Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

28.9.20

जसवंत सिंह का जाना एक गरिमामयी राजनीतिक सितारे का अवसान

-निरंजन परिहार

जसवंत सिंह चले गए। वर्तमान राजनीति के सबसे बुद्धिजीवी और प्रखर राजनेता थे। अटलजी की सरकार में वित्त, विदेश और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय इस भूतपूर्व सैनिक ने कोई यूं ही नहीं संभाल लिए थे। लेकिन राजनीति का दुर्भाग्य देखिए कि बीजेपी की स्थापना में जिनकी अहम भूमिका रही, जीवन भर बीजेपी में जिन्होंने औरों की उम्मीदवारियां निर्धारित की, उसी बीजेपी में 2014 की मोदी लहर में उनके घोषित अंतिम चुनाव में भी टिकट काट दिया। और यह हद थी कि अटलजी, आडवाणीजी व बीजेपी के खिलाफ बकवास करनेवाले सोनाराम को कांग्रेस से लाकर बीजेपी से लड़ाया गया। निर्दलीय जसवंत सिंह चुनाव हारे, जीवन से भी हारे और गंदी राजनीति से भी। भले ही कुछ लोगों की आत्मा को जीते जी शांति मिल गई। लेकिन समूचे देश को निर्विवाद रूप से जिन नेताओं पर गर्व और गौरव होना चाहिए, उस गरिमामयी राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर जसवंत सिंह का नाम चमकीले अक्षरों में दमक रहा है।

रिपब्लिक में पत्रकार नहीं, जोकर और एक्टर भर दिए गए हैं

रिपब्लिक का जोकर प्रदीप बोला- चाय बिस्किट वाले हैं मुंबई के पत्रकार,  जोकर को मीडियाकर्मियों ने धुना...  देश के मुख्यधारा के इलेक्ट्रानिक मीडिया में अब पत्रकार नहीं हैं। पत्रकार रूपी एक्टर और जोकर भर गए हैं। अधिकांश न्यूज चैनलों के एंकर और पत्रकार सर्कस के जोकर लगते हैं, क्योंकि अब न्यूज चैनलों का फंडा पत्रकारिता करना नहीं है, बल्कि जनता का इंटरटेंनमेंट करना है। 

त्रिवेंद्र चचा, क्या गरीब के बच्चे को डाक्टर बनने का हक नहीं?

- क्या प्राइवेट मेडिकल कालेज में भी अमीर का बच्चा और सरकारी में भी अमीर का बच्चा ही पढ़ेगा डाक्टरी?
- बांड सिस्टम समाप्त कर गरीबों के डाक्टर बनने का सपना चकनाचूर


कोरोना काल में मनुष्य जाति को स्वास्थ्य और स्वच्छता कर्मियों की अहमियत का आभास हो गया है। उत्तराखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत किसी से छिपी नहीं है। पहाड़ चढ़ने को कोई डाक्टर तैयार नहीं है। कोरोना महामारी के दौरान अधिकांश लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी है। मध्यम और गरीब वर्ग के लाखों लोग बेरोजगार हो चुके हैं। व्यवसाय भी प्रभावित हैं। ऐसे में गुजर-बसर की चुनौती है। प्रदेश सरकार दून और हल्द्वानी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की फीस चार लाख रुपये प्रति साल वसूल रही है। अब ऐसे में क्या कोई गरीब का बच्चा डाक्टर बन सकेगा? यह सवाल किसी के भी जेहन में आ सकता है। सवाल यह है कि जब कोई डाक्टर बनने के लिए 50 लाख से एक करोड़ रुपये खर्च करेगा तो वो क्यों पहाड़ चढ़ेगा? क्या प्राइवेट मेडिकल कालेज में भी अमीर का बच्चा पढ़ेगा और सरकारी में भी वही पढ़ेगा? गरीबों के सपनों का क्या होगा।

हाजी यूनुस और जियाउर्रहमान में हो सकता है मुकाबला !

 गठबंधन पर टिकीं बुलंदशहर के मुस्लिम समाज की निगाहें

बुलंदशहर | यूपी में विधानसभा उपचुनाव का बिगुल फुंक चूका है | भाजपा ने तैयारियां तेज कर दी है | बसपा, सपा और रालोद ने भी अपने अपने आंकड़े बिठाने शुरू कर दिए हैं | कांग्रेस भी उपचुनाव लड़ने को तैयार है | यूपी में उपचुनाव की तिथियों की घोषणा होना बाकी है लेकिन जिले का सियासी तापमान है है |

24.9.20

‘माल’ से मालामाल सिनेमा की थाली!

