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22.8.08

छा गेल महुआ

हेलो मिथिला
एहि मास के 11 तारीख के लांच भोजपुरी के पहिल चैनल ' महुआ ' छा गेल अछि. यूपी... बिहार के तs गप्प छोड़ु दिल्ली... मुम्बई या बाहर रहय वाला भोजपुरी... मैथिली भाषी लोकक बीच ई धूम मचा देने अछि. भोजपुरी के पहिल चैनल होए के फायदा एहि चैनल के जमि के मिलि रहल अछि. ई बात नहिं छै जे सिर्फ भोजपुरी भाषा के जानय वाला लोक सभ देखि रहल छथिन्ह. एहि चैनल के यूपी... बिहार आओर एतय के बाहर रहय वाला दोसर भाषा के लोक सभ सेहो खूब चाव सं एकर कार्यक्रम सभ के आनंद लs रहल छथिन्ह.
ओना हिन्दी जानय वाला लोक सभ के भोजपुरी जानय मे बेसि दिक्कत नहिं होय छन्हि... किएक तs भोजपुरी फिल्म के लs क लोक सभ मे भोजपुरी पहिने सं बड़ लोकप्रिय अछि. मुम्बइया मायानगरी मे बनल भोजपुरी फिल्म खूब हिट सेहो रहल अछि आ पाई सेहो खूब कमाएल अछि. एहि लs क कहि सकय छी जे भोजपुरीके बाजार पहिने सं छल मुदा एकर पहचान नहिं भेल छल आ सेहो कहि सकय छी जे एकर कोई गोटा फायदा नहिं उठयलाह. महुआ लांच करय लेल महुआ मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक पीके तिवारी जी धन्यवादक पात्र छथिन्ह. हुनकर अथक प्रयास सं ई चैनल समय पर आबि गेल. एकटा नवका बाजार मे घुसय के हिम्मत करय लेल हिनका जतेक बघाई देल जाए कम होएत. किएक तs एकटा चौबीसों घंटा वाला चैनल चलानाय कोनो हंसी -मजाकक चीज नहिं अछि. करोड़ों रुपया खर्च होए छै. एहि चैनल पर शुरुआती तौर पर करीब 75 करोड़ रुपए खर्च भेल अछि. पीके तिवारी जी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर सं छथिन्ह आ 1986 मे एकटा फिल्म न्यू दिल्ली टाइम्स सेहो बना चुकल छथिन्ह.
महुआ चैनल यूपी... एमपी... बिहार... झारखंड... उत्तराखंड... दिल्ली आओर देश- विदेश मे रहय वाला करीब 20 करोड़ लोक के टार्गेट कs शुरू कएल गेल अछि. अगर चैनल एहि टार्गेट वर्ग के अपना दिस लाबय मे सफल रहैत अछि तs ई एकटा बड़का गप्प होएत. ओना जेहि हिसाब सं अखन एहि चैनल सं लोक जुड़ल अछि ओहि सं लगैत अछि जे एहि टार्गेट के पूरा कए लेल जाएत. मुदा एहि के लेल समाचार सं लs क प्रोग्रामिंग तक सभ ठाम कसावट जरूरी अछि. कार्यक्रम जतेक कसल रहल ओतेक लोक जुड़ल रहत आओर लोक एहि सं जुड़ल रहय... दर्शक बनल रहय एकरा लेल कार्यक्रम मे रोचकता बनल रहय ई जरूरी अछि. लोक महुआ सं केना बान्हल रहय ई हिनका सभ के सोचय पड़तन्हि. बीचबीच मे सर्वे करा लोकक पसंद...नापसंद के जानय के कोशिश करय पड़तन्हि. ओना अखन एकर समाचार... कार्यक्रम... गीत संगीत... भोजपुरी फिल्म... धारावाहिक सभ नीक लगि रहल अछि. भ सकय अछि जे अखन नव होय के कारण लोक सभ उत्सुकतावश बेसि देखय होयथिन्ह. मुदा अगर सभ किछ नीक रहत... कार्यक्रम के गुणवत्ता नीक होएत.. प्रोडक्शन उच्च स्तरीय रहत तs लोक जुड़ल रहताह. एहि के लेक लोकक भागीदारी वाला कार्यक्रम सभ सेहो शुरू करय के जरूरत अछि जाहि सं बेसि सं बेसि लोक सीधातौर पर चैनल सं जुड़ि सकथिन्ह.. चाहे ओ फोन... ईमेल आ टॉकशो सं होय.
ई जरूर छै जे भोजपुरी चैनल बाजार मे पहिल चैनल होए के फायदा महुआ के मिलि रहल छै... मुदा चैनल के अपना तेवर बना कs रखय के जरूरत छै... ओहि मे आओर पैनापन... धार लाबय के जरूरत अछि. कनि ठंडयलौं क पाछां भs जाएब आओर दर्शक घसकनाय शुरू भs जाएत. किएक तs लाइन मे कएटा आओऱ चैनल अछि. जल्दीए दुटा आओर भोजपुरी चैनल आबय वाला अछि... हमार टीवी आओर गंगा टीवी. एकटा म्यूजिक चैनल सेहो आबय वाला अछि. भोजपुरी के एकटा म्यूजिक चैनल संगीत भोजपुरी त आबिओ चुकल अछि. महुआ के खुद अलग सं न्यूज़... फिल्म आओर म्यूजिक चैनल लाबय के विचार छै. भs सकय अ दीपावली तक हिनकर एकटा आओर चैनल लांच सेहो भs जाए. हमार टीवी... पॉजीटिव टेलीविजन लिमिटेड .... नॉर्थ ईस्ट टीवी (एनईटीवी) लsक आबि रहल अछि. ई कांग्रेस नेता मतंग सिंह जी के छनि. हमार टीवी के कामकाज देख रहल छथिन्ह कुमार संजॉय सिंह. कुमार संजॉय सिंह एहि सं पहिने एनडीटीवी आओर आजतक सं जुड़ल छलाह. जखन कि गंगा टीवी के प्रमुख छथिन्ह एस एन विनोद. विनोदजी कइटा पेपर जुड़ल रहल छथिन्ह.
चलु जे होय भोजपुरी त आबि गेल... आबिए नहिं गेल छा गेल. मिथिला आओर मिथिला सं बाहर रहय वाला मैथिल लोक सभ सेहो मैथिलीक चैनल नहिं होबाक कारणे एकरे आनंद लs रहल छथिन्ह. मैथिली मे चैनल के सेहो जरूरत अछि. आब देखल जाए जे कोन गोटा एकर भार अपना कंहा पर लै छथिन्ह. ओ ना हमरा सभ सं जहिआ कोनो तरहक मदद के जरूरत होए हम तैयार छी. मैथिली मे आधा घंटाक बुलेटिन के संग सहारा समय बिहार झारखंड के तरफ सं नीक प्रयास भेल रहय मुदा आब ई बंद भ गेल अछि. ओना नेपाल वन...टीवी लाइव पर सांझ मे मैथिलीक कार्यक्रम जारी अछि आओर अपन ओमजी खूब नीक एंकरिंग कs रहल छथिन्ह. त अपन भाषा मे सेहो कार्यक्रम आओर समाचारक आनंद लिअ. हम चलय छी. जय जय राम... जय श्री राम.

आभार :- हेलो मिथिला





ये साले जुगाड़ ढूंढने वाले...

कुछ लोगो को दुनिया मे सबसे ज़रूरी यदि कुछ लगता है तो वो है जुगाड़ ... ये ऐसे लोग हैं जो अपने गुर्दे के बूते कुछ कर पाने की हिम्मत नही रखते ... इन्हे कोई भी काम हो, सबसे पहले जुगाड़ ही ढूंढ़ते हैं...और मजे की बात तो ये है कि इसके लिए ये हर ऐरे गैरे से दोस्ती-व्यवहार बनाने को भी तैयार रहते हैं ...और इसका जरिया बनाते हैं ई मेल और मोबाइल मैसेज को...कुछ होनहार ऑरकुट के स्क्रैप की भी मदद ले लेते हैं... ये ज्ञान मैं इसलिए बघार रहा हूँ क्योंकि एक पुरानी जान-पहचान वाले भाईसाहब आजकल अचानक मुझे ई मेल भेजने लगे हैं...उन्हें ऐसा लगता है कि मेरे जर्नलिस्ट होने को शायद वे भी कभी कैश करा सकेंगे... भगवान् जाने हमारे जैसे दो कौडी के जर्नलिस्ट उनके क्या काम आयेंगे...फ़िर भी वे लगे हुए है...रोज एक-दो ई मेल भेज ही देते हैं ...ये वही महानुभाव हैं जिनके पास मैं तीन साल पहले किसी काम के लिए मदद मांगने गया था और इन्होने अपने नौकर से कहलवा दिया था कि 'साहब घर पे नही हैं'...ये उस समय की बात है जब मैं ख़ुद को कुछ बनाने की जद्दोजहद मे लगा हुआ था... मेरा तो मन करता है कि उन्हें एक जवाबी ई मेल करू और उसमे ज़माने भर की गालियाँ लिख के भेजूं ...लेकिन ऐसा करना मुमकिन नही क्योकि वो मेरे कुछ अच्छे दोस्तों के दोस्त हैं... यही वजह है कि अपनी भड़ास यहाँ निकाल रहा हूँ...काश वो मेरे ई मेल के साथ-साथ इस ब्लॉग का पता भी जानते होते...

ये साले जुगाड़ ढूंढने वाले...

कुछ लोगो को दुनिया मे सबसे ज़रूरी यदि कुछ लगता है तो वो है जुगाड़ ... ये ऐसे लोग हैं जो अपने गुर्दे के बूते कुछ कर पाने की हिम्मत नही रखते ... इन्हे कोई भी काम हो, सबसे पहले जुगाड़ ही ढूंढ़ते हैं...और मजे की बात तो ये है कि इसके लिए ये हर ऐरे गैरे से दोस्ती-व्यवहार बनाने को भी तैयार रहते हैं ...और इसका जरिया बनाते हैं ई मेल और मोबाइल मैसेज को...कुछ होनहार ऑरकुट के स्क्रैप की भी मदद ले लेते हैं... ये ज्ञान मैं इसलिए बघार रहा हूँ क्योंकि एक पुरानी जान-पहचान वाले भाईसाहब आजकल अचानक मुझे ई मेल भेजने लगे हैं...उन्हें ऐसा लगता है कि मेरे जर्नलिस्ट होने को शायद वे भी कभी कैश करा सकेंगे... भगवान् जाने हमारे जैसे दो कौडी के जर्नलिस्ट उनके क्या काम आयेंगे...फ़िर भी वे लगे हुए है...रोज एक-दो ई मेल भेज ही देते हैं ...ये वही महानुभाव हैं जिनके पास मैं तीन साल पहले किसी काम के लिए मदद मांगने गया था और इन्होने अपने नौकर से कहलवा दिया था कि 'साहब घर पे नही हैं'...ये उस समय की बात है जब मैं ख़ुद को कुछ बनाने की जद्दोजहद मे लगा हुआ था... मेरा तो मन करता है कि उन्हें एक जवाबी ई मेल करू और उसमे ज़माने भर की गालियाँ लिख के भेजूं ...लेकिन ऐसा करना मुमकिन नही क्योकि वो मेरे कुछ अच्छे दोस्तों के दोस्त हैं... यही वजह है कि अपनी भड़ास यहाँ निकाल रहा हूँ...काश वो मेरे ई मेल के साथ-साथ इस ब्लॉग का पता भी जानते होते...

चंदे का ब्यौरा नहीं दे रहे 900 राजनीतिक दल


पाणिनी आनंद बीबीसी संवाददाता, दिल्ली


भले ही भारत के प्रधानमंत्री और यूपीए सरकार सूचना का अधिकार क़ानून को अपनी उपलब्धियों की सूची में प्रमुखता से शामिल कर रहे हों पर यूपीए के ही कई प्रमुख घटक दल अपनी पारदर्शिता और जवाबदेही तय कराने के नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। चाहे वो रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल हो, रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी हो, करुणानिधि के नेतृत्ववाली डीएमके हो, शिबू सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा हो या अन्य प्रमुख राजनीतिक दल हों, इन दलों ने चुनाव आयोग को अपने दानदाताओं के बारे में दिया जाने वाला ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराया है।

और तो और, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, आरएसपी, तृणमूल कांग्रेस, पीडीपी, नेशनल कांफ़्रेंस और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की ओर से भी आयोग को जानकारी देने के नियम की लगातार अनदेखी की गई है. दान या चंदे के रूप में पार्टियों को मिलने वाले पैसे के मामले में पारदर्शिता से पीछे हटनेवाले दलों की तादाद इतनी भर नहीं है. जानकारी के मुताबिक भारत के चुनाव आयोग के पास पंजीकृत 920 राजनीतिक दलों में से केवल 21 पार्टियाँ ही ऐसी हैं जो अपने चंदे और आमदनी से संबंधित विवरण आयोग को सौंप रहे हैं।


सूचना का अधिकार क़ानून के तहत चुनाव आयोग से यह जानकारी मांगी दिल्ली के एक युवा कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल ने जिससे पता चला कि पार्टियाँ पारदर्शिता सुनिश्चित करानेवाले इस प्रभावी नियम की किस तरह अनदेखी कर रही हैं।


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वर्ष 2003 में एक संशोधन के तहत यह नियम बनाया गया था कि सभी राजनीतिक दलों को फ़ार्म 24(ए) के माध्यम से चुनाव आयोग को यह जानकारी देनी होगी कि उन्हें हर वित्तीय वर्ष के दौरान किन-किन व्यक्तियों और संस्थानों से कुल कितना चंदा मिला. हालांकि राजनीतिक दलों को इस नियम के तहत 20 हज़ार से ऊपर के चंदों की ही जानकारी देनी होती है. पर चुनाव आयोग से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2004 से 2007 के दौरान तीन वित्तीय वर्षों में केवल 21 राजनीतिक दल ही यह ब्यौरा आयोग को देते रहे हैं. वैसे प्रति वर्ष के आधार पर देखें तो केवल 16 पार्टियाँ ही एक वित्तीय वर्ष में चुनाव आयोग का यह ब्यौरा सौंप रही हैं।


'असहाय' आयोग

इस बारे में जब बीबीसी ने भारत के चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि नियम के मुताबिक आयोग के पास पंजीकृत सभी दलों को चंदे से संबंधित जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत राजनीतिक दल यह जानकारी देने के लिए बाध्य हों. उन्होंने कहा, "राजनीतिक दल यह जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं हैं. कुछ दल आयोग को यह ब्यौरा सौंप देते हैं. हमारे पास इनका मूल्यांकन करने या जाँचने के अधिकार नहीं हैं. हम उन्हें केवल एक प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं कि इस दल ने यह जानकारी आयोग को दी है. इसका लाभ उन्हें आयकर राहत के रूप में मिलता है." यानी नियम तो यह कहता है कि राजनीतिक दलों को चंदे का ब्यौरा आयोग में जमा करना है पर ऐसा प्रावधान नहीं बनाया गया जिसके तहत आयोग इस जानकारी का जमा किया जाना सुनिश्चित कर सके. चुनाव आयुक्त बताते हैं कि राजनीतिक दलों को जो लोग चंदा देते हैं या जो पार्टियां चंदा लेती हैं, उनका इस बात पर तो ध्यान रहता ही है कि इसके बदले उन्हें आयकर में राहत मिले. ऐसे में चंदे के बारे में जानकारी आयोग को देना उनके अपने हित की बात है. साथ ही चुनाव आयुक्त यह भी स्वीकारते हैं कि आयकर में राहत के लिए ही इस नियम को नहीं देखना चाहिए बल्कि राजनीतिक दलों को अपनी पारदर्शिता तय करने के लिए यह जानकारी आयोग को देनी चाहिए और इस बारे में बना यह नियम राजनीतिक दलों के लिए अनिवार्य होना चाहिए. उन्होंने बताया कि कुछ दलों की जाँच के दौरान यह भी पाया गया कि कुछ राजनीतिक दल चंदे तो ले रहे हैं पर इसका उपयोग राजनीतिक कार्यों के बजाय शेयर या जेवरात जैसी निजी चीज़ें ख़रीदने में कर रहे हैं. ऐसे में इस बात की जाँच भी ज़रूरी हो जाती है कि राजनीतिक दल किस तरह से चंदे का इस्तेमाल कर रहे हैं. सवाल और भी हैं. मसलन, राजनीतिक दल अपनी ऑडिट निजी स्तर पर करवाकर आयकर विभाग या आयोग को जानकारी दे देते हैं. इस बारे में आयोग ने केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की थी कि ऑडिट के लिए एक संयुक्त जाँचदल बनाया जाए जो राजनीतिक दलों के पैसे की ऑडिट करे. अगर ऐसा होता तो राजनीतिक दलों के खर्च पर नज़र रख पाना और उसकी जाँच कर पाना संभव हो पाता. इससे पार्टियों की पारदर्शिता तो तय होती ही, साथ ही राजनीतिक दलों के खर्च और उसके तरीके पर भी नियंत्रण क़ायम होता. पर केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को फिलहाल ठंडे बस्ते में ही रखा है। '

कठोर क़दम उठाएं'

