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17.9.20

जब तक अपराध प्रमाणित न हो तब तक मीडिया द्वारा किसी को भी अपराधी कहना अपराध है




मीडिया ट्रायल से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है  
मीडिया ट्रायल से न्यायपालिका की कार्यशीलता प्रभावित होती है
सुशांत केस में लव एंगल बना मीडिया के लिये TRP बढ़ाने का जरिया
आज की पत्रकारिता वॉच डॉग से बनी लैपडॉग
टेलीविजन न्यूज़ चैनल नैतिकता और मूल्यों को छोड़कर बाजारीकरण का एक रूप बन रहे
मुख्यधारा की मीडिया लोगों को वास्तविक मुद्दों से कर रही गुमराह
आज की मीडिया बनी सत्ताधारियों के हाँथो की कठपुतली  
मीडिया स्वयं की स्वतंत्रता का कर रहा गलत उपयोग
प्रिंट मीडिया आज भी लोगों के हित के लिये काम कर रही है

कवि नरेश सक्सेना द्वारा साहित्य सभा का उद्घाटन



हिन्दू कालेज में हिंदी दिवस पर वेबिनार

दिल्ली। 'मातृभाषाओं में पढ़े-समझे बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। रटी हुई भाषा में रटे हुए विचार ही आएँगे, वहाँ मौलिक और नये विचार पैदा नहीं हो सकते।' सुप्रसिद्ध हिंदी कवि नरेश सक्सेना ने उक्त विचार  हिन्दू कालेज की हिंदी साहित्य सभा का उद्घाटन करते हुए व्यक्त किए। सभा द्वारा आयोजित वेबिनार में लखनऊ से जुड़े कवि सक्सेना ने हिंदी की वर्तमान स्थिति के प्रति चिंता और दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी आज तक ज्ञान की भाषा नहीं बन पाई, साथ ही कोई भी भारतीय भाषा ज्ञान की भाषा नहीं बन सकी।

16.9.20

जनता की नजरों में योगी सरकार की ‘रेटिंग’ अच्छी नहीं

अजय कुमार,लखनऊ

अफरशाही के सहारे उत्तर प्रदेश की ‘तकदीर और तस्वीर’ बदलने का सपना देख रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने ‘मिशन’ में कितना कामयाब या नाकामयाब रहे यह तो वह ही जानें, लेकिन आमजन की नजर में प्रदेश के विकास और कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की ‘रेटिंग’ बहुत अच्छी नहीं है। सड़कों और बिजली व्यवस्था का बुरा हाल है। कानून व्यवस्था के मामले में भी योगी सरकार विपक्ष के निशाने पर है।कोरोना महामारी जो पहले पहल यूपी में नियंत्रित दिख रही थी,वह बेकाबू होती जा रही है। कोरोना से निपटने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के सिस्टम में लोच ही लोच नजर आ रहा है।कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता होगा, जब समय पर इलाज नहीं मिल पाने के कारण कोरोना पीड़ितों को जान से हाथ नहीं छोना पड़ जाता हो। अस्पताल की चैखट पर पहुंचने के बाद भी मरीज को घंटों इलाज नहीं मिले तो इससे शर्मनाक स्थिति और कोई हो नहीं सकती है। जिनी अस्पताल लूट का अड्डा बन गए हैं।

तीन साल से मनरेगा श्रमिकों को नहीं मिली मजदूरी, किया ब्लॉक का घेराव

श्रमिक भरण-पोषण योजना का एक भी किश्त मजदूरों को नहीं मिला




वाराणसी : रोहनियां/ आराजी लाइन (दिनांक-16 सितंबर 2020 बुधवार) तीन साल से राजातालाब तहसील क्षेत्र के मरूई गांव के श्रमिकों को मनरेगा से मजदूरी नहीं मिली। इससे वह भुखमरी की कगार पर आ गए हैं। श्रमिकों ने ब्लॉक प्रमुख से मजदूरी दिलाए जाने की मांग की।

और कितना पतन बाकी है पत्रकारिता का? एंकरों के भौंकने और रिपोर्टरों के रेंकने का दौर

