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19.4.14

हिल गये ना झूठे सेक्युलर !

हिल गये ना झूठे सेक्युलर !

राष्ट्रवाद के सामने छद्म धर्मनिरपेक्षता बुरी तरह हिल गयी ना। पूरा देश एक लहर में
है और वो लहर है राष्ट्रवाद की। इस देश को लम्बे इन्तजार के बाद एक ऐसा नेता
मिला है जो छाती ठोक कर कहता है मैं हर धर्म का आदर करता हूँ पर मुझे अपने
हिंदुत्व पर गर्व है,संस्कृति पर गर्व है ,भारत भूमि पर गर्व है।

इस देश से काँग्रेस का सफाया क्यों हो रहा है ?अध नंगे फकीर की काँग्रेस भारत से
विलीन क्यों हो गयी ? कारण साफ है इस सत्ता ने भारतीयों को दौ समुदाय में बँटने
दिया -अल्प संख्यक और बहु संख्यक इतना ही नहीं बहु संख्यक को बाँटने के लिए
दलित,पिछड़ा ,अति पिछड़ा वर्ग को जाति के आधार खण्डित किया इसका गलत
असर देश के विकास पर पड़ा क्योंकि सभी वर्ग आपस में भ्रमित हो गए। इसका
नुकसान देश और देशवासियों को हुआ और फायदा  … ?

इस प्रपंच से देशवासी विकास से दूर होते गये उनके हिस्से में आई बेकारी,भ्रष्टाचार,
धार्मिक कटटरता,अशिक्षा,भुखमरी और गरीबी। देशवासी स्वराज्य और स्वतंत्रता
के स्वरूप को तरसते रह गये और लालफीताशाही,अफसरशाही तथा नेताशाही के
नागपाश में बंध गए। लोकतंत्र के नाम पर वर्षो तक लूट चली, गरीब और गरीब
होता रहा और राज नेताओ की दया नीतियों पर मृत्यु की प्रतीक्षा करता जीता रहा।

किसे मालुम था कि एक साधारण परिवार से निकला बच्चा देश की पीड़ा को दूर
करने के लिए चट्टान बन कर छद्म धर्मनिरपेक्षता के तूफान को इस तरह रोक देगा !!
आज देश का हर वर्ग बेहाल है,सबको रोजी रोटी चाहिये। पेट की भुख धार्मिक
कटटरता के भाषण से दूर नहीं होती है ,तुष्टिकरण की नीति से दूर नही होती है।
नागरिकों के अधिकारों में जातिगत पक्षपात से सामाजिक भाईचारा ना तो पैदा
होने वाला था और ना हुआ,जातिगत पक्षपात से भाईचारा दूर होता गया और आपस
में मन मुटाव और द्वेष पैदा हुआ।

वर्षो तक अँधेरे में जीने के बाद देशवासी जागरूक होने लगे। सम्मान से रोजी रोटी
कमाकर भाईचारे का सपना देखने लगे। कौन सच्चा और कौन धुर्त है कि पहचान
करने लगे। राष्ट्रवाद के लिए,अमन चैन के लिए,सर्व धर्म समभाव के लिए ,रोजी -
रोटी की सुव्यवस्था के लिए देश ने अब तक के सेक्युलर आकाओ को धराशायी
करके उस नेता का हाथ थाम लिया जो दुसरो के सम्मान की रक्षा का वचन दे रहा
है और खुद के सम्मान की रक्षा में भी समर्थ है। अब परिवर्तन निश्चित है जिसे
रोकने का माद्दा स्वार्थी नेताओं में नहीं है ,यह परिवर्तन नए युग की नींव रखेगा
हम भारतवासी अपने मताधिकार का प्रयोग करके इस दीप की लौ को स्थिर
रखने में सहयोग दे ,यही समय का तकाजा है और छद्म लोगों को तमाचा।           
   

18.4.14

Micro short story-6 `अनपढ़-गँवार । `


Micro short story-6 
`अनपढ़-गँवार । `
सुबह-११.०० बजे ।
 
"बेटे, कामवाली बाई के लड़के, छोटू के साथ मत खेलना, देखा नहीं, 
उसके बाप ने शराब पी कर, कामवाली बाई को कितना पीटा है..! 
ये अनपढ़-गँवार लोग है, इन से दोस्ती रखना अच्छी बात नहीं है ।" 
सिर्फ छह साल का मंथन, कुछ समझा-कुछ ना समझा पर ,
उसने मम्मी के सामने अपना सिर हिला  दिया..!
 
रात - ११.०० बजे ।
 
" आज फिर से, आप शराब पी कर आए, 
मंथन जाग जाएगा तो क्या सोचेगा ? क्या..! 
हाँ, जाओ, आज फिर से मैंने, आप की गर्लफ्रेंड को, 
फोन पर फटकार लगाई है, क्या कर लोगे ? 
ओ..ह, नो..नो.. यु आर हर्टींग मी..
प्लिझ, मत मारो मुझे..सहन नहीं  होता..! 
ओह..अ..अ..अ..गो..ड़..!"
 
दूसरे दिन-सुबह- ९.०० बजे ।
 
" कल रात पापा ने शराब पी कर आप को बहुत पीटा था ना मम्मी? 
अब तो हम भी अनपढ़-गँवार हो गए, 
क्या अब मैं छोटू से साथ खेल सकता हूँ ?"
 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १८-०४-२०१४.



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16.4.14

मैं अकेला हे चला था जानिबे मंज़िल मगर,लोग साथ आते गए करवा बनता गया ---

मैं अकेला हे चला था जानिबे मंज़िल मगर,लोग साथ आते गए करवा बनता गया ---
शुक्रया  आप सभी का-----




क्या एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना कपिल सिब्बल की पत्नी का नहीं है?-ब्रज की दुनिया

