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15.1.09

जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मी

काले कानून के खिलाफ जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मियों का हुजूम

मीडियाकर्मी के विरोध प्रदर्शन को शूट करते मीडियाकर्मी
वक्ताओं को तन्मय होकर सुनते मीडियाकर्मी

पत्रकारिता के छात्र राकेश की अगुवाई में अंत तक डटे रहे

भाषण सुनते-सुनते शायद बोर होने लगी हैं !

काले कानून का पुतला फूंकते वक्त नारेबाजी कराते प्रदीप महाजन

...और धूं-धूं कर जल उठा मीडिया विरोधी काला कानून
बच्चू, फंस गया न, अब चल, तू भी थोड़ा बेगार कर ले!

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इससे संबंधित खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें---- जंतर-मंतर पर मीडियाकर्मियों ने दिखाई एकजुटता

13.1.09

उठ जाग मुसाफिर भोर भया, अब रैन कहां कि तू सोवत है....





(उपरोक्त दोनों विजुअल में से कोई एक कापी करके अगर आप अपने ब्लाग पर लगाते हैं तो मीडिया के खिलाफ प्रस्तावित काले कानून से लड़ रहे मीडियाकर्मियों के प्रति अपने सक्रिय समर्थन का इजाहर करेंगे)

कंटेट कोड : तलवार से मक्खी उड़ाने की तैयारी

शाज़ी जमां

अपनी ज़रूरत और सुविधा के मुताबिक फतवा खरीदा जा सकता है! संसद में सवाल पूछने और काम करवाने के लिए सांसद दोनों हाथों नोट बटोर सकते हैं! किसी बेगुनाह को मारने के लिए पुलिस वाले सुपारी ले सकते हैं और उस बेरहम कत्ल को बड़ी सहजता से एनकाउंटर का नाम दे सकते हैं! मेटरनिटी होम के डॉक्टर बच्चों की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं! अनाथालयों में पल रहे मासूमों को खरीदकर गुनाह के रास्ते पर धकेला जा सकता है! इतना ही नहीं एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष कैमरे पर दिन-दहाड़े रिश्वत लेते हुए नज़र भी आ सकते हैं। आपको इन तस्वीरों की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। पिछले कई बरसों में टीवी चैनलों पर ये तस्वीरें आपने अनगिनत बार देखी होंगी। इन ख़बरों ने देश को हिलाया था और सच परदा हटाया था। टीवी पत्रकार होने के नाते हमें इन ख़बरों पर नाज हैं। लेकिन ये ख़बरे हमारे जेहन में अचानक इसलिए बार-बार कौंध रही हैं क्योंकि न्यूज़ चैनलों के ख़िलाफ सत्ता के गलियारे में एक ख़तरनाक खेल चल रहा है।

मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद टीवी चैनलों को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश के तहत बकायदा एक अभियान चलाया रहा है। सरकारी हलकों से कंटेंट कोड की खुसफुसाहट लगातार सुनाई दे रही है। वही कोड जिसका मकसद पत्रकारिता की धार को पूरी तरह कुंद करना है और न्यूज़ चैनलों पर नकेल डालकर उन्हे पालतू बनाना है। कंटेंट कोड एक बेहद ख़तरनाक साजिश है और आंख मूंदकर इसका समर्थन करने से पहले ये समझ लेना चाहिए कि मीडिया और पूरे देश पर इसका असर क्या होगा।

निरंकुश सत्ता हमेशा ख़तरनाक होती है। निरंकुशता चाहे सरकार की हो, न्यायपालिका या फिर मीडिया की, वो अच्छी नहीं है। इतना हम भी समझते हैं कि किसी भी सभ्य समाज में मीडिया के लिए भी कोई ना कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल है-- ये लक्ष्मण रेखा कौन खीचेगा? हम बचपन से पढ़ते आये हैं कि लोकहित में सरकार के हर कदम पर नज़र रखना मीडिया की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की ये एक बुनियादी शर्त है। लेकिन कंटेट कोड के ज़रिये उल्टी गंगा बहाने की तैयारी है। यानी मीडिया सरकार पर नहीं बल्कि सरकार मीडिया पर नज़र रखेगी। जब सरकार ये तय करने लगेगी कि पब्लिक इंट्रेस्ट क्या है, तो फिर तमाम चैनल दूरदर्शन जैसे बन जाएंगे। क्या पब्लिक कभी ये चाहेगी कि इस देश के सारे चैनल दूरदर्शन मार्का हो जायें।

