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19.11.19

झूठ की बुनियाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या कर रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

अजय कुमार,लखनऊ

अपने आप को मुसलमानों का रहनुमा समझने का दंभ भरने वाला करीब 50 वर्ष पुराना ‘आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड’ (एआईएमपीएलबी) अपने आप को हमेशा सुर्खिंयों में बनाए रखने की कला में माहिर है। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल करने की बात कह कर उसने यह बात फिर साबित कर दी है। इससे पहले भी कई मौकों पर बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुखालफत कर चुका है। चाहें राजीव सरकार के समय मुस्लिम महिला साहबानों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजारा भता दिए जाने का फैसला रहा हो या फिर इंस्टेंट तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कट्टरपंथी सोच रखने वाले बोर्ड को कुछ भी रास नहीं आता है। वह हर मसले को शरीयत की चादर में छिपा देने को उतावला रहता है। समय के साथ बदल नहीं पाने और कट्टरपंथी सोच के चलते एआईएमपीएलबी से तमाम बुद्धिजीवी मुलसमान दूरी बनाने लगे हैं। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड अपनी संकुचित सोच के चलते विवादों में भी बना रहता है। एक समय बोर्ड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जेबी संगठन समझा जाता था। आज भी बोर्ड इसी लीक पर चलते हुए भाजपा और उसकी सरकारों की मुखालफत में लगा रहता है। बोर्ड का गठन जिन परिस्थितियों में हुआ था,उसे भी समझना जरूरी है। 

11.11.19

फ्लाप मध्यस्थता का ‘हिट फार्मूला’ बना फैसले का आधार!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद अब इतिहास के पन्नों में जरूर सिमट कर रह जाएगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई अहम सवाल भी खड़ा कर गया है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि देश की सियासी और सामाजिक चूले हिला देने वाले इस विवाद को सुलझाने में आजादी के बाद 72 साल क्यों लग गए ? सवाल यह भी है कि मोदी सरकार की तरह केन्द्र की पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसी इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई, जिससे अयोध्या विवाद को सुलझाया जा सकता था ? कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि अयोध्या विवाद सुलझाने का कोई प्रयास नहीं किया गया हो,लेकिन हकीकत यही है कि अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो इसके लिए सबसे अधिक कांगे्रस जिम्मेदार है। क्यों कि उसने दशकों तक मजबूती के साथ देश पर राज किया था,जबकि अन्य दलों की जब भी केन्द्र में सरकारें बनी तो उनको वह मजबूती नहीं मिल पाई,जिस मजबूती के साथ कांगे्रस की सरकारें चला करती थीं। जनता पार्टी की सरकार जरूर अपवाद है,लेकिन पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के बाद भी जनता पार्टीे की सरकार अंर्तविरोधाभास के चलते अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। यहां तक की मोदी भी अपने पहले कार्यकाल में अयोध्या विवाद सुलझाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे,क्योंकि एक तो संख्याबल के हिसाब से वह आज जितना मजबूत नहीं थे तो दूसरा राज्यसभा में भी उसका(मोदी सरकार) बहुमत नहीं था।

अयोध्या कांड : सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संतुलन साधने का प्रयास किया



सज्जाद हैदर
                   
देश के सबसे बड़े विवाद की जड़ आज उच्चतम न्यायालय ने अपनी ताकत का प्रयोग करते हुए समाप्त कर दी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश की आज की राजनीति ने सत्ता और कुर्सी की लालच में पूरे देश को आग में झोंकने का कार्य किया। इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि धार्मिक भावना जिसकी आड़ में उन्माद भी फलता एवं फूलता है। क्योंकि हमारे देश की सबसे बड़ी मुख्य वजह यह है कि देश में बढ़ता हुआ जातिवाद, जिसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले अधिकतर व्यक्ति या तो अनपढ़ होते हैं या फिर न्यून्तम स्तर की शिक्षा तक ही सीमित रह जाते हैं। जोकि नेताओं की चाल को नहीं समझ पाते और नेताओं की सियासी साज़िश का आसानी के साथ शिकार हो जाते हैं। और धार्मिक भावनाओं के आधार पर विभाजित हो जाते हैं। जबकि शिक्षित एवं विद्वान व्यक्ति ऐसा कदापि नहीं करते।

