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16.9.14

क्या अभी भी भारतीय सैनिकों पर पत्थर फेंकेंगे कश्मीरी?-ब्रज की दुनिया

16 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,रहीम कवि ने कहा है कि
रहिमन बिपदा हूँ भलि जो थोड़े दिन होय,
हित अनहित या जगत में जानि पड़े सब कोय।
कश्मीर के अधिकतर भागों में इन दिनों अचानक सांप्रदायिक सद्भाव कायम हो गया है। क्या मस्जिद,क्या मंदिर और क्या गुरूद्वारा हर जगह हिन्दू,मुसलमान और सिक्ख एकसाथ रह रहे हैं और एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। काश ऐसी एकता बिना आपदा के आए हुए हमेशा बनी रहती! कश्मीर के जलने का बस एक ही कारण है कि कश्मीर मुसलमानबहुल है और मुसलमानों को अपने पंथ के अलावे अन्य कोई पंथ स्वीकार्य ही नहीं है। बाँकी पूरे भारत में जहाँ हिन्दू बहुमत में हैं हिन्दुओं को मुस्लिम सहित दूसरे पंथ के लोगों से कोई परेशानी नहीं है लेकिन मुस्लिमबहुल होने के कारण कश्मीर में पिछले 3 दशकों से अलगाववाद की हवा चल रही है। इसी अलगाववाद ने और इसी विचारधारा ने एक सदी पहले कहा था कि हिन्दू और मुस्लिम दो पंथ नहीं दो राष्ट्र हैं और इसलिए एक देश में एकसाथ नहीं रह सकते  और 1947 में भारत का झूठा धार्मिक और राजनैतिक विभाजन करवाया था जबकि वास्तविकता यह है कि 1947 में मुसलमानों के लिए अलग बने देश पाकिस्तान में जितने मुसलमान हैं आज भी हिन्दूबहुल भारत में उससे कहीं अधिक मुसलमान हैं और अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं और सुखी और समृद्ध हैं। यह एक कटु सत्य है कि कुछ दिन पहले तक कश्मीरी लोग भारतीय सेना को देखते ही उन पर पत्थरबाजी करने लगते थे और 15 अगस्त और 26 जनवरी को भारत की शान तिरंगे को फहराने के बदले वे लोग जलाते हैं।
मित्रों,पिछले कई दिनों से कश्मीर में जबसे 109 सालों में सबसे भयानक प्राकृतिक आपदा आई है तभी से कश्मीर घाटी में न तो राज्य सरकार के तंत्र का कहीं अता-पता है और न ही उन अलगाववादियों का ही जो खुद के कश्मीर का वास्तविक रहनुमा होने का दावा करते हैं। इनमें दो पाकिस्तानपरस्तों यासीन मलिक और अहमद शाह गिलानी की तो जान भी उसी भारतीय सेना ने बचाई है जिस पर पत्थर फेंकने के लिए वे लोग कश्मीरियों को उकसाया करते हैं। आज अगर कश्मीरी इस भयंकर विपदा में भी महफूज हैं,जीवित हैं और स्वस्थ हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारे सैनिक बिना सोये,बिना थके दिन-रात उनकी जान बचा रहे हैं और दिन-रात उन तक खाने-पीने के सामान के अलावा दवाइयाँ पहुँचा रहे हैं। उस पर कहीं-कहीँ  कश्मीरियों ने सेना के हेलीकॉप्टर और जहाजों पर पत्थर फेंके हैं फिर भी कश्मीर में केंद्र सरकार और सेना की ओर से अभूतपूर्व तरीके से पूजा-भाव से राहत का काम किया जा रहा है। भारत सरकार के सारे वरिष्ठ अधिकारी इस समय दिल्ली छोड़कर कश्मीर में हैं और राहत-कार्यों की निगरानी कर रहे हैं। यहाँ तक कि भारत के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अपील की है कि वे 17 सितंबर को उनका जन्मदिन नहीं मनायें बल्कि जम्मू-कश्मीर के लिए योगदान करें।
मित्रों,टेलीवीजन पर इन दिनों आपदा-पीड़ित कश्मीरियों के जो बयान आ रहे हैं वे इस बात की तस्दीक करते हैं कि कश्मीरियों की इन दिनों अगर कोई मदद कर रहा है वह भारतीय सेना है। शायद यही कारण है कि इन दिनों श्रीनगर में लोगों को हिन्दुस्तानी सेना जिंदाबाद के नारे लगाते हुए देखा जा रहा है। यह एक अद्भुत क्षण है क्योंकि यह सब उस श्रीनगर में देखने को मिल रहा है जहाँ के लोग कुछ दिन पहले तक ही भारतीय सैनिकों को देखते ही पत्थर चलाने लगते थे। कश्मीरी तो कश्मीरी आपदा के समय घाटी में मौजूद पाकिस्तानी सांसदों को भी मानना पड़ा कि इस समय जहाँ देखिए वहाँ देवदूत की तरह मानवता की सेवा में सतत तत्पर सिर्फ भारतीय सैनिक ही दिखाई देते हैं।
मित्रों,सवाल उठता है कि क्या अब कश्मीरी भारतीय सेना पर पत्थर नहीं फेंकेंगे? हमने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि गंगा स्नान करते वक्त एक साधू ने देखा कि एक बिच्छू पानी में डूब रहा है। साधू ने उसे अपनी हथेली पर उठा लिया लेकिन बिच्छू ने स्वभावतः डंक मारा। साधू दर्द से कराह उठा और बिच्छू उसके हाथ से छूटकर फिर से डूबने लगा। जब ऐसा कई बार हुआ तो लोगों ने साधू से कहा कि डूब जाने दीजिए इसे। तब साधू ने उत्तर दिया कि जब यह अपना स्वभाव नहीं छोड़ रहा है तो मैं क्यों छोड़ूँ? हो सकता है कि इस कहानी के बिच्छू की तरह कश्मीरी आपदा के टल जाने के बाद फिर से भारतीय सैनिकों पर पत्थर से प्रहार करने लगें लेकिन तब वे इंसान नहीं बिच्छू कहे जाएंगे, इस कहानी के बिच्छू। इंसानियत तो यही कहती है कि एक इंसान को दिल के बदले दिल और जान के बदले जान देनी चाहिए। इंसानियत यह भी कहता है कि जो लोग अहसानफरामोश होते हैं वे इंसानियत के नाम पर कलंक होते हैं। तो क्या कश्मीरी सचमुच बिच्छू हैं,इंसान नहीं हैं। यह हम साबित नहीं कर सकते। यह उनको ही साबित करना होगा और ऐसा सिर्फ और सिर्फ वे ही साबित कर सकते हैं। हम भारतीय तो हमेशा से उनको गले और सीने से लगाने को तैयार हैं मगर क्या वे ऐसा करने के लिए तैयार हैं? 1947 से लेकर अबतक जब-जब कश्मीर को कष्ट हुआ है भारत ने हमेशा उनके जख्मों पर मरहम लगाया है,भाई की तरह जान देकर भी सहायता की है। आज भी जल-प्रलय के समय पूरा भारत कश्मीरियों के साथ खड़ा है मगर अब आगे शेष भारत के साथ हाथ-से-हाथ मिलाकर खड़े होने की बारी कश्मीरियों की है। कश्मीरियों को यह साबित करना ही होगा कि वे कृतघ्न नहीं हैं और वे भी दिल के बदले दिल और जान के बदले जान देना जानते हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मान ना मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर समन्वयक बने मुनमुन की बैठक में पार्षदों का ना आना सियासी हल्कों में हुआ चर्चित 
इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पार्षद आये ही नहीं। घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है। शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा।
मुनमुन की बैठक में नहीं आये पार्षदंः-इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। यहां यह विशेष् रूप से उल्लेखनीय है कि तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। इस संबंध में मुख्यनगरपालिका अधिकारी द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि केन्द्रसरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय के द्वारा दिये जाने वाले अंशदान से कुलराशि 47 करोड़ 36 लाख रु. की राशि इस हेतु स्वीकृत की गयी है। साथ ही यह भी बताया गया है कि राज्य तकनीकी समिति द्वारा 62 करोड़ 55 लाख रु. की निविदा लागत स्वीकृत की गयी है। इसमें वर्तमान तथा नवीन जलावर्धन योजना के पांच साल के रख रखाव और संचालित करने का व्यय भी ठेकेदार द्वारा किया जाना प्रसतवित है। इस योजना हेतु स्वीकृत राशि और निविदा की राशि को लेकर ही विवाद प्रारंभ हुआ है। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि आखिर 15 करोड़ 19 लाख रु. की अतिरिक्त राशि निविदा में कैसे आयी और अंतर की यह राशि पालिका को मिलगी कहां से? आम तौर पर यह माना जा रहा है कि ये अंतर की राशि की बंदर बांट करनंे के लिये ही बढ़ायी गयी है। इसे लेकर पालिका के कांग्रेसी पार्षद लामबंद हो गयें हैं वहीं पालिका के भाजपा पार्षदों का भी अपने अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी को समर्थन नहीं है। बीते कई दिनों से दोनों पक्षों का यह विवाद सुर्खियों में बना हुआ है। यह भी सही है कि जब किन्हीं दो पक्षों के बीच विवाद हो जाता है तो उसे सुलझाने के लिये दोनों ही पक्ष अपने किसी विश्वास प्राप्त व्यक्ति को पंच बनाकर उसे सुलझाने का काम करते है। लेकिन पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान  ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के अलावा भाजपा पार्षद श्याम शोले के अलावा कोई भी पार्षद उसमें नहीं आया। कुछ अखबारों में यह भी छपा कि कांग्रेस पार्षद दल के नेता शफीक पार्षद भी उसमें उपस्थित थे। इसके बावजूद भी विधायक मुनमुन राय ने अपनी निधि से नगर विकास के लिये 25 लाख रु. की राशि देने की घोषणा की जो कि शायद इस बैठक का मुख्य उद्देश्य था। हालांकि यह कहना भी गलत होगा कि मुनमुन को नपा के मामलो से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह उनके विस क्षेत्र के मुख्यालय की पालिका है लेकिन नपा चुनाव के दो तीन महीने पहले ही नगर की सुध लेना कुछ और ही कहानी कहती नजर आ रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि नपा में चुनावों में भाजपा की जीत हार में मुनमुन की भूमिका ही निर्णायक रहने वाली है। इसमें उन्हें अपने चुनाव में नगर में मिली भारी बढ़त और मुस्लिम वार्डों में मिले वोटों को कारण बताया जा रहा है। इसमें उनकी क्या रणनीति होगी? यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा।
भाजपा राज में वेदसिंह और इंका राज में आशुतोष भी नही करा पाये थे जांचः- घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है।शहर के लिये सफेद हाथी साबित हो चुकी इस योजना की जांच के लिये कांग्रेस शासनकाल में सिवनी विस के इंका प्रत्याशी रहे आशुतोष वर्मा ने इस मुद्दे पर जांच की मांग तो कांग्रेस शासनकाल में जरूर उठायी लेकिन कोई कारगर जांच नहीं हो पायी। इसके बाद जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो उमा भारती के शासनकाल में जिला भाजपा अध्यक्ष रहे वेदसिंह ठाकुर ने फिर एक बार इस मामले में शिकायत की लेकिन इस परियोजना की फिर भी जांच नहीं हो पायी। इसमें घपले करने वाले हाथ काफी ताकतवर थे। इस योजना के क्रियान्वयन के दौरान सिवनी में पदस्थ पी.एच.ई. के कार्यपालन यंत्री जोशी जबलपुर संभाग के संघ के प्रमुख स्तंभ रहे स्व. बाबूराव जी परांजपे के निकट रिश्तेदार थे और उस विभाग के मंत्री उस दौरान स्व. हरवंश सिंह थे। उस वक्त इस योजना के घटिया काम को लेकर एक दुर्गा मंड़प में झांकी भी लगायी गयी थी। तकनीकी लोगों का यह मानना है कि इस योजना में निर्धारिम मानदंड़ों के पाइप नहीं लगे है। जितनी रफ्तार और मात्रा में पानी फेंकने के लिये मोटर पंप लगाये लगाये हैं उसकी लगभग आधी क्षमता के पाइप का उपयोग किया गया है। इसीलिये टेस्टिंग के समय जब पूरी रफ्तार से पानी छोड़ा गया था तो छोटे मिशन स्कूल के पास एक जमीन से उखड़कर लगभग खड़ा हो गया था और एक बड़ी दुर्घटना होने से बच गयी थी क्योंकि कुछ समय पहले ही स्कूल की छुट्ठी हो चुकी थी। उसके बाद से मोटर पंपों से लगभग आधी मात्रा ममें नियंत्रित करके पानी छोड़ा जाता है जिसके कारण पंप अपनी क्षमता से दुगने समय तक चलने के बाद भी शहर की स्ीाी टंकियशें को दिन में एक बार भी पूरा नहीं भर पाते थे जबकि तकनीकी स्वीकृति के अनुसार दिन में दो बार में 12 एमएलडी पानी टंकियों में भरा जाना चाहिये था। दुगने समय तक पंपों को चलाने कारण प्राकल्लन में किया गया विद्युत खपत का आकलन फेल हो गया और लगभग दुगनी बिजली की खपत होने लगी जिसका बोझ नगरपालिका आज भी नहीं झेल पा रही है। हाल ही में जो प्रस्ताव जलावर्धन योजना को लेकर सामने आयें हैं उसके अनुसार शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा। ये कैसे संभव होगा? इसे लेकर नगर के सभी कर्णधार फिलहाल तो मौन ही है। “मुसाफिर”
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
16 सितम्बर 2014 से साभार 