मैं दूरदर्शन जैसे सरकारी प्रसारण तंत्र के ख़िलाफ इसलिए नहीं हूं कि वो नीरस और उबाउ है, बल्कि असल में दूरदर्शन जनता के प्रति बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं है, जैसा कि इसे बताया जाता है। मैं टीवी पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों की सरकारी अधिकारियों से मुलाकात का एक दिलचस्प वाकया पेश करना चाहूंगा। इस मुलाकात में कुछ अधिकारियों ने ये शंका जाहिर की कि अपने काम करने के अंदाज़ से न्यूज़ चैनल दंगा करवा सकते हैं। इस पर मेरे एक पत्रकार मित्र ने जवाब दिया है-- ये क्षमता सिर्फ एक ही चैनल में है और वो है- दूरदर्शन। अपनी इस क्षमता का नमूना दूरदर्शन ने 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के कवरेज़ में पेश कर दी थी, जब भयंकर सिख विरोधी दंगे भड़के थे। ज़ाहिर है, जब सत्ता से जुड़े ऐसी समझ वाले लोग हमारी निगरानी करेंगे तो फिर उनपर नज़र कौन रखेगा। हमें अपनी कमजोरियों का पता है। इसलिए न्यूज़ चैनलों ने सेल्फ रेगुलेशन की व्यवस्था बनाई है।

कंधार विमान अपहरण कांड जैसे ही खत्म हुआ सरकार ने मीडिया को संयम बरतने के लिए धन्यवाद दिया। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उससे हमारे प्रति सरकार का नज़रिया बदल गया। क्या इसकी वजह ये थी कि न्यूज़ चैनल जनता के आक्रोश को सामने लाने का मंच बन गये? मुझे इसमें शक है। सच तो ये है कि पब्लिक के गुस्से की कहानी जब मीडिया के ज़रिये सामने आई और ये साफ हो गया कि पूरा तंत्र अपने नागरिकों की हिफाजत में नाकाम है, तो सरकार बुरी तरह हिल गई। जब हुक्मरान और सियासतदां हिले तो ऐसे-ऐसे बचकाने बयान सामने आये जो पहले कभी नहीं सुने गये। बतौर बानगी.. 'ये लिपिस्टिक लाली लगाकर हमारी बहने प्रदर्शन करती हैं'-- इस तरह के बयान सत्ता और राजनीतिक तंत्र की नाकामी के अभूतपूर्व नमूने थे।

24 घंटे चलने वाले हमारे न्यूज़ चैनलों ने इन बयानों पर नेताओं की बखिया उधेड़कर रख दी। 26 नवंबर के आतंकवादी हमले के बाद सरकार ने चैनलों को सुझाव दिया कि वो इसके असर को दबा दें। क्या ये जनता के सच जानने, देखने और समझने के अधिकार का हनन था? हमने भी ये महसूस किया कि मुंबई वारदात की कवरेज़ से जुड़ी तस्वीरे दिखाने से पहले उन्हे आम आदमी की संवेदनशीलता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। लेकिन क्या ये सरकार तय करेगी कि आम आदमी की संवेदनशीलता कैसी और कितनी होनी चाहिए? क्या हम सुरक्षा में हुई ऐतिहासिक चूक की वो तस्वीर हमेशा के लिए मिटा दें जो एक अरब लोगों के दिलो-दिमाग़ में कैद हो चुकी हैं। या फिर हम ये तय करे कि 26-11 को हम कभी नहीं भूलेंगे और ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने देंगे।

अगर सरकार ने न्यूज़ चैनलों पर कंटेट कोड लागू कर दिया तो आप वो तस्वीरे और ख़बरें नहीं देख पाएंगे जिनका जिक्र मैंने अपने लेख की शुरुआत में किया था। समझा जा सकता है कि कंटेट कोड के क्या नतीजे होंगे और इससे क्या हासिल होगा।

(लेखक शाज़ी जमां स्टार न्यूज के संपादक हैं)

सरकारी बाबू चैनल के लिए फुटेज पास करेंगे और ये तय करेंगे कि क्या दिखाइए, क्या मत दिखाइए !