निरंजन परिहार-

हमारे हिंदुस्तान में न्यूज़ टेलीविजन आज पत्रकारिता नहीं, सिर्फ तमाशा है या मदारी का खेल है। क्‍योंकि खबर आज यह नहीं है कि दिल्‍ली से दूर देश के दिल में कहीं क्‍या कुछ खास हो रहा है। बल्कि खबर यह है कि रिया घर से कब निकलनेवाली है और शौविक कहां सोता है। खबर यह है कि तीन महीने पहले मरे हुए एक अभागे सुशांत को तीन साल पहले खाना कौन खिलाता था। और उस खाने में क्या क्या मिलाता था। यह सब इसलिए नहीं है कि आज चैनलों के पास कोई और खबर नहीं है। दरअसल, खबर इसलिए नहीं है क्योंकि खबर की जरूरत को चैनलों ने महसूस करना छोड़ दिया है। यहां सिर्फ होड़ है, आगे निकलने की। दरअसल, संवाद संवेदना से जन्म लेता है और संवेदना सरोकार की संवाहक है। लेकिन जब संवाद, संवेदना और सरोकार सारे ही समान रूप से धंधे की धमक में धराशायी हो जाएं, तो जो पतित परिदृश्य पैदा होता है, वही आज हम सब देख रहे हैं।  

मीडिया विश्‍लेषकों और मीडिया में अब भी आस्‍था रखने वाले हमारे मित्रों से अनुनय विनय है कि, कृपया पत्रकारीय नैतिकता को परंपरागत नज़रिए से देखने के बजाय ताक पर रखकर सुशांत सिंह की मौत के मातम को मजाक बनता देखते रहिए। क्योंकि मीडिया अब मिशन नहीं, कमीशन हैं। खबर अब सूचना और जानकारी नहीं,  एक धमकता हुआ धंधा है। इसलिए, प्रिंट हो या टीवी, मीडिया में अब हर खबर वहां केवल नफे और नुकसान की अवधारणा का आंकलन है। बाजारवाद ने मीडिया को धंधे में ढाल दिया है। ऐसा ही होता है, सेवा का कोई स्वरूप या मिशन, जब धंधे का रूप धर ले, तो सरोकारों की मौत बहुत स्वाभाविक है। इसीलिए, आज टीवी चैनलों की, चैनलों के एंकरों और एंकरों से बात कर रहे रिपोर्टरों की हालत क्‍या है? दिल पर हाथ रखकर पूछिए, कि क्‍या उन्‍हें सूचना व संवाद का माध्यम कहा जा सकता है? 

हम में से बहुत सारे साथी खबरों की दुनिया के पुराने बादशाह हैं – और उन्होंने संस्कार, सरोकार व संवाद की पत्रकारिता की है। कोई प्रिंट में तो कोई टीवी में, और कोई अपनी तरह दोनों में काम का अनुभवी है। सो, हम सबके लिए सोचने, समझने और  दिमाग लगाने के बजाय इस पूरे परिदृश्‍य से गायब हो जाने का वक्त है। चुप्पी साधकर इस दौर के गुजरने का इंतज़ार करने का वक्त है। हम, जो दो – ढाई दशक से ज्यादा वक्त पुराने पत्रकार हैं, हम सबके अतीत और वर्तमान के बीच बाजारीकरण की एक दीवार खड़ी हो गई है। सन 2000 के पहले की और उसके बाद की पत्रकारिता में जो खाई कुछ ज्यादा ही गहरा गई है, उसकी गहराई को सिर्फ सिर्फ एंकरों के ‘भौंकने’, रिपोर्टरों के ‘रैंकने’ और खबरों को खत्म हो जाने नज़रिये से देखिए। पत्रकारिता के पतित होते इस परिदृश्य में, पवित्र और पावन पत्रकारिता तलाशेंगे, तो तकलीफ ही मिलेगी। और कुछ नहीं मिलनेवाला। फिर भी मिले, तो बताना ! 

14.9.20

मीडिया का चरित्र भी जीडीपी की तरह माइनस में जा चुका है


आज भारत कोरोना केसेस के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया है। रोज 1000 मौतें हो रही हैं । लेकिन कोरोना को लेकर मीडिया में सन्नाटा है। अब कोई तब्लीगी एंगल भी नहीं मिल रहा है।  अब तो  पूरा देश रियामय  हो चुका है।  रिया के गाड़ी के पीछे हांफते हुए भागता  रिपोर्टर दुनिया का सबसे लाचार इंसान मालूम पड़ता है। काश कि कोई ऐसी टेक्नोलॉजी आ जाती जिससे कि रिपोर्टर का माइक बंद शीशे के अंदर घुस जाता या फिर उसे  मिस्टर इंडिया  वाली  शक्ति मिल जाती  तो  वह गाड़ी के अंदर घुस कर  सीधे रिया की गोद में बैठ जाता। बड़े दुख की बात है की हमारे इंजीनियर अभी ऐसी तकनीक ईजाद नहीं कर पाए हैं।

भूल जाइए कि सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा... !


