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4.7.15

संपूर्ण विनाश हो,रक्तरंजित बिहार हो,फिर से नीतीश कुमार हो

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के छोटे-छोटे पाँव जमीन पर पड़ ही नहीं रहे हैं। दरअसल उनके हाथ एक ऐसा नारेबाज लग गया है जो नारे और प्रचार की योजना बनाने में बला का माहिर है। पिछले 2 सालों से बिहार को अच्छा शासन देने में विफल रहे नीतीश जी को लग रहा है कि वे कोरे नारों के बल पर ही फिर से बिहार का चुनाव जीत जाएंगे। जबकि चुनाव जीतने के लिए उनको जनता को यह भी बताना पड़ेगा कि उन्होंने बिहार को अब तक दिया क्या है। अगर जनता इससे संतुष्ट हो जाती है तो उनको बताना चाहिए कि वे आगे क्या करने की सोंच रहे हैं।
मित्रों,अब हम चलते हैं फ्लैश बैक में। बात वर्ष 2007 की है। तब हम हिंदुस्तान के पटना कार्यालय में कॉपी एडिटर हुआ करते थे। एक दिन वहाँ चर्चा छिड़ गई कि बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार आने के कारण क्या हैं। तब दिलीप भैया ने कहा था कि चूँकि बिहार सरकार ने सारे बदमाशों को शिक्षामित्र बना दिया है इसलिए अपराध कम हो गया है। उत्तर सुनते ही मैं काँप गया था। इस आशंका से कि बदमाशों की अगली पीढ़ी जब आएगी तब कानून-व्यवस्था का क्या होगा। बदमाश शिक्षक शरीफ बच्चों का निर्माण तो करेंगे नहीं। नीतीश राज में स्कूली शिक्षकों की बहाली में किस कदर मनमानी और भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी कल-परसों ही हाईकोर्ट के भय से 1400 ऐसे शिक्षामित्रों ने इस्तीफा दे दिया है जिनकी डिग्रियाँ फर्जी थीं।
मित्रों,आज के बिहार के कानून-व्यवस्था की स्थिति कमोबेश नीतीश कुमार की उसी गलती का परिणाम है जिसकी ओर तब दिलीप भैया ने ईशारा किया था। सिर्फ राजधानी पटना की ही बात करें तो कल पूर्व मंत्री एजाजुल हक के फ्लैट में घुसकर उनको चाकू मार दिया गया, नीतीश सरकार की नाक के नीचे जीपीओ गोलंबर के पास कल रात गोविंद ढाबा के मालिक गोविंद से 50 हजार रुपये छीन लिए गए, कपड़ा व्यवसायी से नक्सली संगठन के नाम पर 10 लाख रुपये की रंगदारी मांगी गई और एयरपोर्ट थानान्तर्गत किसी जज साहब की धर्मपत्नी से चेन छीन ली गई। ये तो हुई बिहार के कानून-व्यवस्था की खबर अब हम बात करेंगे बिहार पुलिस पर बिहार की जनता के विश्वास की। आज आप बिना घूस दिए या बिना कोर्ट के आदेश के बिहार के थानों में एफआईआर भी दर्ज नहीं करवा सकते। बिहारवासियों का पुलिस पर विश्वास इतना कम हो गया है कि लोगों ने अपराधियों को पकड़ने के बाद पुलिस के हवाले करना ही बंद कर दिया है और ऑन द स्पॉट अपराधियों का निपटारा कर दे रहे हैं। आज एक बार फिर से बिहार में जंगलराज कायम हो चुका है और लोग बिहार में निवेश करने से डरने लगे हैं।
मित्रों,जब नीतीश कुमार ने बिहार का राजपाट संभाला था तब नक्सलवाद सिर्फ गंगा के दक्षिण में ही सक्रिय था। आज नक्सलवाद उत्तर बिहार के अधिकांश क्षेत्रों में भी अपने पाँव पसार चुका है। हमारा वैशाली जिला जो नक्सलवाद के मायने भी नहीं जानता था का बहुत बड़ा इलाका इस समय नक्सलवाद की चपेट में आ चुका है। जिले के कई प्रखंडों में बिना लेवी दिए कोई ठेकेदार न तो सड़क ही बनवा सकता है और न ही कोई उद्योगपति फैक्ट्री ही डाल सकता है। क्या यही है नीतीश कुमार का सुशासन? हमारे हाजीपुर शहर में ही लूट रोजाना की घटना बन गई है।
मित्रों,बिहार की आम जनता का मानना है कि लालू-राबड़ी राज के मुकाबले राज्य में घूसखोरी घटी नहीं है बल्कि बढ़ी है। पहले लालू-राबड़ी राज में खद्दरधारी लोग बिना पैसे के भी काम करवा देते थे लेकिन आज बिना पैसे दिए कोई काम नहीं होता। पहले 250 रुपये में जमीन की दाखिल खारिज हो जाती थी आज 5 हजार से कम में नहीं होती। बिजली विभाग बिजली कम देती है अनर्गल बिलिंग के झटके ज्यादा देती है। नीतीश राज में बने पुल 5 साल में ही गिर जा रहे हैं। क्यों? इतना ही नहीं नीतीश जी ने शासन में आने के बाद कहा था कि ठेकेदारों को सड़कों के निर्माण के समय गारंटी देनी पड़ेगी कि सड़कें कितने सालों तक चलेगी। अब नीतीश सरकार जनता पर यह जिम्मेदारी छोड़ रही है कि कहीं पर सड़क टूट जाती है तो टॉल फ्री नंबर पर फोन करे। सरकार उसके बाद ठेकेदार को ब्लैक लिस्ट में डाल देगी और इस प्रकार भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। सरकारी अस्पतालों की स्थिति में नीतीश राज की शुरुआत में जो सुधार आया था अब फिर से स्थिति बिगड़ चुकी है। कहीं दवा घोटाला है तो कहीं यंत्र खरीद घोटाला। जहाँ नजर डालिए बस घोटाला ही घोटाला। सरकार किसानों से धान खरीदती है तो वहाँ भी घोटाला हो जाता है। यानि जहाँ भी कोई काम राज्य सरकार अपने हाथ में लेती है वहीं पर एक घोटाला हो जाता है और इस तरह से राज्य में सुशासन का राज स्थापित किया जा रहा है।
मित्रों,जहाँ तक शिक्षा का सवाल है तो मैंने शुरू में ही अर्ज किया कि बिहार के स्कूलों में नीतीश कुमार ने अयोग्य और असामाजिक तत्त्वों को शिक्षक बना दिया इसलिए प्राथमिक शिक्षा का जो हाल होना चाहिए था वही हो गया है। किसी भी सरकारी स्कूल में यूँ तो पहले से ही पढ़ाई न के बराबर हो रही थी अब दूरदर्शी नीतीश जी ने उपस्थिति की अनिवार्यता को समाप्त करके हालत को और भी चौपट करने की दिशा में महान कदम उठा दिया है। अब जबकि छात्र स्कूलों में आएंगे ही नहीं तो पठन-पाठन का माहौल कहाँ से बनेगा? यही कारण है कि जब बिहार में मैट्रिक या इंटर या बीए की परीक्षा आयोजित होती है तो बिहार को शर्मशार होना पड़ता है। पिछले 10 सालों में प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षा के माहौल को षड्यंत्रपूर्वक नीतीश सरकार द्वारा समाप्त कर दिया है। बिहार सरकार प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करती है और बहाली कर दी जाती है कभी मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के परिजनों की तो कभी स्वास्थ्य मंत्री की सुपुत्री की।
मित्रों,नीतीश कुमार जी ने कल-परसों ही एक बार फिर से आरक्षण और अपने भेजा का बेजा इस्तेमाल किया है। नीतीश जी ने ठेकों में आरक्षण लागू कर दिया है। इससे पहले भी मोहम्मद बिन तुगलक के 21वीं शताब्दी अवतार श्रीमान ने पंचायती राज में विचित्र आरक्षण व्यवस्था लागू की थी। आप सभी जानते हैं कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है लेकिन बिहार की पंचायती राज व्यवस्था में लोकतंत्र तुगलकी आरक्षण से चलता है। किसी पंचायत में भले ही सवर्णों या यादवों की आबादी 99 प्रतिशत रहे लेकिन गाँव का मुखिया बनेगा कोई दलित या महादलित ही भले ही उस पंचायत में उनका एक ही परिवार क्यों न रहता हो।
मित्रों,तो ये है संक्षेप में नीतीश राज में बिहार की स्थिति। अब आप ही बताईए कि बिहार में बहार हो,नीतीश कुमार हो नारा लगा देने मात्र से कैसे बिहार में बहार आ सकती है? ठीक इसी तरह से यूपी सरकार कहती है कि यूपी में दम है क्योकि यूपी में जुर्म कम है। क्या यूपी सरकार के ऐसा कह देने या ऐसे नारे लगा देने भर से यूपी में जुर्म कम हो गया या हो जाएगा। वास्तविकता तो यह है कि यह नारा बिहार की स्थिति पर फिट तो नहीं ही हो रही है बल्कि पूरी तरह से विरोधाभासी है। नारा तो कुछ इस तह से होना चाहिए कि संपूर्ण विनाश हो,रक्तरंजित बिहार हो,फिर से नीतीश कुमार हों।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

3.7.15

आडवाणी जी यूपी में तो कई साल से आपातकाल लागू है

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने भीष्मपितामह लालकृष्ण आडवाणी जब भी कुछ बोलते हैं तो उसके अनगिनत अर्थ लगाए जाते हैं। श्री आडवाणी ने कहा कि आपातकाल लगाने वाली प्रवृत्तियाँ आज भी हमारे देश में मौजूद हैं और लोगों ने इसे सीधे-सीधे केंद्र की मोदी सरकार से जोड़ दिया जबकि अभी तक मोदी सरकार ने ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा पैदा होता हो। अगरचे भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जरूर वर्ष 2012 से ही यानि समाजवादी सरकार के आने के बाद से ही अघोषित आपातकाल लागू है।

