शंकर जालान
राज्य में राज्यपाल एमके नारायणन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच टकराव के संकेत मिल रहे हैं। बीते दिनों किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को लेकर मुख्यमंत्री बनर्जी और राज्यपाल नारायणन के बीच मतैक्य सामने आया है। अब तक कमोबेश हर मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए नारायणन ने इस मुद्दे पर टकराव के अंदाज में कहा- कर्ज के भार से दबे हुए किसान आत्महत्या कर रहे हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि वह केन्द्र के साथ मिलकर हल तलाशे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एकाधिक बार किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं को अनदेखा करते हुए कह चुकी हैं, आत्महत्या करने वाले या तो किसान नहीं थे या फिर पारिवारिक कारणों से उन लोगों ने जान दी। इससे पहले कॉलेजों में छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष और अस्पतालों में शिशुओं की मौतों को लेकर राज्यपाल चिंता जता चुके हैं, लेकिन कोई मतैक्य सामने नहीं आया था। दोनों ही दफा राज्यपाल ने दुख जताते हुए प्रशासन को जरूरी उपाय करने का सुझाव दिया था। लेकिन किसानों की मौतों को लेकर उन्होंने सीधे तौर पर केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत मानी है। उन्होंने प्रधानमंत्री को राज्य में किसानों की मौतों को लेकर एक रिपोर्ट भी भेजी है। राज्यपाल का मानना है कि आत्महत्या करने वाले किसान कर्ज में डूबे हुए थे और फसल की बिक्री न होने से परेशान थे। उनके परिवार जन अनाहार को मजबूर थे। पिछले दो महीनों में दो दर्जन से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। इनमें 17 किसान बर्दवान जिले के हैं। मालूम बो कि बर्दवान जिले को बंगाल का चावल भंडार कहा जाता है। मालदा, बांकुड़ा, हुगली और जलपाईगुड़ी में भी आत्महत्या की घटनाएं हुई हैं। जलपाईगुड़ी में चाय बागानों के बंद होने के चलते बेरोजगारी की स्थिति है। हालांकि, सभी मौतों की वजह निजी और पारिवारिक बताकर मुख्यमंत्री ने पल्ला झाडऩे की कोशिश की है। ऐसे में राज्यपाल के ताजा कदम से कांग्रेस और वामपंथी दलों के ममता बनर्जी विरोधी अभियान को बल मिला है। कांग्रेस भी वामपंथी दलों की तर्ज पर राज्य में सड़कों पर उतर चुकी है।
2.2.12
राज्यपाल व मुख्यमंत्री में टकराव
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धार्मिक होने के मतलब किसी धर्म से पक्षपात कतई नहीं : स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती
वर्तमान समय में देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब धर्म को ध्यान अथवा जेहन में रख कर राज यानी राजनीति की जाए। यह कथन है द्वारका पीठ के जगद्गुरू स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती महाराज का। स्वामीजी ने अपने कोलकाता प्रवास के दौरान शंकर जालान से लंबी बातचीत करते हुए कहा कि धार्मिक होने का मतलब किसी धर्म से पक्षपात करना कतई नहीं है। सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। पेश ही महाराजश्री से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश
-- महाराज जी, आप धर्म गुरू है, इसीलिए पहला प्रश्न धर्म से संबंधित कर रहा हूं, धर्म की सटीक परिभाषा क्या है?
00 धर्म की सटीक परिभाषा है वह कर्म जिससे किसी को नुकसान न हो, कोई आहात न हो। सही मायने में धर्म उसे ही कहा जा सकता है, जो खुद को शांति और दूसरे को सुख प्रदान करे।
-- संत और संन्यासी में क्या फर्क है?
00 मूल रूप से तो कोई फर्क नहीं है। दोनों को त्यागी और परोपकारी होना चाहिए। यहां यह कह सकते हैं कि संन्यासी बनने के लिए संन्यास आश्रम का आश्रय लेना जरूरी है, जबकि व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी संत हो सकता है।
--संत, महात्मा और संन्यासियों का मुख्य कार्य क्या होना चाहिए?
00 इन सभी का काम और पहला कर्तव्य है मानव मात्र की रक्षा। इसके अलावा लोगों को अपनी धर्म-संस्कृति से अवगत कराना, देश प्रेम की भावना जागृति करना जैसे कामों को दूसरे और तीसरे क्रम में रखा जा सकता है।
-- क्या साधु समाज के लोग अपनी जिम्मेवारी ठीक तरह से निभा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहे तो समाज को उचित अथवा धर्म की राह दिखा रहे हैं?
