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21.7.19

भारतीय समाज में बच्चियां कब सुरक्षित रह सकेंगी?

न जुल्म करो जग-जननी पर
कहीं ज्वालामुखी फट न जाए
ये धरती ध्वस्त न हो जाए
कहीं बेटियां लुप्त न हो जाए

हे! बेटी तू अब शस्त्र उठा
इतिहास बदल, भूगोल बदल
स्वाभिमान बढ़ा, जग नारित्व का
फूलनदेवी की तू, राह पे चल

सभ्य समाज कहलाने वाला भारतीय समाज कितना सभ्य है, यह इसी बात से स्पष्ट होता है कि, वहां पर नारी की स्थिति कैसी है? सभ्यता में कितना स्थान है वह मानवीय प्रतिष्ठा की दौड़ में किस स्थान पर है? ये सवाल इसलिए मायने रखता है कि, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।

बीच भंवर में नवजोत सिद्दू की नैय्या ,कोई नहीं खिवइया

कृष्णमोहन झा
क्रिकेट से राजनीति में आए कांग्रेस के बडबोले नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने आखिरकार पंजाब की अमरिंदर सरकार से इस्तीफा देना ही उचित समझा। पंजाब में गत विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार विजय के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्रित्व में सरकार का गठन हुआ था, तभी से नवजोत सिंह सिद्धू उसमें मंत्री बने हुए थे ,लेकिन उन्होने अपनी एक अलग हस्ती बनाए रखने की महत्वाकांक्षा का परित्याग कभी नहीं किया। वे जितने समय मंत्री रहे हमेशा ही अपनी हैसियत को मुख्यमंत्री से ऊपर मानते रहे। उन्हे यह अहंकार हो गया था कि जब तक राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की बागडोर है ,तब तक पंजाब में उनकी कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित है। सिद्धू ने एकाधिक अवसरों पर यहां तक कह दिया कि मैं किसी कैप्टन को नहीं जानता मेरे केप्टन तो राहुल गांधी ही है। और अब जब राहुल गांधी ही कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे तो मानो उनके सिर से उनका वरदहस्त भी हट गया।

'पत्रिका' वालों ने फिरौती गैंग के सरगना की खबर में राज्यपाल जगदीप धनकड़ की तस्वीर लगा दिया



20.7.19

बाबरी विध्वंस साजिश पर 9 माह में आएगा फैसला, विशेष जज एसके यादव को सेवा विस्तार

जे.पी.सिंह

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद  के बड़े नेताओं पर चल रहा मुकदमा 9 महीने में निपटाया जाएगा। उच्चतम न्यायालय  ने मामले की सुनवाई कर रहे लखनऊ के विशेष जज एस के यादव को सेवा विस्तार देते हुए केस के निपटारे की समय सीमा तय कर दी है।यादव 30 सितंबर को रिटायर होने वाले थे।कोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिया है कि वो उन्हें सेवा विस्तार देने का औपचारिक आदेश जारी करे।साथ ही साफ किया कि इस अवधि में जज सिर्फ इसी केस की सुनवाई करेंगे।

कर्नाटक के नाटक में राज्यपाल के कूदने से नया संवैधानिक संकट

जे.पी.सिंह
कर्नाटक के नाटक में राज्यपाल के कूद जाने से नए तरह का संवैधानिक संकट उत्पन्न हो  गया है और एक बार फिर पूरा विवाद उच्चतम न्यायालय की देहरी पर पहुंच गया है। उच्चतम न्यायालय  की संवैधानिक पीठ ने वर्ष  2016 में अरुणाचल प्रदेश की नबाम टुकी सरकार के मामले में एक आदेश दिया था कि असेंबली का सत्र चलने के दौरान गवर्नर के पास दखल देने और आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।तब पीठ ने फ्लोर टेस्ट को लेकर तत्कालीन गवर्नर जेपी राजखोवा के फैसले को असंवैधानिक करार दिया था।कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस  सरकार भी उच्चतम न्यायालय के इस आदेश से फिलहाल फ्रंटफुट पर है। आंकड़ों के खेल में मुख्यमंत्री  कुमारस्‍वामी यह जंग लगभग हार चुके हैं लेकिन वह अभी पराजय को मानने के मूड में नहीं दिखाई दे रहे हैं। जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार राज्‍यपाल के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय चली गयी है।

हत्या में शामिल और जेल काट चुका आमिर कादरी उर्फ़ रोबिन को रिपब्लिक भारत ने बनाया आगरा का स्ट्रिंगर!


सेवा में
श्रीमान सम्पादक महोदय
भड़ास 4 मीडिया

विषय : हत्या में शामिल और जेल काट चुका आमिर कादरी उर्फ़  रोबिन को रिपब्लिक भारत ने बनाया आगरा का स्ट्रिंगर!

देश का तेजी से उभरता न्यूज चैनल रिपब्लिक भारत किसी न किसी बजह से सुर्ख़ियो में बना रहता है। सबसे पहले खबर दिखने में माहिर और सुर्ख़ियां बटोर कर कम समय में पहचान बनाने वाले हिंदी न्यूज  चैनल रिपब्लिक भारत ने  अब ऐसे युवक को भी अपने संस्थान से जोड़कर स्ट्रिंगर बनाया  है, जो हत्या कर जेल काट चुका है। हम बात कर रहे हैं आगरा के स्ट्रिंगर  आमिर कादरी उर्फ़ रोबिन की। अताउल्लाह का बेटा  आमिर कादरी उर्फ़ रोबिन यमुना ब्रिज घाट, थाना एतमाउददौला में रहता है।

पंकज सुबीर के नए उपन्यास ‘‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’’ का विमोचन


शिवना प्रकाशन द्वारा आयोजित एक गरिमामय साहित्य समारोह में सुप्रसिद्ध कथाकार पंकज सुबीर के तीसरे उपन्यास ‘‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार तथा नाट्य आलोचक डॉ. प्रज्ञा विशेष रूप से उपस्थित थीं। कार्यक्रम का संचालन संजय पटेल ने किया। श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के सभागार में आयोजित इस समारोह में अतिथियों द्वारा पंकज सुबीर के नए उपन्यास का विमोचन किया गया। इस अवसर पर वामा साहित्य मंच इन्दौर की ओर से पंकज सुबीर को शॉल, श्रीफल तथा सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। मंच की अध्यक्ष पद्मा राजेन्द्र, सचिव ज्योति जैन, गरिमा संजय दुबे, किसलय पंचोली तथा सदस्याओं द्वारा पंकज सुबीर को सम्मानित किया गया।

17.7.19

मोदी सरकार में सब कुछ काफी ठीक है बस अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और पैसा नहीं है!

Ravish Kumar : सबकुछ काफी ठीक है बस अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और सरकार के पास पैसे नहीं है। जून में निर्यात का आंकड़ा 41 महीनों में सबसे कम रहा है। आयात भी 9 प्रतिशत कम हो गया है। जो कि 34 महीने में सबसे कम है। सरकार मानती है कि दुनिया भर में व्यापारिक टकरावों के कारण ऐसा हुआ है।

मूडीज ने मोदी सरकार को दे दिया संदेश- झूठी आंकड़ेबाजी से जनता को उल्लू बनाइये, हमें बेवकूफ न समझिए!

Girish Malviya : कुछ बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक खबरें पिछले दिनों आई है एक नजर डाल लीजिए. पहली खबर तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की मोदी सरकार को साफ साफ चेतावनी दी है. आसान भाषा में उसकी बातों का यह मतलब निकाला जा सकता है कि झूठी आंकड़ेबाजी से आप देश की जनता को ही उल्लू बनाइये, हमे बेवकूफ मत समझिए ऐसे आंकड़ो से खतरा देश की साख को है.

देश की आर्थिक समृद्धि के विजन का अभाव ही इस 'इकनॉमिक एंड फाइनेंशियल पैरालिसिस' का कारण है

Shyam Singh Rawat   
मुहम्मद-बिन-तुग़लक़ (1325-1351 ई.) को 'उलूग ख़ाँ' भी कहा जाता था। अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों तथा प्रजाजनों के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण उसे 'पागल' व 'रक्त-पिपासु' कहा गया है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कारनामों से साबित किया है कि वे उसी 'उलूग खाँ' के आधुनिक संस्करण हैं जिन्होंने विरासत में मिली देश की अच्छी-भली अर्थ-व्यवस्था को रसातल में पहुंचा कर इसे 'इकनॉमिक एंड फाइनेंशियल पैरालिसिस' का शिकार बना दिया है। मोदी के बारे में कहा जाता है कि वह निर्णय पहले लेते हैं और सोचते बाद में हैं।

साक्षी-अजितेश दो माह में अपनी शादी रजिस्टर्ड नहीं कराते हैं तो हाईकोर्ट का आदेश निरस्त हो जाएगा!

जेपी सिंह
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साक्षी-अजितेश की शादी को वैध ठहराया है। अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर अदालत पहुंचे साक्षी और अजितेश की शादी का प्रमाणपत्र जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा की एकल पीठ ने देखा। इसके साथ ही एकल पीठ ने दोनों की उम्र की जांच के लिए शैक्षिक प्रमाणपत्रों की भी जांच पड़ताल की। सभी कागजातों से संतुष्ट होकर एकल पीठ ने शादी को वैध घोषित किया और  कहा कि दोनों बालिग हैं इसलिए ये पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं। एकल पीठ ने ये शर्त भी रखी है कि साक्षी और अजितेश को दो  महीने में शादी रजिस्टर्ड करानी होगी. अगर ऐसा नहीं कराते तो कोर्ट का आदेश निरस्त हो जाएगा। एकल पीठ ने सरकार को इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। साथ ही पुलिस को भी जोड़े को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए आदेश दिया है।

भूख - प्यास की क्लास ....!!

भूख - प्यास की क्लास  ....!!
तारकेश कुमार ओझा
क्या होता है जब हीन भावना से ग्रस्त और प्रतिकूल परिस्थितियों से पस्त कोई दीन - हीन ऐसा किशोर कॉलेज परिसर में दाखिल हो जाता है जिसने मेधावी होते हुए भी इस बात की उम्मीद छोड़ दी थी कि अपनी शिक्षा - दीक्षा  को वह कभी कॉलेज के स्तर  तक पहुंचा पाएगा। क्या कॉलेज की सीढ़ियां चढ़ना ऐसे अभागे नौजवानों के लिए सहज होता है। क्या वहां उसे उसके सपनों को पंख मिल पाते हैं या फिर महज कुछ साल इस गफलत में बीत जाते हैं कि वो भी कॉलेज तक पढ़ा है। अपने बीते छात्र जीवन के पन्नों को जब भी पलटता हूं तो कुछ ऐसे ही ख्यालों में खो जाता हूं। क्योंकि पढ़ाई में काफी तेज होते हुए भी बचपन में ही मैने कॉलेज का मुंह देख पाने की उम्मीद छोड़ दी थी। कोशिश बस इतनी थी कि स्कूली पढ़ाई पूरी करते हुए ही किसी काम - धंधे में लग जाऊं। 
पसीना पोंछते हुए  पांच मिनट सुस्ताना भी जहां हरामखोरी मानी जाए, वहां सैर - सपाटा , पिकनिक या भ्रमण जैसे शब्द भी मुंह से  निकालना पाप से कम क्या होता। लेकिन उस दौर में भी कुछ भ्रमण प्रेमियों के हवाले से उस खूबसूरत कस्बे घाटशिला का नाम सुना था। ट्रेन में एकाध यात्रा के दौरान रेलगाड़ी की खिड़की से कस्बे की हल्की सी झलक भी देखी थी। लेकिन चढ़ती उम्र में ही इस शहर से ऐसा नाता जुड़ जाएगा जो पूरे छह साल तक बस समय की आंख - मिचौली का बहाना बन कर रह जाएगा यह कभी सोचा भी न था। यह भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के खुद को संभालने की कोशिश के दरम्यान की बात है। होश संभालते ही शुरू हुई झंझावतों की विकट परिस्थितियों में मैने कॉलेज तक पहुंचने की आस छोड़ दी थी। समय आया तो नए विश्व विद्यालय की मान्यता का सवाल और अपने शहर के कॉलेज में लड़कियों  के साथ पढ़ने की मजबूरी ने मुझे और विचलित कर दिया । क्योंकि मैं बचपन से इन सब से दूर भागने वाला जीव रहा हूं।  इस बीच मुझे अपने शहर से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित घाटशिला कॉलेज की जानकारी मिली। स्कूली जीवन में अपने शहर के नाइट कॉलेज की चर्चा सुनी थी। लेकिन कोई कॉलेज सुबह सात बजे से शुरू होकर सुबह के ही 10 बजे खत्म हो जाता है, यह पहली बार जाना। अपनी मातृभाषा में कॉलेज की शिक्षा हासिल करना और वह भी इस परिस्थिति में कि मैं अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन भी पहले की तरह करता रह सकूं, मुझे यह एक सुनहरा मौका प्रतीत हुआ और मैने उस कॉलेज मे ंदाखिला ले लिया। यद्यपि अपनी पसंद के विपरीत इस चुनाव में  मुझे कॉमर्स पढ़ना था। फिर भी मैने इसे हाथों हाथ लिया। क्योंकि कभी सोचा नहीं था कि जीवन में कभी कॉलेज की सीढ़ियां चढ़ना संभव भी हो पाएगा। । चुनिंदा सहपाठियों से तब पता लगा कि तड़के पांच बजे की ट्रेन से हमें घाटशिला जाना होगा और लौटने के लिए  तब की 29 डाउन कुर्लाटी - हावड़ा एक्सप्रेस मिलेगी। शुरू में कुछ दिन तो यह बदलाव बड़ा सुखद प्रतीत हुआ। लेकिन जल्द ही मेरे पांव वास्तविकता की जमीन पर थे। 354 नाम की जिस पैसेंजर ट्रेन से हम घाटशिला जाते थे, वह सामाजिक समरसता और सह - अस्तित्व के सिद्धांत की जीवंत मिसाल थी। क्योंकि ट्रेन की अपनी मंजिल की ओर बढ़ने के कुछ देर बाद ही लकड़ी के बड़े - बड़े गट्ठर , मिट्टी के बने बर्तन  और पत्तों से भरे बोरे डिब्बों में लादे जाने लगते। खाकी वर्दी वाले डिब्बों में आते और कुछ न कुछ लेकर चलते बनते। अराजक झारखंड आंदोलन के उस दौर में बेचारे इन गरीबों का यही जीने का जरिया था।  वापसी के लिए चुनिंदा ट्रेनों में सर्वाधिक अनुकूल 29 डाउन कुर्लाटी - हावड़ा एक्सप्रेस थी, लेकिन तब यह अपनी लेटलतीफी के चलते जानी जाती थी। यही नहीं ट्रेनों की कमी के चलते टाटानगर से खड़गपुर के बीच यह ट्रेन पैसेंजर के तौर पर हर स्टेशन पर रुक - रुक कर चलती थी। कभी - कभी तब राउरकेला तक चलने वाली इस्पात एक्सप्रेस से भी लौटना होता था। भारी भीड़ से बचने के लिए हम छात्र इस ट्रेन के पेंट्री कार में चढ़ जाते थे। इस आवागमन के चलते बीच के स्टेशनों जैसे कलाईकुंडा, सरडिहा, झाड़ग्राम, गिधनी, चाकुलिया , कोकपारा और धालभूमगढ़  से अपनी दोस्ती सी  हो गई। अक्सर मैं शिक्षा को दिए गए मैं अपने छह सालों के हासिल की सोचता हूं तो लगता है भौतिक रूप से भले ज्यादा कुछ नहीं मिल पाया हो, लेकिन इसकी वजह से मै जान पाया कि एक पिछड़े क्षेत्र में किसी ट्रेन के छूट जाने पर किस तरह दूसरी ट्रेन के लिए मुसाफिरों को घंटों बेसब्री भरा इंतजार करना पड़ता है और यह उनके लिए कितनी तकलीफदेह होती है। सफर के दौरान खुद भूख - प्यास से बेहाल होते हुए दूसरों को लजीज व्यंजन खाते देखना , स्टेशनों के नलों से निकलने वाले बेस्वाद चाय सा गर्म पानी पीने की मजबूरी के बीच सहयात्रियों को कोल्ड ड्रिंक्स पीते निहराना , मारे थकान के जहां खड़े रहना भी मुश्किल हो दूसरों को आराम से अपनी सीट पर पसरे देखना  और भारी मुश्किलें झेलते हुए घर लौटने पर आवारागर्दी का आरोप  झेलना अपने छह साल के छात्र जीवन का हासिल रहा।

