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2.2.12

राज्यपाल व मुख्यमंत्री में टकराव

शंकर जालान


राज्य में राज्यपाल एमके नारायणन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच टकराव के संकेत मिल रहे हैं। बीते दिनों किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को लेकर मुख्यमंत्री बनर्जी और राज्यपाल नारायणन के बीच मतैक्य सामने आया है। अब तक कमोबेश हर मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए नारायणन ने इस मुद्दे पर टकराव के अंदाज में कहा- कर्ज के भार से दबे हुए किसान आत्महत्या कर रहे हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि वह केन्द्र के साथ मिलकर हल तलाशे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एकाधिक बार किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को अनदेखा करते हुए कह चुकी हैं, आत्महत्या करने वाले या तो किसान नहीं थे या फिर पारिवारिक कारणों से उन लोगों ने जान दी। इससे पहले कॉलेजों में छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष और अस्पतालों में शिशुओं की मौतों को लेकर राज्यपाल चिंता जता चुके हैं, लेकिन कोई मतैक्य सामने नहीं आया था। दोनों ही दफा राज्यपाल ने दुख जताते हुए प्रशासन को जरूरी उपाय करने का सुझाव दिया था। लेकिन किसानों की मौतों को लेकर उन्होंने सीधे तौर पर केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत मानी है। उन्होंने प्रधानमंत्री को राज्य में किसानों की मौतों को लेकर एक रिपोर्ट भी भेजी है। राज्यपाल का मानना है कि आत्महत्या करने वाले किसान कर्ज में डूबे हुए थे और फसल की बिक्री न होने से परेशान थे। उनके परिवार जन अनाहार को मजबूर थे। पिछले दो महीनों में दो दर्जन से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। इनमें 17 किसान बर्दवान जिले के हैं। मालूम बो कि बर्दवान जिले को बंगाल का चावल भंडार कहा जाता है। मालदा, बांकुड़ा, हुगली और जलपाईगुड़ी में भी आत्महत्या की घटनाएं हुई हैं। जलपाईगुड़ी में चाय बागानों के बंद होने के चलते बेरोजगारी की स्थिति है। हालांकि, सभी मौतों की वजह निजी और पारिवारिक बताकर मुख्यमंत्री ने पल्ला झाडऩे की कोशिश की है। ऐसे में राज्यपाल के ताजा कदम से कांग्रेस और वामपंथी दलों के ममता बनर्जी विरोधी अभियान को बल मिला है। कांग्रेस भी वामपंथी दलों की तर्ज पर राज्य में सड़कों पर उतर चुकी है।

धार्मिक होने के मतलब किसी धर्म से पक्षपात कतई नहीं : स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती

वर्तमान समय में देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब धर्म को ध्यान अथवा जेहन में रख कर राज यानी राजनीति की जाए। यह कथन है द्वारका पीठ के जगद्गुरू स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती महाराज का। स्वामीजी ने अपने कोलकाता प्रवास के दौरान शंकर जालान से लंबी बातचीत करते हुए कहा कि धार्मिक होने का मतलब किसी धर्म से पक्षपात करना कतई नहीं है। सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। पेश ही महाराजश्री से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश



-- महाराज जी, आप धर्म गुरू है, इसीलिए पहला प्रश्न धर्म से संबंधित कर रहा हूं, धर्म की सटीक परिभाषा क्या है?
00 धर्म की सटीक परिभाषा है वह कर्म जिससे किसी को नुकसान न हो, कोई आहात न हो। सही मायने में धर्म उसे ही कहा जा सकता है, जो खुद को शांति और दूसरे को सुख प्रदान करे।

-- संत और संन्यासी में क्या फर्क है?
00 मूल रूप से तो कोई फर्क नहीं है। दोनों को त्यागी और परोपकारी होना चाहिए। यहां यह कह सकते हैं कि संन्यासी बनने के लिए संन्यास आश्रम का आश्रय लेना जरूरी है, जबकि व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी संत हो सकता है।

--संत, महात्मा और संन्यासियों का मुख्य कार्य क्या होना चाहिए?
00 इन सभी का काम और पहला कर्तव्य है मानव मात्र की रक्षा। इसके अलावा लोगों को अपनी धर्म-संस्कृति से अवगत कराना, देश प्रेम की भावना जागृति करना जैसे कामों को दूसरे और तीसरे क्रम में रखा जा सकता है।

-- क्या साधु समाज के लोग अपनी जिम्मेवारी ठीक तरह से निभा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहे तो समाज को उचित अथवा धर्म की राह दिखा रहे हैं?
00 यह बहुत जटिल सवाल कर लिया आपने। आपको बता दें कि साधुओं का कोई समाज नहीं है। जो व्यक्ति घर-द्वार, माता-पिता, भाई-बहन और रिश्ते-नाते को छोड़कर साधु बनता है वह फिर से समाज के घेरे में क्यों बंधना चाहेगा। साधु का व्यवहार ही लोगों को धर्म की राह दिखा देता है, इसके लिए उन्हें अलग से विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जो साधु आडंबर की आड़ में धर्म को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोगों को धोखा देने के साथ-साथ कहीं न कहीं अपनी जिम्मेवारी से भटक गए हैं।

-- धर्म में दिखावा बढ़ गया है इसका कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है?
00 धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए और ऐसा मंजर तभी देखने को मिलता है जब व्यक्ति धर्मिक आयोजन को स्वार्थसिद्धि के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसे तभी रोका जा सकता है, जब जनता आडंबर वाले धार्मिक आयोजनों में जाने से परहेज करे।

-- सुना जाता है कि संन्यासी होना सहज है, लेकिन वैरागी होना बेहद कठिन ऐसा क्यों?
00 बिल्कुल सही सुना है आपने। संन्यास आश्रम में रहने वाले को संन्यासी कहा जा सकता है। वैरागी होना सहज नहीं है। मोह-माया, मान-सम्मान, स्वाद-बेस्वाद, लाभ-हानि पर विचलित न होना ही वैरागी होने के लक्षण हैं।

-- धर्म और राजनीति का क्या संबंध है?
00 बहुत गहरा संबंध है। व्यक्ति धर्म के मुताबिक जीवन-यापन करे और इसे ही ध्यान में रखकर राजनीति। राजनीति का अर्थ है राज की नीति। यदि राजा धर्म से नियंत्रित होगा तो राजनीति स्वत: धर्म से नियंत्रित हो जाएगी। कुछ लोग धर्म को राजनीति से अलग करने का स्वार्थपूर्ण अभियान चला रहे हैं, ताकि धर्म उनकी राह में बाधक न बने।
-- क्या धार्मिक रहते हुए धर्म निरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता?
00 बिल्कुल हुआ जा सता है। धार्मिक होने का अर्थ किसी धर्म से पक्षपात करना नहीं है। धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। जहां तक हिंदू धर्म की बात है वह अत्यंत वैज्ञानिक है, इसमें किसी से विरोध नहीं है।

-- स्वामीजी पाप क्या है और पुण्य क्या है?
00 जब मनुष्य कोई कर्म करता है तो उसका फल कुछ समय बाद प्राप्त होता है। यदि फल के रूप में संस्कार मिले तो वह पुण्य है और दुराचार मिले तो वह पाप है।

-- सनातन धर्म में धर्म गुरूओं की भरमार है, बावजूद इसके समाज में असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका क्या कारण है?
00 इसका मूल कारण है कुछ धर्म गुरू अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़े हैं। वे जो कहते हैं उसे प्रवचन नहीं, भाषण कहा जाना चाहिए। जब तक प्रवचन की जगह भाषण पिलाया जाएगा, समाज में असंतोष बढ़ता है रहेगा।

--ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप की बात विश्व का समस्त ईसाई समुदाय और हमारे हिंदू धर्मावलंबी भी न केवल ध्यान से सुनते है, बल्कि अमल भी करते देखे गए हैं। पर हमारे धर्मगुरूओं की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, इसका क्या कारण है ?
00 पोप की बात पर भी अमल नहीं होता। समय-समय पर उन्होंने युद्ध विरोधी बयान दिए हैं, क्या युद्ध रुका। जो हमें दिखता है वह पश्चिमी प्रचार तंत्र पर हमारी निर्भरता है और उनके प्रचार का सही तरीका।

-- पश्चिमी देशों में और अपने देश के पश्चिमपंथियों में आजकल दक्षिणपंथी कट््टरवाद की बहस छिड़ी हुई है। यह प्रकारांतर से हिंदू धर्म पर हमला है। आप क्या कहेंगे?
00 पहली बात तो यह है कि दक्षिणपंथी का जो कट््टरवाद है वह हिंदुत्व से परे है। जो हिंदू धर्म को इससे जोड़ते हैं वे इसे खत्म करना चाहते हैं। कहने का अर्थ है कि हिंदू कभी कट््टरपंथी नहीं हो सकता।

-- एक दिवसीय धार्मिक आयोजनों में लाखों रुपए खर्च करना क्या तर्कसंगत है?
00 मोटे तौर पर तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी लोग भाव से ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन दिखावा या प्रभाव जमाने के लिए ऐसा करना बिल्कुल गलत है।

