Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

30.5.11

अखंड भारत अब खंड खंड .

अखंड भारत के और खंड और सरकार की एवं देश की आँखे बंद, मैच, कवितायेँ चालू हैं .

नीचे दिखाया चित्र गूगल के द्वारा दिखाया गया है , इस पर कहीं कोई टिपण्णी नहीं , मैच , व कवितायेँ बदस्तूर चालु हैं.

मेरा बचा हुआ भ्रस्ताचार त्रस्त भारत महान है. और उससे भी महान हैं यहाँ के नेता व ब्लोगिए .

Distortion of Indian Map by 'Google Analytics'

Dear Indians,

Please participate in online signature drive against India Map distortion

Appeal to Patriotic Indians

A patriotic Indian has brought to our notice that Google Analytics has depicted incorrect map of India in its application. As it is evident from the image shown alongside, Google has not shown Jammu & Kashmir, Arunachal Pradesh and Lakshadweep Islands in the domain of India. Jammu & Kashmir, Arunachal Pradesh and Lakshadweep Islands are integral parts of India and by publishing such a map Google has hurt the sentiments of billions of patriotic Indians and has committed serious national crime. It is the duty of all patriotic Indians to protest lawfully against this act of Google, so that it stop this deliberate distortion of India's borders and also it tenders a public apology for hurting the national sentiments of billions of Indians.

Also Google is playing double game with Indians. It shows correct map of India in its Indian website : http://maps.google.co.in But it shows incorrect map of India in its all other websites, for example :http://maps.google.com

Please participate in the Signature Drive against 'Google' to stop the insult of our beloved country 'India' :
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किसको फर्क परता है . पर हम कम से कम इस विषय का प्रचार तो कर सकते हैं.
आपका , अशोक गुप्ता , दिल्ली

अन्ना का जादू बना पिछलग्गू बाबाओं और अस्तित्वविहीन पार्टियों के लिए वरदान

बाबा रामदेव ४ जून से दिल्ली के रामलीला मैदान मे अपना योग शिविर लगाने जा रहे और कह रहे हैं कि ये सिर्फ योग शिविर है जबकि दिल्ली मे लगे पोस्टर मे भ्रष्टाचार अभियान का विज्ञापन छापा गया है। अन्ना हजारे कि तर्ज़ पर यह अभियान शुरू करने का मन बाबा रामदेव ने जब बनाया तो प्रशाशन ने अनुमति नहीं दी। जिसके बाद उन्होंने योग क नाम का सहारा लिया और राजनितिक योग सिखाने क लिए अनुमति ले ली। लेकिन कोई और भी है जो अन्ना कि ही तर्ज़ पर लेकिन किसानो, बेरोजगारों और मुसलमानों के लिए २ जून से भूख हड़ताल पर बैठने जा रहे हैं। ये है वंचित समाज इन्साफ पार्टी कि जंतर मंतर पर ही भूख हड़ताल पर बैठने वाली है। लेकिन कब तक ये तो नहीं पता लेकिन अगर वो इन्साफ मिलने तक बैठते हैं तो शायद उन्हें दुनिया से दिवंगत होना पड़े। क्योकि बेरोजगारी, किसानो कि समस्या और मुसलमानों कि स्थिति जैसी समस्या शायद ही कोई हल कर सके। बहारहाल जो भी हो अन्ना का जादू पिछलग्गू बाबाओं और अस्तित्वविहीन पार्टियों के लिए वरदान जरुर बन गया है। अंतर ये है कि बाबाओं को योग से लेकर राजयोग का सहारा है और अस्तिवाविहीं पार्टियों को मात्र समाचारपत्रों का, जिसको पढ़कर ये पता चला कि कोई और भी है जो अन्ना कि तर्ज़ पर देश का उद्हर करना छह रहे हैं.

एक लेखक आत्महत्या करने जा रहा है ।

एक लेखक आत्महत्या करने जा रहा है ।


लेखक कहता हैः- " ये मेरी अंतिम पोस्ट और अंतिम पत्र है क्योंकि, अब मैं जीना नहीं चाहता, जिस वक़्त आप मेरा ये अंतिम पत्र यह पढ़ रहे होंगे, मैंने आत्मघात कर लिया होगा, अलविदा दोस्तों..!!" 

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/05/blog-post_30.html

29.5.11

शायरी

क्या आप चाहते हैँ कि शायरी आपके मोबाईल पर आए और आपको इसके लिए कोई शुल्क न लगे।ये संभव है।आपको बस अपने मोबाईल से एक एक्टिवेशन रिक्वेस्ट भेजनी होगी।इसके लिए आपको बस एक बार ज्यादा से ज्यादा डेढ रूपये देने होगे।उसके बाद आपको जीवन भर मुफ्त मेँ शायरी आएगी।एक्टिवेट करने के लिए अपने मोबाईल के राईट मैसेज बॉक्स मेँ जाकर टाईप करेँ JOIN LOVEGIVESTEARS और भेज देँ 09219592195 पर।आप जितने अधिक लोगोँ को ये एक्टिवेट करवाओगे,आपको उतनी बेहतर सुविधा मिलेगी।तो मोबाईल उठाइए और तुरन्त ये मैसेज भेज देँ।ध्यान रखेँ कि JOIN और LOVEGIVESTEARS के बीच मेँ स्पेस जरूर हो

बनारस में सियासत की सभा




रविकुमार बाबुल

सियासत भी अजीब राह पकड़ कर चलती है, जब इसकी नब्ज ढ़ीली पड़ती है तो यह सरकार को कसते हुये दिखलायी देती है, और जब इसकी पकड़ मजबूत बन चलती है, तो यही सियासत अवाम की पकड़ से दूर हो चलती है, इसकी बानगी देखनी हो तो लाल और हरा के सहारे लौह पथगामिनी के भरे-पूरे मंत्रालय को ही नहीं बल्कि सरकार को भी अपने इशारे पर चलाने का दंभ भरने वाली ममता बनर्जी को देखना होगा? ममता बनर्जी ने इन्हीं हरे और लाल के सहारे कलकत्ता में लाल का सफाया करके न सिर्फ 36 साल का रिकार्ड को तोड़ा, बल्कि अपनी मौजूदगी से बैसाख में सावन का-सा एहसास भी दिला दिया, चारों तरफ हरा ही हरा पसर गया? रेल भवन से राइटर्स बिल्ंिडग का सफर तय कर लेना यह साबित करता है, कि यह ख्वाब किसी सावन के अंधे ने नहीं देखा था? इधर जीत की खुशी में तमाम तरह की बिकने वाली मिठाइयों के बजाये सोनिया गांधी जयललिता को चाय पर बुला कर मुंह मीठा करना चाहें और उनकी ही सरकार के इशारे पर चलने वाली सी.बी.आई. (जैसा की पूर्व में आरोप लगते रहे हैं) कनीमोझी की उंगली पकड़ कर उसे राजा की राह पर ले जाने की अपनी जिद् में सफलता प्राप्त किये बैठी हो, ऐसे में सरकार चलाने की मजबूरी मान डी.एम.के. का समर्थन ले रही कांग्रेस नये और मजबूत मित्र तलाशेगी ही? लेकिन दुश्मन का दुश्मन जब दोस्त बन चले तो फिर सियासत यहीं से शुरु होती है।
राज्यों का यह चुनाव सियासी दलों को क्या चुनौती दे गया, इसका तो आंकलन राजनीतिज्ञ पंडित ही करेंगे, लेकिन गंगा के तीरे जुटे रहने वाले पंडा यह सोच कर हैरान हो रहे होंगे कि आखिर गंगा की तरह मैली हो चुकी सियासत का बनारस के साथ जो नया रिश्ता पनप रहा है, वह सियासत को सियासत की गंदगी से मोक्ष दिलायेगा या फिर गंगा सफाई अभियान की तरह ही सब कुछ वैैसा ही रह जायेगा, जैसा पहले था?
भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस से लेकर समाज सेवा के आसरे भ्रष्टाचार खत्म करने के लिये अन्न त्यागने वाले अन्ना, सभी ने अपनी-अपनी मंजिलें पाने की जिद् के ऐलान के लिये पाक जमीन बनारस को ही चुना।
मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुये भले ही भ्रष्टाचार के आरोपों को दर-किनार कर अपनी आदमकद प्रतिमाएं लगवा ली हों, लेकिन 2012 में उनका लखनऊ में बैठ समूचे उत्तरप्रदेश को अपने इशारे पर चलाना मुश्किल हो चला, लगने लगा है, भाजपा ने जिस तरह अपना चुनावी एजेन्डा बनारस में गडकरी, राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी आदि तमाम दिग्गज नेताओं के सरमाये में तय किया है, बहिनजी के लिये अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है? दूसरी तरफ कांग्रेस परिवार के लाड़ले कहें या फिर युवराज राहुल ने बनारस को ही चुना, चुनाव की तैयारी के लिये 18 मई को राहुल ने जिस सिलसिले की शुरूआत की उसे 19 मई को मां सोनिया गांधी ने आगे बढ़ाया। इस उम्मीद के साथ की केन्द्रीय सरकार के गठन में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्य उत्तरप्रदेश का नसीब वह बदल कर रख दें, सत्ता बदलने के बहाने। सत्ता का जिक्र चले और सपा को न याद रखा जाये, कैसे मुमकीन है, सपा नेता और विपाशा के अंतरंग मित्र अमर सिंह के कभी बड़े भाई रहे मुलायम सिंह यादव ने भी सत्ता की सीढिय़ां तैयार करने के लिये बनारस को ही अपनी पहली पसंद माना, सियासत के लिये पहली सभा करके। देखना होगा कि भोलेेनाथ की नगरी में किसको सत्ता का प्रसाद मिलता है, इसके लिये तो इंतजार करना होगा? लेकिन संचार-क्रांति के युग में अन्न त्यागने वाले वाले अन्ना ने भ्रष्टाचार को लेकर देशव्यापी मुहिम बनारस से ही शुरु की, टेलीफोन पर रैली को संबोधित करके? त्रि-नेत्रधारी शिव का तांडव, जब हर शख्स की उम्मीद और आसरा बन चला हो, तब अमृतपान के लिये जुटी भीड़ में विष गरल में उतारने वाले को ही सत्ता मिलेगी यह यकीन कर लेना चाहिये?

सावधान आजकल मेल में बग आ रहे हैं ,


सावधान आजकल मेल में बग आ रहे हैं .