16-04-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। क्या कपिल सिब्बल को हिंदू माना जा सकता है? कानून उनको या उनकी पत्नी को भले ही एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना खोलने से नहीं रोकता है लेकिन एक हिन्दू होने के नाते क्या उनको ऐसा करना चाहिए था? वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के समय श्री सिब्बल द्वारा दायर किए गए हलफनामे से पता चलता है साहिबाबाद स्थित एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना जिसका नाम पहले अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड था की मालकिन कोई और नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की पत्नी है। हालाँकि इस बार के हलफनामे में श्री सिब्बल ने इसका जिक्र न जाने क्यों नहीं किया है जिसकी शिकायत भाजपा ने चुनाव आयोग से की भी है।
विदित हो कि सबसे पहले यह गोवधशाला तब चर्चा में आया था जब इसका नाम अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट रखे जाने के खिलाफ जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज ने ऐलान किया था कि वो २ अक्टूबर.2013 को अहमदाबाद मे लाखों लोगों की बड़ी रैली निकालेंगे और कांग्रेस को वोट न देने की अपील करेंगे। बाद में 16-17 सितंबर को दैनिक भास्कर में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमें केप इंडिया के संयोजक डॉ.संदीप जैन ने एक बयान जारी कर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की पत्नी प्रोमिला सिब्बल द्वारा खोले गए बूचडख़ाने का नाम बदलने को जैन समाज की जीत बताया। डॉ.जैन ने बताया कि यह कारखाना साहिबाबाद में है और इसकी कंपनी अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड का कार्यालय दिल्ली में है। उन्होंने बताया कि 24 जैन तीर्थंकरों को अरिहंत के नाम से जाना जाता है, इसलिए यह शब्द जैन धर्म में पूजनीय है। मांस के व्यापार वाली कम्पनी के नाम से अरिहंत शब्द जुडऩे से जैन समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच रही थी।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

15.4.14

मेरे कर्जदार हैं सांसद-पत्रकार हरिवंश-ब्रज की दुनिया

15-04-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात वर्ष 2010 की है। गर्मियों के दिन थे। मैं काफी परेशान था। अपनी छोटी बहन की शादी किए 1 साल से भी ज्यादा समय हो चुका था लेकिन अभी तक मेरी अपनी शादी का कहीं अता-पता नहीं था। अगुआ-वरतुहार (वर की तलाश में भटकनेवाले लड़कीवाले) आते और चले जाते। किसी की लड़की की तस्वीर हमें पसंद नहीं आती तो कोई हमारी बेरोजगारी देखकर खिसक लेता। तभी पिताजी ने सुझाव दिया कि कहीं नौकरी क्यों नहीं कर लेते।
मित्रों,तभी मेरे एक अभिन्न मित्र मीता ने बताया कि इस समय मुजफ्फरपुर में प्रभात खबर की यूनिट खुलने जा रही है। सीधे प्रधान संपादक हरिवंश जी बात करिए,काम हो जाएगा। मैं बात की तो मुझे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वे मुझे जानते हैं और मेरी ब्रज की दुनिया के प्रशंसक भी हैं। उन्होंने मुझे राँची मिलने के लिए बुलाया। रातभर ट्रेन की सीट पर बैठे जागते-सोते हम सावन की रिमझिम फुहारों का आनंद लेते सहरसा-हटिया ट्रेन से राँची पहुँचे। रूकना मेरे मित्र धर्मेन्द्र कुमार सिंह के यहाँ रातु रोड में था। फ्रेश होकर हम प्रभात खबर कार्यालय के लिए रवाना हुए। वहाँ हमारा टेस्ट लिया गया जो मुझे बुरा भी लगा। फिर एचआर विभाग में पूछा गया कि कितना वेतन चाहिए। मैंने बताया दस हजार कम-से-कम। एचआर प्रधान ने कहा कि पिछले एक साल से आपकी आमदनी शून्य रुपया है तो फिर आपको हम इतना क्यों दें? मैंने छूटते ही कहा आपकी मर्जी। फिलहाल तो मुझे भूख लगी हुई है कोई होटल बताईए। उन्होंने झटपट प्रभात खबर के कैंटिन में फोन किया और कहा कि एक व्यक्ति को भेज रहा हूँ खाना खिला देना। मैंने टोंका जनाब जरा गौर से देखिए हम एक नहीं दो हैं और दूसरे ने भी सुबह से कुछ खाया नहीं है। उन्होंने कृपापूर्वक फिर से फोन किया। जब हम खाना खाने के बाद हरिवंश जी से मिलने गए तो उन्होंने कहा कि कुछ दिन बाद हम फोन करके आपको सूचना देंगे। रास्ते में धर्मेन्द्र ने बताया कि प्रभात खबर कई बार नौकरी के लिए ईच्छुक उम्मीदवारों को यात्रा-भत्ता भी देता है। मैंने कहा नहीं दिया तो नहीं दिया हमें तो नौकरी चाहिए।
मित्रों,कई दिनों तक जब फोन नहीं आया तो मैंने फिर से हरिवंशजी को फोन मिलाया तब उन्होंने एक नंबर दिया और बात करने को कहा। वह नंबर किसी मोहन सिंह का था जिनको अखबार लांच करने के लिए मुजफ्फरपुर भेजा गया था। नौकरी शुरू हुई। तब प्रभात खबर कार्यालय जूरन छपरा,रोड नं.1 मुजफ्फरपुर में था। कार्यालय क्या था कबाड़खाना था। कार्यालय में पर्याप्त संख्या में कुर्सियाँ तक नहीं थीं। लोग कंप्यूटर पाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते रहते। वहाँ कई पुराने मित्र भी कार्यरत मिले और कई नए मित्र बने भी। हम घंटों फर्श पर पालती मारकर कंप्यूटर और कुर्सी के खाली होने का इंतजार करते। तब अखबार की छपाई शुरू नहीं हुई थी,प्रशिक्षण चल रहा था।
मित्रों,कार्यालय में न तो शुद्ध पेयजल था और न ही शौचालय में बल्ब। गंदा पानी पीने के चलते मेरा स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। फिर भी मैंने दो महीनों तक जमकर काम किया। इस बीच अगस्त या सितंबर में अखबार की छपाई भी शुरू हो गई। पहले दिन मुजफ्फरपुर पर विशेष परिशिष्ट प्रकाशित हुआ जो पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ मेरे द्वारा संपादित था।
मित्रों,तक कार्यलय में न तो किसी की हाजिरी ही बनती थी और न ही किसी को वेतन ही मिलता था। वहाँ के एचआर हेड से बात करता तो वो कहते कि आपके कागजात राँची भेज दिए गए हैं अभी वहाँ से कोई उत्तर नहीं आया है। सहकर्मियों ने बताया कि उनके कागजात के तो 6 महीने से उत्तर नहीं आए हैं। अब मुझे नौकरी करते दो महीने से ज्यादा हो चुके थे मगर वेतन का कहीं अता-पता नहीं था। नौकरी थी भी और नहीं भी। न कहीँ कोई नियुक्ति-पत्र और न ही कोई अन्य प्रूफ। कार्यालय का गंदा पानी पीने से मेरी तबियत भी बिगड़ती चली गई और अंत में मैंने निराशा और खींज में नौकरी छोड़ दी।
मित्रों,मुझे लगा कि पटना,हिन्दुस्तान की तरह प्रभात खबर भी खुद ही पहल करके मेरे दो महीने का वेतन दे देगा। इससे पहले जब मैंने पटना,हिन्दुस्तान की नौकरी छोड़ी थी तब हिन्दुस्तानवालों ने कई महीने बाद फोन करके बुलाकर मुझे मेरा बकाया दे दिया था। मगर यहाँ तो देखते-देखते तीन साल हो गए। न उन्होंने सुध ली न मैंने मांगे। फिर अगस्त,2013 में मुझे पैसों की सख्त जरुरत आन पड़ी। मैंने हरिवंशजी को फोन मिलाया तो पहली बार में तो वे चेन्नई में थे। दो-तीन दिन फिर से फोन मिलाया और अपनी व्यथा सुनाई। मैंने उनको याद दिलाया कि मैंने दो महीने तक मुजफ्फरपुर,प्रभात खबर में काम किया था जिसका मुझे पैसा नहीं मिला और उल्टे घर से ही नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने मुझे पहचान तो लिया मगर इस मामले में कुछ भी कर सकने में अपनी असमर्थता जताई। तब मैंने कहा कि मुझे पटना,प्रभात खबर में नौकरी ही दे दीजिए। उन्होंने सीट खाली नहीं होने की मजबूरी जताते हुए फोन काट दिया।
मित्रों,मैं हतप्रभ था कि हरिवंश जी भी ऐसा कर सकते हैं? महान समाजवादी,चिंतक,पत्रकार हरिवंश एक मजदूर का पैसा रख लेंगे? मगर यही सच था और आज भी यही सच है। वे आज भी मेरे कर्जदार हैं। दरअसल ये लोग छद्म समाजवादी हैं। चिथड़ा ओढ़कर ये लोग न सिर्फ मलाई चाभते हैं बल्कि अपने ही संस्थान के श्रमिकों का खून भी पीते हैं। ये लोग मुक्तिबोध के शब्दों में रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध,नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे लोग हैं। फिलहाल वे जदयू की तरफ से राज्य सभा सदस्य हैं अपनी सत्ता की चाटुकारिता कर सकने की अद्धुत क्षमता के बल पर। उम्मीद करता हूँ कि वे संसद में मजदूरों के पक्ष में लंबे-लंबे विद्वतापूर्ण भाषण देंगे और समाजवादी होने के अपने कर्त्त्वयों की इतिश्री कर लेंगे। धरातल पर पहले की तरह ही उनके अपने संस्थान में श्रमिकों का शोषण अनवरत जारी रहेगा,फिल्मी महाजन की तरह उनके पैसे पचाते रहेंगे और परिणामस्वरूप प्राप्त अधिशेष के बल पर उनकी चल-अचल सम्पत्ति में अभूतपूर्व अभिवृद्धि होती रहेगी। अंत में उनकी लंबी आयु की कामना करता हूँ जिससे आनेवाले समय में देश में समाजवाद दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति कर सके।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

