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25.10.14

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

पर उपदेश कुशल बहुतेरे 

एक बाबाजी जँगल में कुटिया बना के रहते थे। समीप के गाँवों से भिक्षा अर्जन
करके पेट भर लेते थे। बाबाजी समीप के गाँवों में प्रसिद्ध थे। गाँव वालो के दुःख
दर्द सुनते और उचित उपचार और सलाह देते। उनकी कुटिया पर दिन भर कोई
ना कोई भक्त अपना दुःख दर्द लेकर आता रहता। कोई बच्चे के निरोगी होने की
कामना से,कोई पालतू जानवर के बीमार हो जाने पर,कोई बिगड़े काम को
सँवारने की आशा से।

एक दिन सुबह सवेरे बाबाजी गाँव की ओर गये और गाँव वालो को खुद की बीमार
गाय का हाल बताया और ठीक होने का उपाय पूछा। गाँव वालो ने दूसरे गाँव के
जानकार के पास भेजा ,दूसरे ने तीसरे गाँव वाले जानकार के पास। एक गाँव से
दूसरे गाँव घूमते-घूमते बाबाजी थक गए इतने में एक किसान उधर से गुजरा।
बाबाजी को प्रणाम कर उसकी भैंस को भभूत से ठीक कर देने के लिए आभार
जताया और बाबाजी को वहाँ होने का कारण पूछा।

बाबाजी ने अपनी बीमार गाय के बारे में सुबह से गाँव-गाँव बिमारी के बारे में
जानकारी रखने वाले की खोज में घूमने की बात कही। उनकी बात सुन किसान
बोला -बाबाजी,आपकी भभूत से मेरी भैंस ठीक हो गयी तो क्या आपकी गाय
ठीक नहीं हो सकती ?

बाबाजी बोले -वो तेरी भैंस थी बेटे,मगर यह मेरी गाय है।

हम अपनी पीड़ा के बोझ तले दब जाते हैं। दूसरे का दुःख छोटा और खुद का बड़ा
समझने की फितरत है इंसान में। आप कहेंगे यह तो हर कोई जानता है,इसमें
नया क्या ?दूसरों को उपदेश देना सहज,सरल है क्योंकि उसमें "मेरा"या "मेरापन"
नहीं है। जहाँ मेरापन झुड़ा हो,वहां क्या करे,कैसे करें ?

जब दुःख स्वयं से जुड़ जाता है तो उसको दूर करने के लिए हम निष्णात व्यक्ति
से,अपने हितेषी के निर्णय से और परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जुड़ जाये।
खुद की बुद्धि का संकटकाल में अधिक उपयोग ना करेंक्योंकि चिंतित मन कभी
भी सही निर्णय समय पर नहीं करता है।       

14.10.14

Indian AirForce Hidon 03

धार्मिक उत्सवों से समाप्त होती धर्मिकता ना केवल चिंता का विषय है वरन इसे पुर्नजीवित करने के प्रयास करना जरूरी है
आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी। महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। लेकिन कांग्रेस से टीम राहुल की हिना कांवरे ही गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है। दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। 
धार्मिक उत्सवों में समाप्त होती धार्मिकता चिंता का विषय:-आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। पिछले कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि जब पूरे देश में दशहरा मनाया जाता है तो उसके दूसरे दिन सिवनी में दशहरा मनाने का निर्णय ले लिया जाता है। इस साल भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस कारण होता यह है कि गांव के लोग दशहरे के दिन आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं। उन्हें इस बात का पता ही नहीं रहता कि शहर में आज नहीं ब्लकि कल मनाया जाने वाला हैं। ऐसे आयोजनों में यदि भटकाव आता है तो धर्म गुरु राह दिखाते हैं। कई साल पहले शहर में मां दुर्गा के मंड़पों में नौ दिनों तक ना केवल बेतुके फिल्मी गाने बजते थे ब्लकि कई स्थानों पर फूहड़ नृत्य भी हुआ करते थे। तब जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने यह कहा कि मां जगदम्बा के पंड़ालों में फिल्मी गीत नहीं बजना चाहिये औ फूहड़ नृत्य नहीं होना चाहिये ब्लकि जस और भजन बजना चाहिये ताकि धार्मिक वातावरण बने और दर्शक पूरे श्रृद्धा भाव से मां के दर्शन कर धर्म लाभ ले सकें। इसका यह असर हुआ कि आज शहर में ना तो कोई फूहड़ नृत्य होते है और ना ही फिल्मी गाने बजते है ब्लकि मां अम्बे के जस की गूंज पूरे शहर में भक्ति भाव का संचार करते हैं। इस साल भी पं. रविशंकर शास्त्री जी ने यह कहा था कि धर्मानुसार सभी पूजन पाठ मुहुर्त के हिसाब से होना चाहिये। लेकिन दशहरा एक दिन बाद मनाने का निर्णय ले लिया गया था। जानकार लोगों का दावा है कि ऐसा इसलिये होता है क्योंकि दुर्गा चौक के माता राज राजेश्वरी मंदिर के जवारे नवमी के दिन विसर्जन के लिये निकलते हैं। कई बार जब तिथियों के घटने के कारण दशहरा भी नवमी के दिन पड़ता है तो समस्या आती है। वैसे यदि देखा जाये तो सिर्फ सिंघानिया जी के मकान से स्व.महेश मालू के घर के सामने तक की कुछ मीटर की सड़क ही ऐसी कामन है जो दशहरे के जुलूस मार्ग और जवारे के मार्ग में शामिल रहती हैं। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी।
कांग्रेस में सिवनी का कम होता महत्व:-महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। जिले के भाजपा के के तीन पूर्व विधायकों डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और नरेश दिवाकर को महाराष्ट्र तथा नीता पटेरिया को हरियाणा में प्रभार दिया गया है। इसके अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और पूर्व जिला भाजप अध्यक्ष सुजीत जैन भी महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार करने गये हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश में विस के उप चुनावों में भाजपा को करारा झटका लगने के बाद ये चुनाव भाजपा के लिये प्रतिष्ठा  का प्रश्न बन गयें हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि इन दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जरूरत से ज्यादा प्रचार को महत्व दे रहें हैं। जिसके कारण उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी है। ऐसे महत्वपूर्ण मिशन में जिले के भाजपा नेताओं को भी प्रभार मिलना काफी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिये भी ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व ने जिले के किसी भी नेता को इन राज्यों में चुनाव में कोई जवाबदारी नहीं दी है।  और तो और टीम राहुल से भी सिर्फ बालाघाट लोस क्षेत्र की कांग्रेस उम्मीदवार रहीं विधायक हिना कांवरे कांग्रेस के प्रचार में महाराष्ट्र गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है।
दिवाली के बाद लग सकती है नपा चुनाव के लिये आचार संहिताः-दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। वैसे तो वार्डों के आरक्षण के बाद से ही मोहल्लों में चुनावी रणवीरों ने अपने दांव पेंच दिखाने लगे है। हालांकि अभी किसी भी पार्टी ने अपने उम्मीदवार तय नहीं किये हैं लेकिन अपने अपने आकाओं के आश्वासन पर पार्षद बनने की उम्मीद रखने वाले नेताओं ने अपनी अपनी बिसात बिछाना चालू कर दी है। तब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव में क्या रणनीति अपनाते है और किन मुद्दों को उठाया जाता है। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि सिवनी के निर्दलीय विधायक मुनमुन राय इस चुनाव में सीधे मैदान में उतरते हैं या फिर कोई और रणनीति बना कर किसी को लाभ पहुचाने और किसी को नुकसान करने करने की बिसात बिछाते है? राजनैतिक विश्लेषकों की इन्हीं सब पर पैनी नजर है जो चुनावों के परिणामों को प्रभावित करन वाली साबित होंगीं।“मुसाफिर” 
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
14 अक्टूबर 2014

एक बार फिर से वोट फॉर मोदी,वोट फॉर इंडिया-ब्रज की दुनिया

14 अक्तूबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। महाराष्ट्र और हरियाणा के मित्रों,एक बार फिर से गेंद आपके पाले में है,बाजी आपके हाथों में है। लोकसभा चुनावों के समय जिस तरह आपलोगों ने बाँकी देश के साथ मिलकर कदमताल किया उसके लिए हम आजीवन आपके आभारी रहेंगे। यह आपकी बुद्धिमानी का ही प्रतिफल है कि आज केंद्र में देश के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले व्यक्ति के नेतृत्व में सरकार सत्ता में है। केंद्र में आज मजबूर नहीं मजबूत सरकार है लेकिन यह सरकार अभी भी पूरी तरह से मजबूत नहीं है। वह इसलिए क्योंकि राज्यसभा में इसको बहुमत प्राप्त नहीं है और यह तो आप भी जानते हैं कि कोई भी विधेयक तभी कानून बनता है जब उसको राज्यसभा भी पारित कर दे।
मित्रों,हमारे संविधान में ऐसी व्यवस्था की गई है कि विधानसभा सदस्य ही राज्यसभा सदस्यों का चुनाव करते हैं। जाहिर है कि एनडीए को तभी राज्यसभा में बहुमत मिल सकेगा जब देश की सारी विधानसभाओं में उसका बहुमत हो। यह आप दो राज्यों के निवासियों का सौभाग्य है कि इस दिशा में पहला कदम उठाने का सुअवसर आपलोगों को मिला है। आपने लोकसभा में तो एऩडीए को मजबूत कर दिया आईए राज्यसभा में भी उसको मजबूती प्रदान करें जिससे कि वह सचमुच में मजबूत सरकार सिद्ध हो सके और उसको राज्यसभा में जया,ममता,माया और मुलायम जैसे भ्रष्टों और देशविरोधियों का मुँहतका न बनना पड़े। देश का भविष्य आपके हाथों में है। देश का भविष्य आपको पुकार रहा है। तो आईए दोस्तों,घर से निकलिए भारी-से-भारी संख्या में मतदान करिए-एक बार फिर से वोट फॉर मोदी,वोट फॉर इंडिया।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

13.10.14

कैसे कहूँ हैप्पी बर्थ डे वैशाली जिला?-ब्रज की दुनिया

13-10-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक जमाना था जब वर्तमान वैशाली जिला क्षेत्र में रहनेवाले लोगों को किसी भी काम के लिए हाजीपुर से 55 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर जाना पड़ता था। लोग सत्तू-चूड़ा-ठेकुआ लेकर निकलते और 15-15 दिन के बाद घर आते। कई लोग तो पैदल ही मुजफ्फरपुर का रास्ता नाप देते थे। रास्ते में अगर रिश्तेदारों का घर स्थित हो तो सोने पर सुहागा। दो दिन बुआ के घर ठहर लिया तो दो दिन दीदी के घर। इसी तरह कभी गोविन्दपुर सिंघाड़ा से मुकदमा लड़ने मुजफ्फरपुर का बार-बार चक्कर लगानेवाला एक युवक बार-बार के आने-जाने से इतना परेशान हो गया कि उसने मुजफ्फरपुर में अपना घर ही बसा लिया और उसका वही घर आज एक गांव बन गया है-कन्हौली का राजपूत टोला।
मित्रों,लोग लंबे समय तक मांग करते रहे कि उनको अलग जिला बना दिया जाए। आंदोलन हुए,धरना-प्रदर्शन हुआ और अंततः वह दिन आया 1972 में 12 अक्तूबर के दिन जब वैशाली को मुजफ्फरपुर जिला से अलग कर दिया गया और हाजीपुर को बनाया गया जिला मुख्यालय। अब लोगों को बार-बार मुजफ्फरपुर नहीं जाना पड़ता था। एक ट्रेन से आए अपना काम किया और फिर शाम की दूसरी ट्रेन से घर वापस हो गए। जिस इलाके में ट्रेन नहीं जाती वहाँ के लिए भी उसी कालखंड में बसें चलनी शुरू हो गईं। तब हाजीपुर एक कस्बा था आज महानगर बनने की ओर अग्रसर है। आज हाजीपुर में क्या नहीं है? आईआईएमएच है,नाईपर है,सीपेट है,कई उद्योग-धंधे हैं,महाविद्यालय हैं,कोचिंग हैं,आईटीआई हैं,ट्रेनिंग कॉलेज हैं और सबसे बढ़कर है पूर्व मध्य रेल का मुख्यालय। इनमें से अधिकतर हाजीपुर के हमारे सांसद रामविलास पासवान के प्रयासों का नतीजा हैं।
मित्रों,फिर भी कुछ तो ऐसा है जिसकी हमें कमी लग रही है और लगता है कि जैसे वही समय अच्छा था जब मुजफ्फरपुर हमारा भी जिला मुख्यालय हुआ करता था। हमारा आज का प्रशासन बेहद संवेदनहीन हो गया है। हाजीपुर में कई तरह के प्रशासनिक कार्यालय तो खुल गए हैं लेकिन वहाँ अब आम और निरीह जनता की सुनी नहीं जाती। वहाँ शरीफों को जलील किया जाता और चोरों की आरती उतारी जाती है। जो सड़कें पहले निर्माण के 10-10 साल बाद तक जस-की-तस रहती थीं आज साल-दो-साल में ही इतनी जर्जर हो जा रही हैं कि उन पर पैदल तक नहीं चला जा सकता। स्कूलों की बिल्डिंगों में अब पाँच साल में ही दरार पड़ने लगती है। पूरे जिले में कहीं भी पेय जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं है,लगभग सारे-के-सारे सरकारी नलकूप बंद हैं,संत परेशान हैं और हर जगह चोरों का राज है। पुलिस का तो हाल ही नहीं पूछिए आज चोरी-डकैती होती है तो एक महीने बाद भी थानेदार आपका हाल पूछने आ जाएँ तो इसको उसकी मेहरबानी ही समझिए। पुलिसिया अनुसंधान का हाल ऐसा है कि ठीक नए साल के दिन थानेदार की थाने में घुसकर अपराधी हत्या कर देती है और पुलिस न तो हत्या में प्रयुक्त हथियार ही बरामद कर पाती है और न ही सहअभियुक्तों को गिरफ्तार ही कर पाता है और अंत में होता वही है जो इस अवस्था में होना चाहिए। मुख्य अभियुक्त शान से हाईकोर्ट से जमानत लेकर गांव लौटता है हाथी पर सवार होकर।
मित्रों,आज हमारे जिले की जो हालत है उसमें निश्चित रूप से दिन-ब-दिन भ्रष्ट से भ्रष्टतर और भ्रष्टतम होते जा रहे प्रशासन का भी काफी अहम योगदान है। आज पूरे वैशाली जिले में जिधर देखिए उधर अपराधियों का बोलबाला है। कभी हम गर्व करते थे कि हमारा जिला बहुत शांत जिला है। तब हमारे जिले में न तो लूट-मार थी और नक्सलवाद का तो कहीं नामोनिशान भी नहीं था। लेकिन क्या इस हालत के लिए सचमुच सिर्फ प्रशासन ही दोषी हैं? क्या हमारा अंतर्मन उतना ही शुद्ध है जितना कि हमारे उन पूर्वजों का था जिन्होंने इस जिले में एक-एक कर एक-एक गांव और एक-एक कस्बे को बसाया? कदापि नहीं। फिर जबकि सामाजिक,मानवीय और प्रशासनिक हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते ही जा रहे हों तो आप ही बताईए कि मैं किस मुँह से कहूँ कि हैप्पी बर्थ डे माई डियर वैशाली डिस्ट्रिक्ट,मुझे तुम पर गर्व है?


