पाक पर हुए हमले दरअसल उसी का सेल्फ अटेक प्रोगराम है वैसे भी उसे अपने फौजी या दूसरे लोगों की चिंता तो है नहीं जो वो इतना घिनौना काम नहीं करेगा हो सकता है ये बात भारत के कुछ सोकाल्ड सेकुलरों के गले ना उतरे मगर इसमें कोई संदेह भी नहीं कि पाक का पेशावर में हुआ हमला कोई आतंकी हमला नहीं बल्की सेल्फ प्रोमोटेड अटेक है जो उसने विश्व विरादरी को झांसा देने के लिए किया है। भारत देश अजूबा यूँ ही नहीं है यहां के लोग खास कर वो सेकुलर्स सबसे ज़्यादा मेरी इस बात से नाराज़ होंगे जो सेकुलर का नारा लगाते-लगाते कब शरहदे पार कर पाक फरस्ती करने लगते हैं पता भी नहीं चलता क्योंकि वे अपने आप को इतना बड़ा सेकुलर मानते हैं कि देश दुनिया में एक ही सच है वो है सेकुलर जो वे अनुसरण करते हैं। खैर मेरा मक़सद इस पचड़े में पड़ कर मुख्य बात से आपको भटकाना नहीं है मूल बात है पाक के इस घिनौने कृत्य की तरफ आपका ध्यान आकर्षित कराना। दरअसल आने वाले समय में ऐंसी आवाज़ें उठेंगी कि मुम्बई में पाक का हाथ बता कर भारत सरकार ने सुधरते रिश्तों को दांव पर लगा दिया है ये वही लोग कहेंगे जो इस देश के भीतर सेकुलर कहलाते हैं मतलव साफ है कौन पूछा नहीं जाना चाहिये।.....पाक की इस हरक़त पे किसी को अगर एतराज़ हो तो वह सीधे अपनी आपत्ती लगा सकता है आखिर ये देश धर्मनिरपेक्ष जो है। हाँ भई मैं आप ही से कह रहा हूँ...जी हाँ लगा सकते हो आपत्ती पाक की बुराई करने का मतलव यहाँ के मुस्लिमों की बुराई जो है।..........ऐंसा कोई कार सेवक ,बजरंगी,संघी,शिवसैनिक, या अभिनव भारत का आदमी नहीं मानता बल्की ये सोकाल्ड सेकुलरिस्ट ही ऐंसा सोचते और मुस्लिम भाइयों को भी ऐंसा सोचने मानने को उलूल-जुलूल तर्क देते रहते हैं, जो यहाँ के अल्प शिक्षित अल्पसंख्यकों के मन में घर कर जाते हैं। भारत की हर समस्या का समाधान यहाँ के कमतादादियों के पास है।
7.12.08
27.11.08
ये लो फिर फटे हम
और लो ये हुए फिर श्रृंखलाबद्ध विस्फोट अब तो कुछ होना ही चाहिये ग़ौर कीजिये इसमें शहीद होने वाले एटीएस के करकरे जी हैं जो साध्वी को अनावश्यक परेशान कर रहे थे। इस विषय पर एक स्वस्थ बहस के लिए मैं आप सभी से निवेदन करता हूँ। कृपया समाधान परक बहस करें सादर आयें।
जय भारत
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29.10.08
क्या हमारे भारतीयता त्यागने का समय आ गया ?
