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25.4.15

एक मौत पर हजार शर्मनाक सियासत
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली में सरेआम फांसी लगाने वाले गजेन्द्र की मौत एक मुद्दा बन गई है। कितनी अजीब बात है कि हजारों लोगों के सामने एक शख्स रफ्ता-रफ्ता भाषणबाजियों के बीच अपनी सांसों की डोर को तोड़कर मौत की चौखट पर चला जाता है ओर सब मौत का लाइव तमाशा देखते हैं। कथित ईमानदार पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस व लोकतंत्र का चौथा खंबा मीडिया भी मुस्तैदी से उस वक्त मौजूद था। इंसानियत की गिरावट का शायद यह सबसे निचला पायदान है या दूसरे शब्दोें में कोढ़ग्रस्त इंसानियत की हकीकत। क्योंकि गजेन्द्र के साथ इंसानियत का भी सरेआम जनाजा निकला। गजेन्द्र अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी मौत एक बड़ा मुद्दा ओर सवाल है। राजनीति, संवेदनाओं के साथ ही वादों का सिलसिला भी चलता रहेगा, लेकिन उसके परिवार का दुःख शायद ही कम हो। 
तेजी से मुकाम हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी ने प्रचार के बाद हजारों की भीड़ जुटाई। रैली का मकसद खुद को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित करना था। विपक्षियों की नीतियों पर सवाल उठाना था। तीखे प्रहार करना था। पूर्व में कई पार्टियों से ताज्लुक रखकर एमएलए का चुनाव लड़ चुका गजेन्द्र भी इसमें शामिल हुआ। राजस्थान के दौसा जिले के नांगल झामरवाड़ा गांव में रहने वाला गजेन्द्र का परिवार आर्थिक सम्पन्न है। गांव में उसका रसूख था। उसकी हालत कृषि प्रधान देश के उन अन्नदाताओं जैसी कतई नहीं थी जो फसल बर्बादी पर खून के नीर बहाकर मुआवजे की आस लगाए हैं। वह रैली में खुद ही आया या बुलाया गया? यह अभी स्पष्ट नहीं है अलबत्ता उत्साही गजेन्द्र ‘आप’ का चुनाव चिन्ह् झाड़ू लेकर पेड़ पर चढ़ गया। उसके पास एक सफेद गमछा भी था। गजेन्द्र सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसको देखकर नहीं लगता था कि कुछ समय बाद वह शख्य लाश में तब्दील हो जायेगा। ऐसे उत्साहियों की भी कमी नहीं थी कि जो उसे देखकर इशारेबाजियां कर रहे थे। कार्यकर्ताओं से लेकर मंच पर बैठे दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल तक जानते थे कि पेड़ पर वह है। किसी ने उसे नीचे आने की सलाह तक नहीं दी। एक झटके में गजेन्द्र झूल गया। खबर मंच तक पहुंची, लेकिन राजनीति में इंसानियत की मौत हो चुकी थी। भाषणबाजी जारी नहीं। आरोप-प्रत्यारोप और किसानों के हितैषी होने के खोखले दावे। घटिया राजनीति का शायद यह गजेन्द्र की मौत जैसा लाइव सबूत था। 
गजेन्द्र की मौत पूरे देश की सुर्खियां बन गई। पूरे देश ने ‘आप’ को जिम्मेदार ठहराया। मौत के बाद भी जारी रही उनकी भाषणबाजी को शर्मिंदा करने वाला बताया, लेकिन इस भूल को मानने को कोई तैयार नहीं था। आप नेता आशुतोष का शर्मनाक बायान देखिए- ‘अगली बार ऐसा होगा, तो मैं मुख्यमंत्री जी से कहूंगा कि वह पेड़ पर खुद चढ़े और उस आदमी को आत्महत्या करने से रोकें।’ जिस दल को जनता ने उम्मीदों से सत्ता दी हो क्या उससे इस तरह की संवेदनहीनता की उम्मीद की जा सकती है। गजेन्द्र की मौत की खबर पर उसके परिवार को विश्वास ही नहीं हुआ। गजेन्द्र के परिजन मौत के लिए केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि वह आप के कहने पर ही दिल्ली गया था। वह सवाल उठा रहे हैं कि यदि केजरीवाल का कोई अपना होता, तो क्या तब भी भाषणबाजी जारी रखते? माहौल खिलाफ हुआ, तो केजरीवाल 43 घंटे बाद सामने आये ओर मीडिया पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि मीडिया मामले को तूल दे रहा है। उन्होंने माफी भी मांगी कि उनसे गलती हुई है। उनसे गलत हुई इतना समझने में भी एक मुख्यमंत्री को 43 घंटे लग गए। जिस बात को 10 साल का बच्चा भी समझ रहा था वही नहीं समझ पाए यह ओर भी आश्चर्य में डालने वाला है। उन्हें आपत्ति इस बात पर थी कि मीडिया गजेन्द्र की खबरें क्यों दिखा रहा है। यदि यही गलती किसी अन्य पार्टी में हुई होती, तो केजरीवाल के लिए स्थिति दूसरी होती तब वह मीडिया की बहुत सराहना करते। सवाल उठाए जा रहे हैं कि केजरीवाल बहुत जल्दी भूल गए जब शपथ ग्रहण के दौरान उन्होंने गाकर कहा था कि ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा यही पैगाम हमारा।’ वह किस भाईचारे की बात कर रहे थे। चुनाव से पहले ये तो तार काटने बिजली के खंबें पर चढ़ गए थे, लेकिन अब चुनाव जीत चुके हैं इसलिए पेड़ पर नहीं गए। सोशल मीडिया पर भी आम आदमी पार्टी शिकार बन रही है। कॉमेंट यहां तक हैं कि ‘कॉमेडी, ड्रामा, फाईट ओर इमोशन ‘आप’ के पास सबकुछ है।’ 
मामला चाहे जो भी हो, आम आदमी पार्टी ने हर मामले में बहुत जल्दी प्रगति की है। ईमानदारी के उनके अपने खुद के दावे हैं, लेकिन आपसी फूट व जनता की नाराजगी नीतियों से लेकर वादों तक भी सवाल खड़े करती हैं। ‘मुफ्त’ के सपनों की चुनौती से भी वह जूझ रही है। जनतंत्र को चुनाव में वह उम्मीदों के जहाज पर सवार कर चुकी है। यह अच्छे संकेत नहीं हैं जब लोग दिए हुए चंदे को भी वापस मांगने लगें। गजेन्द्र अब कभी वापस नहीं आयेगा, लेकिन सियासत और जांच दोनों साथ-साथ चलेंगी। उसकी मौत शर्म भी है और सबक भी। सवाल अब भी वही है कि गजेन्द्र की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है? अकेले ‘आप’ ‘हम’ या ‘सब’? 

24.4.15

दुुर्भाग्यपूर्ण किसान द्वारा खुदकुशी

दुुर्भाग्यपूर्ण किसान द्वारा खुदकुशी
आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर मे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आयोजित रैली मे राजस्थान से भाग लेने आये किसान द्वारा खुदकुशी करने का मामला बहुत ही  तो है ही साथ ही साथ इससे भी बड़ी दुुर्भाग्यपूर्ण बात और क्या हो सकती है कि देश की खेती एवं किसानो की बदहाली पर शर्म-सार होने के बजाये देश की राजनीतिक पार्टीयां अपनी-अपनी रोटीयां सेंकने मे व्यस्त हो गई। जहां तक आम आदमी पार्टी का सवाल है पार्टी को ऐसा लगता है कि सरकारें और राजनितिक पार्टियां महज प्रोपोगंडा से चलती हैँ, उसी तर्ज पर वे अपने सामने ही किसान को मरने देते हैँ पर किसानो की बदहाली के लिए मोदी और उनकी सरकार पर आरोप लगाते हुए लगातार लच्छेदार भाषण देते रहे और दिल्ली पुलिस पर दोषारोपण करते रहे, जबकि भाजपा विरोधी लोगो का ऐसा कहना है कि यदि राजस्थान सरकार जिन किसानो के फसले बर्वाद हुई उनको समय से मुआवजा दे देती तो किसान आत्म हत्या करने पर मजबूर न हुआ होता और तो और आत्म हत्या करने वाले किसान के परिवार को दिये जाने वाले मद्द को लेकर भी राजनीतिक पार्टीयां राजनीति करने लगी। इस दुुर्भाग्यपूर्ण हादसे मे कांग्रेस उपाध्यक्ष से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक के लोगो ने किसानो के साथ खड़े होने की बात कही गई है लेकिन जहां तक किसानो की वास्तविक समस्याओं को लेकर उन्हे हल करने व राहत पहूंचाने के लिये कोई भी राजनीतिक दल संजीदा नही दिखई दे रहा है। इन्ही सब बातो का परिणाम यह है कि पिछले दो-ढ़ाई दशकों से लगातार किसानों के खुदकुशी करने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। वर्ष 1991 नरसिंह राव एवं मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई नई आर्थिक नीतियां आज भी बदस्तूर जारी हैं, जबकि इस दौरान कई सरकारें आई और चली गईं। यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि परंपरागत सिंचाई की सीमित संसाधन, छोटी होती जोत, महंगा कर्ज, और बिजली-पानी की किल्लत जैसी समस्याएं वर्तमान समय मे भी बने रहने के कारण बदहाली के बावजूद किसान खुदकुशी जैसा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर है। किसानों की खुदकुशी करने का शिल-शीला नब्बे के दशक के मध्य काल से उस समय शुरू हुई जब उदारीकरण की नीतियों के अन्तर्गत खेती-किसानी को हाशिये पर ही धकेल दिया गया।
वर्तमान समय मे बेमौसम बारिश एवं ओलावृष्टि जैसे पृक्रतिक आपदाओं का सीधा संबंध पृथ्वी पर होने वाले जलवायु परिवर्तन से है लेकिन ऐसे सभी कारणो से किसानों की जो दुर्दशा हो रही है उसका संबंध हमारी अदूरदर्शीता,आर्थिक नीतियों एवं नीति निर्माताओं से ही है। गिरते भूजल स्तर, बढ़ती मजदूरी महंगे बीज, उर्वरक और कीटनाशक के कारण खेती की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण खेती बहुत महंगी होती चली गई इस कारण किसान के बिना कर्ज लिए खेती संभव नहीं रह गई है।
किसानो की बदहाली का दूसरा सबसे बड़ा कारण पेट के लिए नहीं, वल्कि बाजार की खेती का बढ़ता प्रचलन है। कुछ वर्षो पहले तक किसान अपने खेत में विविध प्रकार के फसलों की बुवाई करता था और पशुपालन उनके जीवन का अभिन्न अंग हुआ करता था, जिससे किसानों को फसलो से होने वाले नुकसान की कुछ भरपाई भी हो जाया करती थी। मुसीबत में संयुक्त परिवार मे रहने के कारण उनका एक बहुत बड़ा संबल हुआ करता था, लेकिन वर्तमान समय में किसान एक ही फसल बोया करता है। अपने ही खेत में नहीं, बल्कि पट्टे पर जमीन लेकर भी वह एक ही फसली खेती कर पा रहा है। गृहस्थी का पूरा दारोमदार उस फसल की बाजार में बिक्री से प्राप्त धन पर ही रहता है उपर से बाजार का चरित्र अपने आप में शोषणकारी ही रहता है। उदाहरण के लिए पिछले साल किसानों को आलू की अच्छी कीमत मिली थी। इससे उत्साहित होकर इस साल किसानों ने खेतो को पट्टे पर लेकर और साहूकारों से कर्ज लेकर आलू की खेती की, परन्तु जब फसल तैयार होने वाली थी उसी समय अचानक आई बारिश ने किसानो का पूरा गणित ही बिगाड़ कर रख दिया।
वर्तमान समय उदारीकरण के दौर में सरकार ने कृषि व्यापार का उदारीकरण तो कर दिया, लेकिन भारतीय किसानों को वे सुविधाएं उपल्बध नहीं करा पाई कि जिससे वे विश्व बाजार में अपनी उपज को बेच सकें। दूसरी तरफ विकसित देशों की सरकारें और एग्रो बिजनेस कंपनियां भारत के विशाल बाजार पर अपना कब्जा जमाने के लिय कोई भी मौका नहीं छाड़ना चाहती हैं। पिछले चार सालो से बाजार में चीनी की कीमत जस की तस बनी हुई है, जबकि इस दौरान न केवल चीनी उत्पादन की लागत, बल्कि गन्ना के खरीद मूल्य में भी बढ़ोत्तरी हो चुकी है। इसका परिणाम यह हुआ कि चीनी मिलें घाटे में चल रही हैं और गन्ना किसानों को अपने बकाये के भुगतान के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है। कुछ साल पहले यही स्थिति खाद्य तेल के साथ भी घटित हुई थी। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते के कारण अब देश में सस्ते पामोलिव तेल का आयात बढ़ा तो तिलहनी फसलों की खेती घाटे का सौदा बन कर रह गई। एक बड़ी समस्या यह भी है कि कृषि उपजों की सरकारी खरीद के सीमित नेटवर्क है। जिन राज्यों में सरकारी खरीद का नेटवर्क नहीं है वहां किसानों को अपनी उपज को औने-पौने दामों पर ही बेचने के लिए मजबूर है। उदारीकरण के समर्थक भले इसे अपनी कामयाबी बताएं, लेकिन सच्चाई यह है कि आज किसान एक मजदूर बनकर रह गया है।