(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

10.10.14

२६ इंच का हुआ  सीना
बात अधिक पुरानी नहीं हे अभी कुछ माह पहले जब लोकसभा के चुनाव नहीं हुए थे  बीजेपी और खासकर नरेंद्र मोदी जिस तरह से भाषण में   मनमोहन सरकार को पंगु और पाकिस्तान और चीन  को जनाब मुहतोड़ जवाब देने की बात कर रहे थे. चुनाव हुए जनता ने सिरमौर बनाया और मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा   दिया..सार्क देशो के राष्ट्राध्यक्ष को   अपने  राजतिलक में बुलाकर दुनिया में दमदारी का मेसेज देने   कोशिश की यह काफी हद तक कामयाब भी हुई. अभी सरकार और मोदी अपने हनीमून पीरियड में ही थे की पाकिस्तान ने वही पुरानी  चाले चलना शुरू कर दी. सीमा पर गोलीबारी भी बढ़ा दी.  सीमा से सटे गावों में लोग दहशत में आ गए ४ लोगो की जान भी चली गयी. इश्कि अब निंदा हुई तो मोदी शब ने जवाब दिया की सीमा पर जवाब बंदूके देती हे. और सब ठीक हो जाने की बात  कर रहे हे. चुनाव् से पहले जो मोदी  दहाड़े मर रहे थे पाकिस्तान और को करारा जबाव देने २६ की बात कर रहे थे अब  उन्हें साप क्यों सूंघ गाय. उनका ५६ इंच का सीना २६ का कैसे रह गया मोदी जी वादा करते हुए ये तारे तोड़ने जैसे कई वादे  चुके हे. ये वादे बे सपनो में ही कर सकते हे ऐसे में  उनके गले की फांस बने हुए हे. अगर चुनाव के समय  थोड़ा  होते तो  नहीं आती

8.10.14

रिश्ते के बीच एक श  श  श  होता है । आजकल बीजेपी ने शिवसेना के खिलाफ यही श अपना रखा है । पी एम मोदी कह रहे हैं वे शिव सेना के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे । शिव सेना के लोग बीजेपी के खिलाफ बोलते हुए झिझक तो रहे हैं लेकिन बोल कर रो भी रहे होंगे । दस सीट्स की ही तो बात थी । अब यदि मोदी लहर ने अपना असर दिखा दिया  तो क्या होगा ? लेकिन श के दोनों तरफ जो अक्षर बचे हैं वे रिते  या कह लें रीते से लगने लगे  हैं विशेषकर इन दोनों के सम्बन्ध में । आडवाणी जी को लगा कुछ तो बोला जाए वैसे भी मोदी सरकार में उन्हें वह पद दे दिया गया है जिसमे भ्रष्टाचार के मामले में वे जिस भी सांसद के खिलाफ कुछ करेंगे वही  उनके खिलाफ हो जाएगा और यदि कार्यवाही नहीं करेंगे तो मोदी जी को क्या जवाब देंगे ? उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि  मोदी का यह मायाजाल किसी मकड़जाल से कम  तो नहीं ही होगा । खैर , इधर अब समझ आने लगा है कि  शिवसेना भी क्यों मोदी के नाम का पी एम के लिए समर्थन करने से बचती थी । खैर , अब तो जो हो गया उसे भुगतना ही है । यह अफजल कौन है ? अब जो अफजल है तो फिर औरंगजेब कौन है ? मोदी क्या हैं शिवसेना की नजर में ? अफजल या औरंगजेब ? चुनाव क्योंकि बी जे पी लड़ रही है तो अफजल तो मोदी  हुए और यदि ऐसा तो क्या अमित शाह औरंगजेब हैं क्योंकि बी जे पी के औरंगजेब तो अमित शाह हैं । खैर , लेकिन यदि मोदी औरंगजेब हैं तो अमित शाह अफजल हैं ? तो शिवाजी को ज्यादा परेशानी अफजल से थी या औरंगजेब से ? निश्चित ही औरंगजेब से । तो फिर शिवसेना को ज्यादा परेशानी किस से है ? मोदी से या अमित शाह से ? तय कर लीजिये । दूसरे  का तो पता स्वतः चल जाएगा । एक अफजल वह भी था जिसके नाम पर बी जे पी को बेचारे  मनमोहन सिंह जी में भी औरंगजेब दिखाई देता रहा होगा  । लेकिन सोच रहा हूँ , यदि भाजपा के लोग अफजल या औरंगजेब हो गए तो ध्रुवीकरण की जरूरत बी जे पी अब भी समझेगी ? 

6.10.14

क्या बिहार नीतीश कुमार की निजी जमींदारी है?-ब्रज की दुनिया

6-10-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले कुछ समय में बिहार की राजनीति ने जिस तरह से यू-टर्न लिया है आज से दो साल पहले कोई उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता था। जो व्यक्ति कभी हमेशा दिन-रात मूल्यों और सिद्धांतों का राग अलापा करता था वही सबसे बड़ा अवसरवादी निकला। राम निकला तो था रावण से लड़ने के लिए लेकिन युद्धभूमि में जाकर उसने पाला बदल लिया और सीता (बिहार) अपने उद्धार की बाट ही जोहती रह गई। पहले उसने अपने उस गठबंधन सहयोगी को सरकार से निकाल बाहर कर दिया जिसके साथ मिलकर उसने 2010 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। उसकी पार्टी को जो भी मत मिले थे वे अकेले उसकी पार्टी के नहीं थे बल्कि जनता ने दोनों पार्टियों को एक मानकर उसकी गठबंधन सरकार को बंपर बहुमत दिया था। फिर उस नीतीश कुमार को किसने यह अधिकार दे दिया कि वे अकेले की सरकार चलाएँ? जनता ने तो उनको गठबंधन सरकार चलाने के लिए मत दिया था। क्या बिहार नीतीश कुमार जी की निजी जमींदारी थी और है? अगर नहीं तो नैतिकता का तकाजा तो यह था कि वे गठबंधन तोड़ने के तत्काल बाद ही विधानसभा को भंग करके आम चुनाव करवाते।
मित्रों,नीतीश कुमार जी की बिहार और बिहार की जनता के साथ खिलवाड़ यहीं पर नहीं रुका। भाजपा को सरकार और गठबंधन से निकालबाहर करने के बाद नीतीश जी ने लगभग एक साल तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं किया और एक साथ उन सभी  विभागों सहित जो भाजपा के पास थे 18 विभागों के मंत्री बने रहे जिसका परिणाम यह हुआ कि पूरे बिहार में अराजकता व्याप्त हो गई। सारे नियम-कानून की माँ-बहन होने लगी जिसका परिणाम यह हुआ कि नीतीश जी की पार्टी को बिहार में जीत के लाले पड़ गए। अगर नीतीश जी में थोड़ी-सी भी नैतिकता होती उनको लोकसभा चुनावों के तत्काल बाद ही विधानसभा चुनाव करवाने चाहिए थे। लेकिन नीतीश जी ने एक बार फिर से बिहार को अपनी निजी जमींदारी समझते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और खुलकर जातीयता का गंदा खेल खेलते हुए एक निहायत अयोग्य महादलित को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। इस तरह बिहार के साथ जानलेवा प्रयोग-पर-प्रयोग करने का अधिकार नीतीश कुमार जी को किसने दिया है? चिड़िया की जान जाए बच्चों का खिलौना?
मित्रों,जबसे बिहार में जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया है तबसे बिहार के शासन-प्रशासन ने जो थोड़ी चुस्ती थी वह भी जाती रही। अब आप बिहार पुलिस को घटना के समय या घटना के बाद लाख फोन करते रहें वह तत्काल घटनास्थल पर नहीं आती है जबकि वर्ष 2005 में जब जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार नई-नई आई थी तब पुलिस सूचना मिलते ही घटनास्थल पर हाजिर हो जाती थी और समुचित कार्रवाई भी करती थी। अब अगर आप बिहार में रहते हैं तो अपने जान व माल सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी-पूरी आपकी है। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी में वह योग्यता है ही नहीं कि वे प्रशासनिक अराजकता को दूर कर सकें। वे तो बस विवादित बयान देते रहते हैं और इस बात का रोना रोते रहते हैं कि उनका जन्म छोटी जाति में हुआ है इसलिए लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। पिछले कुछ समय में श्री मांझी ने इतने मूर्खतापूर्ण बयान दिए हैं कि इस मामले में उनके आगे बेनी प्रसाद वर्मा का कद भी बौना हो गया है।
मित्रों,यह तो आप भी मानेंगे कि इस प्रकार के अतिमूर्खतापूर्ण बयान वही व्यक्ति दे सकता है जो महामूर्ख हो। पुत्र-विवाहेतर संबंध विवाद,विद्यालय उपस्थिति विवाद,...... और अब पटना गांधी मैदान भगदड़ पर उटपटांग बयान कि इसमें गलती भीड़ की भी हो सकती है,.....। श्री मांझी किस तरह के मुख्यमंत्री हैं कि इतनी हृदयविदारक घटना के घंटों बाद तक घटना से पूरी तरह से बेखबर रहते हैं? और जब मुँह खोलते भी हैं तो मृतकों के परिजनों के जख्मों पर मरहम लगाने के बदले यह बोलकर कि गलती भीड़ की भी हो सकती है नमक छिड़कने का काम करते हैं। क्या श्री मांझी बताएंगे कि गलती किसकी थी उन दो दर्जन मासूम बच्चों की जिनके जीवन को खिलने से पहले ही पैरों तले कुचल दिया गया? उन बेचारों को तो अभी पता भी नहीं होगा कि गलती की कैसे जाती है या गलती शब्द का मतलब क्या होता है। क्या सिर्फ महादलित होने से ही किसी व्यक्ति में मुख्यमंत्री बनने की पात्रता आ जाती है?
मित्रों,बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के प्रयोगवादी पागलपन जीतनराम मांझी को बहुत बर्दाश्त किया मगर अब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है। जो व्यक्ति एक ट्राफिक हवलदार तक बनने के काबिल नहीं था उसको नीतीश कुमार ने बिहार को दिशा देने का काम सौंप दिया? जब 1 ग्राम भी बुद्धि है ही नहीं तो श्री मांझी शासन कैसे चलाएंगे और इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे उठाएंगे? जाहिर है कि ऐसा कर पाना उनके बूते की बात नहीं है। हाजीपुर टाईम्स ने तब भी जब मांझी को बिहार के सीएम की कुर्सी दी गई थी अपनी सामाजिक व राजनैतिक जिम्मेदारी को निभाते हुए नीतीश जी को चेताया था लेकिन तब नीतीश जी ने जो कि एक वैद्य के बेटे हैं एक मरणासन्न रोगी की तरह हमारे रामवाण नुस्खे को नहीं माना था।
मित्रों,हमारा स्पष्ट रूप से यह मानना है कि नीतीश कुमार जी को देर आए मगर दुरुस्त आए पर संजीदगी से अमल करते हुए तत्काल बिहार में विधानसभा चुनाव करवा कर फिर से जनादेश प्राप्त करना चाहिए। बिहार की जनता को अगर उनके महाअवसरवादी महागठबंधन में विश्वास होगा तो वे दोबारा मुख्यमंत्री बन जाएंगे और अगर नहीं होगा तो विपक्ष की शोभा बढ़ाएंगे लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में बिहार को एक पागल,बुद्धिहीन के शासन से तो मुक्ति मिलेगी। इसके विपरीत अगर नीतीश जी श्री मांझी को हटाकर किसी दूसरे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाते हैं तो यह एक बार फिर से उनकी अनाधिकार चेष्टा होगी। जनता ने 2010 में उनको इसलिए बहुमत नहीं दिया था कि वे बिहार को चूँ-चूँ का मुरब्बा बनाकर रख दें बल्कि उनको बिहार के समग्र विकास के लिए वोट दिया था। वैसे भी लोकसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर वे बिहार के विकासपुरुष की अपनी जिम्मेदारियों से भाग चुके हैं लेकिन वे एक बिहारी होने की जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकते हैं। इसलिए बिहार का एक शुभचिंतक होने के नाते,एक बिहारी होने के नाते उनको अपने सारे प्रयोगों को विराम देते हुए बिहार में तत्काल विधानसभा चुनाव करवाना चाहिए वरना उनके 8 साल के सुशासन से पहले बिहार जहाँ से चला था अगले एक साल में उससे भी पीछे चला जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

