सूचना का अधिकार अपने अधिकार को लेकर एक बार फिर चर्चा में है। इस मुद्दे पर मुख्य सूचना आयुक्त और सुप्रीम न्यायाधीश आमने-सामने हैं। यानी की शीर्ष सत्ता इस एक कानून को लेकर भिड़ी हुई है। मामला बेहद पेचीदा है। सूचना आयुक्त का मानना है कि पद पर रहते हुए किसी भी व्यक्ति के पास मौजूद दस्तावेज निजी नहीं हो सकते वहीं सुप्रीम न्यायाधीश जजों की संपत्ति के मामले में उनके पास उपलब्ध सहायकों के दस्तावेज बेहद गोपन बता उसे सूचना अधिकार के दायरे में लाने से ही इंकार कर रहे हैं। सूचना का अधिकार लोकतंत्र में जनता को सर्वोपरि मानते हुए उसे प्रदत्त यह अधिकार उसकी महत्ता और इस व्यवस्था में उसके शीर्ष पर होने को रेखांकित करता है। यानी जो कुछ भी है वह जनता के लिए हैं। उसे जानने का अधिकार है कि लोकतंत्र के स्तंभ उसके लिए क्या सोच रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा ही इस बात में है कि उसके तीनों स्तंत्र समान हैं, एक दूसरे के पूरक हैं। इन स्तंभों के छोटे या बड़े होने की दशा में वह लोकतंक्ष नाम की इमारत का नक्शा ही बिगाड़ते हैं। सूचना का अधिकार अभी अपने शैशव काल में है। इन तीनों स्तंभों से यह उम्मीद की जाती है कि वह इसके जीवित रहने के लिए जरूरी खाद पानी मुहैया कराएं। लेकिन जिनके हाथों में इसकी जिम्मेदारी है वही आक्सीजन ट्यूब को काटने का काम कर रहे हैं। न्याया सरीखे सम्मानीय किसी भी पद पर रहने वाले किसी भी शख्स के लिए कामकाज में शुचिता और पारदर्शिता का होना बेहद जरुरी है। सूचना का अधिकार इसी पारदर्शिता को बनाए रखने का प्रयोजन मात्र है। अब अगर सम्मानीय न्यायाधीश महोदय इस पद पर रहते हुए किसी सूचना को व्यक्तिगत कह रहे हैं तो इस पर विचार होना ही चाहिए। यह तो ठीक वैसा ही जैसे पड़ोसी के घर भगत सिंह पैदा होने की कामना करना। महा न्यायपालिका की इच्छा तो यही है कि देश में कानून का राज कायम रहे। किताबों में दर्ज कानून की सत्ता सचमुच साकार हो, लेकिन सूचना अधिनियम के आडे आकर तो कमोबेश वह अपनी इस मंशा के विपरीत ही जाती दिखती है। अगर जजों की निजता के गोपन में सब कुछ सही है तो उसके उजागर होने में हर्ज ही क्या है। वैसे भी राजा और दंडाधिकारी के लिए जितना जरूरी ईमानदार होना है उससे ज्यादा जरूरी है ऐसा दिखना। वैसे यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट ने किसी भी सूचना की प्राप्ति के लिए 500 रुपये की फीस तय की थी। यह कदम सूचना अधिनियम के खिलाफ था। इस अधिनियम के मुताबिक यह फीस महज 10 रुपये होनी चाहिए थी। इस मामले को मैने खुद सूचना आयुक्त लखनऊ के यहां उठाया था। बाद में मुकेश केजरीवाल ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी। सूचना आयुक्त ने फैसला हमारे पक्ष में सुनाया था। अब फिर यह दोनों शीर्ष संस्थाओं आमने-सामने हैं।
20.1.09
25.7.08
सोमनाथ के बहाने
