21.11.09
किसानी दांव पेंच
लेकिन इस राज्य में भी वोट की राजनीति की जाती है..विधायकों की खरीद-फरोख्त तो अब पुरानी बात हो गई लेकिन बेमतलव का औबिलीगेशन जारी है...देश का सबसे बड़ा विद्युत उत्पादक होने के नाते राज्य को एक अल्हदा पहचान भी मिली हुई है...लेकिन क्या रमन सरकार को येन वक्त पर किसानों के आंदोलन के सामने हथियार डाल देने थे...धमतरी की हिंसा से घवराए सीएम ने ये फैसला इतने जल्द लिया कि कोई सोच भी नहीं सका...माना कि देश में किसानों से किसी को भी द्वेष नहीं होगा इन्हें कइयों रियायतें भी दी जानी चाहिए ताकि किसान अपनी तंग ज़िंदगी से परेशान ना हो औऱ खेती घाटे का सौदा क़तई ना रहे...लेकिन इन सबके बीच क्या सरकार को इन बातों पर ग़ौर नहीं करना चाहिए...
पहला राज्य़ के किसानों को मुफ्त बिजली देने से खज़ाने पर पड़ने वाले भार की पूर्ती कहां से की जाएगी।
दूसरा 200 करोड़ के अधिभार से राज्य के शेष विकास कार्यों पर क्या फर्क पड़ेगा
तीसरी क्या महज़ बिजली देने से किसान खुश हो जाएंगे या फिर उनकी वाकई यही समस्या है
चौथा इसकी क्या व्यवस्था की गई है कि खेतों में सिंचाई के नाम पर कनेक्शन लेकर इसका दुरूपयोग नहीं होगा जिसमें विभागीय कर्मी भी शामिल होते हैं
पांचवा क्या इस फैसले से राज्य के कर्मठ किसानों की कर्मठता पर असर नहीं होगा. या फिर वे हर मौकों पर सरकार के सामने हाथ फैलाए खड़े नहीं हो जाए जिससे किसानों की कर्मठता तो ख़त्म हो ही जाएगी साथ ही प्रदेश भविष्य में आंदोलनों और सरकारों पर पूरी तरह से निर्भर हो जाएगा, हालाकि ये देश की समस्या है लेकिन इसके पीछे नेता वोटिंग कॉज देकर बच निकलते हैं...
छठा क्या इस तरह मुफ्त बिजली बांट कर सरकार दोबारा पॉवर एक्सीलेंसी एवार्ड जीत सकेगी
सातवां क्या सरकार ये भूल गई कि इसी साल गर्मियों में बढ़ते पावर लोड के कारण राज्य सरकार को केंद्र के सामने अपने एनटीपीसी वाले कोटे के लिए ज़द्दोजहद करनी पड़ी थी
आठवां क्या सरकार भूल जाती है कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल का ख़ुदका कुल उत्पादन दोनों स्रोतों , पनबिजली और थर्मल बिजली से 2200 मेगावॉट तक ही पहुंचता है..जबकि सरप्लस का मतलव आईपीयू औऱ सीपीयू की बिजली होता है..
नौवां क्या सरकार इस बात को नहीं जानती कि यही बिजली बेंच कर राज्य को करोड़ों का लाभ होता है..
दसवां क्या यही किसान प्रेम है...जिसमें खजाना लुटाया जाए...अगर ऐंसा है तो फिर सभी किसानों को कह देना चाहिए कि वे खेतों पर ना जाए बल्कि किसी शेड के नीचे बैठ कर आंदोलन करें।
ये महज़ वोट की राजनीति होती है..जिसे राजनीति के चतुर सुजान रमन सिंह ने क्यों किया इस पर नज़र डालते हैं..
पहला इस मुद्दे पर कांग्रेस की सियासी बढ़त को ख़त्म करना जो वैशालीनगर परिणामों के बाद सामने आई है...
दूसरा अगर मुद्दा आगे बढ़ा जाता तो रियायतें देने के बाद भी श्रेय कांग्रेस को जाता और अगर रियायतें नहीं दी जातीं तो रमन की चांउर वाले बाबा की वोटिंग इमेज पर बुरा असर पड़ता
तीसरा कांग्रेस को बे-मुद्दा करके साबित करना कि सरकार चहुंओर विकास की लहर चला रही है इससे देश की सियासत में सीएम का रुतबा तो बढ़ता है साथ ही डॉ.रमन सिंह की पार्टी के भीतर बेहतर छवि भी बनती...यानें वे एक अच्छे प्रबंधक भी बन जाते...जो कि उन्हे शिवराज से आगे निकलने में मदद करता..गौरतलब है कि शिवराज के डंपर घोटाले ने उनकी पार्टी के भीतर छवि को कम किया है जो एक खराब प्रबंधन का नतीज़ा माना गया है, ऐंसी ही सूझ-बूझ धान घोटाले के वक्त दिखा कर साबित किया था..इन सबसे सीएम का क़द लगातार बढ़ा है..
लेकिन क़द के चक्कर में प्रदेश के साथ बड़ा अन्याय हो सकता है..
किसी भी नेता से पर्सनली पूछा जाए तो वो यही कहता है कि ये सब हमारी सियासी मज़बूरी है वरना हम भी ऐंसा नहीं चाहते...लेकिन इसका समाधान किसी के पास नहीं किसानों की राजनीति अब जोरों पर है हालाकि देश के बड़े नेता मुलायम हों या लालू सभी ने किसानों की नौका का इस्तमाल किया है यहां तक कि अजीत सिंह तो हरित प्रदेश को लेकर किसान पुत्र के नाम से ही जाने जाते हैं...ऐंसे बहुत से नेता हैं जो किसानों के हितैषी कहे जाते हैं..नवीनतम् घटनाक्रम में गन्ना किसानों की बात की जाए तो कांग्रेस के यू-टर्न और शरद पवार पर ठीकरे ने फिर साबित किया कि किसान बड़ा वोट बैंक है...लेकिन सालों से किसानों के हित की बात की जा रही है और ऐंसा नहीं है कि किसी किसान नेता को किसानों के लिए कुछ करने का मौका ना मिला हो कम या ज्यादा सभी को मौका मिल चुका है लेकिन इस सबके बाद ही से किसानी में इज़ाफ़ा किसी नेताई करिश्में से नहीं बल्कि उद्योगपतियों के नये प्रयोगों से हुआ है...जिसमें देश के इंडस्ट्रीयालिस्ट्स ने खेती के उपकरण आमलोगों तक सस्ते दामों पर पहुंचाए...जिससे खेती मौसम के चंगुल से किसी हद तक बाहर आ सकी...सरकारी स्तर पर भी कोशिशें क़ाबिले तारीफ़ हैं...लेकिन पर्टीकुलर नेता इसका श्रेय नहीं ले सकता भले वो इस नाम पर वोट लेले।
अब बात करते हैं सरकारी मदद और किसानों के उत्थान की तो ये कहना ग़लत ना होगा कि इसके बाद से ही किसानों की मेहनत पर उल्टा असर पड़ा है...गांवों में अपराध बढ़ा है, और हद तो तब हो जाती है कि देश के भंडारण में अनाज इतना कम पड़ जाता है कि बाहर से आयात करना पड़ जाता है...राज्य छत्तीसगढ़ की बात की जाए तो देश के कुल चावल उत्पादन का बड़ा हिस्सा राज्य का है लेकिन शायद मौसम की बैरूखी से ज़्यादा सरकारी योजनाओं के कारण 20 सालों बाद देश को चावल का आयात करने पर मज़बूर होना पड़ा....
वरुण के सखाजी
पत्रकार ज़ी24घंटे छत्तीसगढ़ रायपुर
Read me at sakhajee.blogspot.com
contact:-09009986179
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Sakhajee@gmail.com
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वरुण कुमार सखाजी
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20.11.09
कब तक पंगु बना रहेगा कानून ?