2.10.14

स्वच्छता से पवित्रता की ओर

स्वच्छता से पवित्रता की ओर 

मानव या पशु हर कोई स्वच्छता पसन्द होता है भले ही पवित्रता पसन्द ना भी
करता हो। यह सत्य सार्वभौमिक है। फिर क्या कारण रहा कि जो आर्य पवित्रता
का संदेशवाहक था वह पवित्रता तो भुला ही मगर स्वच्छता भी भूलता चला गया।
आज हम लापरवाह और बेजबाबदार हो चुके हैं हमारी स्वच्छता खुद के शरीर तक
खुद के कमरे या मकान तक सिमित हो गयी है ,सार्वजनिक स्थान की हर जबाबदारी
चाहे वह रखरखाव की हो या स्वच्छता की,हम उसमे अपना कर्तव्य नहीं देखते ;
उसको प्रशासन का कर्त्तव्य मानते हैं।
    हम अपने घर का कूड़ा कचरा बाहर सड़क पर इसलिए भी बेहिचक फैंक
देते हैं कि सफाई कर्मचारी को काम मिलता रहे !!हमारी इस सोच के कारण सफाई
कर्मचारी भी कुण्ठित हो अपने काम के प्रति उदासीन हो जाता है क्योंकि वह जानता
है हर दिन ऐसे ही होना है।
    हम हवा,जल और पृथ्वी तीनों ही सम्पदा का दुरूपयोग करने में लगे हैं। बड़े पैसे
वाले जमकर प्रदुषण करते हैं जिसका कुफल निचे से मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा
पड़ता है और हमारा पर्यावरण विभाग कुम्भकर्ण की नींद में रहता है या कभी कभार
खानापूर्ति करके चुप हो जाता है या अपनी जेब में सिक्के का वजन देख अनदेखी
करता रहता है।
    हम वर्षो से स्वच्छता पर राष्ट्र के धन को खर्च करके भी आज तक शून्य ही हासिल
कर पाये हैं ,क्यों ? यह प्रशासनिक अव्यवस्था है जो कटु सत्य है इसे मानकर दुरस्त
करने के लिए हमें जबाबदेही तय करनी पड़ेगी,कार्य के प्रति प्रतिबद्धता रखनी पड़ेगी।
    सड़को को टॉयलेट आम आदमी क्या चाह करके बनाता है ?नहीं ना। इसके पीछे
का कारण है सार्वजनिक जगहों पर टॉयलेट का अभाव। यह काम किसको करना था ?
क्या उस आम आदमी को जिसके पास पेट भरने तक का साधन नहीं है ?हम फैलती
जा रही गन्दगी के लिए उसे तब तक जिम्मेदार नहीं मान सकते जब तक हम हर
नागरिक की पहुँच तक टॉयलेट ना बनवा दे।
    हमारे पास कूड़ा निष्पादन की आधुनिक तकनीक का अभाव है। प्रशासन शहर का
कूड़ा या तो शहर की सीमा पर या समीप के गाँव के पास ढेर लगा देता है। क्या इसे
समाधान कहा जा सकता है ?
    स्वच्छता के लिए जरुरी है पवित्रता। पवित्रता मानसिक और आत्मिक विचारों में
भी झलकनी चाहिए और बाहर वातावरण में भी दिखनी चाहिये। कूड़ा -कचरा बाहर
फैलाने या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने से पहले हमें खुद से प्रश्न करना चाहिए कि
क्या मुझे ऐसा करना चाहिये ? जब हम इस प्रक्रिया को शुरू करेंगे तो परिणाम भी
पायेंगे। आइये- हम केवल स्वच्छ ही नहीं पवित्र भारत के निर्माण के लिए स्वयं की
गन्दी आदतों को अभी से बदले और राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनें।         

30.9.14

पल्लू कांड़ को  राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये लेकिन सामाजिक रूप से उचित ठहराना संभव दिखायी नहीं देता 
विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया।  भाजपा ने इस घटना की निंदा करके चुप्पी साध ली जबकि कांग्रेस ने निंदा करने के साथ ही कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरना का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे 
मोदी के जन्म दिन पर सार्वजनिक मंच पर हुआ भाजपा नेत्री का अपमान:-विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। इसी कार्यक्रम को कवर करने के लिये लगे वीडियो कैमरों में मंच की एक अशोभनीय घटना भी कैद हो गयी। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया। चुपके से ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पलट कर बाजू में देखा तो उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान सी दिख रही थी और उन्होंने चेहरे पर एक ऐसी हरकत करके सिर हिलाया जिसे समाज में अच्छा नहीं माना जाता है। सोशल मीडिया पर इस घटना के दो वीडियो ने चंद घंटों में ही हड़कंप मचा दिया। इसे सार्वजनिक शासकीय मंच पर एक महिला के साथ हुये अपमान से जोड़कर देखा गया और निंदा तथा आलोचना का दौर शुरू हो गया। नीता पटेरिया ने कहा कि उन्हें वाडियो देखने के बाद घटना का पता चला तो दूसरी तरफ मुनमुन राय ने कहा कि वे नीता पटेरिया को मां,बहन और भाभी मानते हैं और मंच पर हुआ वो हास्य विनोद के क्षण थे। फिर भी यदि बुरा लगा हो तो वे माफी मांगते है। दूसरे दिन नपा के सामने मुनमुन राय का भाजपा कार्यकर्त्ताओं ने पुतला जलाया और पुलिस में घटना की कंपलेंट की लेकिन नीता पटेरिया ने रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी। इस घटना के समाचार राष्ट्रीय और प्रादेशिक चैनलों के साथ ही अखबारों की भी सुर्खी बनी और राजनैतिक हल्कों में एक भूचाल सा आ गया। 
कांग्रेस ने सौंपा ज्ञापन तो भाजपा ने की निंदा:- इस घटना को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने विज्ञप्ति जारी कर घटना की निंदा की और इसे महिला अपमान के साथ के साथ जनादेश का अपमान भी निरूपित किया। लेकिन इसके बाद भाजपा ने चुप्पी साघ ली। कहा जाता है दूसरे वीडियों में जिला भाजपा अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर भी विवाद में आ गये थे। कांग्रेस नेताओं ने बाद में कलेंक्टर से मुलाकत कर ज्ञापन भी सौंपा और प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी कटघरें में खड़ा किया कि एक वरिष्ठ महिला नेत्री के साथ हुये अपमान पर सरकार और प्रशासन चुप्पी साधे हुये है। इसके अलावा भ कई संगठनों और दलों ने भी घटना की निंदा की और इसे महिला का अपमान निरूपित किया।
ब्राम्हण समाज ने दिश धरनाः- इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरने का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। इसमें पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेत्री नेहा सिंह और विस प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना सहिीत कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने हिस्सा लेकर धटना की निंदा कर कार्यवाही की मांग भी की। धरने के बाद नीता पटेरिया ने एस.पी. से भेंट करके एक ज्ञापन भी सौंपा और इस बात पर अपनी नाराजगी भी जताई कि मेरे बयान होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी। हालांकि यहां यह उल्लेखनीय है कि पुलिस थाने में स्वयं नीता पटेरिश ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी है। उन्होंने राज्य महिला आयोग में जरूर अपनी शिकायत दी है। 
मुनमुन ने भी किया शक्ति प्रदर्शन:- जिस दिन ब्राम्हण समाज के बैनर पर महिला अपमान के विरोध में धरना प्रदर्शन हो रहा था तो वहीं दूसरी तरफ चंद कदमों दूर विधायक मुनमुन राय अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। जिले भर से आयी सैकड़ों गाड़िया ओर में लाये गये हजारों लोगों का उत्साह देखने लायक था। राजनैतिक विश्लेषकों की आंखों के सामने वह दिन आ गया जब तत्कालीन भाजपा सांसद नीता पटेरिया की रिपोर्ट पर तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला धारा 307 के तहत कायम हुआ था तो उन्होंने न्याय रैली आयोजित की थी जिसमें ऐसी ही भीड़ जुटायी गयी थी। स्व. हरवंश सिंह ने न्याय रैली की थी तो अभी मुनमुन जनता से न्याय मांग रहे थे। अभी यदि रिपोर्ट पर पुलिस मामला कायम करती है तो वो भी धारा 354 का होता। जनता के सामने मुनमुन ने अपनी पुरानी मां,बहन और भाभी वाली सफायी देते हुये कांग्रेस और भाजपा नेताओं पर आरोप भी लगा डाला कि वे उनकी जीत  और लोकप्रियता से जलते है इसलिये धज्जी का सांप बना रहें हैं। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे और इस मामले में घिर जाने पर ही उन्हें यहां गाड़ियां भेज कर बुलाया गया था। कुछ लोग इस बात को लेकर भी लेकर आश्चर्यचकित है कि एक ही दिन लगभग एक ही जगह एक ही मुद्दे पर आयोजित होने वाले दो विपरीत आंदोलनों के लिये अनुमति कैसे दे दी गयी? यह भी बताया गया कि शक्ति प्रदर्शन के दूसरे ही दिन वे विदेश यात्रा पर चले गये हैं। बहरहाल उस दिन मंच पर घटित पल्लू कांड़ को कितने ही राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये?लेकिन सामाजिक रूप से इसे उचित ठहराना तो संभव दिखायी नहीं देता है। “मुसाफिर”
 sABHAR Darpan Jhoot Na Bole
Seoni 
30 Sep 2014




















   



27.9.14

पाकिस्तान का रोना

पाकिस्तान का रोना 

पाकिस्तान को रोने की आदत हो चुकी है क्योंकि नासमझ बच्चा जब भी रोता
है तो समझदार लोग उसके हाथ में लॉलीपॉप थमा देते हैं,तब बच्चा समझता
है रो कर के मेने कुछ पाया और समझदार जानते हैं कि उसका लॉलीपॉप चूसना
ही बेहतर है ताकि वे लोग महत्वपूर्ण काम कर सके।

जब समझदार लोग अपने महत्वपूर्ण काम पुरे कर लेते हैं और बच्चा फिर रोने
लगता है तब उसे चाँटा मारकर चुप करा दिया जाता है या फिर गला फाड़ कर
रोने दिया जाता है और बच्चा दोनों ही परिस्थिति में अपनी औकात समझ मुँह
बंद कर लेता है।

पाकिस्तान का सँयुक्त राष्ट में जाकर कश्मीर पर रोना !! कोई ज़माना था जब
इस मातम मनाने के तरीके पर उसे समझदार पुचकारा करते थे मगर अब
उसके रोने हश्र उस हठीले बच्चे जैसा होगा जो चाँटा खा कर चुप होता है या
गला फाड़ कर रोने से गला दर्द करने लगता है और वह मौका पाकर स्वत: ही
रोना बंद कर देता है।

पाकिस्तान का कश्मीर पर रोने का हश्र क्या होगा ?आज विश्व को ताकतवर
भारत के सहयोग की आवश्यकता है खण्डहर हो चुके पाकिस्तान का सहारा
लेकर कोई भी भारत से रिश्ता खट्टा नहीं करेगा।

विश्व जानता है कि भारत अपना मसला खुद सुलझाने का माद्दा रखता है और
इस मसले पर टाँग फँसा कर कौन आफत मोल लेगा,इसलिए अब वो होने वाला
है जो भारत चाहता है। यह है शक्तिशाली भारत की नयी पहचान।   
   

25.9.14

बराज की श्रृंखला नष्‍ट कर देगी गंगा को


  • अमेरिका में फेल हो चुकी बराज योजना को गंगा में लागू करना चाहती है सरकार
  • एलएस कॉलेज में दो दिवसीय गंगा सेमिनार शुरू