-- बाबा रामदेव प्रकरण पर आपकी क्या राय है?
00 बाबा रामदेव का तरीका बिल्कुल गलत है। मुझे कहीं न कहीं इसमें भाजपा और आरएसएस के हाथ होने की बू आ रही है। रामलीला मैदान में जो हुआ वह साधुओं के लिए शर्म की बात है। इसके लिए सीधे तौर पर रामदेव दोषी हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि राष्ट्र के लिए नहीं निजी महत्वकांक्षा के लिए रामदेव यह सब कर रहे हैं। देखिए, रामदेव विदेशों में जमा काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं और उसे सरकारी संपत्ति घोषित करने की मांग भी। साथ ही वे यह आरोप भी की सरकार भ्रष्ट है। वे देश की समृद्धि की वकालत कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि धन वापस लाने से देश समृद्धि नहीं होगा। देश तभी समृद्धि होगा जब लोग कठोर परिश्रमी, अनुशासनशील और ईमानदार होगें।

-- क्या आप अण्णा हजारे की मांग से सहमत हैं?
00 जहां तक अन्ना की बात है उनका तरीका और उनकी मांग रामदेव से कुछ भिन्न है। उनकी मांग पर भले ही असहमति जताई जा सकती है, लेकिन तरीके को गलत नहीं कहा जा सकता। रही बात भ्रष्टाचार की तो अन्ना की टीम में कई लोग हैं जो घेरे में हैं। अन्ना को देश को ठीक करने से पहले अपने घर यानी टीम में सुधार करना चाहिए।

-- कहते हैं जब-जब अधर्म बढ़ता है परमात्मा अवतार लेते हैं, भारत में भ्रष्टाचार रूपी अधर्म बढ़ रहा है क्या निकट भविष्य पर किसी चमत्कार की उम्मीद है?
00 धर्म विरोधी लोग हर युग में रहे हैं और अधर्म भी करते रहे हैं। बावजूद इसके धर्म सदियों से जीतता आया है। रावण (अधर्म) को राम (धर्म) ने मारा। इसी तरह कंश (अधर्म) का वध कृष्ण (धर्म) ने किया। निश्चित तौर पर रावण और कंश जैसे अधर्मी लोगों की तादाद बढ़ेगी, तो कोई ना कोई राम या कृष्ण के रूप में अवश्य इस धरती पर आएगा।

-- करीब छह साल बाद भाजपा में लौटी उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का अभियान छेड़ रखा है, क्या उन्हें सफलता मिलेगी?
00 कुछ पाने की तमन्ना से किए जा रहे काम को जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जो अभियान छेड़ा है। वह राजनीति लाभ के लिए है। आपको बता दूं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग सर्वप्रथम मैंने की थी। मैं तहे दिल से चाहता हूं कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो। उमा भारती मेरे मुद्दे को राजनीति लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।

-- सुना है मिशन पूरा न होने तक उन्होंने (उमा) मालपुआ न खाने का प्रण लिया है, क्या यह ठीक है?
00 कौन देखने जाता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।

-- यह सच्चाई है कि पढ़ी अधिक रामायण जाती है, लेकिन समाज में अधिक प्रभाव महाभाारत का दिख रहा है, ऐसा क्यों?
00 क्योंकि लोग रामायण केवल पढ़ते हैं, उसका मनन नहीं करते।

धार्मिक होने के मतलब किसी धर्म से पक्षपात कतई नहीं : स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती

वर्तमान समय में देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब धर्म को ध्यान अथवा जेहन में रख कर राज यानी राजनीति की जाए। यह कथन है द्वारका पीठ के जगद्गुरू स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती महाराज का। स्वामीजी ने अपने कोलकाता प्रवास के दौरान शंकर जालान से लंबी बातचीत करते हुए कहा कि धार्मिक होने का मतलब किसी धर्म से पक्षपात करना कतई नहीं है। सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। पेश ही महाराजश्री से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश



-- महाराज जी, आप धर्म गुरू है, इसीलिए पहला प्रश्न धर्म से संबंधित कर रहा हूं, धर्म की सटीक परिभाषा क्या है?
00 धर्म की सटीक परिभाषा है वह कर्म जिससे किसी को नुकसान न हो, कोई आहात न हो। सही मायने में धर्म उसे ही कहा जा सकता है, जो खुद को शांति और दूसरे को सुख प्रदान करे।

-- संत और संन्यासी में क्या फर्क है?
00 मूल रूप से तो कोई फर्क नहीं है। दोनों को त्यागी और परोपकारी होना चाहिए। यहां यह कह सकते हैं कि संन्यासी बनने के लिए संन्यास आश्रम का आश्रय लेना जरूरी है, जबकि व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी संत हो सकता है।

--संत, महात्मा और संन्यासियों का मुख्य कार्य क्या होना चाहिए?
00 इन सभी का काम और पहला कर्तव्य है मानव मात्र की रक्षा। इसके अलावा लोगों को अपनी धर्म-संस्कृति से अवगत कराना, देश प्रेम की भावना जागृति करना जैसे कामों को दूसरे और तीसरे क्रम में रखा जा सकता है।

-- क्या साधु समाज के लोग अपनी जिम्मेवारी ठीक तरह से निभा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहे तो समाज को उचित अथवा धर्म की राह दिखा रहे हैं?
00 यह बहुत जटिल सवाल कर लिया आपने। आपको बता दें कि साधुओं का कोई समाज नहीं है। जो व्यक्ति घर-द्वार, माता-पिता, भाई-बहन और रिश्ते-नाते को छोड़कर साधु बनता है वह फिर से समाज के घेरे में क्यों बंधना चाहेगा। साधु का व्यवहार ही लोगों को धर्म की राह दिखा देता है, इसके लिए उन्हें अलग से विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जो साधु आडंबर की आड़ में धर्म को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोगों को धोखा देने के साथ-साथ कहीं न कहीं अपनी जिम्मेवारी से भटक गए हैं।

-- धर्म में दिखावा बढ़ गया है इसका कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है?
00 धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए और ऐसा मंजर तभी देखने को मिलता है जब व्यक्ति धर्मिक आयोजन को स्वार्थसिद्धि के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसे तभी रोका जा सकता है, जब जनता आडंबर वाले धार्मिक आयोजनों में जाने से परहेज करे।

-- सुना जाता है कि संन्यासी होना सहज है, लेकिन वैरागी होना बेहद कठिन ऐसा क्यों?
00 बिल्कुल सही सुना है आपने। संन्यास आश्रम में रहने वाले को संन्यासी कहा जा सकता है। वैरागी होना सहज नहीं है। मोह-माया, मान-सम्मान, स्वाद-बेस्वाद, लाभ-हानि पर विचलित न होना ही वैरागी होने के लक्षण हैं।

-- धर्म और राजनीति का क्या संबंध है?
00 बहुत गहरा संबंध है। व्यक्ति धर्म के मुताबिक जीवन-यापन करे और इसे ही ध्यान में रखकर राजनीति। राजनीति का अर्थ है राज की नीति। यदि राजा धर्म से नियंत्रित होगा तो राजनीति स्वत: धर्म से नियंत्रित हो जाएगी। कुछ लोग धर्म को राजनीति से अलग करने का स्वार्थपूर्ण अभियान चला रहे हैं, ताकि धर्म उनकी राह में बाधक न बने।
-- क्या धार्मिक रहते हुए धर्म निरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता?
00 बिल्कुल हुआ जा सता है। धार्मिक होने का अर्थ किसी धर्म से पक्षपात करना नहीं है। धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। जहां तक हिंदू धर्म की बात है वह अत्यंत वैज्ञानिक है, इसमें किसी से विरोध नहीं है।

-- स्वामीजी पाप क्या है और पुण्य क्या है?
00 जब मनुष्य कोई कर्म करता है तो उसका फल कुछ समय बाद प्राप्त होता है। यदि फल के रूप में संस्कार मिले तो वह पुण्य है और दुराचार मिले तो वह पाप है।

-- सनातन धर्म में धर्म गुरूओं की भरमार है, बावजूद इसके समाज में असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका क्या कारण है?
00 इसका मूल कारण है कुछ धर्म गुरू अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़े हैं। वे जो कहते हैं उसे प्रवचन नहीं, भाषण कहा जाना चाहिए। जब तक प्रवचन की जगह भाषण पिलाया जाएगा, समाज में असंतोष बढ़ता है रहेगा।

--ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप की बात विश्व का समस्त ईसाई समुदाय और हमारे हिंदू धर्मावलंबी भी न केवल ध्यान से सुनते है, बल्कि अमल भी करते देखे गए हैं। पर हमारे धर्मगुरूओं की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, इसका क्या कारण है ?
00 पोप की बात पर भी अमल नहीं होता। समय-समय पर उन्होंने युद्ध विरोधी बयान दिए हैं, क्या युद्ध रुका। जो हमें दिखता है वह पश्चिमी प्रचार तंत्र पर हमारी निर्भरता है और उनके प्रचार का सही तरीका।

-- पश्चिमी देशों में और अपने देश के पश्चिमपंथियों में आजकल दक्षिणपंथी कट््टरवाद की बहस छिड़ी हुई है। यह प्रकारांतर से हिंदू धर्म पर हमला है। आप क्या कहेंगे?
00 पहली बात तो यह है कि दक्षिणपंथी का जो कट््टरवाद है वह हिंदुत्व से परे है। जो हिंदू धर्म को इससे जोड़ते हैं वे इसे खत्म करना चाहते हैं। कहने का अर्थ है कि हिंदू कभी कट््टरपंथी नहीं हो सकता।

-- एक दिवसीय धार्मिक आयोजनों में लाखों रुपए खर्च करना क्या तर्कसंगत है?
00 मोटे तौर पर तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी लोग भाव से ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन दिखावा या प्रभाव जमाने के लिए ऐसा करना बिल्कुल गलत है।