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण राजनीतिक दलों के जानकारी न देने के क़दम को ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बताते हुए कहते हैं कि इससे स्पष्ट हो गया है कि अपनी ख़ुद की पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति ये दल कितने गंभीर है. ऐसे दलों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून के तहत कार्यवाही की जानी चाहिए. प्रशांत भूषण कहते हैं कि ऐसे दलों के ख़िलाफ़ आयोग को न्यायालय में जाना चाहिए और इनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए. यदि ऐसा आयोग के दायरे में न हो तो न्यायालय के दखल से ऐसा कराना चाहिए. पर चुनाव आयुक्त बताते हैं कि राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ इस मामले में कोई कार्यवाही करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है ही नहीं. उन्होंने बताया कि आयोग राजनीतिक दलों के कामकाज, खर्च और पारदर्शिता तय करने के लिए प्रभावी अधिकार दिए जाने की मांग सरकार के सामने रखता रहा है पर कुछ कारणों से यह टाला जाता रहा है. जानकार मानते हैं कि राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने के लिए जिस तरह के नियमों और अधिकारों की ज़रूरत है, वे संबंधित विभागों को मिले ही नहीं हैं. विडंबना यह है कि देश के वर्तमान राजनीतिक चरित्र में इसकी गुंजाइश भी कम नज़र आती है. बहरहाल, व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की ज़रूरत पर सैद्धांतिक रूप से सिर हिलाने वाले राजनीतिक दलों को यह सिद्धांत पहले ख़ुद व्यवहार में उतारना होगा। कुछ ने पहल ही है पर अभी कितनों का यह समझना, अपनाना बाक़ी है।


वर्तमान लोकसभा में पहुँचनेवाले उन दलों की सूची जिन्होंने अभी तक चुनाव आयोग को अपने चंदों का ब्यौरा नहीं सौंपा है- राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, बीजू जनता दल, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, पक्कलि मक्कल काटची, झारखंड मुक्ति मोर्चा, डीएमके, लोक जनशक्ति पार्टी, ऑल इंडिया फ़ॉरवर्ड ब्लॉक, जनता दल (सेक्यूलर), राष्ट्रीय लोकदल, आरएसपी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ़्रेंस, केरल कांग्रेस, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन, तृणमूल कांग्रेस, भारतीय नवशक्ति पार्टी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, मिज़ो नेशनल फ़्रंट, मुस्लिम लीग केरल स्टेट कमेटी, नगालैंड पीपुल्स फ़्रंट, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, सिक्किम डेमोक्रेटिक पार्टी

अबतक ब्यौरा सौंपने वाले दल
भारतीय जनता पार्टी
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी
इंडियन नेशनल कांग्रेस
एडीएमके
समाजवादी पार्टी
जनता दल (युनाइटेड)
तेलगू देशम
एमडीएमके
शिवसेना
असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट
मातृभक्त पार्टी
राष्ट्रीय विकास पार्टी
भारतीय विकास पार्टी
मानव जागृति मंच
भारतीय महाशक्ति मोर्चा
समाजवादी युवा दल
सत्य विजय पार्टी
थर्ड व्यु पार्टी
जनमंगल पक्ष
लोकसत्ता पार्टी

परासिन की प्यास

यह बात लगभग अस्सी के दशक है। मानिकपुर में अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान कोल-भीलों के लिए काम करने लगा था। पाठा के गरीबों की खबर दिल्ली में बेचने वाले गया प्रसाद गोपाल (अब सिर्फ गोपाल भाई) के यहां पहुंचने लगे थे। उनमें कई बड़े और स्थापित नाम हैं। मैं भी दिल्ली की आवारगी छोड़कर घर लौट रहा था। बुंदेलखंड एक्सप्रेस की एक बोगी में गोपाल जी मिल गए। काफी देर तक चर्चा हुई। उसके बाद वह मुझे अपने साथ मानिकपुर ले गए। वहां कई लोग मिले। हजारी सिंह वहां रहते थे। और भी तमाम लोग थे। गोपाल जी के भाई संतोष से दोस्ती हो गई। दरअसल संतोष बहुत बड़े दारूबाज थे। और हम भी कम नहीं थे। सो शाम की महफिलें पीटर के होटल में सजने लगीं। शायद गोपाल जी को इसकी भनक भी थी पर वह खामोश रहे। मेरे हिस्से जो काम था। उसे मैं पूरी शिद्दत से निपटाता। वैसे काम सिर्फ नाम का था। कुछ खबरें बनानी होती थीं आदिवासियों से जुड़ी हुई और वह काम अपने लिए चुटकी बजाने जैसा था। इसके बाद रेलवे स्टेशन चले जाना। वहां के पान वालों के यहां सिगरेट फूंकते रहना।
यह सिलसिला लगभग छह महीने चला। मानिकपुर से कुछ दूर जरवा में मेरे दोस्त खालिद का फार्म हाउस था। एक दिन पता लगाते हुए खालिद आ धमके। उनके साथ बाबी भी थे। खालिद अपने साथ लाइसेंसी बंदूक भी लाए थे। वह जरवा चलने की जिद करने लगा। गोपाल जी से चर्चा हुई तो उन्होंने इस शर्त के साथ जाने दिया कि तीनों लोग परासिन जरूर जाना। हमने हां भरी और एक मिनी बस में लद लिए। जरवा के लिए। दो घंटे बाद हम जरवा पहुंचे। सड़क किनारे खालिद का माटी का घर था। वहां एक कोल रहता था। खालिद ने उसे आवाज दी। वह आया और हम लोगों के बैग कांधे में टांगकर घर ले गया। शाम हो चली थी। मन करने लगा शराबनोशी का। खालिद भांप गया। वह ओल्डमंग की पेटी लाया था। उसने खोल दी। और हम लोग शुरू हो गए। कुछ देर बाद एक मुर्गा मंगवाया गया। वह जब बनकर तैयार हुआ, रात हो चुकी थी। गरमी के दिन...। हम लोग बाहर बैठ के चट्टानों के चबूतरों पर। फिर शुरू हो गए। रात बारह बजे खा पीकर सो गए। सुबह जंगल में घुस गए। शिकार का मन हो गया। कोशिश करी और सफल हो गए। शिकार को घसीटते हुए ले आए। थोड़ी दूर में आदिवासियों का गांव था। वहां शिकार लाकर पटक दिया। वह लोग खुश हुए। ऐसा करते-करते हफ्ता-दस दिन गुजर गए।
एक दिन संतोष आ धमके राजदूत मोटरसाइकिल से। बोले भाईसाहब ने परासिन जाने के लिए कहा है। हम लोग तैयार हो गए। सबसे पहले संतोष ने मुझे और बाबी को परासिन पहुंचाया। इसके बाद खालिद भाई को लाया। रात बियावान जंगल के बीच स्थित इस गांव में गुजारी। सियारों के रोने की आवाज...चीतों के दहाड़ से पूरा जंगल थर्राता रहा। खालिद के हाथ में बंदूक थी सो डर किसी बात का नहीं लगा। वैसे भी हम लोग मचानों में सो रहे थे। यह अजीब गांव था। देश की तरक्की से दूर। यह गांव तब तक देश-दुनिया के नक्शे में नहीं था। यहां डाकू खुले आम विचरण करते थे। ददुआ के गिरोह की यह मुफीद जगह मानी जाती रही है। यह इतने दुर्गम इलाके में था कि पुलिस यहां जाने से के नाम से कांपती थी। हद दरजे की ऊंचाई में है यह गांव। इसकी जंगल की सीमाएं मध्यप्रदेश के सतना और रीवा जिले को जोड़ती हैं। दस-ग्यारह आदिवासी परिवार यहां रहते थे। सब की कुल जमा आबादी पैंसठ थी। यहां की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि इन लोगों को रिश्ते नहीं मालूम थे। लोग आदम सभ्यता में जी रहे थे। इनकी कमसिन बालाओं की गोद तेंदूपत्ता ठेकेदारों के लोगों की जिस्मानी भूख शांत कर कब हरी हो जाती थीं किसी को पता नहीं चलता था। इस इलाके में श्याम बीड़ी बहुत फेमस है। आजकल इसके मालिक माननीय हैं। इनका पुश्तैनी घर मानिकपुर में ही है। इस गांव की एक और पीड़ा देखिए। इन लोगों को पानी लेने के लिए गगरी और मटकी के साथ तीन किलोमीटर नीचे उतरना पड़ता था। पूरा रास्ता पथरीला। जंगली। रास्ते में जंगली जानवरों का खतरा। गोपाल जी की कोशिश थी कि परासिन में कुआं बनवाया जाए। और हम चारों को उसी मकसद से वहां भेजा गया था। हम चारों के लिए आटा, दाल, आलू, प्याज, नमक, मिर्च और सरसों का तेल भी गोपाल जी ने दूसरे दिन भिजवाया था। वह तीन दिन में खत्म हो गया। हम लोगों ने पूरे गांव को खिला दिया। संतोष को मानिकपुर भेजा गया। शाम को वह लौटा तो उसके साथ खाने-पीने की सामग्री के साथ एरोस्टेकेट की चार बोतलें थीं। हम लोगों ने छक कर पी और रात को टिक्कर और भुने हुए आलू से भूख शांत की। फिर कुएं के लिए काम शुरू हुआ। खुदाई मशीन मंगवाई गई। हम लोग करीब एक माह वहां रहे। कमबख्त पानी नहीं निकला। जहां-जहां खुदाई कराई, वहां अस्सी-नब्बे फीट बाद चट्टान आ जाती और हम सबके हाथ पैर फूल जाते। थक हार कर हम लोग परासिन वालों को प्यासा छोड़कर लौट आए। बाद में बांदा के कलक्टर से इस सिलसिले में मुलाकात की। वह काफी बागी किस्म के थे। बांदा में पहली पोस्टिंग थी उनकी। उन्होंने परासिन के लिए काफी कुछ किया पर कुआं नहीं बन सका। और वह आईएएस की पहली और आखिरी नौकरी छोड़कर मिजोरम चले गए। वहां कुआं बना कि नहीं, मुझे नहीं मालूम। न ही मैं गोपालजी से कभी पूछ सका। हालांकि उनसे कई बार मुलाकात हुई दो-दोचार साल के अंतराल में। मेरी ख्वाहिश है कि एकबार परासिन जरूर जाऊं। देखूं परासिन की प्यास मिटी है कि नहीं।

अब झेलिए मेरी भड़ास को

वो दिन कितने अच्छे थे। गांव में सब रहते थे। कभी नहीं सोचा था कि गांव एकदम से छूट जाएगा। बहुत पीड़ा होती है। कितना अपनापन था। रंजीत नन्ना के घर में सीधे चौके में जाकर बड़ी अम्मा से खाना मांगना। कोई शर्म नहीं आती थी। नेकर और बनियान पहनकर पढ़ने जाना। लौटते वक्त हंगामा करते आना। पूरी टोली के साथ खूब खेलना। गर्मी के दिनों में तालाब और तलइया में डूबे रहना।
सर्दियों में तालाब किनारे उबले हुए सिंघाड़े मिर्च की चटनी के साथ खाना। और बरसात के दिनों में डोंगे में बैठकर तालाब में जाना...कितना रोमांच... मीलों लंबा तालाब...जहां तक देखो पानी ही पानी...और मस्ती में आकर छलांग लगा देना। डुबकी मारकर छुआ-छुआवल खेलना...।
शाम को घरों के बाहर निकलकर नीर-छीर खेलना। लुका-छिपी खेलना और न जाने क्या-क्या..। सावन के महीने में नीम की डाल पर घाले गए झूले का आनंद लेना। और भी न जाने-क्या-क्या। मेरा गांव मटौंध। मुझे बहुत याद आता है। बहुत याद आता है। याद आते हैं। भाऊ, प्रधानजी, मुखिया साहब, लीला, सोमा, लल्ला, स्वामीजी, मंगल भैया, नरेश, सीताराम, सुभाष... और अपना वह घर,,,जो अब अपना नहीं रहा। कितना अच्छा था माटी का घर। हम सब वहीं सुख-दुख में रहते थे। शहर आए तो सबकुछ छूटता चला गया। शुरू में तो गांव जाने का सिलसिला बना रहा। बाद में सबकुछ खत्म हो गया।
याद आता है वह दिन जब गांव में पहली बार बिजली आई थी। खूब जश्न मना था। हम सब लड़के बजरिया तक देखने गए थे कि बिजली कैसी होती है। बहुत अच्छा लगा था। तब हमारे घरों में लालटेन या डिब्बी होती थी। उसी की रोशनी में हम लोग पढ़ते थे। खेतों में जाकर चने के बिरवा तोड़ना भी बहुत भाता था। मेले ठेले तो लगे ही रहते थे। आसपास चार मेले लगते थे। गनेश पहाड़ी का मेला। भद्रकाली का मेला। और दो छोटे-छोटे मेले। सचमुच पूरे प्राण बसते थे इन मेलों में। जीवन के मेले अद्धभुद थे। काश हम उन्हीं दिनों में लौट आएं


बंधन
बंधन टूट नहीं सकता था
बंधन जैसा बंधन होता
घर होता तो छत भी होती
तुलसी बिरवा आंगन होता
पता ठिकाना क्या दें अपना
हम बंजारों जैसे हैं
विषधर बनकर लिपटे होते
बदन जो तेरा कंचन होता
बंधन टूट नहीं सकता था
बंधन जैसा बंधन होता

(प्रिय खालिद और बॉबी के लिए
मानिकपुर के जंगलों
के बीच जरवा फार्म से )


जीत जाएंगे...
सुना है साहिलों में आग भड़की है तबाही की
मगर हमने भी ठानी है बहर के पार जाएंगे
अभी तो मुट्ठियों तक तेग का पानी नहीं उतरा
फिर कैसे कह दिया की बाजी हार जाएंगे

( प्रिय बाबी और वीरेंद्र के लिए)


संदर्भः लैला मैजनूं- टूटेगी धारणा
लैला न काली थी, न कलूटी थी। वह कोई युवती भी नहीं थी। तब फिर कौन थी वह? आखिर कैस उसका इतना दीवाना क्यों था?

अगर आपसे मैं कहूं कि लैला और मजनूं का इतिहास में कोई जिक्र नहीं है तो आप कहेंगे कि कोई सिरफिरा बेवकूफी की बात कर रहा है। मगर यह सच है। अस्सी के दशक में इलाहाबाद के कुसुम प्रकाशन से छपने वाली अपराध साहित्य की पत्रिका नूतन कहानियां या अपराध साहित्य की सच्ची कहानियां ने पेज नंबर २९-३० में लैला-मजनूं शीर्षक से विशेष प्रतिनिधि के हवाले से कथा छापी थी। यह विशेष प्रतिनिधि मेरे मित्र और बड़े भाई इरशाद अनवर थे। तब पत्रिका के संपादक अशोक शुक्ल बने थे. इसके छपने के बाद काफी हंगामा बरपा था।
इससे पढ़कर साफ होता है कि इस नाम के कोई पात्र हुए ही नहीं है। आप भी देखिए। पत्रिका के तीसरे पैराग्राफ से शुरू करते हैं- प्राचीनतम अरबी साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि करीब १३५० साल पहले अरब देश के नजफ शहर में लगभग ३०-३५ वर्ष का एक खूबसूरत युवक पागलों जैसी हालत में लैला-लैला चीखता हुआ दौड़ता-फिरता था। यह युवक एक कबीले के सरदार का इकलौता बेटा कैस था, जो अपने पिता के विरोध की परवाह न करते हुए इस्लामी लश्कर में शामिल होकर जंग में गया। उसके बाद अपने घर नहीं लौटा। उस समय यह अनुमान लगाया गया कि यहूदियों के खिलाफ जंग करते हुए उसने शहादत का जाम पी लिया।....आठ-दस बरस बाद एक दिन कैस अपने शहर लौटता है। उसकी हालत देख नाते-रिश्तेदारों का कलेजा फटा सा रह गया। वह पागलों जैसी अवस्था में था। सोते-जागते हर पल लैला शब्द उसके मुख से फूटता था। तमाम इलाज कराने के बाद कबाइलियों ने कैस को उसके हाल पर छोड़ दिया। अनपढ़ कबाइलियों को लैला का अर्थ नहीं मिला। हालांकि लैला अरबी भाषा का शब्द है। जिसका आशय किसी काली वस्तु या रंग से होता है। कैस की दीवानगी का हाल यह था कि वह अपना नाम मैं जुनूं कहता था। इसका अर्थ होता है मैं दीवाना हूं। कालांतर में मैं और जूनूं ने सिर्फ मजनू की शक्ल अख्तियार कर ली है। कैस के बार-बार मैं जुनूं-मैं जुनूं कहने से लोगों ने उसके साथ लैला को जोड़कर यह निष्कर्ष निकाला कि कैस काली रंगत वाली किसी युवती के इश्क में नाकाम होकर पागल हो गया है। उसके बाद कबाइलियों ने कैस को प्रेम-दीवाना घोषित कर रेतीले टीलों में भटकने के लिए छोड़ दिया।...और कैस एक नखलिस्तान के किनारे अपने लैला-लैला का जाप करने लगा।
जो लोग लैला को युवती समझते हैं, उन्हें भ्रम है। दरअसल इस्लाम धर्म की बुनियाद उसका पहला कलमा है,-ला-इलाहा इल्ललाह मुहम्मदर्रसूल अल्लाह। इसे इस्लाम धर्म का मूलमंत्र भी कहा जा सकता है। जिसका अर्थ है कोई नहीं है माबूद सिवा अल्लाह के और मुहम्मद उसके रसूल हैं। यदि इस कलमे के पहले भाग ला-इलाहा का धारा प्रवाह जाप किया जाए तो एक ऐसी स्थिति आ जाती है कि मुख से स्वतः लैला-लैला निकलने लगता है, ठीक उसी तरह जैसे मरा-मरा जपने से राम-राम। कहने का तात्पर्य यह कि कैस किसी षोडसी के प्रेम में असफल होकर मजनू नहीं बना था, वह जेहाद से लौटकर घर नहीं आया, बल्कि किसी अग्यात स्थान या गुफा में जाकर घोर तपस्या करते हुए उक्त कलमे को सिद्ध कर लिया था। यही कारण था कि उसके मुख पर लैला शब्द चस्पा हो गया। किन्तु विवेकहीनों ने कैस को प्रेम-दीवाना समझकर शहर से बाहर निकाल दिया था।
कालांतर में एक अरबी लेखक इब्न अब्दुल्ला ने कैस के दीवानेपन को जेहन में रखते हुए लैला-मजनू नामक काल्पनिक पात्रों का सृजन कर एक प्रेम-कथा लिखी जो देश-विदेश के पाठकों द्वारा इतनी पसंद की गई कि उसने तात्कालीन ब्रिकी के पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अरबी के अलावा सैकड़ों भाषाओं में अनुदित होकर वह रचना विश्वभर में प्रकाशित हुई। परिणामस्वरूप लैला-मजनू की काल्पनिक प्रेम-कथा ने युवा पीढ़ी के मन-मष्तिक पर इतना प्रभाव डाला कि सच्चाई का दम टूट गया। अरबी साहित्य में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि कैस ने खुदा की इतनी इबादत की थी कि उस पर हर पल अल्लाह व उसके रसूल से इश्क की मस्ती सवार रहती थी। वह बस्ती-बस्ती-सहरा-सहरा लैला-लैला की आवाज लगाता रहता था। नखलिस्तान में एक बबूल के पेड़ से टिककर तपस्या करने लगा। और धीरे-धीरे यह बबूल का पेड़ सूख गया। मजनू के शरीर को रेत और मिट्टी ने ढांप लिया। दीमकों ने घर बना लिया। पास से देखने में भी कोई नहीं कह सकता था कि यहां कि कोई इंसान है। ...और हुआ यह कि एक रोज एक लकड़हारा सूखी लकड़ियों की तलाश में इसी नखलिस्तान में जा पहुंचा और सूख चुके बबूल के ठूंठ पर कुल्हाड़ी से वार कर दिया। जैसे ही कुल्हाड़ी का धारदार फल ठूंस से टकराया, खून का फौव्वारा उबल पड़ा। नीरव वातावरण का सीना चीरती हुई एक कर्णभेदी चीख गूंजी-लैला$$$$$$ टकराया कैस का सिर दो टुकड़ों में बंटकर कंधों पर झूल गया।