मित्रों,अगर आप यूपी में रहते हैं तो आप सुपर चीफ मिनिस्टर आजम खान के खिलाफ लिखने की सोंच भी नहीं सकते हैं। पता नहीं कब आपको पुलिस घर से उठा ले। अभी पिछले दिनों एक पत्रकार जगेंद्र सिंह को तो यूपी सरकार के कद्दावर मंत्री राममूर्ति वर्मा के खिलाफ लिखने पर खुद जनता की रक्षा की शपथ लेनेवाले पुलिसवालों ने ही घर में घुसकर जिंदा जला दिया और वर्मा यूपी सरकार में आज भी मंत्री बना हुआ है। संकेत साफ है कि हमारे खिलाफ लिखोगे तो जिंदा जला दिए जाओगे और हमारा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। मैं समझता हूँ कि ऐसा तो 1975 के आपातकाल में भी नहीं हुआ था।

मित्रों,कल ही पूर्व बसपा सांसद शफीकुर्ररहमान बर्क के खिलाफ दो साल पहले फेसबुक पर की गई टिप्पणी के चलते एक स्वतंत्र टिप्पणीकार को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस बार यूपी पुलिस ने 66 ए के तहत मामला दर्ज नहीं किया है बल्कि सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के ज्यादा संगीन धारा के तहत मुकदमा किया है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है और पूर्व की तरह सुप्रीम कोर्ट मामले में हस्तक्षेप कर पीड़ित पत्रकार को नहीं छुड़वाता है तो आगे उम्मीद की जानी चाहिए कि धड़ल्ले से इस सूत्र का यूपी पुलिस द्वारा प्रयोग किया जाएगा और यूपी में पत्रकार बिरादरी का जीना मुश्किल कर दिया जाएगा।

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि देश में आपातकाल लागू करने के लिए न तो संसद की अनुमति चाहिए और न ही केंद्र सरकार की पहल ही जरूरी है बल्कि राज्य सरकारें भी चाहें तो बिना घोषणा किए ही आपातकाल जैसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकती हैं और यूपी की समाजवादी सरकार यही कर रही है। यूपी में पिछले तीन सालों से लोकतंत्र को खूंटी पर टांग दिया गया है और एक पार्टी की सरकार चल रही है। उसी एक पार्टी के लोग प्रतियोगिता परीक्षाओं में पास हो रहे हैं,उसी एक पार्टी के लोग रंगदारी वसूल रहे हैं,उसी एक पार्टी के लोग थानेदारों को हुक्म दे रहे हैं और उसी एक पार्टी के लोग पत्रकारों को जिंदा जला भी रहे हैं। सवाल यह है कि इस एक पार्टी के सरकार-समर्थित गुंडाराज को रोका कैसे जाए? फिलहाल तो कोई मार्ग दिख नहीं रहा। वैसे भी जनता ने जब बबूल का पेड़ लगाया है तो उसको आम खाने को कहाँ से मिलेगा? गिनते रहिए गिनती कि कितने पत्रकार अंदर कर दिए गए और कितनों को मोक्षधाम पहुँचा दिया गया।
 

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

23.6.15

सिर्फ नदी द्वीप नहीं भ्रष्टाचार का टापू भी है राघोपुर

राघोपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने गृह-प्रखंड राघोपुर (वैशाली) के बारे में हम बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं कि यह एक नदी द्वीप है जिसके चारों तरफ से गंगा बहती है। लेकिन अब राघोपुर को देखता हूँ तो पाता हूँ कि यह न सिर्फ एक नदी द्वीप है बल्कि भ्रष्टाचार का टापू भी है। एक ऐसा टापू जहाँ आकर केंद्र और राज्य सरकार की सारी योजनाएँ दम तोड़ जाती हैं या फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
मित्रों,हरि अनंत हरि कथा अनंता अर्थात राघोपुर में व्याप्त अव्यवस्था के बारे में मैं तो क्या श्रीगणेशजी भी संपूर्णता से वर्णित नहीं कर सकते। हमारे प्रखंड में करीब एक-डेढ़ दशक पहले सामुदायिक शौचालय निर्माण की योजना आई। आज अगर आप प्रखंड में घूमेंगे तो पाएंगे कि कहीं भी सामुदायिक शौचालय बना ही नहीं। ठेकेदारों ने बदले में अपने-अपने घरों में शौचालय बनवा लिए। इसी तरह इस प्रखंड में उनलोगों को भी इंदिरा आवास योजना के तहत पूरी की पूरी राशि दे दी गई जिनके पहले से ही छतदार मकान थे।
मित्रों,इसी तरह आपको इस प्रखंड में कई ऐसे पंचायत मिल जाएंगे जहाँ कि पिछले कई सालों से वृद्धावस्था या विधवा पेंशन का वितरण ही नहीं हुआ है। पूछने पर अधिकारी बताते हैं कि लाभान्वितों का रिकार्ड ही नहीं मिल रहा। पिछले वर्षों में कई बीडीओ यहाँ आए और चले भी गए लेकिन यह गुत्थी आज भी अनसुलझी की अनसुलझी ही है।
मित्रों,अगर आप चकौसन घाट से नदी पार करने के बाद चकसिंगार की तरफ बढ़ेंगे तो देखेंगे कि चकसिंगार में एक पुलिया गिरी पड़ी है। यह एक ऐसी पुलिया है जो बनने के साथ ही धराशायी हो गई जाहिर है कि निर्माण में गुणवत्ता को ध्यान में रखा ही नहीं गया बल्कि पैसा निर्माण पर ज्यादा जोर दिया गया। पुलिया बनी और गिरी। कई साल बीत गए लेकिन न तो ठेकेदार के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई और न ही संबंधित अभियंता के विरूद्ध ही।
मित्रों,चाहे नीतीश कुमार जितने भी दावे कर लें लेकिन सच्चाई तो यही है कि राघोपुर प्रखंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी लालटेन युग में जीने को विवश है। रात होते ही राघोपुर के कई पंचायत अंधेरे में डूब जाते हैं। कहीं ट्रांसफॉर्मर नहीं है तो कहीं तार।
मित्रों,राघोपुर प्रखंड में अगर सबसे खराब स्थिति किसी चीज की है तो वह है सरकारी शिक्षा। बीआरसी यानि ब्लॉक रिसोर्स सेंटर और क्लस्टर रिसोर्स सेंटरों की मिलीभगत से यहाँ के विद्यालयों के अधिकतर शिक्षक सिर्फ वेतन लेने विद्यालय आते हैं। हर महीने सीआरसी के समन्वयक को निर्धारित राशि पहुँचाते रहिए और घर पर खेती कराईए या फिर दुकान चलाईए। हाँ,अगर आप महिला हैं या स्कूलवाले गांव के ही हैं तो फिर और भी सोने पर सुहागा। अब जब शिक्षक रहेगा ही नहीं तो पढ़ाएगा कौन? प्रखंड के कई गांवों के स्कूलों में तो इतना अधिक नामांकन है जितने कि गांव में बच्चे भी नहीं हैं। नहीं समझे क्या? ज्यादा नामांकन होगा तभी तो भ्रष्टाचार की खिचड़ी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पकाई जा सकेगी और हेडमास्टरों और सहायक शिक्षकों के वारे-न्यारे हो सकेंगे।
मित्रों,संभवतः पूरे वैशाली जिले में राघोपुर प्रखंड ही ऐसा इकलौता प्रखंड है जहाँ कि पुलिस पब्लिक के रहमोकरम पर जीती है। कभी थाने में घुसकर कोई दारोगा को मार जाता है और प्रशासन उसका बाल बाँका भी नहीं कर पाता तो कभी कोई बाजाप्ता फोन करके दारोगा को जान से मारने की धमकी देता है और दारोगा उसका कुछ भी नहीं उखाड़ पाता।
मित्रों,जहाँ हाजीपुर शहर की जनवितरण प्रणाली की दुकानों में हर महीने सामानों का वितरण किया जाता है वहीं राघोपुर में साल में दो बार भी अगर वितरण हो जाए तो लोग भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं। प्रखंड के आंगनबाड़ियों का तो कहना ही क्या? कई स्थानों पर तो आंगनबाड़ी का धरातल पर अस्तित्व ही नहीं है और हर महीनों हजारों बच्चे लाभान्वित भी हो जा रहे हैं। कुपोषण को तो आंगनबाड़ियों ने प्रखंड से निकाल बाहर ही कर दिया है।
मित्रों,यूँ तो वैशाली प्रशासन के लिए राघोपुर हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है लेकिन मैं नहीं मानता कि राघोपुर को चुस्त-दुरूस्त नहीं किया जा सकता। इसकी भौगोलिक स्थिति इस दिशा में उतनी बड़ी बाधा नहीं है जितनी बड़ी बाधा बिहार सरकार और उसके अधिकारियों की ईच्छा-शक्ति की कमजोरी है। माना कि साल के 6 महीने तक इस क्षेत्र में सिर्फ नावों के जरिए ही पहुँचा जा सकता है लेकिन बाँकी के 6 महीनों तक तो दो-दो पीपा पुलों की मदद से कभी भी कहीं भी अधिकारी आ-जा सकते हैं। इन 6 महीनों में तो प्रखंड में बहुत-कुछ सुधार लाया जा सकता है। एक और बात,जब तक राघोपुर से होकर पक्के पुल का निर्माण नहीं हो जाता तब तक गंगा के उत्तर पार से भी कम-से-कम एक पीपा पुल का निर्माण तो होना ही चाहिए क्योंकि वैशाली पुलिस-प्रशासन को पीपा पुल चालू होने की स्थिति में भी पटना होकर राघोपुर जाना पड़ता है जो कि गंगा सेतु पर महाजाम लगा होने पर लगभग असंभव-सा हो जाता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

डायबिटीज से हो जा फ्री, मलबरी पी बिंदास जी...

डायबिटीज से हो जा फ्री, मलबरी पी बिंदास जी... 