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12.10.08
पडताल धर्म की
पहले धर्म को समझें।
दोस्तों पिछले कुछ दिनों से केव्स पर गरमा गरम पढने को मिल रहा था हालांकि बहस अपनी सार्थकता खो चुकी थी कमेंन्ट्स कर नहीं पा रहा था, तो मन किया कुछ मैं भी लिखूं और आज चला आया कुछ लिखने सबसे पहले मयंक का बहुत धन्यवाद मुझे जोडने के लिये। सचमुच धर्म से जुडा मुद्दा वेहद संजीदा क़िस्म का होता है जिस पर हम जैसे कम बुद्धियों को तो क़तई नही बोलना चाहिये क्योंकि कोई भी धर्म महज़ अपने आराध्य को पूजने, आरती करने तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि यह एक वृहद विज्ञान होता है। इसे धर्म इसलिये कहा जाता है ताकि अनुयायी निर्दिष्ट पूजन विधान को करें और स्वस्थ रह सकें। इंसान के भीतर विद्यमान सभी दस रसों में से भय का हमारे ऋषियों(वैज्ञानिकों) ने इस्तेमाल करते हुए इसे सर्वोच्च सत्ता के प्रति भय और उसे अपना माई-बाप मानने की सीख दी, क्योंकि विज्ञान हर आदमी नहीं समझता। मुझे शायद धर्म की इससे ज़्यादा सरल परिभाषा कुछ और नहीं लगी मैं इस मंच के माध्यम से सबसे पहले धर्म क्या है ये समझने की कोशिश करना चाहता हूँ। आप सभी का सादर कमेंट्स आमंत्रित हैं कृपया दें और कारवां ये वार्ता आगे बढायें। धन्यवाद।।।।।।।।।।
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7.10.08
छद्म धर्मात्मा
प्रिय तंज़ीर के लिये खास
प्रिय मित्र आप बिल्कुल सच कह रहे हैं एक धर्म जो चंद छद्म धर्मवादियों से डरा हुआ है वह क्या देश दुनिया की बात करते हैं। इतना साहसी वक्तव्य दोस्त आपसे लोग ही दे सकते हैं उम्मीद है, अपना वेधडकपन बनाये रखेंगे और ग़लत को कभी सही ना कहेंगे। आज जिस तरह आपका सद्विचार सनातन के लिये मुखर हुआ है मित्र ऐंसा ही ज्ञान का दीप उन फिरका परस्तों और तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों समेत पोंगा पंडितों कठमुल्लों को भी ज़रूर देंगे। आपसे बडी उम्मीद है मुस्लिम समाज को अंधकूप से बाहर निकालने में सहयोगी बनेंगे। बडी ज़रूरत है,किसी नये चश्में से दुनिया को देखने की अन्यथा मत लीजिये ग़ैरमुस्लिम ये साहस करेगा तो वो दुस्साहस कहलायेगा कमियाँ सबमें होती हैं इन्सान वही है तो नया कहाँ से लायेगा। स्पष्टवादिता सिर्फ दीगर मान्यता की आलोचना का नाम नहीं बल्कि समान्तर आलोचना होनी चाहिये। आज के इस नाजुक दौर से ग़ुजर रहे इस्लाम को आपसे प्रगतिवादी युवकों की निहायत ज़रूरत है। बडी उम्मीद है ऐसे नैज़बानों से मुझे। हम सब मिल कर शायद कोई अच्छी पहल कर सकें जो कल बतौर मिशाल पेश हो। स्वागत है इस वाक्युद्ध में आपका।।।।।। धन्यवाद्
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6.10.08
राष्ट्रधर्म या स्वधर्म.....
हमारे देश में कमोबेश सभी कौम के लोग हैं, और संविधान की बात करें तो सभी एक ही पलडे पर हैं। ना कोई कम ना कोई ज्यादा। सम्पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ जीवन का विभीन्न आयाम देनेवाला एकमात्र देश भारत आज अपने ही अंग में हुए फोडे से द्रवित हैतकलीफ में है, असहनीय पीड़ा में है।
आदिकाल से ही भारत में एकीकरण का प्रयास रहा, चाहे वो युद्ध से हो या प्यार से, और हरेक प्रयास असफल ही रहा। दक्षिण के द्रविड़ और उत्तर के आर्य में विभीन्नता ने एकीकृत भारत के सपने को हमेशा झटके दिए। मगध नरेश महान सम्राट अशोक ने हिन्दुस्तान की सीमा का अद्वितीय विस्तार किया मगर हिंसा का जूनून एक बौध ने पल में अशोक को भिक्षु बना दिया।
