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22.12.11

लोकपाल का डर



लोकपाल का डर


लोकपाल को लेकर हो हल्ला मचा है...सडक से लेकर संसद तक एक ही चर्चा है...अखबार से लेकर टीवी तक एक ही खबर छायी हुई है...लोकपाल...अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल आए...प्रधानमंत्री औऱ सीबीआई इसके दायरे में रहें...आम आदमी का सबसे ज्यादा पाला पडने वाले ग्रुप सी औऱ डी के कर्मचारी इसके दायरे में रहें...अन्ना का इसके पीछे तर्क है कि यह सब लोकपाल में होगा तो भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी...अब लोकपाल बिल पास होने के बाद इसका कितना असर होगा ये तो समय ही बताएगा...लेकिन लोकपाल के जिन्न ने देश की राजनीति में भूचाल जरूर ला दिया है...एक अनजाना सा खौफ हमारे देश के राजनेताओँ पर छाया हुआ है...देश की राजनीति में खासा दखल रखने वाले दो बडे राज्य यूपी औऱ बिहार के कद्दावर नेता मुलायम सिंह औऱ लालू प्रसाद यादव ने तो इसके खिलाफ संसद में ही आवाज बुलंद कर दी है...मुलायम सिंह कहते हैं कि लोकपाल बिल पास हो गया तो एक मामूली सा दारोगा भी उन्हें जेल भेज देगा...कलेक्टर औऱ एसपी उनकी इज्जत नहीं करेंगे...यहां लालू भी मुलायम सिंह का समर्थन करते दिखे...हम कहते हैं...अरे साहब ऐसा काम ही क्यों करते हो कि कोई दारोगा आपको जेल भेजे...कलेक्टर और एसपी आपकी इज्जत न करें...कहीं न कहीं आपके मन में चोर है इसलिए शायद आप लोकपाल के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं...इतने ही ईमानदार आप होते तो एक सशक्त लोकपाल का समर्थन नहीं करते...।
ये तो रही बात यूपी औऱ बिहार के दो महानुभावों कि...बात अगर करें हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की...क्या वाकई में हमारे देश के प्रधानमंत्री ईमानदार हैं...किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं...अरे साहब हम तो कहते हैं कि अगर वाकई में ईमानदार हो...ईमानदारी से देश सेवा कर रहे हो तो फिर डर काहे का...ले आओ न सशक्त लोकपाल...खैर कसूर आपका भी नहीं है...आपकी भी मजबूरी है...आपका तो खुद बुरा हाल है...कहते हैं ना...मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो...मैं पीता नहीं हूं पिलायी गयी है...आपको पिलाने वाला तो कोई औऱ ही है...।
केन्द्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में पेश करने जा रही है...इसके लिए संसद का सत्र भी 29 दिसंबर तक बढाया गया है...सरकार के लोकपाल को लेकर जहां टीम अन्ना ने आंखे तरेर रखी हैं...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने भी इसको लेकर कमर कस ली है...औऱ संसद में इस पर जमकर तकरार होने के आसार हैं...।
अब लोकपाल की इस लडाई में जीत किसकी होती है ये तो समय ही बताएगा...लेकिन निश्चित तौर पर लोकपाल का भय़ बिल के पास होने से पहले ही भ्रष्टाचारियों पर दिखाई देने लगा है...उम्मीद करते हैं कि एक सशक्त लोकपाल आए औऱ भ्रष्टाचार में नित नये रिकार्ड बनाते हिंदुस्तान की तस्वीर बदले।


दीपक तिवारी
08800994612
deepaktiwari555@gmail.com

11.7.11

SMS भाग भाग डी.के.बोस डी.के.बोस डी.के.बोस

नुक्कड़ से एक बच्चा उम्र  मुश्किल से दस साल होगी SMS बोस डी.के.  बोस डी.के. बोस डी.के. गाता हुआ चला जा रहा था ।  नुक्कड़ मे हंगामा मच गया लोग लोट पोट होने लगे भाई सोहन शर्मा उर्फ़ कांग्रेसी  अचकचा गये बोले हंस क्यो रहे हो भाई और ये SMS कौन है । कही जवाब न मिला उल्टे लोग उनको देख और हंसते थे एक ने तो कमेंटिया भी दिया ये पीएसपीओ के जैसे  SMS भी नही जानता इतना सुनते ही हंगामा और बढ़ गया । दुखी हो शर्मा जी हमारे पास आये  बोले दवे जी आपको हमारी प्यारी मम्मी की कसम है SMS का मतलब बताओ । अब साहब  कसम थी हमने बता दिया बात ऐसी है भाई मन्नू को नौजवानो की मोबाईल भाषा मे SMS कहा जाता है । बात समझते ही शर्मा जी आपे के बाहर हो गये बोले हमारे मन्नू का ये अपमान नही सहेगा हिंदुस्तान अभी पीटता हूं उस बच्चे को सारी अकल ठिकाने आ जायेगी ।