मुंबई में शिवसैनिकों और एमएनएस की गुंडागर्दी लगातार जारी है... इन दोनों दलों ने अभी तक ही अपनी काली करतूतों से लोकतंत्र का मजाक उड़ाया है। लेकिन हद तब हो गई जब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया पर भी शिवसैनिकों ने धावा बोल दिया....। .इन दलों की अभी तक की हरकतें साफ बयां कर रही हैं कि आए दिन किस तरह दोनों दल लोकतंत्र, संविधान और कानून को ठोकर मार रहे हैं...। पिछले दिनों एमएनएस ने महाराष्ट्र विधानसभा में मारपीट की....और अब शिवसेना ने मीडिया के दफ्तर पर ही हमला बोल दिया। यानी दोनों दल लोकतंत्र को निशाना बनाने में पीछे नहीं रहना चाहते और इन ओछी हरकतों से क्षेत्रीय सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं । अफसोस की बात ये है कि इनके सामने देश का कानून भी पंगु बना हुआ है....। जनता के जरिए लोकतंत्र के दरबार तक पहुंचने वालों ने ही लोकतंत्र को लाचार कर दिया है। ये कभी राष्ट्रभाषा का अपमान करते हैं तो कभी, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पर हमला बोल देते हैं। खुलेआम संविधान और कानून की मर्यादा तार-तार हो रही है। आखिर कब तक कानून इनके आगे पंगु बना रहेगा...सबसे बड़ा सवाल ये है कि.....राष्ट्रभाषा का अपमान करने वाले और सरेआम गुंडागर्दी करने वाली राजनैतिक पार्टियों की मान्यता अभी तक रद्द क्यों नहीं की गई..? इतना ही नहीं, इन दोनों दलों की तरफ से बार बार कहा जाता है कि इनके लिए राष्ट्रीयता से पहले इनके नेता हैं......तो फिर क्यों नहीं इनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाता...? इस लोकतांत्रिक देश के सदन में राष्ट्रभाषा बोलने पर पिटाई कर दी जाती है....देश के लोकतंत्र और राष्ट्रभाषा का इससे बड़ा और अपमान क्या हो सकता है....ऐसे दलों को सदन में बैठने का क्यों दिया गया है...? लोकतंत्र पर बार बार हमला करके भी जब इनका मन नहीं भरा तो उन्होंने खिसियाहट में मीडिया को भी निशाना बना डाला....। और मीडिया को हाईजैक करने की कोशिश की....। वैसे भी इन लोगों को केवल मारपीट की ही भाषा समझ आती है इसलिए बेहतर होगा कि इनसे भी इसी भाषा में बातचीत की जाए....।
सौरभ दुबे, 9210985314
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SAURABH DUBEY
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खून ही खून
एक तरफ़ विश्व बिरादरी प्रकृति के असंतुलन को लेकर है तौबा मचाएहै वहीदूसरी तरफ़ डेनमार्क जैसे देश डालफिन जैसे इंसानों की दोस्त कही जाने वाले प्राणियों का सामूहिक संहार कर रहा है , वो भी कुछ इस तरह की सागर का पानी खून से लाल हो जा रहा है ,
ख़बर को विस्तार से देखेने के लिये http://uplivenews.blogspot.com/ क्लिक करे
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UP LIVE
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प्रभाषजी की याद में गमगीन हो गया गांधी शांति प्रतिष्ठान
किसी की आंख में आंसू थे। कोई सिसक रहा था। किसी से बोला नहीं जा रहा था। तो किसी का गला बोलते-बोलते रुंधा जा रहा था। कहने को इतना था कि शायद शाम और रात भी कम पड़ती। गांधी शांति प्रतिष्ठान में 18 नवंबर की शाम का कुछ ऐसा ही नजारा था। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि देने के लिए उमडे़ थे। इनमें वो लोग भी थे जिनका प्रभाष जी से करीबी रिश्ता रहा और वो लोग भी जो प्रभाषजी से न कभी मिले थे और न ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे, उनका और प्रभाषजी के बीच सिर्फ एक रिश्ता था और वह था पाठक और लेखक के बीच का रिश्ता। इनमें मेधा पाटकर थीं, अरूणा राय भी, प्रशांत भूषण, कुलदीप नैयर, सुरेन्द्र मोहन, अरविंद मोहन, सुमित चक्रवर्ती, तपेश्वर भाई, विजय प्रताप, रामजी सिंह भी। और न जाने कितने नाम। कोई सर्वोदय आंदोलन का कार्यकर्ता था, कोई सूचना के अधिकार अभियान का तो कोई नर्मदा बचाओ आंदोलन का। देश भर में चल रहे सभी जमीनी आंदोलनों से प्रभाषजी कितने करीब से जुडे़ थे, यहां आए लोग इसकी एक छोटी-सी बानगी पेश कर रहे थे।
महादेव विद्रोही प्रभाषजी को याद करते-करते फफक-फफक कर रो पडे़। बोले- प्रभाषजी का सर्वोदय आंदोलन से गहरा नाता था, वे उनके संपादक थे। रामजी सिंह ने बताया कि प्रभाषजी केवल पत्रकार नहीं थे, अगर पत्रकार थे तो प्रोफेशनल नहीं थे, बाजार में रहते हुए वे बाजार के प्रभाव से दूर थे। अरूणा राय का कहना था कि प्रभाषजी का न रहना देशभर में चल रहे सभी आंदोलनों को झटका है। उन्होंने आरटीआई की नींव डाली और हम जानेंगे, हम जिएंगे का नारा दिया। एक वाकया याद करते हुए अरूणा राय ने बताया कि प्रभाषजी जब भीलवाड़ा में आए तो उन्होंने कहा था कि मैं आजकल यमराज को गच्चा दे रहा हूं। वो मुझे बारात लेकर दिल्ली लेने आता है तो मैं भीलवाड़ा आ जाता हूं, भीलवाड़ आता है तो मणिपुर चला जाता हूं।
सभा में आए राजकुमार जैन ने प्रभाषजी को याद करते हुए बताया कि शुरूआत में वे प्रभाष जोशी से नफरत करते थे, वे उन्हें जूतों की माला पहनाना चाहते थे क्योंकि वे मधु लिमये के खिलाफ रोज अनाप-शनाप लिखा करते थे, लेकिन जब बाबरी मस्जिद गिराने के बाद उन्होंने जनसत्ता में प्रभाषजी का लेख पढ़ा तो अपने को कोसने लगे। प्रभाषजी के सहयोगी कुलदीप नैयर बोले कि कोई शिद्दत से काम करें तो लोग उसकी कदर करते हैं। प्रभाषजी बडे़ इंसान थे, वे ऐसे ही आदमी थे।
मेध पाटकर प्रभाषजी को याद करते-करते भावुक हो उठीं। अपनी भावुकता को नियंत्रित कर वे बोलीं कि जनसुनवाइयों के लिए जो लिस्ट बनती थी, उनमें पहला नाम प्रभाष जोशी का होता था। वो आसमान और धरती को एक साथ छूने वाले व्यक्ति थे। वे पत्रकार नहीं आंदोलनों के मित्र थे। अंत में समाजवादी चिंतक सुरेन्द्र मोहन से प्रभाषजी के बारे में बताया कि उनके भीतर हमेशा एक आग जलती रहती थी जो उन्हें चैन से नहीं बैठने देती थी, वो इस आग को सबके दिलों में जलाना चाहते थे। वे पत्रकार भी थे, सामाजिक सरोकारों से भरे थी थे और स्वयं एक आंदोलन थे।
कला और साहित्य जगत के सम्बन्ध में अपनी राय रखने के लिए kathphodwa.blogspot.com पर जाएँ
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Neeraj Kumar
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लो क सं घ र्ष !: नारी सशक्तीकरण का मूलमंत्र
हम दोनों मित्र अपनी पत्नियों को शायद ही कभी कुछ कहते हों सिवाय उनकी तारीफ के, क्योंकि वह तारीफ के लायक हैं। जब बात शुरू हुई तो हम दोनों ने खुले मन स्वीकार किया कि हम खुले मन से निःसंकोच महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं लेकिन अपने घर की महिलाओं की समर्पण की भावना को सहज रूप मेे स्वीकार कर लेते हैं और उनको जी-तोड़ मेहनत से बचाने का प्रयास नहीं करते। इसके पीछे हमारी सोच यह भी हो सकती है कि परिवार रूपी गाड़ी के दोनों पहिये सुगमता से चलते रहें तो गाड़ी रूकेगी नहीं। पति और पत्नी परिवार रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं जिन्हें मिलकर गाड़ी को खींचना होता है।
