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25.5.20

मनरेगा में फैला भ्रष्टाचार तो कैसे मिलेगा प्रवासियों को रोजगार

सौरभ सिंह सोमवंशी
saurabh96961100@gmail.com


सरकारों के द्वारा लागू की  गई किसी भी योजना  की सफलता और असफलता इस बात से पता चलती है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हुए व्यक्ति को उसका कितना लाभ मिल रहा है 2005 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के द्वारा लोगों को रोजगार दिलाने वाली योजना नरेगा लागू की गई 2009 में इसका नाम बदलकर के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)कर दिया गया। गांधी जी कहां करते थे कि भारत गावों में बसता है।

23.5.20

लॉकडाउन खुलते ही बढ़ने लगा प्रदूषण, साफ हवा के लिए ऑनलाइन आंदोलन



स्वच्छ हवा के लिए देशव्यापी आंदोलन, 12 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने सालभर साफ हवा के लिए उठाई आवाज़


लखनऊ, 23 मई : लॉकडाउन खुलते ही देशभर में प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है. कुछ दिन राहत की सांस लेनेवाले भारतीय एक बार फिर घुटन वाले माहौल में जीने के लिए विवश हो रहे हैं. हाल ही में आईआईटी दिल्ली के एक अध्ययन में कहा गया है कि अगर लॉकडाउन के दौरान भारत के कम प्रदूषण के स्तर को बनाए रखा जाता है, तो यह देश की मृत्यु दर में 6.5 लाख की कमी ला सकता है. यही वजह है कि पर्यावरण को लेकर चिंतित आम आदमी और संस्थाएं आगे आ रही हैं. साफ हवा को बनाए रखने के लिए वह भारत सरकार से वह स्पष्ट और लागू होने वाले कार्यक्रम की मांग कर रहे हैं. इसके लिए ऑनलाइन आंदोलन की मुहिम शुरू करने जा रहे हैं.

बनारस की ईद


हिंदुस्तान में मुसलमानों के आने के साथ ही ईद मनाने के द्रष्टान्त मिलने लगते हैं। बनारस में मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व ही मुस्लिम बस्तियां बस गयी थीं और गोविंदपूरा एवं हुसैनपुरा में ईद की नमाज़ पढ़ने की जानकारी मिलती है। जयचन्द की पराजय के बाद बनारस के मुसलमानों की ईद को देखकर कुतुबुद्दीन को आश्चर्य हुआ कि ईद की नमाज़ के बाद जो सौहार्दपूर्ण वातावरण यहाँ पर बना हुआ है उसमें हिन्दू-मुसलमान की अलग-अलग पहचान करना मुश्किल है। ये बनारसी तहज़ीब थी जो मुस्लिम सत्ता की स्थापना से पूर्व बनारस में मौजूद थी। जिसने एक नई संस्कृति हिंदुस्तानी तहज़ीब को जन्म दिया। तब से लेकर आज तक ईद का त्योहार पारम्परिक ढंग से मनाया जाता है।

मोदी सरकार देश में शासन चलाने का नैतिक अधिकार खो चुकी है


मजदूर वर्ग जिसने आधुनिक युग में कई देशों में क्रांतियों को संपन्न किया, उसने भारत में भी आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक उत्पादन विकास में अपनी अमूल्य भूमिका दर्ज कराई है। वही मजदूर यहां कोरोना महामारी के इस दौर में जिस त्रासद और अमानवीय दौर से गुजर रहा है वह आजाद भारत को शर्मशार करता है। फिर भी मजदूर वर्ग की इतिहास में बनी भूमिका खारिज नहीं होती। घर वापसी के क्रम में भी मजदूर वर्ग ने मोदी सरकार की वर्ग क्रूरता को बेनकाब कर दिया है। फासीवादी राजनीति के विरूद्ध मजदूरों की यह स्थिति नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देगी। यह मजदूर बाहर केवल अपने लिए दो जून की रोटी कमाने ही नहीं गया था, उसके भी उन्नत जीवन और आधुनिक मूल्य के सपने थे। वह बेचारा नहीं है. जिन लोगों ने उन्हें न घर भेजने की व्यवस्था की और न ही रहने के लिए आर्थिक मदद दी, मजदूर उनसे वाकिफ है और समय आने पर उन्हें राजनीतिक सजा जरूर देना चाहेगा। क्योंकि बुरी परिस्थितियों में भी वह किसी की दया का मोहताज नहीं है, आज भी वह अदम्य साहस और सामर्थ्य का परिचय दे रहा है। मजदूरों के अंदर आज भी राजनीतिक प्रतिवाद दर्ज करने की असीम योग्यता है और पूरे देश को नई राजनीतिक लोकतांत्रिक व्यवस्था देने में वह सक्षम है। जरूरत है उसे शिक्षित और संगठित करने की। 

इनकी भड़ास सुनें : गाय के गोबर से परेशान है ये शहरी बाबू!

Gobar safayi k sambandh me

Dear sir ,

Actually I m living in vrandavan enclave ,adipur amhera gram, rakshapuram meerut 250001 since last 6 months.

प्रभाष जोशी से कभी कोई अखबार नहीं संभला था, इसलिए जनसत्ता भी नहीं चल सका!

 satish pednekar 

 Prabhash joshi and Jansatta : कभी मैंने एक मित्र से कहा था कि मुझे जनसत्ता का भविष्य अंधकारमय लगता है क्योंकि उसके संपादक प्रभाष जोशी गांधी और विनोबा दोनों के कट्टर शिष्य थे। करेला और नीम चढा वाला मामला था। उनसे आजतक कोई अखबार (मध्यदेश, प्रजानीति, आसपास) नहीं संभला।

भूलने की बीमारी के इलाज के लिए ब्रह्मी बूटी सचमुच लाभदायक है!


पी. के. खुराना
जनसामान्य में पीजीआई के नाम से प्रसिद्ध चंडीगढ़ स्थित चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के स्नातकोत्तर संस्थान “पोस्टग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च” से जुड़े तीन अलग-अलग अध्ययनों ने मेरे दिमाग की बत्ती जलाई है और मुझे उम्मीद है कि ये अध्ययन कुछ और लोगों के दिमाग की बत्ती भी जला सकते हैं।

संकट में हनुमान चालीसा पढ़ता है ये अंग्रेज पत्रकार! सुनें बातचीत

देश में फेक न्यूज जिस तेजी से चल रही और उस पर कोई रोक नहीं लग रही है वह बहुत ही चिंताजनक है। पिछले दिनों तब्लीगी मरकज को लेकर जिस तरह नकारात्मक खबरें चलाई गई और इसके जरिए उत्तर प्रदेश के एक विधायक ने हिंदू मुस्लिम के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की वह बहुत ही गलत है।  ये कहना है दक्षिण एशिया में लंबे समय तक बीबीसी की पहचान रहे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मार्क टली का।

अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा




लखनऊ : “अयोध्या में हिन्दू मंदिर का दावा मुख्य मुद्दों से ध्यान बटाने का हथकंडा” यह बात एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आज प्रेस को जारी बयान में कही है.