20.4.15

राहुल जी निराश मत होईए,आपका जवाब हम देई देते हैं

मित्रों,आज कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जी काफी खुश हैं और काफी दुःखी भी। आप कहेंगे ऐसा कैसे हो सकता है तो फिर आप राहुल जी को नहीं जानते हैं। वे स्थिरबुद्धि हैं इसलिए एकसाथ ऐसा कर लेते हैं। माननीय युवराज जी इस बात से काफी खुश हैं कि उन्होंने जिन्दगी में पहली बार अच्छा भाषण किया है। वैसे यह मुगालता उनको हर बार हो जाता है जब-जब वे भाषण करते हैं लेकिन कुछ ही समय बाद दूर भी हो जाता है। खैर श्री गांधी को इस बात से भारी सदमा लगा है कि भाजपा नेतागण उनकी बातों का सही-सही जवाब नहीं दे पाए। पता नहीं उनकी दृष्टि में सही जवाब क्या हो सकता है।
मित्रों,चूँकि मुझसे श्री गांधी का दुःख देखा नहीं जा रहा है इसलिए हमने फैसला किया है कि राहुल जी की बातों और उनके सवालों का जवाब हम ही दे देते हैं। वैसे हम न तो सांसद हैं और न ही नेतारूपी अभिनेता लेकिन हमारी आदत रही है अनाधिकार चेष्टा करने की। सो हम इस बात की बिना परवाह किए कि किसी को हमारी चेष्टा से दुःख हो सकता है हम राहुल गांधी जी का दुःख दूर कर देते हैं। आखिर परोपकार भी तो कोई चीज होती है।
मित्रों,हमारे राहुल जी का कहना है कि मोदी सरकार सूट-बूटवालों की सरकार है। राहुल जी कितने बड़े पाखंडी हैं जो उनको यह पता ही नहीं है कि भारत को सबसे ज्यादा नुकसान खादी के बने सस्ते कपड़े पहननेवालों ने पहुँचाया है। उनके पिताजी के नानाजी भी खादी ही पहनते थे लेकिन उनका कपड़ा पेरिस से धुलकर आता था। आज भारत में सबसे ज्यादा कालाधन अगर किसी के पास है तो वे खादीवाले ही हैं।
मित्रों,राहुल जी ने निश्चित रूप से स्वामी विवेकानंद के संस्मरण नहीं पढ़े हैं अन्यथा वे कपड़ों की बात ही नहीं करते। हुआ यूँ था कि जब विवेकानंद जी पहली बार अमेरिका की यात्रा पर गए तो उनके गेरूए वस्त्र को देखकर अमेरिकी हँस पड़े। तब स्वामी जी ने पूरी विनम्रता के साथ अमेरिकियों से पूछा कि आपके यहाँ व्यक्ति की पहचान क्या उनके कपड़ों से निर्धारित होती है उनके कर्म से नहीं? राहुल जी को भी नरेंद्र मोदी के कपड़ों को नहीं उनके कर्मों को देखना चाहिए। नरेंद्र मोदी तो ऐसी शख्सियत हैं कि जो अपने कपड़े तक को नीलाम कर देते हैं और प्राप्त धनराशि को सरकारी खजाने में जमा कर देते हैं। नरेंद्र मोदी राहुल जी की तरह पाखंडी नहीं हैं कि खादी पहनकर चांदी के बरतन में भोजन करें या चांदी की पलंग पर सोयें बल्कि वे तो पूर्ण योगी हैं,ज्ञान योगी,कर्म योगी और राज योगी भी। साथ ही राहुल जी को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मोदी जी के देश-विदेश में सूट पहनने से भारत को लाभ हो रहा है या हानि हो रही है? वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी के सूट पहनने या शॉल ओढ़ने से भारत के उस वस्त्रोद्योग को बढ़ावा मिलता है जो आज भारत के सबसे ज्यादा श्रमिकों को रोजगार दे रहा है।
मित्रों,वास्तविकता तो यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार असली सूट-बूटवालों की सरकार थी जिसमें कौन संचार मंत्री बनेगा का फैसला रतन टाटा,मुकेश अंबानी,नीरा राडिया और बरखा दत्त करते थे न कि मोदी की सरकार सूट-बूटवाली है जिसके समय सहारा श्री तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं,मुकेश अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,वोडाफोन परेशान है,विजय माल्या बेहाल है आदि-आदि। मोदी की सरकार तो गरीबों की सरकार है जिसकी सारी नीतियाँ और कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिए हैं।
मित्रों,इसी तरह राहुल जी नितिन गडकरी के बयान को भी अपने भाषण में उद्धृत किया है लेकिन उन्होंने ऐसा करते हुए थोड़ी-सी धूर्तता भी की है। उन्होंने गडकरी जी के बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया है। गडकरी जी ने न सिर्फ यह कहा था कि किसानों की मदद न तो सरकार ही कर सकती है और न तो भगवान ही बल्कि यह भी कहा था कि उनकी सरकार चाहती है कि किसानों आर्थिक रूप से इतने सक्षम हो जाएँ कि उनको न तो भगवान और न ही सरकार का आसरा ही करना पड़े बल्कि वे हर तरह की क्षति को खुद अपने बल पर झेल सकें। राहुल जी क्या बताएंगे कि गडकरी जी ने क्या गलत कहा था? आज किसान अगर फसल खराब होने पर आत्महत्या करने को बाध्य हो रहे हैं तो यह कोई 14 महीने में पैदा हुई स्थिति नहीं है बल्कि 70 सालों में किसानों को इतना विपन्न बना दिया गया है कि उनको अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। 70 साल पहले कहा जाता था उत्तम खेती,मध्यम बान,अधम चाकरी भीख निदान। क्यों आज यह कहावत उल्टी हो गई है? क्यों आज भी किसान सिंचाई के लिए रामभरोसे है? क्यों आज किसान खेती करना नहीं चाहता? क्या 14 महीने पहले किसानों की स्थिति अच्छी थी? गुजरात के किसानों की जमीन अगर मोदी सरकार ने जबरन छीना था तो वहाँ के किसानों ने कभी विरोध क्यों नहीं किया? कल की राहुल की रैली में कितने ऐसे किसान थे जो गुजरात से आए थे? गुजरात के किसानों की स्थिति बाँकी राज्यों के किसानों से अच्छी क्यों है?
मित्रों,क्या राहुल जी यह नहीं जानते हैं कि कृषि राज्य सूची का विषय है? किस किसान की कितनी फसल खराब हुई इसका सर्वेक्षण करवाना संवैधानिक रूप से किसका काम है केंद्र की सरकार का या राज्य की सरकार का? केंद्र सरकार तो बार-बार राज्य सरकारों से इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांग रही है। अगर राज्य सरकारें इस काम को गंभीरता से नहीं ले रही हैं तो इसके लिए दोषी कौन है राज्य सरकार या नरेंद्र मोदी? हाँ,अगर राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार मुआवजा नहीं देती है तो जरूर वह दोषी होगी लेकिन केंद्र तो पैसे राज्य सरकारों को ही दे सकती है। फिर भी बाँटना तो राज्यों की सरकारों को ही है। अगर बाँटने में भ्रष्टाचार होता है और मुआवजे को तंत्र सोख जाता है तो फिर दोषी कौन होगी राज्य की या केंद्र की सरकार?
मित्रों,हमारे राहुल जी को इस बात का भी दुःख है कि मोदीजी किसानों से मिलने नहीं गए। क्या किसानों का भला करने के लिए सिर्फ उनसे मिल लेना ही काफी होगा? हमारा उद्देश्य किसानों से मिलना होना चाहिए या उनके दुःखों का निवारण करना? क्या उनकी समस्याओं को उनके खेतों में गए बिना दूर नहीं किया जा सकता है? अगर नहीं तो पिछले 70 सालों में किसानों की हालत दिन-ब-दिन खराब क्यों होती चली गई जबकि 65 सालों तक कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थन से बनी सरकार केंद्र में सत्ता में थी? क्या राहुल जी द्वारा लीलावती-कलावती की झोपड़ी में रात गुजारने से देश की गरीबी दूर हो गई? क्या राहुलजी बताएंगे कि आजादी के 70 साल बाद भी अगर भारत की 65 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है तो इसके लिए कौन सबसे ज्यादा जिम्मेदार है? भारत के कृषि मंत्री आसमानी आपदा के आने के बाद से ही प्रत्येक राज्य का दौरा कर रहे हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं। भारत के गृहमंत्री खेतों में जाकर स्वयं बालियों से दानों को निकालकर देख रहे हैं। क्या पीएम को उन्होंने अपनी रिपोर्ट नहीं दी होगी? फिर मोदी जी को हर खेत पर जाने की क्या आवश्यकता है? क्या पीएम के हर खेत का दौरा कर लेने मात्र से ही किसानों की समस्त समस्याओं का समाधान हो जाएगा? या इसके लिए इस तरह की योजनाएँ बनानी पड़ेंगी या संजीदगी से लागू करनी पड़ेगी कि खेती फिर से गुलाम भारत की तरह भारत का सबसे उत्तम व्यवसाय हो जाए? और हम समझते हैं कि मोदी सरकार इसी दिशा में काम भी कर रही है।
मित्रों,सत्ता और विपक्ष में से कौन किसानों की तरफ है और कौन वाड्रा की तरफ यह राहुल जी को बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। आँकड़े गवाह हैं कि किसानों की सबसे ज्यादा जमीन पिछले दिनों हरियाणा में कांग्रेस की सरकार ने ही छीनी है। जमीन का अधिग्रहण होने बाद भी जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा न कि उद्योगपतियों के पास। किसानों और गरीबों के नाम की माला जपते-जपते मुँह में राम बगल में छुरी को चरितार्थ करनेवाले कांग्रेसियों ने किसानों और गरीबों की हालत कितनी चिंताजनक बना दी यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। मोदी जी ने पहली बार किसानों की मूल समस्या को पकड़ा है और वह है सिंचाई के साधन नहीं होना और फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सिंचाई योजना शुरू की है और कहा है कि हम किसानों को उसकी लागत से ड्योढ़ा दाम देंगे।
मित्रों,राहुल जी और पूरा विपक्ष परेशान है कि मोदी इतनी विदेश-यात्रा क्यों करते हैं तो उनको पता होना चाहिए कि मोदी विदेश भी गए थे तो देश के लिए ही न कि छुट्टियाँ मनाने या गुप्त-यात्रा पर गए थे।

