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25.5.20

मनरेगा में फैला भ्रष्टाचार तो कैसे मिलेगा प्रवासियों को रोजगार

सौरभ सिंह सोमवंशी
saurabh96961100@gmail.com


सरकारों के द्वारा लागू की  गई किसी भी योजना  की सफलता और असफलता इस बात से पता चलती है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति को उसका कितना लाभ मिल रहा है 2005 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के द्वारा लोगों को रोजगार दिलाने वाली योजना नरेगा लागू की गई 2009 में इसका नाम बदलकर के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)कर दिया गया। गांधी जी कहां करते थे कि भारत गावों में बसता है।

23.5.20

लॉकडाउन खुलते ही बढ़ने लगा प्रदूषण, साफ हवा के लिए ऑनलाइन आंदोलन



स्वच्छ हवा के लिए देशव्यापी आंदोलन, 12 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने सालभर साफ हवा के लिए उठाई आवाज़


लखनऊ, 23 मई : लॉकडाउन खुलते ही देशभर में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है. कुछ दिन राहत की सांस लेनेवाले भारतीय एक बार फिर घुटन वाले माहौल में जीने के लिए विवश हो रहे हैं. हाल ही में आईआईटी दिल्ली के एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर लॉकडाउन के दौरान भारत के कम प्रदूषण के स्तर को बनाए रखा जाता है, तो यह देश की मृत्यु दर में 6.5 लाख की कमी ला सकता है. यही वजह है कि पर्यावरण को लेकर चिंतित आम आदमी और संस्थाएं आगे आ रही हैं. साफ हवा को बनाए रखने के लिए वह भारत सरकार से वह स्पष्ट और लागू होने वाले कार्यक्रम की मांग कर रहे हैं. इसके लिए ऑनलाइन आंदोलन की मुहिम शुरू करने जा रहे हैं.

बनारस की ईद


हिंदुस्तान में मुसलमानों के आने के साथ ही ईद मनाने के द्रष्टान्त मिलने लगते हैं। बनारस में मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व ही मुस्लिम बस्तियां बस गयी थीं और गोविंदपूरा एवं हुसैनपुरा में ईद की नमाज़ पढ़ने की जानकारी मिलती है। जयचन्द की पराजय के बाद बनारस के मुसलमानों की ईद को देखकर कुतुबुद्दीन को आश्चर्य हुआ कि ईद की नमाज़ के बाद जो सौहार्दपूर्ण वातावरण यहाँ पर बना हुआ है उसमें हिन्दू-मुसलमान की अलग-अलग पहचान करना मुश्किल है। ये बनारसी तहज़ीब थी जो मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व बनारस में मौजूद थी। जिसने एक नई संस्कृति हिंदुस्तानी तहज़ीब को जन्म दिया। तब से लेकर आज तक ईद का त्योहार पारम्परिक ढंग से मनाया जाता है।

मोदी सरकार देश में शासन चलाने का नैतिक अधिकार खो चुकी है


मजदूर वर्ग जिसने आधुनिक युग में कई देशों में क्रांतियों को संपन्न किया, उसने भारत में भी आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक उत्पादन विकास में अपनी अमूल्य भूमिका दर्ज कराई है। वही मजदूर यहां कोरोना महामारी के इस दौर में जिस त्रासद और अमानवीय दौर से गुजर रहा है वह आजाद भारत को शर्मशार करता है। फिर भी मजदूर वर्ग की इतिहास में बनी भूमिका खारिज नहीं होती। घर वापसी के क्रम में भी मजदूर वर्ग ने मोदी सरकार की वर्ग क्रूरता को बेनकाब कर दिया है। फासीवादी राजनीति के विरूद्ध मजदूरों की यह स्थिति नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देगी। यह मजदूर बाहर केवल अपने लिए दो जून की रोटी कमाने ही नहीं गया था, उसके भी उन्नत जीवन और आधुनिक मूल्य के सपने थे। वह बेचारा नहीं है. जिन लोगों ने उन्हें न घर भेजने की व्यवस्था की और न ही रहने के लिए आर्थिक मदद दी, मजदूर उनसे वाकिफ है और समय आने पर उन्हें राजनीतिक सजा जरूर देना चाहेगा। क्योंकि बुरी परिस्थितियों में भी वह किसी की दया का मोहताज नहीं है, आज भी वह अदम्य साहस और सामर्थ्य का परिचय दे रहा है। मजदूरों के अंदर आज भी राजनीतिक प्रतिवाद दर्ज करने की असीम योग्यता है और पूरे देश को नई राजनीतिक लोकतांत्रिक व्यवस्था देने में वह सक्षम है। जरूरत है उसे शिक्षित और संगठित करने की। 

इनकी भड़ास सुनें : गाय के गोबर से परेशान है ये शहरी बाबू!

Gobar safayi k sambandh me

Dear sir ,

Actually I m living in vrandavan enclave ,adipur amhera gram, rakshapuram meerut 250001 since last 6 months.

प्रभाष जोशी से कभी कोई अखबार नहीं संभला था, इसलिए जनसत्ता भी नहीं चल सका!

 satish pednekar 

 Prabhash joshi and Jansatta : कभी मैंने एक मित्र से कहा था कि मुझे जनसत्ता का भविष्य अंधकारमय लगता है क्योंकि उसके संपादक प्रभाष जोशी गांधी और विनोबा दोनों के कट्टर शिष्य थे। करेला और नीम चढा वाला मामला था। उनसे आजतक कोई अखबार (मध्यदेश, प्रजानीति, आसपास) नहीं संभला।

भूलने की बीमारी के इलाज के लिए ब्रह्मी बूटी सचमुच लाभदायक है!


पी. के. खुराना
जनसामान्य में पीजीआई के नाम से प्रसिद्ध चंडीगढ़ स्थित चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के स्नातकोत्तर संस्थान “पोस्टग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च” से जुड़े तीन अलग-अलग अध्ययनों ने मेरे दिमाग की बत्ती जलाई है और मुझे उम्मीद है कि ये अध्ययन कुछ और लोगों के दिमाग की बत्ती भी जला सकते हैं।

संकट में हनुमान चालीसा पढ़ता है ये अंग्रेज पत्रकार! सुनें बातचीत

देश में फेक न्यूज जिस तेजी से चल रही और उस पर कोई रोक नहीं लग रही है वह बहुत ही चिंताजनक है। पिछले दिनों तब्लीगी मरकज को लेकर जिस तरह नकारात्मक खबरें चलाई गई और इसके जरिए उत्तर प्रदेश के एक विधायक ने हिंदू मुस्लिम के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की वह बहुत ही गलत है।  ये कहना है दक्षिण एशिया में लंबे समय तक बीबीसी की पहचान रहे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मार्क टली का।

अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा




लखनऊ : “अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा” यह बात एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आज प्रेस को जारी बयान में कही है.

गे व्यक्ति जो है पुलिस का मुखबिर, उसे बना दिया गया पत्रकार!

यूपी के एक जिले से खबर है कि यहां पुलिस के एक मुखबिर को जो गे है, उसे पत्रकार बना दिया गया है.  नोएडा से हिंदी में चलने वाले एक घटिया चैनल ने इस मुखबिर को पत्रकार बना दिया है. शारीरिक संबंध बनवाने वाला गे बना हिंदी में खबर देने वाले चैनल का पत्रकार.

ज़ी न्यूज़ के लिए अलविदा की नमाज में हुईं दुआएं

नोएडा स्थित जी न्यूज कार्यालय/स्टूडियो के कोरोना संक्रमित कर्मचारियों के सेहतयाब होने की दुआएं अलविदा की नमाज़ के बाद की गईं। अपने-आपने घरों में पढ़ी गई नमाजों से पहले कुछ पेशे इमामों ने ऑनलाइन खुतबा भी दिया। घरों में रहने की ताकीद की गई। लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की हिदायत दी गयीं। उलमा ने अपने खुतबे रूपी ऑनलाइन संदेशों में कोरोना वबा से बचाव के लिए हुकुमत की गाइड लाइन पर चलने की ग़ुज़ारिश भी की।

आरएसएस-भाजपा की डरी सरकार बढ़ी आपातकाल की ओर


वर्कर्स फ्रंट ने एस्मा लगाने की कड़ी निंदा की
संविधान विरूद्ध सांकेतिक प्रदर्शन से रोकने का आदेश विधि विरुद्ध


23 मई 2020

कोरोना महामारी से निपटने में पूरे तौर पर विफल रही और कारपोरेट की सेवा में लगी आरएसएस-भाजपा की सरकार अंदर से बेहद डरी हुई और यही वजह है कि वह आपातकाल की ओर बढ़ रही है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में एस्मा लगाकर उसने कर्मचारियों से सांकेतिक प्रदर्शन तक का अधिकार छीन लिया है। यह प्रतिक्रिया वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष दिनकर कपूर ने उत्तर प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा प्रदेश में एस्मा लगाने पर व्यक्त की।

22.5.20

क्या बहरा हुआ खुदाय



प्रियंका सौरभ  

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को लाउडस्पीकर से अजान देने को लेकर बड़ा फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि अजान इस्लाम का अहम हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान इस्लाम का हिस्सा नहीं है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि लाउडस्पीकर से अजान पर प्रतिबंध वैध है. किसी भी मस्जिद से लाउडस्पीकर से अजान दूसरे लोगों के अधिकारों में हस्तक्षेप है. अजान के समय लाउडस्पीकर के प्रयोग से इलाहाबाद हाईकोर्ट सहमत नहीं है.

continue ban on sale and use of tobacco products

Bhopal, 22 May: A clutch of consumer organisations and public health experts today made a strong plea to the Madhya Pradesh government to continue its ban on sale and use of tobacco products and spitting in public places, saying such a step is imperative to prevent the spread of coronavirus pandemic in the state.

कांग्रेस यूपी में कदम बढ़ाए,यह सपा-बसपा को नामंजूर

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय क्षत्रप मायावती और अखिलेश यादव नहीं चाहते हैं कि उनके सहारे कांग्रेस यहां अपनी ‘सियासी पिच’ मजबूत कर सके। इसीलिए सपा-बसपा नेता कांग्रेस को पटकनी देने का कोई भी मौका छोड़ते नहीं हैं। कौन नहीं जानता है कि 2019 के लोकसभा सभा चुनाव के समय किस तरह से अखिलेश-मायावती ने उत्तर प्रदेश की राजनीति से कांग्रेस को ‘दूध की मक्खी’ की तरह निकाल कर फेंक दिया था। इस पर कांग्रेस के ‘अहम’ को चोट भी लगी थी, लेकिन वह कर कुछ नहीं पाई। सपा-बसपा से ठुकराई कांग्रेस के रणनीतिकारों ने तब यूपी फतह के लिए अपना ‘ट्रम्प कार्ड’ समझी जाने वाली प्रियंका वाड्रा को आगे करके चुनावी बाजी जीतने की जो रणनीति बनाई थी, वह औंधे मुंह गिर पड़ी थी। कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाता यदि सोनिया गांधी राबयरेली से चुनाव जीत नहीं जातीं। उस समय कांग्रेस, बीजेपी को यूपी में पटकनी देकर मोदी को दिल्ली से दूर करने का सपना पाले हुए थीं, जो आज भी वह पूरा करने की कोशिश में लगी हैं,लेकिन इसके लिए आज तक उसे न तो सपा-बसपा का ‘सहारा’ मिला है न राहुल-प्रियंका का जादू काम आया। यूपी में प्रियंका का ‘प्रयोग’ ठीक वैसे ही ‘फ्लाप शो’ रहा जैसा इससे पहले राहुल गांधी का रहा था।

21.5.20

बेरोजगारी और भुखमरी बरपाने वाली है कोरोना से भी बड़ा कहर

CHARAN SINGH RAJPUT
कोरोना की लड़ाई में कितनी जन और धन की हानी होगी यह तो लड़ाई के बाद जब आंकलन होगा तब पता चलेगा। हां अब तक लड़ी गई लड़ाई में जिस तरह से प्रवासी मजदूरों ने विभिन्न हादसों के साथ ही परेशानियों से जूझते हुए दम तोड़ा है। लोगों ने तंगहाली में आत्महत्याएं की हैं। कोरोना कहर में जो परिस्थितियां देश के सामने खड़ी हुई हैं। उन सबके आधार पर कहा जा सकता है कि देश में भुखमरी और बेरोजगारी का जो तांडव होने वाला है वह कोरोना से भी ज्यादा भयावह होगा।  मेरा आंकलन यह है देश कोरोना कहर तो झेल लेगा पर भुखमरी, बेरोजगारी की जो मार पडऩे वाली है वह झेलना मुश्किल लग रहा है।

देश भर में मजदूरों की हड़ताल 22 मई को

Socialist Party (India) Supports the All-India Labour Strike on May 22 and Demands that the Government Immediately Recall all Changes to Labour Laws

कोरोना ने विज्ञान को समाज से जोड़ने के लिए गंभीर चेतावनी दे दी है


दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता कोरोना महामारी द्वारा पैदा की गई विभिन्न चुनौतियों के समाधान  के खिलाफ लड़ाई में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान उनका जज्बा और कर्मठता शीश काबिलेतारीफ रही है, हमने साक्षात उनके रूप में धरती पर भगवान् को देखा है। जब लाइलाज कोरोना वायरस का खतरा बढ़ा है तो एक बार फिर दुनिया की नजरें इस जानलेवा बीमारी की दवा खोजने के लिए वैज्ञानिकों पर टिकी हैं। स्वास्थ्य शोध के क्षेत्र में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा यह एक उदाहरण है जिसमें वैज्ञानिक समुदाय से त्वरित प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग नई विज्ञान प्रौद्योगिकी व नवाचार नीति पर काम कर रहा है जिसमें वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ देश में शोध एवं विकास का वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और प्रधानमंत्री के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के विजयराघवन से इस बात के संकेत मिल चुके हैं कि सरकार वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने लिए प्रतिबद्ध है। भारत सरकार सही समय पर विज्ञान और समाज के बीच की खाई को पाटने के लिए वैज्ञानिक सामाजिक उत्तरदायित्व पर एक नई नीति बनाने  की योजना बना रही है।

लोक सेवा केन्द्र में हुए टेंडर घोटाला व यहां के कर्मचारियों के शोषण के संबंध में कुछ बातें


मध्य प्रदेश में  लोकसेवा केंद्रों के माध्यम से हितग्राहियों को सेवाएं प्रदान करना 2012-13 से शुरू हुआ। तत्समय बहुत ही जल्दबाजी में शासन द्वारा निर्णय लिया गया आनन फानन में लोकसेवा केंद्रों को ठेकेदारों के माध्यम से संचालित करवाया गया जो कि आज भी बदस्तूर जारी है। लोकसेवा अधिनियम बनाया गया लेकिन कर्मचारियों का कोई अधिनियम नही बनाया गया। जिसके कारण लोकसेवा केंद्रों के ठेकेदार खुल्ले सांड की तरह केंद्रों में कार्य कर रहे कर्मचारियों का शोषण लंबे समय से करते आ रहे है। ये बात अलग है कि बीच मे ठेकेदार बदल गए लेकिन शोषण तो जस के तस है।