देश के आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। सुधरने की गुंजाइश कम है। करोड़ों लोग बेकार और बेरोजगार बैठे हैं। भूल जाइए कि जिंदगी फिर गुलजार होगी। इसलिए, जो कुछ आपके पास है उसे बचाकर रखिए, आगे काम आएगा।  अगर आप सोच रहे हैं कि कोरोना की वैक्सिन के आते ही सब कुछ फिर से ठीक हो जाएगा, तो भूल जाइए। हालात सुधरने में पांच साल से भी ज्यादा का वक्त लग सकता है।

-निरंजन परिहार

अखिलेश यादव के रास्ते पर तेजस्वी यादव

अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह तो चुनाव से दूर रखा था तो तेजस्वी ने लालू को पोस्टरों से ही कर दिया गायब


नई दिल्ली/पटना। क्या बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रास्ते पर चल रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश में वर्चस्व में आते ही अखिलेश यादव ने पार्टी के खेवनहार रहे अपने पिता को साइड लाइन किया था। उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर ही रहते हुए अपने पिता को पार्टी का संरक्षण बनाकर एक तरह से पार्टी से साइड लाइन कर दिया था। हालांकि अखिलेश यादव ने पोस्टरों से अपने पिता का फोटो नहीं हटाया बल्कि उनके कद को भुनाया। मुलायम सिंह यादव के साइड लाइन करने के पीछे भी मुलायम सिंह के समय के दागी नेताओं को दरकिनार कर सपा की छवि को निखारना बताया गया था।

नए समीकरण मासिक पत्रिका अब नए समीकरण समाचार पत्र

आगरा। नए समीकरण मासिक पत्रिका, कमला नगर, आगरा अब नए समीकरण समाचार पत्र होने जा रहा है।

पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार पर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने उठाए सवाल?

सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व डीजीपी से की अपील

देश के अंदर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं देश में कई पत्रकारों की हत्या कर दी गई देशभर में पत्रकारों ने इसको लेकर बड़ा विरोध दर्ज किया  उसके बावजूद यह हमले कम नहीं हो रहे हैं इसी को लेकर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने मोर्चा खोल दिया है पत्रकारों के हित में काम करने वाले जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग की है इसको लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और नेता विपक्ष को पत्र भी लिखे जा चुके हैं पत्रकारों को भयमुक्त पत्रकारिता करने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है लगातार ग्राउंड रिपोर्ट करने जा रहे पत्रकारों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सरकारी कार्यालय और पुलिस विभाग में भी पत्रकारों के साथ सही सुलूक नहीं हो रहा है।

साक्षात्कार के बदलते मायने

vijay kumar
 
बचपन से ही लेखन का शौक रखने और पत्रकारों के रुतबे को देखते हुए मुझे पत्रकारिता में अपना भविष्य नजर आने लगा। इसलिए मैंने कानपुर विश्वविद्यालय से अच्छे अंकों में पत्रकारिता की डिग्री ली। एक वरिष्ठ पत्रकार ने सुझाया कि दूरदर्शन से इंटर्नशिप करने के बाद आपको काफी अवसर मिलेंगे। मैंने उनकी बात मानकर इंटर्नशिप पूरी की और फिर निकल पड़ा नौकरी की तलाश में। शायद ही कोई चैनल और समाचार पत्र बचा होगा जहाँ मैंने अपना जीवनवृत्त (बायोडाटा) न दिया हो। संस्थान के गेट पर पहुंचते ही सिक्यूरिटी गार्ड ने ही साक्षात्कार ले लिया कि किसके माध्यम से आए हो। जवाब में कोई संदर्भ (रेफरेंस) न मिलने पर वह कह देता कि आपको काॅल किया जाएगा। लेकिन मजाल है कि कहीं से साक्षात्कार के लिए बुलावा आता।

कांग्रेस में नई जान फूंकने की कोशिश में सोनिया

सोनिया गांधी कोई खतरा मोल नही लेना चाहती। उन्होंने मजबूत नेता की शैली में पार्टी को नई शक्ल देना शुरू कर दिया है। वे बीमार हैं, लेकिन उन्हें पता है कि कांग्रेस चलाना उनकी जिम्मेदारी भी है और मजबूरी भी। क्योंकि उनसे मजबूत नेता पार्टी में कोई और नहीं है और राहुल गांधी के लिए सीढ़ी उन्हें ही बनानी होगी।

