Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

19.9.20

सच्चे पत्रकार और साहित्यकार होते हैं वास्तविक जनप्रतिनिधि

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र

 
साहित्य और पत्रकारिता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।यदि पत्रकारिता तथ्यों एवं विचारों को उदघाटित करती है तो साहित्य अमूर्त भावों और विचारों को अभिव्यक्ति देता है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।पत्रकारिता को साहित्य की एक विधा कहना गलत नहीं होगा।खुशवंत सिंह,कुलदीप नैयर,विद्यानिवास मिश्र,अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी और वर्तमान में हृदयनारायण दीक्षित ,वेदप्रताप वैदिक जैसे लोगों की लंबी परम्परा है जिन्होंने लेखक और पत्रकार के श्रेष्ठ दायित्वों का समान रूप से निर्वहन किया है।कुछ समय पूर्व तक पत्रकारिता में प्रवेश के लिए यह जरूरी था कि व्यक्ति का लगाव साहित्य की तरफ हो लेकिन आज ऐसा नहीं है।तकनीक के प्रयोग और पैसे की चमक ने पत्रकारिता को तुलनात्मक रूप से साहित्य से ज्यादा लोकप्रियता का माध्यम बना दिया।फलतःसाहित्य और पत्रकारिता के बीच पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा।आज दोनों पर एक दूसरे की उपेक्षा का आरोप लगता है।

मेदिनीनगर सेन्ट्रल जेल में 13 सितंबर से कैदी भूख हड़ताल पर

रूपेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार


महान क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ दास के शहादत दिवस यानि कि 13 सितम्बर से झारखंड के मेदिनीनगर सेन्ट्रल जेल के कैदी 5 सूत्रीय एजेंडे पर भूख-हड़ताल पर बैठे हुए हैं।

एजेंडा है-

अमिताभ जी, आप बोलिए......


 
अमिताभ जी आप बोलिए.... क्युकी सब ही तो बोल रहे हैं....आप कैसे नहीं बोलेंगे.....बोलिए, क्युकी ध्रतराष्ट्रवादी चाहते हैं, कि आप भी बोले.....देश की सबसे बड़ी समस्या पर आप कैसे नहीं बोलेंगे.......रिया, कंगना पर कुछ तो बोलिए, जिससे कुछ ध्रत राष्ट्रवादी योद्धाओं की टीआरपी बनी रहे..... नहीं तो वे इसी में टीआरपी बना लेंगे कि आप बोल नहीं रहे......अब ये मत सोचिए कि लोग इतना बोल चुके हैं, सब ऊब गए हैं, अब बोलकर क्या तूल देना..... तूल दीजिए, यही तो साहब के वफादार चाहते हैं, आप बोलिए......और सुनिए, क्या बोलिएगा...?

17.9.20

जब तक अपराध प्रमाणित न हो तब तक मीडिया द्वारा किसी को भी अपराधी कहना अपराध है




मीडिया ट्रायल से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है  
मीडिया ट्रायल से न्यायपालिका की कार्यशीलता प्रभावित होती है
सुशांत केस में लव एंगल बना मीडिया के लिये TRP बढ़ाने का जरिया
आज की पत्रकारिता वॉच डॉग से बनी लैपडॉग
टेलीविजन न्यूज़ चैनल नैतिकता और मूल्यों को छोड़कर बाजारीकरण का एक रूप बन रहे
मुख्यधारा की मीडिया लोगों को वास्तविक मुद्दों से कर रही गुमराह
आज की मीडिया बनी सत्ताधारियों के हाँथो की कठपुतली  
मीडिया स्वयं की स्वतंत्रता का कर रहा गलत उपयोग
प्रिंट मीडिया आज भी लोगों के हित के लिये काम कर रही है

कवि नरेश सक्सेना द्वारा साहित्य सभा का उद्घाटन



हिन्दू कालेज में हिंदी दिवस पर वेबिनार

दिल्ली। 'मातृभाषाओं में पढ़े-समझे बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। रटी हुई भाषा में रटे हुए विचार ही आएँगे, वहाँ मौलिक और नये विचार पैदा नहीं हो सकते।' सुप्रसिद्ध हिंदी कवि नरेश सक्सेना ने उक्त विचार  हिन्दू कालेज की हिंदी साहित्य सभा का उद्घाटन करते हुए व्यक्त किए। सभा द्वारा आयोजित वेबिनार में लखनऊ से जुड़े कवि सक्सेना ने हिंदी की वर्तमान स्थिति के प्रति चिंता और दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी आज तक ज्ञान की भाषा नहीं बन पाई, साथ ही कोई भी भारतीय भाषा ज्ञान की भाषा नहीं बन सकी।

16.9.20

जनता की नजरों में योगी सरकार की ‘रेटिंग’ अच्छी नहीं

अजय कुमार,लखनऊ

अफरशाही के सहारे उत्तर प्रदेश की ‘तकदीर और तस्वीर’ बदलने का सपना देख रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने ‘मिशन’ में कितना कामयाब या नाकामयाब रहे यह तो वह ही जानें, लेकिन आमजन की नजर में प्रदेश के विकास और कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की ‘रेटिंग’ बहुत अच्छी नहीं है। सड़कों और बिजली व्यवस्था का बुरा हाल है। कानून व्यवस्था के मामले में भी योगी सरकार विपक्ष के निशाने पर है।कोरोना महामारी जो पहले पहल यूपी में नियंत्रित दिख रही थी,वह बेकाबू होती जा रही है। कोरोना से निपटने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के सिस्टम में लोच ही लोच नजर आ रहा है।कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता होगा, जब समय पर इलाज नहीं मिल पाने के कारण कोरोना पीड़ितों को जान से हाथ नहीं छोना पड़ जाता हो। अस्पताल की चैखट पर पहुंचने के बाद भी मरीज को घंटों इलाज नहीं मिले तो इससे शर्मनाक स्थिति और कोई हो नहीं सकती है। जिनी अस्पताल लूट का अड्डा बन गए हैं।

तीन साल से मनरेगा श्रमिकों को नहीं मिली मजदूरी, किया ब्लॉक का घेराव

श्रमिक भरण-पोषण योजना का एक भी किश्त मजदूरों को नहीं मिला




वाराणसी : रोहनियां/ आराजी लाइन (दिनांक-16 सितंबर 2020 बुधवार) तीन साल से राजातालाब तहसील क्षेत्र के मरूई गांव के श्रमिकों को मनरेगा से मजदूरी नहीं मिली। इससे वह भुखमरी की कगार पर आ गए हैं। श्रमिकों ने ब्लॉक प्रमुख से मजदूरी दिलाए जाने की मांग की।

और कितना पतन बाकी है पत्रकारिता का? एंकरों के भौंकने और रिपोर्टरों के रेंकने का दौर

निरंजन परिहार-

हमारे हिंदुस्तान में न्यूज़ टेलीविजन आज पत्रकारिता नहीं, सिर्फ तमाशा है या मदारी का खेल है। क्‍योंकि खबर आज यह नहीं है कि दिल्‍ली से दूर देश के दिल में कहीं क्‍या कुछ खास हो रहा है। बल्कि खबर यह है कि रिया घर से कब निकलनेवाली है और शौविक कहां सोता है। खबर यह है कि तीन महीने पहले मरे हुए एक अभागे सुशांत को तीन साल पहले खाना कौन खिलाता था। और उस खाने में क्या क्या मिलाता था। यह सब इसलिए नहीं है कि आज चैनलों के पास कोई और खबर नहीं है। दरअसल, खबर इसलिए नहीं है क्योंकि खबर की जरूरत को चैनलों ने महसूस करना छोड़ दिया है। यहां सिर्फ होड़ है, आगे निकलने की। दरअसल, संवाद संवेदना से जन्म लेता है और संवेदना सरोकार की संवाहक है। लेकिन जब संवाद, संवेदना और सरोकार सारे ही समान रूप से धंधे की धमक में धराशायी हो जाएं, तो जो पतित परिदृश्य पैदा होता है, वही आज हम सब देख रहे हैं।  

मीडिया विश्‍लेषकों और मीडिया में अब भी आस्‍था रखने वाले हमारे मित्रों से अनुनय विनय है कि, कृपया पत्रकारीय नैतिकता को परंपरागत नज़रिए से देखने के बजाय ताक पर रखकर सुशांत सिंह की मौत के मातम को मजाक बनता देखते रहिए। क्योंकि मीडिया अब मिशन नहीं, कमीशन हैं। खबर अब सूचना और जानकारी नहीं,  एक धमकता हुआ धंधा है। इसलिए, प्रिंट हो या टीवी, मीडिया में अब हर खबर वहां केवल नफे और नुकसान की अवधारणा का आंकलन है। बाजारवाद ने मीडिया को धंधे में ढाल दिया है। ऐसा ही होता है, सेवा का कोई स्वरूप या मिशन, जब धंधे का रूप धर ले, तो सरोकारों की मौत बहुत स्वाभाविक है। इसीलिए, आज टीवी चैनलों की, चैनलों के एंकरों और एंकरों से बात कर रहे रिपोर्टरों की हालत क्‍या है? दिल पर हाथ रखकर पूछिए, कि क्‍या उन्‍हें सूचना व संवाद का माध्यम कहा जा सकता है? 

हम में से बहुत सारे साथी खबरों की दुनिया के पुराने बादशाह हैं – और उन्होंने संस्कार, सरोकार व संवाद की पत्रकारिता की है। कोई प्रिंट में तो कोई टीवी में, और कोई अपनी तरह दोनों में काम का अनुभवी है। सो, हम सबके लिए सोचने, समझने और  दिमाग लगाने के बजाय इस पूरे परिदृश्‍य से गायब हो जाने का वक्त है। चुप्पी साधकर इस दौर के गुजरने का इंतज़ार करने का वक्त है। हम, जो दो – ढाई दशक से ज्यादा वक्त पुराने पत्रकार हैं, हम सबके अतीत और वर्तमान के बीच बाजारीकरण की एक दीवार खड़ी हो गई है। सन 2000 के पहले की और उसके बाद की पत्रकारिता में जो खाई कुछ ज्यादा ही गहरा गई है, उसकी गहराई को सिर्फ सिर्फ एंकरों के ‘भौंकने’, रिपोर्टरों के ‘रैंकने’ और खबरों को खत्म हो जाने नज़रिये से देखिए। पत्रकारिता के पतित होते इस परिदृश्य में, पवित्र और पावन पत्रकारिता तलाशेंगे, तो तकलीफ ही मिलेगी। और कुछ नहीं मिलनेवाला। फिर भी मिले, तो बताना ! 

14.9.20

मीडिया का चरित्र भी जीडीपी की तरह माइनस में जा चुका है


आज भारत कोरोना केसेस के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया है। रोज 1000 मौतें हो रही हैं । लेकिन कोरोना को लेकर मीडिया में सन्नाटा है। अब कोई तब्लीगी एंगल भी नहीं मिल रहा है।  अब तो  पूरा देश रियामय  हो चुका है।  रिया के गाड़ी के पीछे हांफते हुए भागता  रिपोर्टर दुनिया का सबसे लाचार इंसान मालूम पड़ता है। काश कि कोई ऐसी टेक्नोलॉजी आ जाती जिससे कि रिपोर्टर का माइक बंद शीशे के अंदर घुस जाता या फिर उसे  मिस्टर इंडिया  वाली  शक्ति मिल जाती  तो  वह गाड़ी के अंदर घुस कर  सीधे रिया की गोद में बैठ जाता। बड़े दुख की बात है की हमारे इंजीनियर अभी ऐसी तकनीक ईजाद नहीं कर पाए हैं।

भूल जाइए कि सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा... !


देश के आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। सुधरने की गुंजाइश कम है। करोड़ों लोग बेकार और बेरोजगार बैठे हैं। भूल जाइए कि जिंदगी फिर गुलजार होगी। इसलिए, जो कुछ आपके पास है उसे बचाकर रखिए, आगे काम आएगा।  अगर आप सोच रहे हैं कि कोरोना की वैक्सिन के आते ही सब कुछ फिर से ठीक हो जाएगा, तो भूल जाइए। हालात सुधरने में पांच साल से भी ज्यादा का वक्त लग सकता है।

-निरंजन परिहार

अखिलेश यादव के रास्ते पर तेजस्वी यादव

अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह तो चुनाव से दूर रखा था तो तेजस्वी ने लालू को पोस्टरों से ही कर दिया गायब


नई दिल्ली/पटना। क्या बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रास्ते पर चल रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश में वर्चस्व में आते ही अखिलेश यादव ने पार्टी के खेवनहार रहे अपने पिता को साइड लाइन किया था। उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर ही रहते हुए अपने पिता को पार्टी का संरक्षण बनाकर एक तरह से पार्टी से साइड लाइन कर दिया था। हालांकि अखिलेश यादव ने पोस्टरों से अपने पिता का फोटो नहीं हटाया बल्कि उनके कद को भुनाया। मुलायम सिंह यादव के साइड लाइन करने के पीछे भी मुलायम सिंह के समय के दागी नेताओं को दरकिनार कर सपा की छवि को निखारना बताया गया था।

नए समीकरण मासिक पत्रिका अब नए समीकरण समाचार पत्र

आगरा। नए समीकरण मासिक पत्रिका, कमला नगर, आगरा अब नए समीकरण समाचार पत्र होने जा रहा है।

पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार पर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने उठाए सवाल?

सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व डीजीपी से की अपील

देश के अंदर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं देश में कई पत्रकारों की हत्या कर दी गई देशभर में पत्रकारों ने इसको लेकर बड़ा विरोध दर्ज किया  उसके बावजूद यह हमले कम नहीं हो रहे हैं इसी को लेकर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने मोर्चा खोल दिया है पत्रकारों के हित में काम करने वाले जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग की है इसको लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और नेता विपक्ष को पत्र भी लिखे जा चुके हैं पत्रकारों को भयमुक्त पत्रकारिता करने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है लगातार ग्राउंड रिपोर्ट करने जा रहे पत्रकारों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सरकारी कार्यालय और पुलिस विभाग में भी पत्रकारों के साथ सही सुलूक नहीं हो रहा है।

साक्षात्कार के बदलते मायने

vijay kumar
 
बचपन से ही लेखन का शौक रखने और पत्रकारों के रुतबे को देखते हुए मुझे पत्रकारिता में अपना भविष्य नजर आने लगा। इसलिए मैंने कानपुर विश्वविद्यालय से अच्छे अंकों में पत्रकारिता की डिग्री ली। एक वरिष्ठ पत्रकार ने सुझाया कि दूरदर्शन से इंटर्नशिप करने के बाद आपको काफी अवसर मिलेंगे। मैंने उनकी बात मानकर इंटर्नशिप पूरी की और फिर निकल पड़ा नौकरी की तलाश में। शायद ही कोई चैनल और समाचार पत्र बचा होगा जहाँ मैंने अपना जीवनवृत्त (बायोडाटा) न दिया हो। संस्थान के गेट पर पहुंचते ही सिक्यूरिटी गार्ड ने ही साक्षात्कार ले लिया कि किसके माध्यम से आए हो। जवाब में कोई संदर्भ (रेफरेंस) न मिलने पर वह कह देता कि आपको काॅल किया जाएगा। लेकिन मजाल है कि कहीं से साक्षात्कार के लिए बुलावा आता।

कांग्रेस में नई जान फूंकने की कोशिश में सोनिया

सोनिया गांधी कोई खतरा मोल नही लेना चाहती। उन्होंने मजबूत नेता की शैली में पार्टी को नई शक्ल देना शुरू कर दिया है। वे बीमार हैं, लेकिन उन्हें पता है कि कांग्रेस चलाना उनकी जिम्मेदारी भी है और मजबूरी भी। क्योंकि उनसे मजबूत नेता पार्टी में कोई और नहीं है और राहुल गांधी के लिए सीढ़ी उन्हें ही बनानी होगी।

 -निरंजन परिहार

कांग्रेस के पास श्रीमती सोनिया गांधी से बड़ा और पार्टी की गरिमा बढ़ानेवाला कोई दूसरा धीर गंभीर नेता नहीं है, और जाहिर है कि वे अपनी इस महिमा को अच्छी तरह समझती भी हैं। इसलिए उन्होंने बीमार होने और विदेश जाने की तैयारी में होने के बावजूद बहुत तेजी से उन सारों के पर कतर दिए हैं, जो पार्टी को आंख दिखाते रहे हैं और जिनकी वजह से पार्टी को विवादों में आना पड़ा है। इसीलिए राजस्थान के दो नेताओं का राजनीतिक कद बड़ा करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती गांधी ने 11 सितंबर की रात को पार्टी के समर्पित नेताओं को हैसियत बख्श दी, तो कई नेताओं को उनकी औकात दिखा दी। किसी को नई जिम्मेदारी सौंपी, तो पुनर्गठन में महत्वपूर्ण पदों पर राहुल गांधी के विश्वस्त नेताओं को अहमियत देकर संदेश भी दे दिया कि अब चलेगी तो उन्हीं की।

ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी पर ब्रेक

मनोज कुमार

 
ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है.

