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25.5.20

मनरेगा में फैला भ्रष्टाचार तो कैसे मिलेगा प्रवासियों को रोजगार

सौरभ सिंह सोमवंशी
saurabh96961100@gmail.com


सरकारों के द्वारा लागू की  गई किसी भी योजना  की सफलता और असफलता इस बात से पता चलती है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति को उसका कितना लाभ मिल रहा है 2005 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के द्वारा लोगों को रोजगार दिलाने वाली योजना नरेगा लागू की गई 2009 में इसका नाम बदलकर के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)कर दिया गया। गांधी जी कहां करते थे कि भारत गावों में बसता है।

23.5.20

लॉकडाउन खुलते ही बढ़ने लगा प्रदूषण, साफ हवा के लिए ऑनलाइन आंदोलन



स्वच्छ हवा के लिए देशव्यापी आंदोलन, 12 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने सालभर साफ हवा के लिए उठाई आवाज़


लखनऊ, 23 मई : लॉकडाउन खुलते ही देशभर में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है. कुछ दिन राहत की सांस लेनेवाले भारतीय एक बार फिर घुटन वाले माहौल में जीने के लिए विवश हो रहे हैं. हाल ही में आईआईटी दिल्ली के एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर लॉकडाउन के दौरान भारत के कम प्रदूषण के स्तर को बनाए रखा जाता है, तो यह देश की मृत्यु दर में 6.5 लाख की कमी ला सकता है. यही वजह है कि पर्यावरण को लेकर चिंतित आम आदमी और संस्थाएं आगे आ रही हैं. साफ हवा को बनाए रखने के लिए वह भारत सरकार से वह स्पष्ट और लागू होने वाले कार्यक्रम की मांग कर रहे हैं. इसके लिए ऑनलाइन आंदोलन की मुहिम शुरू करने जा रहे हैं.

बनारस की ईद


हिंदुस्तान में मुसलमानों के आने के साथ ही ईद मनाने के द्रष्टान्त मिलने लगते हैं। बनारस में मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व ही मुस्लिम बस्तियां बस गयी थीं और गोविंदपूरा एवं हुसैनपुरा में ईद की नमाज़ पढ़ने की जानकारी मिलती है। जयचन्द की पराजय के बाद बनारस के मुसलमानों की ईद को देखकर कुतुबुद्दीन को आश्चर्य हुआ कि ईद की नमाज़ के बाद जो सौहार्दपूर्ण वातावरण यहाँ पर बना हुआ है उसमें हिन्दू-मुसलमान की अलग-अलग पहचान करना मुश्किल है। ये बनारसी तहज़ीब थी जो मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व बनारस में मौजूद थी। जिसने एक नई संस्कृति हिंदुस्तानी तहज़ीब को जन्म दिया। तब से लेकर आज तक ईद का त्योहार पारम्परिक ढंग से मनाया जाता है।

मोदी सरकार देश में शासन चलाने का नैतिक अधिकार खो चुकी है


मजदूर वर्ग जिसने आधुनिक युग में कई देशों में क्रांतियों को संपन्न किया, उसने भारत में भी आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक उत्पादन विकास में अपनी अमूल्य भूमिका दर्ज कराई है। वही मजदूर यहां कोरोना महामारी के इस दौर में जिस त्रासद और अमानवीय दौर से गुजर रहा है वह आजाद भारत को शर्मशार करता है। फिर भी मजदूर वर्ग की इतिहास में बनी भूमिका खारिज नहीं होती। घर वापसी के क्रम में भी मजदूर वर्ग ने मोदी सरकार की वर्ग क्रूरता को बेनकाब कर दिया है। फासीवादी राजनीति के विरूद्ध मजदूरों की यह स्थिति नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देगी। यह मजदूर बाहर केवल अपने लिए दो जून की रोटी कमाने ही नहीं गया था, उसके भी उन्नत जीवन और आधुनिक मूल्य के सपने थे। वह बेचारा नहीं है. जिन लोगों ने उन्हें न घर भेजने की व्यवस्था की और न ही रहने के लिए आर्थिक मदद दी, मजदूर उनसे वाकिफ है और समय आने पर उन्हें राजनीतिक सजा जरूर देना चाहेगा। क्योंकि बुरी परिस्थितियों में भी वह किसी की दया का मोहताज नहीं है, आज भी वह अदम्य साहस और सामर्थ्य का परिचय दे रहा है। मजदूरों के अंदर आज भी राजनीतिक प्रतिवाद दर्ज करने की असीम योग्यता है और पूरे देश को नई राजनीतिक लोकतांत्रिक व्यवस्था देने में वह सक्षम है। जरूरत है उसे शिक्षित और संगठित करने की। 

इनकी भड़ास सुनें : गाय के गोबर से परेशान है ये शहरी बाबू!