सभी न्यूज चैनलों का माई बाप सरकार ही है। आपको यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन केंद्र सरकार तो यही चाहती है और इसकी बाकायदा साजिश रच चुकी है। मीडिया पर सेंसर लगाकर सरकार उसे अपना पालतू बनाना चाहती है। अपने इशारे पर नचाना चाहती है। केंद्र सरकार ऐसा कानून बनाने की साजिश रच रही है, जिसमें जनता की आवाज बंद हो जाएगी। नाइंसाफी के खिलाफ जनता आंदोलन करेगी, लेकिन टीवी चैनल उसे दिखा नहीं पाएंगे। सरकारी बाबू चैनल के लिए फुटेज पास करेंगे और ये तय करेंगे कि क्या दिखाइए क्या मत दिखाइए। इमरजेंसी के वक्त भी प्रेस की आजादी पर हमला हुआ था, लेकिन वो सिर्फ कलम पर पहरा था, लेकिन मनमोहन सरकार तो आम जनता की आंखों में पट्टी बांधकर उसे अंधा करने की साजिश रच रही है। इमरजेंसी के नाम पर पत्रकारिता की आत्मा को रौंदने की ये सरकारी कोशिश परवान न चढ़ पाए, इसकी जंग शुरू हो चुकी है। इससे पहले सरकार इस तालीबानी फरमान को कानूनी जामा पहना सके, उसकी कलई खुल गई है। देश के सभी पत्रकार सरकार की इस साजिश के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। टीवी चैनलों के मुखिया भी इस मुद्दे पर मुखर हो गए हैं। पेश है कुछ संपादकों की राय--

मीडिया का गला घोटने की कोशिश : अजीत अंजुम
सरकार का इरादा टीवी चैनलों को रेगुलेट करना नहीं उन्हें अपने काबू में करना है ताकि कभी को ऐसी खबर जिससे सरकार की सेहत पर असर पड़े, चैनलों पर न चल पाए। अगर टीवी न्यूज चैनलों से मुंबई हमलों के दौरान कोई चूक हुई तो उसे सुधारने के लिए और भविष्य में ऐसी चूक न हो इसके लिए एनबीए ने अपनी गाइडलाइन जारी कर दी है। सभी न्यूज चैनलों के संपादकों के साथ बातचीत करने के बाद एनबीए आथारिटी के चेयरमैन जस्टिस जेएस वर्मा ने सेल्फ रेगुलेशन का ये गाइडलाइन लागू कर दिया है। फिर भी सरकार चैनलों सेंसरशिप की तैयारी कर रही है। ये मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है। इसे नहीं मंजूर किया जाना चाहिए और जिस हद तक मुमकिन हो इसका विरोध किया जाना चाहिए, वरना वो दिन दूर नहीं जब कोई सरकारी बाबू और अफसर नेशनल इंट्रेस्ट के नाम पर किसी भी न्यूज चैनल की नकेल कसने में जुट जाएगा। फिर कभी भी गुजरात दंगों के दौरान जैसी रिपोर्टिंग आप सबने टीवी चैनलों पर देखी है, नहीं देख पाएंगे। कभी भी सरकार या सरकारी तंत्र की नाकामी के खिलाफ जनता अगर सड़क पर उतरी और उसकी खबर को तवज्जो दी गयी तो उसे नेशनल इंट्रेस्ट के खिलाफ मानकर चैनल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर दी जाएगी। हर सूबे और हर जिले का अफसर अपने -अपने ढंग से नेशनल इंट्रेस्ट को परिभाषित करेगा और अपने ढंग से इस्तेमाल करके मीडिया का गला घोंटेगा। ( अजीत अंजुम न्यूज़ 24 के सम्पादकीय प्रमुख हैं)


जागो, नहीं तो देर हो जाएगीः मिलिंद खांडेकर
सेंसर का नाम आपने बहुत दिनों से नही सुना , लेकिन इस सरकार के इरादे ठीक नही लगते अभी सिर्फ़ टीवी को रेगुलेट करने के नाम पर कानून बनाने की बात हो रही हैं। कानून का मतलब ये हुआ कि सिर्फ़ मुंबई जैसे हमले ही नही बल्कि गुजरात जैसे दंगो का कवरेज भी वैसे ही होगा जैसे सरकार चाहेगी। न तो हम अमरनाथ का आन्दोलन टीवी पर देख पाएंगे न ही पुलिस के जुल्म की तस्वीरें क्योंकि नेशनल इंटरेस्ट के नाम पर कुछ भी रोका जा सकता हैं । नेशनल इंटरेस्ट वो सरकार तय करेगी जो मुंबई में हमला नही रोक सकी।बात अगर टीवी से शुरू हुई हैं तो प्रिंट और इन्टरनेट तक भी जायेगी। अभी नही जागे तो बहुत देर हो जायेगी। (मिलिंद खांडेकर स्टार न्यूज के डिप्टी मैनिजिंग एडिटर हैं)

