Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

21.9.18

मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वाले साथी देश के सबसे बड़े पत्रकार कहलाने लायक हैं, इन्हें सलाम

यह माना जाता है कि देश में सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च संस्था है। देश की सुप्रीम पॉवर है। पर जिस तरह से राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट के एससीएसटी कानून में किये संसोधन को विधेयक लाकर बदल दिया। जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं हो पा रहा है। उल्टे जिन साथियों ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर मजीठिया वेज बोर्ड़ मांगा, उनको टर्मिनेट कर दिया गया। ऐसे में यदि किसी संस्था की प्रतिष्ठा कम हुई है तो वह सुप्रीम कोर्ट ही है।

नकली केसर की खेती से रहें सावधान

डा. राजेन्द्र कुकसाल

केसर Saffron की खेती कर अधिक आर्थिक लाभ का प्रलोभन देकर राज्य में विशेष रूप से पहाडी क्षेत्रौ में ठगी की जा रही है। न्यूज़ पेपर, व्हाट्स ऐप ग्रुप, फेसबुक,यूट्यूब आदि के माध्यम से केसर उत्पादन की खबर / सफलता की कहानी देखने को मिल रही है। कई कृषकों ने तो केसर की सफल खेती के video भी वनाये है। ऐसा ही एक video कोटद्वार से श्री अनिल बिष्ट जी का मैंने देखा जिसमें उनके द्वारा बताया जा रहा है कि कोटद्वार में उनके द्वारा सफलता पूर्वक केसर का उत्पादन किया गया है। इसी प्रकार की सफलता की कहानियां पिथौरागढ़, टेहरी जनपद के चम्बा,कीर्तीनगर, रुद्रप्रयाग जनपद के भीरी चन्द्रापुरी आदि क्षेत्रों से मिली हैं।

15.9.18

आतंकवाद और दहशतगर्दी के खिलाफ दुनिया की पहली जंग थी जंग-ए-कर्बला-डॉ. हुदा


आतंकवाद और दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ पहली जंग थी जंग-ए-कर्बला-डॉ. हुदा.....
"वज़ीर-ए-आज़म आली जनाब नरेंद्र मोदी जी ने इमाम
 हुसैन की अज़ीम शहादत को याद कर पूरी दुनिया मे-
 अमन-ओ-शांति और भाईचारे का पैग़ाम दिया है"

आज दिनांक 15/09/2018 को हुदैबिया कमेटी(एक राष्ट्रवादी मिशन) के पुराने शहर स्थित मुख्य कार्यालय पर इमाम हुसैन और उनकी आल की कर्बला में इंसानियत के लिये दी गयी अज़ीम कुर्बानी पर  खिराजे अक़ीदत पेश की गई और हक़-ओ-बातिल की इस इबरतनाक जंग से अवाम को शनासा किया गया। आवाम को ख़िताब करते हुए हुदैबिया कमेटी के नेशनल कन्वेनर डॉ.एस.ई.हुदा ने कहा कि


  • ख़ुदा की अव्वल मखलूक इंसान ने धीरे-धीरे तरक़्क़ी की और आख़िरकार दानिश्वर हज़रात ने ये कहा कि इंसान में तहज़ीब और तरक़्क़ी के सारे पैमाने हासिल कर लिये हैं।बहुत सी इंसानी ख़ुसूसियात ने उसके इंसान हो जाने के साथ उसके तेहज़ीबयाफ्ता हो जाने पर भी मोहर लगा दी।

