(उपदेश सक्सेना)
अम्बानी समूह को देश का सबसे बड़े औद्योगिक समूह बनाने में मेरा भी काफी योगदान है. हालांकि इस परिवार से मेरे पुरखों का भी कोई निकट क्या दूर-दूर तक नाता नहीं रहा है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि यदि आपका किसी से कोई नाता नहीं हो तो आप उसकी उन्नति में सहभागी नहीं बन सकते, वैसे भी नज़दीकी रिश्तेदारी “लक्ष्मी” को कबूल नहीं रही है, उदहारण खुद दोनों अम्बानी हैं. अब बात फिर मूल मुद्दे की, मैं कह रहा था कि अम्बानी मेरे पैसों से कुबेरपति हुए हैं तो इसमें आश्चर्य करने या मेरे किसी घटिया नशे की हालत में होने की भूल कतई ना करें. मेरे पास अम्बानी की रिलायंस कंपनी के चार मोबाईल कनेक्शन हैं. हर माह इनमें श्रद्धानुसार बैलेन्स डलवाया जाता है, इसमें से टेक्स के नाम पर काफी राशि काट ली जाती है, यह रकम जाती है अम्बानी की ज़ेब में. इसी तरह देश भर में मेरे जैसे कई करोड़ ग्राहक इस कंपनी की मोबाइल सेवा का उपयोग करते हैं, इस तरह यह रकम हर दिन लाखों में बैठती है.
मैं बात की इतनी गहराई तक कभी नहीं जाता, और न ही इस तरह होने वाले लाखों के नुकसान का ही कोई हिसाब-क़िताब ही रखता, यदि मेरे मोबाइल खाते से अचानक 30 रूपये बिना कारण कट गए. मैं इतनी बड़ी रकम कट जाने से सन्न रह गया. मैनें तुरंत कम्पनी की ग्राहक सेवा केन्द्र पर फोन लगाया, लंबे दिशा निर्देशों का पालन करने के बाद कम्पनी प्रतिनिधि से बात हो पाई. उसे मैनें अपने भीषण नुकसान के बारे में बताया, उसने काफी देर तक इंतज़ार करवाने के बाद कहा “आपकी शिकायत दर्ज़ हो गई है, आपकी रकम 24 घंटे में आपको वापस मिल जायेगी, मैं खुश हुआ कि चलो घाटा नहीं हुआ, मगर जब एक हफ्ते बाद भी जब मेरी रकम वापस नहीं मिली तो मैंने फिर कम्पनी की ग्राहक सेवा केन्द्र पर फोन लगाया, फिर लंबे दिशा निर्देशों का पालन करने के बाद कम्पनी प्रतिनिधि से बात हुई, उसने सब कुछ समझ लार लगभग 20 मिनट इंतज़ार करवाया, फिर मुझसे खुद को जबरन माफ करवाते हुए बोला “ दो दिन में आपको पैसे वापस मिल जायेंगे.” उसकी भी बात पर भरोसा करने के अलावा मैं कुछ नहीं करने की स्थिति में ही था. अब दो दिनों का पहाड़ जैसा इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं है.
इस हिसाब से गुणा-भाग किया जाए तो मेरे जैसे सेंकडों ग्राहकों के पैसे यदि दो-दो दिन ही कम्पनी के खाते में जमा रह गए तो ही कम्पनी करोड़ों रुपया ब्याज़ से कमा लेती होगी. तो हुई ना मेरी बात सच, अम्बानी को करोड़पति मैंने बनाया. एक बात और जिससे आप भी कभी न कभी ज़रूर दो-चार हुए होंगे, आपने गौर किया होगा कि जब कभी आपने किसी कम्पनी की ग्राहक सेवा केन्द्र पर कोई शिकायत करने के लिए फोन लगाया होगा, लंबा इंतज़ार करने के बाद कम्पनी प्रतिनिधि से बात हो पाई होगी. इस दौरान आपने अक्सर ‘सभी प्रतिनिधियों के दूसरे कॉल पर व्यस्त’ होने का टेप भी सुना होगा, इस बारे में क्या कभी सोचा है? क्या यह नहीं सोचा जाए कि सम्बंधित कम्पनी के खिलाफ़ ग्राहकों को बहुत ज़्यादा शिकायतें रहती हैं इसलिए लाइनें या कम्पनी प्रतिनिधि अक्सर व्यस्त मिलते हैं.
28.5.10
अम्बानी को करोड़पति मैंने बनाया
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उपदेश सक्सेना
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बंदूकों की नाल से सत्ता नहीं निकलेगी
फिर एक बार नक्सलियों ने सत्ता को चुनौती दी है। मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के ट्रैक पर धमाका करके 65 लोगों की जान ले ली है। नक्सलियों के समर्थक बुद्धिजीवी उनका पक्ष लेते हुए कहते हैं कि समस्या के मूल में जाना होगा, समझना होगा कि वे आखिर बंदूक उठाने को मजबूर क्यों हुए। क्या वे बता सकते हैं कि इन हत्याओं से आदिवासियों की, गरीबों की समस्याएं हल हो जायेंगी? क्या इस तरह नक्सली बहुसंख्य देशवासियों की सहानुभूति खो नहीं रहे हैं? यह सर्वहारा के कल्याण का दर्शन है या निरा पागलपन? विस्तार से यहाँ पढ़ें------बात-बेबात
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Subhash Rai
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Labels: naxal
27.5.10
जबसे रोग लागा ब्लॉग्गिंग का मोरे सैंया
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आपका माणिक
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''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल
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युवा रचनाकार अशोक जमनानी से दस सवाल
कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर जानकार मैं और पाठक वर्ग आपके लेखन को और भी अच्छे से समझ सकेंगे.............आशा करतें हैं की जल्दी ही प्रत्युत्तर मिलेगा.
- लोग कहते हैं कविता का दौर ख़त्म हो गया है,कथा की तूती बोलती है,उपन्यास गढ़ने और पढ़ने का वक्त कम ही मिलता है.आप क्या कहेंगे?
- साहित्य संस्कृति के इलाके में राजनीति और धड़ेबाजी को लेकर आपके विचार
- समाज में आज भी साहित्य बदलाव लाने का बड़ा साधन बन सकता है,मध्य प्रदेश के परिदृश्य में ये कितना सही लगता है?
- साहित्य को लेकर पाठकीयता के ग्राफ पर आप क्या सोचते हैं?,वैसे अभी तक आपके भी तीन उपन्यास 'व्यास गादी' ,'बूढ़ी डायरी' और 'को अहम्' बाज़ार में आये,क्या अनुभव रहा ?
- साहित्य-संस्कृति के झमेले में अपनी शुरुआत से आज तक के सफ़र पर कुछ कहना चाहेंगे ?
- देशभर में छपने छपाने का दौर है,पढ़ने की आदत बूढा रही है,मगर लोगों का लेखन जवान हो रहा है,बहुत सा ज्य़ादा और अपरिपक्व ........क्या लगता है ?
- मीडिया के बढ़ते हुए मनमानीकरण और ठीक ठाक स्तर पर आ जाने से लघु पत्रिकाओं और ब्लॉग्गिंग जगत से क्या आस लगाई जा सकती हैं ?
- सत्य,भाव,आदर्श,ईमान,सादगी अहिंशा और स्वाभिमान जैसे गुणों की बात अब बेमानी लगती है....गहराते उपभोक्तावादी दृष्टिकोण पर क्या अनुभव करते हैं ?
- आपकी कौनसी रचनाएँ पाठकों के लिए आने वाली हैं ?
- कोई ऐसी बात जो हमारे से पूछने में छूट गई हो आप बताना चाहें.
माणिक
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''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल
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जाति-जनगणना के खिलाफ़ सबल भारत
(उपदेश सक्सेना)
1857 के स्वतंत्रता आंदोलन से डरे हुए अंग्रेज़ों ने 1871 की जनगणना में जाति-मज़हब का कॉलम भी जोड़ दिया था ताकि भारत में जनता की एकता भंग हो जाए, इसके बाद 1947 में हुआ भारत का विभाजन जातीय आधार पर हुआ था, अब एक बार केन्द्र की कांग्रेस नेतृत्व की गठबंधन सरकार उसी नीति पर चल पड़ी है. देश में चल रही जनगणना में जातीय आधार जोड़ने की कवायदें अब केन्द्रीय कैबिनेट से होकर मंत्रिमंडलीय समूह के पास तक जा पहुंची हैं. देश के बुद्धिजीवीवर्ग ने इसके खिलाफ़ एकजुटता बनाना शुरू कर दिया है.
हालांकि 1931 में कांग्रेस के खासे विरोध के बाद अंग्रेज़ सरकार ने जाति-जनगणना का ख्याल दिमाग से निकाल दिया था, मगर अब पुनः ऐसा होने जा रहा है. इस बारे में सबल भारत नाम का एक अभियान शुरू किया गया है, जिसके सूत्रधार राजनीतिक चिन्तक वेदप्रताप वैदिक बनाए गए हैं. इस अभियान को बलराम जाखड, वसंत साठे, जगमोहन. राम जेठमलानी, एमजीके मेनन,सोली सोराबजी जैसे ख्यात लोगों ने अपना समर्थन दिया है, वहीँ इसका संचालन आरिफ मुहम्मद खान,सुभाष कश्यप, जगदीश शर्मा, दिलीप पडगांवकर,रजत शर्मा, जैसी हस्तियों के पास है.अभियान के तहत जुलूस, धरना, उओवास, विरोध यात्राएं जैसे कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे.
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उपदेश सक्सेना
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अपनी माटी ब्लॉग-''काव्योत्सव '' रचनाएँ एक जून से
आभार माणिक
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''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल
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ओ......बाबा कृष्ण....!!संभाल लेना यार मुझको....हम सबको.....!!
ओ......बाबा कृष्ण....!!संभाल लेना यार मुझको....हम सबको.....!!
इन दिनों कई बार यूँ लगता है कि हम लिखते क्यूँ हैं.....हजारों वर्षों से ना जाने क्या-क्या कुछ और कितना-कितना कुछ लिखा जा चूका है....लिखा जा रहा है...और लिखा जाएगा....मगर उनका कुछ अर्थ....क्या अर्थ है इन सबका....इन शब्दों का...इन प्यारे-प्यारे शब्दों का इन तरह-तरह के शब्दों का अगरचे शब्दों के बावजूद....अपनी समूची भाषाई संवेदनाओं के बावजूद...बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद...दुनिया संबंधों के स्तर पर एक तरह के नफ़रत के पायदान पर आ खड़ी हुई है....धर्म के स्तर पर बिलकुल छिछली....भावना के स्तर पर एकदम गलीच....संवेदना के स्तर पर एकदम दीन-हीन....बस एक ही ख़ास बात दिखाई है इसमें....वो यह कि यह भौतिक स्तर पर क्रमश: विकसित होती चली जाती है मगर यह विकास भी इतना ज्यादा अनियंत्रित है कि उससे वर्तमान बेशक ठीक-ठाक सुविधाओं से परिपूर्ण दीख पड़ता होओ...मगर कुल-मिलाकर यह भी मानव के लिए बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता...और आदमी है कि अपनी सफलताओं पर इतना इतराता है कि मानो उससे बड़ा जैसे भगवान् भी नहीं.....और उसकी सफलताओं का सुबह-शाम-दिन-रात उसकी ही बनायी हुई पत्र- पत्रिकाओं और इंटरनेट के संजाल पर छापी और बिखरी दिखाई पड़ती है.....अपनी सफलताओं का दिन-रात इतना भयानक गुणगान....और उसके चहुँ और चर्चे और तरह-तरह की सफलताओं पर तरह-तरह की पार्टियां... और उनका शोर-शराबा...और एक किस्म का भयानक नशा अपने कुछ होने का....उससे से बढ़कर सामने वाले के कुछ ना होने का....मुझे यह समझने ही नहीं देता कि मैं लिख रहा हूँ आखिर क्यूँ लिख रहा हूँ...मेरे लिखने का अर्थ क्या है....उसका सन्दर्भ क्या है....उससे क्या बदलने वाला है....और मैं नहीं भी लिखूंगा तो ऐसा क्या बिगड़ जाएगा....किसी किताब में छाप जाना....और उस पर टिप्पणियाँ पाना....कहीं ब्लॉग पर लिख लेना और प्रशंसा पा लेना....क्या किसी के लिखने का यही ध्येय होता है...??
तो फिर जिस पीड़ा याकि जिस चिंता से हम लिखते हैं...जो वेदना हमारे लेखन में झलकती है(जो अपने आस-पास विसंगतियों का विकराल पहाड़ देख-कर चिंतित होकर लिखते हैं)और उस वेदना की स्थितियों का कोई निराकरण नहीं हो पाता...और हमारे कुछ भी लिखने के बावजूद भी बदलता हुआ नहीं दिख पड़ता... और ना ही बदलने की कोई संभावना ही दूर-दूर तक दिखाई ही पड़ती है...तो फिर सच बताईये ना कि हम सब क्यों लिखते हैं....मैं चिल्ला-चिल्ला कर आप सबसे यह पूछना चाहता हूँ कि भाईयों और बहनों हम सब क्यूँ लिखते हैं ??अगर लिखने से हमारा तात्पर्य सचमुच स्थितियों का थोडा-बहुत ही सही बदल जाने को लेकर है तो फिर कुछ फर्क दिखलाई नहीं पड़ने के बावजूद हमारा लिखना आखिर किस कारण से जारी है....सिर्फ आपस के कतिपय संबंधों से थोड़ी-बहुत प्रशंसा पाने के लिए...??