सोमनाथ चटर्जी के साथ जो हुआ उसने एक नई बहस को जन्म दिया है। मजे की बात यह है कि यह बहस उस पार्टी के अंदर नहीं चल रही है जिससे सोम संबंध रखते हैं (थे), बल्कि पार्टी के बाहर सोमनाथ दा के तमाम हितैषी एकाएक खड़े हो गए हैं। इनमें से अधिकांश अखबार वाले हैं और ये वही लोग हैं जो सुप्रीम कोर्ट से सोम दा के टकराव पर उनकी चुटकी लेते दिखाई देने लगे थे। सवाल उठता है कि उन लोगों को अचानक उनमें मासूमियत क्यों दिखाई देने लगी है। एकाएक सोमनाथ चटर्जी या स्पीकर उनके लिए सोम दा कैसे हो गए। किसी भी पार्टी द्वारा उसके सदस्य पर की गई कार्रवाई पार्टी का आंतरिक मामला होता है। सोमनाथ के मामले में अखबार और चैनल क्यों अधिक स्यापा करते नजर आ रहे हैं। कहीं यह एक पार्टी और उसके वैचारिक सिद्धांत को बदनाम करने की सोची समझी चाल तो नहीं। मीडिया का ऐसा ही कुछ रुप नेपाल में राजतंत्र की समाप्ति और कम्युनिस्टों की बढ़ती ताकत पर दिखाई दिया। तब लगा जैसे नेपाल में राजतंत्र का खत्म होना घोर पाप कर्म है और उसको करने वाले प्रचंड और उनके साथी पापी। मजे की बात यह देखो कि जब नेपाल में राजतंत्र के विरोध की बात होती है तो उसका श्रेय नेपाली कांग्रेस को दिया जाता है और जब राजा के अधिकार को खत्म करने की बात होती है तो उसका दोष प्रचंड पर मढ़ा जाता है। यानी कि मीठा-मीठा गप्प और कड़वा थू। खैर शायद में भटक रहा हूं मगर मुझे लगता है कि इन दोनों ही मामलों में मीडिया का कर्म तटस्थता या कहें दोनो पक्षों को समानता देने का नहीं रहा है। क्रांतिकारी सोमनाथ ने अपने कामकाज से आम आदमी के दिल में जो जगह बनाई है उसे सभी जानते हैं। सुप्रीम कोर्ट से टकराव के मामले में तो वह हीरो की तरह ही उभरे। जनता में उपजी इस सहानुभूति को माकपा को बदनाम करने के हथियार के रूप में तो नहीं किया जा रहा है। क्या यह अखबार और चैनल में बैठे माकपा विरोध की बुर्जुआ मानसिकता नहीं है। अगर नहीं तो फिर एक घटना को याद कीजिए। भाजपा ने अपने वरिष्ट साथी मदन लाल खुराना को पार्टी से निष्कासित किया। खुराना पार्टी के प्रति निष्टावान रहे। सोम दा की तरह वह भी काफी पुराने कार्यकर्ता थे। तक किसी अखबार या चैनल ने इस तरह की लाइन क्यों नहीं लिखी कि 40 सालों का साथ भूला दिया। सोमनाथ पर कार्रवाई उनका जन्मदिन देखकर तो पार्टी ने नहीं की होगी फिर क्यों उनके समाचार में जन्मदिन की संवेदनाओं को उभारने की कोशिश की गई। लगभग सभी अखबार और चैनल ने यह किया तो क्या सोम दा के सहारे माकपा को खलनायक बनाने का खेल खेला जा रहा है। सोमनाथ से इस्तीफे के लिए माकपा के अंदर का मामला है। वह सदन के लिए स्पीकर हो सकते हैं लेकिन पार्टी के लिए तो वह कार्यकर्ता ही हैं। इसे सोमनाथ के पद से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है। पार्टी अपने कार्यकर्ता को निर्देश दे सकती है। यह कार्यकर्ता पर है वह माने न माने। फिर पार्टी को तय करना होता है कि कार्यकर्ता के खिलाफ क्या किया जाए। और अंत में यह कि विरोध करने वालों को पहले माकपा के सांगठनिक ढांचे की