Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

23.7.08

खत्म हुआ जेजे का गैंग

जगजीवन परिहार उर्फ जेजे गैंग अब पूरी तरह से खुर्द-बुर्द हो गया है। ग्वालियर पुलिस ने सोमवार यानी 21 जुलाई की रात मुठभेड़ में मारे जा चुके दस्यु सरगना जगजीवन परिहार के दो साथियों को पकड़ लिया। यह दोनों वेश बदलकर यूपी की रोडवेज बस से ग्वालियर आ रहे थे। दोनों डकैत 25-25 हजार के इनामी हैं। मुरैना के पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार सिंह ने बताया कि पकड़े गए दस्यु जिलेदार सिंह और लोकेंद्र सिंह निवासी मेहचंदपुर थाना सरायछोला जिला मुरैना हैं। बताया गया कि दोनों डकैत पिछले काफी दिनों से दिल्ली जाकर रहने लगे थे।

22.7.08

भड़ास का जिक्र ......

भड़ास का जिक्र रफ़्तार के दोपहर संस्करण ने अपने ब्लाग रिव्यू में कुछ इस तरह करा है जरा देखिये तो कि क्या ये तारीफ़ है या निंदा या बस एक समालोचना?????


हिंदी ब्लॉगजगत का सबसे 'कुख्यात' ब्लॉग है भड़ास डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम। गालीगलौज से लेकर टांग खिंचाई तक कर यहां भड़ास निकाली जाती है। इसी के चलते इसे बैन करने की मांग व कोशिश भी की गई। इधर भड़ासगी कुछ अलग रूप में सामने आई है। एक जरूरतमंद के लिए धन एकत्र करने की मुहिम इसके कुख्यातपन पर सफेद दाग ही तो है। हालांकि, सार्थक बहस की गुंजाइश भी यहां है और मन में उमड़ रही दो पंक्तियों को भी पनाह है। भड़ास कम्युनिटी ब्लॉग है। इसका लिंक है
http://bhadas.blogspot.com

वजह क्या है..

1 परमाणु करार से आने वाले 30 वर्षों में कुल आवश्यकता की अधिकतम 6 प्रतिशत बिजली ही उपलब्ध हो पाएगी
2 भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर के पूर्व निदेशक डा. पद्मनाभ कृष्णगोपाल अय्यंगर के मुताबिक हमारे पास तीस साल तक के लिए 11 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने लायक यूरेनियम मौजूद
3 डील के बाद मिलने वाले यूरेनियम से पैदा बिजली काफी महंगी होगी
4 हम परमाणु परीक्षण करने का अधिकार खो देंगे
5 करार से हमें परमाणु शक्ति का दर्जा नहीं मिलने वाला

इसके बावजूद सरकार इस करार के लिए इतनी ललायित है कि इसने अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया, इसकी वजह क्या है॥

आप सबों से राय की अपेक्षा

चलो नेता बनें

नेता तरह-तरह के होते हैं. कुछ छोटे, कुछ बड़े, तो कुछ सिर्फ नेता होते हैं. वे क्यों होते हैं, क्या करते हैं, इसका कुछ पता नहीं. वे बस होते हैं. कुछ केवल नाम के होते हैं. जैसे हर गांव में (विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार के गावों में कई सारे थानेदार, जिलेदार, हवलदार, तालुकरदार केवल नाम के होते हैं) वे ही कुछ नेता होते हैं, बस नाम के. मेरे गांव में (उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के एक गांव, नाम-सिसवा) भी ऐसे तमाम नेता हैं. कुछ की बानगी पेश है ः आग्याराम नेता. इनका काम एक जमाने में सरकार के हर फैसले के खिलाफ गांव से तीन किलोमीटर दूर झिलाही बाजार की रेलवे क्रासिंग के किनारे अनशन पर बैठना था. खुद को विनोबा भावे का शिष्य मानते हैं और अब गांव में एक गौशाला बना लिये हैं. सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर काफी मदद मिली और ३० लाख रुयये लगभग हाथ में आये. अब सरकार के किसी फैसले पर इन्हें ऐतराज नहीं होता. आराम से ५ लाख रुपये से बनी इमारत में रहते हैं. जेनरेटर, मोबाइल, फोन, टीवी और पीने के लिए गायों का दूध व खाने के लिए चारा. अब बात करते हैं आदित्य नेता की. पूरा नाम आदित्य प्रसाद शुक्ल पुत्र स्व तिलकराम शुक्ल. काम ः उत्तरप्रदेश पुलिस में होमगाडॆ. एक जमाने में गालियां देने और लोगों के सुख-दुख में काम आने के लिए (विशेषकर जिस घर में कुछ खूबसूरत लोग हों) मशहूर थे, आजकल लोगों की बुराई करने का ठेका लेते हैं. इधर की उधर करना फुट कर काम है. एक और हैं, जिनका नाम ही नेता है (असली नाम मुझे भी नहीं पता). यह सबसे अच्छे हैं. गांव में कम पाये जाते हैं. लुधियाना के किसी सिनेमा हाल में काम करते हैं और परिवार का भरण-पोषण में लगे हैं. है न अच्छी बात. काम का काम और फिल्मों की फिल्में. किसी तरह की चांय-भांय नहीं. एक हमारे पड़ोसी हैं राममणि नेता. किसी जमाने में रुपया कमाने दिल्ली गये थे. जमींदार के पोते थे, सो चाकरी कैसे करते. गांव लौटे, गन्ना विभाग में साइकिलिस्ट हो गये और आजीवन बने रहे. आजकल रिटायर हैं इसलिए खाली हैं. खाली हैं, तो कुछ करना चाहिए. करते हैं. शाम को बाजार जरूर जाते हैं. वहां अच्छी-अच्छी बातें, राजनीति की बातें, पड़ोस की बातें, गांव की बातें ....चाय और समोसे के साथ ढेर सारी बातें करते हैं. ऐसे कई और नेता हैं मेरे गांव में. पर आज संसद में जो कुछ हुआ, वह देख कर गांव के नेताओं पर अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं रही. पता नहीं कब, कौन गांव की जमीन बेच कर रुपया इकट्ठा कर ले और भरे बाजार ले जाकर कहे कि मैंने उसे दिये थे, प्रधान के पक्ष या खिलाफ वोट देने के लिए. तो भैया आज मैं बाल-बाल बचा, जो तीन-चार नेताओं तक ही पहुंचा. हालांकि फायदा बहुत है नेतागीरी में. डॉ रूपेश भैया ने आलोक की एक पोस्ट पर कमेंट दिया है कि भड़ासियों को पॉलिटिकल पार्टी बना लेनी चाहिए. मैं पहले तो सोचता था कि नेता भ्रष्ट होते हैं, पर आज पता चला नहीं उनके पास बहुत पैसा होता है. इतना कि देश की अंतरात्मा संसद तक में लहरा सकें. औऱ शर्म तो इन्हें आती ही नहीं. तो भाई हम भड़ासी भी तो बेशर्म टाइप के लोग हैं. क्यों रोज संपादक जी की झिड़की खायें, अब उठिये, चलिये, एक पोलिटिकल पार्टी बनायें...

सत्ता .... सौदा ....... सरकार ...... और सवाल ???


एक बार फिर संसद शर्मसार हुई। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र फिर से दुनिया के सामने नंगा हो कर खडा हो गया। हालांकि यह पहली बार नही की भारत की संसद में कोई शर्मिंदा कर देने वाली कोई घटना घटी हो पर जिस तरह ये सब हुआ, शायद देश हमारे नेताओं को कभी माफ़ नहीं कर पाएगा।
हुआ यह की सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान लगातार विपक्ष की ओर से सरकार पर सांसदों की खरीद फरोख्त के आरोप लगे, जिसके जवाब में प्रधानमन्त्री ने कहा की सबूत पेश करें और जवाब में भाजपा के तीन सांसद लोक सभा के अन्दर आए और पूरे देश के सामने ( लाइव ) निकाल कर रख दिए नोटों के बण्डल और चिल्ला कर कहा की ये उन्हें घूस के तौर पर दिए गए।
हो सकता है की ये रूपए उनको दिए गए हो, या फिर ना भी दिए गए हों पर दुर्भाग्य ये रहा कि ये सब देश की गरिमा की प्रतीक भारतीय संसद के अन्दर हुआ। हम सब जानते हैं कि ये सब जोड़ तोड़ होती है पर शायद कभी सोचा नही था कि ये सब टीवी पर लाइव देखने पर मिलेगा।
इधर भाजपा के सांसद अमर सिंह और अहमद पटेल पर घूस देने का आरोप लगा रहे हैं तो अमर सिंह, मुलायम सिंह और कांग्रेस सफाई देने में जुट गई है .................................... टीवी चैनलों को साल का सबसे बड़ा मसाला मिल गया है और आम आदमी परेशान है कि इन लोगों को उसने देश की रक्षा और उत्थान के लिए चुन कर भेजा है ?
अभी हाल ही में एक टीवी न्यूज़ चैनल ज्वाइन किया है और आज की बड़ी ख़बर पर लोगों का चेहरा खिला है कि आज टी आर पी का दिन है पर मेरा जी कुछ भारी हो रहा है। देख कर सोच रहा हूँ कि दुनिया शायद बहुत प्रोफेशनल हो गई है। कल के दुश्मन आज के दोस्त ....... और कल के भाई आज ..................... क्या मतलब इतना मतलबी बना देता है ?
कहीं हम सब ऐसे हो गए हैं क्या ?
क्या सच हमेशा इतना ही कड़वा होता है ?
बशीर बद्र साहब के कुछ शेर याद आ गए हैं तो रख ही देता हूँ .....
जी बहुत चाहता है सच बोलें क्या करें हौसला नहीं होता ।

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।

वो बड़े सलीके से झूठ बोलते रहे
मैं ऐतबार ना करता तो और क्या करता

कभी सोचा नहीं था कि हमारे प्रतिनिधि देश के विकास के प्रतिरोधक बन जाएँगे ........... क्या दुर्भाग्य वाकई इतना दुर्भाग्यशाली होता है ?
...................................................
मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com

क्यूँ सुकरात कोई निकलता नही hai

ज़हर कोई हंस कर निगलता नही है
क्यूँ सुकरात कोई निकलता नही है।
यूँ बैठे हैं महफिल चेहरे हजारों,
मगर दोस्त कोई भी मिलता नही है।
कुछ ऐसी है रंगत तेरी शोखियों की,
कि सूरज सहम कर निकलता नही है।
भले मोम का है दिल ये हमारा,
लगे आंच कितनी पिघलता नही है।
समंदर मैं यूँ तो हैं motee हजारों
जो हम ढूंढते हैं वो मिलता नही है।
गज़ब की कशिश है तेरी शख्शियत मैं,
पर मकबूल यूँ ही फिसलता नही है।
Maqbool

अभी तो है बाकी......

कहाँ ले चले तुम, मुझको ओ लोगों?
अभी तो मुझमे चंद साँसे हैं बाकी...
ये गैरों की महफिल है...यहाँ न कोई मेरा
ठहरो, अभी मेरे अपनों का आना है बाकी...

बहुत कुछ बताना है मुझे अपनी माँ को
पिताजी को कई किस्से सुनाना है बाकी
छोटू और पिंकी को तोहफे हैं देने
और अभी तो रूठी दिलरुबा को मनाना है बाकी........

अब वक्त नही रुकेगा तुम्हारे लिए...
उसे क्या पता क्या-क्या करना है बाकी?
नशे के वक्त क्यूँ परवाह न की अपनों की?
अभी तो उनके साथ सारा जीवन बिताना था बाकी.....

कहाँ चला गया है मेरे लाल तू?
अभी तो वो वादा निभाना था बाकी...
तूने जो किया था कि घर आऊंगा माँ मैं..
अभी तो तेरा छुट्टियों में घर आना था बाकी....

कहता था, पिताजी मुझे करना है आपके अरमानों को पूरा
आपकी जिम्मेदारियों का बोझ अपने कन्धों पर उठाना है बाकी
आज मेरे ही कन्धों पर सवार होकर जा रहा है...
क्या इस बाप को यही दिन दिखाना था बाकी?

भइया तुमने कहा था सिखाओगे फर्रे बनाना..
और अभी तो भाभी से मिलवाना था बाकी...
पिंकी को भी तोहफा अभी नही चाहिए
अभी तो राखी बंधवाना है बाकी....

करनी थी बहुत सी शिकायतें तुमसे
तुम्हे अभी और सताना था बाकी...
ले चलो मुझे भी, यूँ छोडो न तनहा
कि तुम बिन अब यहाँ रहा क्या है बाकी?

नशे ने तो चिता पर लेटा ही दिया था
अब रह गया बस जलाना है बाकी
ज़हर पी लेते हैं ख़ुद अपने ही हाथों से
और अपनों पर छोड़ जाते हैं अस्थियों का बहाना ये बाकी.....