00 यह बहुत जटिल सवाल कर लिया आपने। आपको बता दें कि साधुओं का कोई समाज नहीं है। जो व्यक्ति घर-द्वार, माता-पिता, भाई-बहन और रिश्ते-नाते को छोड़कर साधु बनता है वह फिर से समाज के घेरे में क्यों बंधना चाहेगा। साधु का व्यवहार ही लोगों को धर्म की राह दिखा देता है, इसके लिए उन्हें अलग से विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जो साधु आडंबर की आड़ में धर्म को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोगों को धोखा देने के साथ-साथ कहीं न कहीं अपनी जिम्मेवारी से भटक गए हैं।
-- धर्म में दिखावा बढ़ गया है इसका कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है?
00 धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए और ऐसा मंजर तभी देखने को मिलता है जब व्यक्ति धर्मिक आयोजन को स्वार्थसिद्धि के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसे तभी रोका जा सकता है, जब जनता आडंबर वाले धार्मिक आयोजनों में जाने से परहेज करे।
-- सुना जाता है कि संन्यासी होना सहज है, लेकिन वैरागी होना बेहद कठिन ऐसा क्यों?
00 बिल्कुल सही सुना है आपने। संन्यास आश्रम में रहने वाले को संन्यासी कहा जा सकता है। वैरागी होना सहज नहीं है। मोह-माया, मान-सम्मान, स्वाद-बेस्वाद, लाभ-हानि पर विचलित न होना ही वैरागी होने के लक्षण हैं।
-- धर्म और राजनीति का क्या संबंध है?
00 बहुत गहरा संबंध है। व्यक्ति धर्म के मुताबिक जीवन-यापन करे और इसे ही ध्यान में रखकर राजनीति। राजनीति का अर्थ है राज की नीति। यदि राजा धर्म से नियंत्रित होगा तो राजनीति स्वत: धर्म से नियंत्रित हो जाएगी। कुछ लोग धर्म को राजनीति से अलग करने का स्वार्थपूर्ण अभियान चला रहे हैं, ताकि धर्म उनकी राह में बाधक न बने।
-- क्या धार्मिक रहते हुए धर्म निरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता?
00 बिल्कुल हुआ जा सता है। धार्मिक होने का अर्थ किसी धर्म से पक्षपात करना नहीं है। धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। जहां तक हिंदू धर्म की बात है वह अत्यंत वैज्ञानिक है, इसमें किसी से विरोध नहीं है।
-- स्वामीजी पाप क्या है और पुण्य क्या है?
00 जब मनुष्य कोई कर्म करता है तो उसका फल कुछ समय बाद प्राप्त होता है। यदि फल के रूप में संस्कार मिले तो वह पुण्य है और दुराचार मिले तो वह पाप है।
-- सनातन धर्म में धर्म गुरूओं की भरमार है, बावजूद इसके समाज में असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका क्या कारण है?
00 इसका मूल कारण है कुछ धर्म गुरू अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़े हैं। वे जो कहते हैं उसे प्रवचन नहीं, भाषण कहा जाना चाहिए। जब तक प्रवचन की जगह भाषण पिलाया जाएगा, समाज में असंतोष बढ़ता है रहेगा।
--ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप की बात विश्व का समस्त ईसाई समुदाय और हमारे हिंदू धर्मावलंबी भी न केवल ध्यान से सुनते है, बल्कि अमल भी करते देखे गए हैं। पर हमारे धर्मगुरूओं की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, इसका क्या कारण है ?
00 पोप की बात पर भी अमल नहीं होता। समय-समय पर उन्होंने युद्ध विरोधी बयान दिए हैं, क्या युद्ध रुका। जो हमें दिखता है वह पश्चिमी प्रचार तंत्र पर हमारी निर्भरता है और उनके प्रचार का सही तरीका।
-- पश्चिमी देशों में और अपने देश के पश्चिमपंथियों में आजकल दक्षिणपंथी कट््टरवाद की बहस छिड़ी हुई है। यह प्रकारांतर से हिंदू धर्म पर हमला है। आप क्या कहेंगे?
00 पहली बात तो यह है कि दक्षिणपंथी का जो कट््टरवाद है वह हिंदुत्व से परे है। जो हिंदू धर्म को इससे जोड़ते हैं वे इसे खत्म करना चाहते हैं। कहने का अर्थ है कि हिंदू कभी कट््टरपंथी नहीं हो सकता।
-- एक दिवसीय धार्मिक आयोजनों में लाखों रुपए खर्च करना क्या तर्कसंगत है?
