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18.2.20

जनता की कमाई को डोनाल्ड ट्रंप पर लुटाने का पीएम मोदी को कोई हक नहीं

जिस देश में रोजी-रोटी का बड़ा संकट हो। अर्थव्यस्था पूरी तरह से डगमगा गई हो। किसान, मजदूर और युवा विभिन्न समस्याओं से कराह रहो हों, ऐसे में किसी पूंजीवादी देश के राष्ट्रपति के स्वागत में फिजूलखर्ची की क्या तुक है ? फाइट फॉर राइट इसका विरोध करता है। यह जो भी पैसा डोनाल्ड ट्रप के स्वागत में पानी की तरह से बहाया जा रहा है यह सब जनता के खून-पसीने की कमाई है। इस पैसे को इस तरह से खर्च करने का पीएम मोदी को कोई अधिकार नहीं। डोनाल्ड ट्रंप के दौरे की तो बात ही छोड़ दीजिए अहमदाबाद में उनके होने वाले रोड शो में 100 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आ रही है।

14.2.20

ट्रेन और टॉयलट...!!

ट्रेन और टॉयलट...!!
तारकेश कुमार ओझा
ट्रेन के टॉयलट्स और यात्रियों में बिल्कुल सास - बहू सा संबंध हैं। पता
नहीं लोग कौन सा फ्रस्ट्रेशन इन टॉयलट्स पर निकालते हैं। आजादी के इतने
सालों बाद भी देश में चुनाव शौचालय के मुद्दे पर लड़े जाते हैं। किसने  कितने शौचालय बनवाए और किसने नहीं  बनवाए , इस पर सियासी रार छिड़ी रहती है। देश के सेलीब्रिटीज नामचीन हस्तियां टॉयलट पर फिल्में बनाती हैं और कमाई  करती है। जिनसे  यह नहीं  हो पाता वो विज्ञापन के जरिए  ही मुट्टी गर्म करने की कोशिश में रहती है। दूसरे मामलों  के बनिस्बत शौचालय में विशेष सुविधा है।रसगुल्ला खाकर रस पीने की तर्ज पर सेलीब्रिटीज इसकी आड़ में फिल्म और विज्ञापन से कमाई भी करते हैं तिस पर मुलम्मा यह कि बंदा बौद्धिक है। फिल्म और विज्ञापन के जरिए शौचालय की महत्ता का संदेश समाज को दे रहा है।   टॉयलट्स एक महागाथा की तर्ज पर शौचालय से शासकीय अधिकारियों का पाला भी पड़ता रहता है। कुछ दिन  पहले मेरे क्षेत्र में हाथियों के हमलों  में ग्रामीणों  की लगातार मौत से दुखी एक शासकीय अधिकारी दौरे  पर निकल पड़े। एक गांव में उन्हें निरीक्षण की सूझी। इस दौरान  वे यह जानकार दंग रह गए  कि सरकार ने गांव में 63 घरों  में सरकारी अनुदान  से शौचालय तो बना दिए, लेकिन इस्तेमाल एक का भी नहीं हो रहा है। सब में ताले पड़े हैं। दिशा - मैदान  के लिए ग्रामीण आदतन जंगल जाते हैं और वहां  जानवारों के हमलों का शिकार होते हैं। फिर तो अधिकारी  का पारा सातवें  आसमान पर जा पहुंचा। फिर क्या... आनन - फानन  जांच और निगरानी  समिति गठित हुई। हालांकि ग्रामीणों  की आदत में  सुधार हुआ  या नहीं, इसका नोटिस नहीं लिया जा सका। 
यात्रा  के  दौरान  ट्रेन के टॉयलट स्वाभाविक स्थिति में भी नजर आ जाए तो
सुखद  आश्चर्य होता है। याद नहीं पड़ता कि साधारण  दर्जे की किसी यात्रा में ट्रेन के शौचालय सही - सलामत मिले हों। कभी पानी  उपलब्ध तो यंत्रादि टूटे। कभी बाकी सब ठीक तो पानी  गायब।  बचपन में  लोकल ट्रेन में सफर से  इसलिए डर लगता था कि  उसमें टॉयलट नहीं होते थे। हाल में मेमू लोकल में इसकी व्यवस्थाहो तो गई। लेकिन कुछ दिन पहले गोमो - खड़गपुर मेमू लोकल से यात्रा के दौरान जायजा लिया तो डिब्बों के टॉयलट इस हाल में मिले... कि कुछ महीने पहले  की गई पुरानी यात्रा की याद ताजा हो गई। वहीं टूटे नल, बेसिन  में  पड़े प्लास्टिक की   बोतलें और टॉयलट के पास गुटखा और पान की पीके वगैरह। लोग कहते हैं इसके लिए  व्यवस्था दोषी है। व्यवस्था कहती है कि हम सुविधाएं देते हैं, लोग तोड़फोड़ और गंदगी फैलाते हैं तो हम  क्या करें। आखिर कहां तक हम व्यवस्था सुधारते रहें। सचमुच टॉयलट एक महागाथा...