श्रीराम मन्दिर आंदोलन के प्रणेता याद आते हैं

विनीत नारायण

आज हम हिन्दुओं के सदियों पुराने ज़ख्मों पर मरहम लगा है । इस ऐतिहासिक अवसर पर उन हज़ारों सन्तों व  भक्तों को हमारी भावभीनी श्र्द्धांजली जिन्होंने पिछली सदियों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान किया।

10.11.19

और ये सही जवाब...!

#मुझे_फ़क्र_है_कि_मैं_इस_मुल्क़_का_सुन्नी_मुसलमान_हूँ
मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो,
आदमी ही रहने दो ख़ुदा मत समझो!

अज़ीज़ाने गिरामी-ए-मिल्लत और मेरे मुल्क़ के गयूर नौजवानों,
 राम मंदिर और बाबरी मस्जिद हक़-ए-मिल्कियत मुतालबे पर अदालते अज़मीया का आज का फ़ैसला बाइस-ए-मसर्रत तो है ही, हिंदुस्तान की क़ौमी यकजहती के वक़ार को बुलंद-ओ-बाला रखने का पैग़ाम भी आलमी दुनिया को देता है।
 फैसले पर तमाम तरह की राय शुमारी हुई, मुल्क़ के आईन के एतबार से अवाम की अपनी अपनी मुख़्तलिफ़ राय भी थीं मगर मैं जो लिख रहा हूँ वो थोड़ा लीक से हटकर है...
         मुख़्तलिफ़ सियासी जमातों और नामनेहाद क़ौमी रहनुमाओं ने जिस तरह पिछले 75 साला जम्हूरी निज़ाम में मुसलमानों ख़ास कर सुन्नी मुसलमानों का "ब्रेन-ड्रेन" कर मुल्क़ की मुख्य-धारा से काटने का एक घिनोना खेल खेला था।आज अदालत-ए-अज़मीया ने उस मंसूबे को  पामाल कर दिया।
आज ईद मिलादुन्नबी के मुबारक मौक़े पर हिंदुस्तान के सुन्नी मुसलमानों ने जिस नज़्मों-ज़ब्त से काम लिया और अदालत के फ़ैसले को सर-माथे लगाकर मुल्क़ के आईन का इक़बाल बुलंद किया उससे ये साबित हो गया कि नानक,कबीर,रहीम,रसखान,
ख़्वाजा,आला हज़रत,अमीर ख़ुसरो, निज़ामुद्दीन औलिया की इस रूहानी मिट्टी में कोई शरपसंद अब मट्ठा नही डाल सकता।
क्या इत्तेफ़ाक़ है! आज अल्लामा इकबाल की यौमे पैदाइश भी है। इस इंक़लाबी शायर ने श्रीराम को "इमाम-ए-हिंद" की पदवी से नवाज़ा था। आज भी उनकी तहरीर- "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" हमारी रूह की गहराईयों में बसी है। आज हमारा हिन्दुस्तान, हमारा प्यारा मुल्क़ सारे जहां से अच्छा बनने की सिम्त में आगे बढ़ा है और मुझे कहते हुए बड़ा फक़्र है कि इसकी नींव हिंदुस्तान के सुन्नी मुसलमानों ने आज अदालत-ए-अज़मीया के फैसले पर अपनी मोहर लगा कर रखी है।और जवाब दिया है उन फ़िरक़ा परस्त ताक़तों को जो अपने सियासी मफाद के लिये इस क़ौम के मुस्तक़बिल से अब तक खेलते आ रहे थे।
बचा के रखियेगा नफ़रत से,
दिल की बसती को,
ये आग ख़ुद नहीं लगती,
लगाई जाती है!

जय-हिंद जय भारत!
डॉ. सयैद एहतेशाम-उल-हुदा
प्रखर वक्ता एवं राष्ट्रवादी चिंतक
माइनॉरिटी सोशल रिफॉर्मिस्ट
9837357723

7.11.19

क्या राम मंदिर मुद्दा खत्म होने देंगे राम को भुनाने वाले लोग?

