अखंड भारत के और खंड और सरकार की एवं देश की आँखे बंद, मैच, कवितायेँ चालू हैं .
Appeal to Patriotic Indians
30.5.11
अखंड भारत अब खंड खंड .
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अन्ना का जादू बना पिछलग्गू बाबाओं और अस्तित्वविहीन पार्टियों के लिए वरदान
बाबा रामदेव ४ जून से दिल्ली के रामलीला मैदान मे अपना योग शिविर लगाने जा रहे और कह रहे हैं कि ये सिर्फ योग शिविर है जबकि दिल्ली मे लगे पोस्टर मे भ्रष्टाचार अभियान का विज्ञापन छापा गया है। अन्ना हजारे कि तर्ज़ पर यह अभियान शुरू करने का मन बाबा रामदेव ने जब बनाया तो प्रशाशन ने अनुमति नहीं दी। जिसके बाद उन्होंने योग क नाम का सहारा लिया और राजनितिक योग सिखाने क लिए अनुमति ले ली। लेकिन कोई और भी है जो अन्ना कि ही तर्ज़ पर लेकिन किसानो, बेरोजगारों और मुसलमानों के लिए २ जून से भूख हड़ताल पर बैठने जा रहे हैं। ये है वंचित समाज इन्साफ पार्टी कि जंतर मंतर पर ही भूख हड़ताल पर बैठने वाली है। लेकिन कब तक ये तो नहीं पता लेकिन अगर वो इन्साफ मिलने तक बैठते हैं तो शायद उन्हें दुनिया से दिवंगत होना पड़े। क्योकि बेरोजगारी, किसानो कि समस्या और मुसलमानों कि स्थिति जैसी समस्या शायद ही कोई हल कर सके। बहारहाल जो भी हो अन्ना का जादू पिछलग्गू बाबाओं और अस्तित्वविहीन पार्टियों के लिए वरदान जरुर बन गया है। अंतर ये है कि बाबाओं को योग से लेकर राजयोग का सहारा है और अस्तिवाविहीं पार्टियों को मात्र समाचारपत्रों का, जिसको पढ़कर ये पता चला कि कोई और भी है जो अन्ना कि तर्ज़ पर देश का उद्हर करना छह रहे हैं.
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Unknown
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एक लेखक आत्महत्या करने जा रहा है ।
लेखक कहता हैः- " ये मेरी अंतिम पोस्ट और अंतिम पत्र है क्योंकि, अब मैं जीना नहीं चाहता, जिस वक़्त आप मेरा ये अंतिम पत्र यह पढ़ रहे होंगे, मैंने आत्मघात कर लिया होगा, अलविदा दोस्तों..!!"
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/05/blog-post_30.html
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Markand Dave
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Labels: आत्महत्या, ज़िंदगी, ब्लॉगर, मार्कण्ड दवे, मौत
29.5.11
शायरी
क्या आप चाहते हैँ कि शायरी आपके मोबाईल पर आए और आपको इसके लिए कोई शुल्क न लगे।ये संभव है।आपको बस अपने मोबाईल से एक एक्टिवेशन रिक्वेस्ट भेजनी होगी।इसके लिए आपको बस एक बार ज्यादा से ज्यादा डेढ रूपये देने होगे।उसके बाद आपको जीवन भर मुफ्त मेँ शायरी आएगी।एक्टिवेट करने के लिए अपने मोबाईल के राईट मैसेज बॉक्स मेँ जाकर टाईप करेँ JOIN LOVEGIVESTEARS और भेज देँ 09219592195 पर।आप जितने अधिक लोगोँ को ये एक्टिवेट करवाओगे,आपको उतनी बेहतर सुविधा मिलेगी।तो मोबाईल उठाइए और तुरन्त ये मैसेज भेज देँ।ध्यान रखेँ कि JOIN और LOVEGIVESTEARS के बीच मेँ स्पेस जरूर हो
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Kunal Verma
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बनारस में सियासत की सभा
रविकुमार बाबुल
सियासत भी अजीब राह पकड़ कर चलती है, जब इसकी नब्ज ढ़ीली पड़ती है तो यह सरकार को कसते हुये दिखलायी देती है, और जब इसकी पकड़ मजबूत बन चलती है, तो यही सियासत अवाम की पकड़ से दूर हो चलती है, इसकी बानगी देखनी हो तो लाल और हरा के सहारे लौह पथगामिनी के भरे-पूरे मंत्रालय को ही नहीं बल्कि सरकार को भी अपने इशारे पर चलाने का दंभ भरने वाली ममता बनर्जी को देखना होगा? ममता बनर्जी ने इन्हीं हरे और लाल के सहारे कलकत्ता में लाल का सफाया करके न सिर्फ 36 साल का रिकार्ड को तोड़ा, बल्कि अपनी मौजूदगी से बैसाख में सावन का-सा एहसास भी दिला दिया, चारों तरफ हरा ही हरा पसर गया? रेल भवन से राइटर्स बिल्ंिडग का सफर तय कर लेना यह साबित करता है, कि यह ख्वाब किसी सावन के अंधे ने नहीं देखा था? इधर जीत की खुशी में तमाम तरह की बिकने वाली मिठाइयों के बजाये सोनिया गांधी जयललिता को चाय पर बुला कर मुंह मीठा करना चाहें और उनकी ही सरकार के इशारे पर चलने वाली सी.बी.आई. (जैसा की पूर्व में आरोप लगते रहे हैं) कनीमोझी की उंगली पकड़ कर उसे राजा की राह पर ले जाने की अपनी जिद् में सफलता प्राप्त किये बैठी हो, ऐसे में सरकार चलाने की मजबूरी मान डी.एम.के. का समर्थन ले रही कांग्रेस नये और मजबूत मित्र तलाशेगी ही? लेकिन दुश्मन का दुश्मन जब दोस्त बन चले तो फिर सियासत यहीं से शुरु होती है।
राज्यों का यह चुनाव सियासी दलों को क्या चुनौती दे गया, इसका तो आंकलन राजनीतिज्ञ पंडित ही करेंगे, लेकिन गंगा के तीरे जुटे रहने वाले पंडा यह सोच कर हैरान हो रहे होंगे कि आखिर गंगा की तरह मैली हो चुकी सियासत का बनारस के साथ जो नया रिश्ता पनप रहा है, वह सियासत को सियासत की गंदगी से मोक्ष दिलायेगा या फिर गंगा सफाई अभियान की तरह ही सब कुछ वैैसा ही रह जायेगा, जैसा पहले था?
भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस से लेकर समाज सेवा के आसरे भ्रष्टाचार खत्म करने के लिये अन्न त्यागने वाले अन्ना, सभी ने अपनी-अपनी मंजिलें पाने की जिद् के ऐलान के लिये पाक जमीन बनारस को ही चुना।
मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुये भले ही भ्रष्टाचार के आरोपों को दर-किनार कर अपनी आदमकद प्रतिमाएं लगवा ली हों, लेकिन 2012 में उनका लखनऊ में बैठ समूचे उत्तरप्रदेश को अपने इशारे पर चलाना मुश्किल हो चला, लगने लगा है, भाजपा ने जिस तरह अपना चुनावी एजेन्डा बनारस में गडकरी, राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी आदि तमाम दिग्गज नेताओं के सरमाये में तय किया है, बहिनजी के लिये अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है? दूसरी तरफ कांग्रेस परिवार के लाड़ले कहें या फिर युवराज राहुल ने बनारस को ही चुना, चुनाव की तैयारी के लिये 18 मई को राहुल ने जिस सिलसिले की शुरूआत की उसे 19 मई को मां सोनिया गांधी ने आगे बढ़ाया। इस उम्मीद के साथ की केन्द्रीय सरकार के गठन में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्य उत्तरप्रदेश का नसीब वह बदल कर रख दें, सत्ता बदलने के बहाने। सत्ता का जिक्र चले और सपा को न याद रखा जाये, कैसे मुमकीन है, सपा नेता और विपाशा के अंतरंग मित्र अमर सिंह के कभी बड़े भाई रहे मुलायम सिंह यादव ने भी सत्ता की सीढिय़ां तैयार करने के लिये बनारस को ही अपनी पहली पसंद माना, सियासत के लिये पहली सभा करके। देखना होगा कि भोलेेनाथ की नगरी में किसको सत्ता का प्रसाद मिलता है, इसके लिये तो इंतजार करना होगा? लेकिन संचार-क्रांति के युग में अन्न त्यागने वाले वाले अन्ना ने भ्रष्टाचार को लेकर देशव्यापी मुहिम बनारस से ही शुरु की, टेलीफोन पर रैली को संबोधित करके? त्रि-नेत्रधारी शिव का तांडव, जब हर शख्स की उम्मीद और आसरा बन चला हो, तब अमृतपान के लिये जुटी भीड़ में विष गरल में उतारने वाले को ही सत्ता मिलेगी यह यकीन कर लेना चाहिये?
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babul
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सावधान आजकल मेल में बग आ रहे हैं ,
सावधान आजकल मेल में बग
आ रहे हैं .
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आम दिमाग के बूता नहीं चुनौती देना
वनवास के दौरान जब रावण के कोई अतेपते भी नहीं थे, जब कोई पता भी न था कि राम रावण में दीर्घंतर ठनेगी। कोई समुंदर होगा, सुग्रीव, बाली और हुनमान होंगे। यह भी नहीं पता था सीता का हरण होगा या जटायू राम के लिए शहीद होंगे। तब लक्ष्मण ने सूपर्णखा की नाक काटकर किसी सुने त्रिलोकी राजा रावण को
दे डाली थी। लक्ष्मण के पास उस वक्त कोई रावण दिमाग में नहीं था, बल्कि अपनी ईमानदारी की महाताकत और कार्यकुशलता की योजनाबद्ध यशस्वीयता के साथ ही लक्ष्मण को अपने जोश पर भरोसा था। रावण को चुनौती देने वाले लक्ष्मण न तो अतिउत्साहित थे और न ही वे किसी गफलत में ही थे। और ऐसा भी नहीं कि लक्ष्मण को उस समय राम की ओर से ही शह थी। लक्ष्मण ने जो किया वो अपने दम पर किया। यह चुनौती न तो सोचकर दी थी और न ही किसी तरह की योजना को दिमाग में ही रखकर। इस बात यहां पर कहना लाजिमी होगा, भले ही रामायण काल खत्म होने के बाद लक्ष्मण को भगवान मानते हुए सारी बातों को पूर्व निर्धारित कहने लगें। लेकिन लक्ष्मण के इस शौर्य को प्रोत्साहित करना चाहिए।
चुनौती देना और लेना दोनों ही आज के बाजारी महागुणों में शुमार तत्व हैं। लंबे अरसे तक राज्य करने के बाद अंग्रेजों ने पूरे भारत में अपनी ऐसी स्वीकार्यता शुरू हो गई थी, कि छोटी रियासतें तो कुछ बोल ही नहीं सकती थी। बड़ी को कुचल दिया जाता था। बस एक आदमी था मंगल पांडे, जिसने सबसे पहले खारिज किया। कौन अंग्रेज कैसे अंग्रेज, कोई विधाता तो नहीं हैं, कोई परमात्मा तो नहीं हैं न, कोई नियति तो नहीं हैं न। तब कैसी स्वीकार्यता। दे डाली चुनौती और अंग्रेजी हुकुमत का ताबूत बनने लगा।
नक्सली हिंसा करते हैं, विकास के कार्यों को रोकते हैं, लेकिन सलाम के काबिल हैं, कम से कम अन्याय को तो नहीं स्वीकारते। सलाम उन्हें कि वे आतंक के महापर्याय होते हुए भी आदर्शवादी विश्व की परिकल्पना करते हैं। और जो सरकारें या व्यवस्थाएं आदर्शवाद का ढोल पीटती हैं उनमें नेता और अफसरों की ऐश देखते ही बनती है। खारिज करने की क्षमता ही चुनौती देने की क्षमता का विकास करती है।
हो सकता है लंबे अरसे से आदिवासियों की तरह पीपल के पेड़ में ढिमका देव रहते हैं। ट्राइब की सात पुश्तें उस पीपल के आसपास से निकलने या वहां पर गलत काम करने से डरती रहीं, क्योंकि देव हैं। और एक वक्त ऐसा आया कि उस पीपल में देव तो नहीं लेकिन आस्था की ताकत आ गई। नतीजा पीपल के देव अब हिंसक हो गए, वे कोई भला करें न करें, लेकिन अपना हक जरूर ले रहे हैं। जिस-तिस के साथ कुछ उल्टा हुआ पीपल देव के कोप को और बल मिलता गया। एक दिन वन विभाग का अमला आया सडक़ बननी थी। पीपल काटने लगा। आदिवासियों को लगा अब देव प्रकट होकर सबको मार डालेगा, कहां कुछ हुआ। पीपल को काट फेंका राष्ट्रीय राज्यमार्ग बन गया। अरबों का व्यापार बढ़ा, सैकड़ों की जिंदगी बदली। पीपल देव थे वरना सदियों से वहां।
खारिज करिए। चुनौती दीजिए। लोगों को बताइए आप क्या हैं। इसके लिए कई बार आप पर आरोप लगेंगे, आप आतार्ता, बदमिजाज, गैर वाजिब बात करने वाले और कई बार आपके खिलाफ षडयंत्र भी होंगे। लेकिन आप खारिज करते जाइए।
ईश्वर को पाने की पहली सीढ़ी भी खारिज करना ही तो है, आपने खारिज किया कि जो दिख रहा है संसार वह नहीं है। जो समझ आ रहा है, वह सत्य नहीं है। सत्य ईश्वर है, कहीं दिखाई नहीं दे रहा। लेकिन मिल गया। कैसे खारिज करने और संसार के अस्तित्व को चुनौती देने से।
-सखाजी
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Barun Sakhajee Shrivastav
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Labels: चुनौती
मेरी बेटी
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Shikha Kaushik
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Labels: kavita
अंदाज ए मेरा: आत्मसमर्पित नक्सली की कहानी........ उसी की जुबान...
अंदाज ए मेरा: आत्मसमर्पित नक्सली की कहानी........ उसी की जुबान...: "उसकी उमर कोई 21 साल है। वैसे तो 21 साल की उमर कोई बडी उमर नहीं होती लेकिन इस कम उम्र में उसने काफी कुछ झेला है। उसका नाम संध्या है। आज..."