13.9.20

भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक है

-एस.आर. दारापुरी 

दिसंबर 2018 में, महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके की एक वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें वह दलितों और मुसलमानों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में डींग मारते हुए दिखाई दे रही है। उसने जो कहा वह भारत के पुलिस बल में सामाजिक पूर्वाग्रहों की एक कच्ची लेकिन सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है।

ग्लोबल टाइम्स, चीन और भारत



चीन और भारत का सीमा विवाद कोई नया नहीं है। 1962 में चीन-भारत के बीच हुए युद्ध में जिस तरह से चीन ने भारतीय जमीन पर कब्‍जा जमाया था, उसे लगता है कि वह इससे आगे होकर 21वीं सदी के उभरते और वैश्‍विक  हुए भारत की जमीन भी अपने कब्‍जे में कर लेगा ।  वस्‍तुत: यही वजह है कि एक तरफ रुस में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की मुलाकात हुई और वे सीमा पर शांतिवार्ता की चर्चा कर रहे थे, ठीक उसी समय में  चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स धमकी दे रहा था कि अगर युद्ध हुआ तो भारत हार जाएगा।

11.9.20

रजोनिवृत्ति - एक स्वाभाविक परिवर्तन



महिलाओं में जब मासिकधर्म पूरी तरह से समाप्त हो जाता है तब उसे  रजोनिवृत्ति कहते हैं। रजोनिवृत्ति 45 से 55 साल के बीच की उम्र में होता है। रजोनिवृत्ति होने पर स्त्री के शरीर में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के पविर्तन हो जाते हैं। रजोनिवृत्ति वह पड़ाव है जिसमें एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है।

क्या हमें जानकारी है कि अमेरिका में इस वक्त क्या चल रहा है ?

-श्रवण गर्ग

आज से केवल छप्पन दिनों के बाद भारत सहित पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली घटना के परिणामों को लेकर अब हमें भी प्रतीक्षा करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। इस बात पर दुःख व्यक्त किया जा सकता है कि मीडिया ने एक महत्वपूर्ण समय में जनता का पूरा ध्यान जान बूझकर ग़ैर ज़रूरी विषयों की तरफ़ लगा रखा है।इस बातचीत का सम्बंध अमेरिका में तीन नवम्बर को महामारी के बीच एक युद्ध की तरह सम्पन्न होने जा रहे राष्ट्रपति पद के चुनावों और जो कुछ चल रहा है उसके साथ नत्थी हमारे भी भविष्य से है।

दिनबदिन गिरता नजर आ रहा है पत्रकारिता का स्तर

 
पत्रकार सत्येंद्र सिंह राजपुरोहित

पत्रकारिता का अपने आप में काफी महत्व है.। इसलिए पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है। वहीं  पत्रकारिता के कारण ही सामाजिक और राजनीतिक ढांचा मूल रुप से काम कर रहा है। पत्रकारिता के जरिए ही लोगों तक समाचार पहुंचाने का काम किया जाता है। घटना कही होती है तो उस घटना को लोगों तक जानकारी इसी पत्रकारिता के बदौलत ही मिलती है। जनता भी पत्रकारिता के माध्यम से एक जगह के समाचार को पूरे विवरण के साथ देख सकते है ,वहीं आम जन को  इसी पत्रकारिता के कारण सच्ची घटनाओं की जानकारी होती है। सच्ची बात और सच्ची घटनाओं को लोगों तक पहुंचाने का कार्य पत्रकारिता द्वारा किया जाता है। पत्रकारिता के जरिए ही लोग भ्रष्टाचार,राजनीतिक उठापटक, घोटालों, घटनाओं के बारे में जानकारी ले पाते है। 

10.9.20

यूं चिश्तिया चराग़ की रुख़्सती...

#यूं_चिश्तिया_चराग़_की_रुख़्सती...
यार को हमने जा-ब-जा देखा,
कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा!
कहीं मुमकिन हुया कहीं वाजिब,
कहीं फ़ानी कहीं बक़ा देखा!
दीद अपनी की थी उसे ख्वाहिश,
आपको हर तरह बना देखा!
कहीं है वो बादशाहे तख़्त-ए-नशीं,
कहीं कांसा लिए गदा देखा!!
बेह्नुल अक़्वामी सतह पर क़ौमी इत्तेहाद को चिश्तिया चराग़ से रौशन-ओ-फ़रोग़ देने वाली इस बर्रे सगीर की अज़ीमोशान रूहानी शख्सियत हज़रत हसनी मियाँ नियाज़ी आज बतौर-ए-ज़ाहिर इस आरज़ी दुनियां से पर्दा फरमा गये।आपका पर्दा फरमाना चिश्तिया रंग में रंगे हर दीवाने को ग़मो अफ़सुर्दा कर गया।आपने चिश्तिया मिशन को क़ौमी इत्तेहाद की हिन्दू-मुस्लिम तस्बीह में पिरो कर 'अनल-हक़' का जो दर्स दिया है उसकी खुशबू सदा आलम-ए-जहां में महकती रहेगी।
आपसे मोहब्बत करने व् हर मज़ाहिब के मानने वाले आज ग़म आलूदा हैं।"पंजतन की मोहब्बत का म्यार तो देखिये साहब! "हसनी" का "हुसैनी" से माहे मोहर्रम में जा मिलना"...
आपका रुखसत होना बेशक़ हिन्दू-मुस्लिम इत्तेहाद में एक बड़ी ख़ला पैदा कर गया मग़र आपके रौशन चराग़ से इस मुल्क़ की पाकीज़गी और क़ौमी-एकता हमेशा बुलंद-ओ-बाला रहेगी...इन्शा अल्लाह
●इंनालिल्लाहे व् इंनालिल्लाहे राजेऊन●
"कहीं आबिद बना कहीं ज़ाहिद,
  कहीं रिंदो का पेशवा देखा"!
  "शमा होकर के परवाना,
   आपको आप मे जला देखा"!!!

अल्लाह मग़फ़ेरत फरमाए...आमीन

डॉ. सयैद एहतेशाम-उल-हुदा
वरिष्ठ सदस्य भारतीय जनता पार्टी
उत्तर-प्रदेश
9837357723

6.9.20

आज जिसके पास स्मार्टफोन है वे सभी जर्नलिस्ट हैं

कोविड-19 में टीवी स्टोरी को लेकर यूनिसेफ व पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला द्वारा मीडिया कर्मियों के साथ छात्रों का वेबिनार

शुरुआती दौर से - कोरोना को पॉलिटिक्ली देखने की बजाय मेडिक्ली देखने की आवश्यकता थी -ब्रजेश राजपूत


स्वतंत्र शुक्ला

इंदौर। "हाँथ से हाँथ भले न मिले, दिल से दिल मिलाए रखिए" शेर शायरी अल्फाज़ो की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसे कोरोना ने हमेशा हमेशा के लिए हम सब से जुदा कर दिया राहत इंदौरी साहब के साथ साथ ऐसी कई जानें गई हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे ही कोरोना लॉक डाउन के दौरान कवरेज की गई कई कहानियों को जानने के लिए यूनिसेफ मध्यप्रदेश द्वारा पत्रकारिता एवं जन संचार अध्ययन शाला देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के छात्रों के साथ कोविड-19 में टी.वी स्टोरी को लेकर वेबिनार आयोजित किया गया।

एक 'हैंडसम' चेहरे का फीका पड़ता नूर !

-निरंजन परिहार-

सचिन पायलट नायक थे। खलनायक हो गए हैं। राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष पद छिन गया। उपमुख्यमंत्री पद से भी पैदल हो गए। सत्ता और संगठन दोनों गंवाने के दौर में 7 सितंबर को जन्मदिन है। सो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आपदा को अवसर में बदलने’ के मंत्र को अपनाते हुए जन्मदिन पर जलसा जमाने की जुगत में हैं। 


 

5.9.20

आल इंडिया बाईक बोट टैक्सी यूनियन संगठन का 30 सितंबर को संसद का घेराव करने का आह्वान





आज भारतवर्ष जिस तबाही के दौर से गुजर रहा है और भविष्य में जिस बुरे हालात से गुजरने वाला है उसके लिए केवल मोदी ही दोषी नहीं होगें वह सब भी होंगे जिन्होंने जाने अनजाने या मूर्खतावश ऐसे व्यक्ति को देश का प्रधानमंत्री बना दिया जो अशुभ लालची पाखण्डी निर्लज्ज अहंकारी और स्व प्रशंसा का भूखा था।

"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनके भी अपराध"।        
            

त्रासदी में तृप्ति तलाशते तेवर अर्थात कंगना, राऊत और देशमुख

निरंजन परिहार

अनिल देशमुख को माफ कर दीजिए। उन्हें नहीं पता है कि कंगना रणौत के बयान पर प्रतिबयान से उनको क्या मिला। देशमुख बड़े आदमी हैं। महाराष्ट्र के गृह मंत्री हैं। शरद पवार की मेहरबानी से पूरे प्रदेश की प्रजा की रक्षा, सुरक्षा और संरक्षा की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। एक जिम्मेदार मंत्री के नाते चुप रहना चाहिए था। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी कहां बोल रहे हैं, चुप ही हैं न। सो, देशमुख भी चुप रह लेते, तो कौनसा उनका मंत्री पद चला जाता। देशमुख ने कंगना के बयानों पर सख़्त टिप्पणी की है। वे बोले कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को मुंबई में रहने का अधिकार नहीं है, जिसे लगता है कि वो मुंबई में सुरक्षित नहीं है।

एमडी/एमएस के छात्रों की सीएम योगी से अपील

 Chhatro par ho raha hai atyachaar

                              खुला पत्र
                        (open letter)

माननीय प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री(उत्तरप्रदेश)

आशा करते है कि आप कुशल मंगल होंगे लेकिन हम युवा पीढ़ी बहुत चिंतित है अभी और बहुत बड़ी समस्या में फसे है इसीलिए आपके समच्छ मन की बात करना चाहते हैं

केवल ट्रेनों का संचालन ही काफी नहीं बल्कि जन सहयोग भी बहुत जरूरी है


कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों  की घर वापसी का संकट देखते हुए राज्य सरकारों के अनुरोध पर श्रमिक ट्रेनें जरूर चलाई गईं, वह भी मौके की नजाकत को देखते हुए। इन ट्रेनों से लाखों प्रवासी मजदूरों को अपने गांव, अपने घर पहुंचने में काफी मदद मिली। अब जबकि लॉकडाउन अनलॉक हो चुका है। दिल्ली और देशभर में मैट्रो ट्रेनों को चलाने का ऐलान किया जा चुका है तो भारतीय रेलवे भी कोरोना काल से पूर्व की तरह ट्रेनों के संचालन की तैयारी कर रहा है। इतने बड़े नेटवर्क को लम्बे अर्से तक ठप्प करके नहीं रखा जा सकता। जल्द ही गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है-गीत फिर लोगों की जुबां पर आएगा। कोरोना वायरस महामारी के कारण इस वर्ष मार्च में 1.78 करोड़ से ज्यादा टिकट रद्द किए गए और 2727 करोड़ के लगभग रकम वापस की गई। रेलवे ने 25 मार्च से ही अपनी यात्री ट्रेनें स्थगित कर दी थीं। पहली बार रेलवे ने  टिकट बुकिंग से जितनी आमदनी हुई उससे ज्यादा रकम वापस की।

2.9.20

जय लक्ष्मी गृह निर्माण सहकारी संस्था के घोटालों की जांच की जाए

 


महोदय,

सहकारिता विभाग का उद्देश्य सहकारी संस्थाओं को संगठित कर समाज के कमजोर वर्गों के लोगो की रहवासी समस्याओं के समाधान करने के लिये हुआ था किंतु इसके विपरीत सहकारिता विभाग प्रशासनिक तंत्र का एक ऐसा विभाग बन गया है । जो कमजोर लोगो का ही शोषण कर रहा है ।

सहकारिता की विक्षिप्त एवं भ्रष्ट कार्यप्रणाली के कारण वश वर्षो नहीं दशकों तक विभिन्न संस्थाओ के भूखंड धारको / सदस्यों को उनकी रहवासी समस्याओं का समाधान नहीं मिलता । इसके बावजूद सहकारिता विभाग द्वारा न तो संस्था, न हीं संस्था के पदाधिकारिओं पर कोई उचित कार्यवाही की जाती है । जिस वजह से सदस्य / भूखंड धारक अपने अधिकारों से वंचित रह जाते है और दशकों तक न्याय नहीं मिल पाता ।

इसका जीवंत उदाहरण “जय लक्ष्मी गृह निर्माण सहकारी संस्था” है । 3 दशकों (30 वर्षों) से भी पहले से संस्था द्वारा भूखंड धारकों को भूखंड पर कब्जा नहीं दिया जा रहा है । विकास के नाम पर मनमाना शुल्क वसूला जा रहा है विगत 30 वर्षों में दो बार विकास शुल्क एवं अन्य शुल्को के नाम पर लाखों रुपए संस्था पदाधिकारियों द्वारा भूखंड धारकों से लिए जा चुके हैं । जिसका कोई हिसाब किसी भी सरकारी विभाग में संस्था द्वारा नहीं दिया गया है और आज तक भी विकास कार्य पूर्ण नहीं किया गया है । पदाधिकारियों द्वारा संस्था को एक लाभ का व्यवसाय बना दिया गया है जबकि संस्था का गठन भूखंड धारकों की आवासीय समस्याओं को सुलझाने के लिए किया गया था । किन्तु संस्था पदाधिकारियों द्वारा सहकारिता विभाग के अधिकारियों के साथ साठगांठ कर वर्षो से संस्था को पुश्तैनी व्यवसाय की तरह आये का एक स्त्रोत बना लिया गया है । भूखंड धारको से शुल्कों के नाम पर संस्था द्वारा धन राशि वसूली जा रही है और फिर भूखंड हड़पने / धन एठने की नियत से भूखंड धारको से प्राप्त शुल्कों से ही विभिन्न न्यायलयो में फर्जी वाद प्रस्तुत कर वर्षो से उनको उलझा रखा है जिस शुल्कों का उपयोग विकास कार्य में करना चाहिए था । उस से भूखंड हड़प कर संस्था को व्यवसाय बना दिया । इसके विरुद्ध आज तक सहकारिता विभाग द्वारा क्यों कोई कार्यवाही नहीं की गयी ?

प्रशासन से पीड़ित भूखंड धारक निम्नलिखित तथ्यों के आधार निष्पक्ष जांच हेतु “सयुक्त संचालक कोष एवं लेखा विभाग” और “स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग” और "आर्थिक अपराध शाखा" जांच एजेंसियों से मामले की जांच करने की विनती करते है:


1.    विगत 20 वर्षों में 90% भूखंड मूल सदस्यों द्वारा विक्रय कर दिए गए और संस्था द्वारा नए भूखंड धारकों से सभी प्रकार के शुल्क प्राप्त किए गए किंतु नामांतरण एक भी भूखंड धारक का नहीं किया गया ऐसा क्यों ?

2.    यदि 90% भूखंडो के विक्रय मूल सदस्यों द्वारा कर दिया गया है और नए भूखंड धारको के नामांतरण संस्था द्वारा नहीं किया गया और न उन्हें मतदान के अधिकार नहीं मिला तो संस्था में चुनाव किस आधार पर हो रहे है । जब मूल सदस्य ही नहीं है तो ?

3.     पुनः विकास शुल्क की राशि का निर्धारण किन आधारों पर हुआ है ? वर्ष 2011 पश्चात संस्था की ऑडिट क्यों नहीं हुई ?

4.       वर्ष 2011 में जो पुनः विकास शुल्क राशि ₹80 प्रति वर्ग फीट निर्धारित हुई थी । उसे बढ़ाकर ₹150 प्रति वर्ग फीट और उसके पश्चात ₹170 प्रति वर्ग फीट और फिर पुनः ₹175 प्रति वर्ग फीट कर दी गई । किस आधार पर इससे संबंधित किसी भी प्रकार के दस्तावेज़ सहकारिता विभाग में उपलब्ध क्यों नहीं है ?