00 मोटे तौर पर तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी लोग भाव से ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन दिखावा या प्रभाव जमाने के लिए ऐसा करना बिल्कुल गलत है।
-- बाबा रामदेव प्रकरण पर आपकी क्या राय है?
00 बाबा रामदेव का तरीका बिल्कुल गलत है। मुझे कहीं न कहीं इसमें भाजपा और आरएसएस के हाथ होने की बू आ रही है। रामलीला मैदान में जो हुआ वह साधुओं के लिए शर्म की बात है। इसके लिए सीधे तौर पर रामदेव दोषी हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि राष्ट्र के लिए नहीं निजी महत्वकांक्षा के लिए रामदेव यह सब कर रहे हैं। देखिए, रामदेव विदेशों में जमा काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं और उसे सरकारी संपत्ति घोषित करने की मांग भी। साथ ही वे यह आरोप भी की सरकार भ्रष्ट है। वे देश की समृद्धि की वकालत कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि धन वापस लाने से देश समृद्धि नहीं होगा। देश तभी समृद्धि होगा जब लोग कठोर परिश्रमी, अनुशासनशील और ईमानदार होगें।
-- क्या आप अण्णा हजारे की मांग से सहमत हैं?
00 जहां तक अन्ना की बात है उनका तरीका और उनकी मांग रामदेव से कुछ भिन्न है। उनकी मांग पर भले ही असहमति जताई जा सकती है, लेकिन तरीके को गलत नहीं कहा जा सकता। रही बात भ्रष्टाचार की तो अन्ना की टीम में कई लोग हैं जो घेरे में हैं। अन्ना को देश को ठीक करने से पहले अपने घर यानी टीम में सुधार करना चाहिए।
-- कहते हैं जब-जब अधर्म बढ़ता है परमात्मा अवतार लेते हैं, भारत में भ्रष्टाचार रूपी अधर्म बढ़ रहा है क्या निकट भविष्य पर किसी चमत्कार की उम्मीद है?
00 धर्म विरोधी लोग हर युग में रहे हैं और अधर्म भी करते रहे हैं। बावजूद इसके धर्म सदियों से जीतता आया है। रावण (अधर्म) को राम (धर्म) ने मारा। इसी तरह कंश (अधर्म) का वध कृष्ण (धर्म) ने किया। निश्चित तौर पर रावण और कंश जैसे अधर्मी लोगों की तादाद बढ़ेगी, तो कोई ना कोई राम या कृष्ण के रूप में अवश्य इस धरती पर आएगा।
-- करीब छह साल बाद भाजपा में लौटी उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का अभियान छेड़ रखा है, क्या उन्हें सफलता मिलेगी?
00 कुछ पाने की तमन्ना से किए जा रहे काम को जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जो अभियान छेड़ा है। वह राजनीति लाभ के लिए है। आपको बता दूं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग सर्वप्रथम मैंने की थी। मैं तहे दिल से चाहता हूं कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो। उमा भारती मेरे मुद्दे को राजनीति लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।
-- सुना है मिशन पूरा न होने तक उन्होंने (उमा) मालपुआ न खाने का प्रण लिया है, क्या यह ठीक है?
00 कौन देखने जाता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।
-- यह सच्चाई है कि पढ़ी अधिक रामायण जाती है, लेकिन समाज में अधिक प्रभाव महाभाारत का दिख रहा है, ऐसा क्यों?
00 क्योंकि लोग रामायण केवल पढ़ते हैं, उसका मनन नहीं करते।
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धार्मिक होने के मतलब किसी धर्म से पक्षपात कतई नहीं : स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती
वर्तमान समय में देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब धर्म को ध्यान अथवा जेहन में रख कर राज यानी राजनीति की जाए। यह कथन है द्वारका पीठ के जगद्गुरू स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती महाराज का। स्वामीजी ने अपने कोलकाता प्रवास के दौरान शंकर जालान से लंबी बातचीत करते हुए कहा कि धार्मिक होने का मतलब किसी धर्म से पक्षपात करना कतई नहीं है। सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। पेश ही महाराजश्री से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश
-- महाराज जी, आप धर्म गुरू है, इसीलिए पहला प्रश्न धर्म से संबंधित कर रहा हूं, धर्म की सटीक परिभाषा क्या है?
00 धर्म की सटीक परिभाषा है वह कर्म जिससे किसी को नुकसान न हो, कोई आहात न हो। सही मायने में धर्म उसे ही कहा जा सकता है, जो खुद को शांति और दूसरे को सुख प्रदान करे।
-- संत और संन्यासी में क्या फर्क है?
00 मूल रूप से तो कोई फर्क नहीं है। दोनों को त्यागी और परोपकारी होना चाहिए। यहां यह कह सकते हैं कि संन्यासी बनने के लिए संन्यास आश्रम का आश्रय लेना जरूरी है, जबकि व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी संत हो सकता है।
--संत, महात्मा और संन्यासियों का मुख्य कार्य क्या होना चाहिए?
00 इन सभी का काम और पहला कर्तव्य है मानव मात्र की रक्षा। इसके अलावा लोगों को अपनी धर्म-संस्कृति से अवगत कराना, देश प्रेम की भावना जागृति करना जैसे कामों को दूसरे और तीसरे क्रम में रखा जा सकता है।
-- क्या साधु समाज के लोग अपनी जिम्मेवारी ठीक तरह से निभा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहे तो समाज को उचित अथवा धर्म की राह दिखा रहे हैं?
00 यह बहुत जटिल सवाल कर लिया आपने। आपको बता दें कि साधुओं का कोई समाज नहीं है। जो व्यक्ति घर-द्वार, माता-पिता, भाई-बहन और रिश्ते-नाते को छोड़कर साधु बनता है वह फिर से समाज के घेरे में क्यों बंधना चाहेगा। साधु का व्यवहार ही लोगों को धर्म की राह दिखा देता है, इसके लिए उन्हें अलग से विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जो साधु आडंबर की आड़ में धर्म को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोगों को धोखा देने के साथ-साथ कहीं न कहीं अपनी जिम्मेवारी से भटक गए हैं।
-- धर्म में दिखावा बढ़ गया है इसका कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है?
00 धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए और ऐसा मंजर तभी देखने को मिलता है जब व्यक्ति धर्मिक आयोजन को स्वार्थसिद्धि के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसे तभी रोका जा सकता है, जब जनता आडंबर वाले धार्मिक आयोजनों में जाने से परहेज करे।
-- सुना जाता है कि संन्यासी होना सहज है, लेकिन वैरागी होना बेहद कठिन ऐसा क्यों?
00 बिल्कुल सही सुना है आपने। संन्यास आश्रम में रहने वाले को संन्यासी कहा जा सकता है। वैरागी होना सहज नहीं है। मोह-माया, मान-सम्मान, स्वाद-बेस्वाद, लाभ-हानि पर विचलित न होना ही वैरागी होने के लक्षण हैं।
-- धर्म और राजनीति का क्या संबंध है?
00 बहुत गहरा संबंध है। व्यक्ति धर्म के मुताबिक जीवन-यापन करे और इसे ही ध्यान में रखकर राजनीति। राजनीति का अर्थ है राज की नीति। यदि राजा धर्म से नियंत्रित होगा तो राजनीति स्वत: धर्म से नियंत्रित हो जाएगी। कुछ लोग धर्म को राजनीति से अलग करने का स्वार्थपूर्ण अभियान चला रहे हैं, ताकि धर्म उनकी राह में बाधक न बने।
-- क्या धार्मिक रहते हुए धर्म निरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता?
00 बिल्कुल हुआ जा सता है। धार्मिक होने का अर्थ किसी धर्म से पक्षपात करना नहीं है। धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। जहां तक हिंदू धर्म की बात है वह अत्यंत वैज्ञानिक है, इसमें किसी से विरोध नहीं है।
-- स्वामीजी पाप क्या है और पुण्य क्या है?
00 जब मनुष्य कोई कर्म करता है तो उसका फल कुछ समय बाद प्राप्त होता है। यदि फल के रूप में संस्कार मिले तो वह पुण्य है और दुराचार मिले तो वह पाप है।
-- सनातन धर्म में धर्म गुरूओं की भरमार है, बावजूद इसके समाज में असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका क्या कारण है?
00 इसका मूल कारण है कुछ धर्म गुरू अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़े हैं। वे जो कहते हैं उसे प्रवचन नहीं, भाषण कहा जाना चाहिए। जब तक प्रवचन की जगह भाषण पिलाया जाएगा, समाज में असंतोष बढ़ता है रहेगा।
--ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप की बात विश्व का समस्त ईसाई समुदाय और हमारे हिंदू धर्मावलंबी भी न केवल ध्यान से सुनते है, बल्कि अमल भी करते देखे गए हैं। पर हमारे धर्मगुरूओं की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, इसका क्या कारण है ?