14.9.14

यह मेरा हिन्दी दिवस नहीं है दोस्त!-ब्रज की दुनिया

14 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले कई दशकों से जबसे मैंने होश संभाला है मैं देखता आ रहा हूँ कि भारत और दुनियाभर के हिन्दी जन आज 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं। पता नहीं क्यों मनाते हैं? न तो इस दिन भारत में पहली बार हिन्दी बोली गई और न ही इस दिन हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया। अलबत्ता 14 सितंबर,1949 को हिन्दी के साथ धोखा जरूर किया गया था जब यह कहा गया कि हिंदी भारतीय गणतंत्र की राजभाषा तो होगी लेकिन तबसे जब यह इसके लायक हो जाएगी। लायक तो भारत 1947 में प्रजातंत्र के लिए भी नहीं था फिर क्यों लागू किया वयस्क मतदान वाले प्रजातंत्र को? संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार इसे भारतीय संविधान लागू होने की तारीख़ अर्थात् 26 जनवरी, 1950 ई. से लागू नहीं किया जा सकता था, अनुच्छेद 343 (3) के द्वारा सरकार ने यह शक्ति प्राप्त कर ली कि वह इस 15 वर्ष की अवधि के बाद भी अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रख सकती है। रही–सही क़सर, बाद में राजभाषा अधिनियम, 1963 ने पूरी कर दी, क्योंकि इस अधिनियम ने सरकार के इस उद्देश्य को साफ़ कर दिया कि अंग्रेजों के शासन के खात्मे के बाद भी अंग्रेज़ी की हुक़ूमत देश पर अनन्त काल तक बनी रहेगी। इस प्रकार, संविधान में की गई व्यवस्था 343 (1) हिन्दी के लिए वरदान थी परन्तु 343 (2) एवं 343 (3) की व्यवस्थाओं ने इस वरदान को अभिशाप में बदल दिया। वस्तुतः संविधान निर्माणकाल में संविधान निर्माताओं में जन साधारण की भावना के प्रतिकूल व्यवस्था करने का साहस नहीं था, इसलिये 343 (1) की व्यवस्था की गई। परन्तु अंग्रेज़ीयत का वर्चस्व बनाये रखने के लिए 343 (2) एवं 343 (3) से उसे प्रभावहीन कर देश पर मानसिक ग़ुलामी लाद दी गई।
मित्रों,मैं तो हिन्दी दिवस उस दिन की याद में मनाऊंगा जब हिन्दी को वास्तव में भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा घोषित कर दिया जाएगा। जब हमारा संविधान कहेगा कि आज से और अभी से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा है न कि यह कि हिन्दी भारतीय गणतंत्र की राजभाषा तो होगी लेकिन कब पता नहीं। यह हम हिन्दीभाषियों और हिन्दी भाषा के लिए हर्ष का विषय है कि इस समय भारत की बागडोर एक ऐसे प्रधानमंत्री के हाथों में है जो देश तो क्या विदेश में भी हिन्दी ही बोलता है। इतना ही नहीं वर्तमान केंद्र सरकार हिन्दी को लेकर काफी संवेदनशील भी है जिसका प्रमाण हमें तब मिला जब सी-सैट में हिन्दी भाषा के पक्ष में सरकार ने निर्णय दिया। परन्तु सच्चाई यह भी है कि वर्तमान केंद्र सरकार अभी संसद में इतनी ताकतवर नहीं है कि वह बेझिझक होकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने का फैसला ले सके। इसलिए हम हिन्दी जनों को चाहिए कि आनेवाले विधानसभा चुनावों में एनडीए को भारी बहुमत से जिताकर राज्यसभा में भी उसका बहुमत स्थापित करें जिससे उसके पास यह बहाना नहीं रह जाए कि अगर हमारे पास दोनों सदनों में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने लायक बहुमत होता तो हम जरूर ऐसा करते। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह केंद्र सरकार हिन्दी की ताकत को बखूबी जानती है इसलिए यह जरूर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने की ताकत दे सकती है।
मित्रों, हिंदी बहती नदी है और लगातार नई होती रहती है इसलिए उसका विकास भी हो रहा है लेकिन हम देखते हैं कि अभी भी हिन्दी में विज्ञान और इंजीनियरिंग की पुस्तकें कम हैं और अगर हैं भी तो उनकी भाषा ऐसी है जो हमारी रोज की बोलचाल की भाषा से बिल्कुल ईतर है इसलिए इस ओर ध्यान देना पड़ेगा। यह भी कटु सत्य है कि हम अब अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम से शिक्षा देना नहीं चाहते जिससे हिन्दी को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि अपेक्षाकृत ज्यादा तेज दिमागवाले बहुमत युवा भले ही कामचलाऊ हिंदी जानते हों लेकिन वे हिंदी से प्रेम नहीं करते,अपने हिन्दी ज्ञान पर गर्व नहीं करते। ऐसे हालात में भला कैसे हिन्दी का कारवाँ आगे बढ़ेगा? यह भी सच है कि आजादी के पहले भी हिन्दी के लेखक और कवि गरीबी में दिन गुजारते थे और आज आजादी के 67 साल बाद भी मुफलिसी ही उनकी किस्मत है,जिंदगी है। बदलते परिवेश में हमें ऐसे प्रबंध करने होंगे जिससे इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य उपलब्ध हो और इस तरह से उपलब्ध हों कि पढ़नेवालों को पढ़ने से पहले कुछ आर्थिक योगदान जरूर करना पड़े। तभी हिन्दी साहित्य बचेगा और हिन्दी के साहित्यकार बचेंगे क्योंकि आज के युवा किताबों के पन्ने पलटने में यकीन नहीं रखते बल्कि वे तो सीधे गूगल बाबा की शरण लेते हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

अपनी भाषा अपनी माटी

अपनी भाषा अपनी माटी

 (हिंदी दिवस पर )

जब तक हम अपनी भाषा और माटी पर गर्व करना नहीं सीखेंगे तब तक बदलाव
कागज के फूल से मिलने वाली खुशबु की तरह झूठा है। जब देश स्वतन्त्र नहीं था
तब इस देश के लोग हिंदी या मातृभाषा का उपयोग करते थे और स्वतंत्रता के बाद
हम फिरंगी भाषा के गुलाम होते गये,आज गाँव से महानगर तक हर कोई अंग्रेजी
का आशिक होता जा रहा है ,आज कहीं भी किसी को अपनी भाषा को छोड़ने का
मलाल नहीं है और जानबूझ कर अनावश्यक होते हुए भी विदेशी भाषा बोलने पर
शर्म नहीं है। हिन्दी की समस्या वह पढ़ा लिखा समाज है जो अंग्रेजी की जी हजुरी
करता रहा है।

पिछले 65 वर्षों में हमारी सरकार ने हिंदी भाषा को कुछ नारे के अलावा क्या दिया।
इस देश के संत्री से मंत्री टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं जबकि
सहज रूप से सभी को समझ में आने वाली हिंदी बोलने से भी कतराते हैं। देश के
भूतपूर्व प्रधान मंत्री जब सँसद में बोलते थे जो यदा कदा हिंदी में बोलते थे ,कुछ
राजनेता तो वोट लेने के खातिर हिंदी बोलने का दिखावा करते हैं ऐसे में हिंदी का
विकास कैसे हो ?

अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद क्लिष्ट हिंदी में जानबूझ कर किया जाने लगा ?सिर्फ
यह जताने के लिए कि अंग्रेजी सरल भाषा है। सरकारी काम काज में अंग्रेजी का
उपयोग हिंदी भाषा की दुर्दशा करता रहा है। आज विश्व में कितने जापानी,चीनी
अमेरिकी हिन्दी भाषा पर प्रभुत्व रखते हैं ?और कितने भारतीय अंग्रेजी भाषा
पर प्रभुत्व रखते हैं ? हर बार देशी अंग्रेजी पंडित फिजूल का तर्क रखते हैं कि
अंग्रेजी के बिना विश्व स्तर पर तरक्की करना असंभव है जबकि चीन जापान
अपनी भाषा में काम करके विश्व को उनके देश की भाषा सीखने की स्थिति बना
चुके हैं। एक अंग्रेज यात्री जब भारत आता है तो हिंदी के काफी शब्द सीख कर
आता है और वह जब किसी  हिन्दुस्तानी से "नमस्कार" के प्रत्युत्तर में "good
morning "सुनता है तो भौंचक्का रह जाता है।

हिंदी के गौरव के लिए देश के साँसद सँसद में हिंदी में अनिवार्य रूप से बोले,
हर साँसद को अपनी मातृभाषा के साथ सहज हिंदी में बोलने का अभ्यास
करना चाहिए,अंग्रेजी बोल कर काम निकालने का रास्ता बंद करना चाहिए।
हमें विश्व की भाषाएँ सीख कर ज्ञान की वृद्धि करनी है परन्तु अपनी भाषा का
अपमान नहीं करना चाहिए। किसी भी विदेशी के साथ उसकी भाषा में बात
करना अच्छी बात है पर अपने ही देश में एक दूसरे से अन्य देश की भाषा में
बात करना एक ओछी हरकत के अलावा विशेष कुछ नहीं है।

हिंदी सप्ताह नहीं ,हिंदी पखवाड़ा नहीं ,365 दिन हिंदी में काम यह लक्ष्य होना
चाहिये। हिन्दुस्थान को समझना है तो हिंदी जानना और उपयोग में लाना
जरुरी है।         

