Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label फिदेल कास्त्रो. Show all posts
Showing posts with label फिदेल कास्त्रो. Show all posts

9.9.10

समाजवादी क्यूबा के प्रेरणाप्रद अनुभव -1-

           अभी दो दिन पहले शिक्षक दिवस था और उसके मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने क्या कहा शायद ही किसी को याद होगा। वे ऐसे शिक्षक हैं जिसने भारत के गरीबों के भाग्य बदलने के लिए कुछ भी नहीं किया। शिक्षक दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री के पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि उनके शासनकाल में शिक्षा की स्थिति में और भी गिरावट आई है। गुण और मात्रा दोनों ही दृष्टियों से भारत का स्थान विश्व में काफी नीचे है।
       इन दिनों जो लोग समाजवाद को गाली देते हैं। मार्क्सवाद को निरर्थक साबित करने में लगे हैं और अमेरिका के पदचिह्नों का अनुकरण करते हुए भारत में शिक्षा को विदेशी विद्यालयों के हाथों सौंप देना चाहते हैं और उन्हें नव्य उदार शिक्षा नीति से बेहतर कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा ऐसे लोगों के लिए समाजवादी क्यूबा से सीखना चाहिए। जो लोग मार्क्सवाद की असफलता का अहर्निश राग अलापते रहते हैं और मार्क्सवाद के ऊपर कीचड़ उछालने के लिए मिथ्या प्रचार करते रहते हैं उन्हें क्यूबा की शिक्षा क्षेत्र की उपलब्धियों पर गौर करना चाहिए। क्यूबा की सच्चाई को हम फिदेल कास्त्रो के नजरिए से देखें तो कुछ नई चीजों पर भी रोशनी पड़ेगी।
      फिदेल कास्त्रो ने लिखा है कि ‘‘मेरा हमेशा से विश्वास रहा है कि शिक्षा श्रेष्ठ और मानवीय कार्य है जिसमें लोगों को अपना जीवन लगाना चाहिए। इसके बगैर न विज्ञान होगा, न कला और न साहित्य; न उत्पादन होगा और न अर्थव्यवस्था, न स्वास्थ्य होगा और न कल्याण, न अच्छा जीवन होगा और न मनोरंजन तथा आत्म-सम्मान। सामाजिक जागरूकता भी नहीं होगी।’’
‘‘ज्ञान और संस्कृति सुलभ हो जाने मात्र से नैतिक सिध्दांत प्राप्त नहीं हो जाते। लेकिन ज्ञान और संस्कृति के बगैर कोई नीतिशास्त्र तक नहीं पहुंच सकता। इनके बिना किसी तरह की समानता या स्वतंत्रता संभव नहीं है। शिक्षा और संस्कृति के बगैर किसी भी तरह का लोकतंत्र संभव नहीं है। 100 से अधिक साल पहले जोसे मार्ती ने बड़े साफ तौर पर कहा था, 'शिक्षा ही मुक्ति का द्वार है।' ’’
‘‘हमारे मंत्री ने कहा कि क्रांति के समय हमारे देश में 23.6 प्रतिशत साक्षरता थी। मेरा जन्म गांव में हुआ और मैंने बचपन पूरी तरह से ग्रामीण इलाके में बिताया। मुझे उस समय की बहुत सी बातें याद हैं। मैं यहां कह सकता हूं कि वहां 20 प्रतिशत से कम लोग मुश्किल से पढ़-लिख सकते थे। बहुत मुश्किल से बहुत कम बच्चे छठी कक्षा तक पहुंच पाते थे। शहरों में अधिक स्कूल थे। इसलिए वहां निरक्षरों का प्रतिशत कम था।
इस तरह के आंकड़ों का अपेक्षाकृत अधिक मूल्य होता है। क्रांति की जीत के समय कितने बच्चे छठी कक्षा पास थे इस बारे में जांच करने से पता चला कि लगभग सत्तर लाख बाशिंदों में इनकी संख्या चार लाख थी। और वह छठी कक्षा कैसी थी! संक्षिप्त आंकड़े वास्तविकता को प्रकट नहीं करते। यदि सभी निरक्षरों को लिया जाए तो उस समय 90 प्रतिशत से अधिक क्यूबाई छठी कक्षा से आगे नहीं गए थे।’’