दोस्तों बेशक हममे से कुछ लोग यूँ ही लिखते हैं मगर ज्यादातर लोग तो मेरी समझ से व्यथीत होकर ही लिखते हैं और उनकी वेदना उनके लेखन में दिखाई भी देती है...और अपने दैनिक जीवन में भी ऐसे बहुत से लोग अपने आस-पास को बदलने के लिए जूझते हुए भी दिखलाई पड़ते हैं....भले उसमें उन्हें सफलता मिले या ना मिले...मगर सच तो यह भी है कि सफलता भी एक ऐसी चीज है जो अथक परिश्रम से मिल कर ही रहती है...और घोर परिश्रम से मिली सफलता का स्वाद भी बेहद मधुर होता है....इसलिए ओ मेरे दोस्तों कुछ भी करने का अगर उचित मकसद हो तो देर-अबेर उसके कुछ वाजिब अर्थ भी निकल ही आते हैं....!!
आज यह सब लिखना यह सोचकर शुरू किया था कि मैं आखिर क्यूँ हूँ....और लिखते-लिखते इसके उत्तर तक भी आन पहुंचा हूँ...वो यह कि हमारा काम होता है...अपना काम अपने पूरे समर्पण के साथ करना..... और जैसा कि कृष्ण-बाबा कह गए हैं कि फल की चिंता मत कर-मत कर-मत कर....सो अपन भी कृष्ण-बाबा के गीता-रुपी इस कथन को अपने जीवन में अपरिहार्य बना लिया है मगर क्या है कि इंसान हैं ना,सो कभी-कभी दिमाग बिगड़े हुए बैल की माफिक हो जाता है और अंत-शंट सोचने लगता है...और सोचते-सोचते सोचने लगता है कि उफ़ मैं क्या लिखता हूँ....मैं क्यूँ लिखता हूँ....उफ़-उफ़-उफ़....कुछ भी नहीं बदलता मेरे लिखने से...भाग नहीं लिखना अपुन को कुछ...मगर क्या है कि कर्म ही अगर जीवन है...तो हर कर्म जीवन का एक अभिन्न अंग और चूँकि जिन्दगी मेरी भी अभिन्न अंग है...इसीलिए कर्म करते ही जाना है अपन को....और उसका परिणाम अरे ओ अर्जुन के सखा बाबा कृष्ण....जा तुझ पर छोड़ता हूँ आज...अभी...इसी वक्त से....अब तू ही सम्भाल मेरे कर्मों को और मुझे....मेरे खुद को भी.....!!संभालेगा ना ओ मेरे यार......???
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राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ )
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jindgi
इस एक पल जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ जाती ।
मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और....
जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती ।
युँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और....
जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती ।
ये सिलसिला यहीं चलता रहता.....
फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पुछा..........
" तुम हार कर भी मुस्कुराते हो ! क्या तुम्हें दुख नहीं होता हार का ? "
तब मैंनें कहा................
मुझे पता हैं एक ऐसी सरहद आयेगी जहाँ से आगे
जिन्दगी चार कदम तो क्या एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी,
तब जिन्दगी मेरा इन्तज़ार करेगी और मैं......
तब भी युँ ही चलता रुकता अपनी रफ्तार से अपनी धुन मैं वहाँ पहुँगा.......
एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउगा..........
बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाँउगा।
ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउगा..........
मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और अपनी जीत पर भी.......
मगर जिन्दगी अपनी जीत पर भी ना मुस्कुरा पाई थी और अपनी हार पर भी ना रो पायेगी
कमल कश्यप
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kamal.kashyap
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dard
सूनी आंखों में ख्वाबों को सजाया जाए।
चलो दूर कहीं इक शहर बसाया जाए।।
कब
तक सोएगा मुसाफिर उस फुटपाथ पर।
सर तक धूप चढ आई है उसे जगाया जाए।।
जब
अपनों ने ही नहीं छोडा किसी काबिल तो।
किस हक से अब गैरों को बुलाया
जाए।।
क्यूं
कहूं दोस्त तुमको,क्यूं तुम्हें याद करूं।
किस काम
कि
दोस्ती,जिसमें हर गम सुनाया जाए।।
देखते देखते कितने दूर चले गए
तुम
तो।
तुम्ही बताओ ना तुम्हें कैसे बुलाया जाए।।
बहुत रात हो
चुकी
है सोचते सोचते।
चलो चादर से अब इन सितारों को हटाया जाए।।
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kamal.kashyap
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26.5.10
जो नहीं मिला उसका ज्यादा दुख
अब हम इस बात से दुखी भी हों तो इन बच्चों क ो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके लिए अपना सुख ज्यादा मायने रखता है। ऐसे में कई बुजुर्ग कलपते हुए प्रायश्चित भरे लहजे में स्वीकारते भी हैं कि उसी वक्त हमारे बच्चों को खेलने के लिए दे देते तो ज्यादा अच्छा रहता। ऐसा किया होता तो निश्चित ही उस वक्त बच्चों को खुशी मिलती पर उससे हमारा अभिभावक वाला गुरूर खत्म हो जाता, शायद इसीलिए संदूक में रखकर ताला लगाकर भूल गए।
हम सब लगभग इसी तरह के प्रसंगों का सामना करते ही हैं। हमारे बुजुर्गों की न तो ज्यादा आवश्यकताएं थीं और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे हर हाल में खुश रहना और हालातों से समझौता करना जानते थे। अब ऐसा नहीं है, हमारे पास जो है उसे हम भोग नहीं पाते और जो हमेंं मिलना संभव नहीं उसे पाने के प्रयास में घनचक्कर हुए जाते हैं। पूरी जिंदगी मेें हममें से कई लोग तो यह तय ही नहीं कर पाते हैं कि उन्हें क्या करना है और इस दुनिया में उनक ी कुछ उपयोगिता भी है या नहीं। हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाते। लिहाजा परिस्थितियों से समझौता करना नहीं समझ पाते। समझौता करना नहीं चाहते इसी कारण अपने ही हाथों अपने जीवन को असहज बना देते हैं। जो सुख हमें मिला है उसमें खुश होने की अपेक्षा हम इस चिंता में ही अपना खून जलाते रहते हैं कि सामने वाला सुखी क्यों नजर आ रहा है। दूसरे से जलन के मामले में यूं तो हम महिलाओं के स्वभाव का जिक्र तत्काल करने लगते हैं लेकिन पुरुष स्वभाव भी इस मामले में बिल्कुल महिलाओं जैसा ही है। हमें अपना पांच हजार का जूता और दस हजार का मोबाइल एक दिन बाद ही तब घटिया लगने लगता है जब हमारा पड़ोसी अपने जूते और मोबाइल का दाम हमसे ज्यादा बताता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी महिला ने भले ही दस हजार की साड़ी और पचास हजार का हार क्यों न पहन रखा हो, शादी समारोह में वह पड़ोस से गुजरी महिला के नेकलेस की फुसफुसाते हुए तारीफ इसी अंदाज में करेगी मेरे हार से उसका हार कितना अच्छा है न, मुझे भी ऐसा ही लेना था। बस कहते जरूर हैं कि हमे किसी से मतलब नहीं, अपने में मस्त रहते हैं, पर क्या वाकई हमारी कथनी और करनी में अंतर नहीँ है। हम तब ही अपने में मस्त रहते हैं जब सामने वाला मुसीबत में हो। उस वक्त हम चिंतित रहते भी हैं तो इसलिए कि कहीं वह दुखी आदमी आकर हमारे सामने अपना दुखड़ा न रोने लगे। सामने वाला रात-दिन मेहनत करके तरक्की कर भी ले तो हम उसकी यह तरक्की इसलिए नहीं पचा पाते क्योंकि उस मुकाम तक हम नहीं पहुंच पाए। हमें अपना काम तो सर्वश्रेष्ठ लगता है लेकिन दूसरे के काम में हम कमिया ही तलाशते रहतेे हैं।
हम अच्छा करना नहीं चाहते और कोई हमसे आगे निकल जाए यह हमें पसंद नहीं। हमारा बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबरों से पिछड़ जाए तो पेपर कठिन होना, तबीयत खराब हो जाने जैसे बहानों की मदद लेने मेें जरा सी देर नहीं लगाते। उसी क्लास में पढऩे वाला पड़ोसी का बच्चा अच्छे नंबर ले आए तो हम कहने से नहीं चूकते स्कूल वालों से पहचान है। ले-देकर नंबर बढ़वा लिए होंगे। छोटी सी जिंदगी में हमें अपना घर व्यवस्थित करने की फुरसत तो मिल नहीं पाती, दूसरे के अस्तव्यस्त घर का बखान करने में ही हम वक्त जाया करते रहते हैं। हमारे पास लोगों की मदद करने के लिए भले ही टाइम नहीं हो लेकिन सूई में नमक लगाकर उनके जख्म कुरेदने का भरपूर वक्त हमारे पास है।
एज केयर के सुझाव पर आज से ही अमल
संस्था एज केयर के अध्यक्ष डा वीके शर्मा के अनुरोध पर आज से इस कालम का पाइंट साइज कुछ बड़ा किया जा रहा है। उनका सुझाव था कि इससे वरिष्ठ नागरिकों को पढऩे में अधिक आसानी हो जाएगी।
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कीर्ति राणा
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समांतर सिनेमा भी अकाल मौत को प्राप्त हुआ
हिदी सिनेमा का इतिहास -12
- राजेश त्रिपाठी
गुलजार ने जहां एक ओर ‘परिचय’ जैसी साफ-सुथरी फिल्म दी, वहीं उन्होंने ‘कोशिश’ में गूंगे-बहरों की समस्या को उभारने की ईमानदार कोशिश की। इस फिल्म में संजीव कुमार और जया भादुड़ी का अभिनय बहुत ही प्रशंसनीय रहा। गुलजार ने युवा-विद्यार्थी असंतोष पर ‘ मेरे अपने’ फिल्म बनायी। इसी कथानक पर पहले तपन सिन्हा बंगला में ‘अपनजन’ के नाम से फिल्म बनायी थी।
नशीली चीजों की तस्करी और इनके इस्तेमाल पर रामानंद सागर की फिल्म ‘चरस’ और देव आनंद की ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का नाम लिया जा सकता है। सेक्स की थीम पर वी. शांतराम की ‘पर्वत पर अपना डेरा’, देवकी बोस की ‘नर्तकी’ (1940), केदार शर्मा ‘जोगन’ (1950) और बाद में उनकी ही ‘चित्रलेखा’ (1941, 1964), न्यू थिएटर्स की ‘मुक्ति’ आदि फिल्में बनीं। सेक्स शिक्षा के नाम पर बी. के. आदर्श ने ‘गुप्त ज्ञान’, ‘गुप्त शास्त्र‘ जैसी फूहड़ फिल्में पेश कीं, तो पैसा कमाने के लिए ऐसी फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया, जिनकी कड़ी थीं ‘कामशास्त्र’ , ‘स्त्री पुरुष’ और ‘मन का आंगन’ आदि।
ग्रामीण समाज में व्याप्त सूदखोरों के जुल्म पर महबूब खान की ‘औरत’, ‘रोटी’ और ‘मदर इंडिया’ बनी। निहित स्वार्थों के खिलाफ एक पत्रकार के संघर्ष की गाथा बांबे टॉकीज की ‘नया संसार’ में देखने को मिली।
मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ ने फिल्मों को एक नयी लीक दी। इस लीक को नाम दिया गया कला फिल्म या समांतर सिनेमा। इन फिल्मों ने फिल्म के सशक्त माध्यम के सही उपयोग का रास्ता खोल दिया। फिल्में सम सामयिक समाज की जुबान बन गयीं। अब वह सिर्फ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रह गयीं। वे सामाजिक संदेश भी देने लगीं। इन फिल्मों में फंतासी के बजाय वास्तविकता पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। दर्शकों को लगने लगा कि फिल्म के रूप में वे अपने गिर्द घिरी समस्याओं, कुरीतियों और भ्रष्टाचार से साक्षात्कार कर रहे हैं। अब फिल्म उनके लिए महज मनोरंजन का जरिया भर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना बन गयी जिसमें वे रहते हैं। इस आईने ने उन्हें श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ , ‘मंथन’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’ से समाज की कई ज्वलंत समस्याओं से रूबरू कराया। इस लिहाज से स्मिता पाटील अभिनीत ‘चक्र’ (निर्देशक-रवींद्र धर्मराज) भी मील का पत्थर साबित हुई।इस तरह के सिनेमा को समांतर सिनेमा का नाम दिया गया जहां वास्तविकता को ज्यादा महत्व दिया गया। जीवन के काफी करीब लगने वाली और समय से सही तादात्म्य स्थापित करने वाली इन फिल्मों का दौर लंबं समय तक नहीं चल पाया। तड़क-भड़क, नाच-गाने और ढिशुंग-ढिशंग से भरी फिल्मों के आगे ये असमय ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। जीवंत सिनेमा कही जाने वाली इन फिल्मों की वित्तीय मदद के लिए राष्ट्रीय फिल्म वित्त निगम आगे आया, जो बाद में फिल्म विकास निगम बन गया। (क्रमशः)
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Rajesh Tripathi
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उठ गया अब उसके विचारों का जनाज़ा भी - हे राम !