5.       संस्था द्वारा चुनाव की प्रक्रिया कब हुई और किन-किन सदस्यों ने मतदान किया । उसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है क्यों ?

6.       संस्था की आमसभा (जनरल मीटिंग) के रजिस्टर एवं अन्य जानकारियाँ उपलब्ध क्यों नहीं है ?

7.       संस्था द्वारा वर्ष 1997 में जब सभी भूखंडों का आवंटन सदस्यों को कर पंजीकरण करवा दिया गया था किंतु फिर भी विगत 25 वर्षों से संस्था सीधे रूप से भूखंडों का क्रय विक्रय बाजार में कर रही है यह कैसे संभव है ?

8.       विगत कुछ वर्षों में भी संस्था द्वारा कुछ भूखंडों का विक्रय सीधे तौर पर किया गया और यह विक्रय सन 1997 के निर्धारित राशि पर किया गया किंतु क्या नए भूखंड क्रेता से धनराशि भी पुराने मूल्य से ली गई या आज के बाजार भाव से ली गई इसकी भी जांच की जाए ?

9.       कितने भूखंड धारकों का पुनः विकास शुल्क जमा हो चुका है इसकी जानकारी सहकारिता एवं नगर निगम विभाग में उपलब्ध क्यों नहीं है ?

10.   अभी तक कॉलोनी में जो विकास कार्य हुआ है उसका खर्च का विवरण , प्रारंभ से आज तक किसी भी सरकारी विभाग में उपलब्ध क्यों नहीं है ?

11. संपत्ति पंजीकरण कानूनी रूप से सभी दस्तावेजों की रिकॉर्डिंग को संदर्भित करता है प्लॉट रजिस्ट्री एक अनुबंध पत्र नहीं है जिसे रद्द किया जा सकता है, यह एक संपत्ति का पंजीकृत विलेख है । जिसे स्वामी द्वारा हस्तांतरित किया जा सकता है तो फिर संस्था द्वारा सहकारिता एवं अन्य न्यायलयों से विक्रय पत्र को शुन्य / निरस्त करने हेतु आवेदन किसे दिया जा रहा है ।

इस तरह तो संस्था के पदाधिकारी सदियों तक संस्था का उपयोग व्यवसाय के रूप में करते रहेंगे । सहकारिता विभाग द्वारा भूखंड धारको के शिकायतों के बावजूद क्यों कोई उचित कार्यवाही कर भूखंड धारको का नामांतरण कर, भवन निर्माण अनुमति प्राप्त  कर उनकी रहवासी समस्याओं के समाधान करने हेतु उचित कदम नही उठाये गए ।

संस्था द्वारा की जा रही वित्तीय अनियमितताओं की जांच “सयुक्त संचालक कोष एवं लेखा विभाग” और “स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग” एवं संस्था और सहकारिता के अधिकारियों के संरक्षण में किया जा रहे घोटालो और अनियमितताओं की जांच उपरोक्त तथ्यों के आधार पर "आर्थिक अपराध शाखा" द्वारा कराये जाने के अनुरोध इस पत्र के माध्यम से भूखंड धारको द्वारा किया जा रहा है ।

अन्यथा असंवैधानिक रुप से कार्य कर एवं भूखंड धारकों के अधिकारों का हनन करने वाली संस्था को संरक्षण देने ने वाले विभागों की कार्यप्रणाली मे सुधार एवं पीड़ितों को न्याय पाने के लिए “जनहित याचिका” के तहत आवेदन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना पड़ेगा ।

पीड़ित भूखंड धारको द्वारा

deepkunjcolony@gmail.com
 

माननीय मुख्यमंत्री महोदय एवं कलेक्टर महोदय व अन्य प्रशासनिक अधिकारीगण,
 
निवेदन है कि जिस प्रकार बॉबी छाबड़ा द्वारा सहकारिता विभाग के जिन अफसरों के साथ सांठगांठ कर घोटाले किए गए और अब बॉबी छाबड़ा के साथ-साथ उन सभी सहकारिता अधिकारियों की भी जांच की जा रही है और उन पर भी कार्रवाई होगी । उसी तरह जय लक्ष्मी गृह निर्माण सहकारी संस्था द्वारा विगत 30 वर्षों से किए जा रहे घोटाले और संस्था को व्यवसाय की तरह चलाया जा रहा है । यह भी बिना सहकारिता विभाग की मिलीभगत के संभव नहीं है । पूर्व में भी चार बार अनियमितताओं और घोटालों की वजह से संस्था की समिति भंग की जा चुकी है और प्रशासक नियुक्त किए गए थे किंतु 30 वर्ष बीत जाने के बाद भी दीपकुंज कॉलोनी के 185 भूखंडों में से एक भी भूखंड पर भवन नहीं बन पाया है । संस्था के पदाधिकारी संस्था को व्यवसाय की तरह चला रहे हैं । जिसमें सहकारिता विभाग ही नहीं नगर निगम अधिकारी भी शामिल है ।

आज दिनांक को भी संस्था का संचालक मंडल भंग है । आदेश क्रमांक/गृहविधि/2020/08 दिनांक 01.01.2020 से संस्था के संचालक मंडल को म.प्र. सहकारी अधिनियम की धारा 1960 की धारा 53(1) के अन्तर्गत भंग किया गया है ।
 साथ ही कार्यालयीन पत्र क्रमांक/गृहविधि/2020/09 दिनांक 01.01.2020 से संस्था के संचालक मंडल के विरूद्ध अधिनियम की धारा 76(2) के अन्तर्गत आपराधिक प्रकरण दर्ज कर श्री पी. के. जैन को अधिकारी नियुक्त किया गया है ।
किंतु 3 महीने पूर्व संस्था की कॉलोनी दीपकुंज के 30 से भी ज्यादा भूखंड धारकों द्वारा  शिकायतें सहकारिता विभाग में की गई थी । जिनको संस्था द्वारा साठगांठ कर पुनः दबा / बंद कर दिया गया । बिना शिकायतकर्ता के पक्ष की संज्ञा लिए । एक भी भूखंड धारक को निराकरण नहीं मिल पाया ।

प्रशासनिक अधिकारियों से निवेदन है कि कृपया कर संस्था की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जाए एवं 30 वर्षों से जो भूखंड धारक वैध भूखंड पर भवन निर्माण करना चाहते हैं उन्हें भवन निर्माण की अनुमति दी जाए ।
निष्पक्ष और पारदर्शी से तात्पर्य है कि वर्तमान भूखंड धारक को एवं संस्था के मूल सदस्यों को जांच में शामिल किया जाए जो अधिकार मूल सदस्यों को होते हैं पंजीकृत पत्र के बिंदु क्रमांक 4 - 5 के अनुसार वे सारे अधिकार भूखंड क्रेता को स्थानांतरित हो जाते हैं । तो उस अधिकार से मूल सदस्य द्वारा परेशान होकर जिन्हें भूखंडों को विक्रय किया गया है, नए / वर्तमान भूखंड मालिक को वे सारे अधिकार प्राप्त हो और उन्हें भी इस जांच में शामिल किया जाए ।

क्योंकि विगत 30 वर्षों में परेशान होकर लगभग 90% से ज्यादा मूल सदस्यों द्वारा भूखंड का विक्रय कर दिया जा चुका है तो कृपया कर नए क्रेता / वर्तमान भूखंड मालिक को जांच में शामिल करें जो कि न्याय पूर्वक होगा ।

कई ऐसे बिंदु हैं जो पूर्व में भी चार बार जब संस्था भंग हुई थी और अभी भी जब संस्था भंग है जिनके आधार पर जांच होना चाहिए और इन सभी दस्तावेजों की उपलब्धता सहकारिता एवं नगर निगम विभाग में होना चाहिए :

1. वर्ष 2011 पश्चात संस्था की ऑडिट क्यों नहीं हुई ?
2. यदि कॉलोनी में एक भी भवन निर्माण नहीं हो पाया तो धरोहर स्वरूप सुरक्षा निधि के रूप में सुरक्षित प्लॉट नगर निगम से किन आधारों पर संस्था द्वारा छुड़वा लिए गए ? नगर निगम की फाइलों में इससे संबंधित दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं है ?
3. विगत 20 वर्षों में 90% भूखंड मूल सदस्यों द्वारा विक्रय कर दिए गए और संस्था द्वारा नए भूखंड धारकों से सभी प्रकार के शुल्क प्राप्त किए गए किंतु नामांतरण एक भी भूखंड धारक का नहीं किया गया ऐसा क्यों ?
4. सन 1999 में नगर निगम से जय लक्ष्मी हाउसिंग को-ऑपरेटिव सोसायटी  द्वारा सर्वप्रथम दीपकुंज कॉलोनी के विकास की अनुमति ली गई थी । उस समय विकास कार्य अपूर्ण एवं गुणवत्ताहीन होने पर नगर निगम द्वारा पत्र क्रमांक : 1667 / कॉलोनी सेल /07, इंदौर ने भवन निर्माण अनुज्ञा निरस्त कर दी गई । तो फिर धरोहर स्वरूप भूखंडों को कैसे नगर निगम द्वारा छोड़ दिया गया ?
5. ऐसी विषमता और न्याय प्राप्ति हेतु सदस्य नगर पालिका निगम के पूर्व आयुक्त महोदय श्री सीबी सिंह एवं उपायुक्त श्रीमती लता अग्रवाल व श्री केदार सिंह एवं सहकारिता के पूर्व उपायुक्त श्री काडमू पाटनकर, श्री जगदीश  कन्‍नौज,  निरीक्षक श्री संजय कुचन्‍कर, निरिक्षक श्री जगदीश जलोदिया एवं श्री जगदीश खिची से कई बार संपर्क करते रहें किंतु आज दिनांक तक भवन निर्माण अनुमति और संस्था पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई क्यों ?
6. वर्ष 2012 में संस्था द्वारा नगर निगम से पुनः विकास 1 वर्ष में पूर्ण करने के लिए अनुमति पत्र क्रमांक 2283/12 दिनांक 02/01/2012 को प्राप्त की किंतु विगत 8 वर्षों में भी विकास कार्य पूर्ण नहीं किया गया जबकि पुनः विकास अनुमति की शर्त के अनुसार 1 वर्ष में संस्था को विकास कार्य पूर्ण करना था इसके विरुद्ध नगर निगम ने कोई भी कार्यवाही क्यों नहीं की ?
7. विभिन्न न्यायालयों द्वारा संस्था के पक्ष में और विरुद्ध कई बार आदेश पारित किए हर बार सिर्फ संस्था के पक्ष वाले आदेशों का ही पालन किया गया किंतु संस्था के विरुद्ध जो भी आदेश दिए गए उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई ऐसा क्यों ?
8. पुनः विकास शुल्क की राशि का निर्धारण किन आधारों पर हुआ है ? इससे संबंधित किसी भी प्रकार के दस्तावेज सहकारिता विभाग और नगर निगम दोनों कार्यालयों में क्यों उपलब्ध नहीं है ?
9. वर्ष 2011 में जो पुनः विकास शुल्क राशि ₹80 प्रति वर्ग फीट निर्धारित हुई थी । उसे बढ़ाकर ₹150 प्रति वर्ग फीट और उसके पश्चात ₹170 प्रति वर्ग फीट और फिर पुनः ₹175 प्रति वर्ग फीट कर दी गई । किस आधार पर इससे संबंधित किसी भी प्रकार के दस्तावेज सहकारिता एवं नगर निगम के किसी भी विभाग में उपलब्ध क्यों नहीं है ?
10.  संस्था द्वारा चुनाव की प्रक्रिया कब हुई और किन-किन सदस्यों ने मतदान किया । उसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है क्यों ?
11. संस्था की आमसभा (जनरल मीटिंग) के रजिस्टर एवं अन्य जानकारियां उपलब्ध क्यों नहीं है ?
12. संस्था द्वारा वर्ष 1997 में जब सभी भूखंडों का आवंटन सदस्यों को कर पंजीकरण करवा दिया गया था किंतु फिर भी विगत 30 वर्षों से संस्था सीधे रूप से भूखंडों का क्रय विक्रय बाजार में कर रही है यह कैसे संभव है ?
13. विगत कुछ वर्षों में भी संस्था द्वारा कुछ भूखंडों का विक्रय सीधे तौर पर किया गया और यह विक्रय सन 1997 के निर्धारित राशि पर किया गया किंतु क्या नए भूखंड क्रेता से धनराशि भी पुराने मूल्य से ली गई या आज के बाजार भाव से ली गई इसकी भी जांच की जाए ?
14. कितने भूखंड धारकों का पुनः विकास शुल्क जमा हो चुका है इसकी जानकारी सहकारिता एवं नगर निगम विभाग में उपलब्ध क्यों नहीं है ?
15. अभी तक कॉलोनी में जो विकास कार्य हुआ है उसका खर्च का विवरण , प्रारंभ से आज तक किसी भी सरकारी विभाग में उपलब्ध क्यों नहीं है ?
16. सहकारिता में नामांतरण की प्रक्रिया क्या है ? और संस्था द्वारा नामांतरण क्यों नहीं किए जा रहे हैं ?
17. विगत 30 सालों में भी कालोनी में एक भी मकान क्यों नहीं बन पाए ?
18. कॉलोनी का विकास कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है नगर निगम, सहकारिता एवं अन्य विभागों द्वारा सभी प्रकार के शुल्क भूखंड धारकों से वर्षों से प्राप्त किए जा रहे हैं तो फिर एक वैध कॉलोनी में भवन निर्माण अनुमति क्यों नहीं प्रदान की जा रही है जबकि प्रशासन द्वारा अवैध कॉलोनियों को भी वैध किया जा रहा है ?
19. सहकारिता की गृह निर्माण संस्थाओ की जांच "रेरा" के अंतर्गत होना चाहिए और सभी संस्थाओ को रेरा में पंजीकृत होना चाहिए जिसे से घोटालो को रोका जा सके ।
20. कॉलोनी की जिस एक छोटी सी सड़क जिस पर भूखंड क्रमांक 1 से 11 तक के भूखंड आते हैं जिसे बनाने का काम संस्था द्वारा नहीं किया जा रहा । उस पट्टी के भूखंड धारकों के साथ विवादों के चलते । उसके लिए अन्य सभी भूखंड धारकों द्वारा एवं संस्था द्वारा नगर निगम, कलेक्टर कार्यालय एवं अन्य विभागों में आवेदन दिया जा चुका है कि कृपया कर उस एक सड़क को छोड़कर बचे 170 से ज्यादा भूखंडों पर भवन निर्माण की अनुमति प्रदान की जाए । जिस प्रकार आंशिक अनुमति पूर्व में भी कई कॉलोनियां जैसे कि बृज मोहिनी में प्रशासन द्वारा दी गई तो फिर दीपकुंज कॉलोनी में 11 भूखंडों को छोड़कर बाकी के 170 से ज्यादा भूखंडों जहां पर संपूर्ण विकास कार्य हो चुका है संस्था एवं सभी सरकारी विभागों द्वारा विभिन्न प्रकार के शुल्क एक नहीं दो बार लिए जा चुके हैं वहां पर भवन निर्माण अनुमति क्यों नहीं दी जा रही ?

इन सभी बिंदुओं के आधार पर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जाए और पीड़ित भूखंड धारकों को न्याय दिलाया जाए.

बुनकरों की मुर्री बंद हड़ताल

लखनऊ : आज वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में बुनकरों द्वारा शुरू की गयी मुर्री बंद हड़ताल को ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और वर्कर्स फ्रंट ने समर्थन दिया है. समर्थन की घोषणा करते हुए प्रेस को जारी अपने बयान में आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता व पूर्व आईजी एस. आर. दारापुरी और वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष दिनकर कपूर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में वन डिस्टिक-वन प्रोजेक्ट का सरकारी दावा छलावा साबित हुआ है. पूरे प्रदेश में सिवाए हवा हवाई घोषणाओं के कहीं भी छोटे-मझोले उद्योगों और बुनकरी को बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है.