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Atul Shrivastava
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28.5.11
दो पत्र ......एक शहीद ने लिखा ......दूसरा chief of army staff ने
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Dadda ki Khari Khari
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सियासत
पेश है इंडिया न्यूज़ हिंदी साप्ताहिक पत्रिका के 03 जून 2011 के अंक में छपा रिपोर्ट...
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M. Afsar Khan
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confused राजा की confused प्रजा
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Dadda ki Khari Khari
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वाह क्या प्रेम है..!! wow..!! what a LOVE?
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Markand Dave
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११०० की राशि और सम्मिलित करना चाहूंगा
मित्रों,यह पोस्ट लिखने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि ना तो मेरा संघ-परिवार से कोई संबंध है ना उनकी विचारधारा से सहमति अपितु मुझे जानने वाले इस बात की तसदीक करेंगे कि मैने सदैव मुखर होकर उनकी कई बात काविरोद्ध किया और नुकसान भी उठाया है।परंतु स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ को लेकर जो टिप्पणी की और फिर नित्यानद ने जो उनकी प्राकृतिक चिकित्सा की उससे यही सिद्ध होता है कि अग्निवेश को भी वही बीमारी है जिसके लक्षण कभी दिग्विजय सिंह कभी मुलायम सिंह कभि मायावती मे दिखाई देते हैं।यदि आप स्वयं को इतना ही प्रगतिशील मानते है तो एक बार यह भी बताइये कि मक्का का संगे असवद काले पत्थर के सिवा कुछ नहीं
सिर्फ अग्निवेश ही क्यों ?तमाम तथाकथित प्रगतिशीलों को चुनौती है कि हज़रत मुहम्मद का चरित्र-चित्रण तो छोडिए एक रेखाचित्र ही बनाकर दिखाएं।पश्चिम जोकि स्वयं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अलंबरदार मानता है वहां भी हज़रत ईसा के एक कुंआरी के गर्भ से पैदा होने की प्रक्रिया पर बात नही होती।
इस पोस्ट के माध्यम से मैम महंत नित्यानमद को बधाई देते हुए उन्होने जुता मारने वाले को जो ५१००० की राशि घोषित की है उसमें अपनी गाढी कमाई की ११०० की राशि और सम्मिलित करना चाहूंगा।
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Arvind pathik
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हाय महा शोक ! मेरे जर्मन दोस्त मार्गदर्शक मधुकर / Swami Madhukar aka Swami Dhyan Hareesh (Berthold Happle-Thompson) का देहांत
हाय महा शोक ! मेरे जर्मन दोस्त मार्गदर्शक मधुकर / Swami Madhukar aka Swami Dhyan Hareesh (Berthold Happle-Thompson) का देहांत
Bernard Mohan Fickert
P.O Box 80210
Haiku, HI 96708
www.islandartstore.com
572-3520 h • 575-7696 w • 264-2399
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27.5.11
जन्तर मन्तर अन्ना हजारे
लॉफ्टर चैलेंज फेम और सुविख्यात व्यंग्य व हास्य कवि रासाबिहारी गौड की देश के मौजूदा हालात पर यह रचना गागर में सागर के समान है, व्यंग्य और हास्य के साथ इसमें आम आदमी को तंग करता वह तंज भी है, जिसका उसके पास कोई उपाय ही नहीं है, आप स्वयं ही देख सुन लीजिए मुझे लगा कि यह आपको भी शेयर करनी चाहिए, सो प्रस्तुत है
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तेजवानी गिरधर
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थप्पड़ की गूँज-ब्रज की दुनिया
मित्रों,लोकतंत्र में नाराज होना और उसे अभिव्यक्त करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है लेकिन उसका तरीका क्या होना चाहिए;विवादित है.वर्तमान काल में किसी बड़ी शख्शियत से अपना विरोध जताने के लिए लोग उसकी ओर जूते-चप्पल उछालना ज्यादा बेहतर मानते हैं.अगर जूते-चप्पल अवकाश-प्राप्ति की स्थिति में पहुँच गए हों तो यह तरीका और भी कारगर हो जाता है.
मित्रों,कई लोग अपनी नाराजगी दिखाने के लिए शारीरिक क्षति पहुँचाने से भी नहीं चूकते.पहले लक्षित व्यक्ति को और बाद में पुलिस के हाथों पिटकर खुद अपने-आपको को इस प्रक्रिया में भारी शारीरिक कष्ट उठाना पड़ता है.कभी-कभी गलती एक ही पक्ष यानि आक्रामक पक्ष की होती है तो कभी-कभी दोनों पक्षों की.
मित्रों,कुछ दिनों पहले प्रख्यात समाजसेवी,आर्यसमाजी और संन्यासी स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ यात्रा को लेकर अभद्र टिपण्णी की.भारत आदिकाल से ही सहअस्तित्व का समर्थक रहा है.सम्राट अशोक ने सवा दो हजार साल पहले अपने शिलालेखों और स्तम्भलेखों में उत्कीर्ण करवाया था कि किसी भी संप्रदाय को मानने वाला दूसरे संप्रदाय वालों की पूजा-पद्धति की निंदा नहीं करे अन्यथा वह राजदंड का भागी होगा.लगता है प्रसिद्धि के मद में स्वामी अग्निवेश सामान्य शिष्टाचार भी भूल गए है.हम मूर्तिपूजक भी आर्यसमाजियों की तरह भलीभांति जानते हैं कि मूर्ति या तस्वीर भगवान नहीं होता;वह सिर्फ एक प्रतीक होता है,माध्यम होता है.स्वामी जी को अगर मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ करना था तो वे अपनी ईच्छा जाहिर करते और तब अगर वे विजयी होते तो लोग उनका सम्मान करते न कि थप्पड़ मारते.लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अमरनाथ यात्रा पर सार्वजनिक रूप से उटपटांग बयान दे दिया.अगर कोई मूर्तिपूजा करता है तो वह उनका या किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ता,यह कार्य पूरी तरह से व्यक्तिगत और हिंसा या हानि से रहित है इसलिए भी स्वामी अग्निवेश जैसे बुद्धिजीवी को बेवजह इसकी आलोचना करना किसी भी दृष्टिकोण से शोभा नहीं देता.
दोस्तों,मैं स्वामी नित्यानंद ने स्वामी अग्निवेश के साथ जो कुछ भी किया उसका कतई समर्थन नहीं करता हूँ;उन्हें ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.उन्हें बात का जवाब बात से देना चाहिए था और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए था.यहाँ कोई ऐसी स्थिति नहीं थी कि हिंसा का प्रयोग अपरिहार्य हो जाए.भारत मुंडे मुंडे मति भिन्नाः का आदि प्रतिपादक रहा है अतः कम-से-कम आर्यावर्त की इस पवित्र धरती पर साम,दाम और दंड को छोड़कर सीधे भेद पर उतारू हो जाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता.