"हुई मुद्दत के गालिब मर गया फिर भी याद आता है
वह हरेक बात पर कहना की यूँ होता तो क्या होता"|
अजमल आमिर 'कसाब' को अंततः विशेष अदालत ने सजा सुना ही दी| उसे पांच गंभीर मामलों में फांसी पर लटकाने की सजा दी गई है| तथाकथित भारतीय राष्ट्रवाद की इस अप्रतिम जीत पर राष्ट्रवाद का लबादा ओढे लोगों में उत्साह का आलम यह था की उनहोंने अनदिने आये इस दीपावली को सड़कों पर खूब धूम-धाम से मनाया| महाराष्ट्र सहित अन्य कई जगहों पर मिठाइयाँ बंटी और पटाखे छोड़े गए, यानी की भरपूर जश्न का माहौल| फांसी की तारीख जल्द ही मुक़र्रर होगी और फिर लोग बेसब्री से उस दिन का और वैसी ही घटना का इंतजार करेंगे जैसा की १४ अगस्त २००४ को कोलकाता के धनंजय चैटर्जी को फांसी दिए जाने के वक्त उनहोंने किया था| घटना की पुनरावृति हो रही है मीडिया लोगों तक इसे बखूबी परोसने और कमाई के इस नायाब तरीके को यूहीं हाथ से जाने तो देगा नहीं इसलिए जब तक कसाब के शरीर को फांसी पर से उतारा नहीं जाता तब तक उसकी मौजूदगी सम्बंधित खबर की खाल उतरने की रहेगी ही|खैर
उपरोक्त बात तो रही सूद की अब मूल बात यह है की जिस देश में आय-दिन गांधी और उनकी कृतियों की वर्तमान प्रासंगिकता पर बहस-मुबाहसे होते रहते है वहीँ दूसरी तरफ उनके विचारों को बर्बरता से रौंदा जाता है| आखिर यह बात समझ में नहीं आती की जिस देश में गांधी की अहमियत इतनी ज्यादा हो की उसे राष्ट्रपिता का दर्ज़ा दिया जाए और इससे बढ़ कर यह नाम लोगों की भावनाओं को धर्म की भांति छूता हो वहां उसके विचारों की कोई अहमियत ही नहीं| अगर आज गांधी होते तो कसाब को फांसी दिए जाने सहित तमाम ऐसे मुद्दों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती यह सवाल हमारे जेहन में क्यों नहीं कौंधता- यह एक शास्वत सवाल है| अहिंसा के जरिये भारत को पराधीनता की जकड़न से निकाल एक नई लोकतांत्रिक पहचान दिलाने वाले गांधी ने हमसे नहीं कहा था की उन्हें लोग राष्ट्रपिता के रूप में याद रखें| यह नेहरु थे जिन्होंने उन्हें यह कहा और जनता की आम सहमती इसमें रही| केवल राष्ट्रपिता भर कह देने से एक पिता के प्रति सारे कर्तव्य ख़त्म नहीं हो जाते| उसके जीवित रहने या मृत्यु के बाद उसके विचारों को आत्मसात करना भी हमारी जिम्मेदारी हो जाती है| पर हमें संवेदनशील और सहिष्णु होना पसंद नहीं आया|
भारतीय समाज आखिर किस मिट्टी का बना है - पता नहीं| ख़ुशी और गम इसे किन-किन विषयों में मिलेगा कहा नहीं जा सकता| दोनों ही मनोदशाओं की परिणति अतिवाद होता है| विचारों से ज्यादा भावना प्रबल इस समाज का अतिवादी स्वरुप सचिन के छक्के से लेकर कसाब की फांसी और गड्ढे में बच्चे के गिरने से लेकर दंतेवाड़ा की घटना में देखी जा सकती है| आखिरकार हम किस छलावे में फंसे हैं| खुद को भूल जाने का यह बहाना भी बहुत खूब है की ऐसी घटनाओं पर हम पटाखे छोड़े और मिठाइयाँ बाटें| हमें सोचना होगा की कहीं यह पटाखे तो हम उन लोगों के विचारों की लाश पर नहीं छोड़ रहे जिन्होंने हमारे अन्दर भारतीय राष्ट्रवाद के बीज बोए थे| एक जगह मैंने पढ़ा था की- "जिस तरह हांथियों के मरने पर जैसे उसकी लाश को कुल्हाड़ी से काट कर उसी से उठाया जाता है उसी तरह पुराने समाजों का जनाज़ा भी इसी तरह उठता है"|
राष्ट्रपिता की हत्या हो गई और धीरे-धीरे वैचारिक स्तर पर भी गांधी का जनाज़ा निकल गया| राष्ट्र अब अनाथ हो गया लगता है| हे राम !
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पावर प्रोजेक्ट का भूत सीएम दरबार से उठा
पावर प्रोजेक्ट का भूत सीएम दरबार से उठाविरोध्ी चाहते हैं 2012 में अर्जुन नहीं अभिमन्यु बने निशंकदेहरादून, 26 मई। पावर प्रोजेक्ट के भूत ने उत्तराखंड सरकार की साख को देशभर में जहां बट्टा लगाने का काम किया वहीं सीएम दरबार के ही कुछ ददरबारियों की कारसतानी के चलते देशभर में प्राचारित करने का षडयंत्रा भी रचा गया। प्रदेश की कमान संभालने के बाद से ही डाक्टर निशंक की राह में हर बार रोड़े अटकाने का काम उनके विरोध्ी करते रहे हैं। लेकिन हर बार अर्जुन की तरह जिस तरह से डाक्टर निशंक ने निशाने साध्कर हर बार विजयश्री हासिल की उसने विरोध्यिों को यह सोचने पर विवश कर दिया कि आखिर निशंक की राजनीति के आगे हर कोई मुकाबला नहीं कर सकता। दो ध््रुवों में बंटे खंडूड़ी व कोश्यारी भी एक ही खेमे में जुटे तो प्रदेश की राजनीति में कई तरह की आशंकाओं को पिफर से पुर्नजन्म मिलता हुआ देखा गया। पावर प्रोजेक्ट के भूत ने निशंक की साख को जहां देशभर में गलत तरीकेे से प्रचारित करने का जो खेल एक टीवी चैनल के इशारे पर खेला गया उसमें भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस व सीएम के दरबारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहां तक कि टीवी चैनल के दिल्ली कार्यालय में भी डाक्टर निशंक को लाइन पर लेने का खेल एक भाजपा नेता द्वारा पूरी तरह से अंजाम दिया गया। वहीं पूरे खेल को उत्तराखंड में डेढ महीने से अध्कि समय तक रहते हुए ऐसे स्थानपर खेला गया जिसकी भनक प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा. निशंक तक को नहीं लग सकी। पावर प्रोजेक्ट को लेकर सारे दस्तावेज जिस तरह से टीवी चैनल को मुहैया कराए गए उसके पीछे कहीं न कहीं एक बड़े षडयंत्रा की बू भी सामने आ निकली है। दस्तावेजों को जिस तरह से दूसरे हाथों में पहुंचाकर पावर प्रोजेक्ट के आवंटन को रोकने का खेल खेला गया उसे लेकर भी पैसे की मोटी डील उभरकर सामने आ गई है। जब प्रदेश के मुख्यमंत्राी डा0 निशंक को अपने खिलापफ रचे गए षडयंत्रा का पता चला तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई कि आखिर उन्हीं के कुछ लोगों द्वारा इस षडयंत्रा को पूरी तरह तैयार किया गया। जिसके बाद जांच की तो परत दर परत पूरे घटनाक्रम की खुलकर सामने आ गई। कांग्रेसी नेताओं के साथ-साथ भाजपा नेताओं की भूमिका भी इस मामले में पूरी तरह खुलकर जैसे ही प्रदेश के आका को लगी तो उन्होंने गोपनीय जांच कर उन लोगों से दूरी बनानी शुरू कर दी जो कापफी विश्वास पात्रा माने जाते थे। सबसे पहले पावर प्रोजेक्ट के भूत पर सीएम के दरबारी पर डा. निशंक का कहर टूटा उसके बाद जल विद्युत निगम के योगेंद्र प्रसाद उनके निशाने पर रहे बाकी के बचे लोगों से डा. निशंक ने अब बेहद दूरी बनाकर उन्हें सीएम दरबार से दूर रहने तक की सलाह दे डाली है यहां तक कि मुख्यमंत्राी की पांचवी मंजिल में उनके प्रवेश तक को प्रतिबंध्ति कर दिया गया है क्योंकि पावर प्रोजेक्ट को लेकर पूरा खेल सीएम की पांचवी बिल्डिंग से ही संचालित किया जाता रहा। कुल मिलाकर अब पावर प्रोजेक्ट के भूत पर कांग्रेस कोर्ट जाने की बात जनता के बीच कह तो रही है लेकन विध् िविशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस के पास कोई ठोस हथियार कोर्ट में चलाने लायक मौजूद ही नहीं है। क्योंकि पावर प्रोजेक्ट का अंतिम आवंटन अभी तक कागजों में नहीं किया गया है जिसने कांग्रेस के खेल को पूरी तरह बिगाड़ डाला है। वहीं अपने विरोध्यिों को परास्त करने में प्रदेश के सीएम अब पूरी जी जान से जुट गए हैं। और विश्वास का कदम बेहद पफूंक-पफूंक कर रखा जा रहा है। क्योंकि विरोध्ी चाहते हैं कि डा. निशंक अर्जुन की बजाय 2012 में अभिमन्यु की भूमिका निभाते हुए यु( में परास्त हो तभी उनकी विजयश्री हो सकती है।
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narayan pargain
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शशि से थरूर और पुष्प सी सुनंदा की सगाई 26 या 27 जून को
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Shri Sitaram Rasoi
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जनगणना में जाति का क्या काम??
हमारे देश की सबसे बड़ी विशेषता है अनेकता में एकता !इसीलिए अंग्रेज कभी भी हमें बाँट नही पाए ,लेकिन आखिर में उन्होंने फूट डालो और राज़ करो का सहारा लिया!आज हमारे नेता फिर उसी रास्ते पर चल रहे है!देश में फिर जाति आधारित जनगणना की बात उठाई जा रही है!पूरे विश्व में कहीं भी जाति को इतना महत्त्व नही दिया जाता,जितना की हमारे देश में!हर जाति का एक अलग संगठन बना है....जैसे ब्रह्मण समाज,अग्रवाल समाज,प्रजापत समाज आदि!ये समाज अपनी अपनी जाति के विकास के लिए प्रयत्न करते है ...ठीक है पर क्या समाज को इस तरह बांटे बिना विकास नही हो सकता? जनगणना को जातीय आधार पर करना बिलकुल उचित नही होगा!इससे पहले से ही विभिन्न वर्गों में विभाजित समाज में और दूरियां बढ़ेगी! आज अलग अलग जातियों को लेकर जिस तरह से पंचायतें हो रही है और आरक्षण को लेकर राजनीती हो रही है,वो इस निर्णय से और बढ़ेगी ये सब हमारे एकीकृत समाज के लिए घातक होगा!
राष्ट्रीयता की भावना के विकास के लिए समाज को जातिविहीन करना ही होगा! जनगणना में जाति को शामिल करने से और भी बहुत सी विसंगतियां पैदा हो जाएगी!नेता लोग और खाम्प पंचायतें जातिगत जनगणना का दुरूपयोग करेंगे! देश में पहले ही जाति को लेकर आरक्षण की मांग हो रही है,जो और बढ़ेगी! आज जरूरत इस बात की है क़ि हम समाज की भलाई के लिए इसे जातियों में ना बांटे!विकासशील देश इतना विकास इसी लिए कर पाए क्यूंकि वहां जातिगत राजनीती नहीं है!तो फिर हम क्यूँ अभी भी विभिन्न वर्गों में बँटे रहना चाहते है? !सबको समानता का अधिकार भी सबको समान मानने से ही मिलेगा,विभाजित करने से नही!! जाति आधारित जनगणना किसी भी सूरत में उचित नही है!!
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RAJNISH PARIHAR
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इंडिया शाइनिंग, 50 हज़ार में बिके 9 भूखे आदिवासी
(उपदेश सक्सेना)
50 हज़ार रूपये में आज एक अच्छी मोटर सायकिल नहीं आती, इस राशि में कोई अच्छा क़ारोबार नहीं किया जा सकता, महंगाई के इस दौर में 50 हज़ार रूपये में भले ही कुछ ज़्यादा नहीं आ सकता हो, मगर इतने धन में जीते-जागते मनुष्य ज़रूर खरीदे जा सकते हैं, वह भी एक-दो नहीं पूरे 9, साथ में दो बच्चे फ्री. यह हकीकत है देश के उस राज्य मध्यप्रदेश की, जिसे कृषिप्रधान कहा जाता है. इंसानी खरीद-फ़रोख्त का यह मामला है दतिया जिले का. इस घटना ने एक बार पुनः यह साबित कर दिया है कि दबंगों-सामंती मानसिकता के लोगों के लिए इंसान और इंसानियत की कोई क़ीमत नहीं है.
राज्य के इस जिले से प्रदेश के विधि मंत्री नरोत्तम मिश्रा प्रतिनिधित्व करते हैं, मगर वे भी इन आदिवासियों की “विधि का विधान” नहीं बदल सके. हालांकि राज्य की शिवराजसिंह सरकार हमेशा से इस बात के दावे करती आई है कि प्रदेश में भुखमरी की कहीं-कोई स्थिति नहीं है, लेकिन भूख से बिलबिला रहे इन 9 आदिवासियों को भरपेट रोटी और बेहतर काम का आमंत्रण बुरा नहीं लगा, क्योंकि सरकार की ज़मीनी हकीकत तो वे ही जानते हैं. कहने को हम सायबर युग के प्रवेश द्वार पर खड़े हैं, 21 दीं सदी को छूने ही वाले हैं, मगर यह इंसानी खरीद-फ़रोख्त हमें धुर आदम युग की याद दिलाने को काफी है. यह घटना किसी को पता भी नहीं चलती यदि एक “बिका हुआ” आदिवासी क़ैद से छूटकर भाग नहीं आता. अब सरकार और प्रशासन इस बात की लीपा-पोती में जुटे हैं (यही इनका काम भी है), परम्परागत रूप से जांच के आदेश हो चुके हैं, यदि यह आदिवासी सच्चा हुआ तो ही बाकी “गुलामों” को छुडवाने टीम भेजी जायेगी. भूखा-नंगा आदिवासी झूठा भी तो हो सकता है. आखिर मेरा भारत महान है. सच है–भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां विदेशों से अनाज़ आयात किया जाता है, उसी तरह जैसे– भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां आये दिन साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं.