मेरी पुस्तको...।
मैं किन शब्दों में तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं, मेरी किताबो।
कि जमाने की कटुताएं और हृदय की कुण्ठाएं
मैं तुम्हारे पृष्ठों की पवित्र गंगा में डुबो देता हूं
और हल्का हो जाता हूं।
तुमने मेरे दिनों को उजाला दिया है, मेरी पुस्तको
कि वे सब चीजें जो सूरज के उजाले में नहीं देखी जा सकती
तुम्हारे उजाले ने मुझे दिखाई हैं।
तुम्ही ने मेरे असंतोष को संदर्भ दिए हैं
मेरे संघर्ष को परिप्रेछ्य दिया है,
मेरे विद्रोह को इतिहास दिया है।
मेरी थकी-टूटी दिनचया$ की तल्खियों से भरी शामों को
अरब के रेगिस्तान, लेबनान की फलों से लदी घाटियां
और तुर्की के बंदरगाह दिए हैं।
अमेरिका के खेतों के फैलाव और रूस की खानों की गहराइयां दी हैं।
तुमने मेरी रातों के सपनों को व्यापकता दी है, मेरी किताबो।
उन्हें रोजी-रोटी, परिवार और नारी-शरीरों की परिधि से बाहर निकाला है।
तुम मेरे क्रूर परिवेश की कारा में बनी हुई वे खिड़कियां हो
कि जिनसे
बेहतर जिंदगी और आशा और विश्वास की पवित्र हवा
मुझ तक पहुंचती है
तुम वे द्रवण-नलियां हो, मेरी पुस्तको।
जिनसे तुम्हारे महान लेखकों की आत्माएं वास्पीभूत होकर
मेरी आत्मा के छुद्र पात्र में द्रवित हो जाती हैं,
और मैं उनकी सुगंध से परिपूर्ण हो उठता हूं।

यह कविता हिंदी के चर्चित और सोवियत नेहरू पुरस्कार प्राप्त कवि डा. रणजीत की है। यह रचना वर्ष १९८२ में पंडित जवाहर लाल नेहरू डिग्री कालेज बांदा (उत्तर प्रदेश) की वार्षिक पत्रिका विकल्प के पेज नंबर १० में छपी है। इसका पेज मेरे पास अभी तक है। न जाने क्यों यह कविता मुझे भाती है। मैं इसे सैकड़ों बार पढ़ने के बाद भी लगातार पढ़ता हूं। बाद में डा. रणजीत मित्रों की कतार में शामिल हो गए। कानपुर में हुए जनवादी लेखक संघ के पहले सम्मेलन में मैं उनके साथ गया। वहां से लौटने के बाद उन्हों जनवादी लेखक संघ के सचिव का दायित्व सौंपा। डा. रणजीत से बहुत कुछ सीखने को मिला। काफी समय तक संवादहीनता बनी रही। वह बांदा छोड़कर सीतापुर चले गए। मैं भी रोजी-रोटी की तलाश में शहर-दर-शहर बदलता रहा। बड़ी मुश्किल से उनका फोन नंबर मिला। बरेली के साथी विवेक सेंगर के माध्यम से। तब वर्ष २००६ में उनसे बात हो पाई।



टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरता चांद
चांद के टुकड़े-टुकड़े बटोर-बटोरकर प्रकृति के विरुद्ध रात को दिन और दिन को रात की तरह जीने की मिसालें दिसंबर ने साल २००५ में अजीब शक्ल में पेश की हैं। देह के साथ खेली जा रही तिजारत ने सूरज के उजाले में सवालों की सलाखें सभ्य समाज की पीठ में दाग दी हैं। लड़कियों के समलैंगिक विवाह ने आदम भूख की गढ़ी परिभाषाओं को तार-तार कर दिया है। मांसल आकर्षण का जुमला झूठा लगने लगा है। राजशक्ति, सत्ताशक्ति और धनशक्ति के सरमाएदार इससे भौचक्का हैं।
हाल ही में सुर्खियां बनीं घटनाओं ने आचार्य चतुरसेन शास्त्री के कृत वयं रछामः में वर्णित तरुण और तरुणी संवाद के संकेतों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। कथा सम्राट प्रेमचंद ने प्रतिग्या के पृष्ठ १३५ में लिखा है-स्त्री हारे दरजे की दुराचारिणी होती है। अपने सतीत्व से अधिक उसे संसार की और किसी वस्तु पर गर्व नहीं होता, न ही वह किसी चीज को इतना मूल्यवान समझती है। प्रेमचंद की प्रतिग्या की झलक इस्मत चुगताई की जब्तशुदा कहानी लिहाफ में मिलती है। इस समय समाजसुधारकों को जवाब देना चाहिए कि भारतीय समाज में ऐसे विवाह क्यों हो रहे हैं। समाज विग्यानियों को इस पर कोई ठोस राय देनी चाहिए।
इलाहाबाद के संगम में एक-दूसरे का वरण करने वाली कुलीन तबके की युवतियों ने लोक-लाज की परवाह न करते प्यार के अलावा स्त्री-पुरुष संबंधों से होने वाली संतुष्टि से इतर नए मौन संबंधों की स्थापना की है। ठीक इसके बाद पंजाब के अमृतसर से आई खबर ने तो और भी चौंका दिया। सहेलियों की शादी को पति बनी लड़की के घरवालों ने स्वीकार कर अदम्य साहस का परिचय दिया।
३० दिसंबर २००५ की आधी रात का वक्त, पंचकूला (हरियाणा)


पत्र-पत्रिकाओं की अकाल मौत
आज का परिवेश बिलकुल बदला हुआ है। पढ़ने को कुछ नहीं बचा है। जो बचा है, उससे भूख शांत नहीं हो पाती। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, बिलट्ज, सारिका, वामा, माधुरी, माया, दिनमान, रविवार, सत्यकथा, मनोहर कहानियां, चौथी दुनिया, संडे आब्जर्वर, प्रतिप&, असली भारत, अ&र भारत, आदि को बंद हुए लंबा अरसा गुजर गया है।
धर्मयुग को बंद हुए कितना लंबा समय गुजर गया है। बचपन में जगदीश भैया के घर से धर्मयुग लाकर पढ़ते थे। हर हफ्ते हर तरह की भूख शांत होती थी। धर्मवीर भारती के नेतृत्व में हर पन्ना चट कर जाते थे। धर्मयुग ( टाइम्स आफ इंडिया, मुंबई ) ने इस देश को कई बड़े नाम दिए हैं। इनमें से एसपी (सुरेंद्र प्रताप सिंह) इस समय हमारे बीच नहीं हैं। मुंबई से कोलकाता पहुंचकर उन्होंने रविवार के माध्यम से पत्रकारिता को जो दिया है, वह किसी से छुपा नहीं है। पंडित जी ( उदयन जी), राजेश रपिरया, कुरबान अली, संतोष भारतीय, राजीव शुक्ल, अनिल चमडिया, लल्लाजी आदि अनगिनत नाम हैं, जिन्होंने पूरे देश के पत्रकारिता जगत को प्रभावित किया है। विजय भास्कर तो बिहार में धूनी रमाए हैं। बहरहाल धर्मयुग की अलख अलग-अलग जगह जल रही है। बुंदेलखंड के महेश अवस्थी हमीरपुर में जमे हैं। नटवरलाल (राजू मिश्र ) लखनऊ के होकर रह गए हैं। नटवर की आदतें अब बदल गई हैं। चित्रकूट के टिल्लन रिछारिया अब एक चैनल में हैं।
साप्ताहिक हिंदुस्तान के ज्यादातर साथी हिंदुस्तान में देखने को मिल जाते हैं। इसकी कई कहानियां बहुत चरिचत हुई हैं। बिलटज तो अद्भुत अखबार था। बड़े-बड़े दिग्गज कांपते थे। इस अखबार ने अपने समय पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया है। उपेंद्र शुक्ल की एक खबर बांदा के पूरे पुलिस की नौकरी खा चुकी है। खबर थी हथकड़ी के साथ पुलिस लाइन से आदमी फरार। यह खबर घटना के डेढ़ माह बाद छपी थी। उन दिनों में बांदा में फरजी मुठभेड़ें होती थीं। इसके अलावा बांदा में पुलिस मध्ययुग के संपादक सुरेश गुप्त की हत्या कर चुकी थी। वह मामला भी गरमाया हुआ था। इसीलिए इस आदमी को पकड़ा गया था। इस अखबार ने आपातकाल के समय साईंबाबा को खबरें बनाकर अपना उल्लू सीधा किया। आरके (आरके करंजिया) की फौज और भी बहुत कुछ करती रही है।
सारिका कथा जगत की एकमात्र अच्छी पत्रिका रही है। उसका बंद होना मुझे लगातार खल रहा है। इसके कई अंक मैंने सहेज कर रखे हैं। जब कभी मन भटकता है तो उसकी कहानियां पढ़कर संतोष मिलता है। टुकड़ा-टुकड़ा संबंध-अनीता मनोचा की कहानी आते हुए लोग शीर्षक के तहत छपी थी। इस कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इस पत्रिका के बहुत से लेखक आज मेरे मित्र है। अनीता तब मेरठ में पढ़ती हैं। आजकल शायद आकाशवाणी में हैं। नवनीत मिश्र की कहानियां भी हलचल मचाती थीं। विजय किशोर मानव को गजलकार के रूप में सारिका ने ही स्थापित किया है। सारिका के विशेषांक बेहद लोकप्रिय हुए हैं। वामा मृणाल पांडे के नेतृत्व में अच्छी निकली थी। बाद में टाइम्स इंडिया इसे खा गया। यही हाल माधुरी का था। इसके संपादक विनोद तिवारी रहे हैं। यह फिल्म की बहुत साफ-सुथरी पत्रिका थी। इसे भी टाइम्स ने निगल लिया।
माया शुरू फिल्म से हुई बाद में राजनीतिक बन गई। इंदिरा गांधी हत्याकांड के समय इस पत्रिका ने गजब काम किया। तब यह साढ़े आठ लाख छपी। फोटोस्टेट बिकी। इस पत्रिका ने एक जोड़ी बनाई। अजय-अशोक। मध्यप्रदेश से स्वामी त्रिवेदी का काफी हल्ला हुआ करता था। इस जोड़ी का गजब का रुतबा रहा है। निशीथ जोशी, राजीव सक्सेना, आदि बहुत से नाम स्थापित हैं। इसके संपादक बाबूलाल जी अब एक सरकारी पत्रिका में हैं। सुरेश सिंह जी का अता-पता नहीं। पटना से विकास कुमार झा की स्टोरी भी चरचा में रहती थी। कैमूर की पहाडियों का राजा-मोहन बिंदु ऐसी ही आवरण कथा थी। बाद में मोहन बिंदु मार डाला गया। यह वीरप्पन या ददुआ से कम नहीं था।
दिनमान साप्ताहिक भी बहुत अच्छा होता था। जवाहर लाल कौल, त्रिलोक दीप, महेश्वर दयाल गंगवार, रामसेवक श्रीवास्तव, कन्हैया लाल नंदन आदि नाम अब भी जेहन में गूंजते हैं। इसमें हर बार अंतिम पन्ने में एक विदेशी रचनाकार की कविता अनूदित होकर छपती थी। उसका आज तक कोई मुकाबला नहीं हो पाया है। संयोग से मेरी पत्रकारिता की शुरुआत यहीं से एक फ्रीलांसर को तौर पर हुई। इसके बंद होने पर मुझे किसी प्रिय के निधन जैसी पीड़ा भुगतनी पड़ी है। और आज भी होती है। मित्र प्रकाशन की अपराध पत्रिताओं ने एक समय युवा पीढ़ी के दिलों में राज किया है।
साप्ताहिक चौथी दुनिया संतोष भारतीय के संपादकतत्व में निकला। इस अखबार के मालिक कमल मोरारका थे। इसका मकसद चंद्रशेखर जी को प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करना था। और वही हुआ । चंद्रशेखर को गद्दी मिलते ही यह अखबार बंद हो गया। तब संपादक सुधेंदु पटेल थे। वैसे इस अखबार ने उन लोगों को स्थापित किया है, जिन्हें वाकई मंच की जरूरत थी। उनमें एक नाम अरिवंद कुमार सिंह का है। भाई माफ करना। आप तो इस समय संपादक हैं। आप और हम एक जगह एक साथ छपते रहे हैं। वीरेंद्र सेंगर भी यहीं से स्थापित हुए हैं। इस समय कहां हैं, पता नहीं। अंबानी के संडे आब्जरवर को उदयन जी ने ही निकाला था। इरान-ईराक यद्ध के दौरान इस साप्ताहिक ने दैनिक की भूमिका निभाई, मौके से भेजी गई सईद नकवी की रपटों ने देश के मठाधीश अखबारों की बोलती बंद कर दी। प्रतिप& जार्ज और असली भारत चौधरी चरण सिंह का अखबार था। राजनीतिक मकसद के लिए निकाले गए और बंद हो गए। हालांकि इन्होंने भी नए लोगों को अच्छा मंच दिया। उनमें से कुछ नाम स्थापित हो चुके हैं। अजय सिंह तो वीपी के साथ मंत्री भी थे। जार्ज तो दिग्गज नेता हैं। अ&र भारत गांव की परिकल्पना को लेकर निकला गया था। जो अपने मकसद को पूरा करने से पहले बंद हो गया।
बहरहाल दोस्तो, एक अखबार या पत्रिका की मौत बहुत दुखद होती है।....उम्मीद है, अब किसी के सपने नहीं मरेंगे। अखबार और पत्रिकाएं बंद नहीं होंगी।

Book Information Number

मेरे प्रिय मित्र श्री शम्भु चौधरी ने एक नये प्रयास का श्रीगणेश आखिरकार कर ही दिया, जिसका भारतीय साहित्य जगत को वर्षों से इंतजार था, अब तक भारत में साहित्य प्रकाशन के लिये ISBN Code का सहारा लेना पड़ता था। जिसे श्री चौधरी ने 'BiN Code' से करारा जबाब दिया है। भले ही श्री चौधरी का यह प्रयास अभी ब्लॉग के माध्यम से ही क्यों न हो, और जैसा भी क्यों न हो , निश्चय ही भारतीय साहित्य जगत में नई हलचल तो पैदा करेगा ही। - प्रकाश चण्डालिया, कोलकाता


भारत में पुस्तक की जानकारी उपलब्ध कराने वाली कोई ऐसी एक संस्था काम नहीं कर रही जो, ISBN का विकल्प बन सके। कवि गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर की उस पंक्ती "एकला चलो रे" से मेरी बात को शुरू करता हूँ।'BiN' अर्थात एक सूचना केन्द्र जिस जगह, प्रकाशक का पता, इमेल पता. वेव साइट की जानकारी और फोन नम्बर की पूरी जानकारी के साथ-साथ पुस्तक का विवरण, लेखक नाम, पता, इमेल, वेवसाइट और फोन नम्बर के साथ ही प्रकाशित होने वाली, या हो चूकी पुस्तकों के बारे में 100 शब्दों के अंदर संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध कराई जायेगी। हमारा प्रयास भले ही छोटा हो, पर जो भी होगा वह अंतर्राष्ट्रीय मापदण्डों के अनुकूल ही नहीं उससे कहीं बेहतर होगा। भले ही अभी हम इसे ब्लॉग को माध्यम बनाकर शुरू कर रहें हैं, आगे चलकर इसके लिये ऑनलाइन वे तमाम सुविधा देने का प्रयास करेंगें जो इसके लिये जरूरी होगा। हमारा यह भी प्रयास रहेगा कि कि हम प्रत्येक पुस्तक का अलग से 'बार कोड' भी जारी करें। जिसका अलग से शुल्क लिया जायेगा। फिलहाल हम बार कोड के बारे में कोई अनुबंध नहीं कर पा रहें हैं, जैसे ही हम इस सुविधा को उपलब्ध कराने में सक्षम होंगे, इसकी सूचना आप तक पहुँचा दी जायेगी।


BiN जारी करने के लिये निम्न बातों की सूचना देनी जरूरी होगी।

21.8.08

बोलो रोज़गार गांरटी की जय...