मुजफ्फरपुर। एलएस कॉलेज में गुरुवार को ‘गंगा बेसीन : संरक्षण एवं चुनौतियां’ विषय दो दिवसीय राष्‍ट्रीय सेमिनार का उद्घाटन समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्‍हा ने किया।
इस दौरान प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्री व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. भतर झुनझुनवाला ने कहा कि केंद्र सरकार ने गंगा पर बैराज की श्रृंखला बनाने की विध्‍वंसकारी योजना बना रही है। ताकि आयातित कोयले को बिजलीघरों तक गंगा के जल मार्ग से पहुंचाया जा सके। कुछ औद्योगिक घरानों का फायदा पहुंचाकर गंगा को नष्‍ट करने की योजना है। इसके लिए गंगा में गहराई की जरूरत है। जबकि गंगा में कई जगह पर गहराई मात्र छह फीट है। इसलिए यहां पर 16 से 22 बराज बनाने की योजना है। लेकिन असलिय यह है कि इससे गंगा नष्‍ट हो जाएगी।
उनहोंने अमेरिका की सबसे बड़ी नदी मिस्‍सीसिपी का उदाहरण देकर बताया कि वहां पर बैराज की श्रृंखला बनाने की वजह से नदी और वहां के इलाकों में तबाही आ गई है।
मिस्‍सीसिपी नदी पर बराज की श्रृंखला बनाने से पहले वहां के आस-पास मिट्टी ऊंची थी। मैंग्रोव का जंगल था। जंगल खत्‍म हो गए। अमेरिकी सरकार के यूएस गवर्नमेंट एकाउंटेबलिटी ऑफिस की रिपोर्ट में कहा गया है कि बराज की श्रृंखला से नदी की जैविकता पर प्रभाव पड़ा है। इलाकों में बाढ़ आ गई।
उन्‍होंने कहा कि बराज बनने से पहले मिस्‍सीसिपी नदी बालू लेकर आती थी और समुद्र में डालती थी। समुद्र का भोजन बालू है। नदी के माध्‍यम से बालू जाने से यह भूमि का कटान नहीं करती है। वहां बैराजों में सिल्‍ट जमने लगा और पानी जंगलों में फैलने लगा। पांच हजार वर्ग किलोमीटर जमीन समुद्र में घिर चुकी है। तटिय क्षेत्र को बालू नहीं मिलने से ऐसा हुआ। नदी का तल ऊंचा होने से इसकी सहायक नदियों में भी जलस्‍तर बढ़ गया।
डॉ. झुनझुनवाला ने कहा कि अमेरिका में फेल हो चुकी व्‍यवस्था को सरकार गंगा नदी में लागू करना चाहती है। ताकि सस्‍ते में कोयला की ढुलाई हो सके। ऐसा हुआ तो गंगा 16 तालाबों में तब्‍दील हो जाएगी। उन्‍होंने कहा कि बराज से नुकसान का सबसे बड़ा उदाहरण फरक्‍का बराज है। दुनिया में सबसे ज्‍यादा सिल्‍ट चीन की पीली नदी और भारत की गंगा में उत्‍पन्‍न होता है। फरक्‍का बराज से गंगा की गति धीमी हो जाती है और उसके साथ आ रहा सिल्‍ट जम जाता है। इसके बाद जलस्‍तर ऊंचा होता है और डूब क्षेत्र बढ़ रहा है। अब ड्रेनेज से पानी निकालने की कोशिश चल रही है, ताकि नहर में पानी भेजा जा सके।
पहले गंगा बालू को समुद्र तक ले जाती थी, लेकिन फरक्‍का बराज से उसकी क्षमता का ह्रास हो गया है। सिल्‍ट न जाने से पश्चिम बंगाल में समुद्र किनारे बड़ा क्षेत्र डूबता जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि फरक्‍का बराज से कुछ फायदा हुआ है लेकिन नुकसान बेहद ज्‍यादा है। उन्‍होंने कहा कि कठोर निर्णय लेकर फरक्‍का बराज को तोड़ देना चाहिए।
उन्‍होंने कहा कि अगर गंगा पर बराज की श्रृंखला बनी तो गंगा की सहायक नदियों में भी बराज बनाना होगा। इससे यहां की नदियां उफनाएंगी और बा़ढ का जबरदस्‍त खतरा ज्‍यादा बढ़ेगा।
उन्‍होंने कहा कि मौसम वैज्ञानिकों की रिपोर्ट है कि क्‍लाइमेट चेंज की वजह से बरसात के तीन महीने का पानी इकट्ठा अगस्‍त में ही बरसने की परंपर बढ़ेगी। ऐसे में बराज की श्रृंखला हुई तो नदी की पानी संग्रहण की क्षमता घट जाएगी और बढ़ के भयावह रूप को देखना होगा।
उन्‍होंने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को बड़े जहाज के लिए बराज बनाने की जगह इसमें छोटे जहाज से माल ढुलाई करना चाहिए। सोलर पावर की लागत कम होने वाली है, ऐसे में कोयला आधारित बिजलीघरों की जगह सोलर पावर का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए।
उन्‍होंने कुछ उदाहरण देकर बताया कि नदी से पानी को नहरों में भेजने के लिए इसपर बराज बनाने की आवश्‍यकता नहीं है।

समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा कि जब तक हम कचरा पैदा करने वाले विकास के रास्ते को नहीं, छोड़ेंगे, तब तक गंगा को प्रदूषण मु‍क्‍त नहीं किया जा सकता है। सारे विकास की दृष्टि को बदलने की जरुरत है। विज्ञान का इस्‍तेमाल कर प्रकृति पर नियंत्रण करने की कोशिश में हम गलत दिशा में जा रहे हैं। इससे प्रकृति का अधिक से अधिक दोहन हो रहा है और गंगा नष्‍ट हो रही है। उन्‍होंने कहा कि धार्मिक अंधता की वजह से भी गंगा प्रदूषित हो रही है।
उन्‍होंने कहा कि दिल्ली में यमुना गंदा नाला बन गया है। बड़े नगर के लिए गंगा से पानी निकाला जा रहा है। हिमालय से निकलने वाली पानी धीरे-धीरे कम हो रहा है। बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों का कचरा गंगा में डाला जा रहा है।

सेमिनार के संयोजक अनिल प्रकाश ने कहा कि ढ़ाई सौ साल से विकास की अवधारणा है कि प्रकृति को दास मानकर उसका अधिकतर दोहन किया जाए। इस गलत दृष्‍ट‍िकोण की वजह से महाप्रलय का खतरा है और यह दुनिया भर के वैज्ञानिकों की सर्वमान्‍य राय है। गंगा हम जब बोलते हैं तो उससे जुड़ी सभी नदियां हैं, हिमालय और पूरा इको सिस्‍टम भी है। एक फरक्‍का बराज बना और इससे आठ राज्‍यों में हिल्‍सा जैसी कई मछलियां गंगा से गायब हो गईं। बीस लाख मछुआरों की रोजी उजर गई।
उन्‍होंने कहा कि अब गंगा को छोटे छोटे तालाबों में तब्‍दील करने, पिकनिक स्‍पॉट बनाने, रिजॉट बनाने, गंगा के किनारे स्‍मार्ट सिटी बनाने, धर्म के नाम पर अनैतिक काम करने के मंसूबे पर को सफल नहीं होने देंगे। उन्‍होंने कहा कि यह राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्‍कृतिक और सामाजिक सेमिनार है।
जिस तरह से मां का दूध बच्‍चे के लिए संसाधन नहीं होता है, वैसे ही खेत और न‍दी हमारे लिए संसाधन नहीं हो सकती है। नदियां खत्‍म करेंगे तो मानव जाति और जीव जगत पर संकट आ जाएगा।

जल आंदोलनों से जुड़े पश्चिम बंगाल के विजय सरकार कहा कि विकास के बहाने हम महाप्रलय के रास्‍ते पर चल पड़े हैं। उन्‍होंने बताया कि कोलकाता से एक साइकिल यात्रा गंगोत्री से गंगासागर तक जाएगी। इसके माध्‍यम से गंगा के आस-पास बसी जिंदगी की युक्ति भी जानेंगे और गंगा पर बन रही गलत नीतियों के बारे में जागरूक किया जाएगा।
सामाजिक कार्यकर्ता रंजीव ने कहा कि उनका मानना है कि बिहार में गंगा नहीं है। गंगा को टिहरी डैम में बांध दिया गया है। बिहार में जो गंगा दिखती है वह इसकी सहायक नदियों का पानी है। उन्‍होंने कहा कि यही मौका है विचार करने का कि हमें कैसा विकास चाहिए।
रंजीव ने कहा कि वर्ष 2000 से बिहार लगातार क्‍लाइमेट चेंज से पीडि़त हैं। लेकिन आज तक बिहार सरकार ने इसे ध्‍यान में रखकर नीतियां नहीं बनाई है। जब उत्‍तराखंड में बादल फटा तो इससे हम पीडि़त हुए। यहां गंगा का पानी कई महीने तक उल्‍टी दिशा में जाती है। टिहरी और फरक्‍का बराज से गंगा को रोक दिया गया, यह अविरल नहीं है।  
एसएस कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. भुजनंदन प्रसाद ने कहा कि राष्‍ट्रीय सेमिनार ने गंगा पर आ रही चुनौतियों पर माकूल जवाब देने के लिए बौद्धिक रूप से धनी बनाया है।
कार्यक्रम के आयोजक व एलएस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमरेंद्र नारायण यादव ने कहा कि अतिथियों का स्‍वागत किया। उन्‍होंने कहा कि गंगा को लेकर इस तरह का मंथन इसके रखवालों को एक दिशा देगा। प्रथम सत्र का धन्‍यवाद ज्ञापन प्रो. नित्‍यानंद शर्मा ने किया। कार्यक्रम का संचालन विजय कुमार चौधरी ने किया।

द्वितीय सत्र

भागीरथ से गंगा ने कहा था – मैं संसार की सबसे अभिशप्‍त नदी बनने जा रही हूं
दूसरे सत्र में गंगा से आस-पास बीमारी व कृषि पर चर्चा
मुजफ्फरपुर। एलएसए कॉलेज में आयोजित राष्‍ट्रीय सेमिनार के दूसरे सत्र में पूर्व डीजीपी रामचंद्र खान ने कहा कि पुराणों में गंगा के प्रदूषित होने की आशंका भी जताई गई थी। जब भागीरथ, गंगा को पृथ्‍वी पर लाने की प्रार्थना कर रहे थे, तब गंगा ने कहा था- ‘ मैं संसार की सबसे दुखी, सबसे अभिशप्‍त रखने वाली नदी बनने वाली हूं। जिस देश में तुम मुझे लेकर आए हो, उसकी सारी गंदगी मुझ में गिराई जाएगी और फिर मेरा उद्धार करने वाला कोई नहीं होगा। जब तक मैं समुद्र में जाती रहूंगी तब तक अभिशप्‍त रहूंगी।‘
रामचंद्र खान ने कहा कि अब यह सच साबित हो रहा है। गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है और इसके लिए बनने वाली योजना बेहद चिंताजनक हैं।
उन्‍होंने कहा कि अमेरिका में डैम को तोड़ा जा रहा है और भारत में नया बनाने की कोशिश चल रही है। अमेरिकी उदाहरण को भी समझना चाहिए।

चिकित्‍सक डॉ. प्रगति सिंह ने कहा कि गंगा से उनका व्‍यतिगत लगाव रहा है। उन्‍होंने कहा कि हम स्‍वयं दोषी हैं गंगा को प्रदूषित करने में। आस्‍था के नाम पर फूल मालाएं, मूर्तियां व अधजले शव प्रवाहित कर देते हैं। गंगा को बचाने पर लोगों का ध्‍यान ज्‍यादा नहीं जाता है। एक संकल्‍प लेना पड़ेगा कि हमें खुद भी प्रयास करें कि गंदा न करें।
उन्‍होंने कहा कि गंगा के प्रदूषण से बहुत सी बीमारियां फैल रही हैं और इसके इलाज में खर्च बेहद ज्‍यादा हो रहा है। इसलिए गंगा का ऐसा स्‍वरूप ऐसा बनाएं कि गंगा में प्रवाहित होने वाले कचरे को दूर हो सके।
कृषि वैज्ञानिक व राजेंद्र कृषि विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी ने कहा कि प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। हमें प्रकृति के साथ रहने की आदत डालना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि प्रकृति को मुट्ठी में बंद कर दें, यह नहीं होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि भारतवर्ष में गंगा के आस-पास सबसे ज्‍यादा उत्‍पादकता थी। यहां की खेती नदियों की मिट्टी पर होती थी। फसल इतनी अच्‍छी होती थी। नदियों को जोड़ने का बांध बनाने का या अन्‍य योजना बनाकर इसे खत्‍म किया जा रहा है।
टिहरी में बांध बना दिया है। ऐसी आशंका है कि जैसे उत्‍तराखंड और जम्‍मू कश्‍मीर में बाढ़ आ गया, वैसे बारिश हुई तो पूरा बिहार और यूपी डूब जाएगा।
कार्यक्रम में खगडि़या से आए चंद्रशेखर ने भी विचार व्‍यक्‍त किए। 