सिनेमावालों की इज्जत की पूंजी चौराहों पर नीलामी के इंतजार में है। क्योंकि उनकी दमित कामनाएं दुर्गंध की नई सड़ांध रच रही है। चेहरों से नकाब उतर रहे हैं। सिनेमा की सारी सच्चाई समझने के बावजूद जया बच्चन सिनेमा को चरित्र प्रमाणपत्र बांट रही हैं। भुक्तभोगियों में भन्नाहट है। गटर की सफाई इसीलिए जरूरी है।

-निरंजन परिहार

सिनेमा की गंदगी के नालों में बह रही बदबू लगातार नाक पकड़े रहने को मजबूर कर रही है। ड्रग्स व नशे को कारोबार के बाद अब निर्देशक अनुराग कश्यप द्वारा देह शोषण किए जाने का मामला गरम है। यहां किसी अभागी युवती के देह का दोहन मूल विषय नहीं है। मूल विषय है सिनेमावालों के अंत:करण में छिपी बैठी वासना का। वह वासना, जो दमित कल्पनाओं को आकार देने के लिए काम देने के बहाने किसी जरूरतमंद को बिस्तर पर बिछाने के सपने सजाती हैं,  और जीवन की खुशियों और तकलीफों को धुंए में उड़ाने को जिंदगी का अनिवार्य अंग मानती है।  इसी कामना की कसक में सुशांत सिंह राजपूत कोई दुर्भाग्यवश मरा हुआ पात्र नहीं, बल्कि एक पूरा धारावाहिक कथा बन जाता है। जिसे पूरा देश और दुनिया तीन महीने से लगातार देखते रहने और उसी में उलझे रहने को शापित है।

22.9.20

हरिवंश की गलती

 गुमराह राजनीति का चाौका छक्का से आम जनता हतप्रभ


किसानों का हित कहकर लोकसभा में पारित विधेयक राज्यसभा में पास होने आया। अवश्य आना चाहिए। सदन तो ऐसे विधेयक को पारित करने या लौटाने के लिए ही है। सुधार कर पुनः राज्यसभा से पारित करवाया जा सकता था। वोटिंग का अधिकार एवं मांग भी उचित ही है। क्योंकि केवल सत्ता पक्ष ही किसानों का हितकर है ऐसा तो संविधान में नहीं लिखा हुआ है। इसलिए विपक्ष की बातों को भी सुना जाना चाहिए। लेकिन उपसभापति हरिवंश की राजनीतिक चाल सबकों हतप्रभ कर दिया। जब उन्होंने चालाकी से विधेयक को पारित करने के लिए विपक्ष के मांग को तव्वजों नहीं दिया।

19.9.20

सच्चे पत्रकार और साहित्यकार होते हैं वास्तविक जनप्रतिनिधि

डॉ. सन्तोष कुमार मिश्र

 
साहित्य और पत्रकारिता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।यदि पत्रकारिता तथ्यों एवं विचारों को उदघाटित करती है तो साहित्य अमूर्त भावों और विचारों को अभिव्यक्ति देता है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।पत्रकारिता को साहित्य की एक विधा कहना गलत नहीं होगा।खुशवंत सिंह,कुलदीप नैयर,विद्यानिवास मिश्र,अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी और वर्तमान में हृदयनारायण दीक्षित ,वेदप्रताप वैदिक जैसे लोगों की लंबी परम्परा है जिन्होंने लेखक और पत्रकार के श्रेष्ठ दायित्वों का समान रूप से निर्वहन किया है।कुछ समय पूर्व तक पत्रकारिता में प्रवेश के लिए यह जरूरी था कि व्यक्ति का लगाव साहित्य की तरफ हो लेकिन आज ऐसा नहीं है।तकनीक के प्रयोग और पैसे की चमक ने पत्रकारिता को तुलनात्मक रूप से साहित्य से ज्यादा लोकप्रियता का माध्यम बना दिया।फलतःसाहित्य और पत्रकारिता के बीच पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा।आज दोनों पर एक दूसरे की उपेक्षा का आरोप लगता है।

मेदिनीनगर सेन्ट्रल जेल में 13 सितंबर से कैदी भूख हड़ताल पर

रूपेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार


महान क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ दास के शहादत दिवस यानि कि 13 सितम्बर से झारखंड के मेदिनीनगर सेन्ट्रल जेल के कैदी 5 सूत्रीय एजेंडे पर भूख-हड़ताल पर बैठे हुए हैं।

एजेंडा है-

अमिताभ जी, आप बोलिए......


