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11.7.09

‘कविता द्रव्य होती है, जो स्वतः बह निकलती है’


(त्रिलोचन शास्त्री से पहली और आखिरी मुलाकात)
श्रीराजेश
आज सुबह बिजली फिर गुल हो गयी, रोजाना की तरह, और नींद जल्दी खुल गयी, काम कुछ था नहीं. होता भी कैसे ? दिल्ली या नोएडा आये अभी खींच-तान कर डेढ माह बीते हैं, सोचा कि बैग का सामान अव्यवस्थित हो गया है, सहेज दूं. इसी क्रम में मुझे बाबा (त्रिलोचन शास्त्री) की मैं तुम्हें सौंपता हूं काव्य संग्रह दिख गया, जिसे मैंने कोलकाता से दिल्ली के सफर के दौरान पढ़ने के लिए अपने मित्र से ले कर आया था. संग्रह दिखते ही वह दिन मुझे याद आ गया, जब पहली और आखिरी बार मैं बाबा से मिला था. उस समय मुझे ये अंदाजा नहीं था कि बाबा से ये मुलाकात बार-बार याद करने लायक है. उन्हें मैं बाबा कहता हूं. यह संबोधन खुद उन्हीं द्वारा दिया हुआ है.
बात 1994-95 की रहीं होगी. कोलकाता में मैं जनसत्ता में स्ट्रीगरी की जुगाड़ में था. उस समय वहां के समाचार संपादक अमित प्रकाश सिंह हुआ करते थे. जब जनसत्ता कायार्लय पहुंचता तो अमित जी कवि सम्मेलन, विचार गोष्ठी, किसी राजनीतिक दल के धरना-प्रदर्शन को कवर करने का इसानमेंट दे देते और मेरा दिल बाग-बाग हो जाता. इसी तरह कोलकाता में गैर सरकारी स्कूलों की बढ़ती संख्या पर उन्होंने मुझे एक फीचर तैयार करने को कहा, साथ ही चीफ रिपोर्टर गंगा प्रसाद जी (अभी पटना में है) से इससे संबंधित विंदु लिखवा लेने का निर्देश दिया. गंगा जी के टेबल पर जनसत्ता के उस दिन का अंक पड़ा था और उसमें त्रिलोचन शास्त्री के कोलकाता आने की खबर छपी थी. इसके पहले कवि गोष्ठियों को कवर करते मैं सतही तौर पर त्रिलोचन और नागार्जुन दोनों बड़े कवियों के विषय में बहुत कुछ सुन रखा था. खबर पर नजर पड़ते ही मैंने गंगा जी से कहा कि त्रिलोचन जी के कार्यक्रम को कवर करने का इसानमेंट मुझे ही दिजिएगा. गंगा जी हंस दिये और कहा कि अमित जी तुम्हें कार्यक्रम देते हैं, उनसे ही ले लेना. मैं उनके पास से अमित जी के पास पहुंचा और वहीं बात कही. तो टालते हुए कहे कि अभी उनके आने में तो देर है, आयेंगे तो देखा जायेगा. बात आयी-गयी हो गयी. त्रिलोचन कोलकाता आये, कई गोष्ठियों में उन्होंने शिरकत की. जनसत्ता में सभी की खबरें भी छपी लेकिन मुझे किसी कार्यक्रम को कवर करने का मौका नहीं मिला. इससे अमित जी के प्रति थोड़ी खींज भी थी. लगभग एक सप्ताह बीते होंगे अमित जी ने मारवाड़ी समुदाय के एक हास्य कवि सम्मेलन की रिपोर्टिंग करने के लिए कहा. अब मेरी खींज और बढ़ गयी और मैंने बगैर सोचे समझे तन से कह दिया कि जितने घटिया कार्यक्रम होते हैं वहीं आप मुझे थमा देते हैं, त्रिलोचन शास्त्री वाली कवि गोष्ठी का इसानमेंट मांगा था तो आपने दिया ही नहीं. भले ही मैं उसकी खबरे ठीक ढंग से नहीं लिख पाता लेकिन जो सीनियर गये थे, उनके साथ ही मुझे भेज देते तो कम से कम मैं उनसे मिल लेता या उन्हें देख लेता. इस पर कोई टिप्पणी करने के बजाय उन्होंने कहा कि अच्छा अब जाओ और अपना काम करो, दिमाग मत खाओ. मैं आ कर अपनी खबरें लिखने लगा. रात के साढ़े नौ के करीब बजे होंगे. घर लौटने