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20.5.08

ब्रेकिंग न्यूज़.! कुछ और नही है क्या..?


ब्रेकिंग न्यूज़.....!!!!!

ब्रेकिंग न्यूज़.....!!!!!

ब्रेकिंग न्यूज़.....!!!!!

ब्रेकिंग न्यूज़.....!!!!!

मां की आखं.......................!!!!!

न्यूज चैनल वालों के पास आजकल कोई खबर नही है जो नोएडा को नही छोडते !

’आरूषि व हेमराज हत्याकांड ’ के पिछे ही लग गये हैं, जैसे दुनियां मै कुछ हो ही नही रहा !

अकल के दुशमनो, देश मै पांच दिन से कुछ नही हो रहा क्या ?

हिन्दुस्तान कि बोडर पर आतंकवादी घुस रहे हैं , सैन्य शिविर मै फोजी मर रहे हैं, वो क्यों नही दिखाते ?

बुन्देलखडं मे लोग पानी न मिलने से मर रहे हैं, वो क्यों नही दिखाते ?

मीडिया का यही काम रह गया है क्या ?

आखिर मीडिया कहां जा रहा है ??

पांच दिन से दिमाग का दही बना दिया है !

पेश हैं...... TV न्यूज चैनल के महान कार्यो के कुछ अंश......!







जय भड़ास

क्या आप भी फिल्में देखकर रोने लगते हैं? संदर्भ-भूतनाथ

मैं तो रोने लगता हूं। अभी कल की ही तो बात है। बच्चों के साथ गया था भूतनाथ देखने। तीन बार आंखें भर आईं। यह स्थिति तब बनी जब मैं तय करके आया था कि किसी हालत में नहीं रोना है। पिछले बार का अनुभव ठीक नहीं था, इसी से खुद से न रोने का वादा करके और दिल कड़ा करके गया था।


पिछली बार तारे जमीन पर देखने के दौरान कई दफे रोया थ। पत्नी, बच्ची और मैं तीनों रोये थे।


बस, बेटा नहीं रोया। उससे पूछा कि तुझे रूलाई नहीं आई तो बोला कि ये फिल्म सीरियल तो नाटक होते हैं, इन्हें देखकर क्या रोना। उसने उल्टे मुझ पर सवाल खड़ा कर दिया, तुम तो बहुत बहादुर बनते हो, मर्द बनते हो, तो फिर औरतों की तरह रोये क्यों? मैं निरुत्तर था। लगा, चोरी पकड़ी गई। इसी के चलते इस बार दिल कड़ा करके गया था भूतनाथ देखने।


पर उलटी पड़ गईं सब तदबीरें...आंखें भर ही आईं, कुछ बूंद लुढ़क ही गए। सिम्मी दीदी लगातार रुमाल अपने चेहरे पर घुमाए जा रही थीं, मणिमाला मैडम का भी हाथ उनके चेहरे के इर्द गिर्द ही घूमता रहा। पर आयुष दादा तो वाकई दादा निकले। चेहरे पर बिना भाव लाए, पेप्सी गटकते हुए फिल्म देखते रहे।

हे भाई फिल्म वालों, इतनी अच्छी फिल्में भी न बनाओ जिससे देखने जाने के दौरान रास्ते में रुककर कई दर्जन रुमाल खरीदना पड़े। अच्छी फूल्म है भूतनाथ। आप भी जरूर देखें और खासकर बच्चों को भी दिखाएं।


मैं यहां साफ कर दूं कि रुलाई भूत के डर से नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के रीयलिस्टिक नरेशन की वजह से आई। वरना क्या पता भाई लोग कहेंगे कि साला फट्टू फिल्म के भूत से डर गया:)


जय भड़ास
यशवंत

मुझे बचाओ वरना मैं महान बन जाऊंगा....संदर्भ- इंडिया न्यूज पर भड़ास

भई, पहली बार टीवी पर खुद को बोलते हुए देखकर दिल प्रसन्न हो गया। लगा जैसे मुझ देहाती को तो मोक्ष मिल गया। इसके पहले मैं पिछले ही महीने जहाज पर पहली बार चढ़ा तो वर्षों से दिल में दबी एक मुराद पूरी हो गई और अब टीवी पर दिखने से तो लगता है कि मेरे अंदर खुद को महान मानने के भाव पैदा होने लगे हैं।