न तो बुनकरों को सरकारी इमदाद दी जा रही है और ना ही उनके कर्जा, बिजली बिल माफी और उन्हें राहत पैकेज देने की न्यूनतम मांग को पूरा किया जा रहा है. परिणामस्वरूप बुनकर आत्महत्या कर रहे हैं. मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक बुनकर परिवार ने तो तंगहाली में राजघाट के पुल से अपने बच्चों समेत जान दे दी. उन्होंने कहा कि बुनकरों की हालत तो पहले से ही खराब थी लेकिन कोरोना महामारी में सरकारी नीतियों ने उनकी कमर ही तोड़ दी है. बुनकरों को मिलने वाला सस्ती बिजली की पासबुक को योगी सरकार ने खत्म कर दिया और बिजली की कीमतों को लगातार बढ़ाकर इस महामारी में उन्हें बर्बादी की ओर धकेल दिया है.

उनके उत्पादों पर टैक्स लगातार बढ़ाए जा रहे हैं और लागत सामग्री की कीमतों में वृद्धि हो रही है. वहीं योगी सरकार और उसके आला अधिकारी सिर्फ घोषणाएं करने और सब्जबाग दिखाने में व्यस्त हैं. नेताओं ने मांग की है कि तत्काल प्रभाव से बुनकरों का बिजली बिल और सभी प्रकार का कर्जा माफ करना चाहिए, लागत सामग्री पर लगे टैक्सों को खत्म करना चाहिए, पुरानी सस्ती बिजली की पासबुक व्यवस्था बहाल करनी चाहिए और साथ ही हैंडलूम व हथकरघा निगम जैसे सरकारी संस्थानों के जरिए उनके उत्पाद की खरीद को सुनिश्चित कर उसे देशी विदेशी बाजारों में बेचने की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि बुनकरों को बेमौत मरने से बचाया जा सके और उनकी जिंदगी की सुरक्षा हो.

एस. आर.दारापुरी
 राष्ट्रीय प्रवक्ता,
 ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
 

1.9.20

One more scribe dies of Covid-19: JFA expresses grief



Guwahati: As casualties among media persons to Covid-19 complications
continue to grow in India, Journalists’ Forum Assam (JFA) appeals to
every scribe to be cautious and careful in safeguarding themselves
along with their families while reporting from the ground. The forum
also urges the Union government in New Delhi to announce a
comprehensive insurance policy for the media corona warriors.
Lately, a young television  journalist from Kanpur (Uttar Pradesh)
succumbed to novel corona virus infections. Neelanshu Shukla (30), who
 was associated with AajTak, tested positive for Covid-19 on 20 August
and died on 31 August 2020 in the hospital. Shukla, a bachelor, also
worked for NDTV and Republic TV as a Lucknow correspondent.
Earlier, Maharashtra’s veteran journalist Ashok Churi, who edited
Marathi weekly PalgharTimes, died at  a Palghar based  hospital, who
later tested positive for Covid-19. Similarly, a young photo
journalist from Punjab (Jai Deep), who worked for a Patiala based
newspaper, died of corona related ailments.
Tirupati (Andhra Pradesh) based television reporter Madhusudan Reddy
and video journalist M Parthasarathy also succumbed to corona
complications. Tamil Nadu television reporter Ramanathan and Orissa
journalists namely Simanchal Panda, K Ch Ratnam & Priyadarshi Patnaik
also lost their battles against the virus.
New Delhi based scribe Tarun Sisodia  killed himself undergoing
treatment at All India Institute of Medical Sciences.  The
printer-publisher of AsomiyaKhabar (Rantu Das) died of heart-failure
at a Guwahati  hospital, who later tested positive for Covid-19.
Chennai based news videographer E Velmurugan, Chandigarh based news
presenter Davinder Pal Singh, Hyderabad based television scribe Manoj
Kumar, Agra based print journalist Pankaj Kulashrestha and Kolkata
based photojournalist Ronny Roy earlier died of Covid-19.
“Till date, over one hundred Assam based media persons turned positive
for the virus infection,” said a statement issued by JFA president
Rupam Barua and secretary Nava Thakuria adding that the worrisome
development has not been reported by the concerned news papers, news
channels and digital platforms properly except a few infected  media
persons made personal revelations in the social media.
“Need not to remind that it is the duty and responsibility for
newspapers, news channels, digital outlets to report correctly about
the corona warriors and also the victims within the media fraternity,”
asserted the statement adding that they would definitely continue
playing an important role along with the practicing doctors, nurses,
sanitation workers and police personnel during the pandemic.

31.8.20

थोकार्पण, लोकार्पण और थूकार्पण

सुनील जैन राही

 
बढ़ती जनसंख्या, कम होती पाठकों की संख्या से लोकार्पण रसातल में जा रहा है। भ्रम अच्छा है, पाठक कम हो रहे हैं तो ज्यादा कब थे? मास्टर की संटी न हो तो क्लास में बुकार्पण भी न होता। पाठक कम होना चिन्ता की बात नहीं है। असली चिन्ता है, लेखकों का अधिक होना। शहर में एकाद हुआ करता था। इनाम-विनाम देकर संतोष कर लेते। निठल्ला/निकम्मा और बेरोजगार कोई तो है, जो प्रकृति की गोद में बैठकर समय और कागज बरबाद कर रहा है। कलम की पूजा होती थी, अब कलम करने वालों की पूजा होती है।

बौराए आदमी की तरह विचारों में खोया पड़ा रहे। प्रकृति और नारी सौंदर्य के अलावा कुछ ना सूझे? थिरकन रुक जाए, नाक में समा जाए। नाक से बाहर आए तो छींक से। कमर में लटक जाए या फिर ललाट पर वर्षों घूमता रहे। जुल्फों में जुएं की तरह चहलकदमी करता फिरे। कभी नारी में प्रकृति को ढूंढें तो, कभी प्रकृति में नारी को। ऐसे मरदूद को आदमी और आदमी का बच्चा नज़र नहीं आता। न भूखा आदमी न प्यासा जानवर। प्रकृति और नारी सौंदर्य में भूख प्यासा बैठा रहे। यही मरदूद लेखक है।  

अफसोस की बात नहीं है। लेखक बढ़े हैं तो सम्मान भी बढ़े हैं। सम्मान पाने वाले बढ़े हैं, सम्मान देने वाले बढ़े हैं। पहले पुस्तक का लोकार्पण चुपचाप हो जाता था। लेखक गुमनाम दस्तावेज था। किताब आई, छप गई, लोकार्पण हुआ तो हुआ, न हुआ तो न हुआ। कवि होली या गणोत्सव पर करवा चैथ के चांद की तरह दिखता। इसी दिन शहर के गुमनाम कवि सामने आते।

लड़कियां सोचती.... हाय दैया हमें क्या पता था, ये मुआ कवि भी है? प्रेम पत्र इससे ही लिखवा लिया होता। कम से कम रूपा की तो दाल तो न गलती। भ्रम यहां भी था। खुद केे प्रेम पत्र पर चरणपादुका सम्मान मिल चुका था, जनाब को।
पाठक कम हो जाएं, लेकिन श्रोता कम नही होने चाहिए। पाठक को श्रोता की तरह पकड़कर बिठा नहीं सकते। पाठक के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी है! अनपढ़ श्रोता नेता से कम नहीं? पाठक दिखाई नहीं देता, जो दिखाई दे वही काम का। पाठक कितने थे, कोई नहीं पूछता, श्रोता बहुत थे।

लोकार्पण में पाठकों की नहीं, श्रोताओं की संख्या भरपूर होनी चाहिए। श्रोता को हींग और फिटकरी से कोई लेना देना नहीं। वह किताब खरीदने से रहा। श्रोता, देखे की मोहब्बत करता है। चाय पी, बर्फी खाई और फुर्र। किताब से कोई सरोकार नहीं, लोकार्पण हो या थोकार्पण। घेर के लाया जाता है। जमाना लद गया जब एक लेखक के लिए सौ-सौ श्रोता हुआ करते थे। थोकार्पण का जमाना है। दस लेखकों के लिए 50 श्रोता, बस!

थोकार्पण और लोकार्पण की बीच की महत्वपूर्ण कड़ी होती है, थूकार्पण। थूकार्पण को सभ्य भाषा में आलोचना कहते हैं। (असभ्य भाषा में भड़ास) थूकार्पण दो प्रकार का होता है। पहला लेखक का नाम जानने के बाद, दूसरा पुस्तक पढ़ने के बाद। थूकार्पण कई प्रकार से होता है। थूकार्पण को लोकार्पण के दौरान और बाद में भी किया जा सकता है। लोकार्पण के दौरान बीच-बीच में थूकार्पण क्रिया चलती है। लोकार्पण में थूकार्पण की छूट होती है। पुस्तक समीक्षा (प्रशंसा) में थूर्कापण के छींटें आसपास खड़े/बैठे लेखकों को सम्मानित करते हैं। थूकार्पण की माला रुमाल साफ की जाती रहती है।

थूकार्पण समारोह में समूह के थूकक ही होते हैं। इस दौरान थूकक वर्ग, दूसरे थूकक वर्ग पर थू.....थू करता है। एक ही धर्म और विचारधारा के थूकक शामिल होते हैं। अंत में थूकन महाश्री थकान मिटाने के लिए अल्पाहार का आमंत्रण देते हैं। थूकक धारा 144 के अंतर्गत गु्रपों में थूकन क्रिया में फिर संलप्ति हो जाते हैं। थूककगण वटसएप और फेसबुक पर थूकन प्रतीज्ञा के साथ वाहनों में सवार हो जाते हैं।

थोकार्पण और लोकर्पण की क्रिया क्षणिक सुख की तरह होती हैं। सुख का स्थायी भाव थूकार्पण में होता है। थूकार्पण वर्षों तक अनवरत चलता रहता है। थूकार्पण के स्थायी भाव के साथ थोकार्पण लोकार्पित होते रहते हैं।

Sunil Jain Raahi
सुनील जैन राही
एम-9810960285
पालम गांव-110045

27.8.20

खबरों की भीड़ में ....!!

खबरों की भीड़ में ....!!

आर्थिक मन्दी अब चौतरफा असर डाल रही है

सरकार को इसे जल्द संभालना होगा

 विगत जुलाई महीने तक दो करोड़ नौकरी पेशा लोग ही कोरोना ने बेरोजगार बना दिये हैं। इसका मतलब यही है कि आर्थिक मन्दी अब चौतरफा असर डाल रही है जिसे देखते हुए अर्थ व्यवस्था को पटरी पर डालने के पुख्ता इस पर मुस्तैद दिखानी होगी।  देश के गरीब राज्यों की हालत बहुत खस्ता हो चुकी है क्योंकि कोरोना और लाकडाऊन ने इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह गड़बड़ा दिया है और अब ये केन्द्र सरकार से गुहार लगा रही हैं कि उन्हें उनका जीएसटी का  जायज हिस्सा जल्दी से जल्दी दिया जाए। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार की राजस्व उगाही भी लगातार कम हो रही है जिससे आर्थिक स्थिति जटिल होती जा रही है।

 केन्द्र को विभिन्न राज्यों का छह लाख करोड़ रुपए के लगभग हिस्सा अदा करना है जो मार्च के बाद से बनता है। यदि राज्यों को उनका हिस्सा नहीं मिलता है तो उनके पास अपने सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे भी नहीं रहेंगे। अतः इसका हल जल्दी ही निकालना पड़ेगा। इसके साथ ही केन्द्र सरकार को उन राज्यों को मुआवजा धनराशि का भुगतान भी करना है जिन्हें जीएसटी पद्धति लागू होने के बाद राजस्व हानि हुई है। मगर सवाल यह है कि केन्द्र यह भुगतान कहां से करेगा जब स्वयं उसका खजाना खाली हो रहा है और वित्तीय घाटा बढ़ने के आसार बन चुके हैं। इसका एक रास्ता तो यह है कि केन्द्र रिजर्व बैंक से और मुद्रा छापने को कहे  और अपना घाटा पूरा करने के साथ सारी देनदारियां निपटाये।  बेशक इससे वित्तीय घाटा और बढे़गा मगर अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति बढ़ने से बाजार में खरीदारी का माहौल बनेगा जिससे उत्पादनगत गतिविधियों में तेजी आयेगी जिससे शुल्क उगाही में भी तेजी आयेगी और सुस्त अर्थव्यवस्था में चुस्ती का दौर शुरू होगा।

दूसरा उपाय यह है कि सरकार बैंक से कर्ज उठाये।  राज्यों को लगता है पूरा जीएसटी ढांचा कोरोना के झटके से ही चरमराता नजर आ रहा है और राज्यों के पास सिवाय इसके कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है कि वे केन्द्र के दरवाजे पर याचना करती फिरें। जबकि जीएसटी  से पहले राज्य सरकारें अपने वित्तीय साधन जुटाने के लिए खुद मुख्तार थीं और हर संकट काल का समाधान खोजने के लिए स्वतन्त्र थीं। जीएसटी ने उनके विकल्प बहुत सीमित कर दिये हैं। उनके पास केवल अल्कोहल व पेट्रोल ही दो ऐसे उत्पाद बचते हैं जिन पर वे अपने हिसाब से शुल्क लगा सकती हैं मगर इन उत्पादों पर भी गैर तार्किक ढंग से शुल्क लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता है। विशेष रूप से पेट्रोल या डीजल पर मूल्य वृद्धि कर राज्य सरकारें लगाती हैं वह उच्चतम स्तर पर है और कोरोना काल में इस शुल्क में और वृद्धि की गई है। यह सीधे आम जनता को प्रभावित करता है और उसकी कमर तोड़ता है। केंद्र सरकार को कोरोना काल में गिरते आर्थिक पहलू पर प्राथमिकता के साथ जल्द से जल्द काम करना होगा | जल्द ही संसद का मानसून सत्र शुरू होगा और सरकार पर विरोधी को बोलने का पूरा मौका मिलेगा |

अशोक भाटिया
A /0 0 1  वेंचर अपार्टमेंट
वसंत नगरी, वसई पूर्व
(जिला पालघर-401208)
फोन/  wats app  9221232130

26.8.20

बीजेपी इतनी ढीली क्यों है कार्यसमिति की बैठक पर!

बीजेपी देश में मूल्यों, नीतियों प परंपराओं  की राजनीति की पक्षधर पार्टी होने का दावा करती है। लेकिन बीजेपी में आंतरिक लोकतंत्र की चर्चा के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दो साल से बंद है। आखरी बार यह बैठक नई दिल्ली में सन 2018 के सितंबर महीने में में हुई थी। लेकिन अब बिराह व बंगाल के चुनावो की वजह से ढाई साल बाद ही होने की संभावना लगती है।

 -निरंजन परिहार

सन 2018 के सितंबर महीने की 8 तारीख को नई दिल्ली में तब के बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि संकल्प की शक्ति को कोई नहीं हरा सकता। इसलिए संकल्प कीजिए कि हम फिर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आएंगे। यह वह बैठक थी, जो राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक से तत्काल पहले राष्ट्रीय पदाधिकारियों की होती है। सभी ने संकल्प लिया, चुनाव लड़ा। इतिहास के सबसे प्रचंड और छप्परफाड़ बहुमत से उसे जीता और भूल गए कि अगली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तय समय पर करनी है। शायद इसीलिए दो साल होने को है, पार्टी अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का इंतजार कर रही है। हालात बताते हैं कि छह महीने का वक्त और लग सकता है। होने को तो बीजेपी में जेपी नड्डा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। लेकिन अपनी ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तय करने से पहले उनको जिनसे इजाजत होनी होती है, उनसे पूछे कौन, यह सबसे बड़ा सवाल है।

बीते तीन दिनों से कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में जो कुछ हुआ, उस पर देश भर में जबरदस्त चर्चा चल रही है। लेकिन आंतरिक लोकतंत्र की अहमियत का दम भरनेवाली बीजेपी अपनी ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दो साल से नहीं कर पाई है, और इस पर कहीं कोई चर्चा भी नहीं है। अंतिम बार सन 2018 के सितंबर महीने की 8 और 9 तारीख को दिल्ली में नए - नए बने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में यह बैठक आयोजित हुई थी। मुंबई के बांद्रा स्थित रिक्लेमेशन ग्राउंड में 6 अप्रेल 1980 को अपनी स्थापना के बाद बीजेपी को यह 41वां साल चल रहा है, लेकिन इतने लंबे कालखंड में यह पहली बार है, जब दो साल के इतने लंबे अंतराल तक कार्यसमिति की बैठक ही नहीं हुई है। यह शायद इसलिए हैं, क्योंकि बीजेपी के आलाकमान कहे जानेवाले दो सबसे बड़े नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का पूरा ध्यान केवल देश चलाने पर है। शायद वे यही मान रहे होंगे कि पार्टी तो चलती रहेगी।