ऋतू गुप्ता

patrakaar giraftar

APEEL
From Allahabad Press Photographer

Meri samagh mai nahin aa raha ki ise mai vidambana kahun ya Allahabad ki PATRAKAARITA ke durdin…Kal yani 21 July ko Allahabad press photographer association ke president ‘Hemant Chaudhri’ ko police ne kisi Hardcore criminal ki tarah raat ke do baje ghar se utha liya aur subah aanan-phanan main unko IPC ki dhara 253, 307,308 ke tahat court mai pesh kar Naini jail bhej diya…
Hua yoon ki Press Photographer Hemant Chaudhari apne sansthan ke kisi assignment par sham lagbhag 5:30 par Allahabad museum ki tasveer lene gaye saath mai unke Reporter bhi the…tasveer khichne ko lekar vahan guards se kuch kaha suni hui aur guards ne milkar Hemant ji ko kafi buri tarah peeta aur unka camera cheen ne ki koshish kari…kiasi tarah jan bachakar chudhari ne mobile par apne sansthan ko suchit kiya …logon ke aane tak guards wahan se gayab ho chuke the jabki police department ka ek sipahi wahan ruka raha… pahunche patrakaaron ne jab Hemant ko KHUN se lathapath dekaha to unhone mauke par mauzood sipahi ko peet diya aur Sangrahalaya ke officers ko bulane ki mang karne lage par…police aur Adhikariyon ki madhyastata main ye tay hua ki un guards ko kal talab kar unpar karyavahi ki jayegi aur Director of Allahabad museum ne sarvjanik roop se maafi bhi maangi …par raat mai mamla ulat gaya…aur Hemant ko unke ghar se kisi muzrim ki bhanti utha kar jel mai dal diya gaya…
Meri aap sab se ye apeel hain ki kripaya patrakaar biradari is mamle ko Sangan mai le aur Sangam ki is pavitra dharti par Patrakaarita ko kalnkit hone se bachayen…

बीहड़ में भिड़ गई पुलिस



राजस्थान और यूपी के बॉर्डर पर देखने वालों को एक नया तमाशा देखने मिला। अब तक बीहड़ में डकैत गिरोहों को आपस में लड़ते सुना होगा लेकिन यहां तो पुलिस ही आपस में उलझ गई। राजस्थान और यूपी के बीहड़ में डकैत कमल गुर्जर को ढूंढने गई पुलिस को कमल तो नहीं मिला अलबत्ता राजस्थान पुलिस जरूर मिल गई वह भी एसएसपी के साथ। उत्तरप्रदेश के आगरा के एसएसपी रघुवीर लाल को देख राजस्थान पुलिस की भौंहे तन गईं। होना तो यह चाहिए था कि दोनों दल गरमजोशी से मिलते लेकिन राजस्थान के एसएसपी कुछ ज्यादा ही गरम हो गए। यूपी के पुलिस बल के साथ गाली गलौज पर उतर आए। अगर यूपी का दल समझ से काम नहीं लेता तो कुछ भी हो सकता। शायद पुलिस यह मामला भी दबा जाती लेकिन पुलिस दल के साथ गए कैमरामैन ने कैमरे की आंख खोल दी और सब कुछ कैद हो गया। आपकी नजर को पेश है एक तस्वीर.....।

बीहड़ भी बांट लिया



राजस्थान के धौलपुर का बीहड़। गैंगों के लिए सुरक्षित किले की तरह है। धौलपुर के बाड़ी रोड़ पर बसई डांग थाने की सीमा के साथ ही शुरु होता है डकैतों का इलाका। इसी इलाके में डेरा डाले हुए हैं वे डकैत जिनके खौफ से इस समय दहशत है।कौन कहां-राजस्थान के धौलपुर, मध्यप्रदेश के मुरैना और उत्तरप्रदेश के आगरा जिलों से सटे चंबल के बीहड़ों में इन दिनों चार दस्यु गिरोह सक्रिय हैं। दिलचस्प यह है कि चारों ही गुर्जर हैं और इन सभी ने बीहड़ में अपने इलाके बांटे अपना इलाका घोषित कर रखा है।
बसई डांग-धौलपुर जिले के इस इलाके में रामसकल और कमल गुर्जर और राजेंद्र का गिरोह सक्रिय है।
मासलपुर-रामसकल गुर्जर गैंग का नया ठिकाना इस इलाके में बना है। कमल से मनमुटाव के बाद उसने यह स्थान चुना है।
सरमथुरा-मध्यप्रदेश के मुरैना जिले से लगने वाले राजस्थान के इस इलाके में जगन गुर्जर का हुकुम चलता है। यहां वह पत्थर खदानों के ठेकेदार से चौथ वसूलता है।यह है कमल गुर्जर का देवपुर गांव में स्थित मकान

कहावतों की दुनिया


भैये भड़ास निकालने के बाद आंचलिक कहावतों का मजा लीजिये.

21.7.08

मीडिया,पुलिस-प्रशासन,और राजनेता की डेरा मुद्दा पर संदेहास्पद भूमिका.

साह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा, सिरसा
विगत दिनों एक बार फ़िर से डेरा सच्चा सौदा विवाद के साए में रहा, चिंगारी अभी भी सुलग रही है, और अलगाववादी ताकत जानते हैं की चिंगारी को हवा कब देनी है।

डेरा विवाद ने आम जनों के मन में एक बार फ़िर से डेरा के लिए नकारात्मन सोच को बढाया है, क्यूंकि उपद्रव का कारण डेरा का भजन कीर्तन रहा और हमारे देश में धर्म कर्म की प्रधानता होते हुए भी धार्मिक कट्टरपंथ सबसे ऊपर रहा है। चाहे वो राम मन्दिर विवाद हो या धर्म परिवर्तन का मामला, मठाधीशों ने हमेशा इस पर प्रश्नचिन्ह लगाया है क्यूंकि सर्व धर्म समभाव और आपसी भाई चारा इन मठाधीशों के लिए हमेशा से ही खतरा रहा है।

हिन्दुस्तान के संविधान के मुताबिक सर्वोपरी सर्वधर्म समभाव , वसुधैव कुटुम्बकम, अतिथि देवो भावः मगर क्या ये भाव हमारे धार्मिक मठाधीशों में है।

हाल के डबवाली का ही विवाद लें , जिस प्रकार से इसे आम जनों के बीच पडोसा गया यों लगा कि डेरा एक आतंकी संस्था है और इसके अनुयायी आतंकी हैं। जबकि इसके बारे में राय रखनेवाले लोग एक विशुद्ध भारतीय कि तरह बिना जाने अपनी राय रखना शानो शौकत समझते हैं। कुछ समय पूर्व तक मेरी भी कुछ इसी ही राय डेरा के बारे में हुआ करती थी। मगर ये चर्चा बाद में।

बहरहाल डबवाली काण्ड में जिसतरह पोलिस और प्रशासन आँख मूंद कर राजनीति के गलियारों के गुरूजी को खुश करते हुए ताम झाम के साथ मूक दर्शक बने रहे वहीँ सबसे ज्यादा कमाल तो हमारे मीडिया और मीडिया मित्रों का रहा। सनसनी और उत्तेजना के साथ बिकाऊ ख़बर बनाने के लिए आपको पत्रकारिता करनी बिल्कुल जरूरी नही है, ख़बर के तह तक जाने कि कोई जरुरत नही है, टेबल रिपोर्टिंग बैठ कर फोन घुमाया राय ली और लगा दी ख़बर, आख़िर इसी कारण तो दारु और मुर्गा फ्री होता है। मुझे नही लगता कि डेरा पर रिपोर्टिंग करने वाले किसी पत्रकार ने डेरा को समझने कि कोशिश कि है। नही तो लोग ख़बरों के साथ साथ विवाद के दोनों पक्ष से भी अवगत हुए रहते।

विशेष विवरण और डेरा फ़िर लिखूंगा।

जय जय भड़ास।

भड़ास का असर रांची में

भड़ास ने रांची में अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है । हाल ही में लूमर जी ने भड़ास में रांची में खुल रहे एक टीवी चैनल में पत्रकारों पर हो रही ज्यादती और सीईओ की ग़लत नीतिओं के खिलाफ आवाज़ उठाई थी । असर यह है की चैनल के पुराने कर्मचारी सीईओ के बिरोध में खड़े हो गए हैं । इसी रविवार चैनल के पुराने और कुछ कार्यरत कर्मचारिओं ने सीईओ के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए मीटिंग कर रणनीति तय की । हलाकि सीईओ की गतिविधियाँ ज्यों की त्यों बरक़रार है । तक़रीबन हफ्ते भर पहले जनाब सीईओ ने समूह द्वारा निकाले जा रहे स्वास्थय पत्रिका की पुरी टीम को बाहर का रास्ता दिखा दिया । ये तीसरी बार है जब पत्रिका की पुरी टीम को निकाला गया है। हलाकि पत्रिका का दूसरा अंक आज तक बाज़ार में नही आ सका है । खैर भड़ास के माध्यम से आन्दोलन की नीव पर गई है , आशा है जल्द ही सीईओ साहब औकात में आ जायेंगे ।

जय हो जय हो जय जय हो भड़ास की ।

लोकतंत्र के लिए घातक

सोचें आने वाली स्तिथि पर


इस(डील की) लड़ाई में एक टिप्पणी की याचना है

मैं आप सभी से इस पोस्ट पर टिप्पणी का दान मांग रहा हूं.


मामला दरअसल सरकार ही नहीं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का है. परमाणु डील से शुरू हुई लड़ाई अब राजनीतिक स्वार्थ का रूप ले चुकी है. जो जहां अवसर पा रहा है वहीं बिक रहा है. जिसे अवसर मिल रहा है वह खरीद रहा है. खरीदने और बिकने वाले कोई और नहीं लोकतंत्र के वे नुमाइंदे हैं जो हमारी ही गलती से वहां तक पहुंचे हैं जहां पहुंचने का मेरी नजर में कोई हकदार नहीं है. न तो इन्हे लोकतंत्र की मर्यादा का ज्ञान है न ही उन्हें उस मुद्दे की ही जानकारी है जिस पर लड़ाई हो रही है.
परमाणु करार से यह नुकसान है ... इस करार से यह फायदा है... दिनभर इसका राग तो वे अलाप रहे हैं लेकिन उन्हें यही जानकारी नहीं है कि परमाणु करार है क्या?
इनसे हालांकि उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए लेकिन इनकी हरकते देख कर तो मैं शर्मशार हो ही रहा हूं कि इनके दम पर हम भविष्य में भारत को महाशक्ति का दर्जा दिलाने का स्वप्न देख रहे हैं. इनसे बेहतर तो सड़ी लाशों में बिलबिलाने वाले वे कीड़े हैं जिन्हे यह जानकारी होती है कि कौन सी लाश सड़ी है और कौन नहीं. लेकिन हमारे ने नेता तो यह भी नहीं जानते कि कौन से और किस मामले में उन्हें बिलबिलाना है. हत्यारे और अपराधी देश की दिशा तय कर रहे हैं. अनपढ़ों की फौज हाइड एक्ट पर रटारटाया बयान दे रही हैं...
इन्हें टीवी स्क्रीन पर देख कर व अखबारों में पढ़कर तो इनके बारे में घिन आ रही है. एक चैनल का वह प्रश्न जिसमें सांसदों से यह पूछा गया कि एटमी डील क्या है? उनके जवाब सुनकर शायद बुद्धिजीवी तो कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं है.

इसलिये सभी से निवेदन है इस मुद्दे पर कुछ न कुछ तो टिप्पणी लिखें. जरूर यह आवाज ज्यादा दूर तक नहीं जाएगी लेकिन जहां भी जाएगी अपनी धमक तो सुना कर ही रहेगी.

खोखचे में ले खोखचे में


टशन फिल्म में अक्षय कुमार का यह डायलाग हर लोगों के जुबां पर सुनाई पड़ता है, कुछ ऐसा ही नजारा हमारे यूपीए व विपक्षी पार्टियों के नेताओं के मुंह में सुना जा रहा है। 272 के जादुई आंकड़े को छूने के चक्कर में दोनों की तरफ से सांसदों को जुटाकर खोखचे में लेने की कवायद चल रही है, लेकिन इसका खुलासा कल ही हो जाएगा कि किसके खोखचे में कितने आदमी जुटे हैं। इस उठापठक को लेकर पिछले एक हफ्ते से मीडिया के उच्च पदों पर आसीन लोगों के माथे पर भी चिंता की लकीरें देखी जा रही हैं। रही बात मीडिया में खबरों की तो सभी चैनल वाले और अखबार वाले अपने-अपने हिसाब से पल-पल की जानकारी दे रहे हैं। वैसे हमारी जनता को सरकार कोई भी रहे कोई फ्रर्क नहीं पड़ता है, फिर भी जब बात सरकार के गिरने या बनने की आती है तो गली-मोहल्ले से लेकर शहर की सड़कों में एक ही चर्चा सुनाई पड़ती है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी।

इस तरह की सुगबुगाहट को देखकर मुझे अपना बचपन याद आता है। जहां पऱधानी चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव में लोग आपस में बहस करते थे। बहस करते-करते बात इतनी बढ़ जाती थी कि मारपीट तक की नौबत आ जाती थी। राजनीति के इस खेल में आखिर जनता का क्या सरोकार। सरकार चाहे कोई भी आए न तो महंगाई कम कर सकती है और न ही बिजली समस्या से छुटकारा दिला सकती है।

हां हम बात कर रहे थे कि क्या यूपीए सरकार विश्वासमत हासिल कर पाएगी। रविवार रात तक की जो स्थिति बनी उससे यही लग रहा था कि यूपीए सरकार पर विपक्ष कहीं न कहीं भारी पड़ रहा है, लेकिन जब जादुई आंकड़े की बात की जाएगी तो न जाने किसके खोखचे में ज्यादा सांसद आ गिरें।

आखिर खेल

रविवार देर रात तक जो आंकड़े सामने आए हैं उसमें यूपीए के पास 266 और लेफ्ट के पास 264 सांसद थे और दस उहापोह की स्थिति में थे। ये दस उहापोही ही तय करेंगे कि सरकार के सिर पर ताज होगा या नहीं। इस तरह से एक-एक सांसद और एक-एक वोट इतना कीमती हो गया है कि उसकी कीमत करोड़ों-करोड़ों में आंकी जा रही है। लगता ये है कि जितना दाम उतना काम।

आपको क्या लगता है कि सरकार बच पाएगी। विपक्ष क्या यूपीए पर भारी पड़ पाएगा। आखिर इस जादुई आंकड़े में माया का क्या रोल रहेगा।

20.7.08

दर्द

दर्द का सैलाब सीने मे मुस्कुराने से कम कब हुआ है
हजारो जुगनुओ के जलने से भी अँधेरा कम कब हुआ है

वे दो रास्ते

घर से दफ्तर आने के दो रास्ते हैं. एक रास्ते का प्रयोग रोज करता हूं. दूसरे रास्ते का प्रयोग केवल रविवार को. जिस बस से रोज कार्यालय आता हूं, वह रविवार को बंद रहती है. दूसरी बस दूसरे रास्ते से आती है. आइये पहले पहले रास्ते की बात करें. पहले रास्ते पर एक फ्लाईओवर पड़ता है. फ्लाईओवर के नीचे से बस आती है. फ्लाईओवर के नीचे दूसरी ओर अन्य बड़े शहरों (लोग कहते हैं, पर कलकत्ता बड़ा शहर बन रहा है, अभी नहीं है) की तरह कुछ लोग रहते हैं. प्लास्टिक की चादरें तान कर बड़े बिंदास अंदाज में सोते दिखते हैं उन घरों के अधिकतर पुरुष. शायद निगम के पानी आपूर्ति के समय की बदौलत जिस समय मेरी बस वहां से गुजरती है, उसी समय वहां लगे नल पर बड़ी संख्या में उन प्लास्टिक के घरों में रहनेवाली कुछ महिलाएं और लड़कियां नहा रही होती हैं. हालांकि वे काफी कोशिश करती हैं कि शरीर का अधिकांश हिस्सा ढका रहे, पर ... पहले मेरी दिलचस्पी उन महिलाओं और लड़कियों में हुआ करती थी. आजकल बस के यात्रियों पर नजर रहती है. देखता हूं कि जैसे कभी मैं उन महिलाओं को घूर-घूर कर ताका करता था, वैसे ही बस के अधिकतर पुरुष यात्री ताकते हैं. बस में सवार महिला यात्री एक बार उधर नजर डालती हैं और फिर नाक-भौं सिकोड़ कर कहीं और देखने लगती हैं.
आइये अब बात करें दूसरे रास्ते की. जो लोग दिल्ली के रोज गार्डेन के बारे में जानते हैं, उन्हें कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल की बाबत बताने की जरूरत नहीं. कभी महारानी विक्टोरिया के स्वागत के लिए बनायी गयी इस इमारत का पार्क अब प्रेमी जोड़ों के मिलन का या यूं कहें थोड़ी-बहुत शारीरिक गरमी (रोज गार्डेन की स्थिति और दयनीय है, विशेषकर शाम को) दूर करने का अड्डा बन गया है. हां, तो रविवार को मेरी बस उसी विक्टोरिया पार्क के किनारे से गुजरती है. आज देखता हूं कि एकदम सड़क के किनारे पार्क में लगे एक वृक्ष और बाउंड्री के बीच एक जोड़ा खड़ा है. लड़का सड़क की ओर देख कर हिचक रहा था और लड़की उससे सटी जा रही थी..........और बहुत कुछ. बस........