पिछले दिनों राजस्थान जाने का अवसर प्राप्त हुआ। ये मेरा तीसरा ट्रीप था। लेकिन इस बार कोई सम्मेलन, सेमीनार या सिम्पोज़ियम नहीं बल्कि ‘सोशल ऑडिट (सामाजिक अंकेक्षण) का कार्यक्रम था। जिसका निमंत्रण ब्यावर शहर के ‘राष्ट्रीय युवा सम्मेलन’’ में ही मेरी नानी मतलब मैग्सेसे अवार्ड विजेता ‘अरूणा राय’ ने दे दिया था। ‘सोशल ऑडिट 'शब्द मेरे लिए बिल्कुल नया था। न जाने क्यूँ वहां जाने के प्रति मेरी उत्सुक्ता बढ़ती गई, बल्कि मैने अपने कई दोस्तों को साथ चलने का निमंत्रण तक दे डाला, पर कोई फायदा नहीं हुआ।
आखि़रकार बहुत सारी व्यस्तता के बावजूद देहरादून एक्सप्रेस से कोटा हाज़िर था। फिर वहां से झालावाड़ ज़िले के मनोहर थाना इलाके में जाने के लिए बस में सवार हो चला। राजस्थान के लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और पहाड़ों के मनोहर दृश्य मुझे सोचने को मजबूर कर रहे थे।
अब कुछ ही घंटों के बाद ‘हिन्दू राष्ट्र का हिन्दू गांव’ हमारा स्वागत कर रहा था।अब मैं मनोहर थाना के अग्रवाल धर्मशाला में था, जहां गांव के गरीब लोग व सामाजिक कार्यकर्ता बड़े ही निराले अंदाज में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट’ (नरेगा) के दो वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे थे। फिज़ा में ‘‘आपा! पंचायत में चलह..... बोलो रोज़गार गांरटी की जय...’’ की सदा गुंज रही थी।
दरअसल, गांवों में गरीबों की दयनीय दुर्दशा एक खुला सत्य है। सरकार द्वारा ‘इंडिया शाईनिंग’ की बात तो की जाती रही, लेकिन गांव में बसने वाले ‘भारतीयों’ के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया। ऐसे समय में जब किसान आत्महत्याएं कर रहे थे, नवजवान भूखमरी के शिकार हो रहे थे, तो एक ‘‘कानून’’ ने देश के इन सबसे गरीब व उपेक्षित लोगों के दिलों में उम्मीद की एक किरन जगाई और वो किरण है ‘एन।आर।ई।जी.ए.’ जिसे प्यार से लोग ‘नरेगा’ कहते हंै।अगर देखा जाए तो ‘रोज़गार गारंटी क़ानून’ की मांग लगातार अकाल से जूझते राजस्थान (जहां लगभग 94 फीसद जनसंख्या गांवों में रहती है) के जनसंगठनों ने ‘‘ हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम’’ नारे के ज़रिए उठाई और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। खैर, अब इस क़ानून को देश के लगभग सभी ज़िलों में लागू कर दिया गया है।ये बात सच है कि ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने के लिए पारित यह क़ानून अब तक ग्रामीण भारत की तस्वीर तो न बदल सकी, पर पंचायत के सरपंचों ने अपनी तक़दीर व तस्वीर ज़रूर बदल ली है। झालावाड़ में हुए इस ‘सोशल ऑडिट' द्वारा भ्रष्टाचार के बहुत सारे तत्व उजागर हुए। पहले तो सूचना देने में आनाकानी की गई, धरना दिए जाने पर दबाव में आकर आधी-अधूरी सूचना उपलब्ध कराई गई और फिर उन्हें लगा कि इस सूचना से भी हमारे बहुत सारे घोटाले उजागर हो सकते हैं तो ‘अभियान’ के लोगों को बुरी तरह से पीटकर गांव से भगाने की कवायद अपनाई गई। घोटाले हज़ारों में नहीं बल्कि लाखों व करोड़ों में थे।राजस्थान सरकार द्वारा झालावाड़ जिलें में लगभग सौ करोड़ रूपये खर्च किये जाने के बावजूद लोगों से जाब कार्ड बनाने हेतु 70 से 500 रूपये रिश्वत लिए गए। जातिगत भेदभाव काफी देखने को मिले। दलितों को यहां भी नज़र अंदाज़ किया गया। कहीं भी हो रहे कामों के बोर्ड देखने को नहीं मिले, मरे हुए लोग भी काम में लगे हुए हैं। मास्टर रोल में फर्जी नाम हैं, यहां तक कि मटकियों को खरीदनें में भी घोटाला किया गया, बल्कि सच पूछें तो कहीं भी मटकीयां थी ही नहीं। कराए गए कामों की गुणवत्ता ऐसी थी कि उंगली लगाने मात्र से सिमेंट गिर जाए। यही नहीं, गांवों में कई कच्चे चेकडेम बने, पर अधिकांश चोरी हो गए हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक ही जगह तीन-तीन तालाब खोदे गए और तालाब के नाम पर पेड़ तक काटना मुनासिब समझा गया।लेकिन ये बात भी सच है कि लोगों को काफी काम भी मिला है। कुछ हद तक बेरोज़गारी कम हुई है। गांव से पलायन रूकी है। मजदूरी की रेट बढ़ी है। ब्लाॅक आॅफिस से मिली जानकारी के अनुसार अप्रैल-दिसम्बर 2007 में मनोहर थाना में 39,532 लोगों को जाॅब कार्ड जारी किए गए, जिनमें 65 फीसद महिलाएं है, यानी महिलाओं की भी भगीदारी बढ़ी है। यही नहीं 26 फीसद परिवारों को 100 दिन काम भी मिले। और अब डाकघर व बैंकों में इनके खाते खुल जाने पर बिचैलिए द्वारा पैसा हड़प लेने का मामला भी खत्म हो सकेगा।ऐसे में यह कानून गरीबी हटाने, अपने गांव की विकास और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए एक जीवदान है। बस जरूरत इस बात की है कि हकों को हासिल करने के लिए जन-निगरानी को लामबन्दी के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करें। जन नियंत्रण के ऐसे संघर्षो के जरिए भ्रष्टाचार से लड़ना एक प्रबंधकीय’ प्रक्रिया की बजाय, एक ‘राजनीतिक’ प्रक्रिया का अंग हो सकता है ताकि ‘नरेगा’ सच में ग्रामीण भारत में गरीबी सांमतवाद और शोषण से लड़ने के एक साधन के रूप में विकसित हो।

पत्रकारिता झारखण्ड से

गए हफ्ते झारखण्ड सुर्खियों में रहा। खबरिया चैनल के सारे पत्रकार अचानक व्यस्त हो गए। किसी-किसी चैनल के रिपोर्टर २५-२५ फोनों करते पाए गए। चलिए अच्छा लगा कुछ तो हो रहा है । लेकिन ख़बर कुछ और है । ख़बर लेने के पीछे जो गला काट प्रतियोगिता हुई वो बड़ा मजेदार रहा। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के पत्रकार के बीच हाथा पाई तक की नौबत आगई। कुछ लोग अपने फोनों में शिबू सोरेन को गुरूजी कह कर संबोधित कर रहे थे । जहाँ तक मेरी समझ है पत्रकारिता में किसी को विशेषण से संबोधित नही करनी चाहिये । कुछ लोंगो को तो झारखण्ड विधान सभा की सीटों की गिनती नही पता है वो यहाँ एक राष्ट्रीय चैनल के व्यूरो हेड हैं । उदहारण तो कई हैं। सोचने वाली बात है की लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ किनके कर कमलों में है??
दुष्यंतजी के शब्दों में :
जितना सोचा था ज्यादा निकला
जिसकी उठाई पूँछ वो मादा निकला
जय भड़ास

20.8.08

जाने कहां गए वो दिन

रफी के नगमे सुन बीता मुशर्रफ का पहला दिन।
और करते भी क्या जनाब जाने कहां गए वो दिन।।
कहते हैं कि मैं परवाज नहीं जो देश छोड़ दूं।
तो फिर क्या सारे पंछी पड़ोसी मुल्क से खदेड़ दूं।।

सुनो या फिर विचार भी करो

सुनो या फिर विचार भी करो
ये चुनाव की बेला है। आप अगर राजस्थान के वासी है तो कान, नाक, गला बंद कर ले। ये आलेख आपके लिए नही है। दरसअल जहाँ चुनाव होते है. वहां इन तीनो का काम नही होता। चुनावों के मौसम में जो सुनना चाहते है वो सुनाई तो देता है। लेकिन वैसा होता नही है। सिर्फ़ बातों से ही कम चला है। घोषनाओ की बयार शुरू हो चुकी है। ये भी और वो भी सभी बस बात करेंगे। किसी की सुनो उससे पहेले सोचना, विचारना कि पहले जो बोला वो मिला क्या? शायद नही। फिर अब क्या करेंगे? सुना है इस बार फूल और हाथ के साथ हाथी भी होगा। उनका पुराना वायदा नही है। फिर भी सोचना होगा कि उन्होंने पहले क्या किया है। जन्हा रहे वहा क्या हाल है। सोचने कि बातें बहुत है।
अगर आपको इस मुद्दे पर बहस रास आती है तों फिर बात करेंगे।

कवि का ह्रदय सरल होता है

कवि का ह्रदय सरल होता है,
भीतर मगर गरल होता है।
अंतस में हिम पर्वत के यारो,
पावन गंगा जल होता है।
साहस के तेवर के आगे,
हर मुश्किल का हल होता है।
स्याह अँधेरी रात के ढलते,
यार सुनहरा कल होता है।
तख्त-ताज को ख़ाक बनादे,
बहुत बुरा ये छल होता है।
दुनिया के जंगल में केवल,
माँ का ही संबल होता है।
मकबूल.

तोरी मरजी है क्या बता दे बिधना रे...

मशहूर पत्रकार, ब्लागर और अब फिल्म निर्देशक पंकज शुक्ल इन दिनों अपनी फिल्म भोले शंकर के निर्माण के बारे में अपना पूरा अनुभव अपने एक नए ब्लाग क़ासिद पर लिख रहे हैं। उन्होंने एक मेल के जरिए अनुरोध किया....बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म भोले शंकर की मेकिंग इन दिनों मैं अपने ब्लॉग पर लिख रहा हूं, कृपया सुझावों और टिप्पणियों से अवगत कराएं। तो मैंने सोचा कि मैं अकेले क्यों सुझाव और टिप्पणियां दूं, क्यों न सारे भड़ासियों को इस शुभ काम में शामिल किया जाए। इसी उद्देश्य से पंकज के ब्लाग क़ासिद से साभार एक पोस्ट यहां डाल रहा हूं और आप सभी से उम्मीद करता हूं कि पंकज भाई के ब्लाग क़ासिद पर जाकर उनके अनुभवों से दो चार हों।
यहां यह बता दें कि पंकज भाई अपने जैसे ही सामान्य परिवार और ठेठ हिंदी पृष्ठभूमि के साथी हैं। आज वो जहां पर हैं, उसमें किसी गाडफादर का कोई हाथ नहीं है। वे सिर्फ अपनी प्रतिभा और अपने दम पर आगे बढ़ते चले गए। उनसे हम सभी को प्रेरणा मिलती है।
बरेली में अमर उजाला से करियर की शुरुआत की और पत्रकारिता में अपने मेहनत के बल पर धीरे-धीरे बढ़ते चले गए। वे अमर उजाला, कानपुर में भी रहे। इसके बाद दिल्ली आए। प्रिंट से इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर मुखातिब हो गए उसके बाद मीडिया की दुनिया को छोड़कर मायानगरी की ट्रेन पकड़ ली। वहां फिल्म बनाने का जो सपना देखा था, उसे उन्होंने अपनी प्रतिभा, अपने संघर्ष और एक जूनून के जरिए पूरा कर दिखाया। भोले शंकर फिल्म की रिलीज का इंतजार हम सभी भड़ासियों को है। इस फिल्म के पांच सौ टिकट तो हम भड़ासी खरीदेंगे ही।
पंकज भाई से बस एक अनुरोध है कि अगर अगली फिल्म कोई प्लान कर रहें हों तो उसमें मुझे और डा. रूपेश श्रीवास्तव को विलेन और उसके गैंग का रोल जरूर दे दें वरना....जानी, हम भड़ासी बड़े खूंखार और बदनाम लोग हैं। हम पत्थर से तेल और तेल से पत्थर निकालना जानते हैं.....:)
-यशवंत
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भोले शंकर (7)
गतांक से आगे..



मनोज तिवारी ने "भोले शंकर" में कुछ और भी बहुत उम्दा गीत गाए हैं। लेकिन, मनोज तिवारी और मोनालिसा पर फिल्माया गया रोमांटिक गीत - "केहू सपना में अचके जगा के" प्यार में खोए प्रेमियों के लिए सावन की फुहारें लेकर आएगा। और, इस गीत में मनोज तिवारी के लिए अपनी आवाज़ दी है मशहूर गायक उदित नारायण ने। अगर फिल्म में मेरे फेवरिट गाने की बात करें तो मुझे पसंद है फिल्म का वो विरह गाना जो पूनम ने गाया है।

सारेगामापा फाइनलिस्ट रहीं पूनम की निज़ी ज़िंदगी के बारे में सुनकर मैंने अपनी पत्नी को कई बार घर में रोते देखा है। पूनम को प्लेबैक सिंगिंग के लिए कई लोगों ने वादे किए, लेकिन कितने पूरे हुए, इस बारे में ना तो कभी ज़ी टीवी ने कुछ भी बताने की कोशिश की और ना ही कभी मीडिया में कहीं कोई चर्चा सुनाई दी। पूनम का आवाज़ में दर्द बहुत है, कुछ तो जीवन के संघर्ष का और कुछ उसकी आवाज़ पर ऋचा शर्मा का असर का। "भोले शंकर" के संगीत पर चर्चा के दौरान ही मैंने पूनम का नाम उस गाने के लिए संगीतकार धनंजय मिश्रा को सुझाया, जो फिल्म का टर्निंग प्वाइंट है। भोले की बचपन की दोस्त पारवती की पूरी जवानी की कहानी इस गाने में दूसरे सिरे पर पहुंच जाती है। पूनम की गायिकी के बारे में बात करने से पहले कुछ बातें इस गीत को लिखने के बारे में भी बताता चलूं।

गीतकार बिपिन बहार ने जितनी मेहनत फिल्म के ओपनिंग सॉन्ग "रे बौराई चंचल किरनिया" के लिए की है, उससे कम मेहनत इस गाने के लिए भी नहीं हुई। मैंने बिपिन को समझाना शुरू किया। धनंजय मेरा मुंह ताक रहे हैं। मैंने बिपिन को बताया, "पारवती ने बस अभी अभी भोले को बरसों बाद देखा है। भोले बचपन में शहर जाते समय लड़कई में उससे बोले जाता है, "ए पारवती, जब हम पढ़ लिख लेम, त तोहरा से बियाह करब"। बस पारवती उसी दिन से भोले की याद में गुम है। भोले लौटता है, तो पारवती के घर पर उसकी शादी कहीं और किए जाने की बात चल रही है। दोनों संस्कारी घरों से हैं और जैसा कि अक्सर गांवों में होता है, दोनों में से कोई घरवालों का विरोध नहीं कर पाते। पारवती की शादी तय हो चुकी है। वो रात के अंधेरे में भगवान से अपने दिल का दर्द सुना रही है। गाने का ये पहला हिस्सा है। दूसरे हिस्से में आते आते हमें पारवती की शादी होते हुए दिखानी है। और तीसरे हिस्से में हमें पारवती की विदाई दिखानी है। शॉट कुछ यूं होगा कि कैमरा गांव से बाहर निकलती डोली को कैच करता है, उसे फॉलो करते हुए आगे बढ़ता है और जैसे ही डोली फ्रेम से आउट होती है, कैमरा पैन करते हुए दूर एक टीले पर खड़े भोले को कैच करता है। भोले वहां पारवती को दिलासा देने वाला गाना गा रहा है।