मुहम्मद शुऐब एडवोकेट
मोबाइल- 09415012666
loksangharsha.blogspot.com
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Suman
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अस्थाई मीडियासेंटर के निर्माण का काम प्रभातम नामक कंपनी को २.९० लाख रूपये में दे दिया
देहरादून । कुंभ मेले में बनाये जाने वाले अस्थाई मीडिया सेंटर को लेकर बडा खेल आखिरकार विभाग के अधिकारी ने अंजाम दे ही दिया। इस बात की भनक प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा. रमेश पोखरियाल निशंक को भी नहीं लग सकी। जिससे पूरी व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लग गए हैं कि आखिर किस तरह अधिकारी ने टेंडर में दी जाने वाली कई महत्वपूर्ण जानकारियां कम्पनी के अध्किारियों को गुप्त रूप से दी। कुंभ मेले को लेकर प्रदेश सरकार किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहत लेकिन इसके बाद भी अधिकारी की मिली भगत से हरिद्वार में अस्थाई मीडियासेंटर के निर्माण का काम प्रभातम नामक कंपनी को २.९० लाख रूपये में दे दिया गया है। जबकि इससे कम रेट पर काम करने वाली कंपनी को बाहर का रास्ता पहले ही दिखाया जा चुका है। दिल्ली की कंपनी आईटीडीसी व मुंबई की एकअन्य कंपनी को पहले ही बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका था। हरिद्वार में बनाए जाने वाले अस्थाई मीडियाा सेंटर को लेकर सचिवालय में कुल नौ कंपनियों ने अपना प्रस्तुतिकरण कुछ समय पूर्व दिया था और बाद में टेंडर निर्माण केा लेकर कंपनियों से टेंडर मांगे गये थे। मीडिया सेंटर के निर्माण के लिए कुल ६ कंपनियों ने टेंडर डाले दिल्ली की आईटीडीसी, ऊर्ध्वा, सहारा संचार, प्रभातम, पल्स प्रोडक्शन के साथ कुल मुंबई की मिलाकर ६ कंपनियों ने टेंडर डाले। लेकिन तीन कंपनियों को टेक्निकल बिड में अधिकारियों की मिलीभगत से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। जबकि उसमें से एक कंपनी काफी कम कीमत पर काम करने को राजी भी हो गयी थी लेकिन उसके बाद भी उसे फाइनल नहीं किया गया। प्रातः जैसे ही सचिवालय में हरिद्वार कुंभ मेले के अस्थाई निर्माण को लेकर शेष बची तीन कंपनियों सहारा संचार, ऊर्ध्वा व प्रभातम के टेंडर खोले गये तो उनमें सबसे अधिक टेंडर रेट १० करोड सहार संचार, ३ करोड ऊर्ध्वा एवं २ करोड ९० लाख प्रभातम के निकले सबसे कम रेट निकाले जाने पर प्रभातम को अस्थाई मीडिया सेंटर बनाये जाने का काम दिये जाने पर सहमति प्रदान कर दी गई है। जबकि प्रभातम को न तो मीडिया सटर का कोई अनुभव है और न ही उसने इससे पूर्व कुंभ मेले के आयोजन में इस तरह का काम किया है। वहीं यह भी जानकारी में आ रहा है कि इस पूरे मामले में किसी राजनैतिक दबाव के चलते यह टेंडर दिया गया है। जबकि कई कंपनियों के लोगों का साफ कहना है कि इस खेल में करोडों रूपये का मोटा खेल खेला गया है। जिस कारण टेंडर में दी जाने वाली धनराशि को बडी ही चालाकी से पहले ही लीक आउट कर दिया गया और इस मामले में एक अधिकारी की विशेष भूमिका सन्देह के घेरे में आ गई है। इस मामले का लेकर अब अन्य कंपनियों के लोग देर शाम प्रदेश के मुख्यमंत्राी का दरवाजा खटखटाकर पूरे मामले से अब उन्हें अवगत कराने का मन बना चुके हैं। वहीं यह भी आशंकाएं व्याप्त हो रही हैं कि कुंभ के नाम पर जिस तरह से करोडो रूपये की बंदरबांट प्रभातम नामक कंपनी को की गई है इससे अच्छा सूचना विभाग को ही अस्थाई मीडिया सेंटर का काम दिया जाता तो इसे लाखों रूपये में ही निपटाया जा सकता था। लेकिन इसके बाद भी जिस तरह करोडों रूपये की बंदरबाट कर इसे बाहरी कंपनी केा दिया गया है उससे एक बार फिर पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग खडे हुए हैं।
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narayan pargain
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19.11.09
लो क सं घ र्ष !: लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर-2009 अंक का मुख्य पृष्ट
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Suman
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Ganga ke Kareeb: यहां वीरभद्र प्रकट हुआ था ----- वीरभद्रेश्वर मंदिर (ऋषिकेश)
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Rajendra Joshi
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मीडिया फेलोशिप आमंत्रित
नयी दिल्ली -'अंगिका डेवलपमेंट सोसाइटी' भागलपुर ने मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता और देश के अलग अलग राज्यों में नक्सलवाद की मौजूदा स्थिति पर मीडिया फेलोशिप आमंत्रित की है फेलोशिप के लिए चुने गए पत्रकारों को एक लाख रूपए की राशि दी जाएगी ,जिनमे यात्रा खर्चा तथा अन्य व्यय शामिल हैं , संस्था द्वारा फेलोशिप हेतु तीन पुरुष और तीन महिला पत्रकारों का चुनाव साक्षात्कार के आधार पर किया जायेगा ,जो जनवरी के दूसरे सप्ताह में भागलपुर में आयोजित की जाएगी इस फेलोशिप हेतु अन्य जानकारी www.angika.ind.in पर उपलब्ध रहेगी ,फेलोशिप के इच्छुक पत्रकार नियम और शर्तों के आधार पर ३१ दिसम्बर तक अपना आवेदन rajesh.srivastava@angika.ind.in पर भेज सकते हैं , अन्य जानकारी 0641-2452303,2452503 पर ले सकते हैं संस्था के सचिव राजेश श्रीवास्तव ने बताया की फेलोशिप में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागी को २ लाख रूपए का रिवार्ड भी दिया जायेगा
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आवेश
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18.11.09
लो क सं घ र्ष !: राजनीति में विश्वासघात
एक खबर को अधिकतर अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी गई, ‘‘मुलायम और कल्याण की दोस्ती समाप्त।’’ राजनीति के पंडित जानते हैं कि राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं हुआ करते। वक्त की जरूरत थी, दोनों ने दोस्ती की। दोनों ने यह दोस्ती, अपने-अपने फायदे के लिए की थी। चूंकि मैं छात्र जीवन से समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा रहा हूं इस कारण आचार्य नरेन्द्र देव, डा0 राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण से परिचित हूं। जब इन लोगों का नाम लेता हूं तो उस शख्सियत को भी नहीं भूल पाता जो समाजवादी आन्दोलन का एक स्तम्भ था जिसे नेताजी (राज नारायण) के नाम से जाना जाता है। हालांकि नेताजी के नाम से केवल सुभाष चन्द्र बोस को ही जाना जाता रहा है लेकिन राज नारायण के लोगों ने उन्हें नेताजी का नाम दिया और धरतीपुत्र कहा। सचमुच धरतीपुत्र ने समय के अनुसार राजनीतिक दोस्ती उन लोगों से भी की जिन्हें वह राजनीतिक दुश्मन मानते थे लेकिन सिद्धान्त विरोधी राजनीतिक दुश्मन का साथ उन्होंने केवल इसलिए पकड़ा कि उनके नेता डा0 राम मनोहर लोहिया देश में सही लोकतंत्र देखना चाहते थे और सही लोकतंत्र स्थापित करना चाहते जिसके लिए वह राजनीति में व्यक्तित्व पूजा और वंशवाद का मूल नष्ट करने के प्रयास में रहे। डा0 राम मनोहर लोहिया के शब्दों में, ‘‘मैं जानता हूं कि मैं एक चट्टान से टकरा रहा हूं और यह भी जानता हूं कि चट्टान को नहीं तोड़ सकूंगा लेकिन मुझे विश्वास है कि दरार जरूर डाल दूंगा।’’ यह शब्द उनके उस वक्त के थे जब वह पं0 जवाहर लाल नेहरू के मुकाबले चुनाव मैदान में उतरे। एक वाक्य और उद्धृत करता हूं डा0 राम मनोहर लोहिया का, जब उन्होंने ग्वालियर की महारानी के खिलाफ सुक्खो रानी को चुनाव मैदान में उतारा था, ‘‘लोकतंत्र में लोक प्रतिनिधि का चुनाव होता है और यही कारण है कि ग्वालियर के चुनाव में एक तरफ है ग्वालियर की महारानी तो दूसरी तरफ है हमारी उम्मीदवार हैं सुक्खो रानी।’’
समाजवाद के दार्शनिकों का यह मूलमंत्र समाप्त हो गया और समाजवादी आन्दोलन सुविधा और भोग की राजनीति में खो गया और समाजवादी नेता और कार्यकर्ता जो सुविधा और भोग की राजनीति में अपना स्थान बना सके, जीवित हैं, अन्यथा खो गये।
समाजवादी आन्दोलन तो नहीं रहा, लेकिन समाजवाद के नाम पर डा0 राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और आचार्य नरेन्द्र देव के नाम पर शोषण की राजनीति शुरू हो गई और समाजवादी पार्टी ने जन्म लिया। इस पार्टी में सुविधा भोगी जातिवादी और सम्प्रदायवादी लोगों ने गठजोड़ किया और जिसके विरूद्ध समाजवादी नेता लड़ते रहे वही इस पार्टी में परवान चढ़ा और वह है वंशवाद। मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, राम नारायण यादव और अखिलेश यादव। भाई-भतीजावाद पर उठार-प्रहार करने वाली राजनीति पर भाई-भतीजावाद हावी हो गया। साम्प्रदायिकता और जातिवाद का बोलबाला रहा। मुझे याद है कि जब हम समाजवादी योजन सभा संसोपा और सोपा के लोग जाति तोड़ो सम्मेलन किया करते थे, आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे कुचले दलितों को विशेष अवसर दिलवाने के लिए संघर्ष करते थे, आये दिन जगह-जगह सहभोज का आयोजन करते थे, भाई-भतीजावाद को मानना एक गाली समझते थे, आज हम उन्हीं मूल्यों को जीति रखकर अपने को समाजवादी घोषित करने में गर्व महसूस करते हैं। अब अगर मुलायम सिंह यादव भाई-भतीजावाद और वंशवाद को अग्रसर करने के लिए अपने ही जैसे चरित्र के व्यक्ति से दोस्ती करता है और दोस्ती करने के नतीजे में अपनी नींव खिसकती हुई देखकर दोस्ती समाप्त करता है तो इसमें कैसा विश्वासघात?
कल्याण सिंह जो एक समय में बावरी मस्जिद गिराने के दोषी रहे, भारत के संविधान की धज्जियां उड़ायी, अपने ही देश के कानून को जूतों की नोंक पर रखा, भारतीय जनता पार्टी से अलग होने के बाद उन्हें भी सहारे की जरूरत थी और अपनी इसी जरूरत को पूरा करने के लिए मुलायम सिंह का हाथ थामा। आवश्यकता के अनुसार हिन्दू राष्ट्र की स्थापना और मन्दिर आन्दोलन से जोड़ कर सत्ता में भागीदार बनाने के उद्देश्य से जब उन्हें मुलायम का साथ अच्छा लगा साथ हो लिए और जब यह साथ दोनों के लिए नुकसानदेह लगा तो दोनों ही अलग हो गये। ये थी स्वार्थ की राजनीति, फिर यह कहा जाय कि मुलायम ने कल्याण सिंह के साथ विश्वासघात किया या कल्याण सिंह ने मुलायम सिंह के साथ विश्वासघात किया, कोई मायने नहीं रखता और सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि जब दोनों को एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी साथ रहे और जब जरूरत समाप्त हुई तो अलग हो गये।
सिर्फ इन्हीं दोनों नेताओं को नहीं बल्कि देश के किसी दल या दल के किसी नेता को देश की चिन्ता नहीं है और अगर चिन्ता है तो सिर्फ अपने स्वार्थ की। जिस नेता का स्वार्थ जिस दल से सिद्ध होता है, वह उसके लिए उस समय तक वफादार रहता है जब तक कि उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहे, स्वार्थ टकराने के बाद वह जिस दल के प्रति वफादार रहा है उसका साथ छोड़कर उस दल के साथ हो लेता है जहां पर उसके स्वार्थ सिद्धि की गुंजाइश हो।
यही कारण है मुलायम सिंह और कल्याण सिंह का एक-दूसरे के साथ विश्वासघात का। अगर दोनों को अपने स्वार्थ की चिन्ता न होकर देश की चिन्ता होती तो दोनों को यह कभी न लगता कि दोनों ने एक दूसरे के साथ विश्वासघात किया। सच तो यह है दोनों ने एक दूसरे के साथ विश्वासघात न करके हमेशा देश के साथ विश्वासघात किया है, कर रहे हैं और करते रहेंगें, इसलिए आवश्यक है कि अपना भला छोड़कर देश का भला चाहने वाले एक साथ उठें और जन-जागरण चलाकर देश के कल्याण के लिए स्वार्थ त्यागकर आगे बढ़ें, इसी में हमारी भलाई है।
मुहम्मद शुऐब एडवोकेट
मोबाइल - 9415012666
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मुक्तिबोध जन्म सप्ताह - मनुष्य का महाख्यान है मुक्तिबोध
नामवर सिंह निर्विवाद सबसे बड़े आलोचक हैं। लेकिन आलोचना में मुक्तिबोध की छाया का भी स्पर्श क्यों नहीं कर पाए ? मुक्तिबोध ने आलोचना को जिस जमीन पर ले जाकर छोड़ा था उसके आगे क्यों नहीं ले जा पाए ? क्या नामवर सिंह जैसे समर्थ आलोचक से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे मुक्तिबोध की जमीन से आगे जाएं और आलोचना का विकास करें। नामवरजी बहुत बड़े आलोवक हैं लेकिन मुक्तिबोध के संदर्भ में उन्होंने वे सावधानियां क्यों नहीं बरतीं जिनके बारे में मुक्तिबोध ने प्रगतिशील आलोचना को सावधान किया था । जाहिर है मुक्तिबोध की बतायी सावधानी हटी और आलोचनात्मक दुर्घटना घटी और हिन्दी आलोचना की सबसे बड़ी दुर्घटना है 'कविता के नए प्रतिमान'।
सबसे पहले नामवर जी के मुक्तिबोध के प्रति खंडित रवैयये पर गौर करें। मुक्तिबोध को 'कविता के नये प्रतिमान' में न्यूनतम स्पेस दिया गया है। मुक्तिबोध की समग्र रचनाशीलता पर नहीं सिर्फ एक कविता के कुछ आयामों पर ही विचार किया गया है। मुक्तिबोध ने प्रगतिशील समीक्षा के बारे में जो बातें कही थीं, वे नामवरजी पर भी घटती हैं, मसलन् मुक्तिबोध ने लिखा है '' क्या आपने वास्तविक काव्य-कृतियों को उनकी समग्रता में लेकर किसी कवि -विशेष का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत किया ? '' जाहिर है यह काम नामवरजी ने कम से कम नहीं किया।
मुक्तिबोध का आलोचना या साहित्य में सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने पूंजीवाद को प्रधान एजेण्डा बनाया। मुक्तिबोध की शक्ति वहीं पर चमक के साथ महसूस होती है जहॉं पर वे पूंजीवाद की सबसे तीखी आलोचना करते हैं। आलोचना से लेकर कविता तक पूंजीवाद की निर्मम आलोचना और यह आलोचना भी वर्गीय हितों को केन्द्र में रखकर की गई है। क्या हिन्दी का कोई भी आलोचक वैसी निर्मम आलोचना कर पाया है ?