 
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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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13.2.20

दुनिया के दरवाजे पर कोरोना वायरस की दस्तक खतरे की घंटी है

कृष्णमोहन झा

जानलेवा कोरोना वायरस से अब तक चीन में लगभग 400 से अधिक लोगों की असमय मौत हो गई है वही इस वायरस से संक्रमित 18 सौ से अधिक मरीजों की हालत गंभीर बताई जा रही है। चीन के जिस वुहान शहर को कोरोना वायरस के प्रकोप का केंद्र बताया जा रहा है, वहा नौ दिन के अंदर 1000 बिस्तर वाला सर्व सुविधा संपन्न अस्पताल का निर्माण इस हकीकत को उजागर करता है कि चीन सरकार ने स्थिति की भयावहता को भली भांति महसूस कर लिया है। शायद इसीलिए 1000 बिस्तरों वाले इस अत्याधुनिक सुविधा संपन्न अस्पताल के अलावा 14 बिस्तर वाला एक नए अस्पताल का निर्माण भी द्रुतगति से तैयार किया जा रहा है। चीन में सरकार द्वारा कोरोना वायरस के प्रकोप पर नियंत्रण हेतु बहुत सारे कदम उठाए गए हैं। एक करोड़ 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले वुहान सहित हुबेई प्रान्त के स्थानीय लोगों की कहीं भी आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

केजरीवाल की सादगी के सामने फेल हुए भाजपा के सभी हथकंडे

चरण सिंह राजपूत

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा में वही हुआ जिसकी संभावना व्यक्त की जा रही थी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का जादू दिल्लीवासियों के सिर चढ़कर बोला। 70 में से 62 सीटें जीतकर केजरीवाल ने साबित कर दिया कि वह ही दिल्ली के बादशाह हैं। केजरीवाल के सामने भाजपा का कोई भी हथकंडा उसके काम न सका। केजरीवाल की हर बात को दिल्ली के लोगों ने सर माथे लिया।

अमेरिका के लिए 'केम छो ट्रंप' तो भारत को होगा 'शेम शो ट्रंप'

CHARAN SINGH RAJPUT
देश के फकीर प्रधानमंत्री देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए एक और बड़ा कारनामा करने जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को 24-25 फरवरी को भारत यात्रा पर बुला रहे हैं। भाई फकीर प्रधानमंत्री जो ठहरे तो ठाठबाट  और स्वागत भी फकीर जैसा ही होगा न। जैसी फकीरी उन्होंने अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में होने वाली 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम में दिखाई उससे बड़ी फकरी वह गुजरात के अहमदाबाद शहर में डोनल्ड ट्रंप का रोड शो कराकर कर दिखाने वाले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के भारत दौरे में कई ट्रेड डील होने की उम्मीद है। उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि इस डील में वह किसानों की बर्बादी का सौदा कर अपनी गरीबी और संघर्ष का एक और प्रमाण देने वाले हैं।

दिल्ली में केजरीवाल की बंपर जीत को भाजपा व कांग्रेस को हल्के में न लेना चाहिए


स्थानीय मुद्दों एवं नेताओं की उपेक्षा ज्यादा नहीं चल सकती... दिल्ली में केजरीवाल की बंपर जीत को भाजपा व कांग्रेस को हल्के में न लेना चाहिए| भाजपा व कांग्रेस समर्थक इस जीत पर कुछ भी टिपण्णी करें पर उन्हें समझ लेना चाहिए कि इस जीत का  राष्ट्रीय राजनीति पर असर पड़ना स्वाभाविक है। भाजपा के लिये यह समय आत्ममंथन का समय है, राजनीति कभी भी एक दिशा में नहीं चलती, एक व्यक्ति का जादू भी स्थायी नहीं होता राजनीति में।