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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।--

14.7.19

कर्नाटक का संकट : न्यायपालिका और स्पीकर के संवैधानिक अधिकारों को लेकर पेंच फंसा

जे.पी.सिंह
कर्नाटक के राजनीतिक संकट को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका और स्पीकर के संवैधानिक अधिकारों को लेकर पेंच फंस गया है। कर्नाटक संकट पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने सवाल किया कि क्या विधानसभा अध्यक्ष को उच्चतम न्यायालय के आदेश को चुनौती देने का अधिकार है?इस पर कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि अध्यक्ष का पद संवैधानिक है और बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए पेश याचिका पर फैसला करने के लिए वह सांविधानिक रूप से बाध्य हैं।

पहले संसद को तो भ्रष्टाचार मुक्त कर लो मोदी जी

चरण सिंह राजपूत
लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था है कि देश की दशा और दिशा संसद से तय होती है। इसका मतलब है कि देश के उत्थान के लिए संसद में अच्छी छवि के सांसद पहुंचने चाहिए। इन लोगों के क्रियाकलाप ऐसे हों जिनसे जनता प्रेरणा ले। क्योंकि इन लोगों को जनता चुनकर भेजती है तो इनका हर कदम जनता के भले के लिए ही उठना चाहिए। क्या संसद में ऐसा हो रहा है। क्या संसद में जनता की लड़ाई लड़ने वाले सांसद पहुंच रहे हैं। आम लोगों के मुंह से तो यही निकलेगा कि नहीं। तो फिर ये सांसद कैसे जनता के लिए काम करेंगी और कैसे मोदी सरकार कैसे देश और समाज का भला करेगी?

10.7.19

मोदी लिखेंगे विपक्ष की तकदीर!

दिनेश दीनू की कलम से
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जून को संसद में कहा कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है। मोदी का यह कथन वास्तव में विपक्ष के प्रति सम्मान है या विपक्ष को सम्मोहित करने की कला? मोदी के कहे का अर्थ आप अपने हिसाब से कुछ निकाल लें, लेकिन उन्होंने क्यों कहा है और उसका अर्थ क्या है, वह ही जानते हैं। कहे में फंसाने की कला मोदी में है। 2014 से दिल्ली की उनकी यात्रा से विपक्ष उनके आगे बौना बना हुआ है। 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणामों ने तो विपक्ष को छिन्न-भिन्न कर दिया है।

8.7.19

कांग्रेस का संकटकाल

अंशुमान सिंह
कांग्रेस स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से देश की सबसे बडी और व्यापक रूप से सक्रिय पार्टी रही है। कांग्रेस के केन्द्रीय सत्ता के क्रियान्वयन में नेहरू परिवार का अधिपत्य रहा है। चाहे जवाहरलाल नेहरू हों, इंदिरागांधी गांधी हों, राजीव गाँधी हों, कांग्रेस की निवर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी हों या फिर वर्तमान अध्यक्ष राहुल गाँधी हों।

6.7.19

हरेन पांड्या हत्याकांड का सच अब कभी सामने नहीं आएगा

जे.पी.सिंह
हरेन पांड्या हत्याकांड का सच अब कभी सामने नहीं आएगा क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने एनजीओ 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (सीपीआइएल) की जनहित याचिका खारिज कर दी, जिसमें इस हत्या की उच्चतम न्यायालय की निगरानी में फिर से जांच कराने की मांग की गई थी।उच्चतम न्यायालय ने एनजीओ पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। साथ ही यह भी कहा है कोर्ट की निगरानी में नए सिरे से जांच नहीं होगी, ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा।

IPS संजीव भट्ट के साथ जो हुआ, उसे लेकर पूर्व नौकरशाहों में बेचैनी है पर सब चुप हैं!

Parmod Pahwa : कोई भी सिविल सर्वेंट किसी भी दृष्टिकोण से गली के गुंडे, मवाली या अपराधी से तो लाख दर्ज़े बेहतर होता है। पुलिस या अन्य किसी सुरक्षा बल में शक्ति का प्रयोग तथा हथियार प्रशिक्षण का हिस्सा होते हैं और जीना-मरना एक सामान्य प्रक्रिया।

कारपोरेट को रिर्टन गिफ्ट है मोदी सरकार का बजट : वर्कर्स फ्रंट

मजदूर-किसान विरोधी है बजट, इससे देश कमजोर होगा
सोनभद्र : केंद्र की मोदी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा संसद में पेश किया गया बजट देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों द्वारा चुनाव में भाजपा को भरपूर मदद देने के एवज में दिया रिर्टन गिफ्ट है। वित्त मंत्री भले ही कहे कि यह ‘मजबूत देश- मजबूत नागरिक‘ का बजट है सच यह है कि इस बजट से भीषण मंदी के दौर से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में कोई मदद नहीं मिलेगी और इससे आम नागरिक, मजदूर, किसान, महिलाओं, नौजवानों की हालत और भी बदतर होगी।

वो तय करेंगे- आप संदिग्ध हैं, देशद्रोही हैं!

मसीहुद्दीन संजरी
लोकसभा चुनावों में 23 मई 2019 को भाजपा की प्रचंड जीत का एलान हुआ। आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भाजपा ने भोपाल से अपना प्रत्याशी बनाया जिन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह को भारी मतों से पराजित कर कानून बनाने वाली देश की सबसे बड़ी पंचायत में पदार्पण किया। मोदी के दोबारा सत्ता में आने के साथ ही सरकार आतंकवाद पर ‘सख्त’ हो गयी। पहले से ही दुरूपयोग के लिए विवादों में रहे पोटा कानून के स्थान पर कांग्रेस सरकार ने 2004 में नए रूप में गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम पेश किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में इसी में दो और संशोधन लाने का फैसला किया गया।

4.7.19

अमेरिका के आगे क्यों नतमस्तक है मोदी सरकार

Shyam Singh Rawat
थोड़ा पीछे चलकर याद कीजिये कि किस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर में नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन कांग्रेसनीत यूपीए सरकार तथा कांग्रेस को बुरी तरह सवालों के जाल में फँसाकर सत्ता पर कब्जा जमाने में कामयाबी हासिल कर ली थी। उन्होंने ऐसा क्यों हुआ, ऐसा क्यों नहीं किया गया आदि विभिन्न प्रकार के प्रश्नों के अलावा देशभर में घूम-घूमकर देशप्रेम के सुनहरे सपनों का मायाजाल रचा लेकिन दिल्ली की सत्ता कब्जियाने के बाद वे देशहित की बलि चढ़ाते हुए एक के बाद दूसरा फैसला अमेरिका तथा उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित-लाभ में लेते रहे हैं।  

29.6.19

हावड़ा - मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ....!!

हावड़ा - मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ....!!
तारकेश कुमार ओझा
महानगरों के मामले में गांव - कस्बों में रहने वाले लोगों के मन में कई तरह की सही - गलत धारणाएं हो सकती है। जिनमें एक धारणा यह भी है कि देर रात या मुंह अंधेरे महानगर से उपनगरों के बीच चलने वाली लोकल ट्रेनें अमूमन खाली ही दौड़ती होंगी। पहले मैं भी ऐसा ही सोचता था। लेकिन एक बार अहले सुबह कोलकाता पहुंचने की मजबूरी में तड़के साढ़े तीन बजे की फस्र्ट लोकल पकड़ी तो मेरी धारणा पूरी तरह से गलत साबित हुई। खुशगवार मौसम के दिनों में यह सोच कर ट्रेन में चढ़ा कि  इतनी सुबह गिने - चुने यात्री ही ट्रेन में होंगे और मैं आराम से झपकियां लेता हुआ मंजिल तक पहुंच जाऊंगा। लेकिन वास्तविकता से सामना हुआ तो लेटने की कौन कहे डिब्बों में बैठने की जगह भी मुश्किल से मिली। हावड़ा से मेदिनीपुर के लिए छूटने वाली लास्ट लोकल का मेरा अनुभव भी काफी बुरा और डराने वाला  साबित हुआ।
दरअसल यह नब्बे के दशक के वाइटूके की तरफ बढ़ने के दौरान की बात है। अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में मैं लगातार उलझता जा रहा था। हर तरफ से निराश - हताश होकर आखिरकार मैने भी अपने जैसे लाखों असहाय व लाचार लोगों की तरह दिल्ली - मुंबई का रुख करने का निश्चय किया। मोबाइल तो छोड़िए टेलीफोन भी तब विलासिता की वस्तु थी। लिहाजा मैने अपने कुछ रिश्तेदारों को पत्र लिखा कि मैं कभी भी रोजी - रोजगार के लिए आपके पास पहुंच सकता हूं। मेहनत - मजदूरी के लिए आपके मदद की जरूरत पड़ेगी।
जवाब बस एकाध का ही आया। सब की यही दलील थी कि छोटा - मोटा काम भले मिल जाए , लेकिन महानगरों की कठोर जिंदगी शायद तुम न झेल पाओगे। न आओ तो ही अच्छा है।
इससे मेरी उलझन और बढ़ गई। हर पल  जेहन में बुरा ख्याल आता कि अब मुझे भी किसी बड़े शहर में जाकर दीवार फिल्म के अमिताभ बच्चन की तरह सीने में रस्सा बांध कर बोझा ढोना पड़ेगा या फिर किसी मिल में मेहनत - मजदूरी करनी होगी।
श्रमसाध्य कार्य  की मजबूरी से ज्यादा व्यथित मैं अपनों से दूर जाने की चिंता से था। क्योंकि मैं शुरू से होम  सिकनेस का मरीज रहा हूं।
निराशा के इस दौर में अचानक उम्मीद की लौ जगी । सूचना मिली कि कोलकाता से एक बड़े धनकुबेर का अखबार निकलने वाला है। अखबार पहले सांध्य निकलेगा। लेकिन जैसे ही प्रसार एक निश्चित संख्या तक पहुंचेगा वह आम अखबारों की सुबह निकला करेगा। पैसों की कोई कमी नहीं लिहाजा अखबार और इससे जुड़ने वालों का भविष्य सौ फीसद उज्जवल होगा।
संयोग से अखबार के संपादक व सर्वेसर्वा मेरे गहरे मित्र बने, जिनसे संघर्ष के दिनों से दोस्ती थी। लिहाजा मैने उनसे संपर्क साधने में देर नहीं की।
उन्होंने भी मेरी हौसला - आफजाई करते हुए तुरंत खबरें भेजना शुरू करने को कहा। उस काल में मैं सीधे तौर पर किसी अखबार से जुड़ा तो नहीं था। लेकिन अक्सर लोग मुझे तरह - तरह की सूचनाएं  इस उम्मीद में दे जाते थे कि कहीं न कहीं तो छप ही जाएगी। ऐसी ही सूचनाओं में एक सामाजिक संस्था से जुड़ी खबर थी।
जिसके पदाधिकारियों ने कई बार मुझसे  संपर्क किया। मेरे यह कहने पर कि खबर जल्द प्रकाशित होने वाले अखबार के डमी कॉपी में छपी है, उन्होंने इसकी प्रति हासिल करने की इच्छा जताई तो मेरे लिए यह मसला प्रतिष्ठा का प्रश्न बन  गया।
तभी मुझे  सूचना मिली कि अखबार जल्द निकलने वाला है। में आकर डमी कॉपी ले जाऊं।
इस सूचना में मेरे लिए दोहरी खुशी की संभावना छिपी थी। अव्वल तो यदि सचमुच बड़े समूह का अखबार निकला तो मैं अपनी मिट्टी से दूर जाने की भीषण त्रासदी से बच सकता था और दूसरा इससे दम तोड़ते मेरे करियर को आक्सीजन का नया डोज मिल सकता था।
बस कहीं से सौ रुपए का एक नोट जुगाड़ा और अखबार की डमी कॉपियां लेने घनघोर बारिश में ही कोलकाता को निकल पड़ा।
रास्ते में पड़ने वाले सारे स्टेशन मानो बारिश में भींगने का मजा ले रहे हों। कहीं - कहीं रेलवे ट्रैक पर भी पानी जमा होने लगा था।
जैसे - तैसे मैं दफ्तर पहुंचा तो वहां का माहौल काफी उत्साहवर्द्धक नजर आया। सर्वेसर्वा से लेकर हर स्टाफ ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि अपन अब सही जगह पर आ गए हैं... भविष्य सुरक्षित होने वाला है... अब तो बस मौज करनी है।
उदास चेहरे पर फींकी मुस्कान बिखरते हुए मैं मन ही मन बड़बड़ाता .... भैया  मुझे न तो भविष्य सुरक्षित करने की ज्यादा चिंता है और न ऐश करने का कोई शौक... मैं तो बस इतना चाहता हूं कि कुछ ऐसा चमत्कार हो जाए, जिससे मुझे अपनों से दूर न होना पड़े। क्योंकि मैं किसी भी सूरत में अपना शहर नहीं छोड़ना चाहता था।
रिमझिम बारिश के बीच सांझ रात की ओर बढ़ने लगी... बेचैनी ज्यादा बढ़ती तो मैं बाहर निकल जाता और फुटपाथ पर बिकने वाली छोटी भाड़ की चाय पीकर फिर अपनी सीट पर आकर बैठ जाता।
मेरे दिल दिमाग में बस डमी कॉपियों का बंडल घूम रहा था। पूछने पर बार - बार यही कहा जाता रहा कि बस छप कर आती ही होगी।
देर तक कुछ नहीं आया तो लगा मैं फिर किसी धोखे का शिकार हो रहा हूं।
बारिश के बीच घर लौटने की चिंता से मेरा तनाव फिर बढ़ने लगा।
आखिरकार एक झटके से मैं उठा और बाहर निकल गया। किसी से कुछ कहे बगैर हावड़ा जा रही बस में सवार हो गया। लेकिन मुश्किलें यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी। इतनी रात गए हावड़ा - मेदिनीपुर की जिस लॉस्ट लोकल में मैं कुछ आराम से यात्रा करते हुए भविष्य को लेकर चिंतन - मनन की सोच रहा था, उसमें भी ठसाठस भीड़ थी। लोग डिब्बों के बाहर तक लटके हुए थे।  कोलकाता महानगर को ले एक बार फिर मेरी धारणा गलत साबित हुई। लोग डिब्बों के बाहर तक लटके हुए थे।
किसी तरह एक डिब्बे में सवार हुआ तो वहां यात्री एक - दूसरे पर गिरे पड़ रहे थे। इस बात को लेकर होने वाली कहासुनी और वाद - विवाद यात्रा को और भी कष्टप्रद बना रहा था।
ट्रेन एक के बाद एक स्टेशन पर रुकती हुई आगे बढ़ रही थी, लेकिन यात्री कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे थे। बागनान स्टेशन आने पर डिब्बा कुछ खाली हुआ तो मुझे बैठने की जगह मिल पाई।
देउलटि आते - आते कुछ और मुसाफिर डिब्बे से उतर गए तो मैं यह सोच कर बेंच पर लेट गया कि दिन भर की थकान उतारते हुए भविष्य की चिंता करुंगा। मैं सोचने लगा कि ट्रेन तो खैर देर - सबेर अपनी मंजिल पर पहुंच जाएगी लेकिन अपनी मंजिल का क्या होगा। क्या कोई रास्ता निकलेगा।
इस बीच कब मुझे झपकी लग गई पता ही नहीं चला।
नींद टूटने पर बंद आंखों से ही मैने महसूस किया कि ट्रेन किसी पुल के ऊपर से गुजर रही है।
हालांकि डिब्बे में छाई अप्रत्याशित शांति से मुझे अजीब लगा।
आंख खोला तो सन्न रह गया। पूरा डिब्बा खाली। जीवन की तरह यात्रा की भी अजीब विडंबना कि जिस ट्रेन के डिब्बों में थोड़ी देर पहले तिल धरने की जगह नहीं थी, वहीं अब पूरी की पूरी खाली। आस - पास के डिब्बों का टोह लिया तो वहां भी वही हाल।
लुटने लायक अपने पास कुछ था नहीं, लेकिन बारिश की काली रात में एक डिब्बे में अकेले सफर करना खतरनाक तो था ही।
लिहाजा ट्रेन के एक छोटे से स्टेशन पर रुकते ही मैं डिब्बे से उतर गया और किसी हॉरर फिल्म के किरदार की तरह बदहवास इधर - उधर भागने लगा।
क्योंकि हर डिब्बा लगभग खाली था। इंजन के बिल्कुल पास वाले एक डिब्बे में दो खाकी वर्दीधारी असलहा लिए बैठे थे। मैं उसी डिब्बे में चढ़ गया और जैसे - तैसे घर भी पहुंच गया।
इसके बाद के दिन मेरे लिए बड़े भारी साबित हुए। लेकिन वाकई जिंदगी इंतहान लेती है।
एक रोज कहीं से लौटा तो दरवाजे पर वहीं बंडल पड़ा था, जिसे लेने मैं बरसात की एक रात कोलकाता गया था और कोशिश करके भी हासिल नहीं कर पाया। बंडल के साथ एक पत्र भी संलग्न था, जिसमें अखबार शीघ्र निकलने और तत्काल संपर्क करने को कहा गया था। इस घटना के बाद वाकई मेरे जीवन को एक नई दिशा मिली...
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*लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार
हैं।------------------------------**------------------------------*