14.4.14

आँसू । (गीत)


आँसू । (गीत)


जा, समंदर को,  लहूलुहान कर  दे ।
आँसूओं से  गहरी, पहचान कर  ले ।

( समंदर = दुनिया )

 
अन्तरा-१.

 
तन्हा है  लम्हा, गुमशुदा  है  दिल..!
चप्पे - चप्पे,  इक  दरबान  धर  दे ।
जा, समंदर को  लहूलुहान कर  दे ।

गुमशुदा = लापता ।

 
अन्तरा.-२

 
रुके,  ना   थमे,  यही  तो  वक्त  है..!
दम है  तो, उस पर निशान कर ले ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।


अन्तरा-३.

हँसी, न  खुशी, ग़मज़दा है  सांसें..!
बच्चों के  नाम,  मुस्कान  कर  दे ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।

ग़मज़दा = दुःखी ।

अन्तरा-४.

न  तेरा,  न  मेरा,  समंदर झमेला..!
खुद को जहाँ का, मेहमान  कर  ले ।
जा, समंदर को  लहूलुहान  कर  दे ।

झमेला = भीड़-भाड़ ।

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १४-०४-२०१४.



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13.4.14

मयंक कवि विरचित मोदी चालीसा



श्री गणेश का नाम ले, धर शारद के पाँव |
राजनीति की धूप में, मोदी तरु की छाँव ||
अटल, सत्य संकल्प है, सदा नमो के पास |
उद्यत करने को हुये, हर संकट का नाश ||
भीतर, बाहर सभी विरोधी | जनता कहती मोदी मोदी ||१||
बसपा, सपा असुर हैं भारी | कांग्रेस टोटल अत्याचारी ||२||
तुष्टिकरण, अनुचित आरक्षण | लोकतंत्र का करते भक्षण ||३||
कलि के कुटिल नराधम पापी | झाडू ले फिरते आआपी ||४||
कमल चिन्ह का बजा है डंका | मोदी भारत विमल मयंका ||५||
सुखी होय जग, खिले सरोजा | मोदी मोदी कहे मनोजा ||६||
राष्ट्र, धर्म, संस्कृति के साधक | जगदम्बा के श्रेष्ठ अराधक ||७||
नौ दिन निराहार व्रत रहते | भारत, भारत, भारत कहते ||८||
वन्देमातरम के अनुरागी | द्वेष, दम्भ, छल, छिद्र विरागी ||९||
अदना चाय बेचने वाला | संघर्षों ने जिसको पाला ||१०||
अब कहती है दुनिया सारी | राजनीति में यह अवतारी ||११||
खेले भारत माँ की गोदी | हर हर मोदी, घर घर मोदी ||१२||
आतंकी इण्डिया विरोधी | डर डर मोदी, थर थर मोदी ||१३||
संघ कार्य के राज्य प्रणेता | संत सदृश सज्जन जननेता ||१४||
दीन दशा जब भारत लख्या | सोमनाथ से चले अयोध्या ||१५||
जन्म लियो घर अति साधारण | उगा सूर्य जनु तम संहारण ||१६||
हीराबेन लला जनु मानिक | श्रद्धा भाव निखिल निगमादिक ||१७||
सादर है जन जन से नाता | मोदी भारत भाग्य विधाता ||१८||
कार्गिल जुद्ध कियो अरि भारी | प्रतिपक्षी दल बने मदारी ||१९||
भारत की प्रभुता संकट में | लख भारत माता सांसत में ||२०||
सेना के हित बने प्रवक्ता | गरज उठा शावक बन वक्ता ||२१||
पहना प्रलयंकर का चोगा | गोली का जवाब बम होगा ||२२||
आयो भुज भूकंप भयंकर | सवा साल में आठ लाख घर ||२३||
टाटा को गुजरात बुलायो | फ़ाइल में लाइफ ले आयो ||२४||
इधर धर्म अपनाने वाले | उधर देश को खाने वाले ||२५||
बहु विधि भारत के अपकारी | बहु प्रकार नर भ्रष्टाचारी ||२६||
सबके उर भय एक तुम्हारा | तुम नैया के खेवनहारा ||२७||
स्वयं साधना करके देखा | तुम भारत की जीवन रेखा ||२८||
बहुत दिनों से धरती बंजर | तुम छाये बन मेघ धुरंधर ||२९||
विश्वनाथ जी का अनुमोदन | राजनीति में हो संशोधन ||३०||
इसीलिये तुम काशी आये | धर्मप्राण हरिजन हर्षाये ||३१||
जय जय जय मोदी जन नायक | जड़ता हरो विकास प्रदायक ||३२||
कर्मकुशल संशाधन दोहक | रिपुजन दलन सर्वजन मोहक ||३३||
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा | तुमने एक रंग सब रंगा ||३४||
सबके दिल में कमल खिलाने | ऐक सूत्र जन सभी मिलाने ||३५||
पूरे सारे काज करेगा | यह दिल्ली में राज करेगा ||३६||
शुभ चुनाव का बिगुल बजा है | देवासुर संग्राम मचा है ||३७||
गूँज उठा है सारा अम्बर | यह अंतिम निर्णय का अवसर ||३८||
तैंतिस कोटि देव जागे हैं | देवसुतों से मत मांगे हैं ||३९||
जागो माता बहनों भाई | हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई ||४०||
सावधान मन कह रहा, पूरा भारत देश |
कमल बटन गंगा सदृश, कटे पाप अरु क्लेश ||  
                      