कोरोनाकालीन संकट के दौर में शिक्षा के यूनिवर्सलाइजेशन के समक्ष उभरती चुनौतियां


“कोविड महामारी ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत किए बगैर शिक्षा का लोकव्यापीकरण (यूनिवर्सलाइजेशन) असंभव है”

आरटीई फोरम, नई दिल्ली, 21 मई, 2020। कोविड -19 की वैश्विक महामारी ने भारत के एक बड़े हिस्से को बुरी तरह प्रभावित किया है और पहले से चली आ रही भूख, अशिक्षा,  बेरोजगारी एवं असमानता की समस्याओं को और गहरा किया है। खासकर, भारत में पहले से ही बिखरी हुई शिक्षा व्यवस्था को इसने और भी उलझा दिया है। शिक्षा अधिकार कानून, 2009 आने के बाद भी विद्यालयों में न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बहाली के पर्याप्त प्रयास किए गए और न ही विद्यालयों का लोकतांत्रीकरण किया गया था। वंचित समाज के बच्चों को पहले भी सम्मानपूर्वक पढ़ने का अवसर नही दिया गया था और अब ऑनलाइन शिक्षा के जमाने में तो वे और भी पिछड़ जायेंगे क्योंकि इसे व्यापार का जरिया बनाया जा रहा है। विभिन्न कम्पनियों की नजरें इस ओर है। ऑनलाइन शिक्षा, शिक्षा की  मूल भावना को प्रभावित कर रहा है। शिक्षा का काम व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करना होता है। लेकिन “डिजिटल शिक्षा” यह काम करने में असफल है। जब तक हाशिये पर जिंदगी जीने वालों को समान शिक्षा नहीं दी जायेगी तब तक समाज में आर्थिक औऱ सामाजिक समानता नहीं आ सकती है। ये बातें वक्ताओं ने राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा आयोजित शिक्षा – विमर्श शृंखला की चौथी कड़ी में “कोरोनाकालीन संकट के दौर में शिक्षा का लोकव्यापीकरण” विषय पर एक वेबिनार में कहीं।

इंकलाब करने से ही मिलेगा जनता को उसका हक

चरण सिंह राजपूत

शोषकों से राहत की उम्मीद न करें किसान-मजदूर... जब आचार्य चाणक्य के अथक प्रयास से उनका शिष्य चंद्रगुप्त मगध की गद्दी पर बैठ गया तब

भी चाणक्य अपनी झोपड़ी में ही रहे। किसी ने उनसे पूछा कि आचार्य अब आपका शिष्य यहां का राजा है तो फिर अब ये कष्ट क्यों ? आप राजमहल में क्यों नहीं रहते ? पता है कि चाणक्य ने क्या जवाब दिया था ? उन्होंने कहा कि यदि मैं राजमहल में रहने लगा तो एशोआराम की जिदंगी बिताने का आदी हो जाऊंगा। संसाधनों और सुविधाओं में खोकर लोगों का दुख दर्द भूल जाऊंगा। उनका कहना था कि जनता का दुख-दर्द समझने के लिए खुद को दुखऔर दर्द का एहसास होना जरूरी है। यही कारण था कि आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने जनता का दुख दर्द जानने के लिए अपने को कष्ट दिये।

20.5.20

अचानक किए गए 'लॉकडाउन' की वजह से आत्महत्या करने को मजब़ूर गरीब मजदूर लोग!

विभिन्न समाचार माध्यमों से हम देश के लगभग हर हिस्से से प्रतिदिन अचानक किए गए 'लॉकडाउन 'से फैक्ट्रियों के बंद होने,यातायात के बड़े साधनों यथा रेलवे और बस आधारित ट्रासपोर्ट व्यवस्था को भी एक साथ जाम कर देने से भूख से पीड़ित मजदूर परिवारों के किसी भी हालात में अपने हजारों किलोमीटर दूर अवस्थित अपने गाँव जाने के लिए पैदल,सायिकिल, मोटरसाइकिल,जुगाड़,ऑटो,ट्रैक्टर,डंफर,ट्रक आदि किसी भी साधन से जाने,पुलिस द्वारा भयानक रूप से पीटे जाने,40डिग्री सेंटीग्रेड की भीषण गर्मी में जाने से लगभग हर रोज रोड एक्सीडेंट,बिमारी,लू लगने,अत्यधिक थकावट, भूख और प्यास से सैकड़ों मजदूर लोगों की मरने की दुःखद खबरे आ ही रहीं थीं,आज कुछ समाचार पत्रों की खबरों के अनुसार उससे भी ज्यादे दुःखदायी खबर यह आई है कि गुजरात जैसे विकसित कहे जाने वाले राज्य के सूरत शहर में कल तीन लोगों ने नौकरी छूटने,घर न जाने और भूख की हताशा से तंग क्रमशः 28 वर्षीय बाँदा निवासी,55 वर्षीय महाराष्ट्र निवासी व एक 60 वर्षीय, तीन मजदूर लोगों ने आत्महत्या कर लिए!

कुंठाओं से भरा भारत कैसे हो आत्म निर्भर

kp singh
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो नये स्लोगन देश के नाम हालिया संबोधन के दौरान सामने आये हैं- आत्म निर्भर भारत और लोकल-वोकल। उनमें भीड़ को तरंगित कर देने का कौशल है। इसलिए यह स्लोगन भी उनके पिछले नारों की तरह लोगों के दिल-दिमाग और जुबान पर चढ़ रहे हैं लेकिन जब नारे किसी गहरे चितंन की उपज हों तो वे कालातीत सूक्त वाक्य बन जाते हैं जैसे लोहिया जी का नारा जिंदा कौमें पांच साल का इतंजार नही करतीं अन्यथा नारा मनोरंजन करके लोगों की स्मृति से विदा हो जाते हैं। जैसे चुनाव के वक्त नशे की तरह लोगों पर सवार किया गया मैं चौकीदार का नारा। ऐसे खोखले नारों के लिए जुमलेबाजी का टर्म बनाया गया है।

कायदा कानून के ऊपर भाजपा

Akhilesh Dubey 


कायदा कानून के ऊपर भाजपा सिवनी । पूरे देश मे कोविड-19 के प्रकोप से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय किये जा रहे है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी राजनैतिक दलों को और देश की जनता को सोशल डिस्टेंडिंग का पालन करने मास्क का उपयोग करने का आग्रह कर रहे है लॉक डाउन का पालन करने की बात कर रहे है। लेकिन इसके विपरीत सिवनी जिला भाजपा इन सभी बातों को नजर अंदाज करते हुए प्रधानमंत्री की अपीलों की धज्जियां उड़ाते देखे जा रहे है।

जीव वैज्ञानिकों के लिए चुनौती और अवसर है कोविड 19

आगरा। डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में कोरोना महामारी के समय माइक्रोबायोलॉजी एवं बायोटेक्नोलॉजी के योगदान पर चल रहे दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबीनार का आज (19 मई 2019) अंतिम दिन था।

एमसीयू में जारी हैं ऑनलाइन कक्षाएं

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में संचालित हो रही हैं ऑनलाइन कक्षाएं, सैद्धांतिक के साथ दिया जा रहा है व्यावहारिक प्रशिक्षण

भोपाल। लॉकडाउन के बीच माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल सहित सभी परिसरों में ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन जारी है। लॉकडाउन के कारण जब प्रत्यक्ष कक्षाओं का संचालन बंद हो गया तब विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने तकनीक का उपयोग कर अपना अध्ययन-अध्यापन जारी रखा है। कोरोना के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में शिक्षकों ने पाठ्यक्रम पूरा कराने और विद्यार्थियों को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में व्यस्त रखने की चुनौती को स्वीकार किया। इस नवाचार में ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तकनीक और केंद्र सरकार के डिजिटल इन्शिएटिव का बखूबी उपयोग किया गया है।

कोरोना पर मीडिया को लेकर दोहरे मापदंड से कठघरे में योगी सरकार


- जागरण और जी न्यूज प्रबंधन पर आपदा अधिनियम लागू नहीं होता?
- द वायर के सिद्धार्थ वरदराजन और द हिन्दू के पीरजादा ही हैं गुनाहगार?


मीडिया जगत से जुड़ी दो अलग-अलग घटनाओं को लेकर देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। यह बहस राष्ट्रीय आपदा अधिनियम 2005 के तहत निहित शक्तियों की है। पहली घटना द वायर के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन से जुड़ी है। यूपी के फैजाबाद की पुलिस ने एक अप्रैल 2020 को उनके खिलाफ योगी आदित्यनाथ पर टिप्पणी करने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज की। सिद्धार्थ ने योगी पर आपदा के बावजूद अयोध्या में धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने पर ट्वीट किया था। इसी तरह से जम्मू-कश्मीर में द हिन्दू के पत्रकार पीरजादा आशिक द्वारा सोशल मीडिया पर भी आपदा अधिनियम के तहत पोस्ट लिखने पर केस दर्ज किया गया है।

18.5.20

पत्रकार रामजी जायसवाल की बहन का निधन


अपने जन्मदिन पर ही परिवार सहित पूरी दुनिया को छोड़ गयीं किरन

जौनपुर। जनपद के मान्यताप्राप्त पत्रकार शुभांशू जायसवाल ‘राज’ की माता एवं समूह सम्पादक रामजी जायसवाल की दीदी श्रीमती किरन जायसवाल का शनिवार को निधन हो गया। 47 वर्षीया श्रीमती जायसवाल पिछले कुछ महीनों से कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित थीं जो संघर्ष करते हुये जीवन से हार गयीं।

जनमानस की अंतरात्मा जगायेगी राष्ट्रपति की पहल


kp singh

साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण पद पर पहुंचे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पता है कि इतिहास किसी-किसी की जिंदगी में ऐसा कुछ करने का अवसर देता है जिससे वह वास्तव में महान लोगों की सूची में अपना नाम दर्ज करा सके। देश के प्रथम पुरूष ने महामारी से उपजे संकट को देखते हुए अपने वेतन में 30 प्रतिशत कटौती की घोषणा करके अवसर का ऐसा ही उपयोग किया है। काश उनका यह कदम देश में प्रेरणा की ऐसी लहर पैदा कर सके जिससे हर कोई त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करने को उद्यत हो जाये।

मजदूर की मंजिल ….!!

मजदूर की मंजिल ….!!: पत्थर तोड़ कर सड़क बनाता है मजदूर फिर उसी सड़क पर चलते हुए उसके पैरों पर पड़ जाते हैं छाले वोट देकर सरकार बनाता है मजदूर लेकिन वही सरकार छिन लेती है उनके निवाले कारखानों में लोहा पिघलाता है मजदूर फिर खुद लगता है गलने – पिघलने रोटी के लिए …

14.5.20

मीडिया विद्यार्थियों ने 200 से अधिक वीडियो कार्यक्रम प्रोड्यूस किए



भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अपने पत्रकारीय अभिव्यक्ति के माध्यम से कोरोना वायरस के खिलाफ देशव्यापी जंग में अपना योगदान दे रहे हैं। मीडिया विषयों में डिग्री हासिल करने कई प्रदेशों के विद्यार्थी विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं। इनमें से कई विद्यार्थी भोपाल में ही हैं तो कई अपने गृह स्थान जा चुके हैं, लेकिन डॉकडाउन की बंदिशें उनकी अभिव्यक्तीय रचनात्मकता को रोक नहीं पा रही हैं।

"मां" और "मीडिया"

अनुभव आधारित कल्पना

मदर्स-डे स्पेशल

भले ही "मां ने हमें लिखा हो" जैसी कहावतें सोशल मीडिया के बाज़ार में कईं सालों से रिपीट (कॉपी पेस्ट) पर चल रही हों,लेकिन कुछ तो अपना भी लिखना ही होगा ना, कब तक एक फोटो और एक कैप्शन मात्र मातृत्व की सिंगल लाइन डेफिनेशन बनता रहेगा

मैं गांव हूं...


 - धर्मेन्द्र प्रताप सिंह



मातृ दिवस पर मातृभूमि के लिए

सपने में पहुंच गया अपने गांव और फिर...


आज मैंने सपने में एक सपना देखा... देखा कि मुंबई से अपने गांव बहुंचरा (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) पहुंच गया हूं... वहां कोरोना के डर से सभी ग्रामीण भी अपने-अपने घरों में दुबके हुए हैं... मैं बहुंचरा के मध्य में न जाने कब से प्रतिस्थापित और पूज्यनीय गांव देवी (भवानी का स्थान) का दर्शन करने चला गया... मां के चरणों में शीष झुकाने के बाद वहीं पीपल की छांव में बैठ जब मैं थोड़ा सुस्ताने लगा था कि हल्की नींद आ गई... तभी सपने में एक आवाज सुनाई दी:

भारत के मजदूर क्या अभी भी रोम के गुलामों जैसे गुलाम हैं ?

किसी भी राष्ट्रराज्य की सफलता का आकलन इस बात से लगाया जाता है कि उसके राज्य की प्रत्येक प्रजा (जनता )सुखी हो,उसे जीवन जीने की न्यूनतम आवश्यकता कम से कम 'भोजन ' समय से मिल जाय। आज लॉकडाउन को देश में लगे हुए ठीक 48 दिन हो गए। इस देश के धनाढ्य वर्ग,मध्यमवर्ग विशेष रूप से राज्य व केन्द्र सरकार में नौकरी करने वाले लोगों को इस लम्बे लॉकडाउन से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा है,लेकिन इस देश के अतिनिर्धन लगभग 22 करोड़ जनसंख्या वाले लोग जैसे भूमिहीन किसान,दिहाड़ी मजदूर, छोटे रेहड़ीपटरी वाले दुकानदार, रिक्शे,ऑटो,टैक्सी वाले आदिआदि लोगों को जो अपना पेट पालने के लिए अपने गृहराज्य से हजारों किलोमीटर दूर किसी दूसरे राज्य में कोई छोटीसी नौकरी के लिए गए हुए थे,वे अचानक किए गए इस लॉकडाउन के अन्तर्गत सामान्य लोगों के यातायात की साधन रेलों को एकदम ठप्प हो जाने,नौकरी छूटने,मकान किराए का भार आदि से उनको इस 48 दिनों में भूखों मरने की नौबत आ गई है !

ओ दुनिया के रखवाले अब तू ही जान बचा ले


 कोविड 19 की भीषण महामारी से दुनिया मे हाहाकार मचा हूआ है विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोरोना वायरस से सम्पूर्ण विश्व मे अब तक 44  लाख 28 हजार 236 संक्रमित हो गए है 3 लाख मौत हो गयी है वही भारत देश मे 78  हजार संक्रमित और 2549 की मौत इस बिच कोरोना वायरस को मात देने वालो की संख्या 26 हजार 234 है इस कठिन समय मे सभी अपने ईश्वर को याद कर रहे है।

मनमानी कर रहा डीएम और चुप्पी साधे है सरकार!