आम दिमाग के बूता नहीं चुनौती देना

वनवास के दौरान जब रावण के कोई अतेपते भी नहीं थे, जब कोई पता भी न था कि राम रावण में दीर्घंतर ठनेगी। कोई समुंदर होगा, सुग्रीव, बाली और हुनमान होंगे। यह भी नहीं पता था सीता का हरण होगा या जटायू राम के लिए शहीद होंगे। तब लक्ष्मण ने सूपर्णखा की नाक काटकर किसी सुने त्रिलोकी राजा रावण को


दे डाली थी। लक्ष्मण के पास उस वक्त कोई रावण दिमाग में नहीं था, बल्कि अपनी ईमानदारी की महाताकत और कार्यकुशलता की योजनाबद्ध यशस्वीयता के साथ ही लक्ष्मण को अपने जोश पर भरोसा था। रावण को चुनौती देने वाले लक्ष्मण न तो अतिउत्साहित थे और न ही वे किसी गफलत में ही थे। और ऐसा भी नहीं कि लक्ष्मण को उस समय राम की ओर से ही शह थी। लक्ष्मण ने जो किया वो अपने दम पर किया। यह चुनौती न तो सोचकर दी थी और न ही किसी तरह की योजना को दिमाग में ही रखकर। इस बात यहां पर कहना लाजिमी होगा, भले ही रामायण काल खत्म होने के बाद लक्ष्मण को भगवान मानते हुए सारी बातों को पूर्व निर्धारित कहने लगें। लेकिन लक्ष्मण के इस शौर्य को प्रोत्साहित करना चाहिए।
चुनौती देना और लेना दोनों ही आज के बाजारी महागुणों में शुमार तत्व हैं। लंबे अरसे तक राज्य करने के बाद अंग्रेजों ने पूरे भारत में अपनी ऐसी स्वीकार्यता शुरू हो गई थी, कि छोटी रियासतें तो कुछ बोल ही नहीं सकती थी। बड़ी को कुचल दिया जाता था। बस एक आदमी था मंगल पांडे, जिसने सबसे पहले खारिज किया। कौन अंग्रेज कैसे अंग्रेज, कोई विधाता तो नहीं हैं, कोई परमात्मा तो नहीं हैं न, कोई नियति तो नहीं हैं न। तब कैसी स्वीकार्यता। दे डाली चुनौती और अंग्रेजी हुकुमत का ताबूत बनने लगा।
नक्सली हिंसा करते हैं, विकास के कार्यों को रोकते हैं, लेकिन सलाम के काबिल हैं, कम से कम अन्याय को तो नहीं स्वीकारते। सलाम उन्हें कि वे आतंक के महापर्याय होते हुए भी आदर्शवादी विश्व की परिकल्पना करते हैं। और जो सरकारें या व्यवस्थाएं आदर्शवाद का ढोल पीटती हैं उनमें नेता और अफसरों की ऐश देखते ही बनती है। खारिज करने की क्षमता ही चुनौती देने की क्षमता का विकास करती है।
हो सकता है लंबे अरसे से आदिवासियों की तरह पीपल के पेड़ में ढिमका देव रहते हैं। ट्राइब की सात पुश्तें उस पीपल के आसपास से निकलने या वहां पर गलत काम करने से डरती रहीं, क्योंकि देव हैं। और एक वक्त ऐसा आया कि उस पीपल में देव तो नहीं लेकिन आस्था की ताकत आ गई। नतीजा पीपल के देव अब हिंसक हो गए, वे कोई भला करें न करें, लेकिन अपना हक जरूर ले रहे हैं। जिस-तिस के साथ कुछ उल्टा हुआ पीपल देव के कोप को और बल मिलता गया। एक दिन वन विभाग का अमला आया सडक़ बननी थी। पीपल काटने लगा। आदिवासियों को लगा अब देव प्रकट होकर सबको मार डालेगा, कहां कुछ हुआ। पीपल को काट फेंका राष्ट्रीय राज्यमार्ग बन गया। अरबों का व्यापार बढ़ा, सैकड़ों की जिंदगी बदली। पीपल देव थे वरना सदियों से वहां।
खारिज करिए। चुनौती दीजिए। लोगों को बताइए आप क्या हैं। इसके लिए कई बार आप पर आरोप लगेंगे, आप आतार्ता, बदमिजाज, गैर वाजिब बात करने वाले और कई बार आपके खिलाफ षडयंत्र भी होंगे। लेकिन आप खारिज करते जाइए।
ईश्वर को पाने की पहली सीढ़ी भी खारिज करना ही तो है, आपने खारिज किया कि जो दिख रहा है संसार वह नहीं है। जो समझ आ रहा है, वह सत्य नहीं है। सत्य ईश्वर है, कहीं दिखाई नहीं दे रहा। लेकिन मिल गया। कैसे खारिज करने और संसार के अस्तित्व को चुनौती देने से।
-सखाजी

मेरी बेटी


मेरी  बेटी                                               ''गूगल से साभार ''

फूल सी प्यारी है वो और मखमल सी नरम ,
है चपल तितली के जैसी ;रेशमी उसकी छुअन ,
दौड़ती खरगोश सी,कोयल के जैसी बोलती,
मीठी-मीठी बातों से कानों में अमृत घोलती ,
खिलखिलाती धूप-सम ;मुस्कुराती चांदनी,
बाँटती खुशियों के मोती ,क्रोध में है दामिनी ,
वो क्षमा है ,वो शिवा है,वो है काली-भैरवी , 
वो जया है ;वो है दुर्गा,वो है सारा-वाभ्रवी,
मुझसे ही जन्मी है वो ,मेरा ही तो रूप है ,
सृष्टि की संचालिका ,अनुपम है वो अनूप है .
                                         शिखा कौशिक


अंदाज ए मेरा: आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबान...

अंदाज ए मेरा: आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबान...: "उसकी उमर कोई 21 साल है। वैसे तो 21 साल की उमर कोई बडी उमर नहीं होती लेकिन इस कम उम्र में उसने काफी कुछ झेला है। उसका नाम संध्‍या है। आज..."

अधिग्रहण की पीडं

http://varunshail.blogspot.com/2011/05/blog-post_22.html

28.5.11

omkarchaudhary,मुद्दा देश नहीं, दौलत के दीवाने

omkarchaudhary,मुद्दा देश नहीं, दौलत के दीवाने

दो पत्र ......एक शहीद ने लिखा ......दूसरा chief of army staff ने

http://akelachana.blogspot.com/2011_03_01_archive.html

सियासत

समाजवादी पार्टी में घमासान

चंदौली के सय्यदराजा विधानसभा में सपाई नाराज चल रहे हैं, वजह है यहाँ से बहरी उम्मीदवार को उतरना।
पेश है इंडिया न्यूज़ हिंदी साप्ताहिक पत्रिका के 03 जून 2011 के अंक में छपा रिपोर्ट...

confused राजा की confused प्रजा

http://akelachana.blogspot.com/

वाह क्या प्रेम है..!! wow..!! what a LOVE?


वाह क्या प्रेम है..!!
wow..!! what a LOVE?

(सौजन्य-गूगल)


प्रिय मित्रों,

उत्तर महाभारत महाग्रंथ में कलयुग के भविष्य के बारे में महर्षि वेदव्यास ने कुछ त्रुटिरहित कथन किए हैं ।

शिक्षा जगत में व्याप्त मलिनता के कारण, ज्ञान और विद्या का नाश होगा । ( सही - ग़लत )

( पढ़ने-पढ़ाने वालों की पढ़ाई के क्षेत्र में उदासीनता और सच्चे ज्ञान का ह्रास ?)

आईए, सुनें, एक आधुनिक कॉलेज कन्या की मोबाईल talk..!!

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" अरे यार..!! माय मम्मा भी देखना? सुबह-सुबह कॉलेज जाते वक़्त ही उसकी खिचपिच शुरु हो गई..!! शैला ये ड्रेस मत पहनना, इसमें तेरा सारा बदन दिखता है । आज जल्दी वापस घर आ जाना । यार हमारी कोई चोईस ही नहीं? शैलाब की भी रिंग आई थी ,"हाय हनी, कॉलेज आ रही है ना? आज कहाँ मिलना है? मैं, शैला उसे पोपट से मिलूँ? MY FOOT!! साला कभी पॉकेट में  तो हाथ डालता नहीं है ? LEAVE IT यार..!!"

इस मंथ के मेरे सारे पॉकेट मनी फिनिश हो गए हैं, बट यु नॉ? मैने क्या किया? इस शैला ने  स्मार्टनेस दिखाते हुए, उस पोंगा पंडित कौशिक को ऐसी मीठी स्माईल देदी कि, उसने ५०० का नोट तुरंत निकाल कर मुझे दे दिया । नहीं यार, फ्री में नहीं..!! उसके बदले, मैंने उसके साथ लोंग ड्राइव पर जानेका प्रोमिस किया है ।

तु भी आएगी क्या? वो रितुडी को हमारे साथ आना था मगर, you know !! वो सिर्फ न्यूज़ पेपर नहीं, पूरा न्यूज़ चैनल है? क्या, ऍक्ज़ाम नज़दीक है? तु कब से ऍक्ज़ाम की फ़िक्र करने लगी? ही..ही..ही..!!

मुझे  कोई चिंता नहीं है? you see, मैंने तो वो हॅन्डसम प्रोफेसर हैं ना? हाँ..हाँ, उसी को पटा लिया है..!! मुझे बहुत हॅल्प कर रहा है । नहीं,नहीं..वो मेरा नहीं, शैलाब का  रिलेटिव है । उसका हैबिट थोड़ा ख़राब है, मेरे साथ शॅक हॅन्ड करने के बाद हाथ जल्दी छोड़ता नहीं है..!!नहीं..नही..यार,उसकी? नो मोर हिंमत, शैला को तो तु जानती है ना? मुझे ऐसों को हैन्डल करना अच्छी तरह आता है..!!

सन्डे को क्या करती? या..र..!! मेरा ये सन्डे बिलकुल बेकार गुज़रा । मेरी मम्मा अभी से, you know,जन्म कुंडली और ऐसा ही कुछ समथिंग-समथिंग ले कर, मेरे रिश्ते के लिए रिश्तेदारों से बात करती रहती है? बट, मैंने तो उसको क्लिन-क्लिन कह दिया है, हालाँकि मैं थर्ड ईयर में स्टडी कर रही हूँ,But, I want to study further? 

मेरे पापा? मेरे पापा तो वॅरी-वॅरी nice guy है..!! पता है, एक दिन क्या हुआ था? उन्होंने मुझे हैं ना, शैलाब के साथ बाईक पर चिपक कर बैठे हुए देख लिया था, फिर भी ही डीडन्ट टेल मी अ सिंगल वर्ड..या..र? 

मेरी मम्मा, मेरी शादी को लेकर, फ़ालतू में Worry हो रही है..!! हाँ..मगर पापाने, मम्मा को  टू मच, worry करते देखकर, उसे साफ-साफ कह दिया, शिला  is mature  enough  to take care of her self..!! 

No..no..यार,  कॉलेज के किसी भी पोपट के साथ,मेरेज तो मैं करनेवाली नहीं..!! 

पापा जहाँ कहेंगे, उसी लड़के के साथ..!! you know our संस्कार culture और ऐसा ही कुछ समथिंग-समथिंग, 

O.K. I am in hurry,we will talk  later,bye."

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जान ले लो  मेरी मगर प्यार से(गीत)
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नोट- पूरे गीत में, प्रितम शैलाब गीत गा कर शिला से प्यार जता रहा है और शैला `I DON`T CARE.` कह कर इन्कार कर रही है ।


जान ले लो  मेरी, मगर प्यार से....!!

I DON`T CARE.

ज़ख्म दे  दो नया, मगर प्यार से...!!

I DON`T CARE.

१.

चल पड़ा हूँ मैं, इश्क़ की राह पर ।

दिल रखा है क़दमों में, हर आह पर ।

दो क़दम साथ चल, मगर प्यार से....!!