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उपदेश सक्सेना
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25.5.10
राठौर को दिखा आईना, आरुषि को कब मिलेगा न्याय?
(उपदेश सक्सेना)
हर हँसी प्रसन्नता की नहीं होती, कई बार हँसने वाला व्यक्ति खिसियाया हुआ भी हो सकता है. हरियाणा के पुलिस महानिदेशक रहे शम्भू प्रताप सिंह राठौर को भारतीय न्याय व्यवस्था ने आईना दिखा दिया है.अपनी बेटी से भी कम उम्र की रुचिका गिरहोत्रा के साथ यौन छेड़छाड़ के आरोपी राठौर को अदालत ने डेढ़ साल की सज़ा सुनाई है. आखिरकार रुचिका व उसके परिवार को इंसाफ मिल गया। कोर्ट के इस फैसले के बाद राठौर को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसे बुड़ैल जेल भेज दिया गया है.
इस साल जनवरी में जमानत पाने के बाद राठौर के चेहरे पर पुरानी मुस्कान फिर लौट आई थी। अदालत से निकलते हुए वह खुल कर मुस्कुरा रहा था। उसने मीडियाकर्मियों को ताना मारते हुए यह भी कहा कि उसने मुस्कुराना जवाहरलाल नेहरू से सीखा और वह आगे और मुस्कुराएगा। उसने मीडिया पर जम कर गुबार निकाला। उसने कहा, मैं न्याय व्यवस्था को उस तरह नष्ट नहीं करना चाहता जैसे कि मीडिया कर रहा है। इसलिए मैं जांच से जुड़े किसी भी मुद्दे पर कुछ नहीं बोलूंगा।
लेकिन, अगर आप चाहते हैं तो मैं अपनी मुस्कुराहट पर जरूर बोलूंगा जिस पर आप कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं। मैंने पंडित जवाहर लाल नेहरू से सीखा है कि मुश्किलों में कैसे मुस्कुराते हैं। मैं और ज्यादा मुस्कुराऊंगा। अगर आप मुझे नुकसान पहुंचाते हैं तो मैं और ज्यादा मुस्कुराऊंगा।' आज भी अदालत में सज़ा सुनाये जाने के बाद उसके चेहरे पर हँसी की बारिक़ लकीरें दिखाई दीं थी. रुचिका के परिवार और सीबीआई ने याचिका दायर की थी कि राठौर को इस मामले की अधिकतम दो साल की सजा दी जाए। कोर्ट ने राठौड़ की याचिका अस्वीकार कर दी जबकि सीबीआई और रुचिका के परिवार की ओर ये दायर याचिका को स्वीकार करते हुए राठौड़ की सजा को बढ़ाकर डेढ़ साल कर दिया।देश भर में ऐसे कई मामले अदालतों की तारीखों के जाल में उलझे हुए हैं, जिनमें राठौर जैसे नर-पिशाचों के पापों की सज़ा का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है. एक अन्य मामले (आरुषि तलवार) मामले में तो जांच एजेन्सी की जांच की दिशा पर ही सवालिया निशान लगाए गए हैं. निठारी जैसे कांड के आरोपियों को सजाओं का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है. यौन उत्पीडन जैसे अपराधों को सबसे घृणिततम प्रकृति का बनाते हुए ऐसे मामलों के आरोपियों को तुरंत सज़ा का प्रावधान होना चाहिए. देरी से मिला न्याय अपना नैसर्गिक असर खो देता है. उस देश में जहां राष्ट्राध्यक्ष महिला हो, जहां सर्वशक्तिमान महिला का सरकार पर नियंत्रण हो वहाँ महिला अपराधों को लेकर लचर क़ानून होना हमारी न्यायप्रियता पर संदेह पैदा करता है, होना यह चाहिए कि, ऐसे मामलों के लिए त्वरित अदालतें बनाई जाएँ जहां कोई राठौर, कोई पंढेर, कोई कोहली न्याय प्रक्रिया का उपहास न उड़ा सके.
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उपदेश सक्सेना
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राह से भटक गया है आर्य समाज?
(उपदेश सक्सेना)
अपनी स्थापना के १३५ साल बाद आर्य समाज संगठन अपने उद्देश्यों से भटक गया लगता है. 10 अप्रैल 1875 को जब बम्बई में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का गठन किया था तब उसका मुख्य उद्देश्य वेदिक संस्कृति को मानने वाले ऐसे लोगों का समूह बनाना था जो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ़ लड़ सकें. इसके कामकाज में गुरुकुल-स्कूलों का संचालन, शुद्धि सभाएं करना आदि थे, इसे Society of Noble people का नाम दिया गया था. अब आर्य समाज ने अपनी भूमिका केवल प्रेम विवाह करवाने वाली संस्थान तक सीमित कर ली है. देश भर में चल रहे आर्य समाज मंदिरों में आज सामाजिक बुराइयाँ मिटाने से ज़्यादा जातीय-अंतरजातीय विवाह करवाए जाते हैं, यह ज़मीनी हकीकत है, इससे कई लोगों को ख़ासा बुरा भी लग सकता है.
आंकड़े गवाह हैं कि पिछले कुछ दशकों में देश में हुए अधिकाँश विवाह इन आर्य समाज मंदिरों में हुए हैं. इन तथ्यों की तस्दीक की है हरियाणा के आर्य समाज ने. वहाँ आर्य समाज के एक धड़े ने माता-पिता और गांव वालों की अनुमति के बिना समाज के मंदिरों में होने वाली शादियों पर रोक लगाने का फैसला किया है। सभा के प्रतिनिधि के अनुसार “हम एक ही गोत्र और गांव में शादी की अनुमति नहीं दे सकते। समाज के कायदे-कानून का उल्लंघन करने वाली शादियों को भी स्वीकृति नहीं देंगे।“ अपनी सफाई में सभा के प्रतिनिधि की ओर से यह भी कहा गया है कि वे अंतरजातीय विवाह का विरोध नहीं करते, लेकिन भविष्य में शादी करने वाले जोड़ों को मंदिरों में अपने माता-पिता और गणमान्य लोगों के साथ आना होगा। उनके मुताबिक प्रेम विवाह हितकर नहीं है क्योंकि ऐसी शादियों में युवा सिर्फ सुंदरता देखते हैं।वे शादी के आधार की प्रकृति और गुणों को नहीं देखते। इस लंबे चौड़े स्पष्टीकरण में आगे कहा गया है कि भावी संतान को सुसंकृत करने के लिए सोलह संस्कारों का आदेश है. चाहे किसी भी विकृत अवस्था मे हो सम्पूर्ण भारत वर्ष के हिंदु समाज मे इन संस्कारों का किसी न किसी रूप मे पालन किया जाता रहा है. सब का नही तो कुछ महत्वपूर्ण संस्कारों का प्रचलन तो है ही, यही भावनाएं यम और नियम भी हमे याद कराती हैं. एक हिंदु का सामाजिक व्यवहार विश्व के सब लोगों से पृथक इन्ही भावनाओं के कारण होता है. जिन मे से विकृतियों के कारण कुछ हमारे समाज के लिए एक अभिशाप भी सिद्ध हो रहे हैं.
हरियाणा और कुछ अन्य जगहों की खाप पंचायतों द्वारा पिछले लंबे समय से सगोत्र विवाह करने वालों को हिंसक दंड दिए जाने की घटनाएं बढ़ गई हैं. इस समानांतर क़ानून व्यवस्था को कतई जायज़ नहीं कहा जा सकता, हालांकि यह लंबी बहस का मुद्दा हो सकता है कि एक ही जाति में विवाह करना कितना बड़ा ज़ुर्म है, लेकिन इसकी आड़ में होने वाली हत्याएं भी किसी क़ीमत पर जायज़ कैसे कही जा सकती हैं. वेदिक तकनीक और मनु की आचार-संहिता का पालन हो अथवा वेदिक संस्कृति की पुनर्स्थापना यह तभी संभव होंगे जब इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गठित आर्य समाज जैसी संस्थाएं अपनी लीक से हटकर काम न करें.......देश तो वैसे भी रसातल में जा रहा है.
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उपदेश सक्सेना
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हां, राठौर की सजा बढ़ गयी
समाज में अपराधियों की कमी नहीं है लेकिन लोग शांति से जीना चाहते हैं। कोई नहीं चाहता कि उसका ऐसे लोगों से पाला पड़े, जिन्होंने अपराध को अपनी जीवन-शैली के रूप में स्वीकार कर लिया है। अपराधी जब केवल अपराधी होता है, तब उससे मुकाबला करना आसान हो जाता है। क्योंकि तब पूरा समाज इस मुहिम में साथ खड़ा नजर आता है। भौतिक रूप से भले कोई सामने न आये लेकिन जब भी कोई आदमी समाज के दुश्मनों से जूझता है तो लोग भीतर ही भीतर उसके लिए प्रार्थना तो करते ही हैं।
दिन पर दिन भीरु होते समाज में अभी इतनी जान बाकी है तो भला समझिये। पुलिस, प्रशासन भी देर-सबेर ऐसी मुहिम का साथ देता ही है। परंतु अगर वह अपराधी सरकारी तंत्र में हो, पुलिस में हो, प्रशासन में हो तो बहुत मुश्किल हो जाती है। कोई साथ नहीं आना चाहता, कोई पहल नहीं करना चाहता। कौन अपनी जान सांसत में डाले? और ऐसा अपराधी अपने पद, अपनी हैसियत, अपने रसूख का इस तरह इस्तेमाल करता है कि सीधे उसकी संलिप्तता उजागर होती ही नहीं। एसपीएस राठौर ने यही किया।
अभी कुछ ही महीने पहले रुचिका का मामला जब सुर्खियों में आया था तो कितनी सारी कहानियां मीडिया में उछलीं थीं। इन कहानियों ने राठौर को एक क्रूर खलनायक के रुप में सबके दिमाग में ठूस दिया था। किस तरह उसने रुचिका के भाई को उत्पीड़ित कराया, किस तरह उसने रुचिका को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया, किस तरह उसने पूरे परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया, उन्हें मकान बेचकर भाग जाने को मजबूर कर दिया।
मीडिया की पक्षधरता ने आखिरकार पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। केंद्र सरकार तक हिल गयी और उसे कई महत्वपूर्ण फैसले करने पड़े। राठौर को मिले पदक छीन लिये गये। सीबीआई अदालत के निर्णय के बाद बाहर निकलते हुए उसके चेहरे पर जो विजय दर्प की मुस्कान उभरी थी, उसने कितना बवाल कराया था, सबको याद है। तब सभी यही अंदाज लगा रहे थे कि इस खलनायक को बड़ी सजा जरूर मिलेगी, कम से कम उम्र कैद तो होगी ही। परंतु तब भी उसकी वकील पत्नी जिस तरह के दावे ठोंक रही थी, वह अनायास नहीं था।
वह जानती थी कि उसके पति ने जो भी कराया है, उसके बहुत कम सबूत छोड़े हैं। अब जब सत्र अदालत ने राठौर को सजा सुनायी है तो इस सचाई को समझना कठिन नहीं रह गया है। कुल 18 महीने कैद की सजा। फिर भी यह सीबीआई अदालत द्वारा सुनाई गयी सजा की तीनगुनी है। यह समझा जाना चाहिए कि उसकी सजा बढ़ा दी गयी है। हालांकि अभी राठौर को आगे अपील करने का पूरा अवसर है लेकिन अगर उसे डेढ़ साल भी कैद काटनी पड़ी तो यह उस जैसे सुविधाभोगी आदमी के लिए एक दुस्वप्न की तरह होगी।
असल में ऐसे सफेदपोश अपराधियों की सजा समाज को खुद निश्चित करनी चाहिए। लोग ऐसे लोगों का संपूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं। समाज से अलगाव की यंत्रणा बहुत कठिन होती है और यह किसी भी कैद से कई गुना भयानक होती है। राठौर को जेल की रोटी कब तोड़नी पड़ेगी, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन समाज तो उसकी सजा तुरंत शुरू कर सकता है। अभी से, आज ही से।
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Subhash Rai
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24.5.10
नैनीताल क्या नहीं...क्या क्या नहीं, यह भी...वह भी, यानी "सचमुच स्वर्ग"
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डॉ. नवीन जोशी
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दुखी टीवीकर्मी सेलरी के लिए श्रमायुक्त के पास पहुंचे
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यशवंत सिंह yashwant singh
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धैर्य का इम्तेहान न लें
मनमोहन सिंह अभी आप को भूले नहीं हैं। उनको याद हैं आप सब। उन्हें याद है कि इसी जनता ने उन्हें कुर्सी सौंपी है। उन्हें याद है कि जनता महंगाई से बहुत परेशान है। जीवन कठिन हो गया है। चादर छोटी हो गयी है। लोग पांव ढंकते हैं तो सिर बाहर आ जाता है और सिर ढंकते हैं तो पांव खुल जाता है। देशवासियों का क्या दोष?