धौलपुर डीएम ने यू-ट्यूब, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, लिंक्डइन, व्हाट्सएप, ट्वीटर और टेलीग्राम व् अन्य के संचालन पर रोक लगा दी है

जयपुर : सरकार सुशासन की बात कर रही है. और प्रशासन उसमें पलीता लगा रहा है. कोरोना महामारी के दौरान 'राजस्थान सतर्क है 'यह स्लोगन सरकार का है. लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं. वहीँ राजस्थान के धौलपुर के डीएम राकेश कुमार जायसवाल ने अपना एक फरमान जारी कर दिया है. उन्होंने अपने 6 पेज के आदेश में यह लिखा है कि धौलपुर के कतिपय व्यक्तियों जिनके द्वारा सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म यथा यू-ट्यूब, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, लिंक्डइन, व्हाट्सएप, ट्वीटर और टेलीग्राम व् अन्य का संचालन न्यूज चैनेल के रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संचालन किया जा रहा है. ऐसी संचालित समस्त न्यूज चैनल की गतिविधियों को आगामी आदेश तक प्रतिबंधित कर दिया है. जबकि डीएम धौलपुर का सरकारी मोबाइल नम्बर खुद जिले की सरकारी वेबसाइट पर नहीं है. जनता से कैसे संवाद किया जा रहा होगा यह खुद अंदाजा लगाया जा सकता है. बड़ी मुश्किल से डीएम साहब मोबाइल नंबर मिल पाया.

भारत-चीन सैनिक झड़प : अतीत के आईने और भविष्य के मायने

अमूमन भारत-पाकिस्तान के बीच होते रहने वाली झड़पों में तो हमलोग पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात करते आये हैं, लेकिन यदा-कदा जब भारत-चीन के बीच सीधी झड़प की नौबत आती है तो हमलोगों का प्रायः वह उत्साह नहीं दिखता, जो ऐसे मौके पर दिखना चाहिए! तब हमलोग शायद यह भी नहीं सोच पाते कि जब पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल, वर्मा आदि जैसे हमारे लघु पड़ोसी देश हमारी उदारतावश कभी कभार हमसे आंख में आंख मिलाकर बातचीत करने की हिमाकत करते आए हैं, तो फिर भारत जैसा मजबूत देश और हम भारतवासी चीन के साथ ऐसा क्यों नहीं कर सकते! यही वह बात है जिसे समझने, समझाने और तदनुरूप नीतियां बनाने की जरूरत है, जिससे हमारा सियासी व प्रशासनिक जमात भी कमोबेश बचने की कोशिश करता आया है। फिर भी मोदी युगीन भारत में समर्थ चिंतन की जो अजस्र धारा सिस्टम के हरेक रग को अनुप्राणित कर रही है, उसे व्यापक जनसमर्थन कैसे मिले, इस ओर भारतीय प्रबुद्ध लोगों को सतत सचेष्ट रहना होगा।

13.5.20

योगी जी, जब खतरा बड़ा है तो टीम भी बड़ी होनी चाहिए, जनप्रतिनिधियों से अधिक ब्यूरोक्रेसी पर भरोसा ठीक नहीं

अजय कुमार,लखनऊ
 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना महामरी से निपटने के लिए क्या सही दिशा में चल रहे हैं ? कोरोना से लड़ने के लिए सीएम ने जिस टीम-11 का गठन किया था, क्या वह टीम सही तरीके से काम कर रही है या फिर इससे भी बेहतर परिणाम निकल सकते थे ? योगी जी का जनप्रतिनिधियों से अधिक ब्यूरोक्रेसी पर भरोसा करना क्या उचित है ? यह सवाल हम नहीं बल्कि विपक्ष के साथ-साथ बुद्धिजीवी तबका भी उठा रहा है। ऐसे लोगों को लगता है कि जब कोरोना महामारी से ’लड़ाई’ बड़ी है तो फिर योगी की टीम छोटी क्यों है। यह सच है कि कोरोना महामारी से निपटने के मामले में अन्य राज्यों के मुकाबले योगी सरकार काफी आगे दिखाई दे रही है, लेकिन क्या हालात इससे भी बेहतर नहीं हो सकते थे ? यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्य राज्यों के मुकाबले प्रदेश की करीब 23 करोड़ जनता की समस्याओं को सुनने-समझने  और उसके समाधान का काम इतना आसान नहीं है। जमीनी हकीकत भी इसी ओर इशारा कर रही है। तमाम मोर्चाे पर वह नतीजे नहीं आ रहे हैं, जैसे नतीजे सीएम योगी देना और देखना चाहते हैं। योगी की टीम-11 मुख्यमंत्री के उन आदेशों को भी अमलीजाना नहीं पहना पाते हैं है, जिसकी घोषणा सीएम मीडिया से रूबरू होते हुए या सोशल मीडिया के माध्यमों से करते हैं। जनता से जुड़े तमाम ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर मुख्यमंत्री की उम्मीद के अनुसार नतीजे नहीं आ रहे है।

मध्य प्रदेश में फसल बीमा में सरकार एंव कंपनियों की नीयत में खोट

                                                      
विनोद के. शाह
Shahvinod69@gmail.com

राज्य सरकार द्धारा एक साल से अधिक समय तक अपने प्रीमियम अंशदान को लटकाकर कर किसानो के मिलने वाले फसल नुकशान क्लेंब को जानबूझकर विलंवित किया है। तहलसील प्रशासन के अपूर्ण नुकशान आंकलन से राज्य का 75 फीसदी किसान वितरित फसल बीमा के लाभ से वंचित हो चुका है। सवसे बडा आश्चर्य तो यह कि जिस बीमा वितरण के लिये प्रदेश के मुख्यमंत्री किसान को राहत देने की बात कर अपनी पीठ थपथपा रहे है। उस बीमा का 2990 करोड किसानो को वितरित करने के बाद भी बीमा कंपनियों ने 1478.86 करोड का शुद्ध लाभ कमाया है। राज्य में किसानो की नही सिर्फ बीमा कंपनियों की बल्ले—बल्ले हो रही हे।

उमेश कुमार पत्रकार Umesh Kumar Journalist (भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show)


रंजना त्रिपाठी पत्रकार Ranjana Tripathi journalist (भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show)


पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी Journalist Ramdutta Tripathi (भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show)


भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show : संजीव क्षितिज, दिवाकर प्रताप सिंह, अंकित माथुर, एलएन शुक्ला, नवीन सिन्हा


कोरोना लड़ाई के साथ ही जैविक हथियारों को निष्क्रिय कर मानवता की ओर लौटे दुनिया

चरण सिंह राजपूत

यह तो स्पष्ट हो गया है कि कोरोना वायरस चीन की लैब से आया है। जिस तरह से इस वायरस ने दुनिया में अपना रोद्र रूप दिखाया है, इससे यह भी लगभग साफ हो गया है कि यह कोई प्राकृतिक वायरस नहीं बल्कि एक जैविक हथियार है। अमेरिका और रूस ने एक तरह से इसके जैविक हथियार होने पर अपनी मुहर भी लगा दी है।

एक झटके में मजदूर को सड़क पर ला देना वाला कानून बदल देना ही बेहतर

अजय कुमार, लखनऊ

उस श्रम कानून के बदलने पर किसी को भी हो-हल्ला नहीं मचाना चाहिए जो मजदूरों का भविष्य इतना भी सुरिक्षत नहीं रख सकता हो कि यदि किसी मजदूर को एक महीने का वेतन नहीं मिले तो वह भुखमरी की कगार पर पहुंच जाए। जो मजदूर दिन-रात खून-पसीना बहाकर उद्योगपतियों, पंूजीपतियों और बिजनेस घरानों की तिजोरियां भरने और आलीशान कोठियां खड़ी करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं,उसमें से अधिकांश को अपने लिए छत तक नसीब नहीं हो पाती है। इनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने और मिड-डे-मिल के सहारे पेट भरने के लिए मजबूर होते हैं, तो दूसरी तरफ जिसके लिए यह जीवन भर जाड़ा-गर्मी-बरसात की परवाह किए बिना मेहनत करते हैं उन पैसे वालों के बच्चे देश-विदेश के मंहगे स्कूलों में, आलीशान गाड़ियों में बैठ कर पढ़ने जाते हैं।

मेहनतकशों को चाहिए नया गणतंत्र!


लाल बहादुर सिह
नेता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट


देश के बहुसंख्य आमजन-मेहनतकशों के लिए ऐसी सरकार, ऐसे राज्य के बने रहने का तर्क (Raison d'être) खत्म हो गया है!  कोरोना की आपदा तो वैश्विक है, लेकिन इससे जिस तरह हमारे देश में निपटा जा रहा है, उसने मजदूरों की जिस दिल दहला देने वाली अकल्पनीय यातना को जन्म दिया है, उसका पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है ! आने वाले कल कोई संवेदनशील इतिहासकार/पत्रकार/साहित्यकार जब इन दुःख की इन महागाथाओं, शासकों की अनन्त क्रूरता और मजदूरों की अदम्य जिजीविषा को लिपिबद्ध करेगा तो वह विश्व इतिहास का मानव पीड़ा का सबसे महाकाव्य बन जायेगा। आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी के हम साक्षी है!

दलबदल विरोधी कानून के परिणाम

पी. के. खुराना

इसी सप्ताह मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर की ओर से एक वेबिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय था भारतवर्ष में दलबदल विरोधी कानून का विश्लेषण। इस वेबिनार में मुख्य वक्ता भारतवर्ष के अतिरिक्त महाधिवक्ता सत्यपाल जैन थे। चूंकि यह वेबिनार मूलत: अकादमिक प्रकृति का था और लॉ सेंटर के विद्यार्थियों के ज्ञानवर्द्धन के लिए था इसलिए इस मंच पर खुल कर बोलने में कोई परेशानी नहीं थी और यह सच है कि सत्यपाल जैन जो बोले, खुलकर बोले और उन्होंने इस कानून की बहुत सी खामियों की ओर ध्यान दिलाया।

चुनार को अपनी चुप्पी तोड़ने का वक्त है

चुनार के हम सभी नागरिक, प्रबुद्धजन सहित तमाम सामाजिक संगठने अपने अति प्राचीन इतिहास की गौरव गाथा गाते हुए नहीं अघाते हैं। देश के किसी दुसरे हिस्से मे पहुचने पर लगता है कि अपना परिचय और अपने नगर का पहचान बताने के लिए इस दुर्ग और तमाम प्राचीन धरोहरो के अलावा कुछ है ही नहीं। बावजूद इन सबके सभी अपनी तमाम ऐतिहासिक धरोहरों की प्राचीनता को बराबर पहुंचाई जा रही क्षति को कैसे देख कर बर्दाश्त कर रहे हैं। इतना ही नहीं  यदि कोई नागरिक ऐसी कृत्यो को गंभीरता से  उठाता भी है तो  उसके साथ  खड़े होने की बजाय मूकदर्शक बनकर तमाशा देखना ही पसंद करते हैं । कही यह  स्थिति प्रचलित दोहरी चरित्र का नमुना तो नही है। पिछले कई वर्षों से लगातार यहां की पुरातात्विक महत्व की संरक्षित धरोहरों की  प्राचीनता से छेड़छाड़ की लगातार पुनरावृति तो यही साबित कर रही है। हर घटना के बाद किसी कोने से आवाज उठती है। मामले की जांच होती है,गाहे-बगाहे किसी प्रकार प्राथमिकी भी दर्ज हो जाती है किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही साबित  दिखता है। ऐसे मे चुनार के जन जन की प्रबल पहचान का दावेदार ये दुर्ग सहित अन्य बेजुबान धरोहर सभी से पूछ रहे है कि क्या हम तुम्हारे पहचान के बीच अपनी शुरक्षा  के हकदार भी नही है?       

प्रवासी मजदूरों के प्रति पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था के बर्बर रूख का पर्दाफाश

राजेश सचान
संयोजक युवा मंच


रेलवे ने 12 मई से 15 जोड़ी यात्री  एसी ट्रेन चलाने का निर्णय लिया है। इसमें लाकडाऊन में फंसे हुए लोग यात्रा कर सकते हैं अन्य कोई शर्त नहीं है। लेकिन अभी भी जो दसियों लाख #प्रवासी मजदूर देशभर में फंसे हुए हैं उनके लिए चलाई जा रही श्रमिक स्पेशल ट्रेन में मजदूरों को पहले पंजीकरण कराना होगा उसके बाद संबधित राज्य तय करेंगे कि किसे ईजाजत देना है और किसे नहीं।

10.5.20

कोरोना संकट की आड़ में तानाशाही की ओर बढ़ रही सरकारें – दारापुरी


लखनऊ  : “कोरोना संकट की आड़ में तानाशाही की ओर बढ़ रही सरकारें” यह बात एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने प्रेस को जारी बयान में कही है. उन्होंने कहा है कि यह सही है कि  कोरोना से लड़ने के लिए सरकारों को कुछ विशेष व्यवस्थाएं एवं नियम कानून लागू करने पड़ते हैं ताकि इस में किसी प्रकार की अनावश्यक बाधा उत्पन्न न हो. परन्तु इसकी आड़ में  सरकारें कड़े कानून बना कर तानाशाही को ओर बढ़ रही हैं. हमारे देश में महामारी से लड़ने हेतु एक कानून अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है जिसे “द एपिडेमिक डिज़ीज़ज़ एक्ट- 1897’ अर्थात ‘महामारी रोग  अधिनियम 1897’ के नाम से जाना जाता है. इस एक्ट के अंतर्गत पारित आदेशों का उलंघन धारा 188 आईपीसी में दंडनीय है जिसमें 1 महीने की साधारण जेल और 200 रुo जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

इस बार बाजार को ‘अम्मां’ याद आएगी



मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार

ज्यादतर लोग भूल गए हैं कि आज 10 मई है। 10 मई मतलब वैष्विक तौर पर मनाया जाने वाला ‘मदर्स डे’। ‘मदर्स डे’ मतलब बाजार का डे। इस बार यह डे, ड्राय डे जैसा होगा। बाजार बंद हैं। मॉल बंद है। लोग घरों में कैद हैं तो भला किसका और कौन सा ‘मदर्स डे’। अरे वही वाला मदर्स डे जब चहकती-फुदकती बिटिया अम्मां से नहीं, मम्मी से गले लगकर कहती थी वो, लव यू ममा... ममा तो देखों मैं आपके लिए क्या गिफ्ट लायी हूं... इस बार ये सब कुछ नहीं हो पाएगा। इस बार मम्मी, मम्मा नहीं बल्कि मां और अम्मां ही याद आएगी। ‘मदर्स डे’ सेलिब्रेट करने वाले बच्चों को इस बार अम्मां के हाथों की बनी खीर पूड़ी से ही संतोष करना पड़ेगा। मम्मा के लिए गिफ्ट लाने वाले बच्चे अब अम्मां कहकर उसके आगे पीछे रसोई घर में घूूमेंगे। बच्चों से ज्यादा इस बार बाजार को अम्मां याद दिलाएगी। मां के लाड़ को, उसके दुलार को वस्तु बना दिया था बाजार ने। यह घर वापसी का दौर है। रिष्तों को जानने और समझने का दौर है। कोरोना के चलते संकट बड़ा है लेकिन उसने घर वापसी के रास्ते बना दिए हैं। ‘मदर्स डे’ तो मॉल में बंद रह गया लेकिन किचन से अपनी साड़ी के पल्लू से जवान होती बिटिया के माथे से पसीना पोंछते और उसे दुलारने का मां का खालीपन इस ‘मदर्स डे’ पर भरने लगा है।

9.5.20

पत्रकार की मृत्यु पर शोक


अयोध्या । यू पी जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) अयोध्या इकाई की एक आकस्मिक बैठक परिक्रमा मार्ग स्थित कांशी राम कालोनी मे विवेक वर्मा के आवास पर संपन्न हुई। बैठक में आगरा जनपद के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ठ के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर जिंदगी की जंग हारने पर दुख व्यक्त किया और आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना तथा सरकार से  कोरोना वारियर्स का दर्जा देने की मांग किया और परिवार को इस दुख की घड़ी में दुख सहन करने की ईश्वर से कामना किया।

8.5.20

सड़कें यूं उदास तो न थी ….!!