‘‘1959 के विश्वविद्यालय स्नातकों के सही आंकड़े मेरे पास नहीं हैं लेकिन इनकी संख्या तीस हजार से अधिक नहीं रही होगी। अपने लोगों को शिक्षा तथा पुनर्प्रशिक्षण और इसकी उच्च गुणवत्ता बनाए रखने की चार दशकों की जद्दोजहद के बाद आज हमारी 1 करोड़ 10 लाख से अधिक की आबादी में ऐसे बहुत कम नागरिक हैं जिन्होंने कम से कम नौवीं कक्षा तक शिक्षा नहीं पाई है। विश्वविद्यालय स्नातक और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या 8 लाख है। शिक्षा से जुड़े विभिन्न मानदंडों जैसे कि प्रति व्यक्ति अध्यापक संख्या, प्रति क्लासरूम बच्चों की संख्या तथा प्राथमिक स्कूली बच्चों के गणित और भाषा ज्ञान की दृष्टि से पूरी दुनिया जिसमें अत्यधिक विकसित देश शामिल हैं में क्यूबा का पहला स्थान है। स्कूल में उपस्थिति, पढ़ाई में बने रहने और छठी तथा नौवीं कक्षा पूरी करने वाले बच्चों जैसे मानदंडों की दृष्टि से कोई देश हमसे आगे नहीं है। वास्तव में बहुत कम देश बच्चों, किशोरों और युवकों की शिक्षा तथा सांस्कृतिक प्रशिक्षण पर इतना ध्यान देते हैं।’’
‘‘लेकिन अपनी वर्तमान उपलब्धियों से संतुष्ट होने का मतलब अपने दंभ, उग्र राष्ट्रीयता, आत्म संतोष और धृष्टता का प्रदर्शन होगा। हमारी शिक्षा प्रणाली में अभी भी बहुत कमियां हैं। यह सही है कि आज हमारा एक भी बच्चा सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में अकेला बच्चा भी बगैर स्कूल या अध्यापक के नहीं है। भौतिक या मानसिक अक्षमताओं वाला शिक्षा के योग्य एक भी बच्चा या नवयुवक बगैर विशेष स्कूल के नहीं है। यह सही है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों में 20 गुना वृध्दि हुई है, जरूरतमंदों के लिए लाखों बोर्डिंग स्कूल हैं, शिक्षा के लिए निधियां हमेशा उपलब्ध रहती हैं, शिक्षा पर प्राथमिक ध्यान दिया जा रहा है, शिक्षा के क्षेत्र में हमारे पास लाखों प्रोफेसर, अध्यापक और कार्यकर्ता हैं जिनमें से बहुत उत्कृष्ट कोटि के हैं, नि:स्वार्थ, समर्पित तथा मूल्यवान नागरिक हैं फिर भी हम आदर्श शिक्षा प्रणाली कायम नहीं कर पाए हैं।’’
‘‘हमारे प्राथमिक स्कूली छात्र, जिनका पूरा दुनिया में उत्कृष्ट स्थान है, आज के मुकाबले तीन गुना ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और करेंगे।’’
सब जानते हैं कि माध्यमिक शिक्षा जिसमें सातवीं, आठवीं और नौवीं कक्षाएं आती हैं पूरी दुनिया में घोर संकट का क्षेत्र है। किशोरों की इस नाजुक उम्र में जब उन्हें उत्कृष्ट शिक्षा और अधिकतम ध्यान की जरूरत होती है तो उन्हें कुलीन समाज के जमाने में प्रचलित विचार पढ़ाए जाते हैं। ये विचार उस समय के हैं जब जन शिक्षा के बारे में कोई सोचता भी नहीं था।’’
    ‘‘मैं सत्य का एक मात्र ज्ञाता होने का दावा नहीं करता लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि इस समय प्रचलित प्रणाली मूर्खतापूर्ण है। इन कक्षाओं में तथा इस उम्र में अति विशेषज्ञता लाद दी जाती है। 25-30 या उससे अधिक छात्रों के बड़े समूह को अध्यापक देखते हैं। वे विभिन्न समूहों में 200 या उससे अधिक छात्रों को पढ़ाते हैं। वे छात्रों के नाम तक याद नहीं कर सकते, वे उनके परिवार तथा सामाजिक माहौल से वाकिफ नहीं हो सकते, उनके माता-पिताओं से संपर्क नहीं रख सकते, प्रत्येक छात्र की विशेषताओं का ज्ञान नहीं रख सकते तथा उनमें अंतर के अनुसार उनके साथ अलग-अलग तरीके से ध्यान नहीं दे सकते। नकल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और छात्रों का ज्ञान पाठय पुस्तकों में समाविष्ट ज्ञान के 30 फीसदी से आगे नहीं जाता। यहां हम यह मानकर चल रहे हैं कि ये पाठय पुस्तकें पूरी गंभीरता से साथ तैयार की गई हैं। यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि परंपरा या आत्मतुष्टि के कारण हम युवाओं के लिए कथित रूप से अद्वितीय अध्यापन व्यवसाय को बढ़ा-चढ़ाकर सम्मान देते हैं। यदि आप 12वीं कक्षा पास विद्यार्थियों से यह पूछें कि भविष्य में अध्यापकों के रूप में वे क्या पढ़ना चाहते हैं तो उनकी इच्छाएं कार्यक्रम की आवश्यकताओं तथा विषयों की साप्ताहिक आवृत्ति से कभी मेल नहीं खाएंगी। इसके फलस्वरूप अध्यापक कभी अपनी इच्छाएं पूरी नहीं कर सके।
प्राथमिक शिक्षा स्तर तक ऐसी स्थिति नहीं है। यहां अध्यापक चौथी कक्षा तक एक ही समूह के साथ रहते हैं तथा पांचवीं और छठी कक्षा में किसी अन्य अध्यापक के साथ विषय बांटते हैं।’’
‘‘सातवीं से नौवीं कक्षा के दरम्यान अचानक तथा पूरा परिवर्तन हो जाता है। प्राथमिक स्कूलों में कोई न कोई हर बच्चे को देख रहा होता है। माध्यमिक शिक्षा में हर कोई हर किसी को देखता है, कोई किसी को विशेष रूप से नहीं देखता।
इस विषय पर खुद अध्यापकों के साथ चर्चा करना आसान नहीं है। विकल्प में रूप में हमने सातवीं, आठवीं और नौवीं के लिए कई विषय पढ़ाने वाले अध्यापक रखने के बारे में सोचा है जो भाषा और शारीरिक शिक्षा के साथ-साथ अन्य विषय पढ़ा सकें तथा प्रति 15 विद्यार्थी एक अध्यापक के अनुपात में उन तीनों साल छात्रों के साथ आगे बढ़ सकें। ’’
‘‘इस विचार की कड़ी जांच की जा रही है। तत्काल बदलाव की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हम हजारों नए अध्यापकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। ये अध्यापक 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों में से चुने गए हैं। इस समय वे जबर्दस्त उत्साह के साथ इस सघन अभ्यास में जुटे हुए हैं। हमें अभी तक प्राप्त शिक्षा परिणामों से तसल्ली हुई है। उत्साहजनक बात यह भी है कि परंपरागत प्रणाली के अंतर्गत कार्य करने वाले बहुत से अध्यापक दो, तीन या इससे अधिक विषय पढ़ाने और यहां तक कि बहु-विषय अध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए भी तैयार हो रहे हैं। इससे इस दिशा में काफी प्रगति हुई है। अधिक पढ़े जाने वाले विषयों में अध्यापकों की कमी दूर हुई है तथा अध्यापन व्यवसाय के प्रति आकर्षण बढ़ा है।’’
‘‘माध्यमिक शिक्षा में दोपहर के भोजन की उचित व्यवस्था के साथ दोहरे सत्र मुस्तैदी के साथ शुरू किए जाएंगे। यह कार्य राजधानी से शुरू किया जाएगा जहां हर चीज अधिक उलझी होती है। 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा वाले सीनियर हाई स्कूल स्तर पर बुनियादी और तकनीकी दोनों तरह की शिक्षा के लिए कार्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। छात्रों की ओर विशेष ध्यान दिए जाने की योजना के अंतर्गत विशेषज्ञ अध्यापक रखे जाएंगे। किसी को इस बात का डर नहीं है कि इन योजनाओं के कारण अध्यापकों की संख्या कम हो जाएगी तथा माध्यमिक शिक्षा में इस समय कार्य कर रहे अध्यापक फालतू हो जाएंगे। इसके विपरीत हर स्तर पर अध्यापकों की संख्या बढ़ेगी और यदि आवश्यक हुआ तो एक रिजर्व तैयार किया जाएगा ताकि अध्यापन निकाय में लगातार प्रशिक्षण चलता रहे। मैंने इस मुद्दे पर बहुत समय दिया है क्योंकि उच्चतम जोखिम के इस युग में यह बहुत महत्वपूर्ण है। एक देश, जिसमें 100 प्रतिशत छात्र इस शैक्षिक स्तर से गुजरते हैं, में सब बच्चों को इस जोखिम से गुजरना होगा। इस तरह से हम अध्ययन को पांच गुना बढ़ाने की आशा करते हैं।’’