गे व्यक्ति जो है पुलिस का मुखबिर, उसे बना दिया गया पत्रकार!

यूपी के एक जिले से खबर है कि यहां पुलिस के एक मुखबिर को जो गे है, उसे पत्रकार बना दिया गया है.  नोएडा से हिंदी में चलने वाले एक घटिया चैनल ने इस मुखबिर को पत्रकार बना दिया है. शारीरिक संबंध बनवाने वाला गे बना हिंदी में खबर देने वाले चैनल का पत्रकार.

ज़ी न्यूज़ के लिए अलविदा की नमाज में हुईं दुआएं

नोएडा स्थित जी न्यूज कार्यालय/स्टूडियो के कोरोना संक्रमित कर्मचारियों के सेहतयाब होने की दुआएं अलविदा की नमाज़ के बाद की गईं। अपने-आपने घरों में पढ़ी गई नमाजों से पहले कुछ पेशे इमामों ने ऑनलाइन खुतबा भी दिया। घरों में रहने की ताकीद की गई। लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की हिदायत दी गयीं। उलमा ने अपने खुतबे रूपी ऑनलाइन संदेशों में कोरोना वबा से बचाव के लिए हुकुमत की गाइड लाइन पर चलने की ग़ुज़ारिश भी की।

आरएसएस-भाजपा की डरी सरकार बढ़ी आपातकाल की ओर


वर्कर्स फ्रंट ने एस्मा लगाने की कड़ी निंदा की
संविधान विरूद्ध सांकेतिक प्रदर्शन से रोकने का आदेश विधि विरुद्ध


23 मई 2020

कोरोना महामारी से निपटने में पूरे तौर पर विफल रही और कारपोरेट की सेवा में लगी आरएसएस-भाजपा की सरकार अंदर से बेहद डरी हुई और यही वजह है कि वह आपातकाल की ओर बढ़ रही है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में एस्मा लगाकर उसने कर्मचारियों से सांकेतिक प्रदर्शन तक का अधिकार छीन लिया है। यह प्रतिक्रिया वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष दिनकर कपूर ने उत्तर प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा प्रदेश में एस्मा लगाने पर व्यक्त की।

22.5.20

क्या बहरा हुआ खुदाय



प्रियंका सौरभ  

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को लाउडस्पीकर से अजान देने को लेकर बड़ा फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि अजान इस्लाम का अहम हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान इस्लाम का हिस्सा नहीं है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि लाउडस्पीकर से अजान पर प्रतिबंध वैध है. किसी भी मस्जिद से लाउडस्पीकर से अजान दूसरे लोगों के अधिकारों में हस्तक्षेप है. अजान के समय लाउडस्पीकर के प्रयोग से इलाहाबाद हाईकोर्ट सहमत नहीं है.

continue ban on sale and use of tobacco products

Bhopal, 22 May: A clutch of consumer organisations and public health experts today made a strong plea to the Madhya Pradesh government to continue its ban on sale and use of tobacco products and spitting in public places, saying such a step is imperative to prevent the spread of coronavirus pandemic in the state.

कांग्रेस यूपी में कदम बढ़ाए,यह सपा-बसपा को नामंजूर

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय क्षत्रप मायावती और अखिलेश यादव नहीं चाहते हैं कि उनके सहारे कांग्रेस यहां अपनी ‘सियासी पिच’ मजबूत कर सके। इसीलिए सपा-बसपा नेता कांग्रेस को पटकनी देने का कोई भी मौका छोड़ते नहीं हैं। कौन नहीं जानता है कि 2019 के लोकसभा सभा चुनाव के समय किस तरह से अखिलेश-मायावती ने उत्तर प्रदेश की राजनीति से कांग्रेस को ‘दूध की मक्खी’ की तरह निकाल कर फेंक दिया था। इस पर कांग्रेस के ‘अहम’ को चोट भी लगी थी, लेकिन वह कर कुछ नहीं पाई। सपा-बसपा से ठुकराई कांग्रेस के रणनीतिकारों ने तब यूपी फतह के लिए अपना ‘ट्रम्प कार्ड’ समझी जाने वाली प्रियंका वाड्रा को आगे करके चुनावी बाजी जीतने की जो रणनीति बनाई थी, वह औंधे मुंह गिर पड़ी थी। कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाता यदि सोनिया गांधी राबयरेली से चुनाव जीत नहीं जातीं। उस समय कांग्रेस, बीजेपी को यूपी में पटकनी देकर मोदी को दिल्ली से दूर करने का सपना पाले हुए थीं, जो आज भी वह पूरा करने की कोशिश में लगी हैं,लेकिन इसके लिए आज तक उसे न तो सपा-बसपा का ‘सहारा’ मिला है न राहुल-प्रियंका का जादू काम आया। यूपी में प्रियंका का ‘प्रयोग’ ठीक वैसे ही ‘फ्लाप शो’ रहा जैसा इससे पहले राहुल गांधी का रहा था।

21.5.20

बेरोजगारी और भुखमरी बरपाने वाली है कोरोना से भी बड़ा कहर

CHARAN SINGH RAJPUT
कोरोना की लड़ाई में कितनी जन और धन की हानी होगी यह तो लड़ाई के बाद जब आंकलन होगा तब पता चलेगा। हां अब तक लड़ी गई लड़ाई में जिस तरह से प्रवासी मजदूरों ने विभिन्न हादसों के साथ ही परेशानियों से जूझते हुए दम तोड़ा है। लोगों ने तंगहाली में आत्महत्याएं की हैं। कोरोना कहर में जो परिस्थितियां देश के सामने खड़ी हुई हैं। उन सबके आधार पर कहा जा सकता है कि देश में भुखमरी और बेरोजगारी का जो तांडव होने वाला है वह कोरोना से भी ज्यादा भयावह होगा।  मेरा आंकलन यह है देश कोरोना कहर तो झेल लेगा पर भुखमरी, बेरोजगारी की जो मार पडऩे वाली है वह झेलना मुश्किल लग रहा है।

देश भर में मजदूरों की हड़ताल 22 मई को

Socialist Party (India) Supports the All-India Labour Strike on May 22 and Demands that the Government Immediately Recall all Changes to Labour Laws

कोरोना ने विज्ञान को समाज से जोड़ने के लिए गंभीर चेतावनी दे दी है


दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता कोरोना महामारी द्वारा पैदा की गई विभिन्न चुनौतियों के समाधान  के खिलाफ लड़ाई में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान उनका जज्बा और कर्मठता शीश काबिलेतारीफ रही है, हमने साक्षात उनके रूप में धरती पर भगवान् को देखा है। जब लाइलाज कोरोना वायरस का खतरा बढ़ा है तो एक बार फिर दुनिया की नजरें इस जानलेवा बीमारी की दवा खोजने के लिए वैज्ञानिकों पर टिकी हैं। स्वास्थ्य शोध के क्षेत्र में कार्य करने वाले वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा यह एक उदाहरण है जिसमें वैज्ञानिक समुदाय से त्वरित प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग नई विज्ञान प्रौद्योगिकी व नवाचार नीति पर काम कर रहा है जिसमें वैज्ञानिकों की सामाजिक जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ देश में शोध एवं विकास का वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और प्रधानमंत्री के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के विजयराघवन से इस बात के संकेत मिल चुके हैं कि सरकार वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने लिए प्रतिबद्ध है। भारत सरकार सही समय पर विज्ञान और समाज के बीच की खाई को पाटने के लिए वैज्ञानिक सामाजिक उत्तरदायित्व पर एक नई नीति बनाने  की योजना बना रही है।