आदरणीय डॉक्टर साहब, गत 15 दिनों से मलबेरी की चाय 3 बार पीने से मुझे निम्नलिखित फायदे हो रहे हैं। 1. शरीर की त्वचा पर खुरदुरापन था जो कि अब दूर हो रहा है एव त्वचा नरम हो रही है। 2. शुगर लेवल कम हो रहा है 3. मैं इन्सुलिन लेती थी अब उसकी मात्रा में कमी हो गई है। 4. बालो में भी चमक आ रही है। 5. शुगर के कारण शरीर में अस्वस्थता लगती थी जो अब कम हो गई है। यह चाय अधिक से अधिक शुगर रोगी ले और मेरी तरह जल्दी स्वस्थ हों यही आशा है। डॉक्टर साहब आपका बहुत बहुत धन्यवाद। प्रार्थी, स्नेहा अनवेकर तथा एस एन अनवेकर रतलाम/इंदौर

22.6.15

बाबू मोशाय,ब्रांड से नहीं खेल से मैच जीते जाते हैं

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पूरी दुनिया जानती है कि बंगाली बाबू जगमोहन डालमिया का भारतीय और विश्व क्रिकेट में क्या योगदान है। आपको याद होगा कि आज से दो दशक पहले तक पूर्व क्रिकेट खिलाड़ियों की भुखमरी के किस्से कैसे समाचार पत्रों में छाये रहते थे। यह डालमिया की ही देन है कि आज भारत दुनिया के क्रिकेट का गढ़ बन गया है और भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों की गिनती दुनिया के सबसे धनी खिलाड़ियों में की जाती है। लेकिन अगर हम यह कहें कि क्रिकेट के इसी व्यवसायीकरण ने भारतीय क्रिकेट का बंटाधार करके रख दिया है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज भारतीय क्रिकेट के लिए खिलाड़ियों का चयन कदाचित यह देखकर नहीं किया जाता कि कौन खिलाड़ी अभी कैसा खेल रहा है बल्कि यह देखकर किया जाता है कि किस खिलाड़ी का ब्रांड वैल्यू कितना है।

मित्रों,अगर हम भारत-बांग्लादेश एकदिवसीय शृंखला के नतीजों और दोनों देशों की टीमों पर सरसरी नजर भी डालेंगे तो पाएंगे कि जहाँ बांग्लादेश की टीम में सारे फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को रखा गया था वहीं भारत की टीम में बड़े-बड़े ब्रांड खेल रहे थे और उनमें से अधिकतर लंबे समय से आउट ऑफ फॉर्म चल रहे थे।

मित्रों,शायद यही कारण था भारत के कागजी शेर बांग्लादेश के नौजवान,जोशीले और देशभक्त खिलाड़ियों के आगे ढेर हो गए और इस प्रकार दोनों ही मैच एकतरफा हो गए। हम यह नहीं कहते कि भारतीय खिलाड़ी देशभक्त नहीं हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या कारण है कि जब भारतीय टीम विश्वकप के सेमीफाईनल में हारती है तो टीम के किसी भी खिलाड़ी की आँखों से आँसू नहीं बहते लेकिन जब वही खिलाड़ी आईपीएल के मैच हारते हैं तो मैदान पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं? खेल में पैसा होना तो चाहिए मगर उसके प्रति इतना भी पागलपन नहीं हो कि देश के लिए खेलते समय खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता ही खतरे में पड़ जाए।

मित्रों,इसलिए तो हम कहते हैं कि बाबू मोशाय भारतीय क्रिकेट को अगर बचाना है तो टीम से निकाल फेंकिए सारे बिस्कुट-पेप्सी-शैंपू आदि बेचनेवाले चुके हुए ब्रांडों को सिर्फ और सिर्फ उन्हीं खिलाड़ियों को टीम में रखिए जो पूरी तरह से फिट हों,फॉर्म में हों और देश के लिए खेलने में गौरव अनुभव करते हों। देश को ब्रांडों से भरी दिशाहारा टीम नहीं चाहिए बल्कि मैच जितानेवाली,देश का गौरव बढ़ानेवाली मजबूत टीम चाहिए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

डायबिटीज से हो जा फ्री, मलबरी पी बिंदास जी...

डायबिटीज से हो जा फ्री, मलबरी पी बिंदास जी...
आदरणीय डॉक्टर साहब,
गत 15 दिनों से मलबेरी की चाय 3 बार पीने से मुझे निम्नलिखित फायदे हो रहे हैं।
1. शरीर की त्वचा पर खुरदुरापन था जो कि अब दूर हो रहा है एव त्वचा नरम हो रही है।
2. शुगर लेवल कम हो रहा है
3. मैं इन्सुलिन लेती थी अब उसकी मात्रा में कमी हो गई है।
4. बालो में भी चमक आ रही है।
5. शुगर के कारण शरीर में अस्वस्थता लगती थी जो अब कम हो गई है।
यह चाय अधिक से अधिक शुगर रोगी ले और मेरी तरह जल्दी स्वस्थ हों यही आशा है।
डॉक्टर साहब आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
प्रार्थी,
स्नेहा अनवेकर तथा एस एन अनवेकर
रतलाम/इंदौर

19.6.15

SIMI को 'खरीदा' ISIS ने! भारत पर हमले की तैयारी



 -  ख़ुफ़िया एजेंसियों ने भारत के शहरों में आईएसआईएस के हमले को लेकर जारी किया अलर्ट

-  अफगानिस्तान और पकिस्तान के जरिए पूरब में अपनी जड़ें फैलाने की योजना को दे रहा है अंजाम


अनुराग तिवारी


लखनऊ, 17 जून|
विश्व
के सबसे खूंखार माने जाने वाले आतंकी संगठन ने भारत के प्रमुख शहरों में
हमले की योजना बनाई है. आईएसआईएस ने इसके लिए भारत की जमीन पर मौजूद आतंकी
संगठनों की मदद लेने की योजना बनाई है. भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसियों इस
बाबत  जून के पहले हफ्ते में सरकार को एक पत्र भेजकर आईएसआईएस के संभावित
हमले का अलर्ट दिया है. ख़ुफ़िया एजेंसियों को शक है कि आईएसआईएस ने पैसों के
दम पर सिमी और आईएम जैसे संगठनों से सांठगाँठ की है. माना जा रहा है कि
तेल के कुओं से हुई मोटी कमाई के बल पर आईएस ने सिमी जैसे संगठनों को अपने
कब्जे में ले लिया है. देखा जाए तो यह एक तरह से आतंक की दुनिया का
कॉर्पोरेट टेक-ओवर है. इस बात की तस्दीक दुनिया भर में आतंकी संगठनों के
आईएसआईएस से हुए गठजोड़ के मामले कर रहे हैं.








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SIMI को 'खरीदा' ISIS ने! भारत पर हमले की तैयारी



Akshay Kumar Shahrukh Khan Irrfan Khan Jurrasic World



16.6.15

वक्त पर सोना बाद में रोना फिर दूसरांे को कोसना ही क्या  जिले की नियति बन कर रह गयी है ?
कमलनाथ ने प्ररंभ किये भोपाल,इंदौर दिल्ली और मुबंई की  हवाई यात्रा चालू कराने के प्रयास: जिले के सांसद फग्गनसिंह कुलस्ते और बांधसिंग भगत बैठे हैं चुप: वक्त निकल जाने पर क्या फिर दूसरों को कोसेंगे जिले के नेता?
सिवनी ।  मध्यप्रदेश सरकार ने पिछले दिनों केबिनेट मीटिंग में प्रदेश की दस हवाई पट्टियों को निजी विमानन कंपनियों के उपयोग के लिये भी अनुमति दे दी है। इसमें सिवनी के साथ छिंदवाड़ा भी शामिल है। छिंदवाड़ा से हवायी यात्रा प्रारंभ कराने के प्रयास भी प्रारंभ हो गये हैं लेकिन जिले के सांसद अभी सो रहें है। वक्त पर सोना बाद में रोना और फिर दूसरों को कोसना ही क्या जिले की नियति बन कर रह गयी है।
मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने प्रदेश की दस हवाई पट्टियों को निजी हवाई कंपनियों के उपयोग के लिये छूट देने का निर्णय अपनी केबिनेट बैठक में कर लिया है। प्रदेश सरकार के इस निर्णय से इन दसों जिलों में भविष्य में यात्रियों के लिये हवाई यात्रा की सुविधा भी उपलब्ध हो सकती है। प्रदेश के पिछड़े जिलों हवाई यात्रा की सुविधा उपलब्ध होने से जिलों में औद्योगिक विकास के अवसर बढ़ते हैं क्योंकि अच्छे और बड़े उद्योगपति कम समय में यात्रा करने के लिहाज से हवाई यात्रा करना पसंद करते हैं जिससे उनके समय की बचत होती है। 
प्रदेश सरकार ने जिन दस हवाई पट्टियों को यह अनुमति दी है उनमें छिंदवाड़ा के साथ ही सिवनी भी शामिल है। इस अनुमति के मिलते ही अपने क्षेत्र को सब कुछ दिलाने की ललक रखने वाले कांग्रेस के सांसद पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने जबलपुर से छिंदवाड़ा होते हुये भोपाल,इंदौर दिल्ली और मुंबई के लिये हवाई यात्रा उपलब्ध कराने के प्रयास भी प्रारंभ कर दिये हैं जो कि विगत दिनों अखबारों की सुर्खियां भी बने रहे। ये प्रयास कितने और कब कारगर साबित होते हैं? यह तो भविष्य की गर्त में हैं लेकिन प्रयास प्रारंभ होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। 
छिंदवाड़ा के साथ ही सिवनी जिले की हवायी पट्टी को भी प्रदेश सरकार यह अनुमति प्रदान की है लेकिन हमारे जिले के दोनों भाजपा सांसद पूर्व केंद्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते और बोध सिंह भगत के कोई ऐसे प्रयास प्रकाश में नहीं आये हैं कि उन्होनें जिले के लोगों को हवाई यात्रा उपलब्ध कराने के लिये किये हो। आज जबकि देश और प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो जिले के सांसदों को इस दिशा में प्रयास कर लोगों को यह सुविधा उपलब्ध करानी चाहिये क्योंकि जबलपुर से छिंदवाड़ा सिवनी होकर ही हवाई मार्ग भी जायेगा। लेकिन जिले के सांसदों की यह उदासीनता कहीं ऐसा ना हो कि जिले को मिल सकने वाली इस सुविधा से भी वंचित करा दे। 
अभी तक जिला ऐसी ही उपेक्षा के चलते बड़ी रेल लाइन,संभाग और मेडिकल कॉलेज जैसी उपलब्धियों से वंचित हो गया है। हर चीज को पाने के लिये समय पर प्रयास करना जरूरी होते हैं। यदि ऐसा ना किया जाये तो यह जनप्रतिनिधियों की व्यक्तिगत क्षति ना होकर जिले की क्षति हो जाती है। बीते पंद्रह वर्षों से हमेशा यह देखा जा रहा है कि जिले के जनप्रतिनिधि वक्त पर सोते रहते हैं और फिर बाद में रोते हैं। शायद अपनी छिपाने के लिये ही फिर दूसरे को कोसने का काम चालू कर देते हैं। 
यह सब देख देख कर जिले के लोग अब यह सोचने को मजबूर हो गये हैं कि वक्त पर सोना बाद में रोना और फिर दूसरों को कोसना ही क्या जिले की नियति बन कर रह गयी है? 
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी 1
16 दजून 2015 से साभार