मित्रों,लगता है कि राहुलजी ने अभी तक नरेंद्र मोदी को पीएम के रूप में स्वीकार नहीं किया है तभी तो वे कभी मनमोहन सिंह को पीएम कह जाते हैं तो कभी कहते हैं कि आपके पीएम जबकि उनको कहना चाहिए था हमारे पीएम,देश के पीएम।
मित्रों,हम अंत में राहुल जी को बता देते हैं कि मोदी सरकार ने पिछली बार लोकसभा में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में कौन-कौन से परिवर्तन किया था हो सकता है कि वे अपने थाईलैंड प्रवास के दौरान उनको पढ़ने का समय नहीं मिला होगा-
01. खेती योग्य जमीन दायरे में नहीं
मोदी सरकार ने पहले संशोधन में खेती योग्य भूमि को अधिग्रहित करने का भी प्रस्ताव शामिल किया था। लेकिन अब लोकसभा में लाए गए बिल में संशोधन कर दिया गया है। अब बहुफसली भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। साथ ही इंडस्ट्रियल कॉरीडोर के लिए सीमित जमीन लिए जाने का फैसला लिया गया है। इससे किसानों के एक बड़े वर्ग को राहत मिलेगी।
02. मंजूरी जरूरी
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के मुताबिक अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी किसानों की मंजूरी का प्रावधान था। उसे मोदी सरकार ने नए संशोधन में खत्म कर दिया था लेकिन अब लोकसभा में पास किए गए बिल के मुताबिक सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए होने वाले अधिग्रहण में किसानों की मंजूरी भी जरूरी होगी। इसी तरह से आदिवासी क्षेत्रों में अधिग्रहण के लिए पंचायत की सहमति जरूरी होगी।
03. अपील का अधिकार
मोदी सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में शामिल अपील के अधिकार को खत्म कर दिया था। पर अब संशोधन के बाद आए बिल में किसानों को अपील का अधिकार वापस मिल गया है। अब वे अधिग्रहण के किसी भी मामले में अपील कर सकेंगे। इससे उनके अधिकारों की सुरक्षा को बल मिलेगा।
04. मिलेगी नौकरी
पहले चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून में प्रभावित किसानों को मुआवजा देने का प्रावधान था लेकिन किसी को नौकरी नहीं दी जाती थी। संशोधन के बाद लोकसभा में पास हुए बिल में प्रभावित परिवार के किसी एक सदस्य को नौकरी दिए जाने का प्रावधान किया गया है।
05. इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अधिग्रहण
भूमि अधिग्रहण बिल में शामिल किए गए एक प्रावधान से रेलवे ट्रेक और हाइवे के एक किलोमीटर दायरे में रहने वालों को परेशानी हो सकती है। सरकार ने फैसला कर लिया है कि इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अब रेलवे ट्रैक और हाईवे के दोनों तरफ एक किलोमीटर तक की जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है। संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल के मुताबिक बंजर जमीनों के लिए अलग से रिकॉर्ड रखा जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

19.4.15

भारतीय नेताओं का निजी जीवन और देशहित

मित्रों,वैसे तो हर व्यक्ति को निजता का मौलिक अधिकार होता है लेकिन जब व्यक्ति सार्वजनिक जीवन से जुड़ा हुआ हो और उसकी ऐय्याशी व रंगरेलियों की वजह से देश-प्रदेश का हित प्रभावित होता हो तब जनता को अधिकार होना चाहिए यह जानने का कि उसका नेता कैसा है और क्या कर रहा है। पंडित नेहरू से लेकर नीतीश कुमार तक के बारे में समय-समय पर कई तरह की अंदरखाने की बातें बाहर आती रही हैं जिससे भारत की जनता को शक होता रहता है कि कहीं इन नेताओं ने भी मुगल बादशाह जहाँगीर की तरह शराब,कबाब और शबाब के बदले हिन्दुस्तान को नूरजहाँ के पास गिरवी तो नहीं रख दिया था या दिया है या फिर पैसों के बदले बेच तो नहीं दिया।
मित्रों,सवाल उठानेवाले लोग तो भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दाम्पत्य जीवन को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं लेकिन नरेंद्र मोदी तो काफी पहले से ही संन्यासी हैं। हाँ यह बात जरूर है कि अगर उनको संन्यास ही लेना था तो फिर उन्होंने शादी क्यों की? क्यों एक अबला का जीवन बर्बाद किया? हाँ यह भी सही है कि अभी तक नरेंद्र मोदी के ऊपर विवाहेतर संबंध जैसा कोई आरोप नहीं है जो यह दर्शाता है कि मोदी पूरी निष्ठा के साथ संन्यास के नियमों का पालन कर रहे हैं।
मित्रों,अब कांग्रेस के कुछ वर्तमान नेताओं को देखिए जैसे कि अभिषेक मनु सिंघवी,दिग्विजय सिंह आदि। लगता है जैसे इन लोगों का चरित्र शब्द से ही कुछ भी लेना-देना नहीं है। इसी तरह हमारे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के बारे में भी कई-कई तरह की बातें हवाओं में तैरती रहती हैं। नीतीश जी का दाम्पत्य जीवन भी बड़ा रहस्यमय रहा है। उनके बड़े भैया लालू जी की पत्नी ने तो एक बार खुलेआम मंच पर से ही बिहार के सड़क निर्माण मंत्री ललन सिंह को उनका साला बता दिया था जबकि दरअसल में ललन सिंह जी नीतीश जी के साले तो क्या जाति-बिरादरी के भी नहीं हैं। इसी तरह से पिछले साल लालू जी के लाड़ले तेजस्वी यादव जी का भी एक बेहद कामुक फोटो फेसबुक पर वाइरल हो गया था। कहा तो यह भी जाता है कि यह तस्वीर किसी और ने नहीं बल्कि उनके मामाश्री सुभाष जी ने ही खींची थी।
मित्रों,कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी यूपीए की सरकार के समय बराबर विदेश की गुप्त-यात्राएँ किया करती थीं और मीडिया को निजता की दुहाई देती रहती थीं। अभी राहुल जी दो महीने तक गुप्त रहने के बाद प्रकट हुए हैं। इन दो महीनों में वे कहाँ-कहाँ रहे और क्या-क्या किया यह देश की जनता को क्यों नहीं जानना चाहिए? अगर सबकुछ गुप्त ही रखना था तो फिर सार्वजनिक जीवन में आना ही नहीं चाहिए था। आखिर ऐसी कौन-सी बात है जिसको वे और उनकी माँ जनता के साथ साझा नहीं करना चाहते? कहीं उनलोगों ने गुप्त-यात्राओं के दौरान कोई ऐसा काम तो नहीं किया जिससे भारत के दूरगामी या अल्पकालिक हितों को नुकसान होता हो? अगर आपको जनता का मत चाहिए,अगर आप चाहते हैं कि जनता आपके हाथों में देश या प्रदेश की बागडोर सौंप दे तो फिर जनता को निश्चित रूप से यह जानने का अधिकार भी है कि आप क्या हैं,आपका चरित्र कैसा है? ऐसा हरगिज नहीं चलेगा कि पानी में तैरते हुए बर्फ की तरह आपके व्यक्तित्व का दसवाँ हिस्सा ही आँखों के आगे हो। आखिर आज भी भारत कश्मीर और अरूणाचल में नेहरू की गलतियों का नतीजा ही तो भुगत रहा है। उसी नेहरू की गलतियों का जिनके कथित रूप से लेडी माउंटबेटन से अंतरंग संबंध थे और ऐसा दावा सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि माउंटबेटन की बेटी भी कर रही है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

13.4.15

कैंसर – कारण और निवारण



दोस्तों,  आज की प्रेस मीट शानदार रही हिट रही, सभी पत्रकार भाई आए और बड़े इत्मिनान से सारी बातें सुनी। 