बड़ों की, अमीरों की, धनपतियों की बात नहीं कर रहा परंतु गरीब और मध्यवर्ग का मानुष तो वैसे ही परेशान रहता है। घर चलाना, बच्चों को पढ़ाना कोई आसान काम नहीं रहा। एक ईमानदार जिंदगी के लिए बहुत मुश्किल है। इसीलिए वे बेचारे तो हमेशा इसी कोशिश में रहते हैं कि जितनी बड़ी चादर हो, उतना ही पांव पसारें लेकिन अगर कोई उनकी चादर ही फाड़ने पर उतारू हो तो वे क्या करें। महंगाई ने यही तो किया। खाने-पीने के सामान से लेकर कपड़े, तेल, साबुन, बच्चों की किताबें, सबकी कीमतें बढ़ गयीं। छोटे दुपहिया से चलने वालों की मुश्किल तब और बढ़ गयी, जब पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये गये।
आम आदमी एक तो महंगाई से त्रस्त था, दूसरे मनमोहन सरकार के मंत्री उसके घाव पर अपने जले-भुने बयानों का नमक छिड़कते रहे। कोई कहता कि उसके पास जादू की छड़ी नहीं है, जो छू दे और महंगाई नीचे उतर आये। कोई कहता उसे क्या मालूम महंगाई कब कम होगी, वह कोई ज्योतिषी तो है नहीं। अरे भाई, किस बात के मंत्री हो, जब तुम्हें कुछ भी नहीं पता, जब तुम कुछ भी नहीं कर सकते। अब क्या प्रधानमंत्री ज्योतिषी हैं जो उन्होंने कह दिया है कि दिसंबर तक महंगाई पर काबू कर लेंगे?
चलो इस तरह उन्होंने बहुत लंबा समय जनता से मांग लिया है। अगर उस समय भी महंगाई नीचे नहीं उतरी तो कोई न कोई वाजिब कारण तो होगा ही। जनता को पूरी ईमानदारी से बता दिया जायेगा कि महंगाई क्यों काबू में नहीं आ पायी। मनमोहन सिंह से इमानदारी की तो उम्मीद कर ही सकते हो। कई राज्यों में नक्सली सरकारों को परेशान किये हुए हैं, उन पर भी काबू करना है। वह भी कर लेंगे। बस आप थोड़ा धैर्य रखिये। जनता के पास और अस्त्र क्या है? धैर्य रखना और चुपचाप सरकारों और मंत्रियों की गैरजिम्मेदारी का खामियाजा भुगतना, जनता के ये दो महान कर्तव्य हैं और वह कहां इन्हें निभाने में कोई चूक करती है।
यह सरासर छल है, अन्याय है, प्रशासनिक नियंत्रण के अभाव का परिणाम है, समय से उचित और माकूल निर्णय न ले पाने का अंजाम है। आखिर इसका दुष्परिणाम जनता क्यों भुगते? सरकार को यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए कि इस तरह के वादे, बहकावे बहुत लंबे समय तक नहीं चलते। जनता धैर्य तो रखती है, पीड़ाएं चुपचाप तो सहती है लेकिन समय आने पर वह ठोकर भी मारती है। और उसकी ठोकर झेलना बड़े-बड़ों के वश की बात नहीं होती। इसलिए एक नेक सलाह मानें तो आम आदमी के धैर्य का इम्तेहान न लें।
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Subhash Rai
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विश्व भोजपुरी सम्मेलन,क्या खोया, क्या पाया
आगरा में विश्व भोजपुरी सम्मेलन की उपलब्धियां क्या रहीं, क्या खोया, क्या पाया
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भोजपुरी में पढ़ें
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Subhash Rai
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नजमा हेपतुल्ला पर मुस्लिम कार्ड खेल सकती है भाजपा
देहरादून, २4मई। प्रदेश से खाली हो रही राज्यसभा सीट को लेकर उत्तराखंड में अंदरखाने घमासान मचा है। सीट को पाने के लिए कई भाजपा नेता एड़ी चोटी का जोर लगाकर हाईकमान की मान मनोबल में लगे हुए हैं। वहीं भाजपा हाईकमान इस सीट पर वरिष्ठ नेत्री नजमा हेपतुल्ला को बैठाने का लगभग मन बना चुका है। क्योंकि भाजपा महिला आरक्षण के साथ-साथ आगामी होने वाले विधनसभा चुनाव को देखते हुए मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में किये जाने को लेकर भी खाका तैयार कर रहा है। क्योंकि आगामी २०१२ के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम मतदाताओं के सहारे बहुमत प्रदेश में प्राप्त कर सकती है क्योंकि २००७ के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुस्लिम मतदाताओं का सहयोग उस ढंग से नहीं मिल पाया जिसकी आशा की जा रही थी। जिसे देखते हुए अब भाजपा हाईकमान की नजर उत्तराखंड में होने वाले आगामी २०१२ के विधानसभा चुनाव पर जा टिकी है।
भाजपा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश भाजपा उत्तराखंड से राज्य सभा की सीट पर नजमा हेपतुल्ला के पक्ष में नजर आ रही क्योंकि उसका मानना है कि मुस्लिम मतदाताओं का वोट भाजपा को अन्य वोटों की अपेक्षा कम मिलता है ।इसलिए राज्यसभा सीट के लिए किसी अन्य का नाम सामने आना चाहिए। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता तरूण विजय भी राज्यसभा जाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। और ऐसी भी जानकारी प्राप्त हो रही है कि प्रदेश के मुखयमंत्री भी तरूण विजय को राज्यसभा भेजने के इच्छुक हैं। वहीं पूर्व मुखयमंत्री भगत सिंह कोश्यारी व भुवनचंद्र खंडूडी नजमा हेपतुल्ला के पक्ष में लॉबिंग करते नजर आ रहे हैं। जबकि भाजपा का एक अन्य गुट प्रदेश के सह प्रभारी डा. अनिल जैन के सुर में सुर मिलाकर राज्यसभा भेजे जाने को लेकर पार्टी हाईकमान पर दबाव बनाता नजर आ रहा है। क्योंकि भाजपा के उत्तराखंड प्र्रभारी के रूप में नये व्यक्ति की ताजपोशी भी होनी बाकी है और प्रदेश के सह प्रभारी डा. जैन कोई खास वजन उत्तराखंड भाजपा में नहीं डाल सके हैं। इसलिए उनके राज्य सभा पहुंचने की संभावनाएं ना के बराबर बनी हुई हैं। यदि हाईकमान स्तर से निर्णय लिया गया तो नजमा हेपतुल्ला के नाम पर भाजपा हाईकमान मुहर लगा सकता है। यदि प्रदेश संगठन अडा तो तरूण विजय को भी राज्यसभा सदस्य के लिए प्रत्याशी बनाया जा सकता है। वहीं कई अन्य भाजपा नेता भी राज्यसभा जाने की जुगत में एडी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। बीते कई दिनों से खंडूडी व कोश्यारी के बीच हुई मुलाकातों को भी इसी नजरिये से देखा जा रहा है कि दोनो मिलकर किसी एक के नाम पर सहमति बनाने का पूरा मन बना चुके हैं। हालांकि राजनैतिक गलियारों में उनकी मुलाकातों को लेकर कई तरह के अर्थ निकाले गए और राजनीति का तापमान भी काफी गरम रहा।
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narayan pargain
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आज जब हम विश्व शक्ति बनने के स्वपन देख रहें हैं बड़े ही शर्म के बात है के प्रधान मंत्री के लाइव प्रेस संबोधन जिसे के सारा संसार देख रहा है को दूर दर्शन दिखा नहीं पता है. क्यों नहीं अन्य चंनेल्स को भी यह मौका नहीं दिया गया. आदर्श के भल्ला
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Adarsh Bhalla
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Abhishek Prasad is your first Netlog friend!
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Crazy Codes
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23.5.10
कहाँ गए हीरा और मोती-ब्रज की दुनिया

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी मुझे बचपन में बहुत-ही प्रिय थी और आज भी है.कहानी का नाम है-दो बैलों की कथा.यह कहानी थी हीरा और मोती नाम के दो बैलों की.इन बैलों में ही इनके मालिक झूरी की जान बसती थी.ये बैल भी अपने स्वामी को उतना ही अधिक प्यार करते थे.खैर यह कहानी बहुत पुरानी है.प्रेमचंद अगर आज के समय में पैदा हुए होते तो हम इस कहानी के रसपान से वंचित रह जाते.जब गांवों में बैल ही नहीं रहे तो उनको लेकर वे इतनी मार्मिक कहानी लिखते भी कैसे?कृषि और पशुपालन हजारों सालों से एक-दूसरे के पूरक बने हुए थे लेकिन सरकार की गलत नीतियों ने इसे तोड़ने की गलती की है.भारत और पश्चिम की सोंच में हमेश से काफी अंतर रहा है.हम प्रकृति को अपना दुश्मन नहीं बल्कि सहयोगी मानते हैं.गांवों में बैलों को सिर्फ खेती में मदद करनेवाला जानवर नहीं माना जाता था बल्कि उन्हें आदर से महादेव यानी शिव कहकर संबोधित किया जाता था.नए बैल की खरीद के बाद उसे सीधे खूंटे पर ले जाकर बाँध नहीं देते थे बल्कि पहले गृहिणियां तिलक करके उनकी पदपूजा करती थी.हल जोतना तो इनका काम होता ही था फसल की दौनी का काम भी यही करते थे.इतना ही नहीं कुएं से रहट की सहायता से ये पानी भी खींचते थे और इन्हें गाड़ी में जोतकर समान ढोने का काम भी लिया जाता था.यह जीव अपने मालिक के प्रति जितना समर्पित होता था शायद उसके परिवार का सदस्य भी उतना समर्पित नहीं होता था.संतान तो होना नहीं था क्योंकि इनकी बचपन में ही नसबंदी कर दी जाती थी.कोई ख्वाहिश नहीं इन्हें खुश रखने के लिए सिर्फ चारा-पानी और प्यार ही काफी था.खूटे पर बांधे बैलों की संख्या से ही पता चल जाता था कि कौन कितना बड़ा किसान है, किसी से पूछने की कोई दरकार नहीं.इनका गोबर सर्वोत्तम स्तर का खाद होता था और खेतों की उर्वरता बनाये रखने में सहायक होता था.किसान को एक और लाभ था बैलों से खेती होने से.बैलों के साथ गायें भी पाली जातीं जिससे दूध-दही की घर में कभी कमी नहीं रहती.बैलों को हल या गाड़ी में जोतते समय उन्हें निर्देश देने के लिए हमारे यहाँ कई शब्द प्रचलन में थे जैसे अगर उन्हें रोकना हो तो कहिये हौरा, चलने के लिए कहना हो तो कहिये आटठाम और अगर मोड़ना हो तो कहिये गोर तर.क्या मजाल ये बैल कभी कोई गलती कर दें.खेतों से इनके साथ आना भी जरूरी नहीं था बस खोलकर छोड़ दीजिये ये खुद-ब-खुद आपके दरवाजे पर पहुँच जाते.इसी तरह बैलगाड़ी चलाते समय गाड़ीवान के लिए जगा रहना भी जरूरी नहीं था.गाड़ीवान सो गया और बैल अपने रास्ते पर चला जा रहा है और दूर से ही सुनाई दे रही हैं उनके गले में बजती घंटियाँ.लेकिन अब तो बैल गांवों के लिए इतिहास का विषय बनकर रह गए हैं.हमारी सरकार ने पश्चिम की अंधी नक़ल करने के चक्कर में खेती का यंत्रीकरण कर दिया.गोबर की जगह खेतों में जहरीले रासायनिक उर्वरक डाले जा रहे हैं और खेतों को जोत रहे हैं ट्रैक्टर.अब ट्रैक्टर ठहरी महंगी चीज सो हर किसी के लिए इसे रख पाना संभव है नहीं सो किसान खेत जोतने के लिए भी दूसरों का मुंहतका बनकर रह गया है.बैल पालने की अनिवार्यता समाप्त हो जाने से दरवाजों से गायें भी गायब हो गईं जिससे गांवों में भी शुद्ध दूध मिलना दुर्लभ हो गया है,शहरों से तो आये दिन मिलावट वाले दूध की ख़बरें आती ही रहती हैं.अमृत विष बन गया है.खेत रासायनिक खादों के हमलों से ऊसर होने लगे हैं और भूमिगत जल जहरीले रसायनों के लगातार घुलने के चलते जहर बनते जा रहे हैं.जल अब जीवन नहीं मृत्यु बनने की ओर अग्रसर है.किसान भी बैलों से अलग होकर खुश नहीं है उसकी स्वाबलम्बनता जो छिन गई है.खेत जोतने से लेकर, सामान ढोने और जलावन का प्रबंध करने के लिए उसे पहले किसी की मक्खनबाजी नहीं करनी पड़ती थी.पश्चिमी देशों ने भी एक बार फ़िर जैविक खेती की ओर रूख किया है लेकिन हमारी सरकार अभी तक कम-से-कम इस मामले में उनकी नक़ल करने को तत्पर नहीं दिखती.अगर ऐसा होता है तो फ़िर से हमें सड़कों पर बैलों की घंटियाँ सुनाई देने लगेगी.और हीरा-मोती के वियोग में दुखी झूरी के चेहरे पर फ़िर से चवन्निया मुस्कान विराजमान हो जाएगी.और सबसे बड़ी बात कि हमारी खेती को नवजीवन मिल जायेगा.
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ब्रजकिशोर सिंह
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SHAME for USA GOVT. SHAME ......SHAME .