मुझे बचाओ वरना मैं महान बन जाऊंगा और इस महान देश के ढेर सारे महान लोगों के बीच मैं भी महान बनकर महान महान काम करने लगूंगा और आम जनता को बड़े बड़े उपदेश पेलने लगूंगा। मैं आम आदमी ही बनकर रहना चाहता हूं, मैं देहाती बनकर ही जीना चाहता हूं, मैं हिंदी बोलते लिखते हुए ही नौकरी/धंधा/बिजनेस करके रोजी रोटी कमाना चाहता हूं।

इंडिया न्यूज के सभी साथियों को मेरी तरफ से दिली साधुवाद जो मुझ जैसे नीच अधम कामी क्रोधी लोभी कुंठित को ब्लागिंग विषय पर प्रोग्राम में बाइट लेने के लिए चुना वरना महान ब्लागरों और एक से एक महान बुद्धिजीवियों वाले इस देश में मेरी बिसात ही क्या है।
इंडिया न्यूज के भाई अजीत द्विवेदी, विवेक सत्य मित्रम और अभिषेक पाटनी को खासकर धन्यवाद कहना चाहूंगा।

अगर इंडिया न्यूज का कोई साथी इस प्रोग्राम की सीडी या वीडियो फाइल भेज सके तो महती कृपा होगी ताकि उसे भड़ास पर डाला जा सके जिससे जो साथी इस प्रोग्राम को देखने से वंचित रह गए होंगे, वे भी देख सकें।

ब्लागिंग पर इस विशेष कार्यक्रम के लिए इंडिया न्यूज की टीम ने कंटेंट से लेकर विजुअल तक पर निःसंदेह काफी मेहनत की है, तभी इस प्रोग्राम में हर पक्ष को समझाया दिखाया जा सका।

सभी भड़ासी साथियों की तरफ से एक बार फिर आप सभी को बधाई।

जय भड़ास

यशवंत

शाकाहार जिंदाबाद या मांसाहार जिंदाबाद

मेरी एक मित्र हैं, पूजा प्रसाद। इन दिनों रफ्तार डाट काम www.raftaar.com में असिस्टेंट कंटेंट एडीटर हैं। उन्होंने एक मेल भेजा है, शाकाहार के गुणों के बारे में। संभवतः वो मुझ जैसे घनघोर मांसाहारी को बदलने के लिए प्रेरित करना चाहती हैं। मेरे पर क्या असर होगा इस मेल का, मुझे खुद नहीं पता पर मैं चाहता हूं कि पूजा की भावनाएं बाकी भाई भड़ासियों तक भी पहुंचे। उम्मीद है कुछ लोग मांसाहार के गुणों के बारे में भी मुझे मेल भेजेंगे या भड़ास पर पोस्ट करेंगे।

वैसे एक गुण तो मैं यहीं गिना सकता हूं कि कई धर्मों के अनुयायी जबरदस्त मांसाहारी होते हैं, उससे न तो उनकी कौम नष्ट हुई और न उनकी औसत उम्र कम हुई। उल्टे, उनके धर्म ने मांसाहार से आई प्रचंड ऊर्जा के चलते विश्व में अपने आक्रामक अभियानों के जरिए कई देशों पर विजय पताका लहरा दिया। आदि काल से लेकर मध्य काल और आधुनिक काल तक के कई कई उदाहरणों के जरिए यह बात साबित है।

उसके उलट, आलू, घास-फूस, कंद-मूल समर्थक हिंदू धर्म जो शुद्ध शाकाहर पर जोर देता है, हमेशा उन धर्मों से हारा जो मांसाहार को तवज्जो देते हैं।