 
अमिताभ जी आप बोलिए.... क्युकी सब ही तो बोल रहे हैं....आप कैसे नहीं बोलेंगे.....बोलिए, क्युकी ध्रतराष्ट्रवादी चाहते हैं, कि आप भी बोले.....देश की सबसे बड़ी समस्या पर आप कैसे नहीं बोलेंगे.......रिया, कंगना पर कुछ तो बोलिए, जिससे कुछ ध्रत राष्ट्रवादी योद्धाओं की टीआरपी बनी रहे..... नहीं तो वे इसी में टीआरपी बना लेंगे कि आप बोल नहीं रहे......अब ये मत सोचिए कि लोग इतना बोल चुके हैं, सब ऊब गए हैं, अब बोलकर क्या तूल देना..... तूल दीजिए, यही तो साहब के वफादार चाहते हैं, आप बोलिए......और सुनिए, क्या बोलिएगा...?

17.9.20

जब तक अपराध प्रमाणित न हो तब तक मीडिया द्वारा किसी को भी अपराधी कहना अपराध है




मीडिया ट्रायल से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है  
मीडिया ट्रायल से न्यायपालिका की कार्यशीलता प्रभावित होती है
सुशांत केस में लव एंगल बना मीडिया के लिये TRP बढ़ाने का जरिया
आज की पत्रकारिता वॉच डॉग से बनी लैपडॉग
टेलीविजन न्यूज़ चैनल नैतिकता और मूल्यों को छोड़कर बाजारीकरण का एक रूप बन रहे
मुख्यधारा की मीडिया लोगों को वास्तविक मुद्दों से कर रही गुमराह
आज की मीडिया बनी सत्ताधारियों के हाँथो की कठपुतली  
मीडिया स्वयं की स्वतंत्रता का कर रहा गलत उपयोग
प्रिंट मीडिया आज भी लोगों के हित के लिये काम कर रही है

कवि नरेश सक्सेना द्वारा साहित्य सभा का उद्घाटन



हिन्दू कालेज में हिंदी दिवस पर वेबिनार

दिल्ली। 'मातृभाषाओं में पढ़े-समझे बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। रटी हुई भाषा में रटे हुए विचार ही आएँगे, वहाँ मौलिक और नये विचार पैदा नहीं हो सकते।' सुप्रसिद्ध हिंदी कवि नरेश सक्सेना ने उक्त विचार  हिन्दू कालेज की हिंदी साहित्य सभा का उद्घाटन करते हुए व्यक्त किए। सभा द्वारा आयोजित वेबिनार में लखनऊ से जुड़े कवि सक्सेना ने हिंदी की वर्तमान स्थिति के प्रति चिंता और दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी आज तक ज्ञान की भाषा नहीं बन पाई, साथ ही कोई भी भारतीय भाषा ज्ञान की भाषा नहीं बन सकी।

16.9.20

जनता की नजरों में योगी सरकार की ‘रेटिंग’ अच्छी नहीं

अजय कुमार,लखनऊ

अफरशाही के सहारे उत्तर प्रदेश की ‘तकदीर और तस्वीर’ बदलने का सपना देख रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने ‘मिशन’ में कितना कामयाब या नाकामयाब रहे यह तो वह ही जानें, लेकिन आमजन की नजर में प्रदेश के विकास और कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की ‘रेटिंग’ बहुत अच्छी नहीं है। सड़कों और बिजली व्यवस्था का बुरा हाल है। कानून व्यवस्था के मामले में भी योगी सरकार विपक्ष के निशाने पर है।कोरोना महामारी जो पहले पहल यूपी में नियंत्रित दिख रही थी,वह बेकाबू होती जा रही है। कोरोना से निपटने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के सिस्टम में लोच ही लोच नजर आ रहा है।कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता होगा, जब समय पर इलाज नहीं मिल पाने के कारण कोरोना पीड़ितों को जान से हाथ नहीं छोना पड़ जाता हो। अस्पताल की चैखट पर पहुंचने के बाद भी मरीज को घंटों इलाज नहीं मिले तो इससे शर्मनाक स्थिति और कोई हो नहीं सकती है। जिनी अस्पताल लूट का अड्डा बन गए हैं।

तीन साल से मनरेगा श्रमिकों को नहीं मिली मजदूरी, किया ब्लॉक का घेराव

श्रमिक भरण-पोषण योजना का एक भी किश्त मजदूरों को नहीं मिला




वाराणसी : रोहनियां/ आराजी लाइन (दिनांक-16 सितंबर 2020 बुधवार) तीन साल से राजातालाब तहसील क्षेत्र के मरूई गांव के श्रमिकों को मनरेगा से मजदूरी नहीं मिली। इससे वह भुखमरी की कगार पर आ गए हैं। श्रमिकों ने ब्लॉक प्रमुख से मजदूरी दिलाए जाने की मांग की।