00 पोप की बात पर भी अमल नहीं होता। समय-समय पर उन्होंने युद्ध विरोधी बयान दिए हैं, क्या युद्ध रुका। जो हमें दिखता है वह पश्चिमी प्रचार तंत्र पर हमारी निर्भरता है और उनके प्रचार का सही तरीका।
-- पश्चिमी देशों में और अपने देश के पश्चिमपंथियों में आजकल दक्षिणपंथी कट््टरवाद की बहस छिड़ी हुई है। यह प्रकारांतर से हिंदू धर्म पर हमला है। आप क्या कहेंगे?
00 पहली बात तो यह है कि दक्षिणपंथी का जो कट््टरवाद है वह हिंदुत्व से परे है। जो हिंदू धर्म को इससे जोड़ते हैं वे इसे खत्म करना चाहते हैं। कहने का अर्थ है कि हिंदू कभी कट््टरपंथी नहीं हो सकता।
-- एक दिवसीय धार्मिक आयोजनों में लाखों रुपए खर्च करना क्या तर्कसंगत है?
00 मोटे तौर पर तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी लोग भाव से ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन दिखावा या प्रभाव जमाने के लिए ऐसा करना बिल्कुल गलत है।
-- बाबा रामदेव प्रकरण पर आपकी क्या राय है?
00 बाबा रामदेव का तरीका बिल्कुल गलत है। मुझे कहीं न कहीं इसमें भाजपा और आरएसएस के हाथ होने की बू आ रही है। रामलीला मैदान में जो हुआ वह साधुओं के लिए शर्म की बात है। इसके लिए सीधे तौर पर रामदेव दोषी हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि राष्ट्र के लिए नहीं निजी महत्वकांक्षा के लिए रामदेव यह सब कर रहे हैं। देखिए, रामदेव विदेशों में जमा काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं और उसे सरकारी संपत्ति घोषित करने की मांग भी। साथ ही वे यह आरोप भी की सरकार भ्रष्ट है। वे देश की समृद्धि की वकालत कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि धन वापस लाने से देश समृद्धि नहीं होगा। देश तभी समृद्धि होगा जब लोग कठोर परिश्रमी, अनुशासनशील और ईमानदार होगें।
-- क्या आप अण्णा हजारे की मांग से सहमत हैं?
00 जहां तक अन्ना की बात है उनका तरीका और उनकी मांग रामदेव से कुछ भिन्न है। उनकी मांग पर भले ही असहमति जताई जा सकती है, लेकिन तरीके को गलत नहीं कहा जा सकता। रही बात भ्रष्टाचार की तो अन्ना की टीम में कई लोग हैं जो घेरे में हैं। अन्ना को देश को ठीक करने से पहले अपने घर यानी टीम में सुधार करना चाहिए।
-- कहते हैं जब-जब अधर्म बढ़ता है परमात्मा अवतार लेते हैं, भारत में भ्रष्टाचार रूपी अधर्म बढ़ रहा है क्या निकट भविष्य पर किसी चमत्कार की उम्मीद है?
00 धर्म विरोधी लोग हर युग में रहे हैं और अधर्म भी करते रहे हैं। बावजूद इसके धर्म सदियों से जीतता आया है। रावण (अधर्म) को राम (धर्म) ने मारा। इसी तरह कंश (अधर्म) का वध कृष्ण (धर्म) ने किया। निश्चित तौर पर रावण और कंश जैसे अधर्मी लोगों की तादाद बढ़ेगी, तो कोई ना कोई राम या कृष्ण के रूप में अवश्य इस धरती पर आएगा।
-- करीब छह साल बाद भाजपा में लौटी उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का अभियान छेड़ रखा है, क्या उन्हें सफलता मिलेगी?
00 कुछ पाने की तमन्ना से किए जा रहे काम को जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जो अभियान छेड़ा है। वह राजनीति लाभ के लिए है। आपको बता दूं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग सर्वप्रथम मैंने की थी। मैं तहे दिल से चाहता हूं कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो। उमा भारती मेरे मुद्दे को राजनीति लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।
-- सुना है मिशन पूरा न होने तक उन्होंने (उमा) मालपुआ न खाने का प्रण लिया है, क्या यह ठीक है?
00 कौन देखने जाता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।
-- यह सच्चाई है कि पढ़ी अधिक रामायण जाती है, लेकिन समाज में अधिक प्रभाव महाभाारत का दिख रहा है, ऐसा क्यों?
