Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Showing posts with label बमबम. Show all posts
Showing posts with label बमबम. Show all posts

7.5.08

मक्कारों के मोहल्ले में....

मक्कारों के मोहल्ले में कई लोगों ने गीत के लिए विरुदावली गाई। हृद्येंद्र को, भड़ास को एकतरफा दुर्जन करार दे दिया गया। मुझसे रहा नहीं गया और उस पोस्ट पर ये टिपण्णी डाल दी। ठीक किया या ग़लत ये तो आप लोग ही बताएँगे। टिपण्णी-

आप सबने मिलकर एकतरफा गीत को सज्जन और हृद्येंद्र को दुर्जन करार दे दिया। शायद इसलिए क्योंकि आप गीत को जानते हैं. लेकिन यह एक ही पक्ष है. सबसे पहली बात यह है कि अगर कोई अच्छे लेखक हैं तो जरूरी नहीं कि वह अच्छे आदमी भी हों. यह गीत के ऊपर भी लागू होता है.गीत के जहां तक अच्छे लेखक होने बात है, मैंं यह आरोप नहींं लगाता कि वे दूसरी भाषाआें की कहानियां टीपते हैं। उनकी कहानियां आरिजनल होंगी। मैं ये भी नहीं कहता कि इस वजह से मध्यप्रदेश से प्रकाशि एक साहित्यिक पत्रिका में उनका छपना फिलहाल रोक दिया गया है। ये अलग बात है। हृदयेंद्र ने जो महसूस किया वह इन सबसे अलग है। वह एक नए पत्रकार के मन में बैठे एक मूर्ति का भंजन है। हृदयेंद्र की गीत से कोई खेत की लड़ाई नहीं थी कि लट्ठ लेकर पीछे दौड़ गया। यह स्वीकार करने में आप जैसे खाए अघाए लोगों को या दि कत है कि सारी खूबियों के बावजूद भास्कर जैसे व्यावसायिक संस्थानों व्यि त कैसे आगे बढ़ता है? किस तरह के समझौते करते है? इसीलिए जो लोग साथ काम करते हैं, ज्यादा समय गुजारते हैं वे जानते हैं कि व्यि त का असली चरित्र या है और वह कितना लिजलिजा और मतलबी है? आप ने हृदयेंद्र को कुंठा की काली कोठरी में बैठा करार दे दिया लेकिन क्या उसके बारे में जानते हैं? शायद नहीं? क्या किसी ने उससे जानने की कोशिश की ? नहीं। फिर कैसे फैसला ले लिया कौन सही है और कौन गलत। जालंधर में ही गीत केकई पुराने जाननेवाले हैं, उनका कहना है कि गीत पुराने परिचितों से मिलना नहीं चाहते। फोन करने पर भी ठीक से बात नहीं करते। एक सज्जन जो मुंबई से उसे जानते हैं वे मिलने गए तो कहलवा दिया कि मीटिंग में है। मुझे तो लगता है कि गीत कृतित्व और व्यि तव में कितना बड़ा अंतर हो सकता है उसका बड़ा उदाहरण है।