I DON`T CARE.

२.

ज़ुल्फ़ में तेरी यूं ही उलझता गया ।

अश्क बहते रहे, मैं पिघलता रहा ।

एक नज़र देख ले,मगर प्यार से....!!

I DON`T CARE.

३.

आग सी लग गई, जिस्म जलता रहा ।

साँस  थम  सी   गई, मैं  तड़पता रहा ।

दिल जलाओ मेरा, मगर प्यार से.....!!

I DON`T CARE.

 ४.

कोई  क्यूँ न मरे, बेरूख़ी देख कर ।

कोई कैसे जीए, यार को छोड़ कर ।

क़त्ल कर दो मेरा,मगर प्यार से....!!

I DON`T CARE.

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बस, हम आगे और क्या कहें, साहब..!! अब, आप ही कुछ फरमाईए?

मार्कण्ड दवे । दिनांकः- २९- ०५-२०११.

११०० की राशि और सम्मिलित करना चाहूंगा

मित्रों,यह पोस्ट लिखने से पूर्व मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि ना तो मेरा संघ-परिवार से कोई संबंध है ना उनकी विचारधारा से सहमति अपितु मुझे जानने वाले इस बात की तसदीक करेंगे कि मैने सदैव मुखर होकर उनकी कई बात काविरोद्ध किया और नुकसान भी उठाया है।परंतु स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ को लेकर जो टिप्पणी की और फिर नित्यानद ने जो उनकी प्राकृतिक चिकित्सा की उससे यही सिद्ध होता है कि अग्निवेश को भी वही बीमारी है जिसके लक्षण कभी दिग्विजय सिंह कभी मुलायम सिंह कभि मायावती मे दिखाई देते हैं।यदि आप स्वयं को इतना ही प्रगतिशील मानते है तो एक बार यह भी बताइये कि मक्का का संगे असवद काले पत्थर के सिवा कुछ नहीं
सिर्फ अग्निवेश ही क्यों ?तमाम तथाकथित प्रगतिशीलों को चुनौती है कि हज़रत मुहम्मद का चरित्र-चित्रण तो छोडिए एक रेखाचित्र ही बनाकर दिखाएं।पश्चिम जोकि स्वयं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अलंबरदार मानता है वहां भी हज़रत ईसा के एक कुंआरी के गर्भ से पैदा होने की प्रक्रिया पर बात नही होती।
इस पोस्ट के माध्यम से मैम महंत नित्यानमद को बधाई देते हुए उन्होने जुता मारने वाले को जो ५१००० की राशि घोषित की है उसमें अपनी गाढी कमाई की ११०० की राशि और सम्मिलित करना चाहूंगा।

हाय महा शोक ! मेरे जर्मन दोस्त मार्गदर्शक मधुकर / Swami Madhukar aka Swami Dhyan Hareesh (Berthold Happle-Thompson) का देहांत

हाय महा शोक ! मेरे जर्मन दोस्त मार्गदर्शक मधुकर / Swami Madhukar aka Swami Dhyan Hareesh (Berthold Happle-Thompson) का देहांत

प्रिय मित्रों

मैं इस ब्लॉग के द्वारा आपको मेरे महाशोक में सम्मिलित करना चाहता हूँ .

१९८४ में जब मैंने जर्मनी रहता था , तब वो मेरे अभिन्न मित्र थे .

मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा

३ साल से भारत में वेदान्त का अध्यन कर रहे थे.

२३ मई को ऊटी के पास एक्सीडेंट में उनका देहांत हो गया.

मैं खुद एक गीता का एवं वेदांत का विद्यार्थी होने के नाते , चूँकि आत्मा अमर है , मुझे शोक नहीं होना चाइए था , मगर शोक हो रहा है इसका अर्थ यह हुआ कि जो मैंने पढ़आ है वह केवल किताबी ज्ञान है. उसे मैं जीवन में नहीं उतार पाया.

ईश्वर उनको अपने गोलोक वृन्दावन धाम में जगह दें, हम्मारी यही प्रार्थना है.

नीचे लिखा पत्र मेरे दूसरे जेर्मन मित्र जो आब U S A में रहते हैं , उनका है, और मारा उत्तर भी, जिससे मुझे इस हादसे का पता चला , और दिल की दिल मैं ही रह गई .

शोकाकुल
अशोक गुप्ता
दिल्ली

Dear Ashok-bhai,
I am conveying sad news to you. Our beloved friend Madhu has left us and this earthly plane.
When we feel grief the thin veil that separates us from the spiritual life is removed. The good news is that Madhu is alive and present in our hearts.
Namaste,
Mohan
* * * * * *
Bernard Mohan Fickert
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27.5.11

जन्तर मन्तर अन्ना हजारे

लॉफ्टर चैलेंज फेम और सुविख्यात व्यंग्य व हास्य कवि रासाबिहारी गौड की देश के मौजूदा हालात पर यह रचना गागर में सागर के समान है, व्यंग्य और हास्य के साथ इसमें आम आदमी को तंग करता वह तंज भी है, जिसका उसके पास कोई उपाय ही नहीं है, आप स्वयं ही देख सुन लीजिए  मुझे लगा कि यह आपको भी शेयर करनी चाहिए, सो प्रस्तुत है

थप्पड़ की गूँज-ब्रज की दुनिया


agnivesh

मित्रों,लोकतंत्र में नाराज होना और उसे अभिव्यक्त करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है लेकिन उसका तरीका क्या होना चाहिए;विवादित है.वर्तमान काल में किसी बड़ी शख्शियत से अपना विरोध जताने के लिए लोग उसकी ओर जूते-चप्पल उछालना ज्यादा बेहतर मानते हैं.अगर जूते-चप्पल अवकाश-प्राप्ति की स्थिति में पहुँच गए हों तो यह तरीका और भी कारगर हो जाता है.
मित्रों,कई लोग अपनी नाराजगी दिखाने के लिए शारीरिक क्षति पहुँचाने से भी नहीं चूकते.पहले लक्षित व्यक्ति को और बाद में पुलिस के हाथों पिटकर खुद अपने-आपको को इस प्रक्रिया में भारी शारीरिक कष्ट उठाना पड़ता है.कभी-कभी गलती एक ही पक्ष यानि आक्रामक पक्ष की होती है तो कभी-कभी दोनों पक्षों की.
मित्रों,कुछ दिनों पहले प्रख्यात समाजसेवी,आर्यसमाजी और संन्यासी स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ यात्रा को लेकर अभद्र टिपण्णी की.भारत आदिकाल से ही सहअस्तित्व का समर्थक रहा है.सम्राट अशोक ने सवा दो हजार साल पहले अपने शिलालेखों और स्तम्भलेखों में उत्कीर्ण करवाया था कि किसी भी संप्रदाय को मानने वाला दूसरे संप्रदाय वालों की पूजा-पद्धति की निंदा नहीं करे अन्यथा वह राजदंड का भागी होगा.लगता है प्रसिद्धि के मद में स्वामी अग्निवेश सामान्य शिष्टाचार भी भूल गए है.हम मूर्तिपूजक भी आर्यसमाजियों की तरह भलीभांति जानते हैं कि मूर्ति या तस्वीर भगवान नहीं होता;वह सिर्फ एक प्रतीक होता है,माध्यम होता है.स्वामी जी को अगर मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ करना था तो वे अपनी ईच्छा जाहिर करते और तब अगर वे विजयी होते तो लोग उनका सम्मान करते न कि थप्पड़ मारते.लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अमरनाथ यात्रा पर सार्वजनिक रूप से उटपटांग बयान दे दिया.अगर कोई मूर्तिपूजा करता है तो वह उनका या किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ता,यह कार्य पूरी तरह से व्यक्तिगत और हिंसा या हानि से रहित है इसलिए भी स्वामी अग्निवेश जैसे बुद्धिजीवी को बेवजह इसकी आलोचना करना किसी भी दृष्टिकोण से शोभा नहीं देता.
दोस्तों,मैं स्वामी नित्यानंद ने स्वामी अग्निवेश के साथ जो कुछ भी किया उसका कतई समर्थन नहीं करता हूँ;उन्हें ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.उन्हें बात का जवाब बात से देना चाहिए था और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए था.यहाँ कोई ऐसी स्थिति नहीं थी कि हिंसा का प्रयोग अपरिहार्य हो जाए.भारत मुंडे मुंडे मति भिन्नाः का आदि प्रतिपादक रहा है अतः कम-से-कम आर्यावर्त की इस पवित्र धरती पर साम,दाम और दंड को छोड़कर सीधे भेद पर उतारू हो जाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता.
दोस्तों,संन्यास आश्रम शास्त्रवर्णित चारों आश्रमों में सबसे कठिन और गरिमामय है.प्रत्येक संन्यासी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इन्द्रियों के साथ-साथ मन पर भी नियंत्रण रखते हुए अपने जीवन को मानव-सेवा में लगाएंगे या फिर ईश्वराधना में.लगातार चिंतन-मनन करेंगे और अपने अनुभवों से अवगत कराके पूरी दुनिया को लाभ पहुँचाएंगे.मैं नहीं समझता कि स्वामी अग्निवेश जैसे प्रबुद्ध-विद्वान संन्यासी ने जो कुछ भी किया-कहा वह किसी भी तरह संन्यास की अतिकठिन कसौटी पर खरा उतरता है.मैंने माना कि गरीबों की मदद करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है लेकिन क्या दूसरों की धार्मिक भावनाओं का आदर करना भी एक महत्वपूर्ण नागरिक कर्त्तव्य नहीं है?धार्मिक आस्था और समाजसेवा दो अलग-अलग बातें हैं फिर भला दोनों को एक साथ जोड़कर बात करने की स्वामीजी की क्या मजबूरी थी?
मित्रों,मतभेद मतभेद तक ही सीमित रहे तो ठीक है उसका मनभेद में बदल जाना न तो समाज के लिए अच्छा है और न ही उस राष्ट्र के लिए जिसकी नींव ही प्रेम और सद्भाव पर टिकी हो इसलिए मैं उम्मीद करता हूँ कि इस थप्पड़ की गूँज यहीं थम जाएगी और हमारे सामने फिर से उसकी प्रतिध्वनि सुनने का कुअवसर नहीं आएगा.नाराजगी या विरोध प्रकट करने के बहुत-से स्वस्थ तरीके भी हैं;लोग उनका ही प्रयोग करें तो बेहतर होगा हमारे समाज के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए.

अस्पृश्यता ......तेरी छुआछूत बहुत खराब ....मेरी छुआछूत बहुत अच्छी

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सबसे निचले पायदान पर बैठे लोग ......

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26.5.11

reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी

reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी: "एक कश्ती सी रीनाकारी ,फिरती साहिल की तलाश में , कुछ नज़र में आया है ,शायद कोई किनारा आया है , कुछ देर ठहर यहाँ थकान उतार लू , फिर ना जाने..."

reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी

reenakari: एक कश्ती सी रीनाकारी: "एक कश्ती सी रीनाकारी ,फिरती साहिल की तलाश में , कुछ नज़र में आया है ,शायद कोई किनारा आया है , कुछ देर ठहर यहाँ थकान उतार लू , फिर ना जाने..."