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान

एक थे नेता जी वो ग़लत काम करते थे। आतंकियों को मॉल देना उन्हें शरण देना उनकी दिनचर्या में शामिल था. एक दिन एक युवक को जोश आया और उसने नेता जी को मार डाला बस क्या था नेता जी अमर हो गए. और सौभाग्य बस नेता जी जब मूर्ती गांव में लगी और उनके आत्मशांति के लिए गांव वाले एकत्रित हुए तो उस युवक को ही उन्हें माल्यार्पण करने का मौका मिला. पता है उस युवक ने क्या किया. नेता जी को माला पहनते हुए कहा की ये जनता है इसकी यादास्त कमज़ोर है. आज माला पहनते हुए सब ताली बजा रहे हैं. पर कल आपकी इस प्रतिमा पर चिडिया और कबूतर अपना डेरा ज़मायेंगे और इस मूर्ती का इस्तेमाल अपने टॉयलेट के लिए करेंगे. यही नही तब कोई इस जनता के बीच से निकलकर इसकी सफाई करने नही आयेगा. आपको बता दूँ ये कहानी मैंने एक फ़िल्म में घटती देखी है. पर अब समझ में आ रहा है की ये नेता और जनता का नाता कितना पुराना है. कोई रैली हुयी तो जनता कुकुरमुत्ते की तरह किसी शहर की व्यवस्था चौपट करने पहुँच जाती है. उसे भी पता है की नेता जी किसी विपक्ष के नेता को गली देंगे और उस पर ताली बजाना है. मूंगफली वाले की मूंगफली छीनकर खाते हैं किसी फल वाले को पीटकर उसका फल खा जाते हैं और नेता जी की रैली को सफल बनाकर घर वापस आ जाते हैं. ये है हमारे देश की राजनीति जिसमे १०० भ्रस्ट नेता चुनाव ने खड़े होते हैं जनता को उसमे से एक सबसे अच्छे भ्रस्ट नेता को चुनना होता है. यहाँ के लचर कानून के कारन बहुत से नेता जी तो जेल में ही रहकर चुनाव जीत जाते हैं. सभी को पता है इनसे देश का उद्वार नही होने वाला पर किसे इसकी परवाह है. किसी भी तरह से पैसे बनने के लिए देश को गर्त में धकेलते जा रहे हैं. अब आज कल चल रहे राजनीतिक उठापठक को ही देख लीजिये जनता द्वारा देश की विकास के लिए तैयार नेता जी लोग संसद में अपनी मंदी लगाये बैठे हैं और अपनी कीमत फिक्स करने के बजाय जितना अधिक मिल जाए उसके आसरे बैठे हैं. मुझे तो लगता है की क्यूँ ना हम एक बार देश की तकदीर बदलने के लिए सामने आयें इस बिकावू राजनीति को दूर करके स्वस्थ भारत का निर्माण करें क्यूंकि युवा ताकत ही ऐसा कर सकती है, अब कब तक भगवान के पास जाने को तैयार ख़त्म हो चुके निर्बल लोग इस देश का भविष्य तय करेंगे.
अमित द्विवेदी

कुछ काम करो


यशवन्तजी, आपका आभार,

दे दिया मुझे भी भड़ास का हथियार ।

लीक से हटकर लिखने का मौका मिलेगा,

जो सच्चे हैं उनका दिल खिलेगा ।

जो बहाव के खिलाफ न चल पायेंगे,

वे बिना नाम के विदा हो जायेंगे।

इसीलिए कहता हूँ कुछ काम करो,

कुछ काम करो, कुछ काम करो।

डाक्टर भानु प्रताप सिंह, आगरा

बहन

पहले मेरी बहन को एक घंटा लगता था
साड़ी पहननें मैं
पहननें के बाद भी
ठीक होती ही रहती थी जब तक .............
कितना चिढ़ती थी
मेरे चिढ़ाने पर और
प्रसन्न होते थे घर वाले यह देख कर
मगर फिर आधा घंटा
पन्द्रह मिनट
अंततः झटपट
अब भी मैं चिढ़ाता हूँ
पर अब वह नहीं चिढ़ती वह
वरंच हंसती है
सूखे होठो पर जबरन
ओढ़ी गई हँसी
फँस जाती है मेरे भीतर तक

सबकुछ कल पर नहीं टाला जा सकता








डॉ भारती कश्यप

सीइओ द कश्यप मेमोरियल आइ हॉस्पीटल

राज्य गठन के आठ साल पूरे होने को हैं। नवसृजित राज्य ने अपने रास्ते में कई उतार-चढाव देखे। इस पूरे कालखंड में कई सपने साकार हुए, तो कई बिखरे भी। पेशे से मैं एक डॉक्टर हूं. समाज के हर तबके, हर वर्ग से अपने प्रोफेशन की बदौलत रिश्ता बनता चला जाता है। समाज के अमीर-गरीब सबकी मनोभावना, आकांक्षा और फिर पीडा अनुभव करती हूं। निःसदेंह यहां के लोगों के भी सपने हैं।राज्य की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। यानी इस आधी आबादी के गुजर-बसर का संकट है। रोटी, कपडा और मकान जैसे मौलिक चीजों के लिए यह वर्ग संघर्ष करते जीवन काट रहा है। ऐसे में आप यह मानकर चलें कि समाज ये वंचित लोग अपने बूते अपनी स्वास्थ्य की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते। अपने ईलाज के लिए अस्पतालों तक नहीं आ सकते हैं। इनके पास संसाधन नहीं हैं, पैसे नहीं हैं, जिससे ये सरकार या फिर निजी क्षेत्र की सेवाएं ले सके। बीमार एवं कुपोषित जिंदगी अभाव में ही कट जाती है। ऐसे में आप बिना इनकी जिंदगी को संवारे और बिना स्वस्थ बनाये एक सबल राज्य की कल्पना भी नहीं कर सकते। राज्य की ये पूरी आबादी मायने रखती है। इनको नजरअंदाज कर हम आगे बढ ही नहीं सकते हैं। समाज के ऐसे लोगों तक जबतक सरकार की सेवाएं नहीं पहुंचेंगी, इनके चौखट तक समाधान नहीं पहुंचेंगी, तबतक राज्य स्वस्थ नहीं बन सकता है। बीमारियों से अपने घर-गांव में लडते ये लोग न विकास की धारा से जुड सकते हैं और न हीं विकास के सहभागी बन सकते हैं। जाहिर सी बात है, हेल्दी स्टेट में ही विकास की सभी अवधारणाएं लागू होते हैं। जिनकी आंखों में रौशनी नहीं है, उनको आप लंबी चौडी सडकें, बडी इमारतें और मेगा मॉल का सपना नहीं दिखा सकते हैं. जो चलने के काबिल नहीं है, उन्हें आप इन सडकों को देकर कुछ भी हासिल नहीं कर रहे हैं। हमें पहले समाज के इन तबकों के बीच पहुंचना होगा। स्वास्थ्य की इनकी जरूरतों को बडे शहरों में सरकारी अस्पताल खोलकर, यहां मशीनें-उपकरणें लगाकर पूरा नहीं किया जा सकता है। आज जबकि सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं हैं, अस्पतालों की कमी है, डॉक्टर प्रर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में तो इनको अपनी कल की योजनाओं पर छोड भी नहीं सकते। किसी भी राज्य सरकार को अस्पतालों का जाल-बिछाने, मेडिकल कॉलेज खोलने और फिर डॉक्टर तैयार करने में कम से कम आठ से दस साल लग जायेंगे। अगर तेजी से भी काम हो, तो इन आठ से दस सालों के लिए ऐसे गरीब लोगों को चंद अस्पतालों और कुछ डॉक्टरों के भरोसे नहीं छोडा जा सकता है। सबकुछ कल पर नहीं टाला जा सकता है। ऐसे में उन निजी अस्पतालों को भी आगे लाना होगा, जिन्होंने अच्छे संसाधान जुटाये हैं और उससे बढकर समाज को कुछ देने का जज्बा भी रखते हैं।

19.7.08

Rang...


Gilloo.....Bachpan mai Mahadevi ji ki kahani se pyaar ho gaya tha kyun ?? nahin janta tha par Gilloo aksar sapne me milta...Aa wohi pakad mai aaya to ....kash mere paas bhi ek hota waisa hi...

Mere man ka Vikar kahen ya Vikriti...Sangam main lag gayi AAG....us din....

करार उवाच

राजनीति में तर्क और सिद्धांत अपनी जरूरत के मुताबिक किस तरह गढ़े जाते हैं , वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य इसकी मिशाल है । २२जुलाइ को संसद में जहाँ भाजपा परमाणु करार का विरोध करते हुए सरकार को गिराने में कोई कोर कसर नही छोड़ना चाहेगी वहीं अन्य दल भी अपने राजनैतिक नफे नुकसान को ध्यान में रखते हुए अपना रुख तय करेंगे । इस विश्वास मत में जीत हार किसी की भी हो लेकिन अहम् सवाल यह है की परमाणु करार के इस संवेदनशील और गंभीर मसले पर जिस तरह की चर्चा संसद में होनी चाहिए थी क्या वह हुई ? विडम्बना ही है की जिस भाजपा ने इस समझौते की नींव रखीथी वही इस समझौते को विफल करने में अपनी सारी ताकत झोंक रही है । परमाणुकरार का यह मुद्दा विमर्श से दूर जाकर राजनैतिक अहं की लडाई का केन्द्र बिन्दु बन गया है।
दीपेन्द्र

आज की शाम मेरे पापा के नाम

पापा मेरे पापा
करती हूँ आपसे प्यार बहुत
पर कह नही मैं पाती हूँ
कहूँ भी तो कैसे कहूँ ?
कर नहीं पाई हूँ अभी तक
आपके उन सपनो को पूरा
जो देखे थे आपने मेरे लिए
जानती हूँ की
मन ही मन दुखी
हैं आप मेरे लिए
देखा है मैंने
उस दुःख ,उस दर्द को
टूट गए हैं मेरी विफलताओं से आप
फिर भी मुस्कुराते हैं की कहीं
मैं भी न टूट जाऊं
पापा मेरा वायदा है आपसे आज
नहीं टूटने दूंगी
आपकी उमीदों को ,आशाओं को
क्यूंकि देखा है मैंने हमेशा
आपकी मेहनत ,आपकी हिम्मत को
न दिन का चैन ,न रात ही आराम किया
आठों पहर बस
हमारे लिए ही काम किया .
देखा है मैंने
उस चमक को
आपकी आंखो मैं आते हुए
जब भी मैं पास होती थी
और उन आँसुओ को भी
जब मैं बीमार पड़ती थी
मुझे याद है हर लम्हा , हर वो पल
जब आप मेरे साथ खड़े थे .
कभी डांटना ,कभी मनाना ,
कभी हँसाना ,कभी रुलाना
और फिर अपने हाथों से खाना खिलाना
हाँ पापा सब याद है मुझे
पूरी कोशिश करुँगी ,करती रहूँगी
आपके सपनों को पूरा करने की
जो देखे थे आपने मेरे लिए
पर अगर पास न हो पाऊं तो
दुखी न होना
भले ही मैं कुछ बन न पाऊं
पर जिंदगी का जो पाठ
आपने मुझे पढाया है
नहीं भूलूंगी उसे कभी
और उसी के बल
एक अच्छा इंसान बन जरुर दिखाउंगी
न छोडूगी साथ आपका जीवन भर
लाठी की जगह आपका सहारा
मैं बन जाऊँगी
न होने दूँगी आपका बुढापा नीरस
फिर से आपकी वही छोटी सी गुड़िया
मैं बन जाऊँगी .
और एक अच्छी बेटी होने के
सारे फ़र्ज़ निभाऊँगी

राजस्थान में फैला एक साहित्यिक विवाद : अखबारों में खिंचाई

राजस्थान में इन दिनों एक साहित्यिक विवाद ज़बरदस्त रूप से फैला हुआ है। आप जानते ही हैं कि राजस्थान साहित्य अकादेमी यहाँ एक वैद्य महिला डॉ अजित गुप्ता की अध्यक्षता में नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। इन कीर्तिमानों के कारण अकादेमी की 'सरस्वती सभा' से दो सदस्य लक्ष्मीनारायण नंदवाना और रजनी कुलश्रेष्ठ इस्तीफा दे चुके हैं। इन दिनों छाया विवाद अकादेमी द्वारा पुरस्कारों के सम्बन्ध में लिए गए कुछ निर्णयों को लेकर है। अकादेमी के जिन निर्णयों को लेकर विवाद और बहस है, वो संक्षेप में इस प्रकार हैं...
१- साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिए जाने वाला 'प्रकाश जैन पुरस्कार' अकादेमी द्वारा बंद कर दिया गया है। हिन्दी साहित्य की ऐतिहासिक साहित्यिक पत्रिका 'लहर' के सम्पादक स्वप्रकाश जैन की स्मृति के साथ यह निंदनीय और कुत्सित प्रयास है, जिसकी प्रदेश के तमाम लेखकों ने निंदा की है।
२- भारतीय भाषाओं से प्रदेश के लेखकों द्वारा किए जाने वाले अनुवाद पर दिया जाने वाला 'अन्तर-प्रांतीय बंधुत्व पुरस्कार' भी अकादेमी ने बंद कर दिया है।
३- सिन्धी और हिन्दी के कथाकार भगवान अटलानी तथा एक अनाम लेखिका सरला अग्रवाल से कुछ लाख रुपये लेकर अकादेमी ने उनके नाम पर दो नए पुरस्कार शुरू किए हैं।
४- 'गीता प्रेस' गोरखपुर वाले स्व हनुमान प्रसाद पोद्दार और स्व डॉ लक्ष्मी मल सिंघवी के नाम पर दो नए सम्मान प्रारम्भ किए हैं। ये नए सम्मान अकादेमी द्वारा दिए जाने वाले 'साहित्य मनीषी' सम्मान के अतिरिक्त होंगे, इनकी राशि इक्यावन हज़ार रुपये है। सिंघवी जी के नाम पर सम्मान 'अंतर्राष्ट्रीय' स्तर का होगा।

जयपुर से दैनिक भास्कर में सबसे पहले इस लेखक ने अकादेमी के निर्णयों की आलोचना करते हुए लेख लिखा था जो अब लगभग एक महीने से बहस का रूप ले चुका है। सिवाय छिटपुट लेखकों के सभी लेखकों ने इन निर्णयों की भर्त्सना की है। आज 'हिंदुस्तान टाईम्स' के जयपुर परिशिष्ट में एक और लेखक ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी है। इसके जवाब में एक लेखक ने अपना नाम ना उजागर करने की शर्त पर अपनी टिपण्णी भेजी है, उसे यहाँ जस का तस् दे रहे हैं। उम्मीद है गंभीर, लेखक, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी राजस्थान साहित्य अकादेमी की इस गैर साहित्यिक कारगुजारी पर अपनी भावनाएं व्यक्त करेंगे। तो लीजिये पेश है, वो टिपण्णी...