दोस्तों,संन्यास आश्रम शास्त्रवर्णित चारों आश्रमों में सबसे कठिन और गरिमामय है.प्रत्येक संन्यासी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इन्द्रियों के साथ-साथ मन पर भी नियंत्रण रखते हुए अपने जीवन को मानव-सेवा में लगाएंगे या फिर ईश्वराधना में.लगातार चिंतन-मनन करेंगे और अपने अनुभवों से अवगत कराके पूरी दुनिया को लाभ पहुँचाएंगे.मैं नहीं समझता कि स्वामी अग्निवेश जैसे प्रबुद्ध-विद्वान संन्यासी ने जो कुछ भी किया-कहा वह किसी भी तरह संन्यास की अतिकठिन कसौटी पर खरा उतरता है.मैंने माना कि गरीबों की मदद करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है लेकिन क्या दूसरों की धार्मिक भावनाओं का आदर करना भी एक महत्वपूर्ण नागरिक कर्त्तव्य नहीं है?धार्मिक आस्था और समाजसेवा दो अलग-अलग बातें हैं फिर भला दोनों को एक साथ जोड़कर बात करने की स्वामीजी की क्या मजबूरी थी?
मित्रों,मतभेद मतभेद तक ही सीमित रहे तो ठीक है उसका मनभेद में बदल जाना न तो समाज के लिए अच्छा है और न ही उस राष्ट्र के लिए जिसकी नींव ही प्रेम और सद्भाव पर टिकी हो इसलिए मैं उम्मीद करता हूँ कि इस थप्पड़ की गूँज यहीं थम जाएगी और हमारे सामने फिर से उसकी प्रतिध्वनि सुनने का कुअवसर नहीं आएगा.नाराजगी या विरोध प्रकट करने के बहुत-से स्वस्थ तरीके भी हैं;लोग उनका ही प्रयोग करें तो बेहतर होगा हमारे समाज के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए.
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ब्रजकिशोर सिंह
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अस्पृश्यता ......तेरी छुआछूत बहुत खराब ....मेरी छुआछूत बहुत अच्छी
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Dadda ki Khari Khari
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सबसे निचले पायदान पर बैठे लोग ......
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Dadda ki Khari Khari
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26.5.11
reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी
reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी: "एक कश्ती सी रीनाकारी ,फिरती साहिल की तलाश में , कुछ नज़र में आया है ,शायद कोई किनारा आया है , कुछ देर ठहर यहाँ थकान उतार लू , फिर ना जाने..."
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malik
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reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी
reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी: "एक कश्ती सी रीनाकारी ,फिरती साहिल की तलाश में , कुछ नज़र में आया है ,शायद कोई किनारा आया है , कुछ देर ठहर यहाँ थकान उतार लू , फिर ना जाने..."
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malik
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तुम याद बहुत आओगे
कौन, कब, कितना याद आता है इसका आज तक तो कोई बेरोमीटर बना नही है। न ही कोई ऐसा पैमाना है कि जिससे पता चले कि हमने किसी को कितना याद किया। किसी की याद तभी आती है जब वह हमारे पास नहीं होता या हमें यह पता चल जाए कि हम उस अपने से दूर होने वाले हैं।
हम जब किसी अंजान शहर मे जाते हैं। तो भीड़ का हिस्सा बन जाने के बाद भी अलग-थलग से रहते हैं तो इसलिए कि हम जानते हैं कि इस भीड़ में जितने लोग हैं वह सब अंजाने हैं। बस ऐसे ही वक्त में हमें अपनों की याद आती भी है तो कैसे कि उन अपरिचित चेहरों में हम किसी अपने का चेहरा देखने लगते हैं। उस शहर के चौराहों, गलियों में अपने शहर की कोई मिलती-जुलती गली-मकान खोज लेते हैं और इस तरह वह अंजान शहर फिर चाहे वह शिमला हो, गंगानगर, उदयपुर हो या उजैन जाने कब हमारा अपना बन जाता है। पता ही नहीं चलता। अंजाना शहर हम में कितना रच-बस गया है यह भी तब पता चलता है जब अचानक उस शहर को छोड़ने के हालात बन जाएं। सरकारी नौकरी में तबादले का दर्द सहने वाले कर्मचारी वर्ग से कौन यादा समझ सकता है अपने शहर को छोड़ने और किसी भी अंजाने शहर से जुड़ी अपनी यादों का आइना टूटने का दर्द।
शिमला की ही बात करें तो यहां का मौसम, देवदार-चीड़ के दरख्त कहां भुलाए जा सकते हैं। संघर्षों के बीच दाना-पानी के लिए संघर्ष करते बन्दर और बाकी पशु-पक्षी, संकरे रास्तों और उंचाई पर बने मकानों तक के सफर को आसान बनाते कुली(खान), चाहे जितने तनाव में भी पेशेंस नहीं खोने वाले आम लोग, बर्फीले मौसम में भी अपने दायित्व आसानी से पूरे करने वाले होकर, डाककर्मी, यादा की चाहत नहीं और जो है उसमें खुश रहने के आध्यात्म को दर्शाते लोग ये सब बताते हैं कि पहाड़ों की इस चुनौतीपूर्ण जिन्दगी को आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।
पहाड़ों के शिखर पर इठलाते, आसमान छूने की कोशिश करते नजर आने वाले देवदार क्या भुलाए जा सकते हैं। जाने क्यों मुझे ये ऊंचे-ऊंचे दरख्त अहसास कराते हैं कि जीवन में कुछ पाने, ऊंचा उठने के लिए संघर्ष के सफर वाले रास्ते पर चलना है तो पीछे काफी कुछ छोड़ते हुए चलना पडेग़ा। देवदार बताते हैं कि जो उंचा उठते हैं उन्हें कई तरह के त्याग करने पड़ते हैं। देवदार जैसे खड़ा सौ साल का और आड़ा भी इतने ही साल का तो जो ऊंचा उठने की चाहत रखते हैं वे सब भी अपना नाम-काम इतने वर्षों तक तभी बनाए रख सकते हैं जब वे देवदार-चीड़ जैसे वृक्षों की तरह हर हाल में अपना वजूद बनाएं रखने को तत्पर रहना सीख लें।