00 क्योंकि लोग रामायण केवल पढ़ते हैं, उसका मनन नहीं करते।
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धार्मिक होने के मतलब किसी धर्म से पक्षपात कतई नहीं : स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती
वर्तमान समय में देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है, जब धर्म को ध्यान अथवा जेहन में रख कर राज यानी राजनीति की जाए। यह कथन है द्वारका पीठ के जगद्गुरू स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती महाराज का। स्वामीजी ने अपने कोलकाता प्रवास के दौरान शंकर जालान से लंबी बातचीत करते हुए कहा कि धार्मिक होने का मतलब किसी धर्म से पक्षपात करना कतई नहीं है। सही अर्थों में धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। पेश ही महाराजश्री से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश
-- महाराज जी, आप धर्म गुरू है, इसीलिए पहला प्रश्न धर्म से संबंधित कर रहा हूं, धर्म की सटीक परिभाषा क्या है?
00 धर्म की सटीक परिभाषा है वह कर्म जिससे किसी को नुकसान न हो, कोई आहात न हो। सही मायने में धर्म उसे ही कहा जा सकता है, जो खुद को शांति और दूसरे को सुख प्रदान करे।
-- संत और संन्यासी में क्या फर्क है?
00 मूल रूप से तो कोई फर्क नहीं है। दोनों को त्यागी और परोपकारी होना चाहिए। यहां यह कह सकते हैं कि संन्यासी बनने के लिए संन्यास आश्रम का आश्रय लेना जरूरी है, जबकि व्यक्ति गृहस्थ होते हुए भी संत हो सकता है।
--संत, महात्मा और संन्यासियों का मुख्य कार्य क्या होना चाहिए?
00 इन सभी का काम और पहला कर्तव्य है मानव मात्र की रक्षा। इसके अलावा लोगों को अपनी धर्म-संस्कृति से अवगत कराना, देश प्रेम की भावना जागृति करना जैसे कामों को दूसरे और तीसरे क्रम में रखा जा सकता है।
-- क्या साधु समाज के लोग अपनी जिम्मेवारी ठीक तरह से निभा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहे तो समाज को उचित अथवा धर्म की राह दिखा रहे हैं?
00 यह बहुत जटिल सवाल कर लिया आपने। आपको बता दें कि साधुओं का कोई समाज नहीं है। जो व्यक्ति घर-द्वार, माता-पिता, भाई-बहन और रिश्ते-नाते को छोड़कर साधु बनता है वह फिर से समाज के घेरे में क्यों बंधना चाहेगा। साधु का व्यवहार ही लोगों को धर्म की राह दिखा देता है, इसके लिए उन्हें अलग से विशेष कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जो साधु आडंबर की आड़ में धर्म को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, वे लोगों को धोखा देने के साथ-साथ कहीं न कहीं अपनी जिम्मेवारी से भटक गए हैं।
-- धर्म में दिखावा बढ़ गया है इसका कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है?
00 धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए और ऐसा मंजर तभी देखने को मिलता है जब व्यक्ति धर्मिक आयोजन को स्वार्थसिद्धि के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसे तभी रोका जा सकता है, जब जनता आडंबर वाले धार्मिक आयोजनों में जाने से परहेज करे।
-- सुना जाता है कि संन्यासी होना सहज है, लेकिन वैरागी होना बेहद कठिन ऐसा क्यों?
00 बिल्कुल सही सुना है आपने। संन्यास आश्रम में रहने वाले को संन्यासी कहा जा सकता है। वैरागी होना सहज नहीं है। मोह-माया, मान-सम्मान, स्वाद-बेस्वाद, लाभ-हानि पर विचलित न होना ही वैरागी होने के लक्षण हैं।
-- धर्म और राजनीति का क्या संबंध है?
00 बहुत गहरा संबंध है। व्यक्ति धर्म के मुताबिक जीवन-यापन करे और इसे ही ध्यान में रखकर राजनीति। राजनीति का अर्थ है राज की नीति। यदि राजा धर्म से नियंत्रित होगा तो राजनीति स्वत: धर्म से नियंत्रित हो जाएगी। कुछ लोग धर्म को राजनीति से अलग करने का स्वार्थपूर्ण अभियान चला रहे हैं, ताकि धर्म उनकी राह में बाधक न बने।
-- क्या धार्मिक रहते हुए धर्म निरपेक्ष नहीं हुआ जा सकता?
00 बिल्कुल हुआ जा सता है। धार्मिक होने का अर्थ किसी धर्म से पक्षपात करना नहीं है। धर्म निरपेक्षता ही धर्म है। जहां तक हिंदू धर्म की बात है वह अत्यंत वैज्ञानिक है, इसमें किसी से विरोध नहीं है।
-- स्वामीजी पाप क्या है और पुण्य क्या है?