12.2.20

जब लिखने लगा स्वामी अग्निवेश के लेख और बयान, उनको जांचने-परखने का मिला मौका

CHARAN SINGH RAJPUT
राष्ट्रीय सहारा में आंदोलन करने पर जब हम लोग टर्मिनेट कर दिये गये तो नोएडा स्थित राष्ट्रीय सहारा के गेट पर हक की लड़ाई लड़ रहे थे तो मेरे मित्र महंत तिवारी का फोन आया। उन्होंने मुझसे कहा कि सोशल एक्टिविस्ट और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश को लेख और बयान लिखने के लिए राजनीतिक सोच रखने वाले व्यक्ति की जरूरत है। इसके लिए वह मानदेय भी देने को तैयार हैं। राजनीति में दिलचस्पी होने की वजह से मेरे अंदर राजनीतिक सोच भी है और लेख लिखने का शौक भी।

दिल्ली चुनाव के नतीजे क्या कहते हैं

ANUPAM SRIVASTAVA
   
" दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें,
था कल तलक दिमाग जिन्हें ताजो तक्थ का"

आम आदमी पार्टी की दिल्ली में धमाकेदार जीत ने एक बार फिर निराश आमजन के लिए आशा की रोशनी दिखाई है। केजरीवाल के लिए यह जिंदगी का सबसे सुखद क्षण होगा वही जब चुनाव सर्वे का आंकड़ा देने वाली संस्थाओं के द्वारा गोलमोल जवाब देना उनके लिए एक जोरदार झटका वह भी धीरे से..? भारतीय लोकतंत्र के दो भाईयों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि दिल्ली में भाजपा जैसी राजनीतिक खिलाड़ी की पराजय होगी। आप ने जिस तरह दिल्ली में अपनी जोरदार आमद दिखाई है। वह हैरत अंगेज ही है। बीबीसी ने इसे भारतीय इतिहास का सबसे रोचक क्षण कहां है। केजरीवाल ने कहा कि यह जीत दिल्ली की जनता लोकतंत्र और भारत की जीत है। भाजपा कहती हैं देश बदल रहा है लेकिन 2020 की दिल्ली बदल रही हैं।

देश की आधी आबादी कितनी सुरक्षित?


महिलाओं की सुरक्षा हमेशा से हमारे देश में एक बड़ा मुद्दा रहा है। देश की महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार और अन्य कई अपराधों के चलते।

कांग्रेस-भाजपा साफ, आप फिर दिल्ली टाप

                                        
वास्तव में एक बार फिर से सिद्ध हो गया कि सियासत में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कि परिणाम क्या होगा क्योंकि सियासत में कुछ भी स्थाई नहीं होता। दिल्ली के चुनाव में एक बार यह बात सत्य साबित हो गई। जिस प्रकार से भाजपा ने दिल्ली के चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी उससे ऐसा प्रतीत होने लगा था कि दिल्ली का चुनाव किसी भी करवट बैठ सकता है। जिस प्रकार से भाजपा ने अपने ढ़ेरों मुख्यमंत्रियों का कुनबा दिल्ली के चुनाव में उतार रखा था इस कारण दिल्ली के चुनाव का अनुमान नहीं लग पा रहा था। क्योंकि, जिस प्रकार से प्रचार-प्रसार शुरुआत हुई थी उससे ऐसा प्रतीत होता था कि भाजपा एक मजबूत स्थिति में पहुँच रही है। क्योंकि चुनावी सभाओं में जिस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता था उससे एक अलग रूप रेखा तैयार होती हुई दिखाई दे रही थी। परन्तु दिल्ली की जनता ने अपना ध्यान केन्द्रित रखा और अपने अनुसार मतदान किया।

नोएडा टेंडर घोटाले में यादव सिंह फिर गिरफ्तार


जे.पी.सिंह

न्यू ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा) के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। यादव सिंह को सोमवार को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी नोएडा प्राधिकरण में 116.39 करोड़ रुपये के टेंडर घोटाला मामले में हुई है। आरोप है कि यादव के कार्यकाल में निजी कंपनियों को गलत तरीके से यह टेंडर दिया गया था। दो साल पहले इस मामले में मुकदमा दर्ज किया गया था।यादव सिंह के खिलाफ आपराधिक साजिश और सरकारी पद के दुरुपयोग के साथ ठेकेदारों और फर्मों से नियमित रूप से रिश्वत लेने का मुकदमा दर्ज किया गया है।

9.2.20

अकेले यात्रा करने पर आप अपने को जान पाते हैं - डॉ कायनात



यात्रायें समाज के हर तबके से जोड़ती है, महिला यायावर का नजरिया होता है  संवेदनशील