नई दिल्ली। अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है। मंदिर और मस्जिद दोनों ओर के पैरोकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने की बात कर रहे हैं। देश में कहीं से कोई अनहोनी न होने पाए, इसके लिए पुलिस-प्रशासन को पूरी रह से सक्रिय कर दिया गया है । पर क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानकर दोनों ओर के पैरोकार चुप बैठ जाएंगे ? क्या मंदिर -मस्जिद के नाम पर सियासत करने वाले दल इन धर्म स्थलों की राजनीति करनी छोड़ देंगे ? अब तक के भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों का इतिहास देखा जाए तो लगता नहीं है कि ये लोग सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी मानेंगे। जिस पार्टी कानून हाथ में लेकर सरकारों को चुनौती देते हुए रथयात्रा निकाली है, कानून को ढेंगा दिखाकर अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वस्त की है।

2.11.19

पांच सौ साल पुराना विवाद सुलझने के करीब!

अयोध्या मामला : फैसले से पहले सौहार्द की चिंता,  सरकार और धर्मगुरुओं ने एक सुर में की शांति की अपील

अजय कुमार, लखनऊ

‘लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई।’ अयोध्या के करीब पांच सौ साल पुराने भगवान राम की जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में उक्त पंक्तियों को बार-बार दोहराया जा सकता है, लेकिन देर से ही सही अब यह उम्मीद बंधने लगी है कि मोदी सरकार यानी भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने घोषणा पत्र में किए वायदे को पूरा करने की गंभीर इच्छा शक्ति और सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख के बाद अयोध्या विवाद पर फैसले की घड़ी आ गई है। अगर ऐसा हुआ तो सदियों पुराना अयोध्या विवाद हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा। अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 12 वर्षो के बाद 16 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है। फैसला रिजर्व कर लिया गया है। करीब एक दस दिनों के भीतर अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों वाली बैंच का अंतिम(संभवता) फैसला आ जाएगा। माहौल न बिगड़े, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सभी पक्ष सहज स्वीकार करें इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम धर्मगुरूओं के द्वारा ही नहीं अयोध्या विवाद का मुकदमा लड़ रहे तमाम पक्षकार भी यही चाहते हैं कि कोर्ट के फैसले का सम्मान हो।

परिवार के आत्महत्या करने जैसे मामलों में जिलाधिकारी और संबंधित जनप्रतिनिधियों पर हो दंड का प्रावधान

CHARAN SINGH RAJPUT

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आर्थिक तंगी के चलते दो बच्चों को जहर देकर दंपति ने आत्महत्या की है। मीडिया से लेकर सामाजिक संगठन और राजनीतिक संगठनों ने तो औपचाकिरता निभाकर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली। हां सोशल मीडिया पर यह मामला जरूर मजबूती से उठा। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मामला प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र का है। प्रधानमंत्री भी ऐसे कि देश के विकास का ढिंढोरा पूरे विश्व में पीटते फिर रहे हैं। दूसरे देशों में जा-जाकर अपनी कीर्तिमान गिना रहे हैं। संपन्न लोगों के बीच में जाकर सेल्फी ले रहे हैं। अमेरिका जैसे देश में जाकर अपनी महिमामंडन में कार्यक्रम करा रहे हैं।

1.11.19

ऑस्ट्रेलिया में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की दो पुस्तकों का लोकार्पण हुआ





ऑस्ट्रेलिया के खूबसूरत शहर पर्थ की अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘संस्कृति’ तथा हिन्दी समाज ऑफ पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (HSWA) के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक सुरुचिपूर्ण एवम आत्मीय आयोजन में भारत से आए सुपरिचित लेखक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों ‘समय की पंचायत’ और ‘जो देश हम बना रहे हैं’ का लोकार्पण किया गया. 

31.10.19

क्या प्रशांत किशोर गैर-भाजपा पार्टियों को कमजोर करने के भाजपाई एजेंडे के मोहरे हैं!