13.9.14

श्वेता बसु शिकार है या शिकारी?-ब्रज की दुनिया

13 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले दिनों मकड़ी,इकबाल जैसी प्रसिद्ध फिल्मों की हिरोइन श्वेता बसु को वेश्यावृत्ति करते हुए रंगेहाथों पकड़ा गया। तभी से बॉलीवुड में इस बात पर एकतरफा बहस छिड़ी हुई है कि श्वेता बसु ने जो कुछ भी किया है क्या वह सब भारत में और भारतीय लड़की के लिए करना सही है? यह बहस इसलिए एकतरफा है क्योंकि अभी तक किसी भी हिन्दी फिल्म या टेलीवीजन शख्सियत ने यह नहीं कहा कि श्वेता ने गलत किया बल्कि साक्षी तंवर और दीपिका पादुकोण ने उल्टे श्वेता को ही सही ठहराया है और कहा है कि उसके सामने और रास्ता ही क्या था?
मित्रों,तो क्या सचमुच श्वेता के सामने जिस्म बेचने के अलावा धनार्जन का और कोई रास्ता नहीं बचा था? क्या फिल्मी हीरोइनों के सामने हमेशा दो ही विकल्प होते हैं कि या तो वह फिल्मों में काम करे या फिर वेश्यावृत्ति करे? मैं नहीं मानता कि यह सच है। कोई भी अभिनेत्री अन्य महिलाओं की तरह ही बहुत सारे अन्य काम भी कर सकती हैं। अभिनय के लिए टीवी की विशाल दुनिया है तो वहीं फैशन,मॉडलिंग,ब्यूटी पार्लर,बूटिक,भोजनालय,रेस्टोरेंट,शिक्षण आदि बहुत सारे ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें अभिनेत्रियाँ हाथ आजमा सकती हैं और ईज्जत के साथ पैसे कमा सकती हैं। लेकिन यहाँ कठोर संघर्ष करना पड़ेगा और एटीएम मशीन की तरह झटपट हाथों में पैसा नहीं आएगा।
मित्रों,हमारी युवा पीढ़ी के साथ सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि उनके पास धैर्य नहीं है। वे चाहते हैं कि पलक झपकते ही उनका बैंक अकाउंट पैसों से लबालब भर जाए। जबकि ऐसा कहानियों में तो संभव है लेकिन हकीकत में नहीं। मैंने वर्षों पहले अमेरिकन पॉप स्टार मैडोना जो हमारी कई हिन्दी फिल्म अभिनेत्रियों की घोषित आदर्श हैं का इंटरव्यू कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब न्यूयार्क आने के बाद उनके पास पैसे नहीं थे तब उसने नौकरी नहीं खोजी थी बल्कि वासना के सौदागर को खोजा था और अपनी अस्मत बेचकर गुजारा किया था।
मित्रों,ऐसा यूरोप और अमेरिका की महिलाओं के लिए तो सही हो सकता है लेकिन भारत की स्त्रियों से हम ऐसी अपेक्षा नहीं रख सकते। बल्कि भारत की संस्कृति तो स्त्रियों से यह अपेक्षा रखती है कि उसे चाहे कितने भी कष्ट क्यों न उठाना पड़े अपनी ईज्जत और अपने सम्मान को बचाए। मैडोना और सनी लियोन श्वेता बसु,साक्षी तंवर या दीपिका पादुकोण जैसी विदेशी मानसिकतावाली महिलाओं के लिए तो उनका आदर्श हो सकती हैं लेकिन भारत की एक आम औरत के लिए नहीं। हरगिज नहीं।। भारत में प्राचीन काल से ही कौमार्य की अंतर्राष्ट्रीय नीलामी करने की परंपरा नहीं रही है बल्कि जान देकर भी उसकी रक्षा करने वाली पद्मिनियों के जौहर की प्रथा रही है और यही भारतीयता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

भक्तराज हनुमान को तो बक्श देते ठगों!?-ब्रज की दुनिया

13-09-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमारे बिहार में एक कहावत अरसे से प्रचलित है कि कमानेवाला लहरें गिनकर भी पैसे कमा लेता है। फिर धर्म के नाम पर लोगों को ठगना तो काफी आसान होता है। लोगों की आस्था और विश्वास के नाम पर ठगी का धंधा इस धरती पर अनादि काल से ही चलता आ रहा है और कदाचित आगे भी चलता रहेगा लेकिन हनुमान जी के नाम पर ठगी? बेचनेवालों ने अपना ईमान तो बेचा ही भक्तराज हनुमान को भी सोने का पानी चढ़ाकर बेच दिया?
मित्रों,आजकल कई महीनों से दिन-रात विभिन्न टीवी चैनलों पर हनुमान चालीसा युक्त जन्तर का विज्ञापन प्रसारित किया जा रहा है। लोगों का विश्वास जीतने के लिए कई टीवी और फिल्मी कलाकारों से कहलवाया जाता है कि इस जन्तर (यंत्र) को पहनते ही उनके अच्छे दिन आ गए। यहाँ तक कि इस षड्यंत्र में भारत कुमार मनोज कुमार,भजन सम्राट अनूप जलोटा और मशहूर संगीतकार रवीन्द्र जैन को भी शामिल कर लिया गया है।
मित्रों,यह तो सही है कि हनुमान चालीसा इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली मंत्र है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम उसका जन्तर बनाकर गले में धारण कर लें। हनुमान तो महाभक्त हैं। महात्यागी हैं। उनको तो लेना-देना है सिर्फ राम से और राम के नाम को जपने से। उनको क्या लेना-देना सोने और चांदी से? वास्तव में करणीय तो शुद्ध अंतर्मन से हनुमान जी और राम जी की भक्ति है। फिर भी आप दुःख का भागीदार होने से बच नहीं पाएंगे क्योंकि सुख और दुःख तो रथ के पहिये के दो हिस्सों के समान हैं जो बारी-बारी से हमारे सामने आते रहते हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि कर्म करो भाग्य के पीछे मत भागो क्योंकि तुम्हारा कर्मफल तुम्हें प्राप्त होकर ही रहेगा और उसी से तुम्हारा भाग्य भी बनेगा फिर कैसे इस सोने का पानी चढ़ा यंत्र पहन लेने से जीवन में सिर्फ और सिर्फ अच्छे परिणाम ही आने लगेंगे?
मित्रों,यथार्थ तो यही है कि चाहे हम इस यंत्र को धारण करें या नहीं हमारे जीवन पर कोई फर्क नहीं आनेवाला लेकिन अगर हम इन ठगों जिसके मुखिया कोई बाबा मंगलनाथ हैं की बातों में आ जाते हैं तो ये ठग जरूर मालामाल हो जाएंगे और आपको बेवजह अपनी मेहनत की कमाई का एक मोटा हिस्सा खो देना पड़ेगा। हममें से बहुत-से लोग ऐसे होंगे जो कर्म के बदले भाग्य के पीछे भागकर अपना बहुत सारा धन और समय बर्बाद कर चुके हैं। मेरी ऐसे मित्रों को सलाह है कि वे जो कुछ भी काम कर रहे हैं उसमें अटूट विश्वास रखें और लगातार अथक परिश्रम करते रहें आपको आपके कर्म का फल जरूर मिलेगा। सुख भी मिलेगा और दुःख भी मिलेगा। कभी-कभी तो दुःख भी सुख में लिपटकर मिलता है जिसका हमें पता ही नहीं चल पाता है। इसी तरह कभी-कभी सुख भी दुःख में लिपटा रहता है और हम बेवजह परेशान हुए रहते हैं। भगवान पर विश्वास रखें और उससे कहीं ज्यादा खुद पर यकीन रखें और जीवन में जो कुछ भी मिलता है उसे सहर्ष स्वीकार करते चलें। मन को शुद्ध करें तो भगवान खुद ही आकर उसमें बस जाएंगे और फिर आपको परमसुख अर्थात् उनकी निर्बाध भक्ति पाप्त होगी वो भी जन्म-जन्मांतर तक।
मित्रों,ऐसा नहीं है कि मैं आपको कोरे उपदेश दिए जा रहा हूँ। सच्चाई तो यह है कि मैं खुद भी इन दिनों बेहद कठिन संघर्ष के दिनों का सामना कर रहा हूँ। मेरी शादी 12 जून,2011 को ही हो चुकी है लेकिन आज भी मैं अपनी पत्नी से अलग रह रहा हूँ और पिछले दो-ढाई सालों से खुद अपने हाथों से भोजन बनाने सहित घर के सारे काम कर रहा हूँ और अपनी वेबसाईट हाजीपुर टाईम्स का अकेले संचालन भी कर रहा हूँ जबकि विवाह से पहले मैंने कभी चाय तक नहीं बनाई थी। मैं अपने माता-पिता की शिव-पार्वती भाव से अपने हाथों से सेवा कर रहा हूँ और खुश हूँ। मेरा विवाह होते ही मेरे अधिकतर सगे-संबंधियों का मेरे प्रति व्यवहार बदल गया। यहाँ तक कि माँ भी बदल गई लेकिन मैं घबराया नहीं और पूरी दृढ़ता के साथ हालात का सामना कर रहा हूँ। मुझे खुद में और ईश्वर में अटूट विश्वास में विश्वास है इसलिए मैंने तो हनुमान चालीसा यंत्र नहीं मंगवाया। दोस्तों,हारिए न हिम्मत बिसारिए न हरिनाम।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

11.9.14

सेना के फरिश्तों को सलाम!

जम्मू कश्मीर में उपजे भयानक हालातों में सेना के फरिश्ते ही पूरी मेहनत से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं।  मुसीबत में फंसे लोगों की यही जान बचा रहे हैं. आये दिन नौटंकी करने वालों को भी समझ आ रहा होगा कि उनके असली रहनुमा कौन हैं? हमें अपने सैनिकों पर गर्व है। जय हिन्द!

क्या एयरटेल मनी दूसरी जेवीजी बनने जा रही है?-ब्रज की दुनिया

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। दोस्तों आपको याद होगा कि आज से करीब 20 साल पहले बिहार में कारोबार करनेवाली कई नन बैंकिंग कंपनियाँ गरीब बिहारियों की अरबों रुपये की धनराशि लेकर कैसे फरार हो गई थी। कुछ ऐसा ही डर अब बिहार के लोगों के मन में एयरटेल मनी को लेकर बैठने लगा है। 27 अगस्त को हाजीपुर टाईम्स से टेलीफोनिक बातचीत में एयरटेल मनी के हाजीपुर और छपरा के प्रमुख राकेश कुमार ने बताया था कि अगले 4 दिनों में कंपनी उपभोक्ताओं के पैसों को रिटेलरों के अकाउंट में डाल देगी लेकिन दुर्भाग्यवश अबतक भी ऐसा नहीं किया गया है।

इस बारे में जब कंपनी के बिहार प्रभारी मनीष से 9631949898 पर संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि राकेश कुमार ने जो कुछ भी कहा है वह पूरी तरह से गलत है। दरअसल कंपनी ने एयरटेल मनी से बिजली बिल अदा करनेवाले उपभोक्ताओं का विवरण विद्युत बोर्ड को भेज दिया है। उन्होंने आज के बारे में आश्वासन दिया कि वे बिजली बोर्ड से बात करके बताएंगे कि इस बारे में कहाँ तक प्रगति हुई है लेकिन आज जब हमने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि वे स्वयं हमसे थोड़ी देर में संपर्क करेंगे। कई घंटे तक जब उनका फोन नहीं आया तो हमने ही उनको फोन किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राकेश की तरह मनीष भी झूठ बोल रहे हैं? क्या एयरटेल मनी उनके पैसे पचा जाएगी? विदित हो कि बिहार के जिन उपभोक्ताओं ने सरकार द्वारा एयरटेल मनी से बिजली बिल जमा करने की सुविधा का उपयोग किया है उनके बिजली बिल से वह राशि कई महीने बाद भी घटाई नहीं गई है जिससे वे खासे परेशान हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

9.9.14

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

हमारे कश्मीर पर आई विपदा से आज सेना झुंझ रही है और इस विपदा में अपने प्राण
न्योछावर करके भी कश्मीरी भाई बहनों का जीवन बचा रही है। कश्मीर की अलगाववादी
ताकतें की जबान से अभी सेना के प्रति GO BACK के शब्द नहीं निकल रहे हैं और
पाकिस्तान फिरस्त ये अलगाववादी ताकते भारत के कश्मीर और पाकिस्तान के हिस्से
के कश्मीर के राहत काम को देख भी रही है। आज पूरा भारत अपने कश्मीर के लिए
तन मन धन से सहयोग कर रहा है ,आज भारतीयों के मन में जातिवाद का जहर
नहीं है सबके मन में बची है तो विपदिग्रस्त भारतीयों की जिंदगी को पटरी पर लाने की
आशा। जो लोग धारा 370 का विरोध करते हैं क्या वो अब भी यही कहेंगे कि कश्मीर को
उसके हाल में मरने दो,नहीं ना। कश्मीर हमारा है और कश्मीरी भी हमारे हैं यह भाव
देश की सरकार में ह्रदय से बह रहा है,मोदी को सांप्रदायिक कहने वाली कांग्रेस और मिडिया
जमात और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले वोट बैंक वाले नेता चुप हैं। क्या देश के
अल्पसंख्यक इस बात को समझेंगे की कौन पार्टियाँ देश में धर्म के नाम पर सत्ता का सुख
भोगना चाहती है ? क्या हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहने वाले चैनल आज सच्चे धार्मिक समभाव
को देख कर अपने पिछले कुकर्मों पर अफ़सोस जाहिर करेंगे कि वे भी जाने अनजाने में
जाती और धर्म के आधार पर मक्कार नेताओं की बातों में आकर भारतीयों को अलग करने
के खेल में शामिल थे।