तुम याद बहुत आओगे

कौन, कब, कितना याद आता है इसका आज तक तो कोई बेरोमीटर बना नही है। न ही कोई ऐसा पैमाना है कि जिससे पता चले कि हमने किसी को कितना याद किया। किसी की याद तभी आती है जब वह हमारे पास नहीं होता या हमें यह पता चल जाए कि हम उस अपने से दूर होने वाले हैं।

हम जब किसी अंजान शहर मे जाते हैं। तो भीड़ का हिस्सा बन जाने के बाद भी अलग-थलग से रहते हैं तो इसलिए कि हम जानते हैं कि इस भीड़ में जितने लोग हैं वह सब अंजाने हैं। बस ऐसे ही वक्त में हमें अपनों की याद आती भी है तो कैसे कि उन अपरिचित चेहरों में हम किसी अपने का चेहरा देखने लगते हैं। उस शहर के चौराहों, गलियों में अपने शहर की कोई मिलती-जुलती गली-मकान खोज लेते हैं और इस तरह वह अंजान शहर फिर चाहे वह शिमला हो, गंगानगर, उदयपुर हो या उजैन जाने कब हमारा अपना बन जाता है। पता ही नहीं चलता। अंजाना शहर हम में कितना रच-बस गया है यह भी तब पता चलता है जब अचानक उस शहर को छोड़ने के हालात बन जाएं। सरकारी नौकरी में तबादले का दर्द सहने वाले कर्मचारी वर्ग से कौन यादा समझ सकता है अपने शहर को छोड़ने और किसी भी अंजाने शहर से जुड़ी अपनी यादों का आइना टूटने का दर्द।
शिमला की ही बात करें तो यहां का मौसम, देवदार-चीड़ के दरख्त कहां भुलाए जा सकते हैं। संघर्षों के बीच दाना-पानी के लिए संघर्ष करते बन्दर और बाकी पशु-पक्षी, संकरे रास्तों और उंचाई पर बने मकानों तक के सफर को आसान बनाते कुली(खान), चाहे जितने तनाव में भी पेशेंस नहीं खोने वाले आम लोग, बर्फीले मौसम में भी अपने दायित्व आसानी से पूरे करने वाले होकर, डाककर्मी, यादा की चाहत नहीं और जो है उसमें खुश रहने के आध्यात्म को दर्शाते लोग ये सब बताते हैं कि पहाड़ों की इस चुनौतीपूर्ण जिन्दगी को आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।
पहाड़ों के शिखर पर इठलाते, आसमान छूने की कोशिश करते नजर आने वाले देवदार क्या भुलाए जा सकते हैं। जाने क्यों मुझे ये ऊंचे-ऊंचे दरख्त अहसास कराते हैं कि जीवन में कुछ पाने, ऊंचा उठने के लिए संघर्ष के सफर वाले रास्ते पर चलना है तो पीछे काफी कुछ छोड़ते हुए चलना पडेग़ा। देवदार बताते हैं कि जो उंचा उठते हैं उन्हें कई तरह के त्याग करने पड़ते हैं। देवदार जैसे खड़ा सौ साल का और आड़ा भी इतने ही साल का तो जो ऊंचा उठने की चाहत रखते हैं वे सब भी अपना नाम-काम इतने वर्षों तक तभी बनाए रख सकते हैं जब वे देवदार-चीड़ जैसे वृक्षों की तरह हर हाल में अपना वजूद बनाएं रखने को तत्पर रहना सीख लें।
कोई भी अंजान शहर, अपरिचित लोग आप के तभी हो सकते हैं जब आप इन सब से तालमेल बैठाना सीख लें। आप जिस शहर में जाएं उस के प्रति एहसानमंद ना हो अपने शहर और अपने लोगों का ही गुणगान करते ना थके तो यह उस शहर के प्रति नाइंसाफी ही होगी। ऐसी तो बहू भी अपने ससुराल में कभी किसी का दिल नहीं जीत पाएगी जो रहे तो ससुराल मे लेकिन बात-बात मे मायके का जिक्र करना नहीं भूले। जीवन के किसी भी क्षेत्र में उपलब्धियों वाली मंजिल तक तभी पहुंचा जा सकता है जब उस काम के प्रति शतप्रतिशत समर्पण वाला भाव हो। यानी अंजान शहर, वहां के लोगों को आप अपना तभी बना सकते हैं जब वहां के रंग-ढंग मे ढलना भी सीख लें। ऐसा होने पर ही पता चल सकता है कि कल तक जो शहर, जो लोग अपरिचित से थे वह सब तो अपने से हो गए हैं। यह अपना सा लगने का भाव ही शहर छोड़ते वक्त तुम्हे कैसे भुलाऊं की पीड़ा मे बदल जाता है।

...और ममता का एक रूप यह भी

शंकर जालान

जी हां, पश्चिम बंगाल की अग्नि कन्या यानी ममता बनर्जी ने केवल कला प्रेमी है बल्कि एक सफल चित्रकार भी हैं। रेल मंत्री व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को ज्यादातर लोग जुझारू नेता के तौर पर जानते हैं, लेकिन इन चित्रों को देख कर कोई भी सहज ही सकते में पड़ सकता है और यह मानने से पहले दांतों तले अंगुली दबा सकता है कि ये चित्र ममता बनर्जी के बनाए हुए हैं। लोग यह सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि आखिर इतनी व्यस्तता और भाग-दौड़ भरे राजनीतिक जीवन में ममता बनर्जी कैसे कला के लिए समय निकाल लेती हैं। इतना ही नहीं यानी कला के अलावा बनर्जी साहित्य के लिए भी वक्त बचा लेती हैं।सच मानिए संसद में जब जोरदार बहसों का दौर हो या फिर दक्षिण कोलकाता के कालीघाट स्थित उनका आवास या फिर तपसिया में बने तृणमूल कांग्रेस के मुख्यालय में बैठक हो रही हो या चर्चा। ममता बनर्जी थोड़ा समय निकाल कर पेंटिंग्स कर लेती हैं और कविताएं भी लिख लेती हैं।आप ने ठीक समझा हम यहां उसी ममता बनर्जी की बात कर रहे हैं जो पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में परिवर्तन का प्रतीक बनी हुई है। इन्हीं ममता बनर्जी की बनाई गई १०१ पेंटिंग्स की प्रदर्शनी शेक्सपियर सरणी स्थित गैलरी-८८ में लगाई गई। तीन दिनों तक चलने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन चार अप्रैल को हुआ, लेकिन लोगों की भीड़ को देखते हुए प्रदर्शनी एक दिन और बढ़ा दी गई। हालांकि १०१ चित्रों की प्रदर्शनी में बिक्री के लिए ९८ चित्र ही है और बुधवार शाम तक इनमें से आधे से अधिक चित्र बिक चुके थे। इसके एवज में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए एकत्रित किए जा चुके थे।प्रदर्शनी की खास बात यह है कि पहले ही दिन से यहां कला प्रेमियों का न केवल आगमन शुरू हो गया था, बल्कि १४ पेटिंग्स को खरीदार भी मिल गए थे। दूसरे दिन भी १४ और तीसरे दिन १५ से ज्यादा पेंटिंग्स को कला प्रेमियों ने खरीदा।इस प्रदर्शनी में हर रंग और मिजाज को ध्यान में रख कर बनाए गए चित्रों को रखा गया है। ममता के करीबियों के मुताबिक ममता ने इन चित्रों को व्यस्त दिनचर्या के बीच फुरसत में बनाया है। इन चित्रों में जंगल महल, द रिदम आफ लाइफ, द डाउन, अनसीन ड्रीम, फेडेड ब्यूटी व विंड इन ब्लू शामिल हैं।प्रदर्शनी में इन चित्रों को देखने के दौरान कला के जानकर बातचीत भी कर रहे थे और लगभग हर कोई ममता की पेंटिंग्स की तारीफ कर रहा था। कला के इन मुरीदों में मशहूर कलाकार से लेकर आम लोग मुग्ध होकर दीदी (ममता बनर्जी) के चित्रों की प्रशंसा में व्यस्त दिखे। ममता की पेंटिंग्स में उनके बहुचर्चित नारे मां-माटी-मानुष से लेकर जीवन और समाज के विविध रंग भरे हैं। सूत्रों के मुताबिक बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग पार्टी के सांगठनिक कार्यों में किया जाएगा। इसके साथ ही इन पैसों से गरीब व असहायों की मदद की जाएगी।पेटिंग्स की तारीफ करते हुए कोलकाता के मेयर शोभन चटर्जी कहते हैं - ममता छात्र राजनीति के समय से ही किसानों के आंदोलन से जुड़ी थी। प्रकृति के प्रति प्रेम उनमें बचपन से था। उनकी बनाई पेटिंग्स प्रेरणादायक है। कमोबेश यह बात विधानसभा में विरोधी दल के नेता पार्थ चटर्जी में कहते हैं।पेंटिंग्स खरीदने वालों में हर्ष नेवटिया, जगमोहन डालमिया, हरनाथ चक्रवर्ती, रंजीत मल्लिक, जय मेहता समेत कई जाने माने लोग व उद्योगपित शामिल है। वहीं, देखने वाले संजीव गोयनका, आरएस अग्रवाल, आरएस गोयनका, मेघनाथ राय, संदीप भूतोडि़या, जय गोस्वामी, कावेरी गोस्वामी शामिल थे। इन लोगों ने कहा- आंखों को आकर्षित करते हैं चित्रों के रंग। इनमें तुली (ब्रश) की साहसिकता उभर कर आई है। इन चित्रों में गंभीर शांति के भाव छिपे हैं।मालूम हो कि इस प्रदर्शनी का आयोजन तृणमूल कांग्रेस के मुखपत्र जागों बांग्ला की ओर से किया गया। इसमें दो युवा कला प्रेमी सृंजय बोस और शिवाजी पांजा का विशेष सहयोग रहा है। ममता के चित्रों की पहली प्रदर्शनी २००५ में लगी थी, जिसके मार्फत चार लाख रुपए जुट पाए थे और दूसरी प्रदर्शनी २००७ में लगी थी और १४ लाख रुपए एकत्रित किए गए थे।शंकर जालान