ये तो तारीखी बात हो गयी लेकिन इससे साथ-साथ अगर हम इंसान की तवारीख़ और तहज़ीब का मुताला करने और समझने की कोशिश करें तो तेहज़ीबयाफ्ता कहलाने वाले इंसानी मोअशरे ने कई ऐसे ग़ैर-तेहज़ीबयाफ्ता "कारनामे"अंजाम दिए हैं जो शायद कोई हैवान और वहशी दरिंदा भी नही कर सकता था।उनमें बहुत सी ऐसी जंगो का शुमार होता है जिसमे शैतानियत की हदें पार कर दी गईं।उन्ही जंगो में सफ़े अव्वल पर जिस जंग का नाम है वो है जंग-ए-कर्बला,जो इंसान को ज़ुल्म और तशद्दुत का अलंबरदार होने का तमगा अता करती है और उसके तेहज़ीबयाफ्ता होने का ख़िताब नोच लेती है।
जंग-ए-कर्बला वो जंग है जिसमे एक तरफ मुट्ठी भर लोग थे जिनमें मासूम और छः महीने के बच्चे से लेकर अस्सी बरस के बुजुर्ग तक को बेदर्दी से भूखा-प्यासा शहीद किया गया।डॉ. हुदा ने कहा ये दरअसल जंग नही बल्कि दुनिया मे आतंकवाद और दहशतगर्दी गर्दी की पहली और ज़ुलमाना वारदात थी जिसे आज भी दहशतगर्दी के पुजारी आज़माते रहते हैं इसी से हक़ और बातिल की पहचान भी हो जाती है।इस्लाम की तवारीख़ पर अगर हम नज़र डालें तो  कर्बला के तपते सेहरा में आख़िर-उज़्ज़मा पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो आलेही वसल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन(अ0स0) और उनकी आल के साथ जो मारका-ए-आरायी हुई थी उसने इंसानियत और शैतानियत की पहचान के लिए रहती दुनिया तक एक पैमाना ज़रूर दे दिया।एही वजह है कि आज भी दुनिया मे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठने वाली हक़ की सदा का ज़िक्र होता है तो सब से पहले सदा-ए-कर्बला का ज़िक्र होता है।कर्बला की सबसे बड़ी तालीम भी यही है कि हक़ की आवाज़ बुलंद करने के लिये तायदाद,उम्र,जगह मायने नही रखती।इसलिये जैसा पहले ज़िक्र किया कर्बला जी जंग में छह माह के हज़रत अली असगर से लेकर 80 बरस के गाज़ी हज़रते हबीब इब्ने मज़ाहिर तक ने अपने-अपने हालात और उम्र के हिसाब से ये हक़ की सदायें बुलंद की हैं।
जहां हज़रते अली असगर ने गले पर तीर खा कर एक हल्की से मुस्कुराहट से ज़ालिम फ़ौज के हौसले पस्त कर दिए वहीँ 80 बरस के बुज़ुर्ग गाज़ी हज़रते मज़ाहिर ने अपनी क़ुव्वते बाज़ू से दुश्मन फ़ौज के दांत खट्टे किये।मारका-ए-कर्बला में हर एक मर्दे मुजाहिद को शहादत शहद से मीठी मालूम होती है।येही नही हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद जिस तरह आपकी बहन बीबी- ज़ैनब ने हक़ के पैग़ाम को कर्बला से लेकर कूफ़ा तक आम किया वो मुस्लिम मोअशरे में ख़वातीन की एहमियत को तो बयाँ करता ही है साथ-साथ इस बात को ज़ाहिर करता है कि जिस हालात में भी हो ज़ुल्म के खिलाफ हक़ बोलो।इसलिये आज भी हक़ और बातिल की पहचान के लिये जंग-ए-कर्बला हमारी सच्ची रहनुमाई करती है।कर्बला की जंग ने दुनिया के कई बड़े रहनुमाओं की रहनुमाई का भी फ़र्ज़ अदा किया है जिस की वजह से दुनिया के बेशुमार मसाइल का हल निकल पाया है।दुनिया को अदम-तशद्दुत(अहिंसा) का पैग़ाम देने वाले गांधी जी को भी अदम-तशद्दुत तक ले जाने वाली दर्सगाह का नाम भी कर्बला ही है ये बात गांधी जी ने अपनी स्वनेउमरी(जीवनी) में लिखी है।कल इंदौर की सैफ़ी मस्जिद में इमाम हुसैन की शान और पैग़ाम-ए-कर्बला मौज़ू पर मुनक़्क़ीद आलमी पैग़ाम-ए-इंसानियत इजलास में शिरकत कर वज़ीर-ए-आज़म आली जनाब नरेंद्र मोदी जी ने भी इस बात की ताईद कर दी "इंसानियत के हर पैरोकार को इमाम हुसैन अज़ीम कुर्बानी से सबक लेते हुए उसे अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में उतारना चाहिए,हक़ और बातिल की जंग में इमाम हुसैन ने जिस तरह अपना कुनबा का कुनबा इंसानियत के लिये कुर्बान कर दिया इमाम का ये अमल हमे ये पैग़ाम देता है कि ज़ुल्म-ओ-सितम,ताशद्दुत की ताक़त चाहे कितनी भी वसी क्यों न हो हक़ के सामने उसे एक न एक दिन सर खम करना पड़ता है"! अब ये सवाल भी उभरता है कि जब हमारे सामने इतनी बड़ी दर्सगाह कर्बला मौजूद है तो फिर आज भी हम क्यों इंतेशार का शिकार हैं?अगर कर्बला का वाक्या हम सब के लिये दर्सगाह है तो फिर दुनिया मे इतना जंगी ख़ून और फ़साद, बेगुनाहों की चीख़ें और इंसानी कत्ल-ओ-गारत का सिलसिला क्यों दराज़ होता जा रहा है?और अफ़सोस की बात ये है कि मज़लूमो की चीखें सब से ज़्यादा उन मुमालिक से आरही हैं जहां इस्लाम पर चलने का नामनेहाद दावा बड़े ज़ोरो शोर से किया जा रहा है।सब कुछ दीन की हिफाज़त का नाम दे कर किया जा रहा है लेकिन न दीन ही नज़र आरहा है और न ही दुनिया!इस्लामी मुल्क़ों के तशद्दुत ने पूरी दुनिया मे अमन पसंद इंसानियत के अलंबरदार मुसलमान को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।इस महीने में भी कोई दिन शायद ही ऐसा गुज़ारता हो कि ख़ुदा का नाम लेने वाले मुल्क़ों से मज़लूमो के ख़ून से लाल तस्वीरें अख़बरात में देखने को न मिलती हों।ये दिन कर्बला में मज़लूमो को याद करने के साथ-साथ हज़रत इमाम हुसैन के पैग़ाम को भी याद करने के हैं मगर अफसोस!
डॉ. हुदा ने अपनी तक़रीर में मज़ीद इज़ाफ़ा करते हुए कहा कि मोहर्रम का महीना इंसानियत की ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठी सबसे बड़ी आवाज़ की याद दिलाता है।इमाम की कुर्बानी को याद करने का असल मक़सद तो इमाम के किरदार को ज़ेहन में रखना है।कर्बला के वाक़ये पर कोई आंसू बहाता है और ज़िक्र और फिक्र की मजलिस सजाता है,कोई कर्बला के शहीदों की बेबसी पर मातम करता है तो कोई उनकी प्यास को याद कर सबीले लगाता है।कहीं अलम उठाये जाते हैं तो कहीं ताज़िये,तो कहीं कर्बला में शहीदों की बे-कफ़न लाशों को याद करते हुए शहीदाने कर्बला के ताबूत उठा कर ये एहसास कराया जाता है कि जिन ज़ालिम दहशतगर्दों ने शोहदा-ए-कर्बला को बे-क़फ़न छोड़ा था हम उनको आज भी अपने कांधे पर उठाने का जज़्बा रखते हैं। गर्ज़ ये के तरीक़ा चाहे कोई भी हो मगर सब का मक़सद एक ही है कि इंसानियत की बक़ा के लिये रसूल के नवासे ने जो अज़ीम कुर्बानी दी उसको याद करके अपना मोहासबा किया जाए कि हम हक़ के साथ खड़े हैं या नहीं???
मोहर्रम में रसूल के नवासे और उनको आल को ज़ुल्म-ओ-सितम का शिकार बनाया गया था उनको तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया गया था इसलिये इस्लामी नए साल के नाम पर जब कुछ लोग नए साल की मुबारकबाद देने लगते हैं तो हैरत होती है कि क्या ये लोग अपनी तवारीख़ से वाकिफ नही हैं या फिर सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी ने इनकी तालीम बिगाड़ दी है।ये  अनोखा चलन शुरू हुया है कुछ लोगो ने मोहर्रम के महीने की शुरुआत में नए साल की मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू किया है।जो महीना सदियों से सब्र, सच्चाई और हक़ के लिए जाना जाता है उसे अब नए साल की मुबारकबाद देने के नाम पर मशहूर करने की साज़िश हो रही है।मगर ये पैग़ाम-ए-कर्बला ही है कि इस तरह की कोशिश को बढ़ावा नही मिल पा रहा है।कर्बला आज भी हमे हर तरह की मुसीबतों और मुश्किलों में सच्चाई पर कामज़न रहने का सबक़ देती है।कर्बला मज़लूम प्यासों की कुर्बानी की ऐसी हक़ीक़त है जो इस दुनिया की हर उस यूनिवर्सिटी के निसाब में शामिल होनी चाहिए जहां तशद्दुत के ख़िलाफ़ डट कर खड़े होने की बात की जाती हो।
इजलास में प्रमुख रूप से सयैद राशिद अली,शहरोज़ खान,क़ाज़ी हसन,सयैद शहरोज़ बुखारी,हसीन क़ुरैशी,इमरान पठान,सयैद शाहनवाज़,दिलशाद सिद्दीकी आदि शामिल रहे।