"बिपिन बहार पूरा नरेशन सुनने के बाद आधा घंटा तक कुछ बोले नहीं। फिर बोले, "भइया, इ कइसन होई।" मैंने कहा, "काहे ना होई।" मैंने पूरे गाने का स्टोरी बोर्ड बिपिन को फिर से समझाया। इस बार एक एक एक्शन और उसके भाव के साथ में। अब तक शांत बैठे रहे धनंजय मिश्रा के चेहरे के भाव इस बार बदलने लगे। उनके हाथों में जुंबिश हुई और मुंह से कुछ राग निकले, और साथ ही निकला गाने का पहला बोल- "तोरी मरजी है क्या, बता दे बिधना रे...., काहे मोरा पिया ना मिला...ना मिला रे...काहे मोरा पिया ना मिला।" बस इसके बाद तो जैसे बिपिन बहार को राह मिल गई। भाई ने तीन दिन में गाना लिख डाला। लेकिन आखिरी हिस्से पर आकर वो अब भी अटके हुए थे। बोले, "भइया इ बताइं, भोले को पारवती से प्यार था कि नहीं।" मैंने कहा, "जिस उमर में हमने भोले और पारवती को साथ खेलते दिखाया। उस उमर में बच्चे प्यार का मतलब समझते हैं क्या? गांव की लड़की है, बस किसी सयाने पर दिल हार बैठी। लेकिन भोले को इसका इल्म तक नहीं। हां, मां कुछ इशारा करती है तो बात उसकी समझ में आती है। लेकिन तब तक देर हो चुकी है। तो भोले क्या गाएगा?" बिपिन बहार फिर चुप, "भोले क्या गाएगा?"दो दिन तक माथा पच्ची चलती रही। और फिर निकले बोल- "किस्मत ना बा अपना हाथ में, खुश रहे तू सजनवा के साथ में।"

मनोज तिवारी वैसे तो उछल कूद वाले गाने ही खूब गाते हैं, लेकिन फिल्म में मैंने उनसे दो जगह दर्द भरे नगमे गवाए हैं। पहला तो ये और दूसरा जब वो मुंबई में होते हैं और ज़िंदगी के सबसे बड़े इम्तिहान से दो चार होते हैं। और मेरा वादा है कि मनोज तिवारी की आवाज़ का इतना बेहतरीन इस्तेमाल अभी तक उनकी किसी फिल्म में नहीं हुआ है। जिस गाने की ऊपर हम बात कर रहे हैं, उसकी शुरुआत पूनम के गाने से होती है। लखनऊ की इस लड़की को अपनी फिल्म में मौका देकर एक तरह से मैंने और धनंजय ने उत्तर प्रदेश के कलाकारों को बढ़ावा देने की अपनी अघोषित नीति को आगे बढ़ाया और पूनम ने भी अपना दिल उड़ेल कर रखा दिया है इस गाने में। गाने के बोल बहुत मार्मिक हैं और इतना ही मार्मिक है इसका पिक्चराइजेशन। पूनम तुम यूं ही जगमगाती रहो।

वैसे एक दिलचस्प बात भी आपको मैं बताना चाहता हूं। जैसा कि गांव- गलियों की लड़कियों के साथ अक्सर होता है, वैसे ही पूनम भी अब तक मुंबई की चकाचौंध देखकर घबरा जाती हैं। स्टूडियो में रिकॉर्डिंग की बात चलते ही नर्वस हो जाती हैं। ऐसे में संगीतकार के हाथ पांव फूलने ही लगते हैं। मैंने दोनों को हिम्मत बंधाई और तब जाकर ये गाना रिकॉर्ड हुआ। मौली और उज्जयनी की बात अब भी रह गई, खैर इन दोनों नगीनों की बात कल पक्की रही।

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक-भोले शंकर

(साभार-पंकज शुक्ल के ब्लाग क़ासिद से)

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19.8.08

हार के बाद भी जीत का मजा

आइये जीत का जश्न मनाते हैं. क्या कहा कहाँ जीते? किसमें जीते? नहीं पता? अरे ओलम्पिक में हमारे मुक्केबाज़ ने कितना संघर्ष किया, क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को 147 रन बनाने में 2 खिलाडी आउट कर दिए, कई और खिलाडी ओलम्पिक में अपना संघर्ष जारी रखे हैं. क्या ये सब खुशी मनाने का, जश्न मनाने का मौका नहीं है? हम लोगों के लिए कितने फक्र की बात है कि अरब की जनसंख्या को छूने वाले देश में खिलाड़ियों की कुल 56 की संख्या ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई कर पाती है, इस संख्या में से भी एक पदक हमारे हिस्से में आता है. किसी और पदक की चाह में जब हम रहते हैं और हार जाते हैं तो कहते हैं कि ये हमारे लिए किसी जीत से कम नहीं है क्योंकि हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाडी से हारे हैं. क्या ये सफाई हर बार ठीक लगती है?
कई बार हमसे छोटे देश जो संसाधनों में हमसे बहुत पीछे हैं, सुविधाओं में बहुत पीछे हैं वे भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शन करते हैं। याद करिए सूरीनाम का तैराक....... हम भारतीय एक बात तो भली-भांति सीख गए हैं कोई भी घटना हो जाए, दुर्घटना हो जाए किसी और पर दोष मढ़ दो बस बात ख़तम। इसका उदहारण देने की जरूरत नहीं क्योंकि ये सभी को मालूम है. लगा कि हम कितनी आसानी से हारना भी जानते हैं और हार पर अपनी प्रतिक्रिया भी देना जानते हैं. ऐसे तो खेलों का क्या किसी भी स्थिति का भला नहीं होने वाला.
यही कारण है कि देश में आतंकवाद, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, हिंसा, क्षेत्रवाद, जातिवाद अपने चरम पर है।जब तक सुधार की गुन्जाईस नहीं दिखती तब तक हम ये तो कह ही सकते हैं कि इन स्थितियों में भी देशवासियों की ज़िंदा रहने की ताकत किसी जीत से कम नहीं है. इन बातों के साथ-साथ दुआ करें कि शायद ओलम्पिक ख़तम होते-होते एक-दो पदक (दो शायद ज्यादा हो गया) और देश के हिस्से में आ जाएँ. खाली दुआ करें, यज्ञ, हवन न करने लगियेगा क्योंकि इस देश में ये भी बहुत जल्दी होता है और हरेक काम के लिए.
(अब ये न कहना की ये सब चलता है, यदि यही चलता है तो रोना किस बात का और नहीं चलता है तो ये चलना बंद कब होगा?)

यह 'आलोक' जिलाए रखना

भारतीय प्रजा-तंत्र की सबसे बड़ी विडंबना और दुर्भाग्य रहा है कि इसमें प्रजा हमेशा ठगती रही है। जैसा तथाकथित तंत्र ने चाहा, वैसा उसे मुड़ना पड़ा, झुकना पड़ा और चलना पड़ा। गोया सफेदपोश और लालफीताशाही के लिए ’तंत्र‘ कोई ’तांत्रिक क्रियाओं-सा‘ काम कर रहा हो। यानी मुर्दों-सरीखी जनता वैसे ही क्रिया-कलाप करेगी, वही बोलेगी, वही सुनेगी....जैसा यह दोनों तांत्रिक चाहते हैं। इसे प्रजा-तंत्र की कमजोरी कहें या बदकिस्मती....दोनों ही अपने मूल काम के उलट भूमिका निभा रहे हैं। प्रजा से तंत्र बना है और इसकी स्वतंत्रता प्रजातंत्र की मजबूती का आधार है, लेकिन स्थितियां और परिस्थितियाँ निरंतर विलोमगामी होती जा रही हैं। तंत्र जितना पुख्ता हो रहा है, प्रजा उतनी ही निःसहाय या कहें डरपोक होती जा रही है। प्रजा-तंत्र जैसे राजनीतिज्ञों और प्रशासकों के लिए महज कठपुतली बनकर रह गया है। लोकतंत्र के सजग प्रहरियों में शुमार आलोक तोमर ने क्या किया, क्यों किया, उनकी मंशा क्या थी...यह सभी सवाल अब इसलिए भी बेमानी हो जाते हैं कि क्योंकि उन्होंने जिस जुर्म की सजा भोगी है, वैसा ‘पाप‘ हर शहर, हर मोहल्ले और हर घर में रोज किसी न किसी रूप में हो रहा है। जिन्हें आलोक का ’पाप‘ नहीं मालूम, उन्हें बताना जरूरी है कि इन पर आरोप है कि इन्होंने अपने संपादन में निकलने वाली एक पत्रिका में डेनिश कार्टूनिस्ट का एक कार्टून प्रकाशित किया था। इस कार्टून को एक धर्म विशेष की भावनाओं को आहत करने वाला निरूपित किया गया था। सवाल इस बात का नहीं है कि ऐसे कृत्य के लिए क्या सजा होनी चाहिए, मुद्दा यह है कि आलोक तोमर के ’कथित पाप‘ को ’महापाप‘ में परिवर्तित करने तंत्र का जिस ढंग से 'यूज' किया गया, उसे क्या माना जाए? क्या धर्म को मुद्दा बनाकर अपनी खुन्नस निकालना अधर्म नहीं?
मैं आलोक का पक्षधर नहीं, लेकिन अगर हम आलोक को सिर्फ एक आम भारतीय के रूप में देखें, तो क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि भले ही हम उनके लिए कुछ न कर सकें, तो कमस्कम अपना मुंह तो खोलें, कुछ शब्द तो बोलें। स्वार्थ का यह आलम प्रजा और तंत्र दोनों के लिए घातक है। वे लोग जो लोकतंत्र के रहनुमा होने का अलाप करते-फिरते हैं, क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि अधिक न सही ऐसे दूषित तंत्र के खिलाफ अपनी कलम तो चलाएं?

जिन्दगी जिंदादिली का नाम है
मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं
  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

पब्लिक का क्या होगा भाई

गुरूजी अपने चेले कोडा से नाराज़ होकर समर्थन ले चुके हैं । झारखण्ड सरकार अल्पमत में है। सरकार रहेगी या जायेगी यह तय नही है , लेकिन आठ सालो में राज्य की जनता के नाम पर यहाँ के नेता क्या गुल खिला रहे हैं किसी से नहीं छुपा । जनता न तो मधु कोडा को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी और न ही शिबू सोरेन को ही उसने चुना है । फिर भी ये नेता किस मुँह से अपने हरेक फैसले को जनता का फैसला कहते हैं । आठ सालो पहले जब बिहार से अलग झारखण्ड बना तो लोगो को लगा बिकास की गंगा बहेगी । पर बिकास पब्लिक का नहीं नेताओ और मंत्रिओं का ही हुआ । यही नहीं आदिवासी तो और भी गरीब हुए हैं । जिनके नाम पर सारी राजनीती होती है ।

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है.......

काज का तूफ़ान है की थमने का नाम नही ले रहा है, और इसी रोजी रोटी के लिए यदा कदा यहाँ वहां भटकता रहता हूँ। अभी हप्ते दिन पहले की बात है मैं दिल्ली में था और रोज ही नोएडा के फेस टू तक का सफर दक्षिण दिल्ली से कर रहा था कारण वो ही कि पापी पेट का सवाल है।

नॉएडा का फेस टू ओद्योगिक इलाका है चारो तरफ़ फैक्ट्री हि फैक्ट्री और इनके साथ लगे दीवालों के नीचे इनमें काम करने वाले मजदूर और उनका परिवार। मैं रोज ही संध्या काल में कार्यालय से बाहर आता सुट्टा के बहाने और रोज ही इस छोटे बच्चे से मिलता। आप भी देखें.....


पढने की ललक , सुविधा का आभाव चलो दिन के उजाले में पढ़ लें...........

आप जानना चाहेंगे की ये मासूम कौन है तो बताता चलूँ की नॉएडा के ही फक्ट्रियों में काम कर रहे मजदुर के बच्चे हैं, रहने को न छत, पहने को न कपड़े, खाना पता नही ये क्या खाते हैं मगर पढने की ललक को देख कर कुछ कर गुजरने की तमन्ना जरूर दिखती है.

आशियाना आसमान से ऊपर

ये है इस मासूम का ठिकाना जहाँ घर के नाम पर ये चंद पोलीथिन के छत खेलने के लिए सड़क और पढने के लिए सड़क के साथ सूर्य भगवान् की कृपा, अगर बारिश तो इस बेचारे का पढने का हर्जा होना।

सरकार के बाल विकास और बाल शिक्षा की पोल खोलती ये तस्वीर ही बयां करती है की हमारे कार्यक्रम किस प्रकार नेता और समबन्धित अधिकारी से होते हुए मीडिया का जेब गर्म करते हुए अपने मुकाम तक पहूंचता है यानी की वार्षिक रिपोर्ट योजना के सफलतम होने की घोषणा के साथ ही, मगर मेरा ये छुटकू अपने अधिकारों से अनजान अपनी जद्दोजहद इस सड़क की चटाई पर सूर्य की रोशिनी में जारी रखे हुए है,

क्या इस तरह से युद्ध जीतने वाले योद्धा पर सरकार को गर्व करने का हक है?

इस तरह से अपने मुकाम पाने वाले वीरों पर देश की जानता कैसे अपना अधिकार बता सकती है।

जय जय भड़ास।


18.8.08

अपनी नहीं पाकिस्तान की चिंता

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के आज इस्तीफा देते ही पाकिस्तान में प्रतिक्रियाओं का आना स्वाभाविक था किंतु भारत देश में उससे ज्यादा मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रहीं हैं. मीडिया में तमाम स्वयम्भू जानकार जो ख़ुद को मीडिया के द्वारा भारत-पाक संबंधों का जानकार घोषित करवा रहे हैं, मुशर्रफ़ के इस्तीफे पर अपनी राय प्रकट कर रहे हैं. मीडिया में लोगों की चिंता अब पाकिस्तान में स्थिर सरकार, स्थिर लोकतंत्र की स्थापना को लेकर दिख रही थी. कितनी हास्यास्पद स्थिति है की जिस देश में अपना लोकतंत्र, अपनी सरकारें स्थिर नहीं दिख रहीं हैं, जहाँ के हालात ख़ुद बेकाबू हैं (जी हाँ मैं अपने भारत देश की ही चर्चा कर रहा हूँ) वो अपने पड़ोसी के लोकतंत्र के लिए चिंता कर रहा है.
ये बात एकदम सही है कि कोई भी स्थिति हो देश हो, समाज हो, मोहल्ला हो, सफर हो, मनोरंजन हो सभी में पड़ोसी का विशेष महत्त्व है। यहाँ देश के पड़ोसी की अपनी महत्ता है क्योंकि उसको किसी भी स्थिति में बदला नहीं जा सकता है किंतु इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि अपनी स्थिति की चिंता किए बगैर अपने पड़ोसी की चिंता में लग जाया जाए.
बहरहाल अपने देश के हालातों पर एक नज़र भर क्योंकि वास्तविकता से आप सब भी परिचित हैं।
1- केन्द्र सरकार मंहगाई को रोक नहीं पा रही है।
2- जम्मू में स्थिति अभी भी शांत नहीं हैं। वैसे शांत रहे ही कब?
3- झारखण्ड का राजनैतिक संकट बरकरार है। मुम्बई में उत्तर वालों पर अभी भी हमले हो रहे हैं.
4- बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि अनेक राज्यों में आपराधिक घटनाएँ लगातार घटने के स्थान पर बढ़ ही रहीं हैं।
5- बमों के धमाके हमेशा होते रहने की नियति बन चुकी है। आदि-आदि-आदि-आदि....................

ये उदहारण कुछ एक हैं। इन्हें निपटाने का कोई हल नहीं निकाला जा रहा है और चिंता की जा रही है पाकिस्तान की. ठीक है पड़ोसी की भी चिंता की जाए पर क्या उस पड़ोसी की जिसने हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत को खून के आंसू दिए हैं? हो सकता है जो आजादी के पूर्व पाकिस्तान में रह रहे थे और हालातों के चलते यहाँ आ गए उनका पाकिस्तान से मोह तो समझा जा सकता है पर क्या हालत कुछ सीखने को नहीं कहती? फ़िर भी आए दिन पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाई जाती रहती है. अब हालातों को समझ कर वोट बैंक का मोह छोड़ कर वास्तविकता को समझना होगा. पाकिस्तान में शासक कोई भी आए उसकी सत्ता तब तक फलीभूत है जब तक वह भारत विरोध करता है. इसके ठीक उलट यहाँ उसी को वोट मिलने की अधिक उम्मीद रहती है जो पाकिस्तान प्रेम की बात करता है. वाह रे देश, वाह रे सरकारें, वाह रे जानकार, वाह रे नेताओं, वाह रे वोट बैंक लोलुप, वाह से शान्ति समर्थक........... वाह-वाह....... एक तरफ़ विरोध, एक तरफ़ प्रेम.