  



शासकीय मेडिकल कॉलेज छिनने पर कमलनाथ पर आरोप लगाने वाले क्या अब सुषमा और शिवराज पर लगायेंगें आरोप? 
   प्रदेश सरकार ने हाल ही में हुयी केबिनेट की बैठक में पगदेश में तीन जिलों में पी.पी.पी. मोड के मेडिकल कालेज खेलने की स्वीकृति दे दी है लेकिन इन जिलों साथ ही सिवनी जिले के लिये पूर्ण की गयी प्रक्रिया के बाद भी उसे मंजूरी ना देकर लंबित रख दिया गया है। इन जिलों में विदिशा के नाम के जुड़ने से यह एक चिंता का विषय बन गया है। केन्द्र शासन द्वारा पोषित किये जाने वाले जो मेडिकल कॉलेज प्रदेश में खुलने वाले हैं उस प्रस्ताव में भी विदिशा जिले का नाम शामिल है। पहले जिन सात जिलों के नाम प्रदेश सरकार के द्वारा बताये गये थे उनमें  प्रमुख रूप से विदिशा, शिवपुरी और छिंदवाड़ा बताये गये थे। ये तीनों ही वी आई पी क्षेत्र थे । लोकसभा चुनावों के बाद और नपा तथा नगर निगम चुनावों के पहले विवाद चालू हुआ प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा की प्रेस कांफ्रेंस और सदन में दिये गये इस बयान से कि प्रदेश सरकार के मूल प्रस्ताव के अनुसार केन्द्र सरकार द्वारा खोले जाने वाले मेडिकल कालेज सिवनी और सतना में ही खोले जायेंगें ना कि छिंदवाड़ा और शिवपुरी में । इससे विवाद हो गया था और पीपीपी  मोड के कालेज की प्रक्रिया जिले के लिश्े चालू हो गयी थी। जिला योजना समिति के चुनाव में कांग्रेस ने अपना बहुमत बना लिया है। जिला पंचायत से निर्वाचित होने वाले 14 में से 11 सदस्य कांग्रेस के चुने गये है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं रोचक चुनाव रहा नगर पालिका सिवनी के निर्वाचन का जहां से कांग्रेस के संतोष नान्हू पंजवानी ने भाजपा के अलकेश रजक को 10 के मुकाबले 14 मतों से पराजित कर दिया।  
सरकारी छिंदवाड़ा तो क्या पीपीपी मोड का  मेडिकल कालेज सुषमा ले गयीं विदिशा?-प्रदेश सरकार ने हाल ही में हुयी केबिनेट की बैठक में पगदेश में तीन जिलों में पी.पी.पी. मोड के मेडिकल कालेज खेलने की स्वीकृति दे दी है लेकिन इन जिलों साथ ही सिवनी जिले के लिये पूर्ण की गयी प्रक्रिया के बाद भी उसे मंजूरी ना देकर लंबित रख दिया गया है। वैसे तो यह एक सामान्य प्रक्रिया कही जाती है लेकिन इन जिलों में विदिशा के नाम के जुड़ने से यह एक चिंता का विषय बन गया है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र शासन द्वारा पोषित किये जाने वाले जो मेडिकल कॉलेज प्रदेश में खुलने वाले हैं उस प्रस्ताव में भी विदिशा जिले का नाम शामिल है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस मामले में प्रदेश सरकार के जिम्मेदार मंत्री और अधिकारियों के अलग अलग बयान आते रहें है। पहले जिन सात जिलों के नाम प्रदेश सरकार के द्वारा बताये गये थे उनमें  प्रमुख रूप से विदिशा, शिवपुरी और छिंदवाड़ा बताये गये थे। ये तीनों ही वी आई पी क्षेत्र थे जहां से लोकसभा की तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष  एवं वर्तमान में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिंया सांछ थे। ये तीनों ही आज भी इन्हीं क्षेत्रों सांसद है। लेकिन लोकसभा चुनावों के बाद और नपा तथा नगर निगम चुनावों के पहले विवाद चालू हुआ प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा की प्रेस कांफ्रेंस और सदन में दिये गये इस बयान से कि प्रदेश सरकार के मूल प्रस्ताव के अनुसार केन्द्र सरकार द्वारा खोले जाने वाले मेडिकल कालेज सिवनी और सतना में ही खोले जायेंगें ना कि छिंदवाड़ा और शिवपुरी में जिन्हें तत्कालीन यू.पी.ए. सरकार ने बदल दिया था। लेकिन नगर निगम चुनाव के पूर्व छिंदवाड़ा आये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह नें आम सभा में यह घोषणा कर दी थी कि मेरे रहते कोई भी माई का लाल छिंदवाड़ा का हक नहीं छीन सकता यह मेडिकल कालेज यहीं खुलेगा ना जाने कौन ऐसी अफवाहें फैला रहा है। अब भला मुख्यमंत्री जी को यह कौन बताता कि यदि यह अफवाह है तों इसे और कोई नहीं ब्लकि उनके मंत्रीमंडल के सदस्य और स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने फैलायी है। इसके बाद छिंदवाड़ा के सांसद कमलनाथ पर एक बार फिर यह आरोप लगया जाने लगा कि वे सिवनी का हक छीन रहें हैं जबकि 2013 में जब सात जिलों के नाम घोषित किये गये थे तब उनमें सिवनी का नाम शामिल ही नहीं था। जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सालों पहले सिवनी में मेडिकल कालेज खोलने की घोषणा करके सभा में तालियां बजवा चुके थे। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि पी.पी.पी. माडल में मेडिकल कालेज सिवनी में खुलेगा। इसके लिये प्रक्रिया भी प्रारंभ की गयी जिसमें यह पता चला था डॉ. सुनील अग्रवाल के जिंदल ग्रुप और सुखसागर ग्रुप में से किसी को सरकार यह खोलने की अनुमति देने वाली है। पिछले दिनों जब केबिनेट की बैठक में पी.पी.पी. माडल में तीन जिलो के लिये तो मंजूरी दे दी गयी लेकिन उसमें सिवनी का नाम शामिल नहीं था ब्लकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के क्षेत्र और  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के गृह जिले विदिशा का नाम शामिल था जबकि केन्द्र शासन द्वारा खोले जाने मेडिकल कालेजों में विदिशा का नाम शामिल है और उसमें तो विवाद भी नहीं है। प्रदेश सरकार के इस निर्णय से जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में तरह तरह की चर्चायें चाले हो गयी है। कुछ लोगों का मानना है कि या तो विदिशा में दो दो मेडिकल कॉलेज खोले जा रहें या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि केन्द्र शासन द्वारा खोले जाने वाले मेडिकल काफलेजों की सूची से विदिशा का नाम भी इसलिये कट गया हो क्योंकि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गुड बुक में नहीं है। इसीलिये पी.पी.पी. माडल के मेडिकल कॉलेज में सिवनी का नाम रोक कर विदिशा में यह खोला जा रहा है। यदि ऐसा हो रहा है तो मेडकल कॉलेज कमलनाथ द्वारा छीने जाने का आरोप लग रहा था तो अब वही आरोप क्या विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर नहीं लगना चाहिये? यदि ऐसा हो रहा है तो जिले के भाजपा के सांसद द्वय फग्गन सिंह कुलस्ते और बोध सिंह भगत तथा विधायक कमल मर्सकोले को जिले के हित के लिये लड़ना चाहिये और यदि जरूरत हो तो इसके लिये जिले के अन्य जन प्रतिनिधियों को इसमें शामिल कर एक सशक्त पक्ष जिले का रखना समय की मांग है। 
जिला योजना समिति के कांग्रेस ने किया कब्जा -जिला योजना समिति के चुनाव में कांग्रेस ने अपना बहुमत बना लिया है। जिला पंचायत से निर्वाचित होने वाले 14 में से 11 सदस्य कांग्रेस के चुने गये है जबकि लखनादौन और बरघाट नगर पंचायत से गोल्हानी निर्विरोध चुन लिये गये हैं। जिसमें सिवनी के विधायक मुनमुन राय की विशेष भूमिका बतायी जा रही है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं रोचक चुनाव रहा नगर पालिका सिवनी के निर्वाचन का जहां से कांग्रेस के संतोष नान्हू पंजवानी ने भाजपा के अलकेश रजक को 10 के मुकाबले 14 मतों से पराजित कर दिया। यहां यह विशेष रूप से उल्ल्ेखनीय है कि पालिका में अध्यक्ष सहित 25 सदस्यों में से 13 भाजपा के 8 कांग्रेस के हैं। इसके बाद भी भाजपा की हार होना राजनैतिक हल्कों में चर्चित है। जबकि भाजपा ने इसी पालिका में कांग्रेस के नान्हू पंजवानी को हरा कर पहली बार अपना उपाध्यक्ष जिताया था। ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इसे लेकर भाजपा में तरह तरह की चर्चायें चल रहीं हैं। एक तरफ कुछ भाजपा नेताओं का कहना है कि उपाध्यक्ष चुनाव के समय पार्षदों से जो वायदे किये गये थे वे कुछ पार्षदों के साथ पूरे नहीं किये गये तो इसीलिये उन्होंने अपनी नाराजगी बतायी हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ भाजपा नेता यह भी कह रहें हैं कि भाजपा के एक गुट ने जान बूझ कर भाजपा को वोट नहीं देकर हरा दिया तो कुछ यह कहने से भी नहीं चूक रहें कि सब कुछ पैसे का खेल है। अब जो भी हो लेकिन भाजपा की यह हार भाजपा के चाल चरित्र और और चेहरे को बेनकाब जरूर कर गया है। “मुसाफिर”
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी 1
16 दजून 2015 से साभार


10.6.15

अब तेरा क्या होगा लालू?