 बड़ी मुश्किल से शर्मा जी को रोका गया  फ़िर समझाया भाई पीटना है तो खुद को पीटो आज देश के बच्चे बच्चे के मुंह मे यह गाना समा रहा है। जिम्मेदार तुम लोग खुद हो सेंसर बोर्ड मे भी भ्रष्टाचारियो को बैठाया है पैसे खाकर अश्लील गाने हो या द्रुश्य आराम से पास हो जाते है । आज जब बच्चो द्वारा माता पिता मित्रो पड़ोसियो और गुरुओं के नाम के साथ यह गाना जोड़ गुनगुनाया जा रहा है तो मीडियानुसार भ्रष्टाचारी मन्नू के साथ क्यों नही जोड़ा जा सकता ।

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अष्टावक्र

7.3.11

आपकी मज़बूरी

बोफोर्स मामला बंद करने का
कैसे आया ख्याल,
आपकी मज़बूरी की
नहीं इस से बड़ी मिसाल।
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मजाक मजाक में बीत गए
कई अमूल्य साल,
सच बतलाना मनमोहन जी
ये कैसे किया कमाल।

5.9.10

रेल के एक ही डिब्बे में बैठे हैं माओवादी और मनमोहनसिंह

                          कार्ल मार्क्स का प्रसिद्ध कथन है कि  ‘ इस दुनिया में पूंजी का प्रत्येक अंश सिर से पैर तक खून और धूल से सना है।’ खून और धूल के रूपक के बहाने मार्क्स ने सामाजिक संबंधों की ओर ध्यान खींचा है। पूंजीवाद अपने शोषण को बनाए रखने के लिए सामाजिक संबंधों और सामाजिक समूहों को विस्थापित करता है। उल्लेखनीय विभिन्न देशों में पूंजीपतिवर्ग ने विभिन्न धातुओं और कच्चे मालों का खानों से उत्खनन करके लाखों-करोड़ों लोगों को विस्थापित किया है।
     पूंजीपतिवर्ग ने भारत से लेकर अफ्रीका तक अपनी लूट का अभियान जारी रखा। आधुनिककाल के आने के साथ साम्राज्यवाद का उदय हुआ। यूरोप के राष्ट्रों ने सारी दुनियाभर के सुदूरवर्ती देशों में अपने शासन और संपदा के शोषणतंत्र को स्थापित किया। भारत में इस क्रम में ही ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हुआ। औपनिवेशिक सभ्यता और यूरोपीय बस्तियों का विस्तार हुआ।
      उपनिवेश बनाने और कच्चे मालों का दोहन करने के लिए बड़ी संख्या में किसानों को विस्थापित किया गया। यह कहानी अमेरिका,एशिया,अफ्रीका,लैटिन अमेरिका,वेस्टइंडीज आदि में एक ही तरीके से दोहराई गयी। आज भी पूंजीपतिवर्ग की नजर पृथ्वी के कच्चे मालों को पूंजी में तब्दील करने पर लगी हुई है। ज्यादा से ज्यादा संपदा संचय करने की अपनी प्रवृत्ति के कारण पूंजीपतिवर्ग ने समाज के अन्य वर्गों को हाशिए पर पहुँचा दिया है। संचय करने की यह मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है। यही वह बुनियादी परिप्रेक्ष्य है जहां से हमें पूंजीवादी हिंसा और माओवादी हिसा को देखना चाहिए।
    मीडिया और आम विमर्श में माओवादी हिंसा की जब भी चर्चा होती है तो उसके पीछे निहित पूंजीवादी संचय,दोहन,शोषण और विस्थापन को हटाकर चर्चा की जाती है। मसलन् प्रतिवादी आदिवासियों ने पुलिसवालों को जान से मारा। रेल में आग लगाई वगैरह-वगैरह। जाहिरा तौर पर किसी भी व्यक्ति से जब यह सवाल किया जाएगा कि प्रतिवादियों का आग लगाना सही था या गलत,तो प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा गलत।  
       मीडिया बड़ी चालाकी से आदिवासियों के विस्थापन और खानों के उत्खनन के कारण पैदा हो रही समस्याओं को छिपा लेता है। आदिवासियों के प्रतिवाद का खान उत्खनन और तदजनित विस्थापन के साथ संबंध है ,इस तथ्य को छिपा लेता है। यहीं पर मीडिया पूंजीपतिवर्ग की वैचारिक-सामाजिक सेवा करता है। हिंसा के लिए पूंजीपति और राज्य नहीं आदिवासी जिम्मेदार हैं ,इसका प्रचार करता है।
       समस्या यह है कि खानों का उत्खनन किया जाए या नहीं ? एक ही उत्तर होगा किया जाए। खानों का उत्खनन जब होगा तो विस्थापन से कैसे निपटा जाए। सामाजिक तौर पर वैकल्पिक व्यवस्था किए वगैर किया गया विस्थापन श्रृंखलाबद्ध हिंसा को जन्म देता है। खानों के उत्खनन से पैदा हुई हिंसा और उसके परिणाम शहरों को भी स्पर्श करते हैं। गांवों से शहरों की ओर हुआ विस्थापन और स्थानान्तरण विश्वव्यापी फिनोमिना है। यह पूंजीवादी व्यवस्था की हिंसा है। तेल,प्राकृतिक गैस, .यूरेनियम,विभिन्न किस्म की धातुओं के उत्खनन के कारण समाज में व्यापक स्तर पर अस्थिरता पैदा हो रही है। इस अस्थिरता के शिकार गरीब लोग हो रहे हैं।
    भारत सरकार ने हाल में माओवादियों की हिंसा से प्रभावित इलाकों में हजारों पुलिस और अर्द्ध सैन्यबलों को तैनात किया है,तथाकथित तौर पर माओवाद पभावित इलाकों में विकास के नाम पर कई हजार करोड़ रूपये खर्च करने की योजना बनायी है। माओवादियों को आम जनता से अलग-थलग करने के लिए मीडिया को लामबंद किया जा रहा है। इस सबसे लगता है कि माओवाद सबसे बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार-बार कह रहे हैं कि माओवाद सबसे बड़ा खतरा है। मीडिया इस उक्ति को दिशा निर्देश मानकर माओवाद पर हमला करता चला जा रहा है।