की तैयारी कर रहा था. तभी अरविंद (चपरासी) आया और कहा कि अमित जी बुला रहे हैं. मैंने सोचा कल के लिए कुछ निर्देश मिलने वाले होंगे. गया तो उन्होंने बड़े प्यार से बैठाया और पूछा – आखिर तुम क्यों त्रिलोचन जी से मिलना चाहते हो ? मैंने कहा- वे बड़े कवि हैं, स्वाभाविक है कि उनसे मिलने की इच्छा होगी ही. वे हंसने लगे और कहा कि कल तुम्हारा कोई भी इसानमेंट दोपहर दो बजे के बाद ही है, सुबह उनसे जा कर मिल लेना, पता लिख लो. उन्होंने दक्षिण कोलकाता के टालीगंज के रानीकुटी का एक पता लिखा दिया. मैं चला आया.
सियालदह रेलवे स्टेशन पहुंचा तो हमारे कई मित्र पूर्व निर्धारित समय के अनुसार वहां मौजूद थे. इसमें प्रकाश, संजय जायसवाल, और अर्जून सिंह थे. लोकल ट्रेन में बैठे तय हुआ कि प्रकाश भी सुबह मेरे साथ त्रिलोचन जी से मिलने चलेगा. वह अच्छी कविताएं उस समय भी लिखता था, और अब तो लिखता ही है. वह मेरा लंगोटिया मित्र है. अभी वह आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान की गवेषणा पत्रिका में बतौर सह संपादक कार्यरत है.
अगले दिन प्रकाश मेरे घर अपनी कुछ कविताओं के साथ चलने की तैयारी में आया और साथ हम भी अपनी कविताओं की डायरी लिए चल पड़े. निर्धारित पते पर पहुंचे, कालबेल बजाया, एक महिला निकलीं, हमने अपना आशय बताया. उन्होंने बैठकखाने में बैठा दिया. वहां टेबल पर कई हिंदी –अंग्रेजी के अखबार और कई साहित्यिक पत्रिकाएं रखी थीं. हम दोनों उन पत्रिकाओं को पलटना शुरू किया. ये वैसी पत्रिकाएं थी, जिनका नाम सुना था लेकिन इनमें से कई पत्रिकाओं का कोई अंक देखा नहीं था.तभी वह भद्र महिला बैठकखाने में आयीं और पानी दे कर एक ओर संकेत करते हुए कहा – त्रिलोचन जी उस कमरे में है. वहीं चले जायें.
हमने एक सांस में गिलास का पानी खत्म किया और हिचकते हुए कमरे की ओर बढ़े और दरवाजे पर जा कर टिकक गये. भीतर बढ़ी दाढ़ी, विखरे बाल, आसमानी रंग की लुंगी, हां लुंगी ही थी. पीले रंग की कमीज पहने एक वृद्ध पलंग पर लेटे थे. अखबारों में छपी तस्वीरों को देखा ही था, सो तुरंत पहचान गया, यहीं हैं त्रिलोचन. हम दोनों ने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ प्रणाम किया. प्रणाम की आवाज सुन, उठते हुए उन्होंने हम दोनों को आशीष भी दिया और सामने रखी कुर्सी पर बैठने का संकेत किया. कुर्सी एक ही थी, जिस पर मैं बैठ गया और प्रकाश उनके पलंग पर पायताने बैठा बाबा ने बारी-बारी से नाम पूछा. वह धीरे-धीरे हमारी पढ़ाई लिखाई के साथ घर परिवार के विषय में भी बातें करने लगे और महज दस मिनट बीते होंगे कि उनके बातचीत करने के अंदाज से हमारी सारी हिचकिचाहटें दूर हो गईं और हम दोनों सामान्य हो गये. वहीं एक आलमारी में कई सम्मान पत्र, रखे हुए थे. उन्ही में से एक पर उनकी जन्मतिथि 20 अगस्त 1977 अंकित था. जबकि उनकी जन्मतिथि 20 अगस्त 1917 है. हमने कहा- बाबा इस पर तो आपकी जन्मतिथि 1977 है ? तो उन्होंने तपाक से हंसते हुए कहा- मैं क्या तुमलोगों से ज्यादा उम्र का दिखता हूं ? हमलोग कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे. इसके बाद उन्होंने बताया कि गलती से वहां 1917 की जगह 1977 अंकित हो गया है. और वे इस तरह की गलतियों की पूरी फेहरिस्त सुनाने लगे. हम उनके संस्मरण को बड़ी उत्कंठा से सुनते रहे. तभी प्रकाश ने पूछा कि बाबा, सानेट आप लिखते है और हम लोग सानेट के विषय में सुने तो हैं लेकिन जानते नहीं, यहां तक कि आपकी लिखी सानेट भी नहीं पढ़ी है. बाबा ने तुरंत एक पुरानी पत्रिका प्रकाश को थमा दी. इसमें उनके कुछ सानेट थे और इसके बाद वह सानेट के विषय में विस्तार से बताने लगे.