प्रेस की आजादी पर हमला-सतीश के सिंह
आजाद भारत के इतिहास में प्रेस की आजादी पर इससे बड़ा अंकुश लगाने की, इससे बड़ी कोशिश कभी नहीं हुई। सरकार न सिर्फ टीवी बल्कि प्रिंट और वेब मीडिया पर भी अपना अंकुश लगाना चाहती है। सरकार की ये कोशिश किसी मीडिया सेंसरशिप से कम नहीं है। प्रेस के लिए बाकायदा कानून हैं। अगर कोई विवाद की स्थिति होती है तो संस्था और पत्रकारों पर मुकदमे चलते ही हैं, लेकिन सरकार अब जो करने की कोशिश कर रही है वो प्रेस की आजादी पर हमला है, फंडामेंटल राइट्स के खिलाफ है। (सतीश के सिंह जी न्यूज के एडिटर हैं)


सरकार इतनी जल्दी में क्यों हैः आशुतोष
इस रेगुलेशन से सरकारी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं..। क्योंकि टीवी चैनल पर कुछ दिनों पहले ही पूर्व चीफ जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक इमरजेंसी गाइड लाइन बनाई गई थी। सारे चैनलों ने इसे लागू करने की बात भी कही थी, लेकिन सरकार ने इस इमरजेंसी गाइडलाइन को ही सिरे से नकार दिया, जबकि सरकार को इस गाइडलाइन के तहत चैनलों को काम करने देना चाहिए, जो उसने नहीं किया। सवाल ये है कि सरकार इतनी जल्दी में क्यों है? वो सेल्फ रेग्यूलेशन के खिलाफ क्यों है? ये एक बड़ा सवाल है। (आशुतोष आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर हैं)

चौथे खंभे को धराशायी करने की साजिशः सुप्रिय प्रसाद
लोकतंत्र के सबसे चौथे खंभे को उखाड़ने की कोशिशें सिर उठा रही हैं। इस खंभे को कमजोर करने की कोशिश कोई दुश्मन नहीं कर रहा है। मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप थोपकर केंद्र सरकार उसे नख दंतविहीन बना देना चाहती है। अपने हक की लड़ाई लड़ रही जनता पर अगर सरकारी दमन हुआ और उसके फुटेज आपके पास हैं तो उसे आप दिखा नहीं पाएंगे। मुंबई पर हुए हमलों की कवरेज का बहाना बनाकर सरकार अपना छिपा एजेंडा लागू करना चाहती है। वो न्यूज चैनलों को अपना गुलाम बनाना चाहती है। अगर सरकार अपनी मंशा में कामयाब हो गई तो कोई दावा नहीं कर पाएगा कि सच दिखाते हैं हम। क्योंकि सच वही होगा, जो सरकार कहेगी। आपके फुटेज धरे के धरे रह जाएंगे। दंगा हो या आतंकवादी हमला। इमरजेंसी की हालत में सरकारी मशीनरी ज्यादातर मूक दर्शक बनी रहती है। सरकार चाहती है कि मीडिया भी उसी तरह मूक दर्शक बनी रहे। हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखती रहे। ये वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नहीं है। मीडिया पर सेंसरशिप लगाने की इस साजिश को नाकाम करने का वक्त है। (सुप्रिय प्रसाद न्यूज 24 चैनल के न्यूज डायरेक्टर हैं।)


पाक मीडिया हमसे ज्यादा आजादः विनोद कापड़ी
सबसे ब़ड़ा सवाल ये है कि सरकार पर नजर रखने के लिए मीडिया बनी है या मीडिया पर नजर रखने के लिए सरकार बनी है। मीडिया का काम ही यही है कि वो सरकार पर नजर रखे, जनता की बात जनता तक पहुंचाए, सरकार को बताए कि वो ये गलत कर रही है। लेकिन यहां तो स्थिति बिल्कुल उलटी हो चुकी है। सरकार मीडिया को बता रही है कि ये गलत है और ये सही है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। आप पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की हालत देखिए। कितनी अराजकता है, लोकतंत्र नाम की चीज नहीं है, लेकिन वहां का मीडिया हमसे ज्यादा आजाद है। हमारी सरकार को क्या ये नहीं दिखाई देता। मीडिया पर सेंसरशिप का सरकारी ख्याल कतई लोकतांत्रिक नहीं है। ये प्रेस की आजादी पर हमला है। (विनोद कापड़ी इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर हैं)