Gobar safayi k sambandh me

Dear sir ,

Actually I m living in vrandavan enclave ,adipur amhera gram, rakshapuram meerut 250001 since last 6 months.

प्रभाष जोशी से कभी कोई अखबार नहीं संभला था, इसलिए जनसत्ता भी नहीं चल सका!

 satish pednekar 

 Prabhash joshi and Jansatta : कभी मैंने एक मित्र से कहा था कि मुझे जनसत्ता का भविष्य अंधकारमय लगता है क्योंकि उसके संपादक प्रभाष जोशी गांधी और विनोबा दोनों के कट्टर शिष्य थे। करेला और नीम चढा वाला मामला था। उनसे आजतक कोई अखबार (मध्यदेश, प्रजानीति, आसपास) नहीं संभला।

भूलने की बीमारी के इलाज के लिए ब्रह्मी बूटी सचमुच लाभदायक है!


पी. के. खुराना
जनसामान्य में पीजीआई के नाम से प्रसिद्ध चंडीगढ़ स्थित चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के स्नातकोत्तर संस्थान “पोस्टग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च” से जुड़े तीन अलग-अलग अध्ययनों ने मेरे दिमाग की बत्ती जलाई है और मुझे उम्मीद है कि ये अध्ययन कुछ और लोगों के दिमाग की बत्ती भी जला सकते हैं।

संकट में हनुमान चालीसा पढ़ता है ये अंग्रेज पत्रकार! सुनें बातचीत

देश में फेक न्यूज जिस तेजी से चल रही और उस पर कोई रोक नहीं लग रही है वह बहुत ही चिंताजनक है। पिछले दिनों तब्लीगी मरकज को लेकर जिस तरह नकारात्मक खबरें चलाई गई और इसके जरिए उत्तर प्रदेश के एक विधायक ने हिंदू मुस्लिम के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की वह बहुत ही गलत है।  ये कहना है दक्षिण एशिया में लंबे समय तक बीबीसी की पहचान रहे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मार्क टली का।

अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा




लखनऊ : “अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा” यह बात एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आज प्रेस को जारी बयान में कही है.

गे व्यक्ति जो है पुलिस का मुखबिर, उसे बना दिया गया पत्रकार!

यूपी के एक जिले से खबर है कि यहां पुलिस के एक मुखबिर को जो गे है, उसे पत्रकार बना दिया गया है.  नोएडा से हिंदी में चलने वाले एक घटिया चैनल ने इस मुखबिर को पत्रकार बना दिया है. शारीरिक संबंध बनवाने वाला गे बना हिंदी में खबर देने वाले चैनल का पत्रकार.

ज़ी न्यूज़ के लिए अलविदा की नमाज में हुईं दुआएं

नोएडा स्थित जी न्यूज कार्यालय/स्टूडियो के कोरोना संक्रमित कर्मचारियों के सेहतयाब होने की दुआएं अलविदा की नमाज़ के बाद की गईं। अपने-आपने घरों में पढ़ी गई नमाजों से पहले कुछ पेशे इमामों ने ऑनलाइन खुतबा भी दिया। घरों में रहने की ताकीद की गई। लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की हिदायत दी गयीं। उलमा ने अपने खुतबे रूपी ऑनलाइन संदेशों में कोरोना वबा से बचाव के लिए हुकुमत की गाइड लाइन पर चलने की ग़ुज़ारिश भी की।

आरएसएस-भाजपा की डरी सरकार बढ़ी आपातकाल की ओर


वर्कर्स फ्रंट ने एस्मा लगाने की कड़ी निंदा की
संविधान विरूद्ध सांकेतिक प्रदर्शन से रोकने का आदेश विधि विरुद्ध


23 मई 2020

कोरोना महामारी से निपटने में पूरे तौर पर विफल रही और कारपोरेट की सेवा में लगी आरएसएस-भाजपा की सरकार अंदर से बेहद डरी हुई और यही वजह है कि वह आपातकाल की ओर बढ़ रही है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में एस्मा लगाकर उसने कर्मचारियों से सांकेतिक प्रदर्शन तक का अधिकार छीन लिया है। यह प्रतिक्रिया वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष दिनकर कपूर ने उत्तर प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा प्रदेश में एस्मा लगाने पर व्यक्त की।