अंग्रेज़ी अखबार आम तौर पर हिन्दी और हिन्दी साहित्य सम्बन्धी खबरों वगैरह से दूरी ही बनाए रखते हैं. उन्हें शायद लगता हो कि हिन्दी का किसी भी तरह का प्रवेश उनके आभिजात्य को क्षति पहुंचाएगा. लेकिन कभी-कभी वे अपनी नीति में कुछ शिथिलता बरतते हुए हिन्दी विषयक सामग्री भी दे देते हैं. आज(19 जुलाई, 2008) हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपने जयपुर परिशिष्ट एच टी जयपुर लाइव में ऐसा ही किया है. इसने अपने तीसरे पन्ने पर एक आलेख छापा है जिसका शीर्षक है ‘लिटरेरी राउ क्लाउड्स राजस्थान साहित्य अकादमी’ यानि राजस्थान साहित्य अकादमी पर छाया साहित्यिक विवाद. इसके लेखक कोई डॉ मनोज प्रभाकर हैं जिनके परिचय में कहा गया है कि वे दो दशकों तक राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा और संचालिका के सदस्य रहे हैं. आलेख के साथ जो चित्र छपा है वह एक अन्य सुपरिचित लेखक का है.

अब अंग्रेज़ी अखबार जब हिन्दी की खोज खबर लेते हैं तो घपला तो होना ही है. इसलिए कि ज़्यादातर अंग्रेज़ी अखबार वाले हिन्दी लेखकों से अपरिचित हैं.

लेखक (जो भी हो, नाम वाला या चित्र वाला) ने इस आलेख में राजस्थान में चल रहे साहित्यिक विवाद का परिचय देते हुए दो तीन गौर-तलब बातें कही हैं. उन्होंने एक तो यह कहा है कि राजस्थान साहित्य अकादमी साहित्यिक पत्रकारिता के लिए जो पुरस्कार दे रही थी वह केवल पत्रिकाओं तक ही सीमित था. उनका कहना है कि यह पुरस्कार उन लोगों को भी दिया जाना चाहिए था जिन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में योगदान दिया. यह लिखते हुए निश्चय ही उनके जेह्न में कुछ नाम होंगे, जिन्हें यह पुरस्कार मिल सकता था.

लहर की चर्चा करते हुए इन्होंने कहा है कि इस पत्रिका ने साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने लिए जगह बनाई, लेकिन कुछ ‘सायकोफैण्ट्स’ (आलेख में यही शब्द प्रयुक्त किया गया है) जिस तरह इस पत्रिका का गुणानुवाद कर रहे हैं, वह उचित नहीं है. निश्चय ही लेखक का इशारा हिन्दी समाचर पत्रों में इधर छपे अनेक आलेखों, वक्तव्यों और टिप्पणियों की तरफ है जिनमें लहर के साहित्यिक योगदान को स्मरण करते हुए इसके सम्पादक प्रकाश जैन के नाम पर दिए जा रहे पुरस्कार को बन्द करने की भर्सना की गई थी. लेख में यह नहीं बताया गया है कि साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में जगह बनाने वाली पत्रिका (या उसके सम्पादक) का गुणानुवाद कैसे किया जाना चाहिए?

लेखक ने, घनघोर चालाकी का परिचय देते हुए कहा है कि अगर सहित्यिक पत्रकारिता के लिए कोई पुरस्कार दिया ही जाना है तो उसका नाम बदलकर चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, राम निवास शर्मा या हरिभाउ उपाध्याय पुरस्कार किया जाना चाहिए. लगता है कि इस लेखक को प्रकाश जैन के नाम से कोई एलर्जी है, वर्ना यह तर्क पद्धति नहीं अपनाई जाती. भाई आप कह चुके हैं कि लहर ने अपने लिए जगह बनाई थी, तो फिर यह नया सुझाव क्यों? अगर नाम बदलना इतना ही प्रिय है तो बेहतर होता कि अकादमी के सारे ही पुरस्कारों के नाम बदलने के सुझाव दे दिए गए होते. लेकिन, वह तो लेखक का अभिप्रेत है नहीं.

हिडन एजेण्डा इसी को कहते हैं.

अकादमी ने दो नए पुरस्कार निजी राशि से शुरू किए हैं. उनकी चर्चा करते हुए यहां बताया गया है कि एक पुरस्कार जयपुर के लेखक भगवान अटलानी की तरफ से और दूसरा ‘वन सरला अग्रवाल ऑफ कोटा’ (कोटा की किन्हीं सरला अग्रवाल) की तरफ से दिया जाना तै हुआ है. ज़ाहिर है, दूसरे नाम को लेखक कहने में खुद इस टिप्पणीकार को भी संकोच महसूस हुआ है, वर्ना दोनों को एक साथ लेखक कहा जा सकता था. दूसरे नाम के साथ ‘वन’ का प्रयोग उनकी लेखकीय पहचान न होना द्योतित करता है. टिप्पणीकार ने पुरस्कारों के क्षेत्र में इस निजी सहभागिता के सन्दर्भ में कहा है कि ‘ अ मेजोरिटी ऑफ आर्टिस्ट्स एण्डोर्स दिस डिसीसन’. यह समझना मुश्क़िल है कि अगर बहुसंख्यक कलाकार इस निर्णय का समर्थन कर ही रहे हैं तो टिप्पणीकार को इसकी वक़ालत करने की क्या ज़रूरत आन पडी?

अंत में टिप्पणीकर ने एक बडी भली सलाह दी है, कि इस विवाद को ज़्यादा नहीं खींचा जाए. कोई उनसे पूछे कि क्यों? अगर कुछ गलत है तो उसे गलत क्यों न कहा जाए और उसका विरोध क्यों न किया जाए? टिप्पणीकार ने अकादमी को एक सदाशयतापूर्ण सलाह दी है कि वह इस विवाद को सुलझाने के लिए कुछ ‘नोलेजेबल’ लेखकों से अनुरोध करे कि वे अकादमी की संचालिका के बैठक में उपस्थित होकर चर्चा को आगे बढाएं और विवाद का हल ढूंढे. कहीं इसकी व्यंजना यह तो नहीं कि अभी अकादमी की संचालिका में जो हैं, वे नोलेजेबल नहीं हैं. समझने वालों को समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि जब यह टिप्पणीकार ‘नोलेजेबल’ लेखक की बात कर रहा है तो वह उन्हें ज़्यादा दूर जाकर तलाश करने की जेहमत नहीं देना चाहेगा. जब इतना नोलेजेबल लेखक खुद कह रहा है तो... और हां, अगर अकादमी साहित्यिक पत्रकारित में योगदान देने के लिए भी कोई पुरस्कार देना चाहे तो उसे ज़्यादा सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है, वर्ना हम कहेंगे कि घर में छोरा और गांव में ढिंढोरा!

---नाम में क्या रखा है?

सुनामी पर लिखी थी


इस राख में शरार* अभी बाकी है,
दुःख की रात है, सवेरा होना अभी बाकी है,
ऐ खुदा तू हार गया इतनी ताकत दिखा के भी,
समँदर पार बस्तिया अभी बाकी है,
टूट गये है सारे मुसाफिर सफ़र में,
उन मुसाफिरो में गुबार अभी बाकी है,
खुशी और ग़म के रैलों में,ग़म आ गये,
खुशी का इंतज़ार अभी बाकी है,
तेरी ताक़त हमने देखी ऐ खुदा,
हमारी हिम्मत दिखाना तो अभी बाकी है .
शरार*= चिंगारी

बी पी एन टाईम्स की लौन्चिंग २० जुलाई को


बी पी एन टाईम्स की लौन्चिंग २० जुलाई को शाम ७ बजे LNIPE के सभागार में स्वामी अवधेशानंद जी महाराज के मुख्या आथित्य में एक भव्य समारोह में होने जा रही है ! बी पी एम् टाईम्स के संपादक बालेन्दु मिश्र के अनुसार बी पी एन टाईम्स की टैग लाइन " सच का पहरेदार " को साथ लेकर ये अखवार ग्वालियर चम्बल हलचल में एक नई पहचान देगा !

करुनाकर हमारा मिशन है..

श्री आर. पी. गोयल साहब का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ ! गोयल साहब आप जैसे इंसानों से ही इंसानियत जिंदा है ! ये अपील करना चाहूँगा की इस होनहार बालक कोअभी भी हम लोगो की मदद की जरुरत लगेगी ! एक तो करुणाकर बड़ा ही आत्म विश्वासी है दुसरे डा.श्रीवास्तव जी की दवाइयों का कमाल है ! इस जंग को करुनाकर अवश्य ही जीतेगा ! पर आपका सहयोग और आशीर्वाद भी उतना ही जरुरी है ! जैसा की सबको मालुम है इस रोग की दवाइयाँ काफी महंगी है ! मुझे पता चला है की इसकी दवाएं हीरे (असली) एवं मोती से बनती हैं ! जो की बहुत बहुत ही महंगीपड़ती हैं ! डाक्टर श्रीवास्तव जी बड़ी मेहनत से बनवा रहे होंगे !इसीलिए करुणाकर को आराम आता जा रहा है ! ईश्वर डाक्टरसाहब की मेहनत और आप लोगों के आशीर्वाद को अवश्यसफल करेगा ! पर हमको ये भी नही भूलना है की इस कार्यमें सफलता के लिए सतत धन की भी उतनी ही आवश्यक्ताहै ! मैं पुन: श्री गोयल जी एवं सभी सहायता कराने वालों को धन्यवाद देता हूँ और पुन: सभी से निवेदन करता हूँ कीआप यथा सम्भव मदद करें , जिससे ये मिशन जो हम भड़ासियों ने शुरू किया है वह सफल हो और एक अनुकरनिय उदाहरण हम दुनिया के सामने रख सके !साथियों ये मत भूलना की ये हमारा मिशन है और जो भी इस तरह का कार्य आयेगा उसको हम सब मिल कर पूरा करते रहेंगे ! जय जय भडास !






सह योग परम आवश्यक है !

18.7.08

एक्स चेयरमैन स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने दिया पाँच हज़ार का सहयोग

करुणाकर के खाते में एक्स चेयरमैन ऑफ़ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया मिस्टर आरपी गोयल ने दिया ज़मा करवाया पाँच हज़ार रूपया. गोयल जी ने karunakar की स्टोरी के बारे में मुंबई के एक अखबार में पढा. उन्होंने भड़ास की इस मुहिम की ज़मकर सराहना की. उन्होंने करुणाकर के जल्द स्वस्थ होने की कामना की है. उन्होंने और लोगों को भी करुणाकर की मदद करने को सामने आने को कहा है.

व्हिप बनाम फतवा .......!

व्हिप बनाम फतवा .......! वे फतवे के सख्त विरोधी हैं . उनका मानना है कि कुंद बुद्धि लोग ही फतवा मानते हैं . जिन्हें जात बिरादरी से बाहर करने , तनखैया होने का डर दिखाकर असरदार लोग अपनी बात मनवा लेते हैं . बेमन से मानना पड़ता है....... ,
व्हिप भी तो फतवा ही है . है ना ! तो क्या हमारे सांसद स्व विवेक से सही निर्णय ले पाने में सक्षम नही ?

अत्यंत खुशी की बात है .....

एक अत्यंत खुशी की बात है जो मैं अकेले नहीं पचा पा रहा हूं तो आप सब को भी थोड़ी-थोड़ी सी खाने चबाने को दे रहा हूं। देश आजाद हुआ तब मात्र एक दो राजनैतिक पार्टियां थी जिससे कि हमारे दादाजी-दादीजी का मनोरंजन का सर्वथा अभाव था। जैसे जैसे समय बीतता गया पिताजी के समय मनोरंजन के साधन बढ़ गये बहुत सारी पार्टियां बन गयीं और अब हमारे समय में तो नेता लोग जनता के भरपूर मनोरंजन के लिये अपने सर्कसों का गठबंधन करके साझा मनोरंजन करती हैं। हमारे देश की जनता बहुत मनोरंजन की ही भूखी है खाना-कपड़ा हो न हो पर क्रिकेट वगैरह होते रहना चाहिये जिसका हमारी सरकार बराबर ध्यान रखती है,मीडिया भी अब इसमें साझेदारी करने लगा है इस लिये न्यूज चैनल भी अब मनोरंजन के कार्यक्रम बिना नागा दिखाते हैं। खुशखबरी है कि एक नया सर्कस बनाया गया है जनता के मनोरंजन के लिये जिसके पुरोधा हैं -शिव खेड़ा,अरे ये वो ही है भाई जो शिक्षाविद हैं और कहते हैं कि आप अपने बच्चों का गार्जियन जिन लोगों को नहीं बनाना चाहेंगे उन्हें देश का गार्जियन कैसे बना देते हैं आदि .. आदि .. इत्यादि..। इन्होंने अपनी पार्टी का जो नाम रखा है उससे तो लगता है कि उसमें लोकतंत्र के सारे मसाले हैं -भारतीय राष्ट्र्वादी समानता पार्टी... लेकिन चुनावी घोषणा पत्र जो जारी करा है उसमें तमाम बातें ऐसी हैं जो हम सीधे सादे भोले भारतीयों को पसंद नहीं आती हैं जैसे कि आर्थिक आधार पर आरक्षण, राजनैतिक पदों के लिये शैक्षिक योग्यता , जाति और धर्म की बात पर राजनीति नही करी जाएगी.....। अरे कोई तो इसे समझाओ यार कि ये भारत(माफ़ करना इंडिया) में रह रहा है ... यहां के लोग अपनी बातें मनवाने के लिये कानून-वानून जैसी चीज पर यकीन नहीं करते सीधे सड़क पर आकर बाजार बंद,चक्का जाम और बसों को आग लगाना शुरू कर देते हैं उन्हें ये सब बातें पसंद नहीं आयेंगी, इनके प्रत्याशियों की जमानतें जब्त हो जाएंगी। इन लोगों ने न तो कोई आंदोलन ऐसा करा है कि लोग इन्हें जानें न ही किसी घोटाले में नाम आया है तो ये किस आधार पर खुद को जनता का नेता बनाने का योग्य मान रहे हैं? मेरी विनती है वोट देने वाली जनता से कि इन स्वप्नजीवी लोगों को जल्द ही हकीकत का मुंह दिखा कर नींद से जगाए। इस देश में सिर्फ़ लालू, मुलायम, ठाकरे, करात, मायावती जैसे ही लोगों का राज्य चलेगा। खुशी इस बात की है कि जनता इनकी हार में भी मनोरंजन तलाश लेगी।
जय जय भड़ास