हमें इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि 'कविता के नए प्रतिमान' में किस तरह के प्रतिमानों की चर्चा की गई है ,क्या नामवरजी कोई समाजवादी काव्य प्रतिमान खोज पाए ? क्या कोई ऐसा प्रतिमान स्थिर कर पाए जिससे पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष में रचना और आलोचना का अस्त्र बनाया जा सके ? वे जिन प्रतिमानों की चर्चा करते हैं वे पूंजीवाद का तिलिस्म नहीं तोड़ पाते। उलटे कल्याणकारी राज्य के साथ कदमताल मिलाते नजर आते हैं ।
जिन लेखकों,कवियों और आलोचकों के बारे में विस्तार के साथ विमर्श में नामवरजी उलझे रहे हैं उनमें से अधिकतर आज कहॉं पर हैं ? हिन्दी में उनकी क्या कोई परंपरा है ? ऐसा क्यों हुआ कि मुक्तिबोध हिन्दी के नए साहित्यकारों के प्रतीकपुरूष बन गए और बाकी सिर्फ कवि,आलोचक,लेखक मात्र होकर रह गए।
हिन्दी में अपनी परंपरा प्रेमचंद ने बनायी थी या बाद में मुक्तिबोध ने बनायी । दोनों के यहॉं पूंजीवाद सबसे बड़ा एजेण्डा है, प्रेमचंद ने किसान और मध्यवर्ग की तबाही को चित्रित करके मनुष्य की खोज की थी। ठीक अपने तरीके से मुक्तिबोध ने मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग की पूंजीवाद के द्वारा मचायी गयी तबाही को नंगा किया और मनुष्य की सत्ता को प्रतिष्ठित किया। पूंजीवाद के प्रति अविचल सिद्धान्तनिष्ठ संघर्ष चलाने के कारण ही ये दोनों हिन्दी के महान् लेखक बने हुए हैं।
अस्मिता विमर्श मूलत: पूंजीवादी विमर्श है । क्या अस्मिता विमर्श अस्मिता,जाित,धर्म,भाषा,नस्ल,गोत्र ,वर्ग आदि के आधार पर तय होगा या नजरिए के आधार तय होगा ? बतर्ज नामवरजी आधुनिक मानव की ज्वलंत समस्या अस्मिता या 'आइडेंटिटी' की है। क्या मुक्तिबोध की अस्मिता खोज का प्रकल्प वही है जो बुर्जुआजी का है ? क्या मार्क्सवाद में अस्मिता विमर्श है ? मार्क्सवादी वर्गदृष्टि का अस्मिता के साथ तीन तेरह का रिश्ता है। विचारणीय सवाल यह है कि मुक्तिबोध अपनी कविता और आलोचना में अस्मिता को नष्ट करते हैं या निर्मित करते हैं ? थोड़ी देर के लिए नामवरजी की बात मान लें और विचार करें कि मुक्तिबोध की अस्मिता क्या है ,पहले देखें नामवरजी क्या कहते हैं ।
नामवरजी का मानना है '' 'अँधेरे में' कविता की ये अन्तिम पंक्तियॉं उस अस्मिता या'आइडेंटिटी' की ओर संकेत करती हैं, जो आधुनिक मानव की सबसे बड़ी समस्या है। निस्सन्देह इस कविता का मूल कथ्य है अस्मिता की खोज; किन्तु कुछ अन्य व्यक्तिवादी कवियों की तरह इस खोज में किसी प्रकार की आध्यात्मिकता या रहस्यवाद नहीं , बल्कि गली-सड़क की गतिविधि,राजनीतिक परिस्थिति और अनेक मानव-चरित्रों की आत्मा के इतिहास का वास्तविक परिवेश है। '' नामवरजी की सारी समस्या की जड़ उपरोक्त समझ में है।
अस्मिता कोई वायवीय अथवा वातावरण की चीज नहीं है जिसे गली,सड़क वातावरण में खोजें। अस्मिता वातावरण ,नाटकीयता, मैं और तुम में नहीं बल्कि ठोस सामाजिक इकाईयों में निवास करती है। वह 'मैं' और 'वह' में वर्गीकृत होकर व्यक्त नहीं होती। नामवरजी ने 'कविता के नए प्रतिमान' में 'अँधेरे में ' कविता की जो आलोचना और व्याख्या लिखी है, वह अपनी जगह सही हो सकती है, मुक्तिबोध को देखने का यह उनका नजरिया है और इसे व्यक्त करना उनका लोकतांत्रिक हक है। लेकिन अस्मिता का अवधारणात्मक विभ्रम पैदा करने की जो उन्होंने कोशिश की है वह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है। नामवर जी का मानना है '' कवि मुक्तिबोध के लिए अस्मिता की खोज व्यक्ति की खोज नहीं अभिव्यक्ति की खोज है।एक कवि के नाते उनके लिए परम अभिव्यक्ति ही अस्मिता है। भाषा स्वभावत: इस अभिव्यक्ति का आधार है।''
सवाल उठता है मुक्तिबोध की भाषा कौन सी है मराठी या हिन्दी ? क्या उनके पास दो भाषाओं की अस्मिता नहीं है ? क्या मुक्तिबोध की मराठी अस्मिता को हिन्दी अस्मिता हजम कर गई या ये दोनों एक-दूसरे पर लदी रही हैं ,क्या मराठी साहित्य,कम्युनिस्ट आंदोलन का मुक्तिबोध की अस्मिता पर कोई असर था ? क्या मुक्तिबोध की पुंस अस्मिता को हम भूल जाएं ? क्या उनकी एक पति, शिक्षक,कम्युनिस्ट,लेखक, ब्राह्मण,पिता,पुत्र आदि में से किसी भी अस्मिता को मुक्तिबोध में से निकाल सकते हैं ?
नामवरजी जानते हैं कि व्यक्ति के पास एक नहीं अनेक अस्मिताएं होती हैं,इनमें प्रतिस्पर्धा और अन्तर्विरोध भी हैं। आप अस्मिता के जंगल में जब एकबार दाखिल हो जाएंगे तो तार-तार होकर निकलेंगे। अस्मिता स्वयं का ही नाश करती है। हम तय कर लें हमें लेखक मुक्तिबोध की अस्मिता पर विचार करना है या मराठी भाषी मुक्तिबोध पर विचार करना है अथवा 'मनुष्य मुक्तिबोध' पर विचार करना है। सवाल यह है 'मनुष्य मुक्तिबोध' को देखने की बजाय भाषायी अस्मिता वाले मुक्तिबोध को नामवरजी ने क्यों स्थापित किया, क्या यह तत्कालीन भाषायी अस्मिता संघर्षों का नामवरजी पर प्रभाव है ?
'मनुष्य मुक्तिबोध' उन तमाम अस्मिताओं और विचारधाराओं का अतिक्रमण करता है जिसमें उसे बांधने की कोशिश की जा रही है। एक और सवाल पैदा होता है कि मुक्तिबोध के यहॉं मनुष्य की सत्ता को प्रतिष्ठित करने का काम किया गया है या 'परम अभिव्यक्ति' या ' भाषायी अस्मिता' या 'मैं' को अथवा मैं और मैं के बीच की नाटकीयता को खोजने पर जोर है या मनुष्य को खोजने पर जोर है। आखिरकार मुक्तिबोध क्या स्थापित करना चाहते हैं।
सवाल उठता है मुक्तिबोध मनुष्य की खोज करते हैं अथवा अभिव्यक्ति की खोज करते हैं। नामवरजी यह भूल ही गए कि पूंजीवाद ने मनुष्य केअस्तित्व पर ही हमला बोला हुआ है,मानवीय मूल्यों की क्षयगाथा बताते हुए मुक्तिबोध अभिव्यक्ति की खोज नहीं कर रहे थे, मनुष्य की खोज कर रहे थे। उन्हें कविता से लेकर आलोचना में मनुष्य की तलाश थी, समाज में मनुष्य के जितने रूप हैं उनके सभी चरित्र व्यक्त होते हैं लेकिन ये चरित्र माध्यमभर हें। सामाजिक चरित्रों की खोज करना उनका लक्ष्य नहीं है लक्ष्य है मनुष्य को खोजना, मनुष्य की अक्षुण्ण सत्ता को स्थापित करने के क्रम में उन्होंने विभिन्न विचारधाराओं की यात्रा की और इस यात्रा में उन्हें लगातार मनुष्य पर पूंजीवाद के बर्बर हमले दिखाई दिए जिसे उन्होंने अपनी अंतर्वस्तु बनाया।
मुक्तिबोध ने पूंजीवाद को नंगा करने के लिए अस्मिता,भाषा और अभिव्यक्ति का नहीं मनुष्य की सत्ता का सहारा लिया, मनुष्य की सत्ता के प्रति इस तरह की गहरी प्रतिबद्धता भारत में बहुत कम लेखकों में नजर आती है।
मनुष्य की सत्ता को प्रतिष्ठित करने के लिए मुक्तिबोध अनेक किस्म के उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें अस्मिता,भाषा आदि भी हैं, लेकिन उनका लक्ष्य मनुष्य है परम अभिव्यक्ति नहीं। पूंजीवाद ने मनुष्य के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति और भाषा के अपने पैर नहीं होते। मनुष्य के कंधे पर सवार होकर ही वे जाती हैं। मजेदार बात यह है कि स्वयं को व्यक्त करने के लिए भाषा भी चाहिए,अभिव्यक्ति भी चाहिए। लेकिन किसके लिए अस्मिता के लिए अथवा मनुष्य के लिए। मनुष्य की सत्ता ही एकमात्र सत्य है बाकी तो मिथ्याचेतना है। मुक्तिबोध इस अर्थ में अपने युग का और अपने सामयिक साहित्यकारों का अतिक्रमण करते हैं क्योंकि मनुष्य को पाने की जितनी उत्कट आकांक्षा उनके यहॉं है वह अन्यत्र उतनी फोर्स के साथ दिखाई नहीं देती।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी
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हैडली याने हैदर अली...