22.5.20

क्या बहरा हुआ खुदाय



प्रियंका सौरभ  

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को लाउडस्पीकर से अजान देने को लेकर बड़ा फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि अजान इस्लाम का अहम हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान इस्लाम का हिस्सा नहीं है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि लाउडस्पीकर से अजान पर प्रतिबंध वैध है. किसी भी मस्जिद से लाउडस्पीकर से अजान दूसरे लोगों के अधिकारों में हस्तक्षेप है. अजान के समय लाउडस्पीकर के प्रयोग से इलाहाबाद हाईकोर्ट सहमत नहीं है.

continue ban on sale and use of tobacco products

Bhopal, 22 May: A clutch of consumer organisations and public health experts today made a strong plea to the Madhya Pradesh government to continue its ban on sale and use of tobacco products and spitting in public places, saying such a step is imperative to prevent the spread of coronavirus pandemic in the state.

कांग्रेस यूपी में कदम बढ़ाए,यह सपा-बसपा को नामंजूर

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय क्षत्रप मायावती और अखिलेश यादव नहीं चाहते हैं कि उनके सहारे कांग्रेस यहां अपनी ‘सियासी पिच’ मजबूत कर सके। इसीलिए सपा-बसपा नेता कांग्रेस को पटकनी देने का कोई भी मौका छोड़ते नहीं हैं। कौन नहीं जानता है कि 2019 के लोकसभा सभा चुनाव के समय किस तरह से अखिलेश-मायावती ने उत्तर प्रदेश की राजनीति से कांग्रेस को ‘दूध की मक्खी’ की तरह निकाल कर फेंक दिया था। इस पर कांग्रेस के ‘अहम’ को चोट भी लगी थी, लेकिन वह कर कुछ नहीं पाई। सपा-बसपा से ठुकराई कांग्रेस के रणनीतिकारों ने तब यूपी फतह के लिए अपना ‘ट्रम्प कार्ड’ समझी जाने वाली प्रियंका वाड्रा को आगे करके चुनावी बाजी जीतने की जो रणनीति बनाई थी, वह औंधे मुंह गिर पड़ी थी। कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाता यदि सोनिया गांधी राबयरेली से चुनाव जीत नहीं जातीं। उस समय कांग्रेस, बीजेपी को यूपी में पटकनी देकर मोदी को दिल्ली से दूर करने का सपना पाले हुए थीं, जो आज भी वह पूरा करने की कोशिश में लगी हैं,लेकिन इसके लिए आज तक उसे न तो सपा-बसपा का ‘सहारा’ मिला है न राहुल-प्रियंका का जादू काम आया। यूपी में प्रियंका का ‘प्रयोग’ ठीक वैसे ही ‘फ्लाप शो’ रहा जैसा इससे पहले राहुल गांधी का रहा था।

21.5.20

बेरोजगारी और भुखमरी बरपाने वाली है कोरोना से भी बड़ा कहर

CHARAN SINGH RAJPUT
कोरोना की लड़ाई में कितनी जन और धन की हानी होगी यह तो लड़ाई के बाद जब आंकलन होगा तब पता चलेगा। हां अब तक लड़ी गई लड़ाई में जिस तरह से प्रवासी मजदूरों ने विभिन्न हादसों के साथ ही परेशानियों से जूझते हुए दम तोड़ा है। लोगों ने तंगहाली में आत्महत्याएं की हैं। कोरोना कहर में जो परिस्थितियां देश के सामने खड़ी हुई हैं। उन सबके आधार पर कहा जा सकता है कि देश में भुखमरी और बेरोजगारी का जो तांडव होने वाला है वह कोरोना से भी ज्यादा भयावह होगा।  मेरा आंकलन यह है देश कोरोना कहर तो झेल लेगा पर भुखमरी, बेरोजगारी की जो मार पडऩे वाली है वह झेलना मुश्किल लग रहा है।

देश भर में मजदूरों की हड़ताल 22 मई को

Socialist Party (India) Supports the All-India Labour Strike on May 22 and Demands that the Government Immediately Recall all Changes to Labour Laws