लोक सेवा केन्द्र में हुए टेंडर घोटाला व यहां के कर्मचारियों के शोषण के संबंध में कुछ बातें


मध्य प्रदेश में  लोकसेवा केंद्रों के माध्यम से हितग्राहियों को सेवाएं प्रदान करना 2012-13 से शुरू हुआ। तत्समय बहुत ही जल्दबाजी में शासन द्वारा निर्णय लिया गया आनन फानन में लोकसेवा केंद्रों को ठेकेदारों के माध्यम से संचालित करवाया गया जो कि आज भी बदस्तूर जारी है। लोकसेवा अधिनियम बनाया गया लेकिन कर्मचारियों का कोई अधिनियम नही बनाया गया। जिसके कारण लोकसेवा केंद्रों के ठेकेदार खुल्ले सांड की तरह केंद्रों में कार्य कर रहे कर्मचारियों का शोषण लंबे समय से करते आ रहे है। ये बात अलग है कि बीच मे ठेकेदार बदल गए लेकिन शोषण तो जस के तस है।

कोरोनाकालीन संकट के दौर में शिक्षा के यूनिवर्सलाइजेशन के समक्ष उभरती चुनौतियां


“कोविड महामारी ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत किए बगैर शिक्षा का लोकव्यापीकरण (यूनिवर्सलाइजेशन) असंभव है”

आरटीई फोरम, नई दिल्ली, 21 मई, 2020। कोविड -19 की वैश्विक महामारी ने भारत के एक बड़े हिस्से को बुरी तरह प्रभावित किया है और पहले से चली आ रही भूख, अशिक्षा,  बेरोजगारी एवं असमानता की समस्याओं को और गहरा किया है। खासकर, भारत में पहले से ही बिखरी हुई शिक्षा व्यवस्था को इसने और भी उलझा दिया है। शिक्षा अधिकार कानून, 2009 आने के बाद भी विद्यालयों में न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बहाली के पर्याप्त प्रयास किए गए और न ही विद्यालयों का लोकतांत्रीकरण किया गया था। वंचित समाज के बच्चों को पहले भी सम्मानपूर्वक पढ़ने का अवसर नही दिया गया था और अब ऑनलाइन शिक्षा के जमाने में तो वे और भी पिछड़ जायेंगे क्योंकि इसे व्यापार का जरिया बनाया जा रहा है। विभिन्न कम्पनियों की नजरें इस ओर है। ऑनलाइन शिक्षा, शिक्षा की  मूल भावना को प्रभावित कर रहा है। शिक्षा का काम व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करना होता है। लेकिन “डिजिटल शिक्षा” यह काम करने में असफल है। जब तक हाशिये पर जिंदगी जीने वालों को समान शिक्षा नहीं दी जायेगी तब तक समाज में आर्थिक औऱ सामाजिक समानता नहीं आ सकती है। ये बातें वक्ताओं ने राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा आयोजित शिक्षा – विमर्श शृंखला की चौथी कड़ी में “कोरोनाकालीन संकट के दौर में शिक्षा का लोकव्यापीकरण” विषय पर एक वेबिनार में कहीं।

इंकलाब करने से ही मिलेगा जनता को उसका हक

चरण सिंह राजपूत

शोषकों से राहत की उम्मीद न करें किसान-मजदूर... जब आचार्य चाणक्य के अथक प्रयास से उनका शिष्य चंद्रगुप्त मगध की गद्दी पर बैठ गया तब

भी चाणक्य अपनी झोपड़ी में ही रहे। किसी ने उनसे पूछा कि आचार्य अब आपका शिष्य यहां का राजा है तो फिर अब ये कष्ट क्यों ? आप राजमहल में क्यों नहीं रहते ? पता है कि चाणक्य ने क्या जवाब दिया था ? उन्होंने कहा कि यदि मैं राजमहल में रहने लगा तो एशोआराम की जिदंगी बिताने का आदी हो जाऊंगा। संसाधनों और सुविधाओं में खोकर लोगों का दुख दर्द भूल जाऊंगा। उनका कहना था कि जनता का दुख-दर्द समझने के लिए खुद को दुखऔर दर्द का एहसास होना जरूरी है। यही कारण था कि आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने जनता का दुख दर्द जानने के लिए अपने को कष्ट दिये।

20.5.20

अचानक किए गए 'लॉकडाउन' की वजह से आत्महत्या करने को मजब़ूर गरीब मजदूर लोग!

विभिन्न समाचार माध्यमों से हम देश के लगभग हर हिस्से से प्रतिदिन अचानक किए गए 'लॉकडाउन 'से फैक्ट्रियों के बंद होने,यातायात के बड़े साधनों यथा रेलवे और बस आधारित ट्रासपोर्ट व्यवस्था को भी एक साथ जाम कर देने से भूख से पीड़ित मजदूर परिवारों के किसी भी हालात में अपने हजारों किलोमीटर दूर अवस्थित अपने गाँव जाने के लिए पैदल,सायिकिल, मोटरसाइकिल,जुगाड़,ऑटो,ट्रैक्टर,डंफर,ट्रक आदि किसी भी साधन से जाने,पुलिस द्वारा भयानक रूप से पीटे जाने,40डिग्री सेंटीग्रेड की भीषण गर्मी में जाने से लगभग हर रोज रोड एक्सीडेंट,बिमारी,लू लगने,अत्यधिक थकावट, भूख और प्यास से सैकड़ों मजदूर लोगों की मरने की दुःखद खबरे आ ही रहीं थीं,आज कुछ समाचार पत्रों की खबरों के अनुसार उससे भी ज्यादे दुःखदायी खबर यह आई है कि गुजरात जैसे विकसित कहे जाने वाले राज्य के सूरत शहर में कल तीन लोगों ने नौकरी छूटने,घर न जाने और भूख की हताशा से तंग क्रमशः 28 वर्षीय बाँदा निवासी,55 वर्षीय महाराष्ट्र निवासी व एक 60 वर्षीय, तीन मजदूर लोगों ने आत्महत्या कर लिए!