मैं यहां किसी धर्म की बुराई और किसी धर्म की प्रशंसा या दो धर्मों की तुलना शाकाहार या मांसाहार के आधार पर नहीं कर रहा बल्कि सोचने के लिए एक बिंदु दे रहा। मुझे मालूम है कि डा.रूपेश जी मेरी बात से सहमत नहीं होंगे पर हरे भइया तो खुलकर मेरे संग बोलेंगे....मांसाहार जिंदाबाद।
जय भड़ास
यशवंत


शाकाहार किस तरह कैंसर के लिए उपयुक्त स्थियों को दूर रखता है:
--पूजा प्रसाद--
* मांस में सैचुरेटेड फैट अधिक होता है जो शरीर में कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है। (चर्बी निकाले हुए चिकेन से भी, मिलने वाली ऊर्जा की कम से कम आधी मात्रा चर्बी से ही आती है।) चिकेन और कोलेस्ट्रॉल शरीर में ईस्ट्रोजन हार्मोन को बढ़ाता है जो कि स्तन कैंसर से सीधा संबंधित है। जबकि शाकाहार में मौजूद रेशे शरीर में ईस्ट्रोजन के स्तर को नियंत्रित रखते हैं।

* मांस को हजम करने में ज्यादा पाचक एंजाइम और समय लगते हैं। ज्यादा देर तक अनपचा खाना पेट में अम्ल और दूसरे जहरीले रसायन बनाता है जिससे कैंसर को बढ़ावा मिलता है।

* इसके अलावा मांस- मुर्गे का उत्पादन बढ़ाने के लिए आजकल हार्मोन, डायॉक्सिन, एंटीबायोटिक, कीटनाशकों, भारी धातुओं का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है जो कैसर को बढ़ावा देते हैं। इसे ऐसे समझें कि थोड़ी सी जगह में ढेरों मुर्गों को पालने से वे एक-दूसरे से कई तरह की बीमारियां लेते रहते हैं। ऐसे हालात में उन्हें जिलाए रखने के लिए उन्हें खूब एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं जिनमें आर्सेनिक जैसी कैंसरकारी भारी धातुएं भी होती हैं।

* मांस-मुर्गे में मौजूद परजीवी और सूक्ष्म जीव कुछ तो पकाने पर मर जाते हैं और कुछ हमारे शरीर में बढ़ने लगते हैं और कैंसर और दूसरी बीमारियां पैदा करते हैं, हमारी प्रतिरोधक क्षमता को थका देते हैं। ऐसे में शरीर कैंसर से लड़ने और जीतने में नाकाम हो जाता है।

* शाकाहार में मौजूद रेशे बैक्टीरिया से मिलकर ब्यूटिरेट जैसे रसायन बनाते हैं जो कैंसर कोषा को मरने के लिए प्रेरित करते हैं। दूसरे, रेशों में पानी सोख कर मल का वजन बढ़ाने की क्षमता होती है जिससे जल्दी-जल्दी शौच जाने की जरूरत पड़ती है और मल और उसके रसायन ज्यादा समय तक खाने की नली के संपर्क में नहीं रह पाते।

* खूब फल और सब्जियां खाने से मुंह, ईसोफेगस, पेट और फेफड़ों के कैंसर की संभावना आधी हो सकती है।फलों और सब्जियों में एंटी ऑक्सीडेंट की प्रचुर मात्रा होते हैं जो शरीर में कैंसर पैदा करने वाले रसायनों को पकड़ कर उन्हें 'आत्महत्या' के लिए प्रेरित करते हैं।

* शाकाहार में मौजूद विविध विटामिन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और इस तरह कैंसर कोषाएं फल-फूल नहीं पातीं।

* शाकाहार जरूरी लवणों का भी भंडार है।

( ye jankaari RAINBOW/इंद्रधनुष se lee gai hai)

अभी तो सुबह के माथे का रंग काला है......


एक माँ जब तकलीफ में होती है तो उसका दर्द, उसकी तड़प उसकी अपनी औलादों में एक बेटे की बनिस्बत सब से ज्यादा उसकी बेटी महसूस करती है. ये बात पूरी तरह सच साबित हो चुकी है. अपवाद हर जगह होते हैं , इस जगह भी होंगे लेकिन एक माँ को जितना बेटी समझ सकती है , शायद बेटा नही.