प्रशांत किशोर की राजनीतिक ईमानदारी पर शक के बादल... कहीं वे मोदी के पेरोल पर दूसरी पार्टियों को कमजोर करने का  काम तो नहीं कर रहे हैं !

-निरंजन परिहार-

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद चुनावी रणनीतिकार  प्रशांत किशोर की  विश्वसनीयता पर शक के बादल गहराने लगे है।  राजनीतिक हलकों में  महाराष्ट्र के मामले में प्रशांत किशोर की राजनीतिक सूझबूझ, रणनीतिक  तैयारी  और ग्राउंड रियलिटी को समझने की क्षमता पर  प्रश्नचिन्ह उठने लगे हैं। इसके साथ सबसे बड़ा  सवाल यह भी पैदा हो रहा है कि  क्या वे दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कमजोर करने के लिए  बीजेपी और नरेंद्र मोदी के रोल पर तो काम नहीं कर रहे हैं।  प्रशांत किशोर के प्रति प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के रोल पर होने का यह सवाल  इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि बिहार में जेडीयू, उत्तर प्रदेश और  गुजरात में कांग्रेस व अब  महाराष्ट्र में  शिवसेना को प्रशांत किशोर के चुनावी सहयोग ने ताकतवर करने के बजाय कमजोर किया है।

लघुकथा- सब्ज़ी मेकर

इस दीपावली वह पहली बार अकेली खाना बना रही थी। सब्ज़ी बिगड़ जाने के डर से मध्यम आंच पर कड़ाही में रखे तेल की गर्माहट के साथ उसके हृदय की गति भी बढ रही थी। उसी समय मिक्सर-ग्राइंडर जैसी आवाज़ निकालते हुए मिनी स्कूटर पर सवार उसके छोटे भाई ने रसोई में आकर उसकी तंद्रा भंग की। वह उसे देखकर नाक-मुंह सिकोड़कर चिल्लाया, “ममा… दीदी बना रही है… मैं नहीं खाऊंगा आज खाना!”

26.10.19

भगवान चित्रगुप्त जी महाराज परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं, जानिए पूरी कथा....

भैयादूज-चित्रगुप्त जयंती 29 को

संजय सक्सेना,लखनऊ

पांच त्योहारों की श्रृंखला में दीपावली का सबसे अधिक महत्व है तो भैयादूज और इसी दिन पड़ने वाली भगवान चित्रगुप्त जी महाराज की जयंती  की अपनी अलग महत्ता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। तद्नुसार इस बार 29 अक्टूबर को भैयादूज और चित्रगुप्त जी महाराज की जयंती मनाई जाएगी। इस दिन कायस्थ समाज कलम-दवाज की पूजा करके अपने अराध्य चित्रगुप्त जी महाराज की पूजा-अर्चना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

19.10.19

यूपी में आइजीआरएस की सभी सेवाएं ठप, सीएम हेल्पलाइन नंबर ने भी काम करना बंद कर दिया!

तो क्या यूपी के सीएम से भी जनता को नहीं मिलेगा न्याय? जाने-माने तेजतर्रार समाजसेवी तनवीर अहमद सिद्दीकी ने  बताया यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हमेशा ही गरीबों के मसीहा रहे हैं। आम जनता की फरियाद को सुनने के लिए आए दिन अधिकारियों को फटकार ही नहीं लगाते लापरवाही बरतने पर सख्त से सख्त कार्यवाही कर चेताते भी रहते हैं। इसके बाद भी सीएम योगी की हर कोशिशें बेकार हो रही हैं। आम जनता को न्याय नहीं मिल पा रहा है। अंतिम रूप में प्रदेश की जनता सीएम योगी के दरबाद में पहुंचकर ही न्याय की गुहार लगाती है। लेकिन सितंबर 2019 से न्याय का अंतिम दरबार भी बंद हो गया है।

14.10.19

रेल यात्रा या जेल यात्रा ...!!