यह जनता की जीत है - ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली और वाममोर्चा के ३४ साल के शासनकाल के ध्वस्त करने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी इस जीत को जनता की जीत मानती है। मा. माटी और मानुष के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का कहना है कि सचमुच में अब बंगाल आजाद हुआ है। अभूतपूर्व जीत और बंगाल की में विकास की बयार पर रेलमंत्री व अग्निकन्या के नाम से चर्चित ममता बनर्जी से शंकर जालान ने उनके कालीघाट स्थित निवास पर बातचीत की। पेश हैं उसके संक्षित और चुनिंदा अंश-
-- इस जीत को आप किस नजर से देखती हैं?०० यह जीत जनता की जीत है या दूसरे शब्दों में कहे तो हिंसा और हत्या की राजनीति को जनता से सिरे से नकार दिया है।
-- इसे आप वाममोर्चा की हार मानती है या तृणमूल कांग्रेस की जीत?०० निसंदेह तृणमूल कांग्रेस की जीत और वाममोर्चा की सिर्फ हार नहीं बल्कि बुरी हार।
-- क्या आपको वाममोर्चा की इस हार की मुख्य वजह क्या लगती है?०० जनता के बदलाव के मूड को।
-- आपको नहीं लगता की सिंगूर और नंदीग्राम ने आपको सत्ता की चाबी पकड़ाने में मदद की होगी?०० वाममोर्चा, विशेष कर माकपा ने सिंगूर और नंदीग्राम ही क्यों, नेताई के साथ न जाने कितने जुल्म आमलोगों पर ढाए है। उसी का खामियाजा चुनाव परिणाम के रूप में उसे मिला है।
--तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार का रोडमैप क्या होगा?००सरकार का रोडमैप हम आम जनता से पूछ कर तय करेंगे।
--वाममोर्चा सरकार की कुछ नीतियों को आगे क्रियान्वित किया जाएगा या फिर सब कुछ नया होगा?००सब कुछ नया होगा, क्योंकि उनकी नीतियां ही ठीक होती तो पश्चिम बंगाल की जनता उन्हें ठुकराती क्यों? नई सरकार का कामकाज तृणमूल-कांग्रेस-एसयूसीआई गठबंधन संयुक्त रूप से तय करेगा।
--कौन होगा अगला रेल मंत्री?०० इस सवाल को जवाब के लिए १८ मई तक इंतजार करना पड़ेगा ।
--सीएम हाउस में नया बसेरा बनेगा या कालीघाट ही नया मुख्यमंत्री आवास होगा?००--उल्टे सवाल दागते हुए क्यों. आपको कालीघाट का आवास ठीक नहीं लग रहा। अभी तो यहीं हूं। बाकी बाद में देखूंगी।

अगले जनम मोहे ऑडिटर ही कीजो-ब्रज की दुनिया

auditor
मित्रों,किसी ने क्या खूब कहा है-’यहाँ किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता;जमीं मिलती है तो आसमां नहीं मिलता.बचपन में शिक्षकों ने हमसे कौन क्या बनना चाहता है;जानने के लिए बहुत-से निबंध लिखवाए.कई बार तो निबंध लिखते समय तक के लिए हमें प्रधानमंत्री तक बना दिया गया और कहा गया कि ‘अगर मैं प्रधानमंत्री होता’ विषय पर निबंध लिखो.परन्तु क्या कुछ बन जाना या हो जाना इतना आसान है?क्या हम जो बनना चाहते हैं वही बन पाते हैं?अगर ऐसा संभव होता तो आज अपने देश भारत में अनगिनत प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति नहीं होते?
दोस्तों,आप जानते हैं कि मैं अभी एक स्वतंत्र (सरल शब्दों में बेरोजगार) पत्रकार हूँ.मैं जो कुछ भी हूँ वह हरगिज नहीं बनना चाहता था.सच्चाई तो यह है कि मैं एक आईइएस अधिकारी बनना चाहता था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.एक-एक करके मेरे चारों अवसर समाप्त हो गए और मैं मुख्य परीक्षा से आगे बढ़ ही नहीं पाया.थक-हारकर मुझे पत्रकारिता से एमए करने का निर्णय लेना पड़ा और भगवान की अकृपा से मैं आज एक पत्रकार हूँ.
मित्रों,भले ही इस जन्म में मेरा सपना आईएएस बनने का रहा हो अगले जन्म में मैं हरगिज आईएएस बनना नहीं चाहूँगा.बल्कि अगले जन्म में मैं अंकेक्षक या ऑडिटर बनना चाहूँगा.गजब पेशा है ऑडिटिंग;हर्रे लगे न फिटकिरी और रंग भी चोखा होए.इस व्यवसाय का भविष्य भी काफी उज्ज्वल है.जैसे-जैसे दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में निजी कम्पनियों की भागेदारी बढती जाएगी ऑडिटरों का महत्त्व लगातार बढ़ता ही जाएगा.क्या फर्जीवाड़ा है कि कम्पनी दिवालियेपन की ओर बढ़ रही होती है और ऑडिटर पैसे लेकर लिख देता है कि कंपनी की तो बीसों ऊँगलियाँ घी में है और सिर कड़ाही में.क्या बिडम्बना है कि जिस संस्था का जन्म आर्थिक गड़बड़ियों को रोकने के लिए हुआ वही स्वयं इसे बढ़ावा दे रही है.हू विल गार्ड द गार्ड्स?ऐसा सिर्फ अपने भारत में नहीं हो रहा है बल्कि पूरी दुनिया में जहाँ भी निजीकरण का जोर है;हो रहा है.भारत में सत्यम घोटाला और अमेरिका में एनरौन घोटाला तो ऑडिटरों की बेईमानी की जिंदा मिसालें बन चुकी हैं.
दोस्तों,मैं पिछले साल एक कंगाल एनजीओ का अवैतनिक अध्यक्ष भी रहा.जब भी कहीं टेंडर प्राप्त करने या भरने का प्रयास करता;पता चलता कि सरकार ने इस काम के लिए इच्छुक एनजीओ के लिए पिछले तीन सालों में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम ३ लाख या कभी-कभी तो इससे भी अधिक का काम करवाने या सरकारी टेंडर प्राप्त करने की पात्रता निर्धारित करके रखी है.बार-बार समस्या खड़ी हो जाती कि टेंडर लेने की पात्रता कैसे प्राप्त की जाए जबकि सच्चाई तो यह थी कि हमारे एनजीओ को तो पिछले ३ वर्षों में दस-बीस हजार का भी सरकारी काम या टेंडर नहीं मिला था.मैंने जब सचिव महोदय से समस्या बताई तो वे बोले कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है;चलिए किसी प्राईवेट ऑडिटर से प्रमाण-पत्र ले लेते हैं.जब हम ऑडिटर के पास गए तो पाया कि श्रीमान ऑडिटर महोदय ने तो एनजीओ और कम्पनियों के लिए खुलेआम घूस की रेटलिस्ट बना रखी है;जैसे १०० रूपये में १ लाख,२०० रूपये में २ लाख रूपये का प्रमाण-पत्र या फिर इतने रूपये में कंपनी या फर्म की बैलेंस-शीट में इतने की हेराफेरी.
मित्रों,आप शायद नहीं जानते होंगे कि हमारा शहर हाजीपुर बिहार विश्वविद्यालय में आता है.इस समय इस विश्वविद्यालय के सभी २३०० पेंशनधारी शिक्षक परेशान हैं.एक तरफ सभी गुरुजनों के बकाए और अवकाश-प्राप्ति लाभ का निपटारा होना है वहीं दूसरी ओर नए वेतनमान के निर्धारण का काम भी चल रहा है.अभी यहाँ जो स्थिति है वह ‘सब शुभकाम ऑडिटर के हाथा’ वाली है.जिन शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के ऑडिटरों की मुट्ठी गरम कर दी है उनकी तो पौ-बारह है लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया है वे परेशान-ही-परेशान हैं.उनमें से एक तिहाई तो घूस देने में बेवजह की हिचक के चलते पटना उच्च न्यायलय भी पहुँच गए हैं लेकिन समस्या यह है कि उन्हें न्यायालय जाने का भी कोई लाभ नहीं हो रहा है और उनकी फाइलें अंत में भूदेव ऑडिटरों के पास जाकर अँटक जा रही है.उच्च न्यायालय इनकी जूती की नोंक पर है.ऑडिटर उनसे बार-बार बेतुके कागजात मांग रहे हैं.कई बार तो ऐसे कागजातों की मांग भी की जाती है जो विश्वविद्यालय महाविद्यालयों को भेजता ही नहीं है.मजबूरी में कोई १० हजार तो कोई २० हजार या इससे भी ज्यादा देकर अपना कल्याण करवा रहा है.इसलिए मेरी ईच्छा के भीतर एक और ईच्छा है कि मैं अगले जन्म में ऑडिटर तो बनूँ ही साथ ही बिहार विश्वविद्यालय का ऑडिटर बनूँ.
दोस्तों,इस समय पूरी दुनिया के लोग निजी और सरकारी क्षेत्रों में बढ़ते घोटालों से चिंतित है और इससे पार पाने का उपाय खोज रहे हैं.मेरी नजर में उपाय एकदम सरल है.बस ऑडिटरों के स्क्रू को टाईट कर दिया जाए;सारे घपले-घोटाले खुद-ब-खुद रूक जाएँगे.सोंचिए अगर भारत का सीएजी ईमानदार नहीं होता तो क्या कभी घोटालों का राजा ए. राजा दुनिया का दूसरा सबसे भ्रष्ट महापुरुष बनने का गौरव प्राप्त कर पाता?खैर जब मेरे सुझाव पर अगले सौ-दो सौ सालों में अमल होगा तब होगा फिलहाल तो जो स्थिति है उसमें भगवान से यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि हे सर्वशक्तिमान मेरी ईच्छा पूर्ण करो.हे अंतर्यामी;मैं अगले जन्म में सिर्फ और सिर्फ ऑडिटर ही बनना चाहता हूँ.