22.9.14

Break your bad habits - The Hindu

Break your bad habits - The Hindu

बिहार की उच्च शिक्षा के श्राद्ध-कर्म में आप सादर आमंत्रित हैं-ब्रज की दुनिया

22 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, मैं आपसे पहले भी अर्ज कर चुका हूं कि हमारे बिहार का कबाड़ा करने में जवाब नहीं। जब नेपाल की सरकार ने बिहार में बाढ़ लाने से मना कर दिया तो बिहार सरकार ने राजधानी पटना को ही जलमग्न करवा दिया। आखिर राहत के लिए तैयार सामग्री को कहीं-न-कहीं तो खपाना ही था। वो तो भला हो कश्मीर का वरना बिहार के कई अन्य ईलाकों को भी जलमग्न करना पड़ता।
मित्रों,अब बिहार की शिक्षा को ही लीजिए। बिहार की प्राथमिक शिक्षा का तो पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही गला घोंट चुके थे लेकिन बिहार की उच्च शिक्षा अभी तक साँस लिए जा रही थी। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अब बहुत कम शिक्षक बच गए थे लेकिन दुर्भाग्यवश जो शिक्षक अभी तक रिटायर होने से बचे हुए थे उनमें से कई वास्तव में ज्ञानी थे। अब बिहार सरकार कोई नरेंद्र मोदी तो है नहीं कि वो कहे कि डिग्री के लिए नहीं ज्ञान के लिए पढ़ो। बल्कि उसका तो साफ तौर पर मानना है कि पढ़ो ही नहीं। हम साईकिल दे रहे हैं उसकी सवारी गांठो,हम पैसे दे रहे हैं उससे सिनेमा देखो या इंटरनेट पैकेज भरवाओ,हम पोशाक राशि दे रहे हैं उससे अच्छी-अच्छी पोशाक बनवाओ लेकिन पढ़ो मत। परीक्षाओं में हमने कदाचार की पूरी छूट दे रखी है इसलिए ज्ञान के पीछे,पढ़ाई के पीछे नहीं भागो डिग्री के पीछे भागो। नौकरी झक मारकर तुम्हारे पीछे आएगी। दूसरे राज्यों में अगर प्रतियोगिता परीक्षा के कारण नौकरी नहीं मिली तो हम हैं न। हाँ,इंटर और मैट्रिक की परीक्षा में खूब कागज काले करो और हमारे दिए पैसों में से कुछ बचाकर भी रखो क्योंकि जो शिक्षक तुम्हारी कॉपियाँ देखेंगे उनको भी कहाँ कुछ अता-पता है। वे तो तराजू पर तुम्हारी कॉपियाँ तौल कर ही या फिर तुमसे पैसे लेकर ही तुमको नंबर देंगे। चाहे तुम आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में पास भी कर जाओ मगर हमारे परीक्षक तो तुमको केमिस्ट्री में 8 और गणित में 5 नंबर ही देंगे। देखा नहीं इसलिए तो हमने मुहम्मद बिन तुगलक से प्रेरित होकर पहले प्राथमिक विद्यालयों में नंबर के आधार पर शिक्षकों को बहाल किया और अब महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की बहाली भी नंबर के आधार पर करने जा रहे हैं।
मित्रों,हमारे मुख्यमंत्री मांझी जी जो कुछ भी बोलते रहते हैं यह भी कह सकते हैं कि गुजरात में भी तो मोदी ने स्कूल टीचर इसी तरह से बहाल किए थे। मगर गुजरात में इस तरह से मस्ती की पाठशाला तो नहीं चलती,परीक्षाएँ ओपेन बुक सिस्टम के आधार पर तो नहीं ली जातीं? बल्कि वहाँ तो वास्तव में ज्ञान के लिए शिक्षा दी जाती है डिग्री के लिए नहीं। अब आप हमारे बैच को ही लीजिए। मैं अपने बैच में प्रतिभा खोज परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम आया था। हमेशा ज्ञान के पीछे भागा। जबतक किसी प्रश्न का उत्तर नहीं पा जाता बेचैन रहा करता लेकिन जब मैट्रिक का रिजल्ट आया तो हमारी कक्षा का सबसे भोंदू विद्यार्थी जिसने वाकई विद्या की अर्थी ही निकाल दी थी और जिसको ए,बी,सी,डी और पहाड़ा तक का पता नहीं था उस रंजीत झा को सबसे ज्यादा अंक प्राप्त हुए थे क्योंकि उसकी बोर्ड में पैरवी थी। अब आप ही बताईए कि अगर मुझे और रंजीत को शिक्षक बना दिया जाए तो कौन अच्छा पढ़ाएगा? आप कहेंगे कि आप लेकिन बिहार सरकार तो कह रही है कि रंजीत झा छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ज्यादा बेहतर साबित होगा भले ही रंजीत झा कभी कक्षा में जाए ही नहीं।  जिसने मैट्रिक,इंटर,बीए और पीजी की परीक्षाओं में जितना ज्यादा कदाचार किया उसके बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की संभावना उतनी ही ज्यादा है।
मित्रों,मेरे ममेरे भाई संतोष को भले ही कुछ नहीं आता हो,थीटा और बीटा के चिन्हों को भी वो पहचान नहीं पाए लेकिन हमारी बिहार सरकार को तो महाविद्यालय में गणित शिक्षक के तौर पर वही चाहिए भले ही सिर्फ कॉलेजों के स्टाफ रूम की शोभा बढ़ाने के लिए। लगता है कि बिहार सरकार इसलिए खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली नहीं करना चाहती क्योंकि उसको लगता है कि अगर आईए,बीए में ज्यादा-से-ज्यादा नंबर पानेवाले परीक्षा में असफल हो गए तो वह असफलता बिहार की शिक्षा,परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की असफलता होगी। इससे बिहार की शिक्षा और परीक्षा-प्रणाली की पोल भी खुल जाने का खतरा है। फिर हमलोगों के जैसे ज्ञानी मानव अगर प्रोफेसर बन गए तो विद्यार्थियों में विद्रोह और सरकार के विरोध की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा और हमारे महाविद्यालय और विश्वविद्यालय वास्तव में मस्ती की पाठशाला बन पाने से वंचित रह जाएंगे। विद्यार्थियों को पढ़ना पड़ेगा जिससे उनकी दिमागी हालत पर बुरा असर भी पड़ सकता है।
मित्रों,कहने का मतलब यह है कि बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से बिहार सरकार ने बिहार में महाविद्यालय और विश्वविद्यालय शिक्षकों की बहाली के लिए जो अधिसूचना जारी की है और जो कार्यक्रम तय किए हैं वास्तव में वह बिहार की उच्च शिक्षा का श्राद्ध-कर्म कार्यक्रम है जिसमें आप सभी सादर आमंत्रित हैं।-मान्यवर,बड़े ही हर्ष के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि बिहार की उच्च शिक्षा का डिग्री का दौरा पड़ने से दिनांक 13 सितंबर,2014 को आकस्मिक निधन हो गया है। श्राद्ध-कर्म के लिए कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किए गए हैं जिसमें आप सभी येन-केन-प्रकारेण उच्च प्राप्तांकधारी आमंत्रित हैं-
क्षौर-कर्म-              दिनांक 20-11-2014 के पाँच बजे शाम तक
बाँकी के एकादशा,द्वादशा को पिंडदान और महाभोज के बारे में आपको जानकारी भविष्य में दी जाएगी।
दर्शनाभिलाषी-महाठगबंधन के सभी सदस्य,
आकांक्षी-जीतनराम मांझी,मुख्यमंत्री,बिहार।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

21.9.14

एक था पप्पू!-ब्रज की दुनिया

20 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं वैसे तो कई पप्पुओं को जानता हूँ लेकिन इनमें से एक पप्पू ऐसा है जो इन दिनों पूरे बिहार को पप्पू बनाने की कोशिश कर रहा है। मैं बात कर रहा हूं श्रीमान राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जी की। मैंने पहले पहल इन श्रीमान का नाम तब सुना जब पप्पू यादव जी निर्दलीय विधायक हुआ करते थे और किसी दारोगा जी की मूँछें इनको इतनी पसंद आ गई थीं कि इन्होंने उनको जड़ से उखाड़ ही लिया था। बाद में पप्पू जी लालू जी के द्वारा स्थापित यादव राज के प्रतीक बनकर उभरे और इस दौरान इनकी अदावत हुई एक और बाहुबली निर्दलीय विधायक आनंद मोहन के साथ। तब इन दोनों की मुठभेड़ की खबरों से बिहार के अखबार पटे रहते थे। यह वही समय था जब पूरा बिहार आरक्षण की जातीय आग में जल रहा था। यात्रियों को बसों से उतार-उतारकर उनकी जातियाँ पूछकर पीटा जा रहा था। एक बार फिर से पप्पू जी तब चर्चित हुए जेल में होते हुए भी सैर-सपाटा करते हुए पाए गए। इस बीच पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय सांसद बन बैठे और पूरा पूर्णिया जिला उनकी कृपा से राजपूत और यादव जातियों के बीच वर्चस्व का अखाड़ा बन गया। पूर्णिया के मरंगा गांव में एक धक्का सिंह नामक व्यक्ति का लाईन होटल था। एक दिन पप्पू जी के आदमी वहाँ चाय-पानी के लिए पहुँचे और उसका नाम पूछा। नाम सुनकर उनको लगा वो राजपूत होगा और बिना किसी दुश्मनी या बकझक के उन्होंने उसको राजपूत समझकर गोली मार दी। बाद में जब पता चला कि वह धक्का सिंह तो यादव है तब उसे लेकर पटना भागे और इस तरह बेचारे धक्का सिंह जी जान बच गई। उन दिनों इस जातीय झगड़े का मुख्य अखाड़ा था पूर्णिया बस स्टैंड।
मित्रों,तब तक एक बार मैं पप्पू यादव जी का 15 अगस्त,1993 के दिन पटना के सब्जीबाग में भाषण भी सुन चुका था। बड़ा बेकार-सा भाषण देते थे वे लेकिन तब तक मैं उनसे सीधे-सीधे प्रभावित नहीं था। वह गुंडा या अपराधी है तो मुझे क्या तब तक मेरे मन में पप्पू यादव को लेकर यही भाव रहता था लेकिन तब मैं यह नहीं जानता था कि इस व्यक्ति के कारण मेरी जिन्दगी तबाह हो जानेवाली है। हुआ यह कि वर्ष 1993 में पॉलिटेक्निक की प्रवेश परीक्षा में बैठा और पास हो गया लेकिन रैंक अच्छा नहीं आया। सो मेरा नामांकन दरभंगा पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हो गया। दरभंगा पॉलिटेक्निक में जातीय तनाव जैसा कुछ नहीं था इसलिए वहाँ मेरा समय शांति से गुजरा। इसके कुछ महीने बाद ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सीटें खाली हुईँ और तब मैं दरभंगा छोड़कर पूर्णिया पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने पहुँचा लेकिन वहाँ का तो माहौल ही अलग था। वहाँ के अधिकतर विद्यार्थी यादव जाति से आते थे और वे सारे यादव विद्यार्थी कथित रूप से पप्पू यादव के आदमी थे। पहले दिन ही मुझसे वहाँ के छात्रसंघ के अध्यक्ष जयराम यादव ने मेरी जाति पूछी और राजपूत सुनते ही नाराज होकर गालियाँ देने लगा। मैं भौंचक्का था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। हॉस्टल में रहना है तो ठीक वरना 500 रुपया वार्षिक रंगदारी टैक्स देना होगा।
मित्रों,मेरे साथ यादव जाति से आनेवाले विद्यार्थी लगातार काफी बुरा सलूक करते थे जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त था। मैंने भी विरोध किया और अपने स्थानीय मित्र राजकुमार पासवान को साथ लेकर कॉलेज जाने लगा। कक्षा के दौरान ही जाति के आधार पर बंटे छात्रों के बीच अक्सर मारपीट होने लगती। यादव जाति के छात्र बहुधा प्रोफेसरों को भी अपमानित कर डालते थे। इस बीच पूर्णिया में रोजाना हत्याएँ होती थीं। उस समय पूर्णिया में दो आपराधिक गिरोह थे  जिनमें से एक का नेतृत्त्व पप्पू यादव कर रहे थे और दूसरे का नेतृत्त्व था वर्तमान बिहार सरकार में समाज कल्याण मंत्री लेशी सिंह के पति स्व. बूटन सिंह के हाथों में। कभी पप्पू यादव के लोग बूटन सिंह के लोगों को मार देते तो कभी बूटन सिंह के लोग पप्पू यादव के लोगों को। ज्यादातर हत्याएँ पूर्णिया कोर्ट के आसपास होती थीं। पूर्णिया पॉलिटेक्निक के पास ही मरंगा गांव था जो यादवों का गढ़ था इसलिए भी पूर्णिया पॉलिटेक्निक में यादवों का वर्चस्व था। एक बार तो मैंने खुद कचहरी के सामने से पप्पू यादव को अपने आदमी वीरो यादव की लाश के साथ जुलूस निकालते भी देखा था। धड़ाधड़ पूरे शहर की दुकानों के शटर बंद हो गए थे।
मित्रों,धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि या तो मैं हत्या करता या फिर पूर्णिया पॉलिटेक्निक में ही मेरी हत्या हो जाती। मैं सीधा-सच्चा आदमी था इसलिए मैंने पॉलिटेक्निक में दो सालों की पढ़ाई कर लेने के बाद भी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और इस तरह मेरी जिन्दगी तबाह हो गई। अगर मेरी पढ़ाई पूरी हो गई होती तो मैं आज इंजीनियर होता और आराम की जिन्दगी जी रहा होता लेकिन पप्पू यादव के रंगदारी राज के चलते मेरा कैरियर चौपट हो गया। बाद मेें पप्पू यादव के लोगों ने बूटन सिंह और पूर्णिया के विधायक अजीत सरकार की हत्या कर दी। बाद में पप्पू यादव विभिन्न जेलों में भी रहे मगर फिर कानून की कमजोरियों का लाभ उठाकर बरी भी हो गए।
मित्रों,वही पप्पू यादव आज फिर से सहरसा-मधेपुरा में गरीबों के मसीहा होने का ढोंग कर रहे हैं। मेरा सीधे-सीधे मानना है कि यह व्यक्ति कल भी एक रंगदार था,आज भी है और कल भी रहेगा। यह सिर्फ गरीबों के नाम पर उनको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा कर सकता है उनका भला नहीं कर सकता। यह आदमी जातीय वैमनस्यता फैलाकर समाज को पथभ्रष्ट कर सकता है समाज को सही दिशा नहीं दिखा सकता। यह हमारे बिहार की त्रासदी है कि इस तरह का गिरा हुआ आदमी बार-बार चुनाव जीत जा रहा है। चाहे अपराधी को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही क्यों न बना दिया जाए वह मूलतः अपराधी ही रहेगा, देश और समाज को त्रास ही देगा। आपने इस छुटभैय्ये अपराधी को पहले विधायक बनाया फिर एमपी। आपने इस दौरान इसमें क्या परिवर्तन देखा? यह पहले छोटा अपराधी था बाद में बड़ा अपराधी बन गया। अब यह मंत्री-मुख्यमंत्री बनना चाहता है। अगर यह पप्पू यादव जनता को धोखे में रखने में कामयाब हो गया तो निश्चित रूप से इस बार एक-दो नहीं बल्कि सैंकड़ों-हजारों ब्रजकिशोर सिंह को अपनी पढ़ाई अधूरी ही छोड़नी पड़ेगी। इसलिए आपलोगों से मैें हाथ जोड़कर अनुरोध करता हूँ कि इस रंगे सियार की बातों में,झाँसे में आने की भूल कदापि नहीं कीजिएगा। क्या विडंबना है कि जिसको मरते दम तक जेल में होना चाहिए वह व्यक्ति संसद की शोभा बढ़ा रहा है? जिसके हाथ सैंकड़ों अपराधी-निरपराध लोगों के खून से रंगे हुए हैं वह देश के लिए कानून बना रहा है और गंभीर-से-गंभीर मुद्दों पर विचारों की नफासत दिखा रहा है?? यह प्रश्न-चिन्ह वास्तव में हमारे मतदाताओं के विवेक पर लगा प्रश्न-चिन्ह है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