-- बाबा रामदेव प्रकरण पर आपकी क्या राय है?
00 बाबा रामदेव का तरीका बिल्कुल गलत है। मुझे कहीं न कहीं इसमें भाजपा और आरएसएस के हाथ होने की बू आ रही है। रामलीला मैदान में जो हुआ वह साधुओं के लिए शर्म की बात है। इसके लिए सीधे तौर पर रामदेव दोषी हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि राष्ट्र के लिए नहीं निजी महत्वकांक्षा के लिए रामदेव यह सब कर रहे हैं। देखिए, रामदेव विदेशों में जमा काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं और उसे सरकारी संपत्ति घोषित करने की मांग भी। साथ ही वे यह आरोप भी की सरकार भ्रष्ट है। वे देश की समृद्धि की वकालत कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि धन वापस लाने से देश समृद्धि नहीं होगा। देश तभी समृद्धि होगा जब लोग कठोर परिश्रमी, अनुशासनशील और ईमानदार होगें।

-- क्या आप अण्णा हजारे की मांग से सहमत हैं?
00 जहां तक अन्ना की बात है उनका तरीका और उनकी मांग रामदेव से कुछ भिन्न है। उनकी मांग पर भले ही असहमति जताई जा सकती है, लेकिन तरीके को गलत नहीं कहा जा सकता। रही बात भ्रष्टाचार की तो अन्ना की टीम में कई लोग हैं जो घेरे में हैं। अन्ना को देश को ठीक करने से पहले अपने घर यानी टीम में सुधार करना चाहिए।

-- कहते हैं जब-जब अधर्म बढ़ता है परमात्मा अवतार लेते हैं, भारत में भ्रष्टाचार रूपी अधर्म बढ़ रहा है क्या निकट भविष्य पर किसी चमत्कार की उम्मीद है?
00 धर्म विरोधी लोग हर युग में रहे हैं और अधर्म भी करते रहे हैं। बावजूद इसके धर्म सदियों से जीतता आया है। रावण (अधर्म) को राम (धर्म) ने मारा। इसी तरह कंश (अधर्म) का वध कृष्ण (धर्म) ने किया। निश्चित तौर पर रावण और कंश जैसे अधर्मी लोगों की तादाद बढ़ेगी, तो कोई ना कोई राम या कृष्ण के रूप में अवश्य इस धरती पर आएगा।

-- करीब छह साल बाद भाजपा में लौटी उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का अभियान छेड़ रखा है, क्या उन्हें सफलता मिलेगी?
00 कुछ पाने की तमन्ना से किए जा रहे काम को जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जो अभियान छेड़ा है। वह राजनीति लाभ के लिए है। आपको बता दूं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग सर्वप्रथम मैंने की थी। मैं तहे दिल से चाहता हूं कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो। उमा भारती मेरे मुद्दे को राजनीति लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।

-- सुना है मिशन पूरा न होने तक उन्होंने (उमा) मालपुआ न खाने का प्रण लिया है, क्या यह ठीक है?
00 कौन देखने जाता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।

-- यह सच्चाई है कि पढ़ी अधिक रामायण जाती है, लेकिन समाज में अधिक प्रभाव महाभाारत का दिख रहा है, ऐसा क्यों?
00 क्योंकि लोग रामायण केवल पढ़ते हैं, उसका मनन नहीं करते।

धार्मिक होने के मतलब किसी धर्म से पक्षपात कतई नहीं : स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती

वर्तमान समय में देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब धर्म को ध्यान अथवा जेहन में रख कर राज यानी राजनीति की जाए। यह कथन है द्वारका पीठ के जगद्गुरू स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती महाराज का। स्वामीजी ने अपने कोलकाता प्रवास के दौरान शंकर जालान से लंबी बातचीत करते हुए कहा कि धार्मिक होने का मतलब किसी धर्म से पक्षपात करना कतई नहीं है। सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। पेश ही महाराजश्री से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश



-- महाराज जी, आप धर्म गुरू है, इसीलिए पहला प्रश्न धर्म से संबंधित कर रहा हूं, धर्म की सटीक परिभाषा क्या है?
00 धर्म की सटीक परिभाषा है वह कर्म जिससे किसी को नुकसान न हो, कोई आहात न हो। सही मायने में धर्म उसे ही कहा जा सकता है, जो खुद को शांति और दूसरे को सुख प्रदान करे।

-- संत और संन्यासी में क्या फर्क है?
00 मूल रूप से तो कोई फर्क नहीं है। दोनों को त्यागी और परोपकारी होना चाहिए। यहां यह कह सकते हैं कि संन्यासी बनने के लिए संन्यास आश्रम का आश्रय लेना जरूरी है, जबकि व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी संत हो सकता है।

--संत, महात्मा और संन्यासियों का मुख्य कार्य क्या होना चाहिए?
00 इन सभी का काम और पहला कर्तव्य है मानव मात्र की रक्षा। इसके अलावा लोगों को अपनी धर्म-संस्कृति से अवगत कराना, देश प्रेम की भावना जागृति करना जैसे कामों को दूसरे और तीसरे क्रम में रखा जा सकता है।

-- क्या साधु समाज के लोग अपनी जिम्मेवारी ठीक तरह से निभा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहे तो समाज को उचित अथवा धर्म की राह दिखा रहे हैं?
00 यह बहुत जटिल सवाल कर लिया आपने। आपको बता दें कि साधुओं का कोई समाज नहीं है। जो व्यक्ति घर-द्वार, माता-पिता, भाई-बहन और रिश्ते-नाते को छोड़कर साधु बनता है वह फिर से समाज के घेरे में क्यों बंधना चाहेगा। साधु का व्यवहार ही लोगों को धर्म की राह दिखा देता है, इसके लिए उन्हें अलग से विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जो साधु आडंबर की आड़ में धर्म को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोगों को धोखा देने के साथ-साथ कहीं न कहीं अपनी जिम्मेवारी से भटक गए हैं।

-- धर्म में दिखावा बढ़ गया है इसका कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है?
00 धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए और ऐसा मंजर तभी देखने को मिलता है जब व्यक्ति धर्मिक आयोजन को स्वार्थसिद्धि के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसे तभी रोका जा सकता है, जब जनता आडंबर वाले धार्मिक आयोजनों में जाने से परहेज करे।

-- सुना जाता है कि संन्यासी होना सहज है, लेकिन वैरागी होना बेहद कठिन ऐसा क्यों?
00 बिल्कुल सही सुना है आपने। संन्यास आश्रम में रहने वाले को संन्यासी कहा जा सकता है। वैरागी होना सहज नहीं है। मोह-माया, मान-सम्मान, स्वाद-बेस्वाद, लाभ-हानि पर विचलित न होना ही वैरागी होने के लक्षण हैं।

-- धर्म और राजनीति का क्या संबंध है?
00 बहुत गहरा संबंध है। व्यक्ति धर्म के मुताबिक जीवन-यापन करे और इसे ही ध्यान में रखकर राजनीति। राजनीति का अर्थ है राज की नीति। यदि राजा धर्म से नियंत्रित होगा तो राजनीति स्वत: धर्म से नियंत्रित हो जाएगी। कुछ लोग धर्म को राजनीति से अलग करने का स्वार्थपूर्ण अभियान चला रहे हैं, ताकि धर्म उनकी राह में बाधक न बने।
-- क्या धार्मिक रहते हुए धर्म निरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता?
00 बिल्कुल हुआ जा सता है। धार्मिक होने का अर्थ किसी धर्म से पक्षपात करना नहीं है। धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। जहां तक हिंदू धर्म की बात है वह अत्यंत वैज्ञानिक है, इसमें किसी से विरोध नहीं है।

-- स्वामीजी पाप क्या है और पुण्य क्या है?
00 जब मनुष्य कोई कर्म करता है तो उसका फल कुछ समय बाद प्राप्त होता है। यदि फल के रूप में संस्कार मिले तो वह पुण्य है और दुराचार मिले तो वह पाप है।

-- सनातन धर्म में धर्म गुरूओं की भरमार है, बावजूद इसके समाज में असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका क्या कारण है?
00 इसका मूल कारण है कुछ धर्म गुरू अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़े हैं। वे जो कहते हैं उसे प्रवचन नहीं, भाषण कहा जाना चाहिए। जब तक प्रवचन की जगह भाषण पिलाया जाएगा, समाज में असंतोष बढ़ता है रहेगा।

--ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप की बात विश्व का समस्त ईसाई समुदाय और हमारे हिंदू धर्मावलंबी भी न केवल ध्यान से सुनते है, बल्कि अमल भी करते देखे गए हैं। पर हमारे धर्मगुरूओं की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, इसका क्या कारण है ?
00 पोप की बात पर भी अमल नहीं होता। समय-समय पर उन्होंने युद्ध विरोधी बयान दिए हैं, क्या युद्ध रुका। जो हमें दिखता है वह पश्चिमी प्रचार तंत्र पर हमारी निर्भरता है और उनके प्रचार का सही तरीका।

-- पश्चिमी देशों में और अपने देश के पश्चिमपंथियों में आजकल दक्षिणपंथी कट््टरवाद की बहस छिड़ी हुई है। यह प्रकारांतर से हिंदू धर्म पर हमला है। आप क्या कहेंगे?
00 पहली बात तो यह है कि दक्षिणपंथी का जो कट््टरवाद है वह हिंदुत्व से परे है। जो हिंदू धर्म को इससे जोड़ते हैं वे इसे खत्म करना चाहते हैं। कहने का अर्थ है कि हिंदू कभी कट््टरपंथी नहीं हो सकता।