सड़कें यूं उदास तो न थी ….!!: तारकेश कुमार ओझा अपनों से मिलने की ऐसी तड़प , विकट प्यास तो न थी शहर की सड़कें पहले कभी यूं उदास तो न थी पीपल की छांव तो हैं अब भी मगर बरगद की जटाएंं यूं निराश तो न थी गलियों में होती थी समस्याओं की शिकायत मनहूसियत की …

इनके हिस्से का हक भी, कैसे तुम हजम कर जाते हो

Chander Mauli 

देखो ये सड़कों पर भीड़ , देखो इसका हाल
कुछ तो रहम करो मेरे देश के बड़े बड़े नेताओं
नहीं तो भगवान करेगा तुम्हारा भी यही हाल

ये वही लोग हैं वोट के लिए जिनको गले लगाते हो
काम निकला तो फिर पास भी नजर नही आते हो

कोरोना काल में जनता का दर्द


ANUPAM SRIVASTAVA
आज इस कोरोना महामारी में यह प्रश्न उठता है कि आम आदमी की बुनियादी आवश्यकता और सुविधा के लिए  इस देश की 73 साल बूढ़ी आजादी ने क्या किया? क्या यही किया कि 15-20 फिसदी वोटर्स को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया और सत्तारूढ़ होकर बैठ गए।

लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाओ, जनता खुद जीत लेगी कोरोना से यह लड़ाई


CHARAN SINGH RAJPUT
देश में जिस तरह से कोरोना संक्रमण और मौत की संख्या बढ़ रही है। जिस तरह से एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कोरोना संक्रमण का जून में चरम बताया है। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि देश में कोरोना का कहर अभी और बढ़ेगा। मतलब यह कहर लंबा चलना है। हम लोग जो यह समझ रहे थे कि भारत में कोरोना का दूसरे देशों से कम होगा और हम जल्द ही इस पर काबू पा लेगा, इसमें अब संदेह लगने लगा है।

लॉकडाउनन 4.0 : आएगा या नहीं आएगा?



अजय कुमार, लखनऊ   


लाक डाउन खुलने की तारीख (18 मई) ज्यों जो निकट आ रही है, त्यों तो लोगों के दिमाग में अब आगे क्या होगा ? यह सवाल यक्ष प्रश्न बनकर लोगों के सामने खड़ा होता जा रहा है। ऐसा इस लिए हुआ है क्योंकि कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए लाक डाउन लगाया गया था और लॉक डाउन थ्री खत्म होने की समय सीमा करीब आने के बाद भी कोरोना महामारी थमने का नाम ही नहीं ले रही है। बल्कि और अधिक तीव्रता से बढ़ती ही जा रही है। कोरोना महामारी के चलते देश के जो हालात बने हुए हैं,उससे केन्द्र की मोदी सरकार के साथ-साथ तमाम राज्यों की सरकारें तक ‘हिली’ हुई हैं।

नारद जयंती पर विशेष : व्यापक लोकहित ही पत्रकारिता का नारदीय सूत्र

जयराम शुक्ल
मनुष्य चाहे दुर्जन हो या सज्जन, सत्य हमेशा उसकी आँखों में भटकटैया की भाँति गड़ता है। स्तुति देवताओं को भी पसंद थी और दानवों को भी। यहां नेता भी स्तुति जीवी है और  खलनेता भी। इसलिए वहां देवर्षि नारद देव-दानवों को खटकते थे और यहां पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। वैसे भी पत्रकार देवर्षि नारद के ही वंशज समझे जाते हैं।

माननीय रहने तक बोले नहीं, तो अब इलहाम कैसे हुआ!


Nand kishor Pareek

राजकीय सेवाकाल से निवृत्त होना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन कई दूरद्रष्टा इसे खास बना देते हैं, जैसे कि माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति श्रीमंत दीपक जी गुप्ता साहेब ने किया।

देवकमल हास्पिटल ने लॉकडाउन की आड़ लेकर अपने इंप्लाई की सेलरी रोक दी


From: Sugandha Kumari

Subject: Salary problem


Mai devkamal hospital m kaam krti hu is month mere ghar m kch problem hone ki wajah se hm 2 din ka chutti lekr lockdown m hi ghar aa Gaye jiske liye mujhe pass v bana kr diya gaya..

डॉ. अम्बेडकर का श्रमिक वर्ग को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी का सन्देश

- एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. (से0 नि0), अध्यक्ष मजदूर किसान मंच 
 
बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर न केवल महान कानूनविद, प्रख्यात समाज शास्त्री एवं अर्थशास्त्री ही थे वरन वे दलित वर्ग के साथ-साथ श्रमिक वर्ग के भी उद्धारक थे। बाबा साहब स्वयं एक मजदूर नेता भी थे। अनेक सालों तक वे मजदूरों की बस्ती में रहे थे। इसलिये उन्हें श्रमिकों की समस्याओं की पूर्ण जानकारी थी। साथ ही वे स्वयं एक माने हुए अर्थशास्त्री होने के कारण उन स्थितियों के सुलझाने के तरीके भी जानते थे। इसी लिये उनके द्वारा सन 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारिणी में श्रम मंत्री के समय में श्रमिकों के लिये जो कानून बने और जो सुधार किये गये वे बहुत ही महत्वपूर्ण एवं मूलभूत स्वरुप के है। सन 1942 में जब बाबा साहेब वायसराय की कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने थे तो उन के पास श्रम विभाग था जिस में श्रम, श्रम कानून, कोयले की खदानें, प्रकाशन एवं लोक निर्माण विभाग थे.

भारतीय मीडियाः गरिमा बहाली की चुनौती

प्रो. संजय द्विवेदी

      भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा और उन आवाजों का उत्तर बनेगा जो उसे कभी पेस्टीट्यूट, कभी पेड न्यूज तो कभी गोदी मीडिया के नाम पर लांछित करती हैं। जिनकी समाज में कोई क्रेडिट नहीं वह आज मीडिया का हिसाब मांग रहे हैं। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे लोग, वाणी और कृति से अविश्वास के प्रतीक भी मीडिया से शुचिता की मांग कर रहे हैं।

कल्पना, प्रयास और सफलता

पी. के. खुराना
 
कहा जाता है कि ज्ञान शक्ति है, पर क्या आप जानते हैं कि यह एक अधूरा सच है। ज्ञान स्वयं में शक्ति नहीं है। ज्ञान, शक्ति में तभी परिवर्तित होता है जब इसे प्रयोग में लाया जाए। यही नहीं, जब इसे रचनात्मक ढंग से काम में लाया जाए तो यह एक बड़ी शक्ति बन जाता है। ज्ञान के रचनात्मक प्रयोग में कल्पनाशक्ति की आवश्यकता होती है। रचनात्मक कल्पनाशक्ति का विकास उसी तरह संभव है जैसे हम तैरना, पढ़ना या चित्र बनाना सीखते हैं। वस्तुत: लगभग हर कला को वैज्ञानिक विधि से सीखा जा सकता है। कला और विज्ञान के इस संगम ने ही मानव की अपरिमित ऊँचाइयों तक पहुंचाया है।

6.5.20

लघुकथा: यार ये कोरोना है....

यार ये कोरोना है....



"यार भाई! आप भी ग़ज़ब हो, क्या मुझे कोरोना है जो हाथ मिलाने से भी बच रहे हो, गले मिलना तो बहुत दूर! कमाल हो यार आप...",
कहते-कहते विश्वास सोनू से रूठ गया। फिर वही ऊटपटांग बोलना और न जाने क्या-क्या कहने लगा।
तभी सोनू ने कहा- "भाई! बात हाथ मिलाने या गले लगने की नहीं है, न ही हमारी दोस्ती इस हाथ मिलाने और गले लगने से कम या ज़्यादा होने वाली है। और यह विषय भी अपने अहम के टकराव का है। बल्कि ये सोच कि गलती से मैं किसी संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आ चुका तो मेरी सज़ा तू क्यों भुगतेगा यार!
ईश्वर न करें ऐसा हो, पर मुझे तेरी ही चिन्ता है।"
विश्वास का स्वर मध्यम और आँखें झुकी हुई थीं, यकीनन यह कोरोना ऐसे ही फ़ैल रहा है। भावनात्मक से थोड़ा किनारा करना बेहतर है, क्योंकि जान है तो जहान है।

*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
हिन्दीग्राम, इन्दौर

3.5.20

शहर वही है ,नजारे बदल गए ...!!

देश - दुनिया की  विडंबना पर खांटी  खड़गपुरिया की चंद लाइनें ....
शहर वही है , नजारे बदल गए   ....!!
तारकेश कुमार ओझा
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मेले वही है , बस इश्तेहारें बदल गए
आसमां वही है , सितारे बदल गए
मायने वही है , मगर मुहावरे बदल गए
आग वही है , अंगारे बदल गए
गलियां वही है , शोर - शराबे बदल गए
शहर वही है , बस नजारे बदल गए
..…............…..

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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ट पत्रकार हैं। संपर्कः 9434453934, 9635221463

30.4.20

पूछता है भारत, कब पीले होंगे हाथ!!

कोरोना को लेकर मौजूदा व्यवस्था पर व्यंग्य
 

शिवाजी राय

कोरोना का भला नहीं होने वाला है...कोरोना ने लोगों से क्या क्या नहीं छीन लिया...अर्से बाद मेरे एक मित्र शादी के बंधन में बंधने जा रहे थे..कि बीच में कोरोना आ धमका...और उनके गुलाबी सपनों पर 20 सेकेंड तक डिटर्जेंट मल कर चला गया...अब मित्र के बचे खुचे ख्वाब भी क्वरंटिन हो चले हैं...

उत्तराखंड के कुछ ख़ास जनपदों से ग्राउंड रिपोर्ट



कुमुद ऋषभ


खुदरा एंव  अन्य समुदाय के व्यापारियों  समेत उत्तराखंड राज्य के दुर्गम व सुगम क्षेत्रों के बाशिन्दों को करना पड़ रहा  मुश्किलों का सामना :

भारत में कोरोना वायरस से बचने के लिए केंद्र सरकार ने  देश को 14 अप्रैल तक लॉक डाउन करने का एलान किया था। बाद में इसे बढ़ाते हुए 3 मई तक कर दिया है जिससे नागरिकों को तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर उन लोगों को ज्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है जो प्रवासी मजदूर और ठेला-खुमचा लगाने वाले लोग और स्थानीय एंव प्रवासी व्यापारी इसमें कुछ अल्पसंख्यक समुदाय के व्यापारी भी शामिल हैं।

कहानी अधूरी छोड़कर जाने वाला नायक इरफान ख़ान

“दुख सबको माँजता है / और चाहे स्वंय सबको मुक्ति देना वो न जाने / किन्तु जिनको माँजता है/ उन्हें ये सीख देता है कि सबको मुक्त रखे” – अज्ञेय

जैविक बीमारी कोरोना नें हमें हमारे दुख में भी अकेला कर दिया है। अपने-अपने घरों में रहते हुए दुख की घड़ी में किसी को गले नहीं लगा सकते। लेकिन, यही दुख हमें जोड़ भी रहा है। हमारे भाव एवं विचार इस संकट की घड़ी में एक-दूसरे के साथ हैं। आज सुबह अभिनेता इरफ़ान ख़ान की मृत्यु ने हमें एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। साहित्य, सिनेमा, राजनीति, मीडिया ही नहीं, हर विचार, हर क्षेत्र के लोगों के लिए अभिनेता इरफ़ान ख़ान का जाना एक दुखद संदेश है।

ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब का कारोबार फल-फूल रहा है

कालाढूंगी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के निर्देशन पर जिले में चलाए जा रहे कच्ची शराब बनाने और अवैध तरीके से शराब की तस्करी करने वालों पर लगातार  पुलिस द्वारा धरपकड़ जारी है लेकिन ऐसे लॉकडाउन में भी शराब की दुकानें बंद होने का फायदा उठाते हुए अवैध कच्ची शराब बेचकर मुनाफा कमाने की जुगत लगा रहे है ऐसे माफियाओ के हौसले बुलंद है । इस दौरान लॉकडाउन के चलते शराब की दुकानें बंद हैं ऐसे में ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब का कारोबार फल-फूल रहा है।

निगेटिव न्यूज ट्रैक के तहखाने में कैद...


प्रिंस कुमार


पत्रकारिता से जुड़े कुछ साहसी और जाबाज पत्रकारों के कारण ही देश का चौथा स्तंभ वर्तमान समय में चारो खाने चित होने से बचा हुआ है। लेकिन इन पत्रकारों के सामने निगेटिव और पॉजेटिव न्यूज मोड ने बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। अखबार से लेकर बड़े-बड़े न्यूज चैनल तक पॉजेटिव खबर को तरजीह देते हैं।

28.4.20

कारपोरेट घरानों पर सम्पत्ति कर लगा संसाधन जुटाने की जगह कोरोना योद्धा सरकारी कर्मियों पर ही कहर ढा रही सरकार

कारपोरेट पर सम्पत्ति कर लगा संसाधन जुटाए सरकार

 कोरोना योद्धा कर्मचारियों पर दमन ढाना बंद करे सरकार

भत्तों व डीए कटौती समेत सभी मजदूर विरोधी फैसले लिए जाएं वापस

लखनऊ : कोरोना के खिलाफ जमीनीस्तर पर युद्ध लड़ रहे कर्मचारियों के डीए व भत्तों में कटौती कर उनका मनोबल तोड़ने और काम के घंटे बढ़ाने, छटंनी करने जैसे मजदूर विरोधी फैसलों को सरकार को तत्काल प्रभाव से वापस लेना चाहिए और संसाधन जुटाने के लिए कारपोरेट घरानों पर सम्पत्ति कर लगाकर कोरोना संक्रमण के विरूद्ध कार्य करना चाहिए। यह प्रतिक्रिया वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष व स्वराज अभियान नेता दिनकर कपूर ने प्रेस को जारी अपने बयान में व्यक्त की।

23.4.20

पृथ्वी दिवस पर विशेष : धरती माता को बुखार, है कोई सुनने वाला!