क्या फलदायी होगी बिहार के सीएम की लंदन-यात्रा?-ब्रज की दुनिया

21-09-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर! सरफरोशी की गर तमन्ना है तो सर पैदा कर!! यहाँ कौन सी जगह है जहाँ जलवा-ए-माशूक नही! शौके दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर!!
मित्रों,अब हम बोलेंगे तो बिहार के मुख्यमंत्री कहेंगे कि बोलता है। मगर करें क्या इनका रवैया ही कुछ ऐसा है कि हमको बार-बार बोलना ही पड़ जाता है। अब जब देसी व्यवसायी बिहार में फूटी कौड़ी भी लगाने को तैयार नहीं हैं तब बिहार के मुख्यमंत्री आज लंदन जा रहे हैं विदेशी निवेशकों से प्रत्यक्ष बातचीत करके उनको प्रत्यक्ष पूंजी निवेश के लिए तैयार करने के लिए। बिहार का दुर्भाग्य है कि यहाँ के नेता-मंत्री बहुत बार विदेशी दौरे कर चुके हैं लेकिन उसका लाभ अभी तक बिहार को चवन्नी का भी नहीं हुआ है। कोई जापान जाकर खेती करना सीखता है तो कोई अमेरिका जाकर जलापूर्ति के तरीके।
मित्रों,अभी पिछले महीने ही बिहार के नगर विकास मंत्री सम्राट चौधरी सीवेज सिस्टम देखने और सीखने के लिए लंदन जाना चाहते थे लेकिन तब इन्हीं जीतनराम मांझी ने उनको जाने नहीं दिया था क्योंकि उस समय पूरा पटना पानी में डूबा हुआ था। आज जबकि पटना में बरसात के पानी का जल-स्तर उस समय से और भी ज्यादा हो गया है तब मुख्यमंत्री खुद लंदन के लिए रवाना हो गए हैं पूँजी निवेश को आकर्षित करने।
मित्रों,जबसे बिहार में सुशासन की सरकार आई है तभी से नीतीश जी भी बिहार में पूंजी आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं और लगातार कर रहे हैं लेकिन बिहार में चंद चवन्नी-अठन्नी के अलावा कुछ आया नहीं। अब हम आते हैं उस शेर पर जिसको हमने आलेख की शुरुआत में ही लिखा था। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर बिहार में पूंजी निवेश चाहिए तो बिहार को ऐसा बनाईए कि लोग खुद ही चुंबक की तरह खिंचें चले आएँ। बिजली दीजिए,सड़कें दीजिए,जमीन दीजिए और सबसे जरूरी है कि अच्छी कानून-व्यवस्था दीजिए। जहाँ के अधिवासी अपने घरों तक में असुरक्षित हों,जहाँ की पुलिस डाका के दौरान फोन करने पर भी घटनास्थल पर हफ्तों तक नहीं पहुँचे और जहाँ अपने जान और माल की सुरक्षा स्वयं करें का नियम चलता हो वहाँ कोई होशमंद तो क्या कोई पागल भी अपनी पूंजी नहीं लगाएगा।
मित्रों,हमारे बिहार में बिजली का जाना नहीं बल्कि आना खबर बनती है। कई-कई दिनों तक लोगों को बिजली के दर्शन तक नहीं होते,सड़कों की हालत तो ऐसी है कि कई बार कुछ सड़कों से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि हम बाधा दौड़ में भाग ले रहे हैं। बरसात में अगर सड़कों पर पड़े गड्ढ़ों की गहराई का अंदाजा नहीं हो तो यकीनन आप अगले ही पल में छोटे-छोटे तालाब में मछली पकड़ते नजर आएंगे। उद्योग लगवाना है तो जमीन भी चाहिए और बिहार में कहाँ मिलेगी हजार-500 एकड़ जमीन ईकट्ठे? सड़क-रेल लाईन बनाने के लिए तो कोई किसान जमीन देना नहीं चाहता फिर बिहार सरकार उद्योगों के लिए जमीन कहाँ से लाएगी। कानून-व्यवस्था के बारे में हम थोड़ा-सा संकेत पहले भी दे चुके हैं। बिहार में आप दो-चार करोड़ के सड़क-निर्माण या दस-बीस लाख के स्कूल-भवन-निर्माण का भी ठेका अगर लेते हैं तो आपको दर्जनों छुटभैये रंगदारों का सामना करना पड़ेगा। कभी-कभी तो नक्सली भी पहुँच जाते हैं लेवी मांगने और नहीं देने पर जेसीबी-ट्रैक्टर आदि को फूँक डालते हैं और पुलिस उनकी कोई सहायता नहीं करती बल्कि उल्टे सलाह देती है कि साब! काहे को झंझट में पड़ रहे हो? दे दो न दो-चार लाख रुपया।
मित्रों,जाहिर है कि बिहार के पास अभी ऐसी नजर नहीं है कि उसको शौके दीदार का सौभाग्य मिले। हमारे बिहार में एक कहावत है कि बिन मांगे मोती मिले,मांगे मिले न भीख। मतलब कि किसी राज्य में पूंजी निवेश होगा या नहीं यह उस राज्य की परिस्थिति और योग्यता पर निर्भर करता है। अगर आपने वह योग्यता पैदा कर ली है तो आपको पैसों के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा लोग खुद ही पैसे लेकर आपके पीछे भागेंगे वरना आप लंदन-न्यूयार्क घूमते रहिए कोई आपके ईलाके में फूटी कौड़ी भी नहीं लगाएगा। पता नहीं हमारे मुख्यमंत्री इस हकीकत से वाकिफ हैं भी या नहीं। वैसे सरकारी खर्च पर विदेश-यात्रा पर जाने के लिए कोई-न-कोई बहाना तो चाहिए ही था। राज्य की जनता के दिल को बहलाने के लिए मांझी यह ख्याल अच्छा है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

18.9.14

ख़्वाबों की बातें । (गीत)


ख़्वाबों की  बातें । (गीत)

ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
फिर  शब-ए- तन्हाई  में, रोया  करते  हैं  वो..!
 
शब-ए-तन्हाई= रात का अकेलापन;
१.
ज़िंदगी में  कई  हादसे,  आप ने  झेले मगर..!
टूटे ख़्वाबों का  शिकवा  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
 
शिकवा=शिकायत,
२.
बिखरा सा  वो   ख़्वाब  और  अँधेरी  वो  रात..!
हाँ, मातम अब उनका, मनाया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
३.
ख़्वाबों की  तसदीक़, हम  करें  भी  तो  कैसे..!
शब  होते  हमें, रुकसत  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
 
तसदीक़ = सच्चाई की परीक्षा; शब=रात,
४.
इस  ग़म में, हम भी जागे  हैं   कई  रात,  पर..!
अब  हमें, दूर से   सलाम  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया  करते  हैं  वो..!

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१७-०९-२०१४.

17.9.14

नए भारत के विश्वकर्मा को जन्म दिन की शुभकामनाएँ-ब्रज की दुनिया

17 सिंतबंर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यह कितना बड़ा संयोग है कि आज एक तरफ तो देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा के पूजन का दिन है तो वहीं दूसरी ओर आज भारत के प्रधानमंत्री जिन्होंने नवीन और ऊर्जावान भारत के निर्माण का बीड़ा उठाया है उन नरेंद्र मोदी का जन्म दिन भी है। यह सही है कि लोकतंत्र की अपनी मजबूरियाँ होती हैं लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी अबतक जिस तरह से सरकार का संचालन किया है वह भारत के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करने के लिए पर्याप्त है।
मित्रों,मैंने भी मोदी मंत्रिमंडल के गठन के समय कुछ मंत्रियों को मंत्री बनाए जाने को लेकर आपत्ति की थी लेकिन कल यूपी के लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के जो परिणाम आए हैं उनसे पता चलता है कि कहीं-न-कहीं मोदी जी को भी वोटबैंक का ख्याल रखना पड़ता है। जब तक हमारे देश की जनता मूर्ख है तबतक मोदी जी जैसा देश का भला चाहनेवाला,सिर्फ देश के लिए जीने और मरनेवाला व्यक्ति भी लाचार रहेगा।
मित्रों,क्या कारण है कि कोई राजपूत दलितों का लाख हितैषी होने पर भी उनका नेता,उनके वोटों का ठेकेदार नहीं बन पाता? क्या कारण है कि कोई यादव राजपूत मतों पर अपना दावा नहीं कर पाता? क्या कारण है कि कोई ब्राह्मण बनियों को नेतृत्व नहीं दे पाता? कारण बस एक ही है और वह हमारे मतदाताओं की अपरिपक्वता जो आज भी अपनी जाति के लोगों को अपना नेता मानते हैं भले ही वह दशकों से उनको धोखा देता आ रहा हो। मैंने लोकसभा चुनावों के समय भाजपा के लोजपा के साथ जाने का विरोध किया था लेकिन भाजपा नहीं मानी क्योंकि उसके समक्ष और कोई चारा ही नहीं था। बिहार के दुसाधों के लिए रामविलास पासवान ही एकमात्र नेता हैं और दुसाधों का वोट चाहिए तो रामविलास पासवान को साथ में रखना ही होगा चाहे उनपर भ्रष्टाचार के कितने भी आरोप क्यों न हों।
मित्रों,इसलिए नरेंद्र मोदी को भी कई दागियों को मंत्रिमंडल में रखना पड़ा। लेकिन वाहवाही की बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी ने उनलोगों को मनमानी करने की छूट नहीं दी है बल्कि पूरी तरह से शिकंजे में करके रखा है। वास्तविकता तो यह है यह सरकार पूरी तरह से एक ही व्यक्ति पर केंद्रित है और वह हैं नरेंद्र मोदी। मोदी जानते हैं कि अगर सरकार की वाहवाही होगी तो वह भी उनकी ही होगी और अगर बदनामी होगी तो वह भी केवल उनकी ही होगी।
मित्रों,इसलिए शपथ-ग्रहण से पहले कामकाज शुरू कर देनेवाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी। यह उनकी अच्छी नीतियों का ही परिणाम है कि इस समय महंगाई दर पाँच साल के न्यूनतम स्तर पर पहुँच गई है,विकास-दर ने कुलांचे भरना शुरू कर दिया है,बिजली के उत्पादन में 22 प्रतिशत की तेज वृद्धि हुई है,पूँजी-निवेश के क्षेत्र में धन-वर्षा के आसार बनने लगे हैं,भारत के भिखारियों तक के अच्छे दिन आते हुए दिखाई देने लगे हैं,सरकार में गति आई है,कुशलता आई है और 5 सालों तक सरकारविहीन रहे भारत में एक काम करती हुई सरकार नजर आने लगी है।
मित्रों,वैश्विक स्तर पर भी पिछले 100 दिनों में भारत का सिर ऊँचा हुआ है। आज चीन के राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं और 100 अरब डॉलर के निवेश के प्रस्ताव ला रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के राष्ट्रपति इस समय वियतनाम में हैं और उन्होंने तेल खोज से संबंधित ऐसे प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं जो निश्चित रूप से चीन को नागवार गुजरेगा लेकिन नरेंद्र मोदी की तो पॉलिसी ही है कि न हम सिर झुकाकर बात करेंगे और न ही सिर पर चढ़कर बल्कि हम आँखों में आँखें डालकर बराबरी के स्तर पर बातचीत करेंगे फिर चाहे सामने रूस हो,अमेरिका हो या चीन हो।
मित्रों,हमारे प्रधानमंत्री पुराने पिट चुके ढर्रे पर काम करने के बिल्कुल भी पक्षधर नहीं हैं तभी तो उन्होंने योजना आयोग नामक बेकार हो चुकी संस्था को समाप्त कर दिया,कई कैबिनेट समितियों का अंत कर दिया और कई ऐसे मंत्रालयों को मिलाकर एक-एक मंत्री ऱख दिया जिनके कामकाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। फाइलों को अब पैसे देकर चलवाना नहीं पड़ता बल्कि फाइलें खुद ही चलती हैं स्वचालित मोड में। हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि चाहे रक्षा-क्षेत्र हो या इलेक्ट्रॉनिक्स या फिर उपभोक्ता वस्तुएँ सबका उत्पादन भारत में हो और भारत में न केवल इनका निर्माण हो बल्कि पूरी दुनिया में भारत के बने सामान छा जाएँ। उनकी मेक इन इंडिया योजना अगर सफल रहती है तो इससे हमारी अर्थव्यवस्था को तो पर लगेंगे ही साथ ही बेरोजगारी की समस्या का भी स्वतः समाधान हो जाएगा।
मित्रों,कृषि,शिक्षा,पुलिसिंग,न्यायपालिका,खेल,शासन-प्रशासन,आधारभूत संरचना आदि हरेक क्षेत्र में देश में आमूल-चूल परिवर्तन करने की जरुरत है और हमारे प्रधानमंत्री भी यही चाहते हैं कि अब देश सही मायनों में बदले। हमारे बिहार में एक कहावत है कि रास्ता बताओ तो आगे चलो। उनका अभी तक का काम तो यही बताता है कि वे न केवल देश को रास्ता दिखा रहे हैं बल्कि खुद उस रास्ते पर चल भी रहे हैं। जब गांधीनगर से नई दिल्ली आने लगे तो मुख्यमंत्री के रूप में प्राप्त वेतन को अपने चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के बीच बाँट दिया और आज जब माँ ने जन्मदिन के आशीर्वाद के तौर पर 5001 रु. दिया तो उसे भी वतन पर न्योछावर कर दिया। वे सचमुच सबका साथ लेकर सबके विकास पर चल रहे हैं। उनकी संवेदनाओं के दायरे में भारत के युवा,किसान,हस्तशिल्पी,इंजीनियर,डॉक्टर यहां तक कि भिखारी भी हैं,जीव-जंतु भी हैं। न तो रोम एक दिन में बना था और न तो सौ दिनों में एक बर्बाद देश दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र बन सकता है। शीघ्रता तो की जा रही है लेकिन शीघ्रता को भी तो समय चाहिए। न तो हमारे चाहने से समय से पहले वृक्ष फल देने लगेगा और न ही रातों-रात हजारों फैक्ट्रियाँ खुल जाएंगी,चुटकियों में हजारों किमी सड़कें बन जाएंगी और न तो भारत में सरप्लस बिजली का उत्पादन होने लगेगा। इसलिए आईए हम सभी प्रार्थना करें परमपिता परमेश्वर से कि भगवान करें कि नए भारत के स्वप्नद्रष्टा को इतनी शक्ति मिले,इतनी लंबी आयु मिले कि वह अपने सपनों को अपने हाथों अपनी आँखों से साकार होता हुआ देख सके। आमीन!!!!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