मित्रों,हिंदी में एक कहावत है और है महाभारतकालीन कि मनुष्य बली नहीं होत हैं समय होत बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बान। 15 सालों तक बिहार पर एकछत्र राज करनेवाले लालू प्रसाद को देखकर एकबारगी स्वभाववश दया भी आती है और इस कहावत पर हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। दरअसल मानव करण कारक है लेकिन वो खुद को समझ बैठता कर्त्ता है। श्री लालू प्रसाद यादव जी को भी किस्मत ने मौका दिया लेकिन जनाब खुद को खुदा समझ लेने की भूल कर बैठे। बिहार को उन्होंने फैमिली प्रॉपर्टी समझ लिया। दरवाजे पर बंधी गाय समझकर जब जितना चाहा दूहा।
मित्रों,इस लालू के शासन में बिहार का विकास नहीं हुआ विनाश हुआ। बिहार को इन्होंने सीधे रिवर्स गियर में चला दिया। जिस दौर में पूरी दुनिया इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी के पीछे पागल थी उस दौर में यह श्रीमान इसका मजाक उड़ाते हुए कहा करते कि ये आईटी-फाईटी क्या होता है? उनका एक और जुमला उन दिनों काफी मशहूर हुआ करता था कि कहीँ विकास करने से वोट मिलता है वोट तो जात-पात के नाम पर मिलता है?
मित्रों,धीरे-धीरे कैलेन्डर के साथ-साथ वक्त बदला,बिहारियों की सोंच बदली,मानसिकता बदली और आज इन लालू प्रसाद जी की स्थिति ऐसी हो गई है,ये इतने कमजोर हो गए हैं कि इन श्रीमान जो कभी बिहार के साथ-साथ दिल्ली की कुर्सी के भी किंग मेकर हुआ करते थे से खुद सड़कछाप हो चुके सोनिया और राहुल गांधी मिलना तक नहीं चाहते। जिस व्यक्ति ने बिहार पर 40 सालों तक शासन करनेवाली कांग्रेस पार्टी को अपना पिछलगुआ बनाकर रख दिया था आज खुद ही पिछलग्गू बनने को बाध्य है। जिन लोगों को ऐसा लगता था या लगता है कि मुलायम लालू के रिश्तेदार होने के नाते उनका समर्थन करेंगे उनको यह याद रखना चाहिए कि देवगौड़ा और गुजराल के जमाने में मुलायम ही लालू के सबसे बड़े दुश्मन हुआ करते थे और लालू जी जेल भेजवाने में भी सबसे बड़ा हाथ उनका ही था। वैसे भी लालू से मुलायम का यूपी में कुछ बनने-बिगड़ने को नहीं है।
मित्रों,एक बात हमेशा याद रखिएगा कि बिहार में जो पार्टी एक बार पिछलगुआ बन जाती है वह समाप्त ही हो जाती है। यानि अब लालू जी के राजनैतिक जीवन का तो अंत हो ही गया समझिए। भविष्य में बेचारे शरद यादव की तरह नीतीश कुमार की हाँ में हाँ मिलाने का ही एकमात्र काम किया करेंगे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि भाजपा बिहार में सत्ता में साझीदार थी लेकिन पिछलग्गू नहीं थी। उसके नेता बराबर नीतीश कुमार को पसंद न आनेवाले बयान तो देते रहते ही थे साथ ही उस तरह के काम भी करते रहते थे। लेकिन यहाँ लालूजी की स्थिति वैसी नहीं है। उनको नीतीश जी को अपना नेता मानने के साथ ही खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं को नीतीश को नागवार लगनेवाले बयान देने से रोकना पड़ा है। मतलब साफ है कि लालू जी ने अपने साथ-साथ पूरी पार्टी के स्वाभिमान को नीतीश कुमार के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है।
मित्रों,लालू जी ने इस अवसर पर यह भी कहा कि भाजपा को हराने के लिए वे जहर पीने को भी तैयार हैं। वास्तविकता भी यही है कि लालू जी ने जहर ही पिया है,एक ऐसा जहर जो न सिर्फ उनकी राजनीति की बल्कि उनकी पार्टी की भी जान ले लेगा। वैसे हमारी लालू जी के साथ कोई हमदर्दी नहीं है। इस आदमी ने बिहार को बर्बाद करके रख दिया और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बिहार बचा हुआ था उसको समाप्त कर दिया उनके छोटे भाई नीतीश कुमार जी ने। आज तो हालत यह कि बिहार फिर से वहीं पर आकर खड़ा हो गया है जहाँ कि 2005 में तब था जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। मैं पूछता हूँ  कि नीतीश कुमार जी जीतन राम मांझी जी के एस्टीमेट घोटाले पर कोई जवाब या सफाई क्यों नहीं देते? चाहे सरकारी पुल हो,सड़क या मकान उनके निर्माण में खर्च होता है 1 करोड़ तो एस्टीमेट बनाया जाता है 5 करोड़ का। मांझी जी का तो यह व्यक्तिगत अनुभव था कि कमीशन का पैसा मुख्यमंत्री रहते हुए उनके पास भी पहुँचता था तो क्या नीतीश कुमार तक मांझी जी से पहले और मांझी जी के बाद भी कमीशन का पैसा पहुँचता था या पहुँचता है? अगर नहीं तो बरसात के दिनों में बिहार के कोने-कोने से नीतीश काल में निर्मित पुलों के गिरने की खबरें क्यों आती हैं? नीतीश जी ने पूरे बिहार में बोर्ड लगवा दिए हैं कि इन-इन सड़कों के टूटने की सूचना इस नंबर दें? आप कमीशन खाईए और पब्लिक दिन-रात पागलों की तरह नंबर डायल करती रहे?
मित्रों,वैसे आपको अबतक मेरे द्वारा उठाये गए सवाल का जवाब तो मिल ही गया होगा कि अब लालू जी का क्या होने वाला है। अब लालूजी बिहार से समाप्त हो चुके हैं,उन्होंने आत्मघाती गोल मारकर अपने द एंड को सुनिश्चित कर लिया है। चुनावों में चाहे जीते कोई लालूजी ने चुनाव लड़ने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली है। लालू जी अब मदारी नहीं रहे जमूरा बन गए हैं जो दूसरों के इशारे पर नाचता है। लेकिन यह मेरे उस सवाल का पूरा जवाब नहीं है। पूरा उत्तर यह है कि अगले कुछ महीनों में लालू जी कदाचित फिर से जेल की शोभा बढ़ाएंगे। अब दिल्ली में उनकी माई-बाप की सरकार नहीं है जो उनको खुल्ला छोड़ देगी। जब छोटे घोटालेबाज चौटाला को चुनावों के दौरान ही जेल भेज दिया गया तो लालू जी तो बहुत ही बड़े घोटालेबाज हैं पीएचडी डिग्रीधारी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

9.6.15

अलसी की स्वास्थ्यप्रद मेगी

दोस्तों, 

आजकल तो हर तरफ मेगी के ही चरचे हैं। लेकिन बात सिर्फ मेगी की ही नहीं है। ये मल्टीनेशल जो भी फूड आइटम बनाते है या बनाएंगे, उसमें ये स्वास्थ्यप्रद सामग्री कभी नहीं प्रयोग करेंगे। क्योंकि इनका तो मोटो ही है कि पहले बीमार करो फिर उपचार करो। और दवाइयां भी इनके भाई-बंदों की कंपनियां ही बनाती है। यानि ये करते हैं एक तीर से दो शिकार।
इसलिए दोस्तों, छोड़ो नेस्ले की जहरीली मेगी को और घर पर बनाओ अलसी की स्वादिष्ट मेगी…. सचमुच अब वह समय आ गया है जब खाने की सारी चीजें हमे घर पर ही बनानी पड़ेगी। अमिताभ और माधुरी दीक्षित ने हमारे बच्चों को गुमराह किया और बरसों तक जहरीली मेगी खिलाते रहे। और ये गाना गाते गाते अलसी की मेगी खाओ। नीचे यूट्यूब के एक वीडियो का लिंक है जिसमे हमारा फ्लेक्स ब्वॉय फ्लेक्स मेगी बनाना सिखा रहा है। 