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Vikram
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22.5.10
हो चुकी है समाज के विघटन की शुरुआत
(उपदेश सक्सेना)
क्या आप बिल क्लिंटन की जाति जानते हैं? ब्लादिमीर पुतिन किस जाति के हैं, या जापानी प्रधानमन्त्री किस जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं?, शायद नहीं, और संभवतःयही कारण है कि जिन देशों का यह नेता प्रतिनिधित्व करते हैं वे आज तरक्की कि दौड में हमसे कोसों आगे हैं. सफल लोकतंत्र में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण शर्त है आगे की ओर देखना. भारत को आज भी जब तेजी से विकसित हो रहे देशों की श्रेणी में शुमार किया जाता है तब मन में यह कसक टीस बन कर परेशान कर देती है कि आखिर कब तक हम इस दौड में महज़ एक नंबर बनकर दौड़ते रहेंगे? इसके पीछे शायद कारण यह भी है कि हम चार कदम आगे बढ़कर अपनी पुरातन रवायतों के भ्रम जाल में फिर दो कदम पीछे हट जाते हैं. इस वक़्त देश में जाति आधारित जनगणना पर बहस चल रही है. एक ओर तो हम अपनी अखण्डता के किस्से सुनाते-सुनाते नहीं अघाते, वहीँ दूसरी तरफ अतीत की बुराइयों को भी ‘बंदरिया के मृत बच्चे’ की तरह अपने सीने से चिपटाए रहते हैं. कुछ नेताओं के ऐसे प्रयास भारत के मज़बूत नागरिक समाज को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं. भारत की सांस्कृतिक एकता धुर देहात तक नज़र आती है, मगर यह कोई नहीं सोच-समझ रहा कि अपने राजनीतिक निहितार्थों के लिए कुछ क्षेत्रीय ताकतें अपना वज़ूद बचाने के लिए जाति-जनगणना का दाँव खेल रहे हैं.अंग्रेज़ों की फूट डालो, राज करो की नीति के मुरीद ये नेता अपने राजनीतिक स्वार्थों की खातिर समाज को बांटने का षड़यंत्र रच चुके हैं.
भारत आज विश्व का एकमात्र ऐसा देश बन चुका है जहां सबसे ज़्यादा आरक्षण है. यह समाज के विघटन की शुरुआत है. जाति कोई आपत्तिजनक बात नहीं है, मगर इसका राजनीतिक दोहन किया जाना भी कोई सम्मानजनक या राष्ट्रीय गर्व का विषय नहीं हो सकता. आज जाति आधारित जनगणना की बात चल रही है, कल विवाहों पर नियंत्रण की बात उठेगी, इसके बाद प्रेम विवाहों का नंबर भी आ सकता है. आखिर असली ताक़त आम आदमी के हाथों में कहाँ है? इस तरह की जनगणना के बाद सरकार पर आरक्षित वर्गों के लिए ज़्यादा सुविधाओं, धन की मांगें तेज़ हो जायेंगी. सामान्य वर्गों के लिए वैसे भी सरकारी क्षेत्र में कोई काम नहीं बचा है. इस बात पर भी गौर करना होगा कि सरकार हर साल आरक्षित वर्गों के लिए अरबों रूपये की योजनाएं संचालित करती है, मगर उन्नयन तो दूर गरीब-पिछड़े वर्ग की जनसंख्या आनुपातिक स्तर पर काफी बढ़ रही है. सरकार का यह दावा उसे कितना पंगु और जनता को बेवकूफ समझने वाला है कि “आज़ादी के बाद से अनुसूचित जातियों-जनजातियों को छोडकर किसी भी जाति के सवाल को नीतिगत फैसलों के तहत शामिल नहीं किया गया था.” इस बात का कोई जवाब नहीं दिया जा रहा कि आखिर अचानक इसकी ज़रूरत कैसे आन पड़ी.? यह भी सत्य है कि जाति-जनगणना से विभाजनकारी ताक़तें ज्यादा मज़बूत होकर उभरेंगी, इस तरफ से सरकार ने आँखें मूँद रखी है. सोते व्यक्ति को जगाना आसान होता है, मगर सोने का नाटक करने वाले को कोई नहीं जगा सकता. जनता जाग तो रही है, मगर उस निरीह पशु की तरह जिसको दुह कर पुनः खूंटे से बाँध दिया जाता है, वोट छीन लिया गया है, अब तो हाथों में तोते भी नहीं बचे.
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उपदेश सक्सेना
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केंद्र में श्री मनमोहन सिंह की सरकार एक साल की हुई।
---- चुटकी---
एक साल में
खूब पड़ी
महंगाई की मार,
पर अभी भी
चार साल
बाकी हैं
मेरे यार।
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गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर
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चिड़िया की जान जाए बच्चों का खिलौना-ब्रज की दुनिया
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ब्रजकिशोर सिंह
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21.5.10
GULDASTE - E - SHAYARI
GULDASTE - E - SHAYARI
इसी से मिलता मुक्तक है
खुशी के बाद खुशी की तरफ नही देखा,
तुम्हारे बाद किसी की तरफ नही देखा।
मै जानता था तेरा इंतजार लाजिम है,
तमाम उम्र घड़ी की तरफ नही देखा।
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bijnior district
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अपना स्वास्थ्य अपने हाथ,सरकार नहीं ज़िम्मेदार
(उपदेश सक्सेना)
एक हल्का फुल्का मगर असरकारक जोक है- पाकिस्तानी बच्चा सुबह उठकर सबसे पहले अल्लाह को याद करता है, इराकी बच्चा सबसे पहले अपनी पोषाक दुरुस्त करता है, अमरीकी बच्चा सबसे पहले अपना दिन भर का कार्यक्रम तय करता है जबकि भारतीय बच्चा सुबह उठकर सबसे पहले बिस्तर में ही आवाज़ लगाता है, माँ, भूख लगी है कुछ खाने को दो. यह गंभीरता से ली जाने वाली बात है, क्योंकि ऐशो-आराम भरी जिंदगी का असर आम आदमी के स्वास्थ्य पर दिखने लगा है.
भागदौड भरी जिंदगी में खानपान की अनियमितताओं के चलते मानव शरीर बीमारियों का घर बन गया है. हाल ही में एसोचेम की एक रिपोर्ट के आंकड़े भयावह हैं. मधुमेह जैसी अमीरों की बीमारी अब गरीबों को ज्यादा होने लगी है. रिपोर्ट के अनुसार आने वाले 15 वर्षों में भारत में मधुमेह के कुल मरीज़ साढ़े पांच करोड का आंकड़ा पार कर जायेंगे. अकेले दिल्ली में इनकी संख्या साठ लाख तक पहुँच जायेगी. विश्व में इस रोग के तब तक 23 करोड बीमार होने का अनुमान लगाया गया है. रिपोर्ट में मधुमेह के अलावा कैंसर, दिल का दौरा और मानसिक तनाव को भविष्य का ख़तरा बताया गया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ देश में कैंसर के मरीजों की संख्या में हर साल लगभग 14 लाख नए मरीज़ जुड़ रहे हैं.इनमें से आधे मरीज़ ऐसे होते हैं जिनकी मौत सुनिश्चित होती है.
वैसे इन बीमारियों के बढ़ने-फैलने के पीछे हमारी खाने-पीने की आदतें बहुत ज़्यादा ज़िम्मेदार है. अधिक तेल-मसाले वाला खाना, चाय को पानी की तरह पीने, खाने में साफ़-सफाई का अभाव, पौष्टिक खाद्यान्न की खाने की थाली में कमी जैसे कारण भारतीयों को समय के पहले बूढ़ा-बीमार बना बना रहे हैं. रही सही कसर शराब और धूम्रपान पूरा कर रहे हैं. वैज्ञानिकों ने खान पान को लेकर एक आचार संहिता तैयार की है, जिसके अनुसार पूरे दिन में क्या,कितना,कैसे खाया जाए इसका विस्तार से वर्णन किया गया है. साथ ही प्रतिदिन एक निश्चित समय व्यायाम के लिए नियत करने की भी सलाह दी गई है.
अमीरी-गरीबी के बीच बढती दूरी ने भी आम आदमी की सेहत बिगाड़ने में भूमिका निभाई है. सरकार द्वारा स्वास्थय सेवाओं के लिए खर्च की जाने वाली मोटी धनराशि कहाँ, किसकी सेहत सुधार रही है इस बात पर किसी का ना तो नियंत्रण है और ना ही इस पर नज़र रखने का कोई कारगर तंत्र ही तैयार है. निजी अस्पतालों की बढती संख्या से ही स्पष्ट हो जाता है कि सरकार आम आदमी की सेहत को चुस्त रखने में कितनी लचर है. आज तमाम बड़े निजी अस्पताल केंद्रीय और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य पैनल में शुमार हैं, जिससे सरकारी चिकित्सा संस्थाओं की रीढ़ ही टूट गई है. आम आदमी अपना इलाज महंगे चिकित्सा केन्द्रों में नहीं करवा सकता, लिहाज़ा उसे आम आदमी से भी बद्तर मौत झेलना पड़ती है. सरकारी डाक्टर निजी अस्पतालों में अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में ज़्यादा भरोसा करते हैं, आखिर उन्हें अपनी जेब का भी तो स्वास्थ्य दुरुस्त करना होता है. सरकारी अस्पतालों में कई सुविधाएँ उपलब्ध करवाने का दावा करने वाली सरकारें इन अस्पतालों में डाक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं करवा पा रही हैं. बीमारियों से बचना है तो अपनी सुरक्षा आप करें, आपको स्वस्थ रखना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है.
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उपदेश सक्सेना
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कबीर भोजपुरी के आदिकवि
(आगरा में शनिवार से विश्व भोजपुरी सम्मेलन होने जा रहा है। दुनिया भर के तमाम देशों से और देश के कोने-कोने से भोजपुरी के विद्वान साधक ताज के शहर में आ डटे हैं। इस मौके पर हिंदी और भोजपुरी के बारे में मशहूर साहित्यकार और हिंदी के अप्रतिम विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार जानकर आप को अच्छा महसूस होगा। 1976 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में उन्होंने भोजपुरी में जो भाषण दिया था, उसके अंश यहां हिंदी में दिये जा रहे हैं)
कबीरदास भोजपुरी के आदि कवि थे। उन्होंने कहा है, जो रहे करवा त निकंसे टोंटी। लोटे में पानी होगा, तभी तो टोंटी से निकलेगा। यहां तो एक बूंद भी पानी नहीं है। हम सोचते थे कि भोजपुरी अपनी मातृभाषा है, इसमें लिखना आसान होगा लेकिन जिस भाषा में हम रोज बोलते हैं, लगता है उसमें लिखना कठिन काम है। किसी भी भाषा में लेखन के लिए कुछ साधना की जरूरत होती है, कुछ मेहनत-मशक्कत करनी पड़ती है। मेरे अंदर तो ऐसा कुछ भी नहीं है।
भोजपुरी बहुत शक्तिशाली बोली है। लोकसाहित्य का ऐसा भंडार कहीं और नहीं दिखता। मुहावरे, लोकोक्तियां और व्यंग्य-विनोद का तो यह खजाना है। इसे बोलने वालों की संख्या भी विशाल है। पांच करोड़ से भी ज्यादा। बहुत कम भाषाएं हैं, जो इतने लोगों द्वारा बोली जाती हैं। भोजपुरियों में अपनी भाषा का गर्व भी बहुत है। ग्रियर्सन ने लिखा है कि ऐसा भाषा प्रेम उन्होंने कहीं और नहीं देखा। भोजपुरीभाषी हमेशा देश की अखंडता की बात सोचता है। इसके लिए वह सर्वस्व नयोछावर करने को भी तत्पर रहता है। वह अपने घर में भोजपुरी बोलता है, अपनी भाषा में कविता भी लिखता है लेकिन अलग रहने की बात कभी नहीं करता। हमारी सार्वदेसिक भाषा हिंदी को सजाने-संवारने में भी भोजपुरियों का भारी योगदान रहा है। सदल मिश्र और भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर अनेक बड़े-बड़े रचनाकार भोजपुरी क्षेत्र से संबंधित रहे हैं। अपनी बोली से प्रेम के बावजूद इन लोगों ने हिंदी को संवारने में अपना जीवन लगा दिया।
पुराने जमाने से देश में दो तरह की भाषाओं का प्रयोग होता आया है। एक लोकभाषा और दूसरी संस्कृत भाषा। कई बार लोकभाषा में अच्छा साहित्य रचा गया। अब बहुत कम बचा है, काफी कुछ नष्ट हो गया है। बौद्ध और जैन धर्म का प्रचुर साहित्य लोकभाषा में ही लिखा गया। पालि में अकूत साहित्य भरा पड़ा है। मुझे लगता है कि वह भोजपुरी का ही प्राचीन रूप है। जब तक बात धार्मिक उपदेश की, प्रेम की रही, आसानी से काम चलता रहा पर जब दर्शन, तर्कशास्त्र जैसे गंभीर विषयों की बात आयी तो फटाफट संस्कृत में लिखा जाने लगा। आधुनिक हिंदी भी पहले लोकभाषा के रूप में ही सामने आयी। लेकिन जैसे-जैसे उसमें लोकभाषा के तत्व कम होते जा रहे हैं, वह भी संस्कृत के पद पर बैठती जा रही है। अभी भी उसमें संस्कृत जैसा कसाव नहीं आया है मगर आ जायेगा। जहां तक सूक्ष्म चिंतन-मनन मूलक साहित्य की बात है, हिंदी निश्चित रूप से सार्वदेसिक भाषा का रूप ले चुकी है परंतु जहां तक रागात्मक अभिव्यंजना का प्रश्न है, हिंदी जन-जीवन से दूर होती जा रही है। एक तरह से बौद्धिक कसरत बढ़ती जा रही है। इसकी प्रतिक्रिया में हर बोली के प्रतिभावान साहित्यकार जनभाषा की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। आंचलिकता के नाम पर खिचड़ी भी पकायी जा रही है। यह अकारण नहीं हो रहा है, इतिहास विधाता के निर्देश पर हो रहा है।