आखिर जमीन का एक कतरा ही तो है

छोटी-छोटी बातों पर बयान जारी करने वाले हमारे नेता जम्मू-कश्मीर के हालात पर मौन हैं। जबकि, बात यहां तक आ पहुंची है कि श्रीनगर में हमारे राष्ट ्रीय ध्वज का अपमान किया जा रहा है। वहां की इमारतों पर पाकिस्तान का झंडा लहराया जा रहा है। तुष्टि करण की राजनीति का शिकार देश के नेता इस मसले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है उनके मुंह से निकले कुछ शब्द उनके वोट बैंक में सेंधमारी का कारण न बन जाएं। जबकि, जम्मू के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। जमीन के एक टुकड़े के लिए दो संप्रदायों के लोग आमने-सामने हैं। मीडिया में आ रही खबरों में साफ दिखाई दे रहा है कि वहां का आम आदमी इस दिनों किन हालात में जी रहा होगा। भूमि हस्तांतरण मुद् दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेेंकी जा रही हैं। आम आदमी को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मुद् दे की आड़ में उन तमाम बातों को अंतरराष्ट ्रीय मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिनकी कोशिश पहले भी कई बार होती रही हैं। बात साफ है अलगावादी लोग इस बात को उछालना चाहते हैं कि कश्मीर में मुसलमान खुश नहीं हैं, उन पर अत्याचार हो रहे हैं। दूसरा, वे कश्मीर के सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक ताने-बाने को एक पंथीय रूप देना चाहते हैं। कश्मीर के लोगों को भी इस देश केप्रत्येक नागरिक की तरह वे सभी अधिकार प्राप्त हैं, जो भारतीय संविधान में दर्ज हैं। लेकिन, कुछ अलगाववादी लोग धर्म की आड़ लेकर वहां की जनता को बहका रहे हैं। उनका एक ही मकसद है, भारत की अंखडता को छिन्न-भिन्न करना। वे नहीं चाहते की इस देश में एकता कायम रहे।
मेरा मानना है कि इस मुद् दे पर देश के बौद्धिक वर्ग को आगे आकर पहल करनी चाहिए। हिंदू-मुसलमान भाईचारे को कायम रखते हुए दोनों सुमदाय केलोगों को मिलजुलकर विवाद को सुलझाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर आज नहीं, आजादी केबाद से ही जल रहा है। इसका स्थायी समाधान है, लेकिन राजनैतिक लोगों से इसकी अपेक्षा करनी बेमानी है। योंकि अगर जम्मू-कश्मीर और वर्तमान भूमि हस्तांतरण जैसे मुद् दे समय पर सुलझा लिए गए, तो कई राजनेताआें की दुकाने बंद हो जाएंगी।
दूसरा राष्ट ्रीय स्वाभिमान के प्रतीक तिरंगे का अपमान करने वाले को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वह किसी समुदाया का यों न हो। इसी तिरंगे की आन बचाने को हमारे फौजी आए दिन सीने पर गोलियां खाते हैं। लेकिन, तिरंगे को जमीन पर तक नहीं गिरने देते। फिर यह बात कैसे बर्दाश्त किया जा सकत है कि कोई इसी देश में रहते हुए देश के झंडे को जलाए। मुजफ्फराबाद रैली के दौरान और आगे-पीछे भी जम्मू-कश्मीर पर देश की जनता ने टीवी और समाचारों पत्रों में तिरंगे को जलाने की तस्वीरें साफ देखीं। उनकी मुठि् ठयां भिंच गइंर्। लेकिन, वे चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। योंकि यह खेल आम आदमी की पहुंच से बाहर है। देश का आम आदमी खिन्न है, वह धरना-प्रदर्शन तो कर सकता है, चिल्ला सकता है, लेकिन उसके हाथ में वह ताकत नहीं है, जो सीधे तौर पर ऐसे लोगों को मुंहताे़ड जवाब दे।

भ्रष्टाचार

फैल रहा है देश में कैसा भ्रष्टाचार
देख रहे हैं सब खड़े बेबस और लाचार
बेबस और लाचार अगर कोई न चेता
खा जायेंगे बेच इसे आगे ये नेता
कैसी त्रासदी देश हमारा झेल रहा है
भ्रष्टाचार बन ज़हर रगों में फैल रहा है

मेरा भारत महान

15 अगस्त की खुशी मना कर लौटा, मन में उमंग,हर्ष की अनुभूति अपनेआप ही होने लगती है. अब भी तिरंगे को सलामी देते समय बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं जब स्कूल में तिरंगे की तरफ़ देखते हुए सलामी को उठते नन्हे हाथ लरजते थे, मन में अजब सी अनुभूति होती थी, देह का एक-एक रोयाँ खडा हो जाता था. इसके ठीक उलट अब तिरंगे को फहराने की रस्म अदायगी की जाने लगी है. न स्कूलों में कोई कार्यक्रम, न खेलकूद न देशभक्ति भरे गीत. अब जो थोड़े से कार्यक्रम कहीं होते भी हैं तो उनमें बच्चे फिल्मी गीतों पर ठुमका लगाते दीखते हैं.
बच्चों का क्या कहें बड़ों की स्थिति भी प्रशंसनीय नहीं है। हमारे आसपास रोज़ ही लड़ाई-झगडे देखने को मिलते हैं. देश को तोड़ने की साजिश होती दिखती है. ऐसा ही कुछ 15 अगस्त के समारोह के बाद देखने-सुनने को मिला. मन ख़राब हुआ और आज बैठे-बैठे बहुत पुरानी अपनी एक कविता याद आ गई "मेरा भारत महान" आपको भी उसे बताते चलें. शायद..................

सालों पहले देखा
सपना एक
भारत महान का।
आलम था बस
इंसानियत, मानवता का।
सपने के बाहर
मंजर बहुत अलग था,
बिखरा पडा था.......
टूटा पडा था......
सपना.......
भारत महान का।
चल रही थी, आंधी एक
आतंक भरी
हर नदी दिखती थी
खून से भीगी भरी,
न था पीने को पानी
हर तरफ़ बस
खून ही खून।
लाशों के ढेर पर..........
पडा लहुलुहान.....
कब संभलेगा......
मेरा भारत महान!!!

17.8.08

मुस्लिम समाज में परिवर्तन....

' परिवर्तन संसार का नियम है। इसी नियम के तहत आज सब कुछ बदल रहा है। पहले जहाँ औरतें अपने अन्डर-गारमेंट्स खुले धुप में सुखाने में भी शर्माती थी, वहीँ आज ये बाज़ार में खुलेआम नज़र आते हैं....... मुस्लिम समाज भी अब परदे से बाहर निकल रही है....... तुम्हारे यहाँ तो मौल्वियो का दबदबा है.......... बात बात पर फतवे जारी कर दिए जाते हैं............. हर काम पर पर रोक लगा दी जाती है.......... यहाँ मत जाओ , वहां मत जाओ ...... यह मत करो, वो मत करो........जहाँ एक तरफ़ मुसलमान आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट हो कर उसके समाप्ति की बातें कर रहे हैं, वहीँ बाल ठाकरे साहब की ओर से हिंदू आतंकवाद के बढावा देने की भी बातें हो रही हैं, ....... आदि-अनादी। '

हमलोग इन्ही बातों को लेकर पिछले दिनों चम्पारण की पवित्र धरती 'बेतिया' (जहाँ से गाँधी जी ने सत्याग्रह आन्दोलन की शुरुआत की थी, और आज राजनितिक गतिविधियों एवं अपने कारनामों के कारण पुरे भारत में प्रसिद्द है।) अपने एक मित्र के घर बहस कर रहे थे । दरअसल, हम सब को एक पार्टी में जाना था, इसी कारण एक जगह एकत्रित हुए थे। अभी हमारी बहस जारी थी ही थी कि कानो में पटाखों कि गूंज साहब सुनाई दी, ऐसा लगा ठाकरे कि की फिदाईन दस्ते ने हमारे घरों पर हमले बोल दिए हैं। घबराहट में हम छत की तरफ भागे. अब बैंड बाजों की धुन हमारी कानो को आनंदित कर रही थी. मेरे एक मित्र ने कहा "लगता है, बारात है...." पर हम सब इस सोच में डुबे थे कि बिन लगन यह शहनाई कैसी....? हिन्दू धर्म के लिए तो अभी लगन तो है ही नहीं. हो सकता है किसी मुस्लिम कि शादी होगी. उनके यहाँ तो कोई नेम-टेम होता ही नहीं. बाप भी मर जाये तो भी शादी हो जाती है. लेकिन जैसे ही बारात और नजदीक आई, हमने रथ को देखा जो आमतौर पर हिन्दू धर्म कि शादी में ही देखा जाता है. मुस्लमान दुल्हे तो घोडे या फिर गाडी में बैठना मुनासिब समझते हैं. इस तरह हम सब कन्फर्म हो गए कि कोई हिन्दू शादी ही है.मेरे दोस्त ने चुटकी लेते हुए कहा "देखो हमारे यहाँ भी सब कुछ बदल रहा है, अब तो तुम लोग भी सुधर जाओ." पर यह क्या सिर्फ सौगोलिया ही नज़र आ रहे है. दूल्हा तो कही है ही नहीं. सचमुच दूल्हा था ही नहीं. सिर्फ चार छोटे-छोटे बच्चे दूल्हा बने दिखे. कहीं यह बाल विवाह तो नहीं. पर बाद में मालूम चला कि इन बच्चो की कल मुसलमानी होने वाली है और अज उनका अकीका है,और उसी अकीका की पार्टी में हमें जाना है. फिर वहां जाकर मेरे मित्रो ने जो कुछ देखा,उनकी आँखें खुली की खुली रह गयी. और उनके मुंह से बरबस ही निकला "मुस्लिम समाज में इतना परिवर्तन...?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा "जी दोस्त! सब कुछ बदल चूका है,और ये परिवर्तन हमें स्वीकार करना पडेगा."

खेलों का भला ऐसे होगा?

अभिनव बिंद्रा ने ओलम्पिक में गोल्ड मैडल जीत कर देश में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के महत्व दिए जाने का संदेश दिया पर क्या वाकई ऐसा होगा? यह एक बड़ा सवाल है कि क्या वाकई ऐसा होगा क्योंकि ये पहली बार नहीं है जब क्रिकेट के अलावा भी किसी दूसरे खेल के किसी खिलाडी ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है. देश में उस समय भी एक प्रकार का जूनून छाया था जब विश्वनाथ आनंद ने शतरंज में विश्व चैंपियनशिप जीती थी. उस समय लग रहा था कि देश के हर एक नौजवान को अब शतरंज ही खेलना है.
जहाँ तक क्रिकेट की बात है तो इस देश में क्रिकेट को देवताओं के समकक्ष रख कर देखा जाता है बल्कि यदि कहा जाए कि देवताओं से ऊपर रखा जाता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ये बात इस कारण भी ग़लत नहीं है क्योंकि देश में सट्टे के एक कलंकित दौर के बाद लग रहा था कि इस देश के देशभक्त क्रिकेट को भुला कर तो नहीं पर कुछ मोह छोड़ कर दूसरे खेलों की ओर भी ध्यान देंगे पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. क्रिकेट जहाँ था वहीँ रहा बाक़ी खेल जहाँ थे वहीँ रहे.
यदि हम अपने अन्य खेलों के खिलाड़ियों के प्रदर्शन को सामने रख कर क्रिकेट के खिलाड़ियों से तुलना करें तो वे किसी भी स्थिति में सचिन, धोनी, युवराज आदि से कम नहीं बैठते हैं पर सब बातों की एक मुख्य बात है पैसा। और पैसा सबसे ज्यादा है क्रिकेट में तो बस.................. इसका उदहारण अभी हाल में संपन्न हुए 20-20 मैच हैं. कुल मिला कर कहा जा सकता है कि बिंद्रा की अपनी सोच अच्छी है कि उसके स्वर्ण पदक जीतने से अन्य खेलों की तरफ़ सरकार ध्यान देगी पर ऐसा कतई नहीं होगा. यदि सरकार ध्यान देती तो बिंद्रा बिदेश में अपना अभ्यास नहीं करते, सानिया विदेश को नहीं भागती, भूपति-पेस के खेलों पर भी ग्रहण नहीं लगता, और तो और आठ बार के ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता हाकी, देश का राष्ट्रीय खेल हाकी आज बाहर खड़े होकर खेल न देख कर बीजिंग में खेल रही होती. सरकार को बस इतनी सुध है.
चलते-चलते एक बड़ी सुखद ख़बर, बीसीसीआई के एक प्रतिष्ठित पदाधिकारी का कहना है कि हमारी सरकार को ओलम्पिक के समाप्त हो जाने के बाद चीन से उनका उखडा हुआ सामान ले लेना चाहिए ताकि हम 2009 में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी कर सकें, एक ढांचा बना सकें. क्या इस तरह के रवैये से हम खेलों में सुधार की बात कर सकते हैं?

वो कहते हैं हम बदतमीज हैं

अभी कुह दिन पूर्व दिल्ली में था, बस पकड़ने के लिए दक्षिण दिल्ली के एक पोश इलाके के बस स्टैंड पर खड़ा था तो स्टैंड के पास के नजारे ने कुछ दिनों पूर्व के मुख्यमन्त्री और राज्यपाल के वक्तव्य को याद दिला गया।
शहरी मुख्यमन्त्री और अनुशाषित राज्यपाल को लगता था की सम्पूर्ण उत्तर भारतीय नियम कानून को ताक पर रख कर चलते हैं और इनके सरकार चलाने में रोड़ा अटकाते हैं। तुलना की दक्षिण के लोग बड़े सुशिक्षित होते हैं और कायदे कानून वाले भी, तात्पर्य सिर्फ़ इतना की देश की राजधानी के सर्वेसर्वा जहाँ लोगों को सर्टिफिकेट दे रहे थे वहीँ उत्तर और दक्षिण के नाम पर विभेद भी।

जरा इस तस्वीर को देखिये , दक्षिण दिल्ली के पोश इलाके के बस स्टैंड का है, ठीक सामने बड़ा सा गड्ढा, गड्ढा इतना बड़ा की एक छ: फुट का आदमी समां जाए, सोचिये रात का समय हो और लोग बस पकड़ने के लिए स्टैंड से नीचे आयें आगे अल्लाह ही मालिक है क्या इस तस्वीर के बाद भी लोगों से अपेक्षा की वोह बस स्टैंड पर बैठ कर बस आने के बाद गड्ढे में जाने का इन्तेजार करें।

वो कहते हैं हम बदतमीज हैं हमें सभ्य समाज में रहना नही आता हम कहते हैं हमारे दम पर सरकार बनाने वालों तुम्हें सरकार चलाना नही आता।

जय जय भड़ास

कब तक हम विदेश भैजेगे अपने बच्चो को डक्टरी पढ़ाने ..?

इन दिनो देश के ढ़ेरो बच्चे डाक्टरी की शिक्षा पाने के लिये चीन , रूस आदि देशो की ओर जा रहे है . इससे जहां एक तरफ भारत को आर्थिक नुकसान हो रहा है वही लोगो को असाधारण असुविधा हो रही है . पर बचचो के सुखद भविष्य की कामना में लोग यह कदम उठाने को विवश है. ईन देशो से मेडिकल शिक्षित बच्चो को देश में प्रैक्टिस करने के लिये ima की एक परीक्षा पास करणी होती है .
यदि सरकार आर्थिक कारणौ से नये मेडिकल कालेज नही खौल पा रही है तो , निजी क्षेत्र को मेडिकल कालेज शुरू करने दे , इन कालेजो से पास बचचे ima की वही परीक्षा पास करके अपनी प्रैक्टिस कर सकते है .
देश की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है यदि मेदिकल कालेज नही खोले गये तो कुछ ही वर्षो में डाक्टर ढ़ूढ़े नही मिलेंगे .
क्या सोचते है आप?