सेहत पे लग जाए स्वाद का तड़का अलसी की मैगी खाके दिल मेरा फड़का, 

बुद्धि  बढ़ाए  सेहत  बन  जाए   रैंक  भी अच्छी  लाए  लड़की  और  लड़का।


मोदी बनवा रहे राव का स्मारक लेकिन उनके सांसद रामटेक गोटेगांव रेल लाइन की राव की घोषणा  से कर रहे परहेज
   जबलपुर से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख समाचार पत्र में रामटेक से गोटेगांव व्हाया सिवनी रेल लाइन में मामले में प्रकाशित समाचार इन दिनों जिलें में चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। 1996 में देश के प्रधानमंत्री नरसिंहाराव ने इस परियोजना की घोषणा जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती की उपस्थिति में की थी। इस मांग को प्रधानमंत्री के सामने तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री और सिवनी की सांसद कु. विमला वर्मा ने रखी थी। जिले से चुने गये दोनों भाजपा सांसद फग्गनसिंह कुलस्ते और बोधसिंह भगत ने इस ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया जबकि केन्द्र की मोदी सरकार ने दिल्ली में कांग्रेस के दिवंगत प्रधानमंत्री नरसिंहाराव का स्मारक बनाने का निर्णय लेकर सबको चौंका दिया है। जिपं में कांग्रेस के 11 और भाजपा के 6 और दोनो ही पार्टी के 1 1 बागी सदस्य चुन कर आये थे लेकिन अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और भाजपा ने दोनों ही पद जीत लिये थे। इन चुनावों में जिले भर के सारे कांग्रेसी नेता लगे हुये थे और सदस्यों को मार्गदर्शन भी दे रहे थे। इस बार समितियों के चुनाव में ना तो जिले के किसी नेता ने मार्गदर्शन दियालेकिन समितियों में कांग्रेस ने कब्जा कर लिया है। जिले में इस बार कमल या शिशि ठाकुर को मिल लालबत्त्ी सकती है ।  
क्या सांसद द्वय रामटेक गोंटेगांव रेल के लिये करेंगें प्रयास?-जबलपुर से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख समाचार पत्र में रामटेक से गोटेगांव व्हाया सिवनी रेल लाइन में मामले में प्रकाशित समाचार इन दिनों जिलें में चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। इस समाचार में उल्लेख किया गया है कि 1996 में देश के प्रधानमंत्री नरसिंहाराव ने इस परियोजना की घोषणा जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती की उपस्थिति में की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि इसमें रेल्वे को नफा नुकसान नहीं देखना चाहिये क्योंकि इसके बनने से आदिवासी क्षेत्रों को विकास का मौका मिलेगा। लेकिन बीस साल होने को आ गये हैं अब तक मामला सिर्फ सर्वे तक ही पहुंच पाया है। इस समाचार के प्रकाशित होने से जिले के राजनैतिक हल्कों में कुछ सवाल हवा में तैरने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि इस मांग को प्रधानमंत्री के सामने तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री और सिवनी की सांसद कु. विमला वर्मा ने रखी थी। 1996 में कांग्रेस सरकार के दौरान ही इसके ट्रेफिक सर्वे के आदेश हो गये थे लेकिन लोस चुनाव में कांग्रेस तथा सिवनी से विमला वर्मा चुनाव हार गयीं थीं। इसके बाद उनके सक्रिया राजनीति से स्वास्थ्य कारणों से हट जाने के बाद इस योजना के लिये भले ही इंका नेता आशुतोष वर्मा सहित कई नेताओं ने आंदोलन चलाये हों लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस योजना को स्थानीय कांग्रेस की गुटबाजी का खामियाजा भुगतना पड़ा। जबकि इसके लिये शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी ने स्वयं भी दो बार पत्र लिख की आंदोलन को आर्शीवाद दिया था। इसके बाद लगातार अभी तक भाजपा के सांसद चुने जाते रहें लेकिन ना जाने किन राजनैतिक कारणों से उन्होंने ना केवल इस योजना के लिये कोई प्रयास किये वरन अव्यवहारिक नये नये सुझाव देकर जिले की आवाज को ही कमजोर किया । उनके पास एक बहाना भी था कि क्या करें केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है और हमारी कोई सुनता ही नहीं हैं। लेकिन पिछले एक साल से राज्य के साथ साथ केन्द्र में भी भाजपा की सरकार है लेकिन जिले से चुने गये दोनों भाजपा सांसद फग्गनसिंह कुलस्ते और बोधसिंह भगत ने इस ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया जबकि केन्द्र की मोदी सरकार ने दिल्ली में कांग्रेस के दिवंगत प्रधानमंत्री नरसिंहाराव का स्मारक बनाने का निर्णय लेकर सबको चौंका दिया है। मोदी सरकार यदि सही में स्व. नरसिंहाराव के प्रति सम्मान प्रगट करना चाहती है तो उसे गोटेगांव सिवनी रामटेक नई रेल लाइन को मुजूरी देकर बनाना चाहिये क्योंकि यह प्रधानमंत्री के रूप में संभवतः उनकी अंतिम सार्वजनिक घोषणा थी जो अब चालू भी नहीं हो पायी है। जिले से निर्वाचित दोनों सांसद यदि इस बारे में प्रधानमंत्री से बात कर उनका ध्यानाकर्षित कराये तो तो शायद जिले को विकास के नये आयाम तक पहुचने का अवसर मिल सकता है।  
 जिपं समितियों के चुनाव में कांग्रेस का कब्जा-बीते दिनों जिला पंचायत की समितियों के चुनाव संपन्न हुये। उल्लेखनीय है कि जिपं में कांग्रेस के 11 और भाजपा के 6 और दोनो ही पार्टी के 1 1 बागी सदस्य चुन कर आये थे लेकिन अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और भाजपा ने दोनों ही पद जीत लिये थे। इन चुनावों में जिले भर के सारे कांग्रेसी नेता लगे हुये थे और सदस्यों को मार्गदर्शन भी दे रहे थे लेकिन अंतिम समय में सदस्यों की राय के विपरीत उम्मीदवार थोपे जाने के कारण हार का सामना करना पड़ा था। इस समय भी कांग्रेस के कुछ नताओं की यह राय थी कि कांग्रेस के चुने हुये सदस्य काफी अनुभवी है इसीलिये पहला दौर इनके बीच ही होने दिया जाये और यदि सर्वसम्मति से ये प्रत्याशी चयन कर लेते है तो उसे मान लिया जाये लेकिन इस सलाह की अनदेखी कर दी गयी। इस बार समितियों के चुनाव में ना तो जिले के किसी नेता ने मार्गदर्शन दिया और ना ही जिला कांग्रेस ने कोई बैठक ही बुलायी फिर कांग्रेस के सदस्यों ने आपसी तालमेल से अधिकांश समितियों में अपना बहुमत बना लिया हैं और उनमें कांग्रेस का सभापति बनना तय है। जबसे जिला पंचायत का गठन हुआ है तबसे जिला पंचायत पर लगातार चार बार कांग्रेस का कब्जा रहा था लेकिन इस बार पहली बार खुद का स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी कांग्रेस अपना अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष नहीं बना पायी लेकिन समितियों में कांग्रेस का कब्जा बरकरार रहने से कुछ तो संतुलन बन ही जायेगा।
कमल या शशि को मिल सकती है लालबत्ती-प्रदेश में इन दिनों मंत्रीमंड़ल विस्तार और निगमों में नियुक्ति किये जाने की चर्चायें राजनैतिक हल्कों में जारी हैं। बताया जा रहा है कि दिल्ली में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की आलाकमान से इस संबंध में चर्चा भी हो चुकी हैं। इसे लेकर जिले के भाजपायी नेताओं के बीच भी लालबत्ती पाने की होड़ लग गयी है। वैसे तो शिवराज सिंह ने अभी तक अपने मंत्रीमंड़ल में शिव की नगरी सिवनी की उपेक्षा ही की है। भाजपा के तीन तीन विधायक होने के बाद भी उन्होंने  किसी को भी मंत्री नहीं बनाया था जबकि कांग्रेस के शासनकाल में हमेशा जिले से दो दो मंत्री रहें है। लेकिन इस चुनाव में भाजपा से जिले के एकमात्र विधायक कमल मर्सकोले ही है। यदि शिवराज ने शिव की नगरी सिवनी से परहेज नहीं रखा तो ऐसा माना जा रहा है कि कमल मर्सकोले  का मंत्री बनना तय माना जा रहा है। वैसे शिवराज सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल में नदेश दिवाकर और डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को लाल बवैसे शिवराज सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल में नरेश दिवाकर और डॉ. ढ़ालसिंह   बिसेन को लालबत्ती से नवाजा था। यदि इस बार भी ऐसा ही करने की मुख्यमंत्री ने सोचा तो ऐसा माना जा रहा है कि लखनादौन क्षेत्र की दो बार विधायक रही और इस बार चुनाव हार जाने वाली आदिवासी महिला नेत्री शशि ठाकुर को किसी निगम में लालबत्ती दी जा सकती है। अब किसको क्या मिलेगा या दोनों खाली हाथ रह जायेंगें? यह तो शिवराज सिंह का पिटारा खुलने के बाद ही पता चल पायेगा। “मुसाफिर”  
सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी 
09 जून 2015 से साभार