प्रस्तावित काले कानून के खिलाफ प्रधानमंत्री से मिलेंगे संपादक

मीडिया पर सेंसरशिप थोपने के लिए प्रस्तावित काले कानून के खिलाफ मीडिया के दिग्गज एकजुट हो गए हैं। सभी न्यूज चैनलों के हेड और संपादकीय प्रमुख अपना विरोध दर्ज कराने के लिए जल्द ही प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मिलने वाले हैं। पता चला है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के सभी दिग्गज संपादकों के हस्ताक्षरों वाला एक आवेदन प्रधानमंत्री को भेजा जाएगा और उनसे मिलने का वक्त मांगा जाएगा। हस्ताक्षर का अभियान शुरू हो चुका है और लगभग दर्जन भर संपादकों के दस्तखत हो गए हैं। दस्तखत करने वालों में आईबीएन7 के राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, एनडीटीवी की बरखा दत्त, पंकज पचौरी, स्टार न्यूज के शाजी जमां, मिलिंद खांडेकर, न्यूज 24 के अजीत अंजुम, सुप्रिय प्रसाद, इंडिया टीवी के विनोद कापड़ी एवं ईटीवी के एनके सिंह शामिल हैं। एक और हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत सभी न्यूज चैनलों के मीडियाकर्मियों से दस्तखत कराया जा रहा है। हजारों हस्ताक्षरों से युक्त यह विरोध पत्र भी सरकार को सौंपा जाएगा।

मीडिया को अपने अधीन करने की सरकारी कोशिशों को बेपर्दा करने के लिए एक नया ब्लाग भी बना दिया गया है। http://www.returnofcensor.blogspot.com/ नाम के इस ब्लाग के माध्यम से पत्रकारों को एकजुट करने की मुहिम शुरू की जा चुकी है। इस ब्लाग पर कई पत्रकारों ने अपने विचार रखे हैं।

इधर, सरकार द्वारा लाए जाने वाले काले कानून पर मीडिया की रणनीति के बारे में न्यूज 24 के मैनेजिंग एडीटर अजीत अंजुम ने कहा कि हम सभी इस प्रस्तावित कानून का विरोध करते हैं और जरूरत पड़ने पर सड़क पर उतरने से भी नहीं हिचकेंगे। सरकार पहले से ही मीडिया पर शिकंजा कसना चाहती थी और मुंबई हमला का प्रकरण उसे एक बहाने के रूप में मिल गया है। आज वह इलेक्ट्रानिक मीडिया को घेर रही है तो कल सरकार का निशाना प्रिंट मीडिया और ब्लाग की दुनिया भी हो सकती है। लोकतंत्र के चौथे खंभे मीडिया की स्वतंत्रता छीनने की कोशिश खतरनाक है। अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया से चूक हुई है तो उसके लिए एनबीए ने गाइडलाइन जारी कर दिया है। ऐसे में फिर सरकार सेंसरशिप क्यों लाना चाहती है? मुंबई हमले के कवरेज के दौरान जो भी हुआ उसके लिए सरकारी चूक भी जिम्मेवार था। इलेक्ट्रानिक मीडिया को ठीक से ब्रीफ नहीं किया गया। सरकार ने जब अगले दिन लाइव दिखाने को मना किया तो हमने माना भी। जो नया कानून सरकार ला रही है, उसके लागू होने के बाद सरकार जिस घटना को चाहेगी ‘नेशनल इंटरेस्ट में नहीं है’ कहते हुए इसके प्रसारण को रुकवा देगी। इससे देश की आम जनता की आवाज दबी की दबी रह जाएगी।

12.1.09

आइए, विरोध करें ताकि हम मुंह दिखा सकें

  • मीडिया के लिए प्रस्तावित काले कानून का विरोध
  • 15 जनवरी को दिन में 12 बजे जंतर-मंतर पहुंचे
  • काली पट्टियां बांध काला दिवस मनाने का ऐलान