रेल यात्रा या जेल यात्रा ...!!
तारकेश कुमार ओझा
ट्वीटर से समस्या समाधान के शुरूआती दौर में मुझे यह जानकार अचंभा होता
था कि महज किसी यात्री के ट्वीट कर देने भर से रेल मंत्री ने किसी के लिए
दवा तो किसी के लिए दूध का प्रबंध कर दिया। किसी दुल्हे के लिए ट्रेन की
गति बढ़ा दी ताकि बारात समय से कन्यापक्ष के दरवाजे  पहुंच सके। क्योंकि
रेलवे से जुड़ी शिकायतों के मामले में मेरा अनुभव कुछ अलग ही रहा। छात्र
जीवन में रेल यात्रा से जुड़ी  कई लिखित शिकायत मैने केंद्रीय रेल मंत्री
समेत विभिन्न अधिकारियों से की। लेकिन महीनों बाद जब जवाब आया तब तक मैं
घटना को लगभग भूल ही चुका था। कई बार तो  मुझे दिमाग पर जोर देकर याद
करना पड़ा कि मैने क्या शिकायत की थी। जवाबी पत्र में लिखा होता था कि
आपकी शिकायत मिली.... कृपया पूरा विवरण बताएं जिससे कार्रवाई की जा सके।
जाहिर है किसी आम इंसान के लिए इतना कुछ याद रखना संभव नहीं हो सकता था।
रोज तरह - तरह की हैरतअंगेज सूचनाओं से मुझे लगा कि शायद प्रौद्योगिकी के
करिश्मे से यह संभव हो पाया हो। बहरहाल हाल में  नवरात्र के दौरान  की गई
रेल यात्रा ने मेरी सारी धारणाओं को धूल में मिला दिया। सहसा उत्तर
प्रदेश स्थित अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ यात्रा का कार्यक्रम बना। 12815
पुरी - आनंदविहार नंदन कानन एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में बड़ी मुश्किल से
हमारा बर्थ कन्फर्म हो पाया। खड़गपुर के हिजली से ट्रेन के आगे बढ़ने के
कुछ देर बाद मुझे टॉयलट जाने की जरूरत महसूस हुई। भीतर जाने पर मैं हैरान
था , क्योंकि ज्यादातर टॉयलट में पानी नहीं था। मैने तत्काल ट्वीटर से
रेलवे के विभिन्न विभागों में शिकायत की। मुझे उम्मीद थी कि ट्रेन के
किसी बड़े स्टेशन पहुंचते ही डिब्बों में पानी भर दिया जाएगा। शिकायत पर
कार्रवाई की उम्मीद भी थी। लेकिन आद्रा, गया, गोमो और मुगलसराय जैसे बड़े
जंक्शनों से ट्रेन के गुजरने के बावजूद हालत सुधरने के बजाय बद से बदतर
होती गई। पानी न होने से तमाम यात्री एक के बाद एक टॉयलटों के दरवाजे खोल
रहे थे। लेकिन  तुरंत मुंह बिचकाते हुए नाक बंद कर फौरन बाहर निकल रहे
थे। क्योंकि सारे बॉयो टॉयलट गंदगी से बजबजा रहे थे। वॉश  बेसिनों में भी
पानी नहीं था। इस हालत में मैं इलाहाबाद में ट्रेन से उतर गया। हमारी
वापसी यात्रा आनंद विहार - पुरी नीलांचल एक्सप्रेस में थी। भारी भीड़ के
बावजूद सीट कंफर्म होने से हम राहत महसूस कर रहे थे। लेकिन पहली यात्रा
के बुरे अनुभव मन में खौफ पैदा कर रहे थे। सफर वाले दिन करीब तीन घंटे तक
पहेली बुझाने के बाद ट्रेन आई। हम निर्धारित डिब्बे में सवार हुए। लेकिन
फिर वही हाल। इधर - उधर भटकते वेटिंग लिस्ट और आरएसी वाले यात्रियों की
भीड़ के बीच टॉयलट की फिर वही हालत नजर आई। किसी में पानी रिसता नजर आया तो किसी में बिल्कुल नहीं। कई वॉश बेसिन  में प्लास्टिक की बोतलें और
कनस्तर भरे पड़े थे। प्रतापगढ़ से ट्रेन के रवाना होने पर मुझे लगा कि
वाराणसी या मुगलसराय में जरूर पानी भरा जाएगा। लेकिन जितनी बार टॉयलट गया
हालत बद से बदतर होती गई। सुबह होते - होते  शौचालयों में गंदगी इस कदर
बजबजा रही थी कि सिर चकरा जाए। ऐसा मैने कुछ फिल्मों में जेल के दृश्य
में देखा था। लोग मुंह में ब्रश दबाए इस डिब्बे से उस डिब्बे भटक  रहे थे
ताकि किसी तरह मुंह धोया जा सके। बुजुर्ग, महिलाओं और बच्चों की हालत
खराब थी। फिर शिकायत का ख्याल आया... लेकिन पुराने अनुभव के मद्देनजर ऐसा
करना मुझे बेकार की कवायद लगा। इसी हालत में ट्रेन हिजली पहुंच गई। हिजली
के प्लेटफार्म पर भारी मात्रा में पानी बहता देख मैं समझ गया कि अब साफ -
सफाई हो रही है... लेकिन क्या फायदा ... का बरसा जब कृषि सुखानी...।
ट्रेन से उतरे तमाम यात्री अपना बुरा अनुभव सुनाते महकमे कोस रहे थे। मैं
ट्वीटर से समस्या समाधान को याद करते हुए घर की ओर चल पड़ा।
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*