आंतकी वारदातों के बढ़ते ग्राफ और तरह-तरह की बातों ने ज़ेहन में कई सवालात खड़े कर दिए है...दरअसल..मन बेहद विचलित है कि कोई भला कैसे ये कह सकता है कि फलां वर्ग या समाज धर्म के लोग ऐसे होते हैं..क्यों इस मामले में इतना पूर्वाग्रह होता है...इन दिनों हैडली प्रकरण बड़ा उछला हुआ है...सच तो जो भी हो लेकिन भारतीय तीव्रतम् मीडिया को मसाला ख़ूब मिला है...मुम्बई हमले में शामिल था देश के एक-एक शहर को घूमा आदि..आदि। खैर ये तो किसी भी सूचना माध्यम के साथ होता है..मेरे मन में सहसा ही हैडली के बारे में ख़्याल आया कि ये जो डेविड कॉलमेन हैडली है, कहीं इसका असल नाम दाउद क़ल उम्मैन हैदर अली तो नहीं....इस तरह का विचार ज़ेहन में यूं ही नहीं आया था..बल्कि ऐंसे विचारों की शुरूआत कंधार काण्ड के बाद हुई थी ,जब हाईजैकर्स में से एक का नाम शंकर था जो बाद में साकिर निकला...औऱ चल पड़ा सिलसिला आतंकी वारदातों का...जुड़ने लगा नाम इनके पीछे..अक्सर ऐंसी कौम का जो पहले से ही भारत जैसे सहिष्णु देश में रहने की ज़द्दोजहद कर रही है...हर चेकपोस्ट पर अपने देशभक्त होने का सबूत दे रही है...इसी दौरान मैंने एक निजी समाचार चैनल के खास कार्यक्रम में देवबंद के मदनी साहब के विचार जाने उनका दर्द उनकी टीस हर शब्द में थी...बात-बात पर कटघरे में खड़े होने वाले मुल्ला मौलवियों के सामने अब आखिर कितने और सवाल हैं...रजत शर्मा जैसे मंझे हुए पत्रकार अपना पूर्वाग्रह रोक ना सके..उनका भी एक सवाल सीमापार और देशी लोगों के बीच भेद ना कर सका...मुझे तकलीफ इस बात की है..कि आखिर मुस्लिम कौम ही क्यों कटघरे में है अमरिका में भारतीय क्यों नहीं जबकि वहां तो खुले तौर पर भारतीय आज़ादी का दिन औऱ बाकी सब वो राष्ट्रीय त्यौहार मनाये जाते हैं..जो उन्हें सीधा एक भारत परस्त साबित करतीं हैं..क्या कारण है कि भारत में ही ऐंसा होता है...इसके पीछे हम उस पुरानी सोच पर भी चल कर देखते हैं..जिसमें हिंदी वर्णमाला पढ़ाते वक़्त कई ऐंसी चीज़ें पढ़ाई जाती हैं..जिन्हें बच्चा अपने दिमाग में हमेशा के लिए बिठा लेता है..जैसे कि....क्ष क्षत्रिए का और फोटो रहता है एक योद्धा का...जो तलवार ढाल लिए खड़ा रहता है..तब से अब तक कोई अगर ख़ुद को क्षत्रिए बताता है..या ठाकुर जाति का बताता है तो ख़ुदवख़ुद ज़ेहन में बचपन की पढ़ाई गई तस्वीर उभरने लगती है..जबकि सच उस तस्वीर के इतर होता है...ऐंसे ही हर काली पगड़ी बढ़ी दाढी वाला व्यक्ति आतंकी नज़र आता है और ये हमें पढ़ाया गया उस आतंक की क्लास में जो शुरू हुई थी..सन् 2001 में जब अमरिका तिलमिलाया था..तभी एक चेहरा आतंक का पर्याय बन गया..उसकी शक़्ल हुबहू उसी शक़्ल से मिलती है जो आज मौलाना मुल्ला मौलवियों का लुक है...सीधी बात ये है कि धर्म की आड़ लेकर जितनी क्रूरता आतंकियों ने की है और कर रहे हैं उतना ही ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैया उनका भी है जो सच्चे इस्लाम के विचारक हैं..चाहे वो मस्ज़िद में हों या मज़ार में..सब जगह वो हैं..अब अच्छी बात है कि मदनी साहब जैसे लोग आतंक और इस्लाम में फर्क करने के लिए सामान्य सभाएं भी करने लगे हैं..देवबंद का सम्मेलन कई माइनों में देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के चाल,चरित्र,और चेहरा को निर्धारित करने वाला था...जिसमें समय के साथ इस आबादी का सही चेहरा औऱ मौहरा सामने आएगा वहीं बहुसंख्यकों का भी इनके प्रति नज़रिए साफ होता जाएगा..अब हमें क्ष क्षत्रिए का प पंडित का ल लाला का पढ़ाया जाएगा तो तस्वीरें ऐंसी तो बनेंगी ही ना...लेकिन फिर भी पूर्वाग्रह जैसी चीज़ें देश,समाज,दुनिया और धर्म सबके लिए घातक हैं..मीडिया ने इस सम्मलन से वंदेमातरम् उठाया बाकियों पर तो ध्यान ही नहीं गया......इस देश का विचार मीडिया,मुस्लिम,और महंत बनाते हैं तब इनकी भूमिकाएं खास के साथ ही ज़िम्मेदाराना भी हो जाती हैं....