इसके बाद बारी-बारी से हमने अपनी कविताएं भी उन्हें सुनाई. और हमारी नादानी भरी कविताएं बड़ी चांव से सुनते रहे. जब दोनों कि कविताएं खत्म हो गयी. तो उन्होंने कहा – अच्छा लिखते हो, लेकिन पहले साहित्यिक पत्रिकाए पढ़ो. फिर लिखो. कविता द्रव्य होती है, जो स्वतः मन से बह निकलती है. उनके यह शब्द अब भी जेहन में वैसे ही बरकरार है. हम दोनों साहित्य के दंतहीन शावक थे लेकिन यह उनकी सहजता ही थी कि वे हम दोनों से इस तरह बातें कर रहे थे जैसे हम सही मायने में साहित्य के अनुरागी हो. सच तो यह है कि जब वे सानेट के विषय में बताते हुए उस मुद्दे से भटक कर अंग्रेजी साहित्य के विषय में बोलने लगे और अंग्रेजी के कवियों का नाम लेते थे तो उनकी आधी बातें हमरी समझ में हीं नहीं आयी. हालांकि वे बार बार पूछते यह सुना है- उनकी हर बात में हां में सर हिला देते. लेकिन वह ताड़ जाते कि हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ा. उनके पास बैठे तकरीबन एक घंटा हो चुका था. उन्होंने पूछा – कुछ खाओगे ? सुबह जल्दी ही निकल गये थे. खाया कुछ नहीं था. भूख लगी ही थी. हां में सर फिर हिला दिया. वह उठे अंदर गये और एक प्लेट में पहवा ले कर आये. प्लेट में चम्मच नहीं था. पास पड़े अखबार के एक टूकड़े को उन्होंने चम्मच बना कर हमें पकड़ा दिया. हम पहवा खाते रहे और वे साहित्य के विषय में अमृतवर्षा करते रहे, हम भींगे भी लेकिन इसका असर अंदर तक नहीं हुआ. पहवां खतम हुआ तो हम चलने को तैयार हुए. उन्होंने ढ़ेर सारी पत्र-पत्रिकाएं पहली मुलाकात का उपहार स्वरूप दिया और अंत में पूछा कि कैसे आये यहां ? तब हमने बताया कि जनसत्ता के अमित जी ने यहां का पता दिया था. वह हंसने लगे. हम समझ नहीं सके और उनका आशीष ले हम लौट गये.
शाम को दफ्तर पहुंचा तो अमित जी ने देखते ही पूछा – गये थे ?
मैंने कहा – जी.
क्या-क्या बातें हुई?
मैंने वह सब बताना शुरू किया, तभी संपादक जी ने उन्हें अपनी केबिन में बुला लिया और मैं गंगाजी के पास चला गया. मैं त्रिलोचन जी से मिल कर अति प्रसन्न था, चेहरे पर प्रसन्नता के भाव दिख रहे थे, सो गंगा जी बोले – क्या हिरो, क्या हाल है ? मैंने उन्हें भी बताया कि कहां से आ रहा हूं. जब वे सुन लिये तो बोले कि अमित जी तुम लोगों कुछ खिलाया या पानी पिला कर ही टरका दिया. मैंने कहा कि हम अमित जी के यहां थोड़े गये थे, त्रिलोचन जी से मिलने गये थे. वह अपने किसी संबंधी के यहां रानीकुटिर में ठहरे है. गंगा जी हंसने लगे और कहा- अमित जी के पिता है त्रिलोचन शास्त्री और तुम जहां से मिल कर आ रहे हो वह अमित जी का ही घर है, हम यह सुन कर आश्चर्यचकित हुए बगैर नहीं रहे और मेरी नजर में त्रिलोचन जी के साथ अमित जी भी महान हो गये.