विशाल हिंदीभाषाभाषी क्षेत्र में अनेक बोलियां बोली जाती हैं। ब्रजभाषा का साहित्य बहुत समृद्ध रहा है। अवधी, राजस्थानी की अपनी परंपरा रही है। भोजपुरी की साहित्यिक परंपरा भी कम पुरानी नहीं है। हिंदी सबको अपना मानकर चलती है। चाहे राष्ट्रभाषा कहें या राजभाषा या संपर्क भाषा, संविधान बनाने वालों ने हिंदी को सार्वदेसिक भाषा के रूप में चुना लेकिन बहुत से लोग इसे मानने को तैयार नहीं। वे चाहते हैं कि यह काम अंग्रेजी करती रहे। पहले थोड़ी शर्म थी पर अब तो लोग खुलकर कहने लगे हैं कि हिंदी नहीं अंग्रेजी ही संपर्क भाषा रहनी चाहिए। लेकिन कठिनाई यह है कि अंग्रेजी के साथ देश का आत्म सम्मान जुड़ नहीं पाता। इसलिए चलेगी तो हिंदी ही।
कोशिश यह भी हो रही है कि हिंदी की शक्ति कम की जाय। हिंदी के अंतर्गत आने वाली बोलियों में अलगाव के बीच बोने के प्रयास भी हो रहे हैं पर वे सफल नहीं होंगे। अलग-अलग बोलियों में भी बेहतर साहित्य लिखा जाता रहेगा और हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मान भी मिलेगा। अगर भोजपुरी बोलने वालों को कुछ अधिक सुख-सुविधा, मान-सम्मान मिले तो इससे हिंदी को कोई आपत्ति नहीं होगी। भोजपुरी को भी हिंदी से प्रतिस्पर्धा की बात मन में नहीं लानी चाहिए। हमें हिंदी और भोजपुरी को एक ही समझकर काम करना चाहिए। दोनों को दो मानने पर झंझट होगी। हिंदी में लिखने वाले को भी नमन और भोजपुरी में लिखने वाले को भी। भगवान सबका कल्याण करे।
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Subhash Rai
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एक आई पी एस के नाम पैगाम
माननीय आई पी एस ........ जी नमस्कार। आप ज्ञानवान और बुद्धिमान हैं तभी तो आई पी एस हैं। छोटी उम्र में बड़ी सफलता मिलने पर थोड़ा बहुत अहंकार तो आ ही जाता है। अहंकार आते ही विवेक इन्सान के बस में नहीं रहता। हो सकता है यहाँ लिखे गए शब्द आपके व्यक्तित्व के अनुरूप ना लगे लेकिन क्या करें आपकी और मेरी मुलाकात ही ऐसे समय हुई जब आपके साथ आपका विवेक नजर नहीं आया। जिस समय मैने आपसे मिलने की अभिलाषा की उस समय आपने कुछ समय पहले गिरफ्तार किये व्यक्ति को अपने सामने अलफ नंगा खड़ा कर रखा था। मुझे किसी ने बताया नहीं,थाने में खुद देखा। आपने और आपके शागिर्द एक पुलिस वाले ने ऑफिस का दरवाजा बंद कर पर्दा लगा ये पक्का इंतजाम किया था कि आपके अलावा उसे कोई और ना देखे। लेकिन ऑफिस में चलने वाले पंखे के कारण सारा कबाड़ा हो गया। मैने भी उसको देख लिया। पता नहीं कानून की कौनसी धारा के तहत आपने उसको नंगा किया? साहब जी, आपने यहाँ तक आते आते बहुत सा ज्ञान अर्जित किया है,बहुत मोटी-मोटी हिंदी अंग्रेजी की किताबें पढ़ी हैं। क्या किसी किताब में ये ज़िक्र है कि अंग्रेजों के राज में किसी अंग्रेज अफसर ने किसी हिन्दुस्तानी को इस प्रकार से नंगा किया हो। कहीं तालिबान का राज भी रहा है,उनके बारे में भी ऐसा पढ़ने या सुनने में नहीं आया। लादेन का भी सिक्का चलता है मगर ये खबर तो नहीं आई कि वह अपने मुलजिमो को अपने सामने नंगा कर देता है। शायर रवीन्द्र कृष्ण मजबूर कहते हैं कि हट के दिया,हट के किया याद रहता है। इसलिए आँखों में अब भी वह बसा हुआ है जो ४५ घंटे पहले देखा था। क्योंकि वह हट के था। मुलजिम को अपने सामने नंगा करने का आपका तर्क भी हट के है। तब आपने कहा था कि ऐसा करने से मुलजिम दुबारा अपराध करने से डरता है। वह तो थाने में महिला सिपाही भी थी इस कारण से उसको घुमाया नहीं। साहब जी, आपको याद होगा, आपने कहा था कि आप कभी कभी नंगे मुलजिम की अपने मोबाइल फोन से तस्वीर भी ले लेते हैं। ताकि उसको यह कहकर डराया जा सके कि अगर दुबारा अपराध किया तो फोटो घर वालों को दिखा देंगे। मुझे याद है इसके बाद आपने ये कहा, किन्तु अभी तक ऐसा किया नहीं है। मैं फोटो डीलिट कर देता हूँ।
साहब जी, चूँकि ज्ञान, बुद्धि और संस्कार में हम आपका मुकाबला नहीं कर सकते इस वजह से ये तो नहीं जानते की आपने जो किया वह सही है या गलत हाँ इतना जरुर पता है कि किसी को किसी के सामने नंगा कर देने से बड़ी जलालत उस आदमी के लिए तो हो ही नहीं सकती। भारतीय संस्कृति में तो नंगा नहाना भी पाप है,किसी के सामने नंगा होना या किसी को अपने सामने नंगा होने के लिए मजबूर करना तो हट के है। आज आप आई पी एस हैं, वक्त आपके साथ है। जो करोगे सब कानूनन सही कहलायेगा। कल का क्या पता । वक्त किसी दूसरे के पास जा सकता है। मुलजिमो को दुबारा अपराध करने से रोकने के लिए बहुत कुछ है। आपकी फाइल मजबूत हो तो अपराधी सजा से बच ही नहीं सकता। किन्तु आपका तो अपराध समाप्त करवाने का नजरिया ही हट के है। ऐसे में किसी और कानून की तो जरुरत ही नहीं। आज आप उस पोजीशन में हैं जहाँ आप पर कोई पाबन्दी नहीं। कानून! कानून तो वही है जो आप कहें और जो आप करें। किस की मजाल जो आपके हुकम की पालना में जय हिंद ना कहे। मजबूर के ही शब्दों में "कहने को तो सब कुछ कह डाला,कुछ कहते हैं कुछ कह नहीं सकते।" आप मुझे अपना तो मान ही नहीं सकते। इसलिए आपका गोविंद गोयल लिखना तो ठीक नहीं।
चुनांचे केवल -गोविंद गोयल
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यह श्रीगंगानगर में नियुक्त एक आई पी एस को समर्पित है।
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गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर
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अब ये नेता नामक प्राणी किस वर्ण में आएगा?-कुंवर जी,
मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मै कैसे पूछूं!
क्या वर्ण वयस्था उचित थी या है या हो सकती है?
उस हिसाब से चार वर्ण-
एक-पंडित जो ज्ञान बांटता है,
एक क्षत्रिय-जो अपनी जान की भी परवाह नहीं करता दूसरो की रक्षा करने में,
एक वैश्य-जो सभी के लिए 'अर्थ' को सही अर्थो में प्रयोग करता है,व्यापार करता है,
एक शुद्र-जो सेवा करने में ही अपनी मुक्ति जानता है!
अब ये नेता नामक प्राणी किस वर्ण में आएगा?
आदरणीय गोदियाल जी की पोस्ट पर टिप्पणी करते समय आया ख्याल आपके हवाले...
कृप्या सभी वर्णों की गरीमा और सम्मान को ध्यान में रख कर जवाब देना!
मुझे आपसे बहुत उम्मीदे है.....
जय हिन्द,जय श्रीराम,
कुंवर जी,
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kunwarji's
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वक्त की आवाज है शब्द
डा सुभाष राय का साहित्य चिंतन वक्त की आवाज है शब्द रचनाकार पर देखिये
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Subhash Rai
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आदमी साला बोर क्यूँ होता है यार.....??
आदमी साला बोर क्यूँ होता है यार.....??
ऐय क्या बोलती तू...क्या मैं बोलूं....सुन...सुना....आती क्या खंडाला...क्या करुं...आके मैं खंडाला...अरे घुमेंगे..फिरेंगे...नाचेंगे..गायेंगे...ऐश करेंगे...मौज करेंगे..बोरिंग को तोडेंगे...और क्या....ऐय क्या बोलती तू.......हां...!!चल ना अब तू.......ये आदमी धरती पर एक-मात्र ऐसा जीव है,जो हर कार्य से जल्दी ही बोर हो जाता है और उससे कोई अलग कार्य करने की सोचने लगता है या उस एकरसता से दूर भागने के प्रयास करने लगता है....और कभी-कभी तो उसकी बोरियत इतनी ज्यादा ही बढ जाती है कि वह "छुट्टी" पर चला जाता है,अकेला नहीं बल्कि अपने परिवार और दोस्तों के संग...और वह भी कहां....सुरम्य वादियों में...पहाडों... नदियों ..समंदर के पास...यानि किसी भी ऐसी जगह जो अपनी उस रोजमर्रा की जिंदगी से बिल्कुल अलहदा हो....जहां कि लगे कि कुछ दिन हम अलग सा जीये....इसीलिये यह गाना उसके दिमाग में बजता ही रहता है...चल कहीं दूर निकल जायें....कि कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है....ये कश्मीर है....और भी जाने क्या-क्या....और आदमी कुछ दिन घूम-फिरा कर वापस अपने घर लौट आता है....कुछ दिनों के लिए अपने दामन में या कि झोले में खुशियों के कुछ टुकडे लेकर....थोडे दिन तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चलता रहता है...मगर उसके बाद फिर वही...ऐय क्या बोलती तू.....!!
आदमी,मैं सोचता हूं,सच में ही है तो बडा ही विचित्र जीव....यदि ऐसा ना होता तो शायद उसे ये तो पता ही होता कि धरती को बने आज अरबों वर्ष हो चुके ....और यह इन अरबों वर्षों से बिना एक पल भी रूके...बिना एक पल को बोर हुए......अपनी धूरी पर चक्कर काटती हुई...सुर्य के चारों और परिक्रमा किये जा रही है....मौसमों और परिवर्तनों का एक-समान चक्र इतने ही वर्षों से चला ही जा रहा है....रोज-ब-रोज बादल बन रहे हैं और कहीं-ना-कहीं बरस रहे हैं....किसी भी पल को यह बोर नहीं होते...अगर एक पल को मान लो कि सिर्फ़ एक पल को ये बोर हो जायें तो.....???...यहां तक कि सूरज नाम का यह आग का भयावह गोला जो धरती से भी ज्यादा बरसों से धधक रहा है....धधकता ही जा रहा है....साला...कभी बोर ही नहीं होता....सेकेंड के एक अरबवें हिस्से के लिये एक दिन-एक बार बोर हो जाये ना... तो सिर्फ़ जिसके चारों और घूमने से धरती पर असंख्य प्रकार का जीवन चक्र चल रहा है....और निर्बाध रूप से चलता ही जा रहा है और यह भी तय है कि आदमी ही अपने कु-कर्मों से इस चक्र की गति को अपने खिलाफ़ भले कर ले.... आदमी के कारण भले कुछ भयावह किस्म की टूट-फूट या परिवर्तन धरती और वायुमंडल में कोई बवंडर भले ही हो जाये .....मगर अपनी और से प्रकृति ऐसा कुछ बदलाव नहीं करती....नहीं ही करती.... और साली कभी बोर ही नहीं होती....पागल है क्या ये साली....??
और आदमी....!!.....इसका बस चले ना.....तो यह घंटों-दिनों-सप्ताहों-महीनों तो क्या....हर पल ही बोर हो जाये....और हर पल ही किसी और ही दुनिया में चला जाये....शायद इसीलिये ही आदमी नाम का यह विचित्र जीव अपने ख्यालों की अपने से भी ज्यादा विचित्र दुनिया में विचरण करता रहता है....करता ही रहता है मगर मजा तो यह है कि यह साला वहां से भी बोर हो जाता है....अब जैसे कि यह कभी छुट्टी मनाने जो कभी बाहर भी जाता है तो वहां भी यह ज्यादा दिन आराम से टिक कर नहीं रह पाता क्योंकि उसे वहां फिर अपनी पुरानी दुनिया के काम याद आने लगते हैं....अपनी नौकरी...अपना बिजनेस...या फिर अपने अन्य दूसरे काम.....!!
तो बाहर-बाहर भले आदमी अपना काम करता हुआ-सा लगता है मगर साथ ही अन्दर-अन्दर वो अपनी किसी और ही दुनिया में गुम भी रहता है...और जब भी उसे अकस्मात चेत होता है....उसे लगता है....अरे मैं तो यहीं था...और अपने आप पर हंसता है आदमी....मैं अक्सर सोचा करता हूं......काश कि आदमी में धरती-सूरज-चांद-तारों-मौसम-जलवायू और प्रकृति के ठहराव का यह गुण आ जाये जिससे कि वह सदा अपने-आप में रह सके....एकरसता में भी सदा के लिये सदाबहार जी सके....मगर पता नहीं आदमी को तो क्या तो होना है....अपन तो उसकी ओर को सदा शुभ-ही-शुभ सोचा करते हैं....पता नहीं आदमी यह शुभ कब सोच पायेगा.....पता नहीं कब आदमी अपना भला कब सोच पायेगा....पता नहीं कब आदमी यह समझ भी पायेगा कि उससे जुडी हुई हैं असंख्य जिन्दगियां.....और जिनसे वो खुद भी उसी तरह जुडा हुआ है... सब एक-दूसरे के प्राणों से जटिलतम रूपों से जुडे हैं....इस नाते सबको अपने ख्याल के साथ-साथ अन्य सबों का भी ख्याल रखना है....जैसे उपर वाला हमारा ख्याल कर रहा है....करता ही चला आ रहा है....और करता ही रहेगा....मगर आदमी को यह होश शायद तब तक नहीं आयेगा....जब तक कि वह खुद अपनी मौत नहीं मर जाता......!
