के लोग उसका स्वागत करेंगे उसे अविलंब मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाए। वरना केजरीवाल जी बेबुनियाद बातें करना बंद करें क्योंकि उनकी कलई दिल्ली के 49 दिन के उनके कुशासन ने खोलकर रख दी है। श्री केजरीवाल न तो देश को सुशासन दे सकते हैं,न ही भ्रष्टाचार ही दूर कर सकते हैं वे तो बस अराजकता पैदा कर सकते हैं और जनता को दिन-रात झूठ बोलकर गुमराह कर सकते हैं,धोखा दे सकते हैं। देश-विदेश की भारतविरोधी ताकतों से अरबों-खरबों का बेहिसाब चंदा इकट्ठा कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि केजरीवाल ने पिछले 49 दिनों में यह साबित कर दिया है कि वे सिर्फ हंगामा कर सकते हैं सूरत को बदलना उनके बूते का रोग है ही नहीं। हम उन चंद भाग्यशाली व्यक्तियों में से हैं जिसने केजरीवाल की असलियत को तभी समझ लिया था जब वे दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार कर रहे थे।
मित्रों,इन दिनों कांग्रेस पार्टी जोर-शोर से प्रचार कर रही है कि मोदी के चाचा ने कैंटिन का ठेका ले रखा था। मैं उन कांग्रेस के झूठे,लफ्फाज अहमकों से पूछना चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री तो श्री वरूण गांधी के चाचा भी थे फिर युवराज का दर्जा सिर्फ राहुल जी को ही क्यों प्राप्त है? क्यों कांग्रेस ने राजीव के छोटे भाई संजय को भुला दिया है? क्यों आज भी उनकी विधवा श्रीमती मेनका गांधी को गांधी परिवार में सदस्य का दर्जा प्राप्त नहीं है? जब वरूण के लिए पिता और चाचा में इतना बड़ा अंतर है तो फिर मोदी के लिए चाचा और पिता एकसमान कैसे हो गए? हो सकता है कि मोदी के चाचा धनवान हों मगर पिता गरीब हों जैसे कि राहुल कांग्रेस के युवराज है और वरूण कुछ भी नहीं हैं।
मित्रों,कांग्रेस ने किसी चायवाले के संगठन से यह प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया है। मैंने तो बिहार में कहीं भी चायवालों का संगठन नहीं देखा फिर गुजरात में उनका कौन-सा संगठन इस चुनावी मौसम में पैदा हो गया और अगर ऐसा कोई संगठन है भी तो क्या वह 40-45 साल पुराना है और क्या श्री मोदी के पिता दामोदर मोदी उसके सदस्य थे? वास्तव में कांग्रेस के ये अहमक नेता मोदी पर चाय संबंधी बयान देकर फँस गए हैं और इसलिए इन्होंने चायवालों का झूठा संगठन खड़ा करके और उसको प्रलोभन देकर ऐसा बयान दिलवाया है। अभी तो कांग्रेस पार्टी ने यह साबित करने की कोशिश ही की है कि मोदी की चाय की दुकान नहीं थी हमें तो उस दिन का भी इंतजार है जब वह यह कहेगी कि चाय पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और ऐसा वो चायपत्ती के पैकेटों पर भी छपवाएगी।
मित्रों,यह कोई संयोग नहीं है कि कांग्रेस ने मोदी के बारे झूठ की यह खेती तब नए सिरे से शुरू की है जबकि केजरीवाल सरकार ने खुदकुशी कर ली है और लोकसभा के चुनाव में हाथ आजमाने के लिए ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि पहले भी कांग्रेस और केजरीवाल में मिलीभगत थी और आज भी है। अंत में एक शेर कलियुगी रणछोड़,हर बार अपनी जिम्मेदारियों को छोड़कर पलायन कर जानेवाले केजरीवाल सर के नाम-
झूठ और मक्कारी है यह इसे ईबादत का नाम न दो,
तुमने खुदकुशी की है इसे शहादत का नाम न दो।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