और कितना पतन बाकी है पत्रकारिता का? एंकरों के भौंकने और रिपोर्टरों के रेंकने का दौर

निरंजन परिहार-

हमारे हिंदुस्तान में न्यूज़ टेलीविजन आज पत्रकारिता नहीं, सिर्फ तमाशा है या मदारी का खेल है। क्‍योंकि खबर आज यह नहीं है कि दिल्‍ली से दूर देश के दिल में कहीं क्‍या कुछ खास हो रहा है। बल्कि खबर यह है कि रिया घर से कब निकलनेवाली है और शौविक कहां सोता है। खबर यह है कि तीन महीने पहले मरे हुए एक अभागे सुशांत को तीन साल पहले खाना कौन खिलाता था। और उस खाने में क्या क्या मिलाता था। यह सब इसलिए नहीं है कि आज चैनलों के पास कोई और खबर नहीं है। दरअसल, खबर इसलिए नहीं है क्योंकि खबर की जरूरत को चैनलों ने महसूस करना छोड़ दिया है। यहां सिर्फ होड़ है, आगे निकलने की। दरअसल, संवाद संवेदना से जन्म लेता है और संवेदना सरोकार की संवाहक है। लेकिन जब संवाद, संवेदना और सरोकार सारे ही समान रूप से धंधे की धमक में धराशायी हो जाएं, तो जो पतित परिदृश्य पैदा होता है, वही आज हम सब देख रहे हैं।  

मीडिया विश्‍लेषकों और मीडिया में अब भी आस्‍था रखने वाले हमारे मित्रों से अनुनय विनय है कि, कृपया पत्रकारीय नैतिकता को परंपरागत नज़रिए से देखने के बजाय ताक पर रखकर सुशांत सिंह की मौत के मातम को मजाक बनता देखते रहिए। क्योंकि मीडिया अब मिशन नहीं, कमीशन हैं। खबर अब सूचना और जानकारी नहीं,  एक धमकता हुआ धंधा है। इसलिए, प्रिंट हो या टीवी, मीडिया में अब हर खबर वहां केवल नफे और नुकसान की अवधारणा का आंकलन है। बाजारवाद ने मीडिया को धंधे में ढाल दिया है। ऐसा ही होता है, सेवा का कोई स्वरूप या मिशन, जब धंधे का रूप धर ले, तो सरोकारों की मौत बहुत स्वाभाविक है। इसीलिए, आज टीवी चैनलों की, चैनलों के एंकरों और एंकरों से बात कर रहे रिपोर्टरों की हालत क्‍या है? दिल पर हाथ रखकर पूछिए, कि क्‍या उन्‍हें सूचना व संवाद का माध्यम कहा जा सकता है? 

हम में से बहुत सारे साथी खबरों की दुनिया के पुराने बादशाह हैं – और उन्होंने संस्कार, सरोकार व संवाद की पत्रकारिता की है। कोई प्रिंट में तो कोई टीवी में, और कोई अपनी तरह दोनों में काम का अनुभवी है। सो, हम सबके लिए सोचने, समझने और  दिमाग लगाने के बजाय इस पूरे परिदृश्‍य से गायब हो जाने का वक्त है। चुप्पी साधकर इस दौर के गुजरने का इंतज़ार करने का वक्त है। हम, जो दो – ढाई दशक से ज्यादा वक्त पुराने पत्रकार हैं, हम सबके अतीत और वर्तमान के बीच बाजारीकरण की एक दीवार खड़ी हो गई है। सन 2000 के पहले की और उसके बाद की पत्रकारिता में जो खाई कुछ ज्यादा ही गहरा गई है, उसकी गहराई को सिर्फ सिर्फ एंकरों के ‘भौंकने’, रिपोर्टरों के ‘रैंकने’ और खबरों को खत्म हो जाने नज़रिये से देखिए। पत्रकारिता के पतित होते इस परिदृश्य में, पवित्र और पावन पत्रकारिता तलाशेंगे, तो तकलीफ ही मिलेगी। और कुछ नहीं मिलनेवाला। फिर भी मिले, तो बताना ! 

