(साभार एनडीटीवी ख़बर.कॉम से....सौजन्य--रवीश कुमार--दरअसल धर्म मार्ग के सच को जिस तरह रवीश जी ने बयान किया है...उसके बाद मुझे इसमे कुछ जोड़ने की बजाय इसे प्रसारित करने की आवश्यकता महसूस हुई..इसलिए आप सबके सामने इसे पेश कर रहा हूं)
परमाणु मार्ग से गांधी मार्ग की ओररवीश कुमारनई दिल्ली, सोमवार, जुलाई 7, 2008पानी को लेकर परेशान गांधीवादी अनुपम मिश्र गांधी मार्ग पत्रिका निकालते हैं। गांधी शांति प्रतिष्ठान की इस पत्रिका में परमाणु समझौते की अपनी अलग व्याख्या की गई है। आज की बहस से 21 साल पहले अनिल अग्रवाल और प्रफुल्ल विदवई के लेख के ज़रिये अनुपम मिश्र इस बहस में विकल्प पेश करते हैं।यह लेख बता रहा है कि परमाणु ऊर्जा बेहद खर्चीली योजना है। इसे साकार करने के लिए तमाम तरह के संगठन हैं। परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई तरह के सपने भी बेचे गए हैं, लेकिन इस पूरी बहस में यह चिंता ग़ायब है कि परमाणु बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला कचरा कितना ख़तरनाक है। इस कचरे को न केवल प्लूटोनियम से अलग करते समय सावधानी बरतनी होती है, बल्कि हज़ारों साल तक भंडारण का इंतजाम भी करना होता है। अनेक लोगों का मानना है कि इस समस्या का स्थायी हल नहीं है। एक बार प्लूटोनियम को अलग कर लेने के बाद परमाणु आयोग की योजना इस अत्यंत ज़हरीले कचरे को कांच में बदलकर एक ही जगह स्थिर की जा सकती है। लेकिन यहां भी इसे कांच को शीतगृह में 20 साल तक स्थिर रखा जाता है। फिर अंत में उसे किसी ऐसी जगह रखना होता है, जहां पानी, भूचाल, युद्ध या तोड़-फोड़ की कोई भी घटना हज़ारों साल तक छेड़ न सके। परंतु ऐसी जगह मिलना मुश्किल है। हिमालय, सिंधु-गंगा के कछार, थार के रेगिस्तान और दक्षिणी पठार आदि भूजल की अधिकता के कारण रद्द किए जा चुके हैं। परमाणु ऊर्जा आयोग के वैज्ञानिकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और उससे लगे आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ ज़िलों का कंकरीला पठार इसके लिए उपयोगी हो सकता है। 21 साल पहले के इस लेख में अग्रवाल और बिदवई सवाल उठाते हैं कि अगर ऐसी जगह मिल भी गई तो क्या हज़ारों साल तक उसकी सुरक्षा की जा सकती है। कहते हैं कि हमारा परमाणु ऊर्जा आयोग बहुत महत्वकांक्षी है।परमाणु बिजलीघरों से निकला अति भयानक रेडियोधर्मी कचरा अनंतकाल तक, यानि जब तक यह धरती है, बिल्कुल सुरक्षित रूप से जमा करके रखना होगा। है कोई राजनेता या वैज्ञानिक, जो इसका दावा कर सकता है... परमाणु ऊर्जा के कट्टर समर्थकों में कोई भी यह नहीं कह सका है कि उस कचरे के निपटान की समस्या का हल मिल गया है। यह विष आज संसार में 20,000 टन तक की मात्रा में मौजूद है। इसका अधिकांश भाग बिजलीघरों में काम आ चुके ईंधन के हौजों में पड़ा है।इतना ही नहीं, यह लेख यह भी जानकारी देता है कि पुराने हो चुके परमाणु बिजलीघरों को बंद करने में भी इसी प्रकार की आर्थिक परेशानी पैदा होती है। यह बंद करना इसलिए भी ग़लत है, क्योंकि उसका अर्थ होता है - साधारण रीति से किसी निर्जन मकान में ताला लगा देना। लेकिन दसियों साल तक काम करते रहने वाले परमाणु संयंत्रों के अनेक हिस्सों में रेडियोधर्मिता छा चुकी होती है। बंद करते समय उन्हें कंक्रीट की बहुत मोटी तह वाली एक विशाल कब्र में दफनाकर सदियों तक वायुमंडल से बचाकर रखना पड़ेगा। अब तक तोड़ा गया सबसे बड़ा संयंत्र अमेरिका में मिन्नेसोटा स्थित 22 मेगावाट क्षमता का एल्क नदी संयंत्र है। पूरी प्रक्रिया में दो साल और 60 लाख डॉलर लगे। आगे जिन बिजलीघरों को दफनाना होगा, वे तो इससे 50 गुना बड़े और सैंकड़ों गुना अधिक रेडियोधर्मी प्रदूषित संयंत्र हैं। आखिर क्या बात है कि अमेरिका में 1976 के बाद से एक भी नए रिएक्टर के लिए अनुमति नहीं दी गई है। 