कोई भी अंजान शहर, अपरिचित लोग आप के तभी हो सकते हैं जब आप इन सब से तालमेल बैठाना सीख लें। आप जिस शहर में जाएं उस के प्रति एहसानमंद ना हो अपने शहर और अपने लोगों का ही गुणगान करते ना थके तो यह उस शहर के प्रति नाइंसाफी ही होगी। ऐसी तो बहू भी अपने ससुराल में कभी किसी का दिल नहीं जीत पाएगी जो रहे तो ससुराल मे लेकिन बात-बात मे मायके का जिक्र करना नहीं भूले। जीवन के किसी भी क्षेत्र में उपलब्धियों वाली मंजिल तक तभी पहुंचा जा सकता है जब उस काम के प्रति शतप्रतिशत समर्पण वाला भाव हो। यानी अंजान शहर, वहां के लोगों को आप अपना तभी बना सकते हैं जब वहां के रंग-ढंग मे ढलना भी सीख लें। ऐसा होने पर ही पता चल सकता है कि कल तक जो शहर, जो लोग अपरिचित से थे वह सब तो अपने से हो गए हैं। यह अपना सा लगने का भाव ही शहर छोड़ते वक्त तुम्हे कैसे भुलाऊं की पीड़ा मे बदल जाता है।
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कीर्ति राणा
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...और ममता का एक रूप यह भी
शंकर जालान
जी हां, पश्चिम बंगाल की अग्नि कन्या यानी ममता बनर्जी ने केवल कला प्रेमी है बल्कि एक सफल चित्रकार भी हैं। रेल मंत्री व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को ज्यादातर लोग जुझारू नेता के तौर पर जानते हैं, लेकिन इन चित्रों को देख कर कोई भी सहज ही सकते में पड़ सकता है और यह मानने से पहले दांतों तले अंगुली दबा सकता है कि ये चित्र ममता बनर्जी के बनाए हुए हैं। लोग यह सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि आखिर इतनी व्यस्तता और भाग-दौड़ भरे राजनीतिक जीवन में ममता बनर्जी कैसे कला के लिए समय निकाल लेती हैं। इतना ही नहीं यानी कला के अलावा बनर्जी साहित्य के लिए भी वक्त बचा लेती हैं।सच मानिए संसद में जब जोरदार बहसों का दौर हो या फिर दक्षिण कोलकाता के कालीघाट स्थित उनका आवास या फिर तपसिया में बने तृणमूल कांग्रेस के मुख्यालय में बैठक हो रही हो या चर्चा। ममता बनर्जी थोड़ा समय निकाल कर पेंटिंग्स कर लेती हैं और कविताएं भी लिख लेती हैं।आप ने ठीक समझा हम यहां उसी ममता बनर्जी की बात कर रहे हैं जो पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में परिवर्तन का प्रतीक बनी हुई है। इन्हीं ममता बनर्जी की बनाई गई १०१ पेंटिंग्स की प्रदर्शनी शेक्सपियर सरणी स्थित गैलरी-८८ में लगाई गई। तीन दिनों तक चलने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन चार अप्रैल को हुआ, लेकिन लोगों की भीड़ को देखते हुए प्रदर्शनी एक दिन और बढ़ा दी गई। हालांकि १०१ चित्रों की प्रदर्शनी में बिक्री के लिए ९८ चित्र ही है और बुधवार शाम तक इनमें से आधे से अधिक चित्र बिक चुके थे। इसके एवज में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए एकत्रित किए जा चुके थे।प्रदर्शनी की खास बात यह है कि पहले ही दिन से यहां कला प्रेमियों का न केवल आगमन शुरू हो गया था, बल्कि १४ पेटिंग्स को खरीदार भी मिल गए थे। दूसरे दिन भी १४ और तीसरे दिन १५ से ज्यादा पेंटिंग्स को कला प्रेमियों ने खरीदा।इस प्रदर्शनी में हर रंग और मिजाज को ध्यान में रख कर बनाए गए चित्रों को रखा गया है। ममता के करीबियों के मुताबिक ममता ने इन चित्रों को व्यस्त दिनचर्या के बीच फुरसत में बनाया है। इन चित्रों में जंगल महल, द रिदम आफ लाइफ, द डाउन, अनसीन ड्रीम, फेडेड ब्यूटी व विंड इन ब्लू शामिल हैं।प्रदर्शनी में इन चित्रों को देखने के दौरान कला के जानकर बातचीत भी कर रहे थे और लगभग हर कोई ममता की पेंटिंग्स की तारीफ कर रहा था। कला के इन मुरीदों में मशहूर कलाकार से लेकर आम लोग मुग्ध होकर दीदी (ममता बनर्जी) के चित्रों की प्रशंसा में व्यस्त दिखे। ममता की पेंटिंग्स में उनके बहुचर्चित नारे मां-माटी-मानुष से लेकर जीवन और समाज के विविध रंग भरे हैं। सूत्रों के मुताबिक बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग पार्टी के सांगठनिक कार्यों में किया जाएगा। इसके साथ ही इन पैसों से गरीब व असहायों की मदद की जाएगी।पेटिंग्स की तारीफ करते हुए कोलकाता के मेयर शोभन चटर्जी कहते हैं - ममता छात्र राजनीति के समय से ही किसानों के आंदोलन से जुड़ी थी। प्रकृति के प्रति प्रेम उनमें बचपन से था। उनकी बनाई पेटिंग्स प्रेरणादायक है। कमोबेश यह बात विधानसभा में विरोधी दल के नेता पार्थ चटर्जी में कहते हैं।पेंटिंग्स खरीदने वालों में हर्ष नेवटिया, जगमोहन डालमिया, हरनाथ चक्रवर्ती, रंजीत मल्लिक, जय मेहता समेत कई जाने माने लोग व उद्योगपित शामिल है। वहीं, देखने वाले संजीव गोयनका, आरएस अग्रवाल, आरएस गोयनका, मेघनाथ राय, संदीप भूतोडि़या, जय गोस्वामी, कावेरी गोस्वामी शामिल थे। इन लोगों ने कहा- आंखों को आकर्षित करते हैं चित्रों के रंग। इनमें तुली (ब्रश) की साहसिकता उभर कर आई है। इन चित्रों में गंभीर शांति के भाव छिपे हैं।मालूम हो कि इस प्रदर्शनी का आयोजन तृणमूल कांग्रेस के मुखपत्र जागों बांग्ला की ओर से किया गया। इसमें दो युवा कला प्रेमी सृंजय बोस और शिवाजी पांजा का विशेष सहयोग रहा है। ममता के चित्रों की पहली प्रदर्शनी २००५ में लगी थी, जिसके मार्फत चार लाख रुपए जुट पाए थे और दूसरी प्रदर्शनी २००७ में लगी थी और १४ लाख रुपए एकत्रित किए गए थे।शंकर जालान
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anjuman
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यह जनता की जीत है - ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली और वाममोर्चा के ३४ साल के शासनकाल के ध्वस्त करने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी इस जीत को जनता की जीत मानती है। मा. माटी और मानुष के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का कहना है कि सचमुच में अब बंगाल आजाद हुआ है। अभूतपूर्व जीत और बंगाल की में विकास की बयार पर रेलमंत्री व अग्निकन्या के नाम से चर्चित ममता बनर्जी से शंकर जालान ने उनके कालीघाट स्थित निवास पर बातचीत की। पेश हैं उसके संक्षित और चुनिंदा अंश-
-- इस जीत को आप किस नजर से देखती हैं?०० यह जीत जनता की जीत है या दूसरे शब्दों में कहे तो हिंसा और हत्या की राजनीति को जनता से सिरे से नकार दिया है।