बंधन और स्वतंत्रता के संयुक्त अवसर पर

एक ओर स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं हम ...
दूसरी ओर रक्षा बंधन ...
तो बंधन और स्वतंत्रता के संयुक्त अवसर पर चिंतन करें .
स्वतंत्रता के लिये हम जान देने को तैयार हैं फिर हमें आखिर बंधन अच्छा क्यो आर कैसे लगता है ....
उत्तर है हमें वह बंधन अच्छा लगता है जिसमें बहन का शा निश्छल प्यार हो , जिसमें रक्षा का संकल्प हो
तो ऐसे पाव पुनीत अवसर पर सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई , मंगलकामनायें
विवेक रंजन श्रीवास्तव
, जबलपुर

हिन्दी का विकास और विकसित देश

अमेरिका के पास सबसे ज्यादा पैसा है, आस्ट्रेलिया के पास सबसे ज्यादा यूरेनियम है, हर विकसित देश के पास पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन भारत के पास पर्याप्त लोग है... अर्थात पर्याप्त मानव संसाधन हैं. लेकिन इनके लिये भारत में न तो पर्याप्त संसाधन हैं न अवसर.
अब बात करते हैं अपनी भाषा और उसके सशक्तिकरण की. हम हमेशा यही राग अलापते हैं कि हिन्दी को मजबूत करने के कोई प्रयास नहीं किये जा रहे तो मेरे एक मित्र सदैव यह उदाहरण देते हैं कि विदेशों में उन देशों की भाषा ही सर्वमान्य भाषा है वहां चपरासी से लेकर अधिकारी तक सभी एक ही भाषा में काम करते हैं. वहां पढ़ाई भी एक ही भाषा में होती है लेकिन भारत में ऐसा नहीं फिर इस पर लंबी बहस होती है और बात बेनतीजा हो कर अधूरी रह जाती है. काफी सोचने के बाद मेरा मानना है कि जब तक हम विकसित देश नहीं हो जाते तब तक हिन्दी पूरे देश की भाषा नहीं बन सकती चाहे इसके लिये हम कितने भी प्रयास कर लें या फिर कितने भी आयोजन कर लें.
अब हम बात करते हैं कि भारत की पूरी शिक्षा हिन्दी में क्यों नहीं होती तो मेरा मानना है कि चलिये हम पूरी शिक्षा हिन्दी में कर भी लेते हैं सारी किताबे हिन्दी में तैयार भी हो जाती हैं तकनीकी, चिकित्सा सहित सारी पढ़ाई हिन्दी में शुरू हो जाती है तो हासिल क्या होगा... इन परिस्थितियों में जो भी पेशेवर तैयार होंगे वे बेहतर हिन्दी तो जानेगें लेकिन उन्हे हम कितना रोजगार दे पाएंगे... क्या हमारे यहां इतनी व्यवस्थाएं हैं कि उन्हें हम अपने यहां खपा सकें... शायद नहीं. फिर ये बेहतर हिन्दी भाषी क्या बाहर रोजगार पा सकेंगे...
दूसरा क्या हमारे यहां इतने संसाधन हैं कि नित नई खोज अपने यहां अपनी भाषा में कर सकें... निश्चित तौर पर नहीं फिर हम हिन्दी भाषी अपने अल्पसंसाधनों व हिन्दी भाषा ज्ञान के माध्यम से बाहरी प्रणालियों से समन्वय बना सकेंगे... शायद नहीं
लोग कहते हैं विदेशों में जाने वाले लोगों को वहां की भाषा सीखनी पड़ती है तो भारत आने वाले क्यों नहीं सीखते हिन्दी... तो महाशय हम अभी विकास की उस प्रक्रिया से गुजर रहे हैं जहां लोग अभी आना शुरू किये हैं. यदि हम उन्हें अभी नहीं समझ पाएंगे या उन्हें नहीं समझा पाएंगे तो वे दूसरी ओर जाना शुरू कर देंगे... फिर हम उनपर हिन्दी लाद कर क्या हिन्दी का विकास कर सकेंगे...
आज हम गरीबी के साथ जीने वाले तथा कम रोजगार के अवसरों से घिरे देश में रह रहे हैं यदि हमने हिन्दी की चादर ओढ़ ली तो क्या हम रोजगार के बेहतर अवसर बाहर पा सकेंगे... शायद नहीं...
ऐसे कई मामले हैं जहां पूर्ण हिन्दी अपना लेने से हम नुकसान में रहेंगे. हां लेकिन जब हम विकसित राष्ट्र हो जाएंगे तथा हमारे मानव संसाधन पूर्ण संसाधन में बदल जाएंगे तो फिर हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. उस समय हम हिन्दी को लोगों की मजबूरी बना सकेंगे. तब हमारे पास मानव संसाधन को खपाने के पर्याप्त संसाधन होंने और उसका माध्यम होगी हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी...
इसलिये यदि हिन्दी को राष्ट्र भाषा तथा सर्वमान्य भाषा बनाना है तो हिन्दी के विकास के दिखावटी प्रयास बंद कर देश को विकसित राष्ट्र बनाने में जुटें. विकसित होते ही हिन्दी अपने आप राष्ट्र भाषा बन जाएगी.

16.8.08

दिल्ली पुलिस और ब्लू लाइन

दिल्ली और ब्लू लाइन एक दुसरे का पर्याय है, बिना ब्लू लाइन के दिल्ली ऐसी लगेगी जैसे सधवा के मांग से सिंदूर हटा दिया गया हो, सच कहूं तो लोगों का जीना मुहाल हो जाए और दिल्ली सरकार की डी टी सी यानी की या तो बस ही ना आए ओए यदि गलती से आ भी जाए तो किस्मत आपकी ड्राइवरआपको चढ़ाएगा की नही। खैर ये तो बातें बसों की मैं बता रहा था की आप दिल्ली में हों और ब्लू लाइन की सेवा ले रहें हैं गरमी हो या बरसात आपको जल्दी हो या न हो मगर इन तस्वीर को देखिये, दिल्ली पोलिस के इन प्रहरियों को आम जन से कोई लेना देना नही, बस रोकी हील हुज्जत रोज का ड्रामा बस एक पत्ती और बस को हरी झंडी, अगर ज्यादा चूं चपड़ तो फ़िर रुके रहो भाई क्योँ की ये दिल्ली पोलिस है, आपकी सेवा में हमेशा आपके लिए तत्पर, बस पत्ती होनी चाहिए।

जरा इस तस्वीर को देखिये हम भी इसी बस में थे, बस के ड्राइवर और कंडेक्टर ने पत्ती देने से मना कर दिया कारण साफ़ था की दोनों पुरे युनिफोर्म में थे और सभी कागजात भी पुरे थे सो जिच दोनों तरफ़ और बीच में पीसने वाली गरीब दिल्ली की जनता, क्या करें दिल्ली की एलिट क्लास की मुख्यमंत्री और राज्यपाल महोदय को हमारा पिसना जो नही दिखता है, हाँ यहाँ के लोगों की खामियां मीडिया के सामने बताने में परहेज नहीआख़िर इसी बहने अपने खामियों को जो छुपाना है.

15.8.08

किसे फरक पड़ता है किसी करुणाकर या कुंवर जी अंजुम के न होने पर....!!!!

करुणाकर जब जिंदा थे तभी यह सूचना मिली थी कि कुंवर जी अंजुम नहीं रहे। और उनका जाना कोई हफ्ते दो हफ्ते पहले का मामला नहीं था। पूरे एक साल पहले वे इस दुनिया से गए लेकिन खबर आते आते पूरा साल गुजर गया। कुंवर जी अंजुम ने अपनी जिंदगी के दो तिहाई दिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर के रूप में गुजारे। मास्को भी गए थे। सीपीआई की नेशनल कोउंसिल में रहे। सीपीआई की मैग्जीन के संपादक मंडल में तो रहे ही, उन्होंने अपनी पार्टी के कई बड़े कामरेडों की आत्मकथाएं भी लिखी थीं। क्रांति और आदर्शों से सीपीआई की बढ़ती दूरी और चुनाव व सत्ता से लगातार नजदीकी के चलते सीपीआई के नेता भी कुछ वैसे ही हरकत करने लगे जैसे दूसरी पार्टियों के नेता करते थे। पूरी पार्टी के सत्ता व वोट के लाभ हानि नफा नुकसान की तरफ बढ़ जाने से इस पार्टी के आदर्शवादी लोगों को झटका लगा और वे धीरे धीरे इधर उधर होने लगे। कुछ ने सीपीएम या सीपीआईएमएल का साथ पकड़ लिया तो कुछ जो ज्यादा चालाक व चतुर थे वे सपा और बसपा और कांग्रेस की ओर मुड़ लिए। कुंवर जी अंजुम दिल दिमाग व सोच से शायर, बेहतरीन इंसान, सांस्कृतिक चेतना से लैस, समाज व देश-दुनिया की गूढ़ समझ रखने वाले, हिंदी उर्दू लिट्रेचर के जानकार थे। ऐसे संवेदनशील आदमी के लिए यह दो तिहाई उम्र गुजारने के बाद यह समझ में आना की जिस राह पर चले थे वो मंजिल को नहीं जाती, कहीं और ले जाती है, बेहद झटका देने वाला रहा। ज़िंदगी की गाड़ी खींचने के लिए पत्रकारिता में चले आए और दुनिया के दोगलेपन से मुक्त होने व खुद को खो देने की खातिर शराब से दोस्ती कर ली। जब मैं जालंधर में अमर उजाला की लांचिंग पर ट्रेनिंग देने वास्ते डेपुटेशन पर गया था तो वहां कुंवर जी अंजुम एक साथी पत्रकार की भांति मिले। मोटे कंबल वाले जैकेट को पहने, मुंह में पान घुलाए, दाढ़ी बढ़ाए और चेहरे पर मुस्कान लिए गले मिले। इससे पहले हम लोगों की मुलाकातें लखनऊ में दुर्गा दादा के पास हुआ करती थीं। दुर्गा दादा सीपीआई के होलटाइमर होने के साथ साथ पार्टी की मार्क्सवादी साहित्व वाली दुकान चेतना पुस्तक केंद्र के प्रबंधक थे। दुर्गा दादा के यहां कुंवर जी अंजुम से लगातार मिलना होता था। कई बार विधायक निवास दारुलशफा के बगल वाली शराब की दुकान पर टकरा जाते थे। फिर जो मजा़ज़, ग़ालिब, बशीर बद्र, फिराक साहब ....की ग़ज़लों व शेरों से हम लोगों को रुबरु कराते थे, सुनाते थे, समझाते थे और जिंदगी के फलसफे को पद्य में इशारे इशारे में हौले हौले से नशे के साथ दिल में उतारते थे। मैं देहाती, तलछट, कम पढ़ा लिखा.....ऐसे विद्वान व्यक्ति पर मुग्ध सा होता गया। उनकी फटेहाली, उनकी सादगी, उनकी सहजता, उनकी विनम्रता, उनका ज्ञान, उनका विजन, उनकी सोच, उनका क्रांतिकारी अतीत, उनका संघर्षमयी वर्तमान...यह सब मुझे हीरोइक सा लगने लगा।
जालंधर में मुलाकात के बाद एक घटना हुई। कुंवर जी अंजुम शराब के इतने दीवाने हो चुके थे कि वे उसके साथ चौबीसों घंटे जीने लगे थे। नए बने अमर उजाला आफिस के बाथरुम में दीवार में एक ईंटे भर छेद में दारू का पव्वा रख देते थे और उपर से ईंटे के टुकटे से उसे ढक देते थे। हर दो घंटे पर बाधरूम जाते और एक पैग मारकर काम पर लग जाते। कुछ साथियों ने उन्हें ऐसा करते देख लिया और संपादक से शिकायत कर दी। संपादक रामेश्वर पांडेय जी कुंवर जी अंजुम के व्यक्तित्व को भली भांति जानते थे और उन्होंने ही कुंवर जी को ज्यादा उम्र के बावजूद उनके ज्ञान के चलते पत्रकारिता में मौका दिया। रामेश्वर जी ने कुंवर जी को समझाया, चेताया और ऐसा न करने की सलाह दी। दूसरा कोई संपादक होता तो शायद उसी पल कुंवर जी को हटा देता लेकिन रामेश्वर पांडेय ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कुंवर जी को हमेशा मौका दिया। कुंवर जी बाद में दैनिक जागरण, नोएडा आ गए। यहां भी काम के बाद और काम के दौरान पीने पिलाने का दौर चलता रहा। इसके बाद उन्हें एक दिन नौकरी से निकाल दिया गया। साहिबाबाद में नया घर लिया था कुंवर जी, बिटिया पढ़ती है, पत्नी साथ रहती हैं। नौकरी जाने के बाद कुंवर जी से संपर्क किसी का नहीं हो पाया। जो खबरें पता चलीं उसके मुताबिक वो और ज्यादा पीने लगे थे। उसी क्रम में एक दिन उन्हें लखनऊ ले जाकर एसजीपीजीआई में भर्ती कराना पड़ा और कई महीने के इलाज के बाद लीवर सिरोसिस के चलते उनकी मौत हो गई। उनकी मौत की खबर दोस्तों तक पूरे साल भर बाद पहुंची। किसे फिक्र की कोई किसी बेरोजगार का हालचाल जाने। यहां तो उगते सूरज को सौ बार सलाम करने की परंपरा है। डूबते सितारे की तरफ कोई मुड़कर देखता तक नहीं। कुंवर जी नहीं रहे, यह अब भी उनके कई जानने वालों को पता नहीं है। मुझे भी पता नहीं था। जब कुंवर जी की पत्नी पूरे एक साल बाद दैनिक जागरण से उनका बकाया लेने आईं तक जाकर उनके साथ काम करने वालों को उनके निधन के बारे में पता चला। लखनऊ से लेकर जालंधर, नोएडा, दिल्ली में उनके हजारों जानने वाले थे पर किसी को उनकी फिक्र करने की जरूरत नहीं थी। कुंवर जी किसी को नौकरी नहीं दे सकते थे, कुंवर जी किसी को लाभ नहीं दिला सकते थे, कुंवर जी पैसे वाले नहीं थे, कुंवर जी किसी के सामने किसी चीज के लिए रिरिया नहीं सकते थे। कुंवर जी किसी की चापलूसी नहीं कर सकते थे। वो इंसान अपने में मस्त, अपने में खुश, अपने में उदास, अपने में दुखी। उसने जिंदा होते हुए भी खुद को इंसानों से काट लिया था। इंसानों के बीच रहता था लेकिन संवाद बस इतना ही जितने में जिंदगी चल जाती, नौकरी चल जाती।

आखिर में कुंवर जी नहीं रहे। मरना तो सबको है, कुंवर जी थोड़ा पहले चले गए। वो चाहते तो सीपीआई के नेताओं की तरह चतुर सुजान होकर किसी पार्टी में चले जाते और दलाली के जरिए लाखों करोड़ों कमा लेते। किसी बड़े नेता की चापलूसी करके उसके लिए मीडिया मैनेज करते और पैसे में खेलते। पर उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उन्हें पसंद नहीं था। एक संस्कृतकर्मी, एक शायर, एक बेहतरीन इंसान कुंवर जी का जाना कचोट रहा है पर यह कचोट बस केवल कुछ सेकेंड के लिए है जब उनकी याद आ जाती है या जब उनकी याद दिला दी जाती है। अगले ही पल अपने दुनियावी ड्रामे में हम तल्लीन हो जाते हैं और चतुर सुजान आदमी की तरह शह-मत भरी इस बाजारवादी व्यवस्था में अपनी गोटियां चलने के बारे में रणनीति बनाने लगते हैं।

करुणाकर भी चला गया। जिंदगी जीने की उमंग लिए एक 23 साल के नौजवान की अचानक मौत हो जाती है। मौत तय थी, एम्स के मुताबिक पर हम लोग ठहरे एक भावुक इंसान। दिल नहीं मानता था कि वो मरेगा। सब कुछ तो ठीकठाक था बाहर से। हंसता मुस्कराता खाता पीता चलता पढ़ता सुनता बोलता ....सब कुछ करता एक नौजवान। पर अंदर जाने क्या पल रहा था। एम्स ने कहा कि लंग कैंसर अंतिम अवस्था में है, फेफड़े दोनों खत्म हो चुके हैं, छह महीने की जान बची है, जाकर गांव में मां बाप के सामने मरो। पर हम लोगों का दिल नहीं माना। ऐसे कैसे कह दिया कि जाओ और घर वालों के सामने बैठकर मौत की प्रतीक्षा करो। पर अंततः हुवा वही। दवा इलाज सिंपैथी अभियान आह्वान कवरेज मीडिया कंपेन ब्लाग कंपेन के बाद भी करुणाकर गांव में अपने परिजनों के बीच अचानक उभरे दर्द में तड़पकर मर गया।

आज आरकुट पर करुणाकर की प्रोफाइल पर पहुंचा। उसकी प्रोफाइल अब भी है। उसका आरकुट खाता अब भी चल रहा है। आपको कहीं से नहीं लगेगा कि करुणाकर इस दुनिया में नहीं है। जब वो जिंदा था तो मैंने उसे आरकुट पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी पर वो उसके बाद आरकुट पर गया ही नहीं। मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट अब भी वेट कर रहा है। अब करुणाकर तो है नहीं, सो मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट वहीं का वहीं पड़ा रहेगा। संभवतः यह फ्रेंड रिक्वेस्ट तब कनफर्म हो जब मैं भी उपर उसके यहां पहुंच जाऊं। तब उस दूसरी दुनिया के आरकुट खाते में हम जरूर एक दूसरे के फ्रेंड बन जाएंगे। यहां तो करुणाकर मेरे रिक्वेस्ट को एसेप्ट करने से पहले ही गुजर गया।