मीडिया की आजादी फिर खतरे में है। केंद्र और राज्य सरकारों ने मीडिया को गुलाम बनाने की कोशिशें अतीत में भी कई बार की लेकिन इन साजिशों को मीडियाकर्मियों और लोकतंत्र में आस्था रखने वालों ने सफल नहीं होने दिया। एक बार फिर ऐसा ही संकट का समय हमारे करीब आ चुका है। काला कानून तैयार है। कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने के मंसूबे बनाए है। यह कानून संसद के जरिए नहीं, चुपचाप बनाया जा रहा है।


इसे मंत्रिमंडल की बैठक में पारित करके लागू करने की तैयारी है। इस अंतिम कदम से ठीक पहले का काम केंद्र सरकार कर चुकी है। कैबिनेट नोट सभी मंत्रालयों में भेजा जा चुका है। अब सिर्फ बैठक होने और मुहर लगने की औपचारिकता मात्र शेष है। हमारे आपके मन में टीवी न्यूज चैनलों को लेकर कई तरह की असहमतियां हो सकती हैं लेकिन इस तरह की असहमतियां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को लेकर भी है। तो फिर इसका यह मतलब नहीं कि हम लोकतंत्र की मूल भावना को ही तिलांजलि दे दें और देश के जितने भी स्तंभ हैं उनकी आजादी छीन लें। उनकी स्वायत्तता भंग कर दें। उन्हें सरकारी बाबूओं-अफसरों के अधीन कर दें।


मीडिया से जुड़े लोगों और लोकतंत्र को चाहने वालों के लिए मुश्किल वक्त है। समय बिलकुल नहीं बचा है। सड़क पर आकर सरकार को यह बताने भर का समय शेष है कि हम अभी मरे नहीं हैं। हम जिंदा हैं। मीडिया को दूरदर्शन न बनने देंगे। मीडिया को सरकार का प्रवक्ता न होने देंगे।
कैबिनेट नोट की प्रतियां फूंकने और काला दिवस मनाने के लिए भड़ास4मीडिया ने पहल की है। विस्फोट डाट काम और तीसरा स्वाधीनता आंदोलन जैसे पोर्टल और संगठन कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार हो चुके हैं। आपसे भी अनुरोध है। आपको भी न्योता है।


15 जनवरी को दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिन में 12 बजे इकट्ठा हों और काली पट्टियां हाथ-पांव-सिर में बांधकर काला दिवस मनाएं। प्रस्तावित काले कानून के मसौदे को फूंकें। सरकार में बैठे लोगों तक विरोध का संदेश भेजें। उन तक गुस्से को पहुंचाएं। देश के हर जिले के मीडियाकर्मियों से अनुरोध है कि वे जिला मुख्यालयों पर काली पट्टियां बांधकर धरना दें, उपवास करें। काले कानून के मसौदे की प्रतियां फूकें। इन आंदोलनों की सचित्र रिपोर्ट हम तक पहुंचाएं ताकि विरोध की आवाज की अनुगूंज दुनियाभर में सुनाई पड़ने लगे।


इस मसले पर आपको अगर कुछ कहना, कुछ जानना है तो आप bhadas4media@gmail.com पर मेल करें।

साभारः भड़ास4मीडिया

मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के लिए 'काला कानून' !

सरकार मीडिया को अपने इशारे पर नचाने की तैयारी कर चुकी है। शुरुआत टीवी न्यूज चैनलों से की जा रही है। केंद्र सरकार इस महीने एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जिसके अमल में आते ही किसी भी तरह के उपद्रव, बवाल, दंगा, अपहरण, बंधक, जन विक्षोभ, आंदोलन को कवर करने से टीवी न्यूज चैनलों को रोक दिया जाएगा। अगर चैनलों ने इन घटनाओं को शूट कर भी लिया तो उन्हें दिखाने की इजाजत न होगी। वे वही दिखा पाएंगे जो पुलिस अफसर या ब्यूरोक्रेट तय करेंगे। वे वही सच दुनिया के सामने ला सकेंगे जो सरकार बताएगी। मीडिया पर सेंसरशिप लागू करने से संबंधित प्रस्ताव केंद्र सरकार तैयार कर चुकी है और इसे सभी केंद्रीय मंत्रियों के बीच वितरित करा चुकी है। इस कैबिनेट नोट पर मंत्रिमंडल की अगली किसी भी बैठक में मुहर लगते ही इसे कानून का रूप दे दिया जाएगा।