-- इसे आप वाममोर्चा की हार मानती है या तृणमूल कांग्रेस की जीत?०० निसंदेह तृणमूल कांग्रेस की जीत और वाममोर्चा की सिर्फ हार नहीं बल्कि बुरी हार।
-- क्या आपको वाममोर्चा की इस हार की मुख्य वजह क्या लगती है?०० जनता के बदलाव के मूड को।
-- आपको नहीं लगता की सिंगूर और नंदीग्राम ने आपको सत्ता की चाबी पकड़ाने में मदद की होगी?०० वाममोर्चा, विशेष कर माकपा ने सिंगूर और नंदीग्राम ही क्यों, नेताई के साथ न जाने कितने जुल्म आमलोगों पर ढाए है। उसी का खामियाजा चुनाव परिणाम के रूप में उसे मिला है।
--तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार का रोडमैप क्या होगा?००सरकार का रोडमैप हम आम जनता से पूछ कर तय करेंगे।
--वाममोर्चा सरकार की कुछ नीतियों को आगे क्रियान्वित किया जाएगा या फिर सब कुछ नया होगा?००सब कुछ नया होगा, क्योंकि उनकी नीतियां ही ठीक होती तो पश्चिम बंगाल की जनता उन्हें ठुकराती क्यों? नई सरकार का कामकाज तृणमूल-कांग्रेस-एसयूसीआई गठबंधन संयुक्त रूप से तय करेगा।
--कौन होगा अगला रेल मंत्री?०० इस सवाल को जवाब के लिए १८ मई तक इंतजार करना पड़ेगा ।
--सीएम हाउस में नया बसेरा बनेगा या कालीघाट ही नया मुख्यमंत्री आवास होगा?००--उल्टे सवाल दागते हुए क्यों. आपको कालीघाट का आवास ठीक नहीं लग रहा। अभी तो यहीं हूं। बाकी बाद में देखूंगी।
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anjuman
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अगले जनम मोहे ऑडिटर ही कीजो-ब्रज की दुनिया
दोस्तों,मैं पिछले साल एक कंगाल एनजीओ का अवैतनिक अध्यक्ष भी रहा.जब भी कहीं टेंडर प्राप्त करने या भरने का प्रयास करता;पता चलता कि सरकार ने इस काम के लिए इच्छुक एनजीओ के लिए पिछले तीन सालों में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम ३ लाख या कभी-कभी तो इससे भी अधिक का काम करवाने या सरकारी टेंडर प्राप्त करने की पात्रता निर्धारित करके रखी है.बार-बार समस्या खड़ी हो जाती कि टेंडर लेने की पात्रता कैसे प्राप्त की जाए जबकि सच्चाई तो यह थी कि हमारे एनजीओ को तो पिछले ३ वर्षों में दस-बीस हजार का भी सरकारी काम या टेंडर नहीं मिला था.मैंने जब सचिव महोदय से समस्या बताई तो वे बोले कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है;चलिए किसी प्राईवेट ऑडिटर से प्रमाण-पत्र ले लेते हैं.जब हम ऑडिटर के पास गए तो पाया कि श्रीमान ऑडिटर महोदय ने तो एनजीओ और कम्पनियों के लिए खुलेआम घूस की रेटलिस्ट बना रखी है;जैसे १०० रूपये में १ लाख,२०० रूपये में २ लाख रूपये का प्रमाण-पत्र या फिर इतने रूपये में कंपनी या फर्म की बैलेंस-शीट में इतने की हेराफेरी.
मित्रों,आप शायद नहीं जानते होंगे कि हमारा शहर हाजीपुर बिहार विश्वविद्यालय में आता है.इस समय इस विश्वविद्यालय के सभी २३०० पेंशनधारी शिक्षक परेशान हैं.एक तरफ सभी गुरुजनों के बकाए और अवकाश-प्राप्ति लाभ का निपटारा होना है वहीं दूसरी ओर नए वेतनमान के निर्धारण का काम भी चल रहा है.अभी यहाँ जो स्थिति है वह ‘सब शुभकाम ऑडिटर के हाथा’ वाली है.जिन शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के ऑडिटरों की मुट्ठी गरम कर दी है उनकी तो पौ-बारह है लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया है वे परेशान-ही-परेशान हैं.उनमें से एक तिहाई तो घूस देने में बेवजह की हिचक के चलते पटना उच्च न्यायलय भी पहुँच गए हैं लेकिन समस्या यह है कि उन्हें न्यायालय जाने का भी कोई लाभ नहीं हो रहा है और उनकी फाइलें अंत में भूदेव ऑडिटरों के पास जाकर अँटक जा रही है.उच्च न्यायालय इनकी जूती की नोंक पर है.ऑडिटर उनसे बार-बार बेतुके कागजात मांग रहे हैं.कई बार तो ऐसे कागजातों की मांग भी की जाती है जो विश्वविद्यालय महाविद्यालयों को भेजता ही नहीं है.मजबूरी में कोई १० हजार तो कोई २० हजार या इससे भी ज्यादा देकर अपना कल्याण करवा रहा है.इसलिए मेरी ईच्छा के भीतर एक और ईच्छा है कि मैं अगले जन्म में ऑडिटर तो बनूँ ही साथ ही बिहार विश्वविद्यालय का ऑडिटर बनूँ.
दोस्तों,इस समय पूरी दुनिया के लोग निजी और सरकारी क्षेत्रों में बढ़ते घोटालों से चिंतित है और इससे पार पाने का उपाय खोज रहे हैं.मेरी नजर में उपाय एकदम सरल है.बस ऑडिटरों के स्क्रू को टाईट कर दिया जाए;सारे घपले-घोटाले खुद-ब-खुद रूक जाएँगे.सोंचिए अगर भारत का सीएजी ईमानदार नहीं होता तो क्या कभी घोटालों का राजा ए. राजा दुनिया का दूसरा सबसे भ्रष्ट महापुरुष बनने का गौरव प्राप्त कर पाता?खैर जब मेरे सुझाव पर अगले सौ-दो सौ सालों में अमल होगा तब होगा फिलहाल तो जो स्थिति है उसमें भगवान से यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि हे सर्वशक्तिमान मेरी ईच्छा पूर्ण करो.हे अंतर्यामी;मैं अगले जन्म में सिर्फ और सिर्फ ऑडिटर ही बनना चाहता हूँ.
दोस्तों,मैं पिछले साल एक कंगाल एनजीओ का अवैतनिक अध्यक्ष भी रहा.जब भी कहीं टेंडर प्राप्त करने या भरने का प्रयास करता;पता चलता कि सरकार ने इस काम के लिए इच्छुक एनजीओ के लिए पिछले तीन सालों में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम ३ लाख या कभी-कभी तो इससे भी अधिक का काम करवाने या सरकारी टेंडर प्राप्त करने की पात्रता निर्धारित करके रखी है.बार-बार समस्या खड़ी हो जाती कि टेंडर लेने की पात्रता कैसे प्राप्त की जाए जबकि सच्चाई तो यह थी कि हमारे एनजीओ को तो पिछले ३ वर्षों में दस-बीस हजार का भी सरकारी काम या टेंडर नहीं मिला था.मैंने जब सचिव महोदय से समस्या बताई तो वे बोले कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है;चलिए किसी प्राईवेट ऑडिटर से प्रमाण-पत्र ले लेते हैं.जब हम ऑडिटर के पास गए तो पाया कि श्रीमान ऑडिटर महोदय ने तो एनजीओ और कम्पनियों के लिए खुलेआम घूस की रेटलिस्ट बना रखी है;जैसे १०० रूपये में १ लाख,२०० रूपये में २ लाख रूपये का प्रमाण-पत्र या फिर इतने रूपये में कंपनी या फर्म की बैलेंस-शीट में इतने की हेराफेरी.