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वरुण कुमार सखाजी
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Labels: देखशैली
17.11.09
लो क सं घ र्ष !: समय की सबसे बड़ी गाली-2
समय की सबसे बड़ी गाली का पहला भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें
ट्रेन में सफर करते हुए अगर कुछ सैनिक मिल जाएँ तो सम्मान से अपनी रिजर्व सीट छोड़ दें, अन्यथा आपको जबरदस्ती उठा दिया जाएगा, गुस्सा आने पर चलती ट्रेन से धक्का भी दिया जा सकता है। आज-कल सेना के जवानों द्वारा सिवीलियन्स की पिटाई, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ अक्सर सुनने में मिलती हैं। पता नहीं उन्होंने यह सब करना अपना अधिकार समझ लिया है या यह कुण्ठा है जो कहती है ‘‘इन्हीं लोगों की सुरक्षा के नाम पर हमें अमानवीय परिस्थितियों में रहना पड़ता है।‘‘
सच है-वे बहुत काम करते हैं, वे इतने व्यस्त हैं कि सी.आर.पी.एफ. भी अब रिजर्व नहीं रहा। इसके 87 फीसदी जवान किसी न किसी मुहिम से जुड़े हैं। जम्मू-कश्मीर में 39 प्रतिशत पूर्वोत्तर राज्य में 29 प्रतिशत और 19 फीसदी जवान देश के अन्दरूनी इलाकों में नक्सलियों से लड़ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में कठिन और लम्बे संघर्ष तथा पाकिस्तान की नकारात्मक भूमिका के बावजूद क्या भारत कश्मीर की समस्याओं में अपना हाथ होने से खुद को पूरी तरह निर्दोष करार दे सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों की हम बात भी कैसे कर सकते हैं जहाँ की जनता इन जवानों की तैनाती से इतनी व्यथित हो चुकी है कि इसके विरोध में आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं। अन्दरूनी इलाकों में नक्सलियों से लड़ने के नाम पर, आदिवासियों और किसानों को गोलियों से भूना जा रहा है। इससे बढ़ कर ‘सलवा जूडूम‘ जैसी गालियाँ विकसित की जा रही हैं। दिल्ली में ‘सिटीजन फाॅर पीस एण्ड जस्टिस इन छत्तीसगढ़’ की बैठक में एक आदिवासी का यह बयान अगर आपका दिल नहीं दहला सकता तो कुछ भी ऐसा नहीं जो आपको विचलित कर सके-‘‘एक दिन अप्रैल महीने में मैं महुआ बीनने गया हुआ था कि अचानक सलवा जुडूम के लोग वहाँ आ पहुँचे। मैं पेड़ के पीछे छुप गया पर उन्होंने महुआ बीनती चार महिलाओं को पकड़ लिया। उन्होंने मेरे सामने सन्नू ओयामी की 16 साल की बेटी कुमारी और बन्डे की 27 साल की पत्नी कमली का बलात्कार किया। 2 बुर्जुग महिलाओं को उन्होंने छोड़ दिया और जवान लड़कियों को नक्सलियों के रूप में ढ़ालकर अपने साथ ले गए। ये दोनों लड़कियाँ आज भी जगदलपुर की जेल में नक्सली होने के आरोप में बन्द हैं। वकील को अब तक हम लोग 12 हजार रुपये दंे चुके हैं पर वह कहता है कि 20 हजार देंगे तभी वह लड़कियों को छुड़वा सकेगा।’’ 13 मार्च 2007 को नागा बटालियन और सलवा जुडुम के लोगों ने गगनपल्ली पंचायत के नेन्दरा गाँव में कुछ नक्सलियों को मार गिराया था। उनके नाम उनकी उम्र के साथ इस प्रकार है - सोयम राजू (2साल), माडवी गंगा (5 साल), मिडियम नगैया (5साल), पोडियम अडमा (7 साल), वेट्टी राजू (9साल) वंजम रामा (11 साल), सोयम राजू (12 साल), सोडी अडमा (12 साल), मडकम आइत (13 साल) मडकम बुदरैया (14 साल), सोयम रामा (16 साल) सोयम नरवां (20 साल)।
आखिर इन निहत्थे किसानों और आदिवासियों से हमें क्या खतरा है, क्या यही नहीं कि देश की ज्यादातर खनिज सम्पदा इन्हीं इलाकों में है और अब पूँजीपतियों के विस्तार के लिए इन इलाकों पर कब्जा जरूरी है। गृह मन्त्री परेशान हैं क्योंकि पहले वे वित्त मन्त्री भी थे विकास! विकास! विकास! किसानों, आदिवासियों और सेना के अत्याचार झेल रहे दूसरे राज्यों के लोगों तुम मूर्ख हो। हम विकास की बात कर रहे हैं जो तुम समझ ही नहीं सकते और जरूरत भी क्या है कि तुम समझो, हम कौन सा तुम्हें उस विकास में हिस्सेदारी देने वाले हैं। लेकिन इसके बावजूद इतना तो तुमको समझना ही चाहिए कि देश एक है और कानून जरूरी, तुम्हें इसमें यकीन करना चाहिए। पिछले 65 सालों में हमने एक वर्ग की तिजोरियों को इतना भर दिया कि दुनिया के सौ अमीरों में उनके नाम हैं, और तुम मूर्ख! कपटी! देशद्रोही! देश की तरक्की में तुम्हारा यकीन ही नहीं। हाँ सच है इन 65 सालों में हम तुम्हारा भरोसा अब तक नहीं जीत पाये और इसकी तुम्हें सजा मिलेगी।
सेना को कौन बताता है कि ये लोग दुश्मन हैं। यही क्यों, लगे हाथ पाकिस्तान और दूसरे देशों पर भी विचार कर लिया जाए। या फिर पाकिस्तान की सेना को कैसे पता चलता है कि उन्हें भारतीय सैनिकों पर हमला बोलना है। जाहिर सी बात है यह तय करती हैं मुखौटा बदलती और नए साँचे में ढ़लती वे सरकारें, जो शोषण पर टिकी व्यवस्था को कायम रखती हैं। आत्महत्या करने या गोली खाने पर मजबूर किसान को देश शब्द से क्या फर्क पड़ता है, फिर वह चाहे आदिवासी क्षेत्र का हो, विदर्भ का या फिर पाकिस्तान के किसी पिछड़े इलाके का।
असल में हमारे जवान रोबोट भर हैं जिनकी उँगलियाँ ट्रिगर पर हैं और उनके पीछे उनके संचालक (इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अंग्रेज नहीं।) दुश्मनों को चिन्हित करने में व्यस्त हैं। मन दहल जाता है कि अन्दरूनी समस्याओं से निपटने के नाम पर शस्त्रों से लैस हमारी सेना के कसरती जवान, दिन रात अभ्यास करते हैं - निहत्थे किसान, मजदूर और आदिवासियों को कुचलने के लिए। ऐसा नहीं वे चैन से बैठे हैं इस हेतु वे दिन-रात मेहनत करते हैं। बिना छुट्टी लिए अपने परिवार से दूर अकल्पनीय अमानवीय हालात (हालाँकि देश की बड़ी आबादी भी उसी हालत में रहती है। ) का सामना करते हुए, वे हत्याएँ एवं बलात्कार कर रहे हैं और घर जला रहे हैं, क्योंकि उन्हें आदेश मिला है ये शोषित लोग दुश्मन हैं। इस तरह वे वाकई नए दुश्मन पैदा करते हुए लड़ रहे हैं, मर रहे हैं।
पिछले 37 सालों में हमने बेशक कोई यु़द्ध न लड़ा हो पर हमारी सीमाओं के अन्दर यह रोज जारी है। इन परिस्थितियों में लड़ते हुए हमारे जवान वहाँ की जनता से देश भक्तों सा गौरव भी नहीं प्राप्त कर पाते जो वेतन के अतिरिक्त एक आवश्यक ऊर्जा स्रोत है। अतः सेना के जवान तनावग्रस्त हो कर आत्महत्या की राह पर चल पड़े हैं। दो साल पहले सेना के जनरल जे.जे. सिंह ने खुद स्वीकार किया था कि पिछले चार-पाँंच सालों से हर साल कम से कम 100 जवान आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं। इसका अर्थ यह है हर हफ्ते कम से कम दो जवान आत्महत्या करते हैं। इसमें सबसे बड़ी संख्या सी.आर.पी.एफ. की है जिसे अन्दरूनी हिस्सों में लगाया जाता है। 2004-06 में 283 जवान मिलिटेन्ट हमलों में मारे गए। जबकि इसी दौरान खुद अपनी या अपने साथियों की जान लेने वाले सैनिकों की संख्या 408 थी जिसमें से 333 जवान आत्महत्या के शिकार हुए थे।