-- एक दिवसीय धार्मिक आयोजनों में लाखों रुपए खर्च करना क्या तर्कसंगत है?
00 मोटे तौर पर तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी लोग भाव से ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन दिखावा या प्रभाव जमाने के लिए ऐसा करना बिल्कुल गलत है।

-- बाबा रामदेव प्रकरण पर आपकी क्या राय है?
00 बाबा रामदेव का तरीका बिल्कुल गलत है। मुझे कहीं न कहीं इसमें भाजपा और आरएसएस के हाथ होने की बू आ रही है। रामलीला मैदान में जो हुआ वह साधुओं के लिए शर्म की बात है। इसके लिए सीधे तौर पर रामदेव दोषी हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि राष्ट्र के लिए नहीं निजी महत्वकांक्षा के लिए रामदेव यह सब कर रहे हैं। देखिए, रामदेव विदेशों में जमा काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं और उसे सरकारी संपत्ति घोषित करने की मांग भी। साथ ही वे यह आरोप भी की सरकार भ्रष्ट है। वे देश की समृद्धि की वकालत कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि धन वापस लाने से देश समृद्धि नहीं होगा। देश तभी समृद्धि होगा जब लोग कठोर परिश्रमी, अनुशासनशील और ईमानदार होगें।

-- क्या आप अण्णा हजारे की मांग से सहमत हैं?
00 जहां तक अन्ना की बात है उनका तरीका और उनकी मांग रामदेव से कुछ भिन्न है। उनकी मांग पर भले ही असहमति जताई जा सकती है, लेकिन तरीके को गलत नहीं कहा जा सकता। रही बात भ्रष्टाचार की तो अन्ना की टीम में कई लोग हैं जो घेरे में हैं। अन्ना को देश को ठीक करने से पहले अपने घर यानी टीम में सुधार करना चाहिए।

-- कहते हैं जब-जब अधर्म बढ़ता है परमात्मा अवतार लेते हैं, भारत में भ्रष्टाचार रूपी अधर्म बढ़ रहा है क्या निकट भविष्य पर किसी चमत्कार की उम्मीद है?
00 धर्म विरोधी लोग हर युग में रहे हैं और अधर्म भी करते रहे हैं। बावजूद इसके धर्म सदियों से जीतता आया है। रावण (अधर्म) को राम (धर्म) ने मारा। इसी तरह कंश (अधर्म) का वध कृष्ण (धर्म) ने किया। निश्चित तौर पर रावण और कंश जैसे अधर्मी लोगों की तादाद बढ़ेगी, तो कोई ना कोई राम या कृष्ण के रूप में अवश्य इस धरती पर आएगा।

-- करीब छह साल बाद भाजपा में लौटी उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का अभियान छेड़ रखा है, क्या उन्हें सफलता मिलेगी?
00 कुछ पाने की तमन्ना से किए जा रहे काम को जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जो अभियान छेड़ा है। वह राजनीति लाभ के लिए है। आपको बता दूं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग सर्वप्रथम मैंने की थी। मैं तहे दिल से चाहता हूं कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो। उमा भारती मेरे मुद्दे को राजनीति लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।

-- सुना है मिशन पूरा न होने तक उन्होंने (उमा) मालपुआ न खाने का प्रण लिया है, क्या यह ठीक है?
00 कौन देखने जाता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।

-- यह सच्चाई है कि पढ़ी अधिक रामायण जाती है, लेकिन समाज में अधिक प्रभाव महाभाारत का दिख रहा है, ऐसा क्यों?
00 क्योंकि लोग रामायण केवल पढ़ते हैं, उसका मनन नहीं करते।

सूर्य और चन्द्रमा का रहस्यमय गन्धर्व विवाह


 Marriage of Sun & Moon
सौरऊर्जा, इलेक्ट्रोन और लिनोलेनिक एसिड का अलौकिक संबंध:-
डॉ. बुडविग इस युग की महान, स्पष्टवादी, निडर और विदुषी वैज्ञानिक रही हैं और इन्होंने सूर्य के फोटोन्स और मानव शरीर में इलेक्ट्रोन्स के आकर्षण और अनुराग को क्वांटम भौतिकी और जीवरसायन विज्ञान के परिपेक्ष में देवता सूर्य और देवी चन्द्रमा के रहस्यमय गन्धर्व विवाह की संज्ञा दी है। सूर्य और विभिन्न सितारों से निकला प्रकाश इस बृह्माण्ड में सबसे तेज गति से विचरण करता है। इस पूरी कायनात में प्रकाश  से तेज चलने वाली कोई वस्तु या किरण नहीं है। प्रकाश समय के साथ चलता है। क्वांटम भौतिकी के अनुसार सूर्य की किरणों के सबसे छोटे घटक या कण को क्वांटम या फोटोन कहते हैं जो अनंत हैं, शाश्वतहैं, सक्रिय हैं, सदैव हैं, ऊर्जावान हैं और गतिशील हैं। इन्हें कोई ताकत रोक नहीं सकती है। ये ऊर्जा का सबसे परिष्कृत रूप हैं, ये सबसे निर्मल लहर हैं। इनमें ब्रह्मांड के सारे रंग है। ये अपना रंग, प्रकृति और आवृत्ति बदल सकते हैं। जब दो फोटोन एक ही लय में स्पन्दन कर रहे हों तो कभी वे आपस में जुड़ कर अस्थाई और क्षणिक काल के लिए पदार्थ का एक छोटा सा रूप जिसे π0 कण कहते हैं बन जाते हैं। यह कण दूसरे ही क्षण टूट कर दो फोटोन्स के रूप में विभाजित हो जाता है और पुनः एक विशुद्ध लहर (द्रव्यमान रहित) का रूप ले लेता है। यह फोटोन्स की ऊर्जा (प्रकाश) से पदार्थ में और फिर पदार्थ से ऊर्जा में अवस्था परिवर्तन का निराला उदाहरण है। फोटोन्स को एक स्थान पर स्थिर करना असंभव होता है, यही सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of Relativity) का आधार है।


इलेक्ट्रोन्स परमाणु का घटक है और न्यूक्लियस के चारों ओर अपने निश्चित कक्ष में निश्चित आवृत्ति में सदैव परिक्रमा करते रहते हैं, सदैव सक्रिय, ऊर्जावान और गतिशील रहते हैं। इलेक्ट्रोन्स फोटोन्स से प्रेम करते हैं और इनका चुम्बकीय क्षेत्र अत्यन्त गतिशील फोटोन को अपनी ओर आकर्षित करता है, यदि वे एक ही लय में स्पन्दन कर रहे हों। जब भी कोई विद्युत आवेश गतिशील होता है तो एक चुम्बकीय क्षेत्र बनता है। गतिशील फोटोन का भी चुम्बकीय क्षेत्र होता है।  फोटोन्स की आवृत्ति, जिसे वह बदल सकते हैं, स्पन्दन कर रहे इलेक्ट्रोन्स की आवृत्ति के समकक्ष होने पर ही वे मिल सकते हैं और कक्ष में एक ही लय और ताल पर गुंजन करते हैं। यह प्रकृति का बहुत दिलचस्प और पवित्र नृत्य है जिसे वैज्ञानिकों ने भौतिक, जैविक, पारलौकिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण माना है।   

फोटोन सूर्य से निकलकर, जो 9.3 अरब मील दूर है, असीम ऊर्जा लेकर, जीवन की आस लेकर, प्यार की बहार लेकर, खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, अपनी लय, ताल व आवृत्ति बदल कर इलेक्ट्रोन, जो अपने कक्ष में निश्चित आवृत्ति पर सदैव परिक्रमा करते रहते हैं, की ओर आकर्षित होते हैं, साथ मिल कर नृत्य करते हैं और तब पूरा कक्ष समान आवृत्ति में दिव्य गुंजन करता है और असीम सौर ऊर्जा का प्रवाह होता है। यही है जीवन का असली फलसफा, प्रेम का उत्सव, यही है प्रकृति का संगीत। यही है फोटोन रूपी सूर्य और इलेक्ट्रोन रूपी चंद्र का पारलौकिक गंधर्व विवाह, यही है शिव और पार्वति का तांण्डव नृत्य, यही है विष्णु और लक्ष्मी की रति क्रीड़ा, यही है कृष्ण और राधा का अनंत, असीम प्रेम।

हमें सूर्य से बहुत प्रेम है और यह सिर्फ कोई संयोग नहीं है। हमारे शरीर की लय सूर्य की लय से इतनी मिलती है कि हम सूर्य की ऊर्जा का सबसे ज्यादा अवशोषण करते हैं। इसलिए क्वांटम वैज्ञानिक कहते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड सबसे ज्यादा सौर ऊर्जा या फोटोन मनुष्य के शरीर में ही होते हैं। यह क्षमता और बढ़ जाती है जब हम अत्यंत असंतृप्त वसा-अम्ल युक्त भोजन का सेवन करते हैं। इनमें भरपूर इलेक्ट्रोन्स होते हैं, जिनका विद्युत-चुम्बकीय प्रभाव सूर्य से निकले फोटोन्स को आकर्षित करता है। कई तेलों (जैसे अलसी) में जीवन ऊर्जा से भरपूर इलेक्ट्रोन्स होते हैं, जिनकी लय सौर-किरणों की लय के बहुत मिलती है। वैज्ञानिकों ने इन ऊर्जावान इलेक्ट्रोन-युक्त अत्यंत असंत्रप्त तेलों को जीवन के लिए परम आवश्यक माना है। उन्ही दिनों लालची बहुराष्ट्रीय संस्थानों ने शैल्फ लाइफ बढ़ाने की दृष्टि से विभिन्न रसायनों और उच्त तापमान की मदद से तेलों को परिष्कृत करना शुरू किया था।  तेलों के परिष्कृत करने की प्रक्रिया से तेलों में मौजूद सारे सजीव इलेक्ट्रोन्स नष्ट हो जाते हैं और बचता है मृत, प्लास्टिक-तुल्य, इलेक्ट्रोन विहीन तेल, जो न तो फोटोन्स को आकर्षित कर सकता है और ना ही श्वसन हेतु कोशिका में ऑक्सीजन को खीचने में सक्षम हैं। तब इन संस्थानों ने यह नहीं सोचा कि इसका मानव के स्वास्थ्य पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। आज आप और हम उनके कुकृत्य का परिणाम देख रहे हैं कि माटापा, मधुमेह, हृदयरोग, कैंसर, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस जैसे रोग महामारी का रूप ले चुके हैं।  लेकिन फिर भी सब चुप हैं।   