16.9.14

क्या अभी भी भारतीय सैनिकों पर पत्थर फेंकेंगे कश्मीरी?-ब्रज की दुनिया

16 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,रहीम कवि ने कहा है कि
रहिमन बिपदा हूँ भलि जो थोड़े दिन होय,
हित अनहित या जगत में जानि पड़े सब कोय।
कश्मीर के अधिकतर भागों में इन दिनों अचानक सांप्रदायिक सद्भाव कायम हो गया है। क्या मस्जिद,क्या मंदिर और क्या गुरूद्वारा हर जगह हिन्दू,मुसलमान और सिक्ख एकसाथ रह रहे हैं और एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। काश ऐसी एकता बिना आपदा के आए हुए हमेशा बनी रहती! कश्मीर के जलने का बस एक ही कारण है कि कश्मीर मुसलमानबहुल है और मुसलमानों को अपने पंथ के अलावे अन्य कोई पंथ स्वीकार्य ही नहीं है। बाँकी पूरे भारत में जहाँ हिन्दू बहुमत में हैं हिन्दुओं को मुस्लिम सहित दूसरे पंथ के लोगों से कोई परेशानी नहीं है लेकिन मुस्लिमबहुल होने के कारण कश्मीर में पिछले 3 दशकों से अलगाववाद की हवा चल रही है। इसी अलगाववाद ने और इसी विचारधारा ने एक सदी पहले कहा था कि हिन्दू और मुस्लिम दो पंथ नहीं दो राष्ट्र हैं और इसलिए एक देश में एकसाथ नहीं रह सकते  और 1947 में भारत का झूठा धार्मिक और राजनैतिक विभाजन करवाया था जबकि वास्तविकता यह है कि 1947 में मुसलमानों के लिए अलग बने देश पाकिस्तान में जितने मुसलमान हैं आज भी हिन्दूबहुल भारत में उससे कहीं अधिक मुसलमान हैं और अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं और सुखी और समृद्ध हैं। यह एक कटु सत्य है कि कुछ दिन पहले तक कश्मीरी लोग भारतीय सेना को देखते ही उन पर पत्थरबाजी करने लगते थे और 15 अगस्त और 26 जनवरी को भारत की शान तिरंगे को फहराने के बदले वे लोग जलाते हैं।
मित्रों,पिछले कई दिनों से कश्मीर में जबसे 109 सालों में सबसे भयानक प्राकृतिक आपदा आई है तभी से कश्मीर घाटी में न तो राज्य सरकार के तंत्र का कहीं अता-पता है और न ही उन अलगाववादियों का ही जो खुद के कश्मीर का वास्तविक रहनुमा होने का दावा करते हैं। इनमें दो पाकिस्तानपरस्तों यासीन मलिक और अहमद शाह गिलानी की तो जान भी उसी भारतीय सेना ने बचाई है जिस पर पत्थर फेंकने के लिए वे लोग कश्मीरियों को उकसाया करते हैं। आज अगर कश्मीरी इस भयंकर विपदा में भी महफूज हैं,जीवित हैं और स्वस्थ हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारे सैनिक बिना सोये,बिना थके दिन-रात उनकी जान बचा रहे हैं और दिन-रात उन तक खाने-पीने के सामान के अलावा दवाइयाँ पहुँचा रहे हैं। उस पर कहीं-कहीँ  कश्मीरियों ने सेना के हेलीकॉप्टर और जहाजों पर पत्थर फेंके हैं फिर भी कश्मीर में केंद्र सरकार और सेना की ओर से अभूतपूर्व तरीके से पूजा-भाव से राहत का काम किया जा रहा है। भारत सरकार के सारे वरिष्ठ अधिकारी इस समय दिल्ली छोड़कर कश्मीर में हैं और राहत-कार्यों की निगरानी कर रहे हैं। यहाँ तक कि भारत के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अपील की है कि वे 17 सितंबर को उनका जन्मदिन नहीं मनायें बल्कि जम्मू-कश्मीर के लिए योगदान करें।
मित्रों,टेलीवीजन पर इन दिनों आपदा-पीड़ित कश्मीरियों के जो बयान आ रहे हैं वे इस बात की तस्दीक करते हैं कि कश्मीरियों की इन दिनों अगर कोई मदद कर रहा है वह भारतीय सेना है। शायद यही कारण है कि इन दिनों श्रीनगर में लोगों को हिन्दुस्तानी सेना जिंदाबाद के नारे लगाते हुए देखा जा रहा है। यह एक अद्भुत क्षण है क्योंकि यह सब उस श्रीनगर में देखने को मिल रहा है जहाँ के लोग कुछ दिन पहले तक ही भारतीय सैनिकों को देखते ही पत्थर चलाने लगते थे। कश्मीरी तो कश्मीरी आपदा के समय घाटी में मौजूद पाकिस्तानी सांसदों को भी मानना पड़ा कि इस समय जहाँ देखिए वहाँ देवदूत की तरह मानवता की सेवा में सतत तत्पर सिर्फ भारतीय सैनिक ही दिखाई देते हैं।
मित्रों,सवाल उठता है कि क्या अब कश्मीरी भारतीय सेना पर पत्थर नहीं फेंकेंगे? हमने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि गंगा स्नान करते वक्त एक साधू ने देखा कि एक बिच्छू पानी में डूब रहा है। साधू ने उसे अपनी हथेली पर उठा लिया लेकिन बिच्छू ने स्वभावतः डंक मारा। साधू दर्द से कराह उठा और बिच्छू उसके हाथ से छूटकर फिर से डूबने लगा। जब ऐसा कई बार हुआ तो लोगों ने साधू से कहा कि डूब जाने दीजिए इसे। तब साधू ने उत्तर दिया कि जब यह अपना स्वभाव नहीं छोड़ रहा है तो मैं क्यों छोड़ूँ? हो सकता है कि इस कहानी के बिच्छू की तरह कश्मीरी आपदा के टल जाने के बाद फिर से भारतीय सैनिकों पर पत्थर से प्रहार करने लगें लेकिन तब वे इंसान नहीं बिच्छू कहे जाएंगे, इस कहानी के बिच्छू। इंसानियत तो यही कहती है कि एक इंसान को दिल के बदले दिल और जान के बदले जान देनी चाहिए। इंसानियत यह भी कहता है कि जो लोग अहसानफरामोश होते हैं वे इंसानियत के नाम पर कलंक होते हैं। तो क्या कश्मीरी सचमुच बिच्छू हैं,इंसान नहीं हैं। यह हम साबित नहीं कर सकते। यह उनको ही साबित करना होगा और ऐसा सिर्फ और सिर्फ वे ही साबित कर सकते हैं। हम भारतीय तो हमेशा से उनको गले और सीने से लगाने को तैयार हैं मगर क्या वे ऐसा करने के लिए तैयार हैं? 1947 से लेकर अबतक जब-जब कश्मीर को कष्ट हुआ है भारत ने हमेशा उनके जख्मों पर मरहम लगाया है,भाई की तरह जान देकर भी सहायता की है। आज भी जल-प्रलय के समय पूरा भारत कश्मीरियों के साथ खड़ा है मगर अब आगे शेष भारत के साथ हाथ-से-हाथ मिलाकर खड़े होने की बारी कश्मीरियों की है। कश्मीरियों को यह साबित करना ही होगा कि वे कृतघ्न नहीं हैं और वे भी दिल के बदले दिल और जान के बदले जान देना जानते हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मान ना मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर समन्वयक बने मुनमुन की बैठक में पार्षदों का ना आना सियासी हल्कों में हुआ चर्चित 
इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पार्षद आये ही नहीं। घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है। शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा।
मुनमुन की बैठक में नहीं आये पार्षदंः-इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। यहां यह विशेष् रूप से उल्लेखनीय है कि तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। इस संबंध में मुख्यनगरपालिका अधिकारी द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि केन्द्रसरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय के द्वारा दिये जाने वाले अंशदान से कुलराशि 47 करोड़ 36 लाख रु. की राशि इस हेतु स्वीकृत की गयी है। साथ ही यह भी बताया गया है कि राज्य तकनीकी समिति द्वारा 62 करोड़ 55 लाख रु. की निविदा लागत स्वीकृत की गयी है। इसमें वर्तमान तथा नवीन जलावर्धन योजना के पांच साल के रख रखाव और संचालित करने का व्यय भी ठेकेदार द्वारा किया जाना प्रसतवित है। इस योजना हेतु स्वीकृत राशि और निविदा की राशि को लेकर ही विवाद प्रारंभ हुआ है। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि आखिर 15 करोड़ 19 लाख रु. की अतिरिक्त राशि निविदा में कैसे आयी और अंतर की यह राशि पालिका को मिलगी कहां से? आम तौर पर यह माना जा रहा है कि ये अंतर की राशि की बंदर बांट करनंे के लिये ही बढ़ायी गयी है। इसे लेकर पालिका के कांग्रेसी पार्षद लामबंद हो गयें हैं वहीं पालिका के भाजपा पार्षदों का भी अपने अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी को समर्थन नहीं है। बीते कई दिनों से दोनों पक्षों का यह विवाद सुर्खियों में बना हुआ है। यह भी सही है कि जब किन्हीं दो पक्षों के बीच विवाद हो जाता है तो उसे सुलझाने के लिये दोनों ही पक्ष अपने किसी विश्वास प्राप्त व्यक्ति को पंच बनाकर उसे सुलझाने का काम करते है। लेकिन पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान  ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के अलावा भाजपा पार्षद श्याम शोले के अलावा कोई भी पार्षद उसमें नहीं आया। कुछ अखबारों में यह भी छपा कि कांग्रेस पार्षद दल के नेता शफीक पार्षद भी उसमें उपस्थित थे। इसके बावजूद भी विधायक मुनमुन राय ने अपनी निधि से नगर विकास के लिये 25 लाख रु. की राशि देने की घोषणा की जो कि शायद इस बैठक का मुख्य उद्देश्य था। हालांकि यह कहना भी गलत होगा कि मुनमुन को नपा के मामलो से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह उनके विस क्षेत्र के मुख्यालय की पालिका है लेकिन नपा चुनाव के दो तीन महीने पहले ही नगर की सुध लेना कुछ और ही कहानी कहती नजर आ रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि नपा में चुनावों में भाजपा की जीत हार में मुनमुन की भूमिका ही निर्णायक रहने वाली है। इसमें उन्हें अपने चुनाव में नगर में मिली भारी बढ़त और मुस्लिम वार्डों में मिले वोटों को कारण बताया जा रहा है। इसमें उनकी क्या रणनीति होगी? यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा।
भाजपा राज में वेदसिंह और इंका राज में आशुतोष भी नही करा पाये थे जांचः- घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है।शहर के लिये सफेद हाथी साबित हो चुकी इस योजना की जांच के लिये कांग्रेस शासनकाल में सिवनी विस के इंका प्रत्याशी रहे आशुतोष वर्मा ने इस मुद्दे पर जांच की मांग तो कांग्रेस शासनकाल में जरूर उठायी लेकिन कोई कारगर जांच नहीं हो पायी। इसके बाद जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो उमा भारती के शासनकाल में जिला भाजपा अध्यक्ष रहे वेदसिंह ठाकुर ने फिर एक बार इस मामले में शिकायत की लेकिन इस परियोजना की फिर भी जांच नहीं हो पायी। इसमें घपले करने वाले हाथ काफी ताकतवर थे। इस योजना के क्रियान्वयन के दौरान सिवनी में पदस्थ पी.एच.ई. के कार्यपालन यंत्री जोशी जबलपुर संभाग के संघ के प्रमुख स्तंभ रहे स्व. बाबूराव जी परांजपे के निकट रिश्तेदार थे और उस विभाग के मंत्री उस दौरान स्व. हरवंश सिंह थे। उस वक्त इस योजना के घटिया काम को लेकर एक दुर्गा मंड़प में झांकी भी लगायी गयी थी। तकनीकी लोगों का यह मानना है कि इस योजना में निर्धारिम मानदंड़ों के पाइप नहीं लगे है। जितनी रफ्तार और मात्रा में पानी फेंकने के लिये मोटर पंप लगाये लगाये हैं उसकी लगभग आधी क्षमता के पाइप का उपयोग किया गया है। इसीलिये टेस्टिंग के समय जब पूरी रफ्तार से पानी छोड़ा गया था तो छोटे मिशन स्कूल के पास एक जमीन से उखड़कर लगभग खड़ा हो गया था और एक बड़ी दुर्घटना होने से बच गयी थी क्योंकि कुछ समय पहले ही स्कूल की छुट्ठी हो चुकी थी। उसके बाद से मोटर पंपों से लगभग आधी मात्रा ममें नियंत्रित करके पानी छोड़ा जाता है जिसके कारण पंप अपनी क्षमता से दुगने समय तक चलने के बाद भी शहर की स्ीाी टंकियशें को दिन में एक बार भी पूरा नहीं भर पाते थे जबकि तकनीकी स्वीकृति के अनुसार दिन में दो बार में 12 एमएलडी पानी टंकियों में भरा जाना चाहिये था। दुगने समय तक पंपों को चलाने कारण प्राकल्लन में किया गया विद्युत खपत का आकलन फेल हो गया और लगभग दुगनी बिजली की खपत होने लगी जिसका बोझ नगरपालिका आज भी नहीं झेल पा रही है। हाल ही में जो प्रस्ताव जलावर्धन योजना को लेकर सामने आयें हैं उसके अनुसार शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा। ये कैसे संभव होगा? इसे लेकर नगर के सभी कर्णधार फिलहाल तो मौन ही है। “मुसाफिर”
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
16 सितम्बर 2014 से साभार 