27.6.19

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि : हम उन्हें अलविदा नहीं कहा सकते

ललित गर्ग
विश्व प्रसिद्ध भारत माता मंदिर के संस्थापक, भारतीय अध्यात्म क्षितिज के उज्ज्वल नक्षत्र, निवृत्त शंकराचार्य, पद्मभूषण स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि मंगलवार सुबह हरिद्वार में उनके निवास स्थान राघव कुटीर में ब्रह्मलीन हो गए। वे पिछले 15 दिनों से गंभीर रूप से बीमार थे, उनके देवलोकगमन से भारत के आध्यात्मिक जगत में गहरी रिक्तता बनी है एवं संत-समुदाय के साथ-साथ असंख्य श्रद्धालुजन शोक मग्न हो गये हैं।

नयी शिक्षा नीति 2019 की प्रतियाँ जलाई गयी



आज अहमदाबाद में RTE फोरम गुजरात, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, माइनॉरिटी कोआर्डिनेशन कमेटी गुजरात के संयुक्त तत्वाधान में नयी शिक्षा नीति पर चर्चा आयोजित की गयी| नीति की मुख्य बातों को मुजाहिद नफ़ीस ने विस्तार से रखते हुए कहा कि शिक्षा बच्चों का मौलिक कानूनी अधिकार है. इसके अलावा, प्राथमिक स्तर पर स्कूलों में छात्रों की मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिये जाने का मसला भी अहम है. आरटीई फोरम लंबे समय से आरटीई प्रावधानों के मुताबिक शिक्षकों के नियमितीकरण व गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के साथ-साथ स्कूलों में पूर्णकालिक शिक्षकों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति एवं आधी-अधूरी तनख़्वाह पर रखे जाने वाले गैर प्रशिक्षित अतिथि और पैरा शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल उठाता रहा है|

विषय - उत्तराखंड के युवाओं को बेरोजगारी और आजीविका का संकट के संबंध में-



सेवा में
            श्रीमान प्रधानमंत्री जी
           भारत सरकार नई दिल्ली
विषय-उत्तराखंड के युवाओं को बेरोजगारी और आजीविका का  संकट के  संबंध में 

महोदय
      निवेदन इस प्रकार है कि  देश के 27 वें राज्य के रूप में उत्तराखंड का गठन  राज्य के युवाओं को रोजगार और पहाडों के विकास के लिए किया गया। राज्य बनने के 19 साल के बाद भी यहां के युवाओं और इस क्षेत्र के निवासियों की स्थिति और दयनीय होती जा रही है  राज्य में अलग-अलग सरकार बनी और अलग-अलग दावे सरकार द्वारा बार-बार होते रहे । परंतु राज्य की स्थित व राज्य के युवाओं की स्थिति अभी भी दयनीय बनी हुई है।

जनता के लिए तो यह आपातकाल से भी बदतर है प्रधानमंत्री जी

राजनीति में बेशर्मी कोई बड़ी बात नहीं रह गई है पर यदि देश का प्रधानमंत्री इस बेशर्मी पर उतर आये तो देश के लिए चिंतन का विषय जरूर है। जब देश में एक विशेष नारे के नाम पर एक विशेष धर्म के लोगों को टारगेट बनाया जा रहा हो। जब सरकार में बैठे लोग अपने विरोधियों को टारगेट बनाकर जेल भिजवा रहे हों। जब संविधान की रक्षा करने वाले तंत्रों को बंधुआ बनाने का दुस्साहस हो रहा हो।

24.6.19

आखिर क्यों खामोश है सपा और अखिलेश यादव

कल से उत्तर प्रदेश की राजधानी में अपने आपको दलितों और पिछड़ों की पार्टी कहलाने वाली बहुजन समाज पार्टी की लोकसभा चुनाव में जीत कम हार ज्यादा वाले प्रदर्शन पर मंथन चल रहा था. कहने के लिए मंथन हुआ. लेकिन उसमे हुए फैसलों को देखकर तो ऐसा कुछ लगता तो नहीं कि कुछ भी मंथन हुआ है.

पार्टी के संस्थापक काशीराम के उसूलों के खिलाफ जाकर पार्टी की सर्वेसर्वा मायावती ने अपने बाद अपने भाई को पार्टी का नंबर दो बना दिया. उन्होंने अपने भाई आनंद को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया है. हालांकि इससे पहले भी उन्होंने आनंद को इसी पद पर सुशोभित किया था, लेकिन बाद में हटा दिया था. पार्टी का तीसरा पद यानि नेशनल कोआर्डिनेटर उन्होंने अपने भतीजे आकाश को बनाया है. वो लोकसभा चुनावों में पानी बुआ के साथ साए की तरह नजर आए थे.

राजनीति में एक शब्द काफी प्रचलित है- भाई-भतीजावाद. लेकिन अब तक इसका कोई अच्छा उदाहरण नहीं देखने को मिलता था. लेकिन इस ताजे फैसले से अब भाटिया राजनीति को एक अच्छा उदाहरण भी मिल गया. अब राजनीति के छात्रों को एक अच्छे उदहारण के साथ भाई-भतीजावाद समझाया जा सकेगा.

दूसरा फैसला रहा समाजवादी पार्टी से गठबंधन ख़त्म करना. यह हालांकि यह फैसला 23 मई को रिजल्ट के बाद ही हो गया था. बसपा के नेताओं के बयानों से लगने लग गया था की यह बेमेल गठबंधन कभी भी टूट सकता है. और हुआ भी यही.

किसी जोड़ी वाले खेल में हार जाने के बाद कई बार दोनों साथी एक-दूसरे पर आरोप लगते हुए अलग हो जाते है. और कुछ होते हैं की चुपचाप बिना कुछ आरोप प्रत्यारोप के अलग हो जाना. मायावती ने पहला ऑप्शन चुना. उन्होंने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तमाम आरोप जड़ते हुए गठबंधन से अलग हुईं. उन्होंने सीधे अखिलेश यादव और राजनैतिक सूझबूझ पर सवाल उठा दिए. उन्होंने इसे विज्ञानं का एक प्रयोग बता दिया. कहा की इससे बसपा को नुकसान ही हुआ है. हालांकि सच्चाई कुछ और ही कहती है.

लेकिन अच्मभे वाली बात यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी समाजवादी पार्टी की तरफ से कोई भी सफाई या बयां नहीं आया है. बात-बात पर अपनी राय जताने वाले सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनका ट्विटर अकाउंट भी खामोश पड़ा हुआ है. इसके पीछे क्या वजह हो सकती है. क्या उन्हें अभी भी अपनी बुआ मायावती की तरफ से कुछ उम्मीदें हैं? क्या उन्हें आशा है की 2022 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों बसपा उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के मिशन में सहयोग करेगी? या इसके पीछे कुछ और ही राजनीति है?

20.6.19

ब्रज की डिक्शनरी से लिए गए कुछ चुनिंदा शब्द

Excuse me  - नैक सुनियो
 
what             - काये
 
why               - चौं
 
really             - अरे हम्बै??
 
hey dude      - ऐं.. रे
 

19.6.19

गए थे नवोदित खिलाड़ी से मिलने , याद आने लगे धौनी...!!

गए थे नवोदित खिलाड़ी से मिलने , याद आने लगे धौनी...!!
तारकेश कुमार ओझा
कहां संभावनाओं के आकाश में टिमटिमाता नन्हा तारा और कहां क्रिकेट की दुनिया का एक स्थापित नाम। निश्चित रूप से कोई तुलना नहीं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उस रोज नवोदित क्रिकेट खिलाड़ी करण लाल से मिलते समय बार - बार जेहन  में महेन्द्र सिंह धौनी का ख्याल आ रहा था। इसकी ठोस वजहें भी हैं। क्योंकि करीब 18 साल पहले मुझे धौनी का  भी साक्षात्कार लेने का ऐसा ही मौका मिला था। जब वे मेरे शहर खड़गपुर में रहते हुए टीम इंडिया में चुने जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। यह 2001 की बात है। तब  मैं जमशेदपुर से प्रकाशित दैनिक पत्र के लिए जिला संवाददाता के तौर पर कार्य कर रहा था। पत्रकारिता का जुनून सिर से उतरने लगा था। कड़वी हकीकत से हो रहा लगातार सामना मुझे विचलित करने लगा । आय के साधन अत्यंत सीमित जबकि जरूरतें लगातार बढ़ रही थी। तिस पर पत्रकारिता से जुड़े रोज के दबाव और झंझट - झमेले। विकल्प कोई था नहीं और पत्रकारिता से शांतिपूर्वक रोजी - रोटी कमा पाना मुझे तलवार की धार पर चलने जैसा प्रतीत होने लगा था। हताशा के इसी दौर में  एक रोज डीआरएम आफिस के नजदीक हर शाम चाउमिन का ठेला लगाने वाले  कमल बहादुर से मुलाकात हुई। कमल न सिर्फ खुद अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी है बल्कि आज भी इसी पेशे में हैं। मैं जिस अखबार का प्रतिनिधि था कमल उसका गंभीर पाठक भी है, यह जानकर मुझे अच्छा लगा जब उसने कहा .... तारकेश भैया ... आप तो अपने अखबार में इतना कुछ लिखते हैं। अपने शहर के नवोदित क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धौनी के बारे में भी कुछ लिखिए। इस शानदार खिलाड़ी का भविष्य उज्जवल है। मैने हामी भरी। बात उनके शहर लौटने पर मिलवाने की हुई। लेकिन कभी ऐसा संयोग नहीं बन पाया। 2004 तक वे शहर छोड़ कर चले भी गए, फिर क्रिकेट की दुनिया में सफलता का नया अध्याय शुरू हुआ। क्रिकेट की भाषा में कहें तो यह अच्छे से अच्छा फील्डर से कैच छूट जाने वाली बात हुई। धौनी को याद करते हुए करण लाल से मिलने का अनुभव लाजवाब रहा।  टीम में चुने जाने से पहले तक धौनी की पहचान अच्छे  विकेटकीपर के तौर पर थी। वे इतने विस्फोटक बल्लेबाज हैं यह उनकी  सफलता का युग शुरू होने के बाद पता चला। लेकिन करण अच्छा बल्लेबाज होने के साथ बेहतरीन गेंदबाज भी है और टीम में चुने जाने के बिल्कुल मुहाने पर खड़ा है। पत्रकारिता और क्रिकेट में शायद यही अंतर है। क्रिकेट का संघर्षरत खिलाड़ी भी स्टार होता है। करियर के शुरूआती दौर में महेन्द्र सिंह धौनी जब रेलवे  की नौकरी करने मेरे शहर खड़गपुर शहर आए तब भी वो एक स्टार थे। टीम में चुने जाने और अभूतपूर्व कामयाबी हासिल करने के बाद वे सेलीब्रेटी और सुपर स्टार बन गए। करण लाल भी आज एक स्टार है। उसका जगह - जगह नागरिक अभिनंदन हो रहा है। बड़े - बड़े अधिकारी और राजनेता उनसे मिल कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

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18.6.19

हुक्मरानों, बच्चों की अर्थियां बहुत वजनदार होती हैं!


अभी कुछ दिनों पहले ही IIT के रिजल्ट आया. हर बार की तरह इस बार भी बिहार के छात्रों ने अपना लोहा मनवाया. लेकिन इन छात्रों के मन में एक कसक होगी कि हार बार की तरह इस बार इनके बारे में चर्चा नहीं की जा रही है. लेकिन इस बात का इन्हें कोई मलाल नहीं होगा. क्योंकि इस बार चर्चा हो रही है तो उन्हीं के राज्य में ही लगे एक अनचाहे शतक के बारे में. बिहार राज्य की एक ऐसी शतकीय पारी जो इतिहास के पन्नों पर हर वक़्त बिहार से ताल्लुक रखने वालों को ही नहीं हर देशवासी को मुंह चिढ़ाएगी.