डॉ बडविग को मेरा एक ट्रिब्यूट 

प्रेस नोट - कैंसर – कारण और निवारण 

प्रेस क्लब कोटा दिनांक अप्रेल 13, 2015 

कोटा में 12 अप्रेल, 2015 को प्रेस क्लब में 1 बजे डॉ. वर्मा ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि 1931 में नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. ओटो वारबर्ग ने सिद्ध किया कि यदि कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति 48 घन्टे के लिए 35 प्रतिशत कम हो जाए तो कैंसर हो जाता है। सामान्य कोशिकाएँ अपनी जरूरतों के लिए ऑक्सीजन उपस्थिति में ही ऊर्जा बनाती है। जबकि कैंसर कोशिकायें ग्लूकोज को फर्मेंट करके ऊर्जा प्राप्त करती हैं। यदि कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे तो कैंसर का अस्तित्व संभव ही नहीं है। डॉ. वारबर्ग ने यह भी बतलाया कि कोशिका में ऑक्सीजन को आकर्षित करने के लिए दो तत्व जरूरी होते हैं पहला सल्फरयुक्त प्रोटीन जो कि पनीर में पाया जाता है और दूसरा एक फैटी एसिड जिसे पहचानने में वे भी नाकामयाब रहे। डॉ. जोहाना ने वारबर्ग के शोध को जारी रखा। 1949 में उन्होंने पेपरक्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की जिससे वह रहस्यमय फैट पहचाना यह फैट था अल्फा लिनोलेनिक एसिड जो अलसी के तेल में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह ओमेगा-3 फैट है। इस तकनीक द्वारा ही मालूम हुआ कि इस लिनोलेनिक एसिड में सजीव, सक्रिय और ऊर्जावान इलेक्ट्रोन्स की अपार संपदा होती है। ये इलेक्ट्रोन ही कोशिका में ऑक्सीजन को खींचते हैं और इनकी उपस्थिति में कैंसर का अस्तित्व ही संभव नहीं है। फिर क्या था उन्होने मरीजों को अलसी का तेल तथा पनीर देना शुरू कर दिया। नतीजे चौंका देने वाले थे। कैंसर के इलाज में सफलता की पहली पताका लहराई जा चुकी थी। कैंसर के रोगी ऊर्जावान और स्वस्थ दिख रहे थे, उनकी गांठे छोटी हो गई थी। इस तरह जोहाना ने अलसी के तेल और पनीर के मिश्रण और स्वस्थ आहार विहार को मिला कर कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया। इसमें अलसी के तेल, अपक्व जैविक आहार, मेडीटेशन, कॉफी एनीमा और सोडा बाइकार्ब बाथ को शामिल किया गया है। यह उपचार कैंसर के हर रोगी तक पहुँचना चाहिए और सरकार को इसकी जागरुकता और शोध को प्रोत्साहन देना चाहिए। इस उपचार से 90% प्रामाणिक सफलता मिलती है। उन्हें नोबल प्राइज के लिए 7 बार नोमिनेट किया गया। बुडविग ने यह भी साबित किया कि ट्रांसफैट से भरपूर वनस्पति और रिफाइंड तेल मनुष्य के सबसे बड़े दुष्मन हैं और इन्हें प्रतिबंधित कर ने की पुरजोर वकालत की थी। नियमित अलसी के तेल का सेवन कर के इस रोग से बचा जा सकता है। इस वार्ता में फ्लेक्स अवेयरनेस सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. ओ.पी.वर्मा ने बतलाया कि कैंसर एक कमजोर व असहाय रोग है और बुडविग प्रोटोकोल इसका सस्ता, सरल, सुलभ, सुरक्षित और संपूर्ण समाधान है। डॉ. ओम प्रकाश वर्मा बुडविग कैंसर केयर 7-बी-43, महावीर नगर तृतीय, कोटा राज. http://budwig.in Mob 9460816360

नमो की शॉल और प्रेस्टीच्यूट्स

मित्रों, पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर जनरल वीके सिंह द्वारा मीडिया के एक हिस्से को प्रेस्टीच्यूट्स कहे जाने का विवाद छाया हुआ है। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा इस बात को लेकर मुँह फुलाये बैठा है कि उनकी तुलना प्रौस्टीच्यूट्स यानि वेश्याओं के साथ क्यों कर दी गई। जाहिर है कि जनरल साहब को ऐसा नहीं करना चाहिए था बल्कि बिकाऊ मीडिया की तुलना तो किसी जानवर के साथ करनी चाहिए थी।
मित्रों,वेश्या तो सिर्फ शरीर का सौदा करती हैं यह बिकाऊ मीडिया तो रोजाना अपने ईमान का सौदा करती है। इनकी हालत तो कुत्तों जैसी है जो रोटी को देखते ही मुँह से लार टपकाने लगते हैं। इन प्रेस्टीच्यूट्स की आमदनी का आप हिसाब ही नहीं लगा सकते हैं। इनका वेतन होता तो हजारों और लाखों में होता है लेकिन इनकी वास्तविक आय करोड़ों में होती है। वरना क्या कारण है कि किसी पत्रकार के पास दिल्ली में करोड़ों की कोठी है तो किसी के पास नोएडा में अपना मॉल है?
मित्रों,अभी जब भारत के पीएम नरेंद्र मोदी फ्रांस गए थे तो उन्होंने एक शॉल ओढ़ रखी थी जिस पर कथित रूप से N M लिखा हुआ था।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587161033845800960

महान पत्रकार सागरिका घोष ने बिना सोंचे-समझे,बिना किसी प्रमाण के नमो पर यह आरोप लगा दिया कि उनके द्वारा ओढ़ी गई यह शॉल लुईस व्हिटन कंपनी द्वारा बनाई गई थी जबकि लुईस व्हिटन का कहना है कि वो ऐसे शॉल तो बनाती ही नहीं है।

https://twitter.com/search?q=sagrika%20ghose&src=tyah

इसी तरह बिकाऊ मीडिया ने नरेंद्र मोदी के शूट को लेकर भी अफवाह उड़ाई थी और बाद में बिना विलंब किए माफी भी मांग ली थी। लोकसभा चुनावों के समय इसी बिकाऊ मीडिया का एक चैनल एक नेता को जबर्दस्ती क्रांतिकारी,बहुत ही क्रांतिकारी साबित करने पर तुला हुआ था। हद है बेहयाई की कि पहले कुछ भी बोल दीजिए और जब वह झूठ साबित हो जाए तो बेरूखी के साथ माफी मांग लीजिए।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587189427065135104

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस-राज में जमकर मलाई चाभनेवाली बिकाऊ मीडिया ने बार-बार की फजीहत के बाद भी हार नहीं मानी है और अभी भी बेवजह के विवाद पैदा करने की कोशिश करती रहती है। आपको याद होगा कि मनमोहन सिंह की सरकार ने इस दलाल मीडिया का वर्चस्व इस कदर बढ़ा हुआ था कि नीरा राडिया और बरखा दत्त मंत्रियों की सूची तक बनाने में दखल रखते थे और नरेंद्र मोदी की सरकार आते ही इनलोगों के ऐसे बुरे दिन आ गए कि अब जब पीएम विदेश जाते हैं तो इन लोगों को अपनी जेब से भाड़ा लगाकर समाचार कवर करने जाना पड़ता है। ऐसे लोगों का देशहित से भी पहले भी कुछ भी लेना-देना नहीं था और आज भी नहीं है बल्कि इनके लिए तो अपना स्वार्थ ही सबकुछ है। इस बिकाऊ मीडिया को आज भी इस बात का भ्रम है कि वह जो कुछ भी कह या दिखा देगी देश की जनता उसको आँखें बंद करके सच मान लेगा। जबकि सच्चाई तो यह है कि आज की सबसे शक्तिशाली मीडिया न तो प्रिंट मीडिया है और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया बल्कि सोशल मीडिया है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ न तो कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा,सब बराबर हैं। एक ऐसा पात्र है जो पलभर में दूध को दूध और पानी को पानी कर देता है। इसलिए अच्छा हो कि प्रेस्टीच्यूट्स जल्दी ही सही रास्ते पर आ जाएँ और फिजूल की अफवाहें फैलाना बंद कर दे नहीं तो यकीनन उनकी हालत ऐसी हो जाएगी कि वे सच भी बोलेंगे तो लोग उसे झूठ समझेंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

4.4.15

मेक इन इंडिया में बाधक बना विपक्ष

मित्रों,यह गहन चिंतन का विषय है कि राजनीति को किसके लिए होनी चाहिए। राजनीति अगर सिर्फ राज के लिए की जाती है तो वह राजनीति है ही नहीं बल्कि राजनीति राज्य के लिय,राज्य की भलाई के लिए की जानी चाहिए। परन्तु आदर्श और यथार्थ में हमेशा एक फर्क होता है,फासला होता है और इस फासले को इन दिनों आसानी से देखा जा सकता है भारत की केंद्रीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभा रही राजनैतिक पार्टियों की कथनी और करनी में।
मित्रों,लगभग सारी विपक्षी पार्टियाँ बात तो जनता की भलाई की कर रही हैं लेकिन काम कर रही हैं जनता और देश को नुकसान पहुँचाने का। चाहे किसी भी तरह का उद्यम या उद्योग हो उसके लिए सबसे जरूरी होती है जमीन। केंद्र सरकार 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में जरूरी बदलाव करना चाहती है क्योंकि इस कानून ने भूमि अधिग्रहण को लगभग असंभव ही बना दिया है। केंद्र सरकार चाहती है कि कानून में कुछ ऐसे सुधार किए जाएँ जिससे न तो किसानों को ही क्षति हो या न तो किसानों के साथ ही जबर्दस्ती हो और न ही राज्य के लिए उद्योगादि की स्थापना के लिए जमीन प्राप्त करना असंभव ही हो जाए।
मित्रों,कल अगर केंद्र सरकार देश की 65 प्रतिशत युवा आबादी को रोजगार देने में विफल रहती है तो यही विपक्ष शोर मचाएगा कि केंद्र वादे को पूरा नहीं कर पाया। क्या विपक्ष बताएगा कि बिना जमीन के उद्योग कहाँ खुलेंगे? क्या विपक्ष बताएगा कि अगर उद्योग नहीं खुलेंगे तो देश के बेरोजगार युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा? क्या विपक्ष के पास इसके लिए कोई वैकल्पिक योजना है? अगर विपक्ष के पास ऐसी कोई वैकल्पिक योजना नहीं है तो फिर उच्च सदन राज्यसभा को हथियार बनाकर भूमि अधिग्रहण बिल को रोकने का क्या औचित्य है? राज्यसभा का गठन तो इस उद्देश्य से किया गया था कि अगर लोकसभा से कोई गलती हो जाती है तो उसमें सुधार किया जा सके लेकिन जिस तरह से विपक्ष राज्यसभा में अपने बहुमत का देशहित के विरूद्ध दुरूपयोग कर रहा है उसने तो राज्यसभा के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जबकि आज पूरी दुनिया की शक्तियाँ भारत के मेक इन इंडिया में अपना अहम योगदान देने को तत्पर हैं यह विडंबनापूर्ण है कि भारत का विपक्ष इसमें रोड़े अँटका रहा है। कल अगर विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों में देसी-विदेशी पूंजी का निवेश नहीं होता है यही विपक्ष कहेगा कि मेक इन इंडिया का लाभ उनको जानबूझकर नहीं मिलने दिया गया। बिहार का ही उदाहरण अगर लें तो दीघा रेल सह सड़क पुल के लिए एप्रोच पथ के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण हो रही देरी के लिए स्वयं पीएम को राज्य के मुख्य सचिव से बात करनी पड़ रही है। पुल बनकर तैयार है लेकिन एप्रोच पथ नहीं बन पाने के कारण चालू नहीं हो पा रहा है। जब सुशासन बाबू की सरकार सड़क के लिए ही जमीन नहीं जुटा पा रही है तो फिर बिना उचित भूमि अधिग्रहण बिल के उद्योग के लिए कहाँ से हजारों-लाखों एकड़ जमीन लाएगी।
मित्रों,चाहे पक्ष हो या विपक्ष सबके लिए इंडिया फर्स्ट मूल मंत्र होना चाहिए लेकिन ऐसा परिलक्षित हो रहा है कि विपक्ष के लिए इंडिया प्राथमिकता सूची में कहीं है ही नहीं। उसको तो बस मोदी को नीचा दिखाना है,पराजित होते देखना है भले ही इससे देश को कितनी ही क्षति क्यों न उठानी पड़े। मगर ऐसा करते हुए विपक्ष को यह जरूर सोंचना चाहिए कि आज के युग में पब्लिक को बरगलाना आसान नहीं रह गया है। आज की जनता सब जानती है,सब समझती है,सब देखती है। आगे बिहार में विधानसभा चुनाव होना है और बिहार की जनता अपनी देशभक्ति और राजनैतिक-विवेक के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। बिहार की जनता को यह पता है कि मोदी सरकार को अगर राज्यसभा में बहुमत दिलवाना है तो उनको राज्य में ज्यादा-से-ज्यादा सींटें जीतकर भाजपा को देनी होगी। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि निकट-भविष्य में आनेवाले विधानसभा चुनावों में हारते-हारते विपक्ष का राज्यसभा से भी सूपड़ा साफ हो जाए। आखिर नकारात्मक और घोर स्वहितकारी राजनीति का यही परिणाम होता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