भोजन न मिले तो कोई न आए







कुछ दिन पहले सतना कलेक्टर विजय आनंद कुरील, सतना जिले के पर्समनिया पठार गए । पठार के ऊपर लगभग ८५ गांव है। यह मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी और विकास प्राधिकरण और तकनिकी शिक्षा मंत्री नागेन्द्र सिंह के क्षेत्र में है। इधर से लगातार वीमार मरीज सतना आ रहे थे। महामारी की असंका जताई जा रही थी । सरकारी आदमी को तो सब सही दिखता है, कलेक्टर को भी दिखा। दो दिन बाद मेरे मन में आया क्यो न पर्समनिया चला जाए । यही सोच कल में अपनी बाइक से निकल पड़ा..........
सबसे पहले सतना से रोड से उचेहरा गया , १८ किलोमीटर का ये रास्ता तो
ठीक रहा .फिर शुरू हुआ वाकई दंग कर देने वाला रास्ता.... रास्ता बड़ी - बड़ी गिट्टी डाल कर बनाया गया था। लगभग १२ किलोमीटर चला ही था कि शिक्षा की गारंटी देने वाला स्कूल मिला ... जंहा लगभग २० बच्चे खेल रहे थे, १० बज रहा था , लेकिन कोई मास्टर
वंहा नही था। बच्चो से जब हमने पूछा तो ...सभी एक साथ बोल पड़े मास्टर जी १ बजे आते है। और खाना देकर चले जाता है। पास ही खड़े ग्रामीण ramadin से बात कि तो उसका kahana था कि dopahar का भोजन न मिले तो कोई भी गावं वाला अपने बच्चे को नही भेजता ।
जब हम पठार पर पहुंचे तो दंग ही रह गए ...प्राथमिक हॉस्पिटल था, जंहा पर कुल ३ कर्मचारी थे। कहने को तो दो डॉक्टर होने चाहिए । रिकॉर्ड देखा तो २ दिन पहले के सिंग्नेचेर थे । हॉस्पिटल में एक डिलेवरी रूम बना था, हालत ये थे कि रूम पुरी तरह खली था वंहा एक स्टूल तक नही पड़ा था। दोनों फोटो वही कि है।


समाज के मठाधीश यानी की समाज का शोषक.

अभी अर्द्यसत्य पढ़ रहा था, कि मनीषा दीदी के इस ब्लॉग को पढ़ते पढ़ते इस पोस्ट पर आकर अटक गया। विचारों के झंझावात में उलझा रहा मगर समझ में ना आया कि इस पर मैं किन शब्दों में अपनी राय रखूँ, वस्तुत: ये चित्रण लैंगिक विकलांग समाज से है मगर अद्भुत कि ये तो हमारे समाज का आइना है तो क्या सभी जगह इन मठाधीशों ने अपने स्वार्थपरक कार्य के लिए अन्धकार फैलाने कि ही कोशिश कि है। पोस्ट के शब्द और भावः, मेरे पास शब्दों कि कमी हो गयी कि क्या मैं एक लैंगिक विकलांग के ब्लॉग पर घूम रहा हूँ, अगर एसा है तो सम्पूर्ण मानव के ब्लॉग से बेहतर तो हमारी दीदी हैं क्या आप उनके इस विचार से अवगत हैं नही तो एक नजर डालिए और आइना देखिये, संग ही समाज को निहारिये



सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है।


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रजनीश के झा
जय जय भड़ास

माँ

मुझ से दूर ही रह रही हैं
माँ की चिता से उठती लपटें ,
मैं स्फुलिंग से डरता था
माँ को अब तक यह याद है

ghazal

कुछ नई बात हो गयी होगी
गोया बरसात हो गयी होगी।
वो पलटकर यहाँ नही आई
कोई मुलाक़ात हो गयी होगी।
वो खुशबू है लिपटके बाहों में
हवा के साथ हो गयी होगी।
उसने फैलाए होंगे गेसू अपने
फ़िर दिन में रात हो गयी होगी।
सूना है मकबूल आए हैं महफिल मैं
दोस्तों की जमात हो गयी होगी।
Maqbool

एक नजर इधर भी.......

अखबार के नाम पर टिकेट ले लो बाबा!!!!!

जरा गौर से देखिये इस तस्वीर को, शायद आपको वो दिखे जो मुझे भी दिखा ?
कुछ दिन पहले यशवंत जी ने एक पोस्ट डाली थी की नॉएडा में हिजडे एक वाहन में जा रहे थे और वहां पे लिखा था प्रेस। सच में क्या प्रेस का टैग लगना ऐसा है, जरा गौर से देखिये इस सरकारी मुलाजिम को जो मुंबई बस का कंडक्टर है मगर डिब्बे पे "सकाळ" एक मराठी दैनिक का लेबल, महोदय आप सरकारी कर्मचारी हो या इस अकबार के विज्ञापन प्रतिनिधि...
वैसे ये बड़ी बात नही है और कमोबेश सभी अखबार का विज्ञापन विभाग इस कुकृत्य को अंजाम देता है, अपने अखबारनवीश होने का धौंस देकर मनमाफिक विज्ञापन प्रचारित करवा लेता है।
तात्पर्य केवल इतना की मित्र ये व्यावसायिक दौर का समाचारपत्र व्यवसाय है, विचारों की बेला नही और अपने आपको पत्रकार कहने वाले हमारे मित्र इन व्यवसायिक घराने के जी हुजूरी करने वाले चमचे से ज्यादा नही, जिसे चमचागिरी पसंद नही वो अपने घर में रहे, लाला जी के अखबार को उसकी कोई जरूरत नही।
जय जय भड़ास

17.7.08

बैंक में हुआ करोड़ों का गबन

लखनऊ के सीतापुर को-आपरेटिव बैंक में करोड़ों रूपये का घपला हुआ है। बैंक के कर्मचारियों द्वारा किया गया यह घोटाला लगभग 42 करोड़ रूपये का है। आरटीआई आवेदन के माध्यम से आवेदक खालिक मोहम्मद ने अक्टूबर 2007 में उत्तर प्रदेश को-आपरेटिव सोसाइटी के जिला सहायक रजिस्ट्रार कार्यालय से इस संबंध में सूचनाएं मांगी थी।आवेदक ने गबन की गई कुल राशि, दुरूपयोग की गई राशि और अनियमित राशि के बारे में जानकारी मांगी थी। यह राशि साल 1989-90 से 2005-06 में जिला को- आपरेटिव बैंक, सीतापुर के स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट में दिखाई गई थी। आवेदक ने ऑडिट करने के उत्तरदायी अधिकारियों और स्टॉफ के खिलाफ की गई कारवाई की जानकारी भी मांगी थी। आवेदक अहमद ने उन लोगों के नाम और पद भी पूछे थे जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और विभागीय कारवाई की गई।नवंबर 2007 में जन सूचना अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी में कुल गबन की गई राशि ५७२०११४२.७१ दुरूपयोग की गई राशि का मूल्य २५२७९१३०६.४१ है और अनियमित राशि १०६१५५३९०.०८ बताई गई। जन सूचना अधिकारी आर सी दुबे ने यह जानकारी भी दी कि 6 अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और तीन कर्मचारियों को इस सिलसिले में निलंबित किया गया है। आवेदक अहमद ने स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट की प्रतिलिपि भी मांगी थी, जो उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। यह प्रतिलिपि हासिल करने के लिए उन्होंने आयोग में दूसरी अपील दायर की है।


साभार - सूचना का अधिकार

ओलम्पिक का सफरनामा

ओलम्पिक शुरू होने में कुछ ही दिन शेष है, तब तक आइये जाने ओलम्पिक का अभी तक के सफर का पहला कदम.

सुनाते अमर-कहानी

राइट-लेफ्ट कर रहे,बंधु गजब का ट्विस्ट
दागी सब बेदाग अब,स्वार्थसिद्धि है इष्ट ,

स्वार्थसिद्धि है इष्ट ,हुए सक्रिय अंबानी

लाल हुए क्यों लाल,सुनाते अमर-कहानी

अब बैंडिट टूरिज्म

राजस्थान की सरकार में बैठे कुछ ज्ञानियों की चली तो जल्द ही बीहड़ डरने की नहीं देखने और सैर सपाटे की जगह होगी। अकेली राजस्थान सरकार ही क्यों मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सरकार भी इससे लगभग सहमत ही है। मसला यह है कि राजस्थान सरकार ने चंबल के बीहड़ो में टूरिज्म को बढ़ावा देने की पूरी रुपरेखा भी तैयार कर ली है। इस योजना के तहत पर्यटकों को उन स्थानों पर घूमाया जाएगा जहां कभी डकैत रहा करते थे या फिर जिन जगहों पर मशहूर मुठभेड़ हुई या कोई डकैत मारा गया। इसके साथ ही बीहड़ में डकैत किस तरह रहते हैं और उनकी दिनचर्या क्या रहती है यह भी बताया जाएगा। इस सबके लिए गाइड का काम करेंगे आत्मसमर्पण कर चुके डकैत। इन डकैतों को इसके लिए तैयार भी किया जा रहा है। राजस्थान डांग एरिया डवलपमेंट बोर्ड के चैयरमेन का कहना है कि करौली, भरतपुर, धौलपुर, कोटा के बीहड़ों में इसके लिए काम शुरू भी कर दिया गया है। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश सरकार से भी इस मुद्दे पर बातचीत जारी है। इनकी सहमति मिलते ही तीनों सरकारें सम्मिलित तौर पर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाएंगी। यानी अब बीहड़ से सीधा पैसा बनाया जाएगा। भइया इस तरह तो सरकार मेरे ब्लॉग के पीछे पड़ गई है। जब वही यह काम करेगी तो हम क्या करेंगे।

कन्या भ्रूण हत्या पर

वर्तमान में समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध लगातार हो रहा है. सरकार, समाजसेवी संस्थाएं आदि अपने-अपने स्तर पर इस बुराई को दूर करने का प्रयास कर रहे है. इसके बाद भी भ्रूण लिंग की जाँच हो रही है, लड़की के होने पर उसकी गर्भ में ह्त्या हो रही है। बचाव के इन प्रयासों के बीच कुछ नारियों ने एक नया सवाल खड़ा कर पूरे मुद्दे को अलग दिशा में ले जाने का काम किया. इन महिलाओं का सवाल है की वे लड़की नहीं चाहतीं क्योंकि उनके परिवार में पहले से दो या तीन लड़कियां हैं। ऐसे में या तो सरकार उनको लिंग परीक्षण एवं चयन की आजादी दे. यदि सरकार चाहती है कि भ्रूण में कन्या की हत्या न हो तो वो उस लड़की के पैदा होने के बाद उस बच्ची की देखभाल की जिम्मेवारी ले. इन महिलाओं का तर्क है कि कितने और किन बच्चों को जन्मना है इस बात की आज़ादी महिलाओं को होनी चाहिए। आख़िर वे ही गर्भ में बच्चे को पालती हैं. बहस का मुद्दा ये है कि क्या वास्तव में उन परिवारों को लिंग जाँच या लिंग चयन की आज़ादी होनी चाहिए जिनके पहिले से एक से अधिक लड़कियां हैं?=================================================क्या महिलाओं को गर्भ धारण करने की शक्ति के कारण इस बात की आज़ादी होनी चाहिए कि वे किसे जन्म देना चाहती हैं? ये सवाल कपोल-कल्पित नहीं, फील्ड में काम करने के बाद मिले हैं। ऐसे एक नहीं अनेक सवाल हैं बस बहस इस बात पर है कि क्या पारिवारिक स्थिति हमें भ्रूण लिंग जांच, लिंग चयन या भ्रूण हत्या (गर्भपात) की आज़ादी देती है या इस बात पर आज़ादी मिलनी चाहिए? ===================================================आइये बनिए समाज का अहम् हिस्सा, साथ में इस बहस का हिस्सा. भेजिए अपने विचार dr.kumarendra@gmail.com ये तो बहस की शरुआत है.............कहाँ तक जायेगी पता नहीं।

16.7.08

पानी के लिए अभियंता, कर्मचारी और पार्साद को कुए में latkaya

ये

पानी के लिए अभ्ज्यनता

एक संस्मरण गतांक से आगे.........

पहचान कौन ------ साम्भर के पीछे कोन है ?

जब हमारी भेंट एक मीटिंग का रूप ले चुकी थी तब के दृश्य हैं ये पुरे समय हमारे धन्वन्तरी महाराज साम्भर का मजा लेते रहे। विभिन्न विषयों पर चर्चा और सघन चर्चा मगर इसके बावजूद भडास धन्वन्तरी का अहद मस्त मौला रूप सब की फिकर सब की चिंता और सब से अनजान। वैसे दृश्य में आप दिव्या को देख सकते हैं जिसे डॉक्टर साब बताने की कोशिश कर रहे हैं और सब की चर्चा के बीच हमारी मनीषा दीदी सोम्य मगर गंभीर। मुझे आप नही देख सकते क्यूंकि मैं तो परदे के पीछे हूँ न और एक और संवेदनशील प्राणी हरभूषण सिंह जो की जस्टिस आनद सिंह के छोटे भाई हैं भी नजर आयेंगे। हमारी चर्चा में जस्टिस आनद सिंह साब भी छाए रहे और मैं भडासी पत्रकारों से एक अपील करूंगा की जस्टिस साहब के बारे में लोगों को पता चले। इसलिए तथ्य को रखें या नही तो मुझे मुहैया कर दें।

कहने का तात्पर्य की ज़माने भर की मस्ती, उन्मुक्त व्यवहार, लापरवाह जिन्दगी मगर इन सबके बावजूद अपनी जिम्मेदारी के साथ विचारों का आदान प्रदान । ये है एक भडासी बैठक।

और हाँ साम्भर का रहस्य भी ।

धन्यवाद।

जय जय भड़ास.