कुंठाओं से भरा भारत कैसे हो आत्म निर्भर

kp singh
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो नये स्लोगन देश के नाम हालिया संबोधन के दौरान सामने आये हैं- आत्म निर्भर भारत और लोकल-वोकल। उनमें भीड़ को तरंगित कर देने का कौशल है। इसलिए यह स्लोगन भी उनके पिछले नारों की तरह लोगों के दिल-दिमाग और जुबान पर चढ़ रहे हैं लेकिन जब नारे किसी गहरे चितंन की उपज हों तो वे कालातीत सूक्त वाक्य बन जाते हैं जैसे लोहिया जी का नारा जिंदा कौमें पांच साल का इतंजार नही करतीं अन्यथा नारा मनोरंजन करके लोगों की स्मृति से विदा हो जाते हैं। जैसे चुनाव के वक्त नशे की तरह लोगों पर सवार किया गया मैं चौकीदार का नारा। ऐसे खोखले नारों के लिए जुमलेबाजी का टर्म बनाया गया है।

कायदा कानून के ऊपर भाजपा

Akhilesh Dubey 


कायदा कानून के ऊपर भाजपा सिवनी । पूरे देश मे कोविड-19 के प्रकोप से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय किये जा रहे है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी राजनैतिक दलों को और देश की जनता को सोशल डिस्टेंडिंग का पालन करने मास्क का उपयोग करने का आग्रह कर रहे है लॉक डाउन का पालन करने की बात कर रहे है। लेकिन इसके विपरीत सिवनी जिला भाजपा इन सभी बातों को नजर अंदाज करते हुए प्रधानमंत्री की अपीलों की धज्जियां उड़ाते देखे जा रहे है।

जीव वैज्ञानिकों के लिए चुनौती और अवसर है कोविड 19

आगरा। डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज में कोरोना महामारी के समय माइक्रोबायोलॉजी एवं बायोटेक्नोलॉजी के योगदान पर चल रहे दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबीनार का आज (19 मई 2019) अंतिम दिन था।

एमसीयू में जारी हैं ऑनलाइन कक्षाएं

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में संचालित हो रही हैं ऑनलाइन कक्षाएं, सैद्धांतिक के साथ दिया जा रहा है व्यावहारिक प्रशिक्षण

भोपाल। लॉकडाउन के बीच माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल सहित सभी परिसरों में ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन जारी है। लॉकडाउन के कारण जब प्रत्यक्ष कक्षाओं का संचालन बंद हो गया तब विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने तकनीक का उपयोग कर अपना अध्ययन-अध्यापन जारी रखा है। कोरोना के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में शिक्षकों ने पाठ्यक्रम पूरा कराने और विद्यार्थियों को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में व्यस्त रखने की चुनौती को स्वीकार किया। इस नवाचार में ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तकनीक और केंद्र सरकार के डिजिटल इन्शिएटिव का बखूबी उपयोग किया गया है।

कोरोना पर मीडिया को लेकर दोहरे मापदंड से कठघरे में योगी सरकार


- जागरण और जी न्यूज प्रबंधन पर आपदा अधिनियम लागू नहीं होता?
- द वायर के सिद्धार्थ वरदराजन और द हिन्दू के पीरजादा ही हैं गुनाहगार?


मीडिया जगत से जुड़ी दो अलग-अलग घटनाओं को लेकर देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। यह बहस राष्ट्रीय आपदा अधिनियम 2005 के तहत निहित शक्तियों की है। पहली घटना द वायर के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन से जुड़ी है। यूपी के फैजाबाद की पुलिस ने एक अप्रैल 2020 को उनके खिलाफ योगी आदित्यनाथ पर टिप्पणी करने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज की। सिद्धार्थ ने योगी पर आपदा के बावजूद अयोध्या में धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने पर ट्वीट किया था। इसी तरह से जम्मू-कश्मीर में द हिन्दू के पत्रकार पीरजादा आशिक द्वारा सोशल मीडिया पर भी आपदा अधिनियम के तहत पोस्ट लिखने पर केस दर्ज किया गया है।

18.5.20

पत्रकार रामजी जायसवाल की बहन का निधन


अपने जन्मदिन पर ही परिवार सहित पूरी दुनिया को छोड़ गयीं किरन

जौनपुर। जनपद के मान्यताप्राप्त पत्रकार शुभांशू जायसवाल ‘राज’ की माता एवं समूह सम्पादक रामजी जायसवाल की दीदी श्रीमती किरन जायसवाल का शनिवार को निधन हो गया। 47 वर्षीया श्रीमती जायसवाल पिछले कुछ महीनों से कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित थीं जो संघर्ष करते हुये जीवन से हार गयीं।

जनमानस की अंतरात्मा जगायेगी राष्ट्रपति की पहल


kp singh

साधारण पृष्ठभूमि से असाधारण पद पर पहुंचे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पता है कि इतिहास किसी-किसी की जिंदगी में ऐसा कुछ करने का अवसर देता है जिससे वह वास्तव में महान लोगों की सूची में अपना नाम दर्ज करा सके। देश के प्रथम पुरूष ने महामारी से उपजे संकट को देखते हुए अपने वेतन में 30 प्रतिशत कटौती की घोषणा करके अवसर का ऐसा ही उपयोग किया है। काश उनका यह कदम देश में प्रेरणा की ऐसी लहर पैदा कर सके जिससे हर कोई त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करने को उद्यत हो जाये।

मजदूर की मंजिल ….!!

मजदूर की मंजिल ….!!: पत्थर तोड़ कर सड़क बनाता है मजदूर फिर उसी सड़क पर चलते हुए उसके पैरों पर पड़ जाते हैं छाले वोट देकर सरकार बनाता है मजदूर लेकिन वही सरकार छिन लेती है उनके निवाले कारखानों में लोहा पिघलाता है मजदूर फिर खुद लगता है गलने – पिघलने रोटी के लिए …

14.5.20

मीडिया विद्यार्थियों ने 200 से अधिक वीडियो कार्यक्रम प्रोड्यूस किए



भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अपने पत्रकारीय अभिव्यक्ति के माध्यम से कोरोना वायरस के खिलाफ देशव्यापी जंग में अपना योगदान दे रहे हैं। मीडिया विषयों में डिग्री हासिल करने कई प्रदेशों के विद्यार्थी विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं। इनमें से कई विद्यार्थी भोपाल में ही हैं तो कई अपने गृह स्थान जा चुके हैं, लेकिन डॉकडाउन की बंदिशें उनकी अभिव्यक्तीय रचनात्मकता को रोक नहीं पा रही हैं।

"मां" और "मीडिया"

अनुभव आधारित कल्पना

मदर्स-डे स्पेशल

भले ही "मां ने हमें लिखा हो" जैसी कहावतें सोशल मीडिया के बाज़ार में कईं सालों से रिपीट (कॉपी पेस्ट) पर चल रही हों,लेकिन कुछ तो अपना भी लिखना ही होगा ना, कब तक एक फोटो और एक कैप्शन मात्र मातृत्व की सिंगल लाइन डेफिनेशन बनता रहेगा

मैं गांव हूं...


 - धर्मेन्द्र प्रताप सिंह



मातृ दिवस पर मातृभूमि के लिए

सपने में पहुंच गया अपने गांव और फिर...