4.6.15

देश की राजनीति का डिब्बा नहीं ईंजन रहा है बिहार

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप बिहार को गरीब कहकर हँसी भले हीं उड़ा लें लेकिन इस बात से आप इंकार नहीं कर सकते कि बिहार के लोगों में जो राजनैतिक विवेक है वो कई पढ़े-लिखे और समृद्ध कहलानेवाले राज्यों के मतदाताओं में भी नहीं है। यही कारण है कि चाहे छठी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध और जैन धर्म आंदोलन हों या चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का भारत को एक राष्ट्र में बदलने का अभियान या 1857 का पहला स्वातंत्र्य संग्राम हो या 1920 का असहयोग आंदोलन हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1974 का जेपी आंदोलन बिहार ने ईंजन बनकर देश की राजनीति को दिशा दिखाई है। बिहार के लोग इतिहास को दोहराने में नहीं नया इतिहास बनाने में विश्वास रखते हैं।
मित्रों,अब से कुछ ही महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और बिहार की सारी यथास्थितिवादी शक्तियों ने एकजुट होना शुरू कर दिया है। उनको लगता है कि बिहार में 1995 और 2000 ई. जैसे चुनाव-परिणाम आएंगे। ये विकास-विरोधी,बिहार की शिक्षा को रसातल में पहुँचा देनेवाले,भ्रष्टाचार को सरकारी नीति बना देनेवाले और बिजली,चारा,अलकतरा,दवा-खरीद,धान-खरीद,पुल-निर्माण,एस्टीमेट आदि घोटालों की झड़ी लगा देनेवाले घोटालेबाज लोग सोंचते हैं कि बिहार में अगले चुनावों में भी लोग जाति के नाम मतदान करेंगे और इन जातिवादियों की नैया फिर से किनारे लग जाएगी। नीतीश जी ने तो कई बार मंच से कहा था कि अगर साल 2015 तक बिहार के हर घर में बिजली नहीं पहुँचती है तो वे वोट मांगने ही नहीं जाएंगे। बिजली तो मेरी पंचायत जुड़ावनपुर बरारी में ही नहीं है। शाम होते ही पूरी पंचायत अंधेरे के महासागर में डूब जाती है तो क्या नीतीश जी सचमुच इस चुनाव में वोट नहीं मांगेंगे? नीतीश जी ने 2010 के चुनाव जीतने के बाद कहा था कि इस कार्यकाल में उनकी सरकार भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार करेगी तो क्या बिहार से भ्रष्टाचार समाप्त हो गया? फिर क्यों बिहार में रोजाना नए-नए घोटाले सामने आ रहे हैं? क्या यही है जीरो टॉलरेंस की नीति?
मित्रों,कितने आश्चर्य की बात है कि पूरी दुनिया में सत्ता-पक्ष को हराने के लिए मोर्चे बनाए जाते हैं,गठबंधन किए जाते हैं लेकिन बिहार में विपक्ष को रोकने के लिए पहले महाविलय का नाटक किया गया और अब गठबंधन की नौटंकी की जा रही है। कल तक लालू-राबड़ी राज आतंकराज था और लालू-राबड़ी आतंकवादी थे लेकिन आज बड़े भाई और भाभी हो गए हैं। लालू जी भी मंचों से कहा करते थे कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसको नीतीश ने ठगा नहीं और खुद पहुँच गए उस आदमी की शरण में जिसने पूरे बिहार की जनता को ठगा है और आज लालू भी खुद को ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। नीतीश ने लालू को किनारे लगाकर कांग्रेस से खुद को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करवा लिया है और खुद को राजनीति का पीएचडी कहनेवाले लालू जी की समझ में ही नहीं आ रहा है कि अब करें तो क्या करें?
मित्रों,यह सच्चाई है कि जबतक बिहार में भाजपा नीतीश सरकार में शामिल थी तब तक बिहार ने 14 प्रतिशत की दर से विकास किया। तब भी नीतीश कुमार कहा करते थे कि इस रफ्तार से विकास करने पर भी बिहार को अन्य विकसित राज्यों की बराबरी में आने में 20 साल लग जाएंगे और उनके पास 20 साल तक इंतजार करने  लायक धैर्य नहीं है। आज उन्होंने जबसे भाजपा को सरकार से निकाल-बाहर किया है बिहार की विकास दर आधी हो चुकी है और 7 प्रतिशत तक लुढ़क चुकी है। जाहिर है कि अब तो नीतीश जी को 100 सालों तक इंतजार करने लायक धैर्य एकत्रित करना पड़ेगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या बिहार की जनता 100 सालों तक इंतजार करेगी? क्या भारत की तीसरी सबसे बड़ी युवा आबादी को धारण करनेवाले बिहार के लोगों के पास आज 100 सालों तक विकास का इंतजार करने लायक धैर्य है?
मित्रों,कदापि नहीं,कदापि नहीं!!  इतना ही नहीं भाजपा को हटाने के बाद से बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति में इतनी गिरावट हो चुकी है कि लगता है कि बिहार फिर से नीतीशकथित आतंकराज में पहुँच गया है। लालू-नीतीश बिहारी होकर भी बिहार को नहीं समझ पाए हैं। बिहार कोई दिल्ली नहीं है जो बार-बार मूर्खता करे और अपने विकास के मार्ग को रायता विशेषज्ञों को मत देकर खुद ही अवरूद्ध कर ले। बिहार के लोग कम पढ़े-लिखे भले हीं हों लेकिन बिहार का अनपढ़ चायवाला या रिक्शावाला भी इतनी समझ रखता है कि कौन उसका और उसके राज्य का वास्तविक भला चाहता है। बिहार की जनता में अब विकास की भूख जग चुकी है। वैसे भी केंद्र की मोदी सरकार ने बिहार की सारी मांगों को एकसिरे से न सिर्फ मंजूर कर लिया है बल्कि उससे भी ज्यादा दे दिया है जितने कि नीतीश कुमार की सरकार ने मांग की थी। इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता लगातार नए प्रयोग करने में विश्वास रखती है। वो लालू और नीतीश दोनों को देख चुकी है,परख चुकी है इसलिए ये दोनों तो इसबार के चुनाव में शर्तिया माटी सूंघते हुए ही दिखनेवाले हैं। भाजपा अगर बिहार में जीतती है तो निश्चित रूप से भारतमाता की बांयीं बाजू को मजबूत बनाने के नरेंद्र मोदी के संकल्प पर तेज गति से काम होगा और दुनिया में भारत अतुल्य भारत तो बनेगा ही वसुधा पर बिहार का भी जोड़ा नहीं मिलेगा। 1947 में जो बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में दूसरा स्थान रखता था 2047 आते-आते कदाचित पहला स्थान प्राप्त कर लेगा और बिहार की जनता इस बात को बखूबी जानती और समझती है। ये बिहार की पब्लिक है बाबू और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है,कौन बुरा है कौन भला है ये न सिर्फ पहचानती है बल्कि देश में सबसे ज्यादा पहचानती है।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

29.5.15

परलोक में सैटेलाइट: एक विहंगम दृश्य

डॉ. सुभद्रा राठौर,
बी-81,  वीआईपी इस्टेट, खम्हारडीह, रायपुर (छत्तीसगढ़)
विज्ञान और विश्वास के अद्भुत मणिकांचनीय योग से पैदा हुई बरुण सखाजी की कृति ''परलोक में सैटेलाइट'' साहित्य जगत के साथ-साथ आम पाठक को भी अच्छी खासी दस्तक देती है। एक ओर ''परलोक'' है, जिसका संबंध मिथक से है, पौराणिक गल्प से है तो दूसरी ओर है ''सैटेलाइट'', जो विशुद्ध वैज्ञानिक युग की देन है। शीर्षक पर नजर फेरते ही तत्काल समझ में आ जाती है यह बात कि लेखक की दृष्टि सरल नहीं बंकिम है।आलोच्य कृति व्यंग्य है, जिसे हास्य की पांच तार की चासनी में खूब डुबोया, लपेटा गया है। व्यंग्य पितामह हरिशंकर परसाई की परंपरा के अनुपालक व ज्ञान चतुर्वेदी की शैली के परम भक्त सखाजी के भीतर विसंगतियों के प्रति भरपूर असहमतियां हैं। आक्रोश यह है कि मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनैतिक, मूल्यहीन, पापमय हो गया है। कहीं शुचिता नहीं, कहीं प्रतिबद्धता नहीं। मनुजता लुप्त हो रही है। क्यों? क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार का भय नहीं रहा। इहलोक का सिस्टम उसके आगे पानी भरता है, उसमें इतनी कठोरता नहीं रह गई है कि वह मनुष्य को अनुशासित रख सके। ऐसे में एक सार्थक डंडे की तलाश है कृति, जिसका मंतव्य और गंतव्य मानुष-मन है, उसे झिंझोड़ा-जगाया जाए। कर्मफल के दर्शन को आधार बनाकर लेखक ने मानव समुदाय को ''परलोक'' दिखाते हुए वस्तुत: भविष्य के प्रति न सिर्फ सचेत किया है, वर्तमान को सुधारने का संदेश भी दिया है। खूबी यह है कि गहनतम संदेश गंभीर होकर भी बोझिल नहीं होता, पाठक को आद्यांत गुदगुदाते हुए लक्ष्य की ओर ले चलता है।
प्रारंभिक अंशों में साइंस-फिक्शन सा अहसास देते इस व्यंग्य उपन्यास का प्रसार पौराणिक कथा की भूमि पर होता है। लेखक ने अपने ''कंफर्ट जोन'' से प्लॉट का चयन किया है, उसकी चिर-परिचित भूमि है गरुड़ पुराण की। गरुड़ पुराण इसलिए माफिक था क्योंकि इसमें कर्मफल के अनुसार सुख-दुख भोगने के विधान वर्णित हैं। इसलिए ही लेखक का ''सैटेलाइट'' किसी अन्य धर्म के परलोक में गमन नहीं करता, भारतीय संस्कृति की डोर पकड़कर यमपुरी ही चला जाता है। पाठकों को प्रथम दृष्टया यह उपन्यास काल्पनिक प्रतीत होगा किंतु यह सुखद आश्चर्य है कि कल्पना की जमीन पर रोपी गई कथा में लेखक ने अपनी ही तरह का ''जादुई यथार्थवाद'' पैदा कर लिया है। कल्पना में भी मानवीय जीवन का घोर यथार्थ। यहां तक कि धरती में तो यथार्थ वर्णित है ही, परलोकवासियों के कृत्यों में भी धरतीवासियों के क्रियाकलाप, छल-छद्म पूरी सत्यता के साथ उकेरे गए हैं। समाज में व्याप्त कदाचार, भ्रष्टाचार, अनैतिक कार्य व्यापार, अधर्म, पापाचार पर तीखे कटाक्ष हैं यहां। राजनाति, समाज, धर्म, ज्योतिष, अर्थ, विज्ञान, पुलिस, प्रशासन, अफसरशाही, अवसरवादिता, प्रकृति, पर्यावरण, मीडिया, कानून, गांव, शहर, कौन-सा क्षेत्र छूटा? लेखक की टोही नजरें उन्हें देखती हैं, दिखाती हैं और कर्मदंड की भागी भी बनाती चलती हैं। उपन्यास में यत्र-तत्र संकेत हैं कि धरती पर पाप बढ़ गए हैं, फलत: स्वर्ग सूना-सूना सा है, यहां कोई आता ही नहीं। जबकि नरक में रेलमपेल है। पापकर्म अनुसार नरक में दी जाने वाली यातनाओं के दृश्य भी खूभ उभारे गए हैं ताकि पाठक को उनसे वितृष्णा हो। देखा जाए तो कृति का उद्देश्य सीधे तौर पर ''लोक शिक्षण'' ही है। लोक मानस यदि पापिष्ठ हो गया है, तो उसे यह भी समझना होगा कि ''जो जस करहिं सो तस फल चाखा''। धरती पर फैलने वाली नई-नई बीमारियों, आपदाओं,  विपदाओं, कष्टों का कारक लेखक कर्म को ही बताता चलता है, नरक की भीड़ कम करने के लिए ऊपरवाले ने धरती को ही नरक बना देने की योजना बना ली है। ''जैसी करनी वैसी भरनी'' ही नहीं, जहां किया, वहीं भुगतो, यह भी।
उपन्यास की अंतर्वस्तु जितनी गंभीर है, उसका ताना-बाना उतना ही सरल-सहज और हल्का फुल्का है। कहें तो ''गुड़ लपेटी कुनैन''। शैली में रोचकता, चुटीलापन है; व्यंग्य इसका प्राण है तो हास्य देह। फलत: धीर-गंभीर विषय को भी पाठक सहज ही हंसता-मुस्कुराता गटकने को तत्पर हो जाता है, प्रारंभ से ही। लेखक हास्य का एक भी क्षण छोड़ने को तैयार नहीं, सदैव लपकने को तत्पर, ''मत चूको चौहान''। कठोर चट्टान को फाड़कर भी कुटज की तरह इठलाने को तैयार। उदाहरण के तौर पर वह दृश्य लीजिए, जहां धरती पर ही नाना प्रकार के कष्ट झेल आई गरीब की आत्मा को नरक की वैतरणी भी कहां कष्टप्रद लगती है, वह वैतरणी में भी चहक रही है। वैतरणी का मतलब तो खूब समझते हैं आप, वही नदी जिसे पार करने को प्रेमचंद का ''होरी'' जीते जी एक अदद गाय तक न खरीद सका था। वैतरणी अर्थात् खून, पीब, बाल, अस्थि, मज्जा और हिंसक जीव-जंतुओं से भरी वीभत्स नरक की नदी, जिसे पापी आत्मा को पार करना होता है। तो कृति में वह गरीब आत्मा इस वैतरणी को भी खुशी-खुशी पार कर रही है, कभी मगर की पीठ पर चढ़ जाती है, कभी उसकी पूंछ से ही खेलने लग जाती है। ऐसे स्थलों पर छलककर आता हास्य और व्यंग्य वस्तुत: हास्य-व्यंग्य से आगे बढ़कर करुण में तब्दील हो जाता है, अचानक और अनायास। वैसे, हास्य उपजाने में लेखक बेजोड़ है, कई बार आपको भ्रम होगा कि आप कहीं हास्य ही तो नहीं पढ़ रहे।
इस व्यंग्य कृति में एक ओर हास्य की विपुलता है तो दूसरी ओर गंभीर स्थलों की भी कमी नहीं है। यहां सूक्तियां हैं, तो कई प्रोक्तियां भी। जहां भी अवसर आया, लेखक पूरे धैर्य के साथ, ठहरकर चिंतन-मनन करता दीख पड़ता है। संदर्भों, अर्थों, भावों को सहेजे यह अंश सूझ-विवेक से भरे हुए हैं। धर्म पर कटाक्ष करते हुए लेखक का यह कथन देखिए- ''धर्म की यही विकलांगता है, यह अजीब है। जो नहीं मानता, वो नहीं मानता, मगर वो भी मानता है। यानी जो नास्तिक है, वह भी आस्तिक है और जो आस्तिक है वह तो आस्तिक है ही''। इसी प्रकार यह कथन भी गूढ़ संदेशों के साथ आकर्षित करता है- ''जब सफलता मिलती है तो वह अपने साथ मद मस्ती भी लोटाभर  लेकर आती है। जब असफलता आती है तो अपने प्रहार से आत्मबल को रगड़ती है तो सतर्क भी करती है''।
कृति की भाषा सहज-सरल, ग्राह्य अर्थात् आमफहम है। भाषा में, कहन में एक रवानी है, गति है। भाषा कथा के लिए सप्रयास जुटाई गई हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। बोलचाल की भाषा है, फलत: इस दौर की हिंदी, जिसमें अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में आ गए हैं, लेखक ने उसे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। कुछ शब्द व्यंग्य और हास्य के बहाव में डूबते-उतराते लेखक ने खुद ही गढ़ लिए हैं, जो फुलझडियां ही बिखेरते हैं। यथा- ''अनयकीनेबल'',  ''अप्सराईजेशन''। इसी तरह हिंदी-अंग्रेजी के ''स्लो मौत'' जैसे संकर प्रयोग भी भाषा को चमक ही देते हैं, अवरोध नहीं बनते। हां, कथारंभ में पाठक को आंचलिकता के दर्शन अवश्य होंगे, जहां रामसेवक और अन्ना जैसे पात्र बुंदेली बोलते नजर आएंगे। यह आंचलिकता भी रोचक है, पात्रानुकूल है और अर्थ में किसी प्रकार की बाधा भी उत्पन्न नहीं करती। चूंकि बुंदेली हिंदी की ही बोली है, सहज समझ में आती है।
कुल मिलाकर, कैसी है सखाजी की यह रचना? कथानक की दृष्टि से देखें तो कथावस्तु अच्छी है, रोचक है। उद्देश्य भी ऊंचा है। कथा की बनावट-बुनावट भी ठीक है, यह अवश्य है कि इसे शत-प्रतिशत अंक दिया जाना भले ही संभव नहीं है, पर लेखक की तारीफ की जानी चाहिए इसलिए कि उसमें संभावनाएं परिलक्षित हो रही हैं। ''पूत के पांव पालने में''। पहली ही कृति है, पूर्णता की अपेक्षा करना बेमानी होगी, किंतु लेखक में क्षमता है कि वह पूरी सुगठता और कसाव के साथ ऐसी कई कृतियों को आगे भी जन्म दे सकेगा। लेखन में प्रकृति झांक रही है, अकृत्रिमता का यह गुण अच्छी कृति की पूर्वपीठिका बनेगा। देश को, समाज को तीखी और तिरछी नजर की बेतरह आवश्यकता है, जो उसकी चीर-फाड़ करे, पड़ताल करे, उसकी खामियों को उजागर करे और तिलमिला देने वाली वाणी से जगा सके। सन्मार्ग दिखाने के लिए अभी कई कबीर अपेक्षित हैं, सखाजी का मानव-समाज में स्वागत है, वे ऊंघते-उनींदे मानुष को जाग्रत करें। हमारी शुभकामनाएं।