यात्रा लेखन एवं फोटोग्राफी विषयक तीन दिवसीय कार्यशाला हुई शुरू

गरीब मजदूरों के सच्चे दोस्त थे मजदूर नेता व जनपक्षधर अधिवक्ता कामरेड सत्तो दा






रूपेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार


‘कामरेड सत्यनारायण भट्टाचार्य उर्फ सत्तो दा गरीब मजदूरों के सच्चे दोस्त थे। वे ताउम्र गरीबों के हक-अधिकार की रक्षा के लिए लड़ते रहे। वे इस अन्यायी व लूटेरी व्यवस्था के घोर विरोधी थे। वे मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद विचारधारा के प्रबल हिमायती थे और सर्वहारा वर्ग की सत्ता की स्थापना के लिए ही पूरी जिंदगी काम करते रहे। वे एक मजदूर नेता होने के साथ-साथ धनबाद व बोकारो बार एशोसिएशन के वरिष्ठ व सम्मानित अधिवक्ता भी थे, जो गरीबों का मुकदमा मुफ्त में लड़ते थे।’ उक्त पंक्तियां 7 फरवरी, 2020 को झारखंड के कतरास के भंडारीडीह सामुदायिक भवन के मैदान में गूंज रही थी।

4.2.20

12वें पं. बृजलाल द्विवेदी साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित होंगे श्री कमलनयन पाण्डेय


गांधी भवन में 9 फरवरी को आयोजित होगा मीडिया विमर्श का सम्मान समारोह

भोपाल। मीडिया विमर्श के सारस्वत आयोजन में 9 फरवरी को त्रैमासिक पत्रिका ‘युगतेवर’ (सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश) के संपादक कमलनयन पाण्डेय को प्रतिष्ठित साहित्यक पत्रकारिता सम्मान 'पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान' से सम्मानित किया जाएगा। सम्मान समारोह का आयोजन गांधी भवन में सुबह 11:30 बजे से होगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात गाँधीवादी-समाजवादी चिन्तक श्री रघु ठाकुर, मुख्य वक्ता वरिष्ठ संपादक प्रो. कमल दीक्षित, विशिष्ट अतिथि साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के पूर्व निदेशक डॉ. उमेश कुमार सिंह और प्रख्यात व्यंग्यकार श्री गिरीश पंकज होंगे। समारोह की अध्यक्षता सप्रे संग्रहालय के संस्थापक एवं पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ संपादक श्री विजयदत्त श्रीधर करेंगे।

कब आएगा देश में जनसंख्या विरोधी कानून?


इस समय देश में नागरिक संशोधन बिल पर हो रहे पक्ष – विपक्ष के आंदोलनों के बीच एक बड़ा मुद्दा देश के नेताओं से दूर हो गया हैं | सत्ता पक्ष जानता है कि अभी नागरिक संशोधन बिल पर चल रहा आन्दोलन पूरा ही नहीं हुआ है तो यह नया विवाद क्यों पैदा किया जाय और विपक्ष को विरोध करने का एक और मुद्दा दे दिया जाय | पर कोई भी यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि यह राजनीति का मसला नहीं बल्कि देश की अधिकांश समस्याओं की जननी बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण करने का एक ठोस समाधान है व अधिकांश समस्याओं का निदान है।

3.2.20

अमेठी में विकास कार्य देखकर रायबरेली की जनता भी गांधी परिवार से पीछा छुड़ाने के मूड में


अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से हासिए पर पड़ी कांगे्रस आजकल हर वह पैतरा अजमा रही है,जिससे यूपी में राजनीति में वह फिर से उस मुकाम को हासिल कर सके, जहां उसकी तूती बोला करती थी, उसकी आवाज को अनदेखा करना किसी के लिए आसान नहीं था,लेकिन सियासी थपेड़ों में कभी यूपी पर राज करने वाली कांग्रेस अब नंबर चार की पार्टी बनकर रह गई है। उसका वोट प्रतिशत भी 6-7 प्रतिशत पर सिमट गया है। सबसे आश्चर्यजनक यह है कि एक तरफ भाजपा, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सियासत में समय-समय पर उतार-चढ़ाव देखने को मिलता रहता है,लेकिन कांगे्रस का ग्राफ गिरता ही जा रहा है। अगर यह कहा जाए कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ अमेठी और रायबरेली ही ऐसे दो इलाके बचे हैं, जहां थोड़ी-बहुत गांधी परिवार की राजनैतिक हैसियत देखने को मिल जाती थी लेकिन पिछले दो लोकसभा चुनाव से यह परिपाटी भी बदल गई। अब तो कांगे्रस रायबरेली तक ही सिमट गई है,जहां से सोनिया गांधी सांसद हैं,जबकि टीवी कलाकार और भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी से अमेठी हारकर राहुल गांधी केरल पलायन कर गए हैं। जहां की मुस्लिम बाहुल्य वायनाड सीट से वह सांसद हैं।