मित्रों,किसी ने क्या खूब कहा है-'यहाँ किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता;जमीं मिलती है तो आसमां नहीं मिलता.बचपन में शिक्षकों ने हमसे कौन क्या बनना चाहता है;जानने के लिए बहुत-से निबंध लिखवाए.कई बार तो निबंध लिखते समय तक के लिए हमें प्रधानमंत्री तक बना दिया गया और कहा गया कि 'अगर मैं प्रधानमंत्री होता' विषय पर निबंध लिखो.परन्तु क्या कुछ बन जाना या हो जाना इतना आसान है?क्या हम जो बनना चाहते हैं वही बन पाते हैं?अगर ऐसा संभव होता तो आज अपने देश भारत में अनगिनत प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति नहीं होते?
              दोस्तों,आप जानते हैं कि मैं अभी एक स्वतंत्र (सरल शब्दों में बेरोजगार) पत्रकार हूँ.मैं जो कुछ भी हूँ वह हरगिज नहीं बनना चाहता था.सच्चाई तो यह है कि मैं एक आईइएस अधिकारी बनना चाहता था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.एक-एक करके मेरे चारों अवसर समाप्त हो गए और मैं मुख्य परीक्षा से आगे बढ़ ही नहीं पाया.थक-हारकर मुझे पत्रकारिता से एमए करने का निर्णय लेना पड़ा और भगवान की अकृपा से मैं आज एक पत्रकार हूँ.
             मित्रों,भले ही इस जन्म में मेरा सपना आईएएस बनने का रहा हो अगले जन्म में मैं हरगिज आईएएस बनना नहीं चाहूँगा.बल्कि अगले जन्म में मैं अंकेक्षक या ऑडिटर बनना चाहूँगा.गजब पेशा है ऑडिटिंग;हर्रे लगे न फिटकिरी और रंग भी चोखा होए.इस व्यवसाय का भविष्य भी काफी उज्ज्वल है.जैसे-जैसे दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में निजी कम्पनियों की भागेदारी बढती जाएगी ऑडिटरों का महत्त्व लगातार बढ़ता ही जाएगा.क्या फर्जीवाड़ा है कि कम्पनी दिवालियेपन की ओर बढ़ रही होती है और ऑडिटर पैसे लेकर लिख देता है कि कंपनी की तो बीसों ऊँगलियाँ घी में है और सिर कड़ाही में.क्या बिडम्बना है कि जिस संस्था का जन्म आर्थिक गड़बड़ियों को रोकने के लिए हुआ वही स्वयं इसे बढ़ावा दे रही है.हू विल गार्ड द गार्ड्स?ऐसा सिर्फ अपने भारत में नहीं हो रहा है बल्कि पूरी दुनिया में जहाँ भी निजीकरण का जोर है;हो रहा है.भारत में सत्यम घोटाला और अमेरिका में एनरौन घोटाला तो ऑडिटरों की बेईमानी की जिंदा मिसालें बन चुकी हैं.
              दोस्तों,मैं पिछले साल एक कंगाल एनजीओ का अवैतनिक अध्यक्ष भी रहा.जब भी कहीं टेंडर प्राप्त करने या भरने का प्रयास करता;पता चलता कि सरकार ने इस काम के लिए इच्छुक एनजीओ के लिए पिछले तीन सालों में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम ३ लाख या कभी-कभी तो इससे भी अधिक का काम करवाने या सरकारी टेंडर प्राप्त करने की पात्रता निर्धारित करके रखी है.बार-बार समस्या खड़ी हो जाती कि टेंडर लेने की पात्रता कैसे प्राप्त की जाए जबकि सच्चाई तो यह थी कि हमारे एनजीओ को तो पिछले ३ वर्षों में दस-बीस हजार का भी सरकारी काम या टेंडर नहीं मिला था.मैंने जब सचिव महोदय से समस्या बताई तो वे बोले कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है;चलिए किसी प्राईवेट ऑडिटर से प्रमाण-पत्र ले लेते हैं.जब हम ऑडिटर के पास गए तो पाया कि श्रीमान ऑडिटर महोदय ने तो एनजीओ और कम्पनियों के लिए खुलेआम घूस की रेटलिस्ट बना रखी है;जैसे १०० रूपये में १ लाख,२०० रूपये में २ लाख रूपये का प्रमाण-पत्र या फिर इतने रूपये में कंपनी या फर्म की बैलेंस-शीट में इतने की हेराफेरी.
               मित्रों,आप शायद नहीं जानते होंगे कि हमारा शहर हाजीपुर बिहार विश्वविद्यालय में आता है.इस समय इस विश्वविद्यालय के सभी २३०० पेंशनधारी शिक्षक परेशान हैं.एक तरफ सभी गुरुजनों के बकाए और अवकाश-प्राप्ति लाभ का निपटारा होना है वहीं दूसरी ओर नए वेतनमान के निर्धारण का काम भी चल रहा है.अभी यहाँ जो स्थिति है वह 'सब शुभकाम ऑडिटर के हाथा' वाली है.जिन शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के ऑडिटरों की मुट्ठी गरम कर दी है उनकी तो पौ-बारह है लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया है वे परेशान-ही-परेशान हैं.उनमें से एक तिहाई तो घूस देने में बेवजह की हिचक के चलते पटना उच्च न्यायलय भी पहुँच गए हैं लेकिन समस्या यह है कि उन्हें न्यायालय जाने का भी कोई लाभ नहीं हो रहा है और उनकी फाइलें अंत में भूदेव ऑडिटरों के पास जाकर अँटक जा रही है.उच्च न्यायालय इनकी जूती की नोंक पर है.ऑडिटर उनसे बार-बार बेतुके कागजात मांग रहे हैं.कई बार तो ऐसे कागजातों की मांग भी की जाती है जो विश्वविद्यालय महाविद्यालयों को भेजता ही नहीं है.मजबूरी में कोई १० हजार तो कोई २० हजार या इससे भी ज्यादा देकर अपना कल्याण करवा रहा है.इसलिए मेरी ईच्छा के भीतर एक और ईच्छा है कि मैं अगले जन्म में ऑडिटर तो बनूँ ही साथ ही बिहार विश्वविद्यालय का ऑडिटर बनूँ.
                   दोस्तों,इस समय पूरी दुनिया के लोग निजी और सरकारी क्षेत्रों में बढ़ते घोटालों से चिंतित है और इससे पार पाने का उपाय खोज रहे हैं.मेरी नजर में उपाय एकदम सरल है.बस ऑडिटरों के स्क्रू को टाईट कर दिया जाए;सारे घपले-घोटाले खुद-ब-खुद रूक जाएँगे.सोंचिए अगर भारत का सीएजी ईमानदार नहीं होता तो क्या कभी घोटालों का राजा ए. राजा दुनिया का दूसरा सबसे भ्रष्ट महापुरुष बनने का गौरव प्राप्त कर पाता?खैर जब मेरे सुझाव पर अगले सौ-दो सौ सालों में अमल होगा तब होगा फिलहाल तो जो स्थिति है उसमें भगवान से यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि हे सर्वशक्तिमान मेरी ईच्छा पूर्ण करो.हे अंतर्यामी;मैं अगले जन्म में सिर्फ और सिर्फ ऑडिटर ही बनना चाहता हूँ.

कभी यहाँ भी एक बस्ती बसती थी....!!

कभी यहाँ भी एक बस्ती बसती थी....!!

कल जो बस्ती गिराई गई उस बस्ती में मेरा कोई नहीं था|
औरतें बच्चें बूढ़े और कई लोग जिनके सर पर इस झुलसती धुप के सोले गिर रहे थे उन मेसे मेरा कोई नहीं था।

स्कूल जो कभी कच्चा पक्का था,जो बनते बनते इक मोल बनकर कई बच्चों का जीवन झुलसा गया उनमे से मेरा कोई नहीं था । में तो कोंनवेंट स्कूल मे पढ़ा था |

उन स्कुल में, मैं या मेरे घर से कोई कभी पढने न गया है और न ही जायेगा क्या पता उनका स्टान्ड्रड देख हम लोग लज्जा जायेंगे|

उस ओर जिस ईमारत की नीव खोदते खोदते अपनी कबर खोद खुद दफ़न हो गया उन मजुरो में मेरा कोई नहीं था मैं तो अपने आलिशान बंगले मे ऐ.सी. ओन कर के आराम से सोता हुं |

मेरी कोई दुकान कभी नहीं टूटी , मेरा कोई घर कभी नहीं टुटा मैं तो बस दूर से दुसरो के घर को टूटते देखता रहा और देखता रहता हुं।

ये सब ख्याल मेरे दिमाग मे चल रहे थे तभी कहीं अचानक से मेरा दिल जोर से धड़का जैसे मुझसे बोला तू क्यूँ बेकार का परेशान होता है इन सब मैं कहाँ कोई तेरा था जो इतना मायूस होता है|
jayda padhne ke liye niche di gai link par clik karen mere blog ki link hai

http://planetofwords.blogspot.com/

25.5.11

reenakari: सफ़र पर कुछ और आगे आना हुआ ,

reenakari: सफ़र पर कुछ और आगे आना हुआ ,: "मुदत से दुआ कोई आज काबुल हुई , फिर एक मर्दाफा कोई महफ़िल कायल हुई , आज फिर महफ़िल में उनका आना जो हुआ , नज़रो से नजरो का मिलना हुआ , शमा ज..."

अस्पृश्यता ....तेरी छुआछूत बहुत खराब ...मेरी छुआछूत बहुत अच्छी

http://akelachana.blogspot.com/2011/05/blog-post_25.html

लालू यादव का सिमुलतला

http://akelachana.blogspot.com/

ग़ज़लगंगा.dg: डूबने वाले को......

ग़ज़लगंगा.dg: डूबने वाले को......

अजमेर में इंडिया अगेंस्ट करप्शन खुद ही पथ-भ्रष्ट

देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का झंडाबरदार बनी इंडिया अगेंस्ट करप्शन मुहिम की अजमेर इकाई इसके दिल्ली में बैठे मैनेजरों की लापरवाही की वजह से पथ-भ्रष्ट हो गई। पथ-भ्रष्ट कहना इसलिए अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं कहा जा सकता क्यों कि उसमें गुटबाजी हो गई और उसका परिणाम ये रहा कि मौजूदा दौर की सर्वाधिक पवित्र मुहिम का कार्यक्रम फ्लॉप शो साबित हो गया।
असल में यह हालत पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई के कारण हुआ। अजमेर इकाई का झंडा लेकर अब तक सक्रिय रही कॉर्डिनेटर प्रमिला सिंह को न केवल हटा दिया गया, अपितु उनको दिया गया पद ही समाप्त कर दिया गया। उनके स्थान कीर्ति पाठक को मुख्य कार्यकर्ता की जिम्मेदारी सौंप दी गई।  बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक ओर जहां कीर्ति पाठक ने ब्लॉसम स्कूल में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्य श्रीओम गौतम का उद्बोधन आयोजित किया, वहीं प्रमिला सिंह भी पीछे नहीं रहीं और उन्होंने भी गौतम का कार्यक्रम कश्यप डेयरी में आयोजित करने की प्रेस रिलीज जारी कर दी। बड़ी दिलचस्प बात ये थी दोनों का समय शाम छह बजे बताया गया। जहां तक स्थान का सवाल है, बताने भर को दोनों अलग-अलग हैं, जबकि वे हैं एक ही स्थान पर। कश्यप डेयरी परिसर में ही ब्लॉसम स्कूल चलती है।
खैर, हुआ वही जो होना था। कीर्ती पाठक की ओर से आयोजित कार्यक्रम ब्लॉसम स्कूल में हुआ, प्रमिला सिंह वाला नहीं। इतना ही नहीं प्रमिला सिंह व उनके समर्थकों को कार्यक्रम में घुसने ही नहीं दिया गया। कीर्ति पाठक के पति राजेश पाठक ने पहले से ही पुलिस का बंदोबस्त कर दिया था। प्रमिला सिंह ने वहां खूब पैर पटके, मगर उनकी एक नहीं चली। इस पर उन्होंने झल्ला कर कहा कि वे आईएसी दिल्ली को शिकायत करेंगी। देखने वाल बात ये है कि उनकी शिकायत क्या रंग लाती है?
इस पूरे प्रकरण से यह तो स्पष्ट है कि प्रमिला सिंह को भी श्रीओम गौतम के आने की पुख्ता जानकारी थी। गौतम उनके कार्यक्रम में क्यों नहीं आए, इस पर दो सवाल उठते हैं। या तो प्रमिला सिंह को आखिर तक बेवकूफ बनाया जाता रहा या फिर उन्हें पता था कि गौतम उनके कार्यक्रम में नहीं आएंगे, फिर भी उन्होंने अपनी ओर से कार्यक्रम की घोषणा कर दी। हालांकि गौतम सुबह ही अजमेर आ गए थे, मगर प्रमिला सिंह लाख कोशिश के बाद भी उनसे मिल नहीं पाईं। वैसे ये संभव लगता नहीं है कि प्रमिला सिंह इतनी मासूम हैं कि उन्हें कीर्ति पाठक के कार्यक्रम का पता ही नहीं था।
बहरहाल, अजमेर इकाई में तो गुटबाजी उजागर हो ही गई है, मगर इस बात अभी पता नहीं लग पाया है कि क्या यही हाल ऊपर भी है? रहा सवाल कॉर्डिनेटर जैसे पद को समाप्त करने का तो साफ है कि मुहिम के मैनेजरों को पद का झगड़ा समाप्त करने की अक्ल बाद में आई है। और पहले जो पद देने की व्यवस्था की गई थी, उसी का परिणाम है कि अजमेर में गुटबाजी हो गई। वैसे मुहिम से जुड़े कार्यकर्ताओं में यह कानाफूसी होते हुए जरूर सुनी गई कि प्रमिला सिंह को उनके व्यक्तित्व के मुहिम के अनुकूल नहीं मान कर हटाया गया है।
खैर, पूरे उत्तर भारत में सबसे पहले पूर्ण साक्षर घोषित होने का गौरव हासिल अजमेर में इस मुहिम का क्या हाल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गौतम के लोकपाल बिल विवेचना कार्यक्रम में एक सौ से कुछ अधिक ही लोग पहुंचे, वे भी जुटाए हुए। ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली में मुहिम के मैनेजरों को यह पता ही नहीं कि अजमेर में उन्होंने जिन स्वच्छ छवि के लोगों को कमान सौंपी है, उनकी न तो कोई पहचान है और न ही जनता पर पकड़। तुर्रा ये कि वे आम जनता को जोड़ कर अभियान छेड़े हुए हैं। हालांकि इससे उनकी निष्ठा व ईमानदारी पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता, मगर इतना तो तय ही है कि उनको जनता को जोडऩे का कोई अनुभव ही नहीं है। केवल मीडिया के दम पर टिके हुए हैं। सोचते हैं कि चूंकि आमजन में भ्रष्टाचार के प्रति विरोध का भाव है, इस कारण मात्र मीडिया के जरिए ही वे उस फसल को काट लेंगे। अब ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि लोकपाल बिल के मामले में मीडिया ने पिछले दिनों क्या कमाल कर दिखाया था। अजमेर वाला कार्यक्रम भी उसकी जीती जागती मिसाल है। जितना बड़ा वह कार्यक्रम था नहीं, उससे कहीं अधिक उसे कवरेज दिया गया। और यही वजह है कि कार्यक्रम आयोजित करने वाले जितने बड़े नेता हैं नहीं, उससे कहीं अधिक अपने आप को मानने लगे हैं।
tejwanig@gmail.com