जयराम शुक्ल

इस साल धरतीमाता को पूरे साल शरद-गरम रहा। जब हम धूप की उम्मीद करते तो पानी गिरता। जब चाहते कि इंद्रदेव खेती पर कृपा करें तब आसमान से आग बरसती। कभी आँधी-तूफान, तो कभी ओला-पाला। धरती माता की तबियत ठीक ही नहीं हो रही, उसे बुखार है, वह तप रही है। उसे कभी निमोनिया होता है तो कभी फ्लू। हम अपने में ही मरे जा रहे, अपने में ही मस्त और त्रस्त हैं। जो माता हमें पालती है उसकी सुधि लेने का वक्त नहीं।

मीडियाकर्मी भी कोरोना फाइटर्स जैसा सम्मान और सुरक्षा पाने के हकदार

कृष्णमोहन झा

देश में कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने  से रोकने के लिए जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने लाक डाउन लागू करने की घोषणा की तो अधिकांश आबादी की ज़िन्दगी घर की चहार दीवारी के भीतर सिमट कर रह गई  और जब देश के विभिन्न राज्यों में इस वायरस के संक्रमण का दायरा बढने लगा तो  यह जानने के लिए लोगों की अधीरता भी बढने लगी कि देश के किस राज्य में कोरोना वायरस के संक्रमण की क्या स्थिति है | लोगों की यह अधीरता अभी भी बरकरार है बल्कि अगर यह कहें कि कोरोना को लेकर देश दुनिया के हालात जानने की यह उत्सुकता पहले से भी अधिक बढ़ गई है तो गलत नहीं होगा |

22.4.20

कोरोना काल में मेरा शहर खड़गपुर भी इंटरनेशनल हो गया ...!!

कोरोना काल में  मेरा शहर खड़गपुर  भी इंटरनेशनल हो गया ...!!
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तारकेश कुमार ओझा

कोरोना के कहर ने वाकई दुनिया को गांव में बदल दिया है . रेलनगरी खड़गपुर का भी यही हाल है . बुनियादी मुद्दों की जगह केवल कोरोना और इससे होने वाली मौतों की चर्चा है . वहीं दीदी -मोदी की  जगह ट्रम्प और जिनपिंग  ने ले ली है .
सौ से अधिक ट्रेनें ,  हजारों यात्रियों का  रेला  , अखंड कोलाहल और चारों पहर ट्रेनों की  गड़गड़ाहट जाने कहां खो गई . हर समय व्यस्त नजर आने वाला खड़गपुर रेलवे स्टेशन इन दिनों बाहर से किसी किले की  तरह दिखाई देता है. क्योंकि स्टेशन परिसर में लॉक डाउन के  दिनों से डरावना सन्नाटा है. स्टेशन के  दोनो छोर पर बस कुछ सुरक्षा जवान ही खड़े नजर आते हैं . मालगाड़ी और पार्सल ट्रेनें जरूर चल रही है . आलम यह कि स्टेशन में  रात - दिन होने वाली जिन उद्घोषणाओं से  पहले लोग झुंझला उठते थे , आजकल वही उनके कानों में  मिश्री घोल रही है . माइक बजते  ही लोग ठंडी सांस छोड़ते हुए कहने लगते है़ं ... आह बड़े दिन बाद सुनी ये आवाज ...उम्मीद है जल्द ट्रेनें चलने लगेगी ....। रेल मंडल के दूसरे स्टेशनों का भी यही हाल है . यदा - कदा मालगाड़ी और पार्सल विशेष ट्रेनों  के  गुजरने पर ही इनकी मनहूसियत कुछ दूर होती है . हर चंद मिनट पर पटरियों पर दौड़ने वाली तमाम मेल , एक्स्प्रेस और लोकल ट्रेनों के  रैक श्मशान से सन्नाटे में डूबी वाशिंग लाइन्स पर मायूस सी खड़ी है . मानों कोरोना के  डर से वे भी सहमी हुई है . नई पीढ़ी के  लिए लॉक डाउन अजूबा है , तो पुराने लोग कहते हैं ऐसी देश बंदी या रेल बंदी न कभी देखी न सुनी । बल्कि इसकी कभी कल्पना भी नहीं की  थी . कोरोना का  कहर न होता तो खड़गपुर इन दिनों नगरपालिका चुनाव की  गतिविधियों में आकंठ डूबा होता .चौक - चौराहे सड़क , पानी , बिजली और जलनिकासी की चर्चा से सराबोर रहते , लेकिन कोरोनाकाल से  शहर का मिजाज मानों अचानक इंटरनेशनल हो गया . लोकल मुद्दों पर कोई बात ही नहीं करता .एक कप चाय या गुटखे की  तलाश में  निकले शहरवासी मौका लगते ही कोरोना के  बहाने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की  चर्चा में  व्यस्त हो जाते  हैं . सबसे ज्यादा चर्चा चीन की  हो रही है . लोग गुटखा चबाते  हुए कहते हैं ....सब चीन की  बदमाशी है ....अब देखना है अमेरिका इससे कैसे निपटता है ....इन देशों के साथ ही इटली , ईरान और स्पेन आदि में  हो रही मौतों की  भी खूब चर्चा हो रही है . कोरोना के असर ने शहर में   हर - किसी को अर्थ शास्त्री बना दिया है. एक नजर पुलिस की  गाड़ी पर टिकाए  मोहल्लों के  लड़के कहते हैं ....असली कहर तो बच्चू   लॉक डाउन खुलने के  बाद टूटेगा ... बाजार - काम धंधा संभलने  में  जाने कितना वक्त लगेगा . कोरोना से निपटने के राज्य व केंद्र सरकार के  तरीके भी जन चर्चा के  केंद्र में  है .
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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ट पत्रकार हैं। संपर्कः 9434453934, 9635221463

20.4.20

इसे कहते हैं"कर्म"योगी होना...!

इसे कहते हैं"कर्म"योगी होना...
ये कोई योगी ही कर सकता है।वैसे तो उन्हें कल रात ही पता चल गया था कि उनके इस भौतिक शरीर को जन्म देने वाले पिता अंतिम सांसें गिन रहे हैं। सूचना कभी भी आ सकती है।कोई दूसरा मुख्यमंत्री या सामान्य व्यक्ति भी होता तो इतनी खबर पर ही उपलब्ध साधन के आधार पर पिता के पास पहुंचने की कोशिश करता मगर योगीजी ने ऐसा नहीं किया बल्कि एक मुख्यमंत्री के रूप में कोरोना रूपी वैश्विक आपदा के समय अपने कर्तव्यों को अंजाम देने में जुटे रहे।और आशंका के बीच आज सुबह ऐसी ही एक मीटिंग के दौरान जब उन्हें अपने पिताजी के गोलोकवासी होने की सूचना मिली तो वे क्षण भर के लिए विचलित तो हुए और ऐसा होना प्राकृतिक रूप से स्वाभाविक भी है।फिर उन्होंने एक योगी की तरह अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया।एक साधक की तरह अपनी भावनाओं और कर्तव्यों के बीच संतुलन साधा।




और जुट गए फिर अपने कर्तव्यपथ पर। एक मुख्यमंत्री के रूप में अपने राजधर्म को उन्होंने अपने पुत्रधर्म पर वरीयता देते हुए जो संदेश इस पत्र में अपने परिजनों को भेजा है, उसे पढ़िये आप लोग......


 "इसे कहते हैं "कर्म" योगी होना" मुझे गर्व है कि @Myyogiaditynath हमारे मुख्यमंत्री हैं।पितृशोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके साथ हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और दुःख की इस घड़ी में परिजनों को संबल प्रदान करे🙏

19.4.20

कोरोना कहर ने बना दी तीसरे विश्वयुद्ध की भूमिका, जैविक हथियारों के इस्तेमाल होने की पूरी आशंका?



द्वितीय विश्व युद्ध में जब अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा और नागाशाकी पर परमाणु बम गिराया तो उसके ऐसे दुष्परिणाम सामने आये कि दुनिया में मानवता को बचाने के लिए परमाणु नीति पर विश्वस्तरीय मंथन हुआ। परमाणु बम पर प्रतिबंध के लिए कड़े नियम कानून बने। जैविक हथियारों के प्रतिबंध के लिए विश्वस्तरीय नीति बानी।

कोरोना महामारी ने झुठलाया शोले फिल्म का चर्चित संवाद


  
भारतीय फिल्म जगत की एक चर्चित फिल्म है शोले वैसे तो इस फिल्म मे अनेको संवाद भारतीय दर्शको मे चर्चित है जो गाहे बगाहे अब भी दोहराए जाते है फिल्म के विलेन गब्बरसिह का उक्त संवाद "जो डर गया समझो मर गया"  बहुत चर्चित हुआ एवं साहस दिखाने का परिचायक भी बन गया था इस बहुचर्चित संवाद को कोरोना माहमारी के दौरान  बदला हुआ यूँ कहे की झुठलाता सा पाया जा रहा है।

क्या प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश की तरफ़ भी देख रहे हैं?

-श्रवण गर्ग

कोरोना से दो-दो हाथ करने को लेकर इस समय दो मॉडलों की बड़ी चर्चा है।पहली,साढ़े तीन करोड़ की आबादी के राज्य केरल की है और दूसरी उससे कोई सौ गुना छोटे राजस्थान के भीलवाड़ा शहर की।केरल की कुल आबादी में कोई 95 लाख और भीलवाड़ा की कुल आबादी में पचास हज़ार मुस्लिम हैं।केरल में 29 जनवरी को कोरोना का पहला केस दर्ज हुआ था और भीलवाड़ा में 20 मार्च को।केरल में अब तक के मृतकों की संख्या तीन है ।15 अप्रैल को केवल एक नया मामला सामने आया था।16 अप्रैल को खाड़ी से लौटने वालों के ज़रूर कुछ नए मामले सामने आ गए।भीलवाड़ा में कोई भी नया मरीज़ नहीं मिला है।

तो कोरोना पर भी शुरू हो गया मैनेज का खेल


मीडिया को समाज का आईना इसलिए  माना जाता है क्योंकि समाज में घटित हो रही गतिविधियों को दिखाने की नैतिक जिम्मेदारी मीडिया की होती है। मीडिया के कंटेंट्स को लेकर गंभीरता बरतने का भी यही कारण रहा है क्योंकि मीडिया समाज को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा तंत्र माना जाता है। आज के मीडिया की बात करें तो कुछ जुनूनी पत्रकारों को छोड़ दें तो पूरे के पूरे मीडिया का काम बस सरकारों और पूंजीपतियों की गलती पर पर्दा डालना और उनका प्रवक्ता बनना रह गया है। मतलब आज की मीडिया का काम बस मैनेज करना और प्रभावशाली लोगों के लिए काम करना रह गया है। कहना गलत न होगा कि समाज के लिए सबसे उपयोगी साबित होने वाला मीडिया आज समाज का सबसे अधिक नुकसान कर रहा है।

17.4.20

अंबेडकरी आंदोलन से दूर सफाई कामगार जातियां

संजीव खुदशाह

वैसे तो दलितों में विभिन्न जातियां होती है। विभिन्न जातियों के पेशे भी भिन्न भिन्न होते है। लोकिन पूरी दलित जातियों के बड़े समूह को दो भागों में बांट कर देखा जाता रहा है। पहला चमार दलित जातियां जो मरी गाय की खाल निकालती और उसका मांस खाती थी। दूसरा सफाई कामगार जातियां जो झाड़ू लगाने से लेकर पैखाना सिर पर ढोने का काम करती रही है।

कोविड -19 की रिपोर्टिंग में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विश्वसनीयता और तथ्यपरकता की जरूरत है - प्रोफेसर बंदना पांडेय


गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के जन संचार एवं मीडिया अध्ययन विभाग ने '  कोविड -19 विमर्श: महामारी का सामना ' विषय पर विभाग के पहले वेबिनार का आयोजन किया


कोरोना वायरस की विश्वव्यापी महामारी से निपटने के लिए और लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए राष्ट्रीय लॉक डाउन का दूसरा चरण तीन मई तक के लिए घोषित किया गया है। संकट की इस घड़ी में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में ऑनलाइन माध्यमों से शिक्षण कार्य जारी है और अत्याधुनिक संचार तकनीकों की सहायता से अनुसंधान और शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक वेबिनार का आयोजन भी किया गया। जीबीयू के जन संचार और मीडिया अध्ययन विभाग की चेयरपर्सन और विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बंदना पांडेय की पहल पर विभाग ने आज '  कोविड -19 विमर्श : महामारी का सामना ' विषय पर  वेबिनार का आयोजन किया।

12.4.20

दौर कुछ ऐसा आया है ....

देश - दुनिया की  विडंबना पर खांटी  खड़गपुरिया की चंद लाइनें ....
दौर कुछ ऐसा आया है  ....
तारकेश कुमार ओझा
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क्या कोलकाता , क्या खड़गपुर
गया  हो या टाटा
कोरोना वायरस से कांपी दुनिया
गांव शहर है सन्नाटा
हर चेहरे पर चस्पा दहशत
दौर कुछ ऐसा आया है .
कैसी होगी भविष्य की दुनिया
सोच कर दिल घबराया है .
घर से चलेंगे बाबुओं के दफ्तर
गरीब भटकेंगे दर - ब- दर
अहसास से मन अकुलाया है ,
दौर कुछ ऐसा आया है .
बंद कमरों में  होली - दीवाली
दूर की  कौड़ी बकलौली - बतरस
व्वाट्सएप पर मिलेंगे स्नेह निमंत्रण
स्क्रीन पर मिटेगी  शादी - बारात की  हसरत
 भयाकुल मन भरमाया है
दौर कुछ ऐसा आया है .