3.4.15

अल -शबाब के केन्या हिंसाचार के मायने -जगदीश्वर चतुर्वेदी


केन्या में अल-शबाब द्वारा किया गया गरिस्सा विश्वविद्यालय  नृशंस हत्याकांड निंदनीय है। इस घटना के जितने विवरण और ब्यौरे मीडिया में आ रहे हैं, उनसे अल-शबाब की आतंकी हरकतों का संकेत मात्र मिलता है। अल-शबाब के हमले में 147 लोग मारे गए इनमें अधिकतर लड़कियां हैं.तकरीबन 20 पुलिस और सुरक्षाकर्मी भी मारे गए हैं। यह हमला जिस तरह हुआ है उसने सारी दुनिया के लिए संकेत दिया है कि आतंकी हमेशा सुरक्षा की दृष्टि से  कमजोर इलाकों पर ही हमले करते हैं। इन हमलों के पीछे अल-शबाब की साम्प्रदायिक मंशाएं साफ दिख रही हैं, उनके निशाने पर गैर-मुस्लिम छात्र थे।
     उल्लेखनीय है यह संगठन केन्या में गैर-मुस्लिमों पर निरंतर हमले करता रहा है और इसे सोमालिया के  अल-कायदा के हिंसक हमलों के खिलाफ इस्तेमाल करने के मकसद से 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की शांतिसेना की मदद के लिए शामिल किया गया था। अल-शबाब को अफ्रीकी यूनियन सेना की मदद से मुख्य सघन आबादी वाले इलाकों में तैनात किया गया और  उसके वर्चस्व का विस्तार किया गया।  खासकर केन्या,सोमालिया और उगांडा में उसके नेटवर्क का विस्तार करने में संयुक्त राष्ट्रसंघ शांति सेना और अफ्रीकी यूनियन सेना की अग्रणी भूमिका रही है। यह संगठन कई बार आम जनता पर आतंकी हमले कर चुका है। खासकर गैर-मुस्लिमों पर हमले करने में इसकी अग्रणी भूमिका रही है।
   अल-शबाब का गरिस्सा विश्वविद्यालय में निरीह छात्रों पर हमला करने के पीछे क्या मकसद था यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है लेकिन इस घटना ने समूचे केन्या को हिलाकर रख दिया है, उल्लेखनीय है कुछ दिन पहले पाकिस्तान में इसी तरह का आतंकी हमला स्कूली बच्चों पर हुआ था। पैटर्न साफ है कि आतंकी संगठन शिक्षा संस्थानों पर हमले करके आम जनता में दहशत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में स्कूल में काम करने वाली नन पर हमला और बलात्कार उसी पैटर्न का अंग है।

      केन्या के जिस इलाके , गरिस्सा में यह हमला हुआ है वह बेहद गरीब और अभावग्रस्त है। यहां आमलोगों के पास कृषि आधारित काम-काज के अलावा कोई काम नहीं है। पशुपालन और कृषि ही उनकी आजीविका का आधार है, गरिस्सा वि वि में तकरीबन 900छात्र रहते हैं और जिस समय(3अप्रैल2015) शाम को पांच बजे यह आतंकी हमला हुआ उस समय विश्वविद्यालय में हलचल थी।  इनमें से 147 लोग घटनास्थल पर ही मारे गए ।  गरिस्सा विश्वविद्यालय में सभी छात्र 6 डोरमेट्री में रहते हैं। हमलावर आतंकी चुन-चुनकर ईसाईयों को खोज रहे थे। गरिस्सा विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कॉलिन वतनगोला ने कहा कि वह जब नहा रहा था तब उसने अचानक कैम्पस में गोलियां चलने की आवाजें सुनीं। गोलियों की आवाजें सुनने के साथ छात्रों ने अपने कमरे अंदर से बंद कर लिए,अध्यक्ष ने भी अंदर से कमरा बंद कर लिया था।गोला ने कहा  हम सिर्फ जूतों  और गोलियों की आवाजें सुन रहे थे,बीच बीच में अल-शबाब जिंदाबाद के नारे सुन रहे थे।
  अल-शबाब के आतंकियों ने बंदूक की नोंक पर जबरिया डोरमेट्री खुलवायीं और एक-एक छात्र से पूछा कि  कौन मुस्लिम है और कौन ईसाई है ? जिस छात्र ने अपने को ईसाई कहा उसे वहीं अलग करके गोलियों से भून दिया गया। छात्रसंघ के अध्यक्ष ने कहा प्रत्येक गोली के चलने पर उसे यही महसूस हो रहा था कि ये गोलियां अब मुझे भी लग सकती हैं। इस घटना के बाद बाकी बचे सभी छात्र गंभीर मानसिक यंत्रणा और आतंक की पीड़ा से गुजर रहे हैं। सारे केन्या में मातम फैला हुआ है।
      केन्या के आतंकी हमले का यही सबक है कि हर कीमत पर सभी धर्म के मानने वालों में प्रेम और सद्भाव बनाए रखें। भारत में जो लोग ईसाईयों पर हमले कर रहे हैं वे असल में उस अंतर्राष्ट्रीय आतंकी शिविर के मनसूबों को पूरा कर रहे हैं जो आतंकी कहलाते हैं और अपने को मुसलमानों का रखवाला भी कहते हैं। आतंकी हरकत चाहे वे किसी भी रुप में हो उसकी हम सबको एकजुट भाव से निंदा करनी चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि समुदायों में हर हाल में सद्भाव बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है ।