15.2.14

जौनपुर की पहली अंग्रेजी वेबसाइट अब आपके सामने है |


जौनपुर की website दो भाषाओँ में २०१० मई से आप सब के सामने है | इसे समय समय पे  जौनपुर वासियों की आवश्यकताओं को देखते हुए नवीनीकरण किया जाता रहा है |  हिंदी की website जहां पूर्वांचल में अधिक देखी जाती है तो अंग्रेजी की वेबसाइट की आवाज़ पूरे विश्व में अधिक पहुँचती है |

आज तक कई लाख लोग इन वेबसाइट को देख चुके हैं और जौनपुर वासियों के सहयोग से इसके पाठकों में हर दिन वृधि होती जा रही है |

अंग्रेजी की नयी website अपने आपमें बहुत से नए विकल्प ले के आयी है जिसे  समय के साथ साथ जौनपुर के लोगों की सुविधा को देखते हुए जोड़ा गया है | कुछ नए विकल्प आपके सामने हैं जिन्हें आप भी देखें | इनके बारे में लोगों को बताएं और इसका इस्तेमाल करके फायदा उठाएं और इस से जुड़ के जौनपुर का गौरव बढायें |

आपकी आवाज़ और जौनपुर का इतिहास पूरी दुनिया तक पहुंचाती इस website के नए आवरण को अवश्य देखें |
हिंदी http://www.hamarajaunpur.com/
English http://jaunpurcity.in/

1. जौनपुर वासियों की सुविधा के लिए हमेशा से एक डायरेक्टरी की कमी महसूस की जाती रही है | अंग्रेजी की website में इसे yellow page option में जोड़ा गया है |

यदि आप किसी तरह का व्यापार करते हैं या सामाजिक कार्य करते हैं तो उसे  यहाँ मुफ्त में जुड़वा के दुनिया को और जौनपुर के लोगों को बताएं | यह आपके व्यापार को बढाने में सहायक होगा |

आपके  व्यापार इत्यादि को जुड़ने के लिए आप संचालक श्री एस एम् मासूम को इ मेल या एस एम् एस कर सकते है या फिर जौनपुर बाज़ार के facebook पेज पे जा के उसे लिख दें | जल्द से जल्द उसे मुफ्त सेवा के वायदे के अनुसार जल्द से जल्द जोड़ दिया जायेगा |

२)  जौनपुर की इस दो भाषाओँ में शुरू की गयी वेबसाइट का मकसद धन कमाना नहीं बल्कि जौनपुर को दुनिया से जोड़ना है इसलिए विज्ञापन  की सुविधा अभी तक नहीं दी गयी थी लेकिन जौनपुर के लोगों के अनुरोध पे इसे अभी हिंदी की वेबसाइट पे शुरू किया जा रहा है जिसमे विज्ञापन के दर बहुत कम होंगे जिससे की इस सुविधा का लाभ छोटा व्यापारी भी उठा सके | आप यहाँ इसके बारे में जान सकते हैं |

३. अंग्रेजी की website पे पहले लोगों को पुराने लेख इत्यादि तलाशने में असुविधा हुआ करती थी जिसे देखते हुए इसमें बहुत से नए section जोड़े गए हैं जैसे history, news, society,lifestyle, notable jaunpuri इत्यादि जिस से अब आप एक क्लिक से ही बहुत से जानकारी पहले पेज पे ही पा सकते हैं |


४. जौनपुर की यह दोनों website को अब आप अपने मोबाइल से भी आसानी से देख सकते हैं |

5. आपका गाँव आपको अवश्य प्यारा होगा और दुनिया तक उसकी तस्वीरें वहाँ के लोगों के बारे में दुनिया को बताने का मन भी करता होगा तो इंतज़ार आपका अब ख़त्म हुआ | फ़ौरन लिखें संचालक एस एम् मासूम को और भेजें आने गाँव के बारे में तस्वीरों के साथ |

आपके सुझावों का स्वागत है और सहयोग की आशा | आभार संचालक - एस एम् मासूम
facebook

जौनपुर बाज़ार पेज : https://www.facebook.com/jaunpurbazaar

जौनपुर शहर पेज https://www.facebook.com/jaunpurshahar

जौनपुर के विडियो देखें http://www.youtube.com/user/payameamn

साभार - एस एम् मासूम



15-02-
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