 -निरंजन परिहार

कांग्रेस के पास श्रीमती सोनिया गांधी से बड़ा और पार्टी की गरिमा बढ़ानेवाला कोई दूसरा धीर गंभीर नेता नहीं है, और जाहिर है कि वे अपनी इस महिमा को अच्छी तरह समझती भी हैं। इसलिए उन्होंने बीमार होने और विदेश जाने की तैयारी में होने के बावजूद बहुत तेजी से उन सारों के पर कतर दिए हैं, जो पार्टी को आंख दिखाते रहे हैं और जिनकी वजह से पार्टी को विवादों में आना पड़ा है। इसीलिए राजस्थान के दो नेताओं का राजनीतिक कद बड़ा करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती गांधी ने 11 सितंबर की रात को पार्टी के समर्पित नेताओं को हैसियत बख्श दी, तो कई नेताओं को उनकी औकात दिखा दी। किसी को नई जिम्मेदारी सौंपी, तो पुनर्गठन में महत्वपूर्ण पदों पर राहुल गांधी के विश्वस्त नेताओं को अहमियत देकर संदेश भी दे दिया कि अब चलेगी तो उन्हीं की।

ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी पर ब्रेक

मनोज कुमार

 
ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है.

13.9.20

भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक है

-एस.आर. दारापुरी 

दिसंबर 2018 में, महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके की एक वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें वह दलितों और मुसलमानों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में डींग मारते हुए दिखाई दे रही है। उसने जो कहा वह भारत के पुलिस बल में सामाजिक पूर्वाग्रहों की एक कच्ची लेकिन सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है।

ग्लोबल टाइम्स, चीन और भारत



चीन और भारत का सीमा विवाद कोई नया नहीं है। 1962 में चीन-भारत के बीच हुए युद्ध में जिस तरह से चीन ने भारतीय जमीन पर कब्‍जा जमाया था, उसे लगता है कि वह इससे आगे होकर 21वीं सदी के उभरते और वैश्‍विक  हुए भारत की जमीन भी अपने कब्‍जे में कर लेगा ।  वस्‍तुत: यही वजह है कि एक तरफ रुस में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की मुलाकात हुई और वे सीमा पर शांतिवार्ता की चर्चा कर रहे थे, ठीक उसी समय में  चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स धमकी दे रहा था कि अगर युद्ध हुआ तो भारत हार जाएगा।

11.9.20

रजोनिवृत्ति - एक स्वाभाविक परिवर्तन



महिलाओं में जब मासिकधर्म पूरी तरह से समाप्त हो जाता है तब उसे  रजोनिवृत्ति कहते हैं। रजोनिवृत्ति 45 से 55 साल के बीच की उम्र में होता है। रजोनिवृत्ति होने पर स्त्री के शरीर में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के पविर्तन हो जाते हैं। रजोनिवृत्ति वह पड़ाव है जिसमें एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है।

क्या हमें जानकारी है कि अमेरिका में इस वक्त क्या चल रहा है ?

-श्रवण गर्ग

आज से केवल छप्पन दिनों के बाद भारत सहित पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली घटना के परिणामों को लेकर अब हमें भी प्रतीक्षा करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। इस बात पर दुःख व्यक्त किया जा सकता है कि मीडिया ने एक महत्वपूर्ण समय में जनता का पूरा ध्यान जान बूझकर ग़ैर ज़रूरी विषयों की तरफ़ लगा रखा है।इस बातचीत का सम्बंध अमेरिका में तीन नवम्बर को महामारी के बीच एक युद्ध की तरह सम्पन्न होने जा रहे राष्ट्रपति पद के चुनावों और जो कुछ चल रहा है उसके साथ नत्थी हमारे भी भविष्य से है।