कश्मीर की जनता आज जो कुछ महसूस कर रही है वह सकारात्मक दृष्टिकोण लम्बे
समय तक बनाये रखें। ये भारतीय जवान आज अपने प्राणों का मोह त्यागकर आपकी
जिन्दगी को बचा रहे हैं ,क्यों ?क्योंकि आप भारतीय हैं। 125 करोड़ भारतीय अपने
कश्मीर को तबाह होते नहीं देखेंगे उसे स्वर्ग बने रहने देंगे और इसके लिए प्रयास भी
करेंगे। क्या कश्मीरी भाई बहन भी भारतीय फौजी भाई की सलामती के लिए भविष्य
में कुछ करेंगे ?हमारे फौजी जवानों का भी परिवार है वे भी किसी के भाई हैं ,पिता हैं ,
पुत्र हैं ,जब पाकिस्तानी आतंकी घाटी में घूम कर उन पर हमला करते हैं तो कश्मीरियों
का फर्ज बनता है उस समय उन आतंकियों को पनाह ना दे.पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे मत लगाये,हिन्दुस्तानी तिरंगे का अपमान ना करे और ना होने दे। अपने देश की
फौज का साथ दे ,उन्हें सही सुचना से अवगत कराते रहे।

कभी कभी विपत्तियाँ भी सौगात लेकर आती है। इस विपति में जो धन हानि हुयी है
उसकी भरपाई हो जायेगी ,यह समय चिंता का नहीं है ,आज सभी भारतीय और विशेष
कर वो अल्पसंख्यक समुदाय जो गुमराह में है प्रण करे कि हम भी भारतीय हैं,भारत
की रक्षा के लिए काम करेंगे, बहुसंख्यक की भावनाओं का आदर करेंगे उनकी बहु -
बेटियों की इज्जत करेंगे।

मोदीजी आपने गुजरात को हर प्राकृतिक आपदा से बचाया और खड़ा किया ,आज
धर्म का तकाजा है आप कश्मीर का नवसृजन करेंगे,आपके पास आज प्रकृति भी
भारतीय एकता की सौगात देने के लिए विपदा के रूप में आई है आप मुकाबला कर
रहे हैं ,जब तक विपति हार नहीं जाती तब तक लड़िये और कश्मीरियों की हर संभव
सहायता कीजिये,शायद नियति आपसे बहुत कुछ करवाना चाहती है जो भारत के
हित में है।          

तेज धार



हम में से अधिकांश व्यक्ति काफी मेहनत करते हैं और मेहनत के अनुपात में कम
फल प्राप्त करते हैं इसका मतलब यह नहीं होता है कि मेहनत करने से ऊर्जा ज्यादा
खत्म होती है और फल थोड़ी मात्रा में मिलता है और हम में से कुछ व्यक्ति कम
मेहनत करते दिखाई देते हैं तो ज्यादा फल की प्राप्ति होती है। जब भी इस विषय पर
वाद प्रतिवाद होता है तो लोग "किस्मत" कह कर मन को तसल्ली दे देते हैं। क्या
आप भी इस बात को किस्मत में खपाना चाहते हैं ? या फिर आगे की कहानी पढ़
कर तय करना चाहेंगे !!

एक दिन एक बूढ़े लकड़हारे ने अपने जवान पुत्र को कुल्हाड़ी देकर जँगल में लकड़ी
काटने को भेजा। युवक कुल्हाड़ी लेकर जंगल में गया और एक मोटे तने के सूखे पेड़
को काटने में लग गया। लड़का कुल्हाड़ी चलाते -चलाते थक गया मगर वह तना
उससे कटा नहीं। अत्यधिक श्रम करने के कारण पूरा शरीर थक कर चूर हो गया था
मगर लकड़ी बटोर नही पाया। आखिर थक हार कर बैठ गया और पिता के आने का
इन्तजार करने लगा। कुछ समय बाद बूढ़ा लकड़हारा जँगल में आया ,उसने देखा
उसका पुत्र थक कर विश्राम कर रहा है।

लकड़हारे ने पूछा -पुत्र,काफी थके हुए लग रहे हो ,लगता है बड़ा परिश्रम किया है।

युवक बोला - मेने परिश्रम तो बहुत किया है ,मोटे तने के ठूँठ को काटने में पूरी
ताकत झोंक दी मगर वह कट नहीं पाया।

लकड़हारे ने कहा -पुत्र,तू कुछ समय तक विश्राम कर ले बाद में काट लेना,तब तक
मैं उस तने को काटने की कोशिश करता हूँ ।

 पुत्र विश्राम करने लगा और बूढ़ा लकड़हारा उस दरमियान कुल्हाड़ी को पत्थर पर
घिसता रहा। कुल्हाड़ी की धार चमकने लगी और काफी तेज हो गयी। लकड़हारे का
पुत्र विश्राम करके पेड़ के पास में आया तो देखा उसके पिता ने अभी तक पेड़ काटने
का प्रयास तक नहीं किया है इतने समय तक बैठे बैठे कुल्हाड़ी को पत्थर पर घिसते
जा रहे हैं।
युवक ने पिता को उलहाना देते कहा -आपने तो मेरी मदद करने की बात कही थी
मगर आपने तो कुछ काम किया ही नहीं। इतना कहकर उस युवक ने पिता के हाथ
से कुल्हाड़ी ले ली और पूरी ताकत से तने पर वार करने लगा,कुछ ही देर में तना
कट गया।

लकड़हारा अपने पुत्र के पास आया और बोला -पुत्र, अब समझ में आ गया होगा कि
मैं तेरे विश्राम के समय खाली नहीं बैठा था,तेरे काम में मदद कर रहा था। केवल
परिश्रम से ही काम नहीं बनता है अपनी धार को तेज बना कर काम हाथ में लेने से
व्यक्ति सफल बनता है।

हम विषय की उचित जानकारी लिए बिना ही काम करने में लग जाते हैं तब आंशिक
सफलता ही प्राप्त होती है या नहीं भी होती है,विषय वस्तु की सम्पूर्ण जानकारी से
सफलता सहज ही मिल जाती है।             

7.9.14

लव,इस्लाम और जेहाद!-ब्रज की दुनिया

7 सितंबर,2014,हाजीपुर टाईम्स,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसा कि आप जानते हैं कि सभी सामी धर्मों (मेरा मतलब यहूदी,इसाई और इस्लाम से है) में भगवान से प्रेम करने की सख्त मनाही है। उनके मतानुसार ईश्वर कड़क पिता की तरह जो अपनी संतानों पर दया और कृपा करता है उनसे प्रेम नहीं करता इसलिए उसकी ईबादत की जा सकती है,उससे विनती की जा सकती है लेकिन प्रेम नहीं किया जा सकता। इस्लामिक ईश्वर तो इतना ज्यादा कड़क है कि वह संगीत और चित्रकला को भी पसंद नहीं करता। वह खुदा कहता है कि सूअर,कुत्ते और बिल्लियों को छोड़कर सारे जानवर भक्षणीय हैं और महिलाओं को गुलामों की तरह रहना और रखना चाहिए। ससुर बहू के साथ बलात्कार करता है और खुदा कहता है बहू अब उसकी पत्नी और अपने ही पति की माँ हो गई यानि दरिंदे को सजा देने के बदले खुदा ईनाम देता है।
मित्रों,निश्चित रूप से यही कारण था कि मंसूर बिन हल्लाज नामक आरंभिक सूफी को सऊदी अरब में जिंदा आग में झोंक दिया गया था क्योंकि वो खुदा से प्रेम करने की बातें करता था। बाद में सूफी संतों का सिलसिला ही चल पड़ा जो खुदा से प्रेम भी करते थे लेकिन यह सूफी-मत कभी इस्लाम की मुख्यधारा नहीं बन पाया। इतना ही नहीं अभी भी कई सूफी संत अपने मुस्लिम समाज से डरते थे इसलिए सूफी कवियों ने अपने काव्यों-महाकाव्यों में नायिकाओं में खुदा के गुणों को आरोपति जरूर कर दिया और स्वयं नायक बनकर उससे प्रेम भी किया लेकिन वे सीधे-सीधे यह कहने का साहस नहीं जुटा पाए कि सीधे-सीधे खुदा से प्रेम करो। कुछ सूफी संत तो ऐसे भी थे जो कहलाते तो सूफी थे लेकिन थे कट्टरपंथी। नक्शबंदी और सुहरावर्दी जैसे कट्टरपंथी सिलसिलों के संत सल्तनत काल और मुगल काल में दरबारों के कृपापात्र भी बन बैठे और शासकों को हिन्दुओं पर कहर ढाने के लिए उकसाया।
मित्रों,आप ही बताईए कि जिस धर्म में ईश्वर से लव या प्रेम करने की ही मनाही हो उसके बंदे किस प्रकार आपस में या दूसरे धर्म के लोगों के साथ प्रेम कर सकते हैं? सदियों पहले अरब देश में लैला-मजनू ने प्रेम किया था लेकिन मुस्लिम समाज ने उनको गले से नहीं लगाया बल्कि उनके प्रेम को गुनाह मानते हुए उनको सजा दी,तंग किया और अंततः वे जीते-जी एक नहीं हो पाए।
मित्रों,प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज होता है यह कहावत सामी धर्मों में ही अनुकरणीय हो सकता है क्योंकि वे ही ऐसे हैं जो मानते हैं कि प्रेम भी युद्ध होता है और उसमें भी तमाम दाँव-पेंच आजमाए जा सकते हैं। प्रेम का असली मतलब पता हो तब न! प्रेम का असली मतलब तो भारत को पता है। भारत में तो कबीर और सूर कहते हैं कि ईश्वर से प्रेम करना ही चाहिए और प्रेम करना ही ईश्वर की ईबादत का सर्वश्रेष्ठ तरीका है। प्रेम ही ईश्वर है और प्रेम में ही ईश्वर का निवास होता है इसलिए जिसने प्रेम को जान लिया उसने ही ईश्वर को जाना। प्रेम में छल और धोखे का कोई स्थान नहीं होता। प्रेम सर्वदा शुद्ध होता है जहाँ उसमें छल की मिलावट हुई कि प्रेम प्रेम नहीं रह जाता लेकिन हम देख रहे हैं कि इन दिनों सनातन धर्मी भी प्रेम में धोखा करने लगे हैं। जबर्दस्ती एकतरफा प्रेम करने लगे हैं और अपनी प्रेमिकाओं को शारीरिक-मानसिक नुकसान पहुँचाने से भी गुरेज नहीं करते। कई बार तो लड़की को सुनसान स्थान पर बुलाकर अपने ईष्ट-मित्रों के साथ मिल कर सामूहिक बलात्कार भी कर डालते हैं। अब ऐसे प्रेम को प्रेम कैसे कहा जा सकता है वह तो शुद्ध वासना हुई।
मित्रों,इन दिनों भारत में कई मुस्लिम युवकों ने एक अजीबोगरीब जेहाद छेड़ रखा है-लव जेहाद। मीडिया के सामने कई मुस्लिम युवकों ने स्वीकार किया है कि वे हिन्दू नाम रखकर फेसबुक और ट्विटर पर या फिर सीधे-सीधे परिचय में हिन्दू लड़कियों के साथ फ्लर्ट करते हैं और अपने जाल में फँसाते हैं और उनको घरों से भगा ले जाते हैं। फिर उस पर धर्म-परिवर्तन के लिए दबाव डालते हैं और सामूहिक बलात्कार जैसा अमानुषिक अत्याचार करते हैं।
मित्रों,प्रेम तो सिर्फ त्याग करना जानता है फिर प्रेम जिहाद या धर्मयुद्ध का हिस्सा कैसे हो सकता है? एक वास्तविक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ अनाचार-अत्याचार कैसे कर सकता है? जाहिर है कि कानून को ऐसे धोखेबाज वासनापूजकों के साथ सख्ती के साथ पेश आना चाहिए। साथ ही हिन्दुओं को चाहिए कि वे लव-जेहाद के प्रति अपनी बहन-बेटियों को सचेत करें जिससे कि वे गलत लोगों के प्रेमजाल में नहीं फँसे फिर वो चाहे लड़का हिंदू हो या मुसलमान। यह परम-पवित्र भारतभूमि है जहाँ सनातन काल से ही महिलाओं की पूजा होती रही है न कि अरब देश जहाँ पर सदियों से महिलाओं की मंडी लगती है जैसी मंडी अभी ISIS लगा रहा है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