31.3.15

जिला पंचायत चुनाव में डाले गये वोटों में एक ही खाने में पायी गयी एक से अधिक सीलों से गोपनीयता भंग नहीं हुयी?
भाजपा के रणनीतिकारों के अनुसार उन्होंने जो व्यवस्था जमायी थी उससे एक वोट कम मिला तो कैसे? भाजपा के रणनीतिकारों को कांग्रेस के सदस्यों के साथ साथ अपनी खुद की पार्टी के सदस्यों को भी “मैनेज“ करना पडा। भाजपायी सूत्रों का दावा है कि जो एक वोट निरस्त हुआ है वो भाजपा के किसी जयचंद का ही है। प्रदेश कांग्रेस के सचिव राजा बघेल ने बहुत स्पष्ट शब्दों में यह कहा था कि हर चुनाव के बाद समीक्षा बैठक होना चाहिये और उसके अनुसार कार्यवाही होना चाहिये ना कि कभी भी किसी चुनाव को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगते रहें। इंका के वरिष्ठ नेता आशुतोष वर्मा ने अपने संबोधन में कहा था कि कांग्रेस के जिन उम्मीदवारों को जनादेश मिला हैं उन्हें सब नेता अपना मानें। अपनों में ज्यादा अपना तलाशने के प्रयास नुकसानदायक हो जाते हैं। लेकिन इतिहास में पहली बार कांग्रेस ने बहुमत होने के बाद भी जिला पंचायत पर अपना कब्जा बरकरार नहीं रख पायी जो कि पिछले चार चुनावों से बना हुआ था। इसे लेकर राजनैतिक हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हैं। बीते दिनों संपन्न इस चुनाव में तीन या चार मतपत्रों में एक ही प्रत्याशी के सामने वाले खाने में एक से अधिक सील लगी पायी गयीं। इन मतपत्रों में दो से लेकर चार और पांच सीले लगी पायीं गयीं। एक बात और आश्चर्य के साथ यह पायी कि सभी सीलें स्पष्ट रूप से दिखायी दे रहीं थी। क्या मात्र 19 वोटों में ऐसा करना गोपनीयता को भंग करने वाला कृत्य नहीं हैं? क्या इन वोटों को निरस्त नहीं किया जाना चाहिये था ? 
जिपं चुनाव में भाजपायी जयचंद की भी चर्चा-जिला पंचायत के चुनावों के बाद जयचंदों की चर्चा थमने का नाम ही ले रहीं है। भाजपा के रणनीतिकारों के अनुसार उन्होंने जो व्यवस्था जमायी थी उससे एक वोट कम मिला तो कैसे? भाजपा को 6 तथा उसकी बागी गोमती ठाकुर सहित कुल 7 मेम्बर थे। भाजपा के रणनीतिकारों का दावा है कि उन्होंने कांग्रेस के तीन मेम्बरों को मैनेज किया था। एक कांग्रेसी वोट उन्हें चंद्रशेखर चर्तुवेदी का विधायक मुनमुन राय के माध्यम से मिलना था।इस तरह भाजपा को अध्यक्ष के लिये 11 वोट मिलना थे लेकिन भाजपा को दस वोट ही मिले। और एक वोट निरस्त हो गया। भाजपायी सूत्रों का दावा है कि जो एक वोट निरस्त हुआ है वो भाजपा के किसी जयचंद का ही है। चूंकि भाजपा अल्पतम में होने के बाद भी चुनाव जीत गयी है इसीलिये वहां जयचंद की तलाश करने के बजाय जीत श्रेय लेने का सिलसिला जारी  है। अखबारों में विज्ञापनों की होड़ लगी हुयी हैं। भाजपा के बड़े नेताओं ्रके साथ जिले के इकलौते भाजपा विधायक कमल मर्सकोले और निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय की फोटो े प्रकाशित हो रही हैं और उन्हें इन चुनावों का कुशल रणनीतिकार माना जा रहा है।संगठन को सत्ता से प्रमुख मानने वाली भाजपा के हाल भी कंछ अलग थे। इन चुनावों में भाजपा के जिलाध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर की भूमिका भी सत्तासीनों के बगलगीर होने से ज्यादा और कुछ नहीं थी। इसके अलावा एक बात और सामने आयी है कि भाजपा के रणनीतिकारों को कांग्रेस के सदस्यों के साथ साथ अपनी खुद की पार्टी के सदस्यों को भी “मैनेज“ करना पडा।  
प्रदेश सचिव के कहने के बाद भी नहीं हो पायी कांग्रेस की समीक्षा बैठक-नव निर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों के अभिनंदन के लिये आयोजित बैठक में ही प्रदेश कांग्रेस के सचिव राजा बघेल ने बहुत स्पष्ट शब्दों में यह कहा था कि हर चुनाव के बाद समीक्षा बैठक होना चाहिये और उसके अनुसार कार्यवाही होना चाहिये ना कि कभी भी किसी चुनाव को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगते रहें। इसके पूर्व इंका के वरिष्ठ नेता आशुतोष वर्मा ने अपने संबोधन में कहा था कि कांग्रेस के जिन उम्मीदवारों को जनादेश मिला हैं उन्हें सब नेता अपना मानें। अपनों में ज्यादा अपना तलाशने के प्रयास नुकसानदायक हो जाते हैं। इन्हीें कांग्रेसी मेम्बरों में से जिन्हें ज्यादा मेम्बर पसंद करें उसे अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष बनाना चाहिये। लकिन जब जिला पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव हुये तो दोनो ही पदों पर कांग्रेस का हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इस चुनाव के पहले इंका विधायक रजनीश सिंह के निावास स्थान बर्रा में जिले के कांग्रेस नेताओं की प्रदेश के पर्यवेक्षकों सुरेश राय और पाली भाटिया की उपस्थिति और जिला इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी की अध्यक्षता में एक बैठक रखी गयी जिसमें विधायक योगेन्द्र सिंह बाबा सहित सभी नेता शामिल हुये। इस बैठक में कांग्रेस समर्थित चंद्रशेख चर्तुवेदी के अलावा सभी सदस्य शामिल हुये जो कि बाद में भाजपा की ओर से उपाध्यक्ष बने। बैइक के उदबोधनों के बाद रात में अधिकांश नेता चले गये लेकिन पर्यवेक्षक सहित सभी सदस्य रात को वहीं रहें। सदस्यों की रायशुमारी के अलावा प्रत्याशी चयन के लिये और क्या प्रक्रिया अपनायी गयी इसकी जानकारी अधिकांश नेताओं को नहीं दी गयी और दूसरे दिन सुबह लगभग सवा दस बजे मेम्बरों की उपस्थिति में सुरेश राय ने अध्यक्ष पद के लिये ऊषा पटले के नाम के साथ ही उपाध्यक्ष पद के लिये अशोक सिरसाम के नाम की घोषणा कर दी थी और तत्काल ही वाहनों में सवार होंकर काफिला सिवनी रवाना कर दिया गया था। किसी भी मेम्बर की किसी भी नेता से बात ही नहीं हुयी कि मेम्बर इस फैसले से संतुष्ट हैं कि नहीं? यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि श्रीमती पटेल केवलारी क्षेत्र से निर्वाचित हुयीं है तो अशोक सिरसाम के निर्वाचन क्षेत्र में केवलारी विस के एक प्रमुख राजनैतिक केन्द्र भोमा सहित कुछ गांव आते हैं। उम्मीद की जा रही थी कि प्रदेश कांग्रेस सचिव राजा बघेल के निर्देश के अनुसार इस बार समीक्षा बैठक होगी जिसमें खुल कर सभी बातों की चर्चा होगी और जयचंदों को तलाश कर उन्हें दंड़ित किया जायेगा लेकिन ऐसा कुछ भी तक नहीं हो पाया है। चुनाव के बाद कुछ मेम्बरों ने कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह जरूर बताया कि अधिकांश मेम्बरों की राय अध्यक्ष पद के लिये चित्रलेखा नेताम और उपाध्यक्ष पद के लिये जयकेश ठाकुर के लिये थी लेकिन उन पर यह फैसला थोप दिया गया। यदि ऐसा भी हाता तो क्याा होता? यह कहना आसान नहीं हैं लेकिन इतिहास में पहली बार कांग्रेस ने बहुमत होने के बाद भी जिला पंचायत पर अपना कब्जा बरकरार नहीं रख पायी जो कि पिछले चार चुनावों से बना हुआ था। इसे लेकर राजनैतिक हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हैं। 
मतपत्र में एक से अधिक सील से क्या गोपनीयता भंग नहीं होती?-सिवनी जिला पंचायत में मात्र 19 सदस्य मतपत्र के माध्यम से वेट डालकर अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। बीते दिनों संपन्न इस चुनाव में तीन या चार मतपत्रों में एक ही प्रत्याशी के सामने वाले खाने में एक से अधिक सील लगी पायी गयीं। इन मतपत्रों में दो से लेकर चार और पांच सीले लगी पायीं गयीं। एक बात और आश्चर्य के साथ यह पायी कि सभी सीलें स्पष्ट रूप से दिखायी दे रहीं थी। क्या मात्र 19 वोटों में ऐसा करना गोपनीयता को भंग करने वाला कृत्य नहीं हैं? क्या इन वोटों को निरस्त नहीं किया जाना चाहिये था?ये ऐसे सवाल है जो कि इस चुनाव के बाद से सियासी हल्कों में चर्चित हैं। यह बात भी साफ है कि जनादेश के अनुसार तो यह चुनाव कांग्रेस को जीतना था। लेकिन भाजपा की जीत से यह स्पष्ट है कि कुछ मैनेज किया गया। जब मैनेजमेंट किया जाता है तो यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि यह पता चल जाये कि जिसये मैनेज किया है उसने वोट दिया है कि नहीं? क्या एक से अधिक लगायी गयी सीलें इसी योजना का हिस्सा थी? यदि ऐसे वोट निकले थे तो फिर निरस्त करने की मांग क्यों नहीं की गयी? प्रशासनिक अधिकारी तो यह कह सकते हैं कि ऐसी कोई आपत्ति नहीं लगायी गयी। तब यह सवाल  ाी उठता है कि क्या जो एक वोट निरस्त हुआ है उसके लिये आपत्ति लगायी गयी थी?क्या मतदान की गोपनीयता बनाये रखना निर्वाचन में लगे प्रशासनिक अमले की जवाबदारी नहीं हैं? ये तमाम ऐसे सवाल है जो इसलिये चर्चित हो रहें हैं क्योंकि प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा ने बहुमत ना होने के बाद भी अपना अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष बनवा लिया है। “मुसाफिर“
सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
31 मार्च 2015 से साभार

30.3.15

मैं अक्सर सोचा करता था कि  राजनीति में क्यों नहीं एक परीक्षा की व्यवस्था है जिससे पढ़े लिखे लोग राजनीति में आएं और देश को एक स्वस्थ माहौल मिले , देश में सुधार की लहर बहे और विकास हो । गुंडे मवालियो से देश को मुक्ति मिले । इससे देश में जो लोग जनता को बेवकूफ बना रहे हैं वे ऐसा नहीं कर पाएंगे क्योंकि पढ़े लिखे लोगों की पार्टी उन्हें ऐसा नहीं करने देगी । इन्हीं सब उम्मीदों को पूरा करने के लिए आई थी आम आदमी पार्टी । मगर अगर बहुत सारे  हाई प्रोफाइल पढ़े लिखे लोग एक ही पार्टी में आ जाएँ तो पार्टी की क्या दुर्गति हो सकती है यह मैंने कभी सोचा नहीं था । एक ही रसोई में इतने सारे रसोईये खिचड़ी पका रहे हैं और सब अपना अपना मसाला डाल  रहे हैं और खिचड़ी का स्वाद कैसा होगा इसकी कोई चिंता ही नहीं है। ईश्वर दोबारा ऐसे पढ़े लिखे लोगों को सत्ता न दे । सुलझे लोगों को ही सत्ता दे वे चाहे पढ़े लिखे हों या न हों । 

29.3.15

The Story of the Prophetic Mission of Muhammad (Pbuh) In the Qu’ran (Part 4): The Medinian Period


The Story of the Prophetic Mission of Muhammad (Pbuh) In the Qu’ran (Part 4): The Medinian Period