कायदे से देखें, तो बीजेपी का संविधान कहता है कि साल में 3 बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी और एक बार राष्ट्रीय परिषद् की बैठक होनी चाहिए। राष्ट्रीय परिषद में कार्यकारिणी के निर्णयों का अनुमोदन होता है। संविधान के मुताबिक जब तक राष्ट्रीय परिषद में अनुमोदन नहीं मिल जाता, पार्टी में किसी भी स्तर पर की गई कोई भी नियुक्ति अधिकृत नहीं मानी जा सकती। इसके हिसाब से तो जेपी नड्डा भी बीजेपी के संवैधानिक रूप से अध्यक्ष है या नहीं कौन जाने। और जब अध्यक्ष पद पर बैठे व्यक्ति की नियुक्ति ही तकनीकी रूप से संवैधानिक नही है, तो फिर उनके नियुक्त किए प्रदेशों के अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी कैसे संवैधानिक हो गए। हालांकि निश्चित तौर पर नड्डा सहित सारी नियुक्तियों को वैध साबित करने का बीजेपी ने कोई रास्ता जरूर निकाल लिया होगा। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विचार-विमर्श होने की परंपरा का मामला दो साल से अटका हुआ है।

बीजेपी के केंद्रीय संगठन में बड़े पद पर बैठे एक पदाधिकारी का विश्वास है कि आनेवाले कुछ समय में राष्ट्रीय कार्यकारिणी हो सकती है। वे वर्तमान हालात में कोविड संकट का हवाला देते हुए इस बैठक के छह महीने टलने की संभावना से भी इंकार नहीं करते हैं। लेकिन उन्हें भी यह पता नहीं है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तत्काल हो जाएगी, या बिहार और बंगाल विधानसभाओं के चुनाव के बाद कुल ढाई साल बाद होगी। वैसे, संविधान में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और राष्ट्रीय परिषद को विशेष हालात में आगे सरकाए जाने का प्रावधान भी है। ऐसे में फिलहाल तो कोविड का कारण वाजिब है। लेकिन कोरोना संक्रमण भारत में फरवरी के अंत और मार्च में शुरू हुआ, उससे पहले भी छह महीने तो ऊपर वैसे ही निकल ही चुके थे। फिर, अगर राज्यों में चुनावों की वजह से राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक टाली जाती रही, तो हमारे हिंदुस्तान में तो हर छह महीने बाद किसी न किसी प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव डमरू बजाते हुए मैदान मैं आ जाते हैं। ऐसे में देश को दो सर्वशक्तिमान नेता अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को कब तक बंधक बनाए रखेंगे, यह सबसे बड़ा सवाल है। फिर जो बीजेपी, सरकारों के हर काम को तत्काल करने और हर फैसले को त्वरित लागू करने का दम भरती हो, वही बीजेपी अपनी ही राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक को दो साल से भी ज्यादा वक्त तक लटकाए रखे, यह भी तो ठीक बात नहीं है। कहा जा सकता है कि चाल, चेहरा और चरित्र बदलने का दावा करनेवाली पार्टी का हम देख ही रहे हैं कि चरित्र बदल गया है, चेहरे भी बदल गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के मामले में उसकी चाल कछुए जैसी हो गई है।  

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

25.8.20

यह कांग्रेस के अंत की पटकथा या कुछ और ?


कांग्रेस अंदरूनी घमासान से आजाद नहीं हो पा रही है। पार्टी में सबसे ज्यादा संख्या उन लोगों की है,  जो हर हाल में सोनिया गांधी या राहुल का ही नेतृत्व बनाए रखना चाहते हैं। गांधी परिवार के संरक्षण में पार्टी चलाना शायद कांग्रेस की मजबूरी है। लेकिन ताजा घमासान कांग्रेस के संकट को और गहरा कर सकता है।


 निरंजन परिहार

न तो वे कोई इतने बड़े नेता है, न उनकी कोई राजनीतिक हैसियत है और न ही वे भविष्यवक्ता हैं। लेकिन फिर भी संजय झा ने जब यह कहा कि यह कांग्रेस के अंत की शुरुआत है, तो कई बड़े कांग्रेसी भी हत्तप्रभ होकर इसमें सच की संभावना तलाशने लगे। कायदे से कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी जब फिर कांग्रेस की अध्यक्ष बन गई थी, तो बवाल थम जाना चाहिए था। लेकिन घमासान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। जिस चिट्ठी पर जमकर विवाद हुआ, उसे लिखने वाले नेताओं ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक खत्म होने के बाद अपनी बैठक की। आगे क्या करना है, कैसे करना है, और किसको किस हद तक जाना है, इस बारे में आगे की रणनीति तय हुई। इस बैठक के बाद कपिल सिब्बल ने जो ट्वीट किया, उससे अटकलों, आशंकाओं और कयासों का जो दौर शुरू हुआ है, वह कांग्रेस के भविष्य की एक नई कहानी गढ़ रहा है।

कांग्रेस पार्टी के नेता अब खुलकर बोलने लगे हैं। कार्यसमिति की बैठक के दूसरे दिन कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल ने अपने ट्वीटर पर लिखा - यह किसी पद की बात नहीं है। यह मेरे देश की बात है, जो सबसे ज्यादा जरूरी है। तो, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के छोटे बेटे और कांग्रेस नेता बड़े नेता अनिल शास्त्री ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में कुछ कमी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी के नेताओं के बीच बैठकें नहीं होती और वरिष्ठ नेताओं से प्रदेशों के नेताओं का मिलना आसान नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीसी चाको ने भी कहा है कि मुझे लगता है कि नेतृत्व में कुछ चीजें दुरुस्त होनी चाहिए। उन्होंने असंतोष जताते हुए कहा कि दिल्ली में काफी चीजें कामचलाऊ तरीके से चल रही हैं। अपनी उपेक्षा से बेहद आहत वरिष्ठ नेता चाको ने लगभग नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि मैं सीडब्लूसी का स्थायी सदस्य हूं, लेकिन मुझे आमंत्रित भी नहीं किया गया । शायद, मैं बैठक में होता तो, कोई समाधान दे देता।  

कांग्रेस के नेतृत्व की कमजोरी को कुछ ऐसे समझिए। चिट्ठी लिखने के मामले कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी की नाराजगी के बाद गुलाम नबी आजाद के घर पर कांग्रेस के नेताओं की जो बैठक हुई, इसमें क्या हुआ, यह दो दिन बाद भी किसी को कुछ नहीं पता। लेकिन कार्यसमिति की बैठक में जो चल रहा था, उसकी पल पल की खबर पूरे देश और दुनिया में पैल रही थी। यह कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी का सार्वजनिक सबूत नहीं तो और क्या है। सिब्बल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य नहीं है। फिर भी अंदर क्या चल रहा था, उन्हें खबर थी। सो, सोमवार की कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक को दौरान ही उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ बागी तेवर दिखाते हुए बीजेपी से मिलीभगत की बात को खारिज करते हुए ट्वीट किया। उन्‍होंने तो अपने ट्विटर बायोडेटा से कांग्रेस भी हटा लिया।

जाने माने राजनीतिक विश्लेषक अभिमन्यु शितोले मानते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व यानी आलाकमान अर्थात गांधी परिवार के तीनों सदस्यों का अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रति अगर यही रुख रहा, तो आनेवाले समय में कांग्रेस की परेशानियां बढ़ती ही जाएगी। शितोले कहते हैं कि कांग्रेस में मजबूत और उर्जावान नेतृत्व की कमी हैं, यह सच है। खेमेबाजी और क्षमता की बजाय चाटुकारिता को मिल रहे प्रश्रय से जूझ रही कांग्रेस की हालत कुछ ऐसी हो गई है कि एक दीवार को संभालने की कोशिश होती है तो दूसरी भरभराने लगती है। शितोले मानते हैं कि कांग्रेस में तय नहीं हो पा रहा है कि परिवार बचाया जाए या पार्टी। या यूं कहा जाए कि अब तक कांग्रेस के नेता यही नहीं समझ पा रहे हैं कि परिवार और पार्टी दोनों अलग अलग हैं, और कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता पार्टी के लिए हैं, परिवार के लिए नहीं?

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की अंदरूनी राजनीति की गहन जानकारी रखनेवाले राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि ताजा संकट को अगर, कांग्रेस ने शीघ्र नहीं सम्हाला, तो आनेवाले वक्त में कुछ ऐसा होगा कि आज तो सिर्फ नेता ही सवाल उठा रहे हैं, लेकिन मामला आगे बढ़ा तो कल विद्रोह की स्थिति भी पैदा हो सकती है।  सोनवलकर कहते हैं कि राज्यों के नेताओं का हाल तो और भी खराब है। कांग्रेस आलाकमान कहलानेवाले तीनों नेताओं से राज्यों के नेताओं का मिलना ही संभव नहीं हो पाता।  सोशल मीडिया में दिए गए सिब्बल के सार्वजनिक बयान पर कई तरह की अटकलबाजियों का दौर शुरू होने की बात कहते हुए सोनवलकर कहते हैं कि सिब्बल के इस ट्वीट में बगावत के तेवर साफ है। कांग्रेस नेतृत्व को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा।

बात जिन संजय झा से शुरू हुई थी उनके बारे में निश्चित रूप से आप नहीं जानते होंगे। तो, जान लीजिए कि वे कोई बहुत बड़ी तोप नहीं हैं। वे मुंबई के हैं, लेकिन मुंबई के कांग्रेसी भी उन्हें नहीं जानते। वे मीडिया में अपने व्यक्तिगत संपर्कों का उपयोग करके कांग्रेस नेतृत्व की नजरों में चढ़ने के लिए पार्टी की पूरी ताकत से पैरवी करते हुए टीवी पर बोलते थे। नजर में चढ़े तो बिना बहुत सोचे समझे नेतृत्व ने उन्हें सीधे प्रवक्ता बना दिया। फिर जब कांग्रेस के खिलाफ एक लेख लिखा, तो सोनिया गांधी ने पार्टी से निलंबित भी कर दिया। वहीं संजय झा कांग्रेस के अंत की शुरुआत होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। निष्ठावानों को नकारने, अपनों की उपेक्षा करने और अनजानों को ओहदे देने का इतना नुकसान तो होता ही है।  कांग्रेस नेतृत्व को समय रहते अपने फैसलों पर भी चिंतन करना चाहिए। वरना, अंत की भविष्यवाणियां भी सच होते देर कहां लगती है !

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

24.8.20

शुक्र मनाइए कि आपकी नौकरी बची हुई है!

-निरंजन परिहार

शुक्र मनाइए कि आप उन दो करोड़ लोगों में नहीं है, जिनकी, लॉकडाउन में चलती नौकरियां चली गई हैं। और अगर आप उन 22 करोड़ लोगो में नहीं है, जो लॉकडाउन में काम धंधा बंद होने से बेरोजगार होकर घर बैठने को मजबूर हैं, तो भी शुक्र मनाइए। क्योंकि हमारे हिंदुस्तान में कोरोना ने कोहराम मचा रखा है। जिंदगियों के साथ वह रोजगार भी खाए जा रहा है। वायरस से फैल रही इस महामारी ने हमारे हिंदुस्तान में 29 लाख लोगों बीमार कर रखा है। इसलिए लोग डर रहे हैं। लगभग 55 हजार लोग मर गए हैं, सो सारा समाज भयभीत है। इन दिनों हमारा सारा ध्यान केवल कोरोना के बीमार, कोरोना की बीमारी और कोरोना के मामले में की जा रही सरकार की बातों पर है। लेकिन सच कहें, तो कोरोना की बीमारी का जितना हल्ला मचाया जा रहा है, उससे बहुत ज्यादा डरने की जरूरत नहीं लगती। बल्कि डरिए इस बात से कि कल आपका रोजगार बचेगा कि नहीं। डरिए इस तथ्य से कि आपकी नौकरी पर मंडराता खतरा आनेवाले दिनों में आपकी आय को खा रहा है।  और डरिए इस बात से कि आनेवाले किसी रोज आप अचानक सड़क पर आनेवाले हैं। कोरोना की महामारी ने भारत में बेकारी और बेरोजगारी की बाढ़ ला दी है।  लॉकडाउन ने करोड़ों जिंदगियों की खुशियों पर लॉक लगा दिया है और इतने ही परिवारों की जिंदगी को डाउनफॉल में धकेल दिया है। अप्रैल से अब तक 1 करोड़ 89 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है, लेकिन कुल मिलाकर देश में लगभग 22 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया है।

रोजगार रेजगारी की तरह बिखर रहे हैं।  इस मामले में भारत की तस्वीर बहुत भयावह है, और सरकार है कि सिर्फ संक्रमण की बीमारी का हल्ला मचाए हुए है। भारत की कुल 135 करोड़ जनता में से कोरोना वायरस संक्रमण से बीमार तो केवल 28 लाख 71 हजार 35 लोग ही हुए हैं, लेकिन कोरोना ने बीते 5 महीनों में लगभग दो करोड़ लोगों को बेराजगार कर दिया है। एक करोड़ से ज्यादा लोगों की सैलरी आधी हो गई हैं और इतने ही परिवार आयविहीन हो गए हैं। ऐसे में आप और हम सारे लोग सरकार की बातों की तरफ ध्यान देकर सिर्फ कोरोना से बीमार लोगों के आंकड़ों को देख देख कर डर रहे हैं, रो रहे हैं और कोहराम मचा रहे हैं। हालांकि बीमार तो फिर भी ठीक हो जाएंगे, और बहुत बड़ी संख्या में हो भी रहे हैं। लेकिन छूटी हुई नौकरियां फिर से मिलने की संभावनाएं क्षीण हो रही हैं। आधी तनख्वाह में भी लोगों को काम नहीं मिल रहा है। यह तथ्य है कि 24 मार्च से लॉकडाउन शुरू होने के बाद अब तक कुल भारत में 2 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़े गवाह है कि भारत में लॉकडाउन ने बेरोजगारों की बाढ़ ला दी है। सीएमआईई के आंकड़ों में यह बात सामने आई है कि अप्रेल की शुरूआत से अब तक  भारत में 1 करोड़ 89 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। इस रिपोर्ट का अध्ययन करने पर साफ पता चलता है कि अकेले जुलाई महीने में लगभग 50 लाख लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। इस रिपोर्ट के पिछले आंकड़ों को देखें, तो अप्रैल महीने में 1 करोड़ 77 लाख लोगों की नौकरी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि जून महीने में लगभग 39 लाख नौकरियां मिली थीं, लेकिन उससे पहले मई महीने में लगभग 1 लाख लोगों की नौकरी गई।

एक साथ इतनी सारी नौकरियां खोने के इतने अधिक मामले भारत में पिछले हजारों सालों के इतिहास में सबसे बुरे स्तर पर माने जा रहे है। क्योंकि इससे पहले भारत में इतनी बड़ी संख्या में रोजगार कभी नहीं छिने गए। केवल पांच महीनों में लगभग 2 करोड़ लोगों को नौकरी से निकाला जाना अपने आप में बहुत चिंताजनक बात है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, नौकरी से निकाले जाने और बेरोजगारी में फर्क है। नौकरी से हटाया जाना चलते काम का समाप्त होना है और बेरोजगारी की परिभाषा यह है कि किसी व्यक्ति द्वारा सक्रियता से रोज़गार की तलाश किये जाने के बावजूद जब उसे काम नहीं मिल पाता तो यह अवस्था बेरोज़गारी कहलाती है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की स्थापना एक स्वतंत्र थिंक टैंक के रूप में 1976 में की गई थी। यह प्राथमिक डेटा संग्रहण, विश्लेषण और पूर्वानुमानों द्वारा सरकारों, शिक्षाविदों, वित्तीय बाजारों, व्यावसायिक उद्यमों, पेशेवरों और मीडिया सहित व्यापार सूचना उपभोक्ताओं के पूरे स्पेक्ट्रम को अपनी सेवाएँ प्रदान करता है। सीएमआईई के सीईओ महेश व्यास ने कहा कि आमतौर पर वेतनभोगियों की नौकरियां जल्दी नहीं जाती। लेकिन जब जाती है तो, दोबारा पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए ये हम सभी के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। रिपोर्ट के मुताबिक कोरोनावायरस महामारी के मद्देनजर विभिन्न सेक्टर की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के वेतन काटे या फिर उन्हें बिना भुगतान के छुट्टी दे दी। उद्योग निकायों और कई अर्थशास्त्रियों ने बड़े पैमाने पर कंपनियों पर महामारी के प्रभाव से बचने और नौकरी के नुकसान से बचने के लिए उद्योग को सरकारी समर्थन देने का अनुरोध किया है। क्योंकि देश में कोरोना के कारण लगभग 22 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया है। और हम हैं कि सिर्फ बीमारी से डर रहै हैं। जबकि डर दूसरा बहुत बड़ा है, जिसके जल्दी सुधरने के कोई आसार ही नहीं है। इसीलिए अपना डर है कि कल आपका रोजगार बचेगा कि नहीं। लेकिन इसके बावजूद आप अगर सरकार द्वारा मचाए जा रहे कोरोना से बीमार होने के हल्ले से डरे हुए हैं, तो डरिए। कोई आपका क्या कर सकता है।