7.9.10

उपभोक्तावाद,सट्टा और फिदेल कास्त्रो



   उपभोक्ता समाज के तेजी से विकास ने प्रकृति और पर्यावरण के विनाश की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया है। उपभोग की संस्कृति की जो अंधी दौड़ आरंभ हुई है उसमें हमारे समस्त पर्यावरण का संतुलन ही बिगाड़ दिया है। उपभोक्तावाद को विस्तार देने और चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने में विश्व व्यापार संगठन,आईएमएफ,विश्व बैंक और उसके तहत आए आर्थिक कायदों और नीतियों की केन्द्रीय भूमिका है। इसने नए किस्म की दासता और नृशंस शोषण को जन्म दिया है।
    फिदेल कास्त्रो ने इस प्रसंग में लिखा है ‘‘ विकसित देश और उनके उपभोक्ता समाज पर्यावरण के तेजी से हो रहे निरंतर विनाश के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने विजयों और उपनिवेशीकरण तथा नृशंस शोषण और आज की तीसरी दुनिया के देशों में जन्मे करोड़ों लोगों के उन्मूलन का लाभ उठाया। उन्होंने ही दुनिया और उसके बाजारों के बंटवारे के लिए लड़े गए नृशंस तथा तबाही मचा देने वाले दोनों विश्व युध्दों के बाद लादी गई आर्थिक व्यवस्था का फायदा उठाया। उन्हें ही अमरीका और उसके साथियों को ब्रेटन-वुड्स में दिए गए विशेषाधिकारों तथा केवल उनके लिए और उनके द्वारा बनाए गए आई एम एफ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का लाभ मिला है।’’
    आज सारी दुनिया के सामने गंभीर समस्याएं हैं लेकिन विकसित देश उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। फिदेल ने लिखा है  ‘‘दुनिया के अमीर तथा फिजूलखर्च लोगों के पास ही तकनीकी और वित्तीय संसाधन हैं। वे ही मानव जाति को उसका हक लौटा सकते हैं। आधिपत्यवादी महाशक्ति को चाहिए कि वह अफ्रीकी-अमरीकियों, प्रतिबंधों के साथ जी रहे मूल अमरीकियों तथा कैरीबियाई प्रवासियों और गरीब राष्ट्रों के अन्य लोगों चाहे वे नीग्रो हों अथवा पीले या अश्वेत को विशेष ऋण लौटाए। ये लोग कटु भेदभाव और नफरत का शिकार रहे हैं।’’
     ‘‘हमारे गोलार्द्ध में देशी समुदायों की दुर्दशा को समाप्त करने का अब समय आ गया है। उनमें आई जागृति तथा उनके संघर्षों और उनके खिलाफ किए गए अपराधों की भयावहता को पूरी दुनिया द्वारा माने जाने के बाद अब ऐसा करना जरूरी हो गया है।
दुनिया को इस त्रासदी से बचाने के लिए पर्याप्त धन है। विनाश तथा मौत लाने वाली हथियारों की होड़ और हथियारों की तिजारत वास्तव में बंद हो।’’
      उपभोक्तावाद की अशांत भूख को पैदा करने में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है। जिस समय सारे देश में गरीबी का ताण्डव चल रहा हो वैसे में टीवी पर्दे पर मैकडोनाल्ड के विज्ञापन या ऐसे ही विज्ञापनों का अहर्निश प्रसारण गरीबों के दिल में ईर्ष्या पैदा करता है। साथ ही विज्ञापनों से विभिन्न संस्कृतियों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हुआ है। इस समस्या पर राय जाहिर करते हुए फिदेल कास्त्रो ने लिखा है-
     ‘‘वाणिज्यिक विज्ञापनों पर एक खरब अमरीकी डालर खर्च होते हैं। इनसे झूठे भ्रम और पूरी न की जा सकने वाली उपभोक्ता आदतें पैदा होती हैं। साथ ही इनसे राष्ट्रीय संस्कृतियों और पहचानों को नष्ट कर देने वाला जहर फैलता है। इस रकम का बड़ा हिस्सा विकास पर खर्च हो। सकल राष्ट्रीय उत्पादन का छोटा सा 0.7 प्रतिशत हिस्सा शासकीय विकास सहायता के रूप में देने का वायदा किया गया है। यह सहायता वास्तव में दी जाए।’’