समझ होना चाहिए। यह कोई लालू या मुलायम का दल नहीं है जहां व्यक्ति की श्रेष्ठता का सवाल हो। पार्टी की सैद्धांतिक सोच पर व्यक्ति की सोच हावी नहीं हो सकती है। माकपा इससे पहले भी पार्टी के वरिष्ठ लोगों के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई और उन्हें पार्टी लाईन पर चलने के निर्देश देती रही है। ज्योति बसु को इसी पार्टी नेतृत्व ने प्रधानमंत्री न बनने को कहा था तब ज्योति बसु ने न चाहते हुए भी निर्देश माना था।
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11.7.08
अब ब्राह्मणों की बारी
इस बार आरक्षण की मुहिम दक्षिण भारत से उठी है। लक्ष्य है इस मुद्दे पर देश भर के ब्राह्मणों को एकजुट करना। इसकी कमान संभाली है दक्षिण भारत के छोटे से गांव के अय्यर परिवार ने। पिता-पुत्र दोनों ही इन दिनों ब्राह्मणों की राय लेने के लिए उत्तरप्रदेश के दौरे पर हैं। वह अब तक कई जिलों में घूमकर आधा सैकड़ा से अधिक बैठकों में रायशुमारी कर चुके हैं। इसके साथ ही देश भर में कितने तरह के ब्राह्मण हैं इसका भी लेखाजोखा तैयार किया जा रहा है।कर्नाटक के बैंगलोर में रहने वाले एम एस शंकर अय्यर और उनके पिता एमएस मनी अय्यर इन दिनों उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। यह अय्यर पिता-पुत्र कभी केरल के पालघाट का निवासी था। यह वही गांव है जहां से एक तेज तर्रार मुख्य चुनाव आयुक्त थे। अय्यर अयंगर ब्राह्मण होते हैं। इनकी केरल में मजबूत लॉबी है। कर्नाटक में बस चुके यह लोग कर्नाटक ब्राह्मण सभा से जुड़े हैं। पुत्र एक प्रतिष्ठित कंप्यूटर साफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत है।अय्यर पिता-पुत्र अब तक प्रदेश के 35 से अधिक जिलों का दौरा कर ब्राह्मणों में आरक्षण की आग सुलगा चुके हैं। पहली बार मिलने पर अय्यर किसी को यही बताते हैं कि वह देश भर में कितने तरह के ब्राह्मण हैं यह जानने को निकले हैं। बातों का सिलसिला आगे बढ़ता है तो फिर आरक्षण की बात खुलकर कहते हैं। यह भी कहते हैं कि देश भर में ब्राह्मणों की दशा का अध्ययन करने के बाद इंटरनेट पर ब्लॉग जैसा कुछ करना है। हालांकि अभी इसकी रुपरेखा तय नहीं है। किसी भी शहर में यह दो या फिर तीन दिन रुकते हैं। लोगों से व्यक्तिगत बातें करते हैं और बातों का यह सिलसिला अपनों में फैलाने का संदेश भी देते हैं। बात मतलब की होती है सो तेजी से शहर के ब्राह्मण आगंतुकों से मिलते हैं। फिर अगले दिन बैठक बुला ली जाती है। इन बैठकों में बकायदा मोरचा बनाने और शहर में कमेटी गठित करने की बात होती है। बातों का लब्बोलुबाब आरक्षण ही होता है। बकौल शंकर अय्यर अब तक वह प्रदेश के 35 जिलों का दौरा कर चुके हैं। वह अपनी बात पहले छोटे शहरों के लोगों में फैले सजातीयों तक पहुंचा रहे हैं। इसके साथ ही दिसंबर की 15, 16, 17 को बंगलौर में होने वाले कर्नाटक ब्राह्मण सभा के सम्मेलन में भी आने का बुलावा दे रहे हैं। उनके मुताबिक लोग उनकी बात सुन रहे हैं। कमेटी बनाने को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है। मणि के मुताबिक इस प्रदेश के लोग उन्हें ध्यान से सुन रहे हैं इससे उनका हौसला बढ़ा है।