"झुकता ही नही सर,किसी ज़ालिम के सामने
हिम्मत ही ऐसी दे गया सजदा हुसैन का!"

"देखा है जिस उम्मीद से भारत को हुसैन(अ0स0) ने,
आज फिर वहीं से मोहब्बत की खुश्बू सी आगयी!
समझा है जिस क़द्र हक़ और शहीदाने कर्बला को,
वज़ीर-ए-आज़म तेरी एही अदा दुनिया पे छा गयी!

डॉ. सयैद एहतेशाम उल हुदा
नेशनल कन्वेनर, हुदैबिया कमेटी(एक राष्ट्रवादी मिशन)
9837357723

13.9.18

हिंदी बिना हिन्दुस्तान अधूरा (14 सितंबर 2018 हिंदी दिवस पर विशेष आलेख)

हिंदी शब्द है हमारी आवाज का हमारे बोलने का जो कि हिन्दुस्तान में बोली जाती है। आज देश में जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं, उन सबकी जननी हिंदी है। और हिंदी को जन्म देने वाली भाषा का नाम संस्कृत है। जो कि आज देश में सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से हिंदी माध्यम के स्कूलों में एक विषय के रूप में पढाई जाती है। आज देश के लिए इससे बडी विडम्बना क्या हो सकती है कि जिस भाषा को हम अपनी राष्ट्रीय भाषा कहते हैं, आज उसका हाल भी संस्कृत की तरह हो गया है। जिस तरफ देखो उस तरफ अंग्रेजी से हिंदी और समस्त भारतीय भाषाओं को दबाया जा रहा है।

6.9.18

बज चुका आरक्षण के खिलाफ पाञ्चजन्य, संकट में भाजपा

डॉ अर्पण जैन 'अविचल'

समाज के सुधार के पहले क्रम में जातिवाद के समूल नाश के आगे एक राष्ट्र -एक कानून और एक तरह के लाभ की बात रखी जाती थी, राजनीति की सदैव से मंशा तो तरफदारी की रही परन्तु इस बार अनुसूचित जाति,जनजाति की सबलता के लिए बनाये गए अधिकार और संरक्षण की संवैधानिक कवायदों के हो रहे दुरूपयोग के चलते देश का सवर्ण समाज अब की बार नाराज-सा नजर आ रहा है। इस नाराजगी का एक कारण तो आरक्षण का भी समर्थन करना और दूसरा एट्रोसिटी एक्ट के हो रहे दुरूपयोग के बावजूद भी सुधार न करके सवर्ण समाज को कटघरे में खड़ा करना, जिसके कारण सवर्ण समाज खासा नाराज भी है और प्रताड़ित भी।

शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण देश के समक्ष बड़ी चुनौती

05 सितंबर 2018 शिक्षक दिवस पर विशेष

ब्रह्मानंद राजपूत

शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व होता है। किसी भी देश या समाज के निर्माण में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है, कहा जाए तो शिक्षक समाज का आइना होता है। हिन्दू धर्म में शिक्षक के लिए कहा गया है कि आचार्य देवो भवः यानी कि शिक्षक या आचार्य ईश्वर के समान होता है। यह दर्जा एक शिक्षक को उसके द्वारा समाज में दिए गए योगदानों के बदले स्वरुप दिया जाता है। शिक्षक का दर्जा समाज में हमेशा से ही पूज्यनीय रहा है। कोई उसे गुरु कहता है, कोई शिक्षक कहता है, कोई आचार्य कहता है, तो कोई अध्यापक या टीचर कहता है ये सभी शब्द एक ऐसे व्यक्ति को चित्रित करते हैं, जो सभी को ज्ञान देता है, सिखाता है और जिसका योगदान किसी भी देश या राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करना है। सही मायनो में कहा जाये तो एक शिक्षक ही अपने विद्यार्थी का जीवन गढता है। और शिक्षक ही समाज की आधारशिला है। एक शिक्षक अपने जीवन के अन्त तक मार्गदर्शक की भूमिका अदा करता है और समाज को राह दिखाता रहता है, तभी शिक्षक को समाज में उच्च दर्जा दिया जाता है।

गाड़ियों के अतिक्रमण से कब मिलेगी सड़कों को मुक्ति?

बरुण कुमार सिंह

हम बात सुव्यवस्थित शासन प्रणाली की बात करते हैं तो उसमें बहुत सारी बातें देखने को आती हैं जिसमें केवल सुधार शासन के स्तर पर नहीं की जा सकती, उनमें जनभागीदारी का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन सारी कुछ नियम कानून होने के बावजूद भी उसका परिणाम सतह पर नहीं दिखाई देता। चाहे हम कोई-सा भी क्षेत्र ले लें। हम यहां बात कर रहे हैं सड़कों के अतिक्रमण की। जिसकी जैसी क्षमता है वह अपने हिसाब से सड़क को अतिक्रमित किये हुए हैं। दिल्ली के कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाए तो लगभग पूरी दिल्ली का यही हाल है। लोगों के पास गाड़ी खड़ी करने के लिए जगह नहीं है लेकिन वे टू-व्हीलर एवं कार रखे हुए हैं। और ये गाड़ी कहां खड़ी होगी, स्वाभाविक ही है कि कहीं-न-कहीं सड़क पर ही खड़ी होगी, जहां टू-व्हीलर एवं कार खड़ी होगी वहां की सड़कें भी अतिक्रमित होगी।

1.9.18

मुख्यमंत्री न बन पाने की क़सक से बना 'समाजवादी सेक्युलर मोर्चा'!

इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले
ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले

जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनाव नज़दीक आते जायेंगे, वैसे-वैसे 'राजनीति के तालाब' में पार्टियों की गहमा-गहमी शरू होने लगेगी. कांग्रेस और भाजपा अपनी-अपनी "डगन" से बड़ी मछली पकड़ने को छटपटाते दिखाई देंगे.

30.8.18

सुनहरी जीत!शुक्रिया मनजीत

जकार्ता में चमका बरेली का सितारा मंजीत सिंह, अपना गोल्ड मेडल बरेली वासियों को किया समर्पित https://hindi.oneindia.com/news/uttar-pradesh/manjit-singh-from-bareilly-win-gold-medal-asian-games-2018-jakarta-470380.html For more updates Download Oneindia App. For Android click http://bit.ly/1indianewsapp . For iOS click http://bit.ly/iosoneindia

जकार्ता एशियाड में चमका बरेली का सितारा...