6.9.14

य़ा खुदा अपने बंदों से यजीदियों की रक्षा कर!-ब्रज की दुनिया

 6 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कहते हैं कि इस्लाम शांति का मजहब है लेकिन विडंबना यह है कि जबसे धरती पर इस्लाम का आगमन हुआ है हिंसा बढ़ी ही है। तैमूरलंग,चंगेज खाँ,महमूद गजनबी,बलबन,अलाउद्दीन खिलजी,औरंगजेब,नादिरशाह,अहमद शाह अब्दाली,ओसामा बिन लादेन,सद्दाम हुसैन जैसे सैंकड़ों ऐसे इस्लाम के बंदे अब तक हो चुके हैं जिनके लिए इंसानी चीखों,मानवीय दर्द और वेदनाओं-संवेदनाओं का कोई मतलब नहीं था। इन लोगों ने एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में तलवार को धारण किया और गिरफ्त में आए निरीह मर्दों और औरतों से बस इतना ही पूछा कि यह चाहिए या वह और आज ISIS भी कुर्दों,शियाओं और यजीदियों से यही प्रश्न व उसी प्रकार से पूछ रहा है। मैं नहीं जानना चाहता कि कुरान और हदीस में दूसरे मजहबों के प्रति हिंसा और असहिष्णुता बरतने के बारे में क्या कहा गया है लेकिन मैं यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि ISIS आज इस्लाम के नाम पर यजीदियों के साथ जो कुछ भी कर रहा है दरअसल शैतानियत वही है।
मित्रों,मेरे मतानुसार इंसानों साथ शैतानों जैसा व्यवहार करना ही शैतान को पूजना है। धर्म और विश्वास व्यक्तिगत बातें हैं और इस वर्तमान दुनिया में किसी को भी इस बात का हक नहीं है कि वो किसी और को अपना धर्म मानने के लिए बाध्य करे। पूरी दुनिया में मात्र ईराक और सीरिया में मात्र 5 लाख की संख्या में शेष बचे यजीदियों को अगर इस समय बचाया नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं जब वे इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। ISIS आतंकी आज यजीदी पुरुषों की सामूहिक हत्या कर रहे हैं और ISIS चीफ बगदादी का आदेश है कि 35 वर्ष से कम उम्र की सारी यजीदी महिलाओं को बंदी बना लिया जाए। इन बंदी महिलाओं को ISIS आतंकी पहले तो इस्लाम कबूल को कहते हैं और कबूल लेने पर चंद डॉलर में अपने लड़ाकों के हाथों बेच देते हैं और जो यजीदी महिलाएँ ऐसा करने से मना कर दे रही हैं उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है और ऐसा करते हुए यह नहीं देखा जाता कि लड़की 5 साल की है या 7 साल की है या 14 साल की। क्या इस्लाम में महिलाओं को बेचने और उनके साथ सामूहिक बलात्कार करना धार्मिक कृत्य है? अगर नहीं तो फिर ISIS की क्रूरता के खिलाफ दुनियाभर के उन मुसलमानों का खून क्यों नहीं खौल रहा है जो एक कार्टून को लेकर पूरी दुनिया की सड़कों पर उतर आते हैं? क्या इस मामले में वे मौनम् स्वीकृति लक्षणम् पर अमल नहीं कर रहे हैं?
मित्रों,सामान्य लोक-व्यवहार यह कहता है कि हमें दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए दूसरों से हम जिस तरह के व्यवहार की उम्मीद रखते हैं। आज ISIS के इस्लामिक लड़ाके दूसरे पंथों के अल्पसंख्यक अनुयायियों के साथ जैसा व्यवहार ईराक और सीरिया में कर रहे हैं अगर कल किसी ऐसे देश में जहाँ कि वे अल्पसंख्यक हैं उनके साथ भी वही सब हुआ तो क्या वे इसे ईराम और सीरिया की तरह सामान्य घटना मानकर स्वीकार कर लेंगे? धरती पर रहनेवाला कोई भी व्यक्ति कैसे ऐसा सोंच सकता है कि सिर्फ वही ठीक-ठीक सोंच सकता है और सोंचता है और बाँकी लोग गलत हैं इसलिए बाँकियों को या तो उसकी सोंच को मान लेना चाहिए यानि उसकी तरह ही सोंचना चाहिए या फिर मरने के लिए तैयार रहना चाहिए? महिलाएँ तो ब्रह्मा हैं,सृष्टि करती हैं फिर उनके साथ पशुओं से भी ज्यादा बुरा व्यवहार कोई कैसे कर सकता है? महिला के गर्भ से उत्पन्न होनेवाला कोई भी पुरूष कैसे महिलाओं के साथ शैतानों जैसा,नरपिशाचों जैसा व्यवहार कर सकता है फिर ISIS तो ऐसे नरपिशाचों की सेना ही है। या खुदा मैं जानता हूँ कि तू बहुत दयालु और इंसाफपसंद है। या अल्लाह अपने महाक्रूर बंदों को या तो सद्बुद्धि दे या फिर उनको किसी तरह से रोक नहीं तो वे धरती से इंसानियत का ही नामोनिशान मिटा देंगे और तब पूरी दुनिया पूँछ विहीन पशुओं की दुनिया रह जाएगी। जिस तरह एक बगीचे में तरह-तरह के फूल होते हैं उसी तरह से इस धरती पर तुझे माननेवाले भी तरह-तरह के हैं। हे ईश्वर,अपने बगीचे को तबाह होने से बचा। अब ऐसा केवल तू ही कर सकता है क्योंकि ISIS के आगे पूरी दुनिया के मानव तो लाचार हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

5.9.14

आचार्य और टीचर

आचार्य और टीचर

पण्डित विष्णु शर्मा और आचार्य चाणक्य को शिक्षक दिवस पर हिन्दुस्थान नमन
करता है। इनकी बात आज इसलिए क्योंकि हिन्दुस्थान में इनके जैसा शिक्षक
नहीं हुआ। बिना भारी भरकम किताबों के बोझ के इन्होने सम्राट बनाये। विष्णु
शर्मा की पंचतन्त्र की कहानियाँ मुर्ख राजकुमारों को बुद्धिमान और चतुर राजकुमार
बना देती है तो आचार्य चाणक्य की नीति साधारण बच्चे को सम्राट बना देती है। उस
समय भारतीय शिक्षा और शिक्षकों में ऐसा कौनसा गुण था जो नीडर ,साहसी ,देशभक्त
नीतिज्ञ,धर्मात्मा और पुरुषार्थी नागरिक देता था और आज की शिक्षा प्रणाली में कौनसे
ऐसे दोष पनप गए हैं कि राष्ट्र ऐसे नागरिकों के लिए तरस रहा है। आज के अंग्रेजी पढ़े
लिखे युवाओं से जब मैं सवाल करता हूँ कि "तुम आगे क्या करना चाहते हो "?इसका
90 %उत्तर मिलता है -अच्छी नौकरी। पहले हमारे देश के शिक्षक राजा बनाते थे और
आज के शिक्षक नौकरी करने वाले युवा तैयार कर रहे हैं। फिर भी हम गर्व करते हैं कि
हम पढ़ लिख गए हैं ! शिक्षा सर्वांगीण विकास के लिए दी जाती थी और अब मेकाले
आधारित शिक्षा पद्धति पेट भरने का झुगाड़ सिखाती है। शिक्षा जब व्यवसाय बन जाती
है तब शिक्षार्थी शिक्षक का आदर क्योंकर करेगा और शिक्षक को समय पर वेतन मिल
रहा है तो वह छात्रों की चिन्ता क्यों करेगा। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों को अनुभव पथ
पर चलना सीखा कर मंजिल तक पहुँचाना होना चाहिये और हमारी सरकार बच्चों को
केवल रट्टा तोता बना कर कर्तव्य पूरा कर रही है। आजाद भारत के युवकों को
स्वावलम्बी शिक्षा चाहिये वह कब मिलेगी   … क्या पता !!!   

4.9.14

क्या इमरान खान केजरीवाल के पाकिस्तानी संस्करण हैं?-ब्रज की दुनिया

क्या इमरान खान केजरीवाल के पाकिस्तानी संस्करण हैं?

4 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यह हमारे लिए बड़े ही हर्ष का सबब है कि भारत भले ही अबतक विश्वगुरु नहीं बन पाया हो लेकिन भारत का ही एक लाल अरविंद केजरीवाल इस पद को पाने के अधिकारी बन गए हैं। भारत के पड़ोसी और पुराने पट्टीदार पाकिस्तान में उनको एक चेला मिल गया है जो उनकी तरह नालायक और धरनेबाज है। उनका चेला इन दिनों ठीक उसी तरह से पाकिस्तान में रायता फैला रहा है जिस तरह से कभी केजरीवाल जी भारतीयों के दिलो-दिमाग में फैलाया था।
मित्रों,केजरीवाल अमेरिका को परम प्रिय हैं तो इमरान भी अमेरिका के चहेते हैं,केजरीवाल को फोर्ड फाउंडेशन पैसा देता है तो इमरान को भी पश्चिमी देशों से धनालाभ होता है,केजरीवाल ने प्रतिबंधित क्षेत्र में धरना दिया था तो इमरान भी दे रहे हैं,केजरीवाल ने देशभक्ति के गीत बजाए थे और नारे लगाए थे तो इन दिनों इमरान खान भी लगा रहे हैं,केजरीवाल ने अपनी मांगों के पूरा हुए बगैर धरना समाप्त कर दिया था तो कल इमरान खान भी ऐसा ही करनेवाले हैं,केजरीवाल अराजकतावादी हैं तो इमरान भी हैं और कुछ ज्यादा ही हैं,केजरीवाल ने भारतीय संविधान की खिल्ली उड़ाई तो इमरान भी इन दिनों पाकिस्तानी संविधान (मैं नहीं जानता कि यह पाकिस्तान का दूसरा,तीसरा या कौन-सा संविधान है और इसलिए अपनी अल्पज्ञता पर शर्मिंदा भी हूँ) की ऐसी की तैसी कर रहे हैं,केजरीवाल ने इस्तीफा दिया था तो इमरान ने भी अभी-अभी दिया है,केजरीवाल भारत में कांग्रेस की बी टीम के रूप में देखे गए तो इमरान को भी इन दिनों पाकिस्तान में सेना की बी टीम के रूप में देखा जा रहा है।
मित्रों,इन दोनों महापुरुषों की करनी और कथनी में इतनी ज्यादा समानता है कि जितनी भाई-भाई में भी नहीं होती। अंतर इतना ही है कि केजरीवाल को राजनीति में आए जुम्मा-जुम्मा दो साल ही हुए हैं जबकि इमरान खान पिछले 18 सालों से राजनीति के क्रिकेट में नाकाम होते चले आ रहे हैं। अर्थात् गुरू बहुत जल्दी गुड़ से चीनी बन गया और चेले को डेढ़ दशक लग गए मगर दोनों ही बहुत जल्दी फिर से चीनी से गुड़ तो गुड़ सीधे मिट्टी बन गए। दोनों ने ही राजनीति को नौटंकी समझा,दोनों ने ही एक-एक प्रांत में सरकार बनाई लेकिन दोनों की कुछ खास नहीं कर सके। दोनों में अंतर बस इतना है कि केजरीवाल पाकिस्तान में लोकप्रिय थे और इमरान भारत में लोकप्रिय नहीं हैं क्योंकि हम तहेदिल से पाकिस्तान का बुरा नहीं चाहते बल्कि चाहते हैं कि पाकिस्तान समृद्ध और शांतिप्रिय बने। सच यह भी है कि जबतक पाकिस्तान शांतिप्रिय नहीं बनेगा समृद्ध भी नहीं हो सकेगा।
मित्रों,इमरान खान पठान हैं और पठान को समझाना हमने सुना है कि बड़ा कठिन होता है फिर भी हम यह हिमाकत करते हुए उनको कहना चाहते हैं कि नकल करनी है तो नरेन्द्र मोदी की करो,पहले प्रदेश में अच्छा काम करो फिर केंद्र पर दावा ठोंको और पाकिस्तान के पीएम बनो। नाकाम नटकिए की नकल करोगे तो फिर आपका भी वही अंजाम होगा जो उन साहेबान का हुआ है-नहीं समझे क्या? भैया उनको तालियों से कहीं ज्यादा तो अबतक थप्पड़ पड़ चुके हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