मित्रों,आप शायद नहीं जानते होंगे कि हमारा शहर हाजीपुर बिहार विश्वविद्यालय में आता है.इस समय इस विश्वविद्यालय के सभी २३०० पेंशनधारी शिक्षक परेशान हैं.एक तरफ सभी गुरुजनों के बकाए और अवकाश-प्राप्ति लाभ का निपटारा होना है वहीं दूसरी ओर नए वेतनमान के निर्धारण का काम भी चल रहा है.अभी यहाँ जो स्थिति है वह 'सब शुभकाम ऑडिटर के हाथा' वाली है.जिन शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के ऑडिटरों की मुट्ठी गरम कर दी है उनकी तो पौ-बारह है लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया है वे परेशान-ही-परेशान हैं.उनमें से एक तिहाई तो घूस देने में बेवजह की हिचक के चलते पटना उच्च न्यायलय भी पहुँच गए हैं लेकिन समस्या यह है कि उन्हें न्यायालय जाने का भी कोई लाभ नहीं हो रहा है और उनकी फाइलें अंत में भूदेव ऑडिटरों के पास जाकर अँटक जा रही है.उच्च न्यायालय इनकी जूती की नोंक पर है.ऑडिटर उनसे बार-बार बेतुके कागजात मांग रहे हैं.कई बार तो ऐसे कागजातों की मांग भी की जाती है जो विश्वविद्यालय महाविद्यालयों को भेजता ही नहीं है.मजबूरी में कोई १० हजार तो कोई २० हजार या इससे भी ज्यादा देकर अपना कल्याण करवा रहा है.इसलिए मेरी ईच्छा के भीतर एक और ईच्छा है कि मैं अगले जन्म में ऑडिटर तो बनूँ ही साथ ही बिहार विश्वविद्यालय का ऑडिटर बनूँ.
दोस्तों,इस समय पूरी दुनिया के लोग निजी और सरकारी क्षेत्रों में बढ़ते घोटालों से चिंतित है और इससे पार पाने का उपाय खोज रहे हैं.मेरी नजर में उपाय एकदम सरल है.बस ऑडिटरों के स्क्रू को टाईट कर दिया जाए;सारे घपले-घोटाले खुद-ब-खुद रूक जाएँगे.सोंचिए अगर भारत का सीएजी ईमानदार नहीं होता तो क्या कभी घोटालों का राजा ए. राजा दुनिया का दूसरा सबसे भ्रष्ट महापुरुष बनने का गौरव प्राप्त कर पाता?खैर जब मेरे सुझाव पर अगले सौ-दो सौ सालों में अमल होगा तब होगा फिलहाल तो जो स्थिति है उसमें भगवान से यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि हे सर्वशक्तिमान मेरी ईच्छा पूर्ण करो.हे अंतर्यामी;मैं अगले जन्म में सिर्फ और सिर्फ ऑडिटर ही बनना चाहता हूँ.
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ब्रजकिशोर सिंह
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कभी यहाँ भी एक बस्ती बसती थी....!!
कभी यहाँ भी एक बस्ती बसती थी....!!
कल जो बस्ती गिराई गई उस बस्ती में मेरा कोई नहीं था|
औरतें बच्चें बूढ़े और कई लोग जिनके सर पर इस झुलसती धुप के सोले गिर रहे थे उन मेसे मेरा कोई नहीं था।
स्कूल जो कभी कच्चा पक्का था,जो बनते बनते इक मोल बनकर कई बच्चों का जीवन झुलसा गया उनमे से मेरा कोई नहीं था । में तो कोंनवेंट स्कूल मे पढ़ा था |
उन स्कुल में, मैं या मेरे घर से कोई कभी पढने न गया है और न ही जायेगा क्या पता उनका स्टान्ड्रड देख हम लोग लज्जा जायेंगे|
उस ओर जिस ईमारत की नीव खोदते खोदते अपनी कबर खोद खुद दफ़न हो गया उन मजुरो में मेरा कोई नहीं था मैं तो अपने आलिशान बंगले मे ऐ.सी. ओन कर के आराम से सोता हुं |
मेरी कोई दुकान कभी नहीं टूटी , मेरा कोई घर कभी नहीं टुटा मैं तो बस दूर से दुसरो के घर को टूटते देखता रहा और देखता रहता हुं।
ये सब ख्याल मेरे दिमाग मे चल रहे थे तभी कहीं अचानक से मेरा दिल जोर से धड़का जैसे मुझसे बोला तू क्यूँ बेकार का परेशान होता है इन सब मैं कहाँ कोई तेरा था जो इतना मायूस होता है|
jayda padhne ke liye niche di gai link par clik karen mere blog ki link hai
http://planetofwords.blogspot.com/
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दिलीप सिंह
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25.5.11
reenakari: सफ़र पर कुछ और आगे आना हुआ ,
reenakari: सफ़र पर कुछ और आगे आना हुआ ,: "मुदत से दुआ कोई आज काबुल हुई , फिर एक मर्दाफा कोई महफ़िल कायल हुई , आज फिर महफ़िल में उनका आना जो हुआ , नज़रो से नजरो का मिलना हुआ , शमा ज..."
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malik
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अस्पृश्यता ....तेरी छुआछूत बहुत खराब ...मेरी छुआछूत बहुत अच्छी
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Dadda ki Khari Khari
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अजमेर में इंडिया अगेंस्ट करप्शन खुद ही पथ-भ्रष्ट
असल में यह हालत पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई के कारण हुआ। अजमेर इकाई का झंडा लेकर अब तक सक्रिय रही कॉर्डिनेटर प्रमिला सिंह को न केवल हटा दिया गया, अपितु उनको दिया गया पद ही समाप्त कर दिया गया। उनके स्थान कीर्ति पाठक को मुख्य कार्यकर्ता की जिम्मेदारी सौंप दी गई। बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक ओर जहां कीर्ति पाठक ने ब्लॉसम स्कूल में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्य श्रीओम गौतम का उद्बोधन आयोजित किया, वहीं प्रमिला सिंह भी पीछे नहीं रहीं और उन्होंने भी गौतम का कार्यक्रम कश्यप डेयरी में आयोजित करने की प्रेस रिलीज जारी कर दी। बड़ी दिलचस्प बात ये थी दोनों का समय शाम छह बजे बताया गया। जहां तक स्थान का सवाल है, बताने भर को दोनों अलग-अलग हैं, जबकि वे हैं एक ही स्थान पर। कश्यप डेयरी परिसर में ही ब्लॉसम स्कूल चलती है।
खैर, हुआ वही जो होना था। कीर्ती पाठक की ओर से आयोजित कार्यक्रम ब्लॉसम स्कूल में हुआ, प्रमिला सिंह वाला नहीं। इतना ही नहीं प्रमिला सिंह व उनके समर्थकों को कार्यक्रम में घुसने ही नहीं दिया गया। कीर्ति पाठक के पति राजेश पाठक ने पहले से ही पुलिस का बंदोबस्त कर दिया था। प्रमिला सिंह ने वहां खूब पैर पटके, मगर उनकी एक नहीं चली। इस पर उन्होंने झल्ला कर कहा कि वे आईएसी दिल्ली को शिकायत करेंगी। देखने वाल बात ये है कि उनकी शिकायत क्या रंग लाती है?