पगथिया: धर्म विहीन राजनीति या राजनीति विहीन धर्म

पगथिया: धर्म विहीन राजनीति या राजनीति विहीन धर्म:  देश को क्या चाहिये -धर्म विहीन राजनीति या राजनीति विहीन धर्म ?

12.4.14

देशभक्त जवानों को गंदी राजनीति में मत घसीटिए आजम जी!

-वतन की हिम्मत सैनिकों से है, राजनीति से नहीं। 
-करगिल युद्व हिन्दुस्तानियों ने जीता 


बयानबाजी में कुख्यात हो चुके यूपी के ताकतवर मंत्री आजम खां कहते हैं कि कारगिल का युद्व मुस्लिम सैनिकों ने लड़ा....उन्होंने कुर्बानियां दीं---.ओर भी बहुत कुछ। उनका बयान केवल मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिये था। जवानों की कुर्बानियों को भी धर्म में बांट दिया। कुर्बानियों पर सियासत न करें जनाब राजनीति वाकई हद दर्जे तक गिर गई है। आजम साहब को कौन समझाये कि सरहदों की हिफाजत करने वाले राजनीति से आजाद होते हैं। उनकी सोच घिनौनी ओर अपाहिज नहीं होती, कोई लालच भी नहीं होता। फर्ज के प्रति ईमानदारी उनकी सबसे बड़ी दौलत होती है। सवाल यह है कि ऐसा कहकर सैनिकों को क्यों राजनीति में ला रहे हैं। जनाब एक वही तो है जिनकी बदौलत हम महफूज सोते हैं। नेताओं के हाथ सरहदें नहीं दी जा सकती क्या भरोसा वह सरहदों का भी सौदा कर दें क्योंकि राजनीति अब फर्ज नहीं सिर्फ मुनाफा देखती है। जवान सिर्फ फर्ज देखते हैं मुनाफा नहीं, करगिल युद्व किसी हिन्दू-मुसलमान ने नहीं बल्कि देशभक्त हिन्दुस्तानियों ने जीता था। जय हिन्द! मंत्री जी वही हैं एक महीने पहले जिनके तबेले से 7 भैंस चोरी हुई थीं। भैंस ताकतवर मंत्री की थीं। जिले में अलर्ट हुआ। चेकिंग अभियान चला। डॉग स्क्वॉएड भी आया। 5 किलोमीटर तक भैंसों के पैरों के निशानों को खोजा गया। कई थानों की पुलिस व क्राइम ब्रांच टीम ने दिन-रात मेहनत करके 24 घंटे में भैंसों को बरामद किया। तीन पुलिसकर्मियों को सस्पेंड भी कर दिया गया। भैंसों की शिनाख्त परेड भी करायी गई। पुलिस अधिकारियों, तहसीलदार व लेखपालों ने बहुत मेहनत करके राहत की सांस ली। मीडिया से तो आजम साहब बहुत ही नाराज हैं क्योंकि वह उनकी भैंस ओर बयानों वाली खबर दिखाता है। दंगों की हकीकत भी सामने लाता है इसलिए वह दुश्मन है लोकसभा चुनाव हर कोई जीतना चाहता है। बड़े नेताजी के सीने में तो आग लगी है। मुलायम सिंह, नरेन्द्र मोदी, अरविन्द केजरीवाल सब कतार में हैं। राजनीति में जो बयानबाजियों का दौर चल रहा है वह हद दर्जे की गिरावट को दर्शाता है। न कोई शर्म न झिझक बस मुंह खोल दिया।

11.4.14

आम सूचना

जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय शिवपुरी से संबंधित तमाम शिकायतें सामने आ रही हैं, जिसके संबंध में विस्तृत रिपोर्ट साक्ष्यों के आधार पर तैयार की जा रही है । महेंद्र सिंह तोमर द्वारा पद के दुरुपयोग के साक्ष्य भी सामने आए हैं । अगर कोई व्यक्ति इस संबंध में कोई गुप्त सूचना देना चाहे तो निम्न नंबर पर संपर्क करें ।

सौरभ दुबे, 9907363309

Micro short story -4. `शायद..!`


Micro short story -4. `शायद..!`

http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/micro-short-story-4.html

"ये क्या है नंदिनी? आज, पहली बार काम में इतनी गलतियां..! क्या बात है, बहुत उदास लग रही हो..!"  
मैनेजर साहब ने नंदिनी से  आख़िर पूछ ही लिया ।

" सर, मेरे तीन साल के बेटे को किडनी में स्टोन का प्रॉब्लम हुआ है, उसके ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये चाहिए मगर, मेरी हालत..!" कहते-कहते नंदिनी की सुंदर आंखे भर आयीं ।

करीब दस मिनट के बाद, पहली बार, स्मार्ट,युवा और हेन्डसम, बोस के सामने नंदिनी खड़ी थी ।

बोस ने, नंदिनी को सर से पाँव तक घूरते हुए, कहा, " समय नहीं है, सीधा पाइन्ट पर..! लोन मिल जाएगा, 
क्या तुम समझौते (Compomise) के लिए तैयार हो?"