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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ट पत्रकार हैं। संपर्कः 9434453934, 9635221463

गैर-कोरोना मरीजों की मुश्किलें बढ़ीं, इलाज के अभाव में बच्चे ने दम तोड़ा

सेवा में ,

श्रीमान् प्रधानमंत्री जी,

भारत सरकार, नई दिल्ली,                                        

विषय- ग़ैर करोना मरीजों की देखभाल एवं उपचार की तत्काल व्यवस्था के संबंध में ।

महोदय ,                                    

सविनय  एबीपी न्यूज़ चैनल पर आज दिनांक 11 अप्रैल को प्रसारित समाचार का संज्ञान ग्रहण करने का कष्ट करें जिसमें यह बताया गया कि बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में एक महिला पुरुष अपने बच्चे के इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाते हुए किसी प्रकार से स्थानीय अस्पताल में भी पहुंचे तो वहां उसे समुचित इलाज मुहैया नहीं हो पाया। बजाय उसको जहानाबाद के लिए रेफर कर दिया किंतु नहीं उन्हें वहां तक पहुंचने के लिए एंबुलेंस ही उपलब्ध कराया गया, नहीं कोई व्यवस्था की गयी। इलाज के अभाव में बच्चे ने अंततः दम तोड़ दिया।

राजतंत्र से भी ज्यादा घातक साबित हो रहे हैं लोकतंत्र के ये शासक


CHARAN SINGH RAJPUT

लोकतंत्र में जनता का राज माना जाता है। मतलब शासक से बड़ी जनता होती है। क्या आज के शासक जनता के प्रति समर्पित हैं ? क्या लोकतंत्र की दुहाई देने वाले ये  शासक जनहित ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं ? आज के हालात से तो बिल्कुल नहीं लग रहा है। दुनिया में तमाम प्रतिबंध के बावजूद, मानवता पर काम करने का दावा करने वाले अनगिनत संगठनों के बावजूद प्रभाव शाली देशों के शासक अपना धंधा चमकाने के लिए जनता के ही दुश्मन बने हुए हैं।  लोकतंत्र के रखवाले ही लोकतंत्र की ऐसी की तैसी करने में लगे हैं। जनता की आवाज को दबाने के लिए हद से गुजरा जा रहा है।  रोजी रोटी को दरकिनार कर हथियारों की खरीद फरोख्त दुनिया की पहली प्राथमिकता बनकर रह गई है।

9.4.20

करोना और तीन-बटे-तीन

पी. के. खुराना

बहुत से समाचारपत्रों में देवभूमि हिमाचल की पहाड़ियों और बस्तियों की सुंदर तस्वीरें छप रही हैं जो पंजाब और चंडीगढ़ में रह रहे लोगों ने अपने घर से ही देखीं। हिमाचल प्रदेश रमणीक तो है ही पर अब ट्रैफिक न होने और कारखानों का धुंआ न होने की वजह से हवा साफ हो गई है, हवा में ही नहीं, नदियों में भी प्रदूषण कम हो गया है, दिल्ली में यमुना नदी खुद-ब-खुद साफ हो गई है। हम लोग अपने-अपने घरों से ही प्रकृति का यह नज़ारा देख पा रहे हैं। शहरों की सड़कों पर वन्य जीव निर्भय विचरण करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं हिरन घूम रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं। प्रकृति ने शहरों से मानो अपना हक मांगा है।

कोराना काल में नफ़रत व भेदभाव

( भंवर मेघवंशी )

हमारी संचित नफरतें कोराना के कुदरती कहर के वक्त भी उसी तरह प्रकट हो रही है ,जैसे सामान्य दिनों में होती रहती है ,वैसे भी जाति और धर्म आधारित घृणायें तात्कालिक नहीं होती है ,यह हमारे देश में लोगों के दिल ,दिमाग में व्याप्त है ,उसे थोडा सी हवा मिले तो अपने सबसे शर्मनाक स्तर पर बाहर आ जाती है .

FIR against Pramod Boro for spreading lie about Covid-19


New Delhi, 09 April 2020: Suleman Narzary, a resident of Kokrajhar Rupathi Nagar Ward No. 3, BTC Assam, lodged an FIR against Promod Boro, the President of UPPL(United People’s Party Liberal),a regional political party of Bodoland Territorial Council Assam at Kokrajhar Police Station on Monday under the IPC Section 182, 505 (1) (b) for spreading False information on the Covid-19 Pandemic.

कोई बोतल पड़ी है क्या ?

आजकाल दोस्तों/ रिश्तेदारों के फोन आते है। बडी आत्मीयता से पूछते हैं, कैसा चल रहा है ?  स्वास्थ कैसा है ? स्वास्थ ठीक रखने के बारे मे हिदायतें भी देते है।

मनरेगा मजदूरों का पैसा कब तक हजम करते रहेंगे ग्राम प्रधान



 सौरभ सिंह सोमवंशी

 शनिवार को जौनपुर के जिलाधिकारी दिनेश कुमार अपने कार्यालय में बैठे हुए थे उनके पास मोबाइल के व्हाट्सएप पर एक मैसेज आता है। जिसमें पचोखर गांव का एक पीड़ित सुभाष निषाद यह कह रहा है कि हमारे गांव के प्रधान पति श्री पहाड़ू यादव ने हमारे खाते से 4900 रुपए निकाल लिए और हमें सिर्फ 400रूपये दिया। इसमें बैंक मित्र ने भी प्रधान पति की मदद की।

आज हर मुस्लिम को जमाती समझा जाने लगा है

मुस्लिमों के प्रति दिनों दिन नफरत भारत के लोगों में कौन फैला रहा है ?
 
मुस्लिमों के प्रति दिनों दिन नफरत भारत के लोगों में जो फैल रही है. ऐसा भी कह सकते हो कि फैलाई जा रही है.इस बात को आप लोगों को बहुत ही गहराई से समझना होगा.क्योंकि बहुत बड़ा षड्यंत्र रचा गया है.जिसे समझना हर भारतवासी को बहुत जरूरी है.

मुसलमानों के बाद दलितों का नंबर आएगा

संजीव खुदशाह
कोरोना लॉक डाउन के दौरान डॉक्टर अंबेडकर की जयंती (14 अप्रैल) पड़ने वाली है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि बहुजन समाज या अंबेडकरवादी लोग चाहे वह किसी भी जाति से ताल्लुक रखते हो भावनावश अंबेडकर की जयंती को हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे।

झारखंड में कोरोना वायरस से पहली मौत, सरकार पर उठते सवाल


रूपेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार

झारखंड में कोरोना वायरस से मौत का सिलसिला शुरु हो गया है। बोकारो के गोमिया प्रखंड के बुजुर्ग मो. याकूब ने 8 अप्रैल को देर रात करीब डेढ़ बजे दम तोड़ दिया।बोकारो सिविल सर्जन डाॅ. अशोक कुमार पाठक ने कहा कि यह बुजुर्ग बीजीएच में बने आईसोलेशन वार्ड में भर्ती था।

5.4.20

टार्च जलाकर कोरोना भगाने की कवायद

उत्सव धर्मिता भी मानवीय स्वभाव का अभिन्न पहलू है। लोग अपनी धार्मिक अभिव्यक्तियों के लिए भी उत्सव धर्मिता का सहारा लेते हैं जबकि धर्म मुख्य रूप से साधना और समाधि का एकान्तिक विषय है। इसे देखते हुए उत्सव प्रियता के कारण किसी व्यक्ति या समाज का मखौल उड़ाने का कोई औचित्य नहीं है।

4.4.20

क्या कोरोना के उपचार की कोई जड़ी बूटी जंगलों में होगी?


वैज्ञानिक, तकनीकी क्रांति के बूम की बजाय इससे पहले का युग आज होता तो कोरोना महामारी रोकने के लिए लोग प्रयोगशाला में वैक्सीन विकसित होने की प्रतीक्षा करने की बजाय देहाती वैद्य के पास पहुंचते जो उनके विश्वास के मुताबिक जंगल जाकर एक वनस्पति उखाड़ लाता जिसमें इस बीमारी का सहज निदान छुपा होता।

31.3.20

वनवास हुआ लॉकडाउन का एकांतवास ....

कोरोना के  खौफ पर खांटी  खड़गपुरिया की एक और  ....
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वनवास हुआ लॉकडाउन का  एकांतवास  ....
तारकेश कुमार ओझा
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वनवास हुआ लॉकडाउन
का  एकांतवास
खलने लगी जबरदस्ती की आराम तलबी 
तड़पाने  लगी वो स्थगित जिंदगी  ,
फिर लौटे मैदानों में  खेल
पटरियों पर दौड़े धड़धड़ाती रेल  ,
समझ आने लगी उन पलों की  अहमियत
दोस्तों संग एक कुल्हड़ चाय की कीमत ,
भागे मनहूसियत , मिटे  विधि का  लेखा
लौटे रौनक , सजे दुनिया का  मेला
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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ट पत्रकार हैं। संपर्कः 9434453934, 9635221463

28.3.20

कोरोना के चलते यूपी हुआ अपराध मुक्त


अजय कुमार,लखनऊ

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सरकार किसी भी दल की रही हो,लेकिन सबके सामने कानून व्यवस्था हमेशा एक जैसी बड़ी चुनौती बनी रही। समाजवादी सरकारों का तो इस मामले में टैªक रिकार्ड काफी खराब रहा ही,योगी जैसे सख्त सीएम भी उत्तर प्रदेश को अपराध मुक्त नहीं कर पाए,जबकि अखिलेश राज में जंगलराज का नारा देकर ही भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी। हाॅ कोरोना वायरस आने के बाद जरूर योगी सरकार को इससे राहत मिल गई है। प्रदेश में पहले पहले अमूमन लूट, डकैती, बलात्कार  की 3 से 5 घटनाएं रोज होती है. वहीं 22 मार्च से लेकर 27 मार्च तक कहीं कोई घटना नहीं सुनाई दी। इस बीच हत्या और एक बच्ची से दुष्कर्म की घटना जरूर सामने आई, लेकिन वे पारिवारिक रंजिश या विवाद के चलते हुई थी।

पत्रकार मनोज मिश्रा ने मीडिया वालों के लिए बनाया कंट्रेाल रूम, यहां मिलेगी हर संभव सहायता!


लखनऊ : क्या होगा अगर हममें से कुछ लोग खबर करते हुए कोरोना पीड़ित हो जाएं तो? एक सच जिसका न तो जवाब होगा और न ही सुनने में अच्छा लगेगा -- हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिकित्सकों, अस्पतालकर्मियों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों की तर्ज पर दो बार मीडिया का ज़िक्र अनिवार्य सेवाओं के रूप में किया जो कानों में घुलकर पूरे शरीर को आनंदित करता है - लेकिन ज़मीनी हकीकत से हम मुँह नहीं मोड़ सकते, चिकित्सकों, अस्पतालकर्मियों, पुलिस और सरकारी अधिकारियों की तर्ज पर न तो हमें कोई पेंशन मिलती है और न ही हमारी मौत के बाद हमारे किसी भी आश्रित को कही भी नौकरी मिलने की आस दिखती है -- इस सबके बावजूद हम कलम के सिपाही एकदम विपरीत परिस्थितयों में अपना काम इस यकीन के साथ कर रहें है की हम महत्वपूर्ण हैं और एक अनिवार्य सेवा देते हैं।

कोरोना और ईएमआई : सरकार माई बाप दुहाई!


कहाँ से भरेंगे EMI ? मध्यम वर्गीय परिवार हुई लाचार, सरकार करे इन पर भी विचार, फ्री के नहीं पर समय सीमा के छुट के ये भी हैं हकदार, क्योंकि ये भी हैं भारत सरकार के नागरिक जिम्मेदार...

वैश्विक महमारी कोरोना से पुरी दुनिया परेशान है। इसकी रोकथाम के लिये हर स्तर पर प्रयास जारी है। भारत में भी इसके लिए केंद्र समेत सभी राज्य सरकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ा है। लॉक डाउन से इसे रोकने का प्रयास किया जा रहा है। पुरे विश्व में तेजी से फ़ैल रहे इस बीमारी के लिए अनुभवों के आधार पर लॉक डाउन का कदम उठाया गया जिससे कोरोना वायरस के चेन को तोडा जा सके।

कोरोना की दहशत के बीच पत्रिका में जबरन करवाया जा रहा काम

कोरोना वायरस की दहशत के बीच पत्रिका में कर्मचारियों से जबर्दस्ती कार्य करवाया जा रहा है। कोई कर्मचारी अगर घर से कार्य करने के लिए कहता है तो उसे ऐसा काम बताया जा रहा है, जो वह घर से कर ही नहीं सकता। उसे ऑफिस आने पर मजबूर किया जा रहा है। इसके साथ ही ५० साल से ज्यादा उम्र के कर्मचारियों को ऑफिस बुलवाया जा रहा है।

लाक डाउन में बेजुबानों का भी रखें ध्यान


कुलबीर सिंह कलसी

चंडीगढ़ : आज कल हर कोई corona virus राष्ट्रीय आपदा के नियमों को मानते हुए अपने अपने घर बैठा है।  कोई संदेह नहीं है प्रशासन और चंडीगढ़ पुलिस बल असहाय गरीब लोगों रोजमर्रा की दिहाड़ी दार कमाई करने वाले मजदूरों में भोजन वितरण की सेवा करवा रही है।

भय और भ्रांतियों के बीच फैल रहा कोरोना और उसका डर

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे फर्जी मैसेज

जिस तेजी के साथ कोरोना अपने पांव पसार रहा है। उसी गति से भय और भ्रांतियां भी सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रहीं हैं। इसमें से कुछ सच हैं तो कुछ कोरे अफवाह, जो इस महामारी के बीच फैले हुए डर, अनिश्चितता और उहापोह की स्थिति को और बढ़ा रहे हैं।

27.3.20

शहर अंजान हो गया ..

पेश है कोरोना के  खौफ पर खांटी  खड़गपुरिया की  खास पेशकश ....
शहर अंजान हो गया ....
तारकेश कुमार ओझा
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कोरोना के  कहर में  , अपना ही शहर अंजान हो गया
सुनसान हुए चौक - चौराहे
बाजार वीरान हो गया ,
तिनके - तिनके से जहां थी दोस्ती ,
पहचान ही गुमनाम हो गया ,
लापता हो गई यारी - दोस्ती ,
मुल्तवी हर काम हो गया ,
एक अंजाने  - अनचिन्हे डर के आगे ,
बेबस - बेचारा विज्ञान हो गया

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ट पत्रकार हैं। संपर्कः 9434453934, 9635221463

25.3.20

बंगाल में महामारी पर राजनीति नहीं हो रही, ममता की तारीफ कर रहे विपक्षी नेता

श्वेता सिंह
 
कोलकाता। कोरोना के कहर से बचना ही आज सबकी प्राथमिकता है। राज्य में इस महामारी से लड़ने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आवश्यक कदम उठा रही हैं। उनके फैसलों की प्रशंसा पार्टी के नेता ही नहीं कर रहे बल्कि विपक्षी पार्टियों के नेता भी खुले दिल से उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। संकट के इस समय में बंगाल के नेता इस महामारी पर राजनीति नहीं कर रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्र ने ममता बनर्जी की तारीफ करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने ऐन समय पर राज्य में लॉकडाउन का फैसला लिया जो जरूरी था।

24.3.20

सीएए विरोध में लखनऊ के घंटाघर में चल रहा धरना खत्म

अजय कुमार, लखनऊ

जान है तो जहान है। वर्ना सब बेकार है। शायद इसी लिए दो महीने से अधिक समय से लखनऊ के घंटाघर में नागरिकता सुरक्षा कानूनू(सीएए) के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने कोरोना खौफ के चलते अपना धरना स्वतः खत्म कर दिया है। आश्चर्यजनक बात यह रही कि जिन महिलाओं को मोदी-योगी सरकार और पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी नही समझा सके थे की सीएए देश के मुसलामनों को खिलाफ नहीे है, उसे कोरोना वायरस ने समझा दिया। वर्ना तो धरना दे रही दादियां यहीं हुंकार भर रही थीं कि अगर सीएए वापस नहीं हुआ तो वह लोग मरते दम तक नहीं हटेेंगी, लेकिन जब मौत सिर चढ़कर बोलने लगी तो सबने जान बचाने के लिए घंटाघर से चले जाना ही बेहतर समझा।

कोरोना खौफ : रूसी राष्ट्रपति ने सड़कों पर छोडे़ शेर-बाघ!