By Observer for New Age Islam
28 March, 2015
The General Principles
Let us begin with a discussion on the unqualified rules of conduct that may be taken as general principles applicable at all times and irrespective of context, which not only Prophet Muhammad (pbuh) adhered to all through his Prophetic mission, but every Messenger of God that preceded him and indeed God Himself.
Surah Al-Kafirun / The Disbelievers is the 18th Surah in chronological order and is one of the earliest MeccanSurahs.
(109:1) Say : O ye that reject Faith (Al-Kafirun)!
(2) I worship not that which ye worship,
(3) Nor will ye worship that which I worship.
(4) And I will not worship that which ye have been wont to worship,
(5) Nor will ye worship that which I worship.
(6) To you be your Way, and to me mine.
The Surah is a unilateral declaration of peace and a clear intention to leave alone the peaceful Kafirun (rejecters of faith) to their way if they left the Muslims to their way. The public preaching of the message commenced in 613 CE. From part 1 of this article, we know that active and even violent opposition to Prophet Muhammad (pbuh) had started right from the beginning of the prophetic mission. It is to these Kafirun that the Surah is addressed and not to the Mushrikin or the polytheists. This is another proof that Mushrik and Kafir are not synonyms. Otherwise, after saying “To you be your Way, and to me mine” very early during the Prophetic mission, there was nothing more left to do if the Kafirun meant the Mushrikin (polytheists). .
It is here that the Stories of Prophet Yusuf and Yunus (pbut) become relevant. Prophet Yusuf spent a lifetime in Egypt and preceded Moses (pbuh). Apparently, when Moses was sent to the Pharaoh, there were not many believers in Egypt except the “Children of Israel” who were enslaved and brought to Egypt. It can therefore be surmised that not many Egyptians believed after the mission of Yusuf (pbuh) but none opposed him either. The rejecters were peaceful rejecters and therefore there was no punishment from Allah.
In the case of Prophet Yunus (pbuh), there was stiff opposition to begin with and Prophet Yunus left in anger without the permission from Allah for which he was punished. He returned to his people and everyone (some hundred thousand) believed. Prophet Muhammad (pbuh) is also cautioned to not become impatient like Yunus but to persist with patience.
In the case of both these Prophets, there was no punishment from Allah on their people. The people of Mecca could therefore choose to be like the people of Yusuf and peacefully reject or like the people of Yunus and believe or like the people of Noah, Hud, Salih, Shoaib, Lut and Moses and violently oppose and suffer the inevitable consequences.
The following verses are from the Medinian period when Muhammad (pbuh) had become a political leader and in a position to wage war and yet there is an unqualified declaration that there cannot be compulsion in religion.
Surah Al- Baqara, Medinian Chronological order 87
(2:256) Let there be no compulsion in religion: Truth stands out clear from Error: whoever rejects evil and believes in Allah hath grasped the most trustworthy hand-hold, that never breaks. And Allah heareth and knoweth all things.
2:272. It is not required of thee (O Messenger), to set them on the right path, but Allah sets on the right path whom He pleaseth.
Al-Mumtahina, Medinian Chronological order 91
(60:8) Allah forbids you not, with regard to those who fight you not for (your) Faith nor drive you out of your homes, from dealing kindly (taburruhum) and justly (tuqsitu) with them: for Allah loveth those who are just. (9) Allah only forbids you, with regard to those who fight you for (your) Faith, and drive you out of your homes, and support (others) in driving you out, from turning to them (for friendship and protection). It is such as turn to them (in these circumstances), that do wrong.
Al-Maeda, Medinian Chronological order 112
(5:2)…. let not the hatred of some people in (once) shutting you out of the Sacred Mosque lead you to transgression (and hostility on your part). Help ye one another in righteousness and piety, but help ye not one another in sin and rancour: fear Allah: for Allah is strict in punishment.
(5:8) O ye who believe! stand out firmly for Allah, as witnesses to fair dealing, and let not the hatred of others to you make you swerve to wrong and depart from justice. Be just: that is next to piety: and fear Allah. For Allah is well-acquainted with all that ye do.
The underlying principles of secular justice and freedom of conscience and religion, in the verses cited above, are the eternal principles of Islam. And as the Quran says, Islam was the religion of all the prophets.
In my 4 part article “Who is a Kafir in the Quran?” I have brought out that the Quran deals with:
1. The secular, the worldly or the temporal dimension and
2. The Spiritual dimension
What is purely the Spiritual Dimension is outside the pail of both punishment in this world and coercive interference. The Quran prescribes no punishment for the “Rejecters of Faith” as long as they are peaceful. No punishment in this world is prescribed in the Quran for blasphemy unless accompanied by inciting violence, enmity, strife or causing public disorder. The punishment then is not for blasphemy but for the crimes in the temporal dimension. Apostasy is also not punishable in this world unless accompanied by treason. It is treason that is punishable and not apostasy. This rule has however been perverted to equate apostasy with treason where apostasy itself implies treason. This is a clear perversion of the message of the Quran.
Persecution of the Muslims
Part 1 of the article covered active opposition to Muhammad’s mission which started right at the beginning. Among the Muslims were those like the Prophet himself, Abu Bakr, Ali, and Umar with powerful tribal connections who could not be harmed with impunity without attracting tribal revenge. There were many other poor and weak Muslims without such connections who became the target of physical torture and persecution and at least one person was killed by tearing apart the body by tying each leg to a camel and driving them in different directions. It was in these circumstances that the following verse was revealed in Meccan Surah An-Nahl:
16:106 Anyone who, after accepting faith in Allah, utters Unbelief, - except under compulsion, his heart remaining firm in Faith - but such as open their breast to Unbelief, on them is Wrath from Allah, and theirs will be a dreadful Penalty.
Persecution of Muslims by the Quaraish in Mecca intensified and in 615 CE a group of Muslims left for Abyssinia (modern Ethiopia) and sought asylum on the advice of the Prophet. A second group comprising a little over a hundred people emigrated in 616 CE 
In the year 617, the Quraysh under the leadership of Abu Jahl, banished the Muslims and their supporters to a dry valley and refused to trade with them. Muhammad’s uncle, Abu Talib, lost his business and the Muslims nearly starved. Abu Bakr, once a wealthy trader, lost everything. In 619, Muhammad’s wife Khadijah died, and then Muhammad also lost his protector and uncle , Abu Talib in 620.
In 621 CE about 75 persons from Medina took the two Pledges of al-Aqaba, accepting Islam and pledging to protect Muhammad from all danger.
Migration to Medina
The Muslims were offered asylum in a city north of Makkah called Yathrib (later, Madinah). The migration of the Muslims to Yathrib, in 622, is called the Hijrah. Hearing of a joint plot by all the tribes of Mecca to kill Muhammad, he and Abu Bakr escaped to Madinah together in the night, and received a joyful reception by the leaders of that town who willingly adopted Islam. The migration is referred to in an early Medinian Surah Al-Anfal verse 8:30, and also a late Medinian Surah Taubah verse 9:40 below:
(8:30) Remember how the Unbelievers plotted against thee, to keep thee in bonds, or slay thee, or get thee out (of thy home). They plot and plan, and Allah too plans; but the best of planners is Allah.
(9:40) If ye help not (your leader), (it is no matter): for Allah did indeed help him, when the Unbelievers drove him out: he had no more than one companion; they two were in the cave, and he said to his companion, "Have no fear, for Allah is with us": then Allah sent down His peace upon him, and strengthened him with forces which ye saw not, and humbled to the depths the word of the Unbelievers. But the word of Allah is exalted to the heights: for Allah is Exalted in might, Wise.
Muhammad established a mutual defense and cooperation pact among the tribes of Madinah, with himself as the leader of the city. This document was called the "Constitution of Madinah." Muhammad paired immigrants from Makkah with the Muslims from Madinah in a relationship of brotherhood.
Unfolding Of Allah’s Judgment Repeatedly Warned
The permission to fight was given in the Medinian Surah Al-Hajj verse 39 and the justification for it in verse 40. That the nature of this fighting was to assume the punishment meted out to the people of Noah, Hud (Ad), Salih (Thamud), Lut, Shoaib (Madyan), Abraham and Moses of which the Meccans were repeatedly warned in 32 of the MeccanSurahs is clearly indicated. Even then, verse 60 puts a limit on retaliation for the wrongs of the Meccans “to no greater extent than the injury he received”. 
(39) To those against whom war is made, permission is given (to fight), because they are wronged;- and verily, Allah is most powerful for their aid;-
(40) (They are) those who have been expelled from their homes in defiance of right,- (for no cause) except that they say, "our Lord is Allah". Did not Allah check one set of people by means of another, there would surely have been pulled down monasteries, churches, synagogues, and mosques, in which the name of Allah is commemorated in abundant measure. Allah will certainly aid those who aid his (cause);- for verily Allah is full of Strength, Exalted in Might, (able to enforce His Will).
(41) (They are) those who, if We establish them in the land, establish regular prayer and give regular charity, enjoin the right and forbid wrong: with Allah rests the end (and decision) of (all) affairs.
(42) If they treat thy (mission) as false, so did the peoples before them (with their prophets),- the People of Noah, and ´Ad and Thamud;
(43) Those of Abraham and Lut;
(44) And the Companions of the Madyan People; and Moses was rejected (in the same way). But I granted respite to the Unbelievers, and (only) after that did I punish them: but how (terrible) was my rejection (of them)!
(45) How many populations have We destroyed, which were given to wrong-doing? They tumbled down on their roofs. And how many wells are lying idle and neglected, and castles lofty and well-built?
(46) Do they not travel through the land, so that their hearts (and minds) may thus learn wisdom and their ears may thus learn to hear? Truly it is not their eyes that are blind, but their hearts which are in their breasts.
(47) Yet they ask thee to hasten on the Punishment! But Allah will not fail in His Promise. Verily a Day in the sight of thy Lord is like a thousand years of your reckoning.
(48) And to how many populations did I give respite, which were given to wrong-doing? in the end I punished them. To me is the destination (of all).
(49) Say: "O men! I am (sent) to you only to give a Clear Warning:
(50) "Those who believe and work righteousness, for them is forgiveness and a sustenance most generous.
(51) "But those who strive against Our Signs, to frustrate them,- they will be Companions of the Fire."…….
(58) Those who leave their homes in the cause of Allah, and are then slain or die,- On them will Allah bestow verily a goodly Provision: Truly Allah is He Who bestows the best provision.
(59) Verily He will admit them to a place with which they shall be well pleased: for Allah is All-Knowing, Most Forbearing.
(60) That (is so). And if one has retaliated to no greater extent than the injury he received, and is again set upon inordinately, Allah will help him: for Allah is One that blots out (sins) and forgives (again and again).
It is important to note that only a leader with a territory in his control can protect his people and it is only such a leader who can wage war and defend his people. Muhammad (pbuh) was not given the permission to fight in Mecca simply because he was not such a leader in Mecca. All the verses to fight apply only to the Muslims who were with the Prophet in Medina and not to those who stayed behind in Mecca since the Prophet could not protect them.
Battle of Badr
The first battle between the Muslims from Madinah and the Quraysh from Makkah took place at Badr in 624 C.E. The Muslim army of about 300 routed the Makkan army of more than a thousand fighters and took many of them prisoners, according to historical accounts. Several of the leaders of the Unfaith were killed in battle including Abu Jahl, Walidibn al-Mughirah  and Abu Lahab the three chief tormentors of the Muslims mentioned directly or indirectly in the earliest MeccanSurahs covered in part 1. Abu Lahab did not take part in the battle but died a week later from a wound inflicted by a woman in a dispute about the battle! UmayyahibnKhalafibnSafwan who had owned the slave  Bilal and tortured him for converting to Islam, Uqbaibn Abu Mu'ayt one of the principal adversaries of Islam, UtbahibnRabi'ah one of the prominent Leaders of Quraish, and WalidibnUtbah  were also killed. The number of Meccans killed were 70 and another 70 were taken prisoner but ransomed, number of Muslims killed were 14 and none of those killed were among the commanders.
The following are verses from Surah Al-Anfaal
(32) Remember how they said: "O Allah if this is indeed the Truth from Thee, rain down on us a shower of stones form the sky, or send us a grievous penalty."
(33) But Allah was not going to send them a penalty whilst thou wast amongst them; nor was He going to send it whilst they could ask for pardon.
(34) But what plea have they that Allah should not punish them, when they keep out (men) from the sacred Mosque - and they are not its guardians? No men can be its guardians except the righteous; but most of them do not understand.
(35) Their prayer at the House (of Allah) is nothing but whistling and clapping of hands: (Its only answer can be), "Taste ye the penalty because ye blasphemed."