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राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ )
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20.5.10
शशि से थरूर और पुष्प सी सुनंदा की सगाई 26 या 27 जून को
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Shri Sitaram Rasoi
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chief reporter om ne choda kampumail sahara kiya join
chiefreporter से रिपोर्टर बने ओम
पिछले कई दिनों से कम्पुमैल सांध्य दैनिक कानपूर में चीफ रिपोर्टर का पद संभाल रहे ओमबाबू मिश्र ने इस्तीफा दे दिया .वे लम्बे समय तक अपनी सेवाए देने के बाद नया संस्थान ज्वाइन करना चाहते थे । जिसके मद्देनजर उन्होंने दो दिन पहले नौकरी छोड़ दी अब उनकी प्रतिभा को देखते हुए राष्ट्रीय सहारा अख़बार ने उन्हें अपने यहाँ appoint कर लिया है.सहारा में ज्वाइन कर उन्होंने अपनी ख़ुशी का इजहार किया है।
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gaurav shukla
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नाटक ही तो है सब
मनुष्य के जन्म के साथ ही नाटक का जन्म हुआ होगा। भले ही हाव-भाव के प्रदर्शन और इस तरह खुद को अभिव्यक्त करने के विभिन्न तौर-तरीकों के लिए नाटक शब्द का प्रयोग बाद में हुआ हो लेकिन आदिम मनुष्य जब कभी बहुत प्रसन्न या बहुत दुखी होता रहा होगा तो अपनी मनोदशा की अभिव्यंजना के लिए वह जो तरीका उपयोग करता रहा होगा, वह नाटक ही तो रहा होगा।
भारत आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ही संपन्न रहा है। हमारे ऋषियों ने जीवन को ही नाटक की संज्ञा दी है। वे संपूर्ण जगत को एक रंग-मंच की तरह देखते हैं और स्वीकार करते हैं कि हर मनुष्य अपनी निश्चित भूमिका में है, वह भूमिका पूरी होते ही वह रंग-मंच से बाहर हो जायेगा। वह नाटक में इसलिए है क्योंकि उसे क्या करना है, यह वह तय नहीं करता है। उसकी पटकथा पहले से तैयार रहती है। उसी के हिसाब से वह अपने संवाद बोलता है, अपना अभिनय प्रस्तुत करता है। जो इस अभिनय को वास्तविकता मानकर चलते हैं, उन्हें कष्ट होता है। जो इसकी असलियत समझते हैं, वे दुखांत हो या सुखांत, हर स्थिति में प्रसन्न रहते हैं।
जीवन में स्वतस्फूर्त ढंग से व्यक्त हो रहा नाटक ही कालांतर में साहित्यान्वेषियों द्वारा कला और साहित्य की एक विधा के रूप में स्वीकार किया गया होगा। नाटक के सर्वाधिक प्राचीन स्वरूप वेदों में मिलते हैं। यह पांच हजार वर्ष से भी ज्यादा पुरानी रचना है। बाद में ईंसा से तीन शती पूर्व आचार्य भरत मुनि और कई अन्य काव्यशास्त्रियों ने नाटक पर गंभीरता से विचार मंथन करके इसके सिद्धांतों की रचना की। भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटक के प्रकार, नाटक में रस, अभिनय कला, नाटक की आलोचना आदि विषयों पर विस्तार से चर्चा की। तब तक संस्कृत में श्रेष्ठ नाटक लिखे जाने लगे थे।
पश्चिम में नाटक पर सोच-विचार बहुत बाद में शुरू हुआ। प्राचीन ग्रीस की राजधानी एथेंस में सबसे पहले नाटकों पर काम हुआ। ईसा से कोई दो शताब्दी पहले यूनानी विद्वानों ने नाटक को समझने और उसे परिभाषित करने का प्रयास किया। प्रारंभ में कामेडी और ट्रेजेडी अर्थात सुखांत और दुखांत, दो तरह के नाटक लिखे और अभिनीत किये जाते रहे। बाद के समय में इनमें विविधता आयी। तब तक भारत में नाटकों पर विशद काम हो चुका था और उच्च कोटि की नाट्यलेखन और अभिनय कला विकसित हो चुकी थी।
प्रारंभ में नाटक काव्य के अंतर्गत ही था। संस्कृत साहित्य में ज्यादातर नाटक काव्य शैली में ही रचे गये और अभिनय भी गीत-संगीत से भरपूर हुआ करता था लेकिन कालांतर में यह साहित्य और कला की अलग विधा के रूप में विकसित हुआ। नाटक में अब भी काव्य जैसा आनंद निहित रहता है। यह कलाकारों के सामूहिक प्रदर्शन कौशल के रूप में सामने आता है। अब भी नाटकों में काव्यकला की अपनी भूमिका रहती है। यह गद्य और पद्य का मिश्रित साहित्य रूप है।
समकालीन नाटकों में तमाम तरह के प्रयोग हो रहे हैं। थियेटर यद्यपि बाहर से भारत आया लेकिन किंचित अन्य रूप में वह बहुत पहले से भारत में मौजूद रहा है। प्राचीन काल से ही यहां विशाल रंग-मंच पर नाटक खेले जाते रहे हैं। आज के नाटकों में वर्तमान जीवन की दुरूहताओं, मनुष्यता पर आसन्न संकट, सामाजिक विकृतियों और राजनीतिक दांव-पेच को भी कथ्य बना कर नाटक को सामाजिक परिवर्तन के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। नाटकों का ही आधुनिक रूपांतर फिल्मों के रूप में हमारे सामने है। साहित्य में भी युगीन परिस्थितियों को समझने और बदलने के लिए नाटकों को सशक्त माध्यम के रूप में लिया जा रहा है। अब नाटक एक महत्वपूर्ण रचना विधा के रूप में अपनी जगह बना चुका है।
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Subhash Rai
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देश में सरकार की क़ानून व्यस्था क्या ठीक हैं ?

मेरे दिमाक में कुछ दिनों से एक कीड़ा उछल रहा हैं और बार बार कुछ सवालो के जवाब मांग रहा हैं की ये जो हमारी सरकार हैं और जो भी पुराने और नए क़ानून हैं उनमे हम जैसे गरीबो का ही शोषण क्यों होता आ रहा हैं?
या फिर इन कानूनों को किसी अमीर पैसे वाले व्यक्तियों के द्वारा तैयार किया गया हैं?
इसके बारे में तो मैं कुछ भी नहीं कह सकता हु, लेकिन जो भी हो शायद ये क़ानून जब बनाये जा रहे होंगे तो इसमें गरीबो का हित नहीं देखा गया होगा, तभी तो इनमे कुछ कमिया रह गयी हैं.
मैं अभी आपका ध्यान सिर्फ दो बातो की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हु, जिनसे आप भी सोचने पर मजबूर हो जायेंगे की सरकार गरीबो और अमीरों के साथ भेदभाव करती हैं या नहीं?
पहली बात :-
किसी भी ट्रेन में अगर आप बिना टिकट यात्रा करते हैं तो आप सरकार द्वारा तय किये गए दंड को भोगने के लिए उतरदायी हैं. जोकि कुछ इस प्रकार हैं :-
(1) अगर आप बिना टिकट यात्रा करते हैं तो 500 तक का जुर्माना भरना होगा,
(2) और यदि आपके पास जुर्माने को भरने की रकम नहीं हैं तो 6 महीने की जेल जाने की सजा मिलेगी.
अब इस क़ानून से ये तो स्पष्ट हो गया की भारतीय क़ानून कितना सख्त हैं मुफ्खोरो के लिए. लेकिन किस हद तक?
क्योंकि अगर कोई अमीर व्यक्ति जो बिना टिकट के यात्रा कर रहा हो और पकड़ा जाये तो वो 500 रूपए देकर आराम से निकाल सकता हैं. लेकिन वहीँ कोई गरीब व्यक्ति अपने हालत के आगे बेबस होकर बिना टिकट यात्रा करते हुए पकड़ा जाये तो और जुर्माना ना भर पाने की स्थिति में 6 महीने की सजा भोगने का उतरदायी हो सकता हैं.
यहाँ पर मेरा एक सीधा सा सवाल आप लोगो और सरकार से ये हैं की क्या 500 रूपए की राशि 6 महीने की सजा के बराबर हैं? और यदि हैं तो उन बेचारो का क्या होगा जिनका परिवार हैं और बिचारे टिकट नहीं खरीदने की वजह से 6 महीने की सजा काटने के लिए अपने परिवार से दूर हो जाते हैं? और यदि वही एक व्यक्ति ही परिवार का आमदनी का जरिया हो तो ?????
क्या ये सरकार द्वारा बनाया गया कानून सही हैं???
दूसरी बात :-और क्या एक जाबांज सिपाही के जान की कीमत सिर्फ इतनी राशि से लगई जानी चाहिए? और मैं ये नहीं कह रहा की सरकार को बहुत सारे पैसे इनके परिवार को देना चाहिए लेकिन मेरा तथ्य ये हैं की उस सिपाही के बाद उसके परिवार को उबरने में और सामान्य जीवन में दुबारा जाने के लिए सिर्फ इतनी सी राशि से गुजारा कर सकते हैं.
अभी कुछ महीनो पहले की ही बात हैं जब हमरे देश के कुछ खिलाडी ओलम्पिक में गए थे और वहां पर कुछ ने तो पदक जीतकर देश का सम्मान और गौरव को बढाया. लेकिन मुझे सरकार से यहाँ पर भी एक शिकायत हैं की वो सिर्फ परिपूर्ण व्यक्तियों के हित में ही कार्य कर रही हैं.
वो कैसे ? चलिए मैं आपको इसका एक सीधा और सच्ची घटना से समझाने का पर्यास करता हु :-
अभी ओलामिक से स्वर्ण पदक जीत के आये एक तीरबाज और देश का नाम उचा करने वाले शख्स जिनका नाम तो शायद मुझे पता नहीं लेकिन इतना पता हैं की उनके पास काफी धन-दौलत हैं और वो काफी परिपूर्ण व्यक्ति भी हैं, को सरकार के द्वारा लगभग 3 करोड़ की राशि इनाम में दी गयी (जैसा की मैंने सुना हैं). अच्छी बात हैं सरकार उन व्यक्तियों का उत्साह और उन्हें सम्मान दे रही हैं और मुझे ख़ुशी भी हैं सरकार के इस रवैये से क्योंकि देश ये ये गौरवशाली खिलाडियों ने देश का नाम रौशन जो किया हैं.
वही दूसरी और जहाँ बोर्डर पर हमारे देश के जाबांज सिपाही जंग लड़ते हुए शहीद हो जाते हैं और देश को अपना बलिदान देने से नहीं हिचकिचाते, के साथ सरकार क्या कर रही हैं?
अगर कोई सिपाही शहीद हुआ हैं तो उसके परिवार को 1-2 लाख रुपये दिए जाते हैं. और जहाँ सरकार खुद कहती हैं की महंगाई का जमाना हैं तो फिर मैं ये पूछना चाहता हु की अगर महंगाई का जमाना हैं तो क्या आपके द्वारा दी गयी राशि में क्या इनके परिवार का गुजर बसर हो सकता हैं ?
मैं बस ये जानना चाहता हु की हमारी देश की सरकार इन कानूनों में बदलाव क्यों नहीं करती ?
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Pawan Mall
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Labels: Pawan Mall, एक प्रश्न, भड़ास, लतीफे | Hindi Latife (Pawan Mall), सीधी बात नो बकवास
THE ROOT OF NAXALISM
Whether operation green hunt actually exits or the diplomacy of the government insists is a matter of controversy . The war in chhatisgarh , Dantewada, Lalgadh or in any part of the country is only providing the story that how the Maoists are thinking ,planning and implementing their ideology and the work. The cycle of violence has been building on and on in sustainable way to raise various problems against the government .
This may be called the 1970's Bollywood route of taking the law in one's hand as we find that Maoists are diverting themselves from the path of their own ideology and working .The death of a Kanu Sanayaal is a candid example of it. If the emphasis of this exploration is on the Naxalite phenomenon it is not because other modes and forms of agitation are less important but only because the method of struggle chosen by Naxalite has brought the problem to a head .
In the latest incident , the primary target was probably the group of special police officers who were travelling on the roof of the bus. The bus full of civilian passengers witnessed the death of many innocent lives also.
This may be said that the direct harassment of poor through usurping their lands and forest rights is raising the ' worst called internal problem of the country as Naxalism ' in the words of our prime minister .The foul mouthed government's development reveals an another story of co relation of the development and the Naxalism can be segmented as followings .
High rate of SC or ST population
Low literacy;
High infant mortality
Low urbanization;
High forest cover ;
High share of agricultural Labour
Low per capita food grain production
Low road network penetration
Low Financial inclusion ;
High share of rural households without assets .
This is a development cum governance deficit
These are some of the problems which can be counted on the fingers but the problems which are really worsening the situation in those Naxal affected areas even witness the death of many lives who are innocent and has nothing to do either with the government or their policy for the eradication of Naxal or Naxalism .
As for the Maoist , they need to realise that this is not a war they can win .The government must act in sophisticated way to tackle with such a problem which is worsening day by day .Moderate attacks can never be the solution of this permanent problem .
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Unknown
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