5 ट्रिलियन की इकॉनमी और खैराती भीड़ गढ़ती संसदीय राजनीति


(डॉ अजय खेमरिया)

जबाबदेह नागरिक समाज के अपरिहार्य तत्व को खत्म करने की समवेत सहमति बनाती चुनावी राजनीति एक खतरनाक संकेतक है।दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह मुफ्तखोरी की उद्घोषणाए हो रही है वह भारत के संसदीय लोकतंत्र की परिपक्वता को प्रश्नचिंहित करता है।औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के प्रस्ताव का विरोध करते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था"धूर्त,बदमाश, एवं लुटेरे हाथों में सत्ता चली जायेगी।सभी भारतीय नेता सामर्थ्य में कमजोर और महत्वहीन व्यक्ति होंगे।वे जुवान से मीठे होंगे।सत्ता के लिए आपस में लड़ मरेंगे और भारत राजनीतिक तू- तू मैं- मैं में कहीं खो जाएगा।"

28.1.20

यात्रा वृतांत : कई मामलों में बेहद विशेष है पवनार आश्रम






भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे के कार्यों और विचारों के जीवंत कहानी कहता वर्धा स्थित परमधाम आश्रम (पवनार आश्रम) आज भी जनसेवा में लगा हुआ है । धाम नदी के किनारे निर्मित इस क़रीब 15 एकड़ के क्षेत्रफल में विस्तारित इस आश्रम जाने का अवसर मुझे वर्धा निवास के दौरान प्राप्त होता रहा ।

यह आश्रम सामान्य आश्रमों की अपेक्षा बेहद विशेष व अद्वितीय है । कुछ बातें जो इसे विशिष्ठ बनातीं हैं इस प्रकार हैं -

चर्चा इनकी भी हो

पी. के. खुराना

मुझे कुछ समय के लिए आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के कामकाज का तरीका देखने का मौका मिला था। वे नियमित रूप से उच्चाधिकारियों की बैठक लेते थे और प्रदेश भर में चल रहे कामकाज की समीक्षा होती थी। कहां सड़क बन रही है, कहां संडास बनाए जा रहे हैं, कहां विकास के अन्य काम हो रहे हैं आदि पर चर्चा चलती रहती थी। सुबह-सवेरे जाग कर योग करना और फिर काम पर लग जाना उनकी आदत थी। अड़सठ वर्ष की उम्र में भी सारा दिन लगातार काम करते हुए वे उबासी भी नहीं लेते थे।

27.1.20

शेरू का पुनर्जन्म ....!!