कोरोना ने विज्ञान को समाज से जोड़ने के लिए गंभीर चेतावनी दे दी है


दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता कोरोना महामारी द्वारा पैदा की गई विभिन्न चुनौतियों के समाधान  के खिलाफ लड़ाई में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान उनका जज्बा और कर्मठता शीश काबिलेतारीफ रही है, हमने साक्षात उनके रूप में धरती पर भगवान् को देखा है। जब लाइलाज कोरोना वायरस का खतरा बढ़ा है तो एक बार फिर दुनिया की नजरें इस जानलेवा बीमारी की दवा खोजने के लिए वैज्ञानिकों पर टिकी हैं। स्वास्थ्य शोध के क्षेत्र में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा यह एक उदाहरण है जिसमें वैज्ञानिक समुदाय से त्वरित प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग नई विज्ञान प्रौद्योगिकी व नवाचार नीति पर काम कर रहा है जिसमें वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ देश में शोध एवं विकास का वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और प्रधानमंत्री के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के विजयराघवन से इस बात के संकेत मिल चुके हैं कि सरकार वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने लिए प्रतिबद्ध है। भारत सरकार सही समय पर विज्ञान और समाज के बीच की खाई को पाटने के लिए वैज्ञानिक सामाजिक उत्तरदायित्व पर एक नई नीति बनाने  की योजना बना रही है।

लोक सेवा केन्द्र में हुए टेंडर घोटाला व यहां के कर्मचारियों के शोषण के संबंध में कुछ बातें


मध्य प्रदेश में  लोकसेवा केंद्रों के माध्यम से हितग्राहियों को सेवाएं प्रदान करना 2012-13 से शुरू हुआ। तत्समय बहुत ही जल्दबाजी में शासन द्वारा निर्णय लिया गया आनन फानन में लोकसेवा केंद्रों को ठेकेदारों के माध्यम से संचालित करवाया गया जो कि आज भी बदस्तूर जारी है। लोकसेवा अधिनियम बनाया गया लेकिन कर्मचारियों का कोई अधिनियम नही बनाया गया। जिसके कारण लोकसेवा केंद्रों के ठेकेदार खुल्ले सांड की तरह केंद्रों में कार्य कर रहे कर्मचारियों का शोषण लंबे समय से करते आ रहे है। ये बात अलग है कि बीच मे ठेकेदार बदल गए लेकिन शोषण तो जस के तस है।

कोरोनाकालीन संकट के दौर में शिक्षा के यूनिवर्सलाइजेशन के समक्ष उभरती चुनौतियां


“कोविड महामारी ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत किए बगैर शिक्षा का लोकव्यापीकरण (यूनिवर्सलाइजेशन) असंभव है”

आरटीई फोरम, नई दिल्ली, 21 मई, 2020। कोविड -19 की वैश्विक महामारी ने भारत के एक बड़े हिस्से को बुरी तरह प्रभावित किया है और पहले से चली आ रही भूख, अशिक्षा,  बेरोजगारी एवं असमानता की समस्याओं को और गहरा किया है। खासकर, भारत में पहले से ही बिखरी हुई शिक्षा व्यवस्था को इसने और भी उलझा दिया है। शिक्षा अधिकार कानून, 2009 आने के बाद भी विद्यालयों में न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बहाली के पर्याप्त प्रयास किए गए और न ही विद्यालयों का लोकतांत्रीकरण किया गया था। वंचित समाज के बच्चों को पहले भी सम्मानपूर्वक पढ़ने का अवसर नही दिया गया था और अब ऑनलाइन शिक्षा के जमाने में तो वे और भी पिछड़ जायेंगे क्योंकि इसे व्यापार का जरिया बनाया जा रहा है। विभिन्न कम्पनियों की नजरें इस ओर है। ऑनलाइन शिक्षा, शिक्षा की  मूल भावना को प्रभावित कर रहा है। शिक्षा का काम व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करना होता है। लेकिन “डिजिटल शिक्षा” यह काम करने में असफल है। जब तक हाशिये पर जिंदगी जीने वालों को समान शिक्षा नहीं दी जायेगी तब तक समाज में आर्थिक औऱ सामाजिक समानता नहीं आ सकती है। ये बातें वक्ताओं ने राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा आयोजित शिक्षा – विमर्श शृंखला की चौथी कड़ी में “कोरोनाकालीन संकट के दौर में शिक्षा का लोकव्यापीकरण” विषय पर एक वेबिनार में कहीं।