नंदिनी ने केबिन का दरवाजा पुरा खोला, बोस के गाल पर, एक करारा चाँटा मारा और पीछे मुड़ कर देखे बिना ही, ऑफिस की लिफ्ट की ओर आगे बढ़ गई । 

केबिन के बाहर भौंचक्का सा खड़ा  हुआ पुरा स्टाफ, सबकुछ समझ रहा था, अधिकतर महिला कर्मचारी..!

शायद, नंदिनी भी इतनी नासमझ नहीं थी..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ११-०४-२०१४.



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10.4.14

मतदान को अवसर में बदलने का समय

मतदान को अवसर में बदलने का समय 

राष्ट्र के सामने रास्ता चुनकर आगे बढ़ने का समय है और समय को अवसर में बदल 
देने का मौका हर वोटर के हाथ में है ,हम अपने अधिकार का सदुपयोग और दुरूपयोग 
करने को स्वतंत्र हैं मगर इसके परिणाम भी हम खुद ही पाने वाले हैं इसलिए वोट 
देने से पहले राष्ट्र की अस्मिता पर विचार करना,अपने कर्तव्य पर विचार करना ,राष्ट्र 
वाद पर विचार करना। वोट देने से पहले इतना जरुर सोचना कि -

भारत में भुखमरी के लिए जिम्मेदार कौन है ?

भारत में भ्रष्ट राजनीति का पोषण कौन कर रहे हैं ?

भारत की राजनीति में विभिन्न धर्मावलम्बियों में फूट और सन्देह पैदा करके 
लड़ाने से किनका स्वार्थ पूरा हुआ ?

धूर्त ,कुबुद्धि,पाखण्डी,पक्षपाती ,अराजक ,शक्तिहीन ,अहँकारी ,ढोंगी और कामी को 
वोट का दान ना करे क्योंकि कुपात्र को दिया गया दान व्यर्थ का कर्म होता है ,इससे 
अच्छा है मत का उपयोग नहीं करे यदि आवश्यक लगे तो जो कम दुर्गुणी हो उसे 
वोट दे दे।

बदलाव का अर्थ यह नहीं कि खोटी उठा पटक करो ,बदलाव को उन्नति और विकास से 
जोड़कर देखो। बार बार वादा खिलाफी करने वाले, कहकर मुकरने वाले,कथनी करनी 
में अंतर रखने वाले निरंकुश लोगो के हाथ में शासन मत सौंपो। 

राष्ट्र की सरहदों की असलामती, अन्य राष्ट्रों की गुलामी और जी हजूरी, राष्ट्र के लिए 
अनर्थकारी नीति निर्माण, राष्ट्र मे आंतरिक अव्यवस्था, सद्भाव की जगह पक्षपात,
राष्ट्रिय सम्पदा की लूट खसोट और कमरतोड़ राजस्व की वसूली ने हमको गहरी 
खाई में धकेला है इसके लिए जिम्मेदार कौन ?क्या फिर से उनको वोट करना हमारी 
राष्ट्रभक्ति होगी ?सोचो ,सोचो ! वोट करो ,सब को जागृत करो ,देश भक्त सरकार चुनने 
का समय आया है ,अपने एक एक वोट से राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनो।            

    

9.4.14

विकसित भारत के लिए वोट करो

विकसित भारत के लिए वोट करो 

भारत रुग्ण अर्थव्यवस्था वाला देश क्यों बन कर रह गया ?क्या यहाँ का नागरिक
बुद्धि बल में कमजोर है या फिर सही नेता के अभाव में निराश हो गया है,यदि नेता
के अभाव में निराश है तो आशा का दीप जलाना कहाँ मना है ,आप का एक वोट
भारत के सुन्दर भविष्य के लिए मूल्यवान है वह भी तब जब आप बुद्धि का इस्तेमाल
करके वोट डालते हैं

आश्चर्य भी और विडम्बना भी !! हम पढ़े लिखे लोग वोट करने के लिए निकलते
नहीं हैं और देश की बदहाली पर हर दिन घंटो भड़ास निकालते हैं ,क्या फायदा ?
घंटो बहस करने की जगह सही और योग्य व्यक्ति को वोट किया होता तो आप
की कार्य क्षमता में 365 *5 घंटे और देश की कार्य क्षमता 365 *5 *800000000
घंटे से बढ़ जाती।

इससे भी बड़ी विडंबना कि पढ़े लिखे लोग जब वोट नहीं करते हैं तब नेता चुनने का
सारा बोझ उन लोगों पर आ जाता है जो निरक्षर या मामूली पढ़े लिखे हैं। जब ये
लोग नासमझी से गलत व्यक्ति को संसद में भेज देते हैं तब पढ़े लिखे लोग अखबारो
में ,मीडिया में ,सार्वजनिक मंचो से उनके खिलाफ जागृति फैलाने का काम करते हैं
जब जागने का समय आया तो हम नींद ले रहे थे और नींद लेनी थी ,चैन से रहना
था तब हायतौबा मचाते हैं।

हम आरोप लगाते हैं कि गरीब और भूखे भारतीय वोट की ताकत नहीं समझते और
वोट बेचते हैं चन्द रुपयों के लालच में, मगर वोट नहीं देकर हम लोकतन्त्र का या
खुद का क्या भला कर पाये हैं ?

हम उम्मीदवार की जीत और हार के लिए जाति और धर्म को प्रधानता देते हैं क्योंकि
खुद को पंडित और त्रिकालदर्शी ठहराने वाले लोग मतदान केंद्र पर पहुँचना हीन काम
मानते हैं जबकि वो जानते हैं कि उनके वोट ना करने से देश की तस्वीर पर गर्त जम
गयी है।

हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम राष्ट्रवादी लोगों को चुनकर भेजे और वे चुने हुए योग्य
लोग देश के उत्थान के लिए काम करे। देश को भ्रष्टाचार से ,गरीबी से ,बेरोजगारी से ,
छद्म निरपेक्षता से ,धूर्त सियासत से बचाना है तो वोट देने के लिए मतदान केंद्र तक
जाना सीखो,उसके बाद जो परिणाम होगा उससे वंशवाद,तुष्टिकरण,भय,वोटबैंक ,
गरीबी,बेकारी,दंगे -फसाद,अशिक्षा,भ्रष्टाचार ,नौकरशाही जैसे भयंकर रोग खत्म
होते नजर आयेंगे।                  