3.9.14

विधान सभा में मुनमुन ने बागरी जाति का मामला तो उठाया लेकिन उससे बागरी समाज के हित पूरे होते नहीं दिख रहें है
हाल ही में हुये विस सत्र में जिले के बागरी समाज के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना बंद हो जाने का मामला सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने उठाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जवाब देकर मामले को समाप्त कर दिया कि केन्द्र सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रमाण प. देना बंद किये गये हैं। बागरी समाज का यह विवाद  1998 के विस चुनाव के पहले से चल रहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रमाण पत्र जारी नही होंगें इसकी भनक जैसे ही समाज के लोगों को लगी वैसे ही पूरी समाज में हड़कंप मच गया। बागरी समाज के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हिम्मत सिंह बघेल के नेतृत्व में जिला मुख्यालय में एक विशाल जुलूस निकाला गया था। किसी पार्टी में की गयी कोई शिकायत पर भी नौ महीन बाद कार्यवाही होेती है यह पहली बार ही देखने सुनने को मिला है। जी हां प्रदेश भाजपा कार्यालय ने नवम्बर 2013 में की गयी किसी शिकायत पर सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेकाम और सिवनी के पूर्व पार्षद अजय डागोरिया सहित चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। लोग तो यह कहते भी देखे जा रहें है कि कांग्रेस में बहोरीबंद का बंद खुलता ही नजर नहीं आ रहा है कि जीत कैसे हुयी।
सवाल तो विस में उठा लेकिन बागरी समाज को मिला कुछ नहींः-हाल ही में हुये विस सत्र में जिले के बागरी समाज के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना बंद हो जाने का मामला सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने उठाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जवाब देकर मामले को समाप्त कर दिया कि केन्द्र सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रमाण प. देना बंद किये गये हैं। बागरी समाज का यह विवाद  1998 के विस चुनाव के पहले से चल रहा है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 1978 में केन्द्र की जनता पार्टी सरकार ने जिले की बागरी समाज को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया था। उसके बाद इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना चालू हो गये थे जो कि बिना किसी बाधा के 1997 तक जारी रहे। इस दौन शिकायत होने पर प्रदेश सरकार द्वारा इस जाति की जांच के लिये वैष्ठव समिति का गठन किया था कि इस जाति के लोग अनुसूचित जाति के हैं या नहीं? जिला कलेक्टर मो. सुलेमान के कार्यकाल में वैष्ठव समिति ने  जांच हेतु बागरी बाहुल्य क्षेत्रों का भ्रमण किया था। इस कमेटी ने आपनी रिपोर्ट में इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति में शामिल करने योग्य नहीं माना था तथा इस आशय की रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रमाण पत्र जारी नही होंगें इसकी भनक जैसे ही समाज के लोगों को लगी वैसे ही पूरी समाज में हड़कंप मच गया। बागरी समाज के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हिम्मत सिंह बघेल के नेतृत्व में जिला मुख्यालय में एक विशाल जुलूस निकाला गया तथा समाज का पूरा आक्रोश केवलारी क्षेत्र के तत्कालीन विधायक एवं राज्य सरकार के ताकतवर मंत्री स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ फूट पड़ा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि केवलारी विस क्षेकत्र में सिवनी और केवलारी ब्लाक का बहुत बड़ा ऐसा इलाका शामिल था जिसमें बागरी समाज का बाहुल्य था। ऐन चुनाव के समय बागरी समाज के इस आक्रोश का थामना स्व. हरवंश सिंह के लिये राजनैतिक रूप से बहुत जरूरी था। वे प्रदेश सरकार की राजनैतिक मामलों की समिति के भी सदस्य थे। उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुये इस रिपोर्ट पर पुर्नविचार करने का प्रस्ताव लेकर उसे लंबित करा दिया था। इसके बाद उसी बागरी समाज के उनका ग्राम भोंगाखेड़ा में पगड़ी और शाल पहना कर सम्मान भी किया था। 1998 का चुनाव निपटने के बाद कब वैष्ठव समिति की रिपोर्ट अनुशंसा के साथ केन्द्र सरकार को भेज दी गयी और कब केन्द्र की एन.डी.ए. सरकार ने उसे मंजूर कर लिया? इसकी भनक तक किसी को नहीं लगी। जब प्रमाण पत्र मिलना फिर से बंद हो गये तब पता चला कि खेल खत्म हो गया है। तब से लेकर अब तक चाहे कांग्रेस हो या भाजपा उसके नेता इस सामज के लोगों को दिलाया ही देते आये हैं लेकिन किसी ने भी ऐसी पहल नहीं कह है जिससे उसे पुनः वो लाभ मिल सके। अब विधायक बनने के बाद मुनमुन ने यह मामला विधानसभा में उठाकर अखबारों की सुर्ख्राी तो बटोर ली लेकिन नतीजा सिफर ही निकला है। आज तक किसी ने भी यह मांग नहीं उठायी कि वैष्ठन समिति की रिपोर्ट पर आपत्तियों के कारण एक नयी जांच समिति बनायी जाये और उस जांच समिति के आधार पर प्रदेश सरकार अपनी नवीन अनुशंसा केन्द्र सरकार को भेजे ताकि बागरी समाज को एक बार फिर से अन.जाति के प्रमाण पत्र मिलना प्रारंभी हो सके।
विस चुनाव में भीतरघात करने का नोटिस मिला अशोक टेकाम को:-यह ताक शाष्वत सत्य है कि मां के गर्भ मे नौ महीने रहने के बाद ही शिशु का जन्म होता है। लेकिन किसी पार्टी में की गयी कोई शिकायत पर भी नौ महीन बाद कार्यवाही होेती है यह पहली बार ही देखने सुनने को मिला है। जी हां प्रदेश भाजपा कार्यालय ने नवम्बर 2013 में की गयी किसी शिकायत पर सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेकाम और सिवनी के पूर्व पार्षद अजय डागोरिया सहित चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया है कि क्यों ना आपके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाये? आरोप है कि उन्होंने विस चुनाव में भीतरघात किया है। हालांकि नोटिस में यह भी स्पष्ट नहीं है कि शिकायत किसने की है और किस विस क्षेत्र में इन नेताओं ने भीतरघात किया है या पूरे जिले में भाजपा की इस दुर्गति के लिये भी ये ही जवाबदार हैं?जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में इन नोटिसों को आगामी सहकारी बैंक के चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है। 
बहोरीबंद के बंद ही नहीं खुल पा रहें हैं कांग्रेस में:-वैसे तो विधानसभा के उप चुनावों के परिणाम देश में कांग्रेस के लिये संजीवनी का काम कर गये है।बिहार और पंजाब के साथ ही कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में भी एक सीट पर जीत दर्ज की हैं। कांग्रेस ने भाजपा से बहोरीबंद सीट छीन कर जीत दर्ज की है। बहोरीबंद सीट की जीत को लेकर प्रदेश के स्टार प्रचारक एवं पूर्व मंत्री स्व. हरवंश सिंह के पहली बार विधायक बने रजनीश सिंह की प्रशंसा में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमे युवा रजनीश को जीत का पूरा श्रेय देते हुये बताया गया कि कैसे उन्होंने वहां प्रयास कियें जो सफल हुये। जिले के कांग्रेस के दूसरे युवा विधायक योगेन्द्र सिंह बाबा, जो कि हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह के बेटे हैं, ने विज्ञप्ति जारी कर बहोरीबंद सीट पद कांग्रेस की जीत को जनता की जीत बताया और कहा कि कांग्रेस की एकता और क्षेंत्रीय कार्यकर्त्ताओं की मेहनत से यह जीत पार्टी को मिली है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जिस हिस्से का उन्हें प्रभारी बनाया गया था वहां से पार्टी को भारी जीत हासिल हुयी है।वहीं दूसरी ओर जिला कांग्रेस कमेटी ने इस जीत पर कोई बयान भी जारी नहीं किया है। अब ऐसे हालात में लोग तो यह कहते भी देखे जा रहें है कि कांग्रेस में बहोरीबंद का बंद खुलता ही नजर नहीं आ रहा है कि जीत कैसे हुयी। “मुसाफिर”
Sabhar Darpan Jhoot Na Baole Seoni
02 Sep 2014

2.9.14

पूरे तंत्र के सड़ जाने का प्रतीक है रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल हसन-ब्रज की दुनिया

2 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अभी तक हमारे देश में जो भी आपराधिक मामले सामने आ रहे थे सौभाग्यवश उनका संबंध तंत्र के किसी एक या दो हिस्से से होता था। इसलिए अब तक चर्चा राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार के सर्वव्यापीकरण तक ही सीमित होती थी लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी आपराधिक घटना का आयाम एक साथ समाज.खेल,विधायिका,न्यायपालिका और कार्यपालिका तक विस्तृत हो। तो क्या हमारा संपूर्णता में नैतिक पतन हो गया है या फिर नहीं हुआ है तो क्या होने नहीं जा रहा है? पहले जहाँ रिश्वत में पैसे लिए जाते थे अब पैसों के साथ ही सेक्स का लिया जाना क्या दर्शाता है? क्या हमारा महान भारतीय समाज अब मनुष्य के और भी तीव्र पशुकरण के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो गया है?
मित्रों,यह कितने आश्चर्य का विषय है कि एक अदने-से शातिर युवक ने पैसे और सेक्स के दम पर मात्र चार-पाँच सालों में इतना लंबा-चौड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया जितना बनाने में ईमानदार व्यक्ति की कई पीढ़ियाँ खप जातीं! उसके घर पर राजनीतिज्ञों की परेड लगती है,पुलिस अधिकारी उसकी कृपा पाने के लिए तरसते हैं,जज उससे पूछ कर फैसला लिखते और करते हैं और राजपूत समाज की एक विश्वप्रसिद्ध बेटी का बाप बिना गहराई से खानदान की जाँच-पड़ताल किए सिर्फ उसके रुतबे को देखकर अपनी बेटी की शादी उसके साथ कर देता है। समाज और तंत्र के सबसे निचले स्तर से सबसे ऊपरी स्तर तक पतन-ही-पतन।
मित्रों,हमने तो सुना था कि सबहिं नचावत राम गोसाईं मगर यह कैसा युग आ गया है कि सबहिं नचावत रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल हसन? कल्पना की जा सकती है कि रकीबुल के नजदीकी जज किस तरह न्याय करते होंगे,उसके नजदीकी पुलिस अधिकारी किस प्रकार से पुलिसिया जाँच को सही परिणति तक पहुँचाते होंगे और उसके इशारों पर नाचनेवाले मंत्री किस तरह से झारखंड में सुशासन यानि गुड गवर्नेंस की स्थापना के लिए प्रयत्नशील रहे होंगे! यहाँ रकीबुल के तीव्र उत्थान के लिए हमारा समाज भी कम दोषी नहीं है जो आज धर्म और ईमानदारी पर चलनेवालों को नहीं बल्कि धनवानों को पूजने लगा है और उनको ही अपना आदर्श मानने लगा है। जिस समाज के लिए साधन की पवित्रता आज बेमानी हो चुकी है और सबको सिर्फ और सिर्फ पैसा और शारीरिक सुख चाहिए वह समाज अंत में वहीं तो पहुँचेगा जहाँ उसको रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल ने पहुँचाया है। मैं नहीं जानता कि तारा शाहदेव के पिता को इस होनहार लड़के के बारे में किसने बताया था लेकिन उनको लड़के के गोत्र और खानदान के बारे में विस्तार से पता तो लगाना ही चाहिए था। फिर जिन लड़कियों का इस्तेमाल रंजीत उर्फ रकीबुल अफसरों के आगे परोसने में करता था वह भी तो आखिर किसी की बेटी होंगी। कदाचित् ऐसी बेटी जो मैडोना और सनी लियोन को अपना आदर्श मानती हैं और जिनके लिए नैतिकता का कोई मूल्य नहीं है। जिनके मन में एकसाथ सिर्फ पैसों और वासना की भूख है।
मित्रों,आखिर हमारा भारतीय समाज किस मार्ग पर जा रहा है? क्या इस मार्ग पर चलकर हम भारत को विश्वगुरु बनाएंगे? क्या प्राचीन काल से पूरी दुनिया में भारत का सम्मान इन्हीं घोर प्रवृत्तिवादी प्रवृत्तियों को लेकर रहा है? क्या भारत की ऋषि-मुनियों की संतानों को पश्चिम के चिर-असभ्य समाज की आँखें बंद कर नकल करनी चाहिए? कभी स्वामी विवेकानंद ने सत्कर्म और अकर्म की परिभाषा देते हुए कहा था कि जो कर्म हमें ईश्वर के निकट ले जाए वह कर्त्तव्य है और जो ईश्वर से दूर ले जाए वह अकर्त्तव्य है। मैं मानता हूँ कि प्रत्येक भारतीय को भारत के उस महान सपूत द्वारा दी गई कसौटी पर अपने कर्मों को कसना चाहिए और तदनुसार अपने आपमें सुधार लाना चाहिए। वैसे आप क्या मानते हैं? जबकि हमारे आदर्श ही बदल गए हैं तो फिर कोई क्यों कर कसे खुद को स्वामी विवेकानंद की कसौटी पर और क्यों चले उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर हम जैसे कुछ दीवानों और पागलों को छोड़कर???
मित्रों,ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज आज बंद गली के आखिर में आकर फँस गया हो। अपने कई-कई आलेखों में हमने भारतीय समाज के नैतिक उत्थान के मार्ग बताए हैं। हमने बार-बार कहा है कि हमें अपने बच्चों को संस्कृत और संस्कृति की शिक्षा देनी होगी,इस्लाम का भारतीयकरण करना होगा लेकिन जब अभिभावक ही पैसों और तीव्र भोगवाद के पीछे अंधी दौड़ लगाने में लगे हों तो फिर उनसे हमारे सुझावों के अनुपालन की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है? जब बिहार जैसे महान राज्य का मुख्यमंत्री कहता है कि मेरे विवाहित बेटे ने एक विवाहित महिला पुलिस अधिकारी के साथ विवाहेतर शारीरिक संबंध स्थापित करके कोई अपराध नहीं किया है तो फिर बेटा क्या कुछ गलत नहीं करेगा क्योंकि तब तो कोई भी गलत काम गलत है ही नहीं?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