इस पूरे प्रकरण से यह तो स्पष्ट है कि प्रमिला सिंह को भी श्रीओम गौतम के आने की पुख्ता जानकारी थी। गौतम उनके कार्यक्रम में क्यों नहीं आए, इस पर दो सवाल उठते हैं। या तो प्रमिला सिंह को आखिर तक बेवकूफ बनाया जाता रहा या फिर उन्हें पता था कि गौतम उनके कार्यक्रम में नहीं आएंगे, फिर भी उन्होंने अपनी ओर से कार्यक्रम की घोषणा कर दी। हालांकि गौतम सुबह ही अजमेर आ गए थे, मगर प्रमिला सिंह लाख कोशिश के बाद भी उनसे मिल नहीं पाईं। वैसे ये संभव लगता नहीं है कि प्रमिला सिंह इतनी मासूम हैं कि उन्हें कीर्ति पाठक के कार्यक्रम का पता ही नहीं था।
बहरहाल, अजमेर इकाई में तो गुटबाजी उजागर हो ही गई है, मगर इस बात अभी पता नहीं लग पाया है कि क्या यही हाल ऊपर भी है? रहा सवाल कॉर्डिनेटर जैसे पद को समाप्त करने का तो साफ है कि मुहिम के मैनेजरों को पद का झगड़ा समाप्त करने की अक्ल बाद में आई है। और पहले जो पद देने की व्यवस्था की गई थी, उसी का परिणाम है कि अजमेर में गुटबाजी हो गई। वैसे मुहिम से जुड़े कार्यकर्ताओं में यह कानाफूसी होते हुए जरूर सुनी गई कि प्रमिला सिंह को उनके व्यक्तित्व के मुहिम के अनुकूल नहीं मान कर हटाया गया है।
खैर, पूरे उत्तर भारत में सबसे पहले पूर्ण साक्षर घोषित होने का गौरव हासिल अजमेर में इस मुहिम का क्या हाल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गौतम के लोकपाल बिल विवेचना कार्यक्रम में एक सौ से कुछ अधिक ही लोग पहुंचे, वे भी जुटाए हुए। ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली में मुहिम के मैनेजरों को यह पता ही नहीं कि अजमेर में उन्होंने जिन स्वच्छ छवि के लोगों को कमान सौंपी है, उनकी न तो कोई पहचान है और न ही जनता पर पकड़। तुर्रा ये कि वे आम जनता को जोड़ कर अभियान छेड़े हुए हैं। हालांकि इससे उनकी निष्ठा व ईमानदारी पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता, मगर इतना तो तय ही है कि उनको जनता को जोडऩे का कोई अनुभव ही नहीं है। केवल मीडिया के दम पर टिके हुए हैं। सोचते हैं कि चूंकि आमजन में भ्रष्टाचार के प्रति विरोध का भाव है, इस कारण मात्र मीडिया के जरिए ही वे उस फसल को काट लेंगे। अब ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि लोकपाल बिल के मामले में मीडिया ने पिछले दिनों क्या कमाल कर दिखाया था। अजमेर वाला कार्यक्रम भी उसकी जीती जागती मिसाल है। जितना बड़ा वह कार्यक्रम था नहीं, उससे कहीं अधिक उसे कवरेज दिया गया। और यही वजह है कि कार्यक्रम आयोजित करने वाले जितने बड़े नेता हैं नहीं, उससे कहीं अधिक अपने आप को मानने लगे हैं।
tejwanig@gmail.com
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तेजवानी गिरधर
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अन्यायपूर्ण अधिग्रहण

अन्यायपूर्ण अधिग्रहण
साल भर की मेहनत के बाद हमारे अन्नदाताओं को बाकी दिन गुजारने के लिए ‘ऊँट के मुँह में जीरे भर’ मेहनताना मिलता है। वो भी कभी लाठियाँ खाकर तो कभी गोलियाँ खाकर। कभी किसानों को गन्ने की वाजिब दाम के लिए लड़ना पड़ता है तो कभी अपनी जमीन के लिए। जो जमीन उन्हें-हमें अन्न प्रदान कर रही है उसे विकास के नाम पर उनसे कोड़ियों के दाम में छीना जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भूमि खेती के लिए सर्वाधिक उपजाऊ जमीन मानी जाती है। विकास के नाम पर उसकी उपजाऊ क्षमता को व्यर्थ करना कहाँ कि बुद्धिमत्ता है? आजादी के समय 75 फीसदी उत्पादकों को जी डी पी का लगभग 61 फीसदी दिया जाता था आज 64 फीसदी उत्पादकों को 17 फीसदी मिलता है। आप ही बताइये क्या यह किसानों के प्रति अन्याय नहीं है? जो लोग हमारे लिए अन्न का उत्पादन करते हैं उनके हक की लड़ाई पर राजनेता वोट की राजनीति कर रहे हैं और अपने लाभ की रोटियाँ सेंक रहे हैं। वास्तव में किसानों का हित इनमें से कोई नहीं चाहता। क्या नोट बनाने की मशीनें (व्यापारी वर्ग) रोटियों का उत्पादन कर सकती हैं? भूमि अधिग्रहण कानून जोकि 116 साल पहले (1894) में बनाया गया था वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक नहीं है। परन्तु फिर भी वर्षाें से इस कानून से गरीब किसानों को प्रताड़ित किया जा रहा है। भारत में 80 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो 4 हेक्टेयर से भी कम भूमि के मालिक हैं और मुफलिसी में जीवन यापन कर रहे हैं। 1975 से अब तक 8 बार कृषि आयोग भूमि अधिग्रहण कानून की नवीन संस्तुतियाँ प्रस्तुत कर चुका है जिसमें किसानों के पुनर्वास सम्बन्धी सुझाव दिये गये। दुर्भाग्य से अभी तक इस प्रस्ताव को पारित नहीं किया गया। वर्तमान में भूमि अधिग्रहण कानून-2007 प्रस्तावित है। आशा करते हैं कि इसमें पूंजीपति हित की अपेक्षा किसानहित को प्राथमिकता दी जाये। जब किसी किसान की भूमि अधिग्रहित की जाती है तो मुआवजा कब्जे के तारीख से तय होता है। सरकारी महरबानी यह है कि सरकार कभी किसान को कब्जे की स्पष्ट तारीख से अवगत नहीं कराती और जब मुआवजा देना होता है तो पुरानी तारीखों से कब्जा प्रदर्शित कर किसान को ठगती है। शर्मनाक है कि भांखड़ा नांगल बाँध के लिए अधिग्रहित भूमि के किसान मालिकों को आज तक मुआवजा प्राप्त नहीं हुआ है। भूमि अधिग्रहण मसलों में सरकार मुख्यतः दलाल की भूमिका निभाती है। यह किसानों से औने-पौने भाव जमीन खरीद बड़े मुनाफे से बिल्डरों को बेच देती है। किसानों में रोष इसी बात का है कि जिस जमीन के लिए उन्हें 1100रू प्रति मीटर दिये गये हैं वही जमीन सरकार ने बिल्डरों को 1 लाख 30 हजार रूपयों में बेची है। उसमें भी मुआवजे की राशि किसानों को 10 प्रतिशत कमीशन देने के बाद प्राप्त होती है। शहरीकरण और विकास के नाम पर किसानों को बेघर किया जा रहा है परन्तु क्या कृषि का विकास उन्नति की सीढ़ी नही है? क्या तेल, पेट्रोल के पश्चात् कृषि प्रधान देश अब खाद्यानों का भी आयात करेगा? स्थिति तो कुछ ऐसी ही है।
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Neeraj Tomer
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24.5.11
नेता जी का फेवरेट गेम -भ्रष्टाचार
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Shikha Kaushik
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Labels: politician
plitical dairy of seoni disst. of M.P.
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ASHUTOSH VERMA
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