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19.8.08

हार के बाद भी जीत का मजा

आइये जीत का जश्न मनाते हैं. क्या कहा कहाँ जीते? किसमें जीते? नहीं पता? अरे ओलम्पिक में हमारे मुक्केबाज़ ने कितना संघर्ष किया, क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को 147 रन बनाने में 2 खिलाडी आउट कर दिए, कई और खिलाडी ओलम्पिक में अपना संघर्ष जारी रखे हैं. क्या ये सब खुशी मनाने का, जश्न मनाने का मौका नहीं है? हम लोगों के लिए कितने फक्र की बात है कि अरब की जनसंख्या को छूने वाले देश में खिलाड़ियों की कुल 56 की संख्या ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई कर पाती है, इस संख्या में से भी एक पदक हमारे हिस्से में आता है. किसी और पदक की चाह में जब हम रहते हैं और हार जाते हैं तो कहते हैं कि ये हमारे लिए किसी जीत से कम नहीं है क्योंकि हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाडी से हारे हैं. क्या ये सफाई हर बार ठीक लगती है?
कई बार हमसे छोटे देश जो संसाधनों में हमसे बहुत पीछे हैं, सुविधाओं में बहुत पीछे हैं वे भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शन करते हैं। याद करिए सूरीनाम का तैराक....... हम भारतीय एक बात तो भली-भांति सीख गए हैं कोई भी घटना हो जाए, दुर्घटना हो जाए किसी और पर दोष मढ़ दो बस बात ख़तम। इसका उदहारण देने की जरूरत नहीं क्योंकि ये सभी को मालूम है. लगा कि हम कितनी आसानी से हारना भी जानते हैं और हार पर अपनी प्रतिक्रिया भी देना जानते हैं. ऐसे तो खेलों का क्या किसी भी स्थिति का भला नहीं होने वाला.
यही कारण है कि देश में आतंकवाद, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, हिंसा, क्षेत्रवाद, जातिवाद अपने चरम पर है।जब तक सुधार की गुन्जाईस नहीं दिखती तब तक हम ये तो कह ही सकते हैं कि इन स्थितियों में भी देशवासियों की ज़िंदा रहने की ताकत किसी जीत से कम नहीं है. इन बातों के साथ-साथ दुआ करें कि शायद ओलम्पिक ख़तम होते-होते एक-दो पदक (दो शायद ज्यादा हो गया) और देश के हिस्से में आ जाएँ. खाली दुआ करें, यज्ञ, हवन न करने लगियेगा क्योंकि इस देश में ये भी बहुत जल्दी होता है और हरेक काम के लिए.
(अब ये न कहना की ये सब चलता है, यदि यही चलता है तो रोना किस बात का और नहीं चलता है तो ये चलना बंद कब होगा?)

17.8.08

खेलों का भला ऐसे होगा?

अभिनव बिंद्रा ने ओलम्पिक में गोल्ड मैडल जीत कर देश में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के महत्व दिए जाने का संदेश दिया पर क्या वाकई ऐसा होगा? यह एक बड़ा सवाल है कि क्या वाकई ऐसा होगा क्योंकि ये पहली बार नहीं है जब क्रिकेट के अलावा भी किसी दूसरे खेल के किसी खिलाडी ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है. देश में उस समय भी एक प्रकार का जूनून छाया था जब विश्वनाथ आनंद ने शतरंज में विश्व चैंपियनशिप जीती थी. उस समय लग रहा था कि देश के हर एक नौजवान को अब शतरंज ही खेलना है.
जहाँ तक क्रिकेट की बात है तो इस देश में क्रिकेट को देवताओं के समकक्ष रख कर देखा जाता है बल्कि यदि कहा जाए कि देवताओं से ऊपर रखा जाता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ये बात इस कारण भी ग़लत नहीं है क्योंकि देश में सट्टे के एक कलंकित दौर के बाद लग रहा था कि इस देश के देशभक्त क्रिकेट को भुला कर तो नहीं पर कुछ मोह छोड़ कर दूसरे खेलों की ओर भी ध्यान देंगे पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. क्रिकेट जहाँ था वहीँ रहा बाक़ी खेल जहाँ थे वहीँ रहे.
यदि हम अपने अन्य खेलों के खिलाड़ियों के प्रदर्शन को सामने रख कर क्रिकेट के खिलाड़ियों से तुलना करें तो वे किसी भी स्थिति में सचिन, धोनी, युवराज आदि से कम नहीं बैठते हैं पर सब बातों की एक मुख्य बात है पैसा। और पैसा सबसे ज्यादा है क्रिकेट में तो बस.................. इसका उदहारण अभी हाल में संपन्न हुए 20-20 मैच हैं. कुल मिला कर कहा जा सकता है कि बिंद्रा की अपनी सोच अच्छी है कि उसके स्वर्ण पदक जीतने से अन्य खेलों की तरफ़ सरकार ध्यान देगी पर ऐसा कतई नहीं होगा. यदि सरकार ध्यान देती तो बिंद्रा बिदेश में अपना अभ्यास नहीं करते, सानिया विदेश को नहीं भागती, भूपति-पेस के खेलों पर भी ग्रहण नहीं लगता, और तो और आठ बार के ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता हाकी, देश का राष्ट्रीय खेल हाकी आज बाहर खड़े होकर खेल न देख कर बीजिंग में खेल रही होती. सरकार को बस इतनी सुध है.
चलते-चलते एक बड़ी सुखद ख़बर, बीसीसीआई के एक प्रतिष्ठित पदाधिकारी का कहना है कि हमारी सरकार को ओलम्पिक के समाप्त हो जाने के बाद चीन से उनका उखडा हुआ सामान ले लेना चाहिए ताकि हम 2009 में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी कर सकें, एक ढांचा बना सकें. क्या इस तरह के रवैये से हम खेलों में सुधार की बात कर सकते हैं?