शेरू का पुनर्जन्म ....!!
तारकेश कुमार ओझा
कुत्ते तब भी पाले जाते थे, लेकिन विदेशी नस्ल के नहीं। ज्यादातर कुत्ते आवारा ही होते थे, जिन्हें अब  स्ट्रीट डॉग कहा जाता है। गली - मोहल्लों में  इंसानों के बीच उनका  गुजर - बसर हो जाता था। ऐसे कुत्तों के प्रति  किसी प्रकार का विशेष  लगाव या नफरत की भावना भी तब बिल्कुल नहीं  थी। हां कभी - कभार नगरपालिका और  रेलवे  प्रशासन  की अलग  - अलग कुत्ते पकड़ने वाली  गाड़ियां जब मोहल्लों  में आती तो वैसे  ही खौफ फैल जाता  , जैसे पुलिस की गाड़ी देख अपराधियों में  दहशत होती है। समय के  साथ ऐसी गाड़ियों  में  भर  कर आवारा  कुत्तों को ले  जाने  का  चलन बंद हो गया। इसके बाद  आवारा  कुत्तों  की अलग त्रासदी समाज में  जगह - जगह नजर  आने लगी। बहरहाल बचपन के दिनों में मुझ पर कुत्ते पालने का धुन  सवार हुआ। पता चला पास में  एक जगह  कुछ पिल्ले चिल्ल पों  मचाए रहते हैं। कुछ दोस्तों  के साथ वहां पहुंचा और पिल्लों के  बीच एक कुछ तेज सा  नजर आने वाला पिल्ला उठा लिया। कुछ दिनों में ही पिल्ला  सब का प्रिय बन गया। बच्चों  ने नाम  रखा शेरू। घर की  पालतू गायों  को दूध पीकर शेरू सचमुच  शेर जैसा  तगड़ा हो गया। शेरू में कई  खूबियां थी, लेकिन कुछ कमियां भी  थी। वो अचानक उग्र  हो कर आते - जाते लोगों पर हमले  कर देता। कईयों को उसने काटा। लोग डर से गली  के सामने  से  गुजरने  से खौफ खाने  लगे। इसके बाद हमने  उसे  लोहे  की  मोटी  जंजीर से  बांधना शुरू  किया। केवल  रात में ही उसे  खोला  जाता। मुझे अपने  फैसले  पर पछतावा  होने लगा,   क्योंकि   लोगों से हमारे रिश्ते बिगड़ने लगे।  कुछ शुभचिंतकों ने उसे  कहीं   दूर छोड़ आने  या जहर देकर मार देने  का सुझाव दिया। लेकिन  तब तक शेरू से  लगाव  इतना  बढ़ चुका था कि इस बात का ख्याल भी कलेजा चीर कर रख देता। अचानक आक्रामक हो जाने के सिवा शेरू में ऐसी कई  खूबियां थी जो उसे  साधारण कुत्तों  से  अलग करता था। परिवार के सदस्य की तरह शोक की स्थिति में उसकी आंखों से आंसू बहते मैने कई बार देखा था। खुशी  -  गम के  माहौल में  वो आक्रामकता मानो  भूल जाता। हालांकि आगंतुक डरे  - सहमे रहते। जीवन संध्या पर  शेरू कमजोर और बीमार रहने  लगा। हालांकि  अपनों को देखते ही उसकी आंखें  चमक उठती। आखिरकार ठंड की एक उदास शाम शेरू किसी मुसाफिर की तरह चलता बना... कुछ रह गया तो उसकी लोहे  की वो जंजीर , जिससे उसे बांध कर रखा जाता था। । उसके जाने  का गम  मुझे सालों  सालता रहा। किशोर उम्र में  ही  तय कर लिया कि  अब कभी कोई  जानवर नहीं पालूंगा। शेरू  की याद आते  ही सोचता इस नश्वर संसार में मोह - माया जितना  कम  रहे अच्छा। शेरू के जाने के बाद मन अपराध बोध से भी भर जाता। मैं शेरू  के  अचानक आक्रामक हो उठने  की वजह सोच कर परेशान  हो उठता। मुझे लगता कि अंजाने में मैं  शायद शेरू कि  किसी ऐसी  जरूरत को  नहीं भांप  पाया। जिसका बुरा असर उसकी शारीरिक - मानसिक सेहत पर पड़ा। कई  सालों  तक मैं कोई जानवर  नहीं  पालने  के अपने  फैसले  पर अडिग रहा। लेकिन हाल में बेटे की जिद के  आगे झूकना  पड़ा। बेटे ने विदेशी नस्ल का  कुत्ता पाला। नाम रखा ओरियो। चंद दिनों  का ही  था जब घर लाया गया। अपनी  सोच के  लिहाज से  मैं  उससे  दूरी बनाए रखने  का भरसक प्रयास करता रहा। लेकिन डरे - सहमे  रह कर भी वो  मेरे इर्द - गिर्द मंडराने की  कोशिश करता। मैने उसे कभी दुत्कारा तो नहीं लेकिन  कभी दुलार भी  नहीं  किया। लेकिन अपनी  सहज वृत्ति से ओरियो  ने जल्द ही घर के  सभी लोगों  को अपना  बना  लिया। कुछ दिनों में ही आलम  यह कि  उसे देखे  बिना हमें  चैन नहीं  तो परिवार के किसी सदस्य की अस्वाभाविक  अनुपस्थिति उसे बेचैन  कर देती। उसे  देख कर  मैं  सोच में  पड़ जाता हूं  कि  आखिर कौन  सिखाता है इन्हें पालकों  से  प्यार  करना  और वफादारी वगैरह। अभी वो चंद महीने  का ही है, लेकिन  परिवार की  महिलाओं  व बच्चों के  मामले में उसकी भूमिका बिल्कुल किसी बॉडीगार्ड की  तरह है। घर में हर किसी  के आगे - पीछे घूमते रह  कर  अपनी  वफादारी जतलाता  रहता है।  मासूम  बच्चों  की  तरह उन पर भी  जादू  कर देना  जो इनसे दूर रहना  चाहते हैं। ओरियो को देखता हूं तो लगता है शेरू का पुनर्जन्म  हुआ है।
 