बेरहम यादें

यादें.बहुत खूबसूरत होती हैं.बेरहम भी.लाख छुड़ाओ.पीछा ही नहीं छोड़तीं.सावन आ चुका है.पानी भी यदा-कदा बरस रहा है.दिल्ली की गलियां-नालियां कीचड़ से उफना रहीं हैं.पालिथिन की थैलियों में भरा कचरा नालियों में फेंकते हुए लोग रूटीन में नगर निगम को गालियां दे रहे हैं.सोचता हूं.गांव में बरसता था तो खुशियां लेकर आता था.यहां शामत बन कर आता है.दफ्तर से लौट रहा हूं.पानी की हलकी-हलकी बूंदे गांव की यादों को बजाय धोने के और उभार रहीं हैं.स्मृतिपटल पर बन रहे चित्र ज्यादा स्पष्ट हो चुके हैं.नीम के पेड़ पर झूले पड़ चुके हैं.चाचियां,भाभियां,बहनें व बेटियां कजरी गा रही हैं.हमारी पटी(पट्टी) में बड़की बहिनी गा रही हैं-ऊदल बेंदुल के चढ़वइया वीरन कहिया अउबा न.बहिनी ऊदल की उपमा किसे दे रही हैं. मुझे.मुझे ही दे रही होंगी.छोटा वीरन तो मैं ही हूं.मन में सगर्व अनुभूति होती है.चंदबरदाई के समकालीन कवि जगनिक की आल्हा काव्यकथा के नायक आल्हा के छोटे भाई थे ऊदल.उनके घोड़े का नाम बेंदुल था.बीच वाली पटी से परधानिन भाभी का मधुर कंठ गूंज रहा है-सड़िया लाया बलम कलकतिया,जेहमें हरी-हरी पतिया न.हलकी-हलकी आवाज पूरब पटी से भी आ रही है.लेकिन कंठ पुरुषों के हैं-लछिमन कहां जानकी होइहैं,ऐसी विकट अंधेरिया न.अचानक एक कार बगल से गुजरती है.पैर तो कीचड़ से सने ही थे.वह सारे शरीर पर छींटे मारते हुई आगे निकल जाती है.मैं गांव से वापस लौट आता हूं.शहर में.सामने ही तो मेरा मकान है.

हद कर दी भैया इन फिल्म बनाने और दिखाने वाले ने

मोहनदास फिल्म के प्रदर्शन में उदय प्रकाष को न्यौता न देकर हद कर इन फिल्मी बाबूओं ने। ऐसे बाबूओं को केवल राखी सावंत याद रहती है। जो भी हो मोहनदास उदय प्रकाष की लिखी पुस्तक पर आधारित है और इन्हें ही नहीं बुलाया गया.........................

उदय प्रकाश को मोहनदास फ़िल्म के प्रदर्शन पर नहीं बुलाया गया

देश के चर्चित और सुप्रसिद्ध साहित्यकार उदय प्रकाश के बारे में लगभग हर साहित्य प्रेमी जानता है। उन्होंने अपनी रचना में समाज के अनेक कटु सत्यों को उजागर किया है और उन पर तीखे कटाक्ष किए हैं। मोहनदास उदय की सबसे चर्चित रचनाओं में एक है। यह बहुत खुशी की बात है कि इस बहुप्रतीक्षित फिल्म का प्रदर्शन किया जा रहा है लेकिन इस मौके पर उदय प्रकाश की कमी खलेगी। ऐसे लगता है कि इस मौके पर निर्माता निर्देशक ने किसी खास वजह से उदय जी को आधिकारिक तौर पर आमंत्रित नहीं किया है। निर्माता निर्देशक की इस हरकत को उदय जी का अपमान ही कहा जाएगा, जिसकी जितनी आलोचना की जाए कम है। सभी भड़ासी भाइयों से अनुरोध है कि फिल्म जरूर देखें और इसके बाद मजहर और उनकी टीम से पूछें कि उदय कहां है ?

15.7.08

पता तो देते

मनीष जी आपना फ़ोन नम्बर और पता तो बता देते इस भडासी को जो कल दिल्ली आया और चार घंटे रहा स्टेसन पर । यदि मालूम रहता की कहाँ हैं तो इस चार घंटे की ठहराव में आपसे और अपने सप्तर्षि मंडल यानि भड़ास संचालक के अधिकतर सदस्य से मिल कर जाता । मुझे तो यशवंत दादा से पता चला की आजकल आप भड़ास 4 के लिए काम में joote हैं । मैं भले ही बिहार सरकार के जॉब में हूँ किंतु दिल नहीं लगता है। क्या इस अनुज की लिए वहां भड़ास में कुछ जगह है। भड़ास का अपना अख़बार हो ये आइडिया पर विचार करियेगा ।

कथा क्यूल के कुत्तों की

शीर्षक में निहित अनुप्रास पर मुग्ध होने की आवश्यकता नहीं है। लघुकथा दुखांत है। मैं स्वयं कभी क्यूल नहीं गया हूं । यह पटना और कटिहार के बीच का एक जंक्शन स्टेशन है। यह कथा मेरे कुछ मित्रों ने अलग अलग मौकों पर सुनाई है। उनके कथनानुसार यह आपबीती है और इतनी सच है कि गीता पर हाथ रखकर दोहरायी जा सकती है।
क्यूल स्टेशन में जब भी कोई यात्री भोजन करने बैठता है तो उसके साथ एक अजीब वाकया होता है। इधर मुसाफिर ने भोजन सामग्री खोली और उधर अचानक कुत्तों के एक झुण्ड के बीच कुकरहाव मच जाता है। कुत्ते बुरी तरह से एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं। झपटते हैं। भौंकते हैं। एक दूसरे को नोंचते हैं। गरज यह कि मालूम पड़ता है कि आज इनमें से कोई एक वीर शहीद होकर ही दम लेगा। ये लड़ते लड़ते भोजन की तैयारी में जुटे मुसाफिर के इतने समीप पहुंच जाते हैं कि वह डरकर भोजन सामग्री वैसे ही छोडकर भाग जाता है। न भागे तो क्यूल के वीर कुत्ते अपनी सहज स्वाभाविक उग्र लड़ाई से खाना गिराकर ही दम लेते हैं।
उधर यात्री के चले जाने के बाद शांति व सद्भावना का माहौल स्थापित हो जाता है। जो कुत्ते थोड़ी देर पहले एक दूसरे की जान के दुश्मन मालूम पड़ते थे वे अचानक शांतिदूत बन जाते हैं और आपस में निहायत प्रेम व भाईचारे के साथ नीचे गिरे भोजन को ग्रहण करने के पुण्य कार्य में जुट जाते हैं।
अपने एकमात्र ल‌‌क्ष्य को हासिल करने के लिये क्यूल के कुत्तों की इस राजनीतिक सू‌झ व परिपक्वता पर आप कुछ टिप्पणी करना चाहेंगे ०००००

दिनेश चौधरी

ओसियन फ़िल्म फेस्टिवल में उदय प्रकाश की मोहनदास का प्रदर्शन

बहुत दिनों के लंबे इंतज़ार के बाद आखिरकार उदय प्रकाश के मोहनदास पर आधारित फ़िल्म का प्रदर्शन किया जा रहा है। फ़िल्म ओसियन फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई जा रही है। १७ जुलाई को ३.३० बजे सिरीफोर्ट की ओदी १ में और यदि न देख पाए तो १९ जुलाई को १ बजे सिरीफोर्ट के ओदी ३ में फ़िल्म देखी जा सकती है। फ़िल्म का निर्देशन मजहर कामरान ने किया है।

नोट- उदय प्रकाश की यह महत्वपूर्ण रचना जो अब साकार रूप में हमारे सामने होगी लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शन के दौरान हमारे बीच उदय प्रकाश जी नहीं होंगे। जैसा की उदय जी ने फ़ोन पर बताया की वह शहर से बहार है और उन्हें आयोजकों ने न ही इसकी ख़बर दी और न ही उन्हें बुलाया। शायद एक बार फिर उदय अपनी कटु पत्रकारिता की मार सह रहे हैं।

मुंबई की रात को बयान करती ये तस्वीरें...........

जब अक्खा दुनिया सोती है तो मुंबई जागता है, ऐसा मुंबई वाले कहते हैं । मुंबई से जो बाहर रहते हैं वो इसे सुनते हैं और मानते हैं, मगर इनके जागने का क्या कारण है...... इनका मायानगरी होना, मायानगरी की चमक दमक, ग्लेमर को लुभाती रात या फ़िर कुछ और ????

दुनिया सोये या जगे, माया का पता लग सके.....





मायानगरी की माया तो ट्रेन है



मुंबई के स्टेशन बन्दों की दरगाह




लाइफलाइन यानी मुंबईरेल और स्टेशन यानी पल पल का जीवन




मुंबई का सच, रात को जगते ये माली कि मुंबई को दिन में खुशबू दे सकें।


ये एक सच उनके लिए जो मुंबई कि माया में जा के खो जाना चाहते हैं मगर हकीकत से अनजान. क्या इन तस्वीरों को हम अपने जीवन से आत्मसात कर सकते हैं ? क्या सरकार, प्रशासन के साथ आम जन के कर्त्तव्य की सीमा रेखा से परे हैं ?विचार विचार और सिर्फ विचार नहीं मित्र कार्य की दरकार है और ये मुंबई की कहानी नहीं हमारे हिन्दुस्तान की जुबान है. विकसित भारत, शक्तिशाली भारत, अणु और परमाणु वाला भारत मगर जिसकी रीढ़ की हड्डी ये तस्वीरें हैं. हमारे देश की हमारी तस्वीर।

जय जय भड़ास

इंशाअल्लाह नंबर वन ही रहेंगे

राजस्थान पत्रिका में ब्लागिंग पर छपी रिपोर्ट और उसमें यशवंत जी कथन बहुत अच्छा लगा।सिर्फ इसलिए नहीं कि हम भड़ासी हैं.इसलिए कि हम दब कुचले हैं,लेकिन

सो रहे हैं आज हम नीचे खुले आकाश के।

देखना पन्ने बनेंगे एक दिन इतिहास के।

और

-हमने जब भी पंख खोले हैं उड़ानों के लिए

हम चुनौती बन गए हैं आसमानों के लिए

जहां तक भड़ास पर अभद्रता का आरोप लगने की बात है तो हम देसज यथार्थ में जीने वाले लोग हैं। हमें कोई सफाई नहीं देनी है क्योंकि हम जानते हैं

-यह खामोशमिजाजी तुम्हें जीने नहीं देगी

इस दौर में जीना है तो कोहराम मचा दो

और कोई कुछ भी कह ले भड़ासी नंबर वन हैं। इंशाअल्लाह नंबर वन ही रहेंगे

जगदीश त्रिपाठी

परमाणु समझौते की गर्मी

हवाओं में गर्माहट सी दिख रही है. आप कहेंगे कि पानी बरसने के बाद भी गर्माहट?....................जी जनाब, ये देश ही ऐसा है, यहाँ किसी भी मौसम में किसी भी समय गरमी आ सकती है. इस समय गरमी न्यूक्लियर डील की है..............हालाँकि अभी समझौता नहीं हुआ है पर गर्मी आ गई है. लेफ्ट ने राइट करने की गरज से अपना समर्थन बापस लिया था. सोचा होगा कि इस बार तो केन्द्र की सरकार घुटने टेक देगी पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. इधर-उधर की जुगाड़ से सरकार समर्थन की बात करने लगी. लेफ्ट को लगा कि अब वे राइट होने वाले हैं. इस बीच नै गर्माहट आई कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कुछ न कर गुजरें, सी बी आई टाईप का नया कारनामा शुरू होने को है.............(ऐसा समाचार पत्रों की ख़बर है)गर्माहट इसी कारण से बढ़ी है, अब जहाँ देखो वहां लोग चर्चा में मगन हैं। पान की दूकान हो (ब्लॉग वाली पान की दूकान नहीं) या किसी दफ्तर का हॉल, पढ़ा-लिखा अधिकारी हो या घर की काम बाली बाई, कॉलेज हो या सिनेमा हॉल, रेस्टोरेंट हो या खेल का मैदान सब जगह बस परमाणु डील. हँसी तो तब आती है कि जिसे परमाणु का ककहरा भी नहीं पता वो भी इस पर चर्चा कर रहा है. अब क्या कहा जाए? क्या हमारी राजनीतिक समझ इतनी गहरी हो चुकी है कि इन राजनेताओं को समझना आसान हो गया है. क्योंकि हमारा अपना विचार है कि इन नेताओं को समझने में ख़ुद ब्रह्मा भी परेशां होंगे. आज क्या कहें, कल क्या करें....................अभी क्या कहें, अगले पल क्या कर गुजरें............पता नहीं. खैर हम तो बरसते पानी के मजे ले रहे थे कि लेफ्ट ने गरम हवा चला कर गर्माहट पैदा कर दी. अब ये गरमी तो दो-चार दिन में ही समाप्त होगी, जब समर्थन की बात पक्की हो जाएगी. तब तक गरमी झेलना पड़ेगी, क्योंकि यदि भारत में रहना होगा, नेता-नेता कहना होगा। कुछ समझे............ये है छीछालेदर रस.

14.7.08

तन्नै क्युं कर बेरा पाटया के मन्नै बीडी पी थी ?

एक बार एक ताऊ अपनै छोरे के पास अपना ईलाज करानै
शहर चला गया ! वहां ताऊ का छोरा बडा सरकारी अफ़सर
था ! सरकारी गाडी बन्गला नौकर चाकर सब मिल राखे थे !
शहर मे उसके छोरे नै और उसकी बहू नै ताऊ की घणी सेवा करी !
और डाक्टर भी ताऊ के छोरे का पहचान का था सो उसनै ताऊ की
जान्च वान्च करके बताया की उसके प्रोस्टेट का आपरेसन करणा
पडैगा ! ताऊ को असपताल मै भर्ती करा दिया ! और सब जांच वांच
करकै डाक्टर बोल्या-- ताऊ थारा सुबह एक छोटा सा आपरेशन
कर देन्गे ! कोई चिन्ता मत करियो ! आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे !
और इब आप बीडी चिलम मत पीना !

ताऊ बोल्या -- ठिक सै भाई ! जैसी थम कहो !
अगले दिन ताऊ का आपरेशन हो गया ! इसके बाद एक दिन
तो ताऊ नै बिना चिलम बीडी कै निकाल दिया ! पर इब उसतैं रहा
नही जावै था ! चिलम की तलब घणी होण लागरी थी ! और ताऊ नै
वार्ड बाय़ वगैरह सब आजमा के देख लिये , पर बात बणी नही !
इब ताऊ स्टाफ़ को चकमा देके असपताल के सामनै की पान की
दुकान पर पहुंच के बीडी पीके आगया ! और बस घुमण का
बहाना मार के ताऊ बीडी पीके वापस अपने बिस्तर पर आजाया
करै था !