शायद अब आपको अंदाजा हो गया होगा की मैं किस शतकीय पारी की बात कर रह हूँ. मैं बात कर रहा हूँ मुज्जफरपुर में चमकी बुखार से हुए लगभग 130 मासूम बच्चों की मौत का. उन्हीं बच्चों की बात जिनकी मौत शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के अनुसार खाली पेट लीची खाने से हुई थी. बिहार का मुज्जफरपुर जिला हालांकि राज्य की राजधानी से कुछ ज्यादा दूरी पर नहीं है. लेकिन इन मासूम बच्चों से मिलने या इनसे अपनी संवेदना जताने के लिए हुक्मरानों का पहुँचने का सिलसिला बहुत ही लाचार है. क्योंकि यहां से राजनीति या वोटों की रोटियां नहीं सेंकी जा सकती हैं.

कहने को तो बिहार में बहुत कुछ बदलाव हुआ है. लेकिन आपका सिर शर्म से और झुक जाएगा जब आपको मालूम होगा कि मुज्जफरपुर में यह बीमारी पिछले 25 सालों से घर किये हुए है. पिछले 25 सालों से यहां मौत का तांडव हो रहा था, लेकिन सरकार और हुक्मरानों के कानों पर जूं तक न रेंगी थी. स्वास्थ्य विभाग के ही आंकड़ों को देखें तो मालूम पड़ता है कि 2010 से अब तक लगभग इस 500 बच्चे अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. पिछले 9 सालों में यह बीमारी धीमे-धीमे असर कर रही थी, लेकिन इस साल इस चमकी बुखार ने अपना तांडव शताब्दी की स्पीड में चला दिया. इस चमकी बुखार की बढ़ी स्पीड का सारा दोष दिया गया लीची को.

मीडिया को बंगाल से जब फुर्सत मिली, तो इन मासूमों का ख्याल आया. मीडिया ने हो हल्ला किया. सरकार और जिम्मेदारों पर जूं रेंगी. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन उनके जूनियर अश्विनी चौबे और बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय अस्पताल में पहुंचे. अस्पताल का शाही दौरा किया गया. दौरे के बाद दिखावे के लिए प्रेस कांफ्रेंस का मंचन किया गया. डॉ. हर्षवर्धन को भी उम्मीद नहीं होगी की सारा खेल यहीं हो जाएगा. हालांकि उन्होंने सवालों का सामना किया और एक डॉक्टर होने के नाते जवाब भी दिए. लेकिन बगल में ही बैठे दोनों ही मंत्रियों ने सारा गुडगोबर कर दिया. उनके जूनियर अश्विनी चौबे नींद में झूम रहे थे. जिसको उन्होंने चिंतन और मनन का नाम दिया था. और वहीं बिहार के मंत्री साहब को क्रिकेट के स्कोर की ज्यादा चिंता थी.

अब जब मंत्रियों के दौरे की बात आ ही गई है, तो एक और दौरे का जिक्र करना चाहूँगा. तारीख थी 22 जूं 2014. अंतर सिर्फ इतना था की राज्य में एनडीए की सरकार नहीं थी. उस वक़्त भी स्वास्थ्य मंत्री भी यही हर्षवर्धन थे. उस वक़्त भी बच्चों की मौतें हुई थीं. अपने उस दौरे दौरान उन्होंने वादा किया था कि मुज्जफरपुर में 100 बेडों का अस्पताल बनाया जाएगा. लेकिन यह वादा भी अन्य वादों के साथ धुल गया. हाथ आया तो सिर्फ हर साल मौतों का बढ़ता हुआ हुआ आंकड़ा. और यही वादा इस बार भी किया गया है.

लेकिन फिलहाल बात करें तो हालात यह हैं कि डॉक्टरों को अभी तक यह भी नहीं मालूम है कि बीमारी क्या है? कौन सी दवाई दी जाए?किस तरह बढ़ते हुए आंकड़ो को रोका जाए? लेकिन सच्चाई यह है की सरकार और हुक्मरान इन मासूमों की मौत के जिम्मेदार हैं. अगर पहले ही कुछ कर लिया जाता तो यह आंकड़ा इतना लंबा नहीं जाता. बिहार और देश इन मौतों को कभी नहीं भुला पाएगा. क्योंकि बच्चों की आर्थियाँ बहुत वजनदार होती हैं.....             


7.6.19

कोलकाता की वो पुरानी बस और डराने वाला टिकट!


तारकेश कुमार ओझा

कोलकाता की बसें लगभग अब भी वैसी ही हैं जैसी 90 के दशक के अंतिम दौर तक
हुआ करती थी। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले जगहों के नाम ले लेकर
चिल्लाते रहने वाले कंडक्टरों के हाथों में टिकटों के जो बंडल होते थे,
वे साधारणत: 20, 40 और 60 पैसे तक के होते थे। एक रुपये का सिक्का बढ़ाते
ही कंडक्टर टिकट के साथ कुछ न कुछ खुदरा पैसे जरूर वापस लौटा देता। कभी
टिकट के एवज में कंडक्टर 80 पैसे या एक रुपये का टिकट बढ़ाता तो लगता कि
कोलकाता के भीतर ही कहीं दूर जा रहे हैं। उसी कालखंड में मुझे कोलकाता के
एक प्राचीनतम हिंदी दैनिक में उप संपादक की नौकरी मिल गई। बिल्कुल
रिफ्रेशर था, लिहाजा वेतन के नाम पर मामूली रकम ही स्टाइपेंड के तौर पर
मिलती थी और सप्ताह में महज एक दिन का अघोषित अवकाश।

राजनाथ सिंह कभी यशवंत सिन्हा नहीं बनना चाहेंगे!

Navneet Mishra : राजनाथ सिंह कभी यशवंत सिन्हा नहीं बनना चाहेंगे। मंझे हुए खिलाड़ी है। दर्द भी सीने में दबाकर मुस्कुराने वाले नेता हैं। वह कभी महत्वाकांक्षा का शिकार होकर ख़ुद बेटे की राह का काँटा नहीं बनने वाले, जैसे जयंत के लिए उनके पापा बन गए।

आओ राजा हम ढोएंगे पालकी, जाती रहे जान हमारे जवान की

Asit Nath Tiwari
नारा लगा कि आएगा तो मोदी ही और आए भी मोदी ही। लेकिन आए क्यों ? क्योंकि रोज़ी, रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा के तो मुद्दे ही ग़ायब हैं। चुनाव में सेना की शहादत का मुद्दा राष्ट्रवादी चासनी में मीठा होता दिखा। 2016 में भी भारतीय वायुसेना का एएन-32 विमान लापता हो गया था। इस विमान ने तब चेन्नई से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन बंगाल की खाड़ी के ऊपर से उड़ते हुए ये लापता हो गया था। चीन बॉर्डर के नजदीक लापता हुए विमान को ना तो धरती ने निगला होगा और ना ही आसमान ने खा लिया होगा। चीन से पूछने की हिम्मत किसे है। रक्षा मामले में मोदी सरकार की इस बड़ी विफलता पर जवानों की शहादत पर जश्न मनाने वाले मोदी के मतदाताओं ने खामोशी की चादर तान ली। एयर फोर्स के अधिकारियों और जवानों समेत 29 लोग इसमें सवार थे। इनकी शहादत, सरकार की विफलता थी लिहाजा, 29 सैनिकों की शहादत को ग़ुमनामी के घोर अंधेरे में धकेल दिया गया।

दलित राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल विकल्प

एस. आर. दारापुरी
(राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट)


हाल के लोक सभा चुनाव ने दर्शाया है कि दलित राजनीति एक बार फिर बुरी तरह से विफल हुयी है. इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने के उद्देश्य से बना सपा- बसपा गठबंधन बुरी तरह से विफल हुआ है. इस चुनाव में यद्यपि बसपा 2014 के मुकाबले में 10 सीटें जीतने में सफल रही है परन्तु  इसमें इस पार्टी का अवसान भी बराबर दिखाई दे रहा है .  2014 के लोक सभा चुनाव में इसका पूरी तरह से सफाया हो गया था और इसे एक भी सीट नहीं मिली थी. इस चुनाव में भी इसका वोट प्रतिशत 2014 के 19.60% से घट कर 19.26% रह  गया है. इसी तरह 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 23% पर पहुँच गया था.  यद्यपि  मायावती ने बड़ी चतुराई से इस का दोष सपा  के यादव वोट के ट्रांसफर न होने तथा ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी बता कर अपनी जुम्मेदारी पर पर्दा डालने की कोशिश की है परन्तु उसकी अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, तानाशाही, दलित हितों की अनदेखी और जोड़तोड़ की राजनीति के हथकंडे किसी से छिपे नहीं हैं. बसपा के पतन के लिए आज नहीं तो कल उसे अपने ऊपर जुम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी.

दम तोड़ती सपा, अहंकार में डूबे अखिलेश

अजय कुमार, लखनऊ
बसपा-समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन टूटने के बाद यक्ष प्रश्न यही है कि अखिलेश यादव अब कौन सा रास्ता चुनेंगे? 2017 में विधान सभा चुनाव के समय कांगे्रस से और अबकी लोकसभा चुनाव के समय बसपा से गठबंधन का अनुभव अखिलेश के लिए किसी भी तरह से सुखद नहीं रहा। फिर भी अच्छी बात यह है कि गठबंधन टूटने के बाद भी अखिलेश अपनी मंुहबोली बुआ मायावती से संबंध खराब नहीं करना चाहते हैं। अगर इसी सोच के साथ अखिलेश यादव खून के रिश्ते भी निभाते तो शायद न तो चाचा शिवपाल यादव उनसे दूर होते ? न ही उन्हें अपनी सियासत बचाने के लिए गैरों की चैखट पर सिर रगड़ना पड़ता। मगर दुख की बात यह है कि भले ही अखिलेश यादव अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हों ? मायावती ने उनको मझधार में छोड़ दिया हो ? लेकिन अखिलेश पारिवारिक कलह सुलझने में बिल्कुल रूचि नहीं ले रहे हैं। कम से कम पारिवारिक मामलों में तो वह (अखिलेश )कुछ ज्यादा ही अहंकारी नजर आ रहे हैं। उनके अहंकार के कारण ही समाजवादी पार्टी लगातार सियासी मैदान में दम तोड़ती जा रही है।

दूसरों के बैंक एकाउंट से ठग बेहिचक उड़ा रहे रुपए, पीड़ित काट रहे पुलिस के चक्कर!



 अलीगढ़ । अलीगढ़ महानगर में एक्सिस बैंक बस स्टैंड शाखा के खाताधारक बॉबी कुमार के साथ अजीब तरह की ठगी का मामला सामने आया है। बॉबी के मुताबिक 24अप्रैल को उसके पास एक फोन आया और उसके क्रेडिट कार्ड की जानकारी मांगी। बॉबी ने कॉल करने वाले को स्पष्ट रूप से कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया  बाबजूद इसके बॉबी के क्रेडिक कार्ड से 9999 रुपए पांच बार मे निकाले गए कुल मिलाकर पांच बार में 50000/- पचास हज़ार रुपये उड़ गए।

5.6.19

पर्यावरण और बेपरवाह समाज : कुछेक तारीखें हमने छाती पीटने के लिए तय कर दी हैं

मनोज कुमारकुछेक तारीखें हमने छाती पीटने के लिए तय कर दी हैं. विलाप करने का मौका भी ये तारीखें हमें देती हैं. इन्हीं तारीखों में 5 जून भी एक ऐसी ही तारीख है जिस दिन पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर सियापा करते हैं और दिन बीतते ना बीतते हम 5 जून को बिसरा देते हैं. खैर, ऐसा करना हम भारतीयों की जीवनशैली बन गई है क्योंकि हम उत्सव प्रेमी हैं और किसी भी तारीख पर उत्सव की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं. पर्यावरण का संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है. ज्यों ज्यों किया इलाज, त्यों-त्यों बढ़ता गया मर्ज वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. पर्यावरण के जानकार चेता रहे हैं, सजग कर रहे हैं लेकिन हमारी नींद नहीं टूट रही है. पर्यावरण संरक्षण के लिए अकेले सरकार को कटघरे में खड़ा करना या उसकी जवाबदारी तय करना अनुचित है.

यूपी में गठबंधन की सियासत फिर ‘चौराहे’ पर

अजय कुमार,लखनऊ
उत्तर प्रदेश में कल तक मजबूत दिख रहे सपा-बसपा गठबंधन में बसपा सुप्रीमों मायावती के एक बयान के बाद दरार नजर आने लगी है। भले ही बसपा सुप्रीमों मायावती के मन में अखिलेश को लेकर कोई कड़वाहट नहीं है,परंतु गठबंधन के बाद भी लोकसभा चुनाव में उम्मीद के अनुसार उन्हें(मायावती) सियासी फायदा नहीं मिलने से से उम्मीद के अनुसार  यह कहने में भी गुरेज नहीं रहा कि सपा के यादव वोट बैंक में सेंधमारी लग चुकी है। माया का इशारा साफ है कि अगर सपा-बसपा के वोटर एक साथ आते तो गठबंधन की जीत का आंकड़ा बहुत बड़ा होता। मगर सपा से नाराज यादव वोटरों के चलते ऐसा हो नहीं पाया। माया के बयान पर अभी तक सपा प्रमुख अखिलेश यादव सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं,लेकिन मायावती के नए पैतरे से यह तो साफ हो ही गया है कि अखिलेश के लिए मायावती को समझना इतना आसान भी नहीं है। माया ने फिलहाल सपा से संबंध तोड़ने की बात तो नहीं की है लेकिन यह जरूर साफ कर दिया है कि वह अपने हिसाब से चलेंगी। इसी के तरह बसपा सुप्रीमों  2007 के हिट फार्मूले ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय’ को फिर से धार देना चाहती हैं, जिसके बदौलत प्रदेश में उनकी बहुमत के साथ सरकार बनी थी।

चुनाव आयोग ने प्रेक्षकों की शिकायत की सूचना देने से मना किया

निर्वाचन आयोग ने लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को लोक सभा चुनाव 2019 के दौरान विभिन्न प्रेक्षकों द्वारा भेजी गयी शिकायतों तथा रिपोर्ट की सूचना देने से इंकार कर दिया है. नूतन ने लोक सभा चुनाव 2019 में आयोग के प्रेक्षकों द्वारा चुनाव ड्यूटी में लगे अधिकारियों के खिलाफ भेजी गयी शिकायतों तथा उन पर कृत कार्यवाही के संबंध में जानकारी मांगी थी.

बालीवुड टीवी सीरियल के नजरिए से हिन्दू एक कुटिल चाल

यह एक मनोवैज्ञानिक सच है कि हम जिस तरह के माहौल में रहते है उसका हमारी जिंदगी पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। फिल्मे आम जन जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। आज टीवी ओर सिनेमा के युग में आने वाली फिल्में और सीरीयल भी हमारी जिंदगी को उतना ही प्रभावित करते है जितना कि हमारा माहौल हमें प्रभावित करता है। एक तरह से देखा जाए तो आज टीवी सिनेमा हमारी जिंदगी को हमारे माहौल से ज्यादा प्रभावित करते है क्योंकि लोगों का मेलजोल दूसरे लोगों से कम और टीवी से ज्यादा हो रहा है। परंतु दुखद बात यह है कि मनोरंजन के नाम पर टीवी और सिनेमा सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाल रहे हैं।

जब संदली हवाओं ने तुमको छुआ होगा...