आज मैंने सपने में एक सपना देखा... देखा कि मुंबई से अपने गांव बहुंचरा (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) पहुंच गया हूं... वहां कोरोना के डर से सभी ग्रामीण भी अपने-अपने घरों में दुबके हुए हैं... मैं बहुंचरा के मध्य में न जाने कब से प्रतिस्थापित और पूज्यनीय गांव देवी (भवानी का स्थान) का दर्शन करने चला गया... मां के चरणों में शीष झुकाने के बाद वहीं पीपल की छांव में बैठ जब मैं थोड़ा सुस्ताने लगा था कि हल्की नींद आ गई... तभी सपने में एक आवाज सुनाई दी:

भारत के मजदूर क्या अभी भी रोम के गुलामों जैसे गुलाम हैं ?

किसी भी राष्ट्रराज्य की सफलता का आकलन इस बात से लगाया जाता है कि उसके राज्य की प्रत्येक प्रजा (जनता )सुखी हो,उसे जीवन जीने की न्यूनतम आवश्यकता कम से कम 'भोजन ' समय से मिल जाय। आज लॉकडाउन को देश में लगे हुए ठीक 48 दिन हो गए। इस देश के धनाढ्य वर्ग,मध्यमवर्ग विशेष रूप से राज्य व केन्द्र सरकार में नौकरी करने वाले लोगों को इस लम्बे लॉकडाउन से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा है,लेकिन इस देश के अतिनिर्धन लगभग 22 करोड़ जनसंख्या वाले लोग जैसे भूमिहीन किसान,दिहाड़ी मजदूर, छोटे रेहड़ीपटरी वाले दुकानदार, रिक्शे,ऑटो,टैक्सी वाले आदिआदि लोगों को जो अपना पेट पालने के लिए अपने गृहराज्य से हजारों किलोमीटर दूर किसी दूसरे राज्य में कोई छोटीसी नौकरी के लिए गए हुए थे,वे अचानक किए गए इस लॉकडाउन के अन्तर्गत सामान्य लोगों के यातायात की साधन रेलों को एकदम ठप्प हो जाने,नौकरी छूटने,मकान किराए का भार आदि से उनको इस 48 दिनों में भूखों मरने की नौबत आ गई है !

ओ दुनिया के रखवाले अब तू ही जान बचा ले


 कोविड 19 की भीषण महामारी से दुनिया मे हाहाकार मचा हूआ है विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोरोना वायरस से सम्पूर्ण विश्व मे अब तक 44  लाख 28 हजार 236 संक्रमित हो गए है 3 लाख मौत हो गयी है वही भारत देश मे 78  हजार संक्रमित और 2549 की मौत इस बिच कोरोना वायरस को मात देने वालो की संख्या 26 हजार 234 है इस कठिन समय मे सभी अपने ईश्वर को याद कर रहे है।

मनमानी कर रहा डीएम और चुप्पी साधे है सरकार!

धौलपुर डीएम ने यू-ट्यूब, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, लिंक्डइन, व्हाट्सएप, ट्वीटर और टेलीग्राम व् अन्य के संचालन पर रोक लगा दी है

जयपुर : सरकार सुशासन की बात कर रही है. और प्रशासन उसमें पलीता लगा रहा है. कोरोना महामारी के दौरान 'राजस्थान सतर्क है 'यह स्लोगन सरकार का है. लोग इसका समर्थन भी कर रहे हैं. वहीँ राजस्थान के धौलपुर के डीएम राकेश कुमार जायसवाल ने अपना एक फरमान जारी कर दिया है. उन्होंने अपने 6 पेज के आदेश में यह लिखा है कि धौलपुर के कतिपय व्यक्तियों जिनके द्वारा सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म यथा यू-ट्यूब, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, लिंक्डइन, व्हाट्सएप, ट्वीटर और टेलीग्राम व् अन्य का संचालन न्यूज चैनेल के रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संचालन किया जा रहा है. ऐसी संचालित समस्त न्यूज चैनल की गतिविधियों को आगामी आदेश तक प्रतिबंधित कर दिया है. जबकि डीएम धौलपुर का सरकारी मोबाइल नम्बर खुद जिले की सरकारी वेबसाइट पर नहीं है. जनता से कैसे संवाद किया जा रहा होगा यह खुद अंदाजा लगाया जा सकता है. बड़ी मुश्किल से डीएम साहब मोबाइल नंबर मिल पाया.

भारत-चीन सैनिक झड़प : अतीत के आईने और भविष्य के मायने

अमूमन भारत-पाकिस्तान के बीच होते रहने वाली झड़पों में तो हमलोग पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात करते आये हैं, लेकिन यदा-कदा जब भारत-चीन के बीच सीधी झड़प की नौबत आती है तो हमलोगों का प्रायः वह उत्साह नहीं दिखता, जो ऐसे मौके पर दिखना चाहिए! तब हमलोग शायद यह भी नहीं सोच पाते कि जब पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल, वर्मा आदि जैसे हमारे लघु पड़ोसी देश हमारी उदारतावश कभी कभार हमसे आंख में आंख मिलाकर बातचीत करने की हिमाकत करते आए हैं, तो फिर भारत जैसा मजबूत देश और हम भारतवासी चीन के साथ ऐसा क्यों नहीं कर सकते! यही वह बात है जिसे समझने, समझाने और तदनुरूप नीतियां बनाने की जरूरत है, जिससे हमारा सियासी व प्रशासनिक जमात भी कमोबेश बचने की कोशिश करता आया है। फिर भी मोदी युगीन भारत में समर्थ चिंतन की जो अजस्र धारा सिस्टम के हरेक रग को अनुप्राणित कर रही है, उसे व्यापक जनसमर्थन कैसे मिले, इस ओर भारतीय प्रबुद्ध लोगों को सतत सचेष्ट रहना होगा।

13.5.20

योगी जी, जब खतरा बड़ा है तो टीम भी बड़ी होनी चाहिए, जनप्रतिनिधियों से अधिक ब्यूरोक्रेसी पर भरोसा ठीक नहीं

अजय कुमार,लखनऊ
 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना महामरी से निपटने के लिए क्या सही दिशा में चल रहे हैं ? कोरोना से लड़ने के लिए सीएम ने जिस टीम-11 का गठन किया था, क्या वह टीम सही तरीके से काम कर रही है या फिर इससे भी बेहतर परिणाम निकल सकते थे ? योगी जी का जनप्रतिनिधियों से अधिक ब्यूरोक्रेसी पर भरोसा करना क्या उचित है ? यह सवाल हम नहीं बल्कि विपक्ष के साथ-साथ बुद्धिजीवी तबका भी उठा रहा है। ऐसे लोगों को लगता है कि जब कोरोना महामारी से ’लड़ाई’ बड़ी है तो फिर योगी की टीम छोटी क्यों है। यह सच है कि कोरोना महामारी से निपटने के मामले में अन्य राज्यों के मुकाबले योगी सरकार काफी आगे दिखाई दे रही है, लेकिन क्या हालात इससे भी बेहतर नहीं हो सकते थे ? यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्य राज्यों के मुकाबले प्रदेश की करीब 23 करोड़ जनता की समस्याओं को सुनने-समझने  और उसके समाधान का काम इतना आसान नहीं है। जमीनी हकीकत भी इसी ओर इशारा कर रही है। तमाम मोर्चाे पर वह नतीजे नहीं आ रहे हैं, जैसे नतीजे सीएम योगी देना और देखना चाहते हैं। योगी की टीम-11 मुख्यमंत्री के उन आदेशों को भी अमलीजाना नहीं पहना पाते हैं है, जिसकी घोषणा सीएम मीडिया से रूबरू होते हुए या सोशल मीडिया के माध्यमों से करते हैं। जनता से जुड़े तमाम ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर मुख्यमंत्री की उम्मीद के अनुसार नतीजे नहीं आ रहे है।