अजय कुमार, लखनऊ
 
मास्को। कोरोना वायरस के चलते दुनिया भर में हाहाकार मचा है. हर दिन सैकड़ों लोगों की जान जा रही है. कई देशों के शहरों को लॉकडाउन कर दिया गया है. इसी बीच सोशल मीडिया पर रूस का एक मैसेज वायरल हो रहा है. इसमें दावा किया जा रहा है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लोगों से कोरोना वायरस के चलते घरों में रहने की अपील कर रहे हैं लेकिन लोग मान नहीं रहे हैं. लिहाजा उन्होंने वहां की सड़कों पर 800 शेर और बाघ को छोड़ दिए हैं.

कोरोना वायरस ‘परिवार’ का नया सदस्य है कोविड-19


संजय सक्सेना, लखनऊ
कोरोना वायरस का खतरा पूरी दुनिया पर हावी है। हजारों लोगों की जीवन लीला यह वायरस निगल चुका है। दुनिया के तमाम मुल्कों के वैज्ञानिक कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने/तलाशने में लगे हैं, लेकिन इससे इत्तर सोशल मीडिया का कुछ और ही कहना है।

22.3.20

आप चुप क्यों हैं मिस्टर सीएम हेमंत सोरेन ??

Rupesh Kumar Singh
 आप चुप क्यों हैं मिस्टर सीएम Hemant Soren ? आप तो ट्वीटर पर धड़ाधड़ आदेश देने में प्रसिद्ध हो चुके हैं और आपके ही राज्य में एक आदिवासी की लाश थाने में दो दिन से पड़ा हुआ है, फिर भी आप चुप हैं। आपको तो मालूम होगा ही कि 20 मार्च की सुबह सीआरपीएफ ने खूंटी जिला के मुरहू थानान्तर्गत कुम्हारडीह निवासी रोशन होरो की नक्सली समझकर गोली मारकर हत्या कर दी थी, जिसे पुलिस अधिकारियों ने भी गलती मानते हुए मानवीय भूल कहा था।

ट्राम के सफर की दिलचस्प खबर : सिर्फ कोलिकाता नहीं पटना में भी चलता था ट्राम

सक्षम द्विवेदी

"अगला स्टेशन रविन्द्र भवन है। दरवाजे बायीं ओर खुलेंगे।" स्टेशन के नाम बेशक बदल सकते हैं लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ये वाक्य कोलिकाता, दिल्ली, बंगलुरू और अन्य महानगरों के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। दरअसल बढ़ती आबादी और ट्रैफिक के उलझे जंजाल के बीच डेली लोकल सफर को आसान बनाना कभी भी आसान नहीं रहा। किसी को ऑफिस की जल्दी है तो किसी का एक्जाम छूटा जा रहा है। सड़कें वही हैं, रास्ते वही हैं, जनसंख्या और निर्माण बढ़ते जा रहेहैं। ऐसे बढ़ते दबाव में अनवरत यातायात की वैकिल्पक व समानांतर व्यवस्था के प्रयास भी हमेशा से ही जारी रहे हैं। आज पटरियों में भाग रही मेट्रो इसी व्यवस्था की संकल्पना का मूर्त रूप है।

कोरोना का इससे आसान ब्योरा तो नहीं मिलेगा... ज़रूर पढ़िेए-


तेज़ रफ्तार से चल रही दुनिया अचानक से थम सी गई है, दुनिया भर में हाहाकार मचा हुआ है. लोग डरे हुए हैं सहमे हुए हैं हर कोई सोच रहा है कोरोना का यह खौफ़ आखिर कब तक दिलों को दहलाता रहेगा. दुनिया के बड़े-बड़े देशों में लोग अपने घरों में ही कैद हो गए हैं. अंतराष्ट्रीय उड़ानें रद हो रही हैं, सरकारें परेशान हैं, कोई इलाज मिलता नहीं दिख रहा है, दिनों-दिन यह वायरस पूरी दुनिया में अपना पैर पसारता दिख रहा है, अब तक लगभग 170 देशों में कोरोना वायरस ने कोहराम बरपा कर दिया है, 11 हज़ार से अधिक लोगों की जान तक ले बैठा है यह वायरस, लेकिन अभी तक किसी को भी इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि यह कब खत्म होगा और इसपर कंट्रोल कब तक पाया जा सकेगा यह वायरस अभी और कितना दहशत फैलाएगा इसके बारे में कुछ भी ठीक-ठाक नहीं कहा जा सकता है.

21.3.20

क्रांति का चोता (कहानी)



आलोक नंदन शर्मा

घर के सामने बजबजाती हुई छोटी सी नाली पर दोनों तरफ पैर करके दंगला अभी टट्टी करने बैठा ही था कि सामने से गुजरने वाला ग्वाला दुगरन जो अपनी गलमुछों की वजह बडा ही भयानक लगता था   ने उसे जोर से हुल्की दी, “आज तुने अपने पिछवाड़े से लेढ़की निकाली तो मैं उसे फिर से तुम्हारे ही अंदर ठूंस दूंगा।”

ajnara khel gaov : Refund karaye es thag builder se


Hello sir,

Maine 4 year pahle ajnara khel gaov me flat book kiya tha.jo abhi tk nahi bana .jb complnt kiya to pata chala k project nahi banega .so refund nd return kar lijiye .jb refund return  k liye appliction bhar k diye to bole 2 month me bank loan close hojayega uske baad 6 month me full refund hojayega.

19.3.20

कोरोना और करूणा ....

कोरोना और करूणा ....: Get Hindi News Update , 24×7 Trending Update , Live coverage of Hindi News of India , West Bengal and All Districts , Genuine News Update

18.3.20

योगी के तीन साल थे ‘बेमिसाल’ या विपक्ष था लाचार

अजय कुमार,लखनऊ

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के तीन साल हो गए हैं। इन तीन वर्षो में पूरे देश में योगी जी हिन्दुत्व का नया चेहरा बनकर उभरे हैं। हाईकमान द्वारा कई राज्यों के विधान सभा चुनाव में योगी जी स्टार प्रचारक के तौर पर उतारा गया,जिसका भारतीय जनता पार्टी को फायदा भी मिला,लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या उत्तर प्रदेश की जनता जहां के योगी जी मुख्यमंत्री हैं योगी सरकार के कामकाज से संतुष्ट है। इसको लेकर लोगों के बीच अलग-अलग राय है। कुछ लोग योगी सरकार के कामकाज से पूरी तरह से संतुष्ट है तो कई का मानना है कि योगी जी दोहरी राजनीति करते हैं। वह एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए दूसरे वर्ग के लोगों का उत्पीड़न करते हैं। इसका उदाहण देते हुए बताया जाता है कि नागरिकता संशोधन एक्ट(सीएए) के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने वालों के विरूद्ध जिस तरह योगी सरकार ने दंगाइयों जैसा व्यवहार किया वह लोकतांत्रिक तरीका नहीं था। योगी सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में छात्रों पर लाठियां चलवाईं। कभी जिन्ना की तस्वीर के नाम पर तो कभी आतंकवाद के नाम पर छात्रों का उत्पीड़न किया गया। वहीं गौकशी के नाम पर माॅब लिंचिंग करने वालों को इस सरकार में खुली छूट मिली है। सैकड़ों मुस्लिम युवक आतंकवाद और दंगों आदि के नाम पर जेल भेज दिए गए हैं।

16.3.20

बहुजन आंदोलन के नायक कांशीराम : दो सपने जो अधूरे रह गए


मुलायम सिंह को दी थी पार्टी बनाने की सलाह

राष्ट्रपति के पद का ऑफर ठुकरा दिया था.

बीएस फोर से,बामसेफ से  बीएसपी तक का सफर.

क्या थे उनके दो सपने?


यूपी : दंगाइयों से वसूली का नया कानून बना सियासी मुद्दा

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जुलूस, प्रदर्शन, बंदी, हड़ताल के दौरान सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ वसूली का जो नया कानून बनाया है। उसको लेकर जहां एक धड़ा खुश नजर आ रहा है तो दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है जो इस कानून को लेकर आशंकित हैं,जो आशंकित हैं उन्हें लगता है कि यह लोकतंत्र के लिए काला कानून साबित होगा। यह कानून सरकार के खिलाफ मुंह खोलने वालों की आवाज दबाने की साजिश साबित होगा। उक्त कानून क्या प्रभाव होगा ? क्या इस कानून के आने से निजी और सरकारी सम्पति के नुकसान को रोका जा सकेगा ? कहीं इसका राजनैतिक दुरूपयोग तो नहीं होगा ? इस कानून की आड़ लेकर सरकार निरंकुश तो नहीं हो जाएगी। हो सकता है कि जल्द ही इस कानून के खिलाफ कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाए। वहां इसका क्या हश्र होगा यह भी देखने वाली बात होगी।

भास्कर ने पुलिस को ही गिरफ्तार करवा दिया!


 भास्कर में सोमवार को छपी खबर की कटिंग।

खबर राजस्थान के अजमेर से है,जहां सोमवार को जिले के केकड़ी कस्बे से अवैध बजरी से जुड़ी एक खबर दैनिक भास्कर में छपी है। भास्कर ने खबर में एक फोटो लगाया है,जिसमे केप्शन लिखा गया "इनको किया पुलिस ने गिरफ्तार" मगर मजे की बात यह है कि इस फोटो में आरोपियों का फोटो तो काट दिया गया और जिन पुलिसकर्मियों ने कार्यवाही को अंजाम दिया था,उनकी फोटो लगा दी गई।

बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?


मध्य प्रदेश में आए सियासी तूफान को मुख्यमंत्री कमलनाथ किसी न किसी बहाने टालते आ रहे है | पहले कहा गया कि जो विधायक बाहर उन्हें पहले लौट कर आना चाहिए | जब वे लौट कर आए मुख्यमंत्री कमलनाथ उनका कोरोना टेस्ट कराने की बात करते रहे | ये भी बागी विधायकों के खिलाफ एक नया दांव ही समझा जाता रहा |मध्य प्रदेश में राज्यपाल लालजी टंडन ने कमलनाथ सरकार को विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने को कहा था | राजभवन से आये समाचार के  मुताबिक राज्यपाल के अभिभाषण के बाद फ्लोर टेस्ट कराने को कहा गया था स्थगित पर अब सुना जा रहा है कि विधान सभा 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी गई है और अब फ्लोर टेस्ट अभी नहीं होगा | जब भी होगा मुख्यमंत्री कमलनाथ को अविश्वास मत का सामना करना ही पड़ेगा |पूरी दुनिया कोरोना के कहर से जूझ रही है और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने महामारी के मुंह में हाथ डाल कर राजनीतिक तरकीब खोज निकाली है. बागी कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे के खिलाफ पहले ही इमोशनल कार्ड खेल चुके कमलनाथ अब कोरोना को ही विश्वास मत टालने का हथियार बना लिया  हैं और दलील भी ऐसी है कि भला कौन जोखिम उठाना चाहेगा |कोरोना की आड़ में अभी तक इस बात का फैसला नहीं हो सका है कि मध्य प्रदेश में विधानसभा का सत्र 26 को  बुलाया जाएगा भी या नहीं|कमलनाथ कह रहे हैं कि ये सेफ्टी का मामला है और लापरवाही कतई नहीं बरती जाएगी|

पाकिस्तान के जयप्रकाश नारायण


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

कल लाहौर में डा. मुबशर हसन का निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। उनका जन्म पानीपत में हुआ था। वे प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार में वित्तमंत्री थे लेकिन उनकी विद्वता, सादगी और कर्मठता ऐसी थी कि सारा पाकिस्तान उनको उप-प्रधानमंत्री की तरह देखता था। भुट्टो की पीपल्स पार्टी आफ पाकिस्तान की स्थापना उनके घर (गुलबर्ग, लाहौर) में ही हुई थी।

14.3.20

बाराबंकी में दिखा गिद्धों का झुंड, पशु प्रेमी गदगद

संजय सक्सेना,लखनऊ    

लखनऊ से लगा जिला बाराबंकी वैसे तो अफीम की खेती के लिए जाना जाता है,लेकिन अब यह जिला  विलुत्प होते गिद्धों को पुनःजीवनदान देने के चलते चर्चा में आ गया है। हाल ही में एक व्यक्ति ने विलुप्त होने केे कगार पर पहुंच चुके गिद्धों का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में डाला तो यह खूब वायरल हुआ। गिद्ध एक ऐसा पक्षी है जो देखने में भले ही बहुत कुरूप लगता हो,लेकिन सृष्टि के लिए इसकी उपयोगिता अन्य तमाम पक्षियों और जानवरों से कहीं अधिक है।

जो किसान 72 घण्टे में अपने नुकसान की सूचना टोल फ्री नम्बर पर देगा उसे ही मुआवजा मिलेगा


बर्बाद किसानों के लिए टोल फ्री नम्बर भद्दा मज़ाक

मजदूर किसान मंच चलायेगा राहत अभियान

26 मार्च को लोकतंत्र बचाओ सम्मेलन में उठेगा किसानों का सवाल


लखनऊ 14 मार्च 2020,

भीषण ओलावृष्टि और वर्षा से पूरे तौर पर बर्बाद हो चुके किसानों के लिए टोल फ्री नम्बर जारी करना और उसमें यह शर्त रखना कि जो किसान 72 घण्टे में अपने नुकसान की सूचना इस नम्बर पर देगा उसे ही मुआवजा दिया जायेगा, किसानों के साथ भद्दा मजाक है। यह प्रतिक्रिया आज मजदूर किसान मंच के अध्यक्ष एस आर दारापुरी ने व्यक्त की है । उन्होंने ने बताया कि कल मजदूर किसान मंच के कार्यकर्ताओं ने सोनभद्र जिले के  करहिया, सिसंवा, झापर, आरंगपानी आदि विभिन्न गांवों में तबाह हुए किसानों से मुलाकात की थी।

देश आर्थिक तौर से खोखला, समाजिक तौर से बिखरा और दुनिया में अलग थलग पड़ गया है

उबैद उल्लाह नासिर
obaidnasir@yahoo.com


देश इस समय एक चक्रव्यूह में फंस गया है। आर्थिक तौर से देश खोखला हो चुका है। समाजिक तौर से ऐसा बिखराव कभी देखा नहीं गया। आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है  कि अपने सभी पडोसी देशों यहां तक कि पाकिस्तान से भी निचले पायदान पर हमारी जीडीपी  4.5% है। जबकि खुद बीजेपी के सांसद डॉ सुब्रामण्यम स्वामी का कहना है कि मोदी सरकार फ़र्ज़ी आंकड़े दे रही, जीडीपी किसी भी तरह 1.5% से ज़्यादा नहीं है।

12.3.20

सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध विधायक ज्योतिरादित्य के हैं लेकिन कमल सरकारमें सबसे ज्यादा मजाक के पात्र सिंधिया ही बने!