(36) The Unbelievers spend their wealth to hinder (man) from the path of Allah, and so will they continue to spend; but in the end they will have (only) regrets and sighs; at length they will be overcome: and the Unbelievers will be gathered together to Hell;-
(37) In order that Allah may separate the impure from the pure, put the impure, one on another, heap them together, and cast them into Hell. They will be the ones to have lost.
(38) Say to the Unbelievers (kafaru), if (now) they desist (from hindering man from the path of Allah) their past would be forgiven them; but if they persist, the punishment of those before them is already (a matter of warning for them).
(39) And fight them on until there is no more tumult or oppression, and there prevail justice and faith in Allah altogether and everywhere; but if they cease, verily Allah doth see all that they do.
(40) If they refuse, be sure that Allah is your Protector - the best to protect and the best to help.
Verse 33 says that the penalty could come to the Unbelievers only after the Believers had left the place (Mecca) and not while they were in their midst. The penalty in the form of a shower of stones from the sky was not sent even after the Believers had migrated because the door to pardon was still open to them. However, they were without a plea to save themselves from punishment for they kept men out from the Sacred Mosque. However, if they desisted from hindering men from the path of Allah, the past would be forgiven them.
Verse 8:38 is proof, that the battle (Badr) was to end the kufr of persecution and oppression of the Muslims and not for putting an end to the kufr of belief by forcing the Meccans to accept Islam. If the Meccans had heeded and given up practicing oppression against those who were accepting Islam, and allowing the Muslims to worship in the sacred mosque, there would have been no more fighting after this verse was revealed and peaceful propagation of Islam would have recommenced.
Battle of Uhud
A year after the Battle of Badr, the Makkans sent an army to take revenge for their defeat which would have once again resulted in the rout of the Meccans but for the Muslim archers leaving their post for the spoils of war thinking that the war was won. This battle was called the battle of Uhud. With many losses on both sides, the two sides withdrew in a stalemate with the Muslims suffering casualties of about 70 including Hamza a commander and uncle of the Prophet. The Meccans lost only about 40 people. The reverse suffered taught the Muslims many important lessons. There may not have been this battle if the Muslims had more thoroughly routed their enemy in the first battle of Badr. The losing army continues fighting well after the result of the battle becomes apparent. The Muslim army, keen to take prisoners for ransom rather than focus on annihilating the enemy, took it easy and preferred taking a prisoner for ransom rather than killing him while the battle was still on. It is here that the verse that says that the enemy in battle must be struck to kill or incapacitate him makes sense. A thorough rout in the battle of Badr could have demoralized the Meccans to such an extent, that they may then have preferred to make peace, end hostilities, allow the Muslims to return to Mecca and peacefully propagate Islam and worship in the sacred Mosque without hindrance. This would have avoided further loss of lives. While many of the “Chiefs of Unfaith” were killed in the battle of Badr, Abu Sufiyan survived and lived to lead them in the war of Uhud and the battle of the Trench.
Battle of the Trench
The third major battle between the Quraysh and the Muslims was the Battle of the Trench in 628 CE, in which the Quraysh and their allies besieged Madinah. The BaniQurayzah, a Jewish tribe in Madinah, sided with Quraysh and broke their treaty with the Muslims. When the Makkans finally left amid storms and the desertion of their allies, the Muslims turned to attack the BaniQurayzah for siding with the attack against Madinah.
The very fact that the Muslims, 6 years after migrating to Medina, could be besieged in their own city, speaks about their numerical inferiority versus the Meccan pagans. In the face of such numerical inferiority, and the high probability of their defeat, the hypocrites among the Muslims were ready to desert and the allies among the Jews ready to switch sides. For a besieged party to come out on top must be an extremely rare event in the history of warfare.
The Battle is described in the Quran in Surah Al-Ahzaab / The Clans, Medinian, Chronological order 90
(33:9) O ye who believe! Remember the Grace of Allah, (bestowed) on you, when there came down on you hosts (to overwhelm you): But We sent against them a hurricane and forces that ye saw not: but Allah sees (clearly) all that ye do.
(10) Behold! they came on you from above you and from below you, and behold, the eyes became dim and the hearts gaped up to the throats, and ye imagined various (vain) thoughts about Allah!
(11) In that situation were the Believers tried: they were shaken as by a tremendous shaking.
(12) And behold! The Hypocrites and those in whose hearts is a disease (even) say: "Allah and His Messenger promised us nothing but delusion!"
(13) Behold! A party among them said: "Ye men of Yathrib! ye cannot stand (the attack)! therefore go back!" And a band of them ask for leave of the Prophet, saying, "Truly our houses are bare and exposed," though they were not exposed they intended nothing but to run away.
(14) And if an entry had been effected to them from the sides of the (city), and they had been incited to sedition, they would certainly have brought it to pass, with none but a brief delay!
(15) And yet they had already covenanted with Allah not to turn their backs, and a covenant with Allah must (surely) be answered for.
(16) Say: "Running away will not profit you if ye are running away from death or slaughter; and even if (ye do escape), no more than a brief (respite) will ye be allowed to enjoy!"
(17) Say: "Who is it that can screen you from Allah if it be His wish to give you punishment or to give you Mercy?" Nor will they find for themselves, besides Allah, any protector or helper.
(18) Verily Allah knows those among you who keep back (men) and those who say to their brethren, "Come along to us", but come not to the fight except for just a little while.
(19) Covetous over you. Then when fear comes, thou wilt see them looking to thee, their eyes revolving, like (those of) one over whom hovers death: but when the fear is past, they will smite you with sharp tongues, covetous of goods. Such men have no faith, and so Allah has made their deeds of none effect: and that is easy for Allah.
(20) They think that the Confederates have not withdrawn; and if the Confederates should come (again), they would wish they were in the deserts (wandering) among the Bedouins, and seeking news about you (from a safe distance); and if they were in your midst, they would fight but little.
(21) Ye have indeed in the Messenger of Allah a beautiful pattern (of conduct) for any one whose hope is in Allah and the Final Day, and who engages much in the Praise of Allah.
(22) When the Believers saw the Confederate forces, they said: "This is what Allah and his Messenger had promised us, and Allah and His Messenger told us what was true." And it only added to their faith and their zeal in obedience.
(23) Among the Believers are men who have been true to their covenant with Allah: of them some have completed their vow (to the extreme), and some (still) wait: but they have never changed (their determination) in the least:
(24) That Allah may reward the men of Truth for their Truth, and punish the Hypocrites if that be His Will, or turn to them in Mercy: for Allah is Oft-Forgiving, Most Merciful.
(25) And Allah turned back the Unbelievers for (all) their fury: no advantage did they gain; and enough is Allah for the believers in their fight. And Allah is full of Strength, able to enforce His Will.
(26) And those of the People of the Book who aided them - Allah did take them down from their strongholds and cast terror into their hearts. (So that) some ye slew, and some ye made prisoners.
(27) And He made you heirs of their lands, their houses, and their goods, and of a land which ye had not frequented (before). And Allah has power over all things.
The leader of the Meccan army was Abu Sufiyan who withdrew after a siege of 27 days in which they suffered heavy losses and achieved little and natures unseasonal fury caused his army of over 10,000 great distress. This was a turning point and many tribes which had aligned with the Meccans changed their loyalties.
Treaty of Hudaybiyyah
After the Battle of the Trench, in 628, Muhammad (pbuh) decided to lead a pilgrimage to Makkah for the first time in 6 years after migration to Madina. The Muslims camped at Hudaybiyyah, just outside Makkah, where they were halted by Quraysh. The Makkans didn’t want to let the Muslims make the pilgrimage but entered into a peace treaty with Muhammad. The treaty at Hudaybiyyah called for ten years of peace between the Muslims and the Makkans, and allowed the Muslims to make their pilgrimage the following year. A peace treaty within a year of having been besieged is a telling account of the change in fortunes. The peace treaty by the Meccans was only because they knew that the Muslims were in a position to force their way into Mecca if they wished. Muhammad (pbuh) however only wanted to perform the pilgrimage in peace and agreed for the peace treaty and returned to Madina.
He performed Haj the following year.Muhammad asked Bilal ibnRabah, a former slave and among the earliest Muslims, to give the call to prayer from the top of the Ka’bah. This angered the Makkans, who were camped in the hills outside Makkah until the Muslims completed their pilgrimage. They couldn’t believe that a former slave stood on top of their sacred house.
The Makkans broke their treaty with the Muslims by attacking a tribe allied with the Muslims. Muhammad immediately marched on Makkah and took the city peacefully in 630 C.E.
The Final Judgment
This was the time for Allah to pronounce His judgment that was repeatedly warned in the MeccanSurahs. Here the rules of war do not apply but the Judgment of Allah at the end of the Prophetic mission. Allah had spared the Meccans destruction by an act of God when Muhammad (pbuh) was driven out of Mecca. A few of the remaining chiefs of Unfaith were executed after the conquest of Mecca.
Surah Taubah the second last Surah in chronological order was revealed after the conquest of Mecca. The war was mostly with the Meccans and their allies and the Meccans were all mushrikin. Notice when mushrik is used and when kafir is used in these verses.
Verses 9:1 and 9:2 declare amnesty of four months to all mushrikin but with a warning that the kafirun among them will be covered with shame at the end of the period.
9:3 and 9:4 announces dissolution of all treaties with the mushrikin except with those who never broke their treaty and warns the kafirun (not mushrikin) of a grievous penalty.
Verse 9:5 is a command to kill all mushrikin at the end of the four month period with the exception of:
1.         Those who never broke their treaty or never fought the Muslims
2.         Those who accept Islam offer prayers and pay zakat
3.         Those who seek asylum
If the command was to kill only the kafir, then the problem would have been how to identify them since there was no longer an enemy standing in battle. The verse identifies the non kafir among the mushrikin through the exceptions listed above. The rest of the verses are by way of justification and evidence of the kufr practiced by those who are to be killed which covers all the mushrikin except those who never broke their treaty with the Muslims or never fought against them or those who seek asylum. Asylum seekers are not defiant and therefore not kafir.
The following verses are proof that the cause for fighting is not for the kufr of faith or belief which is known only to Allah, but for the kufr of violating oaths and covenants, for having plotted to expel the Messenger, and for being the first to assault the Muslims :
(9:12) But if they violate their oaths after their covenant, and taunt you for your Faith,- fight ye the chiefs of Unfaith ( a-immat-al-kufri) : for their oaths are nothing to them: that thus they may be restrained.(13) Will ye not fight people who violated their oaths, plotted to expel the Messenger, and took the aggressive by being the first (to assault) you?
There is no command to kill for simple unbelief. The fact however is that once the Chiefs of Unfaith were removed from the scene, the rest of the people either accepted Islam or sought asylum and over a period accepted Islam as evidenced by the last Surah in chronological order viz, Surah An-Nasr / Divine Support
(110:1) When comes the Help of Allah, and Victory,
(2) And thou dost see the people enter Allah´s Religion in crowds,
(3) Celebrate the praises of thy Lord, and pray for His Forgiveness: For He is Oft-Returning (in Grace and Mercy).
Those “kafaru” who had actively opposed Islam, fought wars, broke their treaties and remained defiant even after the four month amnesty period were put to the sword. Their family consisting of wife and children also perished unless they had sought asylum and dissociated from their “kafir” husband/father.  Many of the women sought asylum even before the conquest of Mecca and were given asylum. This has always been the judgment of Allah that those who are saved are those who at least seek refuge and not follow the “kafaru”.  It is the Kafaru and those who follow them who perish whether it was Prophet Lut’s wife or Pharaoh, his chiefs and followers who pursued Moses and his people, or the people who disdained from embarking Noah’s ark and remained with the “kafaru” or those among the people of Thamud who did not dissociate from the people who killed the she-camel and go with Salih during the 3 days of respite provided. It may also be noted that many of the women of Mecca like the wife of Abu Lahab were active enemies of the Muslims and many of them accompanied their men to the battle of Uhud to encourage them and many of them who also left their “kafir” husbands and sought refuge with the Prophet even before the fall of Mecca.
Not a single person was killed for simple unbelief and the principle of “Let there be no compulsion in religion” and “To (peaceful rejecter of faith ) be his way and to me mine” was never violated.