 जय-हिंद



24.8.18

फेसबुक का दर्द...डॉ. हुदा की क़लम से

"फेसबुक का दर्द"
यूं अगर मेरे नाम की हिंदी तर्जुमानी की जाए तो "चेहरे की किताब" या "चेहरा एक किताब" या "चेहरा ही किताब" की जा सकती है।अपना दर्द सुनाने से पहले मैं ये बात वाज़े कर दूं मुझे "स्त्रीलिंग" समझा जाये...गोया कुछ बदबख़्त मुझे "पुर्लिंग" समझ कर इस्तेमाल करते हैं।
ख़ैर... सबकी अपनी-अपनी सोच!
जैसा कि आप सब जानते हैं मेरे अब्बा का नाम मार्क जुकरबर्ग है और मेरी पैदाइश 2004 में अमेरिका में हुई।हांलकि मेरे वालिद-ए-मोहतरम ने अपने तीन और हरदिल अज़ीज़ दोस्तों के साथ मुझे पैदा किया मगर इस इंटरनेट की आभासी दुनिया में लोग मुझे मार्क जुकरबर्ग की क़ाबिल और होनहार बेटी के नाम से ही जानते हैं।मेरा शुमार अपने
अब्बा की उस होनहार बेटी के तौर पर है जिसने अपने हुनर और क़ाबलियत के दम पर अभी तक 84.524 बिलियन डॉलर की जायदाद पैदा की है।अभी सिर्फ 14 साल की मेरी कमसिन उम्र है और जवानी की देहलीज़ पर मेरा पहला क़दम है,मगर पूरी दुनिया मे मेरे चाहने वालो की तायदाद 2.2 बिलियन है...आपको जानकर हैरत होगी कि अपने रुक्के और love लेटर्स को रोज़ संजोने के लिए मेरे पास 30275 लोगो का पूरी दुनिया मे स्टाफ़ है।
14 साल की बाली उम्र में जहां एक लड़की के ख़्वाब कुछ और होते हैं मैं रोज़ अपने अब्बा की उम्मीदों के पहाड़ तले दबती जा रही हूं...आख़िर मेरा दर्द भी तो दर्द है...करोड़ो दिलो के दर्द को बांटने वाली के दर्द को आज तक आप लोगो ने महसूस ही नही किया...आदम ज़ात इतनी खुदगर्ज़ होगी इसका अंदाज़ा अगर मुझे हो जाता तो शायद मैं पैदा होने से पहले ही मना कर देती! पैदा होते वक़्त मेरे अब्बा ने मुझसे कहा था कि दुनिया भर के बिछड़ो को मिलाना, टूटे दिलो को जोड़ना और इंसानियत के लिए काम करना,मज़हबी नफरतों को मिटाना और इत्तेहाद का परचम बुलंद करना तुम्हारा पहला काम होगा...मगर ये क्या हो गया...???
अब मेरा इस्तेमाल नफ़रतों के लिये किया जाने लगा...इत्तेहाद और इंसानियत तो जैसे मेरी प्रोफाईल से ख़त्म ही कर दी गयी...मज़हबी नइत्तेफाकियाँ और ऊंच-नीच के संघर्ष ने मेरे 14 साल के नाज़ुक जिस्म को झलनी कर दिया...इसकी शिक़ायत लेकर जब मैं अपने अब्बा मार्क जुकरबर्ग के पास गई तो उन्होंने सिर्फ़ इतना बोला..."ये मानव जाति है बेटी,आदम-हव्वा की औलाद हैं,गलतियां इनके ख़ून में शामिल हैं,तुम सिर्फ़ धंदा करो बस...बाक़ी चीज़ों पर ध्यान न लगाओ"...अब आप लोग ही बतायें क्या करती मैँ...
रोज़ करोड़ो नफ़रत भरी पोस्ट,एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़,कमेंट दर कमेंट...और यहां तक कि जनाज़े के साथ भी सेल्फ़ी लेकर मेरे ऊपर पोस्ट की जाने लगी...अए इंसान आख़िर कितना गिरेगा तू...आक थू
विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी मैंने ज़रूर दी थी मगर इस बिना पर की किसी का दिल न दुखने पाए...मग़र मुझे तमाम पोस्ट पर कमेंट पढ़ कर ऐसा लगता है की दुनिया जब से तशकील में आई सारे सहाफी,दार्शनिक,आलिम, मुफ़्ती पंडित सब मेरे दौर में ही पैदा हो गए...आख़िर किन-किन नामों से पुकारोगे मुझे...ग़ालिब भी मैं,अरस्तू भी मैं,मीर भी मैं,सौदा भी मैं,वैश्या भी मैं,दलाल भी मैं,हिटलर भी मैं,शेक्सपियर भी मैं,फिदा हुसैन भी मैं, बोना पार्ट भी मैं,मार्क्स भी मैं,लेलिन भी मैं...ऐसे बेशुमार क़ाबिल तरीन लोग सब इस 14 साल की नाबालिग लड़की पर ही हुनर दिखा रहे हैं...ये तो बेहतर हुया मेरी पैदाइश हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के दौरान नही हुई...वरना तो गांधी,सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह का क्रेडिट भी मैं अपने नाम ले जाती...
अए ख़ुदा की मखलूक आदम ज़ात...मेरे दर्द को भी समझो...क्यों नफ़रतों की खेती कर रहे हो इस 14 साल के मासूम जिस्म पर...अरे कुछ तो रहम करो मेरे ऊपर...शर्म करो तुम इंसान खुद को "धार्मिक" कहते हो...मगर तुम्हारी पोस्ट जब मेरे नाज़ुक जिस्म से होकर गुज़रती हैं तो मुझे एहसास होता है तुमसे अच्छी तो एक वेश्या है जिसका अपना कोई तो ईमान है...तुम तो पल-पल में ईमान और रिश्तों की धज्जियाँ उड़ा देते हो...पारा-पारा कर देते हो रोज़ मुझे तुम...
रही सही कसर मेरे अब्बा ने व्हाट्सऐप को टेकओवर कर पूरी कर दी...जहां स्वम्भू ज्ञान का अताह समन्द्र है...
जैसे कि क़ुदरत की नियति है जो पैदा हुया उसको फ़ानी तो होना ही है...मगर वक़्त से पहले ख़ुदा रा मुझे क्यों रोज़ मारते हो...मेरे दर्द की ये एक एक बहुत छोटी सी बानगी है...मुझे उम्मीद है मेरे रुख़सत होने से पहले जिस मक़सद के लिये मेरे अब्बा ने मुझे पैदा किया वो शायद कामयाब हो जाये और मेरी दर्द भरी दास्तां सुन कर तुम आदम ज़ात कुछ इबरत हासिल कर लो...ख़ुदा हाफ़िज़