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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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सत्य और संघर्ष से बनी व्यास की आत्मकथा, जयपुर में हुआ विमोचन




जयपुर। कथेतर लेखन अब भारतीय साहित्य की मुख्य धारा है जिसमें हमारे युग की सच्चाई बोल रही है। कवि-लेखक डॉ सत्यनारायण व्यास की आत्मकथा 'क्या कहूं आज' केवल साधारण मनुष्य की सच्चाई और संघर्ष की दास्तान नहीं है बल्कि इसमें लंबे दौर के जीवन अनुभवों को देखा जा सकता है। वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने उक्त विचार राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित विमोचन समारोह में व्यक्त किए। डॉ अग्रवाल ने कहा कि महाविद्यालयी शिक्षक के खरे अनुभव भी इस आत्मकथा को विशिष्ट बनाते हैं।

हिन्दुस्तान भागलपुर के एडिटोरियल की स्थिति विस्फोटक, संपादक की वजह से स्टाफ में रोष


भागलपुर में हिन्दुस्तान के एडिटोरियल की हालात गंभीर होती जा रही है। यहां विस्फोटक स्थिति होती जा रही है। संपादक के चुनींदा लोगों को छुट्टी देने और उनकी बतमीजी वाली भाषा की वजह से यहां के सभी स्टाफ (कुछ को छोड़कर) में स्थानीय एडिटर की तानाशाही और पागलपनी चलते रोष फैलता जा रहा है।

राम मंदिर निर्माण तारीख को लेकर संशय बरकरार, रामनवमी से मंदिर निर्माण की चर्चाओं का जोर

अजय कुमार,लखनऊ

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,विश्व हिन्दू परिषद और साधू संतों आदि तक सभी मंदिर निर्माण की भव्यता को लेकर तो खूब दावे  कर रहे हैं, लेकिन करोड़ों हिन्दुओं के अराध्य मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर का निर्माण कब से शुरू होगा, यह कोई नहीं बता रहा है, जबकि हर राम भक्त मंदिर निर्माण की तारीख जानना चाहता है।

साईं बाबा : न पाथरी के न शिरडी के,वे तो सबके हैं


कृष्णमोहन झा

महाराष्ट्र में जब से शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एवं कांग्रेस की महा विकास आघाडी सरकार के हाथों में सत्ता की बागडोर आई है, तब से रोज नए विवादों के जन्म लेने का सिलसिला थम नहीं रहा है। अब इन विवादों की पहुंच उन क्षेत्रों तक भी हो गई है ,जो वर्षों से लोगों की आस्था और श्रद्धा के केंद्र बने हुए है। पिछले दिनों इसी तरह का एक अनावश्यक विवाद करोड़ों लोगों की आस्था एवं श्रद्धा के केंद्र शिरडी को लेकर निर्मित हुआ है, जो साईं बाबा की तपस्थली के रूप में सारे विश्व में विख्यात हैं। साईं बाबा की समाधि के दर्शन हेतु प्रतिदिन यहां पचास हजार से अधिक लोग आते हैं और यह संख्या अवकाश के दिनों में तथा नव वर्ष , रामनवमी, गुरुपूर्णिमा तथा विजयदशमी के शुभ अवसर पर लाखों की संख्या को पार कर जाती है।

मोदी सरकार के लिए बड़ी आफत बना शाहीन बाग आंदोलन

CHARAN SINGH RAJPUT
   
नई दिल्ली। देश में अपनी बात रखने और विभिन्न मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए भले ही जंतर-मंतर को जाना जाता हो पर आज की तारीख में सीएए के विरोध में शाहीन बाग में हो रहे आंदोलन ने जो मुकाम हासिल किया है वह जंतर-मंतर को पीछे छोड़ता प्रतीत हो रहा है। गणतंत्र दिवस में जिस तरह से वहां पर सीएए के विरोधियों की भीड़ उमड़ी और गणतंत्र दिवस मनाया उसने मोदी सरकार द्वारा मनाए जा रहे गणतंत्र दिवस को भी पीछे छोड़ दिया। भले ही राजपथ पर देश की आन-बान-शान में विभिन्न झांकियां निकाली गईं हों पर शाहीन बाग के गणतंत्र दिवस समारोह ने न केवल देश बल्कि विदेश का भी ध्यान अपनी ओर खींचा।