न जाने फ़िज़ाओं में क्या हुआ होगा
जब संदली हवाओं ने तुमको छुआ होगा

3.6.19

ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय है

जयराम शुक्ल
"यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। युधिष्ठिर कहते हैं कि हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए"....
-महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद

सबसे बड़ा चोर और बेईमान वही आदमी है जो रिश्वत देता है!

भारती सिंह
एक पत्रकार की भड़ास...  दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत यह एक चिराग कई आंधियों पर भारी है....... कुछ विचार साझा करती हूं... हम चाहते हैं कि सब कुछ अच्छा हो जाए पर हम यह नहीं चाहते कि हमारी वजह से अच्छा हो जाए....यह तो चाहते हैं कि हमारे लिए अच्छा हो जाए पर यह कभी नहीं चाहते कि सबके लिए अच्छा हो जाए....

दलित राजनीति की त्रासदी

-एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

हाल के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वर्तमान दलित राजनीति विफल हो गयी है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है जिसकी मुखिया मायावती चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले तक प्रधान मंत्री बनने की इच्छा ज़ाहिर कर रही थी. परिणाम आने पर बसपा केवल दस सीटें ही जीत सकी जबकि चुनाव में महागठबंधन मोदी को हराने का दावा कर रहा था. यद्यपि बसपा की दस सीटों की जीत पिछले चुनाव की अपेक्षा एक अच्छी उपलब्धि  मानी जा सकती है परन्तु महागठबंधन के चुनावी परिणामों ने इसकी विफलता भी दिखा दी है.

1.6.19

अम्बेडकरनगर में ‘आधार’ बनवाने के लिए भटकते लोग

आधार और आधार कार्ड तथा उसमें अंकित नम्बर का महत्व जिस किसी को अच्छी तरह से न मालूम हो वह भारत देश के सूबे उत्तर प्रदेश के जनपद अम्बेडकरनगर में आ जाए.......जी हाँ बात सोलह आने सच है। हर छोटे-बड़े कार्य में आधार की उपयोगिता होती है। इसके चलते आधार बनाने वाले लोगों द्वारा जिले की जनता का भरपूर धनादोहन किया जा रहा है। पहले जब निजी क्षेत्रों में आधार बनाने का कार्य होता था तब लोग आसानी से आधार निर्माण केन्द्रों पर 10, 20, 50 रूपए खर्चने के बाद बहुउद्देश्यीय उपयोगार्थ आधार बनवाने में सफलता प्राप्त कर लेते थे, परन्तु अब आधार बनाने का जिम्मा निजी क्षेत्रों के जनसेवा केन्द्रों के बजाय किसी ऐसी कम्पनी को दे दिया है जो बीते वर्ष से अब तक आधार निर्माण में कम और धन कमाने में ज्यादा रूचि ले रही है।

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री के जिले का सदर अस्पताल सड़ चुका है....

बिहार के सीवान सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में खून नहीं के बराबर है। इसको लेकर सीवान के ब्लड डोनर और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर मुहिम भी छेड़ी है। इसी के तहत दिल्ली स्थित आजतक न्यूज चैनल के सीनियर पत्रकार दीपक कुमार ने भी चिंता जाहिर की है। दीपक कुमार ने अपने आॅफिशियल फेसबुक पेज पर लिखा—

जो मोदी की कसौटी पर था खरा, उसे ही मिला गाड़ी-बंगला!

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्रचंड जीत के बल पर केन्द्र में एक बार फिर मोदी सरकार ने शपथ ले ली है। 80 में से 64 सीटें बीजेपी गठबंधन को मिलना किसी करिश्में से कम नहीं था,इस लिए राजनैतिक पंडितो को लग रहा था कि इस बार मोदी मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश के मंत्रियों की संख्या और अधिक बढ़ सकती है,लेकिन मोदी और शाह क्या और किसी दिशा में सोचते हैं, कोई नहीं जानता। इसी लिए तो यूपी का प्रतिनिधित्व बढ़ना तो दूर राज्य के मंत्रियों की संख्या कम ही हो गई।

संगोष्ठी का आयोजन कर गाजीपुर में भी मनाया गया पत्रकारिता दिवस



गाजीपुर। हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर बृहस्पतिवार को पत्रकार प्रेस परिषद के तत्वाधान में एक संगोष्ठी का आयोजन जिला मुख्यालय स्थित कैंप कार्यालय पर किया गया। संगोष्ठी में जनपद के विभिन्न अंचलों से आए पत्रकारों ने 'पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान एवं चुनौतियों' पर प्रकाश डाला। गाजीपुर के वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्र ने पत्रकारिता के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कर्तव्य एवं कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्रकार को अध्ययनप्रिय एवं कर्तव्यनिष्ठ होना जरूरी है।

हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारों को पक्षकार न बनने की नसीहत

बघौली। गुरूवार को सुन्नी गांव में भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा हिन्दी पत्रकारिता दिवस का आयोजन किया गया। जिसमें जिला उपायुक्त राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की मौजूदगी के साथ वरिष्ठ शहरी और ग्रामीण पत्रकार समाजसेवी व पत्रकारिता के समर्थक मौजूद रहे। नन्हें-मुन्ने बच्चों ने पत्रकारिता को समर्पित स्वरचित रचना का पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकारों का माल्यार्पण कराने के साथ ही उपहार देकर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में जिले के दूरस्थ इलाकों के अलावा उन्नाव जिले से आए पत्रकारों ने आयोजन को सराहा।

हिंदी का प्रथम दैनिक समाचार पत्र 'सुधा वर्षण' भी कलकत्ता से 1854 में प्रारम्भ हुआ

साथियों,

आज 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है।  इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की विभिन्न राज्य इकाइयों ने आज जोर शोर से हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया। यह दिवस हमें न केवल अपने इतिहास की याद दिलाता है अपितु यह एक ऐसा अवसर है जब हम इसकी दशा और दिशा पर विचार करते हैं। हिंदी के प्रथम समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन आज ही के दिन अहिन्दी भाषी राज्य बंगाल की राजधानी कलकत्ता से 1826 में हुआ था।

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर प्रेस क्लब इटावा ने वरिष्ठ पत्रकारों और साहित्कारों को किया सम्मानित


इटावा । हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर आज प्रेस क्लब इटावा के तत्वाधान मे प्रेस क्लब भवन मे वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारो का सम्मान किया गया। प्रेस क्लब भवन, इटावा मे संपन हुए हिंदी पत्रकारिता दिवस के आयोजन मे जिला सूचना अधिकारी मातादीन मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

ब्रज प्रेस क्लब व उपजा के तत्वावधान में आयोजित हुआ पत्रकारिता दिवस समारोह


पत्रकार महेश की स्मृति में रखा जायेगा मार्ग का नाम, ब्रज प्रेस क्लब की जमीन को बोर्ड से रिन्युअल करायेंगे मेयर
पत्रकारिता दिवस आत्म चिंतन का दिवस: जिलाधिकारी
पत्रकारों के हर संघर्ष में साथ रहूंगा: हेमंत तिवारी

भाजपा विधायक पूरन प्रकाश व कारिंदा सिंह बोले- पत्रकारों के सम्मान में नहीं आने देंगे कमी

मथुरा। ब्रज प्रेस क्लब एवं उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के तत्वावधान में होटल ब्रजवासी रॉयल में पत्रकार संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें वक्ताओं ने पत्रकारिता की आगे दिशा-दशा क्या होगी तथा वर्तमान में पत्रकारिता एक चुनौती पूर्ण कार्य विषय पर विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारंभ उप्र मान्यता प्राप्त संवाद समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी, जिलाधिकारी सर्वज्ञ राम मिश्र, महापौर डा.मुकेश आर्यबंधु, वरिष्ठ पत्रकार आईएफडब्ल्यूजे के सचिव सिद्धार्थ कालहंस, उप्र वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष, भास्कर दुबे, सचिव राजेश मिश्रा, महामंडलेश्वर डा.अवेशेषानंद महाराज, भाजपा विधायक पूरन प्रकाश, भाजपा विधायक ठा.कारिंदा सिंह, क्षेत्राधिकारी राकेश सिंह, समाजसेवी पवन चतुर्वेदी, रामलीला कमेटी के अध्यक्ष सेठ जयंती प्रसाद अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर किया।

30.5.19

राष्ट्र निर्माण में हिंदी पत्रकारिता की अहम् भूमिका



जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल  विश्वविद्यालय के कुलपति सभागार में गुरुवार को हिंदी पत्रकारिता  दिवस के अवसर पर राष्ट्र निर्माण में हिंदी पत्रकारिता   का योगदान विषयक  संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सुंदरलाल ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 30 मई 1826 में उदंत मार्तंड ने  हिंदी पत्रकारिता की ऐसी  ज्योति जलाई जो स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में ज्वाला बनकर फूटी। उन्होंने कहा हमनें स्वयं अपने दौर में दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी  पत्रिकाओं से ज्ञान अर्जित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता सेवा भाव से होना चाहिए इसका दुरुपयोग घिनौना अपराध है।  आज हमें  इस बात पर चिन्तन करना चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता सही दिशा में गतिमान रहे। 

ब्रांड मोदी ने विपक्ष को घुटने पर बिठाया

दिनेश दीनू
मोदी है तो मुमकिन है। आएगा तो मोदी ही। और फिर मोदी ने जनमत के हथियार से विपक्ष के वोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी, वह भी उनके गढ़ों में घुसकर। जीत के बाद मोदी का पहला जो ट्वीट आया, उसमें उन्होंने कहा कि सबका साथ+सबका विकास+सबका विश्वास= विजयी भारत। मोदी अपनी चुनावी सभाओं और रैलियों में लगातार कहते रहे कि 2019 का आम चुनाव देश की जनता लड़ रही है। इसी बात पर उनका ट्वीट मोहर लगा रहा है। 2019 का चुनाव मोदी चुनाव रहा।

कुत्ता काटे तो मनपा दे पीड़ित को मुवावजा!

वसई में आवारा  कुत्तों का आतंक चल रहा है । हालाकि कई बार इसकी शिकायत महानगर पालिका के अधिकारियों को की है पर इसका निराकरन नहीं होता । कुत्ते काटने का इंजेक्शन लेने के लिए पीड़ित महानगर पालिका के अस्पताल में ही जाता है क्योंकि वहाँ इसका मुफ्त इलाज होता है ,पूरे आंकड़े महानगर पालिका को मिलते है कि रोजाना कितने लोगों को कुत्ते काटते है पर विभाग सुस्त है।

दलित राजनीति को डॉ. आंबेडकर से सीखना चाहिए

एस. आर. दारापुरी
डॉ. आंबेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने ही सब से पहले दलितों के लिए राजनैतिक अधिकारों की लडाई लड़ी थी. उन्होंने ही भारत के भावी संविधान के निर्माण के सम्बन्ध में लन्दन में 1930-32 में हुए गोलमेज़ सम्मलेन में दलितों को एक अलग अल्पसंख्यक समूह के रूप में मान्यता दिलाई थी और अन्य अल्पसंख्यक मुस्लिम, सिख, ईसाई की तरह अलग अधिकार दिए जाने की मांग को स्वीकार करवाया था. 1932 में जब “कम्युनल अवार्ड” के अंतर्गत दलितों को भी अन्य अल्पसंख्यकों की तरह अलग मताधिकार मिला तो गाँधी जी ने उस के विरोध में यह कहते हुए कि इस से हिन्दू समाज टूट जायेगा, आमरण अनशन की धमकी दे डाली जब कि उन्हें अन्य अल्पसंख्यकों को यह अधिकार दिए जाने में कोई आपत्ति नहीं थी. अंत में अनुचित दबाव में मजबूर होकर डॉ. आंबेडकर को गांधी जी की जान बचाने के लिए “पूना पैकट” करना पड़ा और दलितों की राजनैतिक स्वतंत्रता के अधिकार की बलि देनी पड़ी तथा संयुक्त चुनाव क्षेत्र और आरक्षित सीटें स्वीकार करनी पड़ीं.

29.5.19

हे बाबा राहुल, हे दीदी प्रियंका.... हम कांग्रेसियों की अरज भी सुन लो....

अमितेश अग्निहोत्री

हे बाबा राहुल आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। त्यागपत्र देने का विचार आपके मन में आया भी कैसे। हम सभी कांग्रेसियो का जीवन आपका चरणामृत पी-पी कर पुष्ट हुआ है। आपकी पट्टेचाटी करने मात्र से हमारे शरीर में मिनरल और विटामिन की कमी का अहसास नही होता , इससे हमें ऊर्जा प्राप्त होती है। हे राजमाता सोनिया जी अपने पुत्र को समझाईये। सत्ता तो आती जाती रहती है मगर इससे आपके राजपरिवार के दर्जे पर कभी असर पड़ सकता है क्या।

पुण्यतिथि पर विशेष : किसानों के सबसे बड़े चौधरी थे चरण सिंह

CHARAN SINGH RAJPUT समाजवादी सत्ता की नींव में जहां डॉ. राममनोहर लोहिया का खाद-पानी स्मरणीय है वहीं पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जाति तोड़ो सिद्धांत व उनकी स्वीकार्यता भी अहम बिन्दु है। चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि पर समाजवाद सरोकार में उनके जैसे खांटी नेताओं की याद आना लाजमी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश की सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस के विरुद्ध सशक्त समाजवादी विचारधारा की स्थापना का श्रेय भले ही डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण को जाता हो पर  उत्त प्रदेश में समाजवादी पार्टी के रहनुमा जिस पाठशाला में राजनीति का ककहरा सीख कर आए हैं, उसके आचार्य चरण सिंह रहे हैं। यहां तक कि हरियाणा और बिहार के समाजवादियों को भी चरण सिंह ने राजनीतिक पाठ पढ़ाया। यह उनकी नीतियों से भटकना ही रहा कि न केवल उनकी विरासत को संभाल रहे उनके पुत्र अजित सिंह और पौत्र जयंत सिंह की राजनीतिक दुर्गति हुई बल्कि बिहार में लालू प्रसाद यादव और हरियाणा में देवीलाल की राजनीतिक विरासत को ग्रहण लग गया। जिस दिन समाजवादियों ने चौधरी चरण सिंह की ईमानदारी, किसानों के प्रति वफादारी को अपना लिया उस दिन वे फिर से खड़े होने शुरू हो जाएंगे।

लघुकथा : डर

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी “उसके मानसिक रोग का उपचार हो गया।” चिकित्सक ने प्रसन्नता से केस फाइल में यह लिखा और प्रारंभ से पढने लगा। दंगों के बाद उसे दो रंगों से डर लगने लगा था। वो हरा रंग देखता तो उसे लगता कि हरा रंग भगवा रंग को मार रहा है और इसका उल्टा भी लगता।

लघुकथा : मृत्यु दंड

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी हज़ारों वर्षों की नारकीय यातनाएं भोगने के बाद भीष्म और द्रोणाचार्य को मुक्ति मिली। दोनों कराहते हुए नर्क के दरवाज़े से बाहर आये ही थे कि सामने कृष्ण को खड़ा देख चौंक उठे, भीष्म ने पूछा, "कन्हैया! पुत्र, तुम यहाँ?"