लोग कहते हैं की मुगलों और अंग्रेजों ने हमारे देश को गुलाम बना कर हम हिन्दुस्तानियों पर ढेरक अत्याचार किए। सच है की मुग़ल ने पृथ्वीराज चौहान को सत्रहवेंवार में जाकर हराया और हिन्दुस्तान की गद्दी पर काबिज हुआ मगर गौरी को गद्दी किसने दी, जयचंद नामक हिन्दुस्तानी ने। अंग्रेज एक एक कर हमारे सारे प्रान्तों को हड़पता चला गया क्योँ ? क्या उस समय लडाके की कमी थी ? नही बल्की जयचंदों की भरमार थी।
देश के आजादी की लड़ाई अपने यौवन पर थी हम विजय के सन्निकट थे जब १९२५ में संघ की स्थापना की गयी थी। हेगडेवार महोदय इसके सेनानायक थे, ये वो नेता रहे जिनका स्वंतंत्रता संग्राम में योगदान कतिपय सोचनीय है मगर महत्वाकांक्षा का उन्माद, अंग्रेजों के हितैषी ने ऐसे समय में हिंदू मुसलमान का मामला उठाया जब देश को एकीकृत भारतीय की जरुरत थी ये उस समय भी अंग्रेजों से नहीं हिंदू-मुसलमान कर रहे थे अंग्रेजों की चापलूसी करना मंजूर था लेकिन उन मुसलमानों से मिल कर नहीं रह सकते जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बराबर की शहादत दी..१८५७ में क्रांति गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूसों के कारण हुई तो जब हमारे मंगल पांडे और अन्य बहादुरों ने अंग्रेजों से लड़ाई शुरू करी तब भी उन्होंने वही कारतूस अपने दांतो से काट-काट कर अंग्रेजों की मारी.... तब नहीं सोचा कि धर्म भ्रष्ट हो रहा है क्योंकि राष्ट्र धर्म ईश्वरीय धर्म से बड़ा है मगर आज हिन्दुओं के ठेकेदारों का धर्म भ्रष्ट हो रहा है। १९२५ में स्थापना के बाद से कितने संघ के लोगों को अंग्रेजों ने सजा दी या फ़ांसी दी? एक भी नहीं मगर जो अंग्रेज चाहते थे वो ही हुआ सत्ता की लालसा और वो भी धर्म के पंथ पर पाने की ने भारत की आजादी के अहसास को ना भूल पाने वाली पीड़ा में बदल दिया, जितने बलिदान हमने आजादी की लड़ाई में दी कई गुना ज्यादा लोगों के प्राण इन धार्मिक संगठनों की महत्वाकांक्षा ने ले ली। अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने वो काम कर दीखाया जो अंग्रेज चाहते थे। क्या स्वतन्त्रता संग्राम में सिर्फ़ हिन्दुओं ने अपनी आहुती दी थी , धर्म के नाम पर उभरे इस दल के धार्मिक विषाद के कारण ही १९०६ में स्थापित मुस्लीम लीग ने १९३० में अलग राज्य की मांग की।
"सर्वधर्म समभाव", "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय", "अतिथि देवो भव्:", इत्यादि इत्यादि हमारी संस्कृती है, और ये वो संस्कृति है जिसे ना ही हिंदू अपना बता सकता है और न ही मुसलमान, ये सिर्फ़ सिखों का नही है और न ही ईसाईयों का अपितु ये भारतीय संस्कृति है जो हमें राष्ट्रवाद सीखाती है।
आज जब हमारा देश तरक्की की रह पर है कमोबेश ही सही मगर दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है वापस इतिहास को दुहराते हुए जयचंदों की फौज हमारे देश की नींव को दीमक की तरह खोखला करने पर उतारू हैं। गांधी के देश में गोडसे की फौज तैयार हो रही है जो इस देश को अपनी जागीर समझ रही है। देश को हिंसा, उत्पात धर्म के नाम पर राजनीति अखाडे में डाल चुकी है। कभी मस्जिद का तोडा जाना तो टूटे हुए मस्जिद के कारण हजारो मंदिरों का ध्वस्त होना, धार्मिक उन्माद में गोधरा का कांड होना और प्रतिउत्तर में ट्रेन को आग के हवाले कर देना, चर्च के पादरी को परिवार समेत मरने का मामला हो या फ़िर बाकायदा चर्च को जलाने का सिलसिलेवार मामला, बम के धमाके हों या कश्मीर में अमरनाथ का मामला, उफ्फ्फ्फ्फ्फ....................... सारे कांड के पीछे सिर्फ़ धर्म और धार्मिकता के नाम पर आतंकवाद जबकी किसी भी धर्म में इस तरीके का जिक्र तक नही है तो क्या हम अपने तरीके अपने धर्म में शामिल करते जा रहे हैं ?
कश्मीर के उसपार हथियारों के साथ लोगों को तैयार करते हैं हम जिसे आतंकवाद कह रहे हैं वो ही कार्य कश्मीर के इधर होने पर आतंकवाद से अलग कैसे हो सकता है। किसी भी धर्म में बन्दूक उठानेवाले चार लोग उस धर्म के ठेकेदार नही हो सकते क्यूंकि धर्म में हिंसा बैर वैमनष्यता का कहीं स्थान नही है "मजहब नही सीखता आपस में बैर रखना"।
आज जब हमारा देश जल रहा है तो जरुरत हमारे राष्ट्र धर्म निभाने की है, देश में एकता, प्यार सद्भावना और विश्वास लाने की है, और कुछ लोग जो हमारे राष्ट्रीयता को खंडित करने का प्रयास कर रहे हैं उसको मूंह्तोड़ जवाब देखर खदेड़ देने का है और इसके लिए समस्त भारतवाशी को जात-पात, धर्म-कौम, रंग-भेद से ऊपर उठ कर वंदे मातरम् का नाद करना होगा।
जय हिन्दी
जय हिंद
वंदे मातरम
जय भारत
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सच्चा धर्मनिरपेक्षवादी
आशुतोष जी आपका बडा अनुभव रहा है,देश दुनिया को खूब देखा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा आपका ये लेख क्या असर कर सकता है ? ज़ाहिर है एक बार नहीं हज़ार बार सोचा होगा, क्योंकि आपसे लोग जो मीडिया के धुरंधर हैं, जिनके कंधों पर मत निर्माण की बडी-भारी ज़िम्मेदारी है। सही ग़लत को जस का तस दिखाने का भी भार है इन सब के बीच आप जैसे विशुद्ध धर्मनिरपेक्ष वादी ने ऐसी टिप्पणी की है, वरना किसी राष्ट्रवादी या तथाकथित धर्मनिरपेक्ष के पहरुआ के बस में नहीं है कि वो इस विडंबना पर कटाक्ष कर सकें ग़लतफहमी में ना रहें कि मैं आपकी आरती उतार रहा हूँ या यूँ ही आपसे नजदीकियाँ बढाने की फिराक़ में हूँ। सच ये है कि भारत में ऐंसा कभी नहीं हुआ जब किसी धर्म विशेष को इतना कटघरे में खडा किया गया हो। लेकिन आज सारे देश में जिस तरह से मुस्लिम भाइयों के खिलाफ एक मत खुद-व-खुद बन रहा है उसके लिये आम मुस्लिम क़तई दोषी नहीं है बल्कि इस धर्म के झंडाबरदार और उच्च शिक्षित लोग दोषी हैं। आपके विचार वास्तविक धर्मनिरपेक्षी हैं क्योंकि आज हिन्दुओं के खिलाफ बोलना और अल्पसंख्कों का पक्ष लेना ही सेकुलिरिज़्म है। विभाजन के बाद से अब तक कभी धर्मनिरपेक्षता शब्द तक की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि इस देश में कभी पारकी धर्म के लोगों से ना कभी यहाँ के धर्म को अपनाने का कहा गया और ना कभी उन्हें उनके पूजा विधान के लिये तरसाया गया फिर ये यूरोपियन शब्द क्यों इतना बडा मुद्दा बन बैठा है। मामला सीधा राजनीति से जुडा है जो अपनी मार्केटिंग के लिये एक मॉस्क लगाना चाहती है। और अब खोना नहीं चाहती आप समझ रहें हैं मैं क्या कह रहा हूँ। मस्ज़िद से देश चलेगा तो अल्पसंख्यक खुश नहीं होगा क्योंकि उसकी मंजिल भारत नहीं दुनिया है। कुछ भी करो अल्पसंख्यकों को खुश नहीं किया जा सकता हम ये आज़ादी से अब तक देख रहें हैं लेकिन अगर ऐंसा ही चलते रहा तो वहुसंख्यक ज़रूर ही नाखुश हो जायेंगे, जिसका मतलव सिविल वार है। और इसकी जिम्मेदार होगी देश की सबसे पुरानी और व्यक्तिवादी पार्टी कॉग्रेस होगी।
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एक हो जाओ वहुसंख्यकों......
देश के मूल-निवासी हम हैं
लोकतंत्र का मतलव ही बहुसंख्य है तो क्यों वोट बैंक की राजनीति को दोष दिया जा रहा है? एक बहुत ही साधारण सी बात है कि आज जो संकट भारत पर मंडरा रहा है, वह पैदा करने वाले तो देश के चच्चा बने बैठे हैं और चापलूसों की फौज चच्चा के पिल्लों को ढो रही है। मैं किसी का महिमा मर्दन नहीं कर रहा बल्कि एक सच को सबके सामने लाना चाहता हूँ,जो लोग जान कर भी अनजान बने हैं,उन्हे ये बता देना ज्ञरूरी है, कि लोकवादी बने व्यक्तिवादी नहीं देश के बाप,चाचा,मामा नहीं होने चाहिये तभी संप्रभू राष्ट्र हो सकता है। याद रखिये आप इस देश के मूल-निवासी हो तो आपकी ज्ञिम्मेदारी बाकियों से ज्ञ्यादा है। देश के अच्छे-बुरे का हमें ज्ञ्यादा ख्याल रखना है। वहुसंख्य लोकतंत्र की आत्मा है,तब याद रखिये वहुसंख्य आप हैं और सिर्फ आप। अपनी एकता का परिचय दें।
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