8.4.14

हैरानी होती है जब यह सुनता हूँ कि किस प्रकार से नरेंद्र मोदी के द्वारा कहे किसी भी वक्तव्य को विपक्ष लपक लेता है मानो इसी का इन्तजार कर रहा था । अपने घोषणा पत्र के उद्घोषणा के दिन नरेंद्र मोदी जी ने तीन वाक्य कहे - मैं मेहनत से काम करूंगा । अपने लिए कुछ नहीं करूंगा । बद  इरादे से कोई काम नै करूंगा नहीं करूंगा ।
विपक्ष को इंतजार था कि कुछ तो ऐसा निकले जिसे वे लपक सकें । सो लपक लिया । सिर्फ तीसरा वाक्य । क्या जो व्यक्ति यह कहता है कि वह ईमानदारी से काम करेगा । उस पर हम यह आरोप लगाते हैं कि अरे देखो यह ईमानदारी की  बात कर रहा है इसलिए इसके मन में बेईमानी थी । इसीलिए इसने ईमानदारी का जिक्र किया । इसके मन में चोर है । यह सफाई दे रहा है । क्या जब कोई संविधान के अनुसार काम करने की  शपथ लेता है तो हम उस पर यह आरोप लगाते  हैं कि देखो यह संविधान के अनुसार काम करने की  शपथ ले रहा है यानि इसके मन में चोर था । यह संविधान के विपरीत जाकर काम करने का विचार रखता था । सफाई दे रहा है । तो फिर मोदी पर शक क्यों ?
शक इसलिए कि उन्होंने यह नहीं कहा कि मैं सही इरादे से काम करूंगा ? यह कहा कि मैं बद इरादे से कोई काम नहीं करूंगा । बद इरादे से काम नहीं करने का मतलब भी तो यही है । तो फिर मोदी को यह कहने की  क्या जरूरत पड़  गई । इस देश के तथाकथित धर्म निरपेक्ष दल लम्बे समय से यह हल्ला मचाते रहे हैं कि मोदी आ गया तो यह हो जाएगा , मोदी आ गया तो देश टूट जाएगा , मोदी आ गया तो खून की  होली खेली जायेगी । अब इस तरह की  बातों से एक वर्ग पर भय का भूत बैठा दिया गया है सिर्फ वोटों के लिए । यह वर्ग इतना पिछड़ा है कि समझ ही नहीं पाता  कि यही मोदी को गाली देने वाले लोग अचानक मोदी की  शरण में क्यों चले जाते हैं? यह वर्ग समझ नहीं पाता  कि आखिर कोई अचानक धर्म निरपेक्ष होते होते मोदी के साथ कैसे हो जाता है ? मतलब साफ़ है कि यह सब सिर्फ बेवकूफ बनाने के लिए है ।इसलिए जब मोदी ने यह कहा कि बाद इरादे से कोई काम नहीं करूंगा तो खलबली मच गयी । अब ये दल क्या कहना चाहते हैं ? क्या मोदी को यह कहना चाहिए था कि मैं बद  इरादे से काम करूंगा ? तब यह सब खुश हो जाते । लेकिन मोदी ने यदि यह कहा होता कि मैं नेक इरादे से काम करूंगा तो भी आरोप लगता कि देखो नेक इरादे की  बात कर रहा है । इसके मन में चोर है । वरना  ऐसी बात क्यों करता ?
साफ़ सी बात है मोदी उस वर्ग को भी समझाना चाहते हैं कि वे अपने मन में कोई भ्रम न पालें । और बाकि दल परेशान हैं कि कहीं मोदी सत्ता में आ गए तो इन सबकी पोल न खुल जाए ।  याद होना चाहिए कि वाजपेयी सरकार के आने से पहले भी यह कहा जाता था कि बीजेपी आयी तो देश टूट जाएगा । लेकिन बीजेपी तो आयी पर देश नहीं टूटा पर भ्रम टूट गया । लेकिन उस वर्ग को आज तक भरमाया जा रहा है । ईश्वर उस वर्ग को सदबुद्धि दे । और हाँ , मोदी सम्भवतः यह भी कहना चाहते हैं कि कोई दल भी यह न सोचे कि कहीं मोदी आ गए तो वे सी बी आई का दुरूपयोग करेंगे जैसा कि कांग्रेस पिछले बारह साल से मोदी के खिलाफ सी बी आई का दुरुपयोग करती रही है । 

Micro short stories -03. Intellectual Prostitute - प्रबुद्ध गणिका ।


Micro short stories -03. 
Intellectual Prostitute 

- प्रबुद्ध गणिका ।
 http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/micro-short-stories-03-intellectual.html
चुनाव की सरगर्मी बड़ी तेज हो गई थीं । तथाकथित सेक्युलर टीवी न्यूज़ चैनल के एन्कर्स - रिपोर्टर्स,जनता का मुड़ भाँप ने के लिए, यहाँ से वहाँ भाग दौड़ कर रहे थे ऐसे में, `कब-तक टीवी चैनल का रिपॉर्टर,`लपक शर्मा`एक बदनाम मोहल्ले से गुजरा ।

" इस वक्त मैं, अनपढ़ और अपना देह व्यवसाय कर ने वाली महिलाओं के मोहल्ले से लाईव रिपोर्टिंग कर रहा हूँ । आइए, यहाँ की लोकल महिलाओं से, ये किसे वोट देंगी उसके बारे में जान ने की कोशिश करें..!"

चैनल के स्टूडियो में बैठे एंकर, `लसून क्रांतिकारी` ने,  रिपोर्टर `लपक शर्मा` के कान में कहा," ल..प..क, उन से ये सवाल पूछिए, क्या  ये महिलाएं हमारे न्यूज़ हर रोज़ देखती हैं? कैसा लगा हमारा चुनावी विश्लेषण कवरेज?"

लपक शर्मा, (कुछ सेक्स वर्कर्स से ।), " सब से पहले ये बताइए, क्या आप हमारा न्यूज़ चैनल `कब-तक - चुनाव ` रोज़ देखती हैं? कैसा लगा हमारा प्रोग्राम?"

अपने आप को अनपढ़ और अपना देह व्यवसाय करने वाली बताने पर अत्यंत चिढ़ीं हुई, पढ़ीलिखी एक सेक्स वर्कर ने, लपक शर्मा को 
बौद्धिक तमाचा मारते हुए कहा,

" ये सारी महिलाएँ, आप जैसी, `प्रबुद्ध गणिकाओं -(Intellectual Prostitutes)` के प्रोग्राम कभी नहीं देखतीं..!"

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०८-०४-२०१४.