20.8.18

खरी-खरी पत्रकारिता पसंद करने वालों की यादों में हमेशा रहेंगे आलोक तोमर

चंबल की माटी के लिक्खड़ पत्रकार आलोक तोमर पर प्रसंगवश... तारीख ध्यान नहीं। साल वो भी पक्का नहीं मगर आठ दस साल पहले शायद। स्थान होटल सैन्ट्रल पार्क, मंजिल दूसरी या तीसरा कमरा नंबर जो भी हो यार। ''विवेक तुम्हारे पोहे और जलेबी अच्छे लगे। कचौड़ी अच्छा बनाता है बहादुरा वाला। और हमारी सिगरेट का क्या हुआ। ले आए न। लौटकर दुबारा जाना न पड़ जाए तुम्हें।''

अटलजी को यह कैसी श्रद्धांजलि?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पिछले तीन दिनों में तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के नेताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए। ये तीनों घटनाएं ऐसी हैं, जो अटलजी के स्वभाव के विपरीत हैं। यदि अटलजी आज हमारे बीच होते और स्वस्थ होते तो वे चुप नहीं रहते। बोलते और अपनी शैली में ऐसा बोलते कि संघ और भाजपा की प्रतिष्ठा बच जाती बल्कि बढ़ जाती। पहली घटना। स्वामी अग्निवेश जब अटलजी के पार्थिव शरीर पर श्रद्धांजलि अर्पित करने भाजपा कार्यालय गए तो उन्हें कुछ कार्यकर्ताओं ने मारा-पीटा। धक्का-मुक्की की। कुछ बहनों और बेटियों ने उन पर चप्पलें भी तानीं।

हारी बाजी पलट देंगे अटल जी?

पार लगाएंगे शिवराज, रमन और वसुंधरा की नैया?

सबसे पहले अटलजी के चरणों में नमन। कांग्रेस की राह पर चल रही है बीजेपी ? ये इसलिए कहना पड़ रहा है क्यों कि हाल के दिनों में जो फैसले लिए गए वो बिल्कुल इन्ही बातों की ओर इशारा करते हैं । पहले जरा करीब 1 हफ्ते पीछे चलिए, एक निजी चैनल का सर्वे आया था । जिसमें इस बात का दावा किया गया था कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बल्ले बल्ले होने वाली है, पीएम मोदी देश की आवाम की पहली पंसद हैं लेकिन शिवराज, रमन सिंह और वसुंधरा की सरकार जाने वाली है और वहां कांग्रेस की सरकार बन सकती है।

19.8.18

भेड़-बकरी की तरह हमें मत हकालिये साहब...

बात हक़ के मुतालबे की है...

अवाम को भी अब हक़ है सवाल पूछने का...

भेड़-बकरी की तरह हमें मत हकालिये साहब...

17.8.18

शूद्र


मैं पैदा इंसान अवश्य हुआ
पर
शूद्र होना ही मेरी नियति थी
सवर्ण समाज से मेरी व्यथित विसंगति थी
इतिहास दर इतिहास
काल-कलुषित सर्वथा मेरी तिथि थी
एकलव्य,कर्ण, चंद्रगुप्त के विजयध्वजों पे भी
अपमान की कई सदियों बीती थी

"अटल" मरा नही करते...ये अच्छी बात नई है!

ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
ठन गई!मौत से ठन गई....
           
 ("अटल" मरा नही करते)
अटल जी!ये अच्छी बात नई है!
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यक़ीनन अटल बिहारी बाजपेयी जैसी शख्सियतें मरा नही करतीं बल्कि दुनिया-ए-फानी से रुख़सत होने के बात अवाम के दिलो में,रूह की गहराइयों में बस कर सदा के लिये लिए "अटल-अमर-अजर" हो जाया करती हैं।अटल जी का इस दुनिया से रुख़सत होना हिंदुस्तान की सियासत में वो खला पैदा कर गया है कि जिसकी भरपाई नामुमकिन है।भारत रत्न से सम्मानित पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने सियासत की  बुलंदियों को तो छुआ ही बल्कि एक सच्चे सूफ़ी-दार्शनिक के तौर पर बहनुल अक़्वामी सतह पर अपनी पहचान बनाई।पार्लियामेंट में अटल की तक़रीर यू ट्यूब पर सुन कर बड़ी हो रही इस पीढ़ी को  शायद ये एहसास नही होगा कि उसने सिर्फ़ एक कुशल वक्ता ही नही खोया बल्कि अपनी हाज़िर जवाबी,हँसमुख अंदाज़, बेबाक पन,व्यंग और बढ़ती उम्र के साथ एक बचपन जो सदैव उनके साथ जिया उसको भी खो दिया।
अटल जी को ऐसे ही सर्वमान्य नेता नही कहा जाता...ये उनका बेबाक पन ही था कि पार्लियामेंट में खड़े हो कर पूरे देश के सामने उस दौर से प्रधनमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के लिये बोल दिया कि अगर आज में जिंदा हूँ तो राजीव जी की वजह से ही ज़िंदा हूँ।दरअसल भारत सरकार की और से एक वफद अमेरिका जाना था राजीव जी ने अटल जी का नाम उस वफद में शामिल कर लिया ताकि अमरीका जा का अटल जी अपना इलाज करा लें।लौट कर आने पर अटल जी ने मन्ज़रे आम पर इस बात को स्वीकार कर ये संदेश देने की कोशिश की पक्ष-विपक्ष एक जमुहरियत का हिस्सा है लेकिन मोहब्बत का कोई पक्ष या विपक्ष नही होता।ये पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के साबिक वज़ीर-ए-आज़म नवाज़ शरीफ़ के साथ उनके रिश्तों की बुनियाद पर ही भारत-पाकिस्तान बस सेवा शुरू हो सकी...उनकी वाक पटुता के क़ायल नवाज़ साहब पाकिस्तान जा कर अपने एक बयान में कह गए कि "अटल जी जैसे वज़ीर-ए-आज़म की पाकिस्तान को भी ज़रूरत है,काश पाकिस्तान उनसे कुछ सीख पाता"...नवाज़ साहब का ये बयान पाकिस्तान के आर्मी चीफ मुशर्रफ साहब को बहुत नागवार गुजरा और इस बयान की प्रतिक्रिया में कारगिल युद्ध दोनों मुल्कों को झेलना पड़ा... द्रणनिश्चय और साहसिक फ़ैसले लेने के अदम्य साहस के नतीजे में  पोखरण-परिक्षण ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया और हम भारतीयों का सार फ़क्र से ऊंचा हो गया।