शाम को डाक्टर आया राउन्ड लेता हुआ ! और उसनै ताऊ को
लिटा कै उसकी पेशाब की जगह पट्टि वट्टी
बदलनै लग गया ! और ताऊ सै बात भी करता जावै था !
इब डाक्टर नै पूछी-- ताऊ बीडी सिगरेट तो नही पी थी ना !
ताऊ बोल्या-- क्युं भाइ डागदर साब ? उडे के धुंआ निकलण लागरया सै ?
तन्नै क्युं कर बेरा पाटया के मन्नै बीडी पी थी ?

क्या परमाणु करार देशहित में है?

आज-कल देश में सबसे बड़ा मुद्दा है परमाणु करार का .हमारे देश के लीडर्स को न बढती महंगाई की चिंता है और न ही दिनों-दिन बढ़ रहे आतंकवाद और नक्सलवाद की .उन्हें चिंता है तो सिर्फ़ इस बात की कि कैसे वो अपनी सरकार बचाए ताकी बाकि बचे समय में भी वो सता का मजा लूट सके और अपनी जेबे भर सके।
आज सरकार परमाणु करार के बारे में जनता से सहायता मांग रही है और ये ही वो सरकार ह जिसने परमाणु करार का मसोदा संसद में रखने से इन्क्कर कर दिया था कि यह गोपनीय है .आख़िर वो चेअसे गोपनीय कसे हो सकती है जिसे अमेरिकन कांग्रेश में पेश किया जा चुक्का हो और यह्हा तक कि उसका आदे से ज्यादा मैटर अमेरिकन वेबसाइट्स पर भी आ चुका हो .क्या यह जनता के साथ साफ-साफ धोखा नही है?
आज सरकार कह रही है कि परमाणु करार होगा तो बिजली मिलेगी और तरक्की होगी लेकिन क्या सरकार ने
ये भी हिसाब लगाया है कि पनबिजली और हवा से बिजली बनाना काफी सस्ता परेगा बजाये कि परमाणु बिजली खरीदने के।
सरकार कह रही है कि अगेर परमाणु करार हो जाता है तो इंडिया में बिजली कि कमी नही रहेगी ,महंगाइ कम हो जायेगी लकिन मै जानना चाहुगा कि क्या सरकार के पास इतने परमाणु रेअक्टेर है जिनसे पुरे देश को बिजली मिल सके?
जवाब है नही।
तो फ़िर आख़िर क्या फायदा है इश परमाणु करार का?
क्यों इस मुदे पर बाकि सभी जरुरी मुददों को दबाया जा रह है?
क्या जनता इतनी बेवकूफ है जो अपने से जुड़े मुददों को छोड़ केर परमाणु करार पर वोट देगी?
इन सवालो का जवाब ढूँढना वास्तव में आज कि जरूरत है.

मुंबई नवभारत टाइम्स से..........


१३ जुलाई के नभाटा मुंबई संस्करण ने भडास की मुहीम को महानगर के पन्ने पर जगह दिया है, चुकि नभाटा का ईपपेर नही है सो मैं इसे भड़ास पर डाल रहा हूँ। और नभाटा को इस मुहीम का पक्ष रखने के लिए साधुवाद देता हूँ ।
जय जय भड़ास

चंदा जो मिलता है

एसे लिमटेड कंपनिया कराती है हमारी धार्मिक धरोहरों का संरक्षण। पिस्म सीमेंट ने कितना अच्छा तरीका निकला है । अपने विज्ञापन के लिए ........... ये फोटो सतना जिले की माधवगढ किले की मन्दिर की है। ये सब बीजेपी और बजरंग दल वालो को दिखाई नही देता। गाय मर जाय तो कमीने आदमी को मार डाले, हड़ताल के नाम पर किसी शहर में दंगा कर सकते है। किसी की जान ले सकते है, पर ये सब नही दिखता। क्योंकि पार्टी को चंदा जो मिलता है।

माँ

मुझ से दूर ही रह रही हैं
माँ की चिता से उठती लपटें
मैं स्फुलिंग से डरता था
माँ को अब तक यह याद है
प्रणव सक्सेना
स्फुलिंग -चिंगारी

दो लोगों की सदस्यता भड़ास से खत्म

दो लोगों की सदस्यता भड़ास से इसलिए खत्म की जा रही है कि ये दो लोग अपने मोबाइल नंबर, नाम और पते भड़ास संचालन समिति के पास नहीं भेज पाए हैं और बिना भेजे ही भड़ास पर छुपी पहचान के साथ कई तरह की विवादित पोस्टें डाल रहे हैं। ये लोग फर्जी नाम से पोस्टें लिख रहे थे। कृपया इन दोनों लोगों से गुजारिश है कि पहले वे अपने बारे में संपूर्ण डिटेल भेजें। उसके बाद उन्हें भड़ास की सदस्यता के लिए फिर से लिंक भेज दिया जाएगा।
यशवंत

13.7.08

राजस्थान पत्रिका में हिंदी ब्लागिंग पर स्टोरी- ब्लॉग बोलता है

राजस्थान पत्रिका ने आज के अंके में संडे के परिशिष्ट में हिंदी ब्लागिंग पर स्टोरी प्रकाशित की है जिसे लिखा है मशहूर हिंदी ब्लागर शैलेश भारतवासी ने। इसमें भड़ास के बारे में भी जिक्र है। यहां भड़ास के बारे में जो कुछ प्रकाशित हुए है, उसे हू ब हू दे रहा हूं ताकि बाकी भड़ासियों को भी पता चल सके....

पत्रकारों के ब्लॉग सबसे आगे
हिंदी ब्लागिंग में अभी पत्रकार ब्लागरों का प्रतिशत सबसे अधिक है। इस बात का अंदाजा यहां से लगाया जा सकता है कि हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले कम्युनिटी ब्लाग भड़ास http://bhadas.blogspot.com में 300 से अधिक कांट्रीब्यूटर हैं और अधिकाधिक पत्रकार हैं। इस ब्लाग पर हिंदी पत्रकारों की जाब छोड़ने-पकड़ने की जानकारी भी मुहैया कराई जाती है। भड़ास पर अभद्र ब्लाग का आरोप लगने पर ब्लाग प्रमुख यशवंत सिंह कहते हैं, ''हम तो खुद कहते हैं कि हम फटेहाल, परेशान, कुंठित, दमित, डरे हुए लोग हैं, जो गांव देहात से आए हैं और शहर के अजनबीपन और प्रोफेशनलिज्म में अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं।''

पूरी स्टोरी आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं

थैंक्यू नवभारत टाइम्स, मुंबई- करूणाकर के लिए भड़ास की मुहिम को सराहा

जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है....


करूणाकर के मामले को और भड़ास के अभियान को अब मुंबई के एक प्रतिष्टित अखबार नवभारत टाइम्स ने कवरेज दी है, जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है शीर्षक से। अगर आप मुंबई के रहने वाले हैं तो करूणाकर की ख़बर पेज नम्बर पांच पर नवभारत टाइम्स में ज़रूर देंखें। डाक्टर रूपेश जी और रजनीश भाई से अनुरोध है कि इस कवरेज को भड़ास पर डालें ताकि बाकी भाई भड़ासी भी पढ़ सकें। मुंबई में आज प्रकाशित स्टोरी को पढ़कर मुंबई से बहुत से लोग करूणाकर से जुड़ गए हैं। कई लोगों ने करूणाकर के लिए आर्थिक मदद भी दी है।

मुंबई के वार्ष्णेय चेरीटिबल ट्रस्ट के दिनेश वार्ष्णेय ने करूणाकर को 2000 रुपये की मदद की है जो कि सोमवार तक उसके खाते में आ जायेगी। इसके साथ ही नोएडा के सेक्टर 18 में कपड़े का शोरूम चलने वाले अमित गुप्ता ने 500 रुपये, अमर उजाला के सीनियर सब एडिटर गौरव त्यागी ने 1000 हज़ार रुपये और अजय नथानी जी की अगुवाई में उनके स्पोर्ट्स डेस्क ने भी 1000 रुपये देने का वादा किया है। ये सभी लोग ये राशि सोमवार को करूणाकर के खाते में जामा करवा देंगे। भड़ास परिवार इनका हार्दिक आभार व्यक्त करता है।

इन लोगों ने करूणाकर की तबीयत के बारे में जानने की इच्छा जताई। मैं इसके लिए माफी चाहता हूँ की करूणाकर की कुशल क्षेम भड़ास पर नहीं दे सका। पर आज मैं आपको सारी जानकारी दे देता हूँ।

करूणाकर अब पूरी तरह से स्वस्थ महसूस कर रहा है। उसे भूख लग रही है तथा नींद भी अच्छी आ रही है। डॉक्टर साहब के दवाइयों को नियमित सेवन कर रहा है और उनके बताए परहेज व चिकित्सा विधि का पालन कर रहा है। अभी जब मैंने उसे फोन किया तो नेटवर्क सही नहीं आ रहा था तो करूणाकर फोन लेकर अपनी छत पर लकड़ी की सीढियों के सहारे चढ़ गया, मुझसे बात करने के लिए। वहां जब वो बात कर रहा था तो उसकी सांसें ऊपर नीचे हो रहीं थीं। मैंने उसे खूब डांट लगाई की अब आगे से ऐसा मत करना। डांट खाकर वो सॉरी बोल रहा था पर वो बात करते हुए पूरी तरह से खुश था।


वैसे आपको ये बताना ज़रूरी है कि डॉक्टर रूपेश जिस तरह से उसकी मदद कर रहें हैं, वैसा और कोई भी करूणाकर के लिए नहीं कर सकता था क्योंकि पैसा तो हर कोई दे सकता है पर इलाज़ तो एक डॉक्टर ही कर सकता है।

फिलहाल इतना ही, मैं अगली पोस्ट ज़ल्द लिखूंगा।

-अमित द्विवेदी

देवर के मायने

रात वोदका का आचमन कर सोया था।नींद अच्छी आई।लेकिन सुबह-सुबह सेलफोन बज उठा.गुस्सा तो बहुत जोर का आया पर यह सोच कर फोन उठा लिया कि कहीं फोन बास का न हो.शायद ख़बर में कोई गलती चली गई हो.हालांकि ऐसा था नहीं.फोन भौजाई का था.मेरे हलो करते ही उन्होंने सीधा सवाल किया,रात दफ्तर से कितने बजे लौटेगो ? क्यों भौजी.कोई खास बात है क्या? रात को खाना खिलाना चाहती हो?मैने भी बजाय जवाब देने के उनसे एक साथ तीन सवाल कर डाले.उधर से भौजाई की आवाज आई,नहीं.आज शनिवार है.रात में सब्जी खरीदने बाजार चलना है.तुम्हारे भैयू जी बाहर गए हैं.सब्जी का झोला काफी वजनी हो जाता है.सो वह साथ में जाते हैं.झोला उठा कर लाते हैं.आज यह काम तुम्हें करना पड़ेगा.मैंने मुसीबत छुड़ाने के लिए कहा.भौजी मैं भैयू जी की जगह कैसे ले सकता हूं.क्यों ? भौजाई की आवाज आई,तुम मेरे देवर हो.और देवर वही होता है जो दे वर का काम.सो तुम्हें सब्जी का झोला तो ढोना ही पड़ेगा.यह तो कहो कि मैं भैयू जी द्वारा किए जाने वाले अन्य ढेर सारे काम तुम्हें नहीं सौंप रही हूं.मेरा अहसान मानो.मैंने जवाब दिया,भौजाई आपका आदेश मानना मेरी मजबूरी है. लेकिन कभी इनवर्टेड कामा वाला काम के लिए भी तो देवर को आजमा कर देखो...हां,हां वह भी कभी सौंपूंगी,लेकिन इस बार नहीं.इस बार तो उसकी डेट तक तुम्हारे भैयू जी वापस आ जाएंग.अब मेरे सामने भौजाई का आदेश शिरोधार्य करने के अलावा कोई चारा नहीं था.हालांकि मै जानता था कि वह डेट कभी नहीं आएगी.क्योंकि भौजाई मुझे यह आश्वासन ३२१वीं बार दे रही थीं.हर बार भैयू जी उस डेट के पहले लौट आते हैं.भौजाई डेट ही ऐसी तय कर उन्हें बाहर भेजती हैं.हम जैसे उल्लू को सब्जी का झोला उठाने के लिए देवर की मनमाफिक परिभाषा गढ़ लेती हैं.

सीईओ की तानाशाही चरम पर

लूमर बैठा न्यूज़ चैनल की वर्तमान स्थितियों के बारे में सोच ही रहा था की उसे कुछ विशेष ख़बर मिली । इससे पहले भी इस चैनल की कहानी आप सभी को बताया था .एक रांची बेस्ड न्यूज़ चैनल जो अभी आने की तैयारी में है ,वो बिहार-झारखण्ड में बहुत सारे "प्रोजेक्ट लेकर मीडिया हाउस के नाम पर खेल खेलना शुरू कर दिया है, जिनमें कृषि,हेल्थ,सुगर मिल,मेडिकल कॉलेज & हॉस्पिटल, बिहार के सारे अस्पताल में दवा की दुकानें खोलना शामिल है।ताजा ख़बर के अनुसार uria- बीज को लेकर खेल भी शुरू हो गया है। इसी खेल को लेकर पिछलेl माह बिहार के कुछ कैबिनेट मंत्रियों के साथ कई बैठकें हो चुकी है .ख़बर यहाँ तक है की उन मंत्रियों के ऊपर "विशेष ध्यान "दिया जा रहा है। अब देखना है की ये लोग क्या गुल खिलते है। वैसे चर्चित मीडिया हाउस ने २५ अप्रैल को रांची में अपना एक प्रोग्राम रखा था जिसमें झारखण्ड के मुख्य मंत्री मुख्य अतिथि थे। उस कार्यक्रम में मीडिया हाउस के चेयरमैन भी उपस्थित थे ।i कुख्यात सीईओ ने अपनी बातों से मुख्य मंत्री को फंसाने की भरसक कोशिश की । लेकिन मुख्य मंत्री महोदय सीईओ के जाल में नही फंसे। वैसे उस कार्यक्रम के लिए लालू जी को आमंत्रित किया गया था,किंतु वो सिंगापूर के बहने बच निकले .आप सोच रहे होंगे की लालू जी को बहाना बनने की जरुररत क्यो पड़ गई .बात दरअसल यह थी की उनको बुलाने की जिम्मेदारी बिहार इंचार्ज को सौंपा गया था जिसे लालू जी बहुत चाहते रहे हैं.वैसे उसी ने अपनी कंपनी के लिए अनेक विभागों से कई टेंडर तक निकलवा दिया .लेकिन............... । आजकल सुनने में आया है की बिहार के एक विख्यात मंत्री के साथ सीईओ खूब खिचडी पका रहा है. अब तक अनगिनत बैठकें हो चुकी है। लेकिन नीतिश की सरकार में खिचडी कितनी पकती है यह तो समय ही बतायगा । अंधेर नगरी चौपट रजा एक और ख़बर --सीईओ ने अपने दर्जन भर स्टाफों ko bahar निकाल दिया है.कारन भी अलबेला है --उसने सभी को महीने में तेरह-पन्द्रह स्टोरी करने का काम दिया ,साथ ही साथ एक पत्रिका का एक हज़ार ग्राहक बनाने का अतिरिक्त टास्क दे दिया .बेचारे क्या करते सीईओ सब से पंगा ,न बाबा न । उन लोगों ने किसी तरह कुछ ग्राहक महीने भर के अन्दर बना सके .टारगेट का पुरा नही होना उनके लिए आफत लानी के लिए काफी था . .....और बहार कर दिए गए.उन लोगों का दो -तीन माह का वेतन भी रोक दिया गया ।