13.10.19

गृह मंत्री संविधान और अपनी शपथ का ध्यान रखें, एक वर्ग को भय-अनिश्चितता में रखना उचित नहीं

उबैद उल्लाह नासिर

गृह मंत्री अमित शाह यह भूल जाते हैं कि  अब वह केवल भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष नहीं बल्कि देश के गृह मंत्री भी हैं, यही नहीं वह शायद यह भी भूल जाते हैं कि सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री के तौर पर उन्होंने क्या शपथ लिया था अन्यथा नागरिकता और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर के सिलसले में वह ऐसे बयान न देते जो हमारे संविधान के शब्दों और उसकी आत्मा के खिलाफ है। गृह मंत्री जानते हैं की संविधान की धारा 14  और 15  के तहत इस देश में सभी नागरिकों को सामान अधिकार प्राप्त हैं और सरकार धर्म जाति  क्षेत्र और लिंग के आधार पर किसी से किसी प्रकार का भेद भाव नहीं कर सकती उन्होंने सांसद और मंत्री के तौर पर जो शपथ ली है उस में भी यही कहा गया है कि वह  उक्त आधारों पर देश के किसी नागरिक से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेंगे फिर वह ऐसे बयान कैसे दे सकते हैं की सरकार नागरिकता का जो क़ानून बनाने जा रही है उस से हिन्दुओं सिखों जैनियों बौद्धों ईसाईयों आदि को डरने की ज़रूरत नहीं क्योंकि सरकार उन सबको भारत की नागरिकता दे देगी उनके इस बयान से स्पष्ट है कि केवल मुसलमानों को घुसपैठिया बता कर उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। यह तो सम्भव है की सरकार लोक सभा में अपने बहुमत और राज्य सभा में अपने मैनेजमेंट से उक्त क़ानून पास करा ले और राष्ट्रपति जिस प्रकार आँख बंद कर के सरकार के हर क़ानून को मंज़ूरी दे रहे हैं उसी प्रकार इस क़ानून को भी मंज़ूरी दे दें लेकिन गृह मंत्री को जान्ना चाहिए की उक्त क़ानून को ठीक उसी तरह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जायेगी जैसे धारा ३७० को समाप्त करने के लिए दी गयी है और संविधान की उक्त धाराओं के चलते सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून को निष्क्रय कर देगा क्योंकि संविधान इस सिलसले में बिलकुल स्पष्ट है।

3.10.19

हे राम! कैसा हो गया गांधी का देश

जहां एक तरफ़ अखण्ड भारत मोहनदास करमचंद गांधी को बापू और महात्मा कहता औऱ पूजता है वहीं समाज का एक तबका ऐसा भी है जो उन्हें देशद्रोही बताता है. सवाल तो यह है कि दुनियाभर को लोहा मनवाने वाले इस महात्मा के ऊपर अचानक इतनी टिप्पणी कैसे होने लगी. आख़िरकार यह वही व्यक्ति है जिन्होंने अफ्रीका आन्दोलन, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो, नमक आन्दोलन, असहयोग आन्दोलन आदि कई बड़े आंदोलन किए. साथ ही वैश्विक स्तर पर ओबामा से लेकर नेल्सन मंडेला जैसे दुनियाभर में गांधीवादी और गाँधी जी के भक्त भरे पड़े हैं.