जब सूर्य की किरणें हरे-भरे पेड़ों के मंडवे या झुरमुट पर पड़ती है और प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) द्वारा अवशोषित होती हैं तो पेड़ में इलेक्ट्रोन्स प्रवाहित होते हैं।  पेड़ों में जल और इलेक्ट्रोन के प्रवाहित होने से चुम्बकीय क्षेत्र बनता है। आप यह जान चुके हैं कि स्वस्थ मनुष्य के शरीर में भरपूर इलेक्ट्रोन्स होते हैं और उसकी कोशिकाओं तथा ऊतकों में विद्युत प्रवाहित होने की क्षमता होती है। जब वह मनुष्य पेड़ों के झुरमुट से गुजरता है तो पेड़ों के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव से उसके शरीर के ऊतक विद्युत आवेश से भर जाते हैं। जब हमारे शरीर में रक्त बहता है और चुम्बकीय क्षेत्र में लाल रक्त-कण गुजरते हैं तो उनकी भित्तियों में विद्यमान असंत्रप्त वसा में भी विद्युत आवेश पैदा होता है। जब भी हृदय संकुचित होता है तो लसिका-तंत्र (Lymphatic System) से लसिका-द्रव्य (Lymph Fluid) की कुछ मात्रा, जिसमें भरपूर इलेक्ट्रोन-युक्त अत्यंत असंभप्त वसा होते हैं, रक्त प्रवाह में प्रवेश करते है और फिर हृदय में पहुँचते हैं। इससे हृदय की विद्युत संचालन शक्ति प्रोत्साहित और मजबूत होती है।  यह सब विद्युत चुम्बकीय तरंगों के नियमों के अनुसार ही होता है।

इस तरह मनुष्य एक ट्रांसमीटर की तरह कार्य करता है। मनुष्य की नाड़ियों की संरचना बेलनाकार होती है जिसमें कई परतें, गुच्छिका (Ganglia) होते हैं। विभिन्न तंत्रिकाओं (neurons) और वृक्षिका (dendrites) में  विद्युत विभव (electrical potential) भिन्न-भिन्न होता है। इसी कारण चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव से नाड़ियों में विद्युत धारा प्रवाहित होती हैं, जो विद्युत चुम्बकीय तरंगे छोड़ती है। जब कोई मनुष्य किसी के बारे में अच्छा सोचता है, तो उसके शरीर से विद्युत चुम्बकीय तरंगे निकलती हैं।  इन तरंगों को वही ग्रहण कर पाता है जिसकी लय उस व्यक्ति की लय के समकक्ष होती है। यहाँ एम्प्लीफायर और ट्रांसमीटर भी होते हैं जो इन तरंगों की कार्य प्रणाली में हस्तक्षेप करते हैं। यह क्वांटम औतिकी और  जीव रसायन विज्ञान ही दूरबोध (telepathy), मानसिक दूरबोध (mental telepathy),  सम्मोहन (hypnosis) आदि  का वैज्ञानिक आधार है। उत्तरी युरोप के अमुक कबीले के लोग (Nordic people) दूर दराज अपने व्यक्ति बात करने हेतु पेड़ों की मदद से आवाज का परिवर्धन (Amplify) करते थे। जैसे कोई स्त्री पेड़ से लिपट कर जोर से कहती है कि शहर से लौटते समय नमक लेते आना और शहर गये व्यक्ति को आभास हो जाता है कि पत्नि ने नमक मंगवाया है। इसका आधार भी विद्युत चुम्बकीय तरंगे ही है, जो मेक्सवेल के गणितीय सूत्र के अनुसार व्यवहार करती हैं।
  
जीवनशक्ति और अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ए.एल.ए)-

डॉ. योहाना बडविग ने फोटोन्स, इलेक्ट्रोन्स और आवश्यक वसा अम्लों के पारस्परिक संबन्धों की बड़ी अच्छी विवेचना की है। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण लिनोलिक अम्ल LA (cis- linoleic acid), लिनोलेनिक अम्ल ALA (cis- linolenic acid) और शरीर में इनसे बनने वाले इनसे भी ज्यादा असंत्रप्त वसा-अम्लों की अद्भुत सिस संरचना है। पौधों के एंजाइम्स में वसा-अम्ल की लड़ में तीसरे कार्बन के बाद द्वि-बंध (double bond) बनाने की क्षमता होती है, जब कि मनुष्य के एंजाइम्स नवें कार्बन के बाद द्वि-बंध बना सकते हैं। यदि वसा-अम्ल में एक से ज्यादा द्वि-बंध (double bond)  होता है  तो उसे बहु असंत्रप्त वसा (Poly Unsaturated Fatty Acid) कहते हैं। लिनोलिक अम्ल LA में दो कार्बन असंत्रप्त होते हैं अर्थात दो द्वि-बंध (double bond) होते हैं और लिनोलेनिक अम्ल ALA में तीन द्वि-बंध (double bond) होते हैं। दो द्वि-बंध के बीच तीन कार्बन की फासला होता है।

वसा-अम्लों की लड़ में विद्यमान ये असंत्रप्त द्वि-बंध सीधी लड़ को मोड़ देते हैं क्योंकि प्रकृति लड़ में एक ही तरफ के हाइड्रोजन परमाणु अलग करती है। इसे सिस विन्यास (cis- configuration) कहते हैं। यह वसा-अम्ल के भौतिक और रसायनिक गुणों को बदल देता है। मुड़ने के कारण वसा-अम्लों की लड़ आपस में धुलती नहीं है, बल्कि आपस में फिसलती हैं और सामान्य तापमान पर तरल रहती हैं। जबकि संत्रप्त वसा-अम्लों (जैसे मक्खन, धी, वनस्पति धी या नारियल का तेल) की लड़ें आपस में चिपकती हैं और सामान्य तापमान पर ठोस रहती हैं। आवश्यक वसा-अम्लों में ऋणात्मक आवेश रहता है और ये सतह की बढ़ने की कौशिश करते हैं। इस गुण को सरफेस एक्टिविटी कहते हैं। सरफेस एक्टिविटी के कारण ही ये वसा-अम्ल टॉक्सिन्स को त्वचा, आँत, गुर्दा और फेफड़ों की सतह तक पहुँचा देते हैं, जहाँ उनका विसर्जन हो जाता है।  आवश्यक सिस असंत्रप्त वसा-अम्ल रक्त वाहिकाओं में जमा नहीं होते हैं और उन्हें अवरुद्ध नहीं होने देते हैं।

सिस विन्यास के कारण वसा-अम्ल की लड़ के मोड़ में इलेक्ट्रोन्स एक झुन्ड या बादल के रूप में जमा हो जाते हैं। इन्हें पाई-इलेक्ट्रोन्स  (pi-electrons)  कहते हैं। इलेक्ट्रोन के इस बादल में अपार विद्युत आवेश रहता है जो सूर्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड से आनेवाले प्रकाश की किरणों के सबसे छोटे घटक फोटोन को आकर्षित करते हैं, अवशोषण करते हैं। ये पाईइलेक्ट्रोन ऊर्जा का संग्रहण करते हंह और एक एन्टीना की तरह काम करते हैं। इन बादलों का विद्युत बल ऑक्सीजन को आकर्षित करने की क्षमता रखता है और प्रोटीन्स को झिल्लियों में पकड़े रहता है।  कोशिका की भित्तियों में वसीय माध्यम होता है जबकि दोनों तरफ जलीय माध्यम होता है। इन पाई-इलेक्ट्रोन्स  (pi-electrons) के कारण वसा-अम्ल भित्ति में फेज़ बाउन्डरी विद्युत विभव उत्पन्न होता है। केपेसिटर की भांति यह विद्युत आवेश नाड़ी, मांस पेशी, हृदय और भित्तियों की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक विद्युत धारा प्रवाहित करता है।

शरीर के अहम अंग जैसे मस्तिष्क, दृष्टि पटल (रेटीना), आंतरिक कर्ण, एड्रीनल और वृषण को सुचारु रूप से कार्य करने के लिए बहुत शक्ति, ऊर्जावान सक्रिय इलेक्ट्रोन्स और ऑक्सीजन की जरूरत होती है, जो उन्हें आवश्यक वसा-अम्ल से ही प्राप्त होती है। आवश्यक वसा अम्ल शरीर में जीवन ऊर्जा के उन्मुक्त प्रवाह के लिए अत्यंत जरूरी है।   