भारत और जापान

भारत और जापान 

हिन्दुस्थान और जापान में पिछले साठ वर्ष में एक बड़ा अंतर आया है। भारत में पिछली
सरकारों ने भारतीयों के देश प्रेम की धधकती ज्वाला पर ठण्डा पानी डाला है या देश भक्ति
के अँगारे पर राख की मोटी परत जमने दी। पिछली सरकारों ने देश के गौरवपूर्ण इतिहास
को झूठी धर्मनिरपेक्षता की घास को उगाने के लिए तोड़ मरोड़ दिया,देश को विदेशी भाषा के
नागफाँस में झकड दिया ,देश की भाषा और संस्कृति को तहस नहस किया,भारत के वेद
पुराण और शास्त्रों से भारतीयों को अन्धविश्वास कह कर अलग कर दिया। इसका दुष्परिणाम
यह हुआ कि भारतीयों को अपना गौरव पूर्ण इतिहास बासी लगने लगा ,हमारे रामायण ,गीता
से ग्रन्थ काल्पनिक कहानी लगने लगे ,हमारी देवीशक्तियाँ देवत्व खो कर तामसिक बनने
लगी। हमारे देव पुरुष पौरुषहीन होते चले गये जबकि जापान पर अणुबम्ब गिरा कर रीढ़
हीन करने का प्रयास हुआ मगर जापान अपने इतिहास,अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति पर
गर्व और विश्वास करके कर्म पथ पर चलता रहा ,लाखों बार प्राकृतिक आपदाएँ आयी मगर
जापान सिर उठा के चलता रहा। देश भक्ति का जज्बा भारतीयों में जो स्वतंत्रता से पहले
था वो ना जाने कहाँ दफन हो जाने दिया जबकि जापानियों में आज भी देश भक्ति का जज्बा
जगमगा रहा है। हम अपने ही देशवासियों के धन को लोकतंत्र की दुहाई देकर खुद ही लूटते
रहे और भ्रष्टाचार के विषधर को पोषण देते रहे और जापानी लोग देश का पैसा देश का समझ
सबका विकास करते गए।
  आज कितने काँग्रेसी नेता ऐसे बचे हैं जो देश के सामने यह कहने की हिम्मत रखते हैं कि
मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है ,अपने हिंदुत्व पर गर्व है ,श्री राम और कृष्ण जैसे महापुरुषों
की संतान होने पर गर्व है ?कोई नहीं ना ,यही कारण है देश की दुर्गति होने का ,क्योंकि हम
करोडो देशवासी वर्षों तक अपने पर गर्व महसूस ना कर सके,खुद को भूलकर जिन्दा लाश
की तरह घसीटते रहे। 
 इस देश को अब भी जापान के समकक्ष बनाया जा सकता है,यह काम हम हिंदुस्थानी लोगों
को ही करना है चाहे आज करे या कल। हमें अपने धर्म के महापुरुषों से जुड़ना होगा जिनके
एक हाथ में पुष्प है तो एक में चक्र भी है। एक हाथ से शांति की अपील है तो दूसरे हाथ में
धनुष भी है। जिनके एक हाथ में ज्ञान का शास्त्र है तो दूसरे हाथ में शस्त्र भी है। हमारे महा
पुरुष हमें सद्भाव और शक्ति का तालमेल सीखाते हैं।
हम देश भक्त बनने से पहले परिवार भक्त बने,अपने परिवार को सभ्य,सुसंस्कृत ,शिक्षित,
नीडर और धर्म का अनुसरण करने वाला बनाये यदि हम तीन चार साल लगातार इस काम
पर डटे रहे तो देश को जापान से बढ़कर बनने में देर नहीं लगेगी             

28.8.14

बिहार सरकार की वेबसाईट पर मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों के गलत नंबर हैं दर्ज-ब्रज की दुनिया

28 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार सरकार के मंत्रियों की हरकतों पर अगर नजर डालें तो वे लोग ऑन लाईन गवर्नमेंस का खूब जिक्र करते हैं। अभी कल-परसों ही जब दिल्ली में प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया पर राज्यों के आईटी मंत्रियों की बैठक बुलाई थी तो बिहार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री शाहिद अली खान इस तरह से बिहार सरकार के डिजिटलाईजेशन पर बोल रहे थे मानो इस मामले में बिहार ने बाँकी राज्यों पर मीलों की बढ़त हासिल कर ली हो लेकिन हकीकत तो यह है कि बिहार सरकार की अधिकृत वेबसाईट पर मुख्यमंत्री का फोन नंबर ही गलत दिया गया है। अगर आपने बिहार सरकार की वेबसाईट पर से कोई नंबर नोट किया है तो कृपया जाँच लीजिए कि वह नंबर काम कर भी रहा है कि नहीं।
मित्रों,बिहार सरकार के प्रशासन में न सिर्फ तृणमूल स्तर पर अव्यवस्था का वातावरण है बल्कि उच्च स्तर पर ऐसी ही स्थिति है और बिहार सरकार की वेवसाईट भी इसका अपवाद नहीं है। उदाहरण के लिए बिहार सरकार की मुख्य वेबसाईट पर बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के कार्यालय के जो दो फोन नंबर 0612-2223886 और 2224784 दिए गए हैं वे दोनों ही नंबर गलत हैं और काम नहीं करते हैं। इसी तरह बिहार सरकार में पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री वैद्यनाथ सहनी का जो नंबर दिया गया है 0612-2230496 भी गलत नंबर है तो भवन निर्माण विभाग की वेबसाईट पर भवन निर्माण मंत्री दामोदर राऊत और कला संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री विनय बिहारी का नंबर ही नहीं दिया गया है लगता है कि मंत्रीजी गोपनीयता में कुछ ज्यादा ही विश्वास रखते हैं।
मित्रों,परिवहन विभाग की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री रमई राम का जो नंबर दिया गया है उस पर सेवा अस्थायी रूप से बंद है तो इतिहास में अपना ऊँचा स्थान रखने वाले बिहार के पर्यटन विभाग की वेबसाईट रहस्यमय परीकथा की तरह प्रतीत होती है जिस पर फोटो-ही-फोटो है लेकिन इस विभाग का मंत्री कौन है और उसका नंबर क्या है का कहीं अता-पता नहीं है।
मित्रों,वाणिज्य कर विभाग की तो वेबसाईट खुलती ही नहीं है। बड़े ही दिलचस्प तरीके से सहकारिता मंत्री जय कुमार सिंह  के कार्यालय का वही नंबर दिया गया है जो मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का है 0612-2224784 और जो काम भी नहीं करता। इसी तरह वित्त विभाग की वेबसाईट पर वित्त मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव का जो नंबर दिया गया है वही नंबर मुख्यमंत्री मांझी का भी है-0612-2223886 तो ऊर्जा विभाग की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का जो नंबर दिया गया है वह भी गलत है और लगाने पर यह नंबर मौजूद नहीं है की घोषणा सुनाई देती है। इसी तरह खनन और भूतत्व विभाग के मंत्री रामलखन राम रमन का भी वही नंबर बताया गया है जो मुख्यमंत्री का है जो गलत भी है-2223886।
मित्रों,उद्योग मंत्री भीम सिंह का एक नंबर 0612-2215430 गलत है तो दूसरा नंबर 2215431 सही है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की वेबसाईट से विभाग का मंत्री कौन है का पता ही नहीं लगता। पहले इंफॉरमेशन और फिर अबाउट अस पर क्लिक करने पर पता चलता है विभाग के सचिव के रूप में प्रत्यय अमृत हैं। पता नहीं यह जानकारी सही है या गलत लेकिन उनका जो फोन नंबर-0612-2212390 दिया गया वह जरूर गलत है।
मित्रों,सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की वेबसाईट पर कॉन्टैक्ट पर क्लिक करने पर जो पेज खुलता है उस पर सर्च में ऑनरेबल मिनिस्टर डालने पर फिर से वही पेज खुल जाता है और बार-बार कोशिश करने पर भी फिर से खुलता रहता है मगर नंबर नहीं मिलता। संसदीय कार्य मंत्री श्रवण कुमार का तो विभाग की वेबसाईट पर नंबर ही नहीं दिया गया है और वेबसाईट पर दी गई फोन डाइरेक्ट्री का लिंक भी काम नहीं करता है।
मित्रों,पंचायती राज विभाग की वेबसाईट पर विभाग के मंत्री विनोद प्रसाद यादव का नंबर नहीं दिया गया है और न ही यहाँ दिया गया कॉन्टैक्ट्स लिंक ही काम करता है। हाँ वेबसाईट के डाटाबेस लिंक पर क्लिक करके आप राज्य की किसी भी पंचायत,जिला परिषद या पंचायत समिति प्रतिनिधि का नाम और फोन नंबर जरूर प्राप्त कर सकते हैं।
मित्रों,अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग की वेबसाईट पर विभाग का मंत्री कौन है का पता ही नहीं चलता,Directory पर क्लिक करने पर विभागीय सचिव हुकुम सिंह मीणा का नंबर प्राप्त होता है जो गलत है। इसी तरह की अव्यवस्था की शिकार समाज कल्याण मंत्रालय की वेबसाईट भी है जहाँ महिला मंत्री की तस्वीर तो लगी हुई है लेकिन नाम तक नहीं बताया गया है फोन नंबर तो दूर की बात रही। इसी वेबसाईट पर उपलब्ध एक लिंक मीट द मिनिस्टर पर जाने पर भी न तो मंत्री के नाम का और न ही नंबर का ही पता चल पाता है। वैसे इस विभाग को इन दिनों श्रीमती लेसी सिंह संभाल रही हैं। बिजली विभाग की मनमानी से पूरे बिहार की बिहार की जनता परेशान हैं लेकिन बिहार सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं। तभी तो ऊर्जा विभाग और बीएसपीएचसीएल की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री श्री जीतनराम मांझी और विभागीय सचिव अमृत प्रत्यय दोनों के ही नंबर गलत हैं। न तो ऊर्जा मंत्रालय की वेबसाईट पर,न तो बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड और न ही नॉर्थ बिहार पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी लिमिटेड की वेबसाईट पर ही उपभोक्ताओं के लिए कोई कस्टमर केयर की सुविधा दी गई है। एनबीपीडीसीएल की वेबसाईट पर एक नंबर दिया भी गया है मगर उस पर सिर्फ ट्रांसफार्मर के जलने या काम नहीं करने की ही शिकायत की जा सकती है।
मित्रों,कुल मिलाकर बिहार में किस तरह से शासन-प्रशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का सदुपयोग किया जा रहा है का सबसे अच्छा उदाहरण है बिहार सरकार की वेबसाईट। बिहार सरकार में इन दिनों हर स्तर पर हर विभाग में कहीँ भी व्यवस्था नाम की चीज नहीं है। ऐसा हो भी क्यों नहीं जो सरकार अपनी वेबसाईट तक को दुरूस्त नहीं रख पाती हो वो राज्य को कैसे दुरूस्त करेगी और रखेगी?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