जयराम शुक्ल

राजमाता से ज्योतिरादित्य तक : प्रश्न प्रतिष्ठा का...  राजनीति में प्रतीकों और शब्दों का बड़ा महत्व होता है। जिनको यह नहीं मालूम वे 1967 के उस प्रकरण को याद करें जब पचमढ़ी में मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष अर्जुन सिंह के संयोजकत्व में आयोजित   सम्मेलन में मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र ने 'राजमाता' विजयाराजे सिंधिया पर कटाक्ष किया था..। श्रीमती सिंधिया की मौजूदगी पर डीपी मिश्र ने राजे-रजवाड़ों की लानत मलानत की थी। वह समय ऐसा था कि जो भी अधिकारी या नेता श्रीमती सिंधिया को राजमाता कहता उसपर तत्काल कार्रवाई हो जाती थी।

सिंधिया परिवार ने हर हुकूमत से बनाकर रखा है जबर्दस्त तालमेल


सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने तथा भाजपा के राज्यसभा उम्मीदवार होने पर उनके परिवार पर फिर से उंगली उठने लगी है। वैसे तो देश में ऐसे कई नेता हैं जिनके परिवार पर अंग्रेजों का साथ देने का आरोप लगता रहा है पर सिंधिया परिवार इस मामल में लोगों की जुबान पर रहा है। अक्सर ङ्क्षसंधिया परिवार को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से गद्दारी करने का आरोप लगाया जाता रहा है। अंग्रेजों के 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने में पटौती, रामपुर के नवाब के साथ ही संधिया रियासत का भी अंग्रेजों का साथ देने में नाम आता रहा है। राजतंत्र के अलावा अंग्रेजी हुकुमत और देश के आजाद होने के बाद देश में स्थापित होने वाली पार्टियों में भी इस परिवार का दबदबा रहा। जहां कांग्रेस में माधव राव सिंधिया के साथ उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया  अपनी अलग पहचान बनाकर रखी वहीं भाजपा में उनकी मां विजया राजे ङ्क्षसधिया व बहन वसुंधारा राजे सिंधिया का दबदबा रहा।

दंगाइयों के पोस्टर हटाने के मामले में योगी सरकार कोर्ट के सामने झुकने को तैयार नहीं


अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और न्यायपालिका के बीच दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई के तरीके को लेकर मतभेद बढ़ता जा रहा है। एक तरफ योगी सरकार उन अराजक तत्वों पर सख्त से सख्त कार्यवाही कर रही है जिन्होंने बीते दिसंबर माह में लखनऊ सहित पूरे प्रदेश में हिंसा, आगजनी का तांडव किया था जिसके चलते कई निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी, वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका है जिसे दंगाइयों की निजता की चिंता सता रही है। कौन सही है? कौन गलत? इसको लेकर कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जिस तरह से न्यायपालिका सरकार के काम में दखलंदाजी कर रही है, उसे आम जनता सही नहीं मानती है। उसकी नजर में न्यायपालिका दोहरा रवैया अपना कर सरकार की मुश्किल बढ़ाती है, जिससे अराजक तत्वों के हौसले बुलंद होते हैं।

9.3.20

2022 के विधान सभा चुनाव के चलते चचा-भतीजा आएंगे करीब!

अजय कुमार, लखनऊ
कोरोना के चलते तमाम दलों के नेतागण अबकी बार होली मनाने और होली कार्यक्रमों से दूरी बनाकर चल रहे हैं। पीएम मोदी सहित तमाम नेताओं ने अबकी से होली नहीं मनाने की घोषणा कर दी है,लेकिन ऐसा नहीं है कि इन नेताओं के घरों में भी होली के रंग नहीं बिखरेंगे। यह नेता भले ही सार्वजनिक रूप से रंगों के इस त्योहार पर नजर नहीं आएंगे,लेकिन परिवार और नातेदारों के बीच तो इन्हें जाना ही पड़ेगा। ऐसे में सबकी नजर इस बात पर लगी है कि अबकी से समाजवादी परिवार होली का त्योहार कैसे मनाएगा।

रंगकर्मियों के लिए एक उपहार है यह पुस्तक - पंकज सोनी


पुस्तक - सुबह अब होती है... तथा अन्य नाटक
कहानीकार- पंकज सुबीर, नाट्य रूपांतरण- नीरज गोस्वामी
प्रकाशन : शिवना प्रकाशन, पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, सीहोर, मप्र, 466001, दूरभाष- 07562405545
प्रकाशन वर्ष - 2020, मूल्य - 150 रुपये, पृष्ठ - 136


हाल ही हिंदी नाटकों की एक क़िताब पढ़ी 'सुबह अब होती है.. तथा अन्य नाटक'। शिवना प्रकाशन की यह किताब सुप्रसिद्ध लेखक पंकज सुबीर की चार कहानियों का नाट्य रूपांतरण है। नाट्य रूपांतरण किया है सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लेखक नीरज गोस्वामी ने। इन चारों कहानियों को मैं पहले ही पढ़ चुका था। और चारों ही मेरी पसंदीदा कहानियाँ हैं। किसी कहानी को मैं उसकी समग्रता में पसंद करता हूँ। मसलन उसमें निहित सामाजिक सोद्देश्यता, रोचकता, कहानीपन और चूंकि नाटकों की दुनिया से जुड़ा हूँ तो उसमें नाटकीय  तत्वों का होना बेहद जरूरी है,जो कि पंकज सुबीर की लगभग हर कहानी में होते ही हैं। चारों ही कहानियाँ मन को झकझोर देती हैं। जिन पर लंबी चर्चायें की जा सकती हैं। चूंकि मैं समीक्षक नहीं हूँ। सिर्फ एक रसिक पाठक हूँ। पर बतौर रंगकर्मी उसे एक अलग नजरिये से जरूर देखता हूँ। मेरा मानना है कि एक सजग रंगकर्मी को पढ़ने की आदत एक साहित्यकार से भी ज्यादा होनी चाहिये। क्योंकि यही उसकी बौद्धिक ख़ुराख है। एक बिन पढ़ा अभिनेता , रंगकर्मी कम रंगकर्मचारी ज्यादा लगता है।

8.3.20

बंबई के मुंबई बनने तक बहुत कुछ बदला ...

बंबई  के मुंबई बनने तक बहुत कुछ बदला ...
तारकेश कुमार ओझा
बंबई के मुंबई बनने के रास्ते शायद  इतने  जटिल और घुमावदार नहीं होंगे जितनी मुश्किल मेरी दूसरी  मुंबई यात्रा रही ....महज 11 साल का था जब पिताजी की अंगुली पकड़ कर एक दिन अचानक बंबई  पहुंच गया ...विशाल बंबई की गोद में पहुंच कर मैं हैरान था क्योंकि तब बंबई किंवदंती  की तरह थी ....ना जाने कितने गाने - तराने  , गीत  , संगीत ,  मुहावरे कहावतें  बंबई  पर आधारित होती थी ... तकरीबन हर फिल्म में किसी न किसी रूप में बंबई का जिक्र होता ही था ....क्योंकि फिल्मी दुनिया के  वो तमाम किरदार मुंबई मैं ही रहते थे , जो जूता पालिस  करते हुए पलक झपकते मुकद्दर  का  सिकंदर बन जाते थे . उनके करिश्माई करतब को आंखे फाड़ कर देखने वाली तब की  जवान हो रही साधारणतः टीन की  छत और मिट्टी की दीवार वाले घरों में  रहती थी . हालांकि तब भी मुंबई की  अट्टालिकाएं देखने मैं सिर की  टोपी गिर जाया करती थी .
हाल में दूसरी जब दूसरी  मुंबई यात्रा  का संयोग बना तब तक जीवन के चार दशकों का पहिया घूम चुका था .... बंबई - मुंबई हो गई ...बचपन में की गई मुंबई की यात्रा की यादें मन में बेचैन हिलोरे पैदा करती ....लेकिन फिर कभी मुंबई जाने का अवसर नहीं मिल सका .... कोल्हू के बैल की तरह जीवन संघर्ष की परिधि में गोल गोल घूमते रहना ही मेरी नियति बन चुकी थी ...कुछ साल पहले भतीजे की शादी में जाने का अवसर मुझे मिला था ... लेकिन आकस्मिक परिस्थितियों के चलते अवसर का यह कैच हाथ से छूट गया ....इस बीच कि मेरी ज्यादातर यात्रा उत्तर प्रदेश के   अपने पैतृक गांव या कोलकाता  -  जमशेदपुर तक सीमित रही , बीच में एक बार नागपुर के पास वर्धा जाने का अवसर जरूर मिला लेकिन  मुंबई मुझसे दूर ही रही , लेकिन कहते हैं ना यात्राओं के भी अपने संयोग होते  हैं , हाल में एक नितांत पारिवारिक कार्यक्रम में मुंबई जाने का अवसर मिला , बदली परिस्थितियों में तय हो गया कि इस बार मुझे मुंबई जाने से कोई नहीं रोक सकता , ट्रेन में रिजर्वेशन , अंजान मुंबई की विशालता , लोकल ट्रेनों की भारी   भीड़भाड़ के बीच गंतव्य तक पहुंचने की  की चुनौतियां अपनी जगह थी लेकिन बेटे बेटियों ने जिद पूर्वक एसी में आने जाने का रिजर्वेशन करा कर मेरी संभावित यात्रा को सुगम  बना दिया ...
रही सही कमी अपनों   के लगातार मार्ग निर्देशन और सहयोग   ने पूरी कर दी , इससे मुंबई की विशालता के प्रति  मन में बनी  घबराहट काफी हद तक कम हो गई .
जीवन में पहली बार वातानुकूलित डिब्बे   में सफर करते हुए मैं पहले  दादर और फिर बोईसर आराम से पहुंच गया , पारिवारिक कार्यक्रम में शिरकत की .
मुंबई में कुछ दिन गुजारने के दौरान मैने  यहां की लोकल ट्रेनों में भीड़ की विकट समस्या को नजदीक और गहराई से महसूस किया.
भ्रमण के दौरान बांद्रा कोर्ट के अधिवक्ता  व समाजसेवी प्रदीप मिश्रा  के सहयोग से विरार  स्थित पहाड़ पर जीवदानी माता के दर्शन किए . करीब 700 सीढ़ियां चढ़कर हम माता के दरबार पहुंचे और आनंद पूर्वक दर्शन किया . इससे हमें असीम मानसिक शांति मिली . अच्छी बात यह लगी कि हजारों की भीड़ के बावजूद दलाल या पंडा वगैरह का  आतंक कहीं  नजर नहीं आया . दर्शन की समूची प्रक्रिया बेहद अनुशासित और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न हो रही थी .
कुछ ऐसी ही  अनुभूति मुंबा देवी  और महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन के दौरान भी हुए  . जिन विख्यात मंदिरों की  चर्चा बचपन से सुनता आ रहा था वहां दूर दूर तक आडंबर का  कोई नामो निशान नहीं , कोई मध्यस्थ वहीं , सीधे मंदिर पहुंचिऐ और दर्शन कीजिये . स्थानीय लोगों ने बताया कि मुंबई क्या पूरे महाराष्ट्र की  यह खासियत है .मुझे लगा कि यह सुविधा समूचे देश में  होनी चाहिए .
क्योंकि इस मामले में  मेरा अनुभव कोई सुखद नहीं है . मुंबई  के  प्रसिद्ध व्यंजनों का  स्वाद लेने की  भी भरसक कोशिश की  और  यात्रा समाप्त कर अपने शहर लौट आया .अलबत्ता यह महसूस जरूर किया कि अपनो की  मदद के बगैर अंजान और विशाल मुंबई की  मेरी यह यात्रा काफी दुरूह हो सकती थी .

7.3.20

कोरोना के सामने दुनिया ने जोड़े हाथ, अपनाई जा रही 'अभिवादन' की भारतीय संस्कृति

सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली । यह भारतीय संस्कृति ही है कि हमारा देश दूसरे देशों से भिन्न नजर आता है। यह भारत ही है कि जिसमें सभी मौसम व्याप्त हैं। भारत एक समय में हर मौसम का मजा लिया जा सकता है। यह भारतीय संस्कृति है जिसमें अनेकता में भी एकता है। विभिन्न धर्मांे  के लोग, विभिन्न भाषाएं होने के बावजूद हम सब एक हैं। भले ही राजनीतिक दल लोगों को जाति और धर्म के नाम पर कितना भी बांटने की कोशिश करते रहें पर भारतीय संस्कृति हमें एक करने में सहायक बनती रहती है। जो लोग आधुनिकता की दौड़ में अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे थे, वे आज देख लें कि कोरोना वायरस से बचने के लिए भारतीय संस्कृति ही काम आ रही है। अब पूरा विश्व कहने लगा कि कैरोना वायरस से बचने के लिए हाथ मिलाने के बजाय भारतीयों की तरह हाथ जोड़कर अभिवादन करें। वैसे भी यदि भारतीय संस्कृति के हिसाब से चला जाता तो कोराना जैसी बीमारी पास फटक ही नहीं सकती थी।

दिल्ली को दंगे की आग में झुलसाया किसने..?


जयराम शुक्ल

सीएए : अब आगे क्या! यह स्वाभाविक ही है कि जब शरीर पर चोट का बड़ा घाव हो जाता है तब फोड़े-फुंसी,सर्दी-जुखाम की तकलीफें दब जाती हैं। दंगे ने सीएए के फिलहाल दबा दिया है।

बुधवार को राहुल गांधी उत्तर-पूर्व दिल्ली की राख फूल उठा आए हैं। केजरीवाल की सरकार बर्बाद हुए परिवारों का लेखा लगा रही है। भाजपाई फरार दंगाखोरों की सुराग लगाने में लगे हैं। इधर दंगों पर वक्तव्य और गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे की माँग को लेकर संसद ठप्प है।

जब वाजिद अली शाह ने मुहर्रम-होली एक साथ मनाई

अजय कुमार, लखनऊ

आज भले ही कुछ लोगों ने धर्म के नाम पर हिन्दू-मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ा दी हों लेकिन अवध की जमीं पर हमेशा ऐसा दौर नहीं था। यहां लोग होली-दीवाली,ईद-बकरीद साथ-साथ मनाते थे। न किसी को बलि से गुरेज होता था, न कोई यह कहता था कि शरीर के जिस हिस्से पर रंग पड़ जाता है वह नापाक हो जाता है। होली के मौके पर यह बात बताना जरूरी है।  बस इतना समझ लें कि यह यहां होली त्योहार से बढ़कर है। य लखनऊ के नवाबों को यहाँ की सांस्कृतिक और धार्मिक सद्भाव के अग्रदूत होने का श्रेय दिया जाता है।