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अब कोई कैसे शरण देगा निर्भया को?-ब्रज की दुनिया

8-4-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। बिदुपुर थाना क्षेत्र के खजबत्ती निवासी राजदेव राय की हत्या से पूरा वैशाली जिला सन्न है। उस आदमी की हत्या हो गई जिसने निर्भया को सामूहिक बलात्कार से न केवल बचाया था बल्कि शरण भी दी थी और उसके हिस्से की लड़ाई भी लड़ी थी वह भी अकेले? लड़ाई में उसने राज्य सरकार से मदद भी मांगी थी। सुरक्षा और हथियार का लाइसेंस मांगा था लेकिन मिला कुछ भी नहीं। मिली तो सिर्फ मौत।

मुख्यमंत्री ने उसकी मांग को ध्यान से सुना और डीजीपी को कार्रवाई करने को कहा। पुलिस ने मामले के अनुसंधान पदाधिकारी को निलंबित भर कर दिया और अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली। दो बलात्कारियों की गिरफ्तारी हुई तो पूरा गांव थाने पर चढ़ बैठा उनके समर्थन में। क्या यह संकेत नहीं है हमारे गांवों के नैतिक पतन का? पहले तो गांवों में अपराधियों को बहिष्कृत कर देने की प्रथा थी।

स्थानीय विधायक सतीश कुमार कहते हैं कि अपराधी दूसरे क्षेत्रों से आए हुए लोग थे। अगर ऐसा था तो फिर उनको गांववालों का साथ कैसे मिल गया? राजदेव को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी किसकी थी? पुलिस ने समुचित कदम क्यों नहीं उठाया? हथियार का लाइसेंस अगर दे दिया गया होता तो राजदेव अपनी रक्षा स्वयं कर लेते। क्यों उनको लाइसेंस नहीं दिया गया? क्या बिना घूस लिए पुलिस-प्रशासन किसी को भी लाइसेंस नहीं देती है? जब किसी को राज्य का मुख्यमंत्री भी सुरक्षा नहीं दिला सकता तो फिर कोई जरुरतमंद किससे उम्मीद रखेगा? क्या मतलब है मुख्यमंत्री के जनता दरबार का? इन परिस्थितियों में क्या अब कोई राजदेव बनने की हिमाकत करेगा भी? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गन्दी बात ……

गन्दी बात  …… 

भारत की गरीबी और भुखमरी भारत के लिए गन्दी बात है मगर उन वादा करने
वाले ढोंगियों पर अंधविश्वास करते रहना भी गन्दी बात होगी।

गरीब भारतीयों से छुपे हुए कर लगाकर लिए गए पैसे डकारना  गन्दी बात,मगर
देश की तिजोरी को खाली करने वालो को फिर से संसद में भेजना भी गन्दी बात
होगी।

गैस के सिलेण्डर बारह से नौ करना गन्दी बात थी क्योंकि सबसे ज्यादा सब्सिडी
तो पैसेवालों पर लूटा दी जाती है और नौ से बारह सिलेण्डर करना भी गन्दी चाल
थी। मुर्ख समझने वालों को सत्कार से संसद में बैठाना भी गन्दी बात होगी।

सीमा पर बहादुरों के शीश काट लिए जाए और हिन्दुस्तानी सल्तनत का खून नहीं
खोलना गन्दी बात थी ,हिन्दुस्थान में आतँक फैलाने वालो के लिए दुवा माँगना भी
गन्दी बात थी ,बहादुर शहीद शर्मा जी की शहादत बेकार चली गई तो गन्दी बात
होगी।

ईमानदार ऑफिसर का बार बार तबादला गन्दी बात है ,मगर ईमानदार ऑफिसर
के सवालों पर जनता  सही प्रतिसाद ना दे तो भी गन्दी बात होगी।

अल्पसंख्यको को विकास की ऊँचाई पर ना ले जाना भी गन्दी बात थी मगर उन्हें
तुष्टिकरण की अँधेरी खाई की ओर धकेलते जाना भी गन्दी बात है फिर भी अपनी
समझ को नहीं जगा पाना और वोट बैंक बने रहना भी गन्दी बात होगी।

गरीब भारतीय को 26 से 32 रूपये कमाने पर धनवान मान लेना गन्दी बात है
26 में गुजारा करने के लिए उन्हें अन्न दान माँगने के लिए मजबूर करना भी
गन्दी बात है। गरीब दान के सस्ते अन्न को खा कर अब भी सोता रहा तो भी
गन्दी बात होगी।

लुच्चे नेता को साहूकार बताने वाली खबरे बताते रहना गन्दी बात है मगर लुच्चो
को बचाने के लिए ईमानदारी का खौफनाक नाटक खेलना भी गन्दी बात है। इस
धूर्तता के नाटक को वास्तविकता समझना भी गन्दी बात है। राष्ट्रवादियों को
शासन चलाने से दूर रखने के लिए षड़यंत्र रचना भी गन्दी बात होगी।

चीन हमें आँख दिखाए ,पाकिस्तान साजिश रचे यह देश के लिए गन्दी बात है
मगर हम हुँकार भरने की जगह बिरयानी से उनका स्वागत करने वालो को
साँसद बना दे तो यह भी गन्दी बात होगी।

हमारा वोट ना करना भी गन्दी बात है मगर घुसपेठियों के मतदान के कारण कोई
राष्ट्रवादी हार जाए तो भी गन्दी बात होगी।    

7.4.14

आते-जाते रहेंगे । (गीत)


आते-जाते रहेंगे । (गीत)
http://mktvfilms.blogspot.in/2014/04/blog-post.html
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!
और जालिम ? बस, यूँ ही मुस्कुराते  रहेंगे ।

अन्तरा-१.

वास्ता हो जिन्हें वो, जानते हैं, मज़ा उसका..!
हैं   ग़मखोर, गज़ब  हम भी आज़माते रहेंगे..!
ग़मों का   क्या  है, वो तो  आते - जाते रहेंगे..!
 
ग़मखोर = सहनशील ।

अन्तरा-२.

गर है , तबाह करना, मकसद उनका, यारों..!
कमज़ोर   नहीं   हम   भी, दर्द   सहते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या  है, वो तो  आते - जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-३.

दमदार ग़म परखना, पाला है शौक हमने..!
ताउम्र      क़र्ज़     उनका,     चुकाते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-४.

थामा है, कब से  हमने, प्याला  ज़हर  का..!
फरहत के,  गीत अक्सर, गुनगुनाते रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

फरहत = खुशी.


मार्कंड दवे । दिनांकः ०७-/०४/२०१४.




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6.4.14

चुनाव में दुर्व्यवहार की शिकार हीरोइन!