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20.6.08
वाह गोविंदाचार्य आह गोविंदाचार्य
पतंजलि योग पीठ में गंगा बचाओ अभियान के लिए संत रामदेव की अगुवाई में हुई मंत्रणा में गोविंदाचार्य ने जो कुछ कहा उसे समझना होगा। गोविंदाचार्य ने विहिप की इस मसले में दोहरी नीति से खिन्न होकर इस तरह टिप्पणी की। सांस्कृतिक मामलों को सियासी नजरिए से हल नहीं किया जा सकता। गोविंदाचार्य को यह बात राममंदिर के समय समझ में क्यों नहीं आई। लगता है भाजपा से दूरी और विहिप-आरएसएस से वनवास ने उनका बुद्धत्व जगा दिया है। सच ही तो है कि सांस्कृतिक मसले सियासी नजरिए से हल नहीं होते। बात यह उठती है कि आखिर उन्होंने धर्म की जगह संस्कृति शब्द को क्यों चुना। हम में से अधिकांश को याद होगा कि 1990 के उन झंझावाती समय में जब हिंदु मुसलमान को दो संस्कृति न मानकर यही संगठन और गोविंदाचार्य धर्म मानने और मनवाने पर उतारू थे। दरअसल तब उनका मकसद धर्म शब्द से हल होता था। आज धर्म शब्द राजनीति में चुक चूका है। सो जानबूझकर सांस्कृतिक शब्द उठाया गया है। संस्कृति मनुष्य की सामाजिक और सार्वजनिक चेतनाहै। संस्कृति के निर्माण में धर्म से अधिक स्मृति का अंशदान और योगदान होता है।भारतीय संस्कृति को संस्कृति की इसी परंपरा ने जिंदा रखा है। धर्म और धर्म के स्वरूप,सिद्धांत और उनकी व्यख्याएं आती जाती रहती हैं। सभ्यता और संस्कृति का अधिकांश स्मृति और उसकी मानवीय चिताओं के यथार्थ और उसके सपनों से ही निर्मित होता है। कोई भी संस्कृति हो उसकी धमनियों में सांस्कृतिक स्मृति का रक्त ही प्रवाहित होता है। भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है मुसलमान। इस बात को आरएसएस और विहिप जानते हुए भी भुलाए रहती है। शायद ऐसा करने में ही उसकी भलाई या विवशता है। इस विवशता का मूल कारण है भारतीय मानस का चिंतन। उसने कभी भी अलगाववादियों को इसकी इजाजत नहीं दी। इसलिए गोविंदाचार्य ने बड़ी सफाई से सांस्कृतिक शब्द जोड़ा है। इस सफाई को चतुराई ही कहिए। गोविंदाचार्य भी आखिर उसी विहिप और आरएसएस की कोख की उपज हैं जिसके मास्टरमाइंड इन दिनों आडवाणी को साफ्ट चेहरा साबित करने में जुटे हैं। यह मुहिम है आडवाणी को भारत की कुर्सी दिलाने की। इसलिए सभी साफ्ट हैं मगर विवशता में।यह नहीं तो फिर जिस गंगा बचाओ अभियान में सभी धर्म और पंथ के संगठनों को जोड़ा गया, जिसमें अलग रास्तों पर चलने वाले लोग भी शामिल हैं, उसमें किसी अगुवा मुस्लिम संगठन को क्यों शामिल नहीं किया गया। गोविंदाचार्य बताएं कि क्या इससे ही उनका गंगा अभियान अपवित्र हो जाता और क्या वह हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं।
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