6.11.08

कार में बैठा हुआ, पैदल सफर करता रहा....

कल बहुत दिनों बाद अपने मेरठी मित्र विजेंद्र सिंह परवाज से मुलाकात हुई। अंग्रेजी के लेक्चरर पद से रिटायर होने के बाद परवाज साहब की असली जिंदगी शुरू हुई है। वे उम्दा शायर हैं, लड़ाकू शख्सीयत है, क्रांतिकारी व्यक्तित्व है, आध्यात्मिक मन है, मोरारी बापू के अनन्य भक्त हैं, औघड़ों का तन है, फकीरी रास आती है। भड़ास ब्लाग पर परवाज साहब को न सिर्फ पेश कर रहा हूं बल्कि उन्हें उनके मिजाज को देखते हुए परम भड़ासी की उपाधि भी देता हूं। परवाज साहब भड़ास से जुड़ चुके हैं और वे इसके सक्रिय सदस्य बनने की तैयारी कर रहे हैं। लीजिए, उनके कुछ लिखने से पहले मैं उनके लिखे कुछ शेर पेश करता हूं। मुझे यकीं है आपको पसंद आएगा....यशवंत

जब अमीरी में मुझे गुरबत के दिन याद आ गए

कार में बैठा हुआ पैदल सफर करता रहा।

जिस्म पर कपड़ा नहीं तो अपनी आंखें मूंद ले

कम से कम तुझसे तो तेरा तन छुपा रह जाएगा।

जरा सी बात की खातिर जमीर क्यों बेचें

जरूरतों का सफर सिर्फ जिंदगी तक है।

उम्र भर मेरी शराफत ने खड़ा पहरा दिया

तब कहीं ईमान की दौलत बचा पाया हूं मैं।

बिक गया बाजार में दोपहर तक एक एक झूठ

शात तक बैठे रहे हम अपनी सच्चाई लिए।

अपनी खराबियों को छुपाना पड़े मुझे

भूले से जब किसी ने समझदार कह दिया।

आप दुनिया को बदल डालेंगे, धीरे बोलिए

हौसले की बात कहना बुजदिली है आजकल।

न यूं उठा था धुआं आसमान से पहले

डरा हुआ है परिंदा उड़ान से पहले।

वो मेरे जनाजे में शामिल नहीं है

उसे जिंदगी से कुछ उम्मीद होगी।

दामन पे दाग आए न आए मेरा नसीब

कीचड़ उछालकर तेरी हसरत निकल गई।

आप फूंकों से बुझाने की न कोशिश कीजिए

इन चरागों का सफर तो आंधियों तक जाएगा।

आगे निकल गए हैं मेरे हमसफर तमाम

कांटा निकालने में बहुत देर हो गई।

तलवार पे जाहिर नहीं इक बूंद लहू की

शायद वो मेरे जिस्म के साए से लड़ा है।

...........ऐसा लिखते हैं अपने परवाज साहब।

किसान परिवार के परवाज साहब प्रचार से हमेशा दूर रहे। इसके चलते उनके लिखे को वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं। परवाज साहब बेहद यारबाज आदमी हैं। जिसको दिल दिया फिर उसी के हो गए। जिसको अपनाया तो कभी छोड़ा नहीं। दोस्त कम बनाए लेकिन चुनकर बनाए। दुश्मनों की कभी परवाह नहीं की। परवाज साहब में गजब की विविधता है। उनके शेर में रेंज बहुत है। अध्यात्म से लेकर राजनीति तक, हर विषय पर उन्होंने गजब की लाइनें कहीं हैं।

भड़ास इस देसी और भदेस शायर को उसका सम्मान दिलाने के लिए कृत संकल्पित है। पहले चरण में परवाज साहब को भड़ास ब्लाग से जोड़ा जा रहा है। दूसरे चरण में उनके शेर को नियमित तौर पर यहां प्रकाशित किया जाएगा। तीसरे चरण में उनका एकल काव्य पाठ का प्रोग्राम दिल्ली में आयोजित कराया जाएगा।