पौधों की गहरी हरी पत्तियों मौजूद तेल में आधा लिनोलेनिक अम्ल होता है (हरी पत्तियों में तेल की मात्रा एक प्रतिशत या कम होती है)।  क्लोरोप्लास्ट नामक कोशिकाओं की भित्तियों में लिनोलेनिक अम्ल की मात्रा और अधिक होती है, जहाँ प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया संपन्न होती है। यहाँ पाई-इलेक्ट्रोन्स सौर-ऊर्जा को बीजों में रसायनिक ऊर्जा के रूप में  संरक्षित करते हैं और बीजों के सेवन करने पर लिनोलेनिक अम्ल ALA  से यह ऊर्जा हमें प्राप्त होती है।  शरीर में पाई-इलेक्ट्रोन्स की मात्रा बढ़ने से जीवन ऊर्जा बढ़ती है जो उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर तेज मस्तिष्क में होने वाली सारी कार्य-प्रणाली के लिए आवश्यक है।

स्वस्थ मानव शरीर में भरपूर इलेक्ट्रोन्स होते हैं, उसमें सूर्य के फोटोन्स को आकर्षित और संचय करने की क्षमता भी सबसे ज्यादा होती है। उसके ऊतकों में भरपूर अत्यंत असंत्रप्त वसा अम्ल तथा ऑक्सीजन रहती है, सारी जीवन क्रियाएं सुचारु रूप से संपन्न होती है, वह सदैव ऊर्जावान तथा निरोगी रहता है वह सदैव भविष्य में आगे की ओर अग्रसर होता है। इसे मानुष की संज्ञा दी गई है और इसके विपरीत अमानुष की  भी परिकल्पना की गई है। अमानुष में सूर्य के फोटोन्स की लय में लय मिला कर आकर्षित करने वाले इलेक्ट्रोन्स बहुत ही कम होते हैं, वह ऊर्जाहीन तथा कमजोर होता है, उसकी जीवन क्रियाएं शिथिल हो जाती हैं, उसके विचार और सोच नकारात्मक हो जाती है और वह विभिन्न रोगों से ग्रस्त रहता है और जीवन रेखा में  भूतकाल की ओर गमन करता है। भौतिकी और गणित की दृष्टि से क्षय किरणें, गामा किरणें, परमाणु बम, कोबाल्ट रेडियेशन आदि मानव स्वाथ्य के लिए घातक हैं, शरीर के सजीव इलेक्ट्रोन्स को नष्ट करती हैं, शरीर की जीवन क्रियाओं को शिथिल कर देती हैं  और उसे अमानुष बनाती है यानि भूतकाल की ओर धकेलती हैं। आधुनिक भौतिकशास्त्र के सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार जीवन रेखा, समय तथा बृह्माण्ड एक ही समीकरण पर आधारित है। अमानुष भूतकाल की ओर गमन करता है। सूर्य के गतिशील फोटोन्स तथा इलेक्ट्रोन्स का अन्तर्सम्बंध मानव शरीर में विभिन्न कौशिकीय जीवन क्रियाओं को सम्पूर्ण करता है और मानव भविष्य की दिशा में बढ़ता है।

डॉ. बडविग ने उपरोक्त संदर्भ में  फैट्स की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण माना है। भोजन में विद्यमान असंत्रप्त फैट्स में भरपूर इलेक्ट्रोन्स होते हैं जो जीवनदायक प्राणवायु ऑक्सीजन को आकर्षित करते हैं। लेकिन जबसे मनुष्य ने इलेक्ट्रोन युक्त असंत्रप्त वसा को छोड़ कर ट्रांस फैट्स से भरपूर और सजीव इलेक्ट्रोन्स रहित रिफाइंड तेल और हाइड्रोजिनेटेड फैट खाना शुरू किया है, तबसे ये फैट भविष्य की ओर अग्रसर जीवन्त मानुष को भूतकाल के गर्त में ले जाते हैं। ये मारक वसा शरीर में टार या प्लास्टिक की भांति व्यवहार करते हैं, प्रोटीन से जुड़ नहीं पाते हैं, ऑक्सीजन को आकर्षित नहीं कर पाते हैं,  विद्युत प्रवाह में कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं और शरीर की श्वसन क्रिया और सारी जीवन प्रणालियों को शिथिल करते हैं।  इस तरह ये मारक वसा हमें भूतकाल की तरफ ले जा रहे हैं, दुर्बल तथा रुग्ण बना रहे हैं, कैंसर जैसे रोग का शिकार बना रहे हैं, अमानुष बना रहे हैं।  

जिस भोजन से उसके इलेक्ट्रोन्स की दौलत नष्ट कर दी गई हो वह हमें अमानुष बनाता है, भूतकाल की ओर ले जाता है और कैंसर का शिकार भी बनाता है। ठोस परिर्तित, परिष्कृत और हाइड्रोजिनेटेड वसा इस श्रेणी में आते हैं। दूसरी ओर इलेक्ट्रोन युक्त पोषण, इलेक्ट्रोन्स से भरपूर सजीव असंत्रप्त वसा और स्वादिष्ट फल शरीर में सौरऊर्जा का अवशोषण, संचय और उपयोगिता बढ़ाते हैं।

मेरा उपचार लेने के बाद जब रोगी धूप में लेटते थे तो वे नई ऊर्जा और ताजगी महसूस करते थे। दूसरी ओर आजकल हम देखते हैं कि धूप में लोगों के हार्ट फेल हो रहे हैं, हार्ट अटेक हो रहे हैं। स्वस्थ मानव में यकृत, अग्न्याशय, वृक्क, मूत्राशय आदि ग्रंथियों की स्रवण क्षमता पर सूर्य के चमत्कारी प्रभाव को हम महसूस कर सकते हैं। लेकिन यदि शरीर में सजीव, इलेक्ट्रोन युक्त, अत्यंत असंत्रप्त वसा अम्लों का अभाव है तो उपरोक्त ग्रंथियों पर सूर्य प्रतिकूल प्रभाव डालेगा और ये सूखने लगेंगी। डॉक्टर कैंसर के रोगी को कहते हैं कि सीधी सूर्य की रोशनी से बचें। एक तरह से यह सही भी है। लेकिन वे डॉ. बडविग का आवश्यक वसा से भरपूर आहार शुरू करते हैं, दो या तीन दिन बाद ही उनको धूप में बैठना सुहाना लगने लगता है, सूर्य जीवन की शक्तियों को जादू की तरह उत्प्रेरित करने लगता है और शरीर दिव्य ऊर्जा से भर जाता है। - डॉ. योहाना बडविग, द फैट सिन्ड्रोम एण्ड द फोटोन्स दि सोलर एनर्जी।

व्यापार के धनाड्य मसीहाओं द्वारा डॉ. बडविज को प्रताड़ित करना -

डॉ. बडविग ने अपने परीक्षणों से ये सिद्ध कर दिया था कि मार्जरीन, जिसे मछली या तेलीय बीजों से निकले असंत्रप्त तेलों को उच्च तापमान पर गर्म करके बनाया जाता है, घातक ट्रासंफैट से भरपूर होता है और हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है। मार्जरीन हमें कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज, मोटापा, आर्थाइटिस आदि रोगों का शिकार बनाते हैं। वे अपने शोध-पत्र विभिन्न स्वास्थ्य पत्रिकाओं में प्रकाशित कर रही थी और लोगों को मार्जरीन के खतरों अवगत करवा रही थी। डॉ. बडविग की निर्भीकता, स्पष्ट-वादिता और सच बोलने की आदत से व्यापार के धनाड्य मसीहा बड़े चिन्तित थे। उन्हें डर था कि बुडविज की शोध मार्जरीन की बिक्री को चौपट कर देगी। यहाँ मसीहा से मतलब स्वार्थ के लिए विज्ञान पर नियन्त्रित रखने वाले अमीर बहुराष्ट्रीय संस्थानों से है। मार्जरीन बनाने वाली कम्पनियों ने डॉ. बुडविग को रिश्वत में ढेर सारी दौलत और एक दवा की दूकान देने की कौशिश की, पर बुडविज ने रिश्वत लेने से स्पष्ट मना कर दिया।

डॉ. बडविज को प्रताड़ित करने के लिए मार्जरीन बनाने वाली कम्पनियों ने बड़े बड़े षड़यंत्र रचे, उनकी प्रयोगशाला छीन ली गई और जरनल्स में उनके शोध-पत्रों के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात थी, जबकि वह कई अस्पतालों से संलग्न थी और वह बहुत बड़े सरकारी ओहदे पर थी। उसका कार्य हमारे शरीर पर नई दवाओं और फैट्स के दुष्प्रभावों का अध्ययन करना और उन्हें प्रमाणित करना था। इस तरह बुडविग ने निडर होकर देश और दुनिया के प्रति अपना फर्ज़ निभाया। सन् 1953 में उन्होंने सरकारी पद छोड़ दिया और अपनी क्लीनिक खोल कर कैंसर के रोगियों का उपचार करना शुरू कर दिया। और इसके साथ ही फैट्स पर हो रही शोध पर लगभग लंबा विराम लग गया है।

प्राचीन काल से कई धर्म-शास्त्रियों और दार्शनिकों ने ईश्वर और मन की बादल के रूप में व्याख्या की है। इन दार्शनिकों में ईश्वर को शरीर, मन और आत्मा (body, spirit and soul) का पवित्र संगम माना है, ठीक उसी प्रकार जैसे त्रिवेणी पर गंगा, जमुना और सरस्वती के संगम को एक पवित्र तीर्थ माना गया है।  तत्व, ऊर्जा और मस्तिष्क (matter, energy and mind) के दार्शनिक मिलन की त्रिवेणी को मनुष्य माना है।  वैज्ञानिकों ने इन सिद्धांतों का बहुत अध्ययन किया है। इसी तरह इलेक्ट्रोन, फोटोन और पाई-क्लाउड के पारस्परिक क्रिया-कलाप से जीवन-ऊर्जा मिलती है। 