1975 में 90 से भी अधिक संयंत्र रद्द कर दिए गए। एक अमेरिकी विद्वान ने लिखा है कि जिस देश ने संसार को परमाणु विद्युत के युग में प्रवेश कराया, वही संसार को उससे मुक्त कराने में भी अगुवाई करेगा।अभी ऐसे दिन तो नहीं आए हैं, लेकिन परमाणु ऊर्जा ही एकमात्र विकल्प होता तो दुनिया इसी के पीछे भागती। ऊर्जा के अन्य विकल्पों के मंत्रालय नहीं होते। जितना पैसा परमाणु ऊर्जा के नाम पर बहाया गया है, उनसे तो सूरज से चलने वाले लाखों पंप चालू हो सकते थे, लेकिन यह सब नहीं हुआ। परमाणु ऊर्जा को लेकर बहस हो रही है। हमारी राष्ट्रीय तरक्की के लिए सबसे ज़रूरी है। कोई यह नहीं बता रहा है कि इसके ख़तरे क्या हैं। गांधी मार्ग में छपा यह लेख बता रहा है।
10.7.08
परमाणु उर्जा का दूसरा पहलू
Posted by
राधेश्याम दीक्षित
2
comments
Labels: atomic anergy, आणविक उर्जा, परमाणु करार
5.7.08
राष्ट्रहित की धूम मची है.....धूम मचा ले
पुष्यमित्र
इन दिनों पूरे देश में राष्ट्रहित की धूम मची है. यह सब कुछ. कुछ वैसा ही है, जैसा कारगिल युद्ध और उससे पहले परमाणु परीक्षणा के दिनों में हुआ करता था. आजकल देश की हर बङी राजनीतिक पार्टी, राजनीति के बदले राष्ट्रहित करने का दावा करने लगी है और राष्ट्रहित के नाम पर एक दूसरे को गलत साबित करने में जुट गई है.
अब जैसे लोहियाजी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी के मुताबिक परमाणु करार के लिए यूपीए के साथा हो जाना राष्ट्रहित है, अपने पक्ष में उसने पूर्व राष्ट्रपति कलाम तक से सहमति ले ली है।गुरुवार की शाम से इस पार्टी के प्रवक्ता ऐसा बयान तक जारी करने लगे हैं. हालांकि जैसा माननीय मुलायमजी ने अपना रेपुटेशन बना रखा है, लोग किसी भी सूरत में उन्हें और उनके महासचिव अमर सिंह के राष्ट्रहित पर भरोसा नहीं करते, यह बात दोनों महाशयों को भी मालूम था, इसलिए दोनों ने इसमें कलामजी का एंगिल भी फिट करवा लिए. ऐसे में देश की बहुसंख्यक उत्साही जनता ने भी मानना शुरू कर दिया कि राष्ट्रहित एशिया कप जीतने में नहीं बल्कि परमाणु करार में ही है.
मगर आज दोपहर वामपंथियों ने फिर से पूरे देश को कंन्फयूज कर दिया. लंम्बी चौङी बैठक के बाद उनके नेता प्रकाश करात ने घोषणा कर दी कि इस राष्टविरोधी सरकार से समर्थन तो वापस लिया ही जाएगा, 14 अप्रैल से पूरे देश में अभियान चलाकर लोगों को बताया जाएगा कि परमाणु करार किस तरह राष्टहित के खिलाफ है. वैसे तो अपने देश की आबादी का बङा हिस्सा मानता है कि वामपंथी जो कहते हैं सच अक्सर उसके उलट होता है, यानी अगर वे करार को राष्ट्रहित के खिलाफ बता रहे हैं, तो मुलायम की बातों में कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होगी. कुछ प्रगतिशील जनता के लिए आज भी वाम का स्टैंड ही अंतिम सत्य होता है. लिहाजा राष्ट्रहित के सवाल पर वे कुछ कन्फूज हो गए.
अगर कन्फ्यूजन सिर्फ इतना ही होता तो चल जाता, मगर इन सब के पैरलल देश की एक और बङी राजनीतिक शक्ति ने अलग कन्फ्यूजन फैला रखा है कि राष्ट्रहित का परमाणु करार से कोई लेना देना नहीं, न इसके समर्थन से न ही इसके विरोध से. राष्ट्रहित का संबंधा अगर किसी बात से है तो वह श्राइन बोर्ड की जमीन पर उठे विवाद से है. हम सबों को श्राइन बोर्ड की जमीन छीने जाने की साजिश का मुकाबला करना चाहिए, वह भी राष्ट्रहित में।
-पुष्यमित्र
हजारों ख्वाहिशें ऐसी
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
Labels: परमाणु करार, पुष्यमित्र, भारत, मुद्दा, राष्ट्रहित, वामपंथ, सपा