00 जब मनुष्य कोई कर्म करता है तो उसका फल कुछ समय बाद प्राप्त होता है। यदि फल के रूप में संस्कार मिले तो वह पुण्य है और दुराचार मिले तो वह पाप है।
-- सनातन धर्म में धर्म गुरूओं की भरमार है, बावजूद इसके समाज में असंतोष बढ़ता जा रहा है इसका क्या कारण है?
00 इसका मूल कारण है कुछ धर्म गुरू अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति से जुड़े हैं। वे जो कहते हैं उसे प्रवचन नहीं, भाषण कहा जाना चाहिए। जब तक प्रवचन की जगह भाषण पिलाया जाएगा, समाज में असंतोष बढ़ता है रहेगा।
--ईसाई धर्म के सर्वोच्च गुरू पोप की बात विश्व का समस्त ईसाई समुदाय और हमारे हिंदू धर्मावलंबी भी न केवल ध्यान से सुनते है, बल्कि अमल भी करते देखे गए हैं। पर हमारे धर्मगुरूओं की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, इसका क्या कारण है ?
00 पोप की बात पर भी अमल नहीं होता। समय-समय पर उन्होंने युद्ध विरोधी बयान दिए हैं, क्या युद्ध रुका। जो हमें दिखता है वह पश्चिमी प्रचार तंत्र पर हमारी निर्भरता है और उनके प्रचार का सही तरीका।
-- पश्चिमी देशों में और अपने देश के पश्चिमपंथियों में आजकल दक्षिणपंथी कट््टरवाद की बहस छिड़ी हुई है। यह प्रकारांतर से हिंदू धर्म पर हमला है। आप क्या कहेंगे?
00 पहली बात तो यह है कि दक्षिणपंथी का जो कट््टरवाद है वह हिंदुत्व से परे है। जो हिंदू धर्म को इससे जोड़ते हैं वे इसे खत्म करना चाहते हैं। कहने का अर्थ है कि हिंदू कभी कट््टरपंथी नहीं हो सकता।
-- एक दिवसीय धार्मिक आयोजनों में लाखों रुपए खर्च करना क्या तर्कसंगत है?
00 मोटे तौर पर तो इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी लोग भाव से ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन दिखावा या प्रभाव जमाने के लिए ऐसा करना बिल्कुल गलत है।
-- बाबा रामदेव प्रकरण पर आपकी क्या राय है?
00 बाबा रामदेव का तरीका बिल्कुल गलत है। मुझे कहीं न कहीं इसमें भाजपा और आरएसएस के हाथ होने की बू आ रही है। रामलीला मैदान में जो हुआ वह साधुओं के लिए शर्म की बात है। इसके लिए सीधे तौर पर रामदेव दोषी हैं। लोगों को यह समझ में आ गया है कि राष्ट्र के लिए नहीं निजी महत्वकांक्षा के लिए रामदेव यह सब कर रहे हैं। देखिए, रामदेव विदेशों में जमा काला धन स्वदेश लाने की बात कर रहे हैं और उसे सरकारी संपत्ति घोषित करने की मांग भी। साथ ही वे यह आरोप भी की सरकार भ्रष्ट है। वे देश की समृद्धि की वकालत कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि धन वापस लाने से देश समृद्धि नहीं होगा। देश तभी समृद्धि होगा जब लोग कठोर परिश्रमी, अनुशासनशील और ईमानदार होगें।
-- क्या आप अण्णा हजारे की मांग से सहमत हैं?
00 जहां तक अन्ना की बात है उनका तरीका और उनकी मांग रामदेव से कुछ भिन्न है। उनकी मांग पर भले ही असहमति जताई जा सकती है, लेकिन तरीके को गलत नहीं कहा जा सकता। रही बात भ्रष्टाचार की तो अन्ना की टीम में कई लोग हैं जो घेरे में हैं। अन्ना को देश को ठीक करने से पहले अपने घर यानी टीम में सुधार करना चाहिए।
-- कहते हैं जब-जब अधर्म बढ़ता है परमात्मा अवतार लेते हैं, भारत में भ्रष्टाचार रूपी अधर्म बढ़ रहा है क्या निकट भविष्य पर किसी चमत्कार की उम्मीद है?
00 धर्म विरोधी लोग हर युग में रहे हैं और अधर्म भी करते रहे हैं। बावजूद इसके धर्म सदियों से जीतता आया है। रावण (अधर्म) को राम (धर्म) ने मारा। इसी तरह कंश (अधर्म) का वध कृष्ण (धर्म) ने किया। निश्चित तौर पर रावण और कंश जैसे अधर्मी लोगों की तादाद बढ़ेगी, तो कोई ना कोई राम या कृष्ण के रूप में अवश्य इस धरती पर आएगा।
-- करीब छह साल बाद भाजपा में लौटी उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का अभियान छेड़ रखा है, क्या उन्हें सफलता मिलेगी?