यूपी में बढ़ते कोरोना प्रकोप के बीच स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं

अजय कुमार, लखनऊ

कोरोना महामारी  को लेकर योगी सरकार की प्रतिबद्धता किसी से छिपी नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना से निपटने के लिए हर समय ‘एक्टिव मोड’ में रहते हैं। इलाज के लिए पैसे की कमी को आड़े नहीं दिया जा रहा है। कोरोना जांच का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। अस्पतालों में बिस्तर की संख्या में भी वृद्धि की गई है,ताकि सबको समय पर इलाज मिल सके,लेकिन कोरोना है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है,बल्कि इसका प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। वहीं  इससे निपटने के लिए सरकारी अस्पतालों में दवाई, रैपिड एंटिजन किट,पीपी किट,आक्सीजन तक का टोटा बना हुआ। हालत यह है कि तीमारदारों से छोटी-छोटी चीजें और दवाएं मंगाई जाती हैं। सैनिटाइजर और माक्स खरीद के नाम पर लूट हो रही है। ‘तीन का माल 13 में’ खरीदा जा रहा है।

  हालात यह है कि कोरोना का इलाज जिन अस्पतालों में सबसे अच्छी तरीके से होता हैं। वहां आम आदमी पहुंच ही नहीं पाता है। कोरोना को लेकर योगी सरकार ने जो गाइड लाइन तय की है,उसके अनुसार मरीज की स्थिति देखकर यह तय किया जाता है कि उसे कहां किस अस्पताल में भर्ती किया जाना है। यूपी में अति गंभीर मरीजों के लिए लखनऊ के प्रतिष्ठित केजीएमयू, एसजीपीजीआई, और डा0 राम मनोहर लोहिया को मान्यता मिली हुई है,लेकिन यहां गंभीर नहीं पहुंच वाले मरीजों की ही भर्ती हो पाती है। भले ही पहुंच वाले मरीज में मामूली लक्षण हों,लेकिन उसे भर्ती कर लिया जाता है,जो कोरोना गाइडलाइन के बिल्कुल खिलाफ है।

     मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ की मनमानी के चलते हालात  इसलिए और भी गंभीर होतीे जा रही हैं, क्योंकि इस समय कोरोना पीक पर चल रहा है। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े तमाम लोगों का कहना है कि यूपी में कोरोना गांवों में भी  पैर पसारने लगा है। कोरोना संक्रमित मरीज शहरी आबादी में ही नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी बड़ी तादाद में मिल रहे हैं। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि विभिन्न जिलों के प्रशासन  ग्रामीण इलाकों में भी कंटेनमेंट जोन बड़ी संख्या में बना रहे हैं। प्रदेश के पांच जिले अयोध्या, बाराबंकी, रायबरेली, सीतापुर और सुलतानपुर से यह जानकारी सामने आ रही है कि इन जिलों की शहरी तहसील में तो कंटेनमेंट ज्यादा हैं, लेकिन ग्रामीण तहसीलों में भी कंटेनमेंट जोन कम नहीं हैं।


    उक्त जिलों के ग्रामीण इलाकों से यह बात भी सामने निकल कर आ रही है कि पहले तो दूसरे राज्यों से गांव-गांव प्रवासी श्रमिकों की वजह संक्रमण फैला था। उसके बाद लॉकडाउन खत्म होने के बाद शहर में नौकरी करने या सामान लेने गए ग्रामीण जब गांव पहुंचे तो उन्होंने अपने साथ ही गांव के और लोगों को भी संक्रमित कर दिया। गांवों में संक्रमण फैलने की एक अन्य वजह यह भी सामने आ रही है कि अनलॉक होने से लक्षणविहीन संक्रमित व्यक्ति गांवों के अन्य घरों में आ जा रहे हैं। इसके चलते गांवों में बुजुर्ग पुरुष व महिलाएं संक्रमित हो रही हैं। चूंकि शहरों की अपेक्षा गांवों में टेस्टिंग और कांट्रैक्ट ट्रेसिंग बेहद कम हो रही है। इसलिए संक्रमण थम नहीं पा रहा है।

    सवाल यही है कि योगी सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी कोरोना नियंत्रित क्यों नहीं हो पा रहा है। आम जनता की बात छोड़िए, योगी सरकार के कई मंत्री भी कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। दो मंत्रियों कमलारानी और चेतन चैहान को तो जान तक से हाथ छोना पड़ गई। एक तरफ सरकार और उसकी नौकरशाही शानदार तरीके से कोरोना से निपटने के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है तो दूसरी तरफ कोरोना मरीज अस्पतालों में भर्ती नहीं मिल पाने के कारण अस्पताल के बाहर  दम तोड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि कोरोना की जंग लड़ते-लड़ते चिकित्सक,स्वास्थ्य कर्मी, कोरोना वाॅरियर्स सब के सब पूरी तरह से थक चुके हैं। इसी लिए खीझ और थकान के चलते यह लोग कोरोना पीड़ितों के साथ अमानवीय व्यवहार करने से भी बाज नहीं आ रहे है। बड़ी लड़ाई जितने के लिए तैयारी भी बड़े स्तर पर की जानी चाहिए,लेकिन लगता यही है कि बीच रास्ते में ही योगी के ‘कर्मयोगी’ हाफने लगे हैं। यह स्थिति उत्तर प्रदेश के दूरदराज के क्षेत्रों की नहीं लखनऊ की है।  


  अगर ऐसा न होता तो लखनऊ के जिलाधिकारी को यह सख्त आदेश नहीं देना पड़ता कि कोविड-19 की डयूटी कर रहे डाॅक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ अब सीएमओ की अनुमति के बिना न छुट्टी ले सकेंगे,न नौकरी छोड़ पाएंगे। जिलाधिकारी ने साफ कहा है कि यदि कोई इसके  खिलाफ आचरण करते हुए छुटटी लेता है या फिर नौकरी छोड़ता है तो उसके खिलाफ राष्ट्रीय आपदा मोचन अधिनियम के तहत कार्रवाई होगी। डीम ने यह भी कहा कि मेडिकल और पैरामेडिकल स्टाफ की लापरवाही के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसी कारण सभी कर्मचारियों के लिए आदेश जारी करना पड़ा है।

   जिलाधिकारी की चिंता हकीकत के काफी करीब है। क्योंकि लगातार इस तरह की खबरें आती रहती हैं कि कोरोना मरीज को भर्ती करने में सरकारी अस्पताल का स्टाफ मनमाना रवैया अपनाता है। कोरोना मरीज के भर्ती के लिए बने प्रोटोकाॅल को तार-तार किया जा रहा है। कोरोना मरीज को भर्ती होने से लेकर इलाज की पूरी प्रक्रिया के दौरान बुरी तरह से लूटा जाता है। यह सिलसिला अस्पताल से लेकर शमशान तक जारी रहता है।

  इसकी बानगी गत दिवस तब देखने को मिली जब 28 वर्ष के एक युवा मयंक जायसवाल ने लखनऊ के प्रतिष्ठित विवेकानंद अस्पताल में इलाज नहीं मिलने के चलते दम तोड़ दिया। मयंक को कोरोना पाॅजिटिव था,गंभीर हालत में उसे जिला बलरामपुर से लखनऊ लाया गया था। लखनऊ आने से पूर्व मयंक का इलाज गोंडा में एक निजी क्लीनिक में चल रहा था। जहां हालात बिगड़ने पर वहां के डाक्टर ने उसे डा0 राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान,लखनऊ के लिए रेफर कर दिया था। 

नियमानुसार मयंक की हालात को देखते हुए उसे लोहिया में इलाज मिलना चाहिए था,लेकिन यहां के डाक्टरों ने बैड खाली नहीं होने की बात कहकर उसे रामकृष्ण मिशन दारा संचालित विवेकानंद अस्पताल,निराला नगर में मैमो बनाकर रेफर कर दिया गया। किस अस्पताल में कितने बैड खाली हैं, यह आकड़ा आॅन लाइन रहता है, इसलिए गलती की कोई गुंजाइश नहीं बनती हैं,लेकिन यहां भी मयंक के साथ मजाक किया गया। यहां के स्टाफ ने उसे भर्ती करने से मना कर दिया। इस पर मयंक के घर वालों ने सीएमओ से सम्पर्क साधा तो वहां से जबाव मिला कि आप विद्या अस्पताल चले जाएं। तभी विवेकानंद में भर्ती लाइन में खड़े कुछ लोगों ने बताया कि वह स्वयं विद्या अस्पताल सें वापस आ रहे हैं। वहां तो इलाज के नाम पर लूटखसोट चल रही रही है। उधर, मयंक का आक्सीन सिलेंडर खत्म हो गया था। मयंक के परिवार वालों के काफी हाथ-पैर जोड़ने पर किसी तरह विवेकानंद में उसे (मयंक को) भर्ती कर लिया गया। 

 भर्ती के साथ ही करीब 20 हजार रूपए भी जमा करा लिए,लेकिन मुश्किल से 15-20 मिनट में डाक्टरों ने मयंक को मृत घोषित कर दिया। डाक्टरों की लापरवाही से मयंक की जान चली गई,लेकिन अस्पताल स्टाफ का कलेजा फिर भी नही पसीजा। मयंक की बाॅडी देने से पहले पीपी किट और बाॅडी पैक करने के बैग के नाम पर अस्पताल ने 2450 रूपए और जमा करा लिए। इसके बाद भी करीब चार घंटे के बाद मयंक का शव घर वालों को सौंपा गया। यहां तक की बाॅडी ले जाने के लिए मयंक के परिवार को प्राइवेट एम्बुलेंस तक मंगानी पड़ी। मयंक की बाॅडी जब श्माशान घाट पहुंची तो वहां भी मानवता शर्मशार होती दिखी। मयंक के घर वालों से यहां भी दो पीपी किट मंगवाई गईं,लेकिन मयंक को इलेक्ट्रानिक चिता पर लिटाने तक का काम परिवार वालों से ही कराया गया।

   यह घटना तो एक बानगी भर है। इस तरह के तमाम और उदाहरण भी पेश किए जा सकते हैं। हर तरफ परेशानी ही परेशानी का मंजर है। अब आइवरमेक्टिन टैबलेट को ही ले लीजिए। सीएमओ द्वारा इस टैबलेट को कोरोना मरीज के इलाज के लिए कारगर बताए जाने के बाद इसकी कालाबाजारी शुरू हो गई है। लब्बोलुआब यह है कि जब तक आप का वास्ता किसी अस्पताल से नहीं पड़ता है,तब तक आप सरकारी दावों के आधार पर यह कह सकते हैं कि यूपी में कोरोना के इलाज की बेहतर सुविधाए मिल रही हैं,लेकिन अगर दुर्भाग्य से आप या आपका कोई करीबी कोरोना पाॅजिटिव हो जाता है तो वह मेडिकल और पैरामैडिकल स्टाॅफ के रवैये से तंग आकर मौत तक मांगने लगता हैं।

हवा निकल रही है हवाई कंपनियों की



-निरंजन परिहार


आकाश खाली है। विमान बहुत कम उड़ रहे हैं। दुनिया भर सहित देश का आकाश भी हवाई जहाजों से सूना है। हवाई कंपनियां बहुत कम उड़ानें संचालित रही हैं। नागरिक विमानन क्षेत्र कहीं से भी रफ्तार पकड़ता नहीं दिख रहा। कोरोना के कारण लॉकडाउन के हल्ले में सरकारों ने दुनिया भर के कई देशों में विमान सेवाएं बंद कर दी थीं। अब धीरे धीरे खोल तो दी, पर बहुत कम संख्या में उड़ानें होने के कारण विमान कंपनियों को बहुत घाटा उठाना पड़ रहा है। कोरोना ने विमान कंपनियों को भी बरबाद करने में कोई कमी नहीं रखी है। अनेक एयरलाइंस कंपनियां नौकरियां कम कर रही है, यात्रियों की सुविधाएं समाप्त कर रही हैं और खर्चे समेट रही हैं। क्योंकि कमाई तो है नहीं और घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। अर्थव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि हालात सुधरने में कम से कम चार से पांच साल लग सकते हैं। एयकलाइंस कंपनियों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन ‘इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन’ (आईएटीए) ने भी कहा है कि दुनियाभर की एयरलाइंस कंपनियों को कोरोना संकट से पहले के यानी मार्च 2020 के स्तर पर पहुंचने के लिए 2024 तक इंतजार करना पड़ सकता हैं।

मुंबई एयरपोर्ट अपनी क्षमता की केवल 10 फीसदी उड़ानें ही संचालित कर रहा है। देश की आर्थिक राजधानी में, जहां हर तीन मिनट में एक विमान या तो उड़ान भरता था या फिर उतरता था, उस सबसे व्यस्ततम मुंबई एयरपोर्ट पर अब आधे घंटे के अंतराल पर केवल दो विमान ही उड़ते - उतरते हैं। हालांकि मुंबई एयरपोर्ट पर उड़ानों की तादाद अब बढा दी गई है। यहां पर पहले एक दिन में 50 केवल फ्लाइट के ऑपरेशन की मंजूरी थी, उसे बढाकर 15 जून से 100 तक कर द‍िया गया है। इसमें से भी 50 फ्लाइट आएगी और 50  फ्लाइट जाएंगी। जबकि मुंबई एयरपोर्ट के पास एक दिन में 1000 उड़ानों का ऑपरेशन हैंडल करने की क्षमता है। ऐसे में धंधा नहीं होने से एयर लाइन कंपनियों की आर्थिक हालत लगातार बहुत खराब होती जा रही है।

अब जब पहले के मुकाबले बहुत कम संख्या में विमान सेवाएं चालू हैं, तो विमान कंपनियों के लिए अपने सारे विमानों को खड़ा रखना पड़ रहा है और अपने सामान्य खर्चे भी निकालना बहुत मुश्किल हो गया है। अकेले मुंबई एयरपोर्ट पर ही विभिन्न भारतीय एवं विदेशी एयरलाइंस से कमसे कम 400 के आसपास छोटे बड़े विमान यूं ही खड़े हैं। एयरलाइंस कंपनियों की वैश्विक संस्था आईएटीए ने भी चिंता व्यक्त की है कि अगर यही हाल रहा, तो एयरलाइंस को बड़ी संख्या में अपने स्टाफ में कमी करनी होगी। एयर इंडिया, इंडिगो, गो एयर, स्पाइसजेट जैसी कंपनियां वैसे भी अपने कर्मचारियों को इस बारे में आगाह कर चुकी है। वैसे, विमान खड़े रहे, तो भी खर्चे लगातार जारी पहते हैं। क्योंकि उनको हैंगर का किराया तो एयरपोर्ट को देना ही होता है, साथ ही लंबे समय तक विमान के खड़े रहने से उन पर मेंटेनेंस भी बहुत ज्यादा आता है।

नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी पिछले दिनों कहा था कि एयर इंडिया का निजीकरण जरूरी हो गया है, और सरकार इस दिशा में काम कर रही है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि सभी एयरलाइंस कंपनियां अपने कर्मचारियों को विदाउट पे लीव पर भेज रही हैं। क्योंकि यह उनकी मजबूरी है। आर्तिक हालात भी हर तरफ बहुत खराब हैं, इस कारण सरकार भी इन कंपनियों की कोई बड़ी आर्तिक मदद करने में अक्षम है। गौरतलब है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण भारत ने 23 मार्च से अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानों पर प्रतिबंध लगा रखा है। केवल वंदे भारत योजना की उड़ानें ही विदेश से कभी कभार भारत आ रही है। इसके साथ ही घरेलू विमान सेवाओं को भी बंद कर दिया गया था। लेकिन बीते 25 मई से घरेलू उड़ानें शुरू कर दी गई थीं, जो बहुत ही कम संख्या में है। इन उड़ान सेवाओं के लिए कोरोना से जुड़ी गाइडलाइंस भी इतनी उलझी हुई है कि एयरलाइंस कंपनियों को उनका पालन करने पर बहुत बड़ा खर्च उठाना पड़ रहा है।