मध्य प्रदेश में फसल बीमा में सरकार एंव कंपनियों की नीयत में खोट

                                                      
विनोद के. शाह
Shahvinod69@gmail.com

राज्य सरकार द्धारा एक साल से अधिक समय तक अपने प्रीमियम अंशदान को लटकाकर कर किसानो के मिलने वाले फसल नुकशान क्लेंब को जानबूझकर विलंवित किया है। तहलसील प्रशासन के अपूर्ण नुकशान आंकलन से राज्य का 75 फीसदी किसान वितरित फसल बीमा के लाभ से वंचित हो चुका है। सवसे बडा आश्चर्य तो यह कि जिस बीमा वितरण के लिये प्रदेश के मुख्यमंत्री किसान को राहत देने की बात कर अपनी पीठ थपथपा रहे है। उस बीमा का 2990 करोड किसानो को वितरित करने के बाद भी बीमा कंपनियों ने 1478.86 करोड का शुद्ध लाभ कमाया है। राज्य में किसानो की नही सिर्फ बीमा कंपनियों की बल्ले—बल्ले हो रही हे।

उमेश कुमार पत्रकार Umesh Kumar Journalist (भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show)


रंजना त्रिपाठी पत्रकार Ranjana Tripathi journalist (भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show)


पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी Journalist Ramdutta Tripathi (भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show)


भड़ासी डिबेट शो Bhadasi Debate Show : संजीव क्षितिज, दिवाकर प्रताप सिंह, अंकित माथुर, एलएन शुक्ला, नवीन सिन्हा


कोरोना लड़ाई के साथ ही जैविक हथियारों को निष्क्रिय कर मानवता की ओर लौटे दुनिया

चरण सिंह राजपूत

यह तो स्पष्ट हो गया है कि कोरोना वायरस चीन की लैब से आया है। जिस तरह से इस वायरस ने दुनिया में अपना रोद्र रूप दिखाया है, इससे यह भी लगभग साफ हो गया है कि यह कोई प्राकृतिक वायरस नहीं बल्कि एक जैविक हथियार है। अमेरिका और रूस ने एक तरह से इसके जैविक हथियार होने पर अपनी मुहर भी लगा दी है।

एक झटके में मजदूर को सड़क पर ला देना वाला कानून बदल देना ही बेहतर

अजय कुमार, लखनऊ

उस श्रम कानून के बदलने पर किसी को भी हो-हल्ला नहीं मचाना चाहिए जो मजदूरों का भविष्य इतना भी सुरिक्षत नहीं रख सकता हो कि यदि किसी मजदूर को एक महीने का वेतन नहीं मिले तो वह भुखमरी की कगार पर पहुंच जाए। जो मजदूर दिन-रात खून-पसीना बहाकर उद्योगपतियों, पंूजीपतियों और बिजनेस घरानों की तिजोरियां भरने और आलीशान कोठियां खड़ी करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं,उसमें से अधिकांश को अपने लिए छत तक नसीब नहीं हो पाती है। इनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने और मिड-डे-मिल के सहारे पेट भरने के लिए मजबूर होते हैं, तो दूसरी तरफ जिसके लिए यह जीवन भर जाड़ा-गर्मी-बरसात की परवाह किए बिना मेहनत करते हैं उन पैसे वालों के बच्चे देश-विदेश के मंहगे स्कूलों में, आलीशान गाड़ियों में बैठ कर पढ़ने जाते हैं।

मेहनतकशों को चाहिए नया गणतंत्र!


लाल बहादुर सिह
नेता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट


देश के बहुसंख्य आमजन-मेहनतकशों के लिए ऐसी सरकार, ऐसे राज्य के बने रहने का तर्क (Raison d'être) खत्म हो गया है!  कोरोना की आपदा तो वैश्विक है, लेकिन इससे जिस तरह हमारे देश में निपटा जा रहा है, उसने मजदूरों की जिस दिल दहला देने वाली अकल्पनीय यातना को जन्म दिया है, उसका पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है ! आने वाले कल कोई संवेदनशील इतिहासकार/पत्रकार/साहित्यकार जब इन दुःख की इन महागाथाओं, शासकों की अनन्त क्रूरता और मजदूरों की अदम्य जिजीविषा को लिपिबद्ध करेगा तो वह विश्व इतिहास का मानव पीड़ा का सबसे महाकाव्य बन जायेगा। आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी के हम साक्षी है!

दलबदल विरोधी कानून के परिणाम

पी. के. खुराना

इसी सप्ताह मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर की ओर से एक वेबिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय था भारतवर्ष में दलबदल विरोधी कानून का विश्लेषण। इस वेबिनार में मुख्य वक्ता भारतवर्ष के अतिरिक्त महाधिवक्ता सत्यपाल जैन थे। चूंकि यह वेबिनार मूलत: अकादमिक प्रकृति का था और लॉ सेंटर के विद्यार्थियों के ज्ञानवर्द्धन के लिए था इसलिए इस मंच पर खुल कर बोलने में कोई परेशानी नहीं थी और यह सच है कि सत्यपाल जैन जो बोले, खुलकर बोले और उन्होंने इस कानून की बहुत सी खामियों की ओर ध्यान दिलाया।

चुनार को अपनी चुप्पी तोड़ने का वक्त है

चुनार के हम सभी नागरिक, प्रबुद्धजन सहित तमाम सामाजिक संगठने अपने अति प्राचीन इतिहास की गौरव गाथा गाते हुए नहीं अघाते हैं। देश के किसी दुसरे हिस्से मे पहुचने पर लगता है कि अपना परिचय और अपने नगर का पहचान बताने के लिए इस दुर्ग और तमाम प्राचीन धरोहरो के अलावा कुछ है ही नहीं। बावजूद इन सबके सभी अपनी तमाम ऐतिहासिक धरोहरों की प्राचीनता को बराबर पहुंचाई जा रही क्षति को कैसे देख कर बर्दाश्त कर रहे हैं। इतना ही नहीं  यदि कोई नागरिक ऐसी कृत्यो को गंभीरता से  उठाता भी है तो  उसके साथ  खड़े होने की बजाय मूकदर्शक बनकर तमाशा देखना ही पसंद करते हैं । कही यह  स्थिति प्रचलित दोहरी चरित्र का नमुना तो नही है। पिछले कई वर्षों से लगातार यहां की पुरातात्विक महत्व की संरक्षित धरोहरों की  प्राचीनता से छेड़छाड़ की लगातार पुनरावृति तो यही साबित कर रही है। हर घटना के बाद किसी कोने से आवाज उठती है। मामले की जांच होती है,गाहे-बगाहे किसी प्रकार प्राथमिकी भी दर्ज हो जाती है किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही साबित  दिखता है। ऐसे मे चुनार के जन जन की प्रबल पहचान का दावेदार ये दुर्ग सहित अन्य बेजुबान धरोहर सभी से पूछ रहे है कि क्या हम तुम्हारे पहचान के बीच अपनी शुरक्षा  के हकदार भी नही है?       