दिनबदिन गिरता नजर आ रहा है पत्रकारिता का स्तर

 
पत्रकार सत्येंद्र सिंह राजपुरोहित

पत्रकारिता का अपने आप में काफी महत्व है.। इसलिए पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है। वहीं  पत्रकारिता के कारण ही सामाजिक और राजनीतिक ढांचा मूल रुप से काम कर रहा है। पत्रकारिता के जरिए ही लोगों तक समाचार पहुंचाने का काम किया जाता है। घटना कही होती है तो उस घटना को लोगों तक जानकारी इसी पत्रकारिता के बदौलत ही मिलती है। जनता भी पत्रकारिता के माध्यम से एक जगह के समाचार को पूरे विवरण के साथ देख सकते है ,वहीं आम जन को  इसी पत्रकारिता के कारण सच्ची घटनाओं की जानकारी होती है। सच्ची बात और सच्ची घटनाओं को लोगों तक पहुंचाने का कार्य पत्रकारिता द्वारा किया जाता है। पत्रकारिता के जरिए ही लोग भ्रष्टाचार,राजनीतिक उठापटक, घोटालों, घटनाओं के बारे में जानकारी ले पाते है। 

10.9.20

यूं चिश्तिया चराग़ की रुख़्सती...

#यूं_चिश्तिया_चराग़_की_रुख़्सती...
यार को हमने जा-ब-जा देखा,
कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा!
कहीं मुमकिन हुया कहीं वाजिब,
कहीं फ़ानी कहीं बक़ा देखा!
दीद अपनी की थी उसे ख्वाहिश,
आपको हर तरह बना देखा!
कहीं है वो बादशाहे तख़्त-ए-नशीं,
कहीं कांसा लिए गदा देखा!!
बेह्नुल अक़्वामी सतह पर क़ौमी इत्तेहाद को चिश्तिया चराग़ से रौशन-ओ-फ़रोग़ देने वाली इस बर्रे सगीर की अज़ीमोशान रूहानी शख्सियत हज़रत हसनी मियाँ नियाज़ी आज बतौर-ए-ज़ाहिर इस आरज़ी दुनियां से पर्दा फरमा गये।आपका पर्दा फरमाना चिश्तिया रंग में रंगे हर दीवाने को ग़मो अफ़सुर्दा कर गया।आपने चिश्तिया मिशन को क़ौमी इत्तेहाद की हिन्दू-मुस्लिम तस्बीह में पिरो कर 'अनल-हक़' का जो दर्स दिया है उसकी खुशबू सदा आलम-ए-जहां में महकती रहेगी।
आपसे मोहब्बत करने व् हर मज़ाहिब के मानने वाले आज ग़म आलूदा हैं।"पंजतन की मोहब्बत का म्यार तो देखिये साहब! "हसनी" का "हुसैनी" से माहे मोहर्रम में जा मिलना"...
आपका रुखसत होना बेशक़ हिन्दू-मुस्लिम इत्तेहाद में एक बड़ी ख़ला पैदा कर गया मग़र आपके रौशन चराग़ से इस मुल्क़ की पाकीज़गी और क़ौमी-एकता हमेशा बुलंद-ओ-बाला रहेगी...इन्शा अल्लाह
●इंनालिल्लाहे व् इंनालिल्लाहे राजेऊन●
"कहीं आबिद बना कहीं ज़ाहिद,
  कहीं रिंदो का पेशवा देखा"!
  "शमा होकर के परवाना,
   आपको आप मे जला देखा"!!!

अल्लाह मग़फ़ेरत फरमाए...आमीन

डॉ. सयैद एहतेशाम-उल-हुदा
वरिष्ठ सदस्य भारतीय जनता पार्टी
उत्तर-प्रदेश
9837357723

6.9.20

आज जिसके पास स्मार्टफोन है वे सभी जर्नलिस्ट हैं

कोविड-19 में टीवी स्टोरी को लेकर यूनिसेफ व पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला द्वारा मीडिया कर्मियों के साथ छात्रों का वेबिनार

शुरुआती दौर से - कोरोना को पॉलिटिक्ली देखने की बजाय मेडिक्ली देखने की आवश्यकता थी -ब्रजेश राजपूत


स्वतंत्र शुक्ला

इंदौर। "हाँथ से हाँथ भले न मिले, दिल से दिल मिलाए रखिए" शेर शायरी अल्फाज़ो की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसे कोरोना ने हमेशा हमेशा के लिए हम सब से जुदा कर दिया राहत इंदौरी साहब के साथ साथ ऐसी कई जानें गई हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे ही कोरोना लॉक डाउन के दौरान कवरेज की गई कई कहानियों को जानने के लिए यूनिसेफ मध्यप्रदेश द्वारा पत्रकारिता एवं जन संचार अध्ययन शाला देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के छात्रों के साथ कोविड-19 में टी.वी स्टोरी को लेकर वेबिनार आयोजित किया गया।