यह शहर हर साल डूबता है पर यहाँ के नेताओं और अफसरों का शर्म नहीं डूबता

Madhup Mani "Pikku"
दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर जहाँ बाढ़ नदी से नहीं, नाले के पानी से आता है... 30 वर्षों से इस शहर पर एक ही दल का राज है. कहने में कोई गुरेज नहीं कि यह शहर प्रत्येक वर्ष बाढ़ से नहीं नाले के पानी से हीं डूब जाता है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं बिहार के ऐतिहासिक राजधानी पटना की. निम्न और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार जिन्हें सरकार की ओर से न कोई सब्सिडी मिलती है और न हीं इन तक कोई बाढ़ राहत पहुँच पाती है, वो हर साल अपने घर के बहुत मेहनत से ख़रीदे लाखों के सामान को अपनी आँखों के सामने डूबते और बर्बाद होते देखते हैं.

इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा : चमनलाल


नागपुर. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर चमनलाल ने वर्तमान परिस्थितियों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश की जा रही है. जो असल देशभक्त हैं उन्हें दरकिनार कर उन लोगों को आजादी के आंदोलन का नायक बनाने की कोशिश की जा रही है जिनका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था। इसलिए नागरिकों को बेहद सजग रहते हुए तर्कों और तथ्यों के आधार पर सच्चाई का पता लगाने की कोशिश करना चाहिए.

क्या भारतीय राजनीति ने गांधी का रास्ता खारिज कर दिया?

प्रो. संजय द्विवेदी

‘हिंद स्वराज’ के बहाने गांधी की याद... महात्मा गांधी की मूलतः गुजराती में लिखी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज्य’  हमारे समय के तमाम सवालों से जूझती है। महात्मा गांधी की यह बहुत छोटी सी पुस्तिका कई सवाल उठाती है और अपने समय के सवालों के वाजिब उत्तरों की तलाश भी करती है। सबसे महत्व की बात है कि पुस्तक की शैली। यह किताब प्रश्नोत्तर की शैली में लिखी गयी है। पाठक और संपादक के सवाल-जवाब के माध्यम से पूरी पुस्तक एक ऐसी लेखन शैली का प्रमाण जिसे कोई भी पाठक बेहद रूचि से पढ़ना चाहेगा। यह पूरा संवाद महात्मा गांधी ने लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए लिखा था। 1909 में लिखी गयी यह किताब मूलतः यांत्रिक प्रगति और सभ्यता के पश्चिमी पैमानों पर एक तरह हल्लाबोल है। गांधी इस कल्पित संवाद के माध्यम से एक ऐसी सभ्यता और विकास के ऐसे प्रतीकों की तलाश करते हैं जिनसे आज की विकास की कल्पनाएं बेमानी साबित हो जाती हैं।

गाँधी एक व्यक्ति नही विचार हैं

Shivam Dwivedi
पूर्व में गाँधी जयंती थी। जाहिर है खूब विचार विमर्श चला। गाँधी प्रासंगिक है या अप्रसांगिक। गाँधी किसका है और किसका नहीं है। गांधी बीजेपी का है या कांग्रेस का। एक दूसरे कि विचारधारा को गलत सावित करने के लिए और अपनी विचारधारा को सही बताने के लिए इतिहास , राजनीति, की बड़ी - बड़ी बातें की तथा अंत में एक दूसरे को या गांधी को कोसने के सिवा और कुछ नहीं शेष मिला । पर आखिर में गांधी है किसका ? तेरा या मेरा ।