   इधर के 30-35 सालों में सत्ताबाजार में तेजी आयी है और ज्यादा से ज्यादा लोग सट्टेबाजी में शामिल हो रहे हैं। सट्टाबाजार के विकास ने कालेधन के सर्कुलेशन के बढ़ा दिया है। बड़ी मात्रा में काला धन बाजार में उथल-पुथल पैदा कर रहा है। इससे मध्यवर्ग की पामाली बढ़ी है। कर्जे बढ़े हैं। हमारे यहां सट्टेबाजी पर सही कर लगाया जाना चाहिए। जैसा कि नोबल पुरस्कार विजेता जेम्स तोबिन ने सुझाव दिया है वर्तमान सट्टा कारोबार पर उचित और कारगर कर लगाया जाए।
समाजवादियों-कम्युनिस्टों पर बार-बार यह दबाब पैदा किया गया कि वे अपने विचारों को बदलें । फलतःअनेक मार्क्सवादियों ने अपने विचारों को बदल लिया और इसका यह दुष्परिणाम निकला कि आज सारी दुनिया में मार्क्सवादी हाशिए पर चले गए। उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि वे अपने विचार और दल को बदल देंगे तो वे आगे चले जाएंगे लेकिन हुआ एकदम उल्टा। फिदेल कास्त्रो पर भी यह दबाब था। उन्होंने इस दबाब के आगे झुकने से इंकार किया।
    इस प्रसंग में फिदेल ने कहा ‘‘मेरा मानना है कि हम जितनी साफगोई के साथ सत्य को रखेंगे, उसको माने जाने तथा उसका सम्मान करने की उतनी ही अधिक संभावनाएं होंगी। हम कई शताब्दियों तक छलावे में जी चुके हैं। मेरे पास वास्तविकताओं पर आधारित तीन छोटे सवाल और हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। पूंजीवादी, विकसित और धनी देश पूंजीवाद और दुनिया पर थोपी गई एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था से उपजी साम्राज्यवादी प्रणाली के हिस्सेदार हैं जो स्वार्थ के दर्शन तथा लोगों, राष्ट्रों और राष्ट्र समूहों के बीच वहशी प्रतिस्पर्धा पर आधारित है और जो भाईचारे तथा ईमानदार अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के प्रति पूरी तरह से उदासीन है। वे उपभोक्ता समाजों के भ्रामक और गैर जिम्मेदाराना वातावरण में जीते हैं। इस प्रकार यदि हम इस व्यवस्था में उनके विश्वास तथा उनके सर्वाधिक गंभीर राजनीतिज्ञों के विश्वासों की ओर ध्यान न दें तो भी मुझे यकीन नहीं होता कि वे आज की दुनिया की गंभीर समस्याओं को समझेंगे, ऐसी दुनिया जिसमें असंगत और असमान विकास हुआ है और जिस पर अंधे कानूनों तथा लगातार प्रबल और अनियंत्रणीय होते जा रहे अंतर्राष्ट्रीय निगमों की महाशक्ति और हितों का शासन है।’’
‘‘क्या वे दुनिया भर में अव्यवस्था और बगावत को समझेंगे ? यदि वे ऐसा करना भी चाहें तो क्या वे नस्लवाद, प्रजाति भेदभाव, विदेशी द्वेष तथा इन पर आधारित और इनसे जुड़े अन्य मसलों का अंत करेंगे।’’
‘‘मेरे विचार से हम जबर्दस्त आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विश्व संकट के कगार पर हैं। हमें इन वास्तविकताओं के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए। इसके बाद विकास अपने आप होगा। इतिहास ने हमें दिखाया है कि संकट से ही बड़े समाधान निकलते हैं। जीवन और न्याय के लिए लोगों का अधिकार हजारों रूपों में खुद को निश्चित रूप से स्थापित करेगा।’’