अन्यायपूर्ण अधिग्रहण


अन्यायपूर्ण अधिग्रहण


साल भर की मेहनत के बाद हमारे अन्नदाताओं को बाकी दिन गुजारने के लिए ‘ऊँट के मुँह में जीरे भर’ मेहनताना मिलता है। वो भी कभी लाठियाँ खाकर तो कभी गोलियाँ खाकर। कभी किसानों को गन्ने की वाजिब दाम के लिए लड़ना पड़ता है तो कभी अपनी जमीन के लिए। जो जमीन उन्हें-हमें अन्न प्रदान कर रही है उसे विकास के नाम पर उनसे कोड़ियों के दाम में छीना जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भूमि खेती के लिए सर्वाधिक उपजाऊ जमीन मानी जाती है। विकास के नाम पर उसकी उपजाऊ क्षमता को व्यर्थ करना कहाँ कि बुद्धिमत्ता है? आजादी के समय 75 फीसदी उत्पादकों को जी डी पी का लगभग 61 फीसदी दिया जाता था आज 64 फीसदी उत्पादकों को 17 फीसदी मिलता है। आप ही बताइये क्या यह किसानों के प्रति अन्याय नहीं है? जो लोग हमारे लिए अन्न का उत्पादन करते हैं उनके हक की लड़ाई पर राजनेता वोट की राजनीति कर रहे हैं और अपने लाभ की रोटियाँ सेंक रहे हैं। वास्तव में किसानों का हित इनमें से कोई नहीं चाहता। क्या नोट बनाने की मशीनें (व्यापारी वर्ग) रोटियों का उत्पादन कर सकती हैं? भूमि अधिग्रहण कानून जोकि 116 साल पहले (1894) में बनाया गया था वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिक नहीं है। परन्तु फिर भी वर्षाें से इस कानून से गरीब किसानों को प्रताड़ित किया जा रहा है। भारत में 80 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो 4 हेक्टेयर से भी कम भूमि के मालिक हैं और मुफलिसी में जीवन यापन कर रहे हैं। 1975 से अब तक 8 बार कृषि आयोग भूमि अधिग्रहण कानून की नवीन संस्तुतियाँ प्रस्तुत कर चुका है जिसमें किसानों के पुनर्वास सम्बन्धी सुझाव दिये गये। दुर्भाग्य से अभी तक इस प्रस्ताव को पारित नहीं किया गया। वर्तमान में भूमि अधिग्रहण कानून-2007 प्रस्तावित है। आशा करते हैं कि इसमें पूंजीपति हित की अपेक्षा किसानहित को प्राथमिकता दी जाये। जब किसी किसान की भूमि अधिग्रहित की जाती है तो मुआवजा कब्जे के तारीख से तय होता है। सरकारी महरबानी यह है कि सरकार कभी किसान को कब्जे की स्पष्ट तारीख से अवगत नहीं कराती और जब मुआवजा देना होता है तो पुरानी तारीखों से कब्जा प्रदर्शित कर किसान को ठगती है। शर्मनाक है कि भांखड़ा नांगल बाँध के लिए अधिग्रहित भूमि के किसान मालिकों को आज तक मुआवजा प्राप्त नहीं हुआ है। भूमि अधिग्रहण मसलों में सरकार मुख्यतः दलाल की भूमिका निभाती है। यह किसानों से औने-पौने भाव जमीन खरीद बड़े मुनाफे से बिल्डरों को बेच देती है। किसानों में रोष इसी बात का है कि जिस जमीन के लिए उन्हें 1100रू प्रति मीटर दिये गये हैं वही जमीन सरकार ने बिल्डरों को 1 लाख 30 हजार रूपयों में बेची है। उसमें भी मुआवजे की राशि किसानों को 10 प्रतिशत कमीशन देने के बाद प्राप्त होती है। शहरीकरण और विकास के नाम पर किसानों को बेघर किया जा रहा है परन्तु क्या कृषि का विकास उन्नति की सीढ़ी नही है? क्या तेल, पेट्रोल के पश्चात् कृषि प्रधान देश अब खाद्यानों का भी आयात करेगा? स्थिति तो कुछ ऐसी ही है।

24.5.11

नेता जी का फेवरेट गेम -भ्रष्टाचार


नेता जी का फेवरेट गेम -भ्रष्टाचार 

खेलों में एक खेल है ;भ्रष्टाचार का खेल ,
न गारंटी जीत की ;दिग्गज होते फेल ,
बंधन वैसे कुछ नहीं ;खेलें मेल-फीमेल,
जो न खेलें ठीक से हो जाती है जेल ,
नेताओं का फेवरेट ;नित बनते कीर्तिमान ,
भारत के नेताओं ने सब कर लिए अपने नाम .
                                               शिखा कौशिक 

plitical dairy of seoni disst. of M.P.

अजय सिंह के चन्द शब्दों से अपनी अपनी पार्टी में आरोपों के घेरे में आये शिवराज और हरवंश क्या बचाव की मुद्रा में आयेंगें?

जले की भाजपायी राजनीति में इस बात को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही हैं कि गौ संवंर्धन बोर्ड के अध्यक्ष मेघराज जैन के राज्य सभा सदस्य बन जाने के बाद क्या उनका स्थान पूर्व विधायक नरेश दिवाकर लेंगेंर्षोर्षो इस हेतु उन्होंने लॉबिंग भी शुरू कर दी हैं। सियासी हल्कों में यह भी चर्चा हैं कि अपने किसी गुप्त राजनैतिक ऐञ्जेंड़े के चलते शिवराज जिले में कोई लालबत्ती देने के मूड में नहीं हैं। अजय सिंह के चन्द शब्दों के कारण आरोपों के घेरे में आये शिवराज और हरवंश दोनों ही बचने के प्रयास में दिख रहें हैं। जहां एक तरफ जिले में रहते हुये भी हरवंश सिंह ने शिवराज की उपस्थिति में हुये मोगली उत्सव में शामिल होने से परहेज किया वहीं दूसरी ओर इसी महोत्सव के दौरान दूसरे कार्यकाल में केवलारी विस क्षेत्र, जो कि हरवंश सिंह का क्षेत्र हैं, में उनके ना आने का रोना जब प्रभात झा के सामने रोया गया तो तत्काल है उन्होंने 21 मई को केवलारी आने की स्वीकृति दे दी। लेकिन अन्तत: आये नहीं।बीते सप्ताह की एक और महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा द्वारा पड़ोसी जिले बालाघाट के कबीना मन्त्री गौरीशंकर बिसेन को विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के निर्वाचन क्षेत्र केवलारी का प्रभारी बनाने की मानी जा रही हैं।अपने अपने फन में माहिर ये दोनों नेताओं में गोदे में कौन किसे चित करेगार्षोर्षो यह तो वक्त ही बतायेगा।

क्या मेघराज जैन की जगह ले पायेंगें नरेशर्षोर्षोे -जिले की भाजपायी राजनीति में इस बात को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही हैं कि गौ संवंर्धन बोर्ड के अध्यक्ष मेघराज जैन के राज्य सभा सदस्य बन जाने के बाद क्या उनका स्थान पूर्व विधायक नरेश दिवाकर लेंगेंर्षोर्षो इस हेतु उन्होंने लॉबिंग भी शुरू कर दी हैं। पता चला हैं कि अपने कुछ समर्थकों के साथ इस हेतु उन्होंने भोपाल जाकर मुख्यमन्त्री और प्रदेश अध्यक्ष सहित अन्य नेताओं से भेण्ट करके भी आ गये हैं। कुछ भाजपा नेताओं का यह भी मानना हैं कि नरेश को किसी निगम का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनाने के बजाय किसी आयोग का सदस्य बना कर लाल बत्ती तो थमा दी जायेगी लेकिन फिर वे संवैधानिक पद पर रहने के कारण भाजपा की सक्रिय राजनीति से बाहर हों जायेंगें और इसके लिये जिले के सभी भाजपा नेताओं में सहमति भी बन सकती हैं। प्रदेश के नेताओं ने कैसा रिसपान्स दियार्षोर्षो ये तो वे ही जाने लेकिन भाजपा में ही एक वर्ग का यह मानना हैं कि नरेश की यह कवायत भी वैसे ही बेकार जायेगी जैसे नीता पटेरिया की मन्त्री बनने की कवायत बेकार गई थी। राजनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना हैं कि नरेश की टिकिट काट कर विधायक बनने वाली पूर्व सांसद नीता पटेरिया अपने सम्पंर्कों का लाभ लेकर किसी भी कीमत पर नरेश को लाल बत्ती नहीं लेने देंगीं। भाजपा ने चुनाव में अपने चार सांसदों को विधानसभा का चुनाव लड़ाया था जिसमें से तीन कबीना मन्त्री बन गयें हैं लेकिन नीता पटेरिया का दावा मुख्यमन्त्री ने ना जाने क्यों सिरे से नकार दिया था। आज वे प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष हैं। भाजपा के ही एक वर्ग का यह भी मानना हैं कि जिन कारणों से नरेश दिवाकर की टिकिट कटी थी वे कारण ही लाल बत्ती ना मिलने के पर्याप्त हैं। हाल ही में सागर की पूर्व विधायक सुधा जैन और छिन्दवाड़ा के सन्तोष जैन को लाल बत्ती देकर निगम मंड़ंलों में नियुक्त किया गया हैं। ऐसे हालात में जातीय समीकरण भी नरेश के पक्ष में नहीं माने जा रहें हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना हें कि भूरिया के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने से घबराये शिवराज आदिवासी विधायक शशि ठाकुर या कमल मर्सकोले में से किसी को मन्त्री बना कर आदिवासी वोटों को थामे रखने की कोशिश भी कर सकतें हैं। सियासी हल्कों में यह भी चर्चा हैं कि अपने किसी गुप्त राजनैतिक ऐञ्जेंड़े के चलते शिवराज जिले में कोई लालबत्ती देने के मूड में नहीं हैं। यह सब तो कयासबाजी हैं लोग अपने अपने तरीके से प्रयास तो कर रहें हैं लेकिन वास्तविकता क्या हैंर्षोर्षो यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा।