डॉ. बुडविग का क्वाटम विज्ञान

मैं चाहता हूँ कि मेरे "लोथर हरनाइसे के तीन इक्के (3E Program)" लेख पर डॉ. द्विजेन्द्र जी की महत्वपूर्ण टिप्पणियां आपसे साझा करूँ। और उनको धन्यवाद भी दूँ। 



Blogger Dr Dwijendra said...
oorjaa aur aatma ek jaisi hi hain . aatma bhi na to marti hai aur na wet hoti .na sookhti hai . aprabhaavit rahti hai.
dusri baat -
geeta me kahaa gaya hai
yuktaahaarvihaarasy
yuktacheshtasy karmasu
yukt swapnaavbodhasy
yogo bhavati dukhahaa..
means -
jo aadmi sahi samay par sahi kaanaa peenaa aur sona aur jaagne ka kaam karta hai wo yogi hota hai aur usko kabhi takleef nahi hoti.
31/1/12 7:05 PM
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Blogger Dr Dwijendra said...
god ko bhi bhaartiya upnishad me aur bhartiy dharm granthon me prakaash yani light jaisa bataaya gayaa hai . oorjaa bhi prakaash swaroop hi hai.
31/1/12 7:07 PM
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Blogger Dr Dwijendra said...
aapki is report ke liye thanks a lot.good and true facts.
31/1/12 7:08 PM
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Blogger Dr. O.P.Verma said...
आदरणीय डॉ. द्विजेन्द्र जी,

आपकी सटीक प्रतिक्रिया के लिए आभार। आपने बिलकुल ठीक कहा है। यदि बुडविग द्वारा विकसित की गई क्वाण्टम भौतिकी पर शोध जारी रहती तो आज हम धर्म, आत्मा, परमात्मा, ज्योतिष, रत्न विज्ञान, पराविज्ञान, टेलीपैथी, सम्मोहन और अन्तरिक्ष विज्ञान के अनगिनत रहस्यों का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण ढ़ूँढ़ पाने में सफल हो सकते थे।
डॉ. ओम
2/2/12 8:12 AM  

1.2.12

लप्रेक गुलाबी ताजमहल


तुमको मेरे शहर जाना था, सो मैंने तय किया कि रास्ते में ही, मैं तुम्हारे साथ हो लूंगा। तुम  मुझे ट्रेन में मिल गयी थीं। बीते दिनों की मेरी यादों  की तरह ही  ट्रेन ने भी रफ्तार पकड़ ली थी। तभी सामान बेचता हुआ फेरी वाला आ गया। हम लोगों के पास आकर रुकते हुये, उसने सभी यात्रियों से पेपर वेट के अन्दर झांकते ताजमहल को खरीदने की गुजारिश की थी। लेकिन वह पल भर भी नहीं रुका था, जब मैंने कह दिया था कि तुम्हारे ताजमहल को खरीद कर क्या करुंगा? मैं अपने साथ जीता-जागता ताजमहल लेकर जा रहा हूं। यह सुनकर तुम्हारा चेहरा सुर्ख गुलाबी हो गया था और मेरी तरह ही सभी सहयात्रियों ने पहली बार संगमरमरी ताज को गुलाबी होते हुये देखा था।

  • रवि कुमार बाबुल

क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?


क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?

क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?

यह सवाल खड़ा किया है भविष्य में भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना (दिवास्वप्न ) देखने वाले 
युवा ने .जो लोग इस बयान की तरफदारी करते हैं वो तथाकथित धर्म निरपेक्ष हो सकते हैं.

क्या हिन्दू हित की बात करना मुस्लिम विरोध करना है ?इस देश का हिन्दू यदि अपने देश में अपने 
हित की बात नहीं सोचेगा तो क्या पाक में जाकर सोचेगा .

कश्मीरी हिन्दू शरणार्थियों की कोई बात नहीं करता है?क्यों? क्या कश्मीर में पैदा होना ही उनका 
गुनाह है .१९९० से आज तक उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में दर-दर भटकना पड़ रहा है ?
क्या किया हमारी धर्म निरपेक्ष सरकार ने उनके लिए ?क्या मुस्लिम चाटुकारिता ही धर्म निरपेक्षता  
 है .ऐसी धर्मनिरपेक्षता से क्या भला होगा हमारे वतन का ?आज इस देश का नाम हिन्दुस्थान 
यदि सुनना है तो पाक चेनल या रेडियो सुनना पडेगा ,हमारे यहाँ तो "हिन्दुस्थान "नाम लेना  भी 
सांप्रदायिक हो सकता है .

करोडो हिन्दुओ पर शासन करने का सपना है उनका,किसकी बदोलत ?हिन्दुओ का जाती आधारित 
वर्गीकरण करके तथा अल्पसंख्यक वोट बैंक को मिला कर शासन करना क्या धर्म निरपेक्षता है?

इस देश में तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकारे रही है उन्होंने क्या किया अल्पसंख्यक समाज के लिए ?
सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए किसी कौम को गुमराह करते रहना क्या धर्म निरपेक्षता है?क्या ऐसी धर्म 
निरपेक्षता स्वीकार की जानी चाहिये जो विभिन्न धर्मो में वैमनस्य फैलाये,किसी धर्म विशेष के लोगो 
में जातिगत भेदभाव फैलाये .

राष्ट्रिय स्वयसेवक संघ ने कब सत्ता के लिए चुनाव लड़ा ?संघ ने कब "फतवे" जारी किये ?संघ ने कब
मुस्लिम विरोध किया ?संघ ने राष्ट्र प्रेमी मुस्लिम  को स्वीकार किया है ,मानवता प्रेमी इसाई को
स्वीकारकिया है .इस देश की प्रगति के साथ जुड़े हुए हर कौम के लोगो के साथ संघ हर समय खड़ा
रहता है .

जो लोग इस देश में रहकर भी इस देश के होना नहीं चाहते ,जो लोग इस देश में रहकर भी हिन्दुओ 
का धर्म परिवर्तन करने की नापाक कोशिश करते हैं जो लोग धर्म और बहुसंख्यक समुदाय का खोटा
भय दिखाकर खुद का स्वार्थ साधना चाहते हैं वो लोग विकृत सोच के जीव हैं ऐसे लोग ना तो किसी 
कौम का भला करते हैं ना ही हिन्दुस्थान का भला करने वाले हैं .      

31.1.12

नेता जी क्या कहते हैं ?






नेता जी क्या कहते हैं ? 


जिस जनता की खातिर 
हम तिल-तिल कर हैं मरते ,
सरकारी गाड़ी में हम 
दौरे करते फिरते ;
वो जनता जब  देती  ताने 
वो भी सहते हैं ,
नेता जी क्या कहते हैं ?

वोट के बदले नोट हैं देते 
उन्हें पिलाते दारू ,
सत्ता-दूध इसी से मिलता 
जनता गाय दुधारू ;
ये जो रूठे;सपने टूटे 
आंसू बहते हैं ,
नेता जी क्या कहते हैं ?

मीठे-मीठे भाषण देकर 
झूठे करते वादे ;
घोटाले करते रहते 
वैसे हैं सीधे-सादे ;
सत्ता पाकर सत्ता-मद में 
डूबे रहते हैं ;
नेता जी क्या कहते हैं ?

ए. सी. रूम  के भीतर  
नीति  निर्धारित करते 
लूट के जनता का पैसा 
अपने घर में भर लेते ;
जनता जूते मारे तब भी 
हम हँस देते हैं ;
                                                     शिखा कौशिक 

ब्लॉग- पहेली-१२


ब्लॉग- पहेली-१२

इस बार दिए गए हैं तीन ब्लोगर्स  के परिचय  .आपको  बताने हैं इनके नाम .सर्वप्रथम  व् सही जवाब देने पर बन सकते हैं आप ''विजेता '' तो देर किस बात की है?