14.9.14

यह मेरा हिन्दी दिवस नहीं है दोस्त!-ब्रज की दुनिया

14 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले कई दशकों से जबसे मैंने होश संभाला है मैं देखता आ रहा हूँ कि भारत और दुनियाभर के हिन्दी जन आज 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं। पता नहीं क्यों मनाते हैं? न तो इस दिन भारत में पहली बार हिन्दी बोली गई और न ही इस दिन हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया। अलबत्ता 14 सितंबर,1949 को हिन्दी के साथ धोखा जरूर किया गया था जब यह कहा गया कि हिंदी भारतीय गणतंत्र की राजभाषा तो होगी लेकिन तबसे जब यह इसके लायक हो जाएगी। लायक तो भारत 1947 में प्रजातंत्र के लिए भी नहीं था फिर क्यों लागू किया वयस्क मतदान वाले प्रजातंत्र को? संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार इसे भारतीय संविधान लागू होने की तारीख़ अर्थात् 26 जनवरी, 1950 ई. से लागू नहीं किया जा सकता था, अनुच्छेद 343 (3) के द्वारा सरकार ने यह शक्ति प्राप्त कर ली कि वह इस 15 वर्ष की अवधि के बाद भी अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रख सकती है। रही–सही क़सर, बाद में राजभाषा अधिनियम, 1963 ने पूरी कर दी, क्योंकि इस अधिनियम ने सरकार के इस उद्देश्य को साफ़ कर दिया कि अंग्रेजों के शासन के खात्मे के बाद भी अंग्रेज़ी की हुक़ूमत देश पर अनन्त काल तक बनी रहेगी। इस प्रकार, संविधान में की गई व्यवस्था 343 (1) हिन्दी के लिए वरदान थी परन्तु 343 (2) एवं 343 (3) की व्यवस्थाओं ने इस वरदान को अभिशाप में बदल दिया। वस्तुतः संविधान निर्माणकाल में संविधान निर्माताओं में जन साधारण की भावना के प्रतिकूल व्यवस्था करने का साहस नहीं था, इसलिये 343 (1) की व्यवस्था की गई। परन्तु अंग्रेज़ीयत का वर्चस्व बनाये रखने के लिए 343 (2) एवं 343 (3) से उसे प्रभावहीन कर देश पर मानसिक ग़ुलामी लाद दी गई।
मित्रों,मैं तो हिन्दी दिवस उस दिन की याद में मनाऊंगा जब हिन्दी को वास्तव में भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा घोषित कर दिया जाएगा। जब हमारा संविधान कहेगा कि आज से और अभी से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा है न कि यह कि हिन्दी भारतीय गणतंत्र की राजभाषा तो होगी लेकिन कब पता नहीं। यह हम हिन्दीभाषियों और हिन्दी भाषा के लिए हर्ष का विषय है कि इस समय भारत की बागडोर एक ऐसे प्रधानमंत्री के हाथों में है जो देश तो क्या विदेश में भी हिन्दी ही बोलता है। इतना ही नहीं वर्तमान केंद्र सरकार हिन्दी को लेकर काफी संवेदनशील भी है जिसका प्रमाण हमें तब मिला जब सी-सैट में हिन्दी भाषा के पक्ष में सरकार ने निर्णय दिया। परन्तु सच्चाई यह भी है कि वर्तमान केंद्र सरकार अभी संसद में इतनी ताकतवर नहीं है कि वह बेझिझक होकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने का फैसला ले सके। इसलिए हम हिन्दी जनों को चाहिए कि आनेवाले विधानसभा चुनावों में एनडीए को भारी बहुमत से जिताकर राज्यसभा में भी उसका बहुमत स्थापित करें जिससे उसके पास यह बहाना नहीं रह जाए कि अगर हमारे पास दोनों सदनों में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने लायक बहुमत होता तो हम जरूर ऐसा करते। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह केंद्र सरकार हिन्दी की ताकत को बखूबी जानती है इसलिए यह जरूर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की ताकत दे सकती है।
मित्रों, हिंदी बहती नदी है और लगातार नई होती रहती है इसलिए उसका विकास भी हो रहा है लेकिन हम देखते हैं कि अभी भी हिन्दी में विज्ञान और इंजीनियरिंग की पुस्तकें कम हैं और अगर हैं भी तो उनकी भाषा ऐसी है जो हमारी रोज की बोलचाल की भाषा से बिल्कुल ईतर है इसलिए इस ओर ध्यान देना पड़ेगा। यह भी कटु सत्य है कि हम अब अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से शिक्षा देना नहीं चाहते जिससे हिन्दी को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि अपेक्षाकृत ज्यादा तेज दिमागवाले बहुमत युवा भले ही कामचलाऊ हिंदी जानते हों लेकिन वे हिंदी से प्रेम नहीं करते,अपने हिन्दी ज्ञान पर गर्व नहीं करते। ऐसे हालात में भला कैसे हिन्दी का कारवाँ आगे बढ़ेगा? यह भी सच है कि आजादी के पहले भी हिन्दी के लेखक और कवि गरीबी में दिन गुजारते थे और आज आजादी के 67 साल बाद भी मुफलिसी ही उनकी किस्मत है,जिंदगी है। बदलते परिवेश में हमें ऐसे प्रबंध करने होंगे जिससे इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य उपलब्ध हो और इस तरह से उपलब्ध हों कि पढ़नेवालों को पढ़ने से पहले कुछ आर्थिक योगदान जरूर करना पड़े। तभी हिन्दी साहित्य बचेगा और हिन्दी के साहित्यकार बचेंगे क्योंकि आज के युवा किताबों के पन्ने पलटने में यकीन नहीं रखते बल्कि वे तो सीधे गूगल बाबा की शरण लेते हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

अपनी भाषा अपनी माटी

अपनी भाषा अपनी माटी

 (हिंदी दिवस पर )

जब तक हम अपनी भाषा और माटी पर गर्व करना नहीं सीखेंगे तब तक बदलाव
कागज के फूल से मिलने वाली खुशबु की तरह झूठा है। जब देश स्वतन्त्र नहीं था
तब इस देश के लोग हिंदी या मातृभाषा का उपयोग करते थे और स्वतंत्रता के बाद
हम फिरंगी भाषा के गुलाम होते गये,आज गाँव से महानगर तक हर कोई अंग्रेजी
का आशिक होता जा रहा है ,आज कहीं भी किसी को अपनी भाषा को छोड़ने का
मलाल नहीं है और जानबूझ कर अनावश्यक होते हुए भी विदेशी भाषा बोलने पर
शर्म नहीं है। हिन्दी की समस्या वह पढ़ा लिखा समाज है जो अंग्रेजी की जी हजुरी
करता रहा है।

पिछले 65 वर्षों में हमारी सरकार ने हिंदी भाषा को कुछ नारे के अलावा क्या दिया।
इस देश के संत्री से मंत्री टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं जबकि
सहज रूप से सभी को समझ में आने वाली हिंदी बोलने से भी कतराते हैं। देश के
भूतपूर्व प्रधान मंत्री जब सँसद में बोलते थे जो यदा कदा हिंदी में बोलते थे ,कुछ
राजनेता तो वोट लेने के खातिर हिंदी बोलने का दिखावा करते हैं ऐसे में हिंदी का
विकास कैसे हो ?

अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद क्लिष्ट हिंदी में जानबूझ कर किया जाने लगा ?सिर्फ
यह जताने के लिए कि अंग्रेजी सरल भाषा है। सरकारी काम काज में अंग्रेजी का
उपयोग हिंदी भाषा की दुर्दशा करता रहा है। आज विश्व में कितने जापानी,चीनी
अमेरिकी हिन्दी भाषा पर प्रभुत्व रखते हैं ?और कितने भारतीय अंग्रेजी भाषा
पर प्रभुत्व रखते हैं ? हर बार देशी अंग्रेजी पंडित फिजूल का तर्क रखते हैं कि
अंग्रेजी के बिना विश्व स्तर पर तरक्की करना असंभव है जबकि चीन जापान
अपनी भाषा में काम करके विश्व को उनके देश की भाषा सीखने की स्थिति बना
चुके हैं। एक अंग्रेज यात्री जब भारत आता है तो हिंदी के काफी शब्द सीख कर
आता है और वह जब किसी  हिन्दुस्तानी से "नमस्कार" के प्रत्युत्तर में "good
morning "सुनता है तो भौंचक्का रह जाता है।

हिंदी के गौरव के लिए देश के साँसद सँसद में हिंदी में अनिवार्य रूप से बोले,
हर साँसद को अपनी मातृभाषा के साथ सहज हिंदी में बोलने का अभ्यास
करना चाहिए,अंग्रेजी बोल कर काम निकालने का रास्ता बंद करना चाहिए।
हमें विश्व की भाषाएँ सीख कर ज्ञान की वृद्धि करनी है परन्तु अपनी भाषा का
अपमान नहीं करना चाहिए। किसी भी विदेशी के साथ उसकी भाषा में बात
करना अच्छी बात है पर अपने ही देश में एक दूसरे से अन्य देश की भाषा में
बात करना एक ओछी हरकत के अलावा विशेष कुछ नहीं है।

हिंदी सप्ताह नहीं ,हिंदी पखवाड़ा नहीं ,365 दिन हिंदी में काम यह लक्ष्य होना
चाहिये। हिन्दुस्थान को समझना है तो हिंदी जानना और उपयोग में लाना
जरुरी है।         

13.9.14

श्वेता बसु शिकार है या शिकारी?-ब्रज की दुनिया

13 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले दिनों मकड़ी,इकबाल जैसी प्रसिद्ध फिल्मों की हिरोइन श्वेता बसु को वेश्यावृत्ति करते हुए रंगेहाथों पकड़ा गया। तभी से बॉलीवुड में इस बात पर एकतरफा बहस छिड़ी हुई है कि श्वेता बसु ने जो कुछ भी किया है क्या वह सब भारत में और भारतीय लड़की के लिए करना सही है? यह बहस इसलिए एकतरफा है क्योंकि अभी तक किसी भी हिन्दी फिल्म या टेलीवीजन शख्सियत ने यह नहीं कहा कि श्वेता ने गलत किया बल्कि साक्षी तंवर और दीपिका पादुकोण ने उल्टे श्वेता को ही सही ठहराया है और कहा है कि उसके सामने और रास्ता ही क्या था?
मित्रों,तो क्या सचमुच श्वेता के सामने जिस्म बेचने के अलावा धनार्जन का और कोई रास्ता नहीं बचा था? क्या फिल्मी हीरोइनों के सामने हमेशा दो ही विकल्प होते हैं कि या तो वह फिल्मों में काम करे या फिर वेश्यावृत्ति करे? मैं नहीं मानता कि यह सच है। कोई भी अभिनेत्री अन्य महिलाओं की तरह ही बहुत सारे अन्य काम भी कर सकती हैं। अभिनय के लिए टीवी की विशाल दुनिया है तो वहीं फैशन,मॉडलिंग,ब्यूटी पार्लर,बूटिक,भोजनालय,रेस्टोरेंट,शिक्षण आदि बहुत सारे ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें अभिनेत्रियाँ हाथ आजमा सकती हैं और ईज्जत के साथ पैसे कमा सकती हैं। लेकिन यहाँ कठोर संघर्ष करना पड़ेगा और एटीएम मशीन की तरह झटपट हाथों में पैसा नहीं आएगा।
मित्रों,हमारी युवा पीढ़ी के साथ सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि उनके पास धैर्य नहीं है। वे चाहते हैं कि पलक झपकते ही उनका बैंक अकाउंट पैसों से लबालब भर जाए। जबकि ऐसा कहानियों में तो संभव है लेकिन हकीकत में नहीं। मैंने वर्षों पहले अमेरिकन पॉप स्टार मैडोना जो हमारी कई हिन्दी फिल्म अभिनेत्रियों की घोषित आदर्श हैं का इंटरव्यू कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब न्यूयार्क आने के बाद उनके पास पैसे नहीं थे तब उसने नौकरी नहीं खोजी थी बल्कि वासना के सौदागर को खोजा था और अपनी अस्मत बेचकर गुजारा किया था।
मित्रों,ऐसा यूरोप और अमेरिका की महिलाओं के लिए तो सही हो सकता है लेकिन भारत की स्त्रियों से हम ऐसी अपेक्षा नहीं रख सकते। बल्कि भारत की संस्कृति तो स्त्रियों से यह अपेक्षा रखती है कि उसे चाहे कितने भी कष्ट क्यों न उठाना पड़े अपनी ईज्जत और अपने सम्मान को बचाए। मैडोना और सनी लियोन श्वेता बसु,साक्षी तंवर या दीपिका पादुकोण जैसी विदेशी मानसिकतावाली महिलाओं के लिए तो उनका आदर्श हो सकती हैं लेकिन भारत की एक आम औरत के लिए नहीं। हरगिज नहीं।। भारत में प्राचीन काल से ही कौमार्य की अंतर्राष्ट्रीय नीलामी करने की परंपरा नहीं रही है बल्कि जान देकर भी उसकी रक्षा करने वाली पद्मिनियों के जौहर की प्रथा रही है और यही भारतीयता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)