लघुकथा : वैध बूचड़खाना

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
सड़क पर एक लड़के को रोटी हाथ में लेकर आते देख अलग-अलग तरफ खड़ीं वे दोनों उसकी तरफ भागीं। दोनों ही समझ रही थीं कि भोजन उनके लिए आया है। कम उम्र का वह लड़का उन्हें भागते हुए आते देख घबरा गया और रोटी उन दोनों में से गाय की तरफ फैंक कर लौट गया। दूसरी तरफ से भागती आ रही भैंस तीव्र स्वर में रंभाई, “अकेले मत खाना इसमें मेरा भी हिस्सा है।”

लघुकथा : अदृश्य जीत

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी जंगल के अंदर उस खुले स्थान पर जानवरों की भारी भीड़ जमा थी। जंगल के राजा शेर ने कई वर्षों बाद आज फिर खरगोश और कछुए की दौड़ का आयोजन किया था।

लघुकथा : बहुरूपिया

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
उस नामी प्रदर्शनी के बाहर एक बड़ी चमचमाती आधुनिक कार रुकी। चालक बाहर निकला और पीछे का दरवाज़ा खोला, अंदर से एक सूटधारी आदमी उतरा। वहीँ कुछ दूर एक भिखारी बैठा हुआ था, वह आदमी उस भिखारी के पास गया और जेब से नोटों का एक पुलिंदा निकाल कर बिना गिने उसमें से कुछ नोट भिखारी की कटोरी में डाल दिए। भिखारी सहित कई व्यक्ति उसकी दरियादिली देख कर चौंक गए।

लघुकथा : जानवरीयत

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
वृद्धाश्रम के दरवाज़े से बाहर निकलते ही उसे किसी कमी का अहसास हुआ, उसने दोनों हाथों से अपने चेहरे को टटोला और फिर पीछे पलट कर खोजी आँखों से वृद्धाश्रम के अंदर पड़ताल करने लगा। उसकी यह दशा देख उसकी पत्नी ने माथे पर लकीरें डालते हुए पूछा, "क्या हुआ?"

28.5.19

विपक्ष क्यों हारा? मोदी क्यों जीते?

विनीत नारायण

विपक्ष के किसी नेता को इतनी बुरी हार का अंदाजा नहीं था। सभी को लगता था कि मोदी आर्थिक मोर्चे पर और रोजगार के मामले में जिस तरह जन आंकाक्षाओं पर खरे नहीं उतरे, तो आम जनता में अंदर ही अंदर एक आक्रोश पनप रहा है, जो विपक्ष के फायदे में जाऐगा। मोदी के आलोचक राजनैतिक विश्लेषक मानते थे कि मोदी की 170 से ज्यादा सीटें नहीं आऐंगी। हालांकि वे ये भी कहते थे कि मोदी लहर, जो ऊपर से दिखाई दे रही है, अगर वह वास्तविक है, तो मोदी 300 से ज्यादा सीटें ले जाऐंगे।

अमर उजाला के जिला प्रभारी ने दलित पत्रकारों की यूनियन बनाने की शुरुआत की


यूपी के एक जिले में अमर उजाला के जिला प्रभारी दलित समुदाय के हैं. जिले में अपने पैर जमाने के बाद इन महोदय ने पिछले दिनों विभिन्न संस्थानों के दलित पत्रकारों के साथ गोपनीय मीटिंग की. सभी को अहसास कराया कि हम सब एक हैं और सवर्ण पत्रकारों से डरने की जरूरत नहीं है.

22.5.19

दिल के बड़े गरीब हैं न्यूज़ चैनल के मालिकान, खा जाते हैं स्ट्रिंगर के हक का पैसा

देश में एक से बढ़कर  न्यूज चैनलों ने दस्तक दी और एक से बढ़कर एक टैग लाइन के साथ मीडिया के क्षेत्र में  प्रवेश किया| लोगों ने बड़ी उम्मीद के साथ नए चैनलों का साथ पकड़ा की उन्हें अपनी मेहनत का पैसा मिलेगा लेकिन यह उम्मीद बस उम्मीद बन कर रह गई|

चिरकुट मैनेजमेंट खा जाता है पत्रकारों के खून-पसीने का वेतन!

आखिर कहां चली जाती है उन मीडिया हाउस के मैनेजमेंट की मानवता जो हमेशा समाज के हित के लिए निष्पक्ष होकर चैनल या अख़बार खोलते हैं। कहने और बताने में बहुत ही अच्छा लगता है कि मैं पत्रकार हूं।  लेकिन अपने दिल से  पूछिए जरा दिनभर की थक हारकर जब घर वापस आते हो क्या गुजरती होगी? देश में लगातार न्यूज चैनल खुलते जा रहे हैं। पत्रकारों को रोजगार मुहैया कराने के लिए। लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है? इसे जानना बेहद जरूरी है।

मामूली सिरदर्द को न करें नजरअंदाज

लखनऊ : सिरदर्द एक बहुत ही आम समस्या है, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति में हो सकती है, लेकिन महिलाओं में यह परेशानी ज्यादा देखने को मिलती है। सिरदर्द तनाव, चिंता व माइग्रेन जैसी मेडीकल समस्या का भी संकेत हो सकता है। कुछ प्रमुख सिरदर्द ब्रेन ट्यूमर का परिणाम हो सकते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्लू एच ओ) के अनुसार, विश्व की आधी आबादी बार-बार सिरदर्द का अनुभव करती है।

वरिष्ठ पत्रकार रतन अग्रवाल की पुत्री ने जिले में लाया 7वाँ स्थान


Yudhishthir Mahato
सिन्दरी । मैट्रिक परीक्षा 2019 में एक के बाद जिले के छात्राओं की मेहनत सामने आ रही है। समाज में बेटियां साबित कर रही हैं कि वे भी बेटों से कम नहीं हैं। जो बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहते हैं, उनके लिए ऐसी खबरें प्रेरणादायक हैं। आपको बता दें कि सिन्दरी के वरिष्ठ पत्रकार रतन कुमार अग्रवाल की द्वितीय सुपुत्री श्रेया अग्रवाल ने सिन्दरी में प्रथम स्थान व जिला में 9वाँ स्थान प्राप्त कर सिन्दरी का नाम रोशन किया है।

चुनाव आयोग की नीयत में खोट!

चुनाव आयोग भी रूल 49MA  के तहत यह स्वीकार करती है कि ईवीएम में खराबी हो सकती है और मतदाता ने अपना मत जिस राजनीति पार्टी को दिया है उसे ना जाकर किसी ओर राजनीति दल को जाने पर क्या करना होगा इसकी व्यवस्था की है। परन्तु जिन-जिन जगहों से ऐसी शिकायतें आई उसे दबाने का काम आयोग की भूमिका पर फिर एक नया प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। 

सावधान! छतीसगढ़ और उत्तराखंड में ब्लैकमेलर गैंग ‘तहलका इंडिया न्यूज़’ सक्रिय है!



चोर चोर ही रहता है चाहे कोई भी लबादा पहन ले। कुछ ऐसा ही हाल अनुज अग्रवाल नाम के इस ब्लैक मेलर से जर्नलिस्ट बने और ‘तहलका इंडिया न्यूज़’ नाम का फ़र्ज़ी चैनल चलाने वाले इस शातिर क़िस्म के आदतन अपराधी का। नाम तहलका तो हैरान मत हॉ ये तेजपाल वाला नहीं है बल्कि फ़र्ज़ी और नक़ली है। जिसका लोगों भी इसने चुरा लिया और साथ ही टाइम्ज़ के ’T’ का पेटरन भी पर इस बेशर्म को अभी तक किसी ने नोटिस नहीं दिया। ये आजकल दोनो स्टेट के चक्कर लगा रहा है ताकि अपने वसूली के धंधे को आगे बड़ा सके।

दैनिक जनवाणी: गजब का प्रसार, मेरठ के रोहटा इलाके में सिर्फ तीन प्रतियां बिकती हैं

रोहटा (मेरठ) : खबरें नहीं होगी तो पाठक अखबार पढ़ कर क्या करेगा पाठकों को उनके आसपास की खबरें पढ़ने को जब तक ना मिले उनका दिल नहीं लगता। और मजे की बात तो यह है कि जब पाठक जानते हो कि वास्तव में क्या हुआ है, और अखबार में क्या छपा है, तो सरकुलेशन तो घटेगा ही। यही हाल है रोहटा में दैनिक जनवाणी अखबार का । यहां ना तो कोई रिपोर्टर है और ना ही सरकुलेशन की जिम्मेवारी संभालने वाला कोई अधिकारी।

Was Keeping Space Blank by The Telegraph Justified?


We are inviting the opinion/ suggestion of all journalists on an issue related to the profession of journalism so that the matter can be sent for the consideration of the Press Council of India to decide the limit of the freedom of speech and expression as enshrined in the Constitution of India although the Council should have taken up this issue suo muto. The background of this letter is that on 18th May, the Telegraph, an important newspaper from Calcutta, kept a few columns space blank on the top of the first page saying that it will be filled up when the Prime Minister speaks anything in the Press Conference.

ऐसे विपक्ष से सत्ता परिवर्तन की बात सोचना बेमानी

CHARAN SINGH RAJPUT
जो एग्जिट पोल के झूठे होने की उम्मीद लगाए बैठेे हैं। वे जमीनी हकीकत को समझें। विपक्ष के कई नेता भी मोदी और अमित शाह के डर से एक तरह से भाजपा का ही साथ दे रहे थे। मुलायम सिंह यादव का संसद में विपक्ष के हारने की बात कहते हुए मोदी के फिर से प्रधानमंत्री बनने की कामना करने को क्या कहा जाएगा। 2013 में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले का चुनाव में गर्माना और एग्जिट पोल भाजपा के पक्ष में आते ही उन्हें क्लीन चिट मिल जाने को क्या कहोगे।

21.5.19

सैकड़ों करोड़ की संपत्ति जुटाने के आरोप से मुलायम और अखिलेश को सीबीआई ने 12 साल बाद दी क्लीनचिट

जेपी सिंह
आय से अधिक संपत्ति मामले में सपा संस्थापक और सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव को राहत मिली है। सीबीआई ने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को क्लीनचिट दे दी है। जांच एजेंसी ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय  में हलफनामा दाखिल कर इसकी जानकारी दी। केंद्रीय जांच एजेंसी ने कहा कि उसने 7 अगस्त 2013 को मामले की जांच बंद कर दी थी। उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे पिता-पुत्र के खिलाफ मामला दर्ज कराया जा सके।

व्यंग्य : पत्रकारिता करते-करते हम इतने कमजोर हो जाएंगे, यह पहली बार एहसास हुआ...

शंभु चौधरी 

हाँ! तो मैं सोच रहा था कि कोई "स्टार्टअप इंडिया " के अंतर्गत नया करोबार कर लिया जाए। पत्रकारिता करते-करते हम इतने कमजोर हो जाएंगे यह पहली बार एहसास हुआ। दिमाग जिस तेजी से सड़को पर समाचार चुनने में, लिखने में काम कर रहा था वह रोजगार खोलने के नाम पर पूरा रूह ही कांपा दिया। दिमाग के परचे-परचे उखड़-उखड़ कर हाथ में आने लगे।  

14.5.19

माया को पीएम बनाने वाले मुद्दे पर अखिलेश ने मोदी के कारण लिया यूटर्न!

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जबर्दस्त यूटर्न लेकर अब यूपी से ही नया पीएम आयेगा की जगह कहने लगे हैं कि बसपा सुप्रीमों मायावती को प्रधानमंत्री बनता देख मुझे खुशी होगी। पांच चरणों के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद की पंसद के लिए अखिलेश की जुबान पर अगर खुलकर बसपा सुप्रीमों मायावती का नाम आता है तो यह अप्रत्याशित नहीं, उनकी सियासी मजबूरी है। इसी तरह की मजबूरी अखिलेश 2017 के विधान सभा चुनाव में भी (जब कांगे्रस के साथ उनका गठबंधन हुआ था) दिखा चुके थे, तब उन्होंने कहा था कि वह तो सीएम के लिए हैं जब पीएम का चुनाव होगा तो राहुल गांधी ही इसके हकदार होंगे,लेकिन दो बरस के भीतर ही  अखिलेश की पीएम की पसंद मायावती बन गई हैं।

महल सी चमचमाती मस्जिदें और उजड़ी क़बरों से घरों में क़ैद करवटें बदलता मुस्लमान

बीते कुछ वर्षों से मैं यह देख रहा हूं कि मस्जिदों के निर्माण में काफ़ी परिवर्तन सा आता जा रहा है. यह बदलाव केवल मैंने अपने शहर में ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के जिस भी शहर के मुस्लिम क्षेत्रों में गया,वहां यह परिवर्तन देखने को मिला.पुरानी मस्जिदों को तोड़कर उनके आधारभूत ढ़ाचे को पूरी तरह किसी आलीशान इमारत जैसा बना देना.किसी नई मस्जिद का निर्माण करना, तो किसी आलीशान महल की तरह.

13.5.19

न्यू मीडिया भारत में लोकतंत्र की नई किरण

न्यू मीडिया का यह प्रयोग कम लागत में कोई भी शुरू कर सकता है बस उसके अंदर कार्य करने का ज़ज़्बा होना चाहिये जो सत्य के साथ अपने विचारों को आज भी बिना की किसी ख़ौफ़ और डर के रख सके।  भारत में लोकतंत्र की नई किरण देखने में  भले ही आज छोटी लगती हो पर जब चारों तरफ बाढ़ आ जाती है तो लोग खुद को बचाने के लिये अपने साथ एक दीया साथ रख लेते हैं जो रात के अंधेरे में ही उनके जिंदा रहने का सबूत दुनिया को बता देती है।

11.5.19

चुनाव आयोग को इस चुनाव में अफसरों की शिकायत / ट्रान्सफर की जानकारी नहीं

निर्वाचन आयोग की जन सूचना अधिकारी हरजीत कौर द्वारा लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को दी गयी सूचना के अनुसार आयोग को लोक सभा चुनाव 2019 के दौरान अधिकारियों के खिलाफ आई शिकायतों तथा ट्रान्सफर के संबंध में कोई जानकारी नहीं है.