00 कुछ पाने की तमन्ना से किए जा रहे काम को जनहितकारी नहीं कहा जा सकता। उमा भारती ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जो अभियान छेड़ा है। वह राजनीति लाभ के लिए है। आपको बता दूं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग सर्वप्रथम मैंने की थी। मैं तहे दिल से चाहता हूं कि गंगा प्रदूषण मुक्त हो। उमा भारती मेरे मुद्दे को राजनीति लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।
-- सुना है मिशन पूरा न होने तक उन्होंने (उमा) मालपुआ न खाने का प्रण लिया है, क्या यह ठीक है?
00 कौन देखने जाता है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।
-- यह सच्चाई है कि पढ़ी अधिक रामायण जाती है, लेकिन समाज में अधिक प्रभाव महाभाारत का दिख रहा है, ऐसा क्यों?
00 क्योंकि लोग रामायण केवल पढ़ते हैं, उसका मनन नहीं करते।
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anjuman
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सूर्य और चन्द्रमा का रहस्यमय गन्धर्व विवाह
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Dr. O.P.Verma
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डॉ. बुडविग का क्वाटम विज्ञान
Dr Dwijendra said...dusri baat -
geeta me kahaa gaya hai
yuktaahaarvihaarasy
yuktacheshtasy karmasu
yukt swapnaavbodhasy
yogo bhavati dukhahaa..
means -
jo aadmi sahi samay par sahi kaanaa peenaa aur sona aur jaagne ka kaam karta hai wo yogi hota hai aur usko kabhi takleef nahi hoti.

Dr Dwijendra said...
Dr Dwijendra said...
Dr. O.P.Verma said...आपकी सटीक प्रतिक्रिया के लिए आभार। आपने बिलकुल ठीक कहा है। यदि बुडविग द्वारा विकसित की गई क्वाण्टम भौतिकी पर शोध जारी रहती तो आज हम धर्म, आत्मा, परमात्मा, ज्योतिष, रत्न विज्ञान, पराविज्ञान, टेलीपैथी, सम्मोहन और अन्तरिक्ष विज्ञान के अनगिनत रहस्यों का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण ढ़ूँढ़ पाने में सफल हो सकते थे।
डॉ. ओम
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Dr. O.P.Verma
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1.2.12
लप्रेक गुलाबी ताजमहल
तुमको मेरे शहर जाना था, सो मैंने तय किया कि रास्ते में ही, मैं तुम्हारे साथ हो लूंगा। तुम मुझे ट्रेन में मिल गयी थीं। बीते दिनों की मेरी यादों की तरह ही ट्रेन ने भी रफ्तार पकड़ ली थी। तभी सामान बेचता हुआ फेरी वाला आ गया। हम लोगों के पास आकर रुकते हुये, उसने सभी यात्रियों से पेपर वेट के अन्दर झांकते ताजमहल को खरीदने की गुजारिश की थी। लेकिन वह पल भर भी नहीं रुका था, जब मैंने कह दिया था कि तुम्हारे ताजमहल को खरीद कर क्या करुंगा? मैं अपने साथ जीता-जागता ताजमहल लेकर जा रहा हूं। यह सुनकर तुम्हारा चेहरा सुर्ख गुलाबी हो गया था और मेरी तरह ही सभी सहयात्रियों ने पहली बार संगमरमरी ताज को गुलाबी होते हुये देखा था।- रवि कुमार बाबुल
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babul
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क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?
क्या मुसलमानों के साथ नाइंसाफी के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिम्मेदार है?
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GANGAPRASAD BHUTRA
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Labels: khari-khari
31.1.12
नेता जी क्या कहते हैं ?
नेता जी क्या कहते हैं ?
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शिखा कौशिक
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Labels: song neta ji shikha kaushik
ब्लॉग- पहेली-१२
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शिखा कौशिक
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Labels: blog paheli 12
सरस्वती के उद्दंड बेटे-ब्रज की दुनिया
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ब्रजकिशोर सिंह
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30.1.12
पचपन और बचपन
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neeraj tomer
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सृजन पथ: आज शहीद दिवस है
सृजन पथ: आज शहीद दिवस है: आज शहीद दिवस है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का बलिदान दिवस।गांधीजी के अवदान को लेकर तमाम बातें की जा सकती हैं पर शांति ,अहिंसा और प्रेम का ...
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Arvind Kumar
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