23.8.08

Happy Birthday Fidel: City Observed Fidel Castro's Birthday

Dear Yeshwant,

I saw your blog and thought that the members of Bhadas may like to know about the programme which was held in Indore on no party's banner. Yes, people who don't like the existing order of the world, who believe that capitalism is no answer, and people who respect to the effort to establish an alternate, egalitarian, socialist system; they gathered together and watched the one hour long video of one of the greatest revolutionaries of our times-Fidel Castro.
If you like it, you may send it to others an also put this news on your blog.

Pls respond
Vineet
Indore


Press Release 17/08/2008

Happy Birthday Fidel: City Observed Fidel Castro's Birthday

To mark the 82nd birthday of the revolutionary leader and former President of Cuba, Fidel Castro, Sandarbh Kendra held a gathering in his honour here in Indore on 13th August, 2008. The gathering included a viewing of the 1990 interview of Castro by Saeed Naqvi, the first Indian reporter to ever be granted an interview with the First Secretary of the Cuban Communist Party.

The interview was of importance due to its timing – taking place just after the collapse of socialist governments in Eastern Europe and just before the disintegration of Soviet Union leaving Cuba as a lone Socialist nation. With these events in mind, Mr. Naqvi asked Fidel,"Do you not feel lonely?" and Fidel responded with typically revolutionary passion, "No, I have my convictions to accompany me." Furthermore, Fidel's analyses of world politics remain troublingly pertinent today. He spoke of the danger of America becoming a uni-polar world power, and the urgent need for the United Nations to become a democratised institution. The film was a one hour reduction of the epic, four hour interview, which granted further insights into Cuban socialism, the importance of the Non-Alignment Movement and relations between Latin America, Asia and Africa. Yet amongst his self-assured proclamations, Fidel spoke of the need to retain one's sense of modesty. The history of the world, Fidel stated, teaches that the overt arrogance of certain world leaders will be remembered only as a footnote.

The meeting, held at the 'All India Bank Officers Association' Office at the State Bank of Indore Head Office, was attended by bank employees, writers, journalists, students and others. The showing of the film was preceded by an introduction given by activist and journalist Vineet Tiwari, in which he spoke on Castro's influence on social movements around the world and here in India. The film was translated into Hindi by Jaya Mehta, a prominent Indian economist and activist, who also gave additional insight into the background of the issues discussed.

'Sandarbh Kendra', who organized this meeting, is a collective that strives to raise the level of peoples' consciousness about different relevant political and social issues through different programmes and media projects. This showing was the finale of day of activity to mark the birthday of the legendary revolutionary by Sandarbh Kendra, which included a reading of Aijaz Ahmed's "The Practical Moralist", which was published in Frontline.