मुंबई पर आतंकी हमलों को लेकर टीवी न्यूज चैनलों ने केंद्र सरकार, नेताओं, खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की विफलता को जिस आक्रामक ढंग से देश के सामने पेश किया, उससे चिढ़ी सरकार अब मीडिया का 'संपूर्ण इलाज' करने की ओर कदम बढ़ा चुकी है। सूत्रों का कहना है कि टीवी न्यूज चैनलों पर बनाए जा रहे कानून के अमल में आने के बाद अगला निशाना प्रिंट और वेब मीडिया के माध्यम होंगे। मुंबई आतंकी हमलों को कवर करने के तरीके को लेकर टीवी न्यूज चैनलों के खिलाफ लोगों में गुस्से को देख सरकार इस गुस्से को अपने हित में भुनाने की साजिश रच चुकी है। इस साजिश का पता इसी बात से चलता है कि जिस कैबिनेट नोट को मंत्रियों में वितरित किया गया है उसमें साफ-साफ कहा गया है कि नेशनल क्राइसिस और इमरजेंसी सिचुएवशन (incidents of terror, communal riots, hijacking, hostage situations and incidents that are perceived to be a threat to national security) में टीवी न्यूज चैनल को सरकारी फुटेज मुहैया कराएगी और वे सिर्फ वही फुटेज दिखाने को बाध्य होंगे। मीडिया के जानकारों का कहना है कि इमरजेंसी सिचुएशन का मतलब सरकार अपने हिसाब से गढ़ेगी और ऐसे हर जनांदोलन को कवर करने से रोक देगी जिससे सरकार की छवि पर असर पड़ता हो।

अपने उपर शिकंजा कसते देख मीडिया के एक बड़े हिस्से में सुगबुगाहट तेज हो गई है। भड़ास4मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार देश के सभी छोटे-बड़े टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों ने पिछले दिनों एक आपात बैठक कर सरकार के इस कदम की निंदा की है और मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप थोपने के काले कानून को वापस लेने की मांग केंद्र सरकार से की है। टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों का कहना है कि सरकार पब्लिक के गुस्से को किसी भी तरह मीडिया में मुद्दा न बनने देने की ठान चुकी है जो लोकतंत्र में आजाद मीडिया की मूल भावना पर कुठाराघात है। सरकार अमरनाथ प्रकरण और गुर्जर आंदोलन जैसे मामलों को भी इमरजेंसी सिचुवेशन बता रही है। इसी से साफ पता चलता है कि कल अगर दिल्ली में जनता ब्लू लाइन बसों की अराजकता के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं तो सरकार इसे इमरजेंसी सिचुवेशन कहकर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने से मना कर सकती है। मीडिया के लिए ऐसा काला कानून बनाना किसी भी लोकतांत्रिक देश में मीडिया का गला घोंटने जैसा है। ऐसे में अगर देश के सभी मीडियाकर्मी उठ खड़े नहीं हुए तो फिर मीडिया एक तरह से सरकार के इशारे पर संचालित होने वाला उपक्रम बनकर रह जाएगा।

इन संपादकों का यह भी कहना है कि टीवी न्यूज चैनलों ने अपनी कमियों से खुद सबक लेते हुए अपने को ठीक करने के लिए एनबीए के तहत गाइडलाइऩ बना दी है और कई अन्य कदम उठाए हैं। पर सरकार जिस जल्दबाजी में नया कानून ला रही है, वह बताता है कि नेताओं की मंशा ठीक नहीं है। कहीं न कहीं टीवी न्यूज चैनलों को अपना गुलाम बनाने की तैयारी है। जिस तरह राजनीति में हजार तरह की गड़बड़ियों के बावजूद देश में मिलिट्री राज नहीं लागू किया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के कई गलत फैसलों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट को सरकार के अधीन नहीं किया जा सकता है उसी तरह मीडिया को भी उसकी कुछ गल्तियों के लिए हमेशा के लिए सरकार का गुलाम नहीं बनाया जा सकता है।
इलेक्ट्रानिक मीडिया को पंगु बनाने के लिए केंद्र सरकार जो कानून ला रही है, उसका कई स्तरों पर विरोध भी शुरू हो चुका है। ज्यादा जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें और मामले की गंभीरता को समझें-

I&B guidelines on media coverage soon
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Mind the minders

साभारः भड़ास4मीडिया