अमेरिका, ब्राजील और भारत जैसे देशों में कोरोना संक्रमण की सबसे तेज रफ्तार की वजह से हवाई कारोबार पर खतरा बरकरार है। दुनिया भर में हवाई यातायात बंद होने से एयरलाइंस उद्योग का भट्टा बैठ गया है। सबसे खराब बात यह है कि कोरोना की वजह से आर्थिक हालात सुधरने में किसी भी तरह की गुंजाइश अब बहुत ही मुश्किल लग रही है। दुनिया भर में तो सात महीने हो गए हैं, लेकिन भारत में कोरोना संक्रमण शुरू हुए पांच महीने पूरे हो गए हैं। लेकिन दुनिया भर में कोरोना संकट बढ़ रहा है। ऐसे में, वर्तमान हालात देखते हुए साफ लगता है कि एयरलाइंस उद्योग को अपनी पहले वाली स्थिति में साल 5 साल लगेंगे। वैसे भी, अर्थशास्त्री भी मान रहे हैं कि संसार के किसी भी धंधे के पहले की तरह फिर से धमकने और चमकने की स्थिति फिर लौटने की गुंजाइश बहुत ही कम है।

23.8.20

कासगंज में दिखी हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल, देखें वीडियो


 
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

प्रसिद्ध गीतकार शाहिर लुधियानवी का यह गीत आज उस समय यकायक याद आ रहा है जब हजरत अमीर खुसरो और गोस्वामी तुलसीदास की जन्म स्थली,पूरी दुनिया मे आपसी भाई चारे और साम्प्रदायिक शौहार्द की मशाल पेश करने वाली, भगवान वराह की जन्मभूमि कासगंज ने उस समय एक अनूठी मिशाल पेश की जब यहां मुस्लिम समुदाय के लोगों ने एक बुजुर्ग ब्राह्मण की मौत पर उसकी अर्थी बनाने, अर्थी को कंधा देने,शमशान घाट तक ले जाने और हिन्दू रीति रिवाजों से उसका अंतिम संस्कार करने का कार्य किया।

 हिन्दू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद के नाम पर खून बहाने वालों के लिए कासगंज के मुसलमानों ने एक अनूठी मिशाल पेश कर उनके मुंह पर जबरदस्त तमाचा जड़ा है। भारतीय संस्कृति और धर्म के मर्म को समझने वाले लोगों ने आज हन्दुस्तान की गंगा जमुनी तहजीब को जीवित होते हुए देखा।


उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद में कोरोना वायरस के खौफ के चलते लगाए गए साप्ताहिक लॉकडाउन के बीच सहावर ब्लाक के सहावर थाना छेत्र के गांव गढ़का  में हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल देखने को मिली है। बता दें कि यहां मुस्लिम आबादी के बीच रहने वाले हिन्दू समुदाय के एक बुजुर्ग बाबा हरिओम पंडित का देहान्त हो गया । इसी बीच गांव के मुस्लिमों ने अंतिम संस्कार का बीड़ा उठाते हुए, अंतिम संस्कार की सभी सामग्री को एकत्र किया,बल्कि अर्थी को कांधा देकर पूरे हिंदू रीति-रिवाज से मृतक को अंतिम विदाई भी दी। मुस्लिम समुदाय द्वारा की गई इस पहल की अब हर कोई चर्चा कर रहा है।


 दरअसल यह मामला सहावर ब्लाक के मुस्लिम बाहुल्य गांव गढ़का का है। गांव के ही हाजी राशिद अली ने बताया कि पन्द्रह वर्ष पूर्व गणका रेलवे स्टेशन पर 80 वर्षीय वृद्ध बाबा  हरीओम पंडित मिले  जो कि काफी बीमार थे । उनकी परेशानी देख राशिद अली उन्हें अपने घर ले आए और उन्हें रहने के लिए जगह दे दी और उनकी पूरी देखभाल की। तभी से वह वहां रह रहे थे। उनकी देखभाल व खाने पीने का इंतजाम आसपास के गांव के ही मुस्लिम लोग कर रहे थे। शनिवार सुबह अचानक उनका निधन हो गया तो उनके अंतिम संस्कार करने के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पूरा इंतजाम किया। खुद ही अपने हाथों से नहलाया, अर्थी को बनाया, पिंड लगाकर सभी मुस्लिम समाज के लोगों ने वृद्ध को कंधा देकर श्मशान भूमि पर ले जाकर हिन्दू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया। वृद्ध को मुखाग्नि हाजी राशिद अली ने दी। पूरे अंतिम संस्कार का इंतजाम गड़का के ग्राम प्रधान उमरु प्रधान की देख रेख में सम्पन्न हुआ।

 इलाके में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा वृद्ध का अंतिम संस्कार चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग खुलकर मुस्लिम समुदाय के उन लोगों की तारीफ कर रहे हैं, जिन्होंने पूरे रीति-रिवाज के साथ एक हिन्दू का अंतिम संस्कार किया है। यहाँ जाति, धर्म, साम्प्रदाय और ऊंच नीच की सभी बेड़ियां टूट गयी।
प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान और शायर अल्लामा इकबाल ने ठीक ही कहा है--

मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना
हिंदी हैं हम वतन हैं,हिन्दोस्तां हमारा.....

राकेश प्रताप सिंह भदौरिया

वरिष्ठ पत्रकार,एटा/कासगंज

मो0 9456037346

क्षमा में शक्ति का वास, इसीलिए मिच्छामि दुक्कड़म

 - राष्य्रसंत आचार्य चंद्रानन सागर

 

मुंबई। राष्ट्रसंत आचार्य चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज ने कहा है कि पर्युषण के समापन पर की गई क्षमापना व्यक्ति को महानता की तरफ अग्रसर करती है। असल में क्षमा में बहुत बड़ी ताकत होती है। वह सब बराबर कर देती है। हम जब क्षमा मांगते हैं, तो हमारे मन के भाव बदलने के साथ ही सामने वाले के भाव भी बदल जाते हैं। इसीलिए क्षमापना को परम सुख प्रदान करनेवाले पर्युषण महापर्व की सार्थकता के रूप मे देखा जाता है। नाकोड़ा दर्शन धाम में पर्यूषण महापर्व के दौरान क्षमापना के महत्व पर बोलते हुए आचार्य चंद्रानन सागर ने कहा कि जीवन में क्षमा से बढ़कर कोई दान नहीं है, क्योंकि क्षमादान जीवमात्र में अभय का भाव जगाता है।

मुंबई के पास नाकोड़ा दर्शन धाम में चातुर्मास पर बिराजमान आचार्य चंद्रानन सागर जैन धर्म के प्रतिष्ठित व दिग्गज आचार्यों में गिने जाते है। नाकोड़ा दर्शन धाम के ट्रस्टी प्रवीण शाह बताते हैं कि कोरोना का संकटकाल होने के कारण इस बार लोगों का आना जाना बहुत ही कम रहा। लेकिन फिर भी जो कोई पर्युषण महापर्व के दौरान गुरुदेव से मिला, उसे चंद्रानन सागरजी का अत्यंत अलग स्वरूप देखने को मिला है। प्रवीण शाह बताते हैं कि पूरे पर्यूषण पर्व में चंद्रानन सागरजी परमात्मा स्वरूप में पावन लगे। संवत्सरी पर वे सिद्ध संत स्वरूप में लगे। और क्षमापना के साक्षी बनकर हमारी भूलों को भूलने व भुलाने वाली भगवत्ता का भरोसा बने। परम दर्शन भक्त मोती सेमलानी ने बताया कि चंद्रानन सागरजी पूरे पर्यूषण महापर्व के दौरान हर पल ईश्वरीय आराधना में व्यस्त नजर आए। जाने माने राजनीतिक विश्लेषक निरंजडन परिहार कहते हैं कि चंद्रानन सागरजी ने हम संसारी लोगों के जीवन में पर्यूषण के गहन महत्व को समझाया। तो, उनके शब्द जैसे सदा के लिए मानस पटल पर अंकित हो गए। शताब्दी गौरव के संपादक सिद्धराज लोढ़ा कहते हैं कि हम गर्वित हैं कि हमारे गुरू ज्ञान के भंडार हैं, परमात्मा के पराक्रम से परिपूर्ण हैं और आराधना के मार्ग में भी वे अत्यंत सामर्थ्यवान हैं। लोढ़ा कहते है कि चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज जैसे महान संतों के आशीर्वाद में बीता इस बार का पर्यूषण पर्व और उनसे मिले क्षमापना का दान हमारे जीवन को वास्तव में सक्षम बनाने के महापर्व समान है।

चंद्रानन सागर कहते है कि पर्यूषण महापर्व के दौरान हमारा सारा ध्यान जीवन में सुखों के संयम पर होता है। यह संयम जिसके जीवन में समा जाता है और जो धार्मिक आचरण को जीता हैउनका देवी-देवता भी अभिनंदन करते हैं। चंद्रानन सागर बताते हैं कि बरसात का पानी भूमि में समाकर उसे उपजाऊ व ऊर्जावान बनाता है। उसी तरह क्षमादान मनुष्य को पवित्रता एवं परम सुख प्रदान करता है। वे कहते हैं कि पर्यूषण महापर्व के दौरान धार्मिक कार्यों एवं धार्मिक आचरण का ज्यादा महत्व इसलिए भी हैक्योंकि यह मानव जीवन के कल्याण का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। क्षमापना के महत्व की अवधारणा की व्याख्या करते हुए चंद्रानन सागर कहते है कि पर्यूषण महापर्व में धर्म की प्रतिष्ठा का प्राण अवस्थित है एवं उसी के मूल में क्षमापना। उन्होंने कहा कि पर्यूषण महापर्व आत्मा को शुद्ध करने का पर्व है। क्योंकिमन जब शुद्ध होता है तभी वह प्रसन्न होता है। प्रसन्न मन ही क्षमादान देने व पाने की क्षमता रखता है। चेन्नई के श्रावक एवं विख्यात समाजसेवी पारस जैन जावाल बताते हैं कि चातुर्मास के दौरान चेन्नई में कोई पंद्रह साल पहले चंद्रानन सागर महाराज ने क्षमापना पर हिंदी व अंग्रेजी में एक छोटी सी पुस्तक का लेखन किया था। जीवन में क्षमा के महत्व को रेखांकित करनेवाली आचार्य चंद्रानन सागर महाराज की इस पुस्तक में भावनाओं को प्रभावी ढंग से संप्रेषण की शक्ति का संचार था। उस पुस्तक के शब्द शब्द में प्रभाव था, हर वाक्य में तत्व था। इसीलिए उसे पढ़ने के बाद दक्षिण भारत के हजारों युवक युवतियों ने जीवन को धर्म के मार्ग पर अटल रखा, तो आज वे सफलता के शानदार मुकाम पर हैं। आचार्य चंद्रानन सागर ने कहा है कि  पर्यूषण सन्मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाने का पर्व है। 

16.8.20

Yadon ki Katarane

गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य रक्षा



डाक्टर संध्या
सीनियर रेजिडेंट, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग
चिकित्सा विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय


नारी सशक्तिकरण में पुनर्जागरण के चिंतकों श्री राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री ईश्वर चंद्र विद्यासागर एवं पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने काफी न महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की है। महिलाए समाज का अभिन्न अभिन्न अंग है अतः हम सबको उनकी चिंता हीनी चाहिए।।

गर्भावस्था महिला के जीवन का महत्वपूर्ण चरण है। गर्भवती महिलाएं में एनीमिया एक प्रमुख समस्या है।  यह ऐसी स्थिति है, जिसके अंतर्गत रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम हो जाता है।  डब्लू एच वो का अनुमान है कि हमारे देश में 42 प्रतिशत महिलाएं एवं 65 प्रतिशत गर्भवती महिलाए एनीमिक है। भारत में एनीमिया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रक्तस्राव, हृदय विफलता, संक्रमण और प्रिकलम्सिया के कारण मातृ मृत्यु के 40 प्रतिशत लक्षण के लिए जिम्मेदार है।विश्व स्वास्थ्य संगठन  गर्भवती महिलाओं के लिए प्रतिदिन  60 मि.ग्रा. आयरन अनुपूरण की सलाह देता हैं तथा भारत सरकार गर्भवती महिलाओं के लिए प्रतिदिन100 मि.ग्रा  आयरन अनुपूरण की सलाह देता हैं / एनीमिया के उपचार में जागरूकता एवं पौष्टिक व संतुलित आहार की जानकारी जैसे की विटामिन सी, प्रोटीन और लौह से भरपूर आहार, खाने के साथ चाय और काफी के सेवन से दूर रहने की आवश्यकता है। लौह से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे दाल, गुड़, चुकंदर, हरि सब्जियां, मेवे, अंडा, मछली, अंजीर आदि के नियमित सेवन और गर्भावस्था के दूसरी तिमाही से नियमित रुप से आयरन के गोली के सेवन से एनीमिया से बचा जा सकता है।

इंटरनेशनल जनरल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन एंड पब्लिक हैल्थ के रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 5 लाख से अधिक की मौत गर्भावस्था के दौरान होती है जिसका एक प्रमुख कारण हाई रिस्क प्रेगनेन्सी है । भारत में हाई रिस्क प्रेगनेन्सी की दर 20 से 30 प्रतिशत है। जिसमें प्रमुख रूप से उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदय या गुर्दे की समस्या, ऑटो इम्यून रोग, थायरायड रोग, महिला की आयु 17 साल से कम या 35 साल से अधिक है। इसके अतिरिक्त गर्भवती महिला को यदि पूर्व गर्भावस्था के दौरान प्रीइकलम्सिया या इकलम्सिया, बच्चा आनुवंशिक समस्या के साथ पैदा हुआ हो, एच आई वी या हेपेटाइटिस सी  के संक्रमण रहा हो तो वह हाई रिस्क प्रेगनेन्सी  का कारण बन सकता है। इससे बचने के लिए महिला को डाक्टर की देखरेख में नियमित रूप से परिछन करवाते रहना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान हर महिला को भरपूर मात्रा में पानी पीने जरूरी होता है। जहां तक संभव हो जंक फूड से अपने आप को दूर रखें। गर्भवती महिला को हित या योग्य आहार विहार का सेवन करना चाहिए तथा मैथुन, क्रोध एवं शीत से बचना चाहिए।

वर्तमान में कोविड - 19 संक्रमण तेजी से फैल रहा है ऐसे में गर्भवती महिलाओं को सावधान रहने की अधिक आवश्यकता है। घर से बाहर निकलते समय मास्क का प्रयोग एवं सोशल दिस्टेंसिंग का पालन अवश्य करें। इस दौरान खान पान की आदतों को सुधारते हुए रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर भी संक्रमण से बचा जा सकता है।वैश्विक महामारी कोरोना से बचने के एक मात्र उपाय सरकार द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना हैं। लॉकडाउन खत्म होने के बाद जारी अनलॉक की प्रक्रिया में यह सबसे अहम हो जाता है कि हम अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए निर्धारित नियमों का पालन करें, क्योंकि अभी तक सिर्फ यहीं एक उपाय है, कोरोना से बचने का।"

9.8.20

कोरोना काल और पत्रकारिता का धर्म

कोरोना ने ज़िन्दगी को एक नया अनुभव दिया है, अच्छा भी और बुरा भी। जो जहां जिस कार्यक्षेत्र में है, उसे जीवन के कई सबक मिल रहे है। कोरोना काल से न केवल मानव जाति प्रभावित हुई है, बल्कि जीव जंतु पर्यावरण सब पर कोरोना काल का असर दिखाई देता है। ये सच है कि कुछ लोग इस कठिन घड़ी में निखर गए और कुछ लोग टूट कर बिखर गए। लेकिन इन सब में ज़िन्दगी ने एक सबक जरूर सीखा दिया परिस्थिति चाहे जैसी हो। फ़िर भी जीवन कभी थमता नहीं है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण अगर कुछ है तो वह मीडिया ही है। आज मीडिया ने ही यह साबित कर दिया कि परिस्थिति चाहे जैसी हो लेकिन मीडिया कभी रुकने वाला नहीं।

