ग़ज़ल
कोई बात नहीं चुभती है अब तो मन में |
कितना अनमन है, आलस्य भरा है मन में |
अनाचार अतिचार अनय,है चहुँ दिशि फैला ,
क्यों यह विष की बेल फूलती सकल भुवन में |
भ्रमर गीत अब नहीं, न पंछी कलरव करते ,
मुरझाये हर कली,पुष्प ,तरु आज चमन में |
हिंषा-द्वेष ओ द्वद्व -बैर सब और समाया,
नहीं आस्था रही किसी की आज अमन में |
गला काटने वालो ,हाथ मिलाओ,गले लगो तो,
कितना सुख-आनंद भरा इस प्रीति-छुअन में |
धुंध,धुंआ, विध्वंस मिटे ,जग से जीवन से,
प्रेम-प्रीति की सुरभि , बहे उन्मुक्त गगन में ||
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27.10.09
कोई बात नहीं चुभती है अब तो मन में --डा श्याम गुप्ता की ग़ज़ल ---
Posted by
shyam gupta
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Labels: अनाचार, अन्याय, आलस्य, आस्था, द्वेष प्रेम
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