      इस प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि मैं माओवादियों के हिंसाचार के खिलाफ हूँ। हिंसा को किसी भी तर्क के आधार पर वैध नहीं बनाया जा सकता। हिंसा स्वभावतः अवैध है। हिंसा के तर्क असामाजिक और अवर्गीय हैं। हमें हिंसा पर बात करते समय दो स्तरों पर सोचना होगा। पहला दीर्घकालिक स्तर है और दूसरा अल्पकालिक स्तर है।
   प्रधानमंत्री स्वयं अर्थशास्त्री हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि आखिरकार हिंसा की जड़ में माओवादी नहीं हैं बल्कि खानें हैं। खानों का पूंजीपतिय़ों के लिए दोहन किया जा रहा है। इस दोहन से ध्यान हटाने के लिए वे माओवाद का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं। माओवाद का हल्ला उनकी ध्यान हटाने की टेकनीक का हिस्सा है।
    दूसरी मबत्वपूर्ण बात यह कि माओवादी हिंसा वगैर केन्द्र के हस्तक्षेप के,पुलिस ऑपरेशन के बिना तत्काल बंद हो सकती है बशर्ते खानों का उत्खनन तत्काल बंद कर दिया जाए। खानों के उत्खनन को जारी रखने के कारण हिंसा हो रही है। माओवाद या आदिवासियों के कारण हिंसा नहीं हो रही।
   आदिवासियों को खानों को देशी-विदेशी कंपनियों को बेचते समय विस्थापन और पुनर्वास के काम को प्राथमिकता में सबसे नीचे रखा गया है। वरना यह कैसे हो सकता है कि आदिवासी इलाकों में 60 सालों की आजादी के बाद भी बिजली,पानी,रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं पहुँची हैं। अगर खानों के इलाकों में वैकल्पिक संरचनाओं का समय रहते निर्माण कर दिया गया होता तो आज माओवादी हिंसा का हौव्वा खड़ा करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। विभिन्न किस्म के विस्थापनों के कारण 4 करोड़ से ज्यादा लोग आदिवासी इलाकों से पिछले 60 सालों में विस्थापित हुए हैं। इनका पुनर्वास करने में सरकार अभी तक कामयाब नहीं हुई है।
        माओवादी हिंसा के पक्ष में हो सकता जेनुइन तर्क हों,लेकिन माओवादी हिंसा अंततःबड़ी पूंजी की सेवा कर रही है। मसलन माओवादी हिंसाचार से आदिवासियों के इलाकों के विकास का प्रश्न केन्द्रीय सवाल नहीं बन पाया है बल्कि माओवादियों से इलाके को मुक्त कराने का लक्ष्य प्रमुख हो गया है।
     अब इन इलाकों में शांति नहीं है। जाहिरा तौर पर सवाल किया जाएगा कि आपको शांति चाहिए या स्कूल, तो एक ही जबाब होगा शांति चाहिए। शांति स्थापित करने के सरकारी अभियान के पीछे इस तरह साधारण जनता को गोलबंद किया जा रहा है और जनता की संपदा के शोषण,खानों के शोषण को छिपाया जा रहा है। यही वह बिंदु है जहां से प्रच्छन्नतःमाओवादी संगठन कारपोरेट घरानों की सेवा करने लगते हैं।
      पुलिस ऑपरेशन के नाम पर पूंजीपतिवर्ग को खानों के इलाकों और उनसे आने-जाने वाले मार्गों पर पूरी सुरक्षा मिल जाती है। सरकार के लिए सीधे पूंजीपतिवर्ग के लिए लूट के लिए सुरक्षा देने में असुविधा होती है क्योंकि लोकतंत्र में जनता की नजरों में गिर जाने का खतरा रहता है और जनता की नजरों में गिरने से बचने का मार्ग है माओवादी हिंसा का अहर्निश प्रचार और मदद।
   माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि उनके हिंसाचार से खानों का उत्खनन और आदिवासियों का विस्थापन बंद होने वाला नहीं है। वे यह भी जानते हैं कि उनकी प्रतिवादी कार्रवाई का पूंजीपतिवर्ग को लाभ मिलेगा। खानों के इलाकों में पूंजीपतिवर्ग और उनके गुर्गों की तूती बोलने लगेगी। माओवादी हिंसा इसी अर्थ में कारपोरेट घरानों की सेवा करती है।
     कारपोरेट घरानों के साथ माओवादियों का याराना है,उन्हें खानों के मालिकों से चौथ मिलती है,मंथली पैसा मिलता है, माओवादी हिंसा के कारण बाजार बंद रहते हैं,ट्रेन बंद रहती हैं,सरकारी ऑफिस बंद रहते हैं लेकिन खानों का उत्पादन बंद नहीं होता। झारखंड की प्रत्येक खान से माओवादियों को 10-25 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है। यह बात स्वयं सीबीआई के छापों में मधुकौड़ा के यहां मिले दस्तावेजों से सामने आई है। अकेला मधुकौड़ा की खानों से सालाना 125 करोड़ रूपयों चौथ माओवादियों को मिलती है।  ऐसे ही छापे यदि अन्य खानों के मालिकों के यहां भी ड़ाले जाएं तो माओवादियों और खान मालिकों के बीच का अन्तस्संबंध आसानी से उजागर हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि माओवादियों और मनमोहन सिंह का साझा लक्ष्य एक है कि किस तरह खान मालिकों की कैसे मदद की जाए। दोनों बंदूक की नली के सहारे खान मालिकों की सेवा कर रहे हैं। माओवाद के उन्मूलन के नाम पर सरकारी स्वांग चल रहा है उसके लक्ष्य है खानों के अबाध शोषण को जारी रखना और आदिवासियों को विस्थापित और पिछड़ा रखना।                  
             