कल परवाज साहब दिल्ली में थे। ढाई साल बाद मैं उनसे कल मिला। जब उनका फोन आया तो मैं उन्हें तीसरा स्वाधीनता आंदोलन द्वारा दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्टान में आयोजित राष्ट्रीय विमर्श में बुला लिया। वहां रजनीश के झा समेत कई भड़ासी साथी थे। परवाज साहब ने विमर्श में अपने शेर व अपनी बातों से सबको मुग्ध कर दिया। प्रोग्राम के बाद रजनीश झा और मैंने अलग से परवाज साहब को सुना। वहां से चलने को हुए तो दारू का एक अद्धा लिया गया और कार में ही पीते पिलाते खाते रात 10 बजे तक यहां वहां घूमते रहे, उनको सुनते रहे, उनसे दिल का साझा करते रहे। रात में वे मेरे घर पर ही रुके। पिछले ढाई साल में उन्होंने जो जो नई किताबें लिखीं, उसकी एक प्रति भेंट की। उम्मीद है परवाज साहब से अब नियमित तौर पर हम सभी का संपर्क बना रहेगा।

भड़ास पर परवाज साहब का मैं दिल से स्वागत करता हूं।

जय भड़ास

यशवंत

7.7.08

पंडित सुरेश नीरव को पहली बार सुनने का मौका मिला

नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्टान में आयोजित काव्य गोष्टी में मंच संचालन करते अरविंद पथिक, आशीर्वाद देते पंडित सुरेश नीरव, मंचासीन पीएन सिंह और यशवंत सिंह।

भड़ासियों को काव्य गोष्ठी का न्योता पं. रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के महासचिव अरविंद पथिक की ओर से काफी पहले मिल चुका था। रविवार शाम छह बजे से शुरू हुई काव्य गोष्टी साढ़े आठ बजे तक चली और उसके बाद भोजन का दौर चला। लगभग दर्जन भर कवियों ने अपनी रचनाओं के जरिए खचाखच भरे हाल के श्रोताओं को भाव विभोर किया। पंडित सुरेश नीरव ने पर्यावरण जैसे मुद्दे पर अपनी कविता के जरिए काफी वाहवाही लूटी। इसके अलावा श्लोक अधर...वाली अपनी मशहूर कविता का गायन कर जमकर तालियां लूटीं। मेरे लिए खास यह रहा कि बहुत दिनों बाद किसी काव्य गोष्ठी का हिस्सा बना और इस मौके पर क्रांतिकारी कविताओं की काकटेल को मंच से सुनाया। इस काव्य गोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट अरविंद पथिक जी भड़ास पर डालेंगे पर मैं यहां इतना जरूर कहना चाहूंगा कि रविवार की यह शाम कई मायनों में मेरे लिए काफी फायदेमंद रहे। भड़ास संचालन समिति के सदस्य रजनीश के झा मुंबई से बिहार गए हुए थे और वापसी में दिल्ली आए तो उनसे भी प्रथम मुलाकात का मौका यह कवि सम्मेलन ही बना। कविवर भगवान सिंह हंस के जन्मदिन के मौके पर आयोजित इस कवि सम्मेलन में मेरे मित्र गोपाल राय, अमित द्विवेदी, मनीष राज आदि भी पहुंचे। यहां भारतीयम ब्लाग वाले अरविंद चुतर्वेदी जी से भी मुलाकात हुई। साथ ही प्रवासी संसार मैग्जीन के संपादक राकेश पांडेय जी से परिचय हुआ। ऐसे ढेरों नाम हैं जिनसे पहली दफा मुलाकात का मौका मिला। पंडित सुरेश नीरव को पहली बार मंच से कविता पढ़ते गाते सुनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। कई बड़े कवि भोपाल से पधारे, उन्हें भी सुनने का मौका मिला।

फिलहाल इसे प्राथमिक रिपोर्ट समझा जाए। विस्तृत रिपोर्ट के लिए हम अरविंद पथिक जी के पोस्ट का इंतजार करेंगे।
जय भड़ास
यशवंत

4.3.08

गीतकार रमेश रमनः गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला.....