लेकिन इस सब से क्या फर्क पड़ता है, व्यवस्था में सब कलपुर्जे हैं, फिर वे किसान हों या जवान। इन सबका संचालन वास्तव में वे लोग करते हैं जिन्हें अपनी पूँजी बढ़ानी है। टेक्नोलाॅजी और दूसरे हितों के लिए बाहरी कम्पनियों से हाथ मिलाना है। बेचना है-खरीदना है। किसानों, आदिवासियों से उनकी जमीन छीननी है। इसके लिए उनके पास मुखौटा बदलती सरकार है, जो हमें समझा सके-‘राष्ट्रीय हित‘ में यह सब होना कितना जरूरी है। विरोध को कुचलने के लिए सेना है ओर उसमें भरती होने के लिए बेरोजगारों की फौज, जो भरती हो कर यदि दुश्मन (जिसे चिन्हित किया गया है। ) का सामना करते हुए मरे तो शहीद, किन्तु भर्ती के दौरान यदि भगदड़ मचने से मरे या सेप्टिक टैंक टूटने से उसमें डूब कर मरें तो कुत्ते की मौत मरेंगे यकीन मानिए आक़ाओं को देश शब्द से कोई फर्क नहीं पड़ता।
अन्तिम सत्य यह है कि सम्मानजनक जीवन की माँग शान्तिपूर्ण ढ़ंग से करना आत्महत्या है और हताशा में हथियार उठा लेना देशद्रोह। सबसे सच्चा वह ‘मैं’ है जो ‘धारक’ को एक के नोट पर एक रू. अदा करने का वचन देता है यह बात और है उसकी कीमत कभी भी एक रू. नहीं थी।
-पवन मेराज
मो0 09179371433
लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाशित
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Suman
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मुक्तिबोध जन्मदिन नेट सप्ताह: धर्मनिरपेक्ष नजरिया था मुक्तिबोध का
मुक्तिबोध ने हिन्दू धर्म और दर्शन की धर्मनिरपेक्ष व्याख्या निर्मित की है। सबसे पहले हम देवी-देवताओं के संदर्भ में उनकी व्याख्याओं को देखें। आम तौर पर देवी-देवताओं की देवत्ववादी व्याख्याएं मिलती हैं। इस मूल्यांकन में मुक्तिबोध देवत्व भावना के प्रति समाजशास्त्रीय नजरिया व्यक्त करते हैं। मुक्तिबोध के अनुसार ब्रह्मा,बिष्णु, और महेश का संबंध क्रमश: जन्म, विकास और मृत्यु से है। साथ ही उत्पत्ति ,पालन और संहार इन तीन प्राकृतिक क्रियाओं से ये तीनों देवता जुड़े हैं। इसी रूप में इनकी व्याख्याऍं भी मिलती हैं।
मुक्तिबोध का मानना था ' वैदिक आर्यों ने सृष्टि की शक्तियों में देव -रूप देखा। ऋग्वेद में जो देवता हैं वे प्रकृति के नाना रूपों और शक्तियों के प्रतीक हैं। आगे ,चलकर, उन्होंने कण-कण में समाए परमात्मा की भावना की। प्रारम्भ में वे प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के उपासक थे। हम वैदिक देवताओं को तीन भागों में बॉंट सकते हैं : (1) सर्वोच्च शून्याकाश के देवता,जैसे द्यौस्, अश्विन,सूर्य तथा उसके विभिन्न रूप, जैसे सवित् ,उषस्, और इनके अतिरिक्त ,विष्णु और वरूण; (2) पृथ्वी के देवता,जैसे, अग्नि,सोम, सरस्वती, तथा पृथ्वी; और इन दोनों के बीच , (3) अन्तरिक्ष देवता जैसे इन्द्र,वायु,पर्जन्य,मरूत। इनमें सर्वाधिक प्राचीन हैं द्यौस् और पृथ्वी। द्यौस् या द्यौ: आकाश का चमकता देवता था। वह हमारा पिता था,पृथ्वी माता थी। किन्तु ,ज्यों -ज्यों समय आगे बढ़ता गया ,द्यौ : के स्थान पर वरूण का तथा इन्द्र का माहात्म्य बढ़ता गया। आगे चलकर वरूण समुद्रों का , जल का भी देवता बना। यही नहीं, वह सत्य और ऋत का (विश्व -व्यवस्था , सृष्टि-व्यवस्था ,समाज-व्यवस्था, नैतिकता आदि सबका ) देवता बना। विश्व के त्रिकालदर्शी शासक और अनुशासक के रूप में उसकी कल्पना की गयी। पाप-शान्ति के लिए लोग उससे क्षमा याचना करने लगे। '
' मन्त्र-दृष्टा ऋषियों ने वरूण के प्रति कुछ अतिशय रसार्द्र स्तवन किए हैं। वरूण के पश्चात् सर्वाधिक लोकप्रिय देवता इन्द्र हैं। वह देवों का अग्रणी अर्थात् नेता है। वह वर्षा करता ,शत्रुओं के दुर्गों को विध्वंस करता। युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए आर्य उसकी प्रार्थना करते। इसके अतिरिक्त सूर्य के विभिन्न रूप -पूषा,मित्र,सवितृ इत्यादि भी आर्यों के प्रिय देवता थे। '
मुक्तिबोध ने आर्यों की धर्म -दृष्टि के बारे में लिखा '' आर्यों की धर्म-दृष्टि की बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे देवताओं की सहायता से इसी पृथ्वी पर स्वर्ग बनाना चाहते थे। उनके धर्मौपदेश संसार से विरक्ति या पलायन नहीं सिखाते, वरन् वे इसी जगत् को सर्वांगीण समृद्धि के लिए देवताओं का आवाहन करते हैं। आर्यजन आशावादी थे। उनका अन्त:करण प्रसारशील था। ''
' वे मूर्त्तिपूजक नहीं थे,देवताओं के लिए मन्दिर नहीं बनाते थे। प्रकृति-सौंदर्य के प्रति,उनका हृदय सहज रूप से आकर्षित होता। प्रभात की मनोरम सौन्दर्य आभा को 'देवी' का रूप देना, उनकी कल्पना का सुन्दर नमूना था। '
मुक्तिबोध ने लिखा ' इसके बावजूद वे मातृ देवियों के पूजक नहीं हैं। वैदिक धर्म में पुरूष भावों की प्रधानता है। उसमें एक ताजगी है, नवीनता की संवेदना है,विकास और प्रसार की भावनाऍं हैं। उस धर्म में ,स्वर्ग का तो उल्लेख है ,किन्तु नरक का कहीं नहीं । पापी मनुष्य को इसी लोक में दण्ड दे दिया जाता था । उसके लिए नरक के विधान की आवश्यकता नहीं थी। यह हमारा प्रारम्भिक वैदिक धर्म है। '
मुक्तिबोध ने लिखा ' वेद ' श्रुति' भी कहलाते हैं, इसलिए कि शिष्य ,उन्हें गुरूओं से सुन-सुनकर कण्ठाग्र कर लेते थे। महान् विद्वान ऋषि बादरायण वेदव्यास ने उनका संकलन किया। इसलिए ,ये चारों वेद संहिताऍं कही जाती हैं। संहिता का अर्थ है एकत्र रखना अर्थात् संकलन करना। वेदों का जो रूप आज विद्यमान है वह भगवान वेदव्यास का दिया हुआ है। उन्होंने पुराणों का भी संकलन किया। भगवान वेद-व्यास अपनी माता के अवैध पुत्र थे। इनकी माता कृष्ण वर्ण की,केवट जाति की,शूद्र स्त्री थीं। इनके पिता एक आर्य ऋषि थे । वेदों को संहिता -रूप देने वाला महान् दृष्टा वेदव्यास इस बात का साक्षी है कि जिस भारतीय आर्य सभ्यता का विकास हुआ है उसमें आर्येतर तत्वों का समावेश स्वाभाविक हो उठा था। ''
मुक्तिबोध का उपरोक्त उद्धरण कई नए सवाल पैदा करता है ,पहला तथ्य यह संप्रेषित करता है कि वेदव्यास शूद्र थे, ऐसे में क्या दलित लेखन की परंपरा क्या वेदव्यास से मानी जाए ? यदि ऐसा होता है तो दलित लेखक दुनिया का सबसे पुराना आदिम लेखक कहलाएगा । हमारे दलित बंधु ध्यान दें क्या वेदव्यास से दलित लेखन की परंपरा का आरंभ मानें ? दूसरी महवपूर्ण बात यह निकलती है कि देवी देवताओं के प्रति मुक्तिबोध का नास्तिक भाव नहीं था। वे अपने तर्क यहॉं से आरंभ नहीं करते कि ईश्वर नहीं है। इस अर्थ में वे एक नया धर्मनिरपेक्ष नजरिया व्यक्त करते हैं। इसमें देवताओं के प्रति खारिज करने वाला नहीं बल्कि सम्मान और आदर का भाव है।यही हमारे आधुनिक सामंजस्यवादी दृष्टि की धुरी है।
Posted by
जगदीश्वर चतुर्वेदी
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