                       शुभकामनाओं के साथ 
                                   शिखा कौशिक 

सरस्वती के उद्दंड बेटे-ब्रज की दुनिया

मित्रों,वक़्त को आते हुए तो सभी देखते हैं पर कब वह चुपके से,दबे पांव सरक लेता है कोई नहीं जान पाता.देखते-देखते नववर्ष और मकर-संक्रांति की तरह ही वसंत पंचमी भी गुजर गयी और साथ ही सरस्वती पूजा भी.फिर शुरू हुआ विद्या और विवेक की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती की प्रतिमाओं को विसर्जित करने का सिलसिला.सरस्वती-पुत्र जुलूस की शक्ल में सड़कों से गुजरने लगे.ठेले पर देवी की प्रतिमा सबसे पीछे,उसके आगे भारी-भरकम साउंड बॉक्सों से लैस ट्रॉली और सबसे आगे शराब के नशे में धुत्त,अश्लील-फूहड़ गानों की बेहूदा धुनों पर लड़खड़ाते हुए नृत्य-जैसा कुछ करते सरस्वती के बेटे अथवा भक्त.कई बार तो जी में आया कि लाठी उठाऊँ और एक सिरे से सबकी पिटाई कर दूं परन्तु परिणाम की सोंचकर हर बार गुस्से को जज्ब कर गया.
                        मित्रों,लगभग पूरे बिहार से इस समय प्रतिमा-विसर्जन के दौरान नदियों-तालाबों में युवकों के डूबकर मारे जाने की ख़बरें आ रही हैं.क्या जरुरत है खतरा मोल लेकर ज्यादा गहरे पानी में प्रतिमा  को विसर्जित करने की?यहाँ तक कि खचाखच भरी नावों में भी इन नशेड़ियों की उच्छृंखलता नहीं रूकती जिसका परिणाम होती है जानलेवा दुर्घटनाएं.जुलूस के रास्ते में भी इनका रवैया निहायत अफसोसनाक होता है.कभी-कभी ये लोग रास्ते में वैध-अवैध आग्नेयास्त्रों से गोलीबारी भी करते चलते हैं.कल कुछ इसी तरह की एक दुखद घटना में सहरसा में रेशमा नाम की एक लड़की मारी गयी.इसी तरह की एक और हिंसात्मक घटना में मुजफ्फरपुर में विवेक नाम के एक सरस्वती-भक्त की दूसरे भक्तों ने चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी.
                         मित्रों,आप सोंच रहे होंगे कि इस तरह की घटनाएँ क्यों हो रहीं है?निश्चित रूप से इसके लिए हमारी दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली और समाज का नैतिक-स्खलन तो जिम्मेदार हैं ही हमारे द्वारा दिया गया चंदा भी कम दोषी नहीं है.हम चंदा तो दे देते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि हमारे बच्चे उन पैसों का कर क्या रहे हैं जबकि यह हमारा ही कर्त्तव्य है.हम उन्हें चंदा देते हैं पूजा-पाठ में खर्च करने के लिए और वे जनाब उसका शराब पी जाते हैं.इतना ही नहीं कभी-कभी तो हमारे द्वारा प्रदत्त राशि से नृत्यांगनाएं भी बुलाई जाती हैं और उनसे कामुक और भौंडे नृत्य कराए जाते हैं.भगवान वैद्यनाथ की नगरी देवघर की  एक ऐसी ही घटना इनदिनों खूब चर्चा में है.आश्चर्य है कि ये लोग जाहिर तौर पर पूजा तो कर रहे हैं बुद्धि और विवेक की देवी सरस्वती की और कर रहे हैं बुद्धि और विवेक के सबसे बड़े शत्रु मदिरा का सेवन और अर्द्धनग्न स्त्रियों का साक्षात् दर्शन.मुझे नहीं लगता कि जिन स्थानों पर टिंकू जिया,शीला की जवानी और उ लाला उ लाला जैसे अतिअश्लिल गीत बजे जाते हैं वहां माता सरस्वती का क्षण भर भी टिक पाना संभव होता होगा.
                                       क्या सरलता,सादगी और पवित्रता की देवी की अर्चना सरल सामग्री-साधनों द्वारा,बिना किसी तड़क-भड़क के और सरल-सच्चे मन से नहीं की जानी चाहिए?अन्यथा पूजा का कोई मतलब भी नहीं रह जाता क्योंकि कोई भी पूजा अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए की जाती है न कि दिखावे,प्रदर्शन और अपने उच्छृंखल मन को संतुष्ट करने के लिए.सरस्वती पूजा कोइ आप युवा सरस्वती-पुत्रों की ईजाद नहीं है.पूजा हमने भी की थी.तब यानि आज से कोई २५ साल पहले हम अपने नाजुक कन्धों पर उठाकर देवी को १० किलोमीटर दूर बांदे करनौती से जगन्नाथपुर लाया करते थे.कोई लाउडस्पीकर या साउंड बॉक्स नहीं होता था पूजा-स्थल पर.विसर्जन के समय भी हम प्रतिमा को अपने कन्धों पर ही उठाते थे और गाँव के प्रत्येक अमीर-गरीब के घर के सामने रखते थे ताकि महिलाएँ देवी को विधिवत-पुत्रीवत खोईछा भरकर विदाई दे सकें.तब सूरज पासवान की कमर में ढोलक बंधा होता था और जयलाल रविदास अति मधुर और भक्ति-भीना स्वर में 'हंसा पर सवार हे माता,हंसा पर सवार हे' गाते चलते थे.साथ में हम जैसे अन्य युवा-किशोर झाल-करताल बजा-बजाकर संगत करते चलते थे.कहीं कोई उच्छृंखलता या अश्लीलता नहीं;चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ भक्ति का पवित्र वातावरण.क्या वह युग फिर से वापस नहीं आ सकता?अगर नहीं तो क्यों नहीं?बंद करिए लाउडस्पीकर,डीजे और म्युजिक ट्रॉली का प्रयोग.उठाईये ढोलक और झाल-करताल.शराब पीना और अश्लील सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तो निर्विकल्प रूप से बंद होना ही चाहिए.अंत में,मेरी सरस्वती के सभी उद्दंड पुत्रों से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि जो हुआ सो हुआ आगे से अगर वे सचमुच माता सरस्वती को प्रसन्न करना चाहते हैं तो इन बातों का अवश्य ख्याल रखेंगे.लेकिन क्या मेरे युवा-किशोर अनुज मेरी यानि सरस्वती के इस तुच्छ साधक की सुनेंगे?

30.1.12

पचपन और बचपन


पचपन की उम्र का सेहरा पहने मिश्रा जी बगीचे में अकेले बैठे उबासी ले रहे थे। तभी उनका पाँच वर्ष का पौता, करन कुछ टूटे हुए खिलौने लिए भागा-भागा उनके पास आया और चिल्लाते हुए बोला, ‘‘ दादा जी बचाओ-बचाओ दादा जी। मम्मी मेरे खिलौने कबाड़ी वाले को दे रही हैं। ये मेरे खिलौने हैं, मैं नही दूँगा इन्हें।’’ रूआँ सा करन दादा जी के पीछे खुद को छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था और खिलौने वाले हाथों को अपनी कमर के पीछे छिपा रहा था।
‘‘क्या हुआ बहू? क्यों ले रही हो इसके खिलौने?’’, दादा जी ने पूछा।
‘‘पिताजी! ये सारे टूटे हुए खिलौने हैं। मैं कह रही हूँ कि इन्हें छोड़ दे, हम इससे भी अच्छे नये खिलौने इसे दिला देंगे। पर ये है कि मानता ही नही। पुराने-टूटे खिलौनों से घर भर रखा है।
करन, बेटा नये खिलौने ले लेना........इन्हंे मम्मी हो दे दो। मैं तुम्हें बिलकुल ऐसे ही नये खिलौने दिला दूँगा।
नहीं दादा जी, मुझे इन्हीं से खेलना है। मैं नहीं दूँगा।
अच्छा बहू, रहने दो। मत दो इसके खिलौने। खेलने दो इन्ही से इसे।
परेशान मम्मी वापस लौट जाती हैं।
अच्छा करन! ज़रा दिखा तो क्या खिलौने हैं तेरे पास, जिनके लिए तू मम्मी से इतना लड़ रहा था।
दिखाऊँ? मासूमियत से पूछते हुए करन ने एक टूटा ट्रक, कुछ तिल्लीनुमा लकड़ी, एक कपड़ा और पतंग का मंज्ज़ा आगे बढ़ा दिया।
दादा जी भी उस सामान को देखकर हैरान थे। परन्तु खिलौनों के प्रति करन का अनुराग देखकर उनकी उन खिलौनों में उत्सुकता बढ़ गई।
करन, इनसे खेलोगे कैसे?
आप खेलोगे दादा जी मेरे साथ?
हाँ-हाँ, क्यों नही! बताओ कैसे खेलना है?
मैं बताता हूँ। पहले तो आप ये स्टिक पकड़ो। अब इन्हें है ना इस ट्रक के चारों कोना पर लगाओ। इन छेदों में इन्हें लगा देते हैं। अब उस मंज्ज़ा से है ना इन स्टिक्स् को बाँधो, नी तो ये गिर जायेंगी। अब ये कपड़ा इन स्टिक्स् पर ऐसे लगा दो। ये बन गया हमारा घर। देखो दादा जी अच्छा है ना? और पता है ये चल भी सकता है।
दादा जी हैरान, करन को देख रहे थे। बच्चों के जो खिलौने हमारे लिए व्यर्थ का सामान होते हैं उन्हें लेकर कितनी कल्पनाएँ उनके संवेदनशील संसार में होती हैं। कैसा अद्भुत सान्निध्य उन सड़क पर ठोकर खाने वाले पत्थरों के प्रति, जो इनकी दुनिया में आकर सुंदर इमारत का रूप धर लेते हैं। ये बच्चें ही तो हैं जो पुरानी निर्जीव चीजों में से भी व्यर्थ का विशेषण हटा, उनके महत्व को बढ़ा देते हैं अन्यथा आज तो जीवित प्राणी भी का अस्तित्व भी अर्थहीन हो चला है। तभी तो पचपन का बचपन को किया गया प्यार लौटाने का समय आता है तो बचपन पचपन से उकता जाता है।
दादा जी के एकाग्रता के तार को करन की आवाज ने झनकारा और ‘चलो दादा जी खेलते हैं’ का सुर उत्पन्न हुआ। और एक बार फिर बचपन-पचपन का खेल प्रारम्भ हो गया।

सृजन पथ: आज शहीद दिवस है

सृजन पथ: आज शहीद दिवस है: आज शहीद दिवस है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बलिदान दिवस।गांधीजी के अवदान को लेकर तमाम बातें की जा सकती हैं पर शांति ,अहिंसा और प्रेम का ...