((पिछले दिनों हरिद्वार यात्रा पर था तो कई पोस्टों के जरिए कई कई अनुभवों, मिलाकातों, भ्रमण आदि के बारे में बताया था। पर एक चीज छूट गई थी जो शायद सबसे कोमल चीज है। हरिद्वार के बसे और देश भर में मशहूर गीतकार रमेश रमन से मुलाकात। डा. अजीत तोमर के सौजन्य से जब रमेश रमन जी से मिलने उनके आफिस पहुंचे तो उस वक्त आफिस बंद होने का समय हो चला था। ढलती हुई शाम के वक्त रमन जी के आफिस में हो शुरुवाती परिचय होने के बाद जो स्वर लहरियां फूटीं तो रुकने थमने का नाम ही नहीं लेतीं। मुझसे रहा नहीं गया, कागज कलम उठाकर तुरंत नोट करने लगा। शब्द जितने अच्छे, स्वर उतना ही उत्तम। ये संयोग, ये मेल बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। अगर संक्षेप में कहूं कि मेरी हरिद्वार यात्रा का सबसे कोमल पक्ष व सबसे संवेदनशील पक्ष कोई रहा है तो वो रमेश रमन जी से मुलाकात ही है। देर से ही सही, मैं रमन जी द्वारा लिखित कई गीतों, कविताओं को यहां नीचे भड़ासियों के लिए डाल रहा हूं। मैं तो इन सभी को उनके कोमल कंठ से मय राग के सुन आया हूं इसलिए मैं तो इन लाइनों के पिछे छिपे धुन व संगीत को भी महसूस कर पा रहा हूं व बैठे बैठे गुनगुना भी रहा हूं। आप लोग फिलहाल पढ़िए, कभी मौका मिला तो भड़ास सम्मेलन के दौरान रमन जी को बुलाया जाएगा...जय भड़ास, यशवंत))

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1.
तू अगर पुरवाई है तो

तू अगर पुरवाई है तो बादलों के साथ आ
प्यास धरती की बुझा, ये पेड़ पौधे मत हिला

खेत की क्यारी है सूखी, आ जरा यहां घूम जा
भीगे भीगे होठों से तू, क्यारी क्यारी चूम जा
झरनों को दो जिंदगी, कुछ नदी का कर भला
तू अगर पुरवाई है तो...............

धूल धरती की उड़ा मत, देख फूलों को सता मत
दर्द सोये तू जगा मत, प्यास को पागल बना मत
गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला
तू अगर पुरवाई है तो...............

प्यास की तू अंजुली भर, कुछ दान कर कुछ पुण्य कर
आके पेड़ों को नहला जा, कर कृपा इन फूलों पर
परियों की तरह उतरकर, परिंदों को झुला झूला
दू अगर पुरवाई है तो................


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2.
बिन आहट के आ जाते हो


बिन आहट के आ जाते हो
आंखों को नहला जाते हो
बहुत सताते हो पलकों को
सांसों को उलझा जाते हो
बिन आहट के......

सागर के पानी से खारे
कैसे कह दें तुम हो हमारे
कितने राज छुपा जाते हो
अंदर कुछ पिघला जाते हो
बिन आहट के .....


तुम ममता की गोद पले हो
तुम यादों के बहुत सगे हो
कितने दर्द जगा जाते हो
दिल को बहुत दुखा जाते हो
बिन आहट के ......

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3.
आम कट गया


आम कट गया
शीशम ने तो देखकर
आंखें फेर लीं
पीपल ने पूजा का
बहाना बनाकर
मौन धारण किया
बरगद को अपने बुढ़ापे
का खयाल आया
कुछ नहीं बोला
और......
आम कट गया

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4.
अस्तित्व की कविता सुनें

आओ कभी किसी वृक्ष से अस्तित्व की कविता सुनें
या फिर कभी किसी फूल से व्यक्तित्व की कविता सुनें
जीना का दर्शन सरल मिल जायेगा निश्चित है ये
आओ कभी किसी दीप से अपनत्व की कविता सुनें

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5.
तुम्हारा मेरा साथ



तुम्हारे पास अर्थ बहुत है
मेरे पास शब्द बहुत हैं
आओ, थोड़ी दूर तक चलें
शब्दार्थ बनकर
जीवन के भावार्थ से मिलने
विश्वास रखना
तु्म्हारे अर्थ का अनर्थ नहीं होने दूंगा
तुम्हें भी ध्यान रखना होगा
कि मेरा कोई भी शब्द
अपशब्द की संज्ञा न पा जाए

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उपरोक्त सभी गीत व कविताएं गीतकार रमेश रमन द्वारा रचित हैं। आप रमन जी से उनके निवास के फोन 01334-220749 और कार्यालय के फोन 01334-227904 पर फोन कर संपर्क कर सकते हैं।