प्रवासी मजदूरों के प्रति पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था के बर्बर रूख का पर्दाफाश

राजेश सचान
संयोजक युवा मंच


रेलवे ने 12 मई से 15 जोड़ी यात्री  एसी ट्रेन चलाने का निर्णय लिया है। इसमें लाकडाऊन में फंसे हुए लोग यात्रा कर सकते हैं अन्य कोई शर्त नहीं है। लेकिन अभी भी जो दसियों लाख #प्रवासी मजदूर देशभर में फंसे हुए हैं उनके लिए चलाई जा रही श्रमिक स्पेशल ट्रेन में मजदूरों को पहले पंजीकरण कराना होगा उसके बाद संबधित राज्य तय करेंगे कि किसे ईजाजत देना है और किसे नहीं।

10.5.20

कोरोना संकट की आड़ में तानाशाही की ओर बढ़ रही सरकारें – दारापुरी


लखनऊ  : “कोरोना संकट की आड़ में तानाशाही की ओर बढ़ रही सरकारें” यह बात एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने प्रेस को जारी बयान में कही है. उन्होंने कहा है कि यह सही है कि  कोरोना से लड़ने के लिए सरकारों को कुछ विशेष व्यवस्थाएं एवं नियम कानून लागू करने पड़ते हैं ताकि इस में किसी प्रकार की अनावश्यक बाधा उत्पन्न न हो. परन्तु इसकी आड़ में  सरकारें कड़े कानून बना कर तानाशाही को ओर बढ़ रही हैं. हमारे देश में महामारी से लड़ने हेतु एक कानून अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है जिसे “द एपिडेमिक डिज़ीज़ज़ एक्ट- 1897’ अर्थात ‘महामारी रोग  अधिनियम 1897’ के नाम से जाना जाता है. इस एक्ट के अंतर्गत पारित आदेशों का उलंघन धारा 188 आईपीसी में दंडनीय है जिसमें 1 महीने की साधारण जेल और 200 रुo जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

इस बार बाजार को ‘अम्मां’ याद आएगी



मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार

ज्यादतर लोग भूल गए हैं कि आज 10 मई है। 10 मई मतलब वैष्विक तौर पर मनाया जाने वाला ‘मदर्स डे’। ‘मदर्स डे’ मतलब बाजार का डे। इस बार यह डे, ड्राय डे जैसा होगा। बाजार बंद हैं। मॉल बंद है। लोग घरों में कैद हैं तो भला किसका और कौन सा ‘मदर्स डे’। अरे वही वाला मदर्स डे जब चहकती-फुदकती बिटिया अम्मां से नहीं, मम्मी से गले लगकर कहती थी वो, लव यू ममा... ममा तो देखों मैं आपके लिए क्या गिफ्ट लायी हूं... इस बार ये सब कुछ नहीं हो पाएगा। इस बार मम्मी, मम्मा नहीं बल्कि मां और अम्मां ही याद आएगी। ‘मदर्स डे’ सेलिब्रेट करने वाले बच्चों को इस बार अम्मां के हाथों की बनी खीर पूड़ी से ही संतोष करना पड़ेगा। मम्मा के लिए गिफ्ट लाने वाले बच्चे अब अम्मां कहकर उसके आगे पीछे रसोई घर में घूूमेंगे। बच्चों से ज्यादा इस बार बाजार को अम्मां याद दिलाएगी। मां के लाड़ को, उसके दुलार को वस्तु बना दिया था बाजार ने। यह घर वापसी का दौर है। रिष्तों को जानने और समझने का दौर है। कोरोना के चलते संकट बड़ा है लेकिन उसने घर वापसी के रास्ते बना दिए हैं। ‘मदर्स डे’ तो मॉल में बंद रह गया लेकिन किचन से अपनी साड़ी के पल्लू से जवान होती बिटिया के माथे से पसीना पोंछते और उसे दुलारने का मां का खालीपन इस ‘मदर्स डे’ पर भरने लगा है।

9.5.20

पत्रकार की मृत्यु पर शोक


अयोध्या । यू पी जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) अयोध्या इकाई की एक आकस्मिक बैठक परिक्रमा मार्ग स्थित कांशी राम कालोनी मे विवेक वर्मा के आवास पर संपन्न हुई। बैठक में आगरा जनपद के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ठ के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर जिंदगी की जंग हारने पर दुख व्यक्त किया और आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना तथा सरकार से  कोरोना वारियर्स का दर्जा देने की मांग किया और परिवार को इस दुख की घड़ी में दुख सहन करने की ईश्वर से कामना किया।

8.5.20

सड़कें यूं उदास तो न थी ….!!

सड़कें यूं उदास तो न थी ….!!: तारकेश कुमार ओझा अपनों से मिलने की ऐसी तड़प , विकट प्यास तो न थी शहर की सड़कें पहले कभी यूं उदास तो न थी पीपल की छांव तो हैं अब भी मगर बरगद की जटाएंं यूं निराश तो न थी गलियों में होती थी समस्याओं की शिकायत मनहूसियत की …

इनके हिस्से का हक भी, कैसे तुम हजम कर जाते हो

Chander Mauli 

देखो ये सड़कों पर भीड़ , देखो इसका हाल
कुछ तो रहम करो मेरे देश के बड़े बड़े नेताओं
नहीं तो भगवान करेगा तुम्हारा भी यही हाल

ये वही लोग हैं वोट के लिए जिनको गले लगाते हो
काम निकला तो फिर पास भी नजर नही आते हो

कोरोना काल में जनता का दर्द


ANUPAM SRIVASTAVA
आज इस कोरोना महामारी में यह प्रश्न उठता है कि आम आदमी की बुनियादी आवश्यकता और सुविधा के लिए  इस देश की 73 साल बूढ़ी आजादी ने क्या किया? क्या यही किया कि 15-20 फिसदी वोटर्स को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया और सत्तारूढ़ होकर बैठ गए।

लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाओ, जनता खुद जीत लेगी कोरोना से यह लड़ाई


CHARAN SINGH RAJPUT
देश में जिस तरह से कोरोना संक्रमण और मौत की संख्या बढ़ रही है। जिस तरह से एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कोरोना संक्रमण का जून में चरम बताया है। इसके आधार पर कहा जा सकता है कि देश में कोरोना का कहर अभी और बढ़ेगा। मतलब यह कहर लंबा चलना है। हम लोग जो यह समझ रहे थे कि भारत में कोरोना का दूसरे देशों से कम होगा और हम जल्द ही इस पर काबू पा लेगा, इसमें अब संदेह लगने लगा है।

लॉकडाउनन 4.0 : आएगा या नहीं आएगा?