आखिर नहीं आये शिवराज हरवंश के क्षेत्र केवलारी में -राजनीति में यह माना जाता हैं कि बड़े नेता के मुंह से निकले चन्द शब्द ही बवाल खड़ा कर देतें हैं। ऐसा ही कुछ सिवनी जिले की इंका और भाजपायी राजनीति में दिखायी दे रहा हैं। यहां यह उल्लेखनीय हैं कि नेता पेति पक्ष अजय सिंह ने भोपाल में आयोजित स्वागत समारोह हजारों कार्यकत्ताZओं के समने यह कह दिया था कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार तो हम सब बना लेंगें यदि हमारे वरिष्ठ नेता ठाकुर हरंश सिंह शिवराज सिंह को सहयोग करना बन्द दें। उनके मुंह से निकले इन चन्द शब्दों ने कांग्रेसी तबेले में तो बवाल मचा ही दिया था लेकिन अब इन चन्द शब्दों की आग की चपेट में शिवराज विरोधियों ने उन्हें भी घेर लिया हैं। अजय सिंह के चन्द शब्दों के कारण आरोपों के घेरे में आये शिवराज और हरवंश दोनों ही बचने के प्रयास में दिख रहें हैं। जहां एक तरफ जिले में रहते हुये भी हरवंश सिंह ने शिवराज की उपस्थिति में हुये मोगली उत्सव में शामिल होने से परहेज किया वहीं दूसरी ओर इसी महोत्सव के दौरान दूसरे कार्यकाल में केवलारी विस क्षेत्र, जो कि हरवंश सिंह का क्षेत्र हैं, में उनके ना आने का रोना जब प्रभात झा के सामने रोया गया तो तत्काल ही उन्होंने 21 मई को केवलारी आने की स्वीकृति दे दी। जिले के संगठन मन्त्री सन्तोष त्यागी और लिा भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन ने क्षेत्र के कार्यकत्ताZनों को उत्साहित करने के लिये केवलारी आने का आग्रह किया था। लेकिन मुख्यमन्त्री का तो शासकीय कार्यक्रम तो आया ही नहीं उसके बजाय वे सभी कार्यक्रम जिन्हें शिवराज सिंह को अपने दौरे में करना था वे सभी प्रभारी मन्त्री जगन्नाथ सिंह और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के द्वारा सम्पन्न करा लिये गये। इससे तो अब ऐसा लग रहा हैं तीन साल बाद मुख्यमन्त्री का पहली बार बना दौरा स्थगित नहीं वरन रद्द ही हो गया हैं और शायद अब चुनाव तक वे इस क्षेत्र की सुध भी नहीं लेंगें।

क्यों प्रभारी बने गौरी भाऊ केवलारीं केर्षोर्षो-बीते सप्ताह की एक और महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा द्वारा पड़ोसी जिले बालाघाट के कबीना मन्त्री गौरीशंकर बिसेन को विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के निर्वाचन क्षेत्र केवलारी का प्रभारी बनाने की मानी जा रही हैं। राजनैतिक विश्लेषक प्रभात झा के इस फैसले के तरह तरह के अर्थ निकाल रहें हैं। कुछ का मानना हैं कि गौरीशंकर खुद कई दिनों से प्रभारी बनने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें सफलता और इसलिये भी मिल गई कि पिछले प्रभारी बने आदिवासी मन्त्री जयसिंह मरावी प्रभार मिलने के बाद से एक बार भी क्षेत्र में नहीं आये थे। गौरी शंकर क्यों प्रयास रहे थेर्षोर्षो इसे लेकर भी कई चर्चायें सियासी हल्कों में चल रहीं हैं। भाजपाइयों ने ही केवलारी में भाजपा की हार के छीण्टे भाऊ के दामन पर भी उछाले थे। वैसे एक बात तो सभी मानते हैं कि हरवंश और गौरीशंकर बिसेन दोनों ही राजनीति के मैदान के हरफन मौला खिलाड़ी हैं। कौन किस पर कब भारी पड़ जायेर्षोर्षो इसे कोई भी दावे से नहीं कह सकता हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में गौरीशंकर अपनी पत्नी रेखा बिसेन को लोस की टिकिट दिलाना चाहते थे। पैनल में पूर्व मन्त्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन का नाम भी था। गौरी भाऊ किसी भी कीमत पर डॉ. बिसेन को नहीं चाहते थे। इसलिये अन्त में उन्होंने के. डी. देशमुख के नाम पर अपनी सहमति देकर उन्हें टिकिट दिला दी थी। अब उनकी पत्नी जिला पंचायत का चुनाव भी हार चुकीं है। सियासी हल्कों में यह चर्चा है कि कांग्रेस इस बार बालाघाट लोस से हरवंश सिंह को भी चुनाव लड़ा सकती हैं। इसे भाम्प कर हरवंश सिंह ने भी बालाघाट में अपनी आमद रफ्त बढ़ा दी हैं। राजनैतिक कार्यक्रमों के अलावा वे शादी विवाह में हाजिर हो रहें हैं। इसीलिये शायद गौरी भाऊ हरवंश सिंह पर दवाब बनाने के लिये प्रभार लेना चाहते थे। वे डम्पर कांड़ और धारा 307 के मुकदमे का खेल भी देख चुके हैं। अपने अपने फन में माहिर ये दोनों नेताओं में गोदे में कौन किसे चित करेगार्षोर्षो यह तो वक्त ही बतायेगा।

पुच्छल तारा-शिवराज की जगह आये प्रभारी मन्त्री के कार्यक्रम में बोथिया में पंड़ाल का उड़ना और हरवंश सिंह का कार्यक्रम में शामिल होने बजाय रेस्ट हाउस में बैठे रहना सियासी हल्कों में चर्चित हैं। राजनीति में हर विधाओं का उपयोग करना आज कल आम बात हो गई हैं। ऐसे में इस घाटना को लेकर तरह तरह की चर्चायें होना स्वभाविक ही हैं। यह तो ईश्वर की कृपा ही हैं कि सिर्फ दो लोग घायल हुये और कोई बड़ी दुघZटना होने से बच गई।





नगर विकास का पैसा लील रही है सफेद हसफेद हाथी साबित हो चुकी भीमगढ़ जलावर्धन योजना

13 करोड़ 76 लाख 10 हजार रुपये बिजली बिल बकाया

विकास के 20 लाख काट रही है प्रदेश सरकारर

सिवनी।महत्वाकांक्षी भीमगढ़ जलावर्धन योजना सफेद हाथी साबित हो चुकी है।नगर विकास के लिये मिलने वाले बीस लाख रुपये सरकार काट कर बिजली बिल में समायोजित करा रही है। 30 अप्रल 2011 तक इस योजना का बिजली का पालिका पर 13 करोड़ 76 लाख 10 हजार रुपये बकाया हैं। पालिका अध्यक्ष, विधायक, सांसद और सरकार सभी भाजपा के हैं लेकिन ना तो वे इस घटिया योजना की जांच ही करा रही हैं और ना ही अनुदान देकर पालिका को राहत पहुंचा रही है।

कांग्रेस शासनकाल में बनी महत्वाकांक्षी भीमगढ़ जलावर्धन योजना शुरूसे घटिया पाइप लाइन उपयोग में लाये जाने के कारण दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देने के लिये विवादों में रही हैं। कई बार मांग उठने के बाद भी ना तो कांग्रेस सरकार और ना ही भाजपा सरकार इसकी जांच कराने का साहस जुटा पायी हैं। इसी कारण यह योजना सफेद हाथी साबित हो चुकी हैं।

इस योजना का बिजली का बिल 30 अप्रेल 2011 तक सरचार्ज मिला कर 13 करोड़ 76 लाख 10 हजार रुपये हो गया हैं। इसमें श्रीवनी का बकाया 6 करोड़ 17 हजार रु. है जबकि सुआखेड़ा का 7 करोड़ 75 लाख 93 हजार रु. बकाया है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हे कि इस योजना की कुल लागत 18 करोड़ 15 लाख रु. है।

करोड़ों के बकाया बिल में पालिका हाई कोर्ट के निर्देश के बाद मात्र 5 लाख रु. प्रतिमाह पटा रही थी। जिली बोर्ड के दवाब के चलते प्रदेश सरकार जून 2010 से नगर विकास के लिये मिलने वाली राशि में से प्रतिमाह 20 लाख रु. काटकर बिजली बिल में समायोजित कर रही हैं। इस तरह मई 2011 तक 2 करोड़ 40 लाख रु. बिजली बिल में समायोजित हो चुकें है जो नगर विेकास में लगते तो मुख्यमन्त्री के चुनाव के समय दिखाये गये कुछ सपने तो पूरे हो सकते थे।

यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि नगर के लिये बनायी गई इस योजना से मार्च 1999 से 16 गांवों को भी पानी दिया जा रहा है। गांवों को पेयजल उपलब्ध कराने का काम पी.एच.ई. विभाग का हैं। लेकिन इस योजना से ग्रामीण क्षेत्रों को जो पानी दिया जा रहा है उसमें बिजली के बिल का 8.40 प्रतिशत हिस्सा पंचायतों द्वारा वहन किया जाना था। योजना का हर महीने 31 लाख 17 हजार रु. बिल आ रहा है।इस तरह 12 साल तीन महीने में पंचायतों को देने वाली बिजली बिल की राशि 38 लाख 48 हजार 7 सौ 54 रु. होती हैं जो कि आज तक वसूल नहीं की गई हैं।

पालिका चुनाव के दौरान रोड़ शो करने आये मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह ने जनता को बहुत सब्ज बाग दिखाये थे लेकिन शिव की नगरी सिवनी को कुछ देने के बजाय जो मिल रहा था उसी में कटोती करके जनता के साथ क्रूर मजाक कर रहें हैं।