26.8.14

बिहार के उपचुनाव भाजपा के लिए सबक?!-ब्रज की दुनिया

26 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,वैसे तो बिहार में जो दस सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं उनका कोई मतलब नहीं था। इससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़नेवाला था और मुझे नहीं लगता कि वर्तमान विधानसभा के बचे हुए एक साल में जीतनेवाले 10 उम्मीदवार अपने क्षेत्र के लिए कुछ खास कर पाएंगे लेकिन फिर भी चुनाव तो चुनाव होते हैं। मैच चाहे लीग स्तर का हो या नॉक आउट,20-20 हो या टेस्ट, जीत जीत होती है और हार हार।
मित्रों,इस साल के लोकसभा चुनावों में जिस तरह एनडीए ने बिहार में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था लगता है कि भाजपा के बिहारी नेता उससे कुछ ज्यादा ही फूल गए। उनको लगा कि बिहार की जनता ने सिर्फ उनको ही वोट दिया है और उसके सामने विकल्पहीनता की स्थिति है। वास्तविकता तो यह है कि उस समय बिहार की जनता ने बिहार की जनता की तरह नहीं बल्कि भारत की जनता के रूप में वोट दिया था। वास्तविकता यह भी है कि उस समय भी एनडीए के पक्ष में कम विपक्ष में ज्यादा मत पड़े थे। फिर उस चुनाव में भाजपा के पास एक मजबूत,प्रतिभासम्पन्न और प्रखर सेनापति मौजूद था। उस समय भाजपा का प्रचार अभियान भी काफी सुव्यवस्थित और सुसंगठित तरीके से चला था।
मित्रों,लगता है कि एनडीए ने इन उपचुनावों को गंभीरता से लिया ही नहीं जबकि महागठबंधन ने इस अपने अस्तित्व का प्रश्न बना लिया था। शायद यह कारण भी था कि भाजपा समर्थक मतदाताओं ने मतदान में कम संख्या में भाग लिया जिसका प्रभाव कुल मतदान की संख्य़ा पर भी पड़ा। 10 सीटों में से 9 सीटों पर सिर्फ भाजपा चुनाव लड़ रही थी और लोजपा ने सिर्फ एक सीट पर और रालोसपा ने तो किसी भी सीट पर लड़ने में अपनी रूचि ही नहीं दिखाई शायद इसलिए उसको अपने बाँकी दो सहयोगी दलों के समर्थकों का मत भी पूरी तरह से नहीं मिल सका। रही-सही कसर टिकट-वितरण में की गई गड़बड़ी ने पूरी कर दी जिससे पार्टी को लगभग हरेक सीट पर बागी उम्मीदवारों का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए मोहिउद्दीननगर में हमेशा राजद का वोट बैंक ज्यादा मुखर और सशक्त रहा है फिर भी वहाँ भाजपा ने बाहरी उम्मीदवार को खड़ा कर दिया। मतलब भाजपा को अभी भी निचले स्तर तक स्थानीय व जिताऊ उम्मीदवार तलाशने में परेशानी हो रही है जैसा कि 2010 के विधानसभा चुनावों में भी हुआ था और यह निश्चित रूप से पार्टी के लिए चिंता का विषय है। जब किसी पार्टी के पक्ष में लहर चल रही होती है तब ऐरे-गैरे नत्थू खैरे भी जीत जाया करते हैं लेकिन जब लहर नहीं चल रही होती है तब मतदाता उम्मीदवार को भी देखता है और भाजपा ने कई सीटों पर उम्मीदवार चयन में गलतियाँ कीं। इतना ही नहीं पार्टी ने जदयू के बागियों की ताकत को आँकने में भी गलती की और लगातार बेवजह अनाप-शनाप बयान देती रही।
मित्रों,इन उपचुनावों में प्रदेश भाजपा नेतृत्व बिखरा हुआ दिख रहा था। इसी तरह प्रचार अभियान में भी बिखराव था और अव्यवस्था थी। बिहार की जनता यह जानना भी चाहती है कि बिहार के अगले मुख्यमंत्री के लिए भाजपा किसको अपना उम्मीदवार बनाएगी। बिहार में ऐसा कौन-सा भाजपा नेता है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह सीना ठोंककर यह कह सके कि मैं न तो खाऊंगा और न ही खाने दूंगा? है कोई नेता जो कह सके कि मैं न तो सोऊंगा और न ही सोने दूंगा? भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी लाख गलतियों के बावजूद भी बिहार की जनता ने उनको दस में से चार यानि सबसे ज्यादा सीटें दी हैं और मत प्रतिशत के मामले में भी वह अकेली सबसे आगे है इसलिए पूरी तरह से हार मान लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है एक सशक्त और तेजस्वी नेतृत्व के हाथों में बिहार भाजपा का सेनापतित्व सौंपने की और फिर सुसंगठित और सुव्यवस्थित तरीके से गहन चुनाव प्रचार करने की। सोशल मीडिया से लेकर जनता से डोर-टू-डोर सीधा संवाद करके उसे बताना होगा कि उसकी झोली में बिहार के लिए कौन-सी योजनाएँ हैं और उन योजनाओं को कैसे प्रभावी तरीके से वह लागू करेगी,कैसे बिहार में वास्तविक सुशासन,पारदर्शिता और ईमानदार शासन-प्रशासन की स्थापना करेगी,कैसे अव्यवस्था,अराजकता और रिश्वतखोरी के प्रति जीरो टॉलरेंसे की नीति अपनाएगी और इन बुराइयों को पूरी तरह से दूर करेगी। इसके लिए बिहार प्रदेश भाजपा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क कर सकती है लेकिन चूँकि बिहार पूरे भारत के लिए हमेशा से कुत्ते की दुम रहा है इसलिए योजनाओं के क्रियान्वयन और शासन से भ्रष्टाचार और घूसखोरी की समाप्ति के लिए उनको विशेष बिहारी उपाय खोजने होंगे और जनता को विश्वास में लेना होगा। हम जानते हैं कि बिहार भारत के सबसे युवा प्रदेशों में से है। बिहार का युवा आज भी अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर जाकर नौकरी करने को विवश है,आज भी बिहार सिर्फ श्रमिकों की आपूर्ति करने का काम कर रहा है। कौन ऐसा बिहारी युवा होगा जो अपने घर में परिवार के साथ रहकर रोजी-रोटी कमाना नहीं चाहेगा? बस भाजपा बिहारी युवाओं को विश्वास दिलाए कि हम बिहार को औद्योगिक प्रदेश बनाएंगे और कैसे बनाएंगे बताए।
मित्रों,फाईनल में टक्कर एक बार फिर से काँटे की होनेवाली है इसलिए इंतजाम अभी से ही करने होंगे। बिहार के युवा अभी भी भ्रष्ट व जातिवादी ताकतों के हाथों का खिलौना बनने को तैयार नहीं हैं बशर्ते उनके पास बेहतर और बेहतरीन विकल्प हो और वह विकल्प इस समय सिर्फ भाजपा ही दे सकती है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

25.8.14

बिहार में इंटर परीक्षा का अंतिम परिणाम कभी आएगा भी?-ब्रज की दुनिया

25 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के बारे में विशेषज्ञ लगातार अपनी राय रखते रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि बिहार एक बीमार मानसिकता का नाम है तो कुछेक कहते हैं कि बिहार एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई ईलाज किसी के पास भी नहीं है। चूँकि मैं एक विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिए मानता हूँ कि बिहार नामक बीमारी भले ही 40-50 साल पुरानी हो,भले ही पिछले कई दशकों से बिहार में सरकार और प्रशासन नाम की चीज नहीं रह गई है,भले ही बिहार आज भी दूसरे राज्यों को सिर्फ श्रम की आपूर्ति करनेवाला राज्य बना हुआ है,भले ही बिहार में परीक्षा के नाम पर मजाक होता हो,भले ही बिहार में अंग्रेजी के शिक्षक संस्कृत की और हिन्दी के शिक्षक अंग्रेजी की कॉपियाँ जाँचते हों लेकिन बिहार फिर भी सुधर सकत है,स्वस्थ हो सकता है लेकिन ऐसा इस सरकार में तो कभी नहीं होगा। इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए सत्ता-परिवर्तन करना होगा। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस समय भी बिहार में जन्म लेना बिहारियों के लिए अभिशाप ही बना हुआ है।

मित्रों,बिहार के करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी ऐसे हैं जो बिहार में जन्म लेने और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित इंटर की परीक्षा देने का दंड भुगत रहे हैं। हुआ यह कि इस साल जब इंटर का रिजल्ट आया तो बड़ी संख्या में छात्र फेल कर दिए गए थे। उनमें से कुछ छात्र तो ऐसे थे जो देश की शीर्षस्थ इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों की नामांकन परीक्षाओं में टॉप किया था। रिजल्ट आते ही पूरे राज्य में छात्रों ने हंगामा खड़ा कर दिया। जगह-जगह आगजनी होने लगी। तत्कालीन शिक्षा मंत्री पीके शाही ने कहा कि कॉपियाँ फिर से जाँची जाएंगी और छात्रों के साथ न्याय होगा।

मित्रों,जब से पुनर्मूल्यांकन अर्थात् स्क्रूटनी का काम शुरू हुआ बिहार सरकार और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को परीक्षक मिल ही नहीं रहे। डेढ़ लाख छात्रों की 8 लाख कापियों की जाँच के लिए मात्र 125 परीक्षक रखे गए हैं। ऐसे में जो होना चाहिए था वही हुआ। देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में नामांकन समाप्त हो चुके हैं। नए सत्र की पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है लेकिन रिजल्ट का अभी भी कहीं अता-पता नहीं है। सूत्र बता रहे हैं कि अभी भी कम-से-कम एक छात्रों की कॉपियों की जाँच होनी बाँकी है। ऐसे में छात्रों को जिनका कि एक साल बर्बाद हो चुका है अब जिंदगी खराब होने का खतरा मंडराने लगा है।

मित्रों, जब इन कॉपियों की जाँच की गई थी तब तो सरकार को पर्याप्त संख्या में शिक्षक मिल गए थे फिर अब क्यों नहीं मिल रहे हैं? क्या तब दूसरे विषय के शिक्षकों से दूसरे विषय की कॉपियाँ जँचवाई गई थीं या फिर परीक्षकों ने धड़ल्ले से बिना पढ़े ही नंबर दे दिये? अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर तब इतनी तेजी में कैसे कॉपियों की जाँच हो गई और अब इतनी धीमी गति से क्यों हो रही है? छात्रों को प्राप्त बेतुके अंकों से भी क्या मेरी यह आशंका सत्य साबित नहीं हो रही है?

मित्रों,एक सप्ताह पहले बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के वर्तमान अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद ने दावा किया था कि 10 दिन में परिणाम घोषित कर दिये जाएंगे लेकिन जबकि एक परीक्षक एक दिन में अधिकतम 30 कॉपियों की ही जाँच कर सकता है तो फिर कैसे दस दिन में 5-6 लाख कॉपियों की जाँच हो सकेगी? क्या फिर से उसी तरह से धड़ल्ले से कॉपियों को बिना पढ़े ही जाँच देने की योजना बनाई गई है जैसे कि पहली बार में किया गया था? फिर स्क्रूटनी का मतलब ही क्या है?

मित्रों, अभी भी कॉपियों को स्ट्रांग रूम में मैनेज वे में नहीं रखा गया है जिससे कि एक-एक को निकालने में काफी समय लग रहा है। बीच में समर वैकेशन के कारण लगभग एक महीने बंद रहा था स्कूल जिसके चलते भी कॉपियों की जाँच की गति धीमी पड़ गई। बोर्ड के पास कॉपी चेक कराने के लिए स्पेस की कमी है।
स्कूल एवं कॉलेज खुले होने के कारण बड़ी संख्या में टीचर्स को एग्जामिनर्स बनाने से क्लासेस बंद हो जाएंगे इसके चलते भी समस्या आ रही है। सरकार अगर अमल करना चाहे तो हम सुझाव देते हैं कि सरकार को स्पेशियस सरकारी या प्राइवेट भवन किराए पर लेना चाहिए जहाँ कि ज्यादा संख्या में परीक्षक कॉपियों की जाँच कर सकें। परीक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए। जरुरत के हिसाब से हर जिले में री-चेकिंग सेंटर बने और आगे से इंटर और मैट्रिक की परीक्षाओं से कदाचार को तो समाप्त किया ही जाए कॉपियों की जाँच की प्रक्रिया को भी इस तरह से चुस्त-दुरूस्त किया जाए कि बिहार में जन्म लेना और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति पर विश्वास करना अभिशाप नहीं बन पाए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)