25.1.20

ओछी मानसिकता रखने वाले पत्रकारों की कलम से पत्रकार और पत्रकारिता का गिरता स्तर

Pradeep Gadhwal
 

लोकतंत्र में संविधान के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकार  को जाना जाता है । एक पत्रकार की अहमियत क्या होती है ? उन पीड़ितों से पूछो जिन की परेशानी प्रशासनिक स्तर तक बगैर  जात-पात, धर्म पूछे एक पत्रकार ने पहुंचाई है । लेकिन बदलते समय के अनुसार आम जनता और प्रशासन के बीच सेतु की यह कड़ी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है इसकी प्रमुख वजह निकल कर आई है वह है अब ऐसे पत्रकार बनने लगे हैं , जिनके पास किसी प्रकार का कोई अनुभव हैं ही नहीं है । न हीं कोई डिग्री डिप्लोमा है । ऐसे व्यक्ति प्रायः पत्रकारिता में इसलिए आते हैं कि समाज में उनकी पत्रकार की इमेज बने जिसके जरिए वह रोब डालने वाला बन सके। 

गांधी के राम

कुछ दिनों पहले मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, "वो तो अच्छा हुआ कि गोडसे ने गांधी को मार दिया, अगर गांधी आज ज़िंदा होता तो मैं मार देता।"

आज के परिप्रेक्ष्य में इस बात के समर्थन में कुछ पाठक भी होंगे, लेकिन सिर्फ समर्थन के लिए ही यह बात लेख के प्रारम्भ में नहीं कही और ना ही गाँधीजी के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति या दया उत्पन्न करने की चेष्टा है यह वाक्य। यह वाक्य ना तो नफरत फैलाने के लिए और ना ही किसी राजनीतिक दल की दाल गलाने के लिए मैनें बताया है।

15.1.20

जब सहारा में बकाया भुगतान के लिए भी करना पड़ा था आंदोलन


CHARAN SINGH RAJPUT

एक समय था कि सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय नेताओं और बालीवुड हस्तियों से यह कहते-कहते नहीं थकते थे कि इतना बड़ा ग्रुप हाने के बावजूद हमारे यहां कहीं से कोई विरोध स्वर नहीं हैं। कोई यूनियन नहीं है। सब लोग एक परिवार की तरह काम करते हैं। सुब्रत राय ने सहारा को विश्व का सबसे बड़ा विशालतम परिवार कहा था। उनका कहना था कि रेलवे के बाद देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला ग्रुप सहारा है।

10.1.20

अमेरिका-ईरान तनाव से उड़ी मोदी सरकार की नींद, भारत को आर्थिक मोर्चे पर होंगी तमाम दुश्वारियां


अजय कुमार,लखनऊ

विकास के मामले में भारत भले ही दुनिया में अपनी पहचान नहीं बना पाया हो,लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने देश की अहमियत को कभी किसी ने कम करके नहीं आका। खासकर जब से केन्द्र में मोदी सरकार आई है तब से भारत अंतराष्ट्रीय हनक-धमक और भी बढ़ गई है। मोदी की आवाज को दुनिया गंभीरता से सुनती है। पीएम संतुलन बनाकर आगे बढ़ते हैं,इसी वजह से उनके अमेरिका से भी अच्छे संबंध हैं तो रूस भी उन पर विश्वास करता है। परस्पर विरोधी इजरायल-फिलीपींस ही नहीं मुस्लिम देशों में भी मोदी का सिक्का चल रहा है।

2.1.20

खास मौकों पर चुप रहने वालों को इतिहास नहीं करता माफ

अजय कुमार, लखनऊ

विदेशी पैसे से पल रहे देश के मुट्ठी भर लोग और चंद नेता अगर सड़क पर आगजनी और हो-हल्ला मचाकर यह सोचते हैं कि वह भारत के भाग्य विधाता बन जाएंगे तो उन्हें अपने मन से यह गलत फहमी निकाल देनी चाहिए। कोई भी देश लोकतांत्रिक तरीके से चलता है। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार और उसके बनाए कानून का पालन करना देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी और कर्तव्य दोनों ही हैं। अगर सरकार के किसी फैसले कोई खुश नहीं है तो भी उसे विरोध का रास्ता लोकतांत्रिक तरीके से ही चुनना अथवा न्याय की शरण में जाना होगा,जहां दूध का दूध,पानी का पानी हो जाता है। कुछ नेताओं द्वारा अपनी सियासी रोटियां सेकनें के लिए सरकार के प्रत्येक फैसले के खिलाफ जहर उगलना उसे संविधान विरोधी बता कर बखेड़ा खड़ा करने के दुष्प्रचार को जनता अच्छी तरह से समझती है।