27.5.15

jeet-voice@blogspot.com
में क्षमा चाहुगा की मैंने बहुत दिनों से नहीं लिखा पर अब शायद लगता है लिखना चाहिए ये हमारा दायित्य है 
आज सिर्फ इस बात पर बोलूंगा की कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी ने सही नहीं किया जिस पार्टी से उनका सेंदातिक मतभेद था उसी पार्टी से  समझोता किया शायद यही राजनीती है 
पर जो हुआ वह  भी मान  सकते है जब कश्मीरी पंडितो का पुनर्वास सही ढंग से हो जाये एहि मेरी आशा है 
यह में इसलिए नहीं बोल रहा हूँ की में  पंडित हूँ बल्कि में एक इंसान हूँ 

26.5.15

मोदी सरकार की पहली सालगिरह पश्चाताप दिवस के रूप में मना रहें हैं देशवासी: आशुतोष
वायदों को चुनावी जुमला बनाया भाजपा नेताओं ने: अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है पेरा देश: जिले के पाले में भी कुछ आया नहीं: ऐसे में कैसे आयेंगें अच्दे दिन?

सिवनी। केन्द्र सरकार के एक साल पूरा होने पर प्रधानमंत्री मोदी,भाजपा और पूरी सरकार जश्न मना रही है। लेकिन आम देशवासी अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर इसे पश्चाताप दिवस के रूप में मनाने को मजबूर है। भाजपा नेता ही अपनी पार्टी के चुनावी वायदों को जुमला कहकर पल्ला झाड़ रहें हैं। जिले में भी ना फोर लेन बनी, ना बड़ी रेल लाइन आयी, ना संभाग बना,ना मेडिकल कालेज खुला और ना ही सिवनी मॉडल शहर बन पाया तो भला अच्छे दिन कैसे महसूस हो सकते हैं? प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के परिणाम ने ही भाजपा को आइना दिखा दिया है। उक्ताशय के उदगार वरिष्ठ कांग्रेस नेता आशुतोष वर्मा ने प्रेस को जारी एक विज्ञप्ति में व्यक्त किये हैं। 
इंका नेता वर्मा ने आगे कहा है कि आगामी 26 मई को केन्द्र की मोदी सरकार का एक साल पूरा होने जा रहा है। इसे जश्न के रूप में मनानें के लिये मोदी सरकार और भाजपा युद्ध स्तर पर तैयारियां कर रही है। प्रधानमंत्री सहित तमामा वरिष्ठ नेता रैलियां आदि करके मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान करेगें। लेकिन आम देशवासी अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है और इस दिन को पश्चाताप दिवस के रूप में मनाने को मजबूर हो गया है।
इंका नेता आशुतोष वर्मा ने विज्ञप्ति में उल्लेख किया है कि प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा के तमाम नेताओं ने जनता से जो भी वायदे किये थे उन्हें सरकार बनने के बाद भाजपा ने भुला दिया। इतना ही नहीं ब्लकि इन चुनावी वायदों को एक जुमला करार देकर भाजपा नेताओं ने देश की भोली भाली जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है। आज वह इस बात का पश्चाताप कर रहा है कि क्यों उसने इन पर भरोसा किया। इसीलिये आम मतदाता आज पश्चाताप कर रहा है क्योंकि अच्छे दिन आये नहीं,ना तो काला धन वापस आया और खाते में 15 लाख रु. जमा हुये,विदेशों में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने देश की पिछली सरकार पर खेद जनक टिप्पणियां की ह,ैंअंर्तराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कम होने के बाद भी पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ रहें हैं,मंहगायी बढ़ रही है,नव युवक आज भी रोजगार की राह तक रहें हैं,आतंकवादियों को बिरयानी खिलाने के आरोप लगाने वाले उन्हें फांसी देने के बजाय छोडरहे है, पाकिस्तान के खिलाफ दहाड़ने वाले अब उसकी हरकतों पर खामोश है,विदेश मंत्री देश में और प्रधानमंत्री विदेश में पाये जा रहें हैं,पूंजी पतियों के आये अच्छे दिन और किसान कर रहें हैं आत्म हत्या,देश में मोदी के और विदेश में रुपये के भाव लगातार गिर रहें हैं,बदलाव की बात करने वाले मोदी बदले की राजनीति कर रहें हैं,इतिहास में पहली बार देश के प्रधानमंत्री के विदेश में पुतले जले,कश्मीर में धारा 370 हटाने की बात करके चुनाव लड़ने के बाद उसका समर्थन करने वाले मुफ्ती के साथ सरकार बनाने डाली।
जिले के वरिष्ठ इंका नेता आशुतोष वर्मा ने आगे उल्लेख किया है कि जिले के मतदाताओं ने भी भाजपा के वायदों पर विश्वास कर अच्छे दिन आने की आस में जिले के दोनों भाजपा प्रत्याशियों को प्रचंड़ बहुमत से जिता दिया था। लेकिन एक साल पूरा होने के बाद भी फोर लेन बनी नहीं, बड़ी रेल लाइन आयी नहीं, रामटेक गोटेंगांव रेल लाइन को बजट नहीं, मेडिकल कॉलेज खुला नहीं, संभाग बना नहीं और मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी शहर माडल शहर नहीं बन पाया। इन हालातों में अच्छे दिन तो महसूस हुये ही नहीं इसलिये लोग पश्चाताप दिवस मना रहें हैं। 
इंका नेता वर्मा ने प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश की एक विधानसभा सीट के हाल ही में हुये उप चुनाव का हवाला देते हुये कहा है कि विगत माह भाजपा की एक परंपरागत सीट पर उप चुनाव हुआ था जिसमे जीत सपा की हुयी दूसरे स्थान पर कांग्रेस रही और जनता ने भाजपा को तीसरे स्थान पर ढकेल कर अपने गुस्से का इजहार कर प्रधानमंत्री मोदी और समूची भाजपा को आइना दिखा दिया है।