अजय कुमार, लखनऊ   


लाक डाउन खुलने की तारीख (18 मई) ज्यों जो निकट आ रही है, त्यों तो लोगों के दिमाग में अब आगे क्या होगा ? यह सवाल यक्ष प्रश्न बनकर लोगों के सामने खड़ा होता जा रहा है। ऐसा इस लिए हुआ है क्योंकि कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए लाक डाउन लगाया गया था और लॉक डाउन थ्री खत्म होने की समय सीमा करीब आने के बाद भी कोरोना महामारी थमने का नाम ही नहीं ले रही है। बल्कि और अधिक तीव्रता से बढ़ती ही जा रही है। कोरोना महामारी के चलते देश के जो हालात बने हुए हैं,उससे केन्द्र की मोदी सरकार के साथ-साथ तमाम राज्यों की सरकारें तक ‘हिली’ हुई हैं।

नारद जयंती पर विशेष : व्यापक लोकहित ही पत्रकारिता का नारदीय सूत्र

जयराम शुक्ल
मनुष्य चाहे दुर्जन हो या सज्जन, सत्य हमेशा उसकी आँखों में भटकटैया की भाँति गड़ता है। स्तुति देवताओं को भी पसंद थी और दानवों को भी। यहां नेता भी स्तुति जीवी है और  खलनेता भी। इसलिए वहां देवर्षि नारद देव-दानवों को खटकते थे और यहां पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। वैसे भी पत्रकार देवर्षि नारद के ही वंशज समझे जाते हैं।

माननीय रहने तक बोले नहीं, तो अब इलहाम कैसे हुआ!


Nand kishor Pareek

राजकीय सेवाकाल से निवृत्त होना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन कई दूरद्रष्टा इसे खास बना देते हैं, जैसे कि माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति श्रीमंत दीपक जी गुप्ता साहेब ने किया।

देवकमल हास्पिटल ने लॉकडाउन की आड़ लेकर अपने इंप्लाई की सेलरी रोक दी


From: Sugandha Kumari

Subject: Salary problem


Mai devkamal hospital m kaam krti hu is month mere ghar m kch problem hone ki wajah se hm 2 din ka chutti lekr lockdown m hi ghar aa Gaye jiske liye mujhe pass v bana kr diya gaya..

डॉ. अम्बेडकर का श्रमिक वर्ग को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी का सन्देश

- एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. (से0 नि0), अध्यक्ष मजदूर किसान मंच 
 
बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर न केवल महान कानूनविद, प्रख्यात समाज शास्त्री एवं अर्थशास्त्री ही थे वरन वे दलित वर्ग के साथ-साथ श्रमिक वर्ग के भी उद्धारक थे। बाबा साहब स्वयं एक मजदूर नेता भी थे। अनेक सालों तक वे मजदूरों की बस्ती में रहे थे। इसलिये उन्हें श्रमिकों की समस्याओं की पूर्ण जानकारी थी। साथ ही वे स्वयं एक माने हुए अर्थशास्त्री होने के कारण उन स्थितियों के सुलझाने के तरीके भी जानते थे। इसी लिये उनके द्वारा सन 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारिणी में श्रम मंत्री के समय में श्रमिकों के लिये जो कानून बने और जो सुधार किये गये वे बहुत ही महत्वपूर्ण एवं मूलभूत स्वरुप के है। सन 1942 में जब बाबा साहेब वायसराय की कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने थे तो उन के पास श्रम विभाग था जिस में श्रम, श्रम कानून, कोयले की खदानें, प्रकाशन एवं लोक निर्माण विभाग थे.

भारतीय मीडियाः गरिमा बहाली की चुनौती

प्रो. संजय द्विवेदी

      भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा और उन आवाजों का उत्तर बनेगा जो उसे कभी पेस्टीट्यूट, कभी पेड न्यूज तो कभी गोदी मीडिया के नाम पर लांछित करती हैं। जिनकी समाज में कोई क्रेडिट नहीं वह आज मीडिया का हिसाब मांग रहे हैं। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे लोग, वाणी और कृति से अविश्वास के प्रतीक भी मीडिया से शुचिता की मांग कर रहे हैं।

कल्पना, प्रयास और सफलता

पी. के. खुराना
 
कहा जाता है कि ज्ञान शक्ति है, पर क्या आप जानते हैं कि यह एक अधूरा सच है। ज्ञान स्वयं में शक्ति नहीं है। ज्ञान, शक्ति में तभी परिवर्तित होता है जब इसे प्रयोग में लाया जाए। यही नहीं, जब इसे रचनात्मक ढंग से काम में लाया जाए तो यह एक बड़ी शक्ति बन जाता है। ज्ञान के रचनात्मक प्रयोग में कल्पनाशक्ति की आवश्यकता होती है। रचनात्मक कल्पनाशक्ति का विकास उसी तरह संभव है जैसे हम तैरना, पढ़ना या चित्र बनाना सीखते हैं। वस्तुत: लगभग हर कला को वैज्ञानिक विधि से सीखा जा सकता है। कला और विज्ञान के इस संगम ने ही मानव की अपरिमित ऊँचाइयों तक पहुंचाया है।

6.5.20

लघुकथा: यार ये कोरोना है....

यार ये कोरोना है....



"यार भाई! आप भी ग़ज़ब हो, क्या मुझे कोरोना है जो हाथ मिलाने से भी बच रहे हो, गले मिलना तो बहुत दूर! कमाल हो यार आप...",
कहते-कहते विश्वास सोनू से रूठ गया। फिर वही ऊटपटांग बोलना और न जाने क्या-क्या कहने लगा।
तभी सोनू ने कहा- "भाई! बात हाथ मिलाने या गले लगने की नहीं है, न ही हमारी दोस्ती इस हाथ मिलाने और गले लगने से कम या ज़्यादा होने वाली है। और यह विषय भी अपने अहम के टकराव का है। बल्कि ये सोच कि गलती से मैं किसी संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आ चुका तो मेरी सज़ा तू क्यों भुगतेगा यार!
ईश्वर न करें ऐसा हो, पर मुझे तेरी ही चिन्ता है।"
विश्वास का स्वर मध्यम और आँखें झुकी हुई थीं, यकीनन यह कोरोना ऐसे ही फ़ैल रहा है। भावनात्मक से थोड़ा किनारा करना बेहतर है, क्योंकि जान है तो जहान है।

*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
हिन्दीग्राम, इन्दौर

3.5.20

शहर वही है ,नजारे बदल गए ...!!

देश - दुनिया की  विडंबना पर खांटी  खड़गपुरिया की चंद लाइनें ....
शहर वही है , नजारे बदल गए   ....!!
तारकेश कुमार ओझा
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मेले वही है , बस इश्तेहारें बदल गए
आसमां वही है , सितारे बदल गए
मायने वही है , मगर मुहावरे बदल गए
आग वही है , अंगारे बदल गए
गलियां वही है , शोर - शराबे बदल गए
शहर वही है , बस नजारे बदल गए
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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ट पत्रकार हैं। संपर्कः 9434453934, 9635221463