करुणाकर के आरकुट खाते के स्क्रैप को मैं नहीं पढ़ सकता क्योंकि उसमें लिखा आ रहा है कि मैंने कोई स्क्रैप नहीं किया है इसलिए मैं नहीं पढ़ सकता। यह जरूर कोई तकनीकी व्यवस्था होगी पर अंदर से लगता है जैसे करुणाकर ने मुझे श्राप दिया हो, तुम सब जिंदा हो और मैं तुम लोगों के सामने ही मर कर चला आया, जाओ श्राप देता हूं, तुम मेरा स्क्रैप नहीं पढ़ सकते, तुम मेरे फ्रेंड नहीं बन सकते। करुणाकर, शायद मैं तुम्हारा मित्र पहले बन गया होता तो देख पाता कि तुम्हारे स्क्रैप बुक पर हाल फिलहाल किन लोगों ने क्या लिखा। बाल सुलभ उत्सुकता है। लेकिन मुझे पता है कि जिन लोगों को तुम्हारे मौत की खबर हुई होगी उन लोगों ने तुम्हारे स्क्रैपबुक पर जाकर तुरंत तुम्हें श्रद्धांजलि देकर तुमसे अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया होगा लेकिन मैं वादा करता हूं कि मैं तुम्हे तुम्हारे स्क्रैपबुक को नहीं पढ़ रहा और तुम्हें श्रद्धांजलि नहीं लिख पा रहा इसलिए मैं तुमसे नाता नहीं तोड़ रहा। यह मैं खुद के दिल को समझाने के लिए सोच रहा। जब हम उपर मिलेंगे तो शुरू से दोस्ती रखेंगे, स्क्रैप स्क्रैप खेलेंगे और तुम्हें मैं कुछ गंदी चीजें भी सिखावुंगा। तुमने तो जीवन भर सिगरेट या बीड़ी नहीं पी, पर तुम्हारे फेफड़े खराब हो गए। तुम्हें सिगरेट पीना सिखाउंगा ताकि किसी टेंशन में धुवें के छल्ले छोड़ते हुए तुम हलके से रिलीज हो सको। तुम्हें थोड़ा दारू पीना सिखाउंगा ताकि जब तुम बेहद दर्द में रहो तो इससे मुक्त होने के लिए थोड़ी सुरा ले लो और किसी नई दुनिया में पहुंच जाओ जहां कोई टेंशन नहीं। तुम्हें थोड़ी बदमाशी भी सिखावुंगा। यह सब तुमने किया नहीं। तुम तो ठहरे सीधे साधे आदर्शवादी नौजवान जो मां बाप के अरमान पूरा करने के लिए दिन रात सिर्फ और सिर्फ पढ़ता रहता था और अच्छे नंबरों से पास होता रहता था। पर देखा तुमने, तुम्हारी शराफत ने तुम्हें क्या इनाम दिया। हम लोगों तो सारी बुराई करके जिंदा हैं और तुम आदर्शवादी दोस्त.....चले गए न कलयुग में अच्छे कर्म करके किसी अच्छी दुनिया में, बुरे लोगों को और बुराइयों को यहीं छोड़कर। पर हम बदमाश और बुरे लोग तुम्हें दिल से चाहते हैं।

कुंवर जी, मुझे मलाल है कि मैं भी दिल्ली मे रहा और बेरोजगारी व दारूबाजी के बीच जिंदगी की गणित में उलझकर आपको याद तक न कर सका। पर अब जब आप याद आते हैं तो लगता है जैसे मुझसे पाप हुआ है। अब भी दिल होता है कि एक बार आपके घर जाकर पता करूं कि क्या हाल हैं, कैसे हो रहा है गुजारा पर सच कहूं तो मेरे पास भी टाइम नहीं है, मैं बहुत बिजी आदमी हूं, बहुत आगे जाना है मुझे, हेक्टिक शिड्यूल रहता है इसलिए सारी। मैं आपके परिजनों से भी नहीं मिल सकता। अब आप चाहे इसका बुरा मानों या भला, पर यही सच है मेरे भाई। आपके जीते जी आपकी मदद नहीं कर पाया और मरने के बाद आपके परिजनों के किसी काम न आउंगा लेकिन हां, देखिए आपको याद कर और इतना सब लिखकर कुछ अच्छे नंबर जरूर बटोरने की कोशिश कर रहा हूं। माफ करना दोस्त, आजकल दोस्त ही दगाबाज होते हैं और वही सबसे अच्छे दुश्मन बनते हैं। तुम मुझसे दुश्मनी करो न करो, मैं तुम्हारे लिए एक दोस्त के रूप में दुश्मन ही हूं।

चलिए.....करुणाकर और कुंवर जी अंजुम को थोड़ा याद कर लें, थोड़ा खुद को याद कर लें...बाकी कल तो हम सभी बिजी हो जाएंगे अपने अपने शिड्यूल के हिसाब से।

अंत में करुणाकर की आरकुट प्रोफाइल का लिंक, आप भी जाकर देखें और पढ़ें.....सोचें, बिचारें.....कुछ समझ में आए तो भड़ास निकालें......हम लोग तो बस भड़ास ही निकाल सकते हैं, और क्या कर सकते हैं.......


अगर आपका आरकुट खाता है तो क्लिक करें.......करुणाकर आरकुट पर


करुणाकर ने अपने आरकुट प्रोफाइल में खुद के एक ब्लाग के बारे में भी बताया है, वो है http://karunakarmishra.blogspot.com परफेक्ट डेट के बारे में उसका कहना है कि वो इसे इसलिए नहीं पसंद करता क्योंकि वो यह सब तब करेगा जब वह अपना लक्ष्य हासिल कर लेगा।


करुणाकर के आरकुट प्रोफाइल में सोशल, प्रोफेशनल, और परसनल सेक्शन में जो जो लिखा है वो इस प्रकार है....

relationship status: single

age: 23

languages i speak: English (UK), Hindi

here for: friends

about me: aasmaan ko neend aayegi to sulaaoge kahan...zameen ko maut aayegi to dafnaaoge kahan...

कौन हूँ??
इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.
जो ना समझ सके, उनके लिये "कौन".
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.

दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.
सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.
आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हू

well....if u culd figure me out completely then u wuld b my best friend...multiple personality disorder wuz named after me....i live for a few people...friends mean the world to me...i go out of my way to help them wen they need me...not a gud listener unless its my frnz who wanna talk...outspoken most of the time....spontaneous n sarcastic jokes rule my roost...love is not my cup of tea...i flirt in d gud way n m honest about it....show me attitude n i'll give u an overdose of my own....in d end m gud to only

children: no

ethnicity: east indian

religion: Hindu

political view: not political

humor: campy/cheesy, dry/sarcastic, clever/quick witted, friendly, goofy/slapstick, obscure, raunchy

fashion: natural

smoking: no

drinking: no

pets: i like them at the zoos

living: alone, friends visit often

hometown: ayodhya/noida /delhi/banglore

webpage: http://www.jssate.com

passions: To be iimian

sports: cricket,chess;

activities: SPORTS,STUDY,TALKING WITH FREINDS,AKING FREINDS;

books: STUDY

music: SOFT OLD SONGS

tv shows: INDIAN IDEAL PART TWO

movies: MUNNA BHAI MBBS;PARDESH;

cuisines: kheer,chinees food

city: NOIDA

state: india

zip/postal code: 272123

country: India


education: Bachelor's Degree

high school: ya sure

occupation: STUDENT

industry: High Tech, Computer Software

title: http://www.orkut.co.in/UniversalSearch.aspx?q=%22http%3A%2F%2Fkarunakarmishra.blogspot.com%22

job description: as student life

career skills: IT GETS CHANGE ACCORDING TO REQUIRMENT.

career interests: OF COURSE MANAGEMENT

ideal match: that is in pending

first thing you will notice about me: MY simplicity

height: 172 centimeters

eye color: black

hair color: black

build: slim

looks: average

best feature: chest

my idea of a perfect first date: i do't like dating becoc i will do all these things after achieving all my goals

from my past relationships i learned: i do't have any relationship inspite of my parents and sister brothere and from these i am learning continously no endpoints

five things I cant live without: i can live without anything in the presense of air water and food

in my bedroom you will find: i have't here bedroom but i have my flat in that me and my freinds lives together so u find alot of things like MY PC,MY freinds laptop and as i am student then books obiously.


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आज़ादी का एक रूप ये भी

कोई नही तुम्हे कुछ नही होगा बाबा जी ने अपने पास से थोडी भभूति दे दी। बाबा के पास इतना पैसा हर दिन जामा हो जाता है की उसे देखकर आप चौंक सकते हैं। वैसे बाबा पर लोगों को भरोसा इसलिए था क्यूंकि उनका आकर बहुत छोटा है और वो दीखते इंसानों जैसे हैं।

बाबा जी थोड़ा सा टाइम मुझे दे दीजिये बच्चा बहुत वीमार है। ये सब कुछ मैंने अयोध्या में देखा जहाँ पर इन दिनों सावन का मेला चल रहा है और देश के कोने कोने से यहाँ पर लाखों स्रधालु जमा हुए हैं।

थोडी देर बाद बाबा जी फिर से अपने काम में लग गए। बाबा की विशेषता ये है की वो मुस्किल से कुछ इंच के ही हैं। पर लोगों को लगता है वो उन्हें बहुत खुशियाँ अपने तपोबल से देंगे।






अरे ये क्या कर रहे हो मेरी तस्वीर मत छापना नही तो तुम्हे पाप लगेगा

श्री सुरेश कुमार जैन का दोष

श्री सुरेश कुमार जैन, आई ० जी ० का क्या दोष था कि उनका नाम राष्ट्रपति के पदक से सम्मानित किए जाने वाले अधिकारियों की सूची से निकाल दिया गया। क्या आज तक पूरे देश में गोली चलाने का आदेश देने वाले किसी भी अधिकारी को सम्मानित नहीं किया गया, क्या तमाम के तमाम ऐसे अधिकारियों को तुंरत ही स्थानांतरित कर दिया गया? क्या इसलिए उन्हें वापस दिल्ली बुला लिया गया कि एक पुलिस अधिकारी होने के नाते उपद्रवियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए, यदि ऐसा ही है तो बाकी जम्मू और पूरे देश के अधिकारियों के साथ ऐसा सुलूक क्यों नहीं किया जाता। इससे यह स्पष्ट होता है कि छुद्र स्वार्थों की पूर्ति हेतु राजनीति से जुड़े हुए लोग कैसा भी निर्णय ले सकते हैं, चाहे फिर उनके निर्णयों में घोर साम्प्रदायिकता ही क्यों न व्याप्त हो ? इस प्रकार के निर्णय आगे चलकर अधिकारियों को कम से कम एक विशेष संप्रदाय से सम्बंधित अपराधियों के प्रति भी कार्यवाई करने को लेकर मात्र हतोत्साहित ही करेंगे और इससे जो संदेश जायेगा वह समाज को किस तरफ ले जायेगा, लोगों की मानसिकता में क्या अन्तर आएगा, इसका जबाव भी आने वाले वर्षों में स्वत: मिल जायेगा। विशेष संप्रदाय को खुश करने की कोशिशों की ही अगली और ugly कड़ी है यह निर्णय।

Happy Indipendence Day


Jashn-e-Aajadi
Ki Buniyaad " Shahidon" Ki Qurbani Hai.
Naaz Hai Taqdir Pe Ki Hum
"HINDUSTANI"
Hain.

Happy
Indipendence
Day

शुभकामनाओं सहित
Anil Bhardwaj

14.8.08

शायरों की नजर में देश की आज़ादी

अंकित माथुर
मौलाना आज़ाद ने लिखा था कि जो होने वाला है कोई क़ौम अपनी मनहूसियत से उसे रोक नहीं सकती। यक़ीनन वो दिन आया जब हिंदुस्तान 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ। और गुलामी की वो बेड़ियां जो हमने अपनी नादानी की वजह से अपने पांव में डाल ली थीं वे हिंदुस्तान के जियालों ने काट गिरायीं। हिंदुस्तान की आज़ादी के महासमर में शायद ही किसी धर्म और मजहब के लोगों ने उसमें हिस्सा न लिया हो। लेकिन हिंदुस्तान की आज़ादी ऐसे वक्त आयी जब बंगाल में बहुत ज़बर्दस्त अकाल पड़ा था और लाखों लोग भूख और प्यास से मर गये थे। बंगाल के इस मंज़र को देखकर हिंदुस्तान के कवि एवं लेखकों के पहलू में दिल तड़प उठे और उर्दू का मशहूर कवि वामिक जौनपुरी चिल्ला उठा -

"उत्तर देश में डुग्गी बाजी फैला दु:ख का जाल,
भूख की अग्नि कौन बुझाये, सूख गये सब ताल...
सुंदर नारी भूख की मारी, घर-घर बेचे लाज रे
साथी भूखा है बंगाल रे साथी भूखा है बंगाल...''


साथ ही साथ हिंदुस्तान की आज़ादी ऐसे समय में आयी जब मुल्क का बंटवारा हो गया, हिंदू और मुसलमान दोनों एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो उठे। पंजाब में हिंदुओं और सिखों का क़त्लेआम हुआ और बिहार में मुसलमानों का। इंसानियत मौत के दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुराती रही और हैवानों का राज्य हो गया। लाखों लोग पंजाब से दिल्ली में आ बसे। गोया एक पंजाब दिल्ली में आ बसा और दिल्ली के मुसलमान पंजाब में जा बसे। इस ड्रामे को देखकर उर्दू के मशहूर शायर अली सरदार जाफरी ने मुल्क के नेताओं से यह सवाल पूछा, "कौन आज़ाद हुआ? किसके माथे से गुलामी की स्याही छूटी।

""खंज़र आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए
और मौत आज़ाद है लाशों पे गुजरने के लिए।''

दूसरी तरफ मजाज ने यह आवाज लगायी कि यह इन्क़लाब का मुसदा (साया) है इन्क़लाब नहीं। ये आफताब का परतव (साया) है आफताब नहीं। डा. राही मासूम रज़ा ने नेताओं और फिरक़ापरस्त लोगों की तरफ उंगली उठाते हुए कहा कि

एक मिनिस्टर है तस्वीर के वास्ते और एक मिनिस्टर है ताज़िर के वास्ते
और जनता है सिर्फ ज़ंजीर के वास्ते।


वो लोग जिन्होंने हिंदुस्तान का बंटवारा करवाया उनकी तरफ इशारा करते हुए किसी शायर ने कह दिया कि ..
तुमने फ़िरदौस के बदले में जहन्नुम देकर कह दिया हमसे कि
गुलिस्तां में बहार आयी है
और चंद सिक्कों के एवज में चंद और मिलों की ख़ातिर तुमने
शहीदों का लहू बेच दिया और बाग़वां बन के उठे और चमन बेच दिया।


लेकिन चंद लोग ऐसे भी थे जिन्होंने हिंदुस्तान के बंटवारे की सख़्त मुख़ालफत की थी। मसलन मौलाना आज़ाद ने 1929 में कहा, ""अगर आज़ादी फरिश्ता कुतुब मीनार पर खड़े होकर ये ऐलान करे कि हिंदुस्तान को 24 घंटे में आज़ादी मिल सकती है बशर्ते कि वो हिंदू और मुसलमान की दोस्ती को अलग कर दे तो मैं कहूंगा कि भारत को ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए।
इस बँटवारे को देखकर डॉ. राही मासूम रज़ा ने ये लिखा था कि,

""चंद लुटेरे बड़े आदमी बन गये,
और हम अपने ही घर में शरणार्थी बन गये।''


लेकिन हमें यह जान लेना चाहिए कि उर्दू के शायरों और लेखकों ने इन्क़लाब जैसा ख़ूबसूरत और हिम्मतवर शब्द दिया जिसे हिंदू और मुसलमानों ने अपने गले से लगाया। हिंदुस्तान की आजादी में हिंदू और मुसलमानों ने एक-दूसरे का इतना साथ दिया, जो आज हिंदुस्तानियों के लिए रास्ते के चिराग़ का काम दे सकता है मसलन रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की दोस्ती की कहानी करोड़ों लोग जानते हैं। लेकिन शायद उनको ये नहीं मालूम कि जब चंद अंग्रेज़ों के पिट्ठू अशफाक उल्ला खां से मिलने गये और कहा तुम मुसलमान हो हिंदुओं का साथ क्यों देते हो, अंग्रेज़ों की मुख़ालफत क्यों करते हो और मुल्क की आज़ादी की बात क्यों करते हो? इस पर अशफाक उल्ला खां ने भूखे शेर की तरह चिंघाड़कर कहा कि मुझे हिंदुओं का ग़ुलाम बनना तो मंजूर है लेकिन यह मंजूर नहीं कि मैं और मेरी क़ौम अंग्रेजों के गुलाम रहे। हम अपने ख़ून के आख़िरी क़तरे तक अंग्रेज़ों से लड़ते रहेंगे। ये था मुल्क़ की आज़ादी के लिए सूली पर चढ़ने वाले लोगों का ज़ज्बा और वतन की मुहब्बत।

और हिंदुस्तान के आख़िरी बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने जो ख़्वाब हिंदुस्तानियों के लिए देखा था उसे हिंदुस्तानियों ने पूरा कर दिखाया। यानी उन्होंने कहा था कि -

""हिंदियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की
सद्रे लंदन तक चलेगी तेग़ (तलवार) हिंदुस्तान की।


बहादुर शाह ज़फर ने क़ौम को जो पैग़ाम व नारा दिया था उसी का नतीज़ा था कि उधम सिंह ने जनरल डायर जिसने जालियांवाला बाग़ में हिंदुस्तानियों पर गोलियां चलवायी थीं, अपनी गोलियों से भून डाला और दूसरी तरफ ग़ज़नफर अली ख़ां ने पोर्ट ब्लेयर में अपने ख़ंज़र से लार्ड म्यों का क़त्ल कर डाला। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जब रंगून गये थे तो वो रंगून में बहादुर शाह ज़फर की कब्र पर भी गये और कहा के ऐ हिंदुस्तान के आख़िरी बादशाह जब हिंदुस्तान आज़ाद होगा तो तेरी लाश को हम हिंदुस्तान ले जाएंगे और तेरी लाश को भारत की सरज़मी पर दफन करेंगे; लेकिन अफसोस के साथ लिखना पड़ता है कि मुल्क की आज़ादी के 60 साल गुज़र चुके हैं लेकिन नेताजी के इस वादे को पूरा करना तो दूर उनके ख़्वाब और वादे के बारे में कोई सोचता भी नहीं है।
जय हिन्द...
एक ईमेल से उद्धत.