अल्पसंख्यकवाद,आरक्षण और छद्म धर्मनिरपेक्षता-ब्रज की दुनिया

07-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,लाल किले के प्राचीर से अपने पहले संबोधन में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है। भारत में अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा जनसंख्या मुसलमानों की है फिर सिख,जैन,इसाई और पारसी आते हैं लेकिन मुसलमानों को छोड़कर बाँकी समुदायों की हालत हिन्दुओं से भी अच्छी है। मतलब कि भारत में अल्पसंख्यकों के लिए जो भी इंतजाम सरकार करती है तो वह वास्तव में मुसलमानों के लिए ही करती है।
मित्रों,बाद में सरकार ने मुसलमानों को पहला अधिकार दिया भी। 15 सूत्री कार्यक्रम बनाया जिससे सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को ही लाभ हुआ कदाचित एकाध सिख,इसाई या पारसी ने भी लाभ उठाया हो। अगर रजिया या अहमद को पढ़ाई के लिए सस्ते ऋण या विशेष छात्रवृत्ति दी जाती है तो इससे बहुसंख्यकों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन यह पहला अधिकार वास्तव में सिर्फ पहला अधिकार ही नहीं रहा बल्कि केंद्र सरकार और उ.प्र. और कर्नाटक जैसी कई राज्य सरकारों ने इसे सिर्फ अल्पसंख्यकों का अधिकार ही बना दिया। वरना क्या कारण है कि रजिया को सुविधा मिले और गरीब हिन्दू की बेटी राधा को साधनों के अभाव में पढ़ाई बीच में ही छोड़कर घर बैठना पड़े? कोई भी कार्यक्रम कैसे सिर्फ एक समुदाय विशेष के लिए ही बनाया जा सकता है? क्या ऐसा करना एक नए तरह के भेदभाव को जन्म नहीं देता है? आजादी से पहले अंग्रेजों ने अपने काम आनेवाले होटलों और स्वीमिंग पुलों में लिखवा दिया था कि डॉग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड और अब बिना बोर्ड लगाए ही केंद्र सरकार योजनाओं के लाभ से वंचित कर बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ डॉग्स एंड हिन्दुज आर नॉट एलाउड जैसा व्यवहार कर रही है।
मित्रों,इतना ही नहीं बाद में जब उ.प्र. के मुजफ्फरनगर में दंगे हुए तो वहाँ की वर्तमान राज्य सरकार ने कहा कि हम तो सिर्फ मुसलमानों को ही दंगा पीड़ित मानते हैं इसलिए हम तो सिर्फ उनको ही मुआवजा देंगे। पीड़ितों के दर्द और आँसुओं को भी अल्पसंख्यकवाद की छद्म धर्मनिरपेक्षता की सियासत ने संप्रदायों में बाँट दिया। बाद में इससे भी एक कदम आगे बढ़कर केंद्र सरकार ने संसद में सांप्रदायिकता विरोधी बिल पेश कर दिया जिसमें इस तरह के प्रावधान रखे गए कि अगर देश में कहीं भी दंगे होते हैं तो चाहे दंगों की शुरुआत कोई भी करे जिम्मेदारी सिर्फ बहुसंख्यकों पर आएगी। वाह,नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का भी सरेआम खून कर दिया गया। जबकि सच्चाई तो यह है कि देश के प्रत्येक हिस्से में साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत हमेशा मुसलमान ही करते हैं।
मित्रों,भारत में नौकरियों में आरक्षण देने का उद्देश्य क्या है? यही न कि जो सदियों से पिछड़े हैं उनको बराबरी में आने का अवसर दिया जाए लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार के लिए इसका बस इतना ही मतलब है कि बाँटो और राज करो। तभी तो उसने देश के सबसे समृद्ध समुदायों में से एक जैनों को आरक्षण का लाभ दे दिया जिनको वास्तव में इसकी जरुरत थी ही नहीं। फिर गरीब सवर्ण मुसलमानों को भी आरक्षण देने की कोशिश की गई केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों के द्वारा भी। क्या गरीब सवर्ण हिन्दुओं ने कोई जघन्य अपराध किया है जो आज तक उनको इस सुविधा से वंचित रखा गया है और वही सुविधा गरीब सवर्ण मुसलमानों को दे दी गई। हालाँकि कोर्ट ने सरकार को ऐसा करने नहीं दिया। बाद में मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद जब केंद्र सरकार ने देखा कि प्रशासनिक भेदभाव से जाट मतदाता नाराज हो गए हैं तो जाटों को बिना जरूरी कानूनी प्रक्रिया को पूरा किए ही,राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग से सिफारिश लिए बिना ही आरक्षण दे दिया। क्या भारत के संविधान में आरक्षण का प्रावधान गंदी सियासत का हथियार बनाने के लिए किया गया था? कई सवर्ण हिन्दू जातियों की आर्थिक स्थिति जाटों से ज्यादा खराब है फिर उनको आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? कुछ लोग कह सकते हैं कि आरक्षण का आधार तो सामाजिक पिछड़ापन है तो फिर जैनों,गरीब सवर्ण मुसलमानों और जाटों को कैसे आरक्षण दे दिया गया?

मित्रों,हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ जिसे धर्मनिरपेक्षता कहती हैं वह वास्तव में धर्मनिरपेक्षता है ही नहीं। वह वास्तव में अल्पसंख्यकवाद है और वोट बैंक की गंदी राजनीति है। इन पार्टियों ने सत्ता प्राप्ति के लिए कुछ हिन्दू जातियों और पूरे मुस्लिम समुदाय को अपने साथ रखकर एक समीकरण बनाया है और उसके अनुपालन को ही ये लोग धर्मनिरपेक्षता कहते हैं। यह आरक्षण भी उसी नीति का एक भाग मात्र है। वास्तव में इन पार्टियों को न तो देशहित से कोई मतलब है और न ही प्रदेशहित से कोई लेना-देना। इनके पास न तो देश-प्रदेश के विकास के लिए कोई योजना है और न ही कोई ईच्छा। कहाँ तो राजग की केंद्र सरकार ने 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाने का लक्ष्य रखा था और कहाँ तो यूपीए की वर्तमान केंद्र सरकार ने भारत की विकास दर को फिर से हिन्दू विकास दर से भी नीचे ला दिया। जिस अब्दुल्ला बुखारी पर दर्जनों आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं,जिस व्यक्ति को जेल में होना चाहिए यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी उसी बुखारी से अनुनय-विनय करके मुसलमानों से अपने पक्ष में मतदान करने की अपील जारी करवाती हैं। क्या इसको धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया जाना चाहिए?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)