संकट में है गौरैया


बचपन से देखता आ रहा हूं मेरी मां गौरेया को आटे की नन्हीं नन्हीं गोलियां बनाकर देती है और एक एक कर गौरैया का झुंड मेरे घर की दालान में इकट्ठा हो जाता था और इन आटे को अपना भोजन बनाता था। मेरी भुआ ने हम भाई बहनों को गौरैया का झूठा पानी ये सोच कर कईं बार पिलाया है कि हम भी इनकी भांति चहचहाते रहे और आबाद रहें। बरसों हम भाई बहनों ने इनके लिए घौंसले बनाए हैं और इनके जमीन पर गिरे अंडों को बिना हाथ लगाए वापस घौसलों में रखा है। घर के आंगन में लगे कांच पर जब ये गौरैया अपनी चोंच मारती तो ऐसा लगता जैसे दो पक्षी आपस में लड रहे हो और मां आकर उस कांच पर कोई पर्दा डाल देती ताकि इसकी चोंच को नुकसान न हो।

विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए चार पत्रकारों का चयन

भोपाल। विकास और जनसरोकारों के मुद्दे पर रिपोर्टिंग और शोध के लिए दी जाने वाली विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के तहत चार पत्रकारों का चयन किया गया है। वर्ष 2019 के लिए दैनिक भास्कर भोपाल के हरेकृष्ण दुबोलिया, द वायर  ग्वालियर से जुड़े दीपक गोस्वामी, धार की स्वतंत्र पत्रकार एकता शर्मा और भोपाल के स्वतंत्र पत्रकार मनीष चंद्र मिश्र शामि‍ल हैं। फैलो का चयन वरिष्ठ संपादकों की एक चयन समिति ने किया। फैलोशिप के तहत सभी फैलो को 84 हजार रुपए की सम्मान राशि दी जाएगी।

10.5.19

मांछे तेल तिके मांछ भाजा होबे!

बंगाल में एक कहावत है - ‘‘मांछे तेल तिके मांछ भाजा होबे’’ कहने का अभिप्राय है कि पत्रकारों को उसकी कमज़ोरी से मारा जाए। जो पत्रकार पैसे से बिक जायेगा उसे पैसे से खरीद लिया जाता है, जो नहीं बिके उसे धमकाया या उसके मालिकों को डराया जाता है। विज्ञापन का प्रलोभन या उसे हटा देने की धमकी से मीडिया हाउस ना सिर्फ परेशान हो चुकी है लाचार भी है।  

पूर्वांचल : सियासी बयार अंतिम पड़ाव पर

अजय कुमार, लखनऊ
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आखिरी दो चरणों में 12 और 19 मई को पूर्चांचल की 27 सीटों (छठे में 14 और सातवें चरण 13) पर मतदान होना हैं। पूर्वांचल में इन दिनों पश्चिमी यूपी, बुंदेलखंड व अवध के नेताओं की बाढ़ सी आ गई है। किसी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी संसदीय सीट पर भेजा गया है तो कोई अखिलेश यादव के चुनाव क्षेत्र आजमगढ़ के ग्रामीण इलाकों की खाक छान रहा है। यूपी ही नहीं, दूसरे प्रदेशों के नेताओं ने भी पूर्वांचल में डेरा डाल दिया है। योगी के प्रभाव वाली गोरखपुर संसदीय सीट पर भी लोगों की नजर लगी है। कांगे्रस ने प्रियंका वाड्रा को पूर्वांचल की जिम्मेदारी सौंपी थी,इस चरण में उनकी सियासी ताकत का अंदाजा भी हो जाएगा। आखिरी दो चरण के चुनावों की 27 सीटों में से 24 सीटों पर भाजपा गठबंधन और तीन सीटों पर सपा काबिज है। सपा ने उप-चुनाव में फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट बीजेपी से हथिया ली थी,जबकि आजमगढ़ से 2014 में मुलायम जीते थे।

इलैक्ट्रोमैग्रेटिक तरंगों से कैंसर का इलाज


उमेश कुमार सिंह

कई बार अथक प्रयास करने के बाद भी ट्यूमर जैसे रोगों का निवारण नामुमकिन हो जाता है. आज इक्कीसवीं सदी में भी हम ऐसे रोगों का उपचार नहीं खोज पाए हैं. ऐसे रोगों से ग्रस्त मरीज सभी प्राकर के कैंसरों को असाध्य मानकर तब तक डाक्टर के पास नहीं जाते जब तक रोग बहुत बढ़ न जाए. कहीं न कहीं उनके मन में कैंसर के प्रति डर तो होता है लेकिन साथ ही वे अभी तक उपलब्ध कैंसर से लडने वाली सभी उपचारों के दुष्प्रभावों को लेकर भी चिंतित रहते हैं. अब कई अध्ययनों और ट्रायलों से यह साफ हो चुका है कि साइटोट्रोन चिकित्सा की मदद से किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता और बेहद कम समय मेें कैंसर से छुटकारा पाया जा सकता है. इससे मरीज का डर कम हो जाता है. लुधियाना स्थित सिबिया मेडिकल सेंटर के निदेशक डा. एस.एस. सिबिया का कहना है कि जितनी जल्दी कैंसर का निदान किया जाए और उसका उपचार शुरु कराया जाए, उतनी ही जल्दी कैंसर से छुटकारा पाया जा सकता है. इसके सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करने के लिए इस रोग का निदान होते ही नियमित उपचार आवश्यक है. साइटोट्रोन थैरेपी क्लीनिकली प्रमाणित की हुई एक ऐसी शल्य रहित प्रक्रिया है जिससे कैंसर की बढ़त को रोका जा सकता है और कैंसर के मरीजों की जिंदगी को सुधारा जा सकता है.

9.5.19

DECENTRALISE CENTRAL GOVT. TO REDUCE DELHI’S AIR POLLUTION & CONGESTION

Azad Bharatam, a new liberal political party, has demanded that all central ministries, departments and constitutional authorities be shifted out of Delhi and relocated to all other states and union territories of the country in order to reduce the capital’s population by 30 lakh so that the toxic air pollution and congestion could be brought within the tolerable limits. It made an exception for the parliament, Rashtrapati Bhawan, the PMO, ministry of external affairs and the constitutional bench of the supreme court of India which could stay in Delhi.

1.5.19

मुख्य न्यायाधीश यौन उत्पीडन मामले में पीड़िता बोली- जिस तरह से हो रही सुनवाई, उससे नहीं लगता कि मुझे न्याय मिल पाएगा

जे.पी.सिंह

जिस तरह से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के मामले की जिस तरह से सुनवाई की जा रही है, उससे नहीं लगता कि मुझे  न्याय मिल पाएगा।साथ ही मुझे  ‘डर’ भी लगता है।मुझे मौखिक तौर पर ये निर्देश दिए गए कि मैं मीडिया के सामने समिति की सुनवाई से संबंधित कोई बात ना रखूं और ना ही इसके बारे में मेरे वकील वृंदा ग्रोवर को कुछ बताऊं।यह संगीन आरोप लगाते हुये यौन उत्पीड़न पीड़ित महिला ने कहा है कि अब वह इस मामले में सुनवाई के लिए आतंरिक समिति के सामने पेश नहीं हो पाएगी, क्योंकि उसे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है।इसके साथ ही इस मामले मेंनात्कीय मोड़ आ गया है।महिला ने मामले की सुनवाई कर रही जजों की समिति पर सवाल खड़े किए हैं। महिला ने समिति पर यौन उत्पीड़न अधिनियम के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। साथ ही महिला ने अब समिति के सामने पेश नहीं होने का फैसला किया है।

राफेल पर सुनवाई टालने की मांग खारिज, मोदी और शाह के खिलाफ याचिका पर मांगा जवाब, चुनाव आयोग ने पीएम को दी क्लीन चिट

जे.पी.सिंह

उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को तीन हाईप्रोफाइल मामलों की सुनवाई हुई जिसमें राहुल ने उच्चतम न्यायालय  के हवाले 'चौकीदार चोर है' कहने के लिए उच्चतम न्यायालय से माफ़ी मांग ली है । केंद्र सरकार  द्वारा  राफेल पर सुनवाई को करीब 4 हफ्ते के लिए टालने  के अनुरोध को अस्वीकृत करते हुये उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केंद्र को अपना जवाब शनिवार तक देना होगा। इसके साथ ही न्यायालय ने अगली सुनवाई के लिए सोमवार की तारीख तय की। कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव की ओर से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह के खिलाफ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत पर उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है।इस बीच चुनाव आयोग ने पीएम नरेंद्र मोदी को सेना के नाम पर वोट मांगने के आरोपों पर क्लीन चिट दे दिया  है। आयोग ने कहा है कि पीएम मोदी ने आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया।

30.4.19

एक मई मजदूर दिवस यानि मजदूरों के सम्मान की सवा सौ साल पुरानी परम्परा

संजय सक्सेना, लखनऊ
एक मई-मजदूर दिवस पर विशेष... किसी भी देश की तरक्की उस देश के किसानों तथा कामगारों (मजदूर/कारीगर) पर निर्भर होती है। एक मकान को खड़ा करने और सहारा देने के लिये जिस तरह मजबूत “नीव” की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, ठीक वैसे ही किसी समाज,देश,उद्योग,संस्था,व्यवसाय को खड़ा करने के लिये कामगारों (कर्मचारियों) की विशेष भूमिका होती है। मजदूरों की विशेष भूमिका को सम्मान देने के लिए प्रत्येक वर्ष एक मई को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है। मजदूरों के बारे में चार लाईनों में समझना हो तो हम कह सकते हैं-      

मेहनत उसकी लाठी है,मजबूत उसकी काठी है,
हर बाधा वो कर देता है दूर, दुनिया उसे कहती है मजदूर।

बर्खास्त सैनिक तेज बहादुर यादव के बहाने मोदी के राष्ट्रवाद के नारे को भोथरा करेगी सपा

अजय कुमार, लखनऊ
वाराणसी। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी से अपना प्रत्याशी बदल दिया है। अब सपा पूर्व में घोषित अपनी प्रत्याशी शालनी यादव की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बीएसएफ के पूर्व जवान तेज बहादुर को वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से महागठबंधन उम्मीदवार के रूप में उतार रही है। बीएसएफ कांस्टेबल रहे तेजबहादुर को साल 2017 में सैनिकों को परोसे जाने वाले भोजन के बारे में शिकायत करते हुए एक वीडियो ऑनलाइन पोस्ट करने के बाद बर्खास्त कर दिया गया था, उन्होंने पहले ही कहा था कि वह वाराणसी से चुनाव लड़ेंगे।

उप्र लोक सेवा आयोग की भर्तियों में भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच कब कंप्लीट होगी

आदरणीय महोदय,

भारतीय जनता पार्टी ने उ0प्र0 विधान सभा चुनाव, 2012 के दौरान उ0प्र0 लोक सेवा आयोग की भर्तियों की जांच कराकर प्रतियोगियों को न्याय दिलाने के मुद््दे को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था। स्वयं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपनी चुनावी सभाओं में इस मुद््दे को उठाया था। श्री योगी आदित्यनाथ ने पांच साल की आयोग की भर्तियों की सी0बी0आई0 जांच के आदेश दिये जिसके बाद सी0बी0आई0 ने आयोग की अपर निजी सचिव (उ0प्र0 सचिवालय) परीक्षा-2010 में भ्रष्टाचार/अनियमिततायें बरतने की दिसम्बर, 2017 में लिखित पुष्टि की और काफी विलम्ब से जारी जांच के नोटीफिकेशन के उपरान्त सी0बी0आई0 मुख्यालय, नई दिल्ली में पी0ई0 दर्ज की है, लेकिन अभी तक अंतिम कार्यवाही नहीं हुई है।

मजदूरों का शोषण मानवता का उपहास

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस, 01 मई 2019 पर विशेष आलेख : हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मई महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को मई दिवस भी कहकर बुलाया जाता है। अमेरिका में 1886 में जब मजदूर संगठनों द्वारा एक शिफ्ट में काम करने की अधिकतम सीमा 8 घंटे करने के लिए हड़ताल की जा रही थी। इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात शख्स ने शिकागो की हेय मार्केट में बम फोड़ दिया, इसी दौरान पुलिस ने मजदूरों पर गोलियां चला दीं, जिसमें 7 मजदूरों की मौत हो गयी। इस घटना के कुछ समय बाद ही अमेरिका ने मजदूरों के एक शिफ्ट में काम करने की अधिकतम सीमा 8 घंटे निश्चित कर दी थी। तभी से अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 1 मई को मनाया जाता है। इसे मनाने की शुरुआत शिकागो में ही 1886 से की गयी थी। मौजूदा समय में भारत सहित विश्व के अधिकतर देशों में मजदूरों के 8 घंटे काम करने का संबंधित कानून बना हुआ है। अगर भारत की बात की जाए तो भारत में मजदूर दिवस के मनाने की शुरुआत चेन्नई में 1 मई 1923 से हुई।

लोकतंत्र में चुनाव उत्सव है जंग नहीं

यूं तो चुनाव मूलतौर से मानसिक स्तर पर एक द्वंद है। द्वंद इसलिए कि जब हम चुनाव करते हैं किन्हीं दो या दो से अधिक के बीच में यह समय निःसंदेह बड़ा ही कष्टकर होता है, पहले तो हम स्वयं से ही लड़ते हैं, अपने से अपनी प्रकृति के अनुसार। दूसरा अब लोकतंत्र में जनसेवा की भावना दफन हो चुकी है। हकीकत में हम केवल सेवा भाव का वचन, स्वप्न ही दिखाते हैं लेकिन, वस्तुतः होते नहीं है। वास्तव में सेवा की आड़ में अपना धंधा और मोटा पैसा बनाने के लिए ही राजनीति में आते हैं, तभी तो करोड़पति जन प्रतिनिधियों की संख्या में बेहताशा वृद्धि हुई है, फिर मुफ्त के पैसे का आनंद ही अलग है, अनूठा है, निराला है, आकर्षण है।

मज़दूर दिवस पर विशेष : न घर है न ठिकाना, बस चलते जाना है....

किसी भी देश के विकास में मज़दूरों की सबसे बड़ी भूमिका है. ये मज़दूर ही हैं, जिनके ख़ून-पसीने से विकास की प्रतीक गगनचुंबी इमारतों की तामीर होती है. ये मज़दूर ही हैं, जो खेतों में काम करने से लेकर किसी आलीशान इमारत को चमकाने का काम करते हैं. इस सबके बावजूद सरकार और प्रशासन से लेकर समाज तक इनके बारे में नहीं सोचता. बजट में भी सबसे ज़्यादा इन्हीं की अनदेखी की जाती है. सियासी दल भी चुनाव के वक़्त तो बड़े-बड़े वादे कर लेते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल जाते हैं. रोज़गार की कमी की वजह से लोगों को अपने पुश्तैनी गांव-क़स्बे छोड़कर दूर-दराज के इलाक़ों में जाना पड़ता है. अपने परिजनों से दूर ये मज़दूर बेहद दयनीय हालत में जीने को मजबूर हैं.