मुझे ख़ूब याद है कि देहरादून मेडिकल कॉलेज में मेरा फाइनल ईयर का ग्रैंड प्रैक्टिकल वाइवा था और एक्सटर्नल एग्जामनर बन कर एम्स से डॉ. शिर्के और डॉ बलसरे आ रहे थे...जब हमारे प्रोफेसर डॉ सक्सेना साहब ने ये बताया कि ये वोही डॉ हैं जो अटल जी का घुटना-प्रतिरोपण के बाद रिहैबिलिटेशन कर रहे हैं तो हमारे बैच के सभी स्टुडेंट में एक कौतूहल से पैदा हो गया।दोनों डॉ एग्जाम से एक दिन पहले दून वैली होटल में आकर रुके थे।हमारे बैच के हम जैसे कुछ खुराफ़ाती शाम को उनसे मिलने बल्कि सिर्फ उनको देखने पहुँच गये...मैंने सीधा सवाल किया डॉ बलसरे से..."सर अटल जी अब कैसे हैं और आपको कैसा लगता है उनका इलाज करके"...उन्होंने भी सीधा जवाब दिया मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी मे ऐसा व्यक्तित्व नही देखा...अटल जी ने तो एम्स में अपने कमरे को मिनी प्रधानमंत्री कार्यालय बना रखा है जब बार-बार उनसे मैं आग्रह करता हूँ कि सर अब बस करें रिहैबिलिटेशन का टाइम हो गया तो अटल जी कहते हैं..."डॉ साब मेरे खड़े होने होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण देश का खड़ा होना होना है"....बार-बार मुझे न टोका करें..."ये अच्छी बात नई है"...
विश्व गुरु का सपना हमारे दिलों-दिमाग़ को देने वाले अटल जी जिस्मानी तौर से हमसे आज रुख़सत ज़रूर हो गए मग़र अटल जी के "अटल-सिंद्धान्त" पर पर चल कर हमें उनका देश को विश्व गुरु बनाने का सपना चरितार्थ करना ही होगा तभी इस "अटल-शख्सियत" को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

जय-हिंद
डॉ.इस.ई.हुदा
नेशनल कन्वेनर,हुदैबिया कमेटी
बरैल्ली
9837357723

16.8.18

आरएसएस का ख़ौफ़ दिखा कर सियासी जमातों ने अभी तक ठगा है मुस्लिम मोअशरे को....मुल्क़ और मिल्लत की फलाह के लिए एक हाथ मे कुरान दूसरे हाथ मे कंप्यूटर ज़रूरी---डॉ. हुदा