क्या लौटेगी हरियाली

चंबल में इन दिनों खूब पानी है। बरसात से पहले नदी की धारा सिकुड़ गई थी। अब वह पूरे तेज पर है। चंबल के क्षेत्र में पानी की कमी से हालात यह हो गए हैं कि गांव बूढ़ा गए हैं। मतलब साफ है गांव के जवान काम की तलाश में बाहर हैं। गांव का गंवईपन गायब हो गया है। जो जवान गांव में बचे भी हैं वह जवानी में ही बूढ़े हो गए हैं। खेत खाली हैं और घर के कोठर से अनाज। कई सालों के बाद चंबल क्षेत्र में अच्छा पानी हुआ है। इन पानी से फसल की उम्मीद तो अधिक नहीं लेकिन जल स्तर में सुधार होना संभव है। हालांकि दृषिटहीन प्रशासन ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है कि जिससे गांव का पानी गांव में रह सके। जनता के बीच भी ऐसी कोई पहल नहीं दिखाई दे रही है। हां गांव और खेतों के पेड़ जरूर गायब हो गए हैं। हालात दिन ब दिन खराब हो रहे हैं। इस बारे में विस्तार से फिर कभी लिखूंगा लेकिन हालात ऐसे हैं जो दिल्ली और प्रदेश की अन्य राजधानियों में बैठे लोगों की समझ में नहीं आएंगे। उम्मीद है कि अगर ऐसी ही बारिश हुई तो खेत से लेकर आंख तक हरियाली लौट आएगी।

12.7.08

राम राज्य में ऐसा भी

मेरे जिम में दो लडकियां आती हैं। वो जिम में व्यायाम करने कम बल्कि इसका पता लगाने आती हैं की जिम में उन्हें कितने लोगों से कमेन्ट मिलता हां। उनकी आदत ठीक एक नए ब्लोगर की तरह है जो अपने हर पोस्ट पर ये देखना चाहता है की उसे लोगों से कितने कमेन्ट मिले हैं. इसे जानने के लिए वो अपने ब्लॉग का सबसे अधिक विज़िट करने वाला होता है पर बाद में ये देखकर खुश हो जाता है की आज उसे इतने लोगों ने विज़िट किया भले ही उन विजिटर में उसकी ख़ुद की संख्या ९० फीसदी होती है. तो मैं उन लड़कियों की कहानी सूना रहा था. तो जिम का कोई भी ऐसा बन्दा नही है जो उनसे वाकिफ ना हो. तीन घंटे रोज़ जिम में बिताने के कारन एक मैडम तो सूख के मिनुस जेरो साइज़ में पहुँच गयी हैं. फिर भी वो रोज़ एब्स और लेग्स का व्यायाम करती हैं. वैसे मुझे वो क्या करती हैं इससे मतलब नही होना चाहिए पर इसे बताना इसलिए ज़रूरी थी क्यूंकि किसी और की कहानी में उनकी ये भूमिका देनी ज़रूरी थी ठीक सरस्वती बंदना की तरह. एक दिन मेरे पास एक लड़का आया जो की मुझसे रोज़ जिम में हेल्लो करने आता है. उसने उस लडकी का नाम लेकर उसे गलियाँ देने शुरू कर दीं और कहने लगा देख अमित उसने ख़ुद मुझे मिलने के लिए बुलाया और मेरी बेईज्ज़ती कर दी. बता मैं इस कु... का क्या करूं देखना ये कभी खुश नही रहेगी अपनी ज़िंदगी में. मैंने इसके बाद नोटिस करना शुरू किया की आख़िर माजरा क्या है जो लड़के इससे दो तीन सप्ताह तक तो बिना उससे हेल्लो ही किए बगैर व्यायाम नही शुरू करते थे. अब उसके पास भी नही जाते. तो मुझे बाद में पता चला की इस लडकी को ये सब करने में मज़ा आता है. जो उनकी जाल में फंसा उसकी बेईज्ज़ती पक्की. इसके बाद इनमे से कोई भी उनसे बात नही करता. वैसे मेरा जिम ऐसा है जो बहता पानी है हर रोज़ वहां नए बन्दे बॉडी बनाने आते हैं. और मैडम अपनी खावाहिस पूरी कर लेती हैं. अब सोच रहे होंगे की मैं उसके चक्कर में क्यूँ नही फंसा तो मैं आपको बता दूँ मैं भी नम्बर में था. पर उस लड़के ने मेरी आँखें खोल दी थीं जो उनके चक्कर में आ चुका था. पर यार ये देखने में बहुत अच्छा लग रहा है. और अब तो एक ही बात दिल से निकलती है की अच्छा जी राम राज्य में ऐसा भी होता है.
अमित द्विवेदी

अंटी अपनी बापू की

सबसे पहले में ये जानना चाहता हु, क्या दिल्ली की हर घटना राष्ट्रीय न्यूज़ है ? हिंदुस्तान का चर्चित आरुसी हत्या कांड - सीबीआई के अनुसार डॉ तलवार हत्यारे नही है बल्कि तीनो नौकर है। लगातार पिचले ५० दिनों से चले आ रहे इस ड्रामे में मीडिया अब पुलिस को गुनाहगार मन रही है। साथ ही डॉ तलवार के परिवार वालो से पुलिस के खिलाफ जहर भी उगलवा रही है। क्या मीडिया कभी अपने को भी देखती है कि वो कहा खड़ी है ? तलवार परिवार कि बदनामी के पीछे .................... क्या मीडिया कि भूमिका नही ? या फिर चिट अपनी, पट अपना और अंटी अपनी बापू की ,

२४ ghante khabro के पीछे भागने wale कब तक किसी chij की parwah किए बिना अपनी खबरे देते रहेंगे, मीडिया वाले ही बताये क्या तीनो नौकर (सीबीआई अनुसार हत्या के अपराधी घोषित है ) को अदालत में अपराधी साबित किया जा सकता है, अगर ये भी पाक साफ सिद्ध हो गए तो फिर मीडिया किस पर आरोप लगयेगा।

भारत भूषण
सतना

एक संस्मरण...............

अभी कुछ दिनों पूर्व में मुंबई में था, वहां से चलने की बारी आयी तो अपने परिवार से मिलने की तमन्ना भी सबसे पहले। डॉक्टर साब को बताया तो डॉक्टर साहब ने कार्यक्रम भी तय कर दिया। जगह था नवी मुंबई का वाशी स्टेशन जहाँ हमारा परिवार मेरे लिए जमा था और मैं अपने आप में लाखों खुशियों को समेटे इस परिवार की सन्निकटता महसूस कर रहा था।

मनीषा दीदी रुपेश भाई को इडली खिला रहीं हैं

दीदी इडली मेरे लिए भी !!!!!!!



दीदी का मातृत्व भाव और मैं भावःविह्वल और आह्लादित डॉक्टर साब



न्याय के लिए दो सिपाही हुए साथ

दो भडासी मंथन करते हुए

हमारी आपा और आपा के दो नौनिहाल रजनीश और रुपेश

ये एक छोटा सा भड़ास परिवार मिलन समय था कहने सुनने को बहुत कुछ जो बाद में मगर पहले इन्तेजार कीजिये की इडली के साथ वाला साम्भर कहाँ गया.
जारी रहेगा.................

सूचना के अधिकार पर ब्लॉग

प्यारे भडासी भाइयो,
कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर सूचना के अधिकार पर एक ब्लॉग बनाया है। इसे सूचना के अधिकार की पाक्षिक पत्रिका अपना पन्ना के सदस्य संचालित करते हैं। मैं इस पत्रिका से जुडा हुआ हूँ। आशा है भडासी मित्र अपने सुझावों और कमेन्ट से हमारा उत्साह वर्धन करेंगे।
ब्लॉग का पता है
www.rtihindi.blogspot.com

यशवंत जी और जागो रे जागो

गतसप्ताह पं. रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के तत्वावधान में भगवान सिंह हंस काव्य-संध्या का आयोजन स्थनीय गांधी शांति प्रतिष्ठान,दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली में आयोजित किया गया. इस कविता-अनुष्ठान में सभी भड़ासी बंधु सादर आमंत्रित थे. इस मौके पर हमारे भाडासानंद यशवंत सिंह का "जागो रे जागो" ऊपस्थित लोगों में एक नया जोश का संचार कर गया। एक छोटी सही झलकी.......


छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में भारी अनियमितता

परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किया तो चपरासी बनने के लायक नहीं और कम अंक प्राप्त किया तो नायाब तहसीलदार के पद पर बिठा दिया। ऐसी कहानी एक-दो नहीं बल्कि बड़ी संख्या में सामने आए है। ये मामलें है छत्तीसगढ लोक सेवा आयोग का। जहॉ सूचना के अधिकार के तहत परीक्षाथियों के चयन में भारी संख्या में अकल्पनीय भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है।

अच्छी परीक्षा और संतुष्ट साक्षात्कार देने के बाद जब कई परीक्षार्थियों का चयन नहीं हो पाया, तो अभ्यार्थियों ने सूचना कानून के तहत इस परीक्षा के उत्तर पुस्तिका दिखाने के मांग की। आयोग ने इसे नियम-कानून का हनन का दलील देकर उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया। लेकिन बड़ी संख्या में छात्रों के आंदोलन के बाद बात वहॉ के विधानमंडल तक पहुंची तो पहली खेप में 15 छात्रों की उत्तर पुस्तिका दिखाई गई। लेकिन इसके तुरंत बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश के तहत और उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया गया। दिखाइ गई 15 उत्तर पुस्तिका को देखने के बाद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जिसमें पाया गया कि उस 15 उत्तर पुस्तिका में से 9 उत्तर पुस्तिका के जांच में गड़बड़ है। इनमे 300 अंक के एक विषय, जिसमें 60 अंक के 5 प्रश्न थे। जिसके उत्तर पुस्तिका में 60 अंक के उत्तर को 75-75 अंक का मानकर केवल चार उत्तरों को ही जॉचा गया था। इसी विषय के कुछ अन्य उत्तर पुस्तिका के 5 प्रश्नों में दो प्रश्न को 50-50 अंक और शेष 3 को 60-60 अंक के आधार पर जांच कर दिया गया था। साथ ही प्रश्न के सही जवाब लिखने पर 20 में से 10 अंक मिले और इसी प्रश्न के असंबंधित उत्तर देने पर एक अभ्यार्थी को 20 में से 13 अंक दे दिया गया था। इसी तरह संक्षिप्त नोट के प्रश्न पर पूर्ण गलत उत्तर लिखने पर भी पूरे अंक दिए गए थे। इसके अलावा अन्य विषय में अनुवाद के सही जबाव देने पर शून्य अंक दिया गया। इस तरह की कई गड़बिड़या पाई है। आयोग द्वारा संचलित न्यायायिक सेवा परीक्षा में एक परीक्षार्थी के पूरे उत्तर पुस्तिका के जॉच के बावजूद बीच के दो पृष्ठ (पेज नण् 10, 11) को जांच ही नहीं किया गया था। इसी प्रकार आयोग के गूढ़ हथियार स्केलिग प्रणाली में भारी गड़बड़ी पाई गई है। राजेश कुमार(रोल न 105188 वर्ष 2003) के सांख्यकी के 300 अंक की परीक्षा में स्केलिंग के बाद 304 अंक दे दिया गया था। एक अन्य अभ्यार्थी ग्रजेस प्रताप सिंह(रोल न 66136) अपराध शास़्त्र में 233 अंक मिले थे जिनका स्केलिंग बाद शून्य कर दिया गया था। इसके अलावा एक अन्य चयनित छात्र राजू सिंह चौहान (रोल न 31106) ने एक वैकल्पिक विषय में 182 अंक प्राप्त किए थे जिनका अंक स्केलिग के बाद 188 अंक कर दिया गया। इसी तरह दो अन्य छात्र जिन्होंने एक सांख्ययिकी में 235-235 अंक प्राप्त किए थे। स्केलिंग के बाद उसे शून्य बना दिया गया। मानव शास्त्र विषय के छ: विद्यार्थियों (16834, 102564, 40912, 77632, 97129, 102526) ने 300 में प्रत्येक ने 200 अंक प्राप्त किए थे। जिसे स्केलिंग के बाद क्रमश: 170, 210, 205, 196, 196, और 239 कर दिया गए थे। इसी परीक्षा में वषाZ डोगरे का कर्ट माक्र्स से उपर 1290 अंक प्राप्त करने के बाद भी चयन नहीं किया गया। जबकि उससे नीचे 1274, 1273, 1247 अंक प्राप्त करने वाले कई अभ्यार्थियों का चयन कई पदों पर चयनित किया गया है। इसी प्रकार इस परीक्षा की टॉपर रही पदमीनि भोई जिन्होंने कुल अंक 1481 प्राप्त किए थे और स्केलिग के बाद इसका कुल अंक 1501 कर दिया गया। साथ ही कुन्दर कुमार जिन्होंने कुल अंक 1523 अंक प्राप्त किए थे। जिनका स्केलिंग के बाद कुल अंक 1314 कर दिया गया। लेकिन कुन्दन का किसी भी पद पर चयन नहीं सका था।

इन्हीं आंकडे़ के आधार पर आवेदकों द्वारा बिलासपुर उच्च न्यायालय में रिट दायर की गई, तो आयोग के अध्यक्ष अशोक दरवाड़ी ने स्वीकार किया कि आयोग ने परीक्षा में बड़ी मात्रा में गड़बड़ी की है। जिस पर उच्चतम न्यायालय में केस चल रही है। जिन्हें वर्तमान मे जमानत पर रिहा किया गया है। साथ ही आयोग के एक अन्य सदस्य अमोद सिंह फरार है।
साभार: अपना पन्ना `` सूचना के अधिकार पर एक अर्द्धमासिक पत्रिका´´
अर्जुन कुमार बसाक