14.9.20

मीडिया का चरित्र भी जीडीपी की तरह माइनस में जा चुका है


आज भारत कोरोना केसेस के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया है। रोज 1000 मौतें हो रही हैं । लेकिन कोरोना को लेकर मीडिया में सन्नाटा है। अब कोई तब्लीगी एंगल भी नहीं मिल रहा है।  अब तो  पूरा देश रियामय  हो चुका है।  रिया के गाड़ी के पीछे हांफते हुए भागता  रिपोर्टर दुनिया का सबसे लाचार इंसान मालूम पड़ता है। काश कि कोई ऐसी टेक्नोलॉजी आ जाती जिससे कि रिपोर्टर का माइक बंद शीशे के अंदर घुस जाता या फिर उसे  मिस्टर इंडिया  वाली  शक्ति मिल जाती  तो  वह गाड़ी के अंदर घुस कर  सीधे रिया की गोद में बैठ जाता। बड़े दुख की बात है की हमारे इंजीनियर अभी ऐसी तकनीक ईजाद नहीं कर पाए हैं।

भूल जाइए कि सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा... !


देश के आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। सुधरने की गुंजाइश कम है। करोड़ों लोग बेकार और बेरोजगार बैठे हैं। भूल जाइए कि जिंदगी फिर गुलजार होगी। इसलिए, जो कुछ आपके पास है उसे बचाकर रखिए, आगे काम आएगा।  अगर आप सोच रहे हैं कि कोरोना की वैक्सिन के आते ही सब कुछ फिर से ठीक हो जाएगा, तो भूल जाइए। हालात सुधरने में पांच साल से भी ज्यादा का वक्त लग सकता है।

-निरंजन परिहार

अखिलेश यादव के रास्ते पर तेजस्वी यादव

अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह तो चुनाव से दूर रखा था तो तेजस्वी ने लालू को पोस्टरों से ही कर दिया गायब


नई दिल्ली/पटना। क्या बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रास्ते पर चल रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश में वर्चस्व में आते ही अखिलेश यादव ने पार्टी के खेवनहार रहे अपने पिता को साइड लाइन किया था। उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर ही रहते हुए अपने पिता को पार्टी का संरक्षण बनाकर एक तरह से पार्टी से साइड लाइन कर दिया था। हालांकि अखिलेश यादव ने पोस्टरों से अपने पिता का फोटो नहीं हटाया बल्कि उनके कद को भुनाया। मुलायम सिंह यादव के साइड लाइन करने के पीछे भी मुलायम सिंह के समय के दागी नेताओं को दरकिनार कर सपा की छवि को निखारना बताया गया था।

नए समीकरण मासिक पत्रिका अब नए समीकरण समाचार पत्र

आगरा। नए समीकरण मासिक पत्रिका, कमला नगर, आगरा अब नए समीकरण समाचार पत्र होने जा रहा है।

पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार पर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने उठाए सवाल?

सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व डीजीपी से की अपील

देश के अंदर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं देश में कई पत्रकारों की हत्या कर दी गई देशभर में पत्रकारों ने इसको लेकर बड़ा विरोध दर्ज किया  उसके बावजूद यह हमले कम नहीं हो रहे हैं इसी को लेकर जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने मोर्चा खोल दिया है पत्रकारों के हित में काम करने वाले जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया ने पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग की है इसको लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और नेता विपक्ष को पत्र भी लिखे जा चुके हैं पत्रकारों को भयमुक्त पत्रकारिता करने के लिए पत्रकार सुरक्षा कानून इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है लगातार ग्राउंड रिपोर्ट करने जा रहे पत्रकारों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सरकारी कार्यालय और पुलिस विभाग में भी पत्रकारों के साथ सही सुलूक नहीं हो रहा है।

साक्षात्कार के बदलते मायने

vijay kumar
 
बचपन से ही लेखन का शौक रखने और पत्रकारों के रुतबे को देखते हुए मुझे पत्रकारिता में अपना भविष्य नजर आने लगा। इसलिए मैंने कानपुर विश्वविद्यालय से अच्छे अंकों में पत्रकारिता की डिग्री ली। एक वरिष्ठ पत्रकार ने सुझाया कि दूरदर्शन से इंटर्नशिप करने के बाद आपको काफी अवसर मिलेंगे। मैंने उनकी बात मानकर इंटर्नशिप पूरी की और फिर निकल पड़ा नौकरी की तलाश में। शायद ही कोई चैनल और समाचार पत्र बचा होगा जहाँ मैंने अपना जीवनवृत्त (बायोडाटा) न दिया हो। संस्थान के गेट पर पहुंचते ही सिक्यूरिटी गार्ड ने ही साक्षात्कार ले लिया कि किसके माध्यम से आए हो। जवाब में कोई संदर्भ (रेफरेंस) न मिलने पर वह कह देता कि आपको काॅल किया जाएगा। लेकिन मजाल है कि कहीं से साक्षात्कार के लिए बुलावा आता।