23.7.08

करात और आडवाणी को तमाचा, राजनैतिक नेतृत्व का सफल इम्तिहान.

विजयी मुस्कान।

कल का दिन भले ही लोकसभा में उथल पुथल भरा रहा, आरोप और प्रत्यारोप के साथ संसद की गरिमा भी तार तार हुई, मगर इन सभी के आदि हो चुके नेता और जनता के लिए लिये ये बात एक घटना से अधिक ना थी । कुछ नया और अदभुत था तो वो हमारे प्रधान मंत्री का करिश्मा.
बेहद नाटकीय घटना क्रम में डाकटर मनमोहन सिंह ने जिस कुशलता और राजनैतिक कौशल से अपने नेतृत्व गुण का लोहा मनवाया ने सच में बहुतों बडे दिग्गजों ओर धाकडों के होश उडा दिये होंगे। सबसे बडा ओर जोरदार तमाचा तो आडवानी के साथ तमाम विपक्षी के गाल पर कि एक छोटा सा दिखने वाला अदना सा मैडम के साये के साथ चलने वाला एक कुशल राजनेता कैसे हो गया। भाइयों वो कहावत है कि गुरु गुड ओर चेला चिन्नी। पुर्व प्रधानमंत्री श्री पी वी नरसिम्हा राव के चेले ने साबित कर दिखाया कि वो सिर्फ़ एक अर्थसाश्त्री ही नही वरन आज के दौर का कुशल राजनेता बन चुका है। हथकन्डों के साथ संसद में पहुंचे सांसदों के सारे हथकन्डे धरे के धरे रह गये ओर छोटा सरदार सब पर भारी पडा।

आडवाणी जी गाल सहला रहे होंगे ओर करात की साढे चार साल की चिख चिख सौदेबाजी का भी अन्त। खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे, आज के लोन्डे नेता ओर सांसद बडे दादा को राजनीति का पाठ दे रहें हैं।

वाह रे भारत, वाह रे भारतीय राजनीति ओर वाह रे हमारे देश के कर्णधार नेता।

जय जय भडास