बरेली
सुन्नी मुस्लिम समाज ने मनाया अखण्ड भारत दिवस जश्न ए आज़ादी को धूमधाम से मनाने का लिया संकल्प
आज दिनांक 14 अगस्त 2018 को वर्षों से कौमी इत्तेहाद और आपसी भाईचारे के लिए काविशें अंजाम दे रहे देशव्यापी स्तर पर विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. एस.ई.हुदा एवं भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा की प्रदेश मंत्री डॉ नाज़िया आलम के नेतृत्व में सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं एवं पुरुषों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) द्वारा बरेली के शहीद चौक पर आयोजित अखण्ड भारत कार्यक्रम में भारत माँ के जयकारे एवं वंदेमातरम की आवाज़ बुलंद करते हुए भारत माता की आरती में भाग लिया।
संभवता देश मे पहली बार इतनी भारी तायदाद में सुन्नी मसलक के मानने वालों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ज़ेरे सरपरस्ती हुए इजलास में अज़ीम ओ शान अंदाज़ में शिरकत की।
बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा की प्रदेश मंत्री डॉ नाज़िया आलम ने बताया कि सुन्नी मुस्लिम मोआशरा अब खुल कर भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने का मन बना चुका है और आज का इजलास इस बात की दलील है। कुछ सियासी जमातों ने अभी तक मुस्लिम मोअशरे में ख़ौफ़ बना रखा था लेकिन अब सुन्नी मुस्लिम मोअशरे ने भी ताहिया कर लिया है कि मुस्लिम मोअशरे को मुख्य धारा में आने के लिए सबका साथ सबका विकास के नारे को कोई अमली जामा पहना सकता है तो वो भारतीय जनता पार्टी ही कर सकती हैं । इसी के साथ 15 अगस्त को मुस्लिम समाज के युवा नौजवानों द्वारा जश्न ए आजादी को बड़ी शान ओ शौकत के साथ मनाने एवं स्वस्थ वातावरण के लिए अधिक से अधिक संख्या में वृक्षारोपण करने का संकल्प लिया गया।
राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता एवम हुदैबिया कमेटी के कौमी सदर डॉ एस .ई.हुदा ने अपनी तक़रीर में सुन्नी मोअशरे को ख़िताब करते हुए कहा देश और मिल्लत का मुस्तक़बिल गयूर नोवजवां साथियों के हाथ मे हैं अगर अपने मुल्क़ को विश्व-गुरु बनाना है तो एक हाथ मे कुरान और दूसरे हाथ मे कंप्यूटर लेना होगा।मज़ीद डॉ हुदा ने कहा कि अभी तक दूसरी सियासी जमातों ने आरएसएस का ख़ौफ दिखा कर सिर्फ़ सुन्नी मुस्लिम वोटो की दलाली की है जिसके नतीजे में आज अवाम की सामाजिक हैसियत सिफर पर पहुँच चुकी है।
डॉ. हुदा ने प्रणव मुखर्जी का उदाहरण देते हुए कहा कि संवाद ही हर मुश्किल का हल है और इस कार्य को आरएसएस और बीजेपी ने बहुत खूबसूरत अंदाज़ में क़ायम करने की कोशिश की है जिसकी बिना पर आज सैकड़ो की तायदाद में सुन्नी मुसलमान ने इस इजलास में शिरकत की है।
डॉ हुदा ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के समाज को जोड़ने की दिशा में की जा रही कविशो कि भी भरपूर प्रशंसा की। डॉ. हुदा ने बताया कि कल 15 अगस्त को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिलने पर इस दिन को बड़े हर्ष उल्लास के साथ तमाम मुस्लिम नौजवान साथी मदरसों में तिरंगा फहराकर अपने घरों में अपनी कॉलोनी में 11-11पौधे मिलकर लगायेंगे और हमारे देश की आन बान शान तिरंगे को मदरसों में लहराकर आजादी को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा।
 डॉ.एस.ई.हुदा
नेशनल कन्वेनर,हुदैबिया कमेटी
09837357723

14.8.18

वे पन्द्रह दिन - १४ अगस्त, १९४७

प्रशांत पोळ

 कलकत्ता.... गुरुवार. १४ अगस्त

सुबह की ठण्डी हवा भले ही खुशनुमा और प्रसन्न करने वाली हो, परन्तु बेलियाघाट इलाके में ऐसा बिलकुल नहीं है. चारों तरफ फैले कीचड़ के कारण यहां निरंतर एक विशिष्ट प्रकार की बदबू वातावरण में भरी पड़ी है.

गांधीजी प्रातःभ्रमण के लिए बाहर निकले हैं. बिलकुल पड़ोस में ही उन्हें टूटी – फूटी और जली हुई अवस्था में कुछ मकान दिखाई देते हैं. साथ चल रहे कार्यकर्ता उन्हें बताते हैं कि परसों हुए दंगों में मुस्लिम गुण्डों ने इन हिंदुओं के मकान जला दिए हैं. गांधीजी ठिठकते हैं, विषण्ण निगाहों से उन मकानों की तरफ देखते हैं और पुनः चलने लगते हैं. आज सुबह की सैर में शहीद सुहरावर्दी उनके साथ नहीं हैं, क्योंकि उस हैदरी मंज़िल में रात को सोने की उसकी हिम्मत ही नहीं हुई. आज सुबह ११ बजे वह आने वाला है.

13.8.18

बेहतर पत्रकार बनना है तो बड़े पत्रकारों को पढ़ो और सुनो

सर,

उम्मीद करता हूँ, आप अपना कीमती वक्त निकाल कर इस मैसेज को ज़रूर पूरा पढ़ेंगे और मेरा मार्ग-दर्शन भी ज़रूर करेंगे| वैसे तो मैं आपकी खबरों को देख और सुन कर भी बहुत कुछ सीखता रहता हूँ | क्योंकि पत्रकारिता जगत में मेरे पहले गुरु रहे राज कौशिक जी कहते हैं, बेहतर पत्रकार बनना है तो बड़े पत्रकारों को पढ़ो और सुनो| इस लिंक पर क्लिक कर चैनल को एक बार ज़रूर देखिएगा प्लीज़ |

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धाकड़ खबर के नाम से यू-ट्यूब पर एक न्यूज़ चैनल चल रहा है, डेढ़ साल पहले इस चैनल की शुरुआत हुई थी, शुरू में यह चैनल लोकल एरिया की समस्याएँ उठाता रहा, पर अब देश और प्रदेश के मुद्दों पर काम कर रहा है | आज इस चैनल के करीब सवा 3 लाख सबस्क्राइबर्स हैं, इस चैनल पर 3 से 4 खबरें रोजाना डाली जाती हैं और 70-80 हज़ार दर्शक रोजाना इन खबरों को देख भी लेते हैं |