28.4.19

शार्प रिपोर्टर ने शुरू किया अपना आनलाईन वर्जन

एक दशक के सार्थक और जनसरोकारी पत्रकारिता के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्वी पट्टी का मीडिया समूह "शार्प रिपोर्टर" बदलते तकनीक और समाचार माध्यमों के दौर में अपना आनलाईन वर्जन शुरू किया है। इसके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स यूट्यूब पर @SHARP REPORTER ने एक दैनिक अपडेशन न्यूज़ चैनल (लिंक) https://youtu.be/ziWPjOMOmj8 शुरू किया है और एक वेबसाइट www.sharpreporter.in की भी नये कंटेंट और कलेवर में शुरूआत हुई है।

पांचवे चरण की 14 सीटों का पोस्टमार्टम : अवध की जमीं से बुंदेलों की धरती तक संघर्ष गाथा

 अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव का पांचवां चरण राज्य की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। इस चरण में सियासत का रंग लखनऊ और उसके आसपास के जिलों में सुर्ख होते दिखेगा। पाचवां चरण आते-आते राज्य को लू के थपेड़ों ने अपने आगोश में समेट लिया है। दिन में सड़के विरान होने लगी हैं। सूरज के ढलने के बाद यह विरानगी टूटती है। 06 मई को पांचवें चरण का मतदान होना है और इसी दिन से पवित्र रमजान के महीने की भी शुरूआत हो जाएगी। हो सकता है गरमी और रमजान के चलते मतदान का प्रतिशत थोड़ा कम रहे, इसी को ध्यान में रखते हुए मतदान कार्य से जुड़े और मतदान को बढ़ावा देने वाली संस्थाएं और जागरूक नागरिकों ने भी अपनी मुहिम तेज कर दी है ताकि अधिक से अधिक लोग मतदान करने के लिए पोलिंग बूथ पर पहुंचे।

अब संभव है हृदय रोगों का बिना सर्जरी इलाज

भारत में हृदय रोगियों की संख्या में हाल ही के कुछ वर्षों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। भारतीय चिकित्सकों के लिये यह एक गंभीर मुद्दा इसलिये भी है क्योंकि एंजाइना और अन्य हृदय रोगों के उपचार के लिये भारत में उपयोग की जाने वाली शल्य चिकित्सा काफी महंगी हैं तथा रोगी के शत प्रतिशत स्वस्थ होने की कोई गारंटी भी नहीं देती। सिबिया मेडिकल सेंटर के निदेशक एस.एस.सीबिया का कहना है कि बहरहाल दुनिया भर के हृदय रोगियों के लिये पिछले कुछ समय से विकसित की गई ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्सेशन) और एसीटी (आर्टरी कीलेशन थैरेपी) नामक गैर शल्य चिकित्सा पद्धति एक वरदान साबित हो रही है।

27.4.19

प्रियंका के वाराणसी से न लड़ने से बुआ-बबुआ को सबसे ज्यादा खुशी

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का जोश हाई है। वाराणसी में जिस तरह से विपक्ष और खासकर अपने आप को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली कांगे्रस ने हथियार डाले उससे बीजेपी को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है। कांगे्रस को इसका बढ़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है तो उधर, प्रियंका का वाराणसी से चुनाव नहीं लड़ना मायावती और अखिलेश गठबंधन के लिए राहत भरी खबर रही। प्रियंका अगर मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ती तो भले वह वाराणसी से चुनाव हार जाती, लेकिन पूर्वांचल की अन्य कई लोकसभा सीटों के कांगे्रस प्रत्याशियों को इसका जबर्दस्त फायदा मिलता,जिससे पूर्वांचल लोकसभा चुनाव प्रभारी होने के नाते प्रियंका का कद काफी बढ़ जाता। पूर्वांचल में प्रियंका के प्रभार वाली करीब चार दर्जन लोकसभा सीटें हैं, जिसमें एक आजमगढ़ की लोकसभा सीट को छोड़कर 2014 में भाजपा का सभी सीटों पर कब्जा रहा था। आजमगढ़ से सपा नेता मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते थे। इस बार आजमगढ़ से अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे है।

बहनजी को सीबीआई के जरिए फिर घेरने की तैयारी

सात सरकारी चीनी मिलों के बिक्री घोटाले में 7 लोगों के खिलाफ एफआईआर, मायावती सरकार को दौरान बेचीं गयी 21 चीनी मिलों का मामला, सरकारी खजाने को 1179 करोड़ रुपए का नुकसान

सीबीआई (केंद्रीय जाँच ब्यूरो) ने उत्तर प्रदेश के 7 सरकारी चीनी मिलों के विनिवेश में वर्ष 2010-11 में कथित अनियमितताओं को लेकर एफआईआर दर्ज की है। इस कथित अनियमितता से सरकारी खजाने को 1179 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को खरीदने के दौरान दस्तावेजों में हेराफेरी करने के आरोप में सात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। बसपा सरकार के दौरान हुए कथित चीनी मिल बिक्री घोटाले में सीबीआई लखनऊ की एंटी करप्शन शाखा ने आईपीसी 420, 468, 471, 477एऔर कंपनी एक्ट में एफआईआर दर्ज की है। नई दिल्ली के राकेश शर्मा, सुमन शर्मा, गाजियाबाद के धर्मेंद्र गुप्ता, सहारनपुर के सौरभ मुकुंद, नसीम अहमद, मो जावेद और वाजिद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

25.4.19

यूपी चौथा चरण : भाजपा के सामने साख की चुनौती, देखें किस सीट पर किस जाति के कितने वोटर

अजय कुमार, लखनऊ

यूपी में चौथे चरण में 29 अपै्रल को 13 सीटों पर चुनावी जंग होनी है। 2014 में भाजपा को 13 में से 12 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। एक सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी। यहां से डिम्पल यादव चुनाव जीती थीं।  भाजपा के सामने अपनी 12 सीटें बरकरार रखने की चुनौती है तो सपा-बसपा गठबंधन के सामने जातीय समीकरणों के बूते पुरानी जमीन भाजपा से छीनने का लक्ष्य है। कांग्रेस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर उन सीटों पर खास निगाह लगाए है जो उसने 2009 में जीती थीं। चौथे चरण में जिन दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उसमें बीजेपी सभी 13 सीटो पर तो सपा-बसपा क्रमशः 07 और 06 सीटों पर तथा कांगे्रस 13 सीटों पर मैदान में है। कांगे्रस ने डिम्पल के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारा है। इस चरण में डिम्पल यादव,राम शंकर कठेरिया,सत्यदेव पचैरी,श्री प्रकाश जायसवाल,देवेन्द्र सिंह भोले,आदि दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है।

बाबा भोलेनाथ की नगरी दो दिनों तक रहेगी मोदीमय

अजय कुमार, वाराणसी से
देश की सबसे अधिक चर्चित लोकसभा सीटों में से एक वाराणासी संसदीय सीट पर लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। यहां सांतवें और अंतिम चरण में मतदान होना है। यहां से 26 अ्रपै्रल को नामांकन के लिए भाजपा उम्मीदवार और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक दिन पूर्व 25 अ्रपै्रल को वाराणसी पधार रहे हैं। पीएम मोदी 25 अप्रैल को रोड शो और 26 अप्रैल को नामांकन करेंगे। दो दिनों तक यहां सियासत उफान पर होगी। यह कहना गलत नहीं होगा की बाबा भोलेनाथ की नगरी वाराणसी इन दो दिनों में मोदीमय नजर आएगी।

पत्रकारों की किल्लत हो गई है क्या जो 'चौकीदार' का इंटरव्यू 'खिलाड़ी' ले रहा!

नींद टूटी तो हमेशा की तरह अपनी आदत के मुताबिक न्यूज़ चैनलों का दीदार शुरू कर दिया। अरे ई का!! जहां देखो पीएम से अछईया (अक्षय) वाला इंटरव्यू चल रहा था। ज़ी न्यूज़, आज तक, एबीपी न्यूज़, डीडी न्यूज़, रिपब्लिक भारत और फलाना ढिकाना सारे चैनलों पर इनका ही इंटरव्यू चल रहा था, वह भी नॉनस्टॉप! बोले तो बिना ब्रेक के!

हेमंत करकरे उत्पीड़न और प्रताड़ना का अपराधी था!

विष्णु गुप्त
हेमंत करकरे को लेकर कोई एक नहीं बल्कि अनेकानेक प्रश्न खडे थे, पर अधिकतर लोग इस प्रश्न पर बात ही नहीं करना चाहते थे? हेमंत करकरे को लेकर उठे प्रश्नों पर आखिर लोग बात क्यों नहीं करना चाहते थे? पहला कारण यह था कि कांग्रेस हर हाल में हिन्दू -भगवा आतंकवाद को प्रत्यारोपित करना चाहती थी, इसके लिए कांग्रेस हर वह हथकंडा अपनाने के लिए तैयार बैठी थी जो हथकंडा अपना सकती थी, हथकंडे के तौर पर कांग्रेस के पास तीस्ता सीतलवाड, हर्ष मंदर, जान दयाल और शबनम हाशमी जैसे तमाम चेहरे थे जो भारत को एक खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करते थे और हिन्दुओं को आतंकवादी, खतरनाक तथा अमानवीय मानुष साबित करने के लिए तुले रहते थे, इसी सोच से प्रस्तावित दंगा रोधी विधेयक सामने आया था, जिसमें प्रावधान यह था कि कहीं भी दंगा होगा तो बेगुनाह साबित करने की जिम्मेदारी हिन्दुओं को ही होगी, मुस्लिम पर आरोप होने पर भी उसे बेगुनाही के सबूत नहीं जुटाने होंगे, वह प्रस्तावित विधेयक सोनिया गांधाी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने लायी थी जिसके सदस्य तीस्ता सीतलवाल सहित अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग शामिल थे।

किसी ईसाई ने नमाज़ पढ़ रहे लोगों को मारा तो ये दुनिया में कहीं भी क्रिश्चियन मार के बदला लेंगे!


Tabish Siddiqui : ISIS ने कहा है कि न्यूज़ीलैंड में मारे गए लोगों का बदला उन्होंने श्रीलंका में लिया है.. मतलब न्यूज़ीलैण्ड में किसी ईसाई ने मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे लोगों को मारा था तो ये दुनिया मे कहीं भी क्रिस्चियन मार के वो उसका बदला ले लेंगे. अब सवाल ये नहीं है कि ये सही है या ग़लत.. सवाल ये है कि आपको ये पसंद आया कि नहीँ?

24.4.19

राज ठाकरे ने तो बीजेपी आईटी सेल की बैंड बजा दी!

मोदी-शाह की नाक में दम कर दिया है राज ठाकरे ने। इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू हैं राज ठाकरे. उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ रहा है लेकिन राज ठाकरे पूरे महाराष्ट्र में ताबड़ तोड़ रैलियां कर रहे हैं. अपने हर भाषण में वो सिर्फ मोदी और अमित शाह पर तीखे हमले करते हैं.

दैनिक भास्कर प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ जमकर खबरें छाप रहा है


ये कैसी पत्रकारिता...! बात नाम लेकर ही शुरू कर रहे हैं। पत्रकारिता का विद्यार्थी हूं तो फिर हो रही पत्रकारिता पर भी ध्यान देना तो बनता ही है। इसलिए सीधा नाम लिख रहा हूं, देश के सबसे बड़े अखबार होने का दावा करने वाले दैनिक भास्कर का। इसके भोपाल संस्करण का। साफ कर दें कि यह नाम को बदनाम करने की कोशिश नहीं है। यह प्रयास है समझने का कि आखिर हो क्या रहा है। अखबार का 24 अप्रैल का अंक देखा। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को नीचा दिखाने वाली पांच-पांच खबरों को सआशय इसमें प्रमुखता से स्थान दिया गया है।

क्या वाकई फंस गए हैं देश के मुख्य न्यायाधीश?

जस्टिस रंजन गोगोई पर गम्भीर आरोप, यौन उत्पीड़न मामले में जस्टिस बोबडे और दो अन्य जज करेंगे जाँच

जे.पी.सिंह

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने ऊपर लगे यौन उत्पीडन के आरोपों को जिस तरह शनिवार को एक विशेष पीठ बनाकर स्वयं को क्लीन चिट देने का प्रयास किया उसकी विधिक और न्यायिक क्षेत्रों में कड़ी प्रतिक्रिया हुई और उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं बनाई गयी प्रक्रिया के तहत जाँच की मांग बहुत बड़े पैमाने पर उठी।अंततः मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की आंतरिक जांच के लिए मंगलवार को उच्चतम न्यायालय  के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए बोबडे को नियुक्त किया गया । न्यायमूर्ति बोबडे ने वह मुख्य न्यायाधीश के बाद वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं।न्यायमूर्ति बोबडे ने उच्चतम न्यायालय  के दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति एनवी रमन और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी को शामिल कर एक समिति गठित की है। न्यायमूर्ति रमन वरिष्ठता में न्यायमूर्ति बोबडे के बाद हैं और न्यायमूर्ति बनर्जी को इसलिए शामिल किया गया है क्योंकि वह महिला न्यायाधीश हैं।

गुजरात दंगों की गैंगरेप पीड़िता बिलकिस बानो की कहानी इस लोकतंत्र का सिर शर्म से झुकाती रहेगी!

गुजरात दंगों में गैंगरेप पीड़िता को 50 लाख का मुआवजा और आवास देने के सुप्रीम निर्देश

जे.पी.सिंह

"आप खुद को भाग्यशाली समझिए कि हम अपने आदेश में सरकार के खिलाफ कुछ नहीं कह रहे हैं।" यह कहते हुये उच्चतम न्यायालय ने 2002 गुजरात दंगा मामले में गैंगरेप सर्वाइवल बिलकिस बानो को 50 लाख रुपए का हर्जाना देने का निर्देश गुजरात सरकार को दिया है। उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार को ये भी निर्देश दिया है कि उन्हें नियमों के मुताबिक नौकरी और रहने की सुविधा दी जाए। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने 29 मार्च को बिलकिस बानो मामले में गलत जांच करने वाले 6 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करने को कहा था। अपने फैसले में कोर्ट ने ये कहा था कि उन्हें सेवा में नहीं रखा जा सकता।

जयपुर की सेंट्रल जेल में ये क्या चल रहा है!

जयपुर केंद्रीय कारागारः कैद तनहाई और बर्बर पिटाई की दास्तान, रिहाई मंच व अवमेला के संयुक्त प्रनिधिमंडल की दौरा रिपोर्ट.... रिहाई मंच और अवमेला के तीन सदस्यीय संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने जयपुर केंद्रीय कारागार, जयपुर में जयपुर ब्लास्ट समेत आतंकवाद के नाम पर कैद विचाराधीन कैदियों की 30 अप्रैल 2019 को जेल के अंदर बर्बर पिटाई की घटना के तथ्यों को जानने लिए तीन दिवसीय (6, 7, 8 अप्रैल) दौरा किया। प्रतिधिमंडल जयपुर स्थित मानवाधिकार/सामाजिक संगठनों, जेल अधीक्षक सेंट्रल कारागार जयपुर और पीड़ित विचाराधीन कैदियों से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल में मसीहुद्दीन संजरी, मो0 आसिम और शादाब अहमद शामिल थे।

22.4.19

संचार में धैर्य और समन्वय से कार्य करना जरूरी: नरेश कुमार


भोपाल : क्राइसिस मैनेजमेंट के समय प्रबंधन, प्लानिंग, रिसर्च ,कारपोरेट संचार, प्रबंधन टीम पर भरोसा और समन्वय के साथ कार्य करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। किसी भी संस्थान की संचार प्रबंधन की टीम की योग्यता और क्षमता, संस्थान को संकट से उबार लेती है। जनसंपर्क विभाग की काबलियत उस समय बहुत मदद करती है, जबकि संकट से निपटने के लिए समय बहुत ही कम होता है। जनसंपर्क अधिकारी को सदैव सतर्क रहना चाहिए।