लेकिन उसी बेटी का वजूद , माँ को बीमारियां देने का बाएस(वजह) बनने लगे तो सोचिये , कैसा महसूस होता है. लेकिन बदकिस्मती से रिपोर्ट यही कहती है..

हाल ही में दून के एम्.के.पी. कॉलेज के सायिकालोजी डिपार्टमेन्ट ने अपनी एक रिसर्च के बाद ये खुलासा किया है कि दो बेटियों के बाद प्रेग्नेंट होने वाली माएं हाई ब्लड प्रेशर,एन्जाईटी , डाईबिटीज़ और डिप्रेशन जैसी बीमारियों में मुब्तेला (ग्रुस्त) हो जाती हैं.

इस में शहर के २५० जोडों (दम्पति) के सैम्पल लिए गए थे जिस में से दो बेटियों वाली माओं में तीसरी बार प्रेग्नेंट होने की सूरत में बीमारियों के निशान उजागर हुए .

इस रिसर्च में तीन तबकों(वर्गों) को शामिल किया गया था.पहला प्रेग्नेंट औरतें ,दूसरा गायनेकोलाजिस्ट और रेडिओलाजिस्ट और तीसरा , समाज और कानून .तीनों तबकों से जो बातचीत की गई उसके नतीजे में ही नक़ल कर सामने आया कि पहली प्रग्नेंसी के दौरान औरत किसी तरह के तनाव या फिक्र (चिंता) में नही होती. उस वक़्त बस सेहतमंद(स्वस्थ) औलाद ही उसकी पहली ख्वाहिश होती है.
पहली बार जब उसके यहाँ बेटी जन्म लेती है तब भी उसकी खुशी में ख़ास कमी नही आती. पहली बेटी निहायत लाड प्यार में परवरिश पाती है. लेकिन --दूसरी बेटी होते ही हालात में एकदम ही काफ़ी बदलाव आजाता है.

ये तब्दीली परवरिश को लेकर नही , बल्कि माँ के मन में पलने वाली फिक्र को लेकर होती है. उनके मुस्तकबल (भविष्य) के बारे में सोचने वाली माँ में पहली बेटी के बाद दूसरी बार बेटी की चाह नही दिखाई दी.और दूसरी के बाद तीसरी बार प्रेग्नेंट होने वाली माएं तो इस बार बेटी ना हो , इस खौफ को लेकर बीमारी का ही शिकार हो गयीं.

रिसर्च में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि दूसरी मर्तबा भी बेटी होने की सूरत में अक्सर मियाँ बीवी(पति पत्नी ) के आपसी रिश्ते भी मुतास्सिर (प्रभावित)हो जाते हैं . रिश्तों में खिंचाव आने लगता है. इसके पीछे उनकी फैमिली का दबाव या परिवार में बच्ची की पैदाईश को लेकर हो रही टेंशन भी एक वजह बन कर उभरी.

सब मिला कर नतीजा साफ तोर से ये निकल कर सामने आया कि बेटी के जन्म पर उदास ना होने वाले लोग भी दूसरी और तीसरी बेटी के हामी नही होते.

एम्.के.पी. कॉलेज की मनोविद डा.गीता बलोदी के मुताबिकदो बेटियों की माओं के ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन जैसी बीमारियों में मुब्तेला होने के पीछे वजह सोसिएटी का दबाव भी है. इसके अलावा ससुराल वालों का प्रेशर तो काम करता ही है. कुल मिला कर दो बेटी के बाद माँ के मन में बस यही फिक्र दिखायी दी कि कहीं तीसरी भी बेटी हो……

ये रिसर्च और इसकी रिपोर्ट सिर्फ़ एक शहर की नही है, कम--बेश यही हालात छोटे शहर से लेकर बड़े शहर हर जगह हैं.

हैरत तो तब होती है जब एक अखबारी रिपोर्ट के मुताबिक, एन.आर.आई भारतीयों में एक सर्वे के