            कल्पना करें कि दुनिया नष्ट होने वाली ही क्यों न हो लेकिन खबर देने के लिए मीडिया उन परिस्थितियों में भी मौजूद रहेगा! अब प्रश्न यह उठता है कि कौन है ये मीडिया? जो हर सूचना हर खबर से हमें रूबरू करता है और सूचनाओं के महासागर से जन मानस तक खबरें पहुँचाने का कार्य करता है। क्या ये वही मीडिया है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी परवाह न करके हमें जागरूक करता है। यहां मीडिया का मतलब उन तमाम टेलीविजन चैनलों , समाचार पत्रों, रेडियों या वेब पोर्टल से नहीं बल्कि उस इंसान से है, जो हर कठिन घड़ी में हम तक सूचना, सन्देश पहुँचाता है।  किसी पत्रकार ने ठीक ही कहा है कि- "औरों के लिए लड़ता हूं, पर अपने लिए कहा बोल पाता हूं! हां मैं पत्रकार  कहलाता हूं।" कोरोना काल में जब सभी लोग अपने घरों में डरे सहमे थे तब मीडिया ही था, जो हम तक खबरे पहुँचा रहा था। इस संकट की घड़ी में भी हर चुनौती के लिए तैयार रहा। कोरोना काल में जब लोग घरों में कैद थे उस संकट की घड़ी में मीडिया के माध्यम से ही हम तक सूचनाएं पहुँचाई जा रही थी।

  देश में पत्रकारों के लिए कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए है। संविधान में भी प्रेस का कही कोई जिक्र नही किया गया है। अनुच्छेद-19; सभी व्यक्तियों को बोलने की, स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने की आजादी प्रदान करता है। यही अनुच्छेद पत्रकारों पर भी लागू होता है। वही हम अनुच्छेद-19(ख) की बात करे तो यहां कुछ बंदिशों का जिक्र जरूर किया गया है। जिनके दायरे में सभी पत्रकार आते है। यूं तो पत्रकारों के लिए हमेशा से ही विशेष अधिकारों और कानून की बात होती रही है, लेकिन अब तक इस पर कोई विशेष प्रावधान नही बन पाए है। इस आपदा काल में पत्रकारों ने जिस जिम्मेदारी से अपने कार्य का निर्वहन किया है, उसने पत्रकारों के प्रति नज़रिया बदल दिया है। यही वजह है कि इस कोरोना काल में देश के प्रधानमंत्री ने देश के नाम संबोधन में डॉक्टरों, पुलिसकर्मियों, अस्पताल कर्मचारियों की ही तरह पत्रकारों को भी जरूरी सेवाओं में शामिल किया। अब पत्रकारों की भी ये जिम्मेदारी बन गयी है, कि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से करे।

          आज जब देश वैश्विक महामारी से ही नही जूझ रहा है, अपितु देश में सांस्कृतिक, राजनैतिक, प्राकृतिक और भौगोलिक सभी मोर्चो पर अशांति व्याप्त है। देश मे कोरोना महामारी अपने विकराल और भयावह रूप में है , तो वही राष्ट्र की सीमा पर चीन, पाकिस्तान और नेपाल की तरफ से अशांति फैलाई गई है। ऐसे में पत्रकारों को न केवल इस वैश्विक महामारी का ही अपितु देश के बाहरी दुश्मनों से भी देश को अवगत कराना है।  साथ ही इस संकट में पत्रकारों को सभी मोर्चो के लिए तैयार रहना है। आज जिन हालातों से देश रूबरू हो रहा है वैसी परिस्थितियां शायद पहले कभी नहीं थी, आज लोग डरे हुए है सभी चाहते है कि उन तक सही जानकारी पहुँचे। पत्रकार और पत्रकारिता का भी यही धर्म है कि वह हर परिस्थिति में अपनी जिम्मेदारियों को समझे। आज पत्रकारों को अपने गौरवशाली इतिहास के मायनो को पुनः समझना होगा। देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का नैतिकता से निर्वहन करना होगा।

जिस प्रकार के युद्ध आज वास्तविक परिदृश्य में लड़े जा रहे है, उन हालातों को आज हर पत्रकार को समझने की जरूरत है। आज युद्ध हथियारों से कही अधिक सूचना और संचार क्रांति के दम पर लड़े जा रहे है। ऐसे में पत्रकारों का भी यह कर्तव्य बनता है कि वह किन सूचनाओं को उजागर करे। किस प्रकार से खबरे प्रसारित करे जिससे देश की सुरक्षा बनी रहे। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स-2020 की बात करे तो हमारे देश में आज भी प्रेस की आज़ादी पर बंदिशें लगी है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स के वार्षिक विश्लेषण में वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में भारत 142वें स्थान पर है। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि 2019 में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कश्मीर के इतिहास का सबसे लंबा कर्फ्यू भी लगाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया कि यह प्रेस की आजादी का उल्लंघन है। पत्रकारों को स्वयं यह समझना होगा कि राष्ट्र हित मे लगाई गई पाबंदी को किस तरह से देखना है। आज देश में राष्ट्रवाद का शोर भी बहुत जोरो से सुनाई दे रहा है। राष्ट्रप्रेम की भावना और सच्चे राष्ट्रवाद में ज़मीन आसमान का अंतर है। एक पत्रकार को यह तय करना होगा कि वह खबरों को किस तरह से प्रस्तुत करें। आज भले ही पत्रकारिता पर बाज़ारवाद हावी हो गया हो। लेकिन आज भी देश की आर्थिक राजनीतिक परिदृश्य में पत्रकारिता अपनी निर्णायक भूमिका निभा रही है। देश की दिशा और दशा को आज भी मीडिया के द्वारा ही परिवर्तित किया जा सकता है। अतः एक पत्रकार का यह दायित्व बनता है कि वह अपना व्यक्तिगत लाभ न देखकर देशहित में पत्रकारिता करे। जिससे लोगो का विश्वास पत्रकारिता और पत्रकार दोनों पर बना रहें।

सोनम लववंशी
लेखिका
7000854500

हमारा पिटना किसी त्योहार से कम नहीं

त्योहार का आना और हमारा पिटना किसी त्योहार से कम नहीं। त्योहार की गमक और पिटने की धमक से हमेशा सिटपिटाये रहते। पिटाई का जश्न हर त्योहार पर मनाया जाता। त्योहार के साथ मिठाई और पिटाई आती। बुआ आये या फूफा पिटाई दाल में नमक की तरह जरूरी है। कभी-कभी बिना त्योहार के पिटाई हो जाती। परीक्षा पहले के और परीक्षा बाद तो पिटाई बनती है। अचानक पिटाई का कारण समझ में तब आता जब मास्टर जी बैठक से बाहर निकल रहे होते।

खैर बेशरम का पौधा भी हमारे सामने शरम से नतमस्तक हो जाता। मास्टर जी  साहित्यकार की तरह भड़ास निकालते और चले जाते। मास्टर जी की साइकल में कल बबूल के कांटे घुसेड़कर इमली के पेड़ के नीचे जश्न मनाया था। बिचारा साइकल का पहिया धहसत में जमीन में समा गया। पंचर वाला पहचान गया। झम्मन का काम है। मास्टर जी शिकायत समारोह आयोजित करने घर आ धमके। पिटाई पर  निबंध लिखे जाने से पूर्व ही मां ने मोंगरी से भूमिका लिख दी। मास्टर जी के जाने के बाद पिताजी ने निबंध का उपसंहार कर दिया। मास्टर जी की कहानी को कल स्कूल में जाकर पढ़ना था। खैर, शिक्षा के गिरते स्तर की तरह शाम को तो पिटना ही था।

पिटना मेरे लिए राष्ट्रीय त्योहार था। यह त्योहार कभी भी मना लिया जाता। स्कूल में नेताजी या घर में चाचा जी आ जाएं। लाइन में नेताजी के सामने सब सीधे तो हम तिरछे खड़े हो जाते। तिरछा खड़ा आदमी और टेड़ा पेड़ नेताजी की पसंद है।

तिरछे पेड़ ही जंगल का राज जानते हैं। सीधे तो कटते जाते हैं। श्रेष्ठ भेदियें के रूप में पहचान कायम थी। यह मालूम था, जानकारी हमसे लेंगे। पहले आश्वासन ले लेते पिटाई का मंचन  नहीं होगा। लड़कियों के सामने मुर्गा नहीं बनाया जाएगा। सुकृत्य बखान के लिए पिताजी को स्कूल नहीं बुलाया जाएगा।

शिक्षा अधिकारी और नेताजी के बुलाने से पहले मास्टर जी को घुड़की दे आते। पहले हमें बुलायेंगे फिर तुम्हें बुलायेंगे। फिर ऐसी जगह फेंकेगे जहां बच्चों को पीटने तो क्या देखने को तरस जाओगे।

एक-दो माह तक पिटाई शो पर रोक लग जाती। नेताजी से मुलाकात को गरिमामय बताया जाता। तारीफ में पुल बनाये जाते।  ये पुल एक माह में गिर जाते। पुल गिरते ही पिटाई अभिनंदन शुरू हो जाता।

त्योहार कोई सा भी हो फर्क नहीं पड़ता। होली की पिटाई रक्षाबंधन तक याद रहती। जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी बीमा योजना की तरह। होली के पहले भी और होली के बाद भी, हमारी धुनाई तय थी।

होली से पहले पिताजी बरामदे में सबके सामने हिदायतों के पैकेज जारी करते। धमकियों की अग्रिम किस्त खाते में जमा कर दी जाती। डंडा पंचाग दिखाकर भविष्यवाणी की जाती। पिछले साल का काला चिटठा दिखाया जाता। हमारे स्वीस खाते में जमा रकम की जानकारी ली जाती। उसका उपयोग कहां किस उत्पात के लिए उपयोग करेंगे। नेताओं से स्वीस खातों की जानकारी कोई नहीं उगलवा पाया, पिताजी भी उसी तरह नाकाम रहते।

होली के पहले सभी जेबों पर बाउंसर बिठा देते। हमारी सेहत पर कौन असर पड़ना था। हम मिठाई एक किलो के स्थान पर नौ सौ ग्राम, चीनी 10 किलो की जगह 9 किलो और न जाने कहां-कहां से जेब में काला धन इकट्ठा हो जाता। त्योहारों के मौसम के बाद पिटाई का जश्न होली पर विशेष रूप से मनाया जाता। होली पर कोई पहचान नहीं पाता। दाड़ी वाला था या मूंछ वाला। पटेल का छोरा था या झम्मन।  

पिताजी को अटूट विश्वास था। घर में भले डाका डाल ले, लेकिन छोटी-मोटी चोरी कभी नहीं करेगा। पैकेट से एक-दो सिगरेट चुरा ले, लेकिन लेकिन दारू नहीं पियेगा। होली की पिटाई के बाद चार पांच महीने बाद पींठ फिर खुजाने लगती।

रक्षाबंधन से त्योहार शुरू हो चुके हैं। मिठाई और पिटाई दोनों का इंतजार जल्द समाप्त होने वाला था। मिठाई की खुशी में सिगरेट का पैकेट उड़ा दिया। त्योहार से पहले पश्चिमी विक्षोभ की तरह पिटाइ हो गयी। अब सिलसिला होली तक अनवरत चलेगा। होली के बाद मिठाई, पिटाई और स्कूल की छुट्टी हे जाती है।

सुनील जैन राही
एम-9810 960 285

कारपोरेट भगाओ-किसान बचाओ के नारे पर मनाया लोकतंत्र बचाओ दिवस


उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में आइपीएफ व सहमना संगठनों ने किए कार्यक्रम

रिहाई, काले कानूनों का खात्मा, कमाई, दवाई, पढ़ाई के सवालों को उठाया


लखनऊ 9 अगस्त 2020, भारत छोड़ों आंदोलन के ऐतिहासिक दिन “कारपोरेट भगाओ-किसान बचाओ” के नारे पर पूरे देश के सैकड़ों किसान और मजदूर संगठनों के आव्हान पर उत्तर प्रदेश, तमिलनाडू, झारखंड, उडीसा, कर्नाटक व महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में आल  इण्डिया पीपुल्स फ्रंट व सहमना संगठनों द्वारा “लोकतंत्र बचाओ दिवस” मनाया गया। कनार्टक में आइपीएफ नेता राधवेन्द्र कुस्तगी, झारखण्ड़ में हफीर्जुरहमान व मधु सोरेन, तमिलनाडु में कामरेड पांडियन के नेतृत्व में कार्यक्रम हुआ और जन जागरण अभियान व बात अधिकार की टीम ने सोशल मीडिया पर उडीसा के आइपीएफ नेता मधुसूदन शेट्टी, महाराष्ट्र की ज्योति काम्बले व दिल्ली की रियासत ने टवीट्र कैम्पेन चलाया।

यह जानकारी आल इंण्डिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता व पूर्व आईजी एस आर दारापुरी ने प्रेस को जारी अपने बयान में दी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के सीतापुर में मजदूर किसान मंच के महायचिव डा0 बृज बिहारी व आइपीएफ नेता सुनीला रावत, लखीमपुर खीरी में पूर्व सीएमओ डा0 बी आर गौतम, वाराणसी में आइपीएफ जिला संयोजक योगीराज सिंह पटेल, सोनभद्र में आइपीएफ जिला संयोजक कांता कोल, मजदूर किसान मंच के जिला महासचिव चर्चित उभ्भा गांव निवासी राजेन्द्र सिंह गोंड़, ठेका मजदूर यूनियन के जिलाध्यक्ष कृपाशंकर पनिका व तेजधारी गुप्ता, आदिवासी नेता जितेन्द्र धांगर, मजदूर किसान मंच जिलाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद गोंड़, रामदास गोंड़, मंगरू प्रसाद गोंड़, इंद्रदेव खरवार, श्याम खरवार, राजकुमार खरवार, कैलाश चैहान, चंदौली में मजदूर किसान मंच नेता अजय राय, संयोजक रामेश्वर प्रसाद, गंगा चेरो, युवा मंच नेता आलोक राजभर, इलाहाबाद में युवा मंच संयोजक राजेश सचान, आगरा में वर्कर्स फ्रंट उपाध्यक्ष ई0 दुर्गा प्रसाद, गोण्डा में मोहम्मद साबिर अजीजी व आरिफ, बस्ती में राजनारायण मिश्रा, लखनऊ में कर्मचारी संघ महिला समाख्या की प्रदेश अध्यक्ष प्रीती श्रीवास्तव व शगुफ्ता यासमीन, राधेश्याम, योगेश, चित्रकूट में संघ की महामंत्री सुनीता, श्रवास्ती में इंदु गौतम, 181 वूमेन हेल्पलाइन की नेता पूजा पांड़ेय, बदायूं की नीतू सिंह, गाजीपुर की दीपशीखा व नेहा राय,  महाराजगंज अनीता, बहराइच उमी सिंह, वंदना, कुशीनगर में विजय लक्ष्मी सिंह, मऊ में सारिका दूबे, सीतापुर रामलल्ली पटेल, रंजना मिश्रा संत कबीर नगर, सीमा श्रीवास्तव सुल्तानपुर, ज्ञाना यादव कौशाम्भी, वर्षा यादव झांसी, प्रियंका तिवारी मिर्जापुर, देवरिया की मालामनी त्रिपाठी, बिजनौर से खुशबू, बागपत की रीता, बलरामपुर से मंशा देवी ने कार्यक्रमों का नेतृत्व किया। कार्यक्रम में शामिल रहे लोगों ने दिनभर अपने वीडियों, फोटो ट्वीटर, फेसबुक और वाट्सअप ग्रुपों में डाले।

“लोकतंत्र बचाओ दिवस” के इस कार्यक्रम में मूलतः रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य के अधिकार की गारंटी, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई व उनके उत्पीड़न पर रोक लगाने, काले कानूनों का खात्मा, इनकम टैक्स न देने वाले हर परिवार को पांच हजार रूपए नगद, कोविड मरीजों का मुफ्त इलाज, 181 महिला वूमेन हेल्पलाइन व महिला समाख्या के बकाए वेतन का भुगतान व कार्यक्रमों  की बहाली, वनाधिकार के तहत पट्टा, कोल व धांगर को आदिवासी का दर्जा, पर्यावरण की रक्षा, निजीकरण और श्रमिक अधिकारों के खात्मे पर रोक, किसानों को डेढ गुना दाम व कर्जा मुक्ति के लिए कानून, सहकारी खेती की मजबूती, आंगनबाड़ी, आशा, ठेका मजदूरों समेत सभी मजदूरों को सम्मानजनक वेतन आदि सवालों को उठाया गया।

एस आर दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट