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25.1.20

ओछी मानसिकता रखने वाले पत्रकारों की कलम से पत्रकार और पत्रकारिता का गिरता स्तर

Pradeep Gadhwal
 

लोकतंत्र में संविधान के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकार  को जाना जाता है । एक पत्रकार की अहमियत क्या होती है ? उन पीड़ितों से पूछो जिन की परेशानी प्रशासनिक स्तर तक बगैर  जात-पात, धर्म पूछे एक पत्रकार ने पहुंचाई है । लेकिन बदलते समय के अनुसार आम जनता और प्रशासन के बीच सेतु की यह कड़ी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है इसकी प्रमुख वजह निकल कर आई है वह है अब ऐसे पत्रकार बनने लगे हैं , जिनके पास किसी प्रकार का कोई अनुभव हैं ही नहीं है । न हीं कोई डिग्री डिप्लोमा है । ऐसे व्यक्ति प्रायः पत्रकारिता में इसलिए आते हैं कि समाज में उनकी पत्रकार की इमेज बने जिसके जरिए वह रोब डालने वाला बन सके। 

गांधी के राम

कुछ दिनों पहले मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, "वो तो अच्छा हुआ कि गोडसे ने गांधी को मार दिया, अगर गांधी आज ज़िंदा होता तो मैं मार देता।"

आज के परिप्रेक्ष्य में इस बात के समर्थन में कुछ पाठक भी होंगे, लेकिन सिर्फ समर्थन के लिए ही यह बात लेख के प्रारम्भ में नहीं कही और ना ही गाँधीजी के प्रति किसी भी प्रकार की सहानुभूति या दया उत्पन्न करने की चेष्टा है यह वाक्य। यह वाक्य ना तो नफरत फैलाने के लिए और ना ही किसी राजनीतिक दल की दाल गलाने के लिए मैनें बताया है।

15.1.20

जब सहारा में बकाया भुगतान के लिए भी करना पड़ा था आंदोलन


CHARAN SINGH RAJPUT

एक समय था कि सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय नेताओं और बालीवुड हस्तियों से यह कहते-कहते नहीं थकते थे कि इतना बड़ा ग्रुप हाने के बावजूद हमारे यहां कहीं से कोई विरोध स्वर नहीं हैं। कोई यूनियन नहीं है। सब लोग एक परिवार की तरह काम करते हैं। सुब्रत राय ने सहारा को विश्व का सबसे बड़ा विशालतम परिवार कहा था। उनका कहना था कि रेलवे के बाद देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला ग्रुप सहारा है।

10.1.20

अमेरिका-ईरान तनाव से उड़ी मोदी सरकार की नींद, भारत को आर्थिक मोर्चे पर होंगी तमाम दुश्वारियां


अजय कुमार,लखनऊ

विकास के मामले में भारत भले ही दुनिया में अपनी पहचान नहीं बना पाया हो,लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने देश की अहमियत को कभी किसी ने कम करके नहीं आका। खासकर जब से केन्द्र में मोदी सरकार आई है तब से भारत अंतराष्ट्रीय हनक-धमक और भी बढ़ गई है। मोदी की आवाज को दुनिया गंभीरता से सुनती है। पीएम संतुलन बनाकर आगे बढ़ते हैं,इसी वजह से उनके अमेरिका से भी अच्छे संबंध हैं तो रूस भी उन पर विश्वास करता है। परस्पर विरोधी इजरायल-फिलीपींस ही नहीं मुस्लिम देशों में भी मोदी का सिक्का चल रहा है।

2.1.20

खास मौकों पर चुप रहने वालों को इतिहास नहीं करता माफ

अजय कुमार, लखनऊ

विदेशी पैसे से पल रहे देश के मुट्ठी भर लोग और चंद नेता अगर सड़क पर आगजनी और हो-हल्ला मचाकर यह सोचते हैं कि वह भारत के भाग्य विधाता बन जाएंगे तो उन्हें अपने मन से यह गलत फहमी निकाल देनी चाहिए। कोई भी देश लोकतांत्रिक तरीके से चलता है। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार और उसके बनाए कानून का पालन करना देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी और कर्तव्य दोनों ही हैं। अगर सरकार के किसी फैसले कोई खुश नहीं है तो भी उसे विरोध का रास्ता लोकतांत्रिक तरीके से ही चुनना अथवा न्याय की शरण में जाना होगा,जहां दूध का दूध,पानी का पानी हो जाता है। कुछ नेताओं द्वारा अपनी सियासी रोटियां सेकनें के लिए सरकार के प्रत्येक फैसले के खिलाफ जहर उगलना उसे संविधान विरोधी बता कर बखेड़ा खड़ा करने के दुष्प्रचार को जनता अच्छी तरह से समझती है।

25.12.19

मोदी नाम केवल्म से नहीं जीते जा सकते हैं राज्य


संजय सक्सेना,लखनऊ


झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली हार को लेकर हर तरफ हाय-तौबा मचा हुआ है। सब अपने-अपने तरीके से बीजेपी की हार की समीक्षा कर रहे हैं, खासकर राष्ट्रीय दल का तमगा हासिल किए हुए कांगे्रस-बीजेपी की जर्बदस्त तुलना की जारी है। कोई 16 सीटें जीतने वाली कांगे्रस को दस में दस नंबर दे रहा है तो 25 सीटें जीतने वाली बीजेपी का ‘जीरो’ करार दे रहा है। सबका अपना-अपना नजरिया हैं तो इस हकीकत को भी नही झुठलाया जा सकता है कि झारखंड में कांगे्रस इस लिए जीती, क्योंकि उसने झारखंड में अपने कदम मजबूती के साथ जमाने के बजाए दूसरे(जेएमएम) की बैसाखी का सहारा लेना ज्यादा सही समझा, इसीलिए वह आज झारखंड में खड़ी दिखाई दे रही है।

ऐसे तो और भड़केगा सीएए और एनआरसी के खिलाफ हो रहा आंदोलन

सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली। किसी भी लोकतांत्रिक देश में जब माहौल बिगड़ता है तो उस देश की सरकार का दायित्व बनता है कि वह किसी भी तरह से माहौल को शांत करे। जब बात किसी मांग की होती है और आंदोलन राष्ट्रव्यापी हो तो सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह उस आवाज को सुने। केंद्र में काबिज मोदी सरकार है कि हर आवाज को डंडे के बल पर दबाने पर आमादा है। यही वजह रही कि देश में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध में हो रहे राष्ट्रव्यापी आंदोलन को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष के उकसावे के बाद मुस्लिमों के उपद्रव के रूप में लिया है।

संसद में हुआ अटल सम्मान समारोह, देश विदेश की 25 विभूतियां सम्मानित

मुख्य आयोजक भुवनेश सिंघल सुनाए अटल जी के अंतिम दिनों के भावुक संस्मरण, सांसद कवियों ने कविताओं के माध्यम से भरी हुंकार

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में पूर्व संध्या पर 24 दिसम्बर 2019 को दोपहर 1 बजे से संसद भवन में ‘अटल सम्मान समारोह’ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर एक अनूठी पहल करते हुए सांसद कवियों का राष्ट्रीय अटल कवि सम्मेलन भी किया गया जिसमें विभिन्न सांसद व केन्द्रीय मंत्री ने मंझे हुए कवि की तरह काव्य पाठ कर उपस्थित श्रोताओं को हतप्रभ कर दिया।

24.12.19

यूपी में हिंसाः पीएफआई लम्बे समय से था सक्रिय मगर सुरक्षा तंत्र आंख मूंदे रहा

                                              अजय कुमार, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में प्रतिबंद्धित एवं विवादित संगठन ‘स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया’(सिमी) और उससे जुड़ा संगठन ‘पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (पीएफआई) एक बार फिर से राज्य में अपने पैर पसार रहा हैं। सिमी और पीएफआई  दिल्ली में मोदी और यूपी में योगी सरकार बनने के बाद से राज्य के मुसलमानों को कथित भय दिखाकर उकसाने में लगे हैं तो रिहाई मंच, बामसेफ, आईसा, नागरिक एकता पार्टी और शराब मुक्ति मोर्चा जैसे विवादित संगठनों की भी सक्रियता में तेजी देखी गई। चाहें तीन तलाक पर कानून बनाने की बात हो या फिर अयोध्या पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला अथवा गौरक्षा के नाम पर यदाकदा हुईं माॅब लीचिंग की घटनाओं ने इन संगठनों को ‘उर्जा’ प्रदान की तो नागरिकता संशोधन बिल की आड़ में इन संगठनों ने उत्तर प्रदेश को दंगा-आगजनी की आग में झोंक दिया। प्रतिबंद्धित संगठन को गैर भाजपा दलों के नेताओं के विवादित बयानों ने भी खूब फलने-फूलने का मौका दिया। वैसे,खुफिया सूत्र बताते हैं कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यूपी में बवाल और हिंसा के लिए ‘जमीन’ तैयार की गई थी,लेकिन उस समय खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलांे की अति-सक्रियता के कारण इनके मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए थे। उस समय तमाम मुस्लिम धर्मगुरू भी परिपक्तता दिखाते हुए लगातार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील  करते दिखाई दिए थे,लेकिन नागरिकता संशोधन बिल के पास होने के समय करीब-करीब सभी मुस्लिम धर्मगुरूओं और बुद्धिजीवियों ने मुसलमनों को समझाने की बजाए ‘आग में घी डालने’ का काम ज्यादा किया।

नागरिकता कानून तो एक बहाना है असल मुद्दों से ध्यान भटकाना है

देश में इस वक्त हालात बद से बदतर होते नजर आ रहे हैं ऐसा कोई भी फैसला बीजेपी सरकार ने लिया हो और उस पर विरोध प्रदर्शन ना हुआ हो, यह तो कभी हो ही नहीं सकता है. बीजेपी सरकार ने अपने पिछले शासनकाल में नोटबंदी और जीएसटी का ऐतिहासिक फैसला लेकर लोगों को इस तरह उलझाया...पता ही नहीं चला कि बीजेपी के 5 साल कैसे गुजर गए. लोगों को लगा कि सरकार को अभी और वक्त चाहिए  भारत को न्यू इंडिया बनाने के लिए.... अब सरकार ने अपने अगले 5 साल गुजारने के लिए नागरिकता संशोधन कानून के जाल में लोगों को इस कदर उलझा दिया है कि लोग आपस में ही उलझे रह जाएं और देश के जो असली मुद्दे हैं उनसे ध्यान बिल्कुल ही हट जाए. साथ ही देखते ही देखते सरकार के 5 साल फिर से ऐसे ही गुजर जाए.

झारखंड विस चुनाव परिणाम ने मोदी-शाह को दिखाया आईना


सी.एस. राजपूत


नई दिल्ली। झारखंड का विधानसभा चुनाव एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हो रहे आंदोलन के बीच हुआ है। आंदोलन सही था या फिर गलत इसका निर्णय बहुत हद तक झारखंड चुनाव के परिणाम से भी होना था। इतना ही नहीं मोदी सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल के कारनामे भी इस आंदोलन में समाहित थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी झारखंड चु नाव प्रचार में धारा 370 धारा का हटाना, तीन तलाक पर बिल लाना, राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो जाना, ये सभी अपनी उपलब्धियों का बखान झारखंड चुनाव प्रचार में किया।

23.12.19

आंदोलन और हिंसा एक सिक्के के दो पहलू नहीं

अजय कुमार,लखनऊ

उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन बिल पर दो दिनों की हिंसा के बाद जिंदगी फिर से धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ने लगी है,लेकिन अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है,जिसका जवाब कुछ दिनों तक सड़क पर तांडव मचाने वाले लोगों उनके परिवार के सदस्यों को देना होगा तथा उस समाज को भी चिंन्हित करना होगा, जिस समाज के दंगाई सड़क पर सरकारी और निजी सम्पतियों के साथ आगजनी के साथ-साथ हाथ में पत्थर लिए मरने-मारने पर उतारू थे। पुलिस को जिस तरह दंगाइयों ने अपना निशाना बनाया। वह सुनियोजित था। लखनऊ की बात की जाए तो यहां हिंसा का बंगाल और कश्मीरी कनेक्शन भी दिखाई दिया। राज्य के बाहर से आए युवा जिनके शरीर से लेकर पैरों तक में ब्रांडेड कपड़े और जूते नजर आ रहे थे,उनकी भी शिनाख्त शुरू हो गई है। तलाश उन लोगों की भी हो रही है जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर दूसरे राज्यों से आए दंगाइयों को ठहराने-खाने की व्यवस्था की। योगी सरकार जिस तरह से दंगाइयों पर शिकंजा कस रही है,उससे तो यही लगता है कि दंगाइयों को गिरफ्तार किया जाएगा कुछ पर रासुका के तहत कार्रवाई भी की जा रही है। इसके अलावा दंगाइयों की सम्पति जब्त करके जानमाल का जो नुकसान हुआ है,उसकी भरपाई की जाएगी। इसको लेकर पुलिस काफी आगे बढ़ भी चुकी है।

यूनिवर्सिटी में कर दी दिल्ली पुलिस ने फर्जीकल स्ट्राइक

पुलिस वालों के हौसले  देश की जनता ने इस कदर बुलंद कर दिए हैं कि अब जनता को ही इसकी भरपाई  खूब बेहतरीन ढंग से करनी पड़ रही है. अभी कुछ समय पहले ही हैदराबाद पुलिस ने रेप के चारों आरोपियों का फर्जी एनकाउंटर किया था. भावनाओं में बहते हुए जनता ने पुलिस का पूरा साथ दिया. इस बात को भी आप अच्छे से जानते हैं कि शेर के मुंह में एक बार खून लग जाए तो उसको खून की आदत पड़ ही जाती है. वही हाल पुलिस वालों का हो चुका है. दिल्ली में पुलिस वालों द्वारा एक नामी यूनिवर्सिटी में घुसकर छात्रों को  इस कदर मारा गया जैसे वह यूनिवर्सिटी नहीं, आतंकवादियों की ट्रेनिंग का अड्डा था.

रिटायर आईपीएस अफसर दारापुरी की रिहाई के लिए चलेगा अभियान

योगी सरकार की आंख की किरकिरी बने आम आदमी की आवाज दारापुरी
मजदूर किसान मंच की बैठक में दारापुरी की रिहाई के लिए लिया प्रस्ताव
दारापुरी की रिहाई के लिए चलेगा हस्ताक्षर अभियान
आरएसएस-भाजपा की विभाजनकारी राजनीति का करेगें पर्दाफाश
आदिवासियों को किसी कीमत पर बेदखल नहीं होने देगें-दिनकर


ओबरा, सोनभद्र :  योगी सरकार की हर जन विरोधी, लोकतंत्र विरोधी कार्यवाहियों के आलोचक रहे और हर वक्त अपनी जनपक्षधरता के प्रति प्रतिबद्ध रहे मजदूर किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व आईपीएस अधिकारी एस0 आर0 दारापुरी सरकार की आंख की किरकिरी बन गए थे।

21.12.19

श्रमिकों को बंधुआ बनाने वाला है इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड बिल

सी.एस. राजपूत

नई दिल्ली। हाल ही में केंद्र सरकार ने जो इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड बिल लोकसभा में पेश किया वह श्रमिकों को और मुश्किल में डालने वाला है। मोदी सरकार ने पूंजपीतियों को राहत देते हुए और श्रमिक यूनियनों पर शिकंजा कसते हुए इसके विभिन्न प्रावधानों में औद्योगिक संस्थानों में हड़ताल करने को कठिन बनाया गया है और बर्खास्तगी को आसान कर दिया गया है।

भ्रष्टाचार व मनमानी का अड्डा बना आईजीएनसीए

सिद्धार्थ शंकर गौतम

भारतीय कला और संस्कृति के बिखरे खंडों को एकत्रित करने और उनके संरक्षण की आवश्यकता को पहचानते हुए 1987 में मूर्धन्य कला विद्वान डॉ. कपिला वात्स्यायन ने इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की स्थापना की थी। उन्होंने इस केन्द्र को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई किन्तु वर्तमान में इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र विशुद्ध रूप से राजनीति, भ्रष्टाचार व सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों की शरणस्थली बन गया है। कला-संस्कृति के नाम पर हर माह होने वाले कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारी धन की जमकर फिजूलखर्ची की जा रही है।

13.12.19

ललित कला अकादमी में हर ओर मनमानी!

ललित कला अकादमी नामक संस्थान भारत सरकार का वह सफ़ेद हाथी है जहाँ करोड़ों रुपये अध्यक्ष के घूमने एवं दान कार्य में लगाए जाते हैं. वर्तमान अध्यक्ष के चयन प्रक्रिया में सभी नियम ताक पर रख दिए गए.

12.12.19

राजनेताओं ने बनाया है हिंदू और मुस्लिम के बीच का चक्रव्यूह....


आखिर कब खत्म होगी हिंदू और मुस्लिम के बीच की नफरत की आग

हम इस धरती में जन्म भी लेते हैं इसी मिट्टी के होकर भी रह जाते हैं. हम सबको इस बात का तो पता है कि  मरना तो हमने एक न एक दिन है ही, मगर फिर भी धर्म जाति  और समुदाय  को लेकर आपस में लड़ते झगड़ते रहते हैं आखिर मरने के बाद भी क्यों नहीं खत्म होती ये हिंदू और मुस्लिमों के बीच की नफरत  की आग ! हम तो इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं फिर भी बना जाते हैं इस नफरत की दीवार को....मुस्लिमों को लेकर इस समय भारत देश में जो नफरत की आग पैदा हो चुकी है या पहले से ही थी, ऐसा भी कह सकते हैं कि आप हिंदू मुस्लिमों के भेदभाव के जिस चक्रव्यूह में भारत के लोग फंसे हुए हैं. ऐसा लगता है कि कभी समाप्त ही नहीं होगी.

कैब पर तुष्टिकरण की खतरनाक सियासत

अजय कुमार, लखनऊ

केन्द्र की मोदी सरकार ने आखिरकार  भारी विरोध के बीच अपने घोषणा पत्र के एक और चुनावी वायदे ‘नागरिकता संशोधन बिल’ (कैब)को कानूनी जामा पहना ही दिया। अब सिर्फ राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की औपचारिकता बची है। वहीं इस बिल को गैर-संवैधानिक बता कर कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए हैं।

9.12.19

बलात्कार के बढ़ते मामलों में क्या सरकार व सिस्टम पर सवाल नहीं करना चाहिए


बलात्कार की बढ़ रही वारदातों को देख अब सरकार व सिस्टम से सवाल करने की मजबूरी हुई जरूरी

संदीप के. गुप्ता
असि. प्रोफेसर एवं मीडिया रिसर्च स्कॉलर
ईमेल sandyreporter12@gmail.com


बलात्कार के आए दिन हो रहीं नई वारदातें व बढ़ते हुए क्रूर, बर्बर, घ्रणित दुष्कर्मों के मामले को देखकर तो यह निश्चित हो गया है कि लोगों में अब कानूनी सजा का भय नहीं है। कानून अब उनके लिए शायद एक दाँवपेंच का तंत्र बन गया है। न्यायिक-व्यवस्था का ढुलमुल रवैया, सुस्त कार्यवाही, तारीखों पे तारीख को लेकर अपराधी बड़ी निडरता से अपने अपराधों को जन्म दे रहे हैं। अपराधियों की नजर में यह न्याय-व्यवस्था कानून फिल्मी हो गया है। यह महज एक अन्धा कानून ही लगता है। दलीलों सबूतों का खेल लगता है। यह सब ऐसा